➣ शिव से संबंधित धर्म को शैव धर्म कहा गया है तथा शिव के उपासक को शैव कहा जाता है।
➣ ऋग्वेद में शिव को रुद्र कहा गया है, जो अपनी उग्रता के लिए प्रसिद्ध हैं। रुद्र को समस्त लोकों का स्वामी वाजसनेयी संहिता के शतरुद्रीय मंत्र में कहा गया है जबकि अथर्ववेद में उन्हें पशुपति, भव, शर्व, भूपति आदि कहा गया है।
➣ शिव को समर्पित महामृत्युंजय मंत्र का वर्णन भी ऋग्वेद में है। श्वेताश्वर उपनिषद् में सर्वप्रथम शिव स्तुति का उल्लेख है।
➣ शिव का अभिप्राय मंगलमय होना है। लिंग के रूप में शिव की व्यापक स्तर पर पूजा होती है। महाभारत के अनुशासन पर्व तथा मत्स्यपुराण में शिव लिंग पूजा का उल्लेख है।
➣ पुराणों ने सम्पूर्ण सृष्टि की पहचान शिव के साथ उसके पांच रूपों तत्पुरुष, नामदेव, अघोरेश, साधोजात एवं इशान की अवधारणा के माध्यम से की है।
➣ शिव के 11 रुद्र अवतार हैं-कपिल, पिंगल, भीम, विरुपाक्ष, विलोहित, शास्त्र, अजपाद, अहिरबुधन्य, शम्भू, चाँद तथा भाव।
➣ दक्ष प्रजापति यज्ञ कथा का सम्बन्ध शिव से है, जिसमें उन्होंने वीरभद्र एवं भद्रकाली नामक गणों का निर्माण कर दक्ष के यज्ञ का विध्वंश किया।
➣ लिंग पूजा का प्रथम उल्लेख मत्स्य पुराण तथा फिर महाभारत के अनुशासन पर्व में हुआ।
➣ कौषीतिकी ब्राह्मण एवं शतपथ ब्राह्मण में शिव के आठ रूपों का उल्लेख है। चार संहारक तथा चार सौम्य रूप हैं।
➣ मेगस्थनीज ने शिव का उल्लेख डायोनिसस नाम से किया है। ऐतिहासिक रूप से शिव की पूजा का उल्लेख सर्वप्रथम मेगस्थनीज ने किया।
➣ शिव के दो पुत्र हैं – कार्तिकेय, गणेश।
1. कार्तिकेय: ज्येष्ठ पुत्र
➣ इनको देवताओ का सेनापति एवं युद्ध का देवता कहा जाता है।
उपनाम: स्कन्द, कुमार, महासेन, विशाख, षडानन
वाहनः मयूर
पत्नी : अविवाहित
➣ कार्तिकेय का तादात्म्य दक्षिण के लोकप्रिय देवता मुरूगन से किया जात है।
➣ इनकी पूजा मुख्यत: भारत के दक्षिणी राज्यों और विशेषकर तमिलनाडु में होती है। इसके अतिरिक्त विश्व में श्रीलंका, मलेशिया, सिंगापुर आदि में भी इन्हें पूजा जाता है।
2. गणेश : अनुज पुत्र
➣ इनको मन्दिर का देवता और बुद्धि देवता माना जाता था। तिब्बती बौद्ध अपने मंदिरों में गणेश की पूजा करते है।
उपनाम: गणपति, गजानन, आदिपूज्य, लंबोदर
वाहनः मूषक
पत्नी: 1. रिद्धि, 2. सिद्धि
पुत्रः 1. शुभ, 2. लाभ
श्री गणेश का अर्थ है – आरंभ करना। हिन्दू धर्म में विद्या आरम्भ तथा विवाह के समय गणपति की पूजा की जाती है।
सम्बंधित तथ्य
➣ शिव का संबंध प्रागैतिहासिक युग तक रहा है। सिंधुवासी शिव की पूजा करते थे। इसका प्रमाण मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मुद्रा है, जिस पर योगी की आकृति बनी है।
