Subject: भारतीय इतिहास

  • गुप्तोत्तर काल और हर्षवर्धन | Q&A Practice

    📚 विषय सूची

    पुष्यभूति वंश

    ➣ गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद छठी शताब्दी ई के प्रारंभ में हरियाणा के अम्बाला जिले के थानेश्वर नामक स्थान पर किसने ‘वर्धन’ अथवा ‘पुष्यभूति’ वंश की स्थापना की ?
    उत्तर : पुष्यभूति

    ➣ पुष्यभूति किसके सामंत थे, जिन्होंने दूणों के आक्रमण से लाभ उठाकर अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी?
    उत्तर : गुप्तों के

    ➣ पुष्यभूति वंश के प्रथम महत्वपूर्ण शासक कौन था?
    उत्तर : प्रभाकरवर्धन

    ➣ प्रभाकरवर्धन की मृत्यु के बाद सिंहासन पर कौन बैठा ?
    उत्तर : बड़ा पुत्र राज्यवर्धन

    ➣ प्रभाकरवर्धन ने अपनी पुत्री राज्यश्री का विवाह मौखरि वंश के किस राजा से किया था?
    उत्तर : गृहवर्मन

    ➣ मालवा के किस राजा ने राज्यश्री को बंदी बना लिया था?
    उत्तर : देवगुप्त

    ➣ राज्यवर्धन ने मालवा पर आक्रमण कर देवगुप्त को मार डाला, पर वापस लौटते वक्त बंगाल के किस गौड़ वंश शासक ने उसे धोखे से मार डाला?
    उत्तर : शशांक

    ➣ राज्यवर्धन की मृत्यु के बाद लगभग 606 ई. में कौन थानेश्वर की गद्दी पर बैठा ?
    उत्तर : हर्षवर्धन (606-647 ई.)

    ➣ हर्षवर्धन ने थानेश्वर के स्थान किसको अपनी राजधानी बनाया?
    उत्तर : कन्नौज

    ➣ हर्षवर्धन अपने दक्षिण अभियान में सफल नहीं हो सका। उसको नर्मदा नदी के तट पर बादामी के चालुक्य वंशीय किस शासक ने पराजित कर दिया?
    उत्तर : पुलकेशिन द्वितीय

    ➣ किस राजा ने कश्मीर शासक से बुद्ध के दंत अवशेष बलपूर्वक प्राप्त किये थे?
    उत्तर : हर्षवर्धन

    ➣ हर्षवर्धन बौद्ध धर्म के किस सम्प्रदाय का संरक्षक था?
    उत्तर : महायान

    ➣ हर्षवर्धन के दरबारी कवि का क्या नाम था ?
    उत्तर : बाणभट्ट

    ➣ कवि बाण (बाणभट्ट) कहां के निवासी थे ?
    उत्तर : थानेश्वर

    ➣ हर्षचरित, कादम्बरी और पार्वती परिणय के रचयिता कौन हैं?
    उत्तर : बाणभट्ट

    ➣ यात्रियों के राजकुमार’, ‘नीति का पंडित’ एवं ‘वर्तमान शाक्यमुनि’ कहा जाने वाला कौन-सा चीनी यात्री सातवीं शताब्दी में हर्षवर्धन के काल में भारत आया था?
    उत्तर : ह्वेनसांग

    ➣ हर्षवर्धन ने अपने 41 वर्षों के शासनकाल में पूरा आर्यावर्त अपने अधीन कर करने के उपरांत कौन-सी उपाधि धारण की?
    उत्तर : शिलादित्य

    ➣ चीनी यात्री ह्वेनसांग भारत में कितने वर्षों तक रहा?
    उत्तर : 629 ई. से लेकर 645 ई. तक

    ➣ ह्वेनसांग किस संस्थान में पढ़ने के लिए और भारत से बौद्ध ग्रंथ बटोर कर ले जाने के लिए आया था?
    उत्तर : नालंदा बौद्ध विश्वविद्यालय

    ➣ हर्षवर्धन ने किसके प्रभाव में आकर बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया ?
    उत्तर : ह्वेनसांग

    ➣ बौद्ध धर्म अपनाने से पहले हर्षवर्धन किस धर्म को मानता था ?
    उत्तर : शैव धर्म

    ➣ हर्षवर्धन ने 643 ई. के आसपास क्रमशः कन्नौज (प्रथम) एवं प्रयाग (द्वितीय) में दो विशाल धार्मिक सभाओं का आयोजन किया। किस महासभा में हर्षवर्धन ने अपना सब कुछ दान कर दिया?
    उत्तर : प्रयाग महासभा (महामोक्ष परिषद)

    ➣ हर्ष द्वारा आयोजित ‘कन्नौज सभा’ किसके सम्मान में की गयी थी?
    उत्तर : ह्वेनसांग

    ➣ किस ग्रंथ में हर्षवर्धन को सभी देवताओं का सम्मिलित ‘अवतार’ कहा गया है?
    उत्तर : हर्षचरित

    ➣ ह्वेनसांग के अनुसार, अपराध के लिए कड़ी सजा दी जाती थी। डकैती करने पर डाकू का दायां हाथ काट लिया जाता था। डकैती को क्या कहा जाता था?
    उत्तर : दूसरा राजद्रोह

    ➣ हर्षकाल में भाग भूमि राजस्व था, जो अनाज के रूप में लिया जाता था और यह उत्पादन कितना भाग होता था?
    उत्तर : 1/6 भाग

    ➣ नगद रूप में लिया जाने वाला कर क्या कहलाता था?
    उत्तर : हिरण्य

    ➣ किस राजा के काल में उच्च अधिकारियों को वेतन के रूप में जागीरें ( भूमि अनुदान ) दी जाती थीं?
    उत्तर : हर्षवर्धन के काल में

    ➣ भूमि देने की सामंती प्रथा किसने ही शुरू की ?
    उत्तर : हर्षवर्धन

    ➣ भूदान द्वारा राज्य के अधिकारियों के भुगतान की पुष्टि सर्वप्रथम किस ग्रंथ में हुआ?
    उत्तर : मनुस्मृति

    ➣ गुप्तोत्तर काल में पूर्वी तट पर ताम्रलिप्ति के स्थान पर किसका महत्व अधिक बढ़ गया था?
    उत्तर : सप्तग्राम

    ➣ ह्वेनसांग के अनुसार, हर्षवर्धन ने कन्नौज सभा में पूजा के लिए किसकी विशाल सोने की मूर्ति बनवायी थी?
    उत्तर : बुद्ध

    ➣ साधारण लेनदेन और व्यापार कौड़ियों के माध्यम से होता था। इन कौड़ियों को प्रतिहार अभिलेखों में क्या कहा गया है?
    उत्तर : कपर्दक

    ➣ बुद्ध एवं जिन को किसका अवतार माना जाता था?
    उत्तर : विष्णु

    ➣ इतिहास का वह अंतिम बौद्ध राजा कौन था जो संस्कृत का महान विद्वान और लेखक था?
    उत्तर : हर्षवर्धन

    ➣ हर्षवर्धन की वल्लभी विजय का उल्लेख किस शिलालेख में पाया गया है?
    उत्तर : नवसारी ताम्रपत्र शिलालेख

    ➣ किस विदेशी यात्री ने भारतीयों को गर्म स्वभाव का परंतु ईमानदार’ कहा है?
    उत्तर : ह्वेनसांग

    ➣ चीनी यात्री इत्सिंग ने बिहार का भ्रमण कब किया?
    उत्तर : लगभग 637 ई. में

    ➣ ह्वेनसांग की भारत यात्रा के समय सूती कपड़ों के उत्पादन के लिए सबसे प्रसिद्ध नगर कौन था ?
    उत्तर : मथुरा

    गुप्तोत्तर काल आक्रमण

    ➣ मध्य एशिया में निवास करने वाली वह खानाबदोश और बर्बर जाति कौन-सी थी, जिसने भारत पर आक्रमण किया?
    उत्तर : हूण

    ➣ हूणों का पहला भारतीय आक्रमण किस गुप्त सम्राट के शासनकाल में हुआ ?
    उत्तर : कुमारगुप्त

    ➣ किस गुप्त सम्राट ने हूणों पराजित किया और उनका अभियान सफल नहीं दिया?
    उत्तर : स्कंदगुप्त

    ➣ स्कंदगुप्त की मृत्यु के बाद दूसरे हूण आक्रमण का नेता कौन था ?
    उत्तर : – तोरमाण

    ➣ भारत विजय करने वाला वह प्रथम विदेशी शासक कौन था, जिसने मध्य भारत तक अपना साम्राज्य स्थापित किया तथा पूर्वी भारत के एक बड़े भाग तक अपना प्रभाव जमा लिया?
    उत्तर : तोरण

    ➣ पंजाब के कूरा नामक स्थान से मिले तोरमाण का एक लेख में उसे क्या कहा गया बहिजिऊब्ल

    ➣ जऊब्ल’ तुर्की भाषा का शब्द है, जिसका हिंदी रूपांतर क्या होता है?
    उत्तर : सामत

    ➣ तोरमाण का के बाद हूण का उत्तराधिकारी कौन हुआ?
    उत्तर : पुत्र मिहिरकुल

    ➣ हुण शासक मिहिरकुल की राजधानी कहां स्थित थी?
    उत्तर : गांधार

    ➣ छठी शताब्दी (लगभग 530 ई.) में मालवा के किस पराक्रमी शासक ने मिहिरकुल को बुरी तरह परास्त किया?
    उत्तर : यशोधर्मन

    ➣ मिहिरकुल को पराजित करने में उसकी सहायता किसने की थी?
    उत्तर : नरसिंहगुप्त बालादित्य ने

    ➣ मालवा का यशोधर्मन किस वंश से संबंधित था?
    उत्तर : औलिकर वंश

    ➣ यशोधर्मन के पिता का नाम क्या था?
    उत्तर : प्रकाशधर्मन

    ➣ यशोधर्मन का शासनकाल कब समाप्त हो गया?
    उत्तर : 535 ई. तक

    ➣ मंदसोर प्रशस्ति में उसे यशोधर्मन को क्या कहा गया है ?
    उत्तर : ‘जनेन्द्र

    ➣ यशोधर्मन ने कहां पर दो कीर्ति स्तम्भ भी स्थापित करवाये थे?
    उत्तर : मन्दसौर

    बल्लभी के मैत्रक वंश

    ➣ मैत्रक वंश की स्थापना गुप्त शासन के एक सैनिक पदाधिकारी ने की थी। उसका क्या नाम था ?
    उत्तर : भट्टार्क

    ➣ भट्टार्क का पुत्र धरसेन मैत्रक वंश का अगला राजा बना। ये दोनों प्रारम्भिक राजा स्वयं को क्या कहते थे?
    उत्तर : सेनापति

    ➣ धरसेन का उत्तराधिकारी और इस वंश का तीसरा राजा द्रोण सिंह था । वह स्वयं को क्या कहलाना पसंद करता था ?
    उत्तर : ‘महाराजा’ अथवा ‘महासामंत महाराज’

    ➣ द्रोण सिंह के बाद उसका छोटा भाई ध्रुवसेन प्रथम वल्लभी का राजा बना। वह स्वयं को क्या कहता था ?
    उत्तर : परमभट्टारकपादानुध्यात

    ➣ मैत्रक वंश का अंतिम ज्ञात शासक कौन है, जिसने 766 ई. तक शासन किया?
    उत्तर : शिलादित्य सप्तम

    ➣ बल्लभी राज्य का विनाश किनके आक्रमण के कारण हुआ?
    उत्तर : अरब

  • पुष्यभूति वंश (हर्षवर्धन) | One-Liner Practice

    ❑ पुष्यभूति वंश की स्थापना पुष्यभूति हरियाणा के अम्बाला जिले के थानेश्वर नामक स्थान पर की थी।

    ❑ पुष्यभूति वंश हूणों से हुए संघर्ष के कारण प्रसिद्ध हुआ।

    ❑ प्रभाकरवर्धन इस वंश का चौथा शासक था। उसके दो पुत्र-राज्यवर्धन एवं हर्षवर्धन थे।

    ❑ प्रभाकरवर्धन की पुत्री का नाम राज्यश्री था। राज्यश्री का विवाह मौखरी वंश के गृहवर्मन से हुआ था।

    ❑ प्रभाकरवर्धन की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी यशोमती उसकी चिता में कूदकर आत्मदाह कर ली।

    ❑ प्रभाकरवर्धन के बाद राज्यवर्धन राजा हुआ। मालवा के राजा देवगुप्त को राज्य वर्धन ने पराजित किया था।

    ❑ मालवा अभियान से लौटते समय मार्ग में धोखे से गौड़ शासक शशांक ने राज्यवर्धन की हत्या कर दी।

    ❑ राज्यवर्धन का प्रधानमंत्री उसका ममेरा भाई भण्डि था।

    ❑ हर्षवर्धन 606 ई. में राजगद्दी पर बैठा। उस समय उसकी 16 वर्ष थी।

    ❑ हर्ष के विषय में हमें व्यापक जानकारी बाणभट्ट द्वारा लिखित हर्षचरित से मिलती है। हर्षचरित में हर्षवर्द्धन को सभी देवताओं का सम्मिलित अवतार कहा गया है।

    ❑ हर्ष का दरबारी कवि बाणभट्ट था।

    ❑ ह्वेनसांग ने शूद्रों को कृषक कहा है।

    ❑ हर्षवर्धन सूर्य, शिव एवं बुद्ध का उपासक (महायान शाखा) था।

    ❑ 641 ई. में हर्षवर्द्धन ने मगधराज की उपाधि धारण की।

    ❑ हर्ष ने कुल 41 वर्ष तक शासन किया। चीनी यात्री ह्वेनसांग 629 से 645 ई. के बीच भारत में रहा था।

    ❑ ह्वेनसांग को यात्रियों में राजकुमार, नीति का पण्डित तथा वर्तमान शाक्यमुनि नाम से जाना जाता है।

    ❑ हर्ष की प्राचीन राजधानी थानेश्वर थी। कालांतर में हर्ष ने अपनी राजधानी कन्नौज (उत्तर प्रदेश) में बनाई।

    ❑ हर्ष को शिलादित्य नाम से भी जाना जाता है।

    ❑ हर्ष ने परमभट्टारक तथा उत्तरापथस्वामी की उपाधि धारण की थी।

    ❑ हर्ष एक प्रतिष्ठित कवि एवं नाटककार था। उसने नागानन्द’, ‘प्रियदर्शिका एवं रत्नावली नामक नाटकों की रचना की।

    ❑ बाणभट्ट की रचनायें हैं- हर्षचरित, कादम्बरी एवं पार्वती परिणय।

    ❑ हर्ष बौद्ध धर्म की महायान शाखा का समर्थक होने के अलावा विष्णु एवं शिव को भी मानता था।

    ❑ हर्ष ने विशाल धार्मिक सभाओं का आयोजन कन्नौज तथा प्रयाग में किया।

    ❑ हर्ष द्वारा आयोजित कन्नौज सभा ह्वेनसांग के सम्मान में की गई थी। इस सभा में विभिन्न धर्मों एवं सम्प्रदायों के आचार्यों को बुलाया गया था। इस सभा की अध्यक्षता ह्वेनसांग ने की थी।

    ❑ हर्ष के दिन का प्रथम भाग सरकारी कार्य, दूसरा एवं तीसरा भाग धार्मिक कार्य हेतु था।

    ❑ हर्ष के दरबार में चीनी दूतमण्डल 643 ई. एवं 646 ई. में आया था। हर्ष ने 641 ई. में अपने दूत चीन भेजे।

    ❑ हर्ष द्वारा प्रयाग में प्रतिवर्ष आयोजित सभा को मोक्ष परिषद् कहा जाता था।

    ❑ हर्ष का युद्ध एवं शान्ति का मंत्री अवन्ति था और महासेनापति सिंहनाद था।

    ❑ ह्वेनसांग के अनुसार अधिकारियों को वेतन भूमि अनुदान के रूप में दिया जाता था।

    ❑ हर्ष के समय भूमिकर, कृषि उत्पादन का छठा भाग वसूला जाता था।

    ❑ हर्षकालीन ताम्रपात्रों में केवल तीन करों का उल्लेख मिलता है- भाग (भूमिकर), हिरण्य और बलि।

    ❑ हर्षचरित के अनुसार थानेश्वर के प्रत्येक घर में शिव की पूजा होती थी।

    ❑ ह्वेनसांग मगध के महायान सम्प्रदाय के 10 हजार भिक्षुओं का उल्लेख करता है।

    ❑ ह्वेनसांग 637 ई. में नालंदा विश्वविद्यालय गया। यहाँ के कुलपति आचार्य शीलभद्र थे।

    ❑ ह्वेनसांग ने अपनी यात्रा वृतांत लिखा जिसका नाम सि-यू- की है।

    ❑ हर्ष के दक्षिण अभियान को चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय ने आगे बढ़ने से रोक दिया था।

    ❑ हर्षवर्धन को अंतिम हिन्दू सम्राट भी कहा जाता है जिसका शासन कश्मीर छोड़कर सम्पूर्ण भारत पर था।

  • गुप्तोत्तर काल MCQ प्रश्न | SSC

    1. उत्तर- गुप्त युग में जो विश्वविद्यालय प्रसिद्ध हो गया था।
    (a) कांची
    (b) तक्षशिला
    (c) नालंदा
    (d) वल्लनी
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 1999
    उत्तर-(c)
    उत्तर-गुप्त युग तक नालंदा विश्वविद्यालय प्रसिद्ध हो चुका था। यह विश्वविद्यालय पटना से 64 किलोमीटर दक्षिण में बडगांव नामक स्थान पर स्थित था। यद्यपि नालंदा का बौद्ध धर्म से प्राचीन संबंध था, तथापि लगभग 5वीं शताब्दी ई. के मध्य से ही शिक्षा केन्द्र के रूप में इसकी ख्याति हुई।
    2. बाणभट्ट निम्नलिखित में से किस सम्राट के राजदरबारी कवि थे?
    (a) विक्रमादित्य
    (b) कुमारगुप्त
    (c) हर्षवर्धन
    (d) कनिष्क
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 1999
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2000
    उत्तर-(c)
    बाणभट्ट हर्षवर्द्धन के दरबारी कवि थे। हर्षचरित तथा कादम्बरी इनकी प्रमुख कृतियां हैं। ‘हर्षचरित’, वर्द्धन इतिहास का सर्वप्रमुख स्रोत है। इसे ऐतिहासिक विषय पर गद्यकाव्य लिखने का प्रथम सफल प्रयास कहा जा सकता है।
    3. ‘हर्षचरित’ निम्नलिखित में से किसके द्वारा लिखी गई थी?
    (a) कालिदास
    (b) बाणभट्ट
    (c) वाल्मीकि
    (d) व्यास
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2002
    उत्तर-(b)
    उपर्युक्त प्रश्न की व्याख्या देखें।
    4.हर्षचरित के लेखक कौन थे?
    (a) बाणभट्ट
    (b) अमर सिंह
    (c) कालिदास
    (d) हरिसेन
    S.S.C. मल्टी टॉस्किंग (M.T.S.) परीक्षा, 2013
    उत्तर-(a)
    उपर्युक्त प्रश्न की व्याख्या देखें।
    5.एक महान रोमानी नाटक कादंबरी का लेखक था?
    (a) बाणभट्ट
    (b) हर्षवर्धन
    (c) भास्करवर्धन
    (d) बिंदुसार
    S.S.C. CPO परीक्षा, 2008
    उत्तर-(a)
    उपर्युक्त प्रश्न की व्याख्या देखें।
    6.यादव सम्राटों की राजधानी कहां थी ?
    (a) द्वारसमुद्र
    (b) वारंगल
    (c) कल्याणी
    (d) देवगिरी
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 1999
    उत्तर-(d)
    यादव सम्राटों की राजधानी ‘देवगिरी’ थी। ‘द्वारसमुद्र’ होयसल शासकों की, ‘वारंगल’ काकतीयों की तथा ‘कल्याणी’ चालुक्यों की राजधानी थी। ध्यातव्य है कि मुहम्मद बिन तुगलक ने 1327 ई. में अपनी राजधानी दिल्ली से देवगिरी स्थानांतरित की थी तथा देवगिरी का नाम उसने दौलताबाद रखा था।
    7. ‘पृथ्वीराजरासो’ निम्नलिखित में से किसने लिखा था?
    (a) भवभूति
    (b) जयदेव
    (c) चन्दबरदाई
    (d) बाणभट्ट
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2002
    उत्तर-(c)
    ‘पृथ्वीराजरासो’ चन्दबरदाई द्वारा रचित है। यह हिन्दी साहित्य का प्रथम महाकाव्य माना जाता है। चन्दबरदाई चौहान शासक पृथ्वीराज तृतीय का राजकवि था।
    8.निम्नलिखित में वह धर्म कौन-सा है जिसका विकास प्राचीन काल (अर्थात् ई.पू.) में नहीं हुआ था ?
    (a) शिंतों धर्म (शिंतों मत)
    (b) पारसी धर्म (जरथुस्त्र धर्म)
    (c) इस्लाम
    (d) ताओवाद
    उत्तर-
    (c)
    इस्लाम धर्म का विकास प्राचीन काल में नहीं हुआ था। इस्लाम धर्म का विकास 7वीं शताब्दी में हुआ था।
    9.निम्नलिखित में से किस शासक ने बौद्धों के लिए विख्यात ‘विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना की थी ?
    (a) महीपाल
    (b) देवपाल
    (c) गोपाल
    (d) धर्मपाल
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2002
    उत्तर-(d)
    पाल शासक धर्मपाल ने बौद्धों के लिए विख्यात ‘विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना की थी। ‘दीपंकर श्रीज्ञान विक्रमशिला के आचार्यों में सर्वश्रेष्ठ थे। ये तिब्बत चले गये तथा वहां उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रचार में महत्त्वपूर्ण कार्य किया। बख्तियार खिल्जी ने विक्रमशिला पर आक्रमण करके इसे नष्ट कर दिया। उसने यहां के पुस्तकालय को जला दिया जो लगभग छः महीने तक जलता रहा।
    10. 13वीं शताब्दी में राजस्थान के माउंट आबू में प्रसिद्ध दिलवाड़ा मंदिर किसने बनवाया था ?
    (a) महेन्द्रपाल
    (b) माहेपाल
    (c) राज्यपाल
    (d) तेजपाल
    S.S.C. संयुक्त स्नातक स्तरीय परीक्षा, 2012
    उत्तर-(d)
    13वीं शताब्दी में राजस्थान के माउंट आबू में प्रसिद्ध दिलवाड़ा मंदिर गुजरात के बघेलवंशीय शासक वीरधवल के दो मंत्रियों, वास्तुपाल एवं तेजपाल ने बनवाया था। यह मंदिर जैनियों को समर्पित है।
    11. निम्नलिखित में से वह अन्तिम बौद्ध राजा कौन था जो संस्कृत का महान विद्वान और लेखक था ?
    (a) कनिष्क
    (b) अशोक
    (c) बिंबिसार
    (d) हर्षवर्धन
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2002
    उत्तर-(d)
    हर्षवर्धन संस्कृत का महान विद्वान और लेखक था। इसने ‘नागानंद’, रत्नावली’ और ‘प्रियदर्शिका’ नामक पुस्तकों की रचना की थी। हर्षवर्धन को शिलादित्य के नाम से भी जाना जाता है। इसने परम भट्टारक नरेश की उपाधि धारण की थी। हर्षवर्धन को दक्षिण भारत के शासक पुलकेशिन द्वितीय ने नर्मदा नदी के किनारे पराजित किया था।
    12. निम्नलिखित में कौन-सा सुमेलित है ?
    (a) ऐलोरा- शक
    (b) महाबलीपुरम – राष्ट्रकूट
    (c) मीनाक्षी मंदिर – पल्लव
    (d) खजुराहो – चंदेल
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2002
    उत्तर-(d)
    दिए गए सांस्कृतिक स्थलों तथा उनसे संबंधित राजवंशों का सुमेलन निम्नानुसार है-
    ऐलोरा- राष्ट्रकूट
    महाबलीपुरम – पल्लव
    मीनाक्षी मंदिर – पांड्य
    खजुराहो – चंदेल
    13. खजुराहो मंदिरों का निर्माण किसने किया था ?
    (a) होल्कर
    (b) सिन्धिया
    (c) बुन्देला राजपूत
    (d) चन्देल राजपूत
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 2001
    S.S.C. संयुक्त हायर सेकण्डरी (10+2) स्तरीय परीक्षा, 2010
    उत्तर-(d)
    मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित ‘खजुराहो’ मंदिर-समूहों के लिए अति प्रसिद्ध है। इन मन्दिरों का निर्माण 10वीं से 12वीं सदी ई. में चन्देल शासकों के शासनकाल में हुआ। यहां 85 मंदिरों के निर्माण का उल्लेख मिलता है, किन्तु वर्तमान में 30 मन्दिर ही शेष हैं।
    14. निम्नोक्त में से कौन, विश्व विरासत सूची में शामिल नहीं है?
    (a) खजुराहो
    (b) नालन्दा के ध्वंसावशेष
    (c) हम्पी के ध्वंसावशेष
    (d) ताजमहल
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 2001
    उत्तर-(b)
    ‘खजुराहो’, ‘हम्पी के ध्वंसावशेष’ तथा ‘ताजमहल’ तीनों ही विश्व विरासत सूची में सम्मिलित हैं जबकि नालन्दा के ध्वंसावशेष इस सूची में शामिल नहीं हैं।
    15. निम्नलिखित में से किस राजपूत शासक ने भोपाल शहर की स्थापना की थी ?
    (a) पृथ्वीराज चौहान
    (b) धर्मपाल
    (c) राजा भोज
    (d) जयचंद
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2002
    उत्तर-(c)
    ‘राजा भोज’ ने भोपाल शहर तथा भोजपुर नगर की स्थापना की। राजा भोज ने धारा नगरी में सरस्वती मंदिर तथा चित्तौड़ में त्रिभुवन नारायण मंदिर का निर्माण करवाया। राजा भोज को ‘कविराज’ की उपाधि से विभूषित किया गया था। इन्होंने चिकित्सा, गणित एवं व्याकरण पर अनेक ग्रंथ लिखे।
    16. मिहिर भोज राजपूतों के किस कुल से सम्बन्धित है ?
    (a) प्रतिहार
    (b) राठौर
    (c) चौहान
    (d) परमार
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2006
    उत्तर-(a)
    रामभद्र का पुत्र और उत्तराधिकारी मिहिर भोज प्रथम प्रतिहार वंश का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण शासक हुआ। इसने आदि वराह’ तथा ‘प्रभास’ जैसी उपाधियां धारण की जो उसके द्वारा चलाए गए चांदी के द्रम सिक्कों पर अंकित हैं।
    17. ह्वेनसांग किसके शासनकाल के दौरान भारत आया था ?
    (a) चंद्रगुप्त प्रथम
    (b) चंद्रगुप्त द्वितीय
    (c) हर्षवर्धन
    (d) रुद्रदमन
    S.S.C. संयुक्त स्नातक स्तर परीक्षा, 2011
    उत्तर-(c)
    प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग लगभग 630-643 ई. के मध्य हर्षवर्धन के शासनकाल के दौरान भारत आया था। ह्वेनसांग की भारत यात्रा का वृत्तांत सी-यू- की नामक ग्रंथ तथा उसके मित्र ह्वीलो द्वारा रचित ह्वेनसांग की जीवनी से प्राप्त होता है। ह्वेनसांग के विवरण से तत्कालीन भारत के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक और प्रशासकीय पक्ष की जानकारी प्राप्त होती है।
    18. हर्षवर्धन के समय में कौन-सा चीनी तीर्थयात्री भारत आया था ?
    (a) फाहियान
    (b) इटसिंग
    (c) कनिष्क
    (d) ह्वेनसांग
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2001
    उत्तर-(d)
    उपर्युक्त प्रश्न की व्याख्या देखें।
    19. प्रिंस ऑफ पिलग्रिम्स’ नाम किसे प्रदान किया गया था?
    (a) फाह्यान
    (b) इटसिंग
    (c) ह्वेनसांग
    (d) मेगास्थीन्स
    S.S.C. संयुक्त हायर सेकण्डरी (10+2) स्तरीय परीक्षा, 2011
    उत्तर-(c)
    हर्ष के शासनकाल में भारत आए चीनी यात्री ह्वेनसांग को प्रिंस ऑफ पिलग्निम्स’ कहा जाता है।
    20. आद्य मध्ययुगीन भारत (Early Medieval India) के शासक राजवंशों के साथ उनकी राजधानियों का मेल बैठाए-
    सूची-I   सूची-II
    (a) प्रतिहार-  1. कन्नौज
    (b) चन्देल-  2. खजुराहो
    (c) परमार –  3. धार
    (d) चालुक्य -  4. अनहिलवाड़
       A  B  C  D
    (a) 1  2  3  4
    (b) 1  3  4  2
    (c) 2  4  1  3
    (d) 2  1  3  4
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2001
    उत्तर-(a)
    आद्य मध्ययुगीन भारत के शासक राजवंशों के साथ उनकी राजधानियों का सही सुमेलन निम्नानुसार है-
    प्रतिहार -  कन्नौज
    चन्देल –  खजुराहो
    परमार -  धार
    चालुक्य –  अनहिलवाड़
    21. निम्नलिखित मध्यकालीन यात्रियों का उनके देशों के साथ मिलान करिए
    A. मार्कोपोलो -  1. स्पेन
    B. इब्नबतूता –  2. बल्ख
    C. एन्टोनियो मोनसेरेट –  3.इटली
    D. महमूद वली बाल्खी –  4. मोरक्को
      A  B  C  D
    (a) 3  4  1  2
    (b) 1  3  2  4
    (c) 4  3  1  2
    (d) 3  1  4  2
    S.S.C. CPO परीक्षा, 2012
    उत्तर-(a)
    सही सुमेलित इस प्रकार है-
    मार्कोपोलो -  इटली
    इब्नबतूता –  मोरक्को
    एन्टोनियो मोनसेरेट –  स्पेन
    महमूद वली बाल्खी –  बल्ख
    22. बीतपाल तथा धीमन नामक भारत के दो महानतम कलाकार किस युग से सम्बन्धित थे?
    (a) पाल युग
    (b) गुप्त युग
    (c) मौर्य युग
    (d) पठान युग
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2000
    उत्तर-(a)
    बीतपाल तथा धीमन नामक भारत के दो महानतम कलाकार पाल युग से संबंधित थे। पाल युग के अन्य विद्वानों में प्रसिद्ध बौद्ध लेखक हरिभद्र ‘दायभाग’ का रचयिता जिमूतवाहन तथा ‘रामपाल चरित’ का रचयिता संध्याकर नंदी शामिल हैं।
    23. निम्नलिखित में प्राचीनतम विश्वविद्यालय कौन-सा था ?
    (a) गांधार
    (b) कन्नौज
    (c) नालंदा
    (d) वैशाली
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 1999
    उत्तर-(c)
    दिए गए प्रश्न के विकल्पानुसार नालंदा प्राचीनतम विश्वविद्यालय है। नालंदा वर्तमान बिहार राज्य में अवस्थित है।
    24. भारत में नालंदा विश्वविद्यालय किस राज्य में स्थित है?
    (a) बंगाल
    (b) बिहार
    (c) उड़ीसा
    (d) उत्तर प्रदेश
    D
    S.S.C. Tax Asst. परीक्षा, 2009
    उत्तर-(b)
    उपर्युक्त प्रश्न की व्याख्या देखें।
    25. शृंगेरी, बद्रीनाथ, द्वारका और पुरी में चार ‘मठ’ स्थापित किए गए थे
    (a) रामानुज द्वारा
    (b) अशोक द्वारा
    (c) आदि शंकराचार्य द्वारा
    (d) माधव विद्यारण्य द्वारा
    S.S.C. संयुक्त हायर सेकण्डरी (10+2) स्तरीय परीक्षा, 2011
    उत्तर-(c)
    आदि शंकराचार्य ने देश की चारों दिशाओं- उत्तर में ‘बद्रीनाथ दक्षिण में शृंगेरी, पूर्व में पुरी’ तथा पश्चिम में द्वारका’ में प्रसिद्ध मठों की स्थापना की।
    26. अद्वैत दर्शन के मुख्य प्रतिपादक कौन थे?
    (a) माधवाचार्य
    (b) शंकराचार्य
    (c) रामकृष्ण परमहंस
    (d) रामानुजाचार्य
    S.S.C. (स्टेनोग्राफर) ग्रेड ‘डी’ परीक्षा, 2005
    उत्तर-(b)
    अद्वैत दर्शन के मुख्य प्रतिपादक शंकराचार्य थे। माधवाचार्य ने ‘द्वैतवाद’ एवं रामानुजाचार्य ने ‘विशिष्टाद्वैतवाद’ की स्थापना की।
    27. नालंदा विश्वविद्यालय को नष्ट करने वाला मुस्लिम साहसिक था-
    (a) अलाउद्दीन खिलजी
    (b) मुहम्मद बिन तुगलक
    (c) मुहम्मद बिन बख्तियार
    (d) मुहम्मद बिन कासिम
    S.S.C. संयुक्त स्नातक स्तरीय परीक्षा, 2011
    उत्तर-(c)
    नालंदा और विक्रमशिला के विश्वविद्यालयों को बौद्ध विहार अथवा दुर्ग समझकर मुस्लिम आक्रमणकारी मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी द्वारा नष्ट किया गया था।
    28. हर्षवर्धन को किसने पराजित किया था?
    (a) प्रभाकर वर्धन
    (b) पुलकेशिन II
    (c) नरसिंह वर्मन पल्लव
    (d) शशांक
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 2010
    उत्तर-(b)
    हर्षवर्धन को दक्षिण भारत के शासक पुलकेशिन II (चालुक्य वंश ने नर्मदा नदी के किनारे 630 ई. में हराया था।
    29. हर्षवर्धन की आरंभिक राजधानी कहां थी ?
    (a) प्रयाग
    (b) कन्नौज
    (c) थानेश्वर
    (d) मथुरा
    S.S.C. CPO परीक्षा 2012
    उत्तर-(c)
    हर्षवर्धन की आरंभिक राजधानी थानेश्वर’ में थी, बाद में उसने अपनी राजधानी ‘कन्नौज’ स्थानांतरित की थी। 605 ई. में हर्षवर्धन के पिता प्रभाकरवर्धन की मृत्यु हो गई। हर्षवर्धन शासक बना और 606 ई. में अपनी राजधानी कन्नौज बनाई और इस उपलक्ष्य में हर्ष संवत प्रारंभ किया। अतः अभीष्ट विकल्प (c) होगा।
    30. 738 ईस्वी में अरबों को पराजित किया था ?
    (a) प्रतिहारों ने
    (b) राष्ट्रकूटों ने
    (c) पालों ने
    (d) चालुक्यों ने
    S.S.C. Section Off. परीक्षा, 2007
    उत्तर-(a)
    738 ई. में राजस्थान का युद्ध हुआ था। इस युद्ध में प्रतिहार राजा नागभट्ट प्रथम के नेतृत्व में राजपूतों का एक संघ बना था। राजपूतों के इस संघ ने जुनैद इब्न अब्दुर रहमान-अल-मारी के नेतृत्व वाली अरब सेना को हराया था।
    31. कोणार्क मन्दिर के ‘देवता’ हैं-
    (a) सूर्य
    (b) कृष्ण
    (c) शिव
    (d) ब्रह्मा
    S.S.C. (लोअर डिवीजन क्लर्क) परीक्षा, 2005
    उत्तर-(a)
    कोणार्क सूर्य देवता’ का मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण गंग राजा नरसिंह देव प्रथम ने करवाया था।
    32. प्राचीन भारत में निम्नोक्त में से कौन-सा विद्या अध्ययन का केन्द्र नहीं था ?
    (a) तक्षशिला
    (b) विक्रमशिला
    (c) नालन्दा
    (d) कौशाम्बी
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2001
    उत्तर-(d)
    कौशाम्बी को छोड़कर अन्य तीनों प्राचीन भारत में विद्या अध्ययन के केन्द्र थे।
    33. सांची क्यों विख्यात है?
    (a) चट्टान काटकर बनाए गए मन्दिर
    (b) सबसे बड़ा बौद्ध स्तूप
    (c) गुहाचित्रकारा
    (d) अशोक के शिलालेख
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2001
    उत्तर-(b)
    ‘सांची’ मध्य प्रदेश के रायसेन में स्थित है। यहां स्तूपों की संख्या तीन है। सबसे बड़ा स्तूप महास्तूप के नाम से प्रसिद्ध है। इस स्तूप को सम्राट अशोक ने बनवाया था। प्रारंभ में यह ईंट निर्मित था, तत्पश्चात् शुंग शासकों द्वारा इसका विस्तार पाषाण शिलाओं से किया गया। स्तूप का व्यास लगभग 40 मीटर और ऊंचाई 16.50 मीटर है। इसके एक ओर जंगले एवं तोरण द्वार आंध्र सातवाहन युग में बनाए गए।
    34. सांची का महान स्तूप है-
    (a) उत्तर प्रदेश में
    (b) मध्य प्रदेश में
    (c) अरुणाचल प्रदेश में
    (d) आंध्र प्रदेश में
    S.S.C. (डाटा एंट्री ऑपरेटर) परीक्षा, 2009
    उत्तर-(b)
    उपर्युक्त प्रश्न की व्याख्या देखें।
    35. वर्ष 1100 ई. में निर्मित मन्दिर जो भुवनेश्वर के अन्य मन्दिरों पर प्रधानता रखता है, कौन-सा है ?
    (a) राजा रानी मन्दिर
    (b) कन्दरिया महादेव मन्दिर
    (c) त्रिभुवनेश्वर लिंगराज मन्दिर
    (d) मुक्तेश्वर मन्दिर
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2001
    उत्तर-(c)
    भुवनेश्वर उत्कल प्रदेश की राजधानी थी, जो मंदिरों की नगरी के रूप में प्रसिद्ध रही है। यहां के मंदिरों में पार्श्व देवता के रूप में विनायक की विविध प्रतिमाएं हैं। भुवनेश्वर के शैव मंदिरों में नटराज की प्रतिमाएं भी हैं। सन् 1100 ई. में निर्मित भुवनेश्वर का लिंगराज मंदिर यहां के अन्य मंदिरों पर प्रधानता रखता है।
    36. कलिंग शासक खारवेल ने संरक्षण दिया-
    (a) हिन्दू धर्म (वैष्णव धर्म) को
    (b) शैव धर्म को
    (c) बौद्ध धर्म को
    (d) जैन धर्म को
    S.S.C. संयुक्त हायर सेकण्डरी (10+2) स्तरीय परीक्षा, 2012
    उत्तर-(d)
    कलिंग के चेदिवंश का सबसे प्रतापी शासक खारवेल था, जिसका झुकाव जैन धर्म के प्रति था। इसके द्वारा जैन लोगों को ग्राम दान दिए जाने का अभिलेखीय साक्ष्य ‘हाथी गुम्फा अभिलेख है।
  • गुप्तोत्तर काल MCQ प्रश्न | UPSC

