Subject: भारतीय इतिहास

  • प्रागैतिहासिक काल | Q&A Practice

    ➣ क्या प्रागैतिहासिक काल में मानव जीवन सभ्य नहीं था। क्या इस काल में लिपि का आविष्कार हुआ था?
    उत्तर : नहीं

    ➣ भारत में पाषाणकालीन सभ्यता की खोज का कार्य सबसे पहले किस वर्ष आरम्भ हुआ?
    उत्तर : 1863 ई. में

    ➣ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के विद्वान राबर्ट ब्रूस फुट ने कहां से पूर्व पाषाण कालीन उपकरण प्राप्त किये?
    उत्तर : पल्लवरम् (मद्रास)

    ➣ पुरापाषाण काल को किस युग के नाम से जाना जाता है?
    उत्तर : शिकार व खाद्य संग्रह युग

    ➣ भारत में मानव के प्राचीनतम अस्तित्व का संकेत द्वितीय हिमावर्तन ग्लेसिएशन काल की परतों से प्राप्त उपकरणों से मिलता है, जिसका काल 250,000 ई. पू. बताया जाता है। उक्त उपकरण किससे निर्मित थे?
    उत्तर : पत्थर से

    ➣ बोरी नामक स्थल की खुदाई से प्राप्त नवीनतम जानकारी के आधार पर मानव का अस्तित्व 14 लाख वर्ष पहले से माना जा सकता है। यह स्थल भारत के किस राज्य में स्थित है?
    उत्तर : महाराष्ट्र

    ➣ पुरापाषाण युग को मानव द्वारा प्रयुक्त होने वाले हथियारों के स्वरूप और जलवायु में होने वाले परिवर्तनों के आधार पर कितने वर्गों में बांटा जा सकता है?
    उत्तर : तीन
    1. निम्न पुरा पाषाण युग (250,000 ई.पू. 1,00000 ई. पू.);
    2. मध्य पुरा पाषाण काल (1,00000-40,000 ई.पू.);
    3. उच्च पुरा पाषाण काल (40,000-10,000 ई.पू.)

    ➣ जुरैसिक काल का माना गया पूरी तरह तैयार वृक्षीय जीवाश्म कहां पाया गया है?
    उत्तर : छत्तीसगढ़ में

    ➣ किस संस्कृति को गड़ासा – खंडक, बटिकाश्म संस्कृति के नाम से भी जाना जाता है ?
    उत्तर : सोहन संस्कृति को

    ➣ मध्य पुरापाषाण काल को नैवासा चरण की संज्ञा दी गयी, क्योंकि इस काल के उच्च कोटि के औजार नैवासा नामक स्थान पर प्राप्त हुए थे। यह स्थान भारत के किस राज्य में स्थित है ?
    उत्तर : महाराष्ट्र में

    ➣ नैवासा के ही निकट किस स्थान से मध्य पुरापाषाणिक उद्योग एवं निवास के साक्ष्य मिलते हैं?
    उत्तर : चिरकी

    ➣ मध्य पुरापाषाण काल में क्वार्टजाइट पत्थरों के स्थान पर जैस्पर चर्ट, फ्लिंट आदि के पत्थर प्रयुक्त होने लगे। इस समय के औजार मुख्यतः किससे बनते थे?
    उत्तर : शल्क

    ➣ फलक, बेधनी, छेदनी, खुरचनी आदि किस काल के मुख्य औजार थे?
    उत्तर : मध्य पुरा पाषाण काल के

    ➣ मध्य पुरा पाषाण काल को फलकों की अधिकता के कारण किस अन्य काल के नाम से भी जाना जाता है?
    उत्तर : फलक संस्कृति

    ➣ भदणे किस काल का उपकरण है?
    उत्तर : उच्च पुरा पाषाण काल

    ➣ किस घाटी सभ्यता के लोहंदा नाले से से युक्त एक हड्डी की बनी मातृदेवी की मूर्ति मिली है?
    उत्तर : बेलन घाटी

    ➣ पटणे से किस पक्षी के तीन अंड कवकों पर आड़ी तिरछी रेखाओं अलंकरण है?
    उत्तर : शुतुरमुर्ग

    ➣ अग्नि का आविष्कार सर्वप्रथम किन्होंने किया?
    उत्तर : जावा मानव ने

    ➣ आदि मानव ने सबसे पहले क्या सीखा ?
    उत्तर : आग जलाना

    ➣ हस्तकुठार एवं विदारणी प्राचीन काल के सबसे परिचित उपकरण हैं। किसको प्रथम उपकरण निर्माता कहा जाता है?
    उत्तर : हैंडीमेन