➣ योगी के सिर पर एक त्रिशुल जैसा आभूषण है तथा इसके तीन मुख हैं। तत्कालीन पुरातत्व विभाग के महानिदेशक मार्शल ने इसे शिव से संबंधित किया है।
➣ उत्तर वैदिक काल में तैत्तिरीय संहिता में इनका नाम शिव प्राप्त होता है।
➣ शिव की प्राचीनतम मूर्ति पहली शताब्दी ई. में प्रसिद्ध गुडिमल्लम लिंग के रूप में रेणु गुंटा, मद्रास के निकट प्राप्त हुई।
➣ पाणिनि के 14 सूत्र महादेव के डमरू से उत्पन्न माना जाता है।
➣ अशोक का पौत्र जालौक (कश्मीर का शासक ) शैव धर्म का अनुयायी था। बौद्ध धर्म अपनाने से पहले अशोक भी शैव मतानुयायी था।
➣ मौर्योत्तर काल में कुषाण शासक विम कडफिसस की मुद्राओं पर त्रिशूलधारी शिव और नन्दी के चित्र का अंकन मिलता है तथा पृष्ठ भाग पर महेश्वर।
➣ कुषाण शासकों के सिक्कों पर शिव, वृषभ और त्रिशूल की आकृतियां मिलती हैं। उदयगिरि गुहालेख से पता चलता है कि चंद्रगुप्त द्वितीय के प्रधानमंत्री वीरसेन ने उदयगिरि पहाड़ी पर एक शैव गुफा का निर्माण करवाया था।
➣ पतंजलि के महाभाष्य से पता चलता है कि दूसरी सदी ईसा पूर्व में शिव की मूर्ति बनाकर पूजा की जाती थी। महाभाष्य में शिव के विभिन्न नामों का उल्लेख मिलता है। ये प्रमुख नाम हैं-रुद्र, महादेव,गिरीश, भव, सर्व, त्र्यम्बक आदि।
➣ कुमारगुप्त के समय में खोह तथा करमदंडा में शिवलिंग की स्थापना करवाई गई थी। गुप्त काल में ही नचनाकुठार में पार्वती मंदिर तथा भूमरा में शिव मंदिर का निर्माण करवाया गया था।
➣ अर्द्धनारीश्वर की मूर्ति का निर्माण एवं पूजा गुप्तकाल में प्रारम्भ हुई। ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश (शिव) की त्रिमूर्ति का निर्माण भी गुप्तकाल में हुआ।
➣ समुद्रगुप्त के समय की प्रयाग प्रशस्ति में शिव की जटा से गंगा के निकलने का उल्लेख मिलता है।
➣ 619 ई. से पहले हर्षवर्धन (बाद में बौद्ध धर्म), गौड़ नरेश शशांक और कामरूप के भास्करवर्मा शैव धर्म के उपासक थे।
➣ कालिदास ने कुमारसम्भवम् में शिव की महिमा का गुणगान किया है।
➣ चंदेल शासकों द्वारा खजुराहो का प्रसिद्ध कंदारिया महादेव मंदिर निर्मित कराया गया था।
➣ राष्ट्रकूटों के समय में एलोरा का प्रसिद्ध कैलाश मंदिर निर्मित कराया गया था।
➣ पल्लव काल में शैव धर्म का प्रचार-प्रसार दक्षिण भारत में नयनारों द्वारा किया गया था। उल्लेखनीय है शैवमत के भावनात्मक पक्ष का प्रचार नायनारों द्वारा किया गया जबकि उसके सैद्धान्तिक पक्ष को शैव बुद्धिजीवियों (आचार्यों) ने पूर्ण किया। जो अगमनत, शुद्ध तथा वीरशैव जैसे शैव आंदोलन के रूपों से संबंधित थे।
