Subject: भारतीय इतिहास

  • शैव धर्म : भगवान शिव, तपस्या और भक्ति परंपर

    📚 विषय सूची

    ➣ शिव से संबंधित धर्म को शैव धर्म कहा गया है तथा शिव के उपासक को शैव कहा जाता है।

    ऋग्वेद में शिव को रुद्र कहा गया है, जो अपनी उग्रता के लिए प्रसिद्ध हैं। रुद्र को समस्त लोकों का स्वामी वाजसनेयी संहिता के शतरुद्रीय मंत्र में कहा गया है जबकि अथर्ववेद में उन्हें पशुपति, भव, शर्व, भूपति आदि कहा गया है।

    ➣ शिव को समर्पित महामृत्युंजय मंत्र का वर्णन भी ऋग्वेद में है। श्वेताश्वर उपनिषद् में सर्वप्रथम शिव स्तुति का उल्लेख है।

    ➣ शिव का अभिप्राय मंगलमय होना है। लिंग के रूप में शिव की व्यापक स्तर पर पूजा होती है। महाभारत के अनुशासन पर्व तथा मत्स्यपुराण में शिव लिंग पूजा का उल्लेख है।

    ➣ पुराणों ने सम्पूर्ण सृष्टि की पहचान शिव के साथ उसके पांच रूपों तत्पुरुष, नामदेव, अघोरेश, साधोजात एवं इशान की अवधारणा के माध्यम से की है।

    ➣ शिव के 11 रुद्र अवतार हैं-कपिल, पिंगल, भीम, विरुपाक्ष, विलोहित, शास्त्र, अजपाद, अहिरबुधन्य, शम्भू, चाँद तथा भाव।

    दक्ष प्रजापति यज्ञ कथा का सम्बन्ध शिव से है, जिसमें उन्होंने वीरभद्र एवं भद्रकाली नामक गणों का निर्माण कर दक्ष के यज्ञ का विध्वंश किया।

    ➣ लिंग पूजा का प्रथम उल्लेख मत्स्य पुराण तथा फिर महाभारत के अनुशासन पर्व में हुआ।

    कौषीतिकी ब्राह्मण एवं शतपथ ब्राह्मण में शिव के आठ रूपों का उल्लेख है। चार संहारक तथा चार सौम्य रूप हैं।

    ➣ मेगस्थनीज ने शिव का उल्लेख डायोनिसस नाम से किया है। ऐतिहासिक रूप से शिव की पूजा का उल्लेख सर्वप्रथम मेगस्थनीज ने किया।

    ➣ शिव के दो पुत्र हैं – कार्तिकेय, गणेश।

    1. कार्तिकेय: ज्येष्ठ पुत्र

    ➣ इनको देवताओ का सेनापति एवं युद्ध का देवता कहा जाता है।


    उपनाम: स्कन्द, कुमार, महासेन, विशाख, षडानन
    वाहनः मयूर
    पत्नी : अविवाहित

    ➣ कार्तिकेय का तादात्म्य दक्षिण के लोकप्रिय देवता मुरूगन से किया जात है।

    ➣ इनकी पूजा मुख्यत: भारत के दक्षिणी राज्यों और विशेषकर तमिलनाडु में होती है। इसके अतिरिक्त विश्व में श्रीलंका, मलेशिया, सिंगापुर आदि में भी इन्हें पूजा जाता है।

    2. गणेश : अनुज पुत्र

    ➣ इनको मन्दिर का देवता और बुद्धि देवता माना जाता था। तिब्बती बौद्ध अपने मंदिरों में गणेश की पूजा करते है।
    उपनाम: गणपति, गजानन, आदिपूज्य, लंबोदर
    वाहनः मूषक
    पत्नी: 1. रिद्धि, 2. सिद्धि
    पुत्रः 1. शुभ, 2. लाभ

    श्री गणेश का अर्थ है – आरंभ करना। हिन्दू धर्म में विद्या आरम्भ तथा विवाह के समय गणपति की पूजा की जाती है।

    सम्बंधित तथ्य

    ➣ शिव का संबंध प्रागैतिहासिक युग तक रहा है। सिंधुवासी शिव की पूजा करते थे। इसका प्रमाण मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मुद्रा है, जिस पर योगी की आकृति बनी है।

    ➣ योगी के सिर पर एक त्रिशुल जैसा आभूषण है तथा इसके तीन मुख हैं। तत्कालीन पुरातत्व विभाग के महानिदेशक मार्शल ने इसे शिव से संबंधित किया है।

    उत्तर वैदिक काल में तैत्तिरीय संहिता में इनका नाम शिव प्राप्त होता है।

    ➣ शिव की प्राचीनतम मूर्ति पहली शताब्दी ई. में प्रसिद्ध गुडिमल्लम लिंग के रूप में रेणु गुंटा, मद्रास के निकट प्राप्त हुई।

    पाणिनि के 14 सूत्र महादेव के डमरू से उत्पन्न माना जाता है।

    ➣ अशोक का पौत्र जालौक (कश्मीर का शासक ) शैव धर्म का अनुयायी था। बौद्ध धर्म अपनाने से पहले अशोक भी शैव मतानुयायी था।

    मौर्योत्तर काल में कुषाण शासक विम कडफिसस की मुद्राओं पर त्रिशूलधारी शिव और नन्दी के चित्र का अंकन मिलता है तथा पृष्ठ भाग पर महेश्वर।

    ➣ कुषाण शासकों के सिक्कों पर शिव, वृषभ और त्रिशूल की आकृतियां मिलती हैं। उदयगिरि गुहालेख से पता चलता है कि चंद्रगुप्त द्वितीय के प्रधानमंत्री वीरसेन ने उदयगिरि पहाड़ी पर एक शैव गुफा का निर्माण करवाया था।

    पतंजलि के महाभाष्य से पता चलता है कि दूसरी सदी ईसा पूर्व में शिव की मूर्ति बनाकर पूजा की जाती थी। महाभाष्य में शिव के विभिन्न नामों का उल्लेख मिलता है। ये प्रमुख नाम हैं-रुद्र, महादेव,गिरीश, भव, सर्व, त्र्यम्बक आदि।

    कुमारगुप्त के समय में खोह तथा करमदंडा में शिवलिंग की स्थापना करवाई गई थी। गुप्त काल में ही नचनाकुठार में पार्वती मंदिर तथा भूमरा में शिव मंदिर का निर्माण करवाया गया था।

    अर्द्धनारीश्वर की मूर्ति का निर्माण एवं पूजा गुप्तकाल में प्रारम्भ हुई। ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश (शिव) की त्रिमूर्ति का निर्माण भी गुप्तकाल में हुआ।

    समुद्रगुप्त के समय की प्रयाग प्रशस्ति में शिव की जटा से गंगा के निकलने का उल्लेख मिलता है।

    619 ई. से पहले हर्षवर्धन (बाद में बौद्ध धर्म), गौड़ नरेश शशांक और कामरूप के भास्करवर्मा शैव धर्म के उपासक थे।

    ➣ कालिदास ने कुमारसम्भवम् में शिव की महिमा का गुणगान किया है।

    ➣ चंदेल शासकों द्वारा खजुराहो का प्रसिद्ध कंदारिया महादेव मंदिर निर्मित कराया गया था।

    ➣ राष्ट्रकूटों के समय में एलोरा का प्रसिद्ध कैलाश मंदिर निर्मित कराया गया था।

    ➣ पल्लव काल में शैव धर्म का प्रचार-प्रसार दक्षिण भारत में नयनारों द्वारा किया गया था। उल्लेखनीय है शैवमत के भावनात्मक पक्ष का प्रचार नायनारों द्वारा किया गया जबकि उसके सैद्धान्तिक पक्ष को शैव बुद्धिजीवियों (आचार्यों) ने पूर्ण किया। जो अगमनत, शुद्ध तथा वीरशैव जैसे शैव आंदोलन के रूपों से संबंधित थे।

    ➣ नयनार संतों की संख्या 63 है। इनमें तिरुज्ञान, सुंदर मूर्ति, सम्बन्दर, अप्पार, मणिक्कवाचगर आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इनके भक्तिगीतों को एक साथ देवारम में संकलित किया गया है।

    ➣ दक्षिण भारत में चोल शासक शिव के अनन्य उपासक थे। चोल शासक राजराज प्रथम ने तंजौर में राजराजेश्वर मंदिर निर्मित करवाया था। उसने बृहदीश्वर अथवा राजराजेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया था।

    कुलोतुंग प्रथम एक कट्टर शैव था। इसने शिव के प्रति अतिशय श्रद्धा के कारण चिदंबरम मंदिर में स्थापित विष्णु की प्रतिमा को उखाड़ कर समुद्र में फेंकवा दिया था।

    ➣ परमारवंश के राजा भोज द्वारा रचित पुस्तक तत्वपरीक्षा शैवधर्म से संबंधित है।

    पाल, चंदेल एवं सेन वंश के ज्यादातर अभिलेख ओम नमः शिवाय नामक मंत्र से प्रारंभ होते हैं।

    चंदेल राजा विद्याधर ने कंदरिया महादेव मंदिर का निर्माण महमूद गजनवी पर अपनी विजय के उपलक्ष्य में करवाया था।

    ➣ गुजरात स्थित सोमनाथ मंदिर, जो शिव को समर्पित है , को महमूद गजनवी द्वारा नष्ट करने के बाद परमार शासक भोज एवं अन्हिलवाड़ के चालुक्य शासक कुमारपाल ने इसका पुनर्निर्माण करवाया।

    सम्बन्दर नामक नयनार ने जैनियों को मदुरा में वाद-विवाद में हराकर राजा समेत प्रजा को शैव धर्म में दीक्षित किया तथा 8000 जैनियों को शूली पर चढ़वा दिया था।

    शैव धर्म के प्रमुख सम्प्रदाय

    ➣ वामन पुराण में शैव मत के 4 सम्प्रदायों का उल्लेख है। ये हैं- 1. शैव 2. पाशुपत 3. कापालिक, 4.कालामुख।

    1. शैव सम्प्रदाय : शैव धर्म की प्रमुख परंपरा

    ➣ शैव सम्प्रदायों का प्रथम उल्लेख पतंजलि के महाभाष्य में शिव भागवत नाम से हुआ।

    ➣ इस सम्प्रदाय के अनुसार कर्त्ता शिव हैं, कारण शक्ति और उपादान बिन्दु हैं।

    ➣ इस मत के चार पाद या पाश (बन्धन) हैं- विद्या, क्रिया, योग और चर्या। तीन पदार्थ हैं:-1. पति (शिव) 2. पशु (जीव) 3. पाश (बन्धन)।

    2.पाशुपत सम्प्रदाय : शैव धर्म का प्राचीन संप्रदाय

    ➣ यह शैवों का सबसे प्राचीन सम्प्रदाय है, जिसकी उत्पत्ति ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में हुई। वायु पुराण और लिंग पुराण से पता चलता है कि इस सम्प्रदाय का संस्थापक लकुलीश अथवा लकुली नामक ब्रह्मचारी था।

    ➣ इनका जन्म स्थान कायावरोहण (गुजरात) था।पुराणों के अनुसार, इस संप्रदाय की स्थापना इस संप्रदाय के अनुयायी लकुलीश को शिव का अवतार मानते हैं।

    ➣ पाशुपतों का प्रमुख ग्रन्थ पाशुपत सूत्र है, जो महेश्वर द्वारा रचित है।

    लकुलीश ने पंचार्थ विद्या या पंचाध्यायी नामक ग्रंथ की रचना की थी। इस मत के अनुयायी पंचार्थिक कहे जाते थे।

    ➣ पाशुपत संप्रदाय का मुख्य संबंध अनुष्ठान एवं अनुशासन से है। इस सम्प्रदाय के लोग हाथ में एक लगुड़ या दंड धारण करते थे। इसका अंतिम लक्ष्य शिव के साथ अन्तरविलीन होना है जिससे सभी प्रकार के दुःख एवं परेशानियों से मुक्ति प्राप्त होना है।

    ➣ लकुलीश की अनेक मूर्तियां प्राप्त हुई है, जिनमें एक ग्वालियर के तेली मंदिर में है।

    ➣ इस सम्प्रदाय का प्राचीनतम अंकन कुषाण शासक हुविष्क के सिक्कों पर पाशुपत सम्प्रदाय का सर्वप्रथम उल्लेख मिलता है।

    चन्द्रगुप्त-II कालीन मथुरा लेख में उदिताचार्य नाम एक पाशुपत मतानुयायी का उल्लेख है। जिसने दो लिंगों की स्थापना करवाई थी।

    बाणभट्ट ने कादम्बरी में इस सम्प्रदाय का उल्लेख किया है।

    ➣ नेपाल के काठमाण्डु स्थित पशुपतिनाथ मंदिर इस सम्प्रदाय का केंद्र है।

    पाशुपत सम्प्रदाय का प्राचीनतम अंकन कुषाण शासक हुविष्क के सिक्कों पर हुआ है।

    ➣ कुमारगुप्त प्रथम के करमदण्ड अभिलेख में उसके मंत्री पृथ्वीसेन द्वारा पृथ्वीश्वर नामक शिवलिंग की स्थापना का उल्लेख है।

    3. कापालिक सम्प्रदाय : तांत्रिक शैव परंपरा का परिचय

    ➣ कापालिक संप्रदाय के इष्टदेव भैरव थे। उपासक भैरव को शिव का अवतार मानकर उनकी उपासना करते थे।

    कापालिक सम्प्रदाय एवं कालामुख सम्प्रदाय चिरादम योग पद्धति में विश्वास करते थे।

    ➣ कापालिक संप्रदाय आसुरी प्रवृति का था। इस मत के अनुयायी सुरा का सेवन करते हैं एवं मांस खाते हैं, शरीर पर श्मशान की भस्म लगाते हैं तथा हाथ में नरमुंड धारण करते हैं। इसमें भैरव को नरबलि दी जाती थी।

    ➣ भवभूति के मालतीमाधव नाटक से पता चलता है कि श्रीशैल (हिमालय) नामक स्थान कापालिकों का प्रमुख केंद्र था।

    ➣ संगम साहित्य मणिमेखलै में कापालिकों का वर्णन कट्टर शैव के रूप में हुआ है।

    ➣ भवभूति के मालतीमाधव एवं हाल की गाथा सप्तशती नामक पुस्तकों में कापालिकों पर व्यंग्य किया है।

    4. कालामुख सम्प्रदाय : शैव साधना और मान्यताएँ

    ➣ कालामुख का शाब्दिक अर्थ काले मुख वाले है। इस सम्प्रदाय के अनुयायी आदिवादी व भयंकर प्रकृति के थे। अतिमार्गी होने के कारण ही शिवपुराण में उन्हें महाव्रतधर कहा गया है।

    ➣ इस सम्प्रदाय के लोग नर-कपाल में भोजन, जल, सुरापान करतेशरीर पर भस्म लगाते थे।

    ➣ कालामुखों का प्रमुख केन्द्र बेलगाँव का केदारेश्वर मन्दिर था ।

    5. लिंगायत सम्प्रदाय : वीरशैव आंदोलन और सिद्धांत

    ➣ शैव धर्म का ही एक संप्रदाय लिंगायत अथवा वीर शैव था। यह दक्षिण भारत में प्रचलित था। इसके उपासक लिंगायत या जंगम कहलाते हैं।

    ➣ लिंगायत संप्रदाय के प्रवर्तक अल्लप्रभु एवं उनके शिष्य बसव (बासव राज) थे। ये कलुचरि शासक विज्जल के मंत्री थे। वास्तविक संस्थापक बसव थे।

    वसव पुराण में लिंगायत सम्प्रदाय के प्रर्वतक अल्लभप्रभु तथा उनके शिष्य वासव को बताया गया हैं। कुछ इतिहासकार एकांत रमैया को इस सम्प्रदाय का संस्थापक मानते हैं।

    ➣ इस सम्प्रदाय के उपासक शिवलिंग की आराधना करते थे एवं उसे चांदी के सम्पुट (डिबिया) में रखकर अपने गले में धारण करते थे।

    ➣ बसव को कुडाल संगम देव तथा नन्दी का अवतार कहा जाता है।

    अक्का महादेवी इस सम्प्रदाय में महिला संत थी।

    ➣ फ्लीट महोदय के अनुसार लिंगायत संप्रदाय की स्थापना एकान्त रामय्या ने की।

    ➣ लिंगायत संप्रदाय के आदि आचार्य रेणुक, दारूण, घंटाकर्ण तथा विश्वकर्ण हुए। इन आचार्यों की संतवाणी वचनशास्त्र नामक कन्नड़ ग्रन्थ में संकलित है।

    ➣ लिंगायत सम्प्रदाय इस्लाम से प्रभावित है। यह सम्प्रदाय मूर्ति-पूजा, पुनर्जन्म, वेद, यज्ञ-कर्मकाण्ड, ब्राह्मण एवं जैन विरोधी था। इन्होंने जैन धर्म को मैसूर से उन्मूलित कर दिया।

    ➣ लिंगायत दाह-संस्कार के विरोधी थे। इसलिए ये दफनाए जाते हैं।

    ➣ लिंगायत 63 नयनारों को अपना प्राचीनतम् गुरू मानते हैं।

    ➣ लिंगायत चाँदी का सम्पुट गले में धारण करते हैं।

    6. कश्मीरी शैव सम्प्रदाय : अद्वैत शैव दर्शन का परिचय

    कश्मीर में शैव धर्म का एक सम्प्रदाय विकसित हुआ। इस मत के संस्थापक वसुगुप्त थे।

    ➣ यह शुद्ध से दार्शनिक अथवा ज्ञान मार्गी था। इसमें ज्ञान व ध्यान को परमब्रहा की प्राप्ति का प्रधान आधार माना गया है। इस त्रिक दर्शन के नाम से जाना गया।

    स्पन्दन शास्त्र इस शाखा के पहले दार्शनिक और कश्मीरी शैव सिद्धांत के प्रवर्तक वसुगुप्त थे। इस सम्प्रदाय के दो प्रधान ग्रंथ शिव सूत्रम् व स्पंदनकारिका माने जाते हैं।

    आगम शास्त्र इसके अंतर्गत 3 तत्वों (1. पशु, 2. पति, 3. पाश) की कल्पना की गयी है।

    प्रत्यभिज्ञा शास्त्र इसके प्रवर्तक सोमानंद थे। इनकी रचना का नाम शिव दृष्टि है। गई है। ये सब कुछ शिव को मानते थे।

    ➣ कश्मीरी शैव के प्रत्यभिज्ञा दर्शन के प्रवर्तक सोमानन्द थे। कश्मीरी शैव की दो शाखाएँ हैं:- 1. स्पन्दशास्त्र, 2. प्रत्यविज्ञान शास्त्र।

    ➣ दक्षिण भारतीय शैव संतों को नयनार कहा जाता है। कुल 63 प्रमुख नयनार संत थे। इनके श्लोक-संग्रह को तिरूमुरै कहा जाता है।

    7. नाथपंथ संप्रदाय : गोरखनाथ और योग परंपरा

    ➣ नाथपंथ संप्रदाय दसवीं सदी के अंत में मत्स्येंद्रनाथ ने चलाया। इसे योगिनी कौल मार्ग भी कहा जाता है।

    ➣ इसमें शिव को आदिनाथ मानते हुए नौ नाथों को दिव्य पुरुष के रूप में मान्यता प्रदान की गई है। इसमें पहले नाथ स्वयं शिव थे।

    बाबा गोरखनाथ ने दसवीं- ग्यारहवीं शताब्दी में इस मत का अधिकाधिक प्रचार-प्रसार किया।

    ➣ नाथ सम्प्रदाय का प्रमुख केन्द्र पेशावर है। अलख निरंजन इनका उद्घोष है।

    ➣ नाथ-साधना पद्धति में नारियों का प्रमुख स्थान है।

    ➣ नाथपंथी योगियों ने सूफियों को हठयोग का अभ्यास करवाया था।

    ➣ मत्स्येन्द्रनाथ के शिष्य रावलपिंडी (पाकिस्तान) में जन्मे गोरखनाथ ने 10वीं- 11वीं शताब्दी में नाथ मत का प्रचार-प्रसार किया।

    ➣ नाथ संप्रदाय की साधना वज्रयानी बौद्धों की साधना के समान थी, इसलिए मत्स्येन्द्रनाथ को पूर्वी भारत में अवलोकितेश्वर के अवतार के रूप में स्वीकार किया गया है। तिब्बत में मत्स्येन्द्रनाथ को सिद्ध लुईपाद के रूप में माना गया है।

    शैव धर्म से संबंधित प्रमुख मंदिर

     राजराजेश्वर मंदिरतंजौर (तमिलनाडु)
     शिव मंदिरभूमरा (म.प्र.)
     नटराज मंदिरचिदंबरम (तमिलनाडु)
     विरुपाक्ष मंदिरहम्पी (कर्नाटक)
     विश्वनाथ मंदिरवाराणसी (उ.प्र.)

    ➣ शैव धर्म से संबंधित देश के विभिन्न भागों में स्थित द्वादश ज्योतिर्लिंग हैं-सोमनाथ, नागेश्वर (द्वारका के समीप), केदारनाथ, विश्वनाथ (काशी), वैद्यनाथ, महाकालेश्वर (उज्जैन), ओंकारेश्वर (म.प्र.), भीमेश्वर (नासिक), त्र्यम्बकेश्वर (नासिक), घुश्मेश्वर, मल्लिकार्जुन (आंध्र प्रदेश), रामेश्वरम्। शैव धर्मावलंबी शासक

    उत्तर भारत के शासक
    शासकविवरण
    गोंडाफर्निसपार्थियन/पहलव नरेश।
    विम कडफिसेसकुषाण शासक के मुद्राओं पर त्रिशूलधारी शिव व नंदी का चित्र।
    जालौकमौर्य सम्राट अशोक का पुत्र, मौर्य शासकों में एकमात्र शिव अनुयायी।
    मिहिरकुलहूण शासक।
    वीरसेनगुप्त सम्राट चंद्रगुप्त-II का संधिविग्रहिक।
    हस्तिनगुप्त सम्राट स्कंदगुप्त का सामंत।
    शशाकगौड़, बंगाल शासक।
    हर्षवर्द्धनपुष्यभूति वंश का शासक।
    भास्कर वर्माकामरूप, असम का शासक।
    दक्षिण भारत के शासक
    आडिगल पेरुमननारपल्लव नरेश
    चेरमन पेरुमलचेर नरेश
    पुगल चोलरचोल नरेश
    नेडुमारपाण्ड्य नरेश
    कृष्ण-Iराष्ट्रकुट वंश, एलौरा के कैलाश मंदिर निर्माता।
    राजराज-Iचोल नरेश, तंजौर के राजराजेश्वर/बृहदेश्वर मंदिर निर्माता।
    राजेद्र-Iचोल नरेश, गंगैचेलमंडलम के शिव मंदिर निर्माता।
    कुलोत्तुंग-Iचोल नरेश, चिदम्बरम मंदिर में स्थापित विष्णु की प्रतिमा का समुद्र में फिकवाने वाला।
  • गुप्तोत्तर काल में सामंतवाद: महत्वपूर्ण राजनीतिक व्यवस्था

    📚 विषय सूची

    सामंतवाद का उदय

    सामंतवाद की उत्पत्ति गुप्त काल के अंतिम चरण में दिखाई देने लगती है, लेकिन इसका पूर्ण विकास गुप्तोत्तर काल (550–750 ई.) में हुआ।

    ➣ इस काल में केंद्रीय सत्ता के कमजोर होने के कारण एक नई राजनीतिक व्यवस्था उभरी, जिसमें सामंतों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई।

    ➣ गुप्तोत्तर काल में यह व्यवस्था न केवल प्रशासन का आधार बनी, बल्कि सामाजिक और आर्थिक संरचना को भी गहराई से प्रभावित करने लगी।

    ➣ इस प्रकार, सामंतवाद भारतीय इतिहास में गुप्तोत्तर काल की सबसे प्रमुख विशेषता बन गया, जो भारत के राजनीतिक विघटन का एक महत्वपूर्ण कारण भी बना।

    सामंतवाद

    सामंतवाद सरल शब्दों में कहें तो यह एक ऐसी प्रथा थी जिसमें राजा अपनी बड़ी-बड़ी जमीनों को अपने अधिकारियों, सेनापतियों, ब्राह्मणों और मंदिरों को दान में दे दिया करता था।

    ➣ बदले में ये भूमि प्राप्तकर्ता राजा को सैनिक सहायता, कर (लगान) तथा राजनीतिक समर्थन प्रदान करते थे और उसकी अधीनता स्वीकार करते थे।

    ➣ इस व्यवस्था में धीरे-धीरे नकद मुद्रा का महत्व कम होने लगा और भूमि ही धन, प्रतिष्ठा और शक्ति का प्रमुख स्रोत बन गई।

    भूमि प्राप्त करने वाला व्यक्ति सामंत कहलाता था। अपने क्षेत्र में वह लगभग एक स्थानीय शासक की तरह कार्य करता था तथा किसानों से कर वसूलने, न्याय करने और प्रशासन चलाने का अधिकार रखता था।

    ➣ प्रारंभ में यह व्यवस्था राजा के लिए लाभदायक सिद्ध हुई क्योंकि इससे दूरस्थ क्षेत्रों का प्रशासन और सैन्य प्रबंधन आसान हो गया।

    ➣ समय के साथ सामंत अत्यधिक शक्तिशाली हो गए और उन्होंने अपनी भूमि के कुछ हिस्से अपने अधीनस्थों को देना शुरू कर दिया, जिससे सामंतों की एक विस्तृत श्रृंखला विकसित हुई।

    सामंती पदानुक्रम भूमिका
    राजा सर्वोच्च शासक और भूमि का मूल स्वामी
    बड़े सामंत राजा से भूमि प्राप्त कर क्षेत्रीय प्रशासन और सैन्य सहायता प्रदान करते थे
    छोटे सामंत बड़े सामंतों के अधीन रहकर स्थानीय स्तर पर शासन और कर संग्रह करते थे
    किसान भूमि पर खेती करते थे और कर/उपज का हिस्सा सामंतों को देते थे

    ➣ इस व्यवस्था के कारण गांव आत्मनिर्भर (Self-Sufficient) बन गए, जहाँ खेती, हस्तशिल्प और दैनिक आवश्यकताओं का अधिकांश उत्पादन स्थानीय स्तर पर ही होने लगा।

    स्थानीय उत्पादन और स्थानीय उपभोग बढ़ने से बड़े शहरों और दूरस्थ व्यापार का महत्व अपेक्षाकृत कम हो गया।

    ➣ सामंतवाद के कारण राजनीतिक सत्ता का विकेंद्रीकरण हुआ और भारत अनेक क्षेत्रीय शक्तियों में विभाजित हो गया। साथ ही सामाजिक संरचना अधिक कठोर होती गई।

    ➣ दूसरी ओर, इस व्यवस्था ने कृषि विस्तार, स्थानीय प्रशासन और मंदिर निर्माण को भी प्रोत्साहन दिया, जिससे क्षेत्रीय संस्कृतियों का विकास हुआ।

    ➣ कुल मिलाकर, सामंतवाद गुप्तोत्तर काल की प्रमुख पहचान बन गया और लगभग 600 ई. से 1200 ई. तक भारतीय समाज, अर्थव्यवस्था और राजनीति को गहराई से प्रभावित करता रहा।

    भूमि अनुदान और सामंतवाद अन्तर

    सामंतवाद और भूमि अनुदान दोनों आपस में गहराई से जुड़े हुए थे, क्योंकि गुप्तोत्तर काल में भूमि अनुदान प्रथा ही आगे चलकर सामंती व्यवस्था के विकास का प्रमुख आधार बनी।

    ➣ भूमि अनुदान के माध्यम से राज्य ने अपने अधिकारियों, ब्राह्मणों और मंदिरों को भूमि देकर प्रशासनिक और आर्थिक शक्ति का विकेंद्रीकरण किया, जिससे धीरे-धीरे सामंतों का एक शक्तिशाली वर्ग विकसित हुआ।

    विषय भूमि अनुदान सामंतवाद
    अर्थ राजा द्वारा ब्राह्मणों, अधिकारियों, सेनापतियों या मंदिरों को भूमि अथवा गांव दान देना। भूमि, प्रशासन, कर वसूली और सैन्य सेवा पर आधारित राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था।
    प्रकृति एक प्रशासनिक एवं आर्थिक प्रथा। एक व्यापक राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था।
    उद्देश्य पुरस्कार, धार्मिक दान या प्रशासनिक सहायता प्रदान करना। स्थानीय शासन चलाना और राजा को कर तथा सैन्य सहायता उपलब्ध कराना।
    परिणाम भूमि प्राप्तकर्ताओं की शक्ति में वृद्धि हुई। सामंतों का उदय हुआ और केंद्रीय सत्ता कमजोर होने लगी।
    आपसी संबंध सामंतवाद के विकास का प्रमुख आधार। भूमि अनुदान प्रथा के विस्तार का परिणाम।

    सामंतवाद के विकास की प्रक्रिया

    सामंतवाद की यह प्रक्रिया एक ही समय में नहीं बल्कि कई चरणों में पूरी हुई, जिसमें भूमि अनुदान, शक्ति का विकेंद्रीकरण और स्थानीय सामंतों का उदय प्रमुख रहा।

    चरण समयकाल प्रक्रिया / क्या हुआ? कारण / परिणाम
    1. प्रारंभिक चरण 5वीं-6वीं शताब्दी गुप्त सम्राट भूमि अनुदान देने लगे व्यापार घटने से राजस्व कम हुआ, नकद वेतन देने में कठिनाई
    2. भूमि अनुदान की वृद्धि 6वीं-8वीं शताब्दी ब्राह्मणों, मंदिरों और अधिकारियों को कर-मुक्त भूमि (अग्रहार, देवदान) दी गई धार्मिक दान बढ़ा, ब्राह्मणों की शक्ति बढ़ी
    3. अधिकारियों को जागीर प्रथा 7वीं-9वीं शताब्दी सेनापति, मंत्रियों को सामंत बनाकर भूमि दी गई सामंत राजा को सैनिक देते थे, स्थानीय कर वसूली शुरू हुई
    4. उप-सामंतवाद का उदय 9वीं-11वीं शताब्दी सामंत अपनी भूमि के हिस्से अधीनस्थों को देने लगे सामंती श्रेणी बनी: राजा → महासामंत → सामंत → उप-सामंत
    5. पूर्ण सामंती व्यवस्था 10वीं-12वीं शताब्दी गाँव पूरी तरह आत्मनिर्भर हो गए नकद मुद्रा का कम उपयोग, व्यापार और शहरीकरण घटा
    सामंतवाद के प्रमुख लक्षण विवरण
    भूमि मुख्य संपत्ति धन के बजाय भूमि को सबसे महत्वपूर्ण संपत्ति माना जाने लगा।
    जागीरदारी प्रथा राजा भूमि को सामंतों, ब्राह्मणों और मंदिरों को सेवा (विशेषकर सैन्य सेवा) के बदले अनुदान के रूप में देता था।
    गाँव आत्मनिर्भरता गाँव स्वयं में पूर्ण इकाई बन गए। कृषि, हस्तशिल्प और छोटा व्यापार गाँव के अंदर ही होता था।
    सामंतों की स्वायत्त शक्ति सामंत अपने क्षेत्र में लगभग स्वतंत्र हो गए। वे छोटे राजा की तरह व्यवहार करते थे।
    कर व्यवस्था किसानों से सामंत कर वसूल करते थे और उसका कुछ हिस्सा राजा को देते थे।
    ब्राह्मणों और मंदिरों का उदय ब्राह्मण और मंदिर सबसे बड़े सामंत बन गए। उन्हें कर-मुक्त भूमि (अग्रहार) दी जाती थी।
    सामंती श्रेणी (Hierarchy) राजा → महासामंत → सामंत → उप-सामंत की व्यवस्था बनी।
    नकद मुद्रा का ह्रास व्यापार घटने से नकद अर्थव्यवस्था कमजोर हुई और वस्तु विनिमय बढ़ा।

    सामंतवाद के सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव

    पहलू सकारात्मक प्रभाव नकारात्मक प्रभाव
    राजनीतिक व्यवस्था स्थानीय प्रशासन मजबूत हुआ और दूर-दराज के क्षेत्रों में शासन अधिक प्रभावी बना। केंद्रीय सत्ता कमजोर हुई और राजनीतिक विखंडन बढ़ा।
    आर्थिक व्यवस्था स्थानीय कृषि उत्पादन और आत्मनिर्भर ग्राम अर्थव्यवस्था का विकास हुआ। व्यापार, मुद्रा व्यवस्था और शहरीकरण में गिरावट आई।
    सामाजिक संरचना ग्रामीण समाज में स्थिरता आई और स्थानीय समुदायों का विकास हुआ। जाति व्यवस्था कठोर हुई और सामाजिक असमानता बढ़ी।
    प्रशासन स्थानीय स्तर पर प्रशासन अधिक संगठित और त्वरित हुआ। भ्रष्टाचार और सामंतों की मनमानी बढ़ी।
    संस्कृति स्थानीय कला, भाषा और परंपराओं का विकास हुआ। सांस्कृतिक एकता कमजोर हुई और क्षेत्रीय विभाजन बढ़ा।

    निष्कर्ष

    ➣सामंतवाद ने भारतीय इतिहास में एक मिश्रित भूमिका निभाई। एक ओर इसने स्थानीय प्रशासन, कृषि अर्थव्यवस्था और क्षेत्रीय संस्कृति को मजबूत किया, वहीं दूसरी ओर इसने केंद्रीय सत्ता के पतन, व्यापार में गिरावट और सामाजिक असमानता को भी बढ़ावा दिया।

    ➣ इस प्रकार, सामंतवाद को भारतीय इतिहास की एक ऐसी व्यवस्था के रूप में देखा जा सकता है जिसने विकास और विघटन दोनों प्रक्रियाओं को साथ-साथ प्रभावित किया।

  • गुप्तोत्तर काल में भक्ति आंदोलन: उदय, विकास और प्रभाव

    📚 विषय सूची

    गुप्तोत्तर काल में भक्ति आंदोलन का उदय

    गुप्तोत्तर काल में राजनीतिक अस्थिरता, छोटे-छोटे राज्यों का उदय, हूण आक्रमण और बाद में तुर्की आक्रमणों के कारण सामाजिक और धार्मिक क्षेत्र में गहरे परिवर्तन आए।

    ➣ इसी काल में भक्ति आंदोलन का उदय हुआ, जो भारतीय धार्मिक इतिहास की सबसे बड़ी जन-आंदोलन में से एक माना जाता है।

    ➣ इसने ब्राह्मणवादी कर्मकांड, जटिल यज्ञ-हवन और पुरोहित-प्रधान पूजा पद्धति की बजाय व्यक्तिगत, भावपूर्ण और सरल भक्ति को प्रमुखता दी।

    ➣ भक्ति आंदोलन ने धार्मिक लोकतंत्रीकरण किया, जाति-पाति की कठोर व्यवस्था को चुनौती दी और स्थानीय भाषाओं को धार्मिक अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया।

    भक्ति आंदोलन की जड़ें दक्षिण भारत (मुख्यतः तमिलनाडु) में थीं। यहाँ दो प्रमुख धाराएँ विकसित हुईं-

    भक्ति आंदोलन

    विशेषता वैष्णव भक्ति — आलवार संत (Alvars) शैव भक्ति — नायनमार संत (Nayanmars)
    अर्थ भगवान में डूबा हुआ या “विष्णु का सेवक” स्वामी के अनुयायी (शिव के भक्त)
    संख्या 12 प्रमुख आलवार संत 63 नायनमार संत
    काल 6वीं से 9वीं शताब्दी ई. 6वीं से 8वीं शताब्दी ई. (कुछ 9वीं तक)
    आराध्य देवता विष्णु और उनके अवतार (विशेषकर कृष्ण) भगवान शिव
    मुख्य रचना नालयिरा दिव्य प्रबंधम (4000 दिव्य गीत) तेवारम + तिरुवाचकम
    भाषा तमिल तमिल
    प्रमुख संत • नम्मालवार
    • आंडाल (महिला संत)
    • कुलशेखर आलवार
    • पोइगई, भूतत्, पेय आलवार
    • अप्पर (तिरुनावुक्करसर)
    • तिरुज्ञानसंबंदर
    • सुंदरर
    • मानिक्कवाचकर
    भक्ति का स्वरूप • भावपूर्ण गीतों के माध्यम से विष्णु की लीला, उनकी सुंदरता और भक्त की व्याकुलता को व्यक्त किया।
    • भक्ति को शरणागति (पूर्ण समर्पण) का रूप दिया।
    • शिव को पति, स्वामी, माता-पिता और प्रेमी के रूप में देखा गया।
    • कई नायनमार निम्न जाति या पेशे से थे (जैसे – तिरुनावुक्करसर पहले जैन थे, फिर शिव भक्त बने)।
    सामाजिक विशेषता जाति-पाति का विरोध, निम्न वर्ग से भी संत जाति-विरोधी, कई संत शूद्र या निम्न पृष्ठभूमि से
    प्रभाव विशिष्टाद्वैत दर्शन की नींव (रामानुजाचार्य) शैव सिद्धांत और तमिल शैव परंपरा का विकास

    भक्ति आंदोलन के उदय के कारण

    ➣ भक्ति आंदोलन का उदय गुप्तोत्तर काल की विभिन्न धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों का परिणाम था। इसने समाज के व्यापक वर्गों को प्रभावित किया और धर्म को अधिक सरल व जनसुलभ बनाया।

