➣ पुष्यमित्र शुंग ने जिस मगध को अंतिम मौर्य शासक की हत्या कर प्राप्त किया था अब वह पहले जैसा विशाल साम्राज्य नहीं रहा था। 200 ई.पू. में हुए विदेशी आक्रमण के कारण भारत की पश्चिमोत्तर सीमा पर हिन्द – यूनानी शासन करने लगे थे।
➣ कालांतर में कई विदेशी जैसे शक , पह्लव तथा कुषाण भी भारत में अपनी जड़ें ज़माने लग गयी थी। इनमे सबसे ज्यादा प्रभाव कुषाणों का रहा जिससे प्रसिद्ध विदेशी शासक कनिष्क हुआ।
| पुष्यमित्र शुंग | 185 – 149 ई.पू. |
| अग्निमित्र | 149 – 141 ई.पू. |
| वसुज्येष्ठ | 141 – 131 ई.पू. |
| वसुमित्र | 131 – 124 ई.पू. |
| अन्धक | 124 – 122 ई.पू. |
| पुलिन्दक | 122 – 119 ई.पू. |
| घोष शुंग | – |
| वज्रमित्र | – |
| भगभद्र | – |
| देवभूति | 83 – 75 ई.पू. |
पुष्यमित्र शुंग (185 – 149 ई.पू.)
➣ बाणभट्ट के हर्षचरित से मौर्य सम्राट बृहदथ के सेनापति पुष्यमित्र शुंग द्वारा हत्या का उल्लेख मिलता है। बृहद्रथ को हर्षचरित में प्रज्ञा दुर्बल (दुर्बद्धि) कहा है।
➣ हरप्रसाद शास्त्री ने शुंगों को पारसीक/ईरानी बताया है। बाणभट्ट ने निम्न जाति एवं अनार्य बताया है। दिव्यावदान में शुंगों को मौर्य बताया गया है। वह पुष्यधर्म का पुत्र था।
➣ पुष्यमित्र ने सेनानी/सेनापति की उपाधि धारण की। घोसुण्डी अभिलेख में पुष्यमित्र को सर्वतात का संकर्षण की उपाधि दी गई है।
➣ धनदेव (अयोध्या का राज्यपाल) के अयोध्या अभिलेख के अनुसार उन्होंने दो अश्वमेध यज्ञ किए। प्रसिद्ध व्याकरणविद् पतंजलि (गोनर्द निवासी) उनके अश्वमेध यज्ञ के पुरोहित थे। महर्षि पाणिनि ने पुष्यमित्र शुंग को भारद्वाज गोत्र से सम्बंधित बताया था।
➣ काशीप्रसाद जायसवाल एवं स्मिथ खारवेल के हाथीगुम्फा में उल्लेखित बहसतिमित्र का समीकरण पुष्यमित्र से करते हैं, जिसको खारवेल ने 12वें वर्ष हराया था।
➣ पुष्यमित्र के राजा बन जाने पर मगध साम्राज्य को बहुत बल मिला था। जो राज्य मगध की अधीनता स्याग चुके थे पुष्यमित्र ने उन्हें फिर में अपने अधीन कर लिया था।
➣ पुष्यमित्र शुंग कट्टर ब्राह्मणवादी था। जिसने बौद्धधर्म के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए ब्राह्मण धर्म का पुनरुत्थान किया। अतः उसका काल वैदिक प्रतिक्रिया अथवा वैदिक पुनर्जागरण का काल भी कहा जाता है।
➣ बौद्ध ग्रंथों के अनुसार पुष्यमित्र बौद्ध धर्म का उत्पीड़क था। पुष्यमित्र ने बौद्ध विहारों को नष्ट किया तथा बौद्ध भिक्षुओं की हत्या की थी।
➣ जी. आर. शर्मा (गोवर्धन राय शर्मा) के अनुसार कौशाम्बी के घोषितराम विहार को पुष्यमित्र ने जला दिया और शाकल में घोषणा की, कि जो मुझे एक बौद्ध भिक्षु का सिर देगा, उसे मैं सौ दीनारें दूंगा।
➣ दिव्यावदान के अनुसार पुष्यमित्र ने सम्राट अशोक द्वारा निर्मित 84,000 बौद्ध स्तूपों को नष्ट करवा दिया। लेकिन भरहुत स्तूप बनाने का श्रेय पुष्यमित्र शुंग को ही दिया जाता है।
विदर्भ (बरार) की विजय