    1. नर्मदा नदी पर सम्राट हर्ष के दक्षिणवर्ती अग्रगमन को रोका-
    (a) पुलकेशिन I I ने
    (b) पुलकेशिन II ने
    (c) विक्रमादित्य I ने
    (d) विक्रमादित्य II ने
    I.A.S. (Pre) 2003
    उत्तर-(b)
    हर्षवर्धन ने उत्तर भारत में अपना साम्राज्य स्थापित करने के बाद दक्षिण की ओर विस्तार का प्रयास किया। उसकी विजयों के फलस्वरूप उसके राज्य की दक्षिणी सीमा नर्मदा नदी तक पहुँच गई। उसी समय चालुक्य शासक पुलकेशिन II उत्तर दिशा में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता था। दोनों शक्तियों के टकराव की स्थिति बनी और नर्मदा के तट पर घमासान युद्ध हुआ, जिसमें पुलकेशिन II ने हर्ष को निर्णायक रूप से पराजित किया। इस युद्ध की पुष्टि पुलकेशिन II की प्रसिद्ध ‘ऐहोल प्रशस्ति’ तथा चीनी यात्री ह्वेनसांग के विवरण से होती है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऐहोल प्रशस्ति की रचना पुलकेशिन II के दरबारी कवि रविकीर्ति ने की थी और इसे भारतीय इतिहास के प्रमुख अभिलेखीय साक्ष्यों में गिना जाता है। पुलकेशिन II ने इस जीत के उपलक्ष्य में ‘परमेश्वर’ की उपाधि धारण की थी। उल्लेखनीय है कि बाद में पुलकेशिन II को पल्लव शासक नरसिंहवर्मन प्रथम (जिन्हें ‘मामल्ल’ भी कहा जाता है) ने पराजित कर वातापी (बादामी) को नष्ट कर दिया था।
    2. ‘हर्षचरित’ नामक पुस्तक किसने लिखी?
    (a) आर्यभट्ट
    (b) बाणभट्ट
    (c) विष्णुगुप्त
    (d) परिमलगुप्त
    47th B.P.S.C. (Pre) 2005
    उत्तर-(b)
    ‘हर्षचरित’ संस्कृत साहित्य का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक ग्रंथ है, जिसकी रचना हर्षवर्धन के राजकवि बाणभट्ट ने की थी। इस ग्रंथ में हर्षवर्धन के जीवन, उनके पूर्वजों के इतिहास, तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों और सामाजिक जीवन का विस्तृत चित्रण मिलता है। यह पुष्यभूति (वर्धन) वंश का प्रमुख साहित्यिक स्रोत है। बाणभट्ट की एक अन्य विख्यात रचना ‘कादम्बरी’ है जिसे संस्कृत का पहला उपन्यास भी माना जाता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘हर्षचरित’ को संस्कृत गद्य साहित्य की ‘चम्पू’ शैली का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। हर्षवर्धन स्वयं भी एक कवि और नाटककार थे — उन्होंने ‘रत्नावली’, ‘प्रियदर्शिका’ और ‘नागानंद’ नामक तीन संस्कृत नाटकों की रचना की थी, जिनमें नागानंद सर्वाधिक प्रसिद्ध है और इसमें बौद्ध जातक कथाओं का प्रभाव देखा जा सकता है।
    3. सम्राट हर्षवर्धन ने दो महान धार्मिक सम्मेलनों का आयोजन किया था-
    (a) कन्नौज तथा प्रयाग में
    (b) प्रयाग तथा थानेश्वर में
    (c) थानेश्वर तथा वल्लभी में
    (d) वल्लभी तथा प्रयाग में
    U.P.U.D.A./L.D.A. (Pre) 2001
    उत्तर-(a)
    हर्षवर्धन ने अपने शासनकाल में दो ऐतिहासिक धार्मिक सम्मेलनों का आयोजन किया। पहला सम्मेलन कन्नौज में आयोजित किया गया जिसका उद्देश्य महायान बौद्ध धर्म की श्रेष्ठता को विभिन्न धर्मों के सामने प्रमाणित करना था। इसमें 20 देशों के राजाओं सहित बड़ी संख्या में विद्वान और धर्माचार्य सम्मिलित हुए। इस महासभा की अध्यक्षता चीनी यात्री ह्वेनसांग ने की। दूसरा प्रमुख सम्मेलन प्रयाग (इलाहाबाद) के संगम तट पर प्रति पाँच वर्ष के अंतराल पर ‘महामोक्ष परिषद’ के रूप में आयोजित होता था। ह्वेनसांग स्वयं छठी महामोक्ष परिषद में उपस्थित था जिसमें 18 देशों के राजाओं ने भाग लिया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: प्रयाग की ‘महामोक्ष परिषद’ में हर्ष अपना सारा खजाना दान कर देते थे और अंत में केवल एक पुराना वस्त्र धारण कर लेते थे — इस दानशीलता का उल्लेख ह्वेनसांग ने अत्यंत प्रशंसनीय शब्दों में किया है। हर्ष ने नालंदा विश्वविद्यालय को भी भारी दान और संरक्षण प्रदान किया था; ह्वेनसांग के अनुसार नालंदा में उस समय 10,000 से अधिक छात्र और 1,500 से अधिक शिक्षक थे।
    4. मौखरि शासकों की राजधानी थी।
    (a) थानेश्वर
    (b) कन्नौज
    (c) पुरुषपुर
    (d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
    Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2011
    उत्तर-(b)
    मौखरि वंश के शासक मूलतः गुप्त साम्राज्य के सामंत थे और मगध (गया) क्षेत्र से उनका मूल सम्बन्ध था। गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद मौखरि वंश ने अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित की और कन्नौज (कान्यकुब्ज) को अपनी राजधानी बनाया। इस वंश के प्रमुख शासकों में हरिवर्मा, आदित्यवर्मा, ईशानवर्मा, सर्ववर्मा तथा ग्रहवर्मा उल्लेखनीय हैं। ग्रहवर्मा ने हर्षवर्धन की बहन राज्यश्री से विवाह किया था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कन्नौज उत्तर भारत की राजनीति में इतना महत्वपूर्ण हो गया था कि बाद के इतिहास में इसे ‘कन्नौज त्रिभुज संघर्ष’ (Tripartite Struggle) का केंद्र माना जाता है, जिसमें पाल, प्रतिहार और राष्ट्रकूट वंश सदियों तक कन्नौज पर अधिकार के लिए संघर्षरत रहे। ईशानवर्मा प्रथम स्वतंत्र मौखरि शासक थे जिन्होंने ‘महाराजाधिराज’ की उपाधि धारण की।
    5. निम्नलिखित शासकों में से किसने हर्षवर्धन को पराजित किया था ?
    (a) कीर्तिवर्मन द्वितीय
    (b) विक्रमादित्य द्वितीय
    (c) पुलकेशिन प्रथम
    (d) पुलकेशिन द्वितीय
    U.P.P.C.S(Mains) 2016
    उत्तर-(d)
    चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय ने नर्मदा नदी के तट पर हुए निर्णायक युद्ध में हर्षवर्धन को पराजित किया था। पुलकेशिन II वातापी (वर्तमान बादामी, कर्नाटक) के चालुक्य वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था और उसे दक्षिण का महानतम शासक माना जाता है। उसने इस विजय के फलस्वरूप ‘परमेश्वर’ की उपाधि ग्रहण की। इस युद्ध की ऐतिहासिकता की पुष्टि ‘ऐहोल प्रशस्ति’ और ह्वेनसांग के यात्रा-विवरण से होती है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: पुलकेशिन II ने फारस के ससानी सम्राट खुसरो II के दरबार में अपना एक राजदूत भेजा था, और खुसरो ने भी अपना दूत वातापी भेजा — यह घटना भारतीय इतिहास में प्रारंभिक कूटनीतिक संबंधों का उत्कृष्ट उदाहरण है। अजंता की प्रसिद्ध गुफा संख्या 1 में बनी एक भित्ति-चित्र में ईरानी दूत को पुलकेशिन II के दरबार में आते हुए दर्शाया गया है।
    6. हर्ष के समय की सूचनाएं किसकी पुस्तकों में निहित हैं?
    (a) हरिषेण
    (b) कल्हण
    (c) कालिदास
    (d) इनमें से किसी में नहीं
    U.P.P.C.S. (Pre) 1995
    उत्तर-(b)
    हर्षवर्धन के शासनकाल की विस्तृत जानकारी मुख्यतः उनके राजकवि बाणभट्ट की कृति ‘हर्षचरित’ से प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त कश्मीरी कवि कल्हण द्वारा रचित ‘राजतरंगिणी’ (12वीं शताब्दी) में भी हर्ष से संबंधित कुछ उपयोगी सूचनाएँ उपलब्ध हैं। हरिषेण और कालिदास दोनों हर्ष से पूर्व के काल के हैं — हरिषेण समुद्रगुप्त के दरबारी कवि थे और उन्होंने प्रयाग प्रशस्ति की रचना की, जबकि कालिदास गुप्त काल से संबद्ध हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ (1148–1150 ई.) कश्मीर के इतिहास का सर्वप्रथम व्यवस्थित इतिहास-ग्रंथ है और इसे भारत की पहली ऐतिहासिक काव्य-रचना भी माना जाता है। हर्षवर्धन के शासन की जानकारी के लिए ह्वेनसांग का यात्रा-वृत्तांत ‘सी-यू-की’ (Si-Yu-Ki) भी अत्यंत महत्वपूर्ण विदेशी साक्ष्य है — ह्वेनसांग लगभग 8 वर्षों तक हर्ष के साम्राज्य में रहा था।
    7. हर्ष के साम्राज्य की राजधानी थी-
    (a) कन्नौज
    (b) पाटलिपुत्र
    (c) प्रयाग
    (d) थानेश्वर
    U.P.P.C.S. (Pre) 1993
    उत्तर-(a)
    हर्षवर्धन ने आरंभ में थानेश्वर (हरियाणा) से शासन किया, किंतु अपनी बहन राज्यश्री को सहायता देने तथा विशाल साम्राज्य के सुचारु प्रशासन हेतु उन्होंने अपनी राजधानी कन्नौज (उत्तर प्रदेश) स्थानांतरित की। चीनी स्रोत यह भी उल्लेख करते हैं कि हर्ष और राज्यश्री दोनों ने मिलकर कन्नौज के राजसिंहासन को संभाला। भौगोलिक दृष्टि से कन्नौज उत्तर भारत के केंद्र में स्थित है, जो प्रशासनिक दृष्टि से बेहद उपयुक्त था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: हर्ष ने अपने शासन में गंगा घाटी के मार्गों पर यात्रियों की सुविधा के लिए धर्मशालाएं और अस्पताल बनवाए, जिनका उल्लेख ह्वेनसांग ने किया है। हर्षवर्धन का साम्राज्य उनकी मृत्यु (647 ई.) के बाद विघटित हो गया; उनके कोई उत्तराधिकारी नहीं था और उनके मंत्री अर्जुन ने सत्ता हथियाने का प्रयास किया, जिसे बाद में चीनी दूत वांग ह्वेन-त्से ने नेपाल और तिब्बती सेनाओं की सहायता से पराजित किया।
    8. उत्तर प्रदेश में स्थित वह स्थल जहां हर्षवर्धन ने बौद्ध महासम्मेलन का आयोजन किया था –
    (a) काशी
    (b) प्रयाग
    (c) अयोध्या
    (d) सारनाथ
    U.P. Lower (Sub.) (Pre) 2004
    उत्तर-(b)
    हर्षवर्धन ने उत्तर प्रदेश के प्रयाग (आधुनिक प्रयागराज) में गंगा-यमुना-सरस्वती के संगम पर बौद्ध महासम्मेलन का आयोजन किया था। यह सम्मेलन ‘महामोक्ष परिषद’ के नाम से जाना जाता था और प्रत्येक पाँचवें वर्ष आयोजित किया जाता था। इस अवसर पर हर्ष विशाल दान का आयोजन करते थे जिसमें देश-विदेश के राजा, विद्वान और धर्माचार्य भाग लेते थे। चीनी तीर्थयात्री ह्वेनसांग इस परिषद के प्रत्यक्षदर्शी थे।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: प्रयाग का ‘कुम्भ मेला’ जो आज भी विश्व के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में से एक है, उसकी ऐतिहासिक परम्परा को हर्ष की ‘महामोक्ष परिषद’ से भी जोड़ा जाता है। हर्षवर्धन का धार्मिक दृष्टिकोण व्यापक था — वे शैव, बौद्ध और वैष्णव तीनों धर्मों का सम्मान करते थे; ह्वेनसांग के प्रभाव में आकर उन्होंने महायान बौद्ध धर्म को विशेष संरक्षण दिया।
    9. सम्राट हर्ष ने अपनी राजधानी थानेश्वर से कहां स्थानांतरित की थी?
    (a) प्रयाग
    (b) दिल्ली
    (c) कन्नौज
    (d) राजगृह
    U.P.P.C.S. (Pre) 1992
    उत्तर-(c)
    हर्षवर्धन के पिता प्रभाकरवर्धन की मृत्यु के बाद उनके बड़े भाई राज्यवर्धन को मालव नरेश देवगुप्त ने छल से मार डाला। इस विकट परिस्थिति में हर्ष ने शासन संभाला और अपनी बहन राज्यश्री को (जिन्हें मौखरि राजा ग्रहवर्मा की मृत्यु के बाद कैद किया गया था) मुक्त कराया। प्रशासनिक सुविधा और मौखरि राज्यश्री को सहयोग देने हेतु हर्ष ने अपनी राजधानी थानेश्वर से कन्नौज स्थानांतरित की। कन्नौज भौगोलिक दृष्टि से उत्तर भारत का केंद्र था और व्यापार मार्गों की दृष्टि से भी सामरिक महत्त्व का नगर था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: थानेश्वर (आधुनिक हरियाणा का कुरुक्षेत्र जिला) वैदिक काल से ही एक महत्त्वपूर्ण धार्मिक स्थल था, क्योंकि कुरुक्षेत्र का युद्ध यहीं हुआ था। हर्षवर्धन पुष्यभूति वंश के थे और उनके राज्याभिषेक के समय उनकी आयु मात्र 16 वर्ष बताई जाती है; उन्होंने लगभग 41 वर्षों तक (606–647 ई.) शासन किया।
    10. गुप्त वंश के पतन से लेकर आरंभिक सातवीं शताब्दी में हर्षवर्धन के उत्थान तक
    1. मगध के गुप्त 2. मालवा के परमार
    3.थानेसर के पुष्यभूति 4. कन्नौज के मौखरि
    5. देवगिरि के यादव 6. वल्लभी के मैत्रक
    नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए। उत्तर भारत में निम्नलिखित में से किन राज्यों का शासन था ?
    (a) 1, 2 और 5
    (b) 1, 3, 4 और 6
    (c) 2, 3 और 4
    (d) 5 और 6
    I.A.S. (Pre) 2021
    उत्तर-(b)
    छठी शताब्दी ई. के मध्य में गुप्त साम्राज्य के विघटन के बाद उत्तर भारत में राजनीतिक विकेंद्रीकरण की लहर आई। इस संक्रांतिकाल में निम्नलिखित राज्यों ने उत्तर भारत में प्रमुख भूमिका निभाई: (1) मगध के गुप्त — ये परवर्ती गुप्त शासक थे जो मगध क्षेत्र में सत्ता बनाए रखे; (2) थानेसर के पुष्यभूति — हर्षवर्धन के पूर्वज जो उत्तरी भारत में शक्तिशाली हुए; (3) कन्नौज के मौखरि — उत्तर प्रदेश क्षेत्र में प्रभावशाली शासक वंश; (4) वल्लभी के मैत्रक — सौराष्ट्र (गुजरात) क्षेत्र के शासक। मालवा के परमार बाद के काल (9वीं-10वीं सदी) से संबंधित हैं और देवगिरि के यादव दक्षिण के थे।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वल्लभी (सौराष्ट्र) का मैत्रक वंश अपने समय में शिक्षा और व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र था। वल्लभी में भी एक प्रसिद्ध बौद्ध विश्वविद्यालय था जिसे नालंदा के समकक्ष माना जाता था। परवर्ती गुप्त शासकों में माधवगुप्त उल्लेखनीय हैं जो हर्षवर्धन के मित्र एवं सहयोगी थे और मगध पर शासन करते थे।
    11. चीनी यात्री ह्वेनसांग ने किस विश्वविद्यालय में अध्ययन किया था ?
    (a) तक्षशिला
    (b) विक्रमशिला
    (c) मगध
    (d) नालंदा
    U.P.P.C.S. (Pre) 1995
    46th B.P.S.C. (Pre) 2003
    उत्तर-(d)
    चीनी तीर्थयात्री ह्वेनसांग 637 ई. में नालंदा विश्वविद्यालय पहुँचा, जो उस समय एशिया का सर्वाधिक प्रतिष्ठित शिक्षा केंद्र था। उस समय विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य शीलभद्र थे। ह्वेनसांग ने लगभग डेढ़ वर्ष तक नालंदा में निवास कर योगशास्त्र और बौद्ध दर्शन का गहन अध्ययन किया। इसके पश्चात् वह बंगाल, उड़ीसा, धान्यकटक होते हुए कांची तक गया। अपनी दूसरी यात्रा में वह पुनः नालंदा लौटा और वहाँ व्याख्यान भी दिए।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम (5वीं सदी) के काल में हुई थी। ह्वेनसांग के अनुसार नालंदा में उस समय लगभग 10,000 छात्र और 1,500 से अधिक शिक्षक थे तथा यहाँ प्रवेश के लिए एक कठिन द्वारपंडित परीक्षा उत्तीर्ण करनी पड़ती थी — जिसमें केवल 20% आवेदक ही सफल होते थे।
    12. भारत की यात्रा करने वाले चीनी यात्री युआन च्वांग (ह्वेनसांग) ने तत्कालीन भारत की सामान्य दशाओं और संस्कृति का वर्णन किया है। इस संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
    1. सड़क और नदी-मार्ग लूटमार से पूरी तरह सुरक्षित थे।
    2.जहां तक अपराधों के लिए दंड का प्रश्न है, अग्नि, जल व विष द्वारा सत्यपरीक्षा किया जाना ही किसी भी व्यक्ति की निर्दोषिता अथवा दोष के निर्णय के साधन थे।
    3. व्यापारियों को नौघाटों और नौकाओं पर शुल्क देना पड़ता था। नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए ।
    (a) केवल 1
    (b) केवल 2 और 3
    (c) केवल 1 और 3
    (d) 1, 2 और 3
    I.A.S. (Pre) 2013
    उत्तर-(b)
    ह्वेनसांग के यात्रा-वृत्तांत ‘सी-यू-की’ के अनुसार कथन (1) असत्य है, क्योंकि उसने स्वयं यात्रा के दौरान कई बार लुटेरों और चोर-डाकुओं का सामना किया था; मार्ग पूर्णतः सुरक्षित नहीं थे। कथन (2) सत्य है — न्याय-निर्णय के लिए अग्नि, जल एवं विष द्वारा ‘दिव्य परीक्षा’ का प्रचलन था। कथन (3) भी सत्य है — व्यापारियों को नौघाटों, बाज़ारों और व्यापारिक मार्गों पर विभिन्न प्रकार के कर चुकाने पड़ते थे, जो राज्य की आय का प्रमुख स्रोत था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ह्वेनसांग के विवरण से पता चलता है कि हर्षकालीन भारत में भूमि कर उपज का 1/6 भाग होता था तथा राज्य की आय को चार भागों में बाँटा जाता था — राजकाज, विद्वानों का वेतन, धार्मिक कार्य और दान। ह्वेनसांग ने यह भी लिखा कि हर्ष के राज्य में मृत्युदंड नहीं दिया जाता था और अपराधियों को कारागार में बंद किया जाता था।
    13. चालुक्य शासक पुलकेशिन की हर्ष पर विजय का वर्ष था-
    (a) 612 ई.
    (b) 618 ई.
    (c) 622 ई.
    (d) 634 ई.
    Jharkhand P.C.S. (Pre) 2016
    उत्तर-(b)
    हर्ष और पुलकेशिन द्वितीय के बीच नर्मदा के तट पर हुए ऐतिहासिक युद्ध की तिथि विद्वानों में विवादास्पद रही है। इतिहासकार अल्टेकर के अनुसार यह युद्ध 630 से 634 ई. के बीच हुआ, क्योंकि 634 ई. की ‘ऐहोल प्रशस्ति’ में इस युद्ध का उल्लेख है, किंतु 630 ई. के लोहनारा अभिलेख में हर्ष का नाम पुलकेशिन के शत्रुओं में नहीं है। परंतु अप्रैल 2016 में भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट (BORI) के शोधकर्ताओं ने एक ताम्रपत्र के आधार पर यह निष्कर्ष दिया कि यह युद्ध 618 ई. में हुआ था। इंपीरियल गजेटियर ऑफ इंडिया इसे लगभग 620 ई. का मानता है। झारखंड लोक सेवा आयोग ने भी 618 ई. को सही उत्तर माना है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऐहोल प्रशस्ति को पुलकेशिन II के दरबारी कवि रविकीर्ति ने संस्कृत में लिखा था। इसमें पुलकेशिन की तुलना सीधे कालिदास से की गई है। यह प्रशस्ति न केवल हर्ष पर विजय का, बल्कि पल्लव, कदंब, गंग और अलुप जैसे अनेक राजवंशों पर पुलकेशिन की विजयों का भी उल्लेख करती है।
    14. आज भी भारत में ह्वेनसांग को याद करने का मुख्य कारण है-
    (a) हर्ष के प्रति सम्मान
    (b) नालंदा में अध्ययन
    (c) बौद्ध धर्म में आस्था
    (d) सी-यू-की की रचना
    R.A.S. / R.T.S. (Pre) 1992
    उत्तर-(d)
    ह्वेनसांग को भारत में आज भी मुख्यतः उनकी यात्रा पर आधारित ग्रंथ ‘सी-यू-की’ (Si-Yu-Ki अर्थात् ‘पश्चिमी देशों का वृत्तांत’) के कारण स्मरण किया जाता है। इस ग्रंथ में उन्होंने सातवीं शताब्दी के भारत की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक स्थिति का अत्यंत सजीव विवरण प्रस्तुत किया है। यह ग्रंथ हर्षकालीन भारत के इतिहास के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विदेशी साक्ष्यों में से एक है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘सी-यू-की’ के अतिरिक्त ह्वेनसांग की जीवनी ‘ह्वेनसांग की जीवनकथा’ उनके शिष्य ह्वेली ने लिखी थी, जो भी भारतीय इतिहास का उपयोगी स्रोत है। उल्लेखनीय है कि ह्वेनसांग से पूर्व फाह्यान (चंद्रगुप्त II के काल में, 399–414 ई.) और बाद में इत्सिंग (7वीं सदी के उत्तरार्ध में) भी भारत आए — तीनों के विवरण मिलकर गुप्तकाल से हर्षकाल तक के भारत की एक विस्तृत तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।
    15. हर्ष के दरबार में ह्वेनसांग को एक दूत के रूप में किसने भेजा था ?
    (a) ताई सुंग
    (b) तुंग-कुआन
    (c) कू येन-वू
    (d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
    U.P.P.C.S. (Pre) 2007
    उत्तर-(d)
    ह्वेनसांग को हर्ष के दरबार में किसी ने दूत के रूप में नहीं भेजा था — वे स्वयं की इच्छा और बौद्ध धर्म के प्रति श्रद्धावश भारत आए थे। वे चीन के तांग वंशी शासक ताई सुंग के काल के नागरिक थे, किंतु उस समय तुर्क आक्रमणों के भय से पश्चिम में विदेश यात्रा पर प्रतिबंध था। इसके बावजूद ह्वेनसांग ने 629 ई. में चंगन से स्वतंत्र रूप से यात्रा प्रारंभ की। भारत से लौटने पर सम्राट ताई सुंग ने उन्हें दंडित करने के बजाय सम्मानित किया और अपना आध्यात्मिक सलाहकार नियुक्त किया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: हर्षवर्धन ने चीन के तांग शासक ताई सुंग के दरबार में अपना एक राजदूत भेजा था, और बदले में ताई सुंग ने भी वांग ह्वेन-त्से को भारत भेजा — यह भारत-चीन के बीच प्रारंभिक कूटनीतिक संपर्क का उल्लेखनीय उदाहरण है। हर्ष की मृत्यु के बाद वांग ह्वेन-त्से ने नेपाल और तिब्बती सेनाओं की मदद से हर्ष के विद्रोही मंत्री अर्जुन को पराजित भी किया।
    16. ह्वेनसांग किसके शासनकाल में भारत आया था ?
    (a) चंद्रगुप्त II
    (b) सम्राट हर्ष
    (c) चंद्रगुप्त मौर्य
    (d) चंद्रगुप्त I
    U.P.P.C.S. (Pre) 1990
    U.P.P.C.S. (Mains) 2012
    उत्तर-(b)
    प्रसिद्ध चीनी बौद्ध यात्री ह्वेनसांग सम्राट हर्षवर्धन (शासनकाल: 606–647 ई.) के समय में भारत आया था। उनका मुख्य उद्देश्य महात्मा बुद्ध से जुड़े पवित्र स्थलों का दर्शन करना और मूल बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन करना था। उन्होंने 629 ई. में चीन की राजधानी चंगन से प्रस्थान किया और भारत प्रवास के दौरान अपने अनुभवों को ‘सी-यू-की’ नामक ग्रंथ में लिपिबद्ध किया, जो आज भी तत्कालीन भारत के इतिहास का अमूल्य विदेशी स्रोत है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ह्वेनसांग ने भारत में लगभग 14-15 वर्ष (629–645 ई. के आसपास) बिताए और इस दौरान उन्होंने 657 बौद्ध ग्रंथ एकत्र कर चीन लाए, जिनके अनुवाद में उन्होंने शेष जीवन लगाया। उनसे पहले फाह्यान चंद्रगुप्त II विक्रमादित्य (गुप्तकाल) के समय 399–414 ई. में भारत आया था और उन्होंने ‘फो-क्वो-की’ नामक यात्रा-ग्रंथ लिखा था।
    17. निम्नलिखित शासकों में से किसने हर्षवर्धन को पराजित किया था ?
    (a) कीर्तिवर्मन द्वितीय
    (b) विक्रमादित्य द्वितीय
    (c) पुलकेशिन प्रथम
    (d) पुलकेशिन द्वितीय
    U.P.P.C.S(Mains) 2016
    उत्तर-(d)
    वातापी (बादामी) के चालुक्य वंश के सर्वाधिक शक्तिशाली शासक पुलकेशिन द्वितीय ने नर्मदा के तट पर हुए युद्ध में हर्षवर्धन को पराजित किया था। यह पराजय हर्ष के लिए उनके पूरे शासनकाल की सबसे बड़ी सैन्य विफलता थी। पुलकेशिन II ने इस विजय के उपलक्ष्य में ‘परमेश्वर’ की उपाधि ग्रहण की। इस युद्ध की प्रामाणिकता 634 ई. की ‘ऐहोल प्रशस्ति’ और ह्वेनसांग के यात्रा-विवरण से सिद्ध होती है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: पुलकेशिन II ने दक्षिण भारत में भी अपना प्रभाव स्थापित किया था और ‘दक्षिणापथेश्वर’ की उपाधि धारण की। किंतु उनके जीवन का अंत दुखद रहा — पल्लव नरेश नरसिंहवर्मन प्रथम ‘मामल्ल’ ने लगभग 642 ई. में पुलकेशिन II को पराजित कर उनकी राजधानी वातापी को नष्ट कर दिया, जिस कारण नरसिंहवर्मन को ‘वातापिकोण्ड’ की उपाधि मिली।
    18. ‘कौशेय’ शब्द का प्रयोग किया गया है-
    (a) कपास के लिए
    (b) सन के लिए
    (c) रेशम के लिए
    (d) ऊन के लिए
    U.P.P.C.S. (Spl) (Mains) 2008
    उत्तर-(c)
    गुप्त एवं गुप्तोत्तर काल में रेशम के लिए संस्कृत में ‘कौशेय‘ शब्द का प्रयोग किया जाता था। इसी प्रकार कपास को ‘कार्पासिक’, ऊन को ‘और्ण’ तथा सन को ‘क्षौम’ कहा जाता था। भारत में रेशम उद्योग अत्यंत प्राचीन है और रेशमी वस्त्रों का व्यापार ‘रेशम मार्ग’ (Silk Route) के माध्यम से मध्य एशिया और चीन तक होता था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ह्वेनसांग के अनुसार उस काल में वाराणसी रेशमी वस्त्रों के उत्पादन के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध था, जबकि मथुरा सूती वस्त्रों का प्रमुख केंद्र था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी विभिन्न प्रकार के वस्त्रों — पट्टवस्त्र (रेशम), दुकूल (बंगाल का रेशम), क्षौम (लिनेन) — का विस्तार से उल्लेख मिलता है।
    19. कवि बाण, निवासी था-
    (a) पाटलिपुत्र का
    (b) थानेश्वर का
    (c) भोजपुर का
    (d) उपर्युक्त में कोई नहीं
    41st B.P.S.C. (Pre) 1996
    उत्तर-(d)
    ‘हर्षचरित’ और ‘कादम्बरी’ के रचयिता महाकवि बाणभट्ट का जन्म बिहार में सोन नदी के तट पर स्थित प्रीथिकूटा (प्रीतिकूट) नामक ग्राम में हुआ था — यह स्थान पाटलिपुत्र, थानेश्वर या भोजपुर में से किसी में नहीं आता, इसलिए सही उत्तर विकल्प (d) है। उनके पिता का नाम चित्रभानु और माता का नाम राजदेवी था। बाणभट्ट बचपन में ही अनाथ हो गए थे और उन्होंने अपने जीवन के प्रारंभिक वर्ष भटकते हुए बिताए।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बाणभट्ट की कृति ‘कादम्बरी’ को संस्कृत साहित्य का प्रथम गद्य उपन्यास माना जाता है। यह ग्रंथ बाणभट्ट पूर्ण नहीं कर पाए और उनके पुत्र भूषणभट्ट ने इसे पूरा किया। ‘हर्षचरित’ को संस्कृत की ‘चम्पू’ (गद्य-पद्य मिश्रित) शैली का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है, जो इतिहास और साहित्य दोनों दृष्टियों से अमूल्य है।
    20. ह्वेनसांग की भारत में यात्रा के समय सूती कपड़ों के उत्पादन के लिए सबसे प्रसिद्ध नगर था-
    (a) वाराणसी
    (b) मथुरा
    (c) पाटलिपुत्र
    (d) कांची
    41st B.P.S.C. (Pre) 1996
    उत्तर-(b)
    चीनी यात्री ह्वेनसांग के विवरण के अनुसार, हर्षकाल (7वीं शताब्दी) में मथुरा सूती वस्त्रों के उत्पादन के लिए सबसे प्रसिद्ध नगर था। वहीं वाराणसी रेशमी वस्त्रों (कौशेय) के लिए जाना जाता था। ह्वेनसांग ने यह भी उल्लेख किया कि थानेश्वर नगर की समृद्धि का मूल कारण उसका व्यापार था। इस काल में कन्नौज और उज्जयिनी भी आर्थिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध नगर थे।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मथुरा केवल वस्त्र उद्योग ही नहीं, बल्कि कला के क्षेत्र में भी विश्वप्रसिद्ध था। मथुरा कला शैली (कुषाण काल में विकसित) ने बुद्ध और जैन तीर्थंकरों की मूर्तिकला को एक नई दिशा दी थी। बाणभट्ट ने अपनी रचनाओं में थानेश्वर को व्यापारियों की दृष्टि से ‘लाल भूमि’ और अतिथियों के लिए ‘चिंतामणि भूमि’ कहा है।
    21. हर्षवर्धन के शासनकाल में किस चीनी यात्री ने भारत की यात्रा की थी ?
    (a) फाह्यान
    (b) ह्वेनसांग
    (c) इत्सिंग
    (d) तारानाथ
    56th to 59th B.P.S.C. (Pre) 2015
    उत्तर-(b)
    हर्षवर्धन के शासनकाल (606–647 ई.) में चीनी यात्री ह्वेनसांग (युआन च्वांग) ने भारत की यात्रा की थी। फाह्यान गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त II के काल में भारत आया था (399–414 ई.), इत्सिंग 7वीं सदी के उत्तरार्ध में नालंदा आया था तथा तारानाथ एक तिब्बती इतिहासकार थे जो बौद्ध धर्म के इतिहास-लेखन के लिए जाने जाते हैं। ह्वेनसांग का यात्रा-ग्रंथ ‘सी-यू-की’ हर्षकालीन भारत का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विदेशी साक्ष्य है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तीनों प्रमुख चीनी यात्रियों की भारत यात्रा का स्मरण-सूत्र इस प्रकार है — फाह्यान → गुप्तकाल (चंद्रगुप्त II), ह्वेनसांग → हर्षकाल, इत्सिंग → हर्षोत्तर काल। इत्सिंग ने भी नालंदा में अध्ययन किया और अपनी यात्रा में उसने 56 भारतीय राज्यों का वर्णन किया है। तारानाथ की रचना ‘कंग्युर’ और ‘तंग्युर’ तिब्बती बौद्ध साहित्य के महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं।
    20. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-
    (1) चीनी तीर्थयात्री फाह्यान ने कनिष्क द्वारा आयोजित की गई चतुर्थ महान बौद्ध परिषद में भाग लिया।
    (2) चीनी तीर्थयात्री ह्वेनसांग, हर्ष से मिला और उसे बौद्ध धर्म का प्रतिरोधी पाया।
    उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
    (a) केवल 1
    (b) केवल 2
    (c) दोनों 1 और 2
    (d) न ही 1 और न ही 2
    I.A.S. (Pre) 2004
    उत्तर-(d)
    दोनों कथन असत्य हैं। कथन (1) गलत है क्योंकि फाह्यान गुप्त शासक चंद्रगुप्त II के काल में (399–414 ई.) भारत आया था — वह कनिष्क के काल से लगभग तीन शताब्दी बाद का था, अतः चतुर्थ बौद्ध संगीति (जो लगभग प्रथम शताब्दी ई. में कश्मीर में हुई) में उसकी उपस्थिति असंभव है। कथन (2) भी गलत है क्योंकि हर्षवर्धन ह्वेनसांग से मिलने से पहले ही बौद्ध धर्म के प्रति झुकाव रखते थे। ह्वेनसांग से भेंट के बाद उन्होंने महायान बौद्ध धर्म को राज्याश्रय दिया और पूर्ण बौद्ध बन गए — वे बौद्ध धर्म के प्रतिरोधी नहीं, बल्कि उसके प्रबल संरक्षक थे।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बौद्ध धर्म की चार महासंगीतियाँ क्रमशः राजगृह (अजातशत्रु काल), वैशाली (कालाशोक काल), पाटलिपुत्र (अशोक काल) और कश्मीर (कनिष्क काल) में हुईं। हर्षवर्धन ने मांस-भक्षण और पशु-बलि पर प्रतिबंध लगाया था तथा अपने साम्राज्य में बौद्ध स्तूपों और विहारों के निर्माण को प्रोत्साहन दिया।
    23. नालंदा विश्वविद्यालय के विनाश का कारण था-
    (a) मुसलमान
    (b) कुषाण
    (c) सीथियन्स
    (d) मुगल
    43rd B.P.S.C. (Pre) 1999
    उत्तर-(a)
    नालंदा विश्वविद्यालय को 1193 ई. में बख्तियार खिलजी के नेतृत्व में तुर्क मुस्लिम आक्रमणकारियों ने नष्ट किया था। बख्तियार खिलजी दिल्ली सल्तनत के कुतुबुद्दीन ऐबक का सेनानायक था। आक्रमणकारियों ने नालंदा के विशाल पुस्तकालय — जिसे ‘धर्मगंज’ कहा जाता था और जिसमें लाखों बौद्ध पांडुलिपियाँ थीं — में आग लगा दी। यह विध्वंस भारत में बौद्ध धर्म के पतन का एक निर्णायक कारण बना। तिब्बती ग्रंथों के अनुसार पुस्तकालय की आग इतनी भीषण थी कि वह कई महीनों तक जलती रही।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: नालंदा के अतिरिक्त बख्तियार खिलजी ने विक्रमशिला और उदंतपुरी बौद्ध विश्वविद्यालयों को भी नष्ट किया। आधुनिक समय में नालंदा विश्वविद्यालय को 2010 में भारत सरकार द्वारा पुनः स्थापित किया गया और 2014 में यह कार्यात्मक हुआ; साथ ही नालंदा के पुरातात्विक अवशेषों को 2016 में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया।
    24. चीनी यात्री जिसने भीनमाल की यात्रा की थी-
    (a) फाह्यान
    (b) सुंगयुन
    (c) ह्वेनसांग
    (d) इत्सिंग
    R.A.S. / R.T.S. (Pre) 2007
    उत्तर-(c)
    चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपनी भारत यात्रा के दौरान भीनमाल (वर्तमान राजस्थान के जालोर जिले में स्थित) की यात्रा की थी। भीनमाल उस काल में गुर्जरदेश की राजधानी था। ह्वेनसांग को ‘यात्रियों का राजकुमार’ कहा जाता है और उनके यात्रा-विवरण को ‘सी-यू-की’ के नाम से जाना जाता है। ह्वेनसांग हर्षवर्धन के समय भारत आया और बौद्ध धर्म के प्रति उनकी गहरी आस्था थी।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: भीनमाल उस काल में न केवल राजनीतिक बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण था — प्रसिद्ध गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री ब्रह्मगुप्त (628 ई. में ‘ब्राह्मस्फुटसिद्धांत’ के रचयिता) का संबंध भीनमाल से ही था। ब्रह्मगुप्त ने शून्य और ऋणात्मक संख्याओं के नियमों को पहली बार व्यवस्थित रूप में प्रतिपादित किया था।
    25. कथन (a) : सामंतवाद का विकास गुप्तोत्तर काल की कृषक-संरचना की प्रमुख विशेषता थी।
    कारण (R) : इस काल में भू-स्वामी मध्यस्थ वर्ग एवं आश्रित कृषक वर्ग अस्तित्व में आया। नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए-