    कारण विस्तृत विवरण
    धार्मिक कारण बौद्ध और जैन धर्म का पतन, ब्राह्मणवादी कर्मकांडों की जटिलता, संस्कृत भाषा की दूरी और आम जनता की ईश्वर से सीधे भावुक संबंध की इच्छा ने भक्ति आंदोलन को जन्म दिया।
    सामाजिक कारण वर्ण-व्यवस्था और जाति-प्रथा अत्यंत कठोर हो चुकी थी। निम्न वर्ग, शूद्र, महिलाएँ और किसान मुख्यधारा से अलग महसूस कर रहे थे, जबकि भक्ति आंदोलन ने सभी को समान रूप से ईश्वर की भक्ति का अवसर दिया।
    राजनीतिक कारण गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी और छोटे-छोटे राज्यों का उदय हुआ। कई शासकों ने भक्ति आंदोलन को संरक्षण दिया क्योंकि इससे समाज में एकता और स्थिरता बनी रहती थी।
    सांस्कृतिक कारण द्रविड़ परंपराओं का प्रभाव, स्थानीय भाषाओं (तमिल, कन्नड़ आदि) का विकास तथा संगीत, कविता और नृत्य के माध्यम से भक्ति को लोकप्रिय बनाने की प्रवृत्ति ने इस आंदोलन को व्यापक आधार प्रदान किया।

    ➣ कुल मिलाकर, इन सभी कारणों ने मिलकर भक्ति आंदोलन को एक जन-आंदोलन का स्वरूप दिया, जिसने भारतीय धार्मिक और सामाजिक संरचना को गहराई से प्रभावित किया।

    मुख्य विशेषताएँ

    विशेषता विवरण
    व्यक्तिगत भक्ति मंदिर, पुजारी या जटिल अनुष्ठानों के बिना भी भगवान तक सीधा पहुंच संभव।
    जाति-विरोधी स्वर कई संत निम्न वर्ग, किसान, कारीगर या स्त्रियों से थे। उदाहरण – नायनमारों में कई शूद्र थे।
    भावुकता भक्ति को प्रेम, वियोग, विरह और समर्पण के रूप में व्यक्त किया गया।
    भाषा क्रांति संस्कृत की बजाय तमिल जैसी स्थानीय भाषाओं का प्रयोग – इससे आम जनता तक पहुंच आसान हुई।
    सामाजिक समानता भक्ति में सभी जाति-वर्ग के लोग समान थे।

    भक्ति आंदोलन का प्रसार

    ➣ भक्ति आंदोलन की शुरुआत दक्षिण भारत से हुई और यह धीरे-धीरे पूरे देश में फैलता गया। प्रारंभ में आलवार और नायनमार संतों के माध्यम से यह आंदोलन लोकप्रिय हुआ, जिसने भक्ति को एक सरल और जन-उन्मुख धार्मिक मार्ग के रूप में स्थापित किया।

    ➣ 9वीं-10वीं शताब्दी में रामानुजाचार्य जैसे आचार्यों ने भक्ति परंपरा को दार्शनिक आधार प्रदान किया और इसे विशिष्टाद्वैत वेदांत के रूप में संगठित किया। इससे भक्ति आंदोलन को एक मजबूत वैचारिक ढांचा मिला और यह अधिक व्यवस्थित रूप में फैलने लगा।

    ➣ इसके बाद मध्यकाल (12वीं-17वीं शताब्दी) में भक्ति आंदोलन ने पूरे भारत में व्यापक रूप धारण किया, जिसमें कबीर, नानक, तुलसीदास, मीरा, नामदेव, एकनाथ और तुकाराम जैसे संतों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    ➣ इस प्रकार, गुप्तोत्तर काल के भक्ति आंदोलन ने ही आगे चलकर पूरे मध्यकालीन भारत के भक्ति आंदोलन की नींव रखी, जिसने भारतीय समाज, धर्म और संस्कृति को गहराई से प्रभावित किया।

    भक्ति आंदोलन का प्रसार (क्षेत्रीय केंद्र)

    क्षेत्र प्रमुख विशेषता / विकास
    दक्षिण भारत आलवार और नायनमार संतों के माध्यम से भक्ति आंदोलन की शुरुआत और विकास, मंदिर-आधारित भक्ति परंपरा का उदय।
    तमिल क्षेत्र तमिल भक्ति साहित्य (दिव्य प्रबंधम और तेवरम) का विकास, जिसने भक्ति को जन-भाषा से जोड़कर व्यापक जनसमूह तक पहुँचाया।
    कर्नाटक क्षेत्र वीरशैव आंदोलन और भक्ति परंपरा का विस्तार, स्थानीय कन्नड़ भाषा में धार्मिक एवं दार्शनिक साहित्य का विकास हुआ।
    महाराष्ट्र नामदेव, एकनाथ और तुकाराम जैसे संतों के माध्यम से वारकरी भक्ति परंपरा का विकास हुआ, जिसमें विठोबा भक्ति प्रमुख रही।
    उत्तर भारत कबीर, नानक, तुलसीदास और मीरा जैसे संतों के माध्यम से निर्गुण और सगुण भक्ति परंपराओं का व्यापक प्रसार हुआ।
    बंगाल और पूर्वी भारत चैतन्य महाप्रभु के नेतृत्व में कृष्ण भक्ति आंदोलन का विस्तार हुआ और कीर्तन परंपरा अत्यंत लोकप्रिय बनी।

    ऐतिहासिक महत्व

    महत्व विवरण
    धार्मिक लोकतंत्रीकरण भक्ति आंदोलन ने धर्म को ब्राह्मणों के एकाधिकार से मुक्त किया और आम जनता को भी ईश्वर की उपासना का सीधा मार्ग प्रदान किया, जिससे धार्मिक जीवन अधिक सरल और सुलभ बना।
    सांस्कृतिक एकीकरण दक्षिण भारत की भक्ति परंपरा (अलवार और नायनमार) धीरे-धीरे पूरे भारत में फैली, जिससे उत्तर और दक्षिण भारत के बीच सांस्कृतिक एकता और आदान-प्रदान को मजबूती मिली।
    साहित्य का विकास तमिल, कन्नड़, मराठी, हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में समृद्ध भक्ति साहित्य का विकास हुआ, जिससे स्थानीय भाषाओं को धार्मिक और साहित्यिक पहचान मिली।
    बौद्ध-जैन प्रभाव का प्रतिकार इस आंदोलन ने बौद्ध और जैन धर्म के घटते प्रभाव के बाद हिंदू धर्म को नई ऊर्जा प्रदान की और उसे जनसामान्य में अधिक लोकप्रिय बनाया।
    मंदिर संस्कृति का विकास मंदिरों में भक्ति गीतों के साथ-साथ संगीत, नृत्य, मूर्तिकला और वास्तुकला का विकास हुआ, जिससे मंदिर केवल धार्मिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक केंद्र भी बन गए।
    सामाजिक समावेशन भक्ति आंदोलन में निम्न जातियों और साधारण वर्गों की भागीदारी बढ़ी, जिससे सामाजिक संरचना में कुछ हद तक समावेशिता और समानता का भाव विकसित हुआ।
    धार्मिक भावनात्मकता का विकास जटिल कर्मकांडों के स्थान पर भावनात्मक भक्ति (प्रेम और समर्पण) को महत्व मिला, जिससे धर्म अधिक व्यक्तिगत और अनुभव-आधारित बन गया।

    निष्कर्ष

    ➣ गुप्तोत्तर काल का भक्ति आंदोलन मात्र एक धार्मिक आंदोलन नहीं था, बल्कि सामाजिक-धार्मिक क्रांति था। इसने भारतीय समाज को आंतरिक शक्ति प्रदान की और आने वाले सदियों तक हिंदू धर्म की जीवंतता को बनाए रखा।

    ➣ इस आंदोलन ने धर्म को जनसामान्य से जोड़ा और उसे अधिक सरल, भावनात्मक तथा व्यावहारिक बनाया, जिससे समाज के विभिन्न वर्गों की भागीदारी बढ़ी।

    ➣ इसके प्रभाव से क्षेत्रीय भाषाओं, लोक संस्कृति और मंदिर परंपरा को नई पहचान मिली, जो भारतीय संस्कृति के विकास में महत्वपूर्ण साबित हुई।

    ➣ कुल मिलाकर, भक्ति आंदोलन ने भारतीय समाज, धर्म और संस्कृति को एक नई दिशा दी और मध्यकालीन भारत की सामाजिक संरचना की नींव मजबूत की।

  • गुप्तोत्तर काल (550-750 ई.): राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक बदलाव

    📚 विषय सूची

    गुप्तकाल एंव गुप्तोत्तर काल में अंतर

    पहलू गुप्त काल गुप्तोत्तर काल
    अर्थव्यवस्था का स्वरूप व्यापार और कृषि पर आधारित मुख्यतः कृषि और सामंती व्यवस्था पर आधारित
    शहर समृद्ध, विकसित और बड़े शहरी केंद्र सिकुड़े हुए, कम विकसित या पतन की ओर
    व्यापार लंबी दूरी का सक्रिय एवं विस्तृत व्यापार मुख्यतः स्थानीय और अपेक्षाकृत सीमित व्यापार
    मुद्रा सोने के सिक्कों (दीनार) का व्यापक प्रचलन मुद्राओं की कमी, कौड़ी और वस्तु-विनिमय का बढ़ता उपयोग
    भूमि व्यवस्था सीमित भूमि अनुदान बड़े पैमाने पर भूमि दान और कर-मुक्त अनुदान

    गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद भारतीय राजनीति में बड़े परिवर्तन हुए। गुप्त काल की केंद्रीकृत और शक्तिशाली साम्राज्य व्यवस्था लगभग समाप्त हो गई और उसकी जगह क्षेत्रीय राज्यों तथा बहु-केन्द्रित राजनीति का उदय हुआ।

    ➣ हालाँकि इस प्रवृत्ति का एक महत्वपूर्ण अपवाद हर्षवर्धन (606–647 ई.) था, जो पुष्यभूति (वर्धन) वंश का शासक था। इसी कारण कई इतिहासकारों द्वारा उसे “अंतिम महान हिन्दू सम्राट” भी कहा जाता है।

    हर्षवर्धन ने उत्तर भारत के बड़े भाग, जैसे कन्नौज, थानेसर, पंजाब और बंगाल के क्षेत्रों पर अपना प्रभाव स्थापित किया। वह गुप्त साम्राज्य के बाद उत्तर भारत का सबसे शक्तिशाली शासक माना जाता है।

    ➣ हर्ष ने एक विशाल क्षेत्रीय साम्राज्य की स्थापना की, लेकिन यह पूर्णतः केंद्रीकृत साम्राज्य नहीं था। इसकी शक्ति मुख्य रूप से सैन्य विजयों और हर्ष के व्यक्तिगत नेतृत्व पर आधारित थी।

    हर्षवर्धन की मृत्यु (647 ई.) के तुरंत बाद उसका साम्राज्य विखंडित हो गया और राजनीतिक एकता फिर से समाप्त हो गई।

    हर्षवर्धन का शासन गुप्तोत्तर काल का सबसे शक्तिशाली और गौरवशाली चरण माना जाता है, लेकिन यह अल्पकालिक था और लगभग 41 वर्षों तक ही प्रभावी रहा।

    हर्ष के बाद पुनः छोटे-छोटे क्षेत्रीय राजवंशों और राज्यों का उदय हुआ, जिनका प्रभुत्व लगभग 12वीं शताब्दी तक बना रहा।

    ➣ इसी कारण इतिहासकार गुप्तोत्तर काल को राजनीतिक विखंडन का काल मानते हैं, जिसमें हर्षवर्धन एक महत्वपूर्ण अपवाद के रूप में दिखाई देता है।

    ➣ कुल मिलाकर गुप्तोत्तर काल में कोई स्थायी विशाल साम्राज्य स्थापित नहीं हो सका। हर्षवर्धन का शासन एक शक्तिशाली लेकिन अल्पकालिक प्रयास था, जिसके बाद पुनः क्षेत्रीय राजवंशों का प्रभुत्व स्थापित हो गया।

    केंद्रीकृत शक्ति का अंत और विखंडन

    ➣ गुप्त काल में सम्राट की सत्ता पूरे उत्तर भारत पर मजबूत थी। गुप्तोत्तर काल में यह सत्ता टूट गई।

    ➣ भारत छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्यों में बंट गया। कोई एक बड़ा साम्राज्य पूरे उत्तर भारत को नियंत्रित नहीं कर पाया।

    क्षेत्रीय राजवंशों का उदय हुआ। प्रत्येक क्षेत्र में अपनी अलग शक्ति केंद्र बन गए-

    उत्तर-पश्चिमी और पूर्वी राजवंश

    राजवंश कालखंड (लगभग) मुख्य क्षेत्र
    पुष्यभूति वंश (वर्धन) 606–647 ई. कन्नौज, थानेसर, उत्तर भारत
    (अल्पकालिक बड़ा साम्राज्य – हर्षवर्धन)
    गुर्जर-प्रतिहार वंश 8वीं–11वीं शताब्दी कन्नौज, राजस्थान
    चाहमान (चौहान) वंश 8वीं–12वीं शताब्दी अजमेर, दिल्ली
    परमार वंश 9वीं–13वीं शताब्दी मालवा (धार)
    चंदेल वंश 9वीं–13वीं शताब्दी बुंदेलखंड (खजुराहो)
    पाल वंश 8वीं–12वीं शताब्दी बंगाल, बिहार
    सेन वंश 11वीं–12वीं शताब्दी बंगाल

    दक्षिण एवं दक्कन भारत

    राजवंश कालखंड (लगभग) मुख्य क्षेत्र
    बादामी चालुक्य 543–753 ई. कर्नाटक, महाराष्ट्र
    पल्लव वंश 6वीं–9वीं शताब्दी तमिलनाडु (कांचीपुरम)
    राष्ट्रकूट वंश 753–982 ई. महाराष्ट्र, कर्नाटक
    चोल वंश 9वीं–13वीं शताब्दी तमिलनाडु

    उत्तर और दक्षिण के बीच राजनीतिक संपर्क कम होने की वजह से दोनों क्षेत्रों में अलग-अलग राजनीतिक परंपराएं विकसित हुईं।

    गुप्तोत्तर काल के प्रमुख परिवर्तन : एक झलक में

    परिवर्तन का प्रकार मुख्य परिवर्तन / विशेषताएँ
    राजनीतिक परिवर्तन केन्द्रीय सत्ता का अंत, छोटे-छोटे क्षेत्रीय राज्यों का उदय
    लगातार युद्ध और राजनीतिक अस्थिरता
    राजपूत वंशों का उदय (उत्तर भारत में)
    आर्थिक परिवर्तन
    (सबसे महत्वपूर्ण)
    विदेशी व्यापार में भारी कमी
    कृषि आधारित अर्थव्यवस्था
    सामंती व्यवस्था (Feudalism) की शुरुआत
    भूमि अनुदान और जागीरदारी बढ़ना
    गाँव आत्मनिर्भर बने, शहरों का पतन
    सामाजिक परिवर्तन जाति व्यवस्था अधिक कठोर हुई
    उपजातियों में वृद्धि
    ब्राह्मणों की शक्ति बढ़ी
    महिलाओं की स्थिति में गिरावट (सती, बाल विवाह, पर्दा)
    ग्रामीण समाज का प्रभुत्व
    धार्मिक परिवर्तन हिंदू धर्म का पुनरुत्थान
    बौद्ध और जैन धर्म का तेजी से पतन
    बड़े मंदिरों का निर्माण
    भक्ति आंदोलन की शुरुआत (अलवार एवं नायनमार)
    सांस्कृतिक और साहित्यिक परिवर्तन क्षेत्रीय भाषाओं (हिंदी, तमिल, कन्नड़ आदि) का विकास
    मंदिर वास्तुकला का उदय (नागर, द्रविड़ शैली)
    पुराण, स्मृति और भक्ति साहित्य की रचना
    कला और स्थापत्य में क्षेत्रीय विविधता

    राजनीतिक परिवर्तन

    सामंतवाद का उदय

    सामंतवाद का उदय गुप्तोत्तर काल का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक परिवर्तन था, जिसने प्रशासन और सत्ता संरचना को प्रभावित किया।

    भूमि अनुदान प्रथा के विस्तार के कारण ब्राह्मणों, अधिकारियों, सेनापतियों और मंदिरों को भूमि प्रदान की जाने लगी।

    भूमि प्राप्तकर्ता सामंत कहलाए, जिन्हें अपने क्षेत्रों में प्रशासनिक और आर्थिक अधिकार प्राप्त हो गए।

    सामंत राजा को कर और सैनिक उपलब्ध कराते थे, लेकिन स्थानीय स्तर पर काफी हद तक स्वायत्त हो गए थे।

    सामंतों की शक्ति में निरंतर वृद्धि हुई और समय के साथ वे महत्वपूर्ण क्षेत्रीय शक्ति केंद्र बन गए।

    • केंद्रीय प्रशासन कमजोर हुआ – प्रांतीय और स्थानीय अधिकारियों की शक्ति बढ़ने लगी।
    • स्थानीय शक्ति केंद्र बढ़े – सामंतों और क्षेत्रीय शासकों का प्रभाव अधिक हो गया।
    • राजा की शक्ति सीमित हुई – वह पूर्ण स्वामी के बजाय शक्तिशाली सामंतों का प्रधान बनकर रह गया।

    प्रशासनिक परिवर्तन

    केंद्रीय प्रशासन का कमजोर होना गुप्त काल की मजबूत नौकरशाही धीरे-धीरे कमजोर हुई और प्रशासन पर केंद्र का नियंत्रण कम हो गया।
    विकेंद्रीकरण शासन व्यवस्था अधिक विकेंद्रीकृत हो गई तथा स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक शक्तियाँ बढ़ने लगीं।
    गांवों का बढ़ता महत्व गांव प्रशासन की प्रमुख इकाई बन गए और उनका संचालन ग्राम सभाओं, मुखियाओं तथा सामंतों द्वारा किया जाने लगा।
    राजस्व संग्रह कर वसूली और राजस्व संग्रह की जिम्मेदारी कई क्षेत्रों में सामंतों और स्थानीय अधिकारियों को सौंप दी गई।
    कर-मुक्त अनुदान ब्राह्मणों, मंदिरों और धार्मिक संस्थाओं को बड़े पैमाने पर कर-मुक्त भूमि और अनुदान दिए जाने लगे।
    राजकोष पर प्रभाव कर-मुक्त भूमि की संख्या बढ़ने से राज्य की आय में कमी आई और राजकोष अपेक्षाकृत कमजोर हो गया।

    युद्ध और संघर्ष की संस्कृति

    अनेक छोटे-छोटे राज्यों और क्षेत्रीय शक्तियों के उदय के कारण राजनीतिक एकता कमजोर हुई, जिससे विभिन्न राज्यों के बीच संघर्ष और युद्ध लगातार होते रहे।

    राज्य विस्तार, संसाधनों पर नियंत्रण और राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने के लिए शासकों के बीच आपसी टकराव और सैन्य अभियान सामान्य बात बन गए।

    घुड़सवार सेना तथा सामंतों की सैन्य टुकड़ियों का महत्व बढ़ गया, क्योंकि शासक अपनी सैन्य शक्ति के लिए सामंतों पर अधिक निर्भर होने लगे।

    हूण आक्रमणों और अन्य बाहरी खतरों के बाद सुरक्षा संबंधी चिंताएँ बढ़ीं, जिसके परिणामस्वरूप किलों के निर्माण, सीमाओं की रक्षा और स्थानीय सुरक्षा व्यवस्थाओं को अधिक महत्व दिया जाने लगा।

    आर्थिक परिवर्तन (गुप्तोत्तर काल)

    गुप्तोत्तर काल (लगभग 550 ई. से 750 ई. तक) भारतीय अर्थव्यवस्था में गहरे परिवर्तनों का काल था, जिसमें आर्थिक संरचना और उत्पादन के स्वरूप में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिले।

    गुप्त काल की व्यापार-प्रधान, नगरीय और मुद्रा-आधारित अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे कमजोर होने लगी और उसकी जगह कृषि-प्रधान, ग्रामीण तथा सामंती अर्थव्यवस्था ने लेनी शुरू कर दी।

    ➣ इस अवधि में भूमि और कृषि उत्पादन आर्थिक गतिविधियों का मुख्य आधार बन गए, जबकि व्यापार और शहरी केंद्रों का महत्व अपेक्षाकृत कम हो गया।

    व्यापार और वाणिज्य का पतन

    विदेशी व्यापार में भारी गिरावट आई। रोमन साम्राज्य के पतन, हूण आक्रमणों और राजनीतिक अस्थिरता के कारण उत्तर-पश्चिमी और पश्चिमी व्यापार मार्ग बाधित हो गए।

    चीन में रेशम (Silk) का उत्पादन शुरू हो जाने के कारण भारत का रेशम व्यापार प्रभावित हुआ और उसकी अंतरराष्ट्रीय मांग में कमी आई।

    दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ कुछ व्यापार जारी रहा, लेकिन कुल मिलाकर लंबी दूरी का व्यापार पहले की तुलना में काफी कम हो गया।

    आंतरिक व्यापार भी प्रभावित हुआ क्योंकि शहरों और गांवों के बीच आर्थिक संबंध धीरे-धीरे कमजोर पड़ गए।

    नगरीय केंद्रों का पतन

    ➣ गुप्त काल के प्रमुख शहर जैसे पाटलिपुत्र, उज्जैन, वाराणसी, वैशाली, मथुरा और श्रावस्ती सिकुड़ गए या धीरे-धीरे खंडहरों में परिवर्तित होने लगे।

    पुरातात्विक साक्ष्य (Excavations) बताते हैं कि इन नगरों में बस्तियों का आकार छोटा हुआ, शिल्प उत्पादन घटा तथा व्यापारिक गतिविधियों में उल्लेखनीय कमी आई।

    व्यापार में गिरावट के कारण कारीगरों और व्यापारियों की आय कम हो गई, जिससे उनमें से अनेक लोग रोजगार की तलाश में गांवों की ओर पलायन करने लगे।

    ➣ परिणामस्वरूप, कई शहर व्यापारिक केंद्रों के बजाय मुख्यतः धार्मिक या प्रशासनिक केंद्रों के रूप में कार्य करने लगे।

    भूमि अनुदान प्रथा का विस्तार

    ➣ पयह गुप्तोत्तर काल का सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक परिवर्तन था:

    राजा, सामंत और शासक ब्राह्मणों, मंदिरों, मठों और अधिकारियों को बड़े पैमाने पर भूमि अनुदान (ब्रह्मदेय , अग्रहार, देवदान ) देने लगे-

    भूमि अनुदान का प्रकार विवरण
    ब्रह्मदेय ब्राह्मणों को प्रदान की जाने वाली कर-मुक्त भूमि।
    अग्रहार ब्राह्मणों को दिए गए गांव या भूमि क्षेत्र, जिन पर विशेष अधिकार प्राप्त होते थे।
    देवदान मंदिरों और धार्मिक संस्थाओं को दान में दी गई भूमि।

    ➣ ये अनुदान अक्सर कर-मुक्त होते थे। परिणामस्वरूप-

    • राज्य की आय में कमी आई, क्योंकि बड़ी मात्रा में भूमि कर-मुक्त दान के रूप में दी जाने लगी थी।
    • सामंत वर्ग (Intermediary Landlords) का उदय हुआ, जो भूमि पर अधिकार रखने वाले स्थानीय प्रभु और मध्यस्थ भूमिधर बन गए।
    • किसानों पर आर्थिक बोझ और शोषण बढ़ा, क्योंकि सामंत उनसे कर, उपकर और विभिन्न प्रकार की सेवाएँ वसूलते थे।
    • कृषि का विस्तार हुआ, क्योंकि वनों और बंजर भूमि को साफ करके नई कृषि योग्य भूमि विकसित की गई।
    भूमि अनुदान प्रथा के विस्तार से ही गुप्तोत्तर काल में सामंतवाद का विकास हुआ।

    ➣ इसी कारण इतिहासकार इस काल को भारतीय सामंतवाद (Indian Feudalism) के उदय का काल भी मानते हैं, क्योंकि भूमि दान, सामंतों की बढ़ती शक्ति और स्थानीय नियंत्रण की प्रवृत्तियाँ तेजी से विकसित हुईं।

    स्वावलंबी गांवों का उदय

    गुप्तोत्तर काल में सामंतवाद के विकास के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन यह हुआ कि गांव स्वावलंबी इकाइयों के रूप में विकसित होने लगे।

    ➣ गांवों की बाहरी क्षेत्रों पर निर्भरता बहुत कम हो गई। बाहर से कम वस्तुएँ खरीदी जाती थीं और स्थानीय उत्पादन का अधिकांश भाग गांव के भीतर ही उपयोग किया जाता था। इसी कारण इन्हें बंद अर्थव्यवस्था भी कहा जाता है।

    ➣ उत्पादन का मुख्य उद्देश्य बाजार में बिक्री नहीं, बल्कि गांव की आवश्यकताओं की पूर्ति करना था। अतिरिक्त उत्पादन प्रायः कर के रूप में सामंतों या राजा को दिया जाता था।

    कुम्हार, बढ़ई, लोहार, जुलाहा, सुनार और चर्मकार जैसे शिल्पकार गांवों में बस गए और स्थानीय समाज की आवश्यकताओं को पूरा करने लगे। उनकी सेवाओं के बदले उन्हें भूमि, अनाज या अन्य वस्तुएँ प्रदान की जाती थीं।

    ➣ यह व्यवस्था जजमानी प्रथा के रूप में विकसित हुई, जिसमें विभिन्न व्यवसायिक समूह एक-दूसरे की आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे और बदले में वस्तुओं या उपज के रूप में पारिश्रमिक प्राप्त करते थे।

    ग्राम सभा या पंचायत गांव की महत्वपूर्ण संस्था थी, जो स्थानीय विवादों का निपटारा करती थी तथा गांव की सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी।

    मुद्रा प्रणाली में गिरावट

    गुप्त काल में सोने के दीनार बड़ी संख्या में प्रचलित थे और व्यापारिक लेन-देन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे, लेकिन गुप्तोत्तर काल में धातु मुद्राओं का प्रचलन काफी कम हो गया। उपलब्ध सिक्कों में भी सोने की मात्रा (Gold Content) पहले की तुलना में घटने लगी, जो आर्थिक कमजोरी का संकेत था।

    दैनिक लेन-देन में कौड़ी (Cowries), अनाज तथा वस्तु विनिमय प्रणाली का उपयोग बढ़ गया। लोग वस्तुओं और सेवाओं का आदान-प्रदान सीधे वस्तुओं के माध्यम से करने लगे, जिससे नकद मुद्रा का महत्व कम हो गया।

    मुद्रा के सीमित प्रचलन के कारण व्यापारिक गतिविधियों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। दूरस्थ क्षेत्रों के व्यापार में कमी आई और स्थानीय स्तर पर होने वाले लेन-देन का महत्व बढ़ गया।

    ➣ इस स्थिति के परिणामस्वरूप व्यापार और वाणिज्य पहले की तुलना में कमजोर हुए तथा अर्थव्यवस्था अधिक स्थानीय और ग्रामीण स्वरूप की ओर अग्रसर हो गई।

    सामाजिक परिवर्तन

    ➣ गुप्तोत्तर काल में समाज अधिक पदक्रमित और क्षेत्रीय हो गया। वर्ण-जाति व्यवस्था लचीली होने के बजाय अधिक जटिल और जन्म-आधारित हो गई। ब्राह्मण और सामंत वर्गों को लाभ हुआ, जबकि महिलाओं, वैश्यों और निचली जातियों की स्थिति सामान्यतः कमजोर हुई।

    वर्ण व्यवस्था में बदलाव

    चार वर्णों की संरचना बनी रही, लेकिन व्यावहारिक रूप से जाति व्यवस्था अधिक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली हो गई।

    भूमि अनुदानों के कारण ब्राह्मण सबसे शक्तिशाली वर्ग बन गए। वे आर्थिक, धार्मिक और सामाजिक रूप से गांवों के प्रमुख नियंत्रक बन गए तथा पुराणों, स्मृतियों और धार्मिक ग्रंथों के माध्यम से अपनी स्थिति को और मजबूत किया।

    विदेशी समूहों (जैसे हूणों) और कई आदिवासी सरदारों को क्षत्रिय वर्ण में शामिल किया गया, जिससे आगे चलकर राजपूत जैसी नई सामाजिक श्रेणियों का उदय हुआ।

    वैश्यों की स्थिति में गिरावट आई। व्यापार और शहरी केंद्रों के पतन के कारण उनकी आर्थिक शक्ति कमजोर हुई तथा कई वैश्य कृषि और अन्य व्यवसायों की ओर मुड़ गए।

    शूद्रों की स्थिति में कुछ सुधार हुआ। वे बड़े पैमाने पर कृषि कार्यों से जुड़ने लगे, उन्हें रामायण, महाभारत और पुराणों को सुनने की अनुमति मिली तथा कुछ शूद्र भूमि पर कार्य करने वाले किसान बनकर आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत मजबूत हुए।

    नई जातियों का उदय और वृद्धि

    जाति व्यवस्था का विस्तार हुआ और वर्ण व्यवस्था के भीतर सैकड़ों नई जातियों तथा उपजातियों का उदय हुआ।

    कायस्थ वर्ग का उदय इस काल की एक महत्वपूर्ण घटना थी। भूमि अनुदानों और प्रशासनिक कार्यों में वृद्धि के कारण यह वर्ग विकसित हुआ, जो राजकीय अभिलेखों और दस्तावेजों के लेखन का कार्य करता था।

    अछूत वर्गों की सामाजिक स्थिति और अधिक कठोर हो गई। चांडाल जैसे समुदायों को समाज से अलग-थलग रखा गया तथा वे प्रायः गांवों के बाहर निवास करते थे।

    आदिवासी और विदेशी समूहों का समावेश भी इस काल की महत्वपूर्ण प्रक्रिया थी। अनेक जनजातियों को शूद्र या निम्न जातियों में शामिल किया गया, जबकि उनके प्रमुखों और सरदारों को उच्च वर्णों में स्थान दिया गया।

    महिलाओं की स्थिति में गिरावट

    गुप्तोत्तर काल महिलाओं के लिए अपेक्षाकृत प्रतिकूल माना जाता है। इस समय सामाजिक और धार्मिक नियम अधिक कठोर होते गए, जिसके कारण महिलाओं की स्वतंत्रता, शिक्षा और अधिकारों में कमी देखने को मिलती है तथा उनकी सामाजिक स्थिति में धीरे-धीरे गिरावट आई।

    पहलू स्थिति
    बाल विवाह बाल विवाह का प्रचलन बढ़ने लगा और इसे सामाजिक स्वीकृति मिलने लगी।
    सती प्रथा विशेषकर उच्च जातियों में सती प्रथा को सामाजिक मान्यता मिलने लगी।
    संपत्ति अधिकार महिलाओं के संपत्ति अधिकार सीमित हो गए; सामान्यतः केवल स्त्रीधन (आभूषण, वस्त्र आदि) तक ही अधिकार रहता था।
    शिक्षा महिलाओं, विशेषकर उच्च वर्ण की महिलाओं, की शिक्षा पर प्रतिबंध बढ़ने लगे।
    पर्दा एवं सामाजिक जीवन पर्दा प्रथा और महिलाओं की घरेलू सीमाओं में वृद्धि हुई।
    विवाह संबंधी प्रथा विवाह के बाद पति का गोत्र अपनाने की परंपरा अधिक प्रचलित होने लगी।

    ➣ हालाँकि कुछ अपवाद भी थे, जैसे कुछ रानियाँ और राजपरिवार की महिलाएँ राजनीतिक एवं प्रशासनिक रूप से प्रभावशाली थीं, लेकिन समग्र रूप से इस काल में महिलाओं की सामाजिक स्थिति में गिरावट देखी जाती है।

    धार्मिक परिवर्तन

    गुप्तोत्तर काल में धर्म अधिक लोक-उन्मुख (People-Oriented) हुआब्राह्मणवाद ने भक्ति, पुराणों और मंदिरों के माध्यम से जन-सामान्य तक अपनी पहुँच बनाई। बौद्ध धर्म की अपेक्षा हिंदू धर्म प्रमुख बन गया। क्षेत्रीय संस्कृतियों का विकास हुआ, जिसने आगे चलकर मध्यकालीन भारत की सांस्कृतिक नींव तैयार की।

    गुप्त काल में प्रारंभ हुई मूर्ति पूजा इस काल में व्यापक रूप से प्रचलित हो गई। हिंदू मंदिर केवल धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक केंद्र भी बन गए।

    ➣ मंदिरों में केवल पूजा-पाठ ही नहीं होता था, बल्कि नृत्य, संगीत, शिक्षा और सामुदायिक गतिविधियों का भी आयोजन किया जाता था।

    ब्राह्मणवाद / हिंदू धर्म का पुनरुत्थान

    गुप्त काल में प्रारंभ हुए हिंदू धर्म के पुनरुत्थान को गुप्तोत्तर काल (6वीं से 12वीं शताब्दी) में और अधिक बल मिला। इस काल को पुराणिक हिंदू धर्म तथा भक्ति-आधारित हिंदू धर्म के उदय का महत्वपूर्ण काल माना जाता है।

    विष्णु पुराण, शिव पुराण, भागवत पुराण और मार्कंडेय पुराण जैसे महत्वपूर्ण पुराणों का प्रणयन या संकलन इसी काल में हुआ। इनमें अवतारवाद (विशेषकर विष्णु के दस अवतार), भक्ति, कर्म और धर्म की विस्तृत व्याख्या की गई है।

    मुख्य संप्रदायों का विकास

    संप्रदाय मुख्य देवता प्रमुख विशेषताएँ
    वैष्णव संप्रदाय विष्णु, कृष्ण, राम • अवतारवाद (विशेषकर विष्णु के 10 अवतार) का प्रचार
    • भगवद्गीता का बढ़ता प्रभाव
    • कृष्ण और राम भक्ति का उदय
    • भक्ति मार्ग पर बल
    शैव संप्रदाय शिव, रुद्र • शिव लिंग पूजा का प्रचलन
    • योग, तपस्या और शैव सिद्धांत
    • कई राजवंश (चालुक्य, राष्ट्रकूट आदि) शैव थे
    • शिव मंदिरों का व्यापक निर्माण
    शाक्त संप्रदाय देवी (दुर्गा, काली, लक्ष्मी, पार्वती) • शक्ति उपासना का उदय
    • तंत्र-मंत्र और यंत्र पूजा
    • मातृदेवी पूजा का प्रचार
    • देवी मंदिरों का निर्माण

    बौद्ध धर्म का पतन

    गुप्तोत्तर काल (550 ई. से 12वीं शताब्दी) में बौद्ध धर्म का भारत में तेजी से पतन हुआ। यह प्रक्रिया गुप्त काल में ही शुरू हो चुकी थी, लेकिन गुप्तोत्तर काल में यह और अधिक तीव्र हो गई।
    बौद्ध धर्म के पतन के कारण विवरण
    ब्राह्मणवाद का पुनरुत्थान ब्राह्मणवाद के पुनरुत्थान और लोकप्रिय भक्ति आंदोलन के कारण बौद्ध धर्म का प्रभाव कम हुआ।
    हूण आक्रमण हूण शासकों, विशेषकर मिहिरकुल, द्वारा कई बौद्ध विहारों और संस्थानों को नुकसान पहुँचाया गया।
    संघों में भ्रष्टाचार बौद्ध संघों में भ्रष्टाचार बढ़ने तथा जन-सामान्य से दूरी बनने के कारण उनकी लोकप्रियता घटी।
    राजकीय संरक्षण में कमी यद्यपि कुछ शासकों जैसे हर्षवर्धन ने बौद्ध धर्म का समर्थन किया, फिर भी अधिकांश हिंदू राजाओं का संरक्षण ब्राह्मणवाद को मिला।
    क्षेत्रीय अस्तित्व पूर्वी भारत (बंगाल) और कुछ दक्षिणी क्षेत्रों में बौद्ध धर्म कुछ समय तक बना रहा।

    जैन धर्म की स्थिति

    जैन धर्म का प्रभाव गुप्तोत्तर काल में कुछ हद तक कम हुआ, लेकिन यह बौद्ध धर्म की तुलना में अधिक सुदृढ़ स्थिति में बना रहा। इसका प्रमुख केंद्र पश्चिमी भारत (राजस्थान और गुजरात) तथा दक्षिण भारत (कर्नाटक और तमिलनाडु) रहे।

    जैन समुदायों ने मंदिरों, मठों और बस्तियों का निर्माण जारी रखा। यद्यपि जैन मंदिरों का निर्माण होता रहा, फिर भी हिंदू धर्म की तुलना में इसका प्रभाव अपेक्षाकृत सीमित रहा।

    व्यापारी और व्यवसायी वर्ग में जैन धर्म की मजबूत पकड़ बनी रही, जिसके कारण इसे आर्थिक और सामाजिक समर्थन मिलता रहा।

    भक्ति आंदोलन का उदय

    भक्ति आंदोलन गुप्तोत्तर काल का सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक परिवर्तन था। इसकी शुरुआत दक्षिण India में हुई और यह धीरे-धीरे पूरे भारत में फैल गया।

    आलवार संत (6वीं–9वीं शताब्दी) ने विष्णु और कृष्ण की भक्ति में तमिल भजन रचे, जिन्हें दिव्य प्रबंधम (Divya Prabandham) में संकलित किया गया।