➣ विदर्भ का शासक यज्ञसेन था। वह मौयों की तरफ से विदर्भ के शासक पद पर नियुक्त हुआ था, परंतु मगध साम्राज्य की दुर्बलता का लाभ उठाकर उसने स्वयं को विदर्भ का स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया।
➣ यज्ञसेन को शुंगों का प्रकृत्यामित्र (स्वाभाविक शत्रु) कहा गया है।
➣ पुष्यमित्र के पुत्र अग्निमित्र माधवसेन का पक्ष लेते हुए यज्ञसेन को हराया और वर्धा नदी को सीमा मानते हुए विदर्भ राज्य का बंटवारा माधवसेन एवं यज्ञसेन में कर दिया।
➣ कालिदास के प्रसिद्ध नाटक मालविकाग्निमित्रम् में यज्ञसेन की चचेरी बहन मालविका और अग्निमित्र के प्रेम की कथा के साथ-साथ विदर्भ विजय का वृत्तांत भी उल्लेखित है।
➣ मौर्य वंश के अंतिम दिनों में कलिंग देश (ओडिशा) भी स्वतंत्र हो गया था।
➣ कलिंग का राजा खारवेल था। हाथीगुम्फा अभिलेख से ज्ञात होता है कि खारवेल ने मगध पर आक्रमण कर पुष्यमित्र शुंग को पराजित किया था।
यवनों का आक्रमण
➣ पुष्यमित्र शुंग के समय यवनों का आक्रमण हुआ। यवन आक्रमण का उल्लेख पतंजलि के महाभाष्य, गार्गी संहिता के युग पुराण खण्ड में तथा कालिदास के नाटक मालविकाग्निमित्र में मिलता है।
➣ गार्गी संहिता के युग पुराण में लिखा है कि यवन साकेत, पांचाल एवं मथुरा को जीतते हुए कुसुमध्वज (पाटलिपुत्र) तक पहुंच गए।’ पतंजलि लिखता है कि यवनों ने साकेत (अयोध्या), माध्यमिका (चित्तौड़) पर आक्रमण किया।
➣ डेमेट्रियस (दिमित्र) नामक यवन राजा पुष्यमित्र का समकालीन था। अधिकांश विद्वानों ने यवन आक्रमणकारी डिमेट्रियस प्रथम माना है। पुष्यमित्र के पौत्र वसुमित्र ने सिन्धु नदी के दाएं किनारे यवनों को हराया था।
➣ पुष्यमित्र के समय प्रथम यूनानी आक्रमण डेमेट्रियस के नेतृत्व में हुआ था जिसमे पुष्यमित्र ने यूनानी सेनापति मिनाण्डर को दो बार पराजित किया।
➣ शुंगवशीय शासकों के नामों में मिस्र व ईरान में प्रचलित मिस्र (सूर्य) की पूजा में सम्बन्ध था।
➣ भरहुत का स्तूप बनवाया तथा साँची के स्तूप के चारों ओर चहार दीवारी का निर्माण कराया।
➣ शुग काल में संस्कृत भाषा का पुनरूत्थान हुआ। जिसका श्रेय महर्षि पंतजलि को जाता है।
➣ पुष्यमित्र के समय रामायण, महाभारत व मनुस्मृति की रचना हुयी।
अग्निमित्र (149 – 141ई.पू.),
➣ पुष्यमित्र की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अग्निमित्र साम्राज्य का उत्तराधिकारी हुआ।
➣ पुष्यमित्र के राजत्व काल में ही अग्निमित्र विदिशा का गोप्ता (उपरांजा) बनाया गया था।
➣ कालिदास के नाटक मालविकाग्निमित्र का नायक भी अग्निमित्र था। कालिदास द्वारा रचित मालविकाग्निमित्रम् नाटक में अग्निमित्र और मालविका की प्रेम कथा का वर्णन किया गया है।
➣ अग्निमित्र की सभा में भगवती कौशिकी नामक बौद्ध धर्मावलम्बी स्त्री रहती थी।
➣ अग्निमित्र के बाद पुराणों में क्रमश: सुज्येष्ठ/वसुज्येष्ठ (141 ई.पू. – 131 ई.पू.), वसुमित्र (131-ई.पू. – 124 ई.पू.), आन्ध्रक, पुलिन्दक, घोष, वज्रमित्र, भागभद्र, देवभूति नामक राजाओं का वर्णन मिलता है।