    (a) (a) तथा (R) दोनों सही हैं तथा (R), (a) की सही व्याख्या है।

    (b) (a) तथा (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (a) की सही व्याख्या नहीं है।

    (c) (a) सही है, परंतु (R) गलत है।

    (d) (a) गलत है, परंतु (R) सही है।
    U.P.P.C.S. (Spl) (Mains) 2004
    उत्तर-(a)
    कथन (A) और कारण (R) दोनों सत्य हैं और कारण (R), कथन (A) की सटीक व्याख्या करता है। गुप्तोत्तर काल में केंद्रीय सत्ता के कमजोर पड़ने से सामंतवाद का उदय हुआ। राजाओं ने अपने सेवकों, सैनिकों और ब्राह्मणों को नकद वेतन के स्थान पर भूमि-अनुदान देना प्रारंभ किया। इससे एक शक्तिशाली भू-स्वामी मध्यस्थ वर्ग का उदय हुआ जो सीधे खेती न करके कृषकों से राजस्व वसूलता था। इन पर निर्भर आश्रित कृषक वर्ग की स्वतंत्रता सीमित होती गई, जो भारतीय सामंतवाद की मूल संरचना बनी।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: भारतीय सामंतवाद पर इतिहासकारों में मतभेद है — D.D. कोसाम्बी और R.S. शर्मा ने इसे यूरोपीय सामंतवाद के समकक्ष माना, जबकि B.D. चट्टोपाध्याय ने इसे भिन्न बताया। गुप्तोत्तर काल में भूमि-अनुदान के साक्ष्य ताम्रपत्र अभिलेखों की अत्यधिक वृद्धि से भी मिलते हैं।
    26. ‘सी-यू-की’ नामक यात्रा विवरण निम्नलिखित में से किससे जुड़ा है ?
    (a) फाह्यान
    (b) अलबरुनी
    (c) मेगस्थनीज
    (d) ह्वेनसांग
    U.P.P.C.S(Mains) 2016
    उत्तर-(d)
    ‘सी-यू-की’ (Si-Yu-Ki) अर्थात् ‘पश्चिमी देशों का वृत्तांत’ चीनी यात्री ह्वेनसांग द्वारा रचित यात्रा-विवरण है। इसमें 7वीं शताब्दी के भारत की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक स्थिति का विस्तृत एवं प्रामाणिक वर्णन मिलता है। फाह्यान का यात्रा-ग्रंथ ‘फो-क्वो-की’, मेगस्थनीज का ‘इंडिका’ तथा अलबरुनी का ‘किताब-उल-हिंद’ हैं — ये तीनों अलग-अलग ग्रंथ हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: प्रमुख विदेशी यात्रियों और उनके ग्रंथों का स्मरण-सूत्र: मेगस्थनीज → इंडिका (मौर्यकाल), फाह्यान → फो-क्वो-की (गुप्तकाल), ह्वेनसांग → सी-यू-की (हर्षकाल), अलबरुनी → किताब-उल-हिंद (महमूद गजनवी काल)। इनमें से अलबरुनी ने संस्कृत सीखकर भारतीय ग्रंथों का अध्ययन किया और उन्हें भारत का पहला तुलनात्मक अध्येता माना जाता है।
    27. गुप्तोत्तर युग में प्रमुख व्यापारिक केंद्र था-
    (a) कन्नौज
    (b) उज्जैन
    (c) धार
    (d) देवगिरी
    R.A.S./R.T.S. (Pre) 1993
    उत्तर-(a)
    गुप्तकाल में उज्जैन व्यापार का प्रमुख केंद्र था और चंद्रगुप्त II ने इसे अपनी द्वितीय राजधानी भी बनाया था। परंतु गुप्तोत्तर काल में व्यापार का केंद्र उज्जैन से हटकर कन्नौज हो गया। इसके दो प्रमुख कारण थे — पहला, हर्षवर्धन ने कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया, जिससे यह राजनीतिक और व्यापारिक केंद्र बन गया; दूसरा, कन्नौज की गंगा-यमुना दोआब में रणनीतिक स्थिति ने इसे उत्तर भारत के सबसे महत्त्वपूर्ण व्यापारिक मार्गों का केंद्र बना दिया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कन्नौज की सामरिक और आर्थिक महत्ता इतनी अधिक थी कि 8वीं से 10वीं शताब्दी के बीच पाल, प्रतिहार और राष्ट्रकूट वंश — तीनों इस पर अधिकार के लिए लगातार संघर्षरत रहे, जिसे इतिहास में ‘त्रिपक्षीय संघर्ष’ (Tripartite Struggle) कहा जाता है। इस संघर्ष में अंततः प्रतिहार वंश कन्नौज पर अधिकार करने में सफल हुआ।
    28. निम्नलिखित में से कौन-सा उपवाक्य, उत्तर हर्ष-कालीन स्रोतों में प्रायः उल्लिखित ‘हुंडी’ के स्वरूप की परिभाषा बताता है?

    (a) राजा द्वारा अपने अधीनस्थों को दिया गया परामर्श

    (b) प्रतिदिन का लेखा-जोखा अंकित करने वाली बही

    (c) विनिमय-पत्र

    (d) सामन्त द्वारा अपने अधीनस्थों को दिया गया आदेश
    I.A.S. (Pre) 2020
    उत्तर-(c)
    ‘हुंडी’ भारत की प्राचीन साख-पत्र प्रणाली का एक महत्त्वपूर्ण उपकरण था, जिसे आधुनिक शब्दावली में ‘विनिमय-पत्र’ (Bill of Exchange) कहते हैं। जब कोई व्यापारी नकद भुगतान के स्थान पर भविष्य में एक निश्चित तिथि पर भुगतान का आश्वासन देता था, तो यह हुंडी के रूप में लिखित दस्तावेज प्रस्तुत किया जाता था। यह प्रणाली दूरस्थ व्यापार को सुरक्षित और सुविधाजनक बनाती थी क्योंकि व्यापारियों को लंबी यात्राओं में नकद धन साथ नहीं ले जाना पड़ता था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: हुंडी प्रणाली भारत में अत्यंत प्राचीन है और कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी ऐसी साख-पत्र व्यवस्था का उल्लेख मिलता है। मध्यकाल में राजस्थान के मारवाड़ी व्यापारियों ने इस हुंडी प्रणाली को पूरे भारत और विदेशों तक फैलाया। आधुनिक भारत में हुंडी का स्थान Negotiable Instruments Act, 1881 के अंतर्गत विनियमित विनिमय-पत्रों ने लिया।
    29. भारत में सबसे प्राचीन विहार है-
    (a) नालंदा
    (b) उदंतपुरी
    (c) विक्रमशिला
    (d) भाजा
    R.A.S./R.T.S. (Pre) 1992
    उत्तर-(a)
    दिए गए विकल्पों में नालंदा भारत का सबसे प्राचीन विहार है। इसकी स्थापना 5वीं शताब्दी के मध्य गुप्त काल में हुई। सर्वप्रथम कुमारगुप्त प्रथम ने नालंदा बौद्ध विहार को भूमि-दान दिया। तत्पश्चात् बुधगुप्त, तथागतगुप्त एवं बालादित्य सहित कई गुप्त शासकों ने इसे संरक्षण और दान प्रदान किया। उदंतपुरी और विक्रमशिला की स्थापना पालकाल में हुई, जो नालंदा से काफी बाद का है। भाजा एक बौद्ध गुफा स्थल है, विहार नहीं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: नालंदा में शिक्षा पूर्णतः निःशुल्क थी और छात्रों के भोजन-आवास की व्यवस्था दान से होती थी। इसके पुस्तकालय में तीन भवन थे जिन्हें रत्नसागर, रत्नोदधि और रत्नरंजक कहा जाता था। विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना पाल शासक धर्मपाल ने 8वीं शताब्दी में की थी और यह तंत्रयान बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र था।
    30. चीनी यात्री इत्सिंग ने बिहार का भ्रमण किया, लगभग-
    (a) 405 ई. में
    (b) 635 ई. में
    (c) 637 ई. में
    (d) उपर्युक्त में कोई नहीं
    40th B.P.S.C. (Pre) 1995
    उत्तर-(d)
    चीनी यात्री इत्सिंग ने 671 से 695 ई. के बीच भारत की यात्रा की, जो दिए गए किसी भी विकल्प से मेल नहीं खाती — इसीलिए सही उत्तर (d) है। इत्सिंग ने 37 बौद्ध सहयोगियों के साथ यात्रा का संकल्प लिया था, किंतु अंततः वे अकेले ही कैंटन से जहाज द्वारा रवाना हुए। वे दक्षिण के समुद्री मार्ग से भारत आए और सुमात्रा होते हुए वापस चीन लौटे। उन्होंने नालंदा में अध्ययन किया और अपनी यात्रा में 56 भारतीय राज्यों का विवरण प्रस्तुत किया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इत्सिंग ने अपनी यात्रा में श्रीविजय साम्राज्य (सुमात्रा) का उल्लेख किया है, जो 7वीं शताब्दी में दक्षिण-पूर्व एशिया का शक्तिशाली बौद्ध राज्य था। इत्सिंग के विवरण से पता चलता है कि उस काल में भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच समुद्री व्यापार और बौद्ध धर्म का प्रसार दोनों एक साथ होते थे।
    31. नालंदा कहां पर स्थित है? उत्तर प्रदेश
    (a) मध्य प्रदेश
    (b) आंध्र प्रदेश
    (c)
    (d) बिहार
    M.P.P.C.S. (Spl.) (Pre) 2003
    उत्तर-(d)
    नालंदा बिहार राज्य में राजगीर के निकट स्थित है। यह पटना से लगभग 95 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में स्थित है। प्राचीन काल में यह मगध साम्राज्य का भाग था। गुप्त काल में यहाँ भव्य बौद्ध विश्वविद्यालय की स्थापना हुई, जो कई शताब्दियों तक एशिया का सर्वोच्च शिक्षा केंद्र बना रहा। इसके पुरातात्विक अवशेष आज भी बिहार में देखे जा सकते हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: नालंदा के पास स्थित राजगीर (राजगृह) मगध की प्रारंभिक राजधानी तथा प्रथम बौद्ध संगीति का स्थल भी है। नालंदा जिले में ही पावापुरी स्थित है, जहाँ भगवान महावीर को निर्वाण प्राप्त हुआ था — अतः यह जैन धर्म का भी अत्यंत पवित्र स्थल है। नालंदा के पुरातात्विक अवशेषों की खुदाई सर्वप्रथम अलेक्जेंडर कनिंघम और बाद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने की थी।
    32. सही जोड़े बनाइए तथा नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए :

    (a) भोज (1) उज्जैन

    (b) दुर्गावती (2) विदिशा

    (c) समुद्रगुप्त (3) धार

    (d) अशोक (4) गोंडवाना
    कूट :

    (A) (B) (C) (D)

    (a) (4) (3) (2) (1)

    (b) (3) (4) (1) (2)

    (c) (4) (3) (1) (2)

    (d) (3) (4) (2) (1)
    M.P.P.C.S. (Pre) 2008
    उत्तर-(d)
    सही सुमेलन इस प्रकार है: राजा भोज परमार वंश के महान शासक थे जिनकी राजधानी धार (मध्य प्रदेश) थी — वे स्वयं विद्वान थे और उन्होंने ‘सरस्वती कंठाभरण’ जैसे ग्रंथ लिखे। रानी दुर्गावती गोंड राजवंश की वीर शासिका थीं जो गोंडवाना क्षेत्र पर शासन करती थीं। समुद्रगुप्त का संबंध विदिशा (प्राचीन भीलसा) से है जो गुप्त साम्राज्य का महत्त्वपूर्ण केंद्र था। अशोक का संबंध उज्जैन से है — मौर्य सम्राट बनने से पहले वे उज्जैन के राज्यपाल थे।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:राजा भोज ने धार में एक विशाल संस्कृत पाठशाला की स्थापना की थी जो ‘भोजशाला’ के नाम से आज भी प्रसिद्ध है। रानी दुर्गावती ने 1564 ई. में अकबर के सेनापति आसफ खाँ से युद्ध करते हुए वीरगति प्राप्त की — उनकी स्मृति में जबलपुर में एक विश्वविद्यालय को उनका नाम दिया गया है।
    33. निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा आठवीं शताब्दी के संत शंकराचार्य के बारे में सही नहीं है ?

    (a) उन्होंने भारत के विभिन्न क्षेत्रों में चार धाम स्थापित किए

    (b) उन्होंने बौद्ध तथा जैन धर्मों के विस्तार पर रोक लगाई

    (c) उन्होंने प्रयाग को तीर्थराज नाम दिया

    (d) उन्होंने वेदांत का प्रसार किया
    U.P.P.C.S. (Pre) 2005
    उत्तर-(c)
    विकल्प (c) असत्य है। ‘तीर्थराज’ की उपाधि प्रयाग को प्राचीन काल से ही दी जाती रही है और इसका संबंध शंकराचार्य से नहीं है। शंकराचार्य का जन्म 788 ई. में केरल के कलाडी ग्राम में हुआ था। उन्होंने ‘अद्वैत वेदांत’ दर्शन का प्रचार किया — जिसका मूल सिद्धांत है ‘ब्रह्म सत्यम् जगत मिथ्या’। उन्होंने हिंदू धर्म की पुनर्स्थापना के लिए चार दिशाओं में चार मठ स्थापित किए: उत्तर में ज्योतिर्मठ (जोशीमठ, उत्तराखंड), दक्षिण में शृंगेरी (कर्नाटक), पूर्व में गोवर्धन मठ (पुरी, ओडिशा), और पश्चिम में शारदा मठ (द्वारका, गुजरात)।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:शंकराचार्य ने केवल 32 वर्ष की अल्पायु में देह त्याग किया, किन्तु इस छोटी सी आयु में उन्होंने उपनिषदों, ब्रह्मसूत्रों और भगवद्गीता पर भाष्य लिखे। उनके प्रमुख शिष्यों में पद्मपाद, हस्तामलक, तोटकाचार्य और सुरेश्वर शामिल थे जिन्होंने चारों मठों की बागडोर संभाली।
    34. आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार मठ कहाँ स्थित हैं?