    नायनमार संतों ने शिव की स्तुति में भक्ति गीतों की रचना की, जो तेवरम (Tevaram) के नाम से प्रसिद्ध हैं।

    ➣ भक्ति आंदोलन ने यज्ञों और जटिल कर्मकांडों की अपेक्षा ईश्वर के प्रति प्रेम, समर्पण और व्यक्तिगत भक्ति को अधिक महत्व दिया।

    स्थानीय भाषाओं, विशेषकर तमिल में धार्मिक साहित्य की रचना को बढ़ावा मिला, जिससे धर्म और भक्ति का संदेश आम जनता तक पहुँचा।

    ➣ इस आंदोलन में विभिन्न सामाजिक वर्गों के लोगों ने भाग लिया और कई संत निम्न जातियों तथा साधारण परिवारों से भी आए।

    मंदिर केवल पूजा-स्थल नहीं रहे, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक गतिविधियों के महत्वपूर्ण केंद्र बन गए।

    भक्ति आंदोलन ने हिंदू धर्म को जनसामान्य के बीच अधिक लोकप्रिय बनाया और आगे चलकर मध्यकालीन भक्ति आंदोलन की मजबूत नींव रखी।

    अन्य सांस्कृतिक परिवर्तन

    पहलू विवरण
    शिक्षा ब्राह्मणों के नियंत्रण में गुरुकुल और मठों का विस्तार हुआ। नालंदा और विक्रमशिला जैसे बौद्ध शिक्षा केंद्रों के साथ-साथ हिंदू शिक्षा का भी विकास हुआ।
    समन्वय (सिंक्रेटिज्म) स्थानीय देवताओं, आदिवासी पूजाओं और ब्राह्मणिकल धर्म के बीच समन्वय स्थापित हुआ, जिससे नई धार्मिक परंपराएँ विकसित हुईं।
    त्योहार और रीति-रिवाज कृषि आधारित त्योहारों और स्थानीय उत्सवों को धार्मिक स्वरूप दिया गया तथा उनका सामाजिक महत्व बढ़ा।
    धार्मिक सह-अस्तित्व हिंदू, बौद्ध और जैन परंपराएँ अनेक क्षेत्रों में साथ-साथ विकसित हुईं, जिससे सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा मिला।
    लोक संस्कृति का विकास लोककथाओं, लोकगीतों और क्षेत्रीय परंपराओं को धार्मिक एवं सामाजिक जीवन में अधिक महत्व प्राप्त हुआ।
    तीर्थयात्रा परंपरा का विस्तार विभिन्न धार्मिक केंद्रों की यात्राएँ बढ़ीं, जिससे अलग-अलग क्षेत्रों के बीच सांस्कृतिक संपर्क मजबूत हुए।
    क्षेत्रीय सांस्कृतिक पहचान का उदय विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों ने अपनी विशिष्ट भाषा, कला, रीति-रिवाज और धार्मिक परंपराओं का विकास किया।
    धार्मिक अनुष्ठानों का प्रसार पूजा, व्रत, उपवास और मंदिर-आधारित धार्मिक गतिविधियाँ समाज के दैनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गईं।

    निष्कर्ष

    गुप्तोत्तर काल राजनीतिक रूप से विखंडन, विकेंद्रीकरण और सामंतवाद का युग था, जिसमें केंद्रीय सत्ता की शक्ति पहले की तुलना में काफी कम हो गई।

    गुप्त काल की एकल साम्राज्य व्यवस्था के स्थान पर अनेक क्षेत्रीय राज्यों और सामंत-प्रधान शासन व्यवस्था का उदय हुआ, जिससे भारतीय राजनीति अधिक स्थानीय और विकेंद्रित बन गई।

    ➣ कुछ इतिहासकार गुप्तोत्तर काल को अंधकार युग कहते हैं, लेकिन वास्तव में यह संक्रमण का युग था। इस काल में भारत क्षेत्रीय, ग्रामीण और सामंती व्यवस्था की ओर बढ़ा, जिसका प्रभाव पूरे मध्यकाल में दिखाई देता है।

  • 9वीं शताब्दी का चोल साम्राज्य : पुनरुत्थान और समुद्री साम्राज्य

    📚 विषय सूची

    चोल साम्राज्य का पुनरुत्थान (850-1150 ई.) : विजयालय

    ➣ चोल वंश दूसरी शताब्दी (संगम काल में) के मध्य ही अस्तित्व में आ गया था। उस समय इसका सबसे प्रसिद्ध शासक करिकाल था।

    ➣ नवीं सदी में विजयालय के नेतृत्व में चोलो का पुनरूत्थान हुआ। इतिहास में सामान्यत: इसे 9वीं शताब्दी का चौल वंश नाम से भी जाना जाता है।

    चोल साम्राज्य के राजाओ की सूची

    ➣ करिकाल के पश्चात चोल राज्य कमजोर हो गया। करिकाल के तीन पुत्रों क्रमश: . मनिनर्लोगल्ली, नेडुमुक्किलि तथा मावलतान के अतिरिक्त संगम साहित्य में चोल वंश के कुछ अन्य राजाओं के नाम भी प्राप्त होते हैं- कोप्परुन्जोलन, पेरुनरकिल्लि, कोचेगणान्मरु आदि।

    ➣ संगमयुगीन चोल शासकों ने दूसरी-चौथी सदी तक शासन किया।

    ➣ पल्लव, सातवाहनों के पतन के प्रश्चात दक्षिण भारत में एक शक्तिशाली राज्य बनकर उभरे।

    ➣ इस समय दक्षिण भारत में राष्ट्रकूटों, चालुक्यों, पल्लवों और पाण्ड्यों में सर्वोच्चता के लिए संघर्ष हो रहा था।

    ➣ संगम काल का अंतिम चेर शासक सेइयै (लगभग 210 ई.) था, जिसके समकालीन पाण्ड्य शासक नेडुंजेलियन ने इसे पराजित कर चेर राज्य की भी स्वंतत्रता का अंत कर दिया।

    ➣ 9वीं शताब्दी के मध्य लगभग 850ई. में विजयालय (850-875 ई.) के नेतृत्व में चोल शक्ति का पुनरुत्थान हुआ। इसलिए विजयालय को चोल वंश का द्वितीय संस्थापक भी कहा जाता है। आरम्भ में चोल पल्लवों के सामन्त थे।

    मेगास्थनीज के इंडिका और अशोक के अभिलेखों से ज्ञात होता है कि 9वीं-12वीं शताब्दी तक चोल वंश ने तमिलनाडु, आंध्र प्रदेशकर्नाटक पर शासन किया।

    ➣ इनके समकालीन राष्ट्रकूट दक्षिण क्षेत्र में शक्तिशाली राज्य था। राष्ट्रकूट शासक कृष्ण तृतीय ने 949 ई. में चोल सम्राट परान्तक प्रथम को पराजित किया और चोल साम्राज्य के उत्तरी क्षेत्र पर अधिकार कर लिया था।

    ➣ हालाँकि राष्ट्रकूट नरेश कृष्ण तृतीय की मृत्यु के पश्चात् राष्ट्रकूटों का पतन होने लगा। अत: चोल एक बार फिर उठे।

    9वीं शताब्दी का चोल साम्राज्य
      उरवप्पहर्रे इलन जेत चेन्नी
     करिकाल 190-
     विजयालय 850 – 875 ई.
     आदित्य 875 – 907 ई.
     परान्तक प्रथम 908 – 949 ई.
     परान्तक द्वितीय 956 – 983 ई.
     राजराज प्रथम 985 – 1014 ई.
     राजेन्द्र प्रथम 1014 – 1044 ई.
     राजाधिराज 1044 – 1052 ई.
     राजेन्द्र द्वितीय 1052 – 1064 ई.
     वीर राजेन्द्र 1064 – 1070 ई.
     अधिराजेन्द्र 1070-कुछ महीने
    कुलोत्तुंग प्रथम 1070 – 1120 ई.
     विक्रम चोल 1120 – 1133 ई.
     कुलोत्तुंग द्वितीय 1133 – 1150 ई.

    कुलोत्तुंग प्रथम वेंगी के चालुक्य का शासक था। क्योंकि अधिराजेन्द्र उसी वर्ष सिंहासन आरूढ़ हुआ था उसी वर्ष उसकी मृत्यु भी हो गयी। उसका कोई पुत्र नहीं था अत : कुलोत्तुंग प्रथम ने चोल वंश की सत्ता संभाली क्योंकि वह चोल राजकुमारी का पुत्र था।

    विजयालय (850 – 875 ई.) : चोल साम्राज्य का पुनरुत्थान

    ➣ विजयालय को चोल साम्राज्य का द्वितीय संस्थापक माना जाता है। आरम्भ में वह पल्लवों का सामन्त था।

    ➣ विजयालय ने पल्लवों की अधीनता से चोल को मुक्त किया तथा स्वतंत्रतापूर्वक शासन करना आरम्भ किया।

    ➣ विजयालय ने पाण्ड्य शासकों से तंजौर (तंजावुर) को छीनकर उरैयूर के स्थान पर तंजौर को अपने राज्य की राजधानी बनाई।

    ➣ तंजौर को जीतने के उपलक्ष्य में विजयालय ने नरकेसरी की उपाधि धारण की थी। तंजौर विजय का उल्लेख तिरूकोयिलूर लेख में मिलता है।

    ➣ विजयालय ने निशुम्भसूदिनी देवी मंदिर का निर्माण करवाया था।

    ➣ विजयालय का पुत्र एवं उत्तराधिकारी आदित्य प्रथम लगभग 871-907 ई. में चोल सिंहासन पर बैठा। आदित्य प्रथम (875 – 907 ई.) : पल्लव शक्ति का अंत

    ➣ इसने चोलों को पूर्ण स्वतन्त्र किया एवं पल्लव सत्ता को समाप्त कर दिया। आदित्य परम शैव भक्त था और उसने शिव के अनेक मंदिर बनाए।

    ➣ उसने 890 ई. के लगभग अपने समकालीन पल्लव शासक अपराजित वर्मन को परास्त कर उसकी हत्या कर दी तथा तोंडमंडलम्‌ को अपने राज्य में मिला लिया एवं तोण्डेनाडू, नरकेसरी एवं कोदण्डराम की उपाधि धारण की।

    ➣ पल्लवों की इस पराजय के कारण आदित्य के चोल राज्य की उत्तरी सीमा दक्षिणापथपति राष्ट्रकूटों के राज्य की सीमा के साथ आ लगी।

    ➣ पल्लवों के अतिरिक्त उसने पाण्ड्यों एवं कलिंग देश के गंगों को भी पराजित किया और मदुरैकोण्ड की उपाधि धारण की।

    ➣ 949 ई. में राष्ट्रकूट नरेश कृष्ण तृतीय ने पश्चिमी गंगों की सहायता से चोलों पर आक्रमण कर दिया।

    ➣ इस आक्रमण से तक्कोलम के युद्ध में चोल बुरी तरह पराजित हुये

    परान्तक प्रथम (908 – 949 ई.) : मदुरै विजय और विस्तार नीति

    ➣ परांतक ने 915 ई. में वेल्लूर के युद्ध में नरेश राजसिंह द्वितीय पर आक्रमण कर पाण्ड्यों की राजधानी मदुरै पर अधिकार कर लिया।

    ➣ पुन: पाण्ड्य नरेश ने श्रीलंका के शासक कस्सप पंचम से सैनिक सहायता प्राप्त कर परान्तक के ख़िलाफ़ युद्ध किया। पर चोल राजा परान्तक से बुरी तरह परास्त हुआ।

    ➣ 949 ई. में उसे राष्ट्रकूट नरेश कृष्ण तृतीय ने पश्चिमी गंगों की सहायता से तक्कोलम के युद्ध में बुरी तरह परास्त किया तथा साम्राज्य का उत्तरी भाग (तोण्डमण्डलम) राष्ट्रकूट साम्राज्य में मिल गया।

    ➣ राष्ट्रकूट राजा कृष्ण तृतीय (940-968) ने कांची को एक बार फिर राष्ट्रकूट साम्राज्य में मिला लिया। पर कृष्ण तृतीय केवल कांची की विजय से ही संतुष्ट नहीं हुआ, उसने दक्षिण दिशा में आगे बढ़कर चोलो की राजधानी तंजौर पर आक्रमण कर उसे भी जीत लिया।

    ➣ तंजोर को जीत के उपलक्ष में उसने तैजजयुकोण्ड की उपाधि धारण की और कुछ समय के लिए चोल राज्य की स्वतंत्र सत्ता का अन्त कर दिया।

    ➣ परान्तक प्रथम के समय के उत्तरमेरूर के अभिलेखों (919 ई.व 921 ई.) से चोल स्थानीय स्वशासन की जानकारी मिलती है।

    ➣ उसने मदुरैकोण्ड की उपाधि धारण की। परान्तक प्रथम की एक प्रसिद्ध उपाधि उत्तम चोल भी थी।

    ➣ ऋग्वेद का टीकाकार वेंकटमाघव उसका समकालीन था।

    ➣ चोलराज परान्तक के पुत्र राजादित्य ने राष्ट्रकूटों से युद्ध करते हुए वीरगति प्राप्त की।

    ➣ परान्तक प्रथम ने भूमि का सर्वेक्षण कराया और हेमगर्भ एवं तुलाभार नामक यज्ञ एवं मंदिर बनवाने का भी श्रेय परान्तक को ही जाता है।

    ➣ उसके उत्तरमेरुर लेख से चोलों के स्थानीय स्वशासन की जानकारी प्राप्त होती है।

    अन्य उत्तराधिकारी

    ➣ परान्तक प्रथम के बाद क्रमशः गंडरादित्य (955 से 957 ई.) एवं अरिन्जय (957 ई.) चोल वंश के शासक हुए। जो अयोग्य साबित हुए।

    परान्तक द्वितीय (956-973 ई.) को चोल राजवंश के शासक सुन्दरचोल के नाम से भी जाना जाता था।

    ➣ उसने समकलीन पाण्ड्य शासक वीर पाण्ड्य को चेबूर मैदान में पराजित किया था एंव तथा श्रीलंका के शासक महिन्द चतुर्थ पर असफल आक्रमण किया।

    उत्तमचोल (973-985 ई.) ने चोलों में सर्वप्रथम सोने के सिक्के जारी किये एवं राष्ट्रकूटों से तोण्डमण्डलम जीता।

    राजराज प्रथम (985 – 1014 ई.) : चोल साम्राज्य का स्वर्णकाल एवं नौसैनिक शक्ति

    ➣ यह अरिमोलिवर्मन परान्तक द्वितीय का पुत्र एवं उत्तराधिकारी, परान्तक द्वितीय के बाद चोल राजवंश के सिंहासन पर बैठा। राजराज प्रथम का प्रारम्भिक नाम अरूमोलिवर्मन था।

    ➣ राजराज के शासन के साथ चोल इतिहास की महानता का युग प्रारम्भ हुआ। उसने मूम्माडिचोल देव, जयगोण्ड, चोल-मार्त्तण्ड, अरिमोलिवर्मन, राजाश्रय, चोलेन्द्र सिंह एवं राजमार्त्ताण्ड आदि उपाधियाँ भी ग्रहण की।

    ➣ उसने अपने पितामह परान्तक प्रथम की लौह एवं रक्त की नीति का पालन करते हुए राजराज की उपाधि ग्रहण की।

    तंजौर अभिलेख में राजराज प्रथम के युद्ध अभियानों का क्रमिक विवरण मिलता है। तिरूवलंगाडु ताम्रपत्र अभिलेखों में राजराज प्रथम की चेरों एवं पाण्ड्यों के विरुद्ध विजयों एवं श्रीलंका विजय का उल्लेख है।

    ➣ उसने सर्वप्रथम चेरों (केरल शासक रविवर्मा) की नौसेना को कंडलूर में परास्त किया तथा इस विजय के उपलक्ष्य में माण्डलूर शालैकमरुत की उपाधि ग्रहण की।

    ➣ चेरों के बाद राजराज ने पाण्ड्य शासक अमर भुजंग को पराजित कर राजधानी मदुरै को अपने क़ब्ज़े में कर लिया।

    ➣ राजराज प्रथम ने श्रीलंका पर आक्रमण कर उसके शासक महेन्द्र (महिन्द) पंचम को पराजित किया और श्रीलंका के उत्तरी भाग को चोल साम्राज्य का एक प्रान्त बना दिया और इसे मुम्डिचोलमण्डलम् का नाम दिया।

    ➣ चोल सेनाओं ने श्रीलंका की प्राचीन राजधानी अनुराधापुर को नष्ट कर पोलन्नरूआ को चोल प्रान्त की नई राजधानी बनाया व इसका नाम जयनाथ मंडलम रखा।

    ➣ राजराज के श्रीलंका विजय दक्षिण एवं एशियाई देशों के साथ व्यापार को अपने अधिकार में लाने के उद्देश्य से किया था। उसने श्रीलंका विजय की स्मृति में वहाँ एक शिव मन्दिर का निर्माण कराया।

    ➣ राजराज प्रथम ने वेंगी के अपदस्थ चालुक्य राजकुमारों (शक्तिवर्मन और विमलादित्य) को चोडभीम के विरुद्ध शरण देकर सैनिक दी।

    ➣ राजराज ने वेंगी के अपदस्थ राजकुमारों (शक्तिवर्मन एवं विमलादित्य) को चोडभीम के विरुद्ध संरक्षण प्रदान किया। उसने भीम को पराजित करके शक्ति वर्मन को वेंगी का राजा बनाया, अब वेंगी उसका संरक्षित राज्य बन गया।

    ➣ चोल अभिलेखों से विदित होता है कि राजराज ने कलिंग सहित 12000 पुराने द्वीपों वाले सामूहिक प्रदेशों, जिसकी पहचान लक्षद्वीप एवं मालद्वीप के साथ की गई है को विजित किया।

    ➣ राजराज ने अपनी यशस्वी विजयों का समापन मालदीव द्वीप समूह की विजय से किया। यह विजय उसकी नौ सेना की अद्भुत उपलब्धि थी।

    ➣ राजराज प्रथम ने श्रीविजय के शैलेन्द्र शासक श्रीमारविजयोतुंगवर्मन को नागपट्टनम् में एक चूड़ामणि बौद्ध विहार के निर्माण की अनुमति दी, यद्यपि राजराज प्रथम शैव था।

    ➣ राजराज प्रथम के काल में एक दूतमण्डल चीन गया था।

    ➣ राजराज प्रथम ने शैव मतानुयायी था। उसने शिवपादशेखर की उपाधि धारण की। उसके द्वारा प्रचलित सिक्कों पर कृष्ण मुरलीधर तथा विष्णु-पद-चिह्न आदि का अंकन उल्लेखनीय है।

    ➣ राजराज प्रथम ने अपनी रानी लोक महादेवी के साथ तिरूवलजलि मन्दिर में तुलाभार एवं हिरण्यगर्भ नामक यज्ञ किया था। दक्षिण भारत में सर्वप्रथम खड़ी या आसीनस्थ आकृति वाले सिक्के जारी किये है।

    ➣ उसने 1000 ई. में भूराजस्व के निर्धारण के लिए भूमि का सर्वेक्षण कराया और स्थानीय स्वशासन को प्रोत्साहन दिया।

    ग्राम सभाओं एवं स्वशासित निगमों द्वारा सार्वजनिक धन के दुरुपयोग को रोकने हेतु उसने हिसाब के जाँच पड़ताल की व्यवस्था की।

    ➣ राजराज प्रथम ने मुम्मडिचोल देव, जयगोण्ड, चोलमार्तण्ड, शिवपादशेखर आदि उपाधियाँ भी ग्रहण की।

    ➣ चोल स्थापत्य कला के क्षेत्र में राजराज का योगदान सर्वथा नवीन रहा। तंजौर में उसके द्वारा निर्मित बृहदेश्वर या राजराजेश्वर मन्दिर (शिव मन्दिर) एवं भवन तमिल स्थापत्य के सर्वाधिक सुन्दर स्मारकों में से है।

    ➣ राजराज प्रथम ने अपने शासन काल में चोल अभिलेखों का प्रारम्भ ऐतिहासिक प्राक्कथन (प्रशस्ति) के साथ करवाने की प्रथा की शुरुआत की।

    राजेन्द्र प्रथम (दक्षिण का नेपोलियन) (1014 – 1044 ई.) : गंगईकोंडचोलपुरम् एवं समुद्री विजय

    ➣ वह राजराज प्रथम का पुत्र एवं उत्तराधिकारी था। यह अपने पिता के समान ही साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का था। उसके समय नौसेना का सर्वाधिक विकास हुआ।

    ➣ अपने विजय अभियान के प्रारम्भ में उसने पश्चिमी चालुक्यों, पाण्ड्यों एवं चेरों को पराजित किया। इन राज्यों पर अधिकार करने के पश्चात् उसने अपने पुत्र राजाधिराज प्रथम को पाण्ड्य प्रदेश का वायसराय (महामण्डलेश्वर) नियुक्त किया और उसे चोल पाण्ड्य की उपाधि दी।

    ➣ राजेन्द्र प्रथम के तिरूवालंगाडु एवं करंबाई (तंजौर) अभिलेखों से उसकी उपलब्धियों की जानकारी प्राप्त होती है।

    ➣ राजेन्द्र प्रथम ने संपूर्ण श्रीलंका को विजित किया। राजराज प्रथम ने सिर्फ उत्तरी श्रीलंका ही जीता था। स्मिथ ने राजेन्द्र प्रथम को दक्षिण का नेपोलियन कहा था।

    ➣ लगभग 1017 ई. में सिंहल (श्रीलंका) राज्य के विरुद्ध अभियान में उसने वहां के शासक महेन्द्र पंचम को परास्त कर उसे बंदी बना लिया। सिहंल विजय का उल्लेख करन्दै ताम्रपत्र एवं महावंश में मिलता है।

    ➣ बंदीगृह में 1029 ई. में महेन्द्र पंचम की मृत्यु हो गई। कालांतर में महिन्द पंचम के पुत्र कस्यप ने दक्षिणी लंका पर पुनः अधिकार कर लिया तथा विक्रमबाहु प्रथम के नाम से वहां राज्य किया।

    ➣ राजेन्द्र प्रथम के सामरिक अभियानों का महत्त्वपूर्ण कारनामा था- उसकी सेनाओं का गंगा नदी पार कर कलिंग एवं बंगाल तक पहुंच जाना।

    ➣ राजेन्द्र की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विजय 1035 ई. कडारम (आधुनिक केद्दक) के श्री विजय साम्राज्य के विरुद्ध सफल सैनिक अभियान था। श्री विजय साम्राज्य मलाया प्रायद्वीप, सुमात्रा, जावा और निकटवर्ती द्वीपों तक फैला था।

    ➣ चोल जहाजी बेड़े ने बंगाल की खाड़ी को पारकर कडारम के श्रीविजय नरेश संग्राम कुलोतुंगवर्मन को पराजित किया और निकोबार द्वीप समूह एवं मलय प्रायद्वीप के मध्य कडारम सहित बारह द्वीपों पर अधिकार कर लिया।

    ➣ श्रीविजय साम्राज्य के विरुद्ध राजेन्द्र चोल के अभियान का उद्देश्य भारतीय व्यापारियों के मार्ग में चीन से व्यापार में आ रही बाधाओं को दूर करना था। श्रीलंका एवं महाद्वीप पर जलसेना के कारण चोल नियन्त्रण बना हुआ था, जिसके कारण पूर्वी जगत विशेषतः चीन के साथ व्यापार को भी प्रोत्साहन मिल रहा था।

    ➣ श्रीविजय साम्राज्य के विरुद्ध राजेन्द्र चोल की सफलता के कारण चीन के साथ व्यापारिक संपर्क पहले से आसान हो गया। राजेन्द्र प्रथम ने इस उपलक्ष्य में कडारकोंड एवं कटाहधिपति की उपाधि धारण की।

    ➣ उसने बंगाल के पाल शासक महिपाल प्रथम को पराजित कर गंगाघाटी के अभियान की सफलता पर गंगैकोण्डचोल की उपाधि धारण की तथा गंगैकोण्डचोलपुरम (वर्तमान में त्रिचनापल्ली में) नामक नयी राजधानी की स्थापना की। गंगाघाटी के अभियान का नेतृत्व राजेन्द्र प्रथम के पुत्र विक्रम चोल ने किया।

    ➣ नवीन राजधानी के निकट सिंचाई के लिए चोलगंगम नामक तालाब का निर्माण करवाया।

    ➣ राजेन्द्र प्रथम पहला भारतीय चोल शासक था जिसने अरब सागर पर अपनी प्रभुता कायम की। अरब सागर स्थित सदिमन्तीब द्वीप पर अपना अधिकार स्थापित किया। चोल शासक द्वारा यह पश्चिम का सर्वप्रथम अभियान था।

    ➣ राजेन्द्र द्वारा बंगाल पर आक्रमण निश्चित रूप से तमिल प्रदेश से प्रथम उत्तरी सैनिक अभियान था। उसके समय बंगाल की खाड़ी चोलों की झील कहलाती थी।

    ➣ राजेन्द्र चोल के शासन काल में दक्षिण भारत में वैदिक शिक्षा एवं दर्शन का प्रचुर विकास हुआ। उसने वैदिक साहित्य के अध्ययन के लिए एक विशाल विद्यालय की स्थापना करवायी। उसके विद्यानुराग की पुष्टि उसकी उपाधियों जैसे- पण्डित चोल, मुडिगुंडचोल आदि से होती है।

    ➣ उसने दो बार (1016 ई. व 1033 ई.) व्यापारिक दूतमण्डल चीन भेजा।

    राजाधिराज प्रथम (1044 – 1052 ई.) : चालुक्यों के विरुद्ध संघर्ष

    ➣ राजाधिराज प्रथम (1044-1052 ई.), राजेन्द्र प्रथम का पुत्र था और उसके बाद राज्य का वास्तविक उत्तराधिकारी था। उसने चेर-पाण्ड्य तथा श्रीलंका के संघ को तोड़ने में सफलता प्राप्त की।

    ➣ उसके शासन काल में पाड्य, चेर वंश और सिंहल (श्रीलंका) के राज्यों ने स्वतंत्र होने का प्रयत्न किया, पर चोलराज ने उन्हें बुरी तरह से कुचल डाला।

    ➣ राजाधिराज ने तत्कालीन चालुक्य नरेश सोमेश्वर प्रथम आहवमल्ल को धान्यकटक तथा पुण्डूर के युद्ध में पराजित किया तथा चालुक्य राजधानी कल्याणी पर अधिकार कर लिया। इस विजय के उपलक्ष्य में राजाधिराज ने वहीँ अपना वीरभिषेक करवाकर विजय राजेन्द्र की उपाधि ग्रहण की थी।

    ➣ राजधानी कल्याणी की विजय स्मृति के रूप में वहां से एक द्वार पालक की मूर्ति लाकर राजाधिराज ने उसे तंजौर नगर के रासुरम नामक स्थान पर स्थापित करवाया।

    ➣ कालान्तर में लगभग 1050 ई. में सोमेश्वर ने चोल सेनाओं को अपने प्रदेश से बाहर खदेड़ दिया और साथ ही वेंगी के शासक राजाराम को अपनी अधीन कर लिया।

    ➣ राजाधिराज प्रथम ने अश्वमेध यज्ञ भी किया, जिसका मणिमंगलम लेख में उल्लेख है।

    कोप्पम का युद्ध (1054 ई.)

    ➣ यह युद्ध दक्षिण भारत में प्रभुत्व स्थापित करने तथा कृष्णा-तुंगभद्रा क्षेत्र एवं वेंगी पर नियंत्रण के लिए हुआ।

    ➣ चोल पक्ष का नेतृत्व राजाधिराज प्रथम कर रहे थे, जबकि चालुक्य पक्ष का नेतृत्व सोमेश्वर प्रथम के हाथों में था।

    ➣ युद्ध के दौरान राजाधिराज प्रथम वीरगति को प्राप्त हुए, जिससे चोल सेना में कुछ समय के लिए अव्यवस्था फैल गई।

    ➣ इसके बाद छोटे भाई राजेंद्र द्वितीय ने सेना का नेतृत्व संभाला, सैनिकों को पुनर्गठित किया और अंततः चालुक्यों को पराजित कर चोलों को विजय दिलाई।

    ➣ कहा जाता है कि युद्धभूमि में ही राजेन्द्र द्वितीय का राज्याभिषेक किया गया था। यह युद्ध चोल सैन्य शक्ति, वीरता और नेतृत्व क्षमता का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है।

    ➣ राजाधिराज प्रथम को अनमेरूथजिन (हाथी की पीठ पर मृत्यु को प्राप्त) कहा गया है। उसने भूपेन्द्र चोल की उपाधि धारण की थी।

    राजेन्द्र द्वितीय (1052 – 1064 ई.) : कोप्पम युद्ध में विजय

    कोप्पम के युद्ध में राजाधिराज की हत्या के बाद इसने कल्याणी के चालुक्यो को पराजित कर युद्ध भूमि में ही अपना राज्याभिषेक करवाया तथा कोल्हापुर में विजयस्तम्भ स्थापित किया एवं प्रकेशरी उपाधि धारण की।

    ➣ राजेन्द्र द्वितीय ने 1062 ई. में कुंडलसंगमम् में चालुक्य (सोमेश्वर प्रथम) सेना को पराजित किया था।

    ➣ उसने अपनी पुत्री का विवाह पूर्वी के चालुक्य नरेश राजेन्द्र के साथ किया था।

    वीर राजेन्द्र (1064 – 1070 ई.) : चोल सत्ता का सुदृढ़ीकरण

    ➣ राजेन्द्र द्वितीय की मृत्यु के बाद उसका छोटा भाई वीर राजेन्द्र गद्दी पर बैठा। उसें राजकेसरी की उपाधि धारण की थी।

    ➣ उसने 1060 ई. के आसपास अपने परम्परागत शत्रु पश्चिमी चालुक्यों को कुडलसंगमम् के मैदान में पराजित किया। इस विजय के उपलक्ष्य में वीर राजेन्द्र ने तुंगभद्रा नदी के किनारे एक विजयस्तम्भ की स्थापना करवाई।

    ➣ पश्चिमी चालुक्य नरेश सोमेश्वर युद्ध में के असाध्य रोग के कारण कूड्डल-संगमम् के युद्ध में उपस्थित न हो सका सोमेश्वर ने अपने अपमान एवं रोग से त्रस्त होकर तुंगभद्रा में डूबकर आत्महत्या कर ली।

    ➣ पश्चिमी चालुक्य साम्राज्य के ख़िलाफ़ एक अन्य अभियान में कम्पिलनगर को जीतने के उपलक्ष्य में करडिग ग्राम में एक और विजयस्तम्भ स्थापित करवाया था।

    ➣ उसने सिंहल नरेश विजयबाहु प्रथम के विरुद्ध सैनिक अभियान कर उसे पराजित कर वातगिरि में शरण लेने के लिए बाध्य किया।

    ➣ वीर राजेन्द्र के द्वारा कडारम् को जीतने का भी प्रयास किया गया था।

    अधिराजेन्द्र (1070 ई.) : चोल उत्तराधिकार संघर्ष

    ➣ वीर राजेन्द्र की मृत्यु के बाद अधिराजेन्द्र (1070 ई.) सिंहासन आरूढ़ हुआ। वह चोल साम्राज्य की शक्ति को अक्षुण्ण रखने में असमर्थ रहा।

    ➣ अधिराजेन्द्र शैव धर्म का अनुयायी था। उसके समकालीन प्रसिद्ध वैष्णव आचार्य रामानुज से इतना द्वेष करता था कि, रामानुज को उसके राज्य काल में श्रीरंगम छोड़कर अन्य स्थान जाना पड़ा।

    ➣ उसके शासन काल में सर्वत्र विद्रोह शुरू हो गए और इन्हीं के विरुद्ध संघर्ष करते हुए अपने राज्य के पहले साल में ही उसकी मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के साथ ही चोल वंश समाप्त हो गया।

    ➣ अशांतिमय परिस्थिति का लाभ उठाकर राजेन्द्र द्वितीय कुलोत्तुंग प्रथम के नाम से चोल राजसिंहासन पर बैठा।

    ➣ चूँकि वेंगी के चालुक्य कुलोत्तुंग प्रथम चोल राजकुमारी का पुत्र था इसलिए उसे चोल सिंहासन भी प्राप्त हो गया। अब वेंगी के चालुक्य तथा चोल राज्य परस्पर एक हो गए।

    ➣ इसे 1070 ई0 के लगभग वेंगी का अस्तित्व समाप्त हो गया। इसके बाद का चोल इतिहास चोल-चालुक्य वंशीय इतिहास के नाम से जाना जाता है।

    चोल+चालुक्य वंश

    ➣ इस वंश का संस्थापक राजेन्द्र द्वितीय, विष्णुवर्धन (पूर्वी चालुक्य) का पुत्र था। वह चोल शासक अधिराजेन्द्र की मृत्यु के पश्चात अशांतिमय परिस्थिति का लाभ उठाकर वह कुलोत्तुंग प्रथम के नाम से चोल राजसिंहासन पर बैठा।

    9वीं शताब्दी में चोल+चालुक्य वंश

    कुलोत्तुंग प्रथम (1070 – 1120 ई.) : चोल-चालुक्य एकता एवं प्रशासनिक सुधार

    ➣ विल्हण के विक्रमांकदेवचरित से ज्ञात होता है उसने दक्षिण के चालुक्य नरेश विक्रमादित्य षष्ठ को पराजित किया था।

    ➣ 1075-76 ई. में कुलोत्तंग ने कलचुरी शासक यशकर्णदेव को तथा 1100 ई. में कलिंग नरेश अनन्तवर्मा चोडगंग को पराजित किया।

    ➣ कुलोत्तुंग के शासन काल में सिंहली (श्रीलंका) नरेश विजयबाहु ने अपने को स्वतंत्र घोषित कर लिया।

    ➣ बौद्ध महावंश से प्राप्त ;जानकारी के अनुसार , कुलोत्तुंग ने उसकी स्वतन्त्रता में हस्तक्षेप न कर उससे मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाकर सिंहली राजकुमार वीरप्पेरुमाल के साथ अपनी पुत्री का विवाह करा लिया।

    ➣ कुलोत्तुंग प्रथम ने चोल शासक राजेन्द्र द्वितीय की पुत्री मधुरान्तकी से विवाह किया। वह सर्वाधिक समय तक शासन करने वाला चोल शासक था।

    राजराज प्रथम की तरह कुलोत्तुंग ने भी भूराजस्व निर्धारण के लिए भूमि का पुनः सर्वेक्षण कराया।

    ➣ उसने व्यापार की प्रगति में बाधक चुंगियों तथा तटकरों को समाप्त कर दिया, जिसके कारण उसे शुंगम् (करों को हटाने वाला) की उपाधि मिली।

    ➣ कुलोतुंग प्रथम के स्वर्ण सिक्कों पर उसकी कुछ उपाधियाँ जैसे- कटैकोण्डचोल तथा मलैनडुकोण्डचोलन का उल्लेख प्राप्त होता है।

    ➣1090 ई. में कडारम नरेश ने कुलोत्तुंग के पास अपना दूत भेजा एवं नागपट्टम स्थित चूड़ामणि बौद्ध विहार को दान दी गई भूमि को करमुक्त करवाया।

    1077 ई. में उसने 72 व्यापारियों का एक व्यापारिक शिष्टमण्डल चीन भेजा।

    ➣ उसके शासक काल में मलय प्रायद्वीप के साथ चोलों के सुदृढ़ व्यापारिक एवं सांस्कृतिक सम्बन्ध रहे।

    ➣ कुलोत्तुंग प्रथम के स्वर्ण सिक्कों पर उसकी कुछ उपाधियाँ जैसे कटैकोण्डचोलन तथा मलैनडुकोण्डचोलन का उल्लेख है।

    ➣ अपने शासन के अन्तिम वर्षों में कुलोत्तुंग प्रथम ने कलिंग के विरुद्ध दो बार अभियान किया। उसके द्वितीय कलिंग अभियान का उल्लेख कलिंगतुप्परणी नामक महाकाव्य में मिलता है। इसके लेखक जयन्गोन्दार थे।

    ➣ कुलोत्तुंग प्रथम के समय में अदियरक्कुनल्लर ने शिलप्पादिकारम पर टीका लिखी।

    ➣ इसने तिरूवाडुतुरू में एक चिकित्साविद्यालय की स्थापना की, जहाँ चरक संहिता एवं अष्टांग हृदय जैसे ग्रन्थों का अध्ययन होता था।

    ➣ वैष्णव सुधारक रामानुज को कुलोत्तुंग प्रथम के कारण श्री रंगम छोड़ना पड़ा। फिर उसने मैसूर में होयसल शासक विट्टिग विष्णु वर्धन के यहां शरण ली।

    ➣ कुलोत्तंग प्रथम के शासन के अन्तिम दिनों में वेंगी व मैसूर स्वतन्त्र हो गये थे। इस समय कुलोत्तुंग का शासन केवल तमिल प्रदेश एवं कुल तेलुगू क्षेत्रों तक सीमित रह गया।

    विक्रम चोल (1120 – 1133 ई.) : चोल सत्ता का पुनर्संगठन

    ➣ वह कुलोत्तुंग प्रथम का पुत्र था। जो पिता की मृत्यु के पश्चात राजसिंहासन पर आसीन हुआ था। वह धार्मिक दृष्टि से असहिष्णु प्रवृत्ति का व्यक्ति था। उसने अकलक एवं त्याग समुद्र की उपाधियाँ धारण की थीं।