➣ नयनार संतों की संख्या 63 है। इनमें तिरुज्ञान, सुंदर मूर्ति, सम्बन्दर, अप्पार, मणिक्कवाचगर आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इनके भक्तिगीतों को एक साथ देवारम में संकलित किया गया है।
➣ दक्षिण भारत में चोल शासक शिव के अनन्य उपासक थे। चोल शासक राजराज प्रथम ने तंजौर में राजराजेश्वर मंदिर निर्मित करवाया था। उसने बृहदीश्वर अथवा राजराजेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया था।
➣ कुलोतुंग प्रथम एक कट्टर शैव था। इसने शिव के प्रति अतिशय श्रद्धा के कारण चिदंबरम मंदिर में स्थापित विष्णु की प्रतिमा को उखाड़ कर समुद्र में फेंकवा दिया था।
➣ परमारवंश के राजा भोज द्वारा रचित पुस्तक तत्वपरीक्षा शैवधर्म से संबंधित है।
➣ पाल, चंदेल एवं सेन वंश के ज्यादातर अभिलेख ओम नमः शिवाय नामक मंत्र से प्रारंभ होते हैं।
➣ चंदेल राजा विद्याधर ने कंदरिया महादेव मंदिर का निर्माण महमूद गजनवी पर अपनी विजय के उपलक्ष्य में करवाया था।
➣ गुजरात स्थित सोमनाथ मंदिर, जो शिव को समर्पित है , को महमूद गजनवी द्वारा नष्ट करने के बाद परमार शासक भोज एवं अन्हिलवाड़ के चालुक्य शासक कुमारपाल ने इसका पुनर्निर्माण करवाया।
➣ सम्बन्दर नामक नयनार ने जैनियों को मदुरा में वाद-विवाद में हराकर राजा समेत प्रजा को शैव धर्म में दीक्षित किया तथा 8000 जैनियों को शूली पर चढ़वा दिया था।
शैव धर्म के प्रमुख सम्प्रदाय
➣ वामन पुराण में शैव मत के 4 सम्प्रदायों का उल्लेख है। ये हैं- 1. शैव 2. पाशुपत 3. कापालिक, 4.कालामुख।
1. शैव सम्प्रदाय : शैव धर्म की प्रमुख परंपरा
➣ शैव सम्प्रदायों का प्रथम उल्लेख पतंजलि के महाभाष्य में शिव भागवत नाम से हुआ।
➣ इस सम्प्रदाय के अनुसार कर्त्ता शिव हैं, कारण शक्ति और उपादान बिन्दु हैं।
➣ इस मत के चार पाद या पाश (बन्धन) हैं- विद्या, क्रिया, योग और चर्या। तीन पदार्थ हैं:-1. पति (शिव) 2. पशु (जीव) 3. पाश (बन्धन)।
2.पाशुपत सम्प्रदाय : शैव धर्म का प्राचीन संप्रदाय
➣ यह शैवों का सबसे प्राचीन सम्प्रदाय है, जिसकी उत्पत्ति ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में हुई। वायु पुराण और लिंग पुराण से पता चलता है कि इस सम्प्रदाय का संस्थापक लकुलीश अथवा लकुली नामक ब्रह्मचारी था।
➣ इनका जन्म स्थान कायावरोहण (गुजरात) था।पुराणों के अनुसार, इस संप्रदाय की स्थापना इस संप्रदाय के अनुयायी लकुलीश को शिव का अवतार मानते हैं।
➣ पाशुपतों का प्रमुख ग्रन्थ पाशुपत सूत्र है, जो महेश्वर द्वारा रचित है।