    ➣ मध्य पाषाण काल (10,000 ई.पू. से 7000 ई.पू.) को किस अन्य युग के नाम से भी जाना जाता है?
    उत्तर : शिकार एवं पशुपालन युग

    ➣ किस काल में पहली बार मानव कंकालों को विधिवत रूप से दफन करने की प्रक्रिया शुरू हुई ?
    उत्तर : मध्य पाषाण काल में

    ➣ मध्य पाषाणिक प्रसंग (काल) में पशुपालन के प्रमाण कहां से प्राप्त हुए हैं?
    उत्तर : आदमगढ़, होशंगाबाद, मध्य प्रदेश और बागोर, भीलवाड़ा, राजस्थान

    ➣ मध्य पाषाणिक उद्योग मूलत: किस प्रकार के हैं?
    उत्तर : ज्यामितीय

    ➣ कहां पर मध्य पाषाण काल के 500 से अधिक चित्रित शैलाश्रय प्राप्त हुए हैं ?
    उत्तर : भीमबेटका

    ➣ भारत में मानव कंकाल किस युग से प्राप्त होते हैं?
    उत्तर : मध्य पाषाण युग से

    ➣ शिवालिक क्षेत्र से किसके जीवाश्म प्राप्त हुए हैं?
    उत्तर : रामापिथेकस

    ➣ कृषि की शुरुआत संभवतः कब हुई?
    उत्तर : 7000 ई.पू. के आस-पास

    ➣ किस काल में स्थिर जीवन, जनसंख्या वृद्धि, आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था, चाक का

    ➣ निर्माण एवं मृदभांड का प्रयोग, अग्नि का व्यापक उपयोग शुरू हुआ?
    उत्तर : नव पाषाण काल में

    ➣ मनुष्य ने वस्त्र निर्माण की कला किस काल में सीखी?
    उत्तर : नवपाषाण काल (7000-1000 ई. पू.)

    ➣ वर्ष 1860 में सर्वप्रथम किसने उत्तर प्रदेश में टोंस नदी के किनारे उत्तर पाषाण कालीन सेल्ट प्राप्त किया ?
    उत्तर : ली मसुरियर

    ➣ वर्ष 1872 में फ्रेजर ने किस स्थान को दक्षिण भारत का उत्तर पाषाण कालीन सभ्यता का प्रमुख स्थल घोषित किया?
    उत्तर : बेलारी को

    ➣ नवपाषाण काल (7000-1000 ई. पू.) को किस अन्य नाम से भी जाना जाता है?
    उत्तर : अन्न उत्पादक युग के नाम से

    ➣ किस स्थल से 5000 ई. पूर्व का कृषि जन्य गेहूं और जौ की विभिन्न किस्में प्राप्त हुई हैं?
    उत्तर : मेहरगढ़

    ➣ भारत में पशुपालन एवं कृषि के प्राचीनतम साक्ष्य कहाँ से प्राप्त हुए हैं?
    उत्तर : मेहरगढ़ से

    ➣ धान्यों की खेती प्रथम किस काल में प्रारंभ हुई ?
    उत्तर : नवप्रस्तर काल

    ➣ मानव द्वारा सर्वप्रथम प्रयुक्त अनाज कौन-सा था?
    उत्तर : जौ

    ➣ व्यक्ति भोजन इकट्ठा करने वाली अवस्था से भोजन उत्पादन वाली अवस्था में किस युग में पहुंचा?
    उत्तर : नवपाषण युग में

    ➣ नव पाषाणकाल के लोगों द्वारा पाला गया प्रथम पशु कौन था ?
    उत्तर : कुत्ता

    ➣ भारत में किस क्षेत्र से वन्य और कृषिजन्य चावल का प्रमाण मिला है, जो चावल का सबसे पुराना साक्ष्य है ?
    उत्तर : बेलन घाटी (उत्तर प्रदेश) स्थित कोल्डिहवा से

    ➣ चावल का सबसे पुराना प्राप्त साक्ष्य धान की किस्म किस नाम से जानी जाती है?
    उत्तर : ओराइजा सटाइवा

    ➣ बेलन घाटी के किस स्थल से स्तंभगर्त भी प्राप्त हुआ है?
    उत्तर : कोल्डिहवा

    ➣ हड़प्पा सभ्यता में लिपि का आविष्कार हो चुका था, क्या उसे पढ़ा जा सका है?
    उत्तर : नहीं