    ➣ वेंगी शासक विक्रमादित्य षष्ठ के पश्चात् विक्रम चोल ने पुनः वेंगी पर अधिकार कर लिया। 1133 ई. के लगभग उसने पश्चिमी चालुक्य नरेश सोमेश्वर तृतीय को पराजित किया।

    ➣ उसने अकाल एवं बाढ़ के समय में प्रजा से जबरन राजस्व वसूल कर, चिदम्बरम् के मन्दिर को सुसज्जित किया।

    कुलोत्तुंग द्वितीय (1133 – 1150 ई.) : धार्मिक संरक्षण एवं मंदिर निर्माण

    ➣ कुलोत्तुंग द्वितीय विक्रम चोल का पुत्र था। इस शासक की कोई भी राजनीतिक उपलब्धि नहीं थी। कुलोत्तुंग ने चिदम्बरम मंदिर के विस्तार एवं प्रदक्षिणापथ को स्वर्णमंडित कराने के कार्य को जारी रखा।

    ➣ कुलोत्तुग द्वितीय कट्टर शैव था तथा उसने गोविन्दराज की प्राचीन वैष्णव मूर्ति को समुद्र में फिंकवा दिया। यह प्रतिमा चिदम्बरम के नटराज (शिव) मन्दिर के प्रांगण में स्थित थी।

    ➣ रामानुज ने गोविन्दराज की मूर्ति को समुद्र से निकलवा कर तिरूपति में स्थापित करवाया। गोविन्दराज की यह मूर्ति लम्बे समय बाद विजयनगर के रामराय ने पुनः अपने मूल स्थान चिदम्बरम के नटराज मंदिर में स्थापित करवाई।

    ➣ कुलोत्तंग द्वितीय और उसके सामन्तों ने ओट्टाकुट्टन, शेक्किलर और कंबल को संरक्षण दिया था।

    ➣ उसने कुंभकोणम के निकट तिरुभुवन में कम्पोरेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया एंव चिदम्बरम के नटराज मन्दिर के निर्माण कार्य को पूर्ण करवाया।

    राजराजा द्वितीय (1150 – 1173 ई.) : दारासुरम् मंदिर का निर्माण

    ➣ यह कुलोत्तुंग द्वितीय का पुत्र तथा उत्तराधिकारी था जिसने लगभग 1150 ई. से 1173 ई. तक शासन किया। उसे चोल साहित्य में मुक्तमिल कुततिलैयन (तमिल संरक्षक) कहा गया है।

    ➣ उसका राज्य सम्पूर्ण तेलगू प्रदेश, कोगूनाद के अधिकांश भागों तथा गड्गवाडि के पूर्वी भगा तक फैला हुआ था। उसके समय में चारो ओर शक्तिशाली सामंतों का उदय हुआ।

    ➣ उसके कोई पुत्र नहीं था। अत: 1166 ई. में उसने विक्रमचोल के पौत्र (पुत्री के पुत्र) राजाधिराज द्वितीय को अपना युवराज नियुक्त किया।

    राजाधिराज द्वितीय (1173 – 1182 ई.) : पांड्य संघर्ष एवं चोल प्रभुत्व

    ➣ यह राजराज का उत्तराधिकारी था। इस समय पांड्य वंश में कुलशेखर तथा वीर पांड्य के बीच उत्तराधिकार के लिये संघर्ष हुआ था।

    ➣ राजाधिराज ने वीर पांड्य का पक्ष लिया तथा कुलशेखर का समर्थन श्रीलंका के राजा पराक्रमबाह ने किया।

    ➣ राजाधिराज को सफलता मिली तथा उसने वीर को पांड्यों का राजा बनाया। परंतु इससे चोलों को कोई लाभ नहीं हुआ।

    कुलोत्तुंग तृतीय (1182 – 1216 ई.) : चोल साम्राज्य का अंतिम शक्तिशाली शासक

    ➣ यह राजधिराज का उत्तराधिकारी था परंतु राजाधिराज के साथ उसका संबंध अज्ञात है। वह चोल साम्राज्य का अंतिम शासक था।

    1182 ई. में उसने वीरपांड्य को पराजित किया तथा उसे अपनी अधीनता में रहने के लिये बाध्य किया। कुलोत्तुंग ने होयसलचेर राजाओं को भी जीतकर अपनी अधीनता में किया।

    ➣ कुछ समय बाद पांड्यों ने जटावर्मन कुलशेखर के नेतृत्व में पुनः विद्रोह किया। 1205 ई. में कुलोत्तुगड् ने पांड्य राज्य पर आक्रमण किया।

    ➣ उसकी सेना ने मदुरा लूटा तथा पांड्यों के अभिषेक मंडल को ध्वस्त कर दिया। परंतु कुलशेखर को उसका राज्य पुन: वापस कर दिया गया।

    राजराज तृतीय (1216 – 1250 ई.) : चोल साम्राज्य का पतन प्रारंभ

    ➣ कुलोत्तुग का उत्तराधिकारी राजराज तृतीय एक निर्बल राजा था। उसके राज्य में चतुर्दिक विद्रोह व अराजकता फैल गयी।

    पांड्य नरेश सुंदर ने उसके राज्य पर आक्रमण कर उसे बंदी बना लिया परंतु होयसल नरेश नरसिंह द्वितीय की सहायता से उसे मुक्ति मिली।

    तेल्लारू के युद्ध में उसे यादव सरदार कोप्पेरूजिंग ने परास्त कर बंदी बना लिया।

    1231 ई. में होयसल सेना की सहायता से वह पुनः अपनी स्वतंत्रता एवं राज्य पाने में सफल हुआ।

    ➣ राजराज किसी प्रकार 1250 ई. तक राज्य करता रहा, परंतु उसका अधिकार नाममात्र का ही रहा।

    ➣ चोलकाल में सर्वाधिक महत्वपूर्ण लेख राजराज तृतीय का तिरूवेन्दिपुरम लेख है।

    राजेन्द्र तृतीय (1250 – 1279 ई.) : चोल वंश का अंतिम शासक

    ➣ यह चोल वंश का अंतिम शासक था। उसने चोल-शक्ति का पुनरूद्धार करने का प्रयास किया। उसने पांड्यों पर आक्रमण कर सुंदरपांड्य द्वितीय को पराजित किया।

    ➣ परंतु चालुक्य नरेश सोमेश्वर तृतीय ने पांड्यों का साथ दिया जिससे राजेन्द्र को प्रयास सफल न हो सके। उसने एक युद्ध में राजेन्द्र को परासत किया तथा बाद में उससे संधि कर ली।

    1251 ई. में पाण्ड्य वंश का शासन जटावर्मन् सुंदरपांड्य नामक एक शक्तिशाली राजा के हाथ में आया।

    ➣ उसने चालुक्य, होयसल तथा काकतीय राज्यों को जीता और चोल शासक राजेन्द्र तृतीय को अपनी अधीनता में रहने के लिये बाध्य किया।

    ➣ इसके बाद 1279 ई. तक वह पांड्य नरेश के सामंत की के रूप में से शासन करता रहा।

    ➣ 1279 ई. में उसे पांड्य शासक कुलशेखर के हाथों पुनः पराजित होना पड़ा। इसके साथ ही चोल-राज्य तथा शासन का अंत हुआ।

    पांड्य नरेश कुलशेखर समस्त चोलमंडल का सार्वभौम शासक बन बैठा।

  • वैदिक काल ( 1500–600 ई. पू. ) : एक संक्षिप्त परिचय

    📚 विषय सूची

    वैदिक काल में भारतीय उपमहाद्वीप में हुए परिवर्तन

    वैदिक काल (लगभग 1500 ई.पू. से 500 ई.पू.) भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास में एक बहुत बड़ा संक्रमण काल था। यह काल विश्व इतिहास में “प्राचीन काल का संक्रमण युग” माना जाता है।

    ➣ इससे पहले उपमहाद्वीप में विकसित सिंधु घाटी सभ्यता (हड़प्पा सभ्यता) फल-फूल रही थी (3300–1300 ई.पू.)। यह अत्यंत विकसित नगरीय सभ्यता थी।

    मोहनजो-दारो, हड़प्पा, कालीबंगन, लोथल जैसी सुनियोजित शहरों वाली, उन्नत जल निकासी व्यवस्था, ईंटों के मकान, व्यापार (मेसोपोटामिया तक), लेखन प्रणाली और केंद्रीकृत प्रशासन वाली।

    सिंधु सभ्यता के पतन के बाद उपमहाद्वीप में धीरे-धीरे नया परिवर्तन आया। आर्य जनजातियाँ उत्तर-पश्चिम से आकर पहले पंजाब और सप्तसिंधु क्षेत्र में बसीं, फिर धीरे-धीरे गंगा-यमुना दोआब की ओर बढ़ीं।

    वैदिक काल में बदलाव

    ➣ इस काल में मुख्य बदलाव निम्न थे-

    परिवर्तन का क्षेत्र मुख्य बदलाव प्रभाव / परिणाम
    आर्थिक बदलाव पशुपालन से कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण। लोहे के औजारों के उपयोग से जंगल साफ कर बड़े पैमाने पर खेती शुरू हुई। कृषि उत्पादन बढ़ा, स्थायी बस्तियाँ विकसित हुईं तथा व्यापार और अधिशेष उत्पादन में वृद्धि हुई।
    भौगोलिक विस्तार सभ्यता का केंद्र पंजाब और सप्तसिंधु क्षेत्र से गंगा-यमुना के मैदानों की ओर स्थानांतरित हुआ। नए कृषि क्षेत्रों का विकास हुआ और उत्तर भारत में जनसंख्या तथा बस्तियों का विस्तार हुआ।
    सामाजिक बदलाव सरल जनजातीय समाज से वर्ण व्यवस्था (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) का सुदृढ़ रूप विकसित हुआ। समाज में वर्ग विभाजन बढ़ा तथा आगे चलकर जाति व्यवस्था की नींव पड़ी।
    राजनीतिक बदलाव छोटी जनजातियों (जन) के स्थान पर जनपदों और बाद में महाजनपदों का उदय हुआ। राज्य व्यवस्था मजबूत हुई तथा कुछ क्षेत्रों में गणराज्य और कुछ में राजतंत्र विकसित हुए।
    धार्मिक-दार्शनिक बदलाव यज्ञ और कर्मकांड से आगे बढ़कर उपनिषदों में दार्शनिक चिंतन का विकास हुआ। आत्मा, ब्रह्म, कर्म और मोक्ष जैसे विचार भारतीय दर्शन की आधारशिला बने।
    भारतीय उपमहाद्वीप इस काल में नगरीय → ग्रामीण-कृषि आधारित, केंद्रीकृत → विकेंद्रीकृत जनपदीय, और यज्ञ-कर्मकांड → दार्शनिक चिंतन की ओर जा रहा था। यह परिवर्तन बाद की हिंदू, बौद्ध और जैन परंपराओं की नींव बना।

    समकालीन विश्व सभ्यताएँ (1500–500 ई.पू.)

    कई पुरानी सभ्यताएँ ढह रही थीं और नई शक्तियाँ उभर रही थीं। वैदिक काल के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप में जो बदलाव हो रहे थे, उसी समय दुनिया के अन्य हिस्सों में भी बड़े परिवर्तन हो रहे थे। इस समय विश्व में कई अन्य सभ्यताएँ भी बदल रही थीं।
    क्षेत्र / सभ्यता समकालीन स्थिति / प्रमुख परिवर्तन मुख्य विशेषताएँ भारतीय वैदिक काल से संबंध / तुलना
    मेसोपोटामिया बेबीलोनियन और असिरियन साम्राज्यों का विकास एवं विस्तार। विकसित नगर सभ्यता, विशाल महल, कीलाक्षर लिपि तथा व्यापारिक गतिविधियों का विस्तार। जहाँ मेसोपोटामिया नगर आधारित सभ्यता थी, वहीं वैदिक सभ्यता मुख्यतः ग्रामीण और कृषि आधारित थी।
    मिस्र न्यू किंगडम का अंतिम चरण तथा बाद में उसका पतन। पिरामिड, विशाल मंदिर, फराओ शासन और नील नदी आधारित कृषि व्यवस्था। मिस्र में केंद्रीकृत राजसत्ता मजबूत थी, जबकि वैदिक काल में छोटे जन और जनपद विकसित हो रहे थे।
    चीन शांग राजवंश के बाद झोऊ राजवंश का उदय। लोहे के उपयोग, कृषि विस्तार तथा प्रारंभिक दार्शनिक विचारों का विकास। चीन और उत्तर वैदिक भारत दोनों में लोहे के प्रयोग से कृषि और राज्य व्यवस्था मजबूत हुई।
    यूनान माइसीनी सभ्यता का पतन और होमर काल का उदय। वीरगाथाओं, युद्ध परंपरा और प्रारंभिक नगर-राज्यों का विकास। यूनानी समाज में भी वैदिक समाज की तरह कबीलाई और योद्धा संस्कृति के तत्व दिखाई देते हैं।
    ईरान प्रारंभिक इंडो-ईरानी लोगों का विस्तार तथा बाद में अकैमेनिड साम्राज्य की नींव। घुड़सवारी, युद्ध कौशल और जरथुस्त्र धर्म की प्रारंभिक परंपराएँ। भारतीय आर्य और ईरानी लोगों में भाषाई एवं सांस्कृतिक समानताएँ थीं।
    भारतीय उपमहाद्वीप उत्तर वैदिक सभ्यता का विकास और गंगा घाटी में विस्तार। लोहे का उपयोग, कृषि विस्तार, जनपदों का उदय तथा वर्ण व्यवस्था का सुदृढ़ होना। यह काल सिंधु सभ्यता की नगरीय परंपरा से ग्रामीण-वैदिक व्यवस्था की ओर संक्रमण का समय था।

    निष्कर्ष

    ➣ यह पूरा काल कांस्य युग (Bronze Age) के पतन और लोहे के युग (Iron Age) के उदय का संक्रमण काल था। ➣ 1500–500 ई.पू. का काल विनाश और सृजन का युग था। पुरानी व्यवस्थाएँ टूट रही थीं, लेकिन नई ऊर्जा, नई तकनीक और नई विचारधाराएँ जन्म ले रही थीं।

    ➣ सबसे महत्वपूर्ण बदलाव लोहे का व्यापक उपयोग था। भारत, चीन, मेसोपोटामिया और यूनान में लोहे के हथियार और औजारों ने कृषि उत्पादन और युद्ध दोनों में क्रांति लाई। ➣ इससे अधिशेष (surplus) बढ़ा, जनसंख्या वृद्धि हुई और बड़े राज्य बनाने की क्षमता बढ़ी।

    पुरानी केंद्रीकृत साम्राज्यों (जैसे हित्ती, माइसीनी, सिंधु) के पतन के after छोटे-छोटे राज्य, जनपद और शहर-राज्यों का उदय हुआ। ➣ बाद में कुछ क्षेत्रों में फिर बड़े साम्राज्यों (असिरियन, नियो-बेबीलोनियन) की शुरुआत हुई। भारत में जनपद → महाजनपद की ओर विकास हो रहा था।

    ➣ अधिकांश सभ्यताएँ कृषि-प्रधान थीं, लेकिन व्यापार बढ़ रहा था। फोनीशियन समुद्री व्यापार में आगे थे, ➣ जबकि मिस्र और मेसोपोटामिया नदी-आधारित व्यापार करते थे। लोहे के औजारों से जंगलों को साफ करके नई भूमि जोती जा रही थी।

    ➣ इस काल को “Axis Age” (अक्षीय युग) की शुरुआत माना जाता है। पुराने कर्मकांड और देवता-पूजा से आगे बढ़कर गहरे दार्शनिक प्रश्न उठने लगे।

    क्षेत्र / सभ्यता दार्शनिक एवं धार्मिक विचार मुख्य विशेषता
    भारत उपनिषदों में ब्रह्म, आत्मा, कर्म और मोक्ष की अवधारणा। आध्यात्मिक चिंतन और मोक्ष प्राप्ति पर विशेष बल।
    चीन स्वर्ग का आदेश (Mandate of Heaven) और नैतिक शासन की धारणा। राजा की वैधता को नैतिकता और जनकल्याण से जोड़ा गया।
    यूनान प्रारंभिक दर्शन और तार्किक चिंतन की नींव। प्रकृति, मानव और ब्रह्मांड को तर्क के आधार पर समझने का प्रयास।
    ईरान जरथुस्त्र के एकेश्वरवाद का प्रभाव। अच्छाई और बुराई के द्वैत सिद्धांत पर आधारित धार्मिक विचार।

    वर्ण/वर्ग व्यवस्था सख्त होती गई। योद्धा वर्ग (क्षत्रिय/योद्धा) का महत्व बढ़ा। लेखन प्रणालियाँ विकसित हो रही थीं, जिनमें फोनीशियन वर्णमाला सबसे महत्वपूर्ण थी।

    कला अभी भी मुख्यतः राजकीय शक्ति और धर्म को प्रदर्शित करने वाली थी। विशाल मंदिर, महल, राहत चित्रण और मूर्तियाँ बनाई जा रही थीं। मौखिक परंपरा (भारत, यूनान) बहुत मजबूत थी।

    ➣ कालांतर में इसी आधार पर बाद के क्लासिकल युग (500 ई.पू. से 500 ई.) की भारतीय, चीनी, यूनानी और फारसी सभ्यताएँ विकसित हुईं।

  • वैदिक सभ्यता (1000-500 ई.पू.) | Q&A Practice

    📚 विषय सूची

    ऋग्वैदिक काल | Q&A Practice

    ➣ सिंधु सभ्यता के पतन के बाद जो नयी संस्कृति प्रकाश में आयी उसको किस नाम से जाना जाता है?
    उत्तर : वैदिक संस्कृति ( 1500-600 ई.पू.)

    ➣ वैदिक सभ्यता के संस्थापक आर्य थे, इसलिए इसे किस अन्य नाम से भी जाना जाता है?
    उत्तर : आर्य सभ्यता

    ➣ यह सभ्यता मूलतः ग्रामीण थी या नगरीय?
    उत्तर : ग्रामीण

    ➣ वेद, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद को सम्मिलित रूप से क्या कहा जाता हैं?
    उत्तर : वैदिक साहित्य

    ➣ वेद कितने प्रकार के हैं ?
    उत्तर : चार (ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्वेद)

    ➣ वेदों को सम्मलित रूप से क्या कहा जाता है?
    उत्तर : वैदिक संहिता

    ➣ लगभग 1700 ई. पू. में रचित प्रथम तीन वेदों (ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद) को संयुक्त रूप में क्या कहा जाता है?
    उत्तर : ‘त्रयी’ या ‘वेदत्रयी’

    ➣ मानव जाति का प्रथम ग्रंथ किसको कहा जाता है?
    उत्तर : ऋग्वेद

    ➣ ऋग्वेद की मूल लिपि क्या थी?
    उत्तर : ब्राह्मी

    ➣ ऐतरेय ब्राह्मण ग्रंथ किस वेद से संबंधित है?
    उत्तर : ऋग्वेद

    ➣ आर्यों के आरंभिक इतिहास की जानकारी का मुख्य स्रोत क्या है?
    उत्तर : ऋग्वेद

    ➣ ऋग्वेद में कुल दस मंडल और 1028 मंत्र हैं। इनमें कौन-से दो मंडल बाद में जोड़े गये?
    उत्तर : प्रथम और दसवां

    ➣ ऋग्वेद की रचना किसने ने की?
    उत्तर : गृत्समद, विश्वामित्र, वामदेव, अत्रि, भारद्वाज और वशिष्ठ

    ➣ ऋग्वेद के तीसरे मंडल में वर्णित गायत्री मंत्र के रचयिता कौन हैं?
    उत्तर : विश्वामित्र

    ➣ आठवें मंडल के रचनाकार किन दो वंशों से संबंधित थे, जो अनार्य माने जाते थे?
    उत्तर : कण्व और आंगिरस वंश

    ➣ स्त्रियों ने भी वैदिक ऋचाओं की रचना की। इनमें से प्रमुख रचनाकार का क्या नाम था?
    उत्तर : लोपामुद्रा

    ➣ द्वितीय से सप्तम मंडल के मंत्र अधिकांशतः ऋषियों के एक ही परिवार द्वारा रचे गये, इसलिए इन मंडलों को क्या कहा जाता है?
    उत्तर : वंश मंडल

    ➣ ॠग्वेद का नौवां मंडल किस देवता को समर्पित है?
    उत्तर : सोम देवता

    ➣ प्रो. मैक्समूलर के मुताबिक आर्यों का मूल निवास स्थान कहां था?
    उत्तर : मध्य एशिया

    ➣ ऋग्वेद में सिंधु नदी का वर्णन कई बार हुआ है, जबकि यमुना का तीन बार उल्लेख मिलता है। गंगा का उल्लेख कितनी बार मिलता है?
    उत्तर : एक बार

    ➣ ऋग्वेद में सरस्वती नदी क्या कहा गया है?
    उत्तर : नदीतमा

    ➣ ऋग्वेद में सरस्वती एवं दृशद्वती नदियों के मध्य के प्रदेश को क्या कहा गया है?
    उत्तर : ब्रह्मावर्त

    ➣ आर्य निवास स्थल के लिए किस शब्द का प्रयोग किया गया है?
    उत्तर : सप्त सैंधव

    ➣ वेद मंत्रों के समूह को क्या कहा जाता है, जिसमें एकदैवत्व तथा एकार्थ का ही प्रतिपादन रहता है?
    उत्तर : सूक्त

    ➣ ऋग्वेद के आठवें मंडल में मिली हस्तलिखित प्रतियों के परिशिष्ट को क्या कहा गया है?
    उत्तर : खिल

    ➣ ऋग्वेद की किस ईरानी ग्रंथ के साथ समानता पाई जाती है?
    उत्तर : जेंद अवेस्ता

    ➣ सर्वप्रथम ‘स्तूप’ शब्द का प्रयोग कहां मिलता है?
    उत्तर : ऋग्वेद

    ➣ भारतीय संगीत की उत्पत्ति किस वेद से हुई मानी जाती है?
    उत्तर : सामवेद

    ➣ सामवेद में 1603 या 1810 गेय ऋचाएं हैं, जिनमें से मूल ऋचाओं को संख्या मात्र 99 है, जबकि शेष को ऋचाओं को अन्य ग्रन्थ से लिया गया है ?
    उत्तर : ऋग्वेद

    ➣ सामवेद के ऋचाओं का गायन किस यज्ञ के अवसर पर किया जाता था?
    उत्तर : सोम यज्ञ

    ➣ यजुर्वेद एक कर्मकाण्डीय वेद है, इस वेद में यज्ञों के नियमों का वर्णन है। यह कितने भागों में विभाजित है?
    उत्तर : दो (कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद)

    ➣ यजुर्वेद के पुरोहित क्या कहलाते थे?
    उत्तर : अध्वर्यु

    ➣ किंस वेद में सर्वप्रथम राजसूय तथा वाजपेय यज्ञों का वर्णन मिलता है?
    उत्तर : यजुर्वेद

    ➣ अंतिम वेद ‘अथर्ववेद’ की रचना किसके द्वारा की गयी है?
    उत्तर : अथवर्ण’ तथा ‘आंगिरस’ ऋषियों द्वारा

    ➣ किस वेद में शैतान तथा बीमारियों को दूर करने वाले मंत्रों का उल्लेख मिलता है ?
    उत्तर : अथर्ववेद

    ➣ अथवर्ण’ तथा ‘आंगिरस द्वारा रचित होने के कारण अथर्ववेद को किस अन्य नाम से भी कहा जाता है?
    उत्तर : अथर्वांगिरस वेद

    ➣ अथर्ववेद में कुरू देश में किसको कुरुओं में का राजा कहा गया है?
    उत्तर : परीक्षित

    ➣ अथर्ववेद की दो अन्य शाखाएं हैं- पिप्पलाद और शौनक इसके किस सूक्त के द्वारा राष्ट्रीय भावना का सुदृढ़ प्रतिपादन सर्वप्रथम इसी वेद में हुआ है?
    उत्तर : भूमि सूक्त

    ➣ उपनिषदों को ‘वेदान्त’ ( वेदों का अन्त) भी कहा जाता है। इनकी संख्या कितनी है?
    उत्तर : 108

    ➣ उपनिषदों की रचना किस भाषा में की गयी है?
    उत्तर : साहित्यिक संस्कृत

    ➣ किस साहित्य में वेदों के सूक्तों की व्याख्या और धार्मिक अनुष्ठानों का वर्णन मिलता है?
    उत्तर : ब्राह्मण

    ➣ आरण्यक में दार्शनिक सिद्धांतों और रहस्यवाद का उल्लेख मिलता है। इस साहित्य में किस तरह के गुणों पर बल दिया गया है?
    उत्तर : नैतिक गुणों पर

    ➣ पुनर्जन्म का विचार सबसे पहले किस उपनिषद में आया ?
    उत्तर : – वृहदारण्यक उपनिषद

    ➣ भारतीय शासन के प्रतीक शब्द ‘सत्यमेव जयते’ किस ग्रंथ से लिये गये हैं?
    उत्तर : मुंडकोपनिषद्

    ➣ वेदांगों को कुल संख्या में कितनी है?
    उत्तर : 6

    ➣ धनुर्वेद (युद्धकला), गंधर्व वेद (संगीत), शिल्प वेद (स्थापत्य), तथा आयुर्वेद (जीवन विज्ञान) क्या हैं?
    उत्तर : उपवेद

    ➣ स्मृतियां वैदिक साहित्य में शामिल नहीं हैं। इनको और किस नाम से भी जाना जाता है?
    उत्तर : धर्मशास्त्र

    ➣ मनुस्मृति सबसे प्राचीन और प्रथम स्मृति है। इसका लेखन किस काल में किया गया?
    उत्तर : शुंगकाल (लगभग द्वितीय सदी ई. पू.)

    ➣ आर्यों के बारे में प्राचीनतम पुरातात्विक साक्ष्य किन अभिलेखों से प्राप्त होते हैं ?
    उत्तर : बोगाजकोई अभिलेखों से (1400 ई. पू.)

    ➣ बोगाजकोई अभिलेखों में किन दो शासकों के बीच शांति समझौते का उल्लेख है?
    उत्तर : हित्ती तथा मितन्नी शासकों

    ➣ बोगाजकोई अभिलेखों में मितन्नी शासकों द्वारा वैदिक देवताओं यथा- इंद्र, वरुण, मित्र और नासत्य के आह्वान का उल्लेख मिलता है। इनमें क्या अग्नि का भी नाम है?
    उत्तर : नहीं

    ➣ धूसर मृद्भांड संस्कृति का रचयिता किसको माना जाता है?
    उत्तर : आर्यों को

    ➣ ऋग्वैदिक काल में आर्यों का मुख्य व्यवसाय क्या था ?
    उत्तर : पशुपालन

    ➣ आर्यों का समाज किस प्रकार का था ?
    उत्तर : पुरुष प्रधान समाज

    ➣ आर्यों में किस पशु का सबसे अधिक महत्त्व था?
    उत्तर : घोड़ा

    ➣ भारत में आर्य ईरान होते हुए आये थे। ऋग्वेद की कई बातें ईरानी भाषा के प्राचीनतम ग्रंथ से मिलती हैं। उस ग्रंथ का क्या नाम है?
    उत्तर : अवेस्ता

    ➣ आरम्भिक आर्यों का निवास भारत के पंजाब और हरियाणा के अलावा कहां था?
    उत्तर : पूर्वी अफगानिस्तान और पाकिस्तान

    ➣ आर्यों की सबसे प्रमुख नदी ‘सिंधु’ है। किसको ‘नदीतम’ अर्थात् ‘सर्वश्रेष्ठ नदी’ या सबसे पवित्र नदी कहा गया है?
    उत्तर : सरस्वती नदी

    ➣ किस नदी के निकट ऋग्वैदिक सभ्यताएं सबसे अधिक स्थित थीं?
    उत्तर : सरस्वती

    ➣ आर्य लोग जहां सबसे पहले बसे, उस पूरे क्षेत्र को क्या कहा जाता है?
    उत्तर : सप्त सिंधु

    ➣ भारत आने पर आर्यों का ‘दास’ और ‘दस्यु’ नामक स्थानीय लोगों के साथ संघर्ष हुआ। ऋग्वेद में इनमें से किनकी हत्या का उल्लेख बार-बार मिलता है?
    उत्तर : दस्यु हत्या

    ➣ ऋग्वैदिक आर्य किस भाषा का प्रयोग करते थे?
    उत्तर : संस्कृत

    ➣ आर्यों के पांच कबीलों ( अनु, द्रहु, पुरु, यदु तुर्वस) को क्या कहा जाता था ?
    उत्तर : पंचजन

    ➣ भरत’ और ‘त्रित्सु’ आर्यों के शासक वंश थे। इनके पुरोहित कौन थे?
    उत्तर : वशिष्ठ

    ➣ भरत राजवंश और दस राजाओं (पांच आर्य और पांच अनार्य) के बीच हुई लड़ाई को किस नाम से जाना जाता है?
    उत्तर : दशराज्ञ युद्ध

    ➣ परुष्णी (रावी) नदी के तट पर हुए दशराज्ञ युद्ध में भरतों के राजा सुदास की जीत हुई। प्रतिद्वंद्वियों के राजा कौन थे?
    उत्तर : पुरु

    ➣ कई गांवों को मिलाकर उपरोक्त में से कौन-सी इकाई बनती थी?
    उत्तर : विश

    ➣ ग्राम का प्रधान ‘ग्रामणी’ और विश का प्रधान ‘विशपति’ कहलाता था। कई विशों से मिलकर बने एक जन का प्रधान कौन होता था ?
    उत्तर : राजा

    ➣ ऋग्वेद में ‘जन’ शब्द कितनी बार हुआ है?
    उत्तर : 275 बार

    ➣ सभा, समिति, विदथ एवं गण आर्यों की कबीलाई परिषदें थीं। इनमें से किन परिषदों में महिलाएं भी भाग लेती थीं?
    उत्तर : सभा एवं विदथ

    ➣ ऋग्वैदिक काल की जनसभाएं में से किसमें विवादों का निपटारे के लिए महिला और पुरुष दोनों भाग लेते थे?
    उत्तर : विदथ

    ➣ ‘सभा’, ‘समिति’, ‘विदथ’ और ‘गण’ में से सबसे प्राचीन संस्था कौन-सी थी?
    उत्तर : विदथ

    ➣ वैदिक काल में गुप्तचरों को ‘स्पश’ कहा जाता था। न्यायाधीशों को किस नाम से जाना जाता था?
    उत्तर : प्रश्नविनाक

    ➣ ‘कुल’ (परिवार) सबसे छोटी या मौलिक इकाई थी। सबसे बड़ी इकाई कौन-सी थी?
    उत्तर : कबीला (जन)

    ➣ वैदिक काल में कौन-सी शासन पद्धति प्रचलित थी, जिसके तहत कभी-कभी शासक का चुनाव भी होता था?
    उत्तर : राजतंत्रात्मक

    ➣ वेदों में राजा का चुनाव करने की बजह से किन दो जनसभाओं को प्रजापति की दो दुहिताएं (पुत्रियां ) कहा गया है?
    उत्तर : सभा और समिति

    ➣ ऋग्वैदिक काल के दो महान पुरोहित कौन हुए ?
    उत्तर : वशिष्ठ और विश्वामित्र

    ➣ आर्य समाज किस प्रकार का था ?
    उत्तर : पितृसत्तात्मक

    ➣ किस मंडल के पुरुष सूक्त में चार वर्णों की उत्पत्ति का वर्णन मिलता है, जिसमें ‘शूद्र’ शब्द का भी प्रथम उल्लेख मिलता है?
    उत्तर : दसवां मंडल

    ➣ वैदिक काल में जब कोई स्त्री विधवा हो जाती थी, इसके बावजूद उसे संतानोत्पत्ति का अधिकार होता था। इस प्रथा को क्या कहा जाता था ?
    उत्तर : नियोग प्रथा

    ➣ स्त्रियों को राजनीति में भाग लेने एवं संपत्ति विषयक अधिकार नहीं प्राप्त थे। क्या ऋग्वैदिक में पर्दा प्रथा का उल्लेख मिलता है?
    उत्तर : नहीं

    ➣ प्रारम्भिक वैदिक समाज योद्धा, पुरोहित और सामान्य जन में विभाजित था। बाद में इसमें किस चौथे वर्ण का उदय हुआ?
    उत्तर : शूद्र

    ➣ वैदिक समाज में पिता को पुत्र को दान देने अथवा बेचने का अधिकार प्राप्त था। ” यह कथन सही है या गलत?
    उत्तर : सही

    ➣ वैदि समाज में परिवार में पिता, माता, गुरु, बड़ों और अतिथि का सत्कार करना पांच धार्मिक कर्तव्य माने जाते थे। इनको क्या कहा जाता था?
    उत्तर : पंच महायज्ञ

    ➣ ऋग्वैदिक काल में ‘जाति’ का निर्धारण जन्म से होता था या कर्म से?
    उत्तर : कर्म से

    ➣ कृषि संबंधी प्रक्रिया से संबंधित उल्लेख ऋग्वेद के किस मंडल में मिलता है?
    उत्तर : चतुर्थ मंडल

    ➣ ऋग्वेद में किस एक ही अनाज का उल्लेख मिलता है?
    उत्तर : यव

    ➣ वैदिक कालीन आर्य मुख्य रूप से पशुचारण, कृषि, व्यापार और उद्योग में से क्या करते थे?
    उत्तर : पशुचारण

    ➣ वैदिक काल के लोगों को जौ, गेहूं और चावल जैसी फसलों का ज्ञान था। क्या वे तम्बाकू के बारे में भी जानते थे?
    उत्तर : नहीं

    ➣ वैदिक आर्यों का प्रमुख भोजन क्या था?
    उत्तर : जौ, चावल और गेहूं

    ➣ गाय, बैल, बकरी, भेड़ तथा घोड़ा आय के मुख्य पशु थे। इनमें से किसका इस्तेमाल मुद्रा (धन के पर्याय) के रूप में किया जाता था?
    उत्तर : गाय

    ➣ गविष्टि’ का शाब्दिक अर्थ है गायों की खोज करना । गविष्टि शब्द किसके लिए इस्तेमाल किया जाता था?
    उत्तर : युद्ध

    ➣ किस ग्रंथ में कृषि से जुड़े विभिन्न शब्दों और नियमों का उल्लेख मिलता है?
    उत्तर : शतपथ ब्राह्मण में

    ➣ निष्क’, ‘शतमान’, ‘रजत’, ‘रुप्या’ स्वर्ण और चांदी की इकाइयां थीं, जिसका प्रयोग किस रूप में होता था?
    उत्तर : मुद्रा

    ➣ आर्य लोग तांबा कहां की खानों से प्राप्त किया करते थे ?
    उत्तर : खेतड़ी, राजस्थान

    ➣ वैदिक काल में किन महिलाओं ने कई ऋचाओं की रचना की थी?
    उत्तर : घोषा, लोपामुद्रा और अपाला

    ➣ गोत्र की परंपरा किस काल की दें है?
    उत्तर : वैदिक काल

    ➣ ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य को सम्मिलित रूप से क्या कहा जाता था?
    उत्तर : द्विज

    ➣ ऋग्वैदिक काल में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण देवता को किसको कहा गया है, जिसका अर्थ होता है दुर्गों को तोड़ने वाला?
    उत्तर : ‘पुरंदर’

    ➣ पुरंदर नामक देवता का अन्य प्रसिद्ध नाम क्या था?
    उत्तर : इंद्र

    ➣ वह ऋग्वैदिक देवता कौन हैं, जिनको ‘ऋतु’ अथवा सृजनात्मक आदेश का समर्थक माना जाता है?
    उत्तर : वरुण

    ➣ वृत्र की हत्या करने की वजह से इन्द्र को क्या कहा जाता है?
    उत्तर : वृत्रहन्

    ➣ प्रकृति के प्रतिनिधि के रूप में आर्यों के देवताओं की तीन श्रेणियां थीं- आकाश देवता, अंतरिक्ष देवता और पृथ्वी देवता।

    ➣ सूर्य, धौस, वरुण, मित्र, पूषण, विष्णु, आदित्य आदि कौन-से देवता हैं?
    उत्तर : आकाश देवता

    ➣ इंद्र, रूद्र, मरुत, वायु, पर्जन्य आदि अंतरिक्ष देवता हैं। अग्नि, सोम, पृथ्वी, बृहस्पति आदि किस श्रेणी के देवता हैं?
    उत्तर : पृथ्वी देवता

    ➣ ऋग्वैदिक काल में संसार के प्राकृतिक नियमों का रक्षक, ऋतुओं का राजा आदि किसे कहा गया है?
    उत्तर : वरुण

    ➣ किसको पेय पदार्थ का देवता माना गया है?
    उत्तर : सोम

    ➣ वह महत्त्वपूर्ण देवता कौन थे, जिनको देवताओं का पुरोहित तथा मनुष्यों एवं देवताओं के बीच मध्यस्थ माना जाता था?
    उत्तर : अग्नि (आर्य अग्नि की अराधना करते थे)

    ➣ नौवें मण्डल के श्लोक मुख्यतः किस देवता को समर्पित हैं?
    उत्तर : सोम देवता

    ➣ वैदिक युग में राजा अपनी जनता से जो कर वसूल करते थे, उसे क्या कहते हैं?
    उत्तर : बलि