➣ लकुलीश ने पंचार्थ विद्या या पंचाध्यायी नामक ग्रंथ की रचना की थी। इस मत के अनुयायी पंचार्थिक कहे जाते थे।
➣ पाशुपत संप्रदाय का मुख्य संबंध अनुष्ठान एवं अनुशासन से है। इस सम्प्रदाय के लोग हाथ में एक लगुड़ या दंड धारण करते थे। इसका अंतिम लक्ष्य शिव के साथ अन्तरविलीन होना है जिससे सभी प्रकार के दुःख एवं परेशानियों से मुक्ति प्राप्त होना है।
➣ लकुलीश की अनेक मूर्तियां प्राप्त हुई है, जिनमें एक ग्वालियर के तेली मंदिर में है।
➣ इस सम्प्रदाय का प्राचीनतम अंकन कुषाण शासक हुविष्क के सिक्कों पर पाशुपत सम्प्रदाय का सर्वप्रथम उल्लेख मिलता है।
➣ चन्द्रगुप्त-II कालीन मथुरा लेख में उदिताचार्य नाम एक पाशुपत मतानुयायी का उल्लेख है। जिसने दो लिंगों की स्थापना करवाई थी।
➣ बाणभट्ट ने कादम्बरी में इस सम्प्रदाय का उल्लेख किया है।
➣ नेपाल के काठमाण्डु स्थित पशुपतिनाथ मंदिर इस सम्प्रदाय का केंद्र है।
➣ पाशुपत सम्प्रदाय का प्राचीनतम अंकन कुषाण शासक हुविष्क के सिक्कों पर हुआ है।
➣ कुमारगुप्त प्रथम के करमदण्ड अभिलेख में उसके मंत्री पृथ्वीसेन द्वारा पृथ्वीश्वर नामक शिवलिंग की स्थापना का उल्लेख है।
3. कापालिक सम्प्रदाय : तांत्रिक शैव परंपरा का परिचय
➣ कापालिक संप्रदाय के इष्टदेव भैरव थे। उपासक भैरव को शिव का अवतार मानकर उनकी उपासना करते थे।
➣ कापालिक सम्प्रदाय एवं कालामुख सम्प्रदाय चिरादम योग पद्धति में विश्वास करते थे।
➣ कापालिक संप्रदाय आसुरी प्रवृति का था। इस मत के अनुयायी सुरा का सेवन करते हैं एवं मांस खाते हैं, शरीर पर श्मशान की भस्म लगाते हैं तथा हाथ में नरमुंड धारण करते हैं। इसमें भैरव को नरबलि दी जाती थी।
➣ भवभूति के मालतीमाधव नाटक से पता चलता है कि श्रीशैल (हिमालय) नामक स्थान कापालिकों का प्रमुख केंद्र था।
➣ संगम साहित्य मणिमेखलै में कापालिकों का वर्णन कट्टर शैव के रूप में हुआ है।
➣ भवभूति के मालतीमाधव एवं हाल की गाथा सप्तशती नामक पुस्तकों में कापालिकों पर व्यंग्य किया है।
4. कालामुख सम्प्रदाय : शैव साधना और मान्यताएँ
➣ कालामुख का शाब्दिक अर्थ काले मुख वाले है। इस सम्प्रदाय के अनुयायी आदिवादी व भयंकर प्रकृति के थे। अतिमार्गी होने के कारण ही शिवपुराण में उन्हें महाव्रतधर कहा गया है।
➣ इस सम्प्रदाय के लोग नर-कपाल में भोजन, जल, सुरापान करते व शरीर पर भस्म लगाते थे।
➣ कालामुखों का प्रमुख केन्द्र बेलगाँव का केदारेश्वर मन्दिर था ।
5. लिंगायत सम्प्रदाय : वीरशैव आंदोलन और सिद्धांत
➣ शैव धर्म का ही एक संप्रदाय लिंगायत अथवा वीर शैव था। यह दक्षिण भारत में प्रचलित था। इसके उपासक लिंगायत या जंगम कहलाते हैं।