➣ भागभद्र के शासन काल के 14वें वर्ष में तक्षशिला के यवन शासक एण्टियालकीड्स के राजदूत हेलियोडोरस ने विदिशा में वासुदेव के सम्मान में गरूड़ स्तम्भ स्थापित किया।
➣ देवभूति इस वंश का अंतिम शासक था। हर्षचरित के अनुसार इसके मंत्री वसुदेव ने इसकी हत्या कर एक नए वंश (कण्व वंश) की स्थापना की।
राजनैतिक एंव सांस्कृतिक विकास
➣ शुंग काल में विदिशा का राजनैतिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व सर्वाधिक हो गया था। शुंग काल में ही संस्कृत भाषा तथा हिंदू धर्म का पुनरुत्थान हुआ। इनके उत्थान में महर्षि पतंजलि का विशेष योगदान था।
➣ मथुरा के समीप मोरा नामक स्थान से प्राप्त प्रथम शताब्दी ईस्वी के लेख में तोस नामक विदेशी महिला द्वारा वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, साम्ब व अनिरूद्ध की मूर्तियों (पंचवृष्णि वीरों) की स्थापना का उल्लेख है। अतः शुंग काल भागवत धर्म के विकास के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है।
मनुस्मृति: वैदिक काल का प्रमुख धर्मग्रंथ
❑ मनुस्मृति (मानव धर्मशास्त्र) प्राचीन भारत का एक अत्यंत महत्वपूर्ण धर्मशास्त्र ग्रंथ है, जिसे समाज, कानून, नैतिकता और कर्तव्यों का संकलन माना जाता है।
❑ इस ग्रंथ में समाज को चार वर्णों में विभाजित किया गया है- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य,शूद्र। हर वर्ण के लिए अलग-अलग कर्तव्य और जिम्मेदारियाँ बताई गई हैं।
❑ मनुस्मृति के वर्तमान स्वरूप की रचना इसी युग में हुई है। मनुस्मृति के अनुसार ब्राह्मण को छोड़कर ‘राजा सबका शासक है। मनु भृगुवंश के थे।
❑ मनुस्मृति का अंग्रेजी अनुवाद N.B. हेलहेक ने A code of Zentoo Law के नाम से किया।
❑ अधिकारियों को भूमिदान के माध्यम से भुगतान को मान्यता देने वाली प्रथम कृति मनुस्मृति है।
❑ मनु ने विवाह को आजीवन चलने वाली संस्था कहा। मनु ने तलाक एवं पुनर्विवाह को मान्यता नहीं दी एवं मनु विधवाओं के मुण्डन का प्रावधान करते हैं।
स्तूप
➣ मौर्य काल में स्तूप कच्ची ईटों और मिट्टी की सहायता से बनते थे, परंतु शुंग काल में उनके निर्माण में पाषाण का प्रयोग किया गया है।
➣ साँची के स्तूप को पाषाण द्वारा संवर्धित कर उसका आकार बढ़ाया गया। भरहुत व बौधगया के स्तूपों व तोरण द्वारों का निर्माण शुंग काल में हुआ।
➣ कनिंघम महोदय ने 1873 ई. में भरहुत स्तूप का पता लगाया। उसकी वेष्टनी और तोरणद्वार अधिकांशतः शुंग कालीन थे।
➣ भरहूत स्तूप के पूर्वी तोरण द्वार पर शुंग शासक धनभूति का उल्लेख है। इन तोरण द्वारों पर जातक कथाओं का अंकन, लोक धर्म से संबंधित चित्र तथा गौतम बुद्ध से संबंधित चित्र प्राप्त होते हैं, किन्तु शुंग काल में बुद्ध का मनुष्य रूप में अंकन शुरू नहीं हुआ था।
➣ शुंग काल में बुद्ध का अंकन, स्तूप, धर्मचक्र, छत्र, बोधिवृक्ष, चरण चिह्न आदि माध्यम से किया गया।