    ➣ आर्य सभ्यता में मनुष्य के जीवन के आयु का आरोही क्रम क्या है?
    उत्तर : ब्रह्मचर्य-गृहस्थ- वानप्रस्थ – संन्यास

    ➣ वैदिक काल में आठ प्रकार के विवाह प्रचलित थे। इनमें से कौन-सा प्रेम विवाह था?
    उत्तर : गंधर्व विवाह

    ➣ वैदिक युग में क्या विधवा पुनर्विवाह कर सकती थी?
    उत्तर : हां, कर सकती थी

    ➣ किस काल में जनता मुख्यतया बलि और कर्मकाण्ड में विश्वास करती थी ?
    उत्तर : ऋग्वैदिक काल

    उत्तर वैदिक काल | Q&A Practice

    ➣ उत्तर वैदिक युग की सभ्यता का केंद्र पंजाब से बढ़कर कहां आ गया था?
    उत्तर : कुरुक्षेत्र (गंगा-यमुना दोआब का उत्तरी भाग)

    ➣ पुरु एवं भरत मिलकर कुरु बना था। तुर्वंश व क्रिवि मिलकर कौन-सा राज्य बने थे?
    उत्तर : पांचाल

    ➣ किस वेद में मगध के लोगों को व्रात्य कहा गया है?
    उत्तर : अथर्ववेद

    ➣ उत्तर वैदिक काल में कई कबीले मिलकर राष्ट्र का निर्माण करते थे। इसे किस नाम से जाना जाता था?
    उत्तर : जनपद

    ➣ इस काल में राज्य के विस्तार और राजा की शक्ति में भी वृद्धि के लिए प्रमुख तीन यज्ञ कौन-कौन से थे?
    उत्तर : राजसूय, अश्वमेध और वाजपेय

    ➣ किस यज्ञ के तहत घोड़े की बलि द्वारा राज्य विस्तार किया जाता था?
    उत्तर : अश्वमेध यज्ञ

    ➣ किस यज्ञ के तहत रथों को दौड़ द्वारा राजा की सर्वोच्चता स्थापित की जाती थी ?
    उत्तर : वाजपेय

    ➣ कौन-सा यज्ञ राजा के राज्याभिषेक के लिए होता था, जिसके दौरान राजा रत्नियों (उच्च पदाधिकारियों) के घर जाता था ?
    उत्तर : राजसूय

    ➣ यजुर्वेद में राज्य के उच्च पदाधिकारियों को ‘रत्नी’ कहा जाता था। किस वेद में सभा को ‘नरिष्ठा’ कहा गया है?
    उत्तर : – अथर्ववेद

    ➣ अथर्ववेद में किसको मृत्युलोक का देवता कहा गया है?
    उत्तर : परीक्षित

    ➣ उत्तर वैदिक काल में ‘भागदुध’ किसको कहा जाता था?
    उत्तर : वित्त मंत्री

    ➣ उपनिषदों को वेदांत के रूप में भी जाना जाता है। ‘उपनिषद्’ का शाब्दिक अर्थ क्या है?
    उत्तर : पास बैठना

    ➣ आध्यात्म ज्ञान के विषय में नचिकेता और यम संवाद किस उपनिषद् में प्राप्त होता है ?
    उत्तर : कठोपनिषद्

    ➣ “विश्व ईश्वर है तथा ईश्वर मेरी आत्मा है।” यह दर्शन किस ग्रंथ में मिलता है?
    उत्तर : उपनिषद्

    ➣ उपनिषद् को अन्य किस नाम से भी जाना जाता है?
    उत्तर : वेदांत

    ➣ बड़े बलिदान से जुड़े नियमों के बारे में कौन-सा सूत्र संबंधित है?
    उत्तर : श्रुतसूत्र

    ➣ प्रस्थानत्रयी’ में कौन-से तीन ग्रंथ सम्मिलित है?
    उत्तर : भगवद्गीता, ब्रह्मसूत्र और उपनिषद्

    ➣ किस ग्रंथ में ‘पुरुष मेध’ का उल्लेख हुआ है?
    उत्तर : शतपथ ब्राह्मण

    ➣ सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित किसके संकेतक हैं?
    उत्तर : पुराणों के

    ➣ कलिका पुराण किस धर्म से संबंधित है?
    उत्तर : शाक्त

    ➣ अद्वैत वेदांत के अनुसार किसके द्वारा मुक्ति प्राप्त की जा सकती है?
    उत्तर : ज्ञान

    ➣ कर्म सिद्धांत मीमांसा से संबंधित है। किस दर्शन का मत है कि ‘वेद शाश्वत सत्य है’?
    उत्तर : मीमांसा

    ➣ किस काल में व्यापार का विकास हुआ और व्यापारी श्रेणियों में संगठित हुए?
    उत्तर : उत्तर वैदिक काल

    ➣ उत्तर वैदिक काल में ऋण देने वाले को क्या कहा जाता था ?
    उत्तर : कुसीदीन

    ➣ तांबे या कांसे के लिए किस शब्द का प्रयोग किया जाता था?
    उत्तर : अयस्

    ➣ क्या उत्तर वैदिक काल में लोगों को सीसा, चांदी, सोना (हिरण्य) और लोहे की जानकारी थी, अथवा नहीं?
    उत्तर : जानकारी थी

    ➣ सर्वप्रथम किस उपनिषद में चारों आश्रमों का वर्णन मिलता है?
    उत्तर : जावालो उपनिषद

    ➣ आश्रम प्रणाली का सर्वप्रथम उल्लेख किस ब्राह्मण में पाया जाता है?
    उत्तर : ऐतरेय ब्राह्मण

    ➣ गोत्र’ का अर्थ क्या होता है?
    उत्तर : ‘गोशाला’।

    ➣ एक ही गोत्र के अन्दर विवाह पर प्रतिबन्ध था। इसका उल्लेख किस वेद में मिलता है?
    उत्तर : अथर्ववेद

    ➣ ऋग्वेद के किस सूक्त से शिक्षा पद्धति की जानकारी मिलती है?
    उत्तर : मण्डूक सूक्त

    ➣ उत्तर वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था का आधार कर्म पर आधारित न होकर जाति पर

    ➣ आधारित हो गया। इस काल में केवल एक वर्ण को कर चुकाना पड़ता था। वह वर्ण कौन-सा था ?
    उत्तर : वैश्य

    ➣ किस ब्राह्मण ग्रंथ में एक स्थान पर क्षत्रियों को ब्राह्मणों से श्रेष्ठ कहा गया है?
    उत्तर : शतपथ ब्राह्मण

    ➣ उत्तर वैदिक काल में स्त्रियों का पैतृक संपत्ति से अधिकार छिन गया तथा उनका सभा में प्रवेश वर्जित हो गया, सत्य है असत्य?
    उत्तर : सत्य

    ➣ किस ब्राह्मण ग्रंथ में पुत्री को कृपण अर्थात दुःख देने वाला कहा गया है?
    उत्तर : ऐतरेय ब्राह्मण

    ➣ उत्तर वैदिक काल में प्रमुख फसलें कौन-सी थीं?
    उत्तर : धान व गेहूं

    ➣ किस ब्राह्मण ग्रंथ में कृषि की चारों क्रियाओं जुताई, बुआई कटाई तथा मड़ाई का वर्णन है?
    उत्तर : शतपथ ब्राह्मण

    ➣ 24 बैलों द्वारा खींचे जाने वाले हल का उल्लेख किस संहिता में मिलता है ?
    उत्तर : काठक सहिंता

    ➣ निष्क, शतमान, पाद, कृष्णल आदि माप की इकाइयां थीं। इनमे से बाट की मूलभूत इकाई कौन सी थी ?
    उत्तर : कृष्णल

    ➣ बाट की सबसे छोटी इकाई कौन-सी थी?
    उत्तर : रत्तिका

    ➣ व्यापार के दौरान लेनदेन का माध्यम निष्क के अलावा किसको बनाया जाता था ?
    उत्तर : गाय

    ➣ भारत में वर्ण व्यवस्था किसलिए बनायी गयी थी?
    उत्तर : व्यावसायिक श्रम विभाजन

    ➣ इंद्र और अग्नि जैसे महत्त्वपूर्ण ऋग्वैदिक देवताओं का स्थान उत्तर वैदिक काल में किन देवताओं ने ले लिया ?
    उत्तर : प्रजापति (सर्वोच्च स्थान), विष्णु (पालक ) तथा रुद्र

    ➣ किस उपनिषद में पुनर्जन्म के सिद्धांत का पहली बार उल्लेख किया गया?
    उत्तर : वृहदारण्यक उपनिषद

    ➣ उस देवता का नाम बताइए जो ऋग्वैदिक काल में पशुओं के देवता थे तथा उत्तरवैदिक काल में जाकर शूद्रों के देवता हो गये?
    उत्तर : पूषण

    ➣ उत्तर वैदिक काल में पशुओं के किस देवता की पूजा शिव के रूप में होने लगी?
    उत्तर : रूद्र

    ➣ किस काल में बहुदेववाद एवं षड्दर्शनों का उदय हुआ?
    उत्तर : उत्तर वैदिक काल

    ➣ उपनिषदों में स्पष्ट रूप से यज्ञों तथा कर्मकांडों की निंदा की गयी है। यह कथन सत्य है असत्य ?
    उत्तर : सत्य

    ➣ कठोपनिषद् में यम-नचिकेता संवाद है। किस उपनिषद् में गार्गी- याज्ञवलक्य संवाद का उल्लेख मिलता है?
    उत्तर : वृहदारण्यक उपनिषद

    ➣ निष्काम कर्म सिद्धांत का प्रथम प्रतिपादन किस उपनिषद में किया गया ?
    उत्तर : इषोपनिषद

    ➣ छंद, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, शिक्षा तथा ज्योतिष किन ग्रंथों के तहत आते हैं?
    उत्तर : वेदांग

    ➣ उत्तर वैदिक काल के वेद विरोधी और ब्राह्मण विरोधी धार्मिक अध्यापकों को किस नाम से जाना जाता था?
    उत्तर : श्रमण

    ➣ किस काल में अछूत की अवधारणा स्पष्ट रूप से उद्धृत हुई?
    उत्तर : उत्तर वैदिक काल में

    ➣ वाजसनेयी किस यजुर्वेद की संहिता है ?
    उत्तर : शुक्ल यजुर्वेद

  • वैदिक सभ्यता (1500-600 ई.पू.) | One-Liner Practice

    📚 विषय सूची

    ऋग्वैदिक का काल (1500-1000 ई. पू.) | One Liner Practice

    ❑ वेद शब्द का अर्थ ज्ञान होता है।

    ❑ भारतीय परंपरा में वेदों को अपौरुषेय कहा गया है।

    ❑ ब्रह्मा ने कुछ ऋषियों को मन्त्रों का प्रकाश दिया। ऋषियों ने अपने शिष्यों को बताया। कालान्तर में वेद व्यास ने इस ज्ञान को संकलित कर लिया। इसी कारण वेदों को श्रुति भी कहा गया है।

    ❑ ऋग्वैदिक का काल 1500-1000 ई. पू. है जबकि उत्तरवैदिक की समयावधि 1000-600 ई. पू. है।

    ❑ खगोलीय आधार पर जर्मन भारतविद् प्रो. हरमन जैकोबी के अनुसार ऋग्वेद की ऋचाएँ 4500 ई.पू.-2500 ई.पू. संकलित की गई थी।

    ❑ ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद को वेदत्रयी या त्रयी कहा जाता है।

    ❑ ऋग्वेद में 10 मण्डल तथा 1028 सूक्त हैं।

    ❑ दूसरे से सातवें मण्डल तक को वंश मण्डल कहा जाता है।

    ❑ ऋग्वेद का आठवाँ मण्डल कण्व और अंगिरस वंश को समर्पित है।

    ❑ ऋग्वेद के नौवें मण्डल को सोम मण्डल कहा जाता है।

    ❑ आरंभिक वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था व्यवसाय पर आधारित थी।

    ❑ ऋग्वेद के दसवें मण्डल में पुरुष सूक्त है, जिसमें चारों वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र) की उत्पत्ति का साक्ष्य है।

    ❑ यजुर्वेद (यज्ञ सूत्र) की प्रमुख विशेषता कर्मकाण्ड है। इसमें पहली बार राजसूय एवं वाजपेय यज्ञ का उल्लेख हुआ है। यह वेद पद्य एवं गद्य दोनों में है।

    ❑ आर्यों का आगमन 1500 ई. पू. के पहले है।

    ❑ आर्य सर्वप्रथम सप्त सैंधव प्रदेश में लाये थे।

    ❑ आर्य शब्द का अर्थ श्रेष्ठ होता है।

    ❑ क्लासिकल संस्कृत में आर्य का अर्थ एक उत्तम व्यक्ति है।

    ❑ सुदास ने अनार्यों को पराजित किया था।

    ❑ दशराज्ञ युद्ध परुष्णी नदी (रावी) के तट पर सुदास एवं दस जनों के बीच लड़ा गया था।

    ❑ ऋग्वैदिक काल की सबसे महत्त्वपूर्ण नदी सिन्धु थी।

    ❑ ऋग्वेद के तीसरे मण्डल में गायत्री मन्त्र का उल्लेख है।

    ❑ ऋग्वेद के दशम् मण्डल में नदी सूक्त है। ऋग्वेद में सर्वाधिक पवित्र नदी सरस्वती को नदियों की माता कहा गया है।

    ❑ ऋग्वेद के ऋचाओं के पढ़ने वाले ऋषि को होतृ कहा जाता था।

    ❑ यजुर्वेद के पाठकर्ता को अध्वर्यु कहा जाता था।

    ❑ सामवेद के पाठकर्ता को उदागातृ (उद्गाता) कहा जाता था।

    ❑ सबसे नया वेद अथर्ववेद है।

    ❑ अथर्ववेद में वेदत्रयी नहीं आता है। इसमें जादू-टोना तथा तन्त्र-मन्त्र का उल्लेख है।

    ❑ वेदों की टीकाओं को ब्राह्मण ग्रंथ कहा जाता है।

    ❑ ऋग्वैदिक काल का समाज कबीले के रूप में संगठित था।

    ❑ आर्यों का प्रारम्भिक जीवन मुख्यतः पशुचारक था तथा कृषि उनका गौण धंधा था।

    ❑ भरतकुल के पुरोहित वशिष्ठ थे।

    ❑ आर्यों ने घोड़ों द्वारा चलाए जा रहे रथों का प्रयोग किया।

    ❑ ऋग्वेद में 21 नदियों का जिक्र मिलता है।

    ❑ आर्यों की सर्वाधिक प्राचीन संस्था विदथ थी।

    ❑ श्रेष्ठ लोगों की संस्था को समिति कहते थे। राजा को चुनने एवं पदच्युत करने का अधिकार समिति को था।

    ❑ ऋग्वैदिक काल में पुलिस को उग्र तथा गुप्तचर को स्पश कहते थे। ऊनी कपड़े को सामूल्य कहते थे।

    ❑ तम्बाकू का ज्ञान वैदिक काल के लोगों को नहीं था।

    ❑ इन्द्र ऋग्वैदिक काल के सबसे प्रतापी देवता थे, जिन्हें किला तोड़ने वाला कहा गया है।

    ❑ ऋग्वेद में इन्द्र का सर्वाधिक 250 बार उल्लेख हुआ है।

    ❑ उत्तरवैदिक काल के सर्वाधिक प्रतापी देवता प्रजापति थे।

    ❑ शूद्रों के देवता पूषन थे, जो पशुओं से भी सम्बद्ध थे।

    ❑ आश्रम व्यवस्था का सर्वप्रथम उल्लेख छान्दोग्य उपनिषद् में मिलता है।

    ❑ राजा का प्रमुख सलाहकार पुरोहित होता था।

    ❑ आर्यों के मनोरंजन के मुख्य साधन थे-संगीत, रथदौड़, घुड़दौड़ एवं द्यूतक्रीड़ा।

    ❑ ऋग्वेद में नाई को वप्ता कहा जाता था।

    ❑ वैदिक युग में राजा अपनी जनता से जो कर वसूल करते थे, उसे बलि कहते थे।

    ❑ सर्वप्रथम कर लगाने की प्रथा उत्तर वैदिक काल में शुरू हुई।

    ❑ मगध में निवास करने वाले लोगों को अथर्ववेद में व्रात्य कहा गया है।

    ❑ वैदिक आर्यों का मुख्य भोजन दूध और उसके उत्पाद थे।

    ❑ जौ के सत्तू को दही में मिलाकर करव नामक खाद्य पदार्थ बनाया जाता था।

    ❑ वैदिक काल में जौ, गेहूँ, मूँग, तिल, उड़द आदि प्रमुख अन्न थे।

    ❑ ऋग्वैदिक आर्यों को बढ़ईगीरी, कुम्हार, बुनकर, चर्मकार, रथकार, स्वर्णकार आदि के बारे में मालूम था परंतु उस समय लुहारगीरी की जानकारी नहीं थीं परंतु उत्तरवैदिक काल में लोहे की जानकारी आर्यों को हो गयी थी।

    ❑ अथर्ववेद में सभा तथा समिति को प्रजापति की दो पुत्रियों के समान माना गया है।

    ❑ अथर्ववेद को ब्रह्मवेद भी कहा जाता है।

    ❑ यजुर्वेद पर विद्वानों ने सर्वाधिक भाष्य लिखे हैं।

    ❑ अगत्स्य ऋषि ने दक्षिण भारत का आर्यकरण किया था।

    ❑ ऋग्वेद में क्षत्रिय के लिये राजन्य शब्द का प्रयोग होता था।

    ❑ ऋग्वैदिक काल में पर्दा प्रथा नहीं थी। इस काल में स्त्रियों की दशा बहुत अच्छी थी।

    ❑ ऋग्वैदिक काल में सती प्रथा नहीं थी। पर्दा प्रथा का उल्लेख वैदिक काल में नहीं मिलता है।


    ❑ आकाश के देवता – सूर्य, द्यौस, मित्र, पूषन्, विष्णु, उषा, अश्विन, सवितृ, आदित्य आदि।
    ❑ अन्तरिक्ष के देवता – इन्द्र, मरुत, रुद्र, वायु, पर्जन्य आदि।
    ❑ पृथ्वी के देवता – अग्नि, सोम, पृथ्वी, वृहस्पति, सरस्वती।

    ❑ वैदिक काल में नियोग प्रथा प्रचलित थी।

    ❑ शतपथ ब्राह्मण में पत्नी को अर्द्धांगिनी कहा गया है।

    ❑ ऋग्वैदिक काल में दास प्रथा का प्रचलन था।

    ❑ गाय को अघन्या (न मारने योग्य) माना जाता था।

    ❑ ऋग्वैदिक काल में संयुक्त परिवार की प्रथा थी।

    ❑ ओउम शब्द का सर्वप्रथम निश्चित वर्णन वृहदारण्यक उपनिषद् में मिलता है।

    ❑ सत्यमेव जयते शब्द मुण्डकोपनिषद् से लिया गया है।

    ❑ पाप-पुण्य तथा स्वर्ग-नरक का उल्लेख सर्वप्रथम ऋग्वेद में मिलता है।

    ❑ महाभारत काल में अनार्य जातियों को पणि या दास कहा जाता था।

    ❑ ऋग्वेद में वैद्य या चिकित्सक को भेषज कहा जाता था।

    ❑ अग्नि, देवता एवं मानवों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने वाला देव था।

    ❑ मरुत को तूफान का देवता कहा जाता था।

    ❑ प्राचीन भारत के दो महाकाव्य हैं रामायण तथा महाभारत।

    ❑ वैदिक लोगों द्वारा ताँबा का प्रयोग पहले किया गया था।

    उत्तर वैदिक काल ( 1000 ई. पू. – 600 ई. पू.) | One Liner Practice

    ❑ उत्तर वैदिक काल के पुरातात्विक स्रोत – चित्रित धूसर मृदभांड, लोहा, स्थायी निवास एंव साहित्यिक स्रोत – सामवेद , यजुर्वेद, अथर्ववेद , आरण्यक उपनिषद्

    ❑ उत्तर वैदिक काल में भरत एवं पुरु ने मिलकर कुरु जनपद की स्थापना की तथा तुर्वस एवं क्रिवि ने मिलकर पांचाल जनपद की स्थापना की।

    ❑ उत्तर वैदिक ग्रंथ में लोहे को श्याम अयस् तथा कृष्ण अयस् कहा गया है।

    ❑ प्रारंभ में उनकी राजधानी असन्दनीवात थी। कालांतर में हस्तिनापुर उनकी राजधानी हुई।

    ❑ महत्त्वपूर्ण राजा हुए-बाल्हिक प्रतिपीय, राजा परीक्षित, जन्मेजय आदि। अथर्ववेद में परीक्षित का उल्लेख मिलता है।

    ❑ अंतिम कुरुवंशी शासक निचक्षु ने बाढ़ से विनष्ट होने के कारण हस्तिनापुर की जगह कौशाम्बी को अपनी राजधानी बनाया।

    ❑ महाभारत – कुरुकुल का गृहयुद्ध-950 ई. पू. में हुआ था। इस काल में कबीलों ने जनपद रूप ग्रहण किया।

    ❑ विदेह माधव ने अपने गुरु राहुल गण की सहायता से अग्नि के द्वारा इस क्षेत्र का सफाया किया। यह शतपथ ब्राह्मण में वर्णित है।

    ❑ शतपथ ब्राह्मण में महाजनी प्रथा का पहली बार जिक्र हुआ है तथा सूदखोर को कुसीदिन कहा गया है।

    ❑ पुरुषार्थ– मनुष्य के भौतिक सुख एवं आध्यात्मिक सुखों के मध्य सामजस्य हेतु
    ❑ 1. धर्म-न्याय, सद्गुण, नैतिकता, कर्तव्य पालन
    ❑ 2. अर्थ– अर्थ (धन) की प्राप्ति और मर्यादा से उपभोग
    ❑ 3. काम-धर्माचरण एवं सृष्टि के विकास हेतु सन्तानोत्पत्ति
    ❑ 4. मोक्ष-जीवन चक्र से मुक्ति

    ❑ पुनर्जन्म का सिद्धांत सर्वप्रथम शतपथ ब्राह्मण में दिखाई देता है।

    ❑ शतपथ ब्राह्मण में राजा को विषमता (जनता का भक्षक) कहा गया है।

    ❑ ऐतरेय ब्राह्मण में राजा को उत्तर में विराट, दक्षिण में भोज, पूर्व में सम्राट और पश्चिम में स्वराट कहा जाता था।

    ❑ उत्तर वैदिक काल में तीन आश्रम ब्रह्मचर्य, गृहस्थ एवं वानप्रस्थ होता था। परन्तु कालान्तर में संन्यास नाम से चौथा आश्रम भी इस व्यवस्था का अंग बन गया।

    ❑ चार आश्रम व्यवस्था बुद्ध काल एवं सूत्रकाल में स्थापित हुई।

    ❑ यम और नचिकेता और उनके बीच तीन वर प्राप्त करने की कहानी कठोपनिषद् में वर्णित है।

    ❑ छंदोग्य उपनिषद् में इतिहास पुराण को स्पष्ट रूप से पंचम वेद कहा गया है।

    ❑ अथर्ववेद में मवेशियों की वृद्धि के लिए प्रार्थना की गई है।

    ❑ उत्तर वैदिक काल में गोत्र व्यवस्था स्थापित हुई।

    ❑ उत्तर वैदिक काल में ही मूर्ति पूजा का आरंभ हुआ।

    ❑ अथर्ववेद संभा तथा समिति को प्रजापति की दो पुत्रियाँ कहा गया है।

    ❑ जाबालोपनिषद् में प्रथम बार चारों आश्रम की चर्चा हुई है।

    ❑ ऐतरेय ब्राह्मण द्वारा बहुविवाह के प्रचलन का संकेत मिलता है।

    ❑ विधवा विवाह का प्रचलन तैत्तिरीय संहिता में मिलता है।

    ❑ विधवा पुत्र को देधिपत्य कहा जाता था।

    ❑ शतपथ ब्राह्मण कृषि की समस्त प्रक्रिया का वर्णन मिलता है।

    ❑ काठक संहिता में 24 बैलों द्वारा खींचे जाने वाले हलों का उल्लेख मिलता है।

    ❑ उत्तर वैदिक काल में वेद विरोधी और ब्राह्मण विरोधी धार्मिक अध्यापकों को श्रमण नाम से जाना जाता था।

    ❑ अथर्वदेव के अनुसार राजा को आय का 16वाँ भाग मिलता था।

    ❑ शतपथ ब्राह्मण में एक स्थान पर क्षत्रियों को ब्राह्मणों से श्रेष्ठ बताया गया है।

    ❑ अथर्ववेद में सिंचाई के साधन के रूप में वर्णाकूप और नहर (कूल्या) का उल्लेख मिलता है।

    ❑ अथर्ववेद में परीक्षित को मृत्युलोक का देवता बताया गया है।

    ❑ छांदोग्य उपनिषद् में एक दुर्भिक्ष का उल्लेख मिलता है।

    ❑ 1. राजसूय यज्ञ : राज्याभिषेक के समय यह याज्ञिक अनुष्ठान किया जाता था। जिससे प्रजा में विश्वास उत्पन्न होता था कि उसके राजा को दिव्य शक्ति प्राप्त है।

    ❑ 2. अश्वमेध यज्ञ : राज्य विस्तार हेतु घोड़े को छोड़कर दिग्विजयी होने का प्रतीक।

    ❑ 3. वाजपेय यज्ञ : रथों की दौड़ का आयोजन राजा की श्रेष्ठता का प्रतीक।

    ❑ 4. अग्निष्टोम यज्ञ : इसमें सात्विक जीवन व्यतीत करते हुए जन कल्याण हेतु अग्नि को पशुबलि दी जाती थी।

