गुप्तोत्तर कालीन आर्थिक एंव सामाजिक दशा
➣ गुप्तोत्तर काल में महत्त्वपूर्ण सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं। एक महत्त्वपूर्ण आर्थिक परिवर्तन जिसने जीवन के महत्त्वपूर्ण पहलुओं को प्रभावित किया था-
❑ भूमिदान तथा उससे उत्पन्न सामंतीय व्यवस्था का विस्तृत रूप से अपनाया जाना।
➣ भूमि के दान एवं विभाजन के फलस्वरूप एक नवीन शिक्षित वर्ग (कायस्थ) का उदय हुआ।
प्रशासन व्यवस्था
➣ गुप्तोत्तर काल की एक प्रमुख विशेषता सामंतवाद का विकास तथा राजनीतिक विकेंद्रीकरण थी।
➣ इस काल में राजतंत्र सैद्धांतिक रूप से अनियंत्रित अथवा निरंकुश था। सामंतवाद के विकास से केंद्रीय सत्ता कमजोर हुई, जबकि प्रांतीय व स्थानीय सत्ता मज़बूत हुई।
➣ प्रशासन में राजा की सहायता के लिये अनेक मंत्री एवं पदाधिकारी होते थे। पाल, सेन, चंदेल, चौहान तथा कलचुरि अभिलेखों में मंत्रियों का उल्लेख मिलता है।
➣ इस काल में प्रशासनिक व्यवस्था विभिन्न स्तरों में विभाजित थी। हर स्तर पर विभिन्न प्रकार के अधिकारी मौजूद थे। थोड़े बहुत परिवर्तन के बाद पूर्व की व्यवस्थाएँ चलती रहीं।
➣ इस युग का सर्वाधिक विस्मयकारी परिवर्तन जातियों का प्रगुणन था, जिसने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यों और शूद्रों सभी को प्रभावित किया।
➣ भट्टभुवनदेव कृत अपराजितपृच्छा में महामण्डलेश्वर, मांडलिक, महासामन्त एवं लघु सामन्त सहित सामन्तों की नौ श्रेणियों के लिए भिन्न-भिन्न आकार प्रकार के घरों का उल्लेख है।
सामाजिक स्थिति
➣ समाज में ब्राह्मणों का स्थान सर्वश्रेष्ठ था। वे शास्त्रों द्वारा निर्दिष्ट आधार का पालन करते थे, वेद-वेदांग तथा अन्य शास्त्रों में पारंगत होते थे। उन्हें श्रोत्रिय, आचार्य तथा उपाध्याय कहा जाता था।
➣ गुप्तोत्तर काल में बाह्य आक्रमणों से उत्पन्न राजनीतिक उथल पुथल तथा आर्थिक विषमताओं ने ब्राह्मणों को अन्य व्यवसाय अपनाने के लिए बाध्य किया।
➣ मेधातिथि के अनुसार विदेशी आक्रमण से यदि खतरा हो और सामाजिक व्यवस्था के भय उत्पन्न हो जाय तो ब्राह्मण शस्त्र ग्रहण कर सकता है।
➣ मनु पर टीका करते हुए मेधातिथि ने वेदज्ञ ब्राह्मण को सेनापति तथा राजपद ग्रहण करने की अनुमति दी है।
➣ इस युग में स्मृतिकार पराशर ने ब्राह्मण के लिए कृषि एक सामान्य व्यवसाय बताया है, बशर्ते वे स्वयं खेती न करे।
➣ चालुक्य नरेश कुमारपाल के लेख में ब्राह्मण खेतिहारों के नाम तथा प्रतिहारों के पेहोवा अभिलेख में एक ब्राह्मण का घोड़े के व्यापारी के रूप में उल्लेख मिलता है।
➣ इस काल की स्मृतियों में ब्राह्मणों को आपातकाल में व्यापार से भी आजीविका चलाने की अनुमति थी।
➣ ह्वेनसांग ने टक्क (पंजाब) देश के ब्राह्मणों को स्वयं खेती करते देखा।
| ब्रह्म क्षत्रिय | वह ब्राह्मण जो क्षत्रिय कर्म अपना लेता है।
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| क्षत्र ब्राह्मण | वह जो युद्ध करके जीविका चलाता है।
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| सत् क्षत्रिय | क्षत्रियों से उच्चतम स्तर का दावा करने वाला।
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| वैश्य ब्राह्मण | वार्ता (कृषि, पशुपालन व व्यापार) से जीविका चलाने वाला।
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| निषाद ब्राह्मण | चोरी – डकैती करने वाला ब्राह्मण
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| शूद्र ब्राह्मण | लाख, नमक, दूध, शहद, घी आदि का व्यवसाय करने वाला।
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➣ ब्राह्मण को मृत्युदण्ड से छूट थी। ब्राह्मण के लिए सबसे कठोर दण्ड देश निकाला था। ह्वेनसांग ने भारत को ब्राह्मणों का देश कहा है।
➣ मनु के टीकाकार मेधातिथि ने लिखा है कि राजा शब्द अक्षत्रिय के लिए भी प्रयुक्त हो सकता है, बशर्ते की वह राज्य का स्वामी हो।
➣ अल्बरूनी के वृत्तान्त से पता चलता है कि राजपूत क्षत्रिय ब्राह्मणों के समान समझे जाते थे, किंन्तु खेतिहर क्षत्रिय और वैश्य बराबर थे और शूद्रों से बहुत ऊंचे नहीं थे, क्योंकि इन्हें वेद पढ़ने का अधिकार नहीं था और उनके धार्मिक कृत्य पुराणोक्त मंत्रों द्वारा होते थे, वैदिक मंत्रों द्वारा नहीं।
➣ ह्वेनसांग ने मनिपुर और सिन्ध देश के राजा को शूद्र कहा है।
➣ धर्मशास्त्रों में वैश्यों के लिए कृषि, पशुपालन और व्यापार जैसे व्यवसाय निर्दिष्ट किये गये हैं। पराशर ने कुसीदवृत्ति (सूद पर रुपया उधार लेना) वैश्य का व्यवसाय बताया है।