- विदिशा का गरुणध्वज
- भाजा का चैत्य एवं विहार
- अजन्ता का नवाँ चैत्य मन्दिर
- नासिक तथा कार्ले के चैत्य
- मथुरा की अनेक यज्ञ-यक्षणियों की मूर्तियाँ
➣ शुंग वंश के इतिहास के बारे में जानकारी साहित्यिक एवं पुरातात्त्विक दोनों साक्ष्यों से प्राप्त होती है-
| पुराण (वायु और मत्स्य पुराण) | इससे पता वंश का संस्थापक पुष्यमित्र शुंग था। |
| हर्षचरित | इसकी रचना बाणभट्ट ने की थी।इससे पता चलता है कि पुष्यमित्र ने अंतिम मौर्य नरेश बृहदृथ की हत्या कर सिंहासन पर अधिकार कर लिया था। |
| पतंजलि का महाभाष्य | पतंजलि पुष्यमित्र के पुरोहित थे। इस ग्रंथ में यवनों के आक्रमण की चर्चा है। |
| गार्गी संहिता | इसमें भी यवन आक्रमण का उल्लेख है। यह एक ज्योतिष ग्रंथ है। |
| अयोध्या अभिलेख | इस अभिलेख को पुष्यमित्र शुंग के उत्तराधिकारी धनदेव ने लिखवाया था। इसमें पुष्यमित्र शुंग द्वारा कराए गए दो अश्वमेध यज्ञ की चर्चा है। |
| मालविकाग्निमित्रम् | यह कालिदास का नाटक है, जिससे शुंगकालीन राजनीतिक गतिविधियों का ज्ञान प्राप्त होता है। |
| दिव्यावदान | इसमें पुष्यमित्र शुंग को अशोक के 84,000 स्तूपों को तोड़ने वाला बताया गया है। |
| बेसनगर का अभिलेख | यह यवन राजदूत हेलियोडोरस का है जो गरुड़ स्तंभ के ऊपर खुदा है। इससे भागवत धर्म की लोकप्रियता का पता चलता है। |
| भरहुत का लेख | इससे भी शुंग काल के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। |
➣ उपर्युक्त साक्ष्यों के अतिरिक्त साँची, बेसनगर, बोधगया आदि स्थानों से प्राप्त स्तूप एवं स्मारक शुंगकालीन कला एवं स्थापत्य की विशिष्टता का ज्ञान कराते हैं।
➣ शुंग काल की कुछ मुद्राएँ कौशांबी, अहिच्छत्र, अयोध्या तथा मथुरा से प्राप्त हुई हैं, जिनसे तत्कालीन ऐतिहासिक जानकारी प्राप्त होती है।
कण्व-वंश ( लगभग 73-38 ई. पू.)
➣ शुंग वंश के अन्तिम सम्राट देवभूति की हत्या करके उसके सचिव वासुदेव ने 75 ई.पू. में कण्व वंश की नींव रखी। इस घटना का वर्णन हर्षचरित में मिलता है।
➣ शुंगों के समान यह भी एक ब्राह्मण वंश था। वैदिक धर्म एवं संस्कृति संरक्षण को जो परंपरा शुंगों ने प्रारंभ की थी, उसे कण्व वंश ने जारी रखा।
➣ वसुदेव के शासन काल में भारत की पश्चिमोत्तर सीमा में शक का आक्रमण हुआ था। जिनके कारण न केवल मगध साम्राज्य के सुदूरवर्ती जनपद ही साम्राज्य से निकल गये थे, बल्कि मगध के समीपवर्ती प्रदेशों में भी असमाजिकता फ़ैल गयी।
➣ वासुदेव ने कुल नौ वर्ष तक राज्य किया था। तदोपरान्त तीन राजा हुए- यथा- भूमिपुत्र, नारायण तथा सुशर्मा जिन्होंने क्रमश चौदह, बारह तथा दस वर्षों तक राज्य किया।
➣ सुशर्मा इस वंश का अन्तिम शासक था। वायु पुराण के अनुसार वह अपने आन्ध्रजातीय भृत्य सिमुक (सिन्धुक) द्वारा मार डाला गाया।जिसने कालांतर में सातवाहन वंश (30 ई.पू. से 250 ई.) वंश की नींव रखी।
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