  • वैदिक काल (1500-600 ई.पू.) MCQ प्रश्न | UPSC

    1. ऋग्वेद में……ऋचाएं हैं-
    (a) 1028
    (b) 1017
    (c) 1128
    (d) 1020
    Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2011
    उत्तर-(*)
    ऋग्वेद में कुल 10 मंडल, 1028 सूक्त और 10,552 ऋचाएं (मंत्र) हैं। दिए गए विकल्पों में से कोई भी एकदम सही नहीं है, इसलिए उत्तर (*) अर्थात् कोई नहीं दिया गया है। ऋग्वेद विश्व के प्राचीनतम ग्रंथों में से एक माना जाता है और इसकी रचना लगभग 1500–1200 ईसा पूर्व हुई।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद के 9वें मंडल को ‘सोममंडल’ कहते हैं क्योंकि इसमें सोम देवता की स्तुति में रची गई ऋचाएं संकलित हैं। ऋग्वेद के प्रसिद्ध गायत्री मंत्र की रचना विश्वामित्र ने की थी, जो इसके तीसरे मंडल में मिलता है।
    2. ‘त्रयी’ नाम है-
    (a) तीन वेदों का
    (b) धर्म, संघ व युद्ध का
    (c) हिंदू धर्म के तीन देवताओं का
    (d) तीन मौसमों का
    U.P.P.S.C. (GIC) 2010
    उत्तर-(a)
    ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद — इन तीन वेदों को सम्मिलित रूप से ‘वेदत्रयी’ या ‘त्रयी’ कहा जाता है। अथर्ववेद को प्रारंभ में इस त्रयी में सम्मिलित नहीं किया गया था क्योंकि उसका विषय अन्य तीन वेदों से भिन्न (तंत्र-मंत्र, जादू-टोना आदि) था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यज्ञ में तीन प्रमुख पुरोहित होते थे — होता (ऋग्वेद का ज्ञाता), अध्वर्यु (यजुर्वेद का ज्ञाता) और उद्गाता (सामवेद का ज्ञाता) — जो इसी त्रयी पर आधारित थे। अथर्ववेद को ‘ब्रह्मवेद’ भी कहा जाता है और इसे चौथे वेद के रूप में बाद में मान्यता मिली।
    3. आर्य शब्द इंगित करता है-
    (a) नृजाति समूह को
    (b) यायावरी जन को
    (c) भाषा समूह को
    (d) श्रेष्ठ वंश को
    I.A.S. (Pre) 1999
    U.P.P.C.S. (Pre) 1999
    उत्तर-(d)
    ‘आर्य’ संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ ‘श्रेष्ठ’, ‘कुलीन’ या ‘सज्जन’ होता है। वैदिक साहित्य में इसका प्रयोग किसी नृजातीय समूह या भाषा विशेष के लिए नहीं, बल्कि उच्च नैतिक आचरण वाले व्यक्ति के लिए हुआ है। सायणाचार्य ने ऋग्वेद के भाष्य में आर्य का अर्थ ‘यज्ञ का अनुष्ठाता’ और ‘आदरणीय’ बताया है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बौद्ध साहित्य में भी ‘आर्य’ शब्द का प्रयोग ‘चार आर्य सत्य’ (Four Noble Truths) के रूप में हुआ है, जहाँ इसका अर्थ श्रेष्ठ या पवित्र सत्य है। आधुनिक काल में 19वीं सदी में यूरोपीय विद्वानों ने ‘आर्य’ को एक भाषाई समूह (Indo-European language speakers) के लिए प्रयोग करना शुरू किया, जो मूल वैदिक अर्थ से भिन्न है।
    4. निम्नलिखित चार वेदों में से किस एक में जादुई माया और वशीकरण का वर्णन है ?
    (a) ऋग्वेद
    (b) यजुर्वेद
    (c) अर्थवेद
    (d) सामवेद
    Jharkhand P.C.S. (Pre) 2011
    उत्तर-(c)
    अथर्ववेद चार वेदों में वह एकमात्र वेद है जिसमें जादू-टोना, तंत्र-मंत्र, वशीकरण, रोगनिवारण और भूत-प्रेत आदि से संबंधित विषयों का विस्तृत वर्णन मिलता है। इसमें 20 अध्याय और लगभग 730 सूक्त हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अथर्ववेद को ‘भैषज्यवेद’ भी कहते हैं क्योंकि इसमें अनेक जड़ी-बूटियों और औषधियों का उल्लेख मिलता है, जिससे आयुर्वेद के विकास में इसका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। अथर्ववेद में तत्कालीन सामाजिक जीवन, लोक-विश्वासों और जनसाधारण की संस्कृति का सर्वाधिक प्रामाणिक चित्रण उपलब्ध होता है।
    5.क्लासिकीय संस्कृति में आर्य’ शब्द का अर्थ है-
    (a) ईश्वर में विश्वासी
    (b) एक वंशानुगत जाति
    (c) किसी विशेष धर्म में विश्वास रखने वाला
    (d) एक उत्तम व्यक्ति
    U.P.Lower Sub. (Pre) 1998
    उत्तर-(d)
    क्लासिकीय संस्कृत साहित्य में ‘आर्य’ शब्द का प्रयोग ‘एक उत्तम व्यक्ति’ के अर्थ में होता है। वैदिक साहित्य में कहीं भी आर्य का उल्लेख किसी जाति या विशेष भाषा-भाषी समूह के रूप में नहीं हुआ है। कालिदास के नाटकों में पात्र एक-दूसरे को ‘आर्य’ कहकर संबोधित करते हैं जिसका अभिप्राय ‘सम्माननीय’ या ‘श्रेष्ठ व्यक्ति’ होता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जैन धर्म में ‘आर्य’ का प्रयोग उन व्यक्तियों के लिए किया गया है जो मोक्षमार्ग पर चलते हैं और अहिंसा का पालन करते हैं। रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों में भी ‘आर्य’ शब्द जाति-सूचक नहीं बल्कि गुण-सूचक है।
    6.सुमेलित कीजिये-
    A. अथर्ववेद 1. ईश्वर महिमा
    B. ऋग्वेद 2. बलिदान विधि
    C. यजुर्वेद 3. औषधियों से संबंधित
    D. सामवेद 4. संगीत कूट :
    A B C D
    (a) 3 1 2 4
    (b) 1 2 3 4
    (c) 2 3 4 1
    (d) 3 4 1 2
    M.P.P.C.S. (Pre) 1999
    उत्तर-(a)
    चारों वेदों का विषय-वर्गीकरण इस प्रकार है — अथर्ववेद: औषधियों, रोग-निवारण और तंत्र-मंत्र से संबंधित; ऋग्वेद: देवताओं की स्तुति (ईश्वर महिमा); यजुर्वेद: यज्ञ की विधियाँ (बलिदान विधि); सामवेद: संगीतबद्ध स्तोत्र। अतः सही सुमेलन A-3, B-1, C-2, D-4 है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यजुर्वेद के दो प्रमुख संस्करण हैं — ‘शुक्ल यजुर्वेद’ (वाजसनेयी संहिता) और ‘कृष्ण यजुर्वेद’ (तैत्तिरीय संहिता)। शुक्ल यजुर्वेद में केवल मंत्र हैं जबकि कृष्ण यजुर्वेद में मंत्रों के साथ गद्य में व्याख्या भी दी गई है।
    7. किस वैदिक ग्रंथ में ‘वर्ण’ शब्द का सर्वप्रथम नामोल्लेख मिलता हैं?
    (a) ऋग्वेद
    (b) अर्थवेद
    (c) सामवेद
    (d) यजुर्वेद
    Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2012
    उत्तर-(a)
    ‘वर्ण’ शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है जहाँ इसका प्रयोग ‘रंग’ के अर्थ में हुआ है — आर्यों को ‘गौर वर्ण’ (श्वेत) तथा दासों को ‘कृष्ण वर्ण’ (काला) कहा गया है। चातुर्वर्ण्य व्यवस्था (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) का उल्लेख ऋग्वेद के दसवें मंडल के पुरुष सूक्त में मिलता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वैदिक काल में वर्ण-व्यवस्था जन्म पर नहीं बल्कि कर्म और व्यवसाय पर आधारित थी; बाद के उत्तर-वैदिक काल में यह जन्माधारित और कठोर होती गई। पुरुष सूक्त के अनुसार विराट पुरुष के मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, जंघाओं से वैश्य और पैरों से शूद्र की उत्पत्ति बताई गई है।
    8. वर्णव्यवस्था से संबंधित पुरुष सूक्त’ मूलतः पाया जाता है-
    (a) अथर्ववेद
    (b) सामवेद
    (c) ऋग्वेद
    (d) मनुस्मृति
    Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2014
    उत्तर-(c)
    वर्ण-व्यवस्था से संबंधित ‘पुरुष सूक्त’ ऋग्वेद के दसवें मंडल में स्थित है। इसमें समाज के चार वर्णों — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र — की उत्पत्ति का प्रतीकात्मक वर्णन एक विराट ‘पुरुष’ (ब्रह्मांडीय सत्ता) के विभिन्न अंगों से हुई बताई गई है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद के दसवें मंडल में ही ‘नासदीय सूक्त’ भी मिलता है जो सृष्टि की उत्पत्ति के दार्शनिक प्रश्नों पर विचार करता है और विश्व के प्राचीनतम दार्शनिक ग्रंथों में से एक माना जाता है। पुरुष सूक्त का पाठ आज भी हिंदू धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता है।
    10.भारतीय साहित्य में वेद चार राबरी पुराना बंद कौन-सा है ?
    (a) यजुर्वेद
    (b) ऋग्वेद
    (c) सामवेद
    (d) अथर्ववेद
    U.P.P.C.S. (Pre) 1995
    Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2010
    Uttarakhand U.D.A. / L.D.A. (Pre) 2007
    उत्तर-(b)
    चार वेदों में ऋग्वेद सर्वाधिक प्राचीन माना जाता है। इसकी रचना लगभग 1500–1200 ईसा पूर्व के बीच हुई मानी जाती है। यह न केवल भारत का बल्कि विश्व का भी प्राचीनतम ज्ञात साहित्यिक ग्रंथ है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद को UNESCO ने 2007 में ‘विश्व धरोहर’ (Memory of the World Register) की सूची में सम्मिलित किया है। ऋग्वेद का पहला मंडल ‘अग्निसूक्त’ से आरंभ होता है जिसमें अग्नि देवता की स्तुति की गई है — “अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्।”
    11. उपनिषद पुस्तकें हैं-
    (a) धर्म पर
    (b) योग पर
    (c) विधि पर
    (d) दर्शन
    U.P.P.C.S. (Pre) 2002
    U.P.P.C.S. (Mains) 2004
    उत्तर-(d)
    उपनिषद मूलतः दर्शन (Philosophy) पर आधारित ग्रंथ हैं, जो आत्मा (आत्मन्) और ब्रह्म के संबंध को गहराई से विवेचित करते हैं। इन्हें ‘वेदांत’ भी कहा जाता है क्योंकि ये वेदों के अंतिम एवं सारभूत भाग हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: उपनिषदों की कुल संख्या 108 मानी जाती है, किंतु दार्शनिक दृष्टि से मुख्य रूप से 12 उपनिषद ही प्रमुख माने गए हैं, जिन पर आदि शंकराचार्य ने भाष्य लिखा। सबसे प्राचीन उपनिषद ‘बृहदारण्यक’ और ‘छान्दोग्य’ माने जाते हैं। उपनिषदों का फारसी अनुवाद ‘सिर्र-ए-अकबर’ के नाम से मुगल राजकुमार दारा शिकोह ने 17वीं शताब्दी में करवाया था।
    12. निम्नलिखित में से किसका संकलन ऋग्वेद पर आधारित है ?
    (a) यजुर्वेद
    (b) सामवेद
    (c) अथर्ववेद
    (d) इनमें से कोई नहीं
    U.P.P.C.S. (Pre) 1997
    उत्तर-(b)
    सामवेद में कुल 1875 ऋचाएं संकलित हैं। इनमें से अधिकांश — सामान्य मतानुसार 75 को छोड़कर शेष सभी — ऋग्वेद में भी पाई जाती हैं। कुछ विद्वान यह संख्या 99 बताते हैं। इस प्रकार सामवेद का संकलन मुख्यतः ऋग्वेद की ऋचाओं पर आधारित है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सामवेद को ‘भारतीय संगीत का जनक’ माना जाता है क्योंकि इसकी ऋचाएं विशेष धुनों (सामन्) में गाई जाती थीं। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है — “वेदानां सामवेदोऽस्मि” अर्थात् वेदों में मैं सामवेद हूँ, जो इसकी श्रेष्ठता को दर्शाता है।
    13. गोपथ ब्राह्मण संबंधित है-
    (a) यजुर्वेद से
    (b) ऋग्वेद से
    (c) अथर्ववेद से
    (d) सामवेद से
    U.P.R.O. / A.R.O. (Pre) 2014
    उत्तर-(c)
    गोपथ ब्राह्मण अथर्ववेद से संबद्ध एकमात्र ब्राह्मण ग्रंथ है। ब्राह्मण ग्रंथ यज्ञों और उनके अनुष्ठान-विधानों की विस्तृत व्याख्या करते हैं। प्रमुख ब्राह्मण ग्रंथों का वेद-आधार इस प्रकार है — ऐतरेय व कौषीतकी ब्राह्मण: ऋग्वेद; पंचविश/ताण्ड्य व जैमिनीय ब्राह्मण: सामवेद; शतपथ ब्राह्मण: यजुर्वेद; गोपथ ब्राह्मण: अथर्ववेद।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शतपथ ब्राह्मण सभी ब्राह्मण ग्रंथों में सबसे विशाल एवं महत्त्वपूर्ण माना जाता है; इसमें 100 अध्याय हैं और इसकी रचना याज्ञवल्क्य से जोड़ी जाती है। गोपथ ब्राह्मण ही एकमात्र ऐसा ब्राह्मण ग्रंथ है जो अथर्ववेद की परंपरा को व्याख्यायित करता है।
    14. भारत के किस स्थल की खुदाई से लौह धातु के प्रचलन के प्राचीनतम प्रमाण मिले हैं?
    (a) तक्षशिला
    (b) अंतरजीखेडा
    (c) कौशाम्बी
    (d) हस्तिनापुर
    U.P.P.C.S. (Pre) 1998
    उत्तर-(b)
    अतरंजीखेड़ा (उत्तर प्रदेश के एटा जिले में स्थित) की पुरातात्त्विक खुदाई से लौह धातुमल (iron slag) तथा धातु शोधन में प्रयुक्त भट्टियों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इससे स्पष्ट होता है कि यहाँ लोहे को स्थानीय रूप से गलाने और प्रसंस्करण का कार्य होता था, जो इसे भारत में लौह प्रचलन का प्राचीनतम साक्ष्य देने वाला स्थल बनाता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: भारत में लौह युग का आरंभ लगभग 1000 ईसा पूर्व माना जाता है। अतरंजीखेड़ा से चित्रित धूसर मृद्भांड (Painted Grey Ware – PGW) संस्कृति के अवशेष भी मिले हैं, जो उत्तर वैदिक काल से संबद्ध है। PGW संस्कृति का काल लगभग 1100–600 ईसा पूर्व निर्धारित किया गया है।
    15. ऋग्वेद संहिता का नौवां मंडल पूर्णतः किसको समर्पित है? (a)
    इंद्र और उनका हाथी
    (b) उर्वशी एवं स्वर्ग
    (c) पौधों और जड़ी-बूटियों से संबंधित देवतागण
    (d) सोम और इस पेय पर नामाकृत देवता
    40th B.P.S.C. (Pre) 1995
    उत्तर-(d)
    ऋग्वेद के नौवें मंडल में कुल 114 सूक्त हैं और यह पूर्णतः ‘सोम’ देवता को समर्पित है। सोम एक पवित्र पेय था जिसे यज्ञों में अर्पित किया जाता था और देवताओं की प्रिय वस्तु माना जाता था। इस मंडल को ‘सोम मंडल’ भी कहते हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सोम को वैदिक देवताओं में विशिष्ट स्थान प्राप्त था — इसे ‘वनस्पतिपति’ (वनस्पतियों का राजा) भी कहा गया है। ऋग्वेद में सर्वाधिक स्तुतियाँ इंद्र देव को समर्पित हैं (लगभग 250 सूक्त), जबकि अग्नि देव दूसरे स्थान पर हैं।
    16. ‘यज्ञ’ संबंधी विधि-विधानों का पता चलता है-
    (a) ऋग्वेद से
    (b) सामवेद से
    (c) ब्राह्मण ग्रंथों से
    (d) यजुर्वेद से
    R.A.S. / R.T.S. (Pre) 1999
    उत्तर-(b)
    यज्ञ संबंधी विधि-विधानों का विस्तृत विवरण यजुर्वेद में मिलता है। ‘यजुस्’ शब्द का अर्थ ही यज्ञ-सूत्र अथवा यज्ञ-मंत्र है। यजुर्वेद के दो प्रमुख भाग हैं — शुक्ल यजुर्वेद (वाजसनेयि संहिता) तथा कृष्ण यजुर्वेद (तैत्तिरीय संहिता)। [नोट: विकल्प (b) गलत है; सही उत्तर (d) यजुर्वेद है।]
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शुक्ल यजुर्वेद में मंत्र और ब्राह्मण भाग अलग-अलग हैं, जबकि कृष्ण यजुर्वेद में ये मिश्रित हैं। यजुर्वेद के पुरोहित को ‘अध्वर्यु’ कहा जाता था, जो यज्ञ के समय मंत्रोच्चारण करते हुए क्रियात्मक कार्य भी संपन्न करता था।
    17. ऋग्वेद है-
    (a) स्तोत्रों का संकलन
    (b) कथाओं का संकलन
    (c) शब्दों का संकलन
    (d) युद्ध का ग्रंथ
    U.P.R.O/A.R.O. (Pre) 2016
    उत्तर-(a)
    ऋग्वेद विभिन्न देवताओं की स्तुति में रचित स्तोत्रों (Hymns) का संकलन है। यह विश्व का सबसे प्राचीन उपलब्ध साहित्यिक ग्रंथ माना जाता है। इसमें 10 मंडल, 1028 सूक्त (कुछ मत से 1017) और लगभग 10,552 ऋचाएं (मंत्र) हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद के प्रथम एवं दशम मंडल बाद में जोड़े गए माने जाते हैं और इनकी भाषा अपेक्षाकृत अर्वाचीन है। प्रसिद्ध ‘गायत्री मंत्र’ ऋग्वेद के तृतीय मंडल (3.62.10) में स्थित है, जो सूर्यदेव ‘सवितृ’ को समर्पित है।
    18. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित करें एवं निम्न दिए हुए कूट में से सही
    सूची-I सूची-II (a) ऋग्वेद (i) गोपथ
    (b) सामवेद (ii) शतपथ
    (c) अर्थवेद (iii) ऐतरेय
    (d) यजुर्वेद (iv) पंचविश
    कूट :
    उत्तर का चयन करें
    A B C D
    (a) A-(iv),B-(ii),C-(iii),D-(i),
    (b) B-(ii), B-(iv),C-(iii),D-(i),
    (c) C-(iii), B-(iv),C-(i),D-(ii),
    (d) D-(i),B-(ii),C-(iv),D-(iii),
    R.A.S. / R.T.S. (Pre) 2013
    उत्तर-(c)
    वेदों और उनसे संबंधित ब्राह्मण ग्रंथों का सही सुमेलन इस प्रकार है — ऋग्वेद → ऐतरेय ब्राह्मण; सामवेद → पंचविश (ताण्ड्य) ब्राह्मण; अथर्ववेद → गोपथ ब्राह्मण; यजुर्वेद → शतपथ ब्राह्मण। प्रत्येक वेद के ब्राह्मण ग्रंथ उस वेद के मंत्रों के यज्ञ-संदर्भ में अर्थ और प्रयोग की व्याख्या करते हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद से जुड़ा एक अन्य ब्राह्मण ग्रंथ ‘कौषीतकी ब्राह्मण’ भी है। शतपथ ब्राह्मण में ‘पुरुषमेध’, ‘अश्वमेध’ जैसे यज्ञों के साथ-साथ सृष्टि-उत्पत्ति की कथाएं भी वर्णित हैं और इसे भारतीय गद्य साहित्य का प्रारंभिक नमूना माना जाता है।
    19. निम्नलिखित में से कौन-सा ब्राह्मण ग्रंथ ऋग्वेद से संबंधित है?
    (a) ऐतरेय ब्राह्मण
    (b) गोपथ ब्राह्मण
    (c) शतपथ ब्राह्मण
    (d) तैत्तिरीय ब्राह्मण
    M.P.P.C.S. (Pre) 2017
    उत्तर-(a)
    ऐतरेय ब्राह्मण और कौषीतकी ब्राह्मण — ये दोनों ऋग्वेद से संबंधित हैं। ब्राह्मण ग्रंथ यज्ञ-अनुष्ठानों की विधि, उनके पुरोहितों की भूमिका और मंत्रों की व्याख्या करते हैं। ऐतरेय ब्राह्मण में राज्याभिषेक संस्कार का विस्तृत वर्णन मिलता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऐतरेय ब्राह्मण की रचना महिदास ऐतरेय को श्रेय दी जाती है। तैत्तिरीय ब्राह्मण कृष्ण यजुर्वेद से संबद्ध है। ब्राह्मण ग्रंथ वेदों के ‘कर्मकांड’ पक्ष का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि उपनिषद ‘ज्ञानकांड’ पक्ष का।
    20. ऋग्वेद का कौन-सा मंडल पूर्णतः ‘सोम’ को समर्पित है?
    (a) सातवां मंडल
    (b) आठवां मंडल
    (c) नौवां मंडल
    (d) दसवां मंडल
    42nd B.P.S.C. (Pre) 1997
    उत्तर-(c)
    ऋग्वेद में कुल 10 मंडल हैं। इनमें नौवाँ मंडल पूर्णतः सोम देवता को समर्पित है और इसमें 114 सूक्त संकलित हैं। इसे ‘पवमान मंडल’ भी कहते हैं क्योंकि इसमें सोम के शुद्धिकरण (पवमान) की स्तुतियाँ हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद के दूसरे से सातवें मंडल को ‘वंश मंडल’ या ‘गोत्र मंडल’ कहा जाता है क्योंकि ये किसी विशेष ऋषि-परिवार द्वारा रचित हैं — जैसे तृतीय मंडल विश्वामित्र द्वारा, सप्तम मंडल वसिष्ठ द्वारा। ऋग्वेद का दसवाँ मंडल सबसे बाद में जोड़ा गया और इसमें प्रसिद्ध ‘पुरुष सूक्त’ तथा ‘नासदीय सूक्त’ हैं।
    21. वैदिक नदी कुभा का स्थान कहां निर्धारित होना चाहिए?
    (a) अफगानिस्तान में
    (b) चीनी तुर्किस्तान में
    (c) कश्मीर में
    (d) पंजाब में
    U.P.P.C.S. (Pre) 1999
    उत्तर-(a)
    वैदिक नदी ‘कुभा’ आधुनिक काबुल नदी है, जो अफगानिस्तान में प्रवाहित होती है। ऋग्वेद में इसका उल्लेख आर्यों की उस भौगोलिक स्थिति का संकेत देता है जब वे अफगानिस्तान के क्षेत्रों में भी निवास करते थे।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद में कुभा के साथ-साथ ‘क्रुमु’ (कुर्रम), ‘गोमती’ (गोमल) और ‘सुवास्तु’ (स्वात) नदियों का भी उल्लेख है, ये सभी आधुनिक अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमावर्ती क्षेत्र में बहती हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि ऋग्वैदिक आर्यों का विस्तार पंजाब से परे पश्चिम की ओर भी था।
    22. उपनिषदों का मुख्य विषय है –
    (a) सामाजिक व्यवस्था
    (b) दर्शन
    (c) विधि
    (d) राज्य
    U.P.Lower Sub. (Pre) 1998
    उत्तर-(b)
    उपनिषदों का केंद्रीय विषय दर्शन (Philosophy) है। इनमें आत्मा (आत्मन्), ब्रह्म, जगत की उत्पत्ति, मृत्यु के बाद का जीवन और मोक्ष जैसे गहन दार्शनिक प्रश्नों की विवेचना की गई है। इन्हें ‘वेदांत’ कहा जाता है अर्थात् वेदों का अंतिम और सर्वोच्च ज्ञान।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: उपनिषदों की कुल संख्या परंपरागत रूप से 108 मानी जाती है, किंतु दार्शनिक दृष्टि से आदि शंकराचार्य द्वारा भाष्यित 12 उपनिषद ही सर्वप्रमुख हैं। ‘तत्त्वमसि’ (तुम वही हो) और ‘अहं ब्रह्मास्मि’ (मैं ब्रह्म हूँ) — ये उपनिषदों के सबसे प्रसिद्ध महावाक्य हैं।
    23. ऋग्वेद में निम्नांकित किन नदियों का उल्लेख अफगानिस्तान के साथ आर्यों के संबंध का सूचक है?
    (a) अस्किनी
    (b) B. परुष्णी
    (c) कुभा, क्रुमु
    (d) विपाशा, शुतुद्री
    U.P.C.S. (Pre) 2010
    उत्तर-(c)
    ऋग्वेद में उल्लिखित कुभा (काबुल नदी), क्रुमु (कुर्रम नदी), गोमती (गोमल नदी) एवं सुवास्तु (स्वात नदी) — ये सभी आधुनिक अफगानिस्तान और पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में प्रवाहित होती थीं। इनके उल्लेख से सिद्ध होता है कि आर्यों का इस क्षेत्र से सघन भौगोलिक एवं सांस्कृतिक संबंध था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इसके विपरीत, अस्किनी (चेनाब), परुष्णी (रावी), विपाशा (ब्यास) और शुतुद्री (सतलज) — ये नदियाँ पंजाब क्षेत्र की हैं और ऋग्वेद में वर्णित ‘सप्त सिंधु’ (सात नदियों) का भाग मानी जाती हैं। दशराज युद्ध (दस राजाओं का युद्ध) परुष्णी (रावी) नदी के तट पर हुआ था।
    24. उपनिषद काल के राजा अश्वपति थे –
    (a) काशी के
    (b) केकय के
    (c) पांचाल के
    (c) विदेह के
    U.P.P.C.S. (Pre) 1999
    उत्तर-(b)
    उपनिषद काल में राजा अश्वपति केकय जनपद के शासक थे। उपनिषदों में वर्णित प्रमुख दार्शनिक राजाओं में — विदेह के राजा जनक, पांचाल के राजा प्रवाहण जाबालि, केकय के राजा अश्वपति और काशी के राजा अजातशत्रु विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: राजा जनक को ‘विदेही’ भी कहा जाता था और वे याज्ञवल्क्य जैसे महान ऋषियों के शिष्य थे; बृहदारण्यक उपनिषद में उनके दरबार में हुई दार्शनिक वाद-विवाद सभाओं का विस्तृत वर्णन है। यह तथ्य उपनिषद काल में राजाओं की दार्शनिक अभिरुचि और ज्ञान-संरक्षण की परंपरा को दर्शाता है।
    25. आरंभिक वैदिक साहित्य में सर्वाधिक वर्णित नदी है-
    (a) सिंधु
    (b) शुतुद्री
    (c) सरस्वती
    (d) गंगा
    I.A.S. (Pre) 1996
    उत्तर-(a)
    ऋग्वैदिक काल में सिंधु नदी का सर्वोच्च आर्थिक, सांस्कृतिक और धार्मिक महत्त्व था, इसीलिए ऋग्वेद में इसका उल्लेख सबसे अधिक बार हुआ है। अपने प्रचुर जल और व्यापारिक महत्व के कारण सिंधु को ‘हिरण्यनी’ (स्वर्ण प्रदान करने वाली) कहा गया है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सरस्वती नदी को ऋग्वेद में ‘नदीतमा’ (नदियों में श्रेष्ठ) कहा गया है और इसे देवी के रूप में भी पूजा जाता था; परवर्ती वैदिक काल में इसकी महत्ता बढ़ गई। गंगा नदी का उल्लेख ऋग्वेद में केवल एक बार (नदी-स्तुति सूक्त में) मिलता है, जो दर्शाता है कि उस काल में आर्यों का केंद्र गंगा घाटी नहीं बल्कि सप्त सिंधु क्षेत्र था।
    26. निम्नलिखित में से किस एक वैदिक हित्य में मोक्ष की चर्चा मिलती है ?
    (a) ऋग्वेद
    (b) परवर्ती संहिताएं
    (c) ब्राह्मण
    (d) वेद
    U.P.P.C.S. (Mains) 2003
    उत्तर-(d)
    मोक्ष की अवधारणा वेदों के अंतिम भाग अर्थात् उपनिषदों में सर्वप्रथम प्रकट होती है। ‘मोक्ष’ शब्द का प्रथम प्रयोग ‘श्वेताश्वर उपनिषद’ में मिलता है। संहिताओं और ब्राह्मण ग्रंथों में इस शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: उपनिषदों में मोक्ष को ‘ब्रह्म में आत्मा का विलीन हो जाना’ (ब्रह्मानुभव) बताया गया है। हिंदू दर्शन के चार पुरुषार्थों — धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — में मोक्ष को सर्वोच्च लक्ष्य माना गया है, और इसकी विधिवत दार्शनिक व्याख्या सर्वप्रथम उपनिषदों में ही हुई।
    27. वैदिक नदी अस्किनी की पहचान निम्नांकित नदियों में से किस एक के साथ की जाती है ?
    (a) ब्यास
    (b) रावी
    (c) चेनाब
    (d) झेलम
    U.P.P.S.C. (GIC) 2010
    उत्तर-(c)
    वैदिक नाम ‘अस्किनी’ आधुनिक चेनाब नदी का पर्याय है। ऋग्वेद में पंजाब की नदियों के वैदिक नाम इस प्रकार हैं — विपाशा = ब्यास, परुष्णी = रावी, अस्किनी = चेनाब, वितस्ता = झेलम, शुतुद्री = सतलज।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इन पाँच नदियों के कारण ही इस क्षेत्र को ‘पंचनद’ (पाँच नदियों की भूमि) कहा गया, जो कालांतर में ‘पंजाब’ कहलाया। ऋग्वेद के प्रसिद्ध दशराज युद्ध में परुष्णी (रावी) नदी के तट पर सुदास ने दस राजाओं के गठबंधन को पराजित किया था।
    28. अध्यात्म ज्ञान के विषय में नचिकेता और यम का संवाद किस उपनिषद में प्राप्त होता है?
    (a) बृहदारण्यक उपनिषद में
    (b) छांदोग्य उपनिषद में
    (c) कठोपनिषद में
    (d) केन उपनिषद में
    I.A.S. (Pre) 1997
    U.P.P.C.S. (Pre) 1999
    U.P.U.D.A. / L.D.A. (Pre) 2002
    Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2005
    उत्तर-(c)
    कठोपनिषद में यमराज और बालक नचिकेता के मध्य आत्मा की प्रकृति और मृत्यु के रहस्य पर हुए प्रसिद्ध संवाद का वर्णन है। यमराज ने नचिकेता को उपदेश दिया — “यह आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है; यह अजन्मा, नित्य और शाश्वत है।” कठोपनिषद कृष्ण यजुर्वेद की परंपरा से संबद्ध है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: नचिकेता की कथा का सबसे प्रारंभिक उल्लेख ऋग्वेद (10.135) और तैत्तिरीय ब्राह्मण में मिलता है, किंतु इसका विस्तृत दार्शनिक रूप कठोपनिषद में ही प्राप्त होता है। स्वामी विवेकानंद कठोपनिषद को वेदांत दर्शन की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्तियों में से एक मानते थे।
    29. नचिकेता आख्यान का उल्लेख मिलता है-
    (a) अथर्ववेद में
    (b) शतपथ ब्राह्मण में
    (c) कठोपनिषद में
    (d) बृहदारण्यक उपनिषद में
    U.P.P.C.S. (Mains) 2006
    उत्तर-(c)
    नचिकेता आख्यान का सर्वाधिक विस्तृत एवं दार्शनिक वर्णन कठोपनिषद में मिलता है। इस आख्यान में बालक नचिकेता अपने पिता वाजश्रवा द्वारा यमराज को दान किए जाने पर यम के पास पहुँचता है और वहाँ आत्मतत्त्व का ज्ञान प्राप्त करता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: नचिकेता ने यमराज से तीन वर माँगे थे — पहला, पिता की प्रसन्नता; दूसरा, स्वर्गलोक की अग्नि-विद्या; और तीसरा, मृत्यु के बाद आत्मा के रहस्य का ज्ञान। यह तीसरा वर ही कठोपनिषद का मूल विषय है और इसे भारतीय दार्शनिक चिंतन की सर्वोच्च उपलब्धियों में गिना जाता है।
    30. निम्नलिखित में से वैदिक साहित्य का सही क्रम कौन-सा है ?
    (a) वैदिक संहिताएं, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद
    (b) वैदिक संहिताएं, उपनिषद,आरण्यक, ब्राह्मण
    (c) वैदिक संहिताएं, आरण्यक, ब्राह्मण, उपनिषद
    (d) वैदिक संहिताएं, वेदांग, आरण्यक,स्मृतियां
    U.P.P.C.S. (Mains ) 2014
    उत्तर-(a)
    वैदिक साहित्य का कालक्रमानुसार सही क्रम है — (1) वैदिक संहिताएं (ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद), (2) ब्राह्मण ग्रंथ (यज्ञ-विधान की व्याख्या), (3) आरण्यक (वन-ग्रंथ, यज्ञ के आंतरिक अर्थ की विवेचना), (4) उपनिषद (दार्शनिक विवेचन)। यह क्रम वैदिक चिंतन के कर्मकांड से ज्ञानकांड की ओर विकास को दर्शाता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: आरण्यक का शाब्दिक अर्थ है ‘वन में रचित ग्रंथ’ — ये वानप्रस्थ आश्रम के लोगों के लिए लिखे गए थे और ब्राह्मण तथा उपनिषद के बीच की कड़ी माने जाते हैं। उपनिषद इसी श्रृंखला की अंतिम एवं दार्शनिक दृष्टि से सर्वोच्च कड़ी हैं, इसीलिए इन्हें ‘वेदांत’ कहा जाता है।
    31. बोगजकोई महत्वपूर्ण है, क्योंकि-
    (a) यह मध्य एशिया एवं तिब्बत के मध्य एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था।
    (b) यहां से प्राप्त अभिलेखों में वैदिक देवताओं एवं देवियों का नामोल्लेख प्राप्त होता है
    (c) वेद के मूल ग्रंथों रचना यहां हुई थी।
    (d) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
    U.P.P.C.S. (Pre) 1996
    39th B.P.S.C. (Pre) 1994
    उत्तर-(b)
    बोगजकोई (Bogazkoy) आधुनिक तुर्की (एशिया माइनर) में स्थित एक पुरातात्त्विक स्थल है। यहाँ से प्राप्त लगभग 1400 ई.पू. के हित्ती-मितन्नी संधि-अभिलेखों में इंद्र, वरुण, मित्र और नासत्य जैसे ऋग्वैदिक देवताओं के नाम मिले हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि वैदिक आर्य ईरान होते हुए भारत आए और उनका प्रभाव मध्य एशिया तक फैला था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:बोगजकोई से मिले अभिलेख हित्ती भाषा में लिखे गए थे, जो भारोपीय भाषा परिवार की ही एक शाखा है — यह तथ्य वैदिक आर्यों और पश्चिम एशियाई सभ्यताओं के साझा मूल की ओर संकेत करता है। इसके अतिरिक्त, इन अभिलेखों में उल्लिखित देवता ‘नासत्य’ ऋग्वेद के अश्विन देवताओं से पहचाने जाते हैं, जो वैदिक सभ्यता की व्यापक भौगोलिक उपस्थिति को सिद्ध करता है।
    32. निम्नलिखित में से कौन सी प्रथा चतुष्टय वेदोत्तर काल में प्रचलित हुई?
    (a) धर्म-अर्थ-काम- मोक्ष
    (b) ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र
    (c) ब्रह्मचर्य – गृहस्थाश्रम – वानप्रस्थ – संन्यास
    (d) इंद्र- सूर्य-रुद्र-मरुत
    I.A.S. (Pre) 1994
    उत्तर-(a&c)
    चारों पुरुषार्थ — धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — की अवधारणा वेदोत्तर काल में विकसित हुई। ऋग्वैदिक काल में ‘मोक्ष’ की संकल्पना नहीं थी; यह विचार सर्वप्रथम उपनिषदों में प्रकट हुआ। उसी प्रकार चतुराश्रम व्यवस्था (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास) भी वेदोत्तर काल की देन है। ‘आश्रम’ शब्द संस्कृत की ‘श्रम’ धातु से बना है जिसका अर्थ है — परिश्रम या साधना।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘पुरुषार्थ’ की चतुष्टय व्यवस्था में मोक्ष को सर्वोच्च लक्ष्य माना गया है और इसे सर्वप्रथम बृहदारण्यक उपनिषद में स्पष्ट रूप से वर्णित किया गया। इसके अलावा, आश्रम व्यवस्था का सबसे प्रारंभिक उल्लेख जाबालोपनिषद में मिलता है, जो इसकी उत्तर-वैदिक उत्पत्ति को प्रमाणित करता है।
    33. निम्नलिखित वैदिक देवताओं में किसे उनका पुरोहित माना जाता था?
    (a) अग्नि
    (b) बृहस्पति
    (c) द्यौस
    (d) इन्द्र
    U.P.P.C.S. (Mains) 2013
    उत्तर-(b)
    वैदिक परंपरा में बृहस्पति को देवताओं का पुरोहित (देवगुरु) माना जाता था। वे ज्ञान, वाणी और बुद्धि के अधिपति देवता हैं। ऋग्वेद में बृहस्पति को ‘वाचस्पति’ भी कहा गया है — अर्थात वाणी के स्वामी। इसी कारण उन्हें देवताओं के यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठानों में पुरोहित की भूमिका दी गई।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जिस प्रकार देवताओं के गुरु बृहस्पति हैं, उसी प्रकार असुरों (दैत्यों) के गुरु शुक्राचार्य को माना जाता है। इसके अलावा, अग्नि को भी वैदिक साहित्य में ‘पुरोहित’ कहा गया है — किंतु वे मनुष्यों और देवताओं के बीच यज्ञ-संदेशवाहक के रूप में पुरोहित हैं, जबकि बृहस्पति स्वयं देव-समाज के आचार्य हैं।
    34. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट से सही
    सूची-1 (वैदिक नदियां ) सूची-II (आधुनिक नाम)
    A. कुभा 1. गंडक
    B. परुष्णी 2. काबुल
    C. सदानीरा 3. रावी
    D. शुतुद्री 4. सतलज
    कूट :
    उत्तर का चयन कीजिए:
    A B C D
    (a) 1 2 4 3
    (b) 2 3 1 4
    (c) 3 4 2 1
    (d) 4 1 3 2
    U.P.P.C.S. (Pre) 2012
    उत्तर-(b)
    वैदिक साहित्य में उल्लिखित नदियों और उनके आधुनिक नामों का सुमेलन इस प्रकार है — कुभा = काबुल, परुष्णी = रावी, सदानीरा = गंडक, तथा शुतुद्री (या शत्रुद्रि) = सतलज। ये नदियाँ मुख्यतः उत्तर-पश्चिम भारत और वर्तमान पाकिस्तान-अफगानिस्तान क्षेत्र में प्रवाहित होती थीं और वैदिक सभ्यता के विस्तार की साक्षी रही हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद के ‘नदी-सूक्त’ (10वें मंडल) में कुल 10 नदियों का पश्चिम से पूर्व की ओर उल्लेख है — गंगा से शुरू होकर सिंधु तक। इनमें सरस्वती नदी को सबसे पवित्र माना जाता था जो आज की घग्गर-हाकरा नदी के रूप में पहचानी जाती है और वर्तमान में लुप्तप्राय है। इसी सरस्वती के तट पर वैदिक संस्कृति का केंद्र था।
    35. ऋग्वैदिक काल में निष्क शब्द का प्रयोग एक आभूषण के लिए होता था, किंतु परवर्ती काल में उसका प्रयोग इस अर्थ में हुआ-
    (a) शस्त्र
    (b) कृषि औजार
    (c) लिपि
    (d) सिक्का
    I.A.S. (Pre) 1993
    उत्तर-(d)
    ऋग्वैदिक काल में ‘निष्क’ सोने का बना एक गले का आभूषण (हार) था जिसे राजा और कुलीन वर्ग के लोग धारण करते थे। कालांतर में, जब मुद्रा-विनिमय की प्रणाली विकसित हुई, तो यही ‘निष्क’ शब्द सोने के सिक्के के अर्थ में प्रयुक्त होने लगा। इस प्रकार आभूषण से मुद्रा की यह यात्रा वैदिक अर्थव्यवस्था के विकास को दर्शाती है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वैदिक काल में विनिमय की मुख्य इकाई ‘गाय’ (गव्य) थी और ‘निष्क’ उससे ऊँचे मूल्य की इकाई मानी जाती थी। बाद में मौर्य काल में ‘पण’ (punch-marked coins) सर्वाधिक प्रचलित मुद्रा बने। भारत में सबसे प्राचीन ज्ञात धातु-मुद्राएँ ‘आहत सिक्के’ (Punch Marked Coins) हैं जो लगभग 600 ई.पू. के आसपास प्रचलित हुईं।
    36. “धर्म “तथा “ऋत” भारत की प्राचीन वैदिक सभ्यता के एक द्रीय विचार को चित्रित करते हैं। इस संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
    1. धर्म व्यक्ति के दायित्वों एवं स्वयं तथा दूसरों के प्रति व्यक्तिगत कर्तव्यों की संकल्पना था।
    2. ऋत मूलभूत नैतिक विधान था, जो सृष्टि और उसमें अंतर्निहित सारे तत्वों के क्रियाकलापों को संचालित करता था। उपर्युक्त में से कौन-सा / कौन-से कथन सही है/हैं?
    (a) केवल 1
    (b) केवल 2
    (c) 1 और 2 दोनों
    (d) न तो 1 और न ही 2
    I.A.S. (Pre) 2011
    उत्तर-(c)
    वैदिक सभ्यता में ‘धर्म’ और ‘ऋत’ दोनों ही मौलिक नैतिक-दार्शनिक अवधारणाएँ हैं। धर्म व्यक्ति के नैतिक कर्तव्यों और सामाजिक उत्तरदायित्वों की संकल्पना को व्यक्त करता है, जबकि ऋत ब्रह्मांडीय नियम है जो समस्त सृष्टि की व्यवस्था और प्राकृतिक क्रम को नियंत्रित करता है। वरुण देव इस ‘ऋत’ के संरक्षक थे और इसीलिए उन्हें ‘ऋतस्य गोपा’ कहा जाता था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद में ‘ऋत’ शब्द का प्रयोग लगभग 390 बार हुआ है, जो इस अवधारणा की केंद्रीयता को दर्शाता है। ईरानी (अवेस्ता) ग्रंथों में ‘ऋत’ का समकक्ष ‘आशा’ (Asha) है, जो वहाँ भी नैतिक-सत्य के नियामक के रूप में पूजित है — यह भारत-ईरानी सांस्कृतिक साझेदारी का प्रमाण है।
    37. भारतीय संस्कृति के अंतर्गत ‘ऋत’ का अर्थ है-
    (a) प्राकृतिक नियम
    (b) कृत्रिम नियम
    (c) मानवीय नियम
    (d) सामाजिक नियम
    Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2016
    उत्तर-(a)
    ‘ऋत’ वैदिक दर्शन की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण अवधारणा है जिसका शाब्दिक और भावार्थ ‘ब्रह्मांडीय प्राकृतिक नियम’ है। यह वह अदृश्य शक्ति है जो ऋतुओं के परिवर्तन, सूर्योदय-सूर्यास्त, नदियों के प्रवाह और जीव-जगत के समस्त क्रियाकलापों को सुव्यवस्थित रखती है। ऋग्वेद में सृष्टि के प्रारंभ में ऋत की उत्पत्ति को प्राथमिक माना गया है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘ऋत’ से ही संस्कृत का ‘ऋतु’ शब्द बना है, जो छह ऋतुओं के प्राकृतिक चक्र को दर्शाता है। वैदिक देवता मित्र और वरुण दोनों को संयुक्त रूप से ‘ऋत के रक्षक’ माना गया था — मित्र दिन और सामाजिक नियम के और वरुण रात्रि एवं नैतिक व्यवस्था के देवता के रूप में।
    38. निम्नलिखित में से कौन सी वह ब्रह्मवादिनी थी, जिसने कुछ वेद मंत्रों की रचना की थी ?
    (a) लोपामुद्रा
    (b) गार्गी
    (c) लीलावती
    (d) सावित्री
    I.A.S. (Pre) 1995
    उत्तर-(a)
    वैदिक साहित्य में अनेक विदुषी स्त्रियों — जिन्हें ‘ब्रह्मवादिनी’ कहा जाता था — का उल्लेख मिलता है जिन्होंने वेद मंत्रों की रचना की। इनमें लोपामुद्रा प्रमुख हैं जो महर्षि अगस्त्य की पत्नी थीं और जिन्होंने ऋग्वेद के प्रथम मंडल का एक सूक्त रचा। इसके अतिरिक्त अपाला, घोषा और विश्ववारा भी प्रसिद्ध ब्रह्मवादिनी थीं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद में कुल 27 महिला ऋषियों (द्रष्टाओं) का उल्लेख है जिन्होंने मंत्रों की रचना की। गार्गी और मैत्रेयी, हालांकि वेद मंत्रों की रचयित्री नहीं थीं, किंतु बृहदारण्यक उपनिषद के दार्शनिक संवादों में उनकी उपस्थिति वैदिक काल में नारी की बौद्धिक स्वतंत्रता को प्रमाणित करती है।
    39. ऋग्वैदिक काल में निष्क किस अंग का आभूषण था ?
    (a) कान का
    (b) गला का
    (d) कलाई का
    (c) बाहु का
    U.P.P.C.S. (Mains ) 2007
    उत्तर-(b)
    ऋग्वैदिक काल में ‘निष्क’ गले में धारण किया जाने वाला एक विशिष्ट सुवर्ण (स्वर्ण) हार था। यह आभूषण सामाजिक प्रतिष्ठा और धन-संपदा का प्रतीक माना जाता था। राजा और अमीर वर्ग के व्यक्ति इसे विशेष अवसरों पर पहनते थे। वैदिक काल में ‘निष्क’ विनिमय के माध्यम के रूप में भी प्रचलित था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वैदिक काल के अन्य प्रसिद्ध आभूषणों में ‘रुक्म’ (सोने का वक्षाभूषण), ‘कर्णशोभन’ (कान का आभूषण) और ‘खादि’ (कंगन) का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद में दान में दी जाने वाली वस्तुओं में निष्क का विशेष उल्लेख है, जो तत्कालीन दानशीलता और सामाजिक मूल्यों को दर्शाता है।
    40. प्राचीन भारत में ‘निशाका’ जाने जाते थे –
    (a) स्वर्ण आभूषण
    (b) गायें
    (c) तांबे के सिक्के
    (d) चांदी के सिक्के
    U.P.P.C.S. (Pre) 2005
    उत्तर-(a)
    बौद्ध जातक ग्रंथों में तीन प्रकार के स्वर्ण सिक्कों का वर्णन मिलता है। इनमें ‘निशाका’ (निष्क) सर्वोच्च मूल्य की स्वर्ण मुद्रा थी, ‘सुवर्ण’ मध्यम और ‘मशाका’ सबसे न्यून मूल्य की। इस प्रकार प्राचीन भारत में स्वर्ण आभूषणों से विकसित होकर मुद्रा-व्यवस्था एक परिष्कृत रूप ले चुकी थी।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जातक कथाओं में ‘कार्षापण’ का उल्लेख भी एक महत्त्वपूर्ण मुद्रा के रूप में मिलता है जो विभिन्न धातुओं (सोना, चाँदी, ताँबा) में ढाली जाती थी। कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ में भी मुद्राओं की विभिन्न श्रेणियों का विस्तृत विवरण दिया गया है, जो मौर्यकालीन उन्नत मौद्रिक व्यवस्था को दर्शाता है।
    41. प्रसिद्ध दस राजाओं का युद्ध किस के तट पर लड़ा गया ?
    (a) गंगा
    (b) ब्रहह्मपुत्र
    (c) कावेरी
    (d) परुष्णी
    42nd B.P.S. C. (Pre) 1997
    उत्तर-(d)
    दशराज्ञ युद्ध ऋग्वेद के सातवें मण्डल में वर्णित एक ऐतिहासिक संघर्ष है, जो परुष्णी नदी (आधुनिक रावी नदी, पंजाब) के तट पर लड़ा गया था। इस युद्ध में भरत जनजाति के राजा सुदास ने दस राजाओं के एक शक्तिशाली गठबंधन को परास्त किया। सुदास के पुरोहित विश्वामित्र थे, परंतु बाद में वशिष्ठ उनके राजपुरोहित बने।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: • दशराज्ञ युद्ध को विश्व के प्राचीनतम दर्ज युद्धों में से एक माना जाता है, जो लगभग 1100 ई.पू. में हुआ था।
    • इस युद्ध में पराजित राजाओं में अनु, द्रुह्यु, यदु, तुर्वश और पुरु जैसे प्रमुख आर्य कबीले शामिल थे।
    42. निम्नलिखित अभिलेखों में से कौन-सा ईरान से भारत में आर्यों के आने की सूचना देता है ?
    (a) मानसेहरा
    (b) शहबाजगढ़ी
    (c) बोगजकोई
    (d) जूनागढ़
    U.P.P.C.S. (Mains) 2009
    उत्तर-(c)
    बोगजकोई अभिलेख (Boghaz-köi Inscription) आधुनिक तुर्की में स्थित है और यह लगभग 1400 ई.पू. का है। इसमें मित्र, वरुण, इंद्र एवं नासत्य जैसे वैदिक देवताओं का उल्लेख मिलता है, जो यह सिद्ध करता है कि आर्य मध्य एशिया से होते हुए ईरान और फिर भारत में आए। यह अभिलेख हित्ती राजा और मित्तानी राजा के बीच संधि का दस्तावेज़ है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: • यह अभिलेख 1906-07 में जर्मन पुरातत्वविद् हुगो विंकलर (Hugo Winckler) ने खोजा था।
    • मानसेहरा और शहबाजगढ़ी अभिलेख सम्राट अशोक के खरोष्ठी लिपि में लिखे गए शिलालेख हैं, जिनका आर्यों के आगमन से कोई संबंध नहीं है।
    43. आर्यों का धर्म प्रमुखतः था-
    (a) भक्ति
    (b) मूर्ति पूजा और यज्ञ
    (c) प्रकृति पूजा और यज्ञ
    (d) प्रकृति पूजा और भक्ति
    I.A.S. (Pre) 2012
    उत्तर-(c)
    पूर्व वैदिक आर्यों का धर्म मुख्यतः प्रकृति की शक्तियों की उपासना (जैसे अग्नि, वायु, वरुण, इंद्र, सूर्य) और यज्ञ-अनुष्ठानों पर केंद्रित था। वे प्राकृतिक तत्त्वों को देवता मानकर उनकी स्तुति में ऋचाएं रचते और यज्ञ में आहुतियां देते थे। मूर्ति पूजा एवं भक्ति आंदोलन का उदय उत्तर वैदिक काल के बाद पुराण युग में हुआ।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: • ऋग्वेद में 33 देवताओं का उल्लेख है, जिन्हें तीन श्रेणियों में बाँटा गया है — आकाश, वायु/अंतरिक्ष और पृथ्वी के देव।
    • इंद्र ऋग्वेद के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण देवता हैं — उनकी स्तुति में सबसे अधिक (250 से अधिक) ऋचाएं हैं।
    44. निम्नलिखित में से किसने आर्यों के के आदि देश के बारे में लिखा था?
    (a) शंकराचार्य
    (b) एनी बेसेंट
    (c) विवेकानंद
    (d) बाल गंगाधर तिलक
    U.P.P.C.S. (Pre) 1996
    उत्तर-(d)
    बाल गंगाधर तिलक ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “The Arctic Home in the Vedas” (1903) में यह तर्क प्रस्तुत किया कि आर्यों का मूल निवास उत्तरी ध्रुव (आर्कटिक क्षेत्र) था। उन्होंने ऋग्वेद और अवेस्ता के खगोलीय संदर्भों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला। हालाँकि अधिकांश इतिहासकार इस मत को स्वीकार नहीं करते।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: • आर्यों के मूल निवास के संदर्भ में सबसे अधिक मान्य मत मैक्स मूलर का है, जिन्होंने मध्य एशिया (बैक्ट्रिया) को आर्यों का आदि देश बताया।
    • तिलक ने एक अन्य प्रसिद्ध पुस्तक “Orion” (1893) भी लिखी, जो वेदों की खगोलीय व्याख्या पर आधारित है।
    45. उत्तर वैदिक काल में निम्नलिखित में से किनको आर्य संस्कृति का धुर समझा जाता था ?
    (a) अंग, मगध
    (b) कोसल , विदेह
    (c) कुरु, पांचाल
    (d) मत्स्य, शूरसेन
    U.P.P.C.S. (Mains ) 2007
    उत्तर-(c)
    उत्तर वैदिक काल (लगभग 1000–600 ई.पू.) में कुरु और पांचाल जनपद वैदिक सभ्यता के सांस्कृतिक एवं धार्मिक केंद्र बन गए थे। ये क्षेत्र आधुनिक उत्तर प्रदेश और हरियाणा में स्थित थे। इन्हें ‘मध्यदेश’ कहा जाता था और ये आर्य धर्म व संस्कृति का मुख्य संस्थान माने जाते थे।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: • उत्तर वैदिक काल में लोहे के हथियारों और औजारों का व्यापक प्रयोग शुरू हुआ, जिससे कृषि का विस्तार हुआ और इन्हीं क्षेत्रों में पहले नगर विकसित हुए।
    • महाभारत में वर्णित कुरुक्षेत्र का युद्ध इसी कुरु जनपद की भूमि पर हुआ था, जो इस क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्त्व को दर्शाता है।
    46. ऋग्वेद काल में जनता निम्न में से मुख्यतया किसमें विश्वास करती थी ?
    (a) मूर्ति पूजा
    (b) एकेश्वरवाद
    (c) देवी पूजा
    (d) बलि एवं कर्मकांड
    U.P.P.C.S. (Pre) 1993
    उत्तर-(d)