➣ लिंगायत संप्रदाय के प्रवर्तक अल्लप्रभु एवं उनके शिष्य बसव (बासव राज) थे। ये कलुचरि शासक विज्जल के मंत्री थे। वास्तविक संस्थापक बसव थे।
➣ वसव पुराण में लिंगायत सम्प्रदाय के प्रर्वतक अल्लभप्रभु तथा उनके शिष्य वासव को बताया गया हैं। कुछ इतिहासकार एकांत रमैया को इस सम्प्रदाय का संस्थापक मानते हैं।
➣ इस सम्प्रदाय के उपासक शिवलिंग की आराधना करते थे एवं उसे चांदी के सम्पुट (डिबिया) में रखकर अपने गले में धारण करते थे।
➣ बसव को कुडाल संगम देव तथा नन्दी का अवतार कहा जाता है।
➣ अक्का महादेवी इस सम्प्रदाय में महिला संत थी।
➣ फ्लीट महोदय के अनुसार लिंगायत संप्रदाय की स्थापना एकान्त रामय्या ने की।
➣ लिंगायत संप्रदाय के आदि आचार्य रेणुक, दारूण, घंटाकर्ण तथा विश्वकर्ण हुए। इन आचार्यों की संतवाणी वचनशास्त्र नामक कन्नड़ ग्रन्थ में संकलित है।
➣ लिंगायत सम्प्रदाय इस्लाम से प्रभावित है। यह सम्प्रदाय मूर्ति-पूजा, पुनर्जन्म, वेद, यज्ञ-कर्मकाण्ड, ब्राह्मण एवं जैन विरोधी था। इन्होंने जैन धर्म को मैसूर से उन्मूलित कर दिया।
➣ लिंगायत दाह-संस्कार के विरोधी थे। इसलिए ये दफनाए जाते हैं।
➣ लिंगायत 63 नयनारों को अपना प्राचीनतम् गुरू मानते हैं।
➣ लिंगायत चाँदी का सम्पुट गले में धारण करते हैं।
6. कश्मीरी शैव सम्प्रदाय : अद्वैत शैव दर्शन का परिचय
➣ कश्मीर में शैव धर्म का एक सम्प्रदाय विकसित हुआ। इस मत के संस्थापक वसुगुप्त थे।
➣ यह शुद्ध से दार्शनिक अथवा ज्ञान मार्गी था। इसमें ज्ञान व ध्यान को परमब्रहा की प्राप्ति का प्रधान आधार माना गया है। इस त्रिक दर्शन के नाम से जाना गया।
➣ स्पन्दन शास्त्र इस शाखा के पहले दार्शनिक और कश्मीरी शैव सिद्धांत के प्रवर्तक वसुगुप्त थे। इस सम्प्रदाय के दो प्रधान ग्रंथ शिव सूत्रम् व स्पंदनकारिका माने जाते हैं।
➣ आगम शास्त्र इसके अंतर्गत 3 तत्वों (1. पशु, 2. पति, 3. पाश) की कल्पना की गयी है।
➣ प्रत्यभिज्ञा शास्त्र इसके प्रवर्तक सोमानंद थे। इनकी रचना का नाम शिव दृष्टि है। गई है। ये सब कुछ शिव को मानते थे।
➣ कश्मीरी शैव के प्रत्यभिज्ञा दर्शन के प्रवर्तक सोमानन्द थे। कश्मीरी शैव की दो शाखाएँ हैं:- 1. स्पन्दशास्त्र, 2. प्रत्यविज्ञान शास्त्र।
➣ दक्षिण भारतीय शैव संतों को नयनार कहा जाता है। कुल 63 प्रमुख नयनार संत थे। इनके श्लोक-संग्रह को तिरूमुरै कहा जाता है।
7. नाथपंथ संप्रदाय : गोरखनाथ और योग परंपरा
➣ नाथपंथ संप्रदाय दसवीं सदी के अंत में मत्स्येंद्रनाथ ने चलाया। इसे योगिनी कौल मार्ग भी कहा जाता है।