    (a) शृंगेरी, द्वारका, जोशीमठ, प्रयाग

    (b) द्वारका, जोशीमठ, प्रयाग, कांची

    (c) जोशीमठ, द्वारका, पुरी, शृंगेरी

    (d) पुरी, शृंगेरी, द्वारका, वाराणसी
    U.P.P.C.S. (Pre) 2006
    उत्तर-(c)
    आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार मठ इस प्रकार हैं: (1) ज्योतिर्मठ — उत्तर दिशा में, जोशीमठ (उत्तराखंड); (2) शारदा मठ — पश्चिम दिशा में, द्वारका (गुजरात); (3) गोवर्धन मठ — पूर्व दिशा में, पुरी (ओडिशा); (4) श्रृंगेरी मठ — दक्षिण दिशा में, शृंगेरी (कर्नाटक)। इन मठों की स्थापना का उद्देश्य हिंदू धर्म और वेदांत दर्शन का देश के चारों कोनों में प्रचार-प्रसार करना था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:कुछ परंपराओं में एक पाँचवाँ मठ — कांची मठ (तमिलनाडु) — भी शंकराचार्य से जोड़ा जाता है, हालाँकि यह विद्वानों के बीच विवादास्पद है। शृंगेरी मठ भारत का सबसे प्राचीन और सक्रिय हिंदू मठ माना जाता है और इसके शंकराचार्य की परंपरा आज भी अविच्छिन्न रूप से चली आ रही है।
    35. निम्नलिखित में से कौन-सा ‘चारधाम’ में सम्मिलित नहीं है?
    (a) पुरी
    (b) द्वारका
    (c) मानसरोवर
    (d) रामेश्वरम्
    M.P.P.C.S. (Pre) 2013
    उत्तर-(c)
    मानसरोवर चारधाम में सम्मिलित नहीं है। चारधाम में बद्रीनाथ (उत्तराखंड), द्वारका (गुजरात), पुरी (ओडिशा) और रामेश्वरम् (तमिलनाडु) आते हैं। इन्हें आदि शंकराचार्य ने हिंदू तीर्थाटन की मुख्य धुरी के रूप में प्रतिष्ठित किया। ‘छोटा चारधाम’ उत्तराखंड में स्थित है जिसमें गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ आते हैं। मानसरोवर तिब्बत (चीन) में स्थित एक पवित्र झील है जो कैलाश पर्वत के निकट है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:मानसरोवर झील को हिंदू, बौद्ध और जैन — तीनों धर्मों में पवित्र माना जाता है। हिंदू मान्यता के अनुसार यह ब्रह्मा जी के मन से उत्पन्न हुई थी। रामेश्वरम् में स्थापित ज्योतिर्लिंग को भगवान राम ने लंका विजय के बाद स्थापित किया था — यह दक्षिण भारत का प्रमुख शैव तीर्थ है।
    36. भारतीय इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से सामंती व्यवस्था का / के अनिवार्य तत्व है/हैं?
    1. अत्यंत सशक्त केंद्रीय राजनीतिक सत्ता और अत्यंत दुर्बल प्रांतीय अथवा स्थानीय राजनीतिक सत्ता
    2. भूमि के नियंत्रण तथा स्वामित्व पर आधारित प्रशासनिक संरचना का उदय
    3. सामंत तथा उसके अधिपति के बीच स्वामी-दास संबंध का बनना नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए ।
    (a) केवल 1 और 2
    (b) केवल 2 और 3
    (c) केवल 3
    (d) 1, 2 और 3
    I.A.S. (Pre) 2015
    उत्तर-(b)
    सामंती व्यवस्था के अनिवार्य तत्व केवल कथन 2 और 3 हैं। कथन 1 गलत है क्योंकि सामंतवाद में केंद्रीय सत्ता निर्बल होती थी, सशक्त नहीं — सामंत अपने क्षेत्र में स्वायत्त शासन करते थे। ‘सामंत’ शब्द का प्राचीनतम उल्लेख कौटिल्य के अर्थशास्त्र में ‘स्वतंत्र पड़ोसी राजा’ के अर्थ में मिलता है। भारत में सामंती व्यवस्था का अंकुरण शक-कुषाण काल में हुआ और राजपूत काल तक यह पूरी तरह परिपक्व हो गई। भूमि-दान (अग्रहार और देवग्राम) की प्रथा ने सामंती व्यवस्था को और सुदृढ़ किया। भारतीय सामंतवाद यूरोपीय सामंतवाद से इस अर्थ में भिन्न था कि भारत में भूमि का सर्वोच्च स्वामित्व राजा में निहित था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:इतिहासकार डी.डी. कोसांबी और आर.एस. शर्मा ने भारतीय सामंतवाद की विस्तृत व्याख्या की है। आर.एस. शर्मा के अनुसार गुप्तोत्तर काल (छठी से बारहवीं शताब्दी) भारतीय सामंतवाद का चरमोत्कर्ष काल था, जिसमें भूमि-दान प्रथा ने ब्राह्मणों और मंदिरों को शक्तिशाली भू-स्वामी वर्ग के रूप में स्थापित किया।
  • गुप्तोत्तर कालीन समाज और अर्थव्यवस्था: प्रमुख बदलाव

    📚 विषय सूची

    गुप्तोत्तर कालीन आर्थिक एंव सामाजिक दशा

    ➣ गुप्तोत्तर काल में महत्त्वपूर्ण सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं। एक महत्त्वपूर्ण आर्थिक परिवर्तन जिसने जीवन के महत्त्वपूर्ण पहलुओं को प्रभावित किया था-

    भूमिदान तथा उससे उत्पन्न सामंतीय व्यवस्था का विस्तृत रूप से अपनाया जाना।

    ➣ भूमि के दान एवं विभाजन के फलस्वरूप एक नवीन शिक्षित वर्ग (कायस्थ) का उदय हुआ।

    प्रशासन व्यवस्था

    ➣ गुप्तोत्तर काल की एक प्रमुख विशेषता सामंतवाद का विकास तथा राजनीतिक विकेंद्रीकरण थी।

    ➣ इस काल में राजतंत्र सैद्धांतिक रूप से अनियंत्रित अथवा निरंकुश था। सामंतवाद के विकास से केंद्रीय सत्ता कमजोर हुई, जबकि प्रांतीयस्थानीय सत्ता मज़बूत हुई।

    ➣ प्रशासन में राजा की सहायता के लिये अनेक मंत्री एवं पदाधिकारी होते थे। पाल, सेन, चंदेल, चौहान तथा कलचुरि अभिलेखों में मंत्रियों का उल्लेख मिलता है।

    ➣ इस काल में प्रशासनिक व्यवस्था विभिन्न स्तरों में विभाजित थी। हर स्तर पर विभिन्न प्रकार के अधिकारी मौजूद थे। थोड़े बहुत परिवर्तन के बाद पूर्व की व्यवस्थाएँ चलती रहीं।

    ➣ इस युग का सर्वाधिक विस्मयकारी परिवर्तन जातियों का प्रगुणन था, जिसने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यों और शूद्रों सभी को प्रभावित किया।

    भट्टभुवनदेव कृत अपराजितपृच्छा में महामण्डलेश्वर, मांडलिक, महासामन्त एवं लघु सामन्त सहित सामन्तों की नौ श्रेणियों के लिए भिन्न-भिन्न आकार प्रकार के घरों का उल्लेख है।

    सामाजिक स्थिति

    ➣ समाज में ब्राह्मणों का स्थान सर्वश्रेष्ठ था। वे शास्त्रों द्वारा निर्दिष्ट आधार का पालन करते थे, वेद-वेदांग तथा अन्य शास्त्रों में पारंगत होते थे। उन्हें श्रोत्रिय, आचार्य तथा उपाध्याय कहा जाता था।

    ➣ गुप्तोत्तर काल में बाह्य आक्रमणों से उत्पन्न राजनीतिक उथल पुथल तथा आर्थिक विषमताओं ने ब्राह्मणों को अन्य व्यवसाय अपनाने के लिए बाध्य किया।

    मेधातिथि के अनुसार विदेशी आक्रमण से यदि खतरा हो और सामाजिक व्यवस्था के भय उत्पन्न हो जाय तो ब्राह्मण शस्त्र ग्रहण कर सकता है।

    मनु पर टीका करते हुए मेधातिथि ने वेदज्ञ ब्राह्मण को सेनापति तथा राजपद ग्रहण करने की अनुमति दी है।

    ➣ इस युग में स्मृतिकार पराशर ने ब्राह्मण के लिए कृषि एक सामान्य व्यवसाय बताया है, बशर्ते वे स्वयं खेती न करे।

    चालुक्य नरेश कुमारपाल के लेख में ब्राह्मण खेतिहारों के नाम तथा प्रतिहारों के पेहोवा अभिलेख में एक ब्राह्मण का घोड़े के व्यापारी के रूप में उल्लेख मिलता है।

    ➣ इस काल की स्मृतियों में ब्राह्मणों को आपातकाल में व्यापार से भी आजीविका चलाने की अनुमति थी।

    ➣ ह्वेनसांग ने टक्क (पंजाब) देश के ब्राह्मणों को स्वयं खेती करते देखा।

     ब्रह्म क्षत्रिय वह ब्राह्मण जो क्षत्रिय कर्म अपना लेता है।
     क्षत्र ब्राह्मण वह जो युद्ध करके जीविका चलाता है।
     सत् क्षत्रिय क्षत्रियों से उच्चतम स्तर का दावा करने वाला।
     वैश्य ब्राह्मण वार्ता (कृषि, पशुपालन व व्यापार) से जीविका चलाने वाला।
     निषाद ब्राह्मण चोरी – डकैती करने वाला ब्राह्मण
     शूद्र ब्राह्मण लाख, नमक, दूध, शहद, घी आदि का व्यवसाय करने वाला।

    ➣ ब्राह्मण को मृत्युदण्ड से छूट थी। ब्राह्मण के लिए सबसे कठोर दण्ड देश निकाला था। ह्वेनसांग ने भारत को ब्राह्मणों का देश कहा है।

    ➣ मनु के टीकाकार मेधातिथि ने लिखा है कि राजा शब्द अक्षत्रिय के लिए भी प्रयुक्त हो सकता है, बशर्ते की वह राज्य का स्वामी हो।

    ➣ अल्बरूनी के वृत्तान्त से पता चलता है कि राजपूत क्षत्रिय ब्राह्मणों के समान समझे जाते थे, किंन्तु खेतिहर क्षत्रिय और वैश्य बराबर थे और शूद्रों से बहुत ऊंचे नहीं थे, क्योंकि इन्हें वेद पढ़ने का अधिकार नहीं था और उनके धार्मिक कृत्य पुराणोक्त मंत्रों द्वारा होते थे, वैदिक मंत्रों द्वारा नहीं।

    ➣ ह्वेनसांग ने मनिपुर और सिन्ध देश के राजा को शूद्र कहा है।

    ➣ धर्मशास्त्रों में वैश्यों के लिए कृषि, पशुपालन और व्यापार जैसे व्यवसाय निर्दिष्ट किये गये हैं। पराशर ने कुसीदवृत्ति (सूद पर रुपया उधार लेना) वैश्य का व्यवसाय बताया है।

    ➣ इस काल में वैश्यों की स्थिति में गिरावट आयी। मनु धर्मसूत्र में वैश्यों को सर्वप्रथम शूद्रों के समकक्ष माना गया।

    शूद्रों की स्थिति

    ➣ समाज में शूद्रों की संख्या सर्वाधिक थी। उनकी आर्थिक स्थिति में पर्याप्त उन्नति हुई; किन्तु सामाजिक स्थिति में कोई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन नहीं दिखाई देता है।

    ➣ शूद्रों में कुछ वर्ण संकर जातियाँ भी थीं। इन जातियों का जन्म उच्च जाति के पुरुषों का निम्न जाति की स्त्रियों के साथ या प्रतिलोम विवाह से हुआ।

    ➣ अल्बरूनी ने वैश्यों एवं शूद्रों में कोई अन्तर नहीं पाया है, उसके अनुसार इन दोनों को वेदों के अध्ययन या श्रवण की अनुमति नहीं थी।

    ➣ अल्बरूनी ने यह भी कहा कि “यदि इनमें (वैश्य एवं शूद्र) से किसी भी जाति के लोग वेदों का पाठ करते तो राजा उनकी जीभ कटवा देता था।” प्रायः ये दोनों एक ही गाँव और नगर में रहते थे।

    उदयन, तेजपाल इत्यादि धनी व्यापारी मंत्री पद पर नियुक्त थे। जयसिंह सिद्धराज के राज्यकाल में कई व्यापारियों को सामन्त की पदवी दी गई थी।

    ➣ इस काल के स्मृतियों एवं निबन्धों में भी सेवानिवृत्त के अतिरिक्त शूद्र के लिए अनेक व्यवसाय निर्धारित किये गये हैं।

    देवल एवं पराशर ने शूद्र के लिए सेवा के अतिरिक्त कृषि, पशुपालन, वाणिज्य तथा शिल्प उपयुक्त व्यवसाय बताए हैं।

    ➣ आर्थिक दृष्टि से इस युग की महत्त्वपूर्ण विशेषता है- कृषि कार्य का आमतौर पर शूद्रों का व्यवसाय होना।

    ह्वेनसांग तथा इब्नखुर्दाव ने कृषि को शूद्रों का व्यवसाय बताया है।

    व्यास, पराशर और वैजयन्ती में एक कृषि वर्ग का उल्लेख है, जिन्हें कुटुम्ब कहा गया है। इन्हें शूद्रों के अन्तर्गत रखा गया है।

    मेधातिथि उच्च वर्णों पर शूद्रों की निर्भरता के सिद्धान्त की पुनरावृत्ति करता है। उसने शूद्रों को संन्यास आश्रम से वंचित करते हुए कहा कि वे गृहस्थ जीवन में रहकर सन्तानोत्पत्ति तथा द्विजों की सेवा द्वारा पुण्य कमा सकते हैं।

    अल्बरूनी ने भी शूद्रों के प्रति ही नहीं अपितु वैश्यों के प्रति भी ऐसे उपर्युक्त दृष्टिकोण का उल्लेख किया है।.

    ➣ शूद्रों के बंधुआ होने के संकेत एक धार्मिक विचारधारा में मिलते हैं जो पूर्व मध्यकाल में अत्यन्त प्रभावी हो गई थी।

    ➣ शूद्र को दो वर्गों में विभक्त किया गया- सत् एवं असत्। सत् शूद्रों को पौराणिक विधि से संस्कार, पंचमहायज्ञ इत्यादि धार्मिक कृत्य करने का अधिकार दे दिया गया।

    ➣ मूर्त धर्म-समाज हित के लिए कार्य जैसे-तालाब खुदवाना, वृक्ष लगवाना आदि।

    ➣ इस युग की महत्त्वपूर्ण घटना राजपूतों का अभ्युदय है, जिन्होंने प्राचीन क्षत्रियों का स्थान ले लिया। इस काल में राजपूत शब्द लड़ाकू जातियों तथा सामन्त वर्ग के लिए प्रयुक्त किया जाने लगा।

    ➣ 12वीं शताब्दी तक राजपूतों की 36 जातियाँ प्रसिद्ध हो गयी थी जिसमें प्रमुख हैं- चालुक्य, चौहान, प्रतिहार, परमार, गुहिल, चन्देल, कछवाहा, मेद आदि। सातवीं-आठवीं शताब्दी में इनका उदय हुआ था।

    कायस्थ वर्ग

    ➣ एक वर्ग के रूप में कायस्थों का सर्वप्रथम उल्लेख याज्ञवल्क्य स्मृति में मिलता है, जबकि एक जाति के रूप में सर्वप्रथम उल्लेख ओशनस स्मृति में मिलता है।

    ➣ कायस्थों को भूमि-सीमा निर्धारण सम्बन्धी दस्तावेज रखने पड़ते अर्थात् भूमि तथा राजस्व सम्बन्धी इन सभी कार्यों का हिसाब- किताब रखना पड़ता था।

    ➣ कायस्थों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में उनका द्वयर्थक रुख रहा। कुछ ने उनकी उत्पत्ति द्विजाति से बताई है, किन्तु अनेक ब्राह्मण ग्रन्थों में उन्हें शूद्र कहा गया है।

    अस्पृश्यता

    वृहद्धर्म और स्कन्द पुराण में जिन अंत्यज जातियों का उल्लेख किया गया है, उसकी संख्या अठारह थी। प्रारम्भिक स्मृतियों के रचनाकाल में अछूतों को अंत्यज कहा जाता था।

    ➣ अल्बरूनी ने अंत्यजों को चारों वर्णों या जातिक्रम से बाहर का माना है। अन्त्यजों का सामाजिक स्तर शूद्रों से बहुत नीचे था, उन्हें प्रायः उच्च जाति के लोगों की बस्तियों से दूर रहना पड़ता था।

    वर्ण संकर जातियाँ

    ➣ शिल्पियों व श्रेणियों के जातियों में परिवर्तित होने से तथा प्रतिलोम विवाह के कारण गुप्तोत्तर काल में जातियों की संख्या में बढ़ोतरी हुई।

    वैजयंती ने 64 वर्ण संकर जातियों की सबसे लम्बी सूची दी है, जबकि राजतंरगिणी में 64 उपजातियों का वर्णन है।

    ➣ इन वर्ण संकर जातियों की उत्पत्ति चारों वर्णों के पुत्रों, बारह अनुलोम और प्रतिलोम विवाह से उत्पन्न पुत्रों और उसके अड़तालिस प्रशाखाओं से हुई थी।

    ➣ अनुलोम जातियाँ द्विज मानी जाती थी, इसलिए उन्हें यज्ञोपवीत संस्कार का अधिकार था।

    बृहदधर्म पुराण में छत्तीस वर्ण शंकर जातियों का उल्लेख है, इन्हें शूद्र का स्तर प्रदान किया गया है। इस काल में जन्म वर्ण संकर जातियों में कायस्थ सर्वाधिक उल्लेखनीय थे।

    दास प्रथा

    ➣ पूर्व मध्यकाल में दास प्रथा में वृद्धि हुई, इन्हें किसी सामाजिक वर्ग के रूप में नहीं माना गया था। दासों की सामाजिक स्थिति अंत्यजों तथा तिरस्कृत जातियों से अच्छी थी।

    विज्ञानेश्वर ने मिताक्षरा में नारद द्वारा कथित पन्द्रह प्रकार के दासों का उल्लेख किया है।

    ➣ लेख पद्धति के अनुसार वस्तुओं के विनिमय में दासों का निर्यात समुद्री मार्ग से पश्चिम देशों को होता था।

    ➣ दास-दासियों को दान में देने की प्रथा इस काल में बहुत प्रचलित हो गई थी। बौद्ध मठों और मन्दिरों को दास दान के रूप में दिये जाते थे।

    विज्ञानेश्वर के अनुसार ऋण न चुका सकने के कारण ऋणी स्वयं को ऋणदाता का दास बना लेता था। दास प्रायः घरेलू कामों में ही लगाए जाते थे।

    ➣ पूर्वकाल की अपेक्षा इस काल में दासों की स्थिति में काफी गिरावट आई।

    विवाह

    ➣ सामान्यतः अन्तर्जातीय विवाह से सम्बन्धित स्मृति नियम प्रचलित थे। अनुलोम-अन्तर्जातीय विवाह से उत्पन्न सन्तान की जाति माता पर आधारित होगी। इस नियम की पुष्टि पूर्वमध्यकालीन अभिलेखों तथा अल्चरूनी के विवरण से होती है।

    विज्ञानेश्वर एवं अपरार्क ने तीन उच्च वर्गों द्वारा असवर्ग विवाहों (शूद्रों के साथ विवाह) का अनुमोदन किया है।

    ➣ आदर्श विवाह आठ वर्ष का माना जाता था। आठ वर्ष की लड़की को गौरी तथा दस वर्ष की लड़की को कन्या कहा जाता था।

    ➣ शासक वर्ग में बहु-विवाह प्रथा व्यापक रूप से प्रचलित थी। अल्बरूनी के अनुसार ब्राह्मण अनुलोम अन्तर्जातीय विवाह कर सकते थे।

    स्त्रियों की दशा

    ➣ स्त्रियों की स्थिति में गिरावट आई व बाल विवाह की प्रथा में तेजी आई। बाल विवाह से स्त्री शिक्षा पर असर पड़ा।

    सती प्रथा अत्यधिक प्रचलित हो गई। अंगिरा, हारीत आदि पूर्व मध्यकालीन स्मृतियों तथा अपरार्क, विज्ञानेश्वर आदि निबंधकारों ने सती प्रथा की प्रशंसा की।

    मेधातिथि ने सती प्रथा को आत्महत्या कह कर इसकी आलोचना की है। बाणभट्टदेवण्णभट्ट ने भी सती प्रथा की निन्दा की है।

    ➣ पूर्व काल में सती प्रथा को बढ़ावा इसलिए मिला क्योंकि सामन्तों व राजाओं द्वारा अधिक संख्या में पत्नियाँस्त्रियाँ रखने के कारण संपत्ति विषयक विवादों को बढ़ावा मिला।

    ➣ विधवा विवाह निषेध था। अतः संपत्ति के विवादों से बचने व विधवा के दण्डनीय जीवन से मुक्ति का समाधान पति के साथ सती होने में दिखाई दिया।

    ➣ पूर्व मध्यकाल में महिलाओं के संपत्ति संबंधी अधिकारों में वृद्धि हुई। इसका कारण यह था कि सामंती समाज के विकास के कारण निजी संपत्ति की अवधारणा को बल मिला।

    वैजयन्ती में सच्चरित्र महिला को परिवृक्ति, युद्ध में जीती हुई स्त्री को कालकलि, उपपत्नी को अवरोध वधू तथा चंचल स्त्रियों को विलासिनी कहा है।

    आर्थिक दशा

    ➣ इस काल में कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार थी। अग्निपुराण के अनुसार कृषि की वृद्धि के लिए सिंचाई के साधन जुटाना राजा के प्रमुख आठे कर्त्तव्यों में से है।

    नीतिवाक्यामृत में अनेक प्रकार के संग्रहों में धान्य संग्रह सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

    ➣ गुप्तोत्तर काल में अधिकारियों, मंदिरों, ब्राह्मणों आदि को उनकी सेवाओं के बदले भू-क्षेत्र प्रदान करने से सामंतवाद का उदय हुआ। यद्यपि भूमिदान की प्रथा का प्रारंभ सातवाहन काल में हुआ था।

    मिताक्षरा के अनुसार भूमिदान का अधिकार सिर्फ राजा को था, न कि सेवा के बदले सम्पत्ति प्राप्त करने वाले को।

    मेधातिथि के अनुसार राजा ही भू-स्वामी है; परन्तु उन्होंने यह भी बताया कि भूमि उसकी होती है, जो उसकी सफाई करके उसे कृषि योग्य बनाता है।

    बृहत्संहिता एवं अमरकोश जैसे छठी शताब्दी के ग्रंथों में कृषि, फलों एवं बागानों पर अलग से अध्याय देकर उसे समझाया गया है।

    अभिधानरत्नमाला नामक ग्रंथ में तत्कालीन समय में बोये एवं उपजाये जाने वाले विभिन्न अनाजों का वर्णन है।

    ➣ उत्पादकता के हिसाब से भूमि का वर्गीकरण किया गया है-

     वाहीत भूमि, जिसमें बोया जाता हो।
     अकृष्ट जिसमें खेती न की गई हो।
     ऊसर जहाँ बीज न उगता हो।
     खिल-परती जिस भूमि को जोता नहीं जाता।
     साक्त व्यक्तिगत स्वामित्व वाली भूमि।
     इरिणबंजर भूमि

    ➣ ऐसी भूमि जिस पर खेती न की जाती हो, राज्य के अधिकार क्षेत्र या स्वामित्व के अन्तर्गत होती थी।

    ➣ जिन जमीनों का मुक्त या निःशुल्क अनुदान किया गया था, उन्हें आप्रद, शासन, चतुर्वेयग्राम, ब्रह्मदेय ग्राम आदि कहा जाता है; परन्तु प्रायः अनुदान प्राप्तकर्ता को भूमि को बन्धक रखने या बेचने का अधिकार नहीं होता था।

    ➣ स्थायी रूप से प्रदत्त धर्मदाय धन को मूल्य, नीवि या अक्षयनीवि आदि नामों से जाना जाता था।

     कौटुम्बिक जिस कृषि योग्य भूमि पर पूरे कृषक परिवार का स्वामित्व होता था।
     साक्त व्यक्तिगत या एक कृषक के स्वामित्व वाली भूमि
     प्रकृष्ट या कृष्ट विभिन्न कृषकों द्वारा जोती जाने वाली भूमि।

    भूमि बंधक रखने का प्रथम उल्लेख बृहस्पति के द्वारा किया गया है।

    बंधुआ मजदूरी का सबसे पहला उल्लेख भागवत् पुराण (8वीं सदी) में मिलता है।

    ➣ स्वतन्त्र किसान ( कुटुम्बी ) जो भूमि के स्वामी थे और राज्य को अनेक प्रकार के कर देते थे।

    ➣ वे किसान जो बटाई पर खेती करते थे। इन्हें त्यधसीरिन या सीरिन कहा गया है। इन्हें उपज का 1/3 या 1/4 भाग मिलता था।

    ➣ किसान मजदूरों को उपज का 1/10 से 1/4 भाग मिलता था।

    हर्षचरित में आदिवासी कृषकों का उल्लेख है। गुप्तकाल के अभिलेखों में शिल्पी (बढ़ई) के खेत का उल्लेख है।

    सिंचाई व्यवस्था

    राजतरंगिणी में खूया नामक इंजीनियर का उल्लेख है जिसने झेलम नदी पर बांध बनाकर नहर निकलवाई।

    ➣ चंदेल राजाओं ने राहिल्यसागर और कीरतसागर नामक जलाशय बनाये।

    ➣ सिंचाई रहट से होती थीं संस्कृत ग्रंथों में अरघट्ट का उल्लेख है। इसको खींचने वाले को अरघट्टीयनर कहा जाता है। रहट के प्रयोग का प्रथम उल्लेख गाथासप्तशती में मिलता है।

    ➣ बाणभट्ट के हर्षचरित में सिंचाई के साधन के रूप में तुलायंत्र (जल पंप) का उल्लेख मिलता है।

    ➣ ह्वेनसांग के अनुसार हर्ष के समय खेतों में सिंचाई के लिए घंटी यन्त्र तथा उद्घघटि का प्रयोग किया जाता था।

    कर व्यवस्था

    ➣ जमीन का उत्पादन क्षमता एवं वास्तविक उत्पादन के आधार पर 1/12 से लेकर 5/6 भाग तक निर्धारित होता था।

    ➣ करों का संग्रह गाँव का मुखिया करता था। इस काल में कुछ प्रमुख करों का विवरण निम्नलिखित है-

     भाग उपज का हिस्सा (भूमिकर)
     भोग फल, फूल, लकड़ी आदि उपहारस्वरूप राजा को प्रदान करना।
     हिरण्य नकद रूप में वसूल किया जाने वाला कर (अतिरिक्त)।
     प्रस्थ अधिकारियों का हिस्सा।
     उपरिकर अस्थायी कृषकों पर लगने वाला कर

    ➣ भूमि मापन के लिये कुछ लोक प्रचलित मापक थे-निर्वतन, पट्टिकहल, पातक, खरिवाप, कूल्यवाप, द्रोणवाप, आढ़वाप, खंडूकवाप, नालिकवाप आदि।

    व्यापार

    ➣ सामन्तवाद के कारण बंद व स्थानीय अर्थव्यवस्था का विकास हुआ। ग्राम आत्मनिर्भर थे अतः व्यापार वाणिज्य में गिरावट आई।

    ➣ गुप्तोत्तर काल में व्यापार का ह्रास हुआ, जिसके अनेक कारण थे-चोर-डाकुओं के कारण मार्गों का असुरक्षित होना, सामंतवादी प्रवृत्ति बढ़ने के कारण केंद्रीय शक्ति का ह्रास तथा व्यापारियों के एक राज्य से दूसरे राज्य में आने-जाने पर अधिक चुंगी कर आदि।

    ➣ मालवा गन्ना, नीलअफीम के लिए, मगध व कलिंग धान के लिए प्रसिद्ध थे। गुजरात सूती कपड़ेनील के लिए प्रसिद्ध था।

    उज्जैनकन्नौज (कान्यकुब्ज) इस समय के समद्ध नगर थे। बंगाल मलमल, पान, सुपारी तथा सण के लिए प्रसिद्ध था एंव दक्षिण मोती, मूल्यवान पत्थर, चन्दन, मसाले आदि के लिए प्रसिद्ध था।

    ➣ पूर्वी तट के बन्दरगाह :- ताम्रलिप्ति, सप्तग्राम, पुरी, कलिंगशिकाकोस। इस काल में ताम्रलिप्ति के स्थान पर सप्तग्राम का महत्त्व बढ़ा। पश्चिमी तट के बन्दरगाह :- देवल, थाना, खंभात, भड़ौँच तथा सोमनाथ

    ➣ इन बन्दरगाहों से आयातित (बाहर से) वस्तुएं थीं- सोना, टिन, ताँबा, मसाले, मूंगा तथा घोड़े आदि।

    ➣ दसवीं शताब्दी के मनु के टीकाकार मेधातिथि, कुवलयमाला तथा कथासरित्सागर से ज्ञात होता है कि व्यापारी पण्य वस्तुओं को एक नगर से दूसरे नगर में ले जाकर बेचते थे।

    ➣ पेहोवा अभिलेख में देश के विभिन्न भागों में आने वाले घोड़ों के क्रय-विक्रय करने वालों की गोष्ठी का उल्लेख है। कुवलयमाला से ज्ञात होता है कि उत्तरापथ से घोड़े खरीदे जाते थे।

    तरशुल्क राज्य की आय का प्रमुख स्रोत था। पाल अभिलेखों में इसे वसूलने वाले अधिकारी को तरिक कहा गया है।

    मल्लकर या तुरुष्क दण्ड उपद्रवी जनजातियों से निपटने के लिए लगाया जाता था। (अतिरिक्त कर)

    ➣ अरब आक्रमणों के कारण पश्चिमी एशिया के साथ व्यापार में हास हुआ। 8वीं शताब्दी से भारत का व्यापार उत्तर-पश्चिमी दर्रों से होकर मध्य एशिया तथा चीन के साथ हो रहा था।

    ➣ 10वीं शताब्दी में गुजरात में चालुक्यों का शासन स्थापित होने से समुद्री व्यापार को प्रोत्साहन मिला, क्योंकि चालुक्य शासकों ने समुद्री व्यापारियों को सुरक्षा प्रदान की।

    ➣ चीन के साथ भारत का व्यापार अरबों एवं हिन्द एशिया के व्यापारियों की प्रतिद्वंद्विता के कारण कम हो रहा था; किन्तु चोल सम्राट राजेन्द्र चोल की श्री विजय, सुमात्रा पर विजय के फलस्वरूप चीन के साथ व्यापार मार्ग खुल गया।

    ➣ चीन से बढ़ती हुई मात्रा में सोने और चाँदी के निर्यात को रोकने के लिए 1296 में चीन राज्य को नियम बनाने पड़े।

    उद्योग

    ➣ पूर्व मध्यकाल की स्मृतियों में शिल्प और उद्योग शूद्र के लिए आवश्यक व्यवसाय माने गये।

    ➣ वस्त्र उद्योग विकसित अवस्था में था। मानसोल्लास के अनुसार 12वीं शताब्दी में मुल्तान, अन्हिलवाड़कलिंग वस्त्र उद्योग के प्रमुख केन्द्र थे। अपरान्त, मालवा, काशी, बंगालमदुरा भी वस्त्र उद्योग के केन्द्र थे।

    ➣ ह्वेनसांग ने कश्मीर के सफेद लिनन का उल्लेख किया है। ह्वेनसांग ने अनेक प्रकार के रेशमी एवं सूती वस्त्रों का उल्लेख किया है। पौधों के रेशों से बना हुआ कपड़ा दुकूल कहलाता था।

    ➣ बाण ने हर्षचरित में रेशम के बने अनेक प्रकार के वस्त्रों का उल्लेख किया गया है- जैसे- लाल, तुंज, अंशुक, चीनांशुक

    भड़ौच के बने हुए वस्त्र इतने प्रसिद्ध थे कि, उन्हें वरोज कहा जाता था। खम्भात के बने वस्त्र खंबायात के नाम से जाने जाते थे।

    ➣ मध्यदेश चुनरी के लिए प्रसिद्ध था। कश्मीर में वस्त्रोद्योग-विशेषकर सफेद लिनन का उल्लेख ह्वेनसांग ने किया है।

    शांतिदेव के शिक्षा समुच्चय (7वीं शताब्दी) से ज्ञात होता है कि वाराणसी श्रेष्ठ रेशम के लिए प्रसिद्ध था।

    ➣ कामरूप (असम) का चित्रपट्टजातिपट्ट (रेशम का कपड़ा) प्रसिद्ध वस्त्र थे।

    ➣ अरब यात्री सुलेमान ने बंगाल की मलमल के बारे में लिखा है कि यह इतनी महीन होती है कि अंगूठी के बीच से पूरा थान निकल जाये।

    ➣ इब्न हौकल के अनुसार सिन्ध का देवल नगर तलवारों के निर्माण के लिए प्रसिद्ध था।

    शिल्पउद्योग श्रेणियों में संगठित होते थे। श्रेणी एक ही व्यवसाय करने वाले लोगों का संगठन होता था। वे अनेक स्थानों के लोग भी हो सकते थे बशर्ते वे एक ही व्यवसाय करने वाले लोग हो ।

    ➣ श्रेणी का मुखिया महत्तक या माहर कहलाता था। इन श्रेणियों की कार्य समिति को कार्यचिंतक कहा गया है।

    वृहद्संहिता में सर्वप्रथम न केवल वर्ण के आधार पर बल्कि, आर्थिक आधार पर श्रेणियों का निर्धारण कर गृहों का आकार निर्धारित किया गया।

    मुद्रा

    ➣ पूर्व मध्यकाल में सिक्के का प्रयोग कम हो गया। विदेशी व्यापार में गिरावट एवं सामंती व्यवस्था में राज्य कर्मचारियों को वेतन के स्थान पर भूमिदान दिये जाने के कारण सिक्कों की आवश्यकता कम हो गई।