    ऋग्वैदिक काल में समाज प्रकृति की शक्तियों (इंद्र, वरुण, अग्नि, मरुत आदि देवताओं) की स्तुति में यज्ञ, बलि और कर्मकांड में विश्वास रखता था। देवताओं को प्रसन्न करने के लिए सोमयज्ञ, अश्वमेध जैसे अनुष्ठान किए जाते थे। इस काल में मूर्ति पूजा या एकेश्वरवाद का प्रचलन नहीं था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: • ऋग्वेद के दशम मण्डल के ‘नासदीय सूक्त’ में सृष्टि की उत्पत्ति पर दार्शनिक चिंतन मिलता है, जो एकत्ववाद (Monism) की दिशा में एक प्रारंभिक कदम माना जाता है।
    • ‘सोमरस’ एक महत्त्वपूर्ण यज्ञीय पेय था जिसे देवताओं को अर्पित किया जाता था; ऋग्वेद का नौवाँ मण्डल पूर्णतः सोम की स्तुति को समर्पित है।
    47. 14वीं सदी ई.पू. का एक अभिलेख जिसमें वैदिक देवताओं का वर्णन है, प्राप्त हुआ है –
    (a) एकवटाना से
    (b) बोगजकोई से
    (c) बेबीलोन से
    (d) विसोटुन से
    U.P.P.C.S (Mains) 2016
    उत्तर-(b)
    तुर्की के बोगजकोई (Boghaz-köi) नामक स्थान से प्राप्त 14वीं शताब्दी ई.पू. का यह अभिलेख हित्ती राजा सुब्बिलुलियुमा और मित्तानी राजा मत्तिवाजा के बीच की संधि का दस्तावेज़ है। इसमें मित्र, वरुण, इंद्र और नासत्य (अश्विन) — चार वैदिक देवताओं के नाम साक्षी के रूप में लिए गए हैं, जो आर्यों के मध्य एशिया में प्रसार का प्रमाण है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: • मित्तानी साम्राज्य (उत्तरी मेसोपोटामिया/आधुनिक सीरिया) में शासक वर्ग की भाषा संस्कृत के निकट थी, जो आर्य भाषा परिवार से संबंधित मानी जाती है।
    • विसोटुन (बेहिस्तून) अभिलेख ईरान में है और इसमें फारसी राजा दारयवहुश (डेरियस प्रथम) की उपलब्धियों का वर्णन है — यह वैदिक देवताओं से असंबंधित है।
    48. शतपथ ब्राह्मण में उल्लिखित राजा विदेध माधव से संबंधित ऋषि थे-
    (a) ऋषि भारद्वाज
    (b) वशिष्ठ
    (c) ऋषि विश्वामित्र
    (d) ऋषि गौतम राहुगण
    U.P. Lower Sub. (Pre) 2015
    उत्तर-(d)
    शतपथ ब्राह्मण की एक प्रसिद्ध आख्यायिका में वर्णन है कि राजा विदेध माधव अपने पुरोहित ऋषि गौतम राहुगण के साथ पश्चिम से पूर्व की ओर बढ़े और सदानीरा नदी (आधुनिक गंडक) को पार करते हुए विदेह (मिथिला/उत्तरी बिहार) राज्य की स्थापना की। यह कथा वैदिक आर्यों के पूर्व दिशा में सरस्वती से गंगा-यमुना की ओर विस्तार का प्रतीकात्मक वर्णन है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: • शतपथ ब्राह्मण शुक्ल यजुर्वेद का ब्राह्मण ग्रंथ है और इसकी रचना याज्ञवल्क्य से संबंधित मानी जाती है — यह विश्व के सबसे बड़े वैदिक गद्य ग्रंथों में से एक है।
    • इस आख्यायिका में अग्नि देवता की भूमिका महत्त्वपूर्ण है — ऋषि गौतम राहुगण अग्नि को अपने मुख में धारण करते थे और जहाँ-जहाँ अग्नि जलाई गई, उन वनों को आर्य भूमि मान लिया गया।
    49. गोत्र शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम हुआ था-
    (a) अथर्ववेद में
    (b) ऋग्वेद में
    (c) सामवेद में
    (d) यजुर्वेद में
    U.P.P.C.S (Mains) 2005
    उत्तर-(b)
    गोत्र शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग ऋग्वेद में हुआ था। इस काल में इसका अर्थ था — गोष्ठ अर्थात वह स्थान जहाँ किसी कुल का पशुधन (गाय आदि) एक साथ पाला जाता था। कालांतर में उत्तर वैदिक काल तक आते-आते ‘गोत्र’ का अर्थ एक ऋषि से उत्पन्न वंश-परंपरा में बदल गया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: • ‘गोत्र’ व्यवस्था एक्सोगैमी (बहिर्विवाह) के नियमों पर आधारित थी — एक ही गोत्र में विवाह वर्जित माना जाता था।
    • प्राचीन भारत में आठ मूल गोत्र माने जाते थे, जो अष्टर्षि से संबंधित हैं — विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप और अगस्त्य।
    50. जिस ग्रंथ में ‘पुरुषमेध’ का उल्लेख हुआ है, वह है-
    (a) कृष्ण यजुर्वेद
    (b) शुक्ल यजुर्वेद
    (c) शतपथ ब्राह्मण
    (d) पंचविश ब्राह्मण
    P.C.S. (SpL) (Pre) 2008
    उत्तर-(*)
    पुरुषमेध एक प्रतीकात्मक यज्ञ है जिसका उल्लेख एक से अधिक ग्रंथों में मिलता है — शुक्ल यजुर्वेद के तीसवें अध्याय, कृष्ण यजुर्वेद (तैत्तिरीय संहिता), तथा शुक्ल यजुर्वेद के शतपथ ब्राह्मण में। चूँकि प्रश्न के विकल्पों में तीनों ग्रंथ उपस्थित हैं, इसलिए कोई एकल उत्तर सही नहीं है। अधिकांश इतिहासकार शतपथ ब्राह्मण का विशेष उल्लेख करते हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: • अधिकांश इतिहासकार मानते हैं कि पुरुषमेध कभी वास्तविक रूप से नहीं किया गया — यह एक प्रतीकात्मक (symbolic) यज्ञ था जिसमें मनुष्य को यज्ञवेदी पर बाँधकर बाद में मुक्त कर दिया जाता था।
    • शुक्ल यजुर्वेद के 30वें अध्याय में पुरुषमेध के अंतर्गत विभिन्न व्यवसायों और वर्गों के 184 व्यक्तियों की सूची दी गई है, जो उस काल के सामाजिक वर्गीकरण को समझने की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
    51. किस वेद में सभा और समिति को प्रजापति की दो पुत्रियां कहा गया है ?
    (a) ऋग्वेद
    (b) सामवेद
    (c) यजुर्वेद
    (d) अथर्ववेद
    U.P.P.C.S. (Mains) 2009
    उत्तर-(d)
    अथर्ववेद में सभा और समिति को प्रजापति की दो पुत्रियाँ बताया गया है, जो वैदिक काल की दो प्रमुख शासन-संस्थाएँ थीं। सभा मुख्यतः कुलीन और वृद्ध जनों की परिषद थी, जबकि समिति एक व्यापक जन-सभा थी जिसमें सामान्य नागरिक भी भाग लेते थे।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद में ‘सभा’ का उल्लेख 8 बार तथा ‘समिति’ का 9 बार मिलता है। विद्वान पी.वी. काणे के अनुसार सभा न्यायिक कार्यों से भी जुड़ी थी और उसमें द्यूतक्रीड़ा (जुआ) भी खेला जाता था।
    52. ऋग्वैदिक ‘पणि’ किस वर्ग के नागरिक थे?
    (a) पुरोहित
    (b) लोहार
    (c) स्वर्णकार
    (d) व्यापारी
    M.P.P.C.S. (Pre) 2019
    उत्तर-(d)
    ऋग्वेद में ‘पणि’ शब्द उन धनी व्यापारियों के लिए प्रयुक्त हुआ है जो वाणिज्य और साहूकारी करते थे। ये लोग ऊँची ब्याज दर पर ऋण देते थे, इसीलिए इन्हें ‘सूदखोर’ की संज्ञा दी गई। आर्य इनसे प्रायः शत्रुभाव रखते थे क्योंकि ये देवताओं की पूजा नहीं करते थे।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: पणि शब्द से ही संस्कृत का ‘वणिज्’ और आधुनिक ‘बनिया’ शब्द व्युत्पन्न माने जाते हैं। ऋग्वेद में ‘निष्क’ नामक स्वर्ण मुद्रा का उल्लेख है, जिसे व्यापार में मुद्रा के रूप में प्रयोग किया जाता था।
    53. ऋग्वेद में उल्लिखित प्रसिद्ध ‘दस-राजाओं’ का युद्ध किस नदी के किनारे लड़ा गया था?
    (a) परुष्णी
    (b) सरस्वती
    (c) विपाशा
    (d) अस्किनी
    U.P.P.C.S.. (Spl.) (Mains) 2008
    उत्तर-(a)
    ऋग्वेद के सातवें मंडल में वर्णित ‘दाशराज्ञ युद्ध’ (दस राजाओं का युद्ध) परुष्णी नदी (आधुनिक रावी नदी) के तट पर लड़ा गया था। इस युद्ध में भरत जनजाति के राजा सुदास ने दस शत्रु राजाओं के संघ को पराजित किया था। यह युद्ध ऋग्वैदिक काल की सबसे महत्त्वपूर्ण सैन्य घटना मानी जाती है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: दस राजाओं के संघ में पाँच आर्य जनजातियाँ (पुरु, यदु, तुर्वश, अनु, द्रुह्यु) और पाँच अनार्य जनजातियाँ शामिल थीं। इस विजय के बाद भरत जन सर्वोच्च आर्य जनजाति बन गई और भारतवर्ष का नाम इन्हीं के नाम पर पड़ा।
    54. वैदिकयुगीन सभा-
    (a) गांवों के व्यावसायिक लोगों की संस्था थी
    (b) राज-दरवार होता था
    (c) मंत्रिपरिषद थी
    (d) राज्य के समस्त लोगों की एक राष्ट्रीय सभा थी
    R.A.S. / R.T.S. (Pre) 1994
    उत्तर-(c)
    वैदिक युग में ‘सभा’ मुख्यतः कुलीन, वृद्ध और प्रभावशाली व्यक्तियों की एक चुनिंदा परिषद थी जो राजा को परामर्श देती थी और उसकी निरंकुशता पर अंकुश रखती थी। यह मंत्रिपरिषद के समान कार्य करती थी। इसके विपरीत ‘समिति’ एक व्यापक जन-सभा थी।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वैदिक काल में ‘विदथ’ नामक एक तीसरी संस्था भी थी जो आर्थिक एवं धार्मिक कार्यों से जुड़ी थी। ऋग्वेद में ‘विदथ’ का उल्लेख सबसे अधिक बार (लगभग 122 बार) हुआ है, जो उसके महत्त्व को दर्शाता है।
    55. सूची-1 एवं सूची-1 को सुमेलित कीजिए तथा नीचे दिए गए कूट सही उत्तर चुनिए-
    सूची – I सूची – II
    (a) ब्रीही (i) गन्ना
    (b) मुद्ग (ii) चावल
    (c) यव (iii) चावल
    (d) इक्षु (iv) चावल
    कूट :
    (a) A- (i), B- (ii), C-(iii), D-(iv)
    (b) A – (iv), B-(iii), C-(ii), D- (i)
    (c) A – (iii), B-(iv), C-(i), D-(ii)
    (d) A- (ii), B- (iii), C-(iv), D- (i)
    R.A.S. / R.T.S (Pre) 2021
    उत्तर-(d)
    वैदिक साहित्य में कृषि उत्पादों के लिए विशिष्ट संस्कृत शब्दों का प्रयोग हुआ है — व्रीही (चावल), मुद्ग (मूँग), यव (जौ) और इक्षु (गन्ना)। इनमें से जौ (यव) ऋग्वैदिक काल की सर्वप्रमुख फसल थी जबकि चावल (व्रीही) का उत्तर वैदिक काल में अधिक महत्त्व बढ़ा।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अथर्ववेद में ‘तिल’ और ‘उमा’ (अलसी) जैसी फसलों का भी उल्लेख मिलता है। उत्तर वैदिक ग्रंथ शतपथ ब्राह्मण में व्रीही (चावल) और यव (जौ) को ‘अन्नों का राजा’ कहा गया है।
    56. उस जनजाति का नाम बतलाइए, जो ऋग्वैदिक आर्यों के पंचजन से संबंधित नहीं है-
    (a) यदु
    (b) पुरु
    (c) तुर्वसु
    (d) किकट
    U.P.P.C.S. (Mains) 2009
    उत्तर-(d)
    ऋग्वैदिक ‘पंचजन’ में पाँच प्रमुख आर्य जनजातियाँ — यदु, द्रुह्यु, पुरु, अनु और तुर्वसु — सम्मिलित थीं। ‘किकट’ इनमें से कोई नहीं है; यह एक अनार्य जाति थी जो मगध क्षेत्र में निवास करती थी और वैदिक धर्म से अपरिचित थी।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद के तृतीय मंडल में किकटों को ‘अव्रत’ (यज्ञ न करने वाले) कहा गया है। बाद के काल में ‘पुरु’ जनजाति सर्वाधिक प्रभावशाली बनी और ‘भरत’ जन उसी की शाखा थी जिसके नाम पर ‘भारत’ नाम पड़ा।
    57. प्राचीन काल में आर्यों के जीविकोपार्जन का मुख्य साधन था –
    (a) कृषि
    (b) शिकार
    (c) शिल्पकर्म
    (d) व्यापार
    U.P.P.C.S. (Pre) 1993
    उत्तर-(a)
    आर्यों की अर्थव्यवस्था मूलतः कृषि और पशुपालन पर आधारित थी। ऋग्वेद में वर्षा की कामना, हल चलाने, और फसल काटने के अनेक संदर्भ मिलते हैं। ‘गो’ (गाय) सबसे महत्त्वपूर्ण सम्पत्ति थी और युद्ध प्रायः गायों के लिए लड़े जाते थे। उत्तर वैदिक काल में कृषि और अधिक विकसित हुई।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद में ‘गव्य’ (गायों का समूह) और ‘गोत्र’ (गायों का बाड़ा) जैसे शब्द आर्थिक जीवन में पशुओं के केंद्रीय महत्त्व को दर्शाते हैं। ऋग्वेद में ‘युद्ध’ के लिए ‘गविष्टि’ शब्द भी प्रयुक्त है जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘गायों की खोज।’
    58. निम्न में से किस नदी को ऋग्वेद में “मातेतमा’ ‘देवीतमा’ एवं ‘नदीतमा’ संबोधित किया है ?
    (a) सिंधु
    (b) सरस्वती
    (c) वितरता
    (d) यमुना
    U.P.P.C.S. (Spl.) (Mains) 2008
    उत्तर-(b)
    ऋग्वेद में सरस्वती नदी को सर्वोच्च सम्मान दिया गया है — उसे ‘मातेतमा’ (सर्वश्रेष्ठ माँ), ‘देवीतमा’ (सर्वश्रेष्ठ देवी) और ‘नदीतमा’ (सर्वश्रेष्ठ नदी) कहा गया है। यह नदी वैदिक सभ्यता के केंद्र में थी और इसी के तट पर अनेक यज्ञ और सांस्कृतिक क्रियाकलाप होते थे।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: आधुनिक भूविज्ञान और उपग्रह चित्रों के आधार पर माना जाता है कि सरस्वती नदी लगभग 4000 वर्ष पूर्व जलवायु परिवर्तन और भूगर्भीय हलचलों के कारण विलुप्त हो गई। ऋग्वेद में सरस्वती को ‘सिन्धु माता’ भी कहा गया है, जो उसके विशाल आकार का संकेत देता है।
    59. ऋग्वेद में उल्लिखित ‘यव’ शब्द किस कृषि उत्पाद हेतु प्रयुक्त किया गया है ?
    (a) जौ
    (b) चना
    (c) चावल
    (d) गेहूं
    U.P.P.C.S. (Spl.) (Mains) 2008
    उत्तर-(a)
    ऋग्वेद में ‘यव’ शब्द जौ (Barley) के लिए प्रयुक्त हुआ है। जौ ऋग्वैदिक काल की सबसे प्रमुख और व्यापक रूप से उगाई जाने वाली फसल थी। इसका उपयोग भोजन, यज्ञ में आहुति और ‘सुरा’ (मदिरा) बनाने में होता था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद में ‘धान्य’ शब्द का सामान्य अर्थ अनाज है और जौ उस काल का ‘प्रमुख धान्य’ था। बाद के उत्तर वैदिक काल में ‘व्रीहि’ (चावल) का महत्त्व बढ़ा और शतपथ ब्राह्मण में चावल की खेती का विस्तृत विवरण मिलता है।
    60. वैदिक युग में प्रचलित लोकप्रिय शासन प्रणाली थी-
    (a) निरंकुश
    (b) प्रजातंत्र
    (c) गणतंत्र
    (d) वंश परंपरागत राजतंत्र
    R.A.S. / R.T.S. (Pre) 1993
    उत्तर-(d)
    वैदिक काल में वंश-परंपरागत राजतंत्र सबसे प्रचलित शासन प्रणाली थी, जिसमें राजपद पिता से पुत्र को हस्तांतरित होता था। हालाँकि राजा की शक्ति पर ‘सभा’ और ‘समिति’ जैसी संस्थाओं का नियंत्रण रहता था, जिससे शासन पूर्णतः निरंकुश नहीं था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वैदिक काल में ‘राजसूय यज्ञ’ राजा के राज्यभिषेक का प्रमुख अनुष्ठान था जो उसकी वैधता को धार्मिक स्वीकृति देता था। ‘अश्वमेध यज्ञ’ सार्वभौम सत्ता के दावे का प्रतीक था — राजा का घोड़ा जितने क्षेत्र में विचरण करता था, वह सब उसका राज्य माना जाता था।
    61. सर्वाधिक ऋग्वैदिक सूक्त समर्पित हैं-
    (a) अग्नि को
    (b) इंद्र को
    (c) रुद्र को
    (d) विष्णु को
    U.P.P.C.S. (Mains ) 2002
    उत्तर-(b)
    ऋग्वेद में इंद्र को सर्वाधिक 250 सूक्त समर्पित हैं, जो उन्हें ऋग्वैदिक काल के सबसे प्रमुख और शक्तिशाली देवता के रूप में स्थापित करता है। अग्नि को लगभग 200 सूक्त समर्पित हैं, जिससे वे दूसरे सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण देवता माने जाते हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इंद्र को ‘पुरंदर’ (किलों को नष्ट करने वाला) कहा गया है, जो दास एवं दस्युओं के किलों को तोड़ने का प्रतीक है। वरुण को नैतिक व्यवस्था के रक्षक (ऋत के पालनकर्ता) के रूप में जाना जाता था, जो पापियों को दंड देते थे।
    62. ऋग्वैदिक धर्म था-
    (a) बहुदेववादी
    (b) एकेश्वरवादी
    (c) अद्वैतवादी
    (d) निवृत्तमार्गी
    U.P.P.C.S. (Mains) 2014
    उत्तर-(a)
    ऋग्वैदिक धर्म मूलतः बहुदेववादी (Polytheistic) था, जिसमें आर्य अनेक देवताओं में आस्था रखते थे। इन देवताओं को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया था — द्युस्थान (आकाश) के देवता, अंतरिक्ष के देवता और पृथ्वी के देवता। जिस देवता की स्तुति होती थी, उसे उस समय सर्वश्रेष्ठ माना जाता था — इसे एकैकदेवतावाद या हेनोथेइज्म (Henotheism) कहते हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद का प्रसिद्ध वाक्य “एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति” एकेश्वरवाद की ओर संकेत करता है, जिसका अर्थ है — सत्य एक है, विद्वान उसे अनेक नामों से पुकारते हैं। मैक्स मूलर ने ऋग्वैदिक धर्म को ‘हेनोथेइज्म’ कहा था।
    63. गायत्री मंत्र किस पुस्तक में मिलता है ?
    (a) उपनिषद
    (b) भगवद्गीता
    (c) ऋग्वेद
    (d) यजुर्वेद
    39th B.P.S.C. (Pre) 1994
    उत्तर-(c)
    गायत्री मंत्र ऋग्वेद के तृतीय मंडल में संकलित है। इसके रचयिता विश्वामित्र हैं और यह मंत्र सूर्य देवता ‘सविता’ को समर्पित है। यह मंत्र हिंदू धर्म का सर्वाधिक पवित्र और प्रचलित मंत्र माना जाता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गायत्री मंत्र को ‘वेदमाता’ भी कहा जाता है। यह अनुष्टुप छंद में न होकर गायत्री छंद में रचित है, जिसमें 24 अक्षर होते हैं।
    64. किस वेद में सभा और समिति को प्रजापति की दो पुत्रियां कहा गया है ?
    (a) ऋग्वेद
    (b) सामवेद
    (c) यजुर्वेद
    (d) अथर्ववेद
    U.P.P.C.S. (Mains) 2009
    उत्तर-(d)
    अथर्ववेद में सभा और समिति को प्रजापति की दो पुत्रियाँ बताया गया है। सभा एक छोटी, कुलीन एवं न्यायिक संस्था थी, जबकि समिति एक व्यापक जनसभा थी जो राजनीतिक निर्णयों में भाग लेती थी।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अमेरिकी विद्वान ए.ए. मैकडोनेल और कीथ के अनुसार, सभा और समिति वैदिककालीन लोकतांत्रिक संस्थाओं के जीवंत प्रमाण हैं। समिति में राजा का निर्वाचन भी होता था, जो उस काल की लोकतांत्रिक व्यवस्था को दर्शाता है।
    65. 800 से 600 ईसा पूर्व का काल किस युग से जुड़ा है ?
    (a) ब्राह्मण युग
    (b) सूत्र युग
    (c) रामायण युग
    (d) महाभारत युग
    U.P.P.C.S. (Pre) 2002
    उत्तर-(a)
    800 से 600 ईसा पूर्व का समय ब्राह्मण ग्रंथों की रचना का युग माना जाता है। ब्राह्मण ग्रंथ वेदों की गद्यात्मक व्याख्याएँ हैं जो यज्ञ-कर्मकांड को विस्तार से समझाते हैं। इसके पश्चात लगभग सातवीं-छठी शताब्दी ई.पू. से तीसरी शताब्दी ई.पू. तक का काल सूत्रकाल कहलाता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: प्रमुख ब्राह्मण ग्रंथों में ऋग्वेद का ‘ऐतरेय ब्राह्मण’ और ‘कौषीतकि ब्राह्मण’, तथा सामवेद का ‘पंचविंश ब्राह्मण’ विशेष उल्लेखनीय हैं। ये ग्रंथ उत्तर वैदिक काल में धार्मिक कर्मकांड की जटिलता के साक्षी हैं।
    66. वैदिक देवमंडल में निम्न में से कौन देवता युद्ध का देवता माना जाता है ?
    (a) वरुण
    (b) इंद्र
    (c) मित्र
    (d) अग्नि
    Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2016
    उत्तर-(b)
    इंद्र ऋग्वैदिक देवमंडल में सबसे शक्तिशाली देवता थे और उन्हें आर्यों का युद्ध नेता माना जाता था। उन्हें ‘पुरंदर’ (दुर्गभेदी), ‘वृत्रहंता’ (वृत्रासुर का नाश करने वाला) तथा ‘शतक्रतु’ (सौ शक्तियों के स्वामी) जैसे उपनामों से पुकारा जाता था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इंद्र ने वृत्रासुर नामक राक्षस का वध कर नदियों को मुक्त किया था — यह घटना वर्षा और कृषि के संदर्भ में प्रतीकात्मक रूप से महत्त्वपूर्ण मानी जाती है। इंद्र को ‘सोमपा’ भी कहा जाता था क्योंकि वे सोमरस के प्रिय पीने वाले थे।
    67. ‘आयुर्वेद’ अर्थात ‘जीवन का विज्ञान’ का उल्लेख सर्वप्रथम मिलता है-
    (a) आरण्यक में
    (b) सामवेद में
    (c) यजुर्वेद में
    (d) अथर्ववेद में
    U.P.P.C.S. (Pre) 1994
    उत्तर-(d)
    अथर्ववेद में आयुर्वेद का प्रारंभिक उल्लेख मिलता है। इस वेद में रोग निवारण, औषधि, मंत्र-तंत्र, विवाह, प्रणय-गीत, राजभक्ति और सामान्य जन-जीवन के विचारों का विस्तृत विवरण है। अथर्ववेद की भाषा और विषय-वस्तु अन्य तीनों वेदों से भिन्न एवं लौकिक जीवन के अधिक करीब है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अथर्ववेद को ‘ब्रह्मवेद’ भी कहा जाता है। इसमें 20 काण्ड, 731 सूक्त और लगभग 5987 मंत्र हैं। आयुर्वेद की परंपरा को आगे चरक संहिता और सुश्रुत संहिता ने विकसित किया।
    68. ऋग्वैदिक जन सभा जो न्यायिक कार्यों से संबंधित थी-
    (a) सभा
    (b) समिति
    (c) विधाता
    (d) उपर्युक्त में से सभी
    Jharkhand P.C.S. (Pre) 2016
    उत्तर-(a)
    ऋग्वैदिक काल में सभा, समिति और विदथ — तीन प्रमुख जनतांत्रिक संस्थाएँ थीं। इनमें ‘सभा’ न्यायिक कार्यों से जुड़ी थी और यह कुलीन एवं वृद्ध जनों की परिषद थी। ऋग्वेद में सभा का आठ बार उल्लेख हुआ है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘विदथ’ ऋग्वैदिक काल की सबसे प्राचीन संस्था मानी जाती है, जिसमें स्त्रियाँ भी भाग लेती थीं। ‘समिति’ में राजनीतिक और प्रशासनिक निर्णय लिए जाते थे तथा इसमें सामान्य जन की भी भागीदारी होती थी।
    69. ऋग्वेद में सर्वाधिक संख्या में मंत्र संबंधित हैं-
    (a) अग्नि से
    (b) वरुण से
    (c) विष्णु से
    (d) यम से
    U.P.P.C.S. (Mains) 2010
    उत्तर-(a)
    ऋग्वेद में सर्वाधिक मंत्र इंद्र को समर्पित हैं, परंतु दिए गए विकल्पों में इंद्र का नाम न होने के कारण अग्नि सही उत्तर है, जिन्हें लगभग 200 मंत्र समर्पित हैं। अग्नि को देवताओं और मनुष्यों के बीच दूत (संदेशवाहक) माना जाता था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अग्नि को ‘गृहपति’ अर्थात गृह का स्वामी कहा जाता था। यज्ञ में अग्नि की केंद्रीय भूमिका होती थी क्योंकि वे आहुति को देवताओं तक पहुँचाने वाले माने जाते थे।
    70. वैदिक देवता इंद्र के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए तथा नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए-
    1. झंझावत के देवता थे।
    2. पापियों को दंड देते थे।
    3. नैतिक व्यवस्था के संरक्षक थे। 4. वर्षा के देवता थे।
    कूट : उत्तर चुनिए-
    (a) 1 एवं 2 सही हैं।
    (b) 1 एवं 3 सही हैं।
    (c) 2 एवं 4 सही हैं।
    (d) 1 एवं 4 सही हैं।
    U.P.P.C.S. (Mains ) 2017
    उत्तर-(d)
    इंद्र को वर्षा, आँधी और तूफान का देवता माना जाता था, इसलिए कथन 1 और 4 सही हैं। नैतिक व्यवस्था के संरक्षक वरुण को माना जाता था, इसलिए कथन 3 गलत है। कुछ मंत्रों में पापियों को दंड देने के लिए इंद्र और सोम दोनों से प्रार्थना की गई है, लेकिन यह इंद्र का प्रमुख गुण नहीं था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वरुण को ‘ऋत’ (सत्य और नैतिक व्यवस्था) का रक्षक माना जाता था। वे समुद्र के देवता भी थे और उन्हें ‘सर्वज्ञ’ (सब कुछ जानने वाला) कहा गया है।
    71. निम्नलिखित में से किसे ऋग्वेद में युद्ध-देवता समझा जाता है ?
    (a) अग्नि
    (b) इंद्र
    (c) सूर्य
    (d) वरुण
    U.P.P.C.S. (Mains) 2011
    उत्तर-(b)
    ऋग्वेद में इंद्र को आर्यों का सर्वप्रमुख युद्ध-नेता और देवता माना गया है। वे दुर्गों और शत्रुओं को नष्ट करने के लिए जाने जाते थे। उन्हें ‘पुरभिद्’ (किला भेदने वाला) और ‘दस्युहंता’ (दस्युओं का नाश करने वाला) कहा गया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इंद्र के अस्त्र ‘वज्र’ का निर्माण ऋषि दधीचि की हड्डियों से हुआ था — यह पौराणिक मान्यता आर्यों के दशराज्ञ युद्ध (दस राजाओं के युद्ध) से जुड़ी है जिसका उल्लेख ऋग्वेद के सप्तम मंडल में मिलता है।
    72. निम्नलिखित में से पूर्व वैदिक आर्यों का सर्वाधिक लोकप्रिय देवता कौन था ?
    (a) वरुण
    (b) विष्णु
    (c) रुद्र
    (d) इंद्र
    U.P.P.C.S. (Mains ) 2008
    उत्तर-(d)
    पूर्व वैदिक (ऋग्वैदिक) आर्यों में इंद्र सबसे लोकप्रिय देवता थे। उन्हें 250 से अधिक सूक्त समर्पित हैं, जो किसी भी अन्य देवता से अधिक है। इंद्र की लोकप्रियता का मुख्य कारण वर्षा, युद्ध और शत्रु-विनाश में उनकी भूमिका थी।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वैदिक काल में विष्णु और रुद्र अपेक्षाकृत कम महत्त्वपूर्ण थे। परवर्ती वैदिक और पौराणिक काल में इनका महत्त्व बढ़ा और विष्णु तथा शिव (रुद्र का विकसित रूप) हिंदू धर्म के प्रमुख देवता बन गए।
    73. जीविकोपार्जन हेतु ‘वेद-वेदांग’ पढ़ाने वाला अध्यापक कहलाता था-
    (a) आचार्य
    (b) अध्वर्यु
    (c) उपाध्याय
    (d) पुरोहित
    Uttarakhand U.D.A./L.D.A. (Mains) 2007
    उत्तर-(c)
    वैदिक शिक्षा व्यवस्था में शिक्षकों को उनके कार्य और पारिश्रमिक के आधार पर अलग-अलग नामों से जाना जाता था। जो शिक्षक जीविकोपार्जन के लिए शुल्क लेकर वेद और वेदांग पढ़ाता था, उसे उपाध्याय कहा जाता था। इसके विपरीत, आचार्य वह गुरु होता था जो गुरुकुल स्थापित करके शिष्यों को निःशुल्क शिक्षा देता था और केवल दक्षिणा स्वीकार करता था। अध्वर्यु यजुर्वेद का पाठ करने वाला पुरोहित होता था, जबकि पुरोहित राजा का प्रमुख धार्मिक सलाहकार होता था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वैदिक काल में गुरुकुल शिक्षा प्रणाली में शिष्य ‘ब्रह्मचारी’ कहलाता था और उसे गुरु के घर रहकर शिक्षा ग्रहण करनी होती थी। शिक्षा समाप्त होने पर ‘समावर्तन संस्कार’ किया जाता था, जो वर्तमान के दीक्षांत समारोह के समान था।
    74. प्राचीन भारतीय समाज के प्रसंग में निम्नलिखित शब्दों में से कौन-सा शब्द शेष तीन के वर्ग का नहीं है?
    (a) कुल
    (b) वंश
    (c) कोश
    (d) गोत्र
    I.A.S. (Pre) 1996
    उत्तर-(c)
    प्राचीन भारतीय समाज में कुल (परिवार की इकाई), वंश (पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आ रहा परिवार-समूह) और गोत्र (एक सामान्य पूर्वज से उत्पन्न वंश-परंपरा) — ये तीनों पारिवारिक और सामाजिक संरचना से संबंधित हैं। इनके विपरीत कोश का अर्थ है खजाना या भंडार, जो राज्य की आर्थिक शक्ति का प्रतीक था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में राज्य के सात अंगों (सप्तांग सिद्धांत) में कोश को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। इसलिए ‘कोश’ शेष तीन के वर्ग का नहीं है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वैदिक समाज में सामाजिक संगठन की सबसे छोटी इकाई कुल थी, इसके ऊपर ग्राम, फिर विश, फिर जन और सबसे बड़ी इकाई राष्ट्र थी। गोत्र विवाह वर्जित था क्योंकि एक ही गोत्र के लोग एक पूर्वज की संतान माने जाते थे।
    75. संस्कारों की कुल संख्या कितनी है ?
    (a) 10
    (b) 10
    (c) 15
    (d) 16
    M.P.P.C.S. (Pre) 2015
    उत्तर-(d)
    हिंदू धर्म में ‘संस्कार’ शब्द का अर्थ है — परिष्कार, शुद्धता अथवा पवित्रता। विभिन्न धर्मग्रंथों में संस्कारों की संख्या अलग-अलग बताई गई है। गौतम धर्मसूत्र में 40 संस्कारों का उल्लेख है, जबकि मनुस्मृति में गर्भाधान से प्रारंभ होने वाले 13 संस्कारों का वर्णन है। बाद की स्मृतियों में यह संख्या 16 (षोडश संस्कार) पर स्थिर हो गई, जो आज सर्वाधिक प्रचलित और मान्य है। इन 16 संस्कारों में गर्भाधान से लेकर अंत्येष्टि तक के सभी महत्वपूर्ण जीवन-संस्कार शामिल हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: 16 संस्कारों में प्रमुख हैं — गर्भाधान, पुंसवन, सीमंतोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, विद्यारंभ, उपनयन, वेदारंभ, केशांत, समावर्तन, विवाह और अंत्येष्टि। उपनयन संस्कार (यज्ञोपवीत) को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता था, जिसके बाद बालक ‘द्विज’ कहलाता था।
    76. ऋग्वैदिक काल के प्रारंभ में निम्न में से किसे महत्वपूर्ण मूल्यवान संपत्ति समझा जाता था?
    (a) भूमि को
    (b) गाय को
    (c) स्त्रियों को
    (d) जल को
    U.P.P.C.S. (Pre) (Re-Exam) 2015
    उत्तर-(b)
    ऋग्वैदिक काल के प्रारंभ में गाय को सबसे महत्वपूर्ण और मूल्यवान संपत्ति माना जाता था। यह काल मुख्यतः पशुपालन-प्रधान था, इसलिए गाय विनिमय (वस्तु-विनिमय) का प्रमुख माध्यम भी थी। ऋग्वेद के कुछ सूक्तों में गाय को देवता के रूप में चित्रित किया गया है और उसे ‘अघन्या’ (न मारी जाने योग्य) कहा गया है। युद्ध का एक प्रमुख कारण गायों को हथियाना भी था, जिन्हें ‘गव्य’ या ‘गोग्रह’ के संघर्ष कहा जाता था। भूमि उस काल में उतनी महत्वपूर्ण नहीं थी जितनी उत्तर वैदिक काल में हो गई।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद में ‘गोमत्’ शब्द का अर्थ ‘धनी व्यक्ति’ है और ‘गविष्टि’ का अर्थ ‘गायों की खोज में युद्ध’ है। इससे स्पष्ट है कि गाय ही उस युग की वास्तविक मुद्रा और संपदा थी। ऋग्वेद में दूरी नापने की एक इकाई ‘गव्यूति’ भी थी जो गाय से संबंधित थी।
    77. ऋग्वेद-कालीन आर्यों और सिंधु घाटी के लोगों की संस्कृति के बीच अंतर के संबंध में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
    1. ऋग्वेद-कालीन आर्य कवच और शिरस्त्राण (हेलमेट) का उपयोग करते थे, जबकि सिंधु घाटी सभ्यता के इनके उपयोग का कोई साक्ष्य नहीं मिलता।
    2. ऋग्वेद-कालीन आर्यों को स्वर्ण, चांदी और जबकि सिंधु घाटी के लोगों को केवल ताम्र और लौह का ज्ञान था।
    3. ऋग्वेद-कालीन आर्यों ने घोड़े को पालतू बना लिया था, जबकि इस बात का कोई साक्ष्य नहीं है कि सिंधु घाटी के लोग इस पशु को जानते थे।
    नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए-
    (a) केवल 1
    (b) केवल 2 और 3
    (c) केवल 1 और 3
    (d) 1, 2 और 3
    I.A.S. (Pre) 2017
    उत्तर-(a)
    तीनों कथनों का विश्लेषण इस प्रकार है —
    कथन 1 (सही): ऋग्वेद में ‘वर्म’ (कवच) का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। सैंधव सभ्यता के उत्खनन में कवच या शिरस्त्राण का कोई साक्ष्य नहीं मिला, जो दर्शाता है कि वे शांतिप्रिय थे।
    कथन 2 (गलत): ऋग्वैदिक आर्यों को स्वर्ण, चांदी और ताम्र का ज्ञान था, किंतु लोहे का नहीं। सिंधु घाटी के लोगों को ताम्र और कांसे का ज्ञान था। लोहे का प्रयोग भारत में लगभग 1000–600 ई.पू. के मध्य प्रारंभ हुआ।
    कथन 3 (गलत): सिंधु सभ्यता के कई स्थलों — मोहनजोदड़ो (मिट्टी की घोड़े की आकृति), लोथल (तीन मृणमूर्तियाँ) और सुरकोटडा (घोड़े की हड्डियाँ) — से घोड़े के प्रमाण मिलते हैं।
    अतः केवल कथन 1 सही है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सिंधु सभ्यता के लोगों को लोहे का ज्ञान नहीं था — यह एक महत्वपूर्ण विशेषता है। इसी कारण सिंधु सभ्यता को ‘कांस्य युगीन सभ्यता’ (Bronze Age Civilization) कहा जाता है। साथ ही, ऋग्वेद में लोहे का कोई उल्लेख नहीं है; ‘अयस्’ शब्द का प्रयोग संभवतः ताँबे या कांसे के लिए था।
    78. सूची 1 को सूची II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए :
    सूची-1 सूची – II
    A. सिंधु घाटी सभ्यता 1. चारागाह
    B. उत्तर वैदिक समाज 2. जमींदारी
    C. ऋग्वैदिक समाज 3. कृषक
    D. मध्य काल 4.नगरीय
    कूट :
    A B C D
    (a) 4 2 3 1
    (b) 2 1 4 3
    (c) 3 4 1 2
    (d) 4 3 1 2
    U.P.P.C.S. (Pre) 2020
    उत्तर-(d)
    विभिन्न ऐतिहासिक कालों की आर्थिक प्रकृति के आधार पर सही सुमेलन इस प्रकार है —
    सिंधु घाटी सभ्यता → नगरीय: यह भारत की प्रथम नगरीय सभ्यता थी जिसमें सुनियोजित नगर, पक्की सड़कें और जल-निकासी व्यवस्था थी।
    उत्तर वैदिक समाज → कृषक: उत्तर वैदिक काल में कृषि का विस्तार हुआ और भूमि का महत्व बढ़ा।
    ऋग्वैदिक समाज → चारागाह: ऋग्वैदिक काल में पशुपालन प्रधान था और गाय चारागाह (pasture) अर्थव्यवस्था का आधार थी।
    मध्य काल → जमींदारी: मध्यकालीन भारत में भूमि पर जमींदारों का वर्चस्व था।
    अतः सही उत्तर विकल्प (d) है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: उत्तर वैदिक काल में हल को ‘लांगल’ या ‘सीर’ कहा जाता था और लोहे के फाल वाले हल का प्रयोग प्रारंभ हो गया था। इस काल में ‘बलि’ (कर) नामक एक स्वैच्छिक कर का भी उल्लेख मिलता है जो बाद में अनिवार्य हो गया।
    79. ऋग्वेद में अघन्या का प्रयोग हुआ है-
    (a) बकरी के लिए
    (b) गाय के लिए
    (c) हाथी के लिए
    (d) घोड़े के लिए
    U.P. U.D.A./L.D.A. (Spl.) (Pre) 2010
    उत्तर-(b)
    ऋग्वेद में ‘अघन्या’ शब्द का प्रयोग गाय के लिए किया गया है। इस शब्द का शाब्दिक अर्थ है — ‘जो मारी न जाए’ या ‘जिसे वध नहीं करना चाहिए।’ यह शब्द गाय की पवित्रता और उसके वध पर निषेध को दर्शाता है। ऋग्वैदिक काल में गाय आर्थिक समृद्धि का प्रतीक थी और उसकी रक्षा करना धार्मिक कर्तव्य समझा जाता था। इसी से ‘अघन्या’ शब्द गाय की सामाजिक-धार्मिक महत्ता का सूचक बना।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद में गाय के लिए अनेक नामों का प्रयोग हुआ है जैसे — ‘अघन्या’, ‘गो’, ‘धेनु’ आदि। इसी प्रकार ऋग्वेद में ‘गोघ्न’ शब्द का प्रयोग उस अतिथि के लिए किया गया है जिसके सम्मान में गाय का वध किया जाता था, जो यह दर्शाता है कि वैदिक काल में गाय का वध पूर्णतः वर्जित नहीं था, बल्कि धार्मिक अवसरों पर किया जाता था।
    80. ऋग्वेद में कई परिच्छेदों में प्रयुक्त ‘अघन्य शब्द संदर्भित है-
    (a) पुजारी के लिए
    (b) स्त्री के लिए
    (c) गाय के लिए
    (d) ब्राहम्ण के लिए
    U.P.P.C.S. (Pre) 2017
    उत्तर-(c)
    ऋग्वेद में अनेक परिच्छेदों (passages) में ‘अघन्य’ (स्त्रीलिंग में ‘अघन्या’) शब्द का प्रयोग गाय के संदर्भ में हुआ है। इस शब्द का अर्थ है ‘जिसे नहीं मारना चाहिए।’ यह शब्द गाय के प्रति आर्यों की श्रद्धा और उसकी आर्थिक-धार्मिक महत्ता को प्रकट करता है। गाय केवल दूध देने वाला पशु ही नहीं थी, बल्कि वह वैदिक समाज में धन, यज्ञ और जीवन-यापन का आधार थी। इसीलिए ऋग्वेद में गाय को ‘देवी’ तुल्य माना गया है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद में ‘उषा’ देवी की तुलना गाय से की गई है, जो गाय की दिव्यता को उजागर करती है। इसके अलावा ऋग्वेद में पृथ्वी को भी ‘गौ’ (गाय) के रूप में रूपकात्मक ढंग से चित्रित किया गया है, जो इस पशु के प्रतीकात्मक महत्व को और बढ़ाता है।
    81. जीविकोपार्जन हेतु ‘वेद-वेदांग’ पढ़ाने वाला अध्यापक कहलाता था-
    (a) आचार्य
    (b) अध्वर्यु
    (c) उपाध्याय
    (d) पुरोहित
    Uttarakhand U.D.A./L.D.A. (Mains) 2007
    उत्तर-(c)
    वैदिक शिक्षा व्यवस्था में शिक्षकों को उनके कार्य और पारिश्रमिक के आधार पर अलग-अलग नामों से जाना जाता था। जो शिक्षक जीविकोपार्जन के लिए शुल्क लेकर वेद और वेदांग पढ़ाता था, उसे उपाध्याय कहा जाता था। इसके विपरीत, आचार्य वह गुरु होता था जो गुरुकुल स्थापित करके शिष्यों को निःशुल्क शिक्षा देता था और केवल दक्षिणा स्वीकार करता था। अध्वर्यु यजुर्वेद का पाठ करने वाला पुरोहित होता था, जबकि पुरोहित राजा का प्रमुख धार्मिक सलाहकार होता था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वैदिक काल में गुरुकुल शिक्षा प्रणाली में शिष्य ‘ब्रह्मचारी’ कहलाता था और उसे गुरु के घर रहकर शिक्षा ग्रहण करनी होती थी। शिक्षा समाप्त होने पर ‘समावर्तन संस्कार’ किया जाता था, जो वर्तमान के दीक्षांत समारोह के समान था।
    82. प्राचीन भारतीय समाज के प्रसंग में निम्नलिखित शब्दों में से कौन-सा शब्द शेष तीन के वर्ग का नहीं है?
    (a) कुल
    (b) वंश
    (c) कोश
    (d) गोत्र
    I.A.S. (Pre) 1996
    उत्तर-(c)
    प्राचीन भारतीय समाज में कुल (परिवार की इकाई), वंश (पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आ रहा परिवार-समूह) और गोत्र (एक सामान्य पूर्वज से उत्पन्न वंश-परंपरा) — ये तीनों पारिवारिक और सामाजिक संरचना से संबंधित हैं। इनके विपरीत कोश का अर्थ है खजाना या भंडार, जो राज्य की आर्थिक शक्ति का प्रतीक था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में राज्य के सात अंगों (सप्तांग सिद्धांत) में कोश को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। इसलिए ‘कोश’ शेष तीन के वर्ग का नहीं है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वैदिक समाज में सामाजिक संगठन की सबसे छोटी इकाई कुल थी, इसके ऊपर ग्राम, फिर विश, फिर जन और सबसे बड़ी इकाई राष्ट्र थी। गोत्र विवाह वर्जित था क्योंकि एक ही गोत्र के लोग एक पूर्वज की संतान माने जाते थे।
    83. संस्कारों की कुल संख्या कितनी है ?
    (a) 10
    (b) 10
    (c) 15
    (d) 16
    M.P.P.C.S. (Pre) 2015
    उत्तर-(d)
    हिंदू धर्म में ‘संस्कार’ शब्द का अर्थ है — परिष्कार, शुद्धता अथवा पवित्रता। विभिन्न धर्मग्रंथों में संस्कारों की संख्या अलग-अलग बताई गई है। गौतम धर्मसूत्र में 40 संस्कारों का उल्लेख है, जबकि मनुस्मृति में गर्भाधान से प्रारंभ होने वाले 13 संस्कारों का वर्णन है। बाद की स्मृतियों में यह संख्या 16 (षोडश संस्कार) पर स्थिर हो गई, जो आज सर्वाधिक प्रचलित और मान्य है। इन 16 संस्कारों में गर्भाधान से लेकर अंत्येष्टि तक के सभी महत्वपूर्ण जीवन-संस्कार शामिल हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: 16 संस्कारों में प्रमुख हैं — गर्भाधान, पुंसवन, सीमंतोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, विद्यारंभ, उपनयन, वेदारंभ, केशांत, समावर्तन, विवाह और अंत्येष्टि। उपनयन संस्कार (यज्ञोपवीत) को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता था, जिसके बाद बालक ‘द्विज’ कहलाता था।
    84. ऋग्वैदिक काल के प्रारंभ में निम्न में से किसे महत्वपूर्ण मूल्यवान संपत्ति समझा जाता था?
    (a) भूमि को
    (b) गाय को
    (c) स्त्रियों को
    (d) जल को
    U.P.P.C.S. (Pre) (Re-Exam) 2015
    उत्तर-(b)
    ऋग्वैदिक काल के प्रारंभ में गाय को सबसे महत्वपूर्ण और मूल्यवान संपत्ति माना जाता था। यह काल मुख्यतः पशुपालन-प्रधान था, इसलिए गाय विनिमय (वस्तु-विनिमय) का प्रमुख माध्यम भी थी। ऋग्वेद के कुछ सूक्तों में गाय को देवता के रूप में चित्रित किया गया है और उसे ‘अघन्या’ (न मारी जाने योग्य) कहा गया है। युद्ध का एक प्रमुख कारण गायों को हथियाना भी था, जिन्हें ‘गव्य’ या ‘गोग्रह’ के संघर्ष कहा जाता था। भूमि उस काल में उतनी महत्वपूर्ण नहीं थी जितनी उत्तर वैदिक काल में हो गई।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद में ‘गोमत्’ शब्द का अर्थ ‘धनी व्यक्ति’ है और ‘गविष्टि’ का अर्थ ‘गायों की खोज में युद्ध’ है। इससे स्पष्ट है कि गाय ही उस युग की वास्तविक मुद्रा और संपदा थी। ऋग्वेद में दूरी नापने की एक इकाई ‘गव्यूति’ भी थी जो गाय से संबंधित थी।
    85. ऋग्वेद-कालीन आर्यों और सिंधु घाटी के लोगों की संस्कृति के बीच अंतर के संबंध में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
    1. ऋग्वेद-कालीन आर्य कवच और शिरस्त्राण (हेलमेट) का उपयोग करते थे, जबकि सिंधु घाटी सभ्यता के इनके उपयोग का कोई साक्ष्य नहीं मिलता।
    2. ऋग्वेद-कालीन आर्यों को स्वर्ण, चांदी और जबकि सिंधु घाटी के लोगों को केवल ताम्र और लौह का ज्ञान था।
    3. ऋग्वेद-कालीन आर्यों ने घोड़े को पालतू बना लिया था, जबकि इस बात का कोई साक्ष्य नहीं है कि सिंधु घाटी के लोग इस पशु को जानते थे।
    नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए-
    (a) केवल 1
    (b) केवल 2 और 3
    (c) केवल 1 और 3
    (d) 1, 2 और 3
    I.A.S. (Pre) 2017
    उत्तर-(a)
    तीनों कथनों का विश्लेषण इस प्रकार है —
    कथन 1 (सही): ऋग्वेद में ‘वर्म’ (कवच) का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। सैंधव सभ्यता के उत्खनन में कवच या शिरस्त्राण का कोई साक्ष्य नहीं मिला, जो दर्शाता है कि वे शांतिप्रिय थे।
    कथन 2 (गलत): ऋग्वैदिक आर्यों को स्वर्ण, चांदी और ताम्र का ज्ञान था, किंतु लोहे का नहीं। सिंधु घाटी के लोगों को ताम्र और कांसे का ज्ञान था। लोहे का प्रयोग भारत में लगभग 1000–600 ई.पू. के मध्य प्रारंभ हुआ।
    कथन 3 (गलत): सिंधु सभ्यता के कई स्थलों — मोहनजोदड़ो (मिट्टी की घोड़े की आकृति), लोथल (तीन मृणमूर्तियाँ) और सुरकोटडा (घोड़े की हड्डियाँ) — से घोड़े के प्रमाण मिलते हैं।
    अतः केवल कथन 1 सही है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सिंधु सभ्यता के लोगों को लोहे का ज्ञान नहीं था — यह एक महत्वपूर्ण विशेषता है। इसी कारण सिंधु सभ्यता को ‘कांस्य युगीन सभ्यता’ (Bronze Age Civilization) कहा जाता है। साथ ही, ऋग्वेद में लोहे का कोई उल्लेख नहीं है; ‘अयस्’ शब्द का प्रयोग संभवतः ताँबे या कांसे के लिए था।
    86. सूची 1 को सूची II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए :
    सूची-1 सूची – II
    A. सिंधु घाटी सभ्यता 1. चारागाह
    B. उत्तर वैदिक समाज 2. जमींदारी
    C. ऋग्वैदिक समाज 3. कृषक
    D. मध्य काल 4.नगरीय
    कूट : A B C D
    (a) 4 2 3 1
    (b) 2 1 4 3
    (c) 3 4 1 2
    (d) 4 3 1 2
    U.P.P.C.S. (Pre) 2020
    उत्तर-(d)
    विभिन्न ऐतिहासिक कालों की आर्थिक प्रकृति के आधार पर सही सुमेलन इस प्रकार है —
    सिंधु घाटी सभ्यता → नगरीय: यह भारत की प्रथम नगरीय सभ्यता थी जिसमें सुनियोजित नगर, पक्की सड़कें और जल-निकासी व्यवस्था थी।
    उत्तर वैदिक समाज → कृषक: उत्तर वैदिक काल में कृषि का विस्तार हुआ और भूमि का महत्व बढ़ा।
    ऋग्वैदिक समाज → चारागाह: ऋग्वैदिक काल में पशुपालन प्रधान था और गाय चारागाह (pasture) अर्थव्यवस्था का आधार थी।
    मध्य काल → जमींदारी: मध्यकालीन भारत में भूमि पर जमींदारों का वर्चस्व था।
    अतः सही उत्तर विकल्प (d) है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: उत्तर वैदिक काल में हल को ‘लांगल’ या ‘सीर’ कहा जाता था और लोहे के फाल वाले हल का प्रयोग प्रारंभ हो गया था। इस काल में ‘बलि’ (कर) नामक एक स्वैच्छिक कर का भी उल्लेख मिलता है जो बाद में अनिवार्य हो गया।
    87. ऋग्वेद में अघन्या का प्रयोग हुआ है-
    (a) बकरी के लिए
    (b) गाय के लिए
    (c) हाथी के लिए
    (d) घोड़े के लिए
    U.P. U.D.A./L.D.A. (Spl.) (Pre) 2010
    उत्तर-(b)
    ऋग्वेद में ‘अघन्या’ शब्द का प्रयोग गाय के लिए किया गया है। इस शब्द का शाब्दिक अर्थ है — ‘जो मारी न जाए’ या ‘जिसे वध नहीं करना चाहिए।’ यह शब्द गाय की पवित्रता और उसके वध पर निषेध को दर्शाता है। ऋग्वैदिक काल में गाय आर्थिक समृद्धि का प्रतीक थी और उसकी रक्षा करना धार्मिक कर्तव्य समझा जाता था। इसी से ‘अघन्या’ शब्द गाय की सामाजिक-धार्मिक महत्ता का सूचक बना।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद में गाय के लिए अनेक नामों का प्रयोग हुआ है जैसे — ‘अघन्या’, ‘गो’, ‘धेनु’ आदि। इसी प्रकार ऋग्वेद में ‘गोघ्न’ शब्द का प्रयोग उस अतिथि के लिए किया गया है जिसके सम्मान में गाय का वध किया जाता था, जो यह दर्शाता है कि वैदिक काल में गाय का वध पूर्णतः वर्जित नहीं था, बल्कि धार्मिक अवसरों पर किया जाता था।
    88. ऋग्वेद में कई परिच्छेदों में प्रयुक्त ‘अघन्य शब्द संदर्भित है-
    (a) पुजारी के लिए
    (b) स्त्री के लिए
    (c) गाय के लिए
    (d) ब्राहम्ण के लिए
    U.P.P.C.S. (Pre) 2017
    उत्तर-(c)
    ऋग्वेद में अनेक परिच्छेदों (passages) में ‘अघन्य’ (स्त्रीलिंग में ‘अघन्या’) शब्द का प्रयोग गाय के संदर्भ में हुआ है। इस शब्द का अर्थ है ‘जिसे नहीं मारना चाहिए।’ यह शब्द गाय के प्रति आर्यों की श्रद्धा और उसकी आर्थिक-धार्मिक महत्ता को प्रकट करता है। गाय केवल दूध देने वाला पशु ही नहीं थी, बल्कि वह वैदिक समाज में धन, यज्ञ और जीवन-यापन का आधार थी। इसीलिए ऋग्वेद में गाय को ‘देवी’ तुल्य माना गया है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋग्वेद में ‘उषा’ देवी की तुलना गाय से की गई है, जो गाय की दिव्यता को उजागर करती है। इसके अलावा ऋग्वेद में पृथ्वी को भी ‘गौ’ (गाय) के रूप में रूपकात्मक ढंग से चित्रित किया गया है, जो इस पशु के प्रतीकात्मक महत्व को और बढ़ाता है।