➣ इस काल में वैश्यों की स्थिति में गिरावट आयी। मनु धर्मसूत्र में वैश्यों को सर्वप्रथम शूद्रों के समकक्ष माना गया।
शूद्रों की स्थिति
➣ समाज में शूद्रों की संख्या सर्वाधिक थी। उनकी आर्थिक स्थिति में पर्याप्त उन्नति हुई; किन्तु सामाजिक स्थिति में कोई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन नहीं दिखाई देता है।
➣ शूद्रों में कुछ वर्ण संकर जातियाँ भी थीं। इन जातियों का जन्म उच्च जाति के पुरुषों का निम्न जाति की स्त्रियों के साथ या प्रतिलोम विवाह से हुआ।
➣ अल्बरूनी ने वैश्यों एवं शूद्रों में कोई अन्तर नहीं पाया है, उसके अनुसार इन दोनों को वेदों के अध्ययन या श्रवण की अनुमति नहीं थी।
➣ अल्बरूनी ने यह भी कहा कि “यदि इनमें (वैश्य एवं शूद्र) से किसी भी जाति के लोग वेदों का पाठ करते तो राजा उनकी जीभ कटवा देता था।” प्रायः ये दोनों एक ही गाँव और नगर में रहते थे।
➣ उदयन, तेजपाल इत्यादि धनी व्यापारी मंत्री पद पर नियुक्त थे। जयसिंह सिद्धराज के राज्यकाल में कई व्यापारियों को सामन्त की पदवी दी गई थी।
➣ इस काल के स्मृतियों एवं निबन्धों में भी सेवानिवृत्त के अतिरिक्त शूद्र के लिए अनेक व्यवसाय निर्धारित किये गये हैं।
➣ देवल एवं पराशर ने शूद्र के लिए सेवा के अतिरिक्त कृषि, पशुपालन, वाणिज्य तथा शिल्प उपयुक्त व्यवसाय बताए हैं।
➣ आर्थिक दृष्टि से इस युग की महत्त्वपूर्ण विशेषता है- कृषि कार्य का आमतौर पर शूद्रों का व्यवसाय होना।
➣ ह्वेनसांग तथा इब्नखुर्दाव ने कृषि को शूद्रों का व्यवसाय बताया है।
➣ व्यास, पराशर और वैजयन्ती में एक कृषि वर्ग का उल्लेख है, जिन्हें कुटुम्ब कहा गया है। इन्हें शूद्रों के अन्तर्गत रखा गया है।
➣ मेधातिथि उच्च वर्णों पर शूद्रों की निर्भरता के सिद्धान्त की पुनरावृत्ति करता है। उसने शूद्रों को संन्यास आश्रम से वंचित करते हुए कहा कि वे गृहस्थ जीवन में रहकर सन्तानोत्पत्ति तथा द्विजों की सेवा द्वारा पुण्य कमा सकते हैं।
➣ अल्बरूनी ने भी शूद्रों के प्रति ही नहीं अपितु वैश्यों के प्रति भी ऐसे उपर्युक्त दृष्टिकोण का उल्लेख किया है।.
➣ शूद्रों के बंधुआ होने के संकेत एक धार्मिक विचारधारा में मिलते हैं जो पूर्व मध्यकाल में अत्यन्त प्रभावी हो गई थी।
➣ शूद्र को दो वर्गों में विभक्त किया गया- सत् एवं असत्। सत् शूद्रों को पौराणिक विधि से संस्कार, पंचमहायज्ञ इत्यादि धार्मिक कृत्य करने का अधिकार दे दिया गया।
➣ मूर्त धर्म-समाज हित के लिए कार्य जैसे-तालाब खुदवाना, वृक्ष लगवाना आदि।
➣ इस युग की महत्त्वपूर्ण घटना राजपूतों का अभ्युदय है, जिन्होंने प्राचीन क्षत्रियों का स्थान ले लिया। इस काल में राजपूत शब्द लड़ाकू जातियों तथा सामन्त वर्ग के लिए प्रयुक्त किया जाने लगा।
➣ 12वीं शताब्दी तक राजपूतों की 36 जातियाँ प्रसिद्ध हो गयी थी जिसमें प्रमुख हैं- चालुक्य, चौहान, प्रतिहार, परमार, गुहिल, चन्देल, कछवाहा, मेद आदि। सातवीं-आठवीं शताब्दी में इनका उदय हुआ था।
कायस्थ वर्ग
➣ एक वर्ग के रूप में कायस्थों का सर्वप्रथम उल्लेख याज्ञवल्क्य स्मृति में मिलता है, जबकि एक जाति के रूप में सर्वप्रथम उल्लेख ओशनस स्मृति में मिलता है।
➣ कायस्थों को भूमि-सीमा निर्धारण सम्बन्धी दस्तावेज रखने पड़ते अर्थात् भूमि तथा राजस्व सम्बन्धी इन सभी कार्यों का हिसाब- किताब रखना पड़ता था।
➣ कायस्थों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में उनका द्वयर्थक रुख रहा। कुछ ने उनकी उत्पत्ति द्विजाति से बताई है, किन्तु अनेक ब्राह्मण ग्रन्थों में उन्हें शूद्र कहा गया है।
अस्पृश्यता
➣ वृहद्धर्म और स्कन्द पुराण में जिन अंत्यज जातियों का उल्लेख किया गया है, उसकी संख्या अठारह थी। प्रारम्भिक स्मृतियों के रचनाकाल में अछूतों को अंत्यज कहा जाता था।
➣ अल्बरूनी ने अंत्यजों को चारों वर्णों या जातिक्रम से बाहर का माना है। अन्त्यजों का सामाजिक स्तर शूद्रों से बहुत नीचे था, उन्हें प्रायः उच्च जाति के लोगों की बस्तियों से दूर रहना पड़ता था।
वर्ण संकर जातियाँ
➣ शिल्पियों व श्रेणियों के जातियों में परिवर्तित होने से तथा प्रतिलोम विवाह के कारण गुप्तोत्तर काल में जातियों की संख्या में बढ़ोतरी हुई।
➣ वैजयंती ने 64 वर्ण संकर जातियों की सबसे लम्बी सूची दी है, जबकि राजतंरगिणी में 64 उपजातियों का वर्णन है।
➣ इन वर्ण संकर जातियों की उत्पत्ति चारों वर्णों के पुत्रों, बारह अनुलोम और प्रतिलोम विवाह से उत्पन्न पुत्रों और उसके अड़तालिस प्रशाखाओं से हुई थी।