    ➣ शुद्ध सिक्के तो बहुत ही कम मिले है। साधारण लेन-देन कौड़ियों के माध्यम से होता था जिन्हें प्रतिहार अभिलेखों में कपर्दक कहा गया है।

    ➣ अरब यात्रियों के वृत्तान्तों से स्पष्ट है कि व्यापार वस्तु विनिमय के माध्यम से होता था।

    ➣ सोने के सिक्कों की मात्रा बहुत कम थी। अधिकांश सिक्के चाँदी एवं ताँबे के थे। पाल एवं सेन राजाओं में केवल देवपाल के 6 सोने के सिक्के मिले हैं और गुजरात के चालुक्यों में केवल जयंसिंह सिद्धराज का एक सोने का सिक्का मिला है।

    धार्मिक स्थिति

    ➣ गुप्तोत्तर काल में शैव, वैष्णव, बौद्ध एवं जैन सभी धर्मों का समाज में स्थान था। शक्ति पूजा इस काल में बहुत व्यापक हो गई। पूजा और भक्ति दोनों ही तांत्रिक धर्म के अभिन्न तत्त्व बन गए।

    ➣ बुद्ध मन्दिरों को गाँव दान में मिलते थे। इन गाँवों से पैदावार का राजकीय भाग मेलावार कहलाता था

    ➣ बुद्ध और जिन को विष्णु का अवतार माना जाने लगा। अवतारवाद जन साधारण के पुनरुत्थान की आशा एवं आकांक्षा का प्रतीक था।

    बौद्ध एंव जैन धर्म

    ➣ राजपूताना में अधिकांश हिन्दू तथा जैन धर्मानुयायी थे। पाल राजाओं के संरक्षण में बंगाल और बिहार में बौद्ध धर्म सम्पन्न अवस्था में था।

    महायान बौद्ध धर्म विकृत होकर मंत्रयान, वज्रयानसहजयान जैसे तंत्र सम्प्रदायों का आधार बन गया। पाल राजाओं के काल में सहजयान का विकास हुआ।

    ➣ सहजयानियों का मार्ग योग-क्रिया का है। चर्य्यापदों एवं दोहों से सहजीया बौद्धों के मूल सिद्धान्तों का ज्ञान होता है।

    ➣ महायान का नया रूप मंत्रयान के रूप में आया। मंत्रयान में धरणियों का प्रमुख स्थान है। प्रारम्भ में मंत्रयान ग्रन्थों में बोधिसत्व अवलोकितेश्वर की पूजा की जाती थी; किन्तु आगे चलकर तारा की पूजा की महिमा का वर्णन है।

    ➣ बंगाल में पालवंशीय राजाओं के राज्यकाल में वज्रयान में मंत्र पाठ तथा कर्मकाण्ड के विरोध में एक पृथक तान्त्रिक सम्प्रदाय बना, जो सहजयान के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

    ➣ तान्त्रिक रचनाओं का प्रारम्भ छठी शताब्दी माना गया है। तान्त्रिक साधना में मंत्र, बीज, यन्त्र तथा मुद्रा को विशेष महत्त्व दिया गया है। यह तान्त्रिक साधना स्त्री, शूद्र सभी के लिए थी।

    ➣ तान्त्रिक धर्म में चर्य्या, क्रिया, योग एवं ज्ञान द्वारा सिद्धि प्राप्त की जा सकती है।

    ➣ तान्त्रिक पद्धति में पंचमकार- मद्य, मत्स्य, मांस, मुद्रा तथा मैथुन के उपयोग के कारण तान्त्रिक सम्प्रदाय की निन्दा की जाती है।

    नालन्दा देश का सर्वोच्च शिक्षा संस्थान तथा बौद्ध संस्कृति का अन्तर्राष्ट्रीय केन्द्र था।

    ➣ दक्षिण के कदम्ब, गंग, होयसल, राष्ट्रकूट तथा पश्चिमी चालुक्यों ने तथा गुजरात के चालुक्य शासकों ने जैन धर्म को संरक्षण प्रदान किया।

    ➣ राजस्थान व मालवा में भी जैन धर्म को प्रश्रय मिला। राजस्थान में अनेक जैन मन्दिरों का निर्माण हुआ, जिनमें ओसिया में महावीर का मन्दिर प्रसिद्ध है।

    ➣ सोमेश्वर ने विजोलिया जैन मन्दिर को एक गाँव दान में दिया।

    ➣ पल्लव तथा चोल अभिलेखों में परिहार शब्द का उल्लेख मिलता है, जिसका अर्थ है- ‘देवदान भूमि की राज्य करों से मुक्ति तथा राज्य के भूमि अधिकारों का मन्दिरों को हस्तांतरित होना।’

    ➣ पूर्व मध्यकाल में जैनों ने अपभ्रंश भाषा में साहित्य लिखकर साहित्य की अमूल्य सेवा की।

    शक्ति पूजा

    ➣ शक्ति पूजा पूर्व मध्यकाल में बहुत व्यापक हो गई। ईश्वरीय सम्प्रदायों में शक्ति, परमदेवता की अर्द्धांगिनी के रूप में संसार में प्रचलित हो गई।

    ➣ संस्कृति संक्रमण की क्रिया विधि में आदिवासियों की मातृदेवी हिन्दू तथा बौद्ध धर्म में शक्ति या तारा के रूप में ग्रहण की गई।

    ➣ छठीं शताब्दी से शक्ति-उपासना स्पष्ट एवं निश्चित रूप से दिखाई देती है। दुर्गा की उपासना प्रचलित करने का श्रेय मार्कण्डेय पुराण को है।

    ➣ यद्यपि अग्नि और वराह पुराण में गणेश को उद्देश्य-पूर्ति में विघ्न डालने वाला कहा गया है; किन्तु जनसाधारण में गणेश को सिद्धि देने वाला तथा उद्देश्यों की पूर्ति में सहायक देवता माना गया है।

    शैव धर्म

    ➣ शैव धर्म पाशुपत, कापालिक, अघोरी, लिंगायत, शैवाद्वैत आदि अनेक उप-संप्रदायों में विभाजित था। हिन्दू धर्म में जितने भी सम्प्रदाय थे, उनमें शैव सम्प्रदाय सबसे अधिक प्रबल था।

    ➣ परमार नरेश शैव मतानुयायी थे। भोज परमार ने शैव धर्म पर तत्व परीक्षा नामक पुस्तक लिखी और उदयपुर में नीलकंठेश्वर मन्दिर बनवाया था।

    पाल, सनमैदल राजाओं के अभिलेख ओम नमः शिवाय की प्रार्थना से शुरू होते हैं।

    ➣ बंगाल के सेन शासक विश्वरूप सेन तथा केशव सेन सूर्योपासक होने के कारण परमसोर पदवी से विभूषित किये गए।

    ➣ दक्षिण भारत के शैव अनुयायियों को नयनार कहा जाता था। इनकी संख्या 63 थी। नयनारों में प्रमुख तीन थे- सन्त अप्पार, नान सबंदर तथा सुन्दर मूर्ति, तिरुज्ञान

    ➣ शैव नयनारों की भक्ति भावनात्मक थी। उसके बाद आने वाले आचार्यों ने शैव मत के बौद्धिक एवं दार्शनिक पक्ष को प्रस्तुत किया। इन आचार्यों को संतानाचार्य कहा गया था, जिसमें भराई ज्ञान तथा उमापति शिवाचार्य के नाम विशेष उल्लेखनीय थे।

    ➣ इस युग के अन्तिम चरण (12वीं शताब्दी) में दक्षिण में वीर शैव मत का आविर्भाव हुआ। इसके प्रवर्तक वासवराज थे।

    वीर शैव मत एक क्रान्तिकारी सम्प्रदाय था। इस मत के अनुयायी लिंगायत कहलाते थे। वे अहिंसा में विश्वास करते थे; किन्तु वर्णाश्रम धर्म और जातिवाद का विरोध करते थे।

    ➣ वासव सन्यास एवं तप में विश्वास नहीं करते थे, उनका मत था कि प्रत्येक व्यक्ति को श्रम से आजीविका अर्जित करनी चाहिए।

    ➣ शैव मत से सम्बन्धित नाम्बि-आदार-नाम्बि को 11 तिरुमुरायो के विशाल संग्रह के कारण तमिल व्यास कहा जाता है।

    ➣ वीर शैव सन्तों के भक्ति गीतों को वचन शास्त्र कहा जाता है। वीर शैव 63 पुरातन सन्तों की पूजा करते थे ।

    ➣ वीर शैवमत में गुरु, जंगम और लिंग को अधिक महत्त्व दिया गया है। आठ नियमों का पालन धर्म में प्रगति के लिए आवश्यक माना गया। ये आठ नियम प्रत्येक लिंगायत बालक को सिखाए जाते हैं।

    वैष्णव धर्म

    ➣ गुप्तोत्तर काल में वैष्णव धर्म भारत वर्ष में प्रचलित था; किन्तु इसका गढ़ दक्षिण भारत में तमिल प्रदेश था जहाँ वैष्णव मत के आदि प्रवर्तक अलवार सन्त थे।

    ➣ अलवार संतों की संख्या 12 थी, जिनमें प्रमुख हैं :- तिरूमंगाई, पेरिय अलवार, अण्डाल, नाम्मालवार, मधुरकवि, कुलशेखर (पाण्ड्य राजा), तिरूप्पान, भूतयोगी, महायोगी, सरोयोगी आदि।

    ➣ शूद्र सन्त तिरुमंगाई, पेरिय अलवार, उसकी पुत्री स्त्री सन्त आण्डाल तथा नाम्मालवार सर्वप्रसिद्ध थे।

    ➣ अलवार भक्ति आन्दोलन की प्रमुख विशेषता है कि, यह आन्दोलन मूलतः भावनात्मक है, दार्शनिक नहीं।

    ➣ अलवारों ने वैष्णव धर्म में भावनात्मक पक्ष का प्रसार किया, तो आचार्यों ने बौद्धिक और दार्शनिक पक्ष को भी अपनाया। उनके शिक्षाओं में कर्म, ज्ञान एवं भक्ति का सम्मिश्रण था।

    अलवार आचार्य श्री वैष्णव सम्प्रदाय के निर्माता थे। इन आचार्यों में सर्वप्रथम नाथमुनि थे। उन्हें राजेन्द्र चोल का समकालीन माना जाता है।

    प्रतिहार नरेश मिहिरभोज ने आदिवराह की उपाधि धारण की और इसी शैली के सिक्के जारी किये।

    ➣ मन्दिरों के कर्मचारियों एवं देवदासियों को, जो भूमि वेतन के बदले दी जाती थी, उसे वेलि भूमि कहा जाता था।

    ➣ दक्षिण के (विशेषतः चोल कालीन) मन्दिरों का राजधानी तथा साम्राज्य की अर्थव्यवस्था से घनिष्ठ सम्बन्ध था।

    एन्नारियम गाँव ब्राह्मणों का गाँव था। इसे चतुर्वेदी मंगलम् कहा गया है। यहाँ के मन्दिर से लगा हुआ एक विद्या मन्दिर था, जिसे गंगैकोण्ड चोलमंडप कहा गया है।

    ➣ मन्दिर ने नाट्य एवं संगीत कला को भी प्रोत्साहन दिया। मन्दिरों में उत्सवों पर धार्मिक नाटकों का अभिनय होता था। राजेन्द्र चोल के ही समय मन्दिर के मण्डप पर राजराजेश्वर नाटक का अभिनय कराया गया था।

    सूर्य पूजा

    ➣ आदित्य सेन व जीवित गुप्त के शाहपुर और देवबर्नाक अभिलेख में सूर्य पूजा का उल्लेख है।

    मोढ़ेरा (गुजरात) का सूर्य मंदिर भी प्रसिद्ध है। मन्दसौर, मूलस्थान (गुजरात) तथा माडास्यात (बुलन्दशहर) में सूर्य मन्दिर बने थे।

    ललितादित्य ने कश्मीर में सूर्य का प्रसिद्ध मार्तण्ड मंदिर बनवाया।

    ➣ मुल्तान के प्रसिद्ध सूर्य मंदिर का उल्लेख ह्वेनसांग, अबूजईद, अलमसूदी तथा अलबरूनी ने किया है। मुल्तान सूर्य पूजा का प्रसिद्ध केन्द्र था।

    ➣ बंगाल के सेन शासक विश्वरूप सेन तथा केशव सेन ने सूर्योपासक होने के कारण परमसौर की उपाधि ग्रहण की।

    ➣ ह्वेनसांग के अनुसार मुल्तान के सूर्य मन्दिर का निर्माण साम्ब द्वारा करवाया गया था।

    मोडेरा (गुजरात), औसिया (जोधपुर), कोणार्क (उड़ीसा) आदि प्रसिद्ध सूर्य मन्दिर हैं।

    ➣ राजस्थान में सूर्य का सबसे प्राचीन मन्दिर चित्तौड़ दुर्ग में स्थित कालिका माता का मन्दिर है।

    भाषा एवं साहित्य

    ➣ आठवीं शताब्दी के एक जैन ग्रंथ कुमाल में 18 जमुख राष्ट्रों नाथा 15 प्रकार के लोगों की नृवंशात्मक विशिष्टताओं का वर्णन है।

    ➣ पूर्व मध्यकाल भाषा की दृष्टि से क्षेत्रीयता के चिह स्तुत करता है। संस्कृत के प्रयोग में क्लिष्ट एवं कृत्रिमना आती जा रही थी।

    ➣ अपभ्रंश का विकास आद्य हिन्दी, आद्य बंगाली , आद्य गुजराती, आद्य राजस्थानीआद्य मराठी में हो रहा था।

    ➣ क्षेत्रीय भाषा के साथ-साथ क्षेत्रीय निमिया का भी विकास हुआ। सिद्धपात्रका इस काल में विकसित हुई लिपि थी।

    वास्तुकला

    ➣ गुप्तोत्तर काल की वास्तुकला की मुख्य कृतियाँ मंदिर हैं। भौगोलिक आधार पर शास्त्रकारों ने इसकी तीन शैलियाँ निर्धारित की हैं- नागर, द्रविड़ और बेसर।

    नागर शैली

    ➣ नागर शैली उत्तर भारत में हिमालय से विध्य प्रदेश के भू-भाग में विकसित हुई। नागर शैली के मंदिर चतुष्कोणीय होते हैं।

    ➣ इस शैली के मंदिरों के शिखरों में खड़ी रेखा की प्रधानता होने के कारण इसे रेखीय शिखर कहते हैं। वर्गाकार तथा ऊपर की ओर वक्र होते हुए शिखर इन मंदिरों की विशेषताएँ हैं।

    ➣ नागर शैली के प्रसिद्ध मंदिर- लिंगराज मंदिर (भुवनेश्वर), सूर्य मंदिर (कोणार्क), जगन्नाथ मंदिर (पुरी). कंदरिया महादेव मंदिर (खजुराहो), सूर्यमंदिर (मोढेरा), दिलवाड़ा जैन मंदिर (माउंट आबू) आदि।

    लिंगराज मन्दिर पूर्व विकसित आर्य नागर शैली के सर्वोत्तम उदाहरण हैं।

    ➣ भारतीय राजाओं और पूर्वी वासुकला की महान उपलब्धि कोणार्क का सूर्य मन्दिर है। इसकी एक विशेषता यह है कि मन्दिर के भवनों के सभी बाह्य भाग उकेरी हुई आकृतियों से सजे हुए हैं।

    ➣ खजुराहो के मन्दिर चंदेल राजाओं के समय 950-1050 ई. के बीच बनाये गये हैं, खजुराहों में मन्दिर चबूतरों पर निर्मित हैं।

    द्रविड़ शैली

    ➣ द्रविड़ शैली का विस्तार कृष्णा तथा कन्याकुमारी अंतरीप के बीच अर्थात् आधुनिक तमिलनाडु प्रदेश में है।

    ➣ इस शैली के मंदिरों के बनावट की विशेषता है-वर्गाकार गर्भगृह पर पिरामिडनुमा अर्थात् ऊपर की ओर आकार में छोटी हुई मंज़िलों का बना शिखर। इसका शीर्ष आठ या छह कोणों के गुंबद के आकार का होता है।

    पल्लव, चालुक्य, चोल एवं पांड्य शासकों के शासनकाल में मुख्यत: इस शैली में मंदिरों का निर्माण हुआ।

    महाबलीपुरम् और कांची के मंदिर, वातापी तथा ऐहोल के मंदिर, तंजौर का राजराजेश्वर मंदिर या वृहदेश्वर मंदिर इस शैली के मंदिर के प्रमुख उदाहरण हैं।

    बेसर शैली

    ➣ बेसर शैलों का विस्तार विंध्य और कृष्णा के बीच में है, इसे दक्षिणावर्त भी कहा जाता है।

    ➣ बेसर शैली में नागर और द्रविड़ शैली के तत्त्व मिश्रित हैं। बेसर शैली के मंदिरों में देउल, गर्भगृह और जगमोहन (सभा मंडल) होता था। इस शैली के मंदिर अर्द्ध गोलाकार होते थे।

    होयसल, राष्ट्रकूट काल के ऐहोल मंदिर, कैलाश मंदिर (एलोरा) आदि बेसर शैली से निर्मित हैं।

    शैली मुख्य विशेषता उदाहरण प्रमुख शासक / काल
    नागर शैली उत्तर भारत की शैली; ऊँचा शिखर (रेक्खा-प्रसाद), घुमावदार टॉवर खजुराहो मंदिर, कोणार्क सूर्य मंदिर गुप्त काल, चंदेल शासक (खजुराहो), गंग शासक (कोणार्क)
    द्रविड़ शैली दक्षिण भारत की शैली; पिरामिडाकार विमान, विशाल गोपुरम, प्रांगणयुक्त मंदिर बृहदेश्वर मंदिर (तंजावुर), शोर मंदिर (महाबलीपुरम) पल्लव शासक (महाबलीपुरम), चोल शासक (बृहदेश्वर मंदिर)
    बेसर शैली नागर और द्रविड़ का मिश्रित रूप; कर्नाटक क्षेत्र में विकसित होयसलेश्वर मंदिर (हलेबिडु), बादामी चालुक्य मंदिर चालुक्य शासक (बादामी), होयसल शासक

    अन्य महत्वपूर्ण तथ्य

    ➣ पर्वत शिलाओं को खोदकर भवन निर्माण के विकास की चरमावस्था ऐलोरा का कैलाश मन्दिर है। इस मन्दिर का आकार पट्टडकल के चालुक्य कालीन विरूपाक्ष मन्दिर की भाँति है। यह मन्दिर द्रविड़ शैली के नियमित क्रमबद्ध विकास का उदाहरण है।

    ➣ ऐलोरा का कैलाश मन्दिर राष्ट्रकूट नरेश कृष्ण प्रथम ने बनवाया /था।

    कैलाश मन्दिर संसार के प्रस्तर कला की महान तथा अद्वितीय कृति है। यह मन्दिर तक्षण कला से अलंकृत है।

    एलिफैन्टा का विशाल मन्दिर तराशी हुई विशाल मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध है, जिनमें त्रिमूर्ति सबसे प्रभावशाली है।

    महेन्द्र वर्मन शैली का विकास 600-640 ई. तक हुआ। इस शैली के मन्दिरों को मण्डप कहा गया है।

    ➣ महेन्द्र वर्मन प्रथम ने दक्षिण भारत में प्रथम हिन्दू गुफा मन्दिरों का निर्माण किया।

    मामल्ल शैली का विकास पल्लव नरेश नरसिंह वर्मन के समय हुआ। उसने मामल्ल की उपाधि धारण की थी, अतः इसे मामल्ल शैली कहते हैं।

    ➣ मामल्ल शैली का प्रमुख केन्द्र मामल्लपुरम् (महावलीपुरम्) नगर था, जिसकी स्थापना नरसिंह वर्मन मामल्ल ने की थी।

    महाबलीपुरम् (मामल्लपुरम) का शिवमन्दिर तथा कांचीपुरम का कैलाश मन्दिर नरसिंहवर्मन द्वितीय ने बनाया।

    ➣ मामल्ल शैली के रथ सप्त पैगोडा के नाम से विख्यात है। इनकी संख्या 8 है। इन रथों का विकास बौद्ध बिहार तथा चैत्यों में हुआ। इनमें से द्रौपदी रथ अलग शैली का है।

    ➣ विहारों के विकसित रूपों में धर्मराज रथ उल्लेखनीय है। भीमरथ, गणेश रथ और सहदेव रथ चैत्य भवनों पर आधारित हैं।

    ➣ तंजौर के बृहदेश्वर मन्दिर का निर्माण राजराज चोल ने 1000 ई., में करवाया था। मन्दिर का सबसे मुख्य अंग है- गर्भगृह तथा शिखर (विमान ) |

    ➣ पर्सी ब्राउन का मत है कि तंजौर का बृहदेश्वर मन्दिर द्रविड़ शिल्प कला की सर्वोत्तम कृति है और भारतीय वास्तुकला की कसौटी है।

    ➣ मन्दिरों के प्रवेश द्वार को गोपुरम् कहा जाता था। पाण्ड्य कालीन वास्तुकला की विशेषता मन्दिर नहीं है, अपितु ये गोपुरम् ही हैं।

    गोपुरम् एक प्रकार का आयताकार भवन है। तिरुमलाई मन्दिर, चिदंबरम् मन्दिर, कुंबकोणम् मन्दिर इस शैली की कुछ प्रसिद्ध कृतियाँ हैं।

  • वल्लभी का मैत्राक वंश (475–776 ई.) : गुप्तोत्तर काल का प्रमुख पश्चिमी भारतीय राजवंश

    ➣ गुप्तवंश के अंतिम दिनों में जिस समय पूर्वोतर भारत में नई राजनीतिक शक्तियों का उदय हो रहा था पश्चिम में सौराष्ट्र में भी नई शक्तियों राजनीतिक रंगमंच पर आई।

    ➣ मैत्रक वंश का शासन मालवा (मध्य प्रदेश) और राजस्थान में भी फैल गया था, लेकिन बाद में मैत्रकों को दक्कन के चालुक्यों और कन्नौज के शासक हर्ष से पराजित होना पड़ा।

    हर्ष वर्धन की मृत्यु के बाद मैत्रक फिर से उठ खड़े हुए, लेकिन 712ई. से सिंध में स्थापित हो चुके अरबों ने अंतिम मैत्रक राजा शिलादित्य चतुर्थ को मार डाला और 780 ई. में उनकी राजधानी को ध्वस्त कर दिया।

    ➣ सौराष्ट्र गुप्तों का अधीनस्थ प्रदेश था परंतु स्कंदगुप्त की मृत्यु के पश्चात यह प्रदेश गुप्तों से स्वतंत्र हो गया था। बुद्धगुप्त के शासनकाल में मैत्रक सरदार भट्टार्क ने अपनी स्वतंत्र सत्ता (475 ई.) स्थापित कर ली थी।

    ➣ ऐसा प्रतीत होता है कि भट्टारक गुप्तों का अधीनस्थ प्रशासक या सामंत था। वह सेनापति के पद पर था। इसलिए पुष्यमित्र शुंग के समान राजा बनने पर भी वहा सेनापति ही कहलाता रहा।

    ➣ उसने अपनी राजधानी वल्लभी में स्थापित की। उसका पुत्र धरसेन प्रथम भी सेनापति ही कहलाया।

    द्रोणासिंह इस वंश का प्रथम शासक हुआ जिसने महाराज की उपाधि धारण की। उसने संभवत: गुप्त राजा भानुगुप्त की मृत्यु के पश्चात अपनी पूर्ण स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली।

    नरसिंहगुप्त बालादित्य ने परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए उसकी स्वतंत्र सत्ता को स्वीकार कर लिया।

    ➣ हूणों के पराभव और यशोधर्मन के अंत के बाद मैत्रकों रको अपनी शक्ति के विस्तार का अवसर प्राप्त हो गया जिसका लाभ इन लोगों ने उठाया। 6वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में मैत्रकों की एक शाखा ने पश्चिमी मालवा पर भी अपना अधिकार कर लिया।

    ➣ मैत्रकों का पहला तिथियुक्त अभिलेख गुप्त संवत 206 (526 ई.) का है। इसमें ध्रुवसेन प्रथम को महाराज, महाप्रतिहार, महादंडनायक तथा महाकार्तिक की उपाधियों से विभूषित किया गया है। उसने मैत्रकों की शक्ति का और अधिक विस्तार किया।

    ➣ मैत्रको का सबसे शक्तिशाली शासक ध्रुवसेन द्वितीय था। उसके अभिलेख 640ई. स्वीकार कर ली थी। प्रयाग सम्मेलन पर उपास्थित राजाओं में उसका उल्लेख भी ह्वेनसांग करता है।

    हर्षवर्द्धन ने अपनी पुत्री का विवाह उसके साथ कर वर्द्धनों और मैत्रकों की मैत्री को सुदृढ़ किया। उसी के समय में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने वल्लभी की यात्रा की थी।

    ➣ ध्रुवसेन के पश्चात मैत्रक वंश में अन्य कई राजा भी हुए। इनमें धरसेन चतुर्थ एक शक्तिशली शासक था। उसका संघर्ष गुर्जरों से हुआ था

    ➣ उसने संभवत: भड़ौच पर अधिकार किया। उसका सबसे महत्वपूर्ण कार्य ध्रुवसेन द्वितीय के बाद मैत्रकों की गिरती हुई स्थिति को पुनस्थापित करना था।

    ➣ उसने 645-650 ई. के मध्य शासन किया तथा परमभट्टारक, महाराजिराज और परमेश्वर जैसी गौरवपूर्ण उपाधियाँ धारण किया था।

    धरसेन चतुर्थ के पश्चात मैत्रकों की शक्ति पुनः कमजोर पड़ गई। गुर्जरों का दबाव उन पर बढ़ता जा रहा था।

    चालुक्य. गुर्जर प्रतिहार और राष्ट्रकूटों के उदय तथा अरबों के आक्रमण के बाद मैत्रकों की शक्ति नाममात्र के लिए बच गई। बाद में अरबों ने वल्लभी पर अधिकार कर लिया।

    वल्लभी शिक्षा केंद्र (वल्लभी विश्वविद्यालय)

    वल्लभी विश्वविद्यालय गुप्तोत्तर काल का पश्चिम भारत का एक अत्यंत प्रसिद्ध शिक्षा केंद्र था, जो वर्तमान गुजरात के वल्लभी नगर में स्थित था।

    ➣ इसका विकास मुख्यतः मैत्रकी वंश के शासकों के संरक्षण में हुआ। 6वीं से 8वीं शताब्दी के बीच यह विश्वविद्यालय भारत के प्रमुख शिक्षण संस्थानों में गिना जाता था।

    ➣ वल्लभी विशेष रूप से प्रशासनिक शिक्षा और बौद्ध अध्ययन के लिए प्रसिद्ध था। बौद्ध धर्म के अलावा राजनीति शास्त्र, न्यायशास्त्र, व्याकरण, तर्कशास्त्र, अर्थशास्त्र की भी शिक्षा दी जाती थी।

    ➣ वल्लभी विश्वविद्यालय की एक विशेषता यह थी कि यहाँ बौद्ध तथा ब्राह्मण दोनों परंपराओं की शिक्षा दी जाती थी, जिससे यह धार्मिक सहिष्णुता और बहुआयामी शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र बना।

    ➣ चीनी यात्री ह्वेनसांग ने वल्लभी को समृद्ध और उच्च शिक्षा का केंद्र बताया था। ह्वेनसांग और इत्सिंग ने इसकी तुलना नालंदा विश्वविद्यालय से की थी। बाद में अरब आक्रमणों और राजनीतिक अस्थिरता के कारण इसका पतन हो गया।

  • वाकाटक वंश (250–500 ई.) : गुप्तकालीन दक्षिण भारत का शक्तिशाली राजवंश

    📚 विषय सूची

    अजंता गुफाओं के संरक्षण के लिए प्रसिद्ध (दक्कन की प्रमुख शक्ति) : वाकाटक राजवंश

    शासक शासनकाल परिचय / प्रमुख तथ्य
    विंध्यशक्ति 255 – 275 ई. वाकाटक वंश का संस्थापक, दक्खन (मध्य भारत) में स्वतंत्र शक्ति की स्थापना की। प्रारंभिक स्तर पर राज्य को मजबूत करने का कार्य किया।
    प्रवरसेन प्रथम 275 – 335 ई. वाकाटक वंश का सबसे शक्तिशाली प्रारंभिक शासक। विशाल साम्राज्य विस्तार किया और “सम्राट” जैसी उपाधियाँ धारण कीं।
    रुद्रसेन प्रथम 335 – 360 ई. गुप्त साम्राज्य से वैवाहिक संबंध स्थापित किए। वाकाटक-गुप्त संबंधों की शुरुआत इसी काल में मानी जाती है।
    पृथ्वीसेन प्रथम 360 – 385 ई. साम्राज्य की स्थिरता बनाए रखी और दक्खन क्षेत्र में प्रभाव को मजबूत किया।
    रुद्रसेन द्वितीय 385 – 390 ई. कम समय का शासन, गुप्त वंश से संबंध और मजबूत हुए (प्रभावित शासन काल)।
    प्रवरसेन द्वितीय 410 – 440 ई. राजधानी को परिवर्तित/विकसित किया और प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत किया। कला और निर्माण कार्यों को प्रोत्साहन दिया।
    नरेंद्रसेन 440 – 460 ई. कमजोर राजनीतिक स्थिति का काल, बाहरी दबाव और आंतरिक अस्थिरता बढ़ी।
    पृथ्वीसेन द्वितीय 460 – 480 ई. वाकाटक वंश को पुनः स्थिर करने का प्रयास किया, लेकिन शक्ति पहले जैसी नहीं रही।
    हरिषेण 475 – 510 ई. वाकाटक वंश का अंतिम महत्वपूर्ण शासक। अजंता गुफाओं के संरक्षण और बौद्ध कला के विकास से जुड़ा माना जाता है। इसके बाद वंश का पतन हो गया।

    ➣ वाकाटक वंश सातवाहनों के उपरान्त दक्षिण की महत्त्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरा। वाकाटक छठी शताब्दी के मध्य तक चालुक्य वंश के उदय होने तक दक्कन में सबसे महत्त्वपूर्ण शक्तिशाली साम्राज्य था।

    दक्षिणापथ में शासन करने वाले समस्त राजवंशों में वाकाटक वंश सर्वाधिक सम्मानित एवं सुसंस्कृत था। उन्होंने कभी-कभी मध्य भारत के कुछ क्षेत्रों में अपनी सत्ता स्थापित की।

    ➣ लेख प्रमाणों एवं पुराणों के आधार पर यह कहा जाता है कि वाकाटक शासन तीसरी शताब्दी के अन्त में प्रारम्भ हुआ और पाँचवीं शताब्दी के अन्त तक चलता रहा।

    ➣ मगध के चक्रवर्ती गुप्तवंश के समकालीन इस राजवंश ने मध्य भारत तथा दक्षिण भारत के ऊपरी भाग में शासन किया। एक तरह से वाकाटक वंश गुप्त साम्राज्य से पहले अस्तित्व में आ चूका था और, अंत गुप्तोत्तर काल के साथ (लगभग 500 ई. के आसपास)