    ➣ हड़प्पा सभ्यता को किस काल का माना गया है?
    उत्तर : आद्य ऐतिहासिक का

    ➣ मानव द्वारा प्रयुक्त पहली धातु कौन-सी थी?
    उत्तर : तांबा ( Copper)

    ➣ किस काल में मनुष्य ने पत्थर एवं तांबे के औजारों का साथ-साथ प्रयोग किया?
    उत्तर : ताम्र-पाषाण काल (Chalcolithic Age) में

    ➣ ताम्रपाषाण संस्कृति को अन्य किस नाम से भी जाना जाता है?
    उत्तर : सैंधव-पूर्व सभ्यता

    ➣ ताम्र-पाषाण काल के लोग मुख्यतः किस समुदाय से संबंधित धे?
    उत्तर : ग्रामीण समुदाय से

    ➣ ताम्राश्म या ताम्र-पाषाण काल में महाराष्ट्र के लोग मृतकों को घर के फर्श के नीचे किस तरह रखकर दफनाते थे?
    उत्तर : उत्तर से दक्षिण की ओर

    ➣ भारत में ताम्र पाषाण अवस्था के मुख्य क्षेत्र दक्षिण-पूर्वी राजस्थान (आहार एवं गिलुंद), पश्चिमी मध्य प्रदेश (मालवा, कायथा एवं एरण), पश्चिमी महाराष्ट्र एवं दक्षिण पूर्वी भारत हैं। इनमें से किस स्थल के मृद्धांड ताम्र पाषाणिक मृदभांडों में सर्वोत्कृष्ट माने जाते हैं?
    उत्तर : मालवा

    ➣ आहार का प्राचीन नाम तांबवती है। किसको इस संस्कृति का स्थानीय केंद्र माना जाता है ?
    उत्तर : गिलुंद

    ➣ जोर संस्कृति ग्रामीण थी। इससे संबंधित सबसे बड़ा स्थल किस को माना जाता है?
    उत्तर : दैमाबाद

    ➣ दैमाबाद से बड़ी मात्रा में किस प्रकार की वस्तुएं मिली हैं?
    उत्तर : कांसे की वस्तुएं

    ➣ 1200 ई.पू. के लगभग ताम्र पाषाणिक संस्कृति का लोप हो गया। केवल जोरवे संस्कृति कब तक जीवित रही?
    उत्तर : 700 ई.पू. तक

    ➣ ताम्र पाषाणिक काल में किस प्रकार के मृदभांडों का प्रयोग होता था?
    उत्तर : चाक पर बने काले एवं लाल मृदभांडों का

    ➣ चित्रित मृदभांडों का प्रयोग सर्वप्रथम किस काल के लोगों ने किया?
    उत्तर : ताम्र पाषाणिक काल

    ➣ नवदाटोली से किस तरह की वस्तुएं के सबसे बड़े ढेर मिले हैं?
    उत्तर : अनाज

  • पाषाणकालीन सभ्यता | One-Liner Practice

    📚 विषय सूची

    पुरापाषाण काल (शिकार एवं खाद्य संग्रह युग)

    ❑ भारत में मानव के प्राचीनतम अस्तित्व का संकेत द्वितीय हिमावर्त्तन (ग्लेसिएशन) काल की परतों से प्राप्त पत्थर के उपकरणों से मिलता है, जिसका काल 25,00,000 ई.पू. बताया जाता है।

    ❑ आदिम मानव को धातुओं का ज्ञान नहीं था, उसके पास निश्चित घरों का अभाव था। जानवरों का भय बराबर बना रहता था।

    ❑ खेती करना, आग जलाना और बर्तन बनाने की कला का ज्ञान नहीं था।

    ❑ वे शिकार द्वारा जानवरों के मांस और ऐसे फलों एवं सब्जियों, कंद-मूलों (खाद्य संग्रह) पर जीवन व्यतीत करते थे, जो जंगलों में उपजाते थे।

    ❑ पुरापाषाण युग को मानव द्वारा प्रयुक्त होने वाले हथियारों के स्वरूप और जलवायु में होने वाले परिवर्तनों के आधार पर तीन वर्गों में बाँटा जा सकता है-
    1. पूर्व पुरापाषाण युग (2500000 ई.पू.-100000 ई.पू.) ।
    2. मध्य पुरापाषाण युग (100000 ई.पू.- 40000 ई.पू.
    3. उत्तर पुरा पाषाण युग (40000 ई.पू.- 10000 ई. पू.)।