➣ अनुलोम जातियाँ द्विज मानी जाती थी, इसलिए उन्हें यज्ञोपवीत संस्कार का अधिकार था।
➣ बृहदधर्म पुराण में छत्तीस वर्ण शंकर जातियों का उल्लेख है, इन्हें शूद्र का स्तर प्रदान किया गया है। इस काल में जन्म वर्ण संकर जातियों में कायस्थ सर्वाधिक उल्लेखनीय थे।
दास प्रथा
➣ पूर्व मध्यकाल में दास प्रथा में वृद्धि हुई, इन्हें किसी सामाजिक वर्ग के रूप में नहीं माना गया था। दासों की सामाजिक स्थिति अंत्यजों तथा तिरस्कृत जातियों से अच्छी थी।
➣ विज्ञानेश्वर ने मिताक्षरा में नारद द्वारा कथित पन्द्रह प्रकार के दासों का उल्लेख किया है।
➣ लेख पद्धति के अनुसार वस्तुओं के विनिमय में दासों का निर्यात समुद्री मार्ग से पश्चिम देशों को होता था।
➣ दास-दासियों को दान में देने की प्रथा इस काल में बहुत प्रचलित हो गई थी। बौद्ध मठों और मन्दिरों को दास दान के रूप में दिये जाते थे।
➣ विज्ञानेश्वर के अनुसार ऋण न चुका सकने के कारण ऋणी स्वयं को ऋणदाता का दास बना लेता था। दास प्रायः घरेलू कामों में ही लगाए जाते थे।
➣ पूर्वकाल की अपेक्षा इस काल में दासों की स्थिति में काफी गिरावट आई।
विवाह
➣ सामान्यतः अन्तर्जातीय विवाह से सम्बन्धित स्मृति नियम प्रचलित थे। अनुलोम-अन्तर्जातीय विवाह से उत्पन्न सन्तान की जाति माता पर आधारित होगी। इस नियम की पुष्टि पूर्वमध्यकालीन अभिलेखों तथा अल्चरूनी के विवरण से होती है।
➣ विज्ञानेश्वर एवं अपरार्क ने तीन उच्च वर्गों द्वारा असवर्ग विवाहों (शूद्रों के साथ विवाह) का अनुमोदन किया है।
➣ आदर्श विवाह आठ वर्ष का माना जाता था। आठ वर्ष की लड़की को गौरी तथा दस वर्ष की लड़की को कन्या कहा जाता था।
➣ शासक वर्ग में बहु-विवाह प्रथा व्यापक रूप से प्रचलित थी। अल्बरूनी के अनुसार ब्राह्मण अनुलोम अन्तर्जातीय विवाह कर सकते थे।
स्त्रियों की दशा
➣ स्त्रियों की स्थिति में गिरावट आई व बाल विवाह की प्रथा में तेजी आई। बाल विवाह से स्त्री शिक्षा पर असर पड़ा।
➣ सती प्रथा अत्यधिक प्रचलित हो गई। अंगिरा, हारीत आदि पूर्व मध्यकालीन स्मृतियों तथा अपरार्क, विज्ञानेश्वर आदि निबंधकारों ने सती प्रथा की प्रशंसा की।
➣ मेधातिथि ने सती प्रथा को आत्महत्या कह कर इसकी आलोचना की है। बाणभट्ट व देवण्णभट्ट ने भी सती प्रथा की निन्दा की है।
➣ पूर्व काल में सती प्रथा को बढ़ावा इसलिए मिला क्योंकि सामन्तों व राजाओं द्वारा अधिक संख्या में पत्नियाँ व स्त्रियाँ रखने के कारण संपत्ति विषयक विवादों को बढ़ावा मिला।
➣ विधवा विवाह निषेध था। अतः संपत्ति के विवादों से बचने व विधवा के दण्डनीय जीवन से मुक्ति का समाधान पति के साथ सती होने में दिखाई दिया।
➣ पूर्व मध्यकाल में महिलाओं के संपत्ति संबंधी अधिकारों में वृद्धि हुई। इसका कारण यह था कि सामंती समाज के विकास के कारण निजी संपत्ति की अवधारणा को बल मिला।
➣ वैजयन्ती में सच्चरित्र महिला को परिवृक्ति, युद्ध में जीती हुई स्त्री को कालकलि, उपपत्नी को अवरोध वधू तथा चंचल स्त्रियों को विलासिनी कहा है।
आर्थिक दशा
➣ इस काल में कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार थी। अग्निपुराण के अनुसार कृषि की वृद्धि के लिए सिंचाई के साधन जुटाना राजा के प्रमुख आठे कर्त्तव्यों में से है।
➣ नीतिवाक्यामृत में अनेक प्रकार के संग्रहों में धान्य संग्रह सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
➣ गुप्तोत्तर काल में अधिकारियों, मंदिरों, ब्राह्मणों आदि को उनकी सेवाओं के बदले भू-क्षेत्र प्रदान करने से सामंतवाद का उदय हुआ। यद्यपि भूमिदान की प्रथा का प्रारंभ सातवाहन काल में हुआ था।
➣ मिताक्षरा के अनुसार भूमिदान का अधिकार सिर्फ राजा को था, न कि सेवा के बदले सम्पत्ति प्राप्त करने वाले को।
➣ मेधातिथि के अनुसार राजा ही भू-स्वामी है; परन्तु उन्होंने यह भी बताया कि भूमि उसकी होती है, जो उसकी सफाई करके उसे कृषि योग्य बनाता है।
➣ बृहत्संहिता एवं अमरकोश जैसे छठी शताब्दी के ग्रंथों में कृषि, फलों एवं बागानों पर अलग से अध्याय देकर उसे समझाया गया है।
➣ अभिधानरत्नमाला नामक ग्रंथ में तत्कालीन समय में बोये एवं उपजाये जाने वाले विभिन्न अनाजों का वर्णन है।
➣ उत्पादकता के हिसाब से भूमि का वर्गीकरण किया गया है-
| वाहीत | भूमि, जिसमें बोया जाता हो।
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| अकृष्ट | जिसमें खेती न की गई हो।
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| ऊसर | जहाँ बीज न उगता हो।