    ➣ इस राजवंश में विष्णुवृद्धि गोत्र के ब्राह्मण थे तथा उनका मूल निवास स्थान बरार (विदर्भ) में था। उनके सिक्कों पर गंगा की आकृति का अंकन है। यही उनका राजचिह्न था।

    ➣ वाकाटक नरेश ब्राह्मण धर्मावलम्बी थे। इस वंश के राजाओं ने अश्वमेघ, वाजपेय आदि अनेक वैदिक यज्ञों का अनुष्ठान किया था। उनकी उपाधियाँ परममाहेश्वर तथा परमभागवत थीं।

    संस्थापकविंध्यशक्ति (पुराणों अनुसार)
    राजधानीनन्दीवर्धन (नागपुर) बाद में प्रवरपुर
    राजचिन्हसिक्कों में गंगा की आकृति का अंकन

    ➣ वाकाटकों के दो शाखाओं (विंध्यशक्ति की मूल शाखा, बेसिम की शाखा) के शासन का उल्लेख मिलता है। बेसिम शाखा संस्थापक प्रवरसेन का पुत्र सर्वसेन था।

    ➣ इस समय पाटलिपुत्र में जिस शक्तिशाली गुप्त साम्राज्य का विकास हो रहा था, उसके सम्मुख वाकाटकों की शक्ति कमजोर पड़ गयी थी। संभवत: ये गुप्त साम्राज्य के अन्तर्गत अधीनस्थ राजाओं के रूप में रह गये थे।

    विंध्यशक्ति (255 – 275 ई.) : वाकाटक वंश की स्थापना

    ➣ वाकाटक राज्य का संस्थापक विंध्यशक्ति था। संभवतः वह सातवाहनों का अधीनस्थ कोई पदाधिकारी या महत्वपूर्ण सरदार था।

    ➣ पुराणों के अतिरिक्त अजंता अभिलेखों में भी उसे वाकाटक शक्ति का संस्थापक माना गया है तथा उसकी तुलना इंद और विष्णु से की गई है।

    ➣ विंध्यशक्ति विष्णुवृद्धि गोत्र का ब्राह्मण था। शिलालेख में उसे वाकाटक वंशकेतु कहा गया है

    ➣ इससे प्रतीत होता है कि वह ब्राह्मण धर्म को मानने वाला था। उसने कोई विशिष्ट राजकीय उपाधि धारण नहीं की थी ।

    ➣ उसने पूर्वी मालवा में अपनी शक्ति स्थापित की तथा बाद में विंध्य के पार सातवाहनों के प्रदेशों पर अधिकार किया।

    प्रवरसेन प्रथम (275 – 335 ई.) : साम्राज्य विस्तार

    ➣ वाकाटकों की शक्ति का विस्तार विंध्यशक्ति के पुत्र प्रवरसेन प्रथम ने किया। उसने सभी दिशाओं में विजय अभियान किए।

    ➣ प्रवरसेन के समय में वाकाटक शक्ति का विस्तार मध्य भारत में बुंदेलखंड से लेकर दक्षिण में हैदराबाद तक था। प्रवरसेन ने शको के अनेक क्षेत्रों पर भी अधिकार कर लिया।

    ➣ वाकाटकों में एकमात्र वही ऐसा शासक था जिसने महाराजा की उपाधि धारण की थी । उसने धर्ममहाराज की उपाधि भी धारण की।

    ➣ प्रवरसेन ने ब्राह्मण धर्म की महत्ता स्थापित की। उसने चार अश्वमेध, सात सोम यज्ञ एवं एक वाजपेय यज्ञ भी किया। उसे प्रवीर भी कहा जाता है।

    ➣ जिस समय वाकाटकों का उदय हो रहा था उसी समय मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश में नाग वंश का भी उत्थान हो रहा था।

    ➣ प्रवर सेन प्रथम ने भारशिव नागवंश के प्रसिद्ध राजा भवनाग की पुत्री के साथ अपने पुत्र गौतमी पुत्र का विवाह किया।

    ➣ समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति में दक्षिण के जिन राज्यों का उल्लेख हुआ है उस सूची में वाकाटकों का नाम नहीं मिलता। यह एक आश्चर्यजनक तथ्य है कि रूद्रसेन शैव मतावलंबी था।

    ➣ प्रवरसेन ने अपना राज्य अपने पुत्रों में प्रशासनिक सुविधा के लिए विभक्त कर दिया था। इसमें दो भाग मुख्य थे।

    ➣ एक भाग: प्रवरसेन के बड़े पुत्र गौतमीपुत्र का केंद्र नागपुर के निकट नंदिवर्धन था।

    ➣ दूसरा भागः सर्वसेन के अधीन जिसका केंद्र बरार में वत्सगुल्म था। आगे इसी से बेसिम की शाखा का उदय हुआ।

    ➣ आधुनिक उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, दक्षिणापथ, गुजरात और काठियावाड़ क्षेत्र इस समय तक वाकाटक साम्राज्य में सम्मिलित थे।

    रुद्रसेन प्रथम (335 – 360 ई.) : गुप्तों से वैवाहिक संबंध

    ➣ प्रवरसेन के बाद रूद्रसेन प्रथम वाकाटक राजा बना। वह प्रवरसेन के बड़े पुत्र गौतमीपुत्र का पुत्र था।

    ➣ प्रवरसेन की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारियों में प्रतिस्पर्धा आरंभ हुई। शासक बनते ही उसे अपने विरोधियों और प्रतिद्वंद्वियों से सामना करना पड़ा।

    ➣ गौतमीपुत्र की मृत्यु पहले ही हो गई थी। उसी का पुत्र रूद्रसेन प्रवरसेन का उत्तराधिकारी बना।

    ➣ अन्य तीन पुत्र जो वस्तुत: गर्वनर (प्रशासक) के रूप में राज्य के तीन भागों पर राज्य कर रहे और स्वतंत्र शासक बन गए।

    ➣ रूद्रसेन ने अपने नाना भवनाग की सहायता से अपने दो चाचाओं के राज्य पर विजय प्राप्त कर उनका राज्य समाप्त कर दिया।

    ➣ परंतु सर्वसेन अपनी स्वतंत्र सत्ता बनाए रखने में सफल हुआ। रूद्रसेन ने वाकाटकों की शक्ति को बनाए रखने का प्रयास किया।

    ➣ उसने संभवतः गुप्तों से मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित कर लिया जिससे समुद्रगुप्त ने उसके राज्य को छोड़ दिया।

    ➣ रूद्रसेन प्रथम ने अपने वंश के वैष्णव धर्म को छोड़कर शैव धर्म को स्वीकार कर लिया। इसे वाकाटक लेखों में महाभैरव का उपासक कहा गया है।

    ➣ रुद्रसेन के शासन काल के अन्तिम वर्षों में गुजरात और काठियावाड़ में फिर शक-महाक्षत्रपों का शासन हो गया।

    पृथ्वीसेन प्रथम (360 – 385 ई.) : सत्ता सुदृढ़ीकरण

    ➣ वाकाटकों की मुख्य शाखा में रूद्रसेन का उत्तराधिकारी पृथ्वीसेन प्रथम बना। उसे धर्म विजयी कहा गया है तथा इसकी तुलना युधिष्ठिर से की गई है।

    ➣ उसने बेसिम की शाखा के शासक विंध्यसेन (विंध्यशक्ति) से सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखा तथा उसे कुंतल पर अधिकार करने में सहायता प्रदान किया।

    ➣ गुप्त सम्राटों की यह प्रबल इच्छा थी कि गुजरात-काठियावाड़ से शक महाक्षत्रपों के शासन का अन्त कर भारत को विदेशी आधिपत्य से सर्वथा मुक्त कर दिया जाए।

    वाकाटक राजा इस कार्य में उनके सहायक हो सकते थे, क्योंकि उनके राज्य की सीमाएँ शक महाक्षत्रपों के राज्य से मिलती थीं।

    सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय ने अपनी पुत्री प्रभावती गुप्त का विवाह पृथ्वीसेन के पुत्र रूद्रसेन द्वितीय से कर दिया।

    ➣ इस वैवाहिक संबंध से दोनों राजवंशों को लाभ हुआ, परंतु अधिक लाभ गुप्तों को हुआ। इस विवाह से गुप्त-वाकाटक गठबन्धन ने पश्चिमी भारत में शको की शक्ति का उन्मूलन किया।

    रुद्रसेन द्वितीय (385 – 390 ई.) : अल्पकालीन शासन

    पृथ्वीसेन का उत्तराधिकारी रूद्रसेन द्वितीय हुआ। वह चंद्रगुप्त द्वितीय का दामाद था। वह एक शक्तिशाली शासक था।

    ➣ उसने अपनी पत्नी के प्रभाव में आकर बौद्धधर्म त्याग दिया और वैष्णव धर्म को अपना लिया।

    ➣ दुर्भाग्यवश शासक बनने के कुछ समय बाद लगभग 390 ई. में रुद्रसेन द्वितीय की मृत्यु हो गई।

    ➣ रूद्रसेन की मृत्यु के पश्चात उसकी पत्नी प्रभावती गुप्त अपने बड़े नाबालिग पुत्र दिवाकरसेन की संरक्षिका बनी।

    ➣ उसके संरक्षिका के रूप में प्रभावती गुप्त ने अपने पिता चंद्रगुप्त द्वितीय के सहयोग से लगभग 13 वर्षों तक शासन किया।

    ➣ प्रभावती गुप्त ने चंद्रगुप्त द्वितीय ने शकों पर विजय प्राप्त कर गुजरातकाठियावाड़ को अपने साम्राज्य में मिला दिया।

    लगभग 403 ई. में दिवाकरसेन की भी मृत्यु हो गई। कालांतर में प्रभावतीगुप्त ने अपने दूसरे पुत्र दामोदरसेन की संरक्षिका के रूप में राज्य करना आरंभ किया।

    प्रवरसेन द्वितीय (410 – 440 ई.) : प्रशासनिक सुधार एवं कला विकास

    ➣ इस वंश की मूल शाखा का अंतिम शक्तिशाली शासक प्रवरसेन द्वितीय था, उसका आरंभिक नाम दामोदरसेन था। उसने प्रवरसेन की उपाधि धारण की।

    ➣ वह एक कुशल प्रशासक था। लेकिन उसकी अभिरूचि युद्ध से अधिक शांति के कार्यों, विशेषतया साहित्य और कला के विकास में थी। उसने सेतुबंध नामक काव्य की रचना की थी।

    ➣ समकालीन गुप्त शासक चन्द्रगुप्त द्वितीय के राजकवि कालिदास ने प्रवरसेन द्वितीय के राजदरबार में रहकर सेतुबंध में संशोधन कर अपना काव्य मेघदूत लिखा था।

    ➣ उसे नयी राजधानी प्रवरपुर बनाने का श्रेय भी दिया जाता है।

    ➣ उसने अपने पुत्र नरेंद्र का विवाह कुंतल नरेश की पुत्री अजित भट्टारिका से किया। इस वैवाहिक संबंध से वाकाटकों की स्थिति मजबूत हुई।

    ➣ प्रवरसेन वैष्णव धर्म को मानने वाला था।

    नरेन्द्रसेन (440 – 460 ई.) : साम्राज्य विस्तार

    ➣ प्रवरसेन का उत्तराधिकारी नरेंद्रसेन हुआ। प्रवरसेन के पश्चात वाकाटकों की शक्ति का पतन आरंभ हो गया।

    ➣ उसके शासनकाल में नल राजा भवदत्तवर्मन ने वाकाटकों पर आक्रमण किया।

    ➣ आरंभिक चरण में वाकाटकों को पराजित होना पड़ा। परंतु बाद में नरेंद्रसेन ने नलोको कुछ प्रदेशों पर विजय प्राप्त कर ली।

    ➣ नरेंद्रसेन ने मालवा, मेकल और कोसल पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया। उसने बेसिम शाखा के वाकाटकों से भी सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखा।

    पृथ्वीसेन द्वितीय (460 – 480 ई.) : पतन की शुरुआत

    ➣ वाकाटक वंश का अंतिम ज्ञात शासक पृथ्वीसेन-II था। बालघाट लेख में उसे परमभागवत कहा गया है।

    ➣ उसे नलों और त्रैकुटकों के साथ संघर्ष करना पड़ा। इस संघर्ष ने वाकाटकों की शक्ति क्षीण कर दी।

    ➣ बेसिम वंश के शासकों ने 5वीं शताब्दी के अंत तक वाकाटकों के मूल शाखा पर अधिकार कर लिया।


    अजन्ता की 16वीं तथा 17वीं गुफाओं का निर्माण पृथ्वी सेन द्वितीय के समय हुआ।

    वाकाटकों की बेसिम शाखा : –

    ➣ बेसिम शाखा का संस्थापक प्रवरसेन का पुत्र सर्वसेन था। उसे बरार (विदर्भ) और उत्तरी हैदराबाद का प्रशासक नियुक्त किया गया था।

    रूद्रसेन प्रथम के समय में वह स्वतंत्र शासक बन बैठा।

    ➣ सर्वसेन का उत्तराधिकारी विंध्यसेन (विंध्यशक्ति) हुआ। उसने पृथ्वीसेन प्रथम की सहायता से महाराष्ट्र पर विजय प्राप्त की।

    प्रवरसेन और देवसेन इस वंश के अन्य शासक थे। बेसिम शाखा का सबसे महत्वपूर्ण शासक हरिषेण था।

    हरिषेण (475 – 510 ई.) : अजन्ता गुफाओं का संरक्षण

    ➣ यह बेसिम शाखा का अंतिमशक्तिशाली शासक हुआ। राज्यारोहण के समय मुख्य शाखा के पृथ्वी सेन-द्वितीय की मृत्यु हुई, पृथ्वीसेन का कोई पुत्र नहीं था।

    ➣ उसकी मृत्यु 550 ई. में हुई, निर्बल उत्तराधिकारियो के कारण दक्षिण में चालुक्यों ने अधिकार कर लिया।

    स्थापत्य-कला

    ➣ वाकाटक विशेष रूप से कला एवं बौद्ध स्थापत्य के संरक्षण के लिए प्रसिद्ध है। इस वंश के शासकों ने अजंता गुफाओं के निर्माण और चित्रकला को संरक्षण प्रदान किया।

    ➣ इस वंश के शासकों ने विशेष रूप से अजंता गुफाओं की कई बौद्ध गुफाओं, चैत्यगृहों (प्रार्थना स्थल) और विहारों (मठों) के निर्माण एवं संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

    अजन्ता की विहार गुफ़ा संख्या 16,17 एवं चैत्य गुफ़ा संख्या 19 का निर्माण वाकाटकों के समय में ही हुआ। गुफ़ा 16 का निर्माण हरिषेण के मंत्री वराहदेव ने करवाया था।

    ➣ भवन निर्माण कला एवं मूर्तिकला की दृष्टि से विदर्भ का टिगावा एवं नचना का मंदिर उल्लेखनीय है। टिगोवा मंदिर में गंगा, यमुना की मूर्तियां स्थापित हैं।

    जेम्स फ़र्गुसन ने गुफ़ा संख्या 19 को भारत के बौद्ध कला का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण बताया है।

    🧠 : प्रारंभिक गुफाओं का निर्माण मुख्यतः सातवाहन वंश के समय (लगभग 2वीं शताब्दी ई.पू. – 1वीं शताब्दी ई.) हुआ। बाद में वाकाटक वंश के शासकों, विशेषकर राजा हरिषेण के काल में, अजंता गुफाओं का विस्तार, भित्ति चित्रकला और विहार निर्माण अपने उत्कर्ष पर पहुँचा।
  • पुष्यभूति वंश (550–650 ई.) : हर्षवर्धन और कन्नौज का उत्कर्ष

    📚 विषय सूची

    थानेश्वर का पुष्यभूति (वर्धन वंश)

    पुष्यभूति वंश राजाओ की सूची

    ➣ पुष्यभूति वंश की स्थापना छठी शताब्दी ई. में गुप्त वंश के पतन के बाद हरियाणा के अम्बाला ज़िले के थानेश्वर नामक स्थान पर हुई थी।

    ➣ बाणभट्ट की हर्षचरित में इस वंश का संस्थापक पुष्यभूति को बताया है, लेकिन इस वंश के अभिलेख एवं मुहरों में प्रथम शासक नरवर्धन को बताया गया है।

    ➣ इस वंश में तीन राजा हुए- प्रभाकरवर्धन और उसके दो पुत्र राज्यवर्धन तथा हर्षवर्धन। इन्होंने गुप्तों के बाद उत्तर भारत में सबसे विशाल राजवंश की स्थापना की। पुष्यभूति वंश

    ➣ पुष्यभूतियों को वैश्य अथवा क्षत्रिय जाति का माना गया है।

    ह्वेनसांग तथा आर्यमंजूश्रीमूलकल्प के अनुसार वर्धन वंश (पुष्यभूति वंश) वैश्य (फीशे) जाति का था।

    ➣ पुष्यभूति वंश की उत्पत्ति के विषय में स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है। बाणभट्ट के हर्षचरित में इस वंश का वर्णन मिलता है।

    ➣ इस वंश का संस्थापक पुष्यभूति था। उसी के नाम पर यह वंश पुष्यभूति वंश के नाम से विख्यात हुआ।

    ➣ वह संभवतः गुप्तों का अधीनस्थ सामंत या अधिकारी था। गुप्त राजाओं की दुर्बलता का लाभ उठाकर उसने पूर्वी पंजाब (हरियाणा) में अपनी सत्ता स्थापित कर ली तथा थानेश्वर को अपनी राजधानी बनायी।

    ➣ वह शिव का भक्त माना जाता है। उस पर भैरवाचार्य नामक शैव का प्रभाव था। पुष्यभूति वंश प्रथम एतिहासिक राजा नरवर्द्धन था।

    प्रभाकरवर्धन (580-605 ई.)

    ➣ वर्धन वंश की शक्ति व प्रतिष्ठा का संस्थापक प्रभाकरवर्धन था। उसका अनुमानित समय 6वीं शताब्दी का अंति चरण माना गया है।

    ➣ उसकी उपाधियों- परमभट्टारक और महाराजाधिराज से स्पष्ट होता है कि वह एक सार्वभौम और शक्तिशाली राजा था।

    बाणभट्ट इस राजा की अलंकारपूर्ण शब्दों में, हर्षचरित में प्रशंसा करता है।

    ➣ उसे हूणहरिणकेसरी (हूणरूपी हरिणो के लिए सिंह समान), सिंधुराजज्वर (सिंधु राज्य के लिए ज्वर के समान), गुर्जर प्रजागर (गुर्जरों की नींद हराम करने वाला),

    गांधाराधिपगंधद्विपकूटहस्तिज्वरो (गांधार के राजारूपी) सुगन्धिगज के लिए महान हस्तिज्वर या घातक महामारी के समान, लाटपाटवपाटच्चरो (चंचलता को नष्ट करने वाला) तथा मालवलक्ष्मीतलापरशु (मालवा की राज्यलक्ष्मी रूपी लता के लिए कुल्हाड़ी के समान) बताया है।

    ➣ हर्षवर्धन के मधुबन और बांसखेड़ा अभिलेखों के अनुसार उसका यश चारों समुद्रो के पार तक फैला हुआ था। अपने पराक्रम के कारण वह प्रतापशील के नाम से भी जाना जाता था।

    मालवा पर उसके प्रभाव की पुष्टि हर्षचरित से होती है जिसमें कहा गया है कि मालवा के शासक महासेनगुप्त के दो पुत्र माधवगुप्त और कुमारगुप्त उसके दरबार में रहते थे।

    ➣ अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के लिए प्रभाकरवर्धन ने मौखरियों (कन्नौज) से वैवाहिक संबंध स्थापित किया।

    ➣ उसके अपनी पुत्री राज्यश्री का विवाह कन्नौज के मौखरी शासक ग्रहवर्मा (ग्रहवर्मन) के साथ किया। इस विवाह से वर्धनों व मौखरियों का संबंध प्रगाढ़ हुआ।

    ➣ प्रभाकरवर्धन सूर्य का उपासक था। उसकी प्रधान रानी यशोवती (यशोमती) थी।

    हर्षचरित के अनुसार प्रभाकरवर्धन के जीवन के अंतिम चरण में हूणों ने उसके राज्य की सीमा पर आक्रमण किया। पिता बीमार थे इसलिए पुत्र राज्यवर्धन को हूणों को दबाने का उत्तरदायित्व सौंपा गया।

    ➣ हर्ष की माता यशोमति ने अपने पति की बीमारी से न बचने की आशा में पति के जीवित रहते हुये ही चिता मे जलकर आत्मदाह कर लिया।

    ➣ कालांतर में जिस समय राज्यवर्धन हूणों के विरूद्ध अभियान कर रहा था। उसे अपने पिता की कमजोर स्वास्थ की सूचना मिली। सूचना प्राप्त करते ही वह वापस थानेश्वर लौटा, परंतु उस समय तक प्रभाकरवर्धन की मृत्यु हो चुकी थी।

    राज्यवर्धन (605-606 ई.)

    ➣ प्रभाकरवर्धन के तीन संताने (पुत्री राज्यश्री, राज्यवर्धन व हर्षवर्धन) थी। पिता की मृत्यु के पश्चात राज्यवर्धन थानेश्वर की गद्दी पर बैठा।

    ➣ उसी समय उसे सूचना मिला कि बंगाल के शासक शशांक (गौड़ वंश) और मालवा के राजा देवगुप्त ने मिलकर कन्नौज पर आक्रमण किया है तथा ग्रहवर्मन की हत्या कर, राज्यश्री को कैद कर लिया है।

    ➣ इस दुर्घटना की सूचना सुनकर राजयवर्धन कन्नौज की सुरक्षा के लिए आगे बढ़ा। उसने देवगुप्त की सेना को पराजित कर दिया।

    ➣ अभियान की सफलता के उपरान्त लौटते हुए मार्ग में बंगाल नरेश शशांक ने धोखे से राज्यवर्धन की हत्या कर दी।

    ➣ राज्यवर्धन की मृत्यु के पश्चात 606 ई. में उसका छोटा भाई हर्षवर्धन थानेश्वर का राजा बना।

    ➣ वर्धन वंश में सर्वप्रथम हर्ष के भाई राज्यवर्धन ने बौद्ध धर्म ग्रहण किया। वंसखेड़ा और मधुवन अभिलेखों में राज्यवर्धन को परम सौगत (बौद्ध) कहा गया है।

    हर्षवर्धन (606-647 ई.)

    सेनापति सिंहनाद के कहने पर हर्ष ने सिंहासन ग्रहण किया। हर्षवर्धन ने 606 ई. में राज्यारोहण के साथ ही हर्ष संवत् चलाया।

    ➣ राजा बनते ही उसने शशांक और देवगुप्त से बदला लेने की प्रतिज्ञा की तथा अपनी बहन की सुरक्षा के लिए वह कन्नौज की तरफ बढ़ा।

    ➣ मार्ग में उसे कामरूप (असम) के राजा भास्करवर्मन का दूत हंसबेग मिला, जिसने हर्षवर्धन के समक्ष अपने राजा की तरफ से मित्रता का प्रस्ताव रखा, जिसे हर्ष ने सहर्ष स्वीकार कर लिया।

    ➣ हर्ष ने कामरूप, (असम) के राजा भास्कर वर्मा से संधि कर गौड़ के राजा शशांक के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही की।

    ➣ हर्ष ने गौड़ शासक शशांक को हराया। आर्यमंजूश्रीमूलकल्प में शंशाक की पराजय की जानकारी है।

    ➣ मार्ग में उसे मित्र भण्डी से सूचना मिली की राज्यश्री कैद से मुक्त होकर विंध्याचल चली गई है। अतः, वह कन्नौज का मार्ग छोड़कर विंध्याचल गया।

    आचार्य दिवाकर मित्र की सहायता से उसने राज्यश्री को उस समय खोज निकाला, जब वह सती होने जा रही थी। हर्ष उसे वापस कन्नौज ले आया।

    ➣ ग्रहवर्मन की हत्या के पश्चात उसका कोई उत्तराधिकारी नहीं होने से, कन्नौज के मंत्रियों व राज्यश्री की सहमति से, हर्ष कन्नौज का भी शासक बन गया।

    ➣ उसकी राजधानी अब थानेश्वर से कन्नौज हस्तांतरित हो गयी। इसके साथ ही कन्नौज अब उत्तरी भारत की राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बन गया।

    ➣ चीनी ग्रन्थ फैंगचिन्ह के अन्सुअर हर्ष एंव राज्य श्री कन्नौज के सिहांसन पर साथ-साथ बैठते थे।

    ➣ कन्नौज ऊँचे स्थान में दोआब के ठीक मथ्य में स्थित था। जिसकी व्यवस्थित किलाबंदी की गयी। सन 619 में शशांक की मृत्यु हो जाने पर शत्रुता भी समाप्त हो गयी।

    साम्राज्य विस्तार

    ➣ हर्ष ने लगभग 41 वर्ष शासन किया। इन वर्षों में हर्ष ने अपने साम्राज्य का विस्तार कश्मीर को छोड़कर जालंधर, पंजाब, नेपाल एवं बल्लभीपुर तक कर लिया। इसने आर्यावर्त को भी अपने अधीन किया।

    पंचभारत (पंजाब, बंगाल, कन्नौज (उत्तरप्रदेश), मिथिला (बिहार) एवं उड़ीसा) विजय के पश्चात् कन्नौज पर अपनी बहन के आग्रह पर अधिकार करके अपनी राजधानी थानेश्वर से कन्नौज स्थानान्तरित की।

    ➣ हर्ष वर्धन अपने दक्षिणी अभियान में सफल नहीं हो सका। उसे नर्मदा नदी के तट पर बादामी के चालुक्यवंशी शासक पुलकेशिन द्वितीय से पराजित होना पड़ा। ऐहोल प्रशस्ति (634 ई.) में इसका उल्लेख मिलता है।

    ➣ पुलकेशिन द्वितीय से युद्ध का उल्लेख ऐहोल लेख, सी यू की एवं येक्केरी अभिलेख में है। ऐहोल अभिलेख में हर्ष की गजसेना (गज का नाम दर्पशात) का भी उल्लेख है।

    ➣ हर्ष ने वल्लभी के शासक ध्रुवसेन द्वितीय को पराजित किया। जयभट्ट तृतीय के नौसारी ताम्रपत्र के अनुसार ध्रुवसेन ने भड़ौंच के गुर्जर शासक दद्द द्वितीय के दरबार में शरण ली। ध्रुवसेन को ही ध्रुवभट्ट अथवा दुर्लभ भट्ट कहते हैं।

    ➣ मगध के शासक पूर्णवर्मन ने जिसने मगध पर अधिकार कर लिया था (वह शायद मौखरी वंश का प्रतीत था।) जिसने हर्ष की अधीनता स्वीकार कर ली।

    ➣ हर्ष ने उसे मगध का शासक बना रहने दिया। बाद में माधवगुप्त, हर्ष का अधीनस्थ राजा बना। इस प्रकार मगध पर हर्ष का आधिपत्य स्थापित हो गया।

    चीनी स्रोतों में हर्ष को मगधराज भी कहा गया है।

    ➣ मगध के साथ नालंदा पर भी हर्ष का आधिपत्य स्थापित हुआ। वहां से उसकी एक मुहर मिली है।

    नेपाल में हर्ष-संवत् (606 ई.) के प्रचलन (अंशुवर्मन और उसके उत्तराधिकारियों द्वारा) के आधार पर कुछ विद्वान मानते हैं कि नेपाल पर भी हर्ष का आधिपत्य था ।

    ➣ हर्ष ने ओडू (उत्तरी उड़ीसा) तथा तत्पश्चात कोगोंडा (दक्षिणी उड़ीसा, गंजाम जिला)कलिंग पर भी विजय प्राप्त की। इन विजयों के पश्चात हर्ष उत्तरी भारत का स्वामी बन गया। उसने सकलोत्तरापथनाथ की उपाधि धारण की थी।

    ➣ हर्प द्वारा अंतिम युद्ध 643 ई. में गंजाम या कांगोद (उड़ीसा) में लड़ने का उल्लेख है।

    ➣ मात्वालिन के अनुसार हर्ष ने 641 ई. में चीनी नरेश ताई-सुंग (ती-आंग) के दरबार में अपना दूत भेजा जिसके जवाब में तीन चीनी दूतमण्डल भी हर्ष के दरबार में आये।

    ➣ 641 ई. में पहला चीनी दूत मण्डल लियांग-होई-किंग के नेतृत्व में, 643 ई. में लि-यि-पियओ के नेतृत्व में तथा 647 ई. में वैन-ह्वान-शे (वांगश्वासे) के नेतृत्व में कूल तीन चीनी दूत मण्डल हर्ष के दरबार में आये, लेकिन 647 ई. में तीसरा दूत मण्डल हर्ष की मृत्यु के बाद दरबार पहुंचा।

    ➣ हर्ष सूर्यशिव के साथ बुद्ध की भी उपासना करता था। कालांतर में उसका झुकाव महायान बौद्ध धर्म की ओर अधिक हो गया।

    राजतरंगिणी के अनुसार बौद्ध धर्म अपनाने से पूर्व हर्ष शैव मतावलम्बी था। उसे अभिलेखों में परममाहेश्वर कहा गया है।

    प्रयाग महामोक्षपरिषद्

    ➣ हर्ष प्रत्येक पाँचवें वर्ष प्रयाग में महोत्सव (धर्म महासम्मेलन) करके दान करता था। चीनी यात्री ह्वेनसांग 643 ई. में इस प्रकार के छठे महोत्सव में शामिल हुआ था।

    ➣ इसमें 18 देशों के राजाओं ने भाग लिया। 75 दिनों तक चले इस समारोह के प्रथम दिन बुद्ध, दूसरे दिन आदित्य (सूर्य) एवं तीसरे दिन ईश्वरदेव (शिव) की पूजा की गई।

    ➣ हर्ष ने नालन्दा महाविहार को 100 गाँवों की आय दान में दी थी। दानशीलता के लिए हर्ष को भारतीय हातिम भी कहा गया है। हर्ष के बंसखेड़ा, मधुवन एवं नालन्दा लेखों में भूमिदान का उल्लेख है।

    साहित्यिक उपलब्धियाँ

    ➣ हर्ष एक प्रतिष्ठित नाटककार एवं कवि था। इसने नागानन्द, रत्नावली एवं प्रियदर्शिका नामक नाटकों की रचना की। अतः हर्ष को साहित्यकार सम्राट भी कहा जाता है।

    हर्षचरित,चंडीशतक, पूर्वपीठिका, कादम्बरी और पार्वती परिणय के रचयिता बाणभट्ट हर्षवर्धन के दरबारी कवि थे।

    बाणभट्ट के पुत्र भूषणभट्ट (पुलिन्दभट्ट) ने अपने पिता के अपूर्ण ग्रन्थ कादम्बरी को पूर्ण किया।

    ❑ कुछ विद्वानों ने चण्डीशतक, पार्वतीपरिणय एवं मुकुटताड़ितक का रचयिता भी बाणभट्ट को माना है।

    ➣ इसके अतिरिक्त हरिदत्त एवं जयसेन जैसे प्रसिद्ध कवि एवं लेखक इसके दरबार की शोभा बढ़ाते थे।

    ➣ हर्ष ने जयसेन नामक बौद्ध विद्वान को उड़ीसा के 80 ग्राम दान देने चाहे परन्तु जयसेन ने विनीत भाव से दान लेना अस्वीकार कर दिया।