➣ इसमें शिव को आदिनाथ मानते हुए नौ नाथों को दिव्य पुरुष के रूप में मान्यता प्रदान की गई है। इसमें पहले नाथ स्वयं शिव थे।
➣ बाबा गोरखनाथ ने दसवीं- ग्यारहवीं शताब्दी में इस मत का अधिकाधिक प्रचार-प्रसार किया।
➣ नाथ सम्प्रदाय का प्रमुख केन्द्र पेशावर है। अलख निरंजन इनका उद्घोष है।
➣ नाथ-साधना पद्धति में नारियों का प्रमुख स्थान है।
➣ नाथपंथी योगियों ने सूफियों को हठयोग का अभ्यास करवाया था।
➣ मत्स्येन्द्रनाथ के शिष्य रावलपिंडी (पाकिस्तान) में जन्मे गोरखनाथ ने 10वीं- 11वीं शताब्दी में नाथ मत का प्रचार-प्रसार किया।
➣ नाथ संप्रदाय की साधना वज्रयानी बौद्धों की साधना के समान थी, इसलिए मत्स्येन्द्रनाथ को पूर्वी भारत में अवलोकितेश्वर के अवतार के रूप में स्वीकार किया गया है। तिब्बत में मत्स्येन्द्रनाथ को सिद्ध लुईपाद के रूप में माना गया है।
शैव धर्म से संबंधित प्रमुख मंदिर
| राजराजेश्वर मंदिर | तंजौर (तमिलनाडु) |
| शिव मंदिर | भूमरा (म.प्र.) |
| नटराज मंदिर | चिदंबरम (तमिलनाडु) |
| विरुपाक्ष मंदिर | हम्पी (कर्नाटक) |
| विश्वनाथ मंदिर | वाराणसी (उ.प्र.) |
➣ शैव धर्म से संबंधित देश के विभिन्न भागों में स्थित द्वादश ज्योतिर्लिंग हैं-सोमनाथ, नागेश्वर
(द्वारका के समीप), केदारनाथ, विश्वनाथ (काशी), वैद्यनाथ, महाकालेश्वर (उज्जैन), ओंकारेश्वर (म.प्र.), भीमेश्वर (नासिक), त्र्यम्बकेश्वर (नासिक), घुश्मेश्वर, मल्लिकार्जुन (आंध्र प्रदेश), रामेश्वरम्।
| उत्तर भारत के शासक | |
| शासक | विवरण |
|---|---|
| गोंडाफर्निस | पार्थियन/पहलव नरेश। |
| विम कडफिसेस | कुषाण शासक के मुद्राओं पर त्रिशूलधारी शिव व नंदी का चित्र। |
| जालौक | मौर्य सम्राट अशोक का पुत्र, मौर्य शासकों में एकमात्र शिव अनुयायी। |
| मिहिरकुल | हूण शासक। |
| वीरसेन | गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त-II का संधिविग्रहिक। |
| हस्तिन | गुप्त सम्राट स्कंदगुप्त का सामंत। |
| शशाक | गौड़, बंगाल शासक। |
| हर्षवर्द्धन | पुष्यभूति वंश का शासक। |
| भास्कर वर्मा | कामरूप, असम का शासक। |
| दक्षिण भारत के शासक | |
| आडिगल पेरुमननार | पल्लव नरेश |
| चेरमन पेरुमल | चेर नरेश |
| पुगल चोलर | चोल नरेश |
| नेडुमार | पाण्ड्य नरेश |
| कृष्ण-I | राष्ट्रकुट वंश, एलौरा के कैलाश मंदिर निर्माता। |
| राजराज-I | चोल नरेश, तंजौर के राजराजेश्वर/बृहदेश्वर मंदिर निर्माता। |
| राजेद्र-I | चोल नरेश, गंगैचेलमंडलम के शिव मंदिर निर्माता। |
| कुलोत्तुंग-I | चोल नरेश, चिदम्बरम मंदिर में स्थापित विष्णु की प्रतिमा का समुद्र में फिकवाने वाला। |