    ❑ अधिकांश हिमयुग आरम्भिक पुरापाषाण युग में ही व्यतीत हुआ है। इसका प्रमाण है-कुल्हाड़ी या हस्त-कुठार (हैंड-एक्स), विदारणी (क्लीवर) और गंडासा (खंडक) का उपयोग।

    ❑ भारत में प्राप्त हुई प्रस्तर कुल्हाड़ियाँ प्रायः पश्चिम एशिया, यूरोप एवं अफ्रीका से प्राप्त कुल्हाड़ियों जैसी ही हैं।

    ❑ निम्न पुरापाषाण युग के अधिसंख्य स्थल, सिंधु नदी की सहायक सोहन नदी की घाटी (सम्प्रति पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में) में पाये गये हैं। पहली बार सोहन क्षेत्र से सम्बन्धित साक्ष्य मिलने के कारण इसे सोहन संस्कृति की संज्ञा भी दी गयी है।

    ❑ अनेक स्थल कश्मीर तथा थार के मरुस्थल (डिडवाना क्षेत्र) में भी मिले हैं। निम्न पुरापाषाणकालीन हथियार मिर्जापुर जिले की बेलनघाटी (उ.प्र.) एवं भीमबेटका की गुहाओं (भोपाल म.प्र.) में भी मिले हैं।

    ❑ इस युग में प्रस्तर शल्कों से निर्मित विभिन्न प्रकार के फलक, वेधनी, छेदनी और खुरचनी का प्रयोग होता था। जो सम्पूर्ण भारत में पाये गये हैं।

    ❑ इस युग का शिल्प कौशल नर्मदा नदी के किनारे-किनारे अनेक स्थानों पर और तुंगभद्रा नदी के दक्षिणवर्ती स्थानों पर भी पाया जाता है।

    ❑ इस युग में आर्द्रता कम हो गयी थी और जलवायु अपेक्षाकृत गर्म होते जाने से हिमयुग की अंतिम अवस्था आरम्भ हो चुकी थी। इसी युग में आधुनिक प्रारूप के मानव (होमोसेपियन्स) का आविर्भाव हुआ।

    ❑ इस युग के प्रस्तर फलक और कुल्हाड़ियाँ आंध्र, कर्नाटक, महाराष्ट्र, केन्द्रीय मध्य प्रदेश, दक्षिण उत्तर प्रदेश, पूर्व विहार (वर्तमान झारखंड) के पठारी भाग में पाये गये हैं।

    ❑ गुजरात के टिब्बों के ऊपरी तलों पर एक उच्च पुरापाषाणीय भंडार भी मिला है, जिसमें शल्क फलक, तक्षणियाँ और खुरचनियाँ सम्मिलित हैं।

    मध्य पाषाण काल (9000 ई.पू. – 4000 ई.पू.) (शिकार एवं पशुपालन युग)

    ❑ मध्य पाषाणकालीन मानव शिकार करके मछली पकड़ कर तथा जंगली कंद-मूल का संग्रह कर उसी से अपना पेट भरते थे।

    ❑ इस युग के प्रस्तर उपकरणों परिष्कार आया और उनका आकार भी छोटा हो गया। इस मध्यवर्तीकाल को उत्तर पाषाण युग या Mesolithic Age भी कहा जाता है।

    ❑ मध्य पाषाण-कालीन स्थल राजस्थान, दक्षिणी उ.प्र., मध्यपूर्वी भारत तथा कृष्णा नदी के दक्षिण में बहुतायत से पाये गये हैं। यहाँ पर मानव बस्ती 5000 वर्षों तक रही।

    ❑ मध्य प्रदेश में आदमगढ़ और राजस्थान का बागोर पशुपालन का प्राचीनतम प्रमाण प्रस्तुत करते हैं, जिसका समय 5000 ई.पू. हो सकता है।

    ❑ मध्य पाषाण कालीन महादहा (उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले) से बड़ी मात्रा में हड्डी एवं सींग निर्मित उपकरण प्राप्त हुए हैं।

    नव पाषाण काल (7000-1000 ई.पू.) (अन्न उत्पादक युग)

    ❑ विश्व के संदर्भ में नव पाषाण युग (Neolithic Age) का आरम्भ 9000 ई.पू. में आरम्भ होता है लेकिन ब्लूचिस्तान के मेहरगढ़ में एक ऐसी प्राचीन भारतीय बस्ती (सम्प्रति पाकिस्तान) मिली है, जिसका समय 7000 ई.पू. बताया जाता है।

    ❑ इस युग के लोग पॉलिशदार पाषाण हथियारों का प्रयोग करते