    ➣ हर्षवर्द्धन के दरबार में मयूर शर्मा नामक विद्वान ने मयूरशतक व सूर्यशतक पुस्तक की रचना की थी।

    व्यक्तित्व

    हर्षचरित नामक ग्रंथ में हर्षवर्धन को सभी देवताओं का सम्मिलित अवतार कहा गया है।

    ➣ एक यूरोपीय लेखक ने हर्ष को हिन्दूकाल का अकबर कहा है। हर्ष का दूसरा नाम शिलादित्य था। ह्वेनसांग हर्ष का शिलादित्य नाम से ही वर्णन करता है।

    ➣ 11वीं शताब्दी के गुजराती लेखक सोढ़ल ने अपनी उदयसुन्दरी कथा में हर्ष को कवीन्द्र एवं वाणी का हर्ष कहा है।

    गीतगोविंद के लेखक जयदेव ने प्रसन्नराघव में उसे कविताकामिनी का साक्षात हर्ष/ काव्य का हर्ष तथा भास एवं कालिदास के समतुल्य बताया है।

    ➣ चालुक्य अभिलेखों (ऐहोल अभिलेख) में हर्ष को सकलोत्तरापथनाथ (संपूर्ण उत्तरी भारत का सम्राट) कहा गया है।

    ➣ बाण ने उसे चतुः समुद्राधिपति”, सकलराजचक्रचूड़ामणि तथा सर्वचक्रवर्तिनांधौरेय कहा है।

    ➣ हर्षवर्धन अंतिम हिन्दू सम्राट भी कहा गया है। लेकिन वह ना ता कट्टर हिन्दू था ना ही पुरे देश का शासक। वह सम्पूर्ण उत्तर-भारत (कश्मीर छोड़कर) का शासक था।

    बंसखेड़ा अभिलेख में हर्ष के हस्ताक्षर है एवं सोनपत मुहर पर हर्ष का पूरा नाम हर्षवर्धन (हर्ष नाम अंकित मुहर) मिलता है।

    ➣ हर्षवर्द्धन को शिलादित्यपरमभट्टारक जैसी उपाधि प्राप्त हैं।

    ➣ हर्षवर्द्धन के समय नालन्दा विश्वविद्यालय का कुलपति शीलभद्र था।

    ➣ हर्षवर्द्धन के समय बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए कुमारजीव, परमार्थ, शुमाक तथा धर्मदेव चीन गए।

    ➣ ह्वेनसांग के अनुसार हर्ष ने कश्मीर से गौतम बुद्ध का दांत लाकर कन्नौज के निकट एक संघाराम में स्थापित किया।

    ➣ हर्ष बौद्ध धर्म की महायान शाखा का समर्थक होने के साथ-साथ विष्णु एवं शिव की भी स्तुति करता था।

    ➣ हर्षवर्द्धन निःसंतान था इसलिए उसकी मृत्यु के साथ ही पुष्यभूति वंश का सदा के लिए अंत हो गया।

    मृत्यु

    ➣ हर्ष का कोई पुत्र नहीं उसकी एक पुत्री थी जिसक विवाह वल्लभी के शासक ध्रुवसेन द्वितीय से हुआ था। अतः उसकी मृत्यु के साथ ही 647 ई. में पुष्यभूति वंश का अंत हो गया।

    हर्ष के समकालीन शासक

      राजवंशप्रमुख शासकअवस्थिति
    मैत्रकभट्टार्क, धर्मसेन चतुर्थ बल्लभी(गुजरात )
    मौखरिहरिवर्मा, ईशानवर्मा, सर्ववर्मा, ग्रहवर्माकन्नौज (उत्तर प्रदेश)
    परवर्ती गुप्तमहासेन गुप्तमगध (बिहार)
    औलिकरप्रकाशधर्मान, यशोधर्मन, देवगुप्त मालवा (मध्यप्रदेश)
    हूण जाति तोरमाण, मिहिरकुलपश्चिमी पंजाब
    चन्द्र (गौड़)शशांकबंगाल, कर्ण सुवर्ण (मुर्शिदाबाद)
    वर्मनभास्कर वर्माकामरूप (असम का केन्द्रीय भाग)
    बादामी के चालुक्यपुलकेशिन-IIकर्नाटक के आधुनिक बीजापुर जिला

    हर्षवर्धन के पश्चात पुष्यभूति वंश

    ➣ हर्ष की मृत्यु के पश्चात् अर्जुन (एक स्थानीय शासक) ने कन्नौज पर अधिकार कर लिया। उसने चीन के राजदूत वांग ह्यूगसे का विरोध किया, जो हर्ष की मृत्यु के उपरांत वहाँ पहुँचा था।

    वांग ह्यूगसे पुनः असम, तिब्बतनेपाल की सैन्य सहायता लेकर लौटा। युद्ध में अर्जुन की हार हुई। अर्जुन को बंदी बनाकर चीन ले जाया गया तत्पश्चात् वहीं कारागार में उसकी मृत्यु हो गई।

    ➣ आठवीं शताब्दी के आरंभ में यशोवर्मन कन्नौज के सिंहासन पर बैठा। अपने पराक्रम से उसने पुनः कन्नौज को अपने अतीत का गौरव प्रदान किया। वह सिंध के राजा दाहिर एंव कश्मीर के शासक ललितादित्य का समकालीन था।

    ➣ यशोवर्मन ने 725 से 752 ई. तक शासन किया। वह कुशल शासक व विद्वान था। उसके दरबार में वाक्पति नामक कवि ने प्राकृत भाषा में गोड़वहो की रचना की।

    ➣ यशोवर्मन के दरबार में भवभूति नामक प्रसिद्ध नाटककार रहते थे। उन्होंने मालतीमाधव (10 अंकों का नाटक), उत्तररामचरित (सात अंकों का नाटक) तथा महावीरचरित (सात अंकों का नाटक) नामक तीन नाटक लिखे। महावीर चरित में भगवान राम का जीवन है।

    ➣ उसके चीन के साथ राजनैतिक संबंध थे। यशोवर्मन ने 731 ई. में बुद्धसेन (पुटासिन) नामक अपने मंत्री को चीनी शासक हेन-शुंग के दरबार में भेजा था।

    ➣ यशोवर्मन की मृत्यु के बाद कन्नौज पर आधिपत्य को लेकर महाशक्तियों में संघर्ष हुआ जो त्रिपक्षीय संघर्ष कहलाता है। ये शक्तियाँ थी :- गुर्जर-प्रतिहार, पालदक्षिण भारत के राष्ट्रकूट।

    त्रिपक्षीय संघर्ष आठवीं शताब्दी के अन्त से शुरू होकर लगभग 150 वर्षों तक अनेक चरणों में चला। अंत में गुर्जर-प्रतिहारों की ही विजय रही।

    हर्ष के समय बौद्ध धर्म

    ➣ हर्ष के पूर्वज भगवान शिव और सूर्य के अनन्य उपासक थे। शुरू में हर्ष भी अपने कुलदेवता शिव का परम भक्त था।

    ➣ कालांतर में चीनी यात्री ह्वेनसांग से मिलने के बाद उसने बौद्ध धर्म की महायान शाखा को राजाश्रय दिया तथा वह पूर्णतः वौद्ध बन गया।

    ➣ हर्ष के समय में नालंदा महाविहार महायान बौद्ध धर्म की शिक्षा का मुख्य केंद्र था।

    ➣ आगे चलकर कन्नौज तथा प्रयाग में दो विशाल धार्मिक सभाओं का आयोजन किया। कुंभ मेले को प्रारंभ करने का श्रेय हर्षवर्धन को ही दिया जाता है।

    ➣ हर्ष ने नालंदा में एक कांसे का विहार भी बनवाया तथा महाविहार को गांव दान में दिए।

    कन्नौज धर्म सभा (643 ई.)

    ➣ अन्य धर्मों से महायान की उत्कृष्टता सिद्ध करने के लिए हर्षवर्धन ने 643 ई. में कन्नौज में विशाल धार्मिक सभाओं का आयोजन किया गया। इसमें बौद्ध की महायान शाखा की श्रेठता सिद्ध हुई।

    ➣ चीनी साक्ष्यों के अनुसार इस सभा में बीस देशों के राजा अपने देशों के प्रसिद्ध ब्राह्मणों, श्रमणों, सैनिकों, राजपुरुषों आदि के साथ उपस्थित हुए थे। इस सभा की अध्यक्षता ह्वेनसांग ने की थी।

    ➣ इसी सभा में ह्वेनसांग को महायानदेव एवं मोक्षदेव की उपाधियाँ प्रदान की गई। आर. के. मुखर्जी ने इस धर्म सभा को धर्मोका महासम्मेलन कहा है।

    चीनी यात्री : ह्वेनसांग

    ➣ हर्षवर्द्धन के समय चीनी यात्री हवेनसांग 629 ई0 में भारत आया और वह लगभग644ई. तक भारत मे रहा।

    15 वर्ष की इस अवधि में उसने भारत के प्रमुख नगरों, बौद्ध केन्द्रों, स्तूपोंमहाविहारों का भ्रमण किया।

    ➣ हवेनसांग नालंदा विश्वविद्यालय में अध्ययन करने और बौद्ध ग्रंथों को संग्रह करने के उद्देश्य से आया था।

    ➣ हवेनसांग के समय नांलदा विश्वविद्यालय का प्राचार्य शीलभद्र था।

    ➣ हवेनसांग ने सियूकी नामक पुस्तक लिखी जिसमें उसका विभिन्न देशों का यात्रावृतांत था इसमें हर्षवर्द्धन को शिलादित्य कहा गया है।

    ➣ इसे यात्रियों का राजकुमार, नीति का पंडित‘ एवं वर्तमान शाक्यमुनि कहा गया है।

    ➣ ह्वेनसांग के अनुसार-

    • हर्षवर्धन ने कन्नौज सभा में पूजा के लिए बुद्ध की विशाल सोने की मूर्ति बनवायी थी।
    • भारतीयों को गर्म स्वभाव का परंतु ईमानदार कहा है।
    • सूती कपड़ों के उत्पादन के लिए सबसे प्रसिद्ध नगर मथुरा था।
    • इस समय सिंचाई घटी यन्त्र (रहट) द्वारा होती थी।
    • हर्ष की सेना को चतुरंगिनी कहा।
    • भारत के घोड़े अरब, ईरान एवं कम्बोज से आते थे।
    • ह्वेनसांग ने कन्नौज की धर्मशालाप्रयाग की महामोक्षपरिषद् का भी वर्णन किया है।

    ➣ चीन लौटकर उसने पाश्चात्य संसार के लेख (शी-यू-की) नामक पुस्तक में तत्कालीन भारतीय राजनीति, समाज, धर्म, आर्थिक व्यवस्था, शिक्षा एवं साहित्य की प्रगति पर विस्तृत ढंग से लिखा।

    ➣ इतिहास में अंतिम हिन्दू सम्राट से तीन शासक का नाम मिलता है- हर्षवर्धन , पृथ्वी राज-चौहान तथा हेमू।

    ➣ हर्षवर्धन के समय तक भारत में मुस्लिम का आगमन नहीं हुआ था। यह अंतिम ऐसा शासक था जिसका साम्राज्य सम्पूर्ण उत्तर भारत पर था। जिसने उत्तर-भारत को एक सूत्र में बंधा था।

    पृथ्वी राज चौहान के शासन काल में मुस्लिम आक्रमणकारियों ने भारत के पश्चिमोत्तर पर कब्ज़ा कर लिया था। इसी शासक के पराजय के बाद भारत में मुस्लिमों का आगमन हुआ।

    ➣ हेमू एक वजीर था जो हुमायूँ की मृत्यु के पश्चात् दिल्ली की गद्दी पर बैठा। वह मध्यकालीन भारत का पहला ऐसा हिन्दू सम्राट था जो दिल्ली की गद्दी पर बैठा परन्तु कुछ समय पश्चात् पानीपत के द्वितीय युद्ध में मारा गया।

    प्रशासन व्यवस्था

    ➣ हर्ष के शासनकाल तथा समाज की जानकारी बाणभट्ट द्वारा रचित हर्षचरित और चीनी यात्री ह्वेनसांग के संस्मरण द्वारा मिलती है।

    ➣ हर्ष का प्रशासन निरंकुश तथा गणतंत्रीय तत्वों को मिश्रण था। प्रशासन प्रणाली सामन्त-प्रणाली की अग्रगामी थी।

    ➣ सम्राट को सहायता देने के लिये एक मंत्रिपरिषद् होती थी। मंत्री को सचिव या अमात्य कहा जाता था।

    ➣ हर्ष के प्रशासन में एक सुव्यवस्थित सचिवालय था, जिसके प्रमुख पदाधिकारी निम्न थे-

     अधिकारी  कार्य
     अवन्ती   युद्ध व शांति का अधिकारी, विदेश मंत्री/ सचिव
     सिंघनाद  सेनापति
     कुन्तल  अश्व सेना का प्रधान
     स्कन्दगुप्त  हस्ति सेना का प्रधान
     भण्डी  प्रधान सचिव/प्रधानमंत्री

    ➣ हर्ष के अधीनस्थ शासक महाराज अथवा महासामंत कहे जाते थे।

    ➣ विदेश सचिव को महासंधिविग्रहिक कहा जाता था। राजस्थानीय संभवतः वायसराय (प्रान्त प्रमुख) थे। चाट और भाट पुलिस अधिकारी थे।

    ➣ हर्ष के प्रशासन व पदाधिकारियों के नाम बंसखेड़ा अभिलेख में मिलते है।

    बंसखेड़ा एवं मधुबन लेखों में हर्ष के महासामन्त स्कन्दगुप्त एवं ईश्वरगुप्त का उल्लेख है।

    ➣ हर्ष ने अपनी बहिन को प्रशासनिक कार्यों में सहयोग देने के लिए राजधानी थानेश्वर से कन्नौज स्थानान्तरित की थी।

    ➣ हर्षचरित के अनुसार हर्ष ने सर्वप्रथम पदाधिकारियों को वेतन के रूप में भूमि देने की जागीरदारी प्रथा शुरू की।

    ➣ ह्वेनसांग के अनुसार मंत्रियों एवं केन्द्रीय कर्मचारियों को नकद वेतन नहीं बल्कि भूखण्ड दिए जाते थे और सैनिक पदाधिकारियों को नकद वेतन दिया जाता था।

    ➣ ह्वेनसांग ने लिखा है कि राज-भूमि को चार भागों में बांटा गया था-

    1. एक भाग राज्य-कार्य चलाने के लिए
    2. दूसरा भाग मंत्रियों तथा अन्य राजकर्मचारियों को वेतन देने के लिए था
    3. तीसरा भाग सुयोग्य व्यक्तियों को पुरस्कृत करने के लिए था
    4. चौथा भाग धार्मिक सम्प्रदायों को दान देने के लिए था

    न्याय व्यवस्था

    ➣ न्याय व्यवस्था का सर्वोच्च अधिकारी सम्राट था। ह्वेनसांग के अनुसार हर्ष के राज्य में कानून व्यवस्था अच्छी नहीं थी। राज्य में अपराध के लिये कठोर दंड का प्रावधान था।

    साम्राज्य संरचना

    ➣ राज्य प्रशासनिक सुविधा के लिए ग्राम, विषय, भुक्ति, राष्ट्र में विभाजित था। मुक्ति का तात्पर्य प्रांत से था, विषय जिले के समान था। शासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी।

    ➣ हर्ष का साम्राज्य प्रांतों या भूक्ति में विभक्त था जिसके शासक को लोकपाल या उपरिक कहा जाता था।

    ➣ प्रांत के अन्तर्गत जिले या विषय और विषय के अधीन पाठक या तहसील होते थे।

    ➣ प्रशासन की सबसे छोटी ईकाई ग्राम थी जिसके मुख्य को ग्रामक्षपटलिक कहा जाता है।

    आर्थिक व्यवस्था

    ➣ इस काल में राज्य को सर्वाधिक आय भूमि से होती थी। भौगिक कर वसूलने वाला तथा पुस्तपाल जमीन का हिसाब रखने वाला पदाधिकारी था।

    राष्ट्रीय आय का एक चौथाई भाग उच्च कोटि के राज्य कर्मचारियों को वेतन या उपहार के रूप में, एक चौथाई भाग धार्मिक कार्यो के खर्च हेतु, एक चौथाई भाग शिक्षा के लिए एवं एक चौथाई भाग राजा स्वयं अपने खर्च के लिए प्रयोग करता था।

    हर्षकालीन ताम्रपत्रों में राजस्व के स्रोत के रूप में तीन प्रकार के करों का विवरण मिलता है- भाग, हिरण्य एवं बलि। भाग या भूमिकर पदार्थ के रूप में लिया जाता था।

    हिरण्य नगद में रूप में लिया जाने वाला कर था। जो सम्भवत: व्यापारियों से लिया जाता था।

    ➣ हर्षवर्द्धन के समय सिंचाई के लिये रहट या तुलायंत्र का प्रयोग तथा मथुरा सूती वस्त्र को केंद्र था।

    ➣ भूमि राजस्व अनाज के रूप में लिया जाता था और यह उत्पादन का 1/6 भाग होता था।

    ➣ हर्षवर्धन के काल में उच्च अधिकारियों को वेतन के रूप में जागीरें (भूमि अनुदान) दी जाती थीं। भूमि देने की सामंती प्रथा हर्षवर्धन ने ही शुरू की।

    ➣ भूदान द्वारा राज्य के अधिकारियों के भुगतान की पुष्टि सर्वप्रथम मनुस्मृति ग्रंथ में मिलता है।

    ➣ साधारण लेनदेन और व्यापार कौड़ियों के माध्यम से होता था। इन कौड़ियों को प्रतिहार अभिलेखों में कपर्दक कहा गया है।

    ➣ हर्षवर्द्धन समय पूर्वी भारत में ताम्रलिप्ति व पश्चिमी भारत में भड़ौच नामक बन्दरगाह थे।

    ➣ हर्ष के समय में मथुरा सूती वस्त्रों के निर्माण के लिये प्रसिद्ध था।

    सैन्य व्यवस्था

    ➣ ह्वेनसांग के अनुसार हर्ष की सेना में लगभग 5,000 हाथी, 2,000 घुड़सवार एवं 5,000 पैदल सैनिक थे।

    ➣ कालान्तर में हाथियों की संख्या बढ़कर लगभग 60,000 एवं घुड़सवारों की संख्या एक लाख पहुंच गई। यह संख्या मौर्यों से भी अधिक थी।

    कुंतल अश्वारोही सेना का सर्वोच्च अधिकारी था तथा स्कंदगुप्त गज़ सेना का प्रधान था।

    ➣ साधारण सैनिकों को चाट एवं भाट, अश्वसेना के अधिकारियों को हदेश्वर, पैदल सेना के अधिकारियों को बलाधिकृत एवं महाबलाधिकृत कहा जाता था।

    बाणभट्ट के अनुसार अवन्ति युद्ध और शान्ति का सर्वोच्च मंत्री था। सिंहनाद हर्ष का महासेनापति था।

    प्रशासन पदाधिकारी

    बाणभट्ट ने हर्षचरित में इन पदों की व्याख्या इस प्रकार की है-

     महाबलाधिकृतसर्वोच्च सेनापति/सेनाध्यक्ष
     बलाधिकृतसेनापति
     महासन्धि विग्रहाधिकृतसंधिरु/युद्ध करने संबंधी अधिकारी
     कटुकहस्ति सेनाध्यक्ष
     वृहदेश्वरअश्व सेनाध्यक्ष
     अध्यक्षविभिन्न विभागों के सर्वोच्च अधिकारी
     आयुक्तकसाधारण अधिकारी
     मीमांसकन्यायधीश
     महाप्रतिहारराजाप्रासाद का रक्षक
     चाट-भाटवैतनिक/अवैतनिक सैनिक
     उपरिक महाराजप्रांतीय शासक
     अक्षपटलिकलेखा-जोखा लिपिक
     पूर्णिकसाधारण लिपिक

    गुतोत्तर काल से सम्बंधित विशिष्ट शब्दावली

    महत्तर (ग्राममहत्तर) उत्तर भारतीय ग्रामीण क्षेत्रों में ग्राम प्रमुख व मुखिया लोगों का वर्ग।
    सार्थवाह व्यापारिक कारवां के नेता।
    विष्टि बाध्य श्रम या बेगार।
    कायस्थ सर्वप्रथम ‘याज्ञवल्क्य स्मृति’ में उल्लिखित दरबार से सम्बद्ध एक जाति।
    भुक्ति गुप्तकाल में प्रांत का नाम।
    विषय गुप्तकालीन जिला।
    पेठ गुप्तकालीन ग्राम समूह।
    क्षेत्र खेती के योग्य भूमि।
    वास्तु वास करने योग्य भूमि।
    सिल जो भूमि जोती नहीं जाती थी।
    अप्रहत बिना जोती गयी जंगल भूमि।
    कुटुम्बी भू-स्वामी स्वतंत्र किसान।
    सीरिन बटाई पर खेती करने वाले किसान।
    आर्थीक पाराशर स्मृति के अनुसार फसल बटाई करने वाली एक पृथक् जाति।
    अग्रहार ब्राह्मण बस्तियों को दान में दी जाने वाली भूमि।
    मेलबार गांवों की वह आय, जो मंदिरों को दी जाती थी।
    ब्रह्मदेय ब्राह्मणों को दी जाने वाली कर मुक्त भूमि।
    देवदान ब्राह्मणों को भूमि दान में देना।
    परिहार परिहार का अर्थ है-देवदान,राज्य करों से मुक्ति भूमि।
  • हूणों का आक्रमण: तोरमाण, मिहिरकुल एवं भारत पर उनका प्रभाव

    📚 विषय सूची

    हूण : मध्य एशिया की बर्बर जाति

    शासक महत्वपूर्ण तथ्य
    तोरमाण हूणों का प्रमुख शासक; उत्तर-पश्चिम भारत पर आक्रमण; गुप्त साम्राज्य के पतन को तेज किया
    मिहिरकुल सबसे शक्तिशाली हूण शासक; विनाशकारी आक्रमण; नरसिंहगुप्त बालादित्य और यशोधर्मन द्वारा पराजित

    ➣ हूण मध्य एशिया की एक बर्बर जाति थी जो मूलतः मंगोलियन थे। हूण, शक और कुषाण जातियों की ही भाँति मध्य एशिया के निवासी थे ।

    ➣ वे जीविका की खोज में पश्चिम, दक्षिण-पश्चिम और फिर दक्षिण दिशाओं में दूर-दूर तक छा गये थे। हूणों की दो शाखाएं थी- पश्चिमी शाखा एवं पूर्वी शाखा।

    ➣ पश्चिमी शाखा ने यूरोप में पहुँच कर शक्तिशाली रोम साम्राज्य का अंत कर दिया जबकि दूसरी शाखा ने पांचवीं शताब्दी ई. में भारत पर आक्रमण किया।

    ➣ हूण जाति में तोरमाण तथा उसका पुत्र मिहिरकुल दो प्रसिद्ध नेता हुए। जिसमे मिहिरकुल की मृत्यु के पश्चात् भारत से हूणों का अंत हुआ।

    ➣ दोनों का उल्लेख कल्हण की राजतरंगिणी में मिलता है।

    📌 : जूनागढ़ अभिलेख में हूणों को म्लेच्छ कहा गया है।

    भारत में हूणों का आक्रमण

    ➣ प्रथम हुण आक्रमण खुशनवाज के नेतृत्व में लगभग 455 ई. में गुप्त शासक स्कंदगुप्त के समय हुआ।

    ➣ हूणों की पूर्वी शाखा अफ़ग़ानिस्तान से होकर भारत के पश्चिमोत्तर सीमा से बढ़ते हुए तक्षशिला तक आ गए और तक्षशिला के सांस्कृतिक वैभव को और उसके विश्वविद्यालय को पूर्णतया नष्ट कर दिया।

    ➣ किन्तु तत्कालीन गुप्त शासक स्कन्दगुप्त ने इन्हें पीछे धकेल दिया। स्कन्दगुप्त के समय में हूण गान्धार से आगे नहीं बढ़ सके। इस प्रकार गुप्त साम्राज्य का वैभव उसके शासन काल में प्रायः अक्षुण्ण रहा।

    कास्मोस इन्दिकप्लेस्तेस नामक एक यूनानी ने मिहिरकुल के समय भारत की यात्रा की थी। उसने क्रिस्टचिँन टोपोग्राफ़ी नामक ग्रन्थ में लिखा हैं, की हूण भारत के उत्तरी पहाड़ी में निवास करते थे।

    तिगिन
    (गांधार का प्रथम हूण शासक)

    ख़ुशनेबाज
    (स्कंदगुप्त के शासनकाल में असफल आक्रमण)

    तोरमाण
    (स्कंदगुप्त के पश्चात सफल आक्रमण)
    प्रथम राजधानी स्यालकोट
         ↓उत्तराधिकारी
    मिहिरकुल
    (मालवा के यशोधर्मन द्वारा खदेड़ा गया)

    मिहिरकुल का कश्मीर पर कब्ज़ा
    द्वितीय राजधानी गांधार
    पुन: आक्रमण, यशोधर्मन द्वारा मारा गया
    📌: स्कंदगुप्त एशिया व यूरोप का पहला शासक था जिसने हूणों को परास्त किया था। भारत में आक्रमण करने वाले हूणों को सफेद हूण कहते थे।

    तोरमाण

    ➣ स्कंदगुप्त के शासनकाल के पश्चात हूणों का आक्रमण तोरमाण के नेतृत्व में फिर हुआ परन्तु उत्तराधिकारी आक्रमण को रोकने में असफल साबित हुए।

    ➣ इस प्रकार तोरमाण भारत विजय करने वाला वह प्रथम विदेशी शासक था, जिसने मध्य भारत तक अपना साम्राज्य स्थापित किया।

    ➣ सन् 485 तक, हूणों ने पूर्वी मालवा और मध्य भारत के बड़े हिस्सों पर कब्जा कर लिया, जहाँ उनके अभिलेख पाए गए हैं।

    पंजाब और राजस्थान जैसे मध्यवर्ती क्षेत्रपर भी उनका अधिकार हो गया। छठी शताब्दी की शुरुआत में गुप्त साम्राज्य की सीमा बहुत सीमित हो गई।

    ➣ कालांतर में उसका प्रभुत्व सम्भवत: मध्य प्रदेश, नमक की पहाड़ियों तथा मध्य भारत तक व्याप्त हो गया। अपनी विजयों के बाद उसने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की थी।

    ➣ एरण का वराह प्रतिमा अभिलेख तोरमाण के प्रथम वर्ष का अभिलेख है। इससे ज्ञात होता है कि एरण के धन्य विष्णु ने गुप्तों के स्थान पर तोरमाण की अधीनता स्वीकार कर ली थी।

    ➣ धन्य विष्णु के एरण (मालवा) के वराह प्रतिमा अभिलेख में भी तोरमाण का उल्लेख मिलता है। इसके अलावा कुरा अभिलेख में भी तोरमाण का जिक्र मिलता है। कुरा अभिलेख व तोरमाण की रजत मुद्राओं पर षाहि-जउब्ल की उपाधि मिली है।

    ➣ जैन ग्रन्थ कुवलयमाला के अनुसार तोरमाण की राजधानी चन्द्रभागा (चिनाब) नदी के किनारे पवैया थी जबकि तोरमाण के सेनापति कराल ने साकल (स्यालकोट) को अपनी राजधानी बनाया।

    ➣ तोरमाण का सुप्रसिद्ध पुत्र मिहिरकुल अथवा मिहिरगुल लगभग 502 ई. में उसका उत्तराधिकारी बना।

    मिहिरकुल

    तोरमाण के बाद उसका पुत्र मिहिरकुल शासक बना। उसका साम्राज्य भारत से बाहर अफ़ग़ानिस्तान तक विस्तृत था। व्हेनसांग के अनुसार उसकी प्रारंभिक राजधानी स्यालकोट (साकल) थी।

    ➣ ह्वेनसांग ने मिहिरकुल को पंचभारत का स्वामी कहा है एवं राजधानी साकल बताई है। पंचभारत में सम्मलित क्षेत्र हैं- पंजाब, बंगाल, कन्नौज (उत्तरप्रदेश), मिथिला (बिहार) एवं उड़ीसा।

    ➣ मिहिरकुल को बड़ा ही अत्याचारी शासक माना जाता है। ह्वेनसांग के अनुसार उसने बौद्धों पर बहुत अत्याचार किये और उनका कठोरतापूर्वक दमन किया। जैन लेखक ने मिहिरकल को दुष्टों में प्रथम कहा है।

    ➣ मिहिकुल एक कट्टर शैव था। उसने अपने शासन काल में हज़ारों शिव मंदिर बनवाये।

    ➣ मिहिरकुल ने ग्वालियर अभिलेख में अपने को शिव भक्त कहा हैं। मिहिरकुल के सिक्कों पर जयतु वृष लिखा हैं, जिसका अर्थ हैं- जय नंदी। ऐसा माना जाता है कि हूणों ने ही हर-हर महादेव का नारा दिया था।

    मंदसोर अभिलेख के अनुसार यशोधर्मन से युद्ध होने से पूर्व उसने भगवान स्थाणु (शिव) के अलावा किसी अन्य के सामने अपना सिर नहीं झुकाया था।

    मंदसौर अभिलेख से प्राप्त जानकारी के अनुसार 533ई॰ के लगभग मालवा का शासक यशोधर्मन्, हूण शासक मिहिरकुल को हरा कर उसे कश्मीर की ओर विस्थपित कर दिया था।

    ➣ इस युद्ध में कई राजाओं के साथ गुप्त शासक नरसिंह बालादित्य ने भी भाग लिया था।

    प्रारम्भिक गुप्त शासक वैष्णव धर्म के उपासक थे जबकि स्कंदगुप्त के उत्तराधिकारियों ने बौद्ध धर्म अपना लिया था। नरसिंह बालादित्य स्वंय बौद्ध अनुयायी था। जिसने अहिंसा नीति के पालन करते हुए उसे मुक्त कर दिया।

    कश्मीर में विद्रोह कर मिहिरकुल वहां का शासक बना तथा गांधार पर अपना अधिकार स्थापित किया जिसे उसने अपनी राजधानी बनाई और अजमेर की और गूँज किया।

    ➣ यशोधर्मन् को सूचना मिलने पर राजा फिर से संगठित होने लगे। अजमेर में भीषण युद्ध में मिहिरकुल मारा गया। मिहिरकुल की मृत्यु के पश्चात् भारत में हूणों अधिपत्य समाप्त होने लगा।

    ➣ मिहिरकुल ने कश्मीर में मिहिरपुर नामक नगर बसाया था। कल्हण के अनुसार मिहिरकुल ने कश्मीर में श्रीनगर के पास मिहिरेशवर नामक भव्य शिव मंदिर बनवाया था।

    • मिहिरकुल का ग्वालियर अभिलेख है। इसमें विदित है कि उसने सूर्य मन्दिर बनवाया था।
    • हरिगुप्त ने तोरमाण को जैन धर्म में दीक्षित किया था।
    • तोरमाण के छोटे ताँबे के सिक्के पंजाब व उत्तरप्रदेश से प्राप्त होते हैं।
    • हूणों ने केवल ताँबेचाँदी के सिक्के चलाए।
    • हूणों ने संस्कृत को राजभाषा बनायी।

    ➣ इस समय वर्धन या पुष्यभूति वंश (550–650 ई.) के द्वारा थानेश्वर और उसके आस-पास के इलाके पर अपना नया राज्य स्थापित किया गया।