  • वैदिक सभ्यता : महत्वपूर्ण तथ्य

    📚 विषय सूची

    दास-प्रथा

    ➣ भारत में दास-प्रथा की प्राचीनतम उल्लेख त्रग्वैदिक ग्रन्थ से प्राप्त होता है। उत्तर वैदिक साहित्य से भी दासों के विषय में वृहत जानकारी मिलती है।

    ऐतरेय ब्राह्मण एक ऐसे राजा का उल्लेख करता है जिसने अपने अभिषेक के समय दस हजार दासियों को उपहार स्वरुप पुरोहित को दिया था।

    ➣ हालाँकि मौर्य काल तथा गुप्तकाल, दोनों में दास प्रथा के प्रमाण मिले हैं।

    ➣ मौर्यकालीन शासक अशोक के अभिलेखों में भी दासों का उल्लेख मिलता है।

    अर्थशास्त्र में 5 प्रकार के दासों का उल्लेख है- उदरदास,आत्मविक्रयी , आत्माधाता, दण्डप्रणीतदाम , ध्वजाह्रत।

    मनुस्मृति में 7 प्रकार के दासों का उल्लेख किया गया है- ध्वजाह्रत , भक्तदास, गृहज, क्रीत, दत्त्रिम , पैत्रिक , दण्ड दास।

    नारद स्मृति में 15 प्रकार के दासों का उल्लेख किया गया है। दास मुक्ति के अनुष्ठान का विधान सर्वप्रथम नारद ने ही किया है।

    विज्ञानेश्वर ने मिताक्षरा में पन्द्रह प्रकार के दासों का उल्लेख मिलता है।

    ➣ भारत में ब्रिटिश शासन के समय 1843 ई. में इस प्रथा को बन्द करने के लिए एक अधिनियम पारित कर दिया गया था।

    ➣ चौथी शताब्दी ई. पू. भारत के विषय में मेगस्थनीज ने लिखा था कि भारतवर्ष में दास प्रथा नहीं है

    ➣ अशोक के अभिलेखों में दासों तथा सेवकों के प्रति उचित व्यवहार किये जाने का आदेश मिलता है। सम्भवत: प्राचीन भारत दासों की स्थिति प्राचीन रोम तथा यूनान के दासों की अपेक्षा बहुत अच्छी थी।

    सती प्रथा

    अथर्ववेद से सती प्रथा की औपचारिकता पूरी करने के लिए पत्नी अपने पति के साथ चिता पर लेटती थी। जहाँ से उसके सम्बन्धी उसके उठने का आग्रह करते थे।

    वैदिक समाज में सती प्रथा प्रचलित नहीं थी।

    ➣ रामायण के मूल अंश में इसका उल्लेख नहीं मिलता , दशरथ तथा रावण की मृत्यु के पश्चात् उनकी पत्नियॉं के सती होने का उल्लेख नहीं मिलता। किन्तु उत्तरकाण्ड में वेदयंती की माता के सती होने का उल्लेख है।

    ➣ ब्राह्मण साहित्य , बौद्ध साहित्य एंव गृह सूत्रों से भी इसका उल्लेख नहीं मिलता।

    ➣ महाभारत में इस प्रथा का विस्तृत उल्लेख नहीं मिलता है, पाण्डु की मुत्यु बाद उनकी पत्नी माद्री सती हो गयी थी जबकि अभिमन्यु, घटोत्कच तथा द्रोण की पत्नियाँ सती नहीं हुई थीं।

    ➣ कौटिल्य के अर्थशास्त्र (मौर्यकाल) में सती प्रथा का कोई प्रमाण नहीं मिलता है किन्तु यूनानी लेखकों ने उत्तर-पश्चिम में सैनिकों की स्त्रियों के सती होने का उल्लेख किया है।

    ➣ दूसरी शताब्दी ई. के लगभग चेर शासक नेदुनजेरल आदन का चोल शासक पत्तिनी से युद्ध हुआ। जिसमे दोनों मारे गये फलस्वरूप दोनों की पत्नियां सती हो गयीं।


    ➣ पुराणों में सती होने का उल्लेख मिलता हैं। वात्स्यायन , भास् , कालिदास एंव शूद्रक जैसे विद्वानों ने इसका उल्लेख किया है।

    ➣ सती प्रथा का प्रथम अभिलेखीय प्रमाण गुप्तकाल में मिलता है। 510 ई. के ऐरण अभिलेख से पता चलता है कि, गुप्त नरेश भानुगुप्त का मित्र गोप राज (सैनिक) हूणों के विरुद्ध वीरगति को प्राप्त हुआ तत्प्श्चात उसके पत्नी के सती होने का उल्लेख है।

    1829 ई. में भारत के गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बैंटिक द्वारा सती प्रथा को प्रतिबन्धित करने के लिये लाये गये कानून को लागू करवाने में राजा राम मोहन राय ने सरकार की मदद की थी। अंततः सती प्रथा को अवैध घोषित किया गया।

    हड़प्पा और वैदिक सभ्यता में अंतर

    तुलना का आधार हड़प्पा सभ्यता वैदिक सभ्यता
    काल हड़प्पा सभ्यता का विकसित काल लगभग 2600 ई.पू. से 1900 ई.पू. माना जाता है। इसे कांस्य युगीन सभ्यता भी कहा जाता है। वैदिक सभ्यता का काल लगभग 1500 ई.पू. से 600 ई.पू. माना जाता है। इसे प्रारंभिक (ऋग्वैदिक) और उत्तर वैदिक काल में विभाजित किया जाता है।
    भौगोलिक क्षेत्र यह सभ्यता सिंधु नदी तथा उसकी सहायक नदियों के क्षेत्र में फैली थी। इसका विस्तार वर्तमान पाकिस्तान, पंजाब, गुजरात, राजस्थान और हरियाणा तक था। प्रारंभिक वैदिक सभ्यता सप्तसिंधु क्षेत्र में विकसित हुई, बाद में गंगा-यमुना दोआब और पूर्वी भारत तक फैल गई।
    संस्कृति हड़प्पा सभ्यता एक विकसित नगरीय संस्कृति थी। यहाँ सुनियोजित नगर, चौड़ी सड़कें, पक्के मकान, जल निकासी व्यवस्था और विशाल स्नानागार मिलते हैं। वैदिक सभ्यता मुख्यतः ग्रामीण संस्कृति थी। आरंभ में लोग गाँवों में रहते थे, बाद में उत्तर वैदिक काल में नगरों का विकास हुआ।
    समाज समाज व्यवस्थित और संगठित था। वर्ग विभाजन के संकेत मिलते हैं, लेकिन कठोर जाति व्यवस्था का प्रमाण नहीं मिलता। समाज वर्ण व्यवस्था पर आधारित था। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चार वर्ण प्रमुख थे। उत्तर वैदिक काल में जाति व्यवस्था कठोर हो गई।
    परिवार व्यवस्था संभवतः मातृसत्तात्मक प्रभाव था, क्योंकि मातृदेवी की पूजा के प्रमाण मिलते हैं। पितृसत्तात्मक परिवार व्यवस्था प्रमुख थी। परिवार का मुखिया पिता होता था।
    स्त्रियों की स्थिति स्त्रियों को सम्मानजनक स्थान प्राप्त था। मातृदेवी की पूजा से स्त्रियों के महत्व का संकेत मिलता है। प्रारंभिक वैदिक काल में स्त्रियों की स्थिति अच्छी थी, वे शिक्षा और यज्ञों में भाग लेती थीं। उत्तर वैदिक काल में उनकी स्थिति कमजोर हो गई।
    अर्थव्यवस्था अर्थव्यवस्था व्यापार, शिल्प और उद्योग पर आधारित थी। आंतरिक और विदेशी व्यापार अत्यधिक विकसित था। अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि और पशुपालन पर आधारित थी। उत्तर वैदिक काल में व्यापार और उद्योग का विकास हुआ।
    कृषि गेहूँ, जौ, तिल और कपास की खेती की जाती थी। सिंचाई के लिए नदी जल का उपयोग होता था। गेहूँ और जौ प्रमुख फसलें थीं, बाद में चावल की खेती भी होने लगी। बैलों द्वारा हल चलाया जाता था।
    पशुपालन गाय, बैल, भैंस, भेड़ और बकरी पाली जाती थीं। बैल कृषि कार्यों में उपयोगी थे। गाय सबसे महत्वपूर्ण संपत्ति मानी जाती थी। पशुधन व्यक्ति की समृद्धि का प्रतीक था।
    व्यापार एवं वाणिज्य मेसोपोटामिया सहित विदेशी क्षेत्रों से व्यापार के प्रमाण मिले हैं। मानकीकृत माप-तौल प्रणाली विकसित थी। प्रारंभिक वैदिक काल में व्यापार सीमित था, लेकिन उत्तर वैदिक काल में व्यापार और विनिमय प्रणाली का विस्तार हुआ।
    शिल्प एवं उद्योग मिट्टी के बर्तन, मनके, आभूषण, धातु कार्य और मूर्ति निर्माण अत्यधिक विकसित थे। रथ निर्माण, धातु कार्य, हथियार निर्माण और कुटीर उद्योग प्रमुख थे।
    नगर व्यवस्था नगर सुनियोजित थे। ग्रिड प्रणाली, जल निकासी, अनाज भंडार और सार्वजनिक स्नानागार प्रमुख विशेषताएँ थीं। ग्राम प्रधान जीवन था। सुनियोजित नगर व्यवस्था का अभाव था।
    धार्मिक विश्वास मातृदेवी, पशुपति, वृक्ष और प्रकृति पूजा के प्रमाण मिलते हैं। इंद्र, अग्नि, वरुण, सोम आदि देवताओं की पूजा की जाती थी। यज्ञों का विशेष महत्व था।
    धार्मिक प्रथाएँ मूर्ति पूजा और प्रतीक पूजा के प्रमाण मिलते हैं, लेकिन मंदिरों के स्पष्ट प्रमाण नहीं हैं। यज्ञ, मंत्र और वैदिक कर्मकांड धार्मिक जीवन का मुख्य भाग थे।
    लिपि हड़प्पा लिपि अब तक पढ़ी नहीं जा सकी है। यह चित्रात्मक मानी जाती है। वैदिक साहित्य मौखिक परंपरा में सुरक्षित रखा गया। लिखित लिपि का स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता।
    माप-तौल प्रणाली मानकीकृत वजन और माप प्रणाली विकसित थी, जो व्यापार में उपयोग होती थी। ऐसी विकसित मानकीकृत प्रणाली के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलते।
    धातु उपयोग तांबा और कांस्य का व्यापक उपयोग होता था। इसलिए इसे कांस्य युगीन सभ्यता कहा जाता है। प्रारंभ में तांबे का उपयोग और उत्तर वैदिक काल में लोहे का उपयोग बढ़ा।
    राजनीतिक व्यवस्था स्पष्ट राजतंत्र के प्रमाण नहीं मिलते। संभवतः व्यापारी या नगर प्रशासन व्यवस्था थी। राजा प्रधान शासन व्यवस्था थी। सभा और समिति जैसी संस्थाएँ भी थीं।
    अंत्येष्टि प्रथा दफनाने और कुछ स्थानों पर दाह संस्कार के प्रमाण मिले हैं। दाह संस्कार प्रमुख प्रथा थी।
    पतन / परिवर्तन जलवायु परिवर्तन, नदी मार्ग परिवर्तन, बाढ़ और व्यापार में गिरावट इसके पतन के कारण माने जाते हैं। उत्तर वैदिक काल में महाजनपदों और नए राज्यों का विकास हुआ।

    वैदिक शब्दावली

    वेद ज्ञान या जानना
    कुलप परिवार का मुखिया
    उग्र पुलिस कर्मचारी
    यव जौ
    उष्णीष पगड़ी
    लांगल हल
    करीष गोबर की खाद
    पर्जन्य बादल
    ऊर्दर अनाज नापने का पात्र/यंत्र
    अमाजू आजोबन अविवाहिता विदुषी स्त्रियां
    अपन्या गाय (जिसे मारा न जाये)
    गोमत धनी व्यक्ति (जिसके पास पर्याप्त मात्र में गायें हों)
    गव्य एवं गव्यति चारागाह
    गविष्टि गाय के लिए युद्ध हेतु शब्द
    गोपति राजा या मुखिया
    गोधूलि समय मापने का शब्द
    गवयुती दूरी मापने का शब्द
    दुहिता/दुहित्री (दूध दूहने वाली)पुत्री
    श्याम अयम् लोहा
    लोहित अयस् तांबा
    हिरण्य सोना
    लोह तांबा
    अपुटिन
    निष्क सोने का टुकड़ा अथवा आभूषण,अथवा मुद्रा
    पेशम कढ़ाई बाले वस्त्र
    उपान जूते
    गोधूम गेहूं
    ब्रीहि चावल
    अपूप दूध या घी मिश्रित भोज्य पदार्थ
    वाधूय वधू द्वारा धारण किया जाने बाला बस्त्र (विबाह के अवसर पर)
    धन्व मरुस्थल
    व्रात्य पतित क्षत्रिय या पतित आर्य
    हिमवन्त हिमालय पर्वत
    मूंजपर्वत हिन्दूकुश पर्वत
    नदीतमा सरस्वती नदी
    सिंधुमाता सरस्वती नदी
    अर्णव समुद्र
    पुरंदर इंद्र की उपाधि (दुर्ग भेदक)
    अथर्वन भृग या अगिरस ऋषि की उपाधि (इन्होंने यज्ञ वेदी में अग्नि‌ की स्थापना की)
    धूमकेतु अग्नि की उपाधि
    अतिथि अग्नि
    कीवाश हलवाहा
    करीष या शकृत गोबर की खाद
    उर्वरा अथवा क्षेत् कृषि योग्य भूमि
    गोमत धनी व्यक्ति
    गोधना अतिथि
    नियोग नि:सन्तान विधवा को पुत्र प्राप्ति के लिए किसी अन्य के साथ सम्बंध बनाने की अनुमति
    पुनर्भू विधवाओं का पुनर्विवाह
    त्रयम्बक शिव

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