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| खिल-परती | जिस भूमि को जोता नहीं जाता।
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| साक्त | व्यक्तिगत स्वामित्व वाली भूमि।
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| इरिण | बंजर भूमि |
➣ ऐसी भूमि जिस पर खेती न की जाती हो, राज्य के अधिकार क्षेत्र या स्वामित्व के अन्तर्गत होती थी।
➣ जिन जमीनों का मुक्त या निःशुल्क अनुदान किया गया था, उन्हें आप्रद, शासन, चतुर्वेयग्राम, ब्रह्मदेय ग्राम आदि कहा जाता है; परन्तु प्रायः अनुदान प्राप्तकर्ता को भूमि को बन्धक रखने या बेचने का अधिकार नहीं होता था।
➣ स्थायी रूप से प्रदत्त धर्मदाय धन को मूल्य, नीवि या अक्षयनीवि आदि नामों से जाना जाता था।
| कौटुम्बिक | जिस कृषि योग्य भूमि पर पूरे कृषक परिवार का स्वामित्व होता था।
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| साक्त | व्यक्तिगत या एक कृषक के स्वामित्व वाली भूमि
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| प्रकृष्ट या कृष्ट | विभिन्न कृषकों द्वारा जोती जाने वाली भूमि। |
➣ भूमि बंधक रखने का प्रथम उल्लेख बृहस्पति के द्वारा किया गया है।
➣ बंधुआ मजदूरी का सबसे पहला उल्लेख भागवत् पुराण (8वीं सदी) में मिलता है।
➣ स्वतन्त्र किसान ( कुटुम्बी ) जो भूमि के स्वामी थे और राज्य को अनेक प्रकार के कर देते थे।
➣ वे किसान जो बटाई पर खेती करते थे। इन्हें त्यधसीरिन या सीरिन कहा गया है। इन्हें उपज का 1/3 या 1/4 भाग मिलता था।
➣ किसान मजदूरों को उपज का 1/10 से 1/4 भाग मिलता था।
➣ हर्षचरित में आदिवासी कृषकों का उल्लेख है। गुप्तकाल के अभिलेखों में शिल्पी (बढ़ई) के खेत का उल्लेख है।
सिंचाई व्यवस्था
➣ राजतरंगिणी में खूया नामक इंजीनियर का उल्लेख है जिसने झेलम नदी पर बांध बनाकर नहर निकलवाई।
➣ चंदेल राजाओं ने राहिल्यसागर और कीरतसागर नामक जलाशय बनाये।
➣ सिंचाई रहट से होती थीं संस्कृत ग्रंथों में अरघट्ट का उल्लेख है। इसको खींचने वाले को अरघट्टीयनर कहा जाता है। रहट के प्रयोग का प्रथम उल्लेख गाथासप्तशती में मिलता है।
➣ बाणभट्ट के हर्षचरित में सिंचाई के साधन के रूप में तुलायंत्र (जल पंप) का उल्लेख मिलता है।
➣ ह्वेनसांग के अनुसार हर्ष के समय खेतों में सिंचाई के लिए घंटी यन्त्र तथा उद्घघटि का प्रयोग किया जाता था।
कर व्यवस्था
➣ जमीन का उत्पादन क्षमता एवं वास्तविक उत्पादन के आधार पर 1/12 से लेकर 5/6 भाग तक निर्धारित होता था।
➣ करों का संग्रह गाँव का मुखिया करता था। इस काल में कुछ प्रमुख करों का विवरण निम्नलिखित है-
| भाग | उपज का हिस्सा (भूमिकर)
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| भोग | फल, फूल, लकड़ी आदि उपहारस्वरूप राजा को प्रदान करना।
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| हिरण्य | नकद रूप में वसूल किया जाने वाला कर (अतिरिक्त)।
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| प्रस्थ | अधिकारियों का हिस्सा।
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| उपरिकर | अस्थायी कृषकों पर लगने वाला कर |
➣ भूमि मापन के लिये कुछ लोक प्रचलित मापक थे-निर्वतन, पट्टिकहल, पातक, खरिवाप, कूल्यवाप, द्रोणवाप, आढ़वाप, खंडूकवाप, नालिकवाप आदि।
व्यापार
➣ सामन्तवाद के कारण बंद व स्थानीय अर्थव्यवस्था का विकास हुआ। ग्राम आत्मनिर्भर थे अतः व्यापार वाणिज्य में गिरावट आई।
➣ गुप्तोत्तर काल में व्यापार का ह्रास हुआ, जिसके अनेक कारण थे-चोर-डाकुओं के कारण मार्गों का असुरक्षित होना, सामंतवादी प्रवृत्ति बढ़ने के कारण केंद्रीय शक्ति का ह्रास तथा व्यापारियों के एक राज्य से दूसरे राज्य में आने-जाने पर अधिक चुंगी कर आदि।
➣ मालवा गन्ना, नील व अफीम के लिए, मगध व कलिंग धान के लिए प्रसिद्ध थे। गुजरात सूती कपड़े व नील के लिए प्रसिद्ध था।
➣ उज्जैन व कन्नौज (कान्यकुब्ज) इस समय के समद्ध नगर थे। बंगाल मलमल, पान, सुपारी तथा सण के लिए प्रसिद्ध था एंव दक्षिण मोती, मूल्यवान पत्थर, चन्दन, मसाले आदि के लिए प्रसिद्ध था।
➣ पूर्वी तट के बन्दरगाह :- ताम्रलिप्ति, सप्तग्राम, पुरी, कलिंग व शिकाकोस। इस काल में ताम्रलिप्ति के स्थान पर सप्तग्राम का महत्त्व बढ़ा। पश्चिमी तट के बन्दरगाह :- देवल, थाना, खंभात, भड़ौँच तथा सोमनाथ।
➣ इन बन्दरगाहों से आयातित (बाहर से) वस्तुएं थीं- सोना, टिन, ताँबा, मसाले, मूंगा तथा घोड़े आदि।
➣ दसवीं शताब्दी के मनु के टीकाकार मेधातिथि, कुवलयमाला तथा कथासरित्सागर से ज्ञात होता है कि व्यापारी पण्य वस्तुओं को एक नगर से दूसरे नगर में ले जाकर बेचते थे।
➣ पेहोवा अभिलेख में देश के विभिन्न भागों में आने वाले घोड़ों के क्रय-विक्रय करने वालों की गोष्ठी का उल्लेख है। कुवलयमाला से ज्ञात होता है कि उत्तरापथ से घोड़े खरीदे जाते थे।
➣ तरशुल्क राज्य की आय का प्रमुख स्रोत था। पाल अभिलेखों में इसे वसूलने वाले अधिकारी को तरिक कहा गया है।
➣ मल्लकर या तुरुष्क दण्ड उपद्रवी जनजातियों से निपटने के लिए लगाया जाता था। (अतिरिक्त कर)
➣ अरब आक्रमणों के कारण पश्चिमी एशिया के साथ व्यापार में हास हुआ। 8वीं शताब्दी से भारत का व्यापार उत्तर-पश्चिमी दर्रों से होकर मध्य एशिया तथा चीन के साथ हो रहा था।
➣ 10वीं शताब्दी में गुजरात में चालुक्यों का शासन स्थापित होने से समुद्री व्यापार को प्रोत्साहन मिला, क्योंकि चालुक्य शासकों ने समुद्री व्यापारियों को सुरक्षा प्रदान की।
➣ चीन के साथ भारत का व्यापार अरबों एवं हिन्द एशिया के व्यापारियों की प्रतिद्वंद्विता के कारण कम हो रहा था; किन्तु चोल सम्राट राजेन्द्र चोल की श्री विजय, सुमात्रा पर विजय के फलस्वरूप चीन के साथ व्यापार मार्ग खुल गया।
➣ चीन से बढ़ती हुई मात्रा में सोने और चाँदी के निर्यात को रोकने के लिए 1296 में चीन राज्य को नियम बनाने पड़े।
उद्योग
➣ पूर्व मध्यकाल की स्मृतियों में शिल्प और उद्योग शूद्र के लिए आवश्यक व्यवसाय माने गये।
➣ वस्त्र उद्योग विकसित अवस्था में था। मानसोल्लास के अनुसार 12वीं शताब्दी में मुल्तान, अन्हिलवाड़ व कलिंग वस्त्र उद्योग के प्रमुख केन्द्र थे। अपरान्त, मालवा, काशी, बंगाल व मदुरा भी वस्त्र उद्योग के केन्द्र थे।
➣ ह्वेनसांग ने कश्मीर के सफेद लिनन का उल्लेख किया है। ह्वेनसांग ने अनेक प्रकार के रेशमी एवं सूती वस्त्रों का उल्लेख किया है। पौधों के रेशों से बना हुआ कपड़ा दुकूल कहलाता था।
➣ बाण ने हर्षचरित में रेशम के बने अनेक प्रकार के वस्त्रों का उल्लेख किया गया है- जैसे- लाल, तुंज, अंशुक, चीनांशुक।
➣ भड़ौच के बने हुए वस्त्र इतने प्रसिद्ध थे कि, उन्हें वरोज कहा जाता था। खम्भात के बने वस्त्र खंबायात के नाम से जाने जाते थे।
➣ मध्यदेश चुनरी के लिए प्रसिद्ध था। कश्मीर में वस्त्रोद्योग-विशेषकर सफेद लिनन का उल्लेख ह्वेनसांग ने किया है।
➣ शांतिदेव के शिक्षा समुच्चय (7वीं शताब्दी) से ज्ञात होता है कि वाराणसी श्रेष्ठ रेशम के लिए प्रसिद्ध था।
➣ कामरूप (असम) का चित्रपट्ट व जातिपट्ट (रेशम का कपड़ा) प्रसिद्ध वस्त्र थे।
➣ अरब यात्री सुलेमान ने बंगाल की मलमल के बारे में लिखा है कि यह इतनी महीन होती है कि अंगूठी के बीच से पूरा थान निकल जाये।
➣ इब्न हौकल के अनुसार सिन्ध का देवल नगर तलवारों के निर्माण के लिए प्रसिद्ध था।
➣ शिल्प व उद्योग श्रेणियों में संगठित होते थे। श्रेणी एक ही व्यवसाय करने वाले लोगों का संगठन होता था। वे अनेक स्थानों के लोग भी हो सकते थे बशर्ते वे एक ही व्यवसाय करने वाले लोग हो ।
➣ श्रेणी का मुखिया महत्तक या माहर कहलाता था। इन श्रेणियों की कार्य समिति को कार्यचिंतक कहा गया है।
➣ वृहद्संहिता में सर्वप्रथम न केवल वर्ण के आधार पर बल्कि, आर्थिक आधार पर श्रेणियों का निर्धारण कर गृहों का आकार निर्धारित किया गया।
मुद्रा
➣ पूर्व मध्यकाल में सिक्के का प्रयोग कम हो गया। विदेशी व्यापार में गिरावट एवं सामंती व्यवस्था में राज्य कर्मचारियों को वेतन के स्थान पर भूमिदान दिये जाने के कारण सिक्कों की आवश्यकता कम हो गई।
➣ शुद्ध सिक्के तो बहुत ही कम मिले है। साधारण लेन-देन कौड़ियों के माध्यम से होता था जिन्हें प्रतिहार अभिलेखों में कपर्दक कहा गया है।
➣ अरब यात्रियों के वृत्तान्तों से स्पष्ट है कि व्यापार वस्तु विनिमय के माध्यम से होता था।
➣ सोने के सिक्कों की मात्रा बहुत कम थी। अधिकांश सिक्के चाँदी एवं ताँबे के थे। पाल एवं सेन राजाओं में केवल देवपाल के 6 सोने के सिक्के मिले हैं और गुजरात के चालुक्यों में केवल जयंसिंह सिद्धराज का एक सोने का सिक्का मिला है।
धार्मिक स्थिति
➣ गुप्तोत्तर काल में शैव, वैष्णव, बौद्ध एवं जैन सभी धर्मों का समाज में स्थान था। शक्ति पूजा इस काल में बहुत व्यापक हो गई। पूजा और भक्ति दोनों ही तांत्रिक धर्म के अभिन्न तत्त्व बन गए।
➣ बुद्ध मन्दिरों को गाँव दान में मिलते थे। इन गाँवों से पैदावार का राजकीय भाग मेलावार कहलाता था
➣ बुद्ध और जिन को विष्णु का अवतार माना जाने लगा। अवतारवाद जन साधारण के पुनरुत्थान की आशा एवं आकांक्षा का प्रतीक था।
बौद्ध एंव जैन धर्म
➣ राजपूताना में अधिकांश हिन्दू तथा जैन धर्मानुयायी थे। पाल राजाओं के संरक्षण में बंगाल और बिहार में बौद्ध धर्म सम्पन्न अवस्था में था।
➣ महायान बौद्ध धर्म विकृत होकर मंत्रयान, वज्रयान व सहजयान जैसे तंत्र सम्प्रदायों का आधार बन गया। पाल राजाओं के काल में सहजयान का विकास हुआ।
➣ सहजयानियों का मार्ग योग-क्रिया का है। चर्य्यापदों एवं दोहों से सहजीया बौद्धों के मूल सिद्धान्तों का ज्ञान होता है।
➣ महायान का नया रूप मंत्रयान के रूप में आया। मंत्रयान में धरणियों का प्रमुख स्थान है। प्रारम्भ में मंत्रयान ग्रन्थों में बोधिसत्व अवलोकितेश्वर की पूजा की जाती थी; किन्तु आगे चलकर तारा की पूजा की महिमा का वर्णन है।
➣ बंगाल में पालवंशीय राजाओं के राज्यकाल में वज्रयान में मंत्र पाठ तथा कर्मकाण्ड के विरोध में एक पृथक तान्त्रिक सम्प्रदाय बना, जो सहजयान के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
➣ तान्त्रिक रचनाओं का प्रारम्भ छठी शताब्दी माना गया है। तान्त्रिक साधना में मंत्र, बीज, यन्त्र तथा मुद्रा को विशेष महत्त्व दिया गया है। यह तान्त्रिक साधना स्त्री, शूद्र सभी के लिए थी।
➣ तान्त्रिक धर्म में चर्य्या, क्रिया, योग एवं ज्ञान द्वारा सिद्धि प्राप्त की जा सकती है।
➣ तान्त्रिक पद्धति में पंचमकार- मद्य, मत्स्य, मांस, मुद्रा तथा मैथुन के उपयोग के कारण तान्त्रिक सम्प्रदाय की निन्दा की जाती है।
➣ नालन्दा देश का सर्वोच्च शिक्षा संस्थान तथा बौद्ध संस्कृति का अन्तर्राष्ट्रीय केन्द्र था।
➣ दक्षिण के कदम्ब, गंग, होयसल, राष्ट्रकूट तथा पश्चिमी चालुक्यों ने तथा गुजरात के चालुक्य शासकों ने जैन धर्म को संरक्षण प्रदान किया।
➣ राजस्थान व मालवा में भी जैन धर्म को प्रश्रय मिला। राजस्थान में अनेक जैन मन्दिरों का निर्माण हुआ, जिनमें ओसिया में महावीर का मन्दिर प्रसिद्ध है।
➣ सोमेश्वर ने विजोलिया जैन मन्दिर को एक गाँव दान में दिया।
➣ पल्लव तथा चोल अभिलेखों में परिहार शब्द का उल्लेख मिलता है, जिसका अर्थ है- ‘देवदान भूमि की राज्य करों से मुक्ति तथा राज्य के भूमि अधिकारों का मन्दिरों को हस्तांतरित होना।’
➣ पूर्व मध्यकाल में जैनों ने अपभ्रंश भाषा में साहित्य लिखकर साहित्य की अमूल्य सेवा की।
शक्ति पूजा
➣ शक्ति पूजा पूर्व मध्यकाल में बहुत व्यापक हो गई। ईश्वरीय सम्प्रदायों में शक्ति, परमदेवता की अर्द्धांगिनी के रूप में संसार में प्रचलित हो गई।
➣ संस्कृति संक्रमण की क्रिया विधि में आदिवासियों की मातृदेवी हिन्दू तथा बौद्ध धर्म में शक्ति या तारा के रूप में ग्रहण की गई।
➣ छठीं शताब्दी से शक्ति-उपासना स्पष्ट एवं निश्चित रूप से दिखाई देती है। दुर्गा की उपासना प्रचलित करने का श्रेय मार्कण्डेय पुराण को है।
➣ यद्यपि अग्नि और वराह पुराण में गणेश को उद्देश्य-पूर्ति में विघ्न डालने वाला कहा गया है; किन्तु जनसाधारण में गणेश को सिद्धि देने वाला तथा उद्देश्यों की पूर्ति में सहायक देवता माना गया है।
शैव धर्म
➣ शैव धर्म पाशुपत, कापालिक, अघोरी, लिंगायत, शैवाद्वैत आदि अनेक उप-संप्रदायों में विभाजित था। हिन्दू धर्म में जितने भी सम्प्रदाय थे, उनमें शैव सम्प्रदाय सबसे अधिक प्रबल था।
➣ परमार नरेश शैव मतानुयायी थे। भोज परमार ने शैव धर्म पर तत्व परीक्षा नामक पुस्तक लिखी और उदयपुर में नीलकंठेश्वर मन्दिर बनवाया था।
➣ पाल, सन व मैदल राजाओं के अभिलेख ओम नमः शिवाय की प्रार्थना से शुरू होते हैं।
➣ बंगाल के सेन शासक विश्वरूप सेन तथा केशव सेन सूर्योपासक होने के कारण परमसोर पदवी से विभूषित किये गए।
➣ दक्षिण भारत के शैव अनुयायियों को नयनार कहा जाता था। इनकी संख्या 63 थी। नयनारों में प्रमुख तीन थे- सन्त अप्पार, नान सबंदर तथा सुन्दर मूर्ति, तिरुज्ञान।
➣ शैव नयनारों की भक्ति भावनात्मक थी। उसके बाद आने वाले आचार्यों ने शैव मत के बौद्धिक एवं दार्शनिक पक्ष को प्रस्तुत किया। इन आचार्यों को संतानाचार्य कहा गया था, जिसमें भराई ज्ञान तथा उमापति शिवाचार्य के नाम विशेष उल्लेखनीय थे।
➣ इस युग के अन्तिम चरण (12वीं शताब्दी) में दक्षिण में वीर शैव मत का आविर्भाव हुआ। इसके प्रवर्तक वासवराज थे।
➣ वीर शैव मत एक क्रान्तिकारी सम्प्रदाय था। इस मत के अनुयायी लिंगायत कहलाते थे। वे अहिंसा में विश्वास करते थे; किन्तु वर्णाश्रम धर्म और जातिवाद का विरोध करते थे।
➣ वासव सन्यास एवं तप में विश्वास नहीं करते थे, उनका मत था कि प्रत्येक व्यक्ति को श्रम से आजीविका अर्जित करनी चाहिए।
➣ शैव मत से सम्बन्धित नाम्बि-आदार-नाम्बि को 11 तिरुमुरायो के विशाल संग्रह के कारण तमिल व्यास कहा जाता है।
➣ वीर शैव सन्तों के भक्ति गीतों को वचन शास्त्र कहा जाता है। वीर शैव 63 पुरातन सन्तों की पूजा करते थे ।
➣ वीर शैवमत में गुरु, जंगम और लिंग को अधिक महत्त्व दिया गया है। आठ नियमों का पालन धर्म में प्रगति के लिए आवश्यक माना गया। ये आठ नियम प्रत्येक लिंगायत बालक को सिखाए जाते हैं।
वैष्णव धर्म
➣ गुप्तोत्तर काल में वैष्णव धर्म भारत वर्ष में प्रचलित था; किन्तु इसका गढ़ दक्षिण भारत में तमिल प्रदेश था जहाँ वैष्णव मत के आदि प्रवर्तक अलवार सन्त थे।
➣ अलवार संतों की संख्या 12 थी, जिनमें प्रमुख हैं :- तिरूमंगाई, पेरिय अलवार, अण्डाल, नाम्मालवार, मधुरकवि, कुलशेखर (पाण्ड्य राजा), तिरूप्पान, भूतयोगी, महायोगी, सरोयोगी आदि।
➣ शूद्र सन्त तिरुमंगाई, पेरिय अलवार, उसकी पुत्री स्त्री सन्त आण्डाल तथा नाम्मालवार सर्वप्रसिद्ध थे।
➣ अलवार भक्ति आन्दोलन की प्रमुख विशेषता है कि, यह आन्दोलन मूलतः भावनात्मक है, दार्शनिक नहीं।
➣ अलवारों ने वैष्णव धर्म में भावनात्मक पक्ष का प्रसार किया, तो आचार्यों ने बौद्धिक और दार्शनिक पक्ष को भी अपनाया। उनके शिक्षाओं में कर्म, ज्ञान एवं भक्ति का सम्मिश्रण था।
➣ अलवार आचार्य श्री वैष्णव सम्प्रदाय के निर्माता थे। इन आचार्यों में सर्वप्रथम नाथमुनि थे। उन्हें राजेन्द्र चोल का समकालीन माना जाता है।
➣ प्रतिहार नरेश मिहिरभोज ने आदिवराह की उपाधि धारण की और इसी शैली के सिक्के जारी किये।
➣ मन्दिरों के कर्मचारियों एवं देवदासियों को, जो भूमि वेतन के बदले दी जाती थी, उसे वेलि भूमि कहा जाता था।
➣ दक्षिण के (विशेषतः चोल कालीन) मन्दिरों का राजधानी तथा साम्राज्य की अर्थव्यवस्था से घनिष्ठ सम्बन्ध था।
➣ एन्नारियम गाँव ब्राह्मणों का गाँव था। इसे चतुर्वेदी मंगलम् कहा गया है। यहाँ के मन्दिर से लगा हुआ एक विद्या मन्दिर था, जिसे गंगैकोण्ड चोलमंडप कहा गया है।
➣ मन्दिर ने नाट्य एवं संगीत कला को भी प्रोत्साहन दिया। मन्दिरों में उत्सवों पर धार्मिक नाटकों का अभिनय होता था। राजेन्द्र चोल के ही समय मन्दिर के मण्डप पर राजराजेश्वर नाटक का अभिनय कराया गया था।
सूर्य पूजा
➣ आदित्य सेन व जीवित गुप्त के शाहपुर और देवबर्नाक अभिलेख में सूर्य पूजा का उल्लेख है।
➣ मोढ़ेरा (गुजरात) का सूर्य मंदिर भी प्रसिद्ध है। मन्दसौर, मूलस्थान (गुजरात) तथा माडास्यात (बुलन्दशहर) में सूर्य मन्दिर बने थे।
➣ ललितादित्य ने कश्मीर में सूर्य का प्रसिद्ध मार्तण्ड मंदिर बनवाया।
➣ मुल्तान के प्रसिद्ध सूर्य मंदिर का उल्लेख ह्वेनसांग, अबूजईद, अलमसूदी तथा अलबरूनी ने किया है। मुल्तान सूर्य पूजा का प्रसिद्ध केन्द्र था।
➣ बंगाल के सेन शासक विश्वरूप सेन तथा केशव सेन ने सूर्योपासक होने के कारण परमसौर की उपाधि ग्रहण की।
➣ ह्वेनसांग के अनुसार मुल्तान के सूर्य मन्दिर का निर्माण साम्ब द्वारा करवाया गया था।
➣ मोडेरा (गुजरात), औसिया (जोधपुर), कोणार्क (उड़ीसा) आदि प्रसिद्ध सूर्य मन्दिर हैं।
➣ राजस्थान में सूर्य का सबसे प्राचीन मन्दिर चित्तौड़ दुर्ग में स्थित कालिका माता का मन्दिर है।
भाषा एवं साहित्य
➣ आठवीं शताब्दी के एक जैन ग्रंथ कुमाल में 18 जमुख राष्ट्रों नाथा 15 प्रकार के लोगों की नृवंशात्मक विशिष्टताओं का वर्णन है।
➣ पूर्व मध्यकाल भाषा की दृष्टि से क्षेत्रीयता के चिह स्तुत करता है। संस्कृत के प्रयोग में क्लिष्ट एवं कृत्रिमना आती जा रही थी।
➣ अपभ्रंश का विकास आद्य हिन्दी, आद्य बंगाली , आद्य गुजराती, आद्य राजस्थानी व आद्य मराठी में हो रहा था।
➣ क्षेत्रीय भाषा के साथ-साथ क्षेत्रीय निमिया का भी विकास हुआ। सिद्धपात्रका इस काल में विकसित हुई लिपि थी।
वास्तुकला
➣ गुप्तोत्तर काल की वास्तुकला की मुख्य कृतियाँ मंदिर हैं। भौगोलिक आधार पर शास्त्रकारों ने इसकी तीन शैलियाँ निर्धारित की हैं- नागर, द्रविड़ और बेसर।
नागर शैली
➣ नागर शैली उत्तर भारत में हिमालय से विध्य प्रदेश के भू-भाग में विकसित हुई। नागर शैली के मंदिर चतुष्कोणीय होते हैं।
➣ इस शैली के मंदिरों के शिखरों में खड़ी रेखा की प्रधानता होने के कारण इसे रेखीय शिखर कहते हैं। वर्गाकार तथा ऊपर की ओर वक्र होते हुए शिखर इन मंदिरों की विशेषताएँ हैं।
➣ नागर शैली के प्रसिद्ध मंदिर- लिंगराज मंदिर (भुवनेश्वर), सूर्य मंदिर (कोणार्क), जगन्नाथ मंदिर (पुरी). कंदरिया महादेव मंदिर (खजुराहो), सूर्यमंदिर (मोढेरा), दिलवाड़ा जैन मंदिर (माउंट आबू) आदि।
➣ लिंगराज मन्दिर पूर्व विकसित आर्य नागर शैली के सर्वोत्तम उदाहरण हैं।
➣ भारतीय राजाओं और पूर्वी वासुकला की महान उपलब्धि कोणार्क का सूर्य मन्दिर है। इसकी एक विशेषता यह है कि मन्दिर के भवनों के सभी बाह्य भाग उकेरी हुई आकृतियों से सजे हुए हैं।
➣ खजुराहो के मन्दिर चंदेल राजाओं के समय 950-1050 ई. के बीच बनाये गये हैं, खजुराहों में मन्दिर चबूतरों पर निर्मित हैं।
द्रविड़ शैली
➣ द्रविड़ शैली का विस्तार कृष्णा तथा कन्याकुमारी अंतरीप के बीच अर्थात् आधुनिक तमिलनाडु प्रदेश में है।
➣ इस शैली के मंदिरों के बनावट की विशेषता है-वर्गाकार गर्भगृह पर पिरामिडनुमा अर्थात् ऊपर की ओर आकार में छोटी हुई मंज़िलों का बना शिखर। इसका शीर्ष आठ या छह कोणों के गुंबद के आकार का होता है।
➣ पल्लव, चालुक्य, चोल एवं पांड्य शासकों के शासनकाल में मुख्यत: इस शैली में मंदिरों का निर्माण हुआ।
➣ महाबलीपुरम् और कांची के मंदिर, वातापी तथा ऐहोल के मंदिर, तंजौर का राजराजेश्वर मंदिर या वृहदेश्वर मंदिर इस शैली के मंदिर के प्रमुख उदाहरण हैं।
बेसर शैली
➣ बेसर शैलों का विस्तार विंध्य और कृष्णा के बीच में है, इसे दक्षिणावर्त भी कहा जाता है।
➣ बेसर शैली में नागर और द्रविड़ शैली के तत्त्व मिश्रित हैं। बेसर शैली के मंदिरों में देउल, गर्भगृह और जगमोहन (सभा मंडल) होता था। इस शैली के मंदिर अर्द्ध गोलाकार होते थे।
➣ होयसल, राष्ट्रकूट काल के ऐहोल मंदिर, कैलाश मंदिर (एलोरा) आदि बेसर शैली से निर्मित हैं।
| शैली |
मुख्य विशेषता |
उदाहरण |
प्रमुख शासक / काल |
| नागर शैली |
उत्तर भारत की शैली; ऊँचा शिखर (रेक्खा-प्रसाद), घुमावदार टॉवर |
खजुराहो मंदिर, कोणार्क सूर्य मंदिर |
गुप्त काल, चंदेल शासक (खजुराहो), गंग शासक (कोणार्क) |
| द्रविड़ शैली |
दक्षिण भारत की शैली; पिरामिडाकार विमान, विशाल गोपुरम, प्रांगणयुक्त मंदिर |
बृहदेश्वर मंदिर (तंजावुर), शोर मंदिर (महाबलीपुरम) |
पल्लव शासक (महाबलीपुरम), चोल शासक (बृहदेश्वर मंदिर) |
| बेसर शैली |
नागर और द्रविड़ का मिश्रित रूप; कर्नाटक क्षेत्र में विकसित |
होयसलेश्वर मंदिर (हलेबिडु), बादामी चालुक्य मंदिर |
चालुक्य शासक (बादामी), होयसल शासक |
अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
➣ पर्वत शिलाओं को खोदकर भवन निर्माण के विकास की चरमावस्था ऐलोरा का कैलाश मन्दिर है। इस मन्दिर का आकार पट्टडकल के चालुक्य कालीन विरूपाक्ष मन्दिर की भाँति है। यह मन्दिर द्रविड़ शैली के नियमित क्रमबद्ध विकास का उदाहरण है।
➣ ऐलोरा का कैलाश मन्दिर राष्ट्रकूट नरेश कृष्ण प्रथम ने बनवाया /था।
➣ कैलाश मन्दिर संसार के प्रस्तर कला की महान तथा अद्वितीय कृति है। यह मन्दिर तक्षण कला से अलंकृत है।
➣ एलिफैन्टा का विशाल मन्दिर तराशी हुई विशाल मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध है, जिनमें त्रिमूर्ति सबसे प्रभावशाली है।
➣ महेन्द्र वर्मन शैली का विकास 600-640 ई. तक हुआ। इस शैली के मन्दिरों को मण्डप कहा गया है।
➣ महेन्द्र वर्मन प्रथम ने दक्षिण भारत में प्रथम हिन्दू गुफा मन्दिरों का निर्माण किया।
➣ मामल्ल शैली का विकास पल्लव नरेश नरसिंह वर्मन के समय हुआ। उसने मामल्ल की उपाधि धारण की थी, अतः इसे मामल्ल शैली कहते हैं।
➣ मामल्ल शैली का प्रमुख केन्द्र मामल्लपुरम् (महावलीपुरम्) नगर था, जिसकी स्थापना नरसिंह वर्मन मामल्ल ने की थी।
➣ महाबलीपुरम् (मामल्लपुरम) का शिवमन्दिर तथा कांचीपुरम का कैलाश मन्दिर नरसिंहवर्मन द्वितीय ने बनाया।
➣ मामल्ल शैली के रथ सप्त पैगोडा के नाम से विख्यात है। इनकी संख्या 8 है। इन रथों का विकास बौद्ध बिहार तथा चैत्यों में हुआ। इनमें से द्रौपदी रथ अलग शैली का है।
➣ विहारों के विकसित रूपों में धर्मराज रथ उल्लेखनीय है। भीमरथ, गणेश रथ और सहदेव रथ चैत्य भवनों पर आधारित हैं।
➣ तंजौर के बृहदेश्वर मन्दिर का निर्माण राजराज चोल ने 1000 ई., में करवाया था। मन्दिर का सबसे मुख्य अंग है- गर्भगृह तथा शिखर (विमान ) |
➣ पर्सी ब्राउन का मत है कि तंजौर का बृहदेश्वर मन्दिर द्रविड़ शिल्प कला की सर्वोत्तम कृति है और भारतीय वास्तुकला की कसौटी है।
➣ मन्दिरों के प्रवेश द्वार को गोपुरम् कहा जाता था। पाण्ड्य कालीन वास्तुकला की विशेषता मन्दिर नहीं है, अपितु ये गोपुरम् ही हैं।
➣ गोपुरम् एक प्रकार का आयताकार भवन है। तिरुमलाई मन्दिर, चिदंबरम् मन्दिर, कुंबकोणम् मन्दिर इस शैली की कुछ प्रसिद्ध कृतियाँ हैं।