    ➣ धीरे-धीरे बंगाल भी गुप्तों के अधिकार से बाहर हो गया और वहाँ गौड़ के एक नये राजवंश का उदय हुआ, जिसमें शशांक एक शक्तिशाली शासक हुआ। इस प्रकार भारत के एक महान साम्राज्य का अंत हो गया।

    📌 : शशांक(590–625 ई) बंगाल (गौड़ क्षेत्र) का पहला स्वतंत्र शक्तिशाली शासक था।

    ❑ उल्लेखनीय है पुष्यभूति वंश से हर्षवर्धन(बौद्ध की महायान शाखा का संरक्षक) होता है, जिसे अंतिम हिन्दू सम्राट भी कहा गया है।

    ❑ बंगाल शासक शशांक (शैव सम्प्रदाय) का अनुयायी था। यह कट्टर बौद्ध विरोधी था जिसने गया में बौधि वृक्ष को कटवा दिया था (वर्तमान में गया में, जो बौधिवृक्ष है वो चौथी पीढ़ी का है)।

    ❑ शशांक ने ही धोखे से हर्षवर्धन के बड़े भाई राज्य वर्धन की हत्या की थी, इसे कालांतर में हर्षवर्धन से परास्त होना पड़ा।

    हूण आक्रमणों का राजनीतिक प्रभाव

    हूण आक्रमणों ने भारतीय राजनीति पर गहरा और स्थायी प्रभाव डाला। इनके परिणामस्वरूप गुप्त साम्राज्य की केंद्रीय शक्ति लगभग समाप्त हो गई और लगभग 550 ईस्वी तक उसका पूर्ण पतन हो गया।

    ➣ हूण आक्रमण गुप्तोत्तर काल की राजनीतिक संरचना के निर्माण में महत्वपूर्ण सिद्ध हुए। इनके कारण राजनीतिक विखंडन बढ़ा और अनेक छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्यों के उदय का मार्ग प्रशस्त हुआ।

    ➣ गुप्त साम्राज्य के कमजोर होने के बाद कोई भी शक्ति पूरे उत्तर भारत पर स्थायी नियंत्रण स्थापित नहीं कर सकी, जिससे क्षेत्रीय राज्यों का महत्व बढ़ गया।

    गुप्त शासकों को हूणों से संघर्ष के दौरान स्थानीय शासकों और सेनापतियों की सहायता लेनी पड़ी। बदले में उन्हें भूमि अनुदान दिए गए, जिससे सामंत वर्ग का उदय हुआ और सामंतवाद को बढ़ावा मिला।

    पश्चिमोत्तर भारत (विशेषकर पंजाब और राजस्थान) हूण आक्रमणों से अधिक प्रभावित हुआ। इस अस्थिरता ने नए क्षेत्रीय राजवंशों और बाद में उभरने वाले राजपूत वंशों के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ पैदा कीं।

    ➣ यद्यपि पुष्यभूति वंश के हर्षवर्धन ने कुछ समय के लिए उत्तर भारत को पुनः एकीकृत किया, लेकिन उनका साम्राज्य स्थायी और पूर्णतः केंद्रीकृत नहीं था।

    ➣ हूण मुख्य रूप से घुड़सवार योद्धा थे। उनके आक्रमणों के बाद भारतीय सेनाओं में घुड़सवार सेना और भारी अश्वारोही सैनिकों का महत्व पहले की तुलना में काफी बढ़ गया।

    ➣ अंततः हूण भारतीय शासकों द्वारा पराजित कर दिए गए और धीरे-धीरे भारतीय संस्कृति में विलीन हो गए। बाद के समय में कुछ हूण समूहों और शासकों ने हिंदू धर्म अपनाया तथा स्थानीय राजवंशों और समाज का हिस्सा बन गए।

    प्रभाव का प्रकार विस्तार
    बौद्ध धर्म पर विनाशकारी प्रभाव मिहिरकुल ने बौद्ध विहारों, स्तूपों और मठों को बड़े पैमाने पर नष्ट किया (तक्षशिला, पेशावर, कश्मीर आदि)। इससे बौद्ध धर्म भारत में तेजी से कमजोर पड़ा।
    हिंदू धर्म का पुनरुत्थान हूण शासक बाद में हिंदू धर्म की ओर मुड़े। शिव और सूर्य पूजा को बढ़ावा मिला, जिससे पुराणिक हिंदू धर्म को नया बल मिला।
    राजपूत वंशों पर प्रभाव कई राजपूत वंशों (प्रतिहार, चौहान आदि) में हूण रक्त और योद्धा परंपरा का मिश्रण माना जाता है।
    कला और स्थापत्य पर प्रभाव गंधार कला का अंतिम पतन। बौद्ध मूर्तिकला और स्थापत्य को भारी नुकसान पहुंचा।
    सैन्य एवं घुड़सवारी संस्कृति हूणों ने भारत में उन्नत घुड़सवारी और घोड़े की तकनीक लाई, जो बाद में राजपूत संस्कृति में शामिल हुई।
    सामाजिक प्रभाव हूणों के कुछ समूह भारतीय समाज में घुल-मिल गए और क्षत्रिय वर्ण में शामिल हुए।
    धार्मिक सहिष्णुता का परिवर्तन आरंभिक क्रूरता के बाद हूण शासकों ने हिंदू मंदिरों का निर्माण भी करवाया (जैसे शिव मंदिर)।

    निष्कर्ष

    ➣ हूण आक्रमण मुख्य रूप से गुप्त साम्राज्य के पतन के सबसे बड़े कारणों में से एक थे। इन्होंने केंद्रीकृत शक्ति को समाप्त करके विखंडन, सामंतवाद और क्षेत्रीय राज्यों के युग (गुप्तोत्तर काल) की शुरुआत की।

    मालवा : यशोधर्मन (528 -543 ई. )

    ➣ यशोधर्मन अथवा यशोधर्मा को विष्णुधर्मन नाम से भी जाना जाता है इसके पिता का नाम प्रकाश वर्धन था।

    ➣ मालवा नरेश यशोधर्मा की मन्दसौर प्रशस्ति की रचना वासुल ने की। इसमें यशोधर्मन् (यशोधर्मा) द्वारा हूण शासक मिहिरकुल को परास्त करने का वर्णन है।

    ➣ इसका उत्थान एवं पतन 528 ई. से 543 ई. के बीच हुआ। सम्भवतः शासनकाल 535 ई. तक समाप्त हो गया। मंदसोर प्रशस्ति में उसे जनेन्द्र कहा गया था।

    ➣ वह औलिकर वंश से संबंधित था। उसके पूर्वजों के विषय में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।

    📌 : भारत में हूणों की सत्ता उखाड़ फैंकने का श्रेय यशोधर्मन को जाता है।

    ➣ हूणों के ऊपर विजय पाने के उपरांत यशोधर्मन् ने भानुगुप्त के पुत्र वज्र को पराजित कर उसे मार डाला। जिससे उसके पश्चिमी तथा दक्षिणी भागों से प्रधान गुप्तवंश का शासन समाप्त हो गया।

    ➣ हालाँकि परवर्ती गुप्तों का शासन मगध तथा उत्तरी बंगाल में कुछ समय बाद तक बना रहा।

    सन् 532 में लगभग पूरे उत्तर भारत में अपनी विजय की याद में यशोधर्मन ने मंदसौर में दो कीर्ति स्तम्भ स्थापित किया।

    ➣ कीर्ति स्तम्भों पर अंकित अभिलेखों के अनुसार वह ब्रह्मपुत्र से पश्चिमी समुद्र और हिमालय से त्रावनकोर प्रदेश के पश्चिमी घाट में स्थित महेन्द्रगिरि तक सम्पूर्ण भारत पर शासन करता था।

  • गुप्त काल (275-550 ई.) | Q&A Practice

    ➣ गुप्त राजवंश का इतिहास का ज्ञात किस से होता है?
    उत्तर : साहित्यिक तथा पुरातात्विक दोनों

    ➣ साहित्यिक प्रणामों में सर्वप्रथम किसका स्थान आता है?
    उत्तर : पुराण

    ➣ चौथी शताब्दी में उत्तर भारत में एक नए राजवंश का उदय हुआ, उसका क्या नाम था?
    उत्तर : गुप्तवंश

    ➣ गुप्त वंश का संस्थापक कौन था?
    उत्तर : श्रीगुप्त

    ➣ गुप्तवंश ने लगभग 300 वर्षों तक शासन किया। इनके शासन की अवधि क्या है?
    उत्तर : 319-550 ई.

    ➣ गुप्त साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक किसे माना जाता है?
    उत्तर : चंद्रगुप्त प्रथम

    ➣ प्रभावती गुप्त के पूना ताम्रपत्र अभिलेख में श्रीगुप्त को क्या कहा गया है?
    उत्तर : आदिराज

    ➣ किस विदेशी यात्री ने कहा कि श्रीगुप्त ने सारनाथ के निकट एक मंदिर बनवाया था तथा 24 गांव दान में दिये थे?
    उत्तर : इत्सिंग

    ➣ श्रीगुप्त के बाद गुप्त वंश का अगला शासक कौन बना, जिसने ‘महाराज’ की उपाधि भी ग्रहण की थी ?
    उत्तर : घटोत्कच गुप्त

    ➣ प्रभावती गुप्त के पूना एवं रिद्धपुर ताम्रपत्र अभिलेखों में घटोत्कच को गुप्त वंश का कौन-सा राजा बताया गया है?
    उत्तर : प्रथम राजा

    ➣ चन्द्रगुप्त प्रथम गुप्त वंश का तीसरा एवं प्रथम महान शासक था। इसने कौन-सी उपाधि धारण की थी?
    उत्तर : महाराजाधिराज

    ➣ फाह्यान किस गुप्तनरेश के शासनकाल में भारत आया था?
    उत्तर : चंद्रगुप्त द्वितीय (375-415 ई.)

    ➣ किस चीनी यात्री ने कुमारगुप्त प्रथम (शक्रादिव्य), बुधगुप्त, बालादित्य आदि गुप्त शासकों का उल्लेख किया है?
    उत्तर : ह्वेनसांग

    ➣ गुप्तकालीन स्वर्ण सिक्कों का सबसे बड़ा संग्रह कहां से प्राप्त हुआ है?
    उत्तर : बयाना, राजस्थान

    ➣ महरौली (दिल्ली) के लौह स्तम्भ से प्राप्त लेख में किसकी प्रशस्ति की गयी है?
    उत्तर : चन्द्रगुप्त द्वितीय

    ➣ समुद्रगुप्त की किस प्रशस्ति में उसकी विजयों की जानकारी है, जिससे गुप्त साम्राज्य के भौगोलिक विस्तार का पता चलता है ?
    उत्तर : इलाहाबाद प्रशस्ति

    ➣ कदम्ब वंश के शासक काकुष्ठवर्मन के अभिलेखों के अनुसार, उसकी पुत्री का विवाह किस वंश में हुआ था ?
    उत्तर : गुप्त वंश

    ➣ किस गुप्त शासक के सिक्कों से अश्वमेध करने की जानकारी प्राप्त होती है?
    उत्तर : कुमारगुप्त प्रथम

    ➣ चांदी की एकमात्र मुहर पायी गयी है। यह किस गुप्त शासक के काल की हैं?
    उत्तर : कुमारगुप्त द्वितीय

    ➣ वैशाली से प्राप्त मुहरों में सर्वाधिक प्रसिद्ध चन्द्रगुप्त द्वितीय की पत्नी के सिक्के हैं। उसकी पत्नी का क्या नाम था?
    उत्तर : ध्रुवदेवी या ध्रुवस्वामिनी

    ➣ चन्द्रगुप्त के कुमारदेवी सिक्कों से उनकी किस प्रस्थिति की जानकारी प्राप्त होती है?
    उत्तर : राजनैतिक प्रस्थिति

    ➣ स्थान गुप्त साम्राज्य की जानकारी प्रदान करने के लिए किस ग्रंथ को प्राप्त है?
    उत्तर : नीतिसार

    ➣ नीतिसार की रचना कामंदक ने किस गुप्त शासक के काल में की थी?
    उत्तर : चन्द्रगुप्त प्रथम

    ➣ रघुवंशम्’, ‘कुमारसंभव’, ‘मालविकाग्निमित्रम्’, ‘मेघदूतम्’ तथा ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’ से प्रकृति, प्रेम, समाज, प्रशासन, धर्म और राजनैतिक इतिहास की जानकारी प्राप्त होती है। ये रचनाएं किसकी हैं?
    उत्तर : कालिदास

    ➣ महाकवि कालिदास को किस काल विभूति माना जाता है ?
    उत्तर : गुप्त काल

    ➣ चन्द्रगुप्त प्रथम ने लिच्छवी राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह कर दहेज में कौन-सा राज्य प्राप्त किया था?
    उत्तर : वैशाली राज्य

    ➣ चन्द्रगुप्त प्रथम ने अपने राज्यारोहण की स्मृति में 319-20 ई. में किस संवत् की शुरुआत की ?
    उत्तर : गुप्त संवत्

    ➣ प्रयाग प्रशस्ति के अनुसार, चन्द्रगुप्त प्रथम ने अपने राज्यकाल में ही किसको अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया था ?
    उत्तर : समुद्रगुप्त को ( 335-380 ई.)

    ➣ समुद्रगुप्त के ‘प्रयाग प्रशस्ति’ में कोसल के शासक का क्या नाम था?
    उत्तर : महेन्द्र

    ➣ किस गुप्त शासक ने ‘धरणिबन्ध’, ‘सम्पूर्ण पृथ्वी को जीतने वाला’ और ‘पृथिव्या प्रथम वीर’ की उपाधि ग्रहण की?
    उत्तर : समुद्रगुप्त ने

    ➣ किसके द्वारा रचित इलाहाबाद स्तम्भ अभिलेख में समुद्रगुप्त की विजयों का वर्णन किया गया है?
    उत्तर : हरिसेण

    ➣ समुद्रगुप्त शासन के आधार के लिए कौन-सी नीति अपनाई थी?
    उत्तर : हिंसा एवं आक्रमण की नीति

    ➣ समुद्रगुप्त के सिक्कों से सैनिक गतिविधियों की जानकारी प्राप्त होती है?
    उत्तर : समुद्रगुप्त

    ➣ एक सिक्के में समुद्रगुप्त को कौन-सा वाद्य यंत्र बजाते हुए दिखाया गया है?
    उत्तर : वीणा

    ➣ किस गुप्त सम्राट के सिक्कों पर ‘अश्वमेध पराक्रम खुदा है?
    उत्तर : समुद्रगुप्त

    ➣ किस गुप्त शासक को ‘कविराज’ कहा जाता था?
    उत्तर : समुद्रगुप्त

    ➣ किसके भितरी अभिलेख में तथा प्रभावती गुप्ता के पूना ताम्र लेख में समुद्रगुप्त को अनेक अश्वमेध यज्ञों को करने वाला कहा गया है?
    उत्तर : स्कंदगुप्त

    ➣ चीनी स्रोतों के अनुसार, श्रीलंका के किस राजा ने उपहार भेजकर समुद्रगुप्त से गया में एक बौद्ध मंदिर बनाने की अनुमति मांगी थी?
    उत्तर : राजा मेघवर्मन

    ➣ समुद्रगुप्त ने किसको अपनी राजधानी बनाया ?
    उत्तर : पाटलिपुत्र

    ➣ इतिहासकार विंसेंट स्मिथ ने समुद्रगुप्त को क्या कहकर संबोधित किया है?
    उत्तर : भारत का नेपोलियन

    ➣ समुद्रगुप्त के बाद उसका बड़ा पुत्र गुप्तवंश का अगला शासक बना, किंतु वह एक अयोग्य शासक था। उसका क्या नाम था ?
    उत्तर : रामगुप्त

    ➣ विशाखदत्त के किस ग्रंथ से शक शासक द्वारा रामगुप्त की पराजय एवं चन्द्रगुप्त द्वितीय द्वारा दोनों की हत्या कर राज्यारोहण तथा ध्रुव देवी (रामगुप्त की पत्नी) से विवाह का वर्णन है ?
    उत्तर : देवीचन्द्रगुप्तम्

    ➣ रामगुप्त के छोटे भाई का क्या नाम था?
    उत्तर : चन्द्रगुप्त द्वितीय

    ➣ चन्द्रगुप्त द्वितीय की माता का नाम क्या था?
    उत्तर : रानी (महिषी) दत्त देवी

    ➣ चन्द्रगुप्त द्वितीय का दूसरा नाम क्या था ?
    उत्तर : देवराज या देवगुप्त

    ➣ चन्द्रगुप्त द्वितीय ने विक्रमांक, विक्रमादित्य, परमभागवत आदि उपाधियां धारण कीं। इसलिए उसका प्रसिद्ध नाम क्या है?
    उत्तर : चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य

    ➣ चन्द्रगुप्त द्वितीय ने किन तीन राजवंशों से वैवाहिक संबंध स्थापित किये?
    उत्तर : वाकाटक, नागवंश एवं कदम्ब राजवंश

    ➣ चन्द्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती गुप्त का विवाह वाकाटक वंश के किस शासक से हुआ था?
    उत्तर : रुद्रसेन द्वितीय

    ➣ चन्द्रगुप्त द्वितीय ने किस शक शासक को पराजित कर ‘शकारि’ एवं ‘विक्रमादित्य’ का विरुद धारण किया?
    उत्तर : रुद्रसिंह तृतीय

    ➣ शकों पर विजय के परिणामस्वरूप पश्चिमी समुद्र तट के किस प्रसिद्ध बन्दरगाह पर चन्द्रगुप्त द्वितीय का नियंत्रण स्थापित हो गया?
    उत्तर : भृगुकच्छ

    ➣ शकों पर विजय के परिणामस्वरूप चन्द्रगुप्त द्वितीय ने किस धातु के विशेष सिक्के जारी किए ?
    उत्तर : चांदी

    ➣ किन पुराणों से पता चलता है कि चन्द्रगुप्त द्वितीय ने कांसल, पुंडू (बंगाल) तथा ताम्रलिप्ति तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया?
    उत्तर : विष्णु पुराण और वायु पुराण

    ➣ दिल्ली में महरौली के कुतुबमीनार के पास स्थित किस स्तम्भ पर ‘चन्द्र’ नाम उत्कीर्ण है, जिसे ‘चन्द्रगुप्त द्वितीय’ माना जाता है?
    उत्तर : लौह स्तम्भ

    ➣ 399 ई. में किस गुप्त शासक के समय में चीनी बौद्ध यात्री फाह्यान भारत आया?
    उत्तर : चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य

    ➣ विदेशी यात्री फाह्यान भारत में कितने समय तक रहा ?
    उत्तर : 15 वर्ष ( 399 – 414 ई. )

    ➣ चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के समय में कौन क्षेत्र विद्या के प्रमुख केन्द्र थे?
    उत्तर : पाटलिपुत्र एवं उज्जयिनी

    ➣ चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने किस नगर को अपनी दूसरी राजधानी बनाया ?
    उत्तर : उज्जयिनी

    ➣ राजशेखर कृत पुस्तक के मुताबिक उज्जयिनी में कवियों की परीक्षा लेने के लिए एक विद्वानों की परिषद थी?
    उत्तर : काव्यमीमांसा

    ➣ चन्द्रगुप्त द्वितीय का सेनापतिं आम्रकार्दव किस धर्म को मानता था?
    उत्तर : बौद्ध धर्म

    ➣ चन्द्रगुप्त द्वितीय का कौन सा पुत्र उसका उत्तराधिकारी बना और गुप्त साम्राज्य का एक महान शासक साबित हुआ?
    उत्तर : कुमारगुप्त प्रथम

    ➣ कुमारगुप्त प्रथम की माता का क्या नाम था ?
    उत्तर : ध्रुवदेवी

    ➣ कुमारगुप्त प्रथम लगभग कितने वर्षों तक का शासन किया?
    उत्तर : 40 वर्षों तक (415-455 ई.)

    ➣ किस गुप्त शासक को महेंद्रादित्य, श्रीमहेन्द्र, अजितमहेंद्र, महेंद्रात्य, महेंद्रकुमार आदि नाम से भी जाना जाता है?
    उत्तर : कुमारगुप्त प्रथम

    ➣ कुमारगुप्त प्रथम के शासनकाल की जानकारी भितरी अभिलेख, भिल्साद स्तम्भ अभिलेख,

    ➣ गढ़वा अभिलेख, मनकुवार मूर्ति अभिलेख आदि से मिलती है। उसने

    ➣ गुप्त शासकों में सर्वाधिक अभिलेख किस गुप्त शासक ने जारी किये?
    उत्तर : कुमारगुप्त प्रथम (18)

    ➣ किस गुप्त शासक ने ही नालन्दा बौद्ध विहार और नालन्दा विश्वविद्यालय की स्थापना की थी ?
    उत्तर : कुमारगुप्त प्रथम

    ➣ नालंदा विश्वविद्यालय किसलिए विश्व प्रसिद्ध था?
    उत्तर : बौद्ध धर्म दर्शन

    ➣ चन्द्रगुप्त द्वितीय ने अपने पुत्र कुमारगुप्त प्रथम का विवाह किस वंश के शासककाकुत्सवर्मन की पुत्री के साथ किया?
    उत्तर : कदम्ब वंश

    ➣ गुप्त शासकों में सर्वाधिक स्वर्ण मुद्राएं किस गुप्त शासक ने जारी किये?
    उत्तर : कुमारगुप्त प्रथम

    ➣ कुमारगुप्त प्रथम ने अपनी मुद्राओं में गरुड़ के स्थान पर किस पक्षी का चित्र अंकित करवाया?
    उत्तर : मयूर

    ➣ स्कन्दगुप्त के भितरी अभिलेख से प्राप्त जानकारी के मुताबिक कुमारगुप्त को अपने शासन के अन्तिम समय में किन जातियों के विद्रोह का सामना करना पड़ा?
    उत्तर : पुष्यमित्र और हूण

    ➣ कुमारगुप्त के पुत्र स्कन्दगुप्त ने शकों तथा हूणों हराकर कौन-सी उपाधि धारण की थी?
    उत्तर : शकरादित्य

    ➣ गुप्त शासकों किन विदेशी आक्रमणकारियों ने भारत पर आक्रमण किया, जिससे गुप्त साम्राज्य कमजोर हो गया और उसका पतन होने लगा ?
    उत्तर : हूणों ने

    ➣ कांचीपुरम के पल्लवों का राज्य हर्षवर्धन के राज्य की राजधानी कहां स्थित थी ?
    उत्तर : कन्नौज

    ➣ गुप्तवंश के राजाओं ने किस धर्म को राजकीय संरक्षण दिया था?
    उत्तर : वैष्णव धर्म

    ➣ गुप्तवंश के किस राजा ने बौद्ध धर्म अपना लिया था ?
    उत्तर : नृसिंहगुप्त बालादित्य (463-473 ई.)

    ➣ जूनागढ़ अभिलेख के मुताबिक किस गुप्त शासक ने गिरनार पर्वत पर स्थित सुदर्शन झील का पुनरुद्धार करवाया?
    उत्तर : स्कंदगुप्त

    ➣ किसने सुदर्शन झील के तट पर विष्णु की मूर्ति स्थापित करवायी ?
    उत्तर : चक्रपालित

    ➣ गुप्तवंश का अंतिम प्रतापी कौन राजा था?
    उत्तर : स्कंदगुप्त

    ➣ गुप्तवंश कब और किसके शासनकाल में समाप्त हो गया?
    उत्तर : 550 ई. में विष्णुगुप्त के शासनकाल में

    प्रशासन, समाज, अर्थव्यवस्था

    ➣ गुप्त प्रशासन में राजा को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था। उसे क्या कहा जाता था?
    उत्तर : धर्मप्रवर्तक

    ➣ गुप्त युग में रानियां भी शासन कार्य में सहयोग देती थीं, जिसका प्रमाण किसके शासन से मिलता है?
    उत्तर : कुमारदेवी और प्रभावती गुप्त

    ➣ गुप्त युग में राज्य सभा के सदस्यों को क्या कहा जाता था?
    उत्तर : संभय

    ➣ समुद्रगुप्त के शासन काल में किसको एक ही साथ कुमारामात्य, संधिविग्राहिक एवं महादंडनायक का विभाग मिला हुआ था?
    उत्तर : हरिषेण

    ➣ गुप्तकाल में पुलिस विभाग के मुख्य अधिकारी को क्या कहा जाता था?
    उत्तर : दण्डपाशिक

    ➣ पुलिस विभाग के साधारण कर्मचारियों को क्या कहते थे?
    उत्तर : ‘चास्ट’ और ‘भास्ट’

    ➣ गुप्त साम्राज्य अनेक प्रांतों में विभक्त था। प्रांतों को देश, भुक्ति या अवनी कहा जाता था। ‘भुक्ति’ के अधिकारी को क्या कहा जाता था?
    उत्तर : उपरिक

    ➣ सीमा प्रांतों के प्रशासक को क्या कहा जाता था?
    उत्तर : गोप्ता

    ➣ गोप्ता अधिकारियों की नियुक्ति कितने वर्ष के लिए की जाती थी?
    उत्तर : पांच वर्ष

    ➣ गुप्तकाल में प्रांतों को जिलों में बांटा जाता था, जिसे ‘विषय’ कहा जाता था। विषय का प्रधान अधिकारी क्या कहलाता था?
    उत्तर : विषयपति

    ➣ विषयपति की नियुक्ति कौन करते थे?
    उत्तर : उपरिक

    ➣ गुप्त काल में प्रशासन की सबसे छोटी इकाई क्या थी?
    उत्तर : ‘ग्राम

    ➣ गुप्त काल में ग्राम का प्रशासन किसके द्वारा संचालित होता था?
    उत्तर : ग्राम सभा

    ➣ गुप्त राजाओं ने सर्वाधिक मात्रा में सोने के सिक्के जारी किये, परंतु सर्वाधिक शुद्ध सोने के सिक्के किसके थे?
    उत्तर : कुषाणों के

    ➣ गुप्तकालीन स्वर्ण मुद्राओं को अभिलेखों में कहा गया है ?
    उत्तर : दीनार

    ➣ मृच्छकटिकम् के अनुसार, चारुदत्त नामक ब्राह्मण क्या था ?
    उत्तर : सार्थवाह

    ➣ मालवा के शासक किस वर्ण के थे?
    उत्तर : शुद्र

    ➣ ह्वेनसांग ने शूद्रों को कृषि कार्य में संलग्न बताया था। किस काल में शूद्रों को रामायण, महाभारत एवं पुराण सुनने का अधिकार प्राप्त था?
    उत्तर : गुप्त काल

    ➣ गुप्त काल में किस एक नवीन जाति का उदय हुआ, जिनका (कायस्थों) कार्य लेखाकरण, गणना, आय-व्यय और भूमि कर से संबंधित था ?
    उत्तर : कायस्थ

    ➣ कायस्थों का प्रथम उल्लेख किस ग्रंथ में मिलता है याज्ञवल्क्य स्मृति

    ➣ गुप्त काल में किसने सर्वाधिक 15 प्रकार के दासों का वर्णन किया है?
    उत्तर : नारद

    ➣ इतिहास सती होने का प्रथम प्रमाण 510 ई. के भानुगुप्त के किस अभिलेख से प्राप्त होता है?
    उत्तर : एरण अभिलेख

    ➣ गुप्त शासक मुख्यतः किस धर्म के अनुयायी थे?
    उत्तर : वैष्णव धर्म

    ➣ चन्द्रगुप्त द्वितीय एवं समुद्रगुप्त ने किस प्रकार की आकृति के सिक्के जारी किये?
    उत्तर : विष्णु के वाहन गरुड़ की आकृति

    ➣ गुप्त राजाओं का राजकीय चिह्न क्या था?
    उत्तर : गरुड़

    ➣ चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का सेनापति वीरसेन किस धर्म का अनुयायी था?
    उत्तर : शैव धर्म

    ➣ शिव के अर्द्धनारीश्वर रूप की कल्पना एवं शिव और पार्वती की मूर्तियों का एक साथ निर्माण किस काल में आरम्भ हुआ?
    उत्तर : गुप्त काल

    ➣ शैव एवं वैष्णव धर्म के समन्वय के फलस्वरूप किसकी मूर्तियों का निर्माण गुप्त युग में आरम्भ हुआ?
    उत्तर : हरिहर

    ➣ किस रूप में ब्रह्मा ( सर्जक), विष्णु (पालक) एवं महेश ( संहारक) की पूजा गुप्त काल में प्रारम्भ हुई ?
    उत्तर : त्रिमूर्ति के रूप में

    ➣ फाह्यान एवं ह्वेनसांग के विवरणों के अनुसार, गुप्त काल में कौन-सा उन्नत अवस्था में था, क्या गुप्त शासकों ने बौद्ध धर्म को राजकीय संरक्षण प्रदान किया?
    उत्तर : नहीं

    ➣ गुप्त काल में जैन धर्म का भी विकास हुआ। गुप्त काल में ही किन दो नगरों में जैन सभाएं एक साथ आयोजित की गयीं?
    उत्तर : मथुरा और वल्लभी

    ➣ षड्दर्शन अर्थात सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, पूर्व मीमांसा एवं उत्तर – मीमांसा की रचना किस काल में हुई?
    उत्तर : गुप्त काल

    ➣ गुप्त काल में मंदिर निर्माण किन शेलियों का विकास हुआ?
    उत्तर : नागर एवं द्रविड़ शैली

    ➣ गुप्तों के मंदिर किस शैली में बनाये जाते थे?
    उत्तर : नागर शैली

    ➣ गुप्त काल को श्रेष्ठ कवियों का काल माना जाता है, जिनमें मुख्य हैं- कालिदास,

    ➣ गुप्त काल को संस्कृत साहित्य की दृष्टि से कौन-सा युग कहा जाता है?
    उत्तर : स्वर्ण युग

    ➣ लौकिक साहित्य की रचना भी संस्कृत भाषा में ही हुई।

    ➣ समुद्रगुप्त के सन्धिविग्रहिक ‘हरिषेण’ द्वारा रचित ‘प्रयाग प्रशस्ति’ संस्कृत भाषा की किस शैली का प्रथम उदाहरण चम्पू शैली (गद्य और पद्य का मिश्रित रूप)

    ➣ गुप्त शासकों की सरकारी (दरबारी) भाषा क्या थी?
    उत्तर : संस्कृत

    ➣ किस शासक वंश ने मंदिरों एवं ब्राह्मणों को सबसे अधिक ग्राम अनुदान में दिया था?
    उत्तर : गुप्त वंश

    ➣ ‘प्रशस्ति’ का क्या तात्पर्य है?
    उत्तर : राज प्रशंसा

    ➣ प्राचीनकाल में किस वर्ण को ‘सार्थवाह’ भी कहा जाता था?
    उत्तर : वैश्य

    ➣ चीनी यात्री ‘मूंग यून’ भारत कब आया ?
    उत्तर : 518

    ➣ मानव जाति के इतिहास में दूसरी महत्वपूर्ण खोज किसे माना जाता है?
    उत्तर : लोहा

    ➣ हूण राजा तोरमाण किस औलिकार राजा द्वारा पराजित किया गया था ?
    उत्तर : प्रकाशधर्मन

    ➣ कौन-सा राजवंश हूणों के आक्रमण से अत्यंत विचलित हुआ?
    उत्तर : गुप्त राजवंश

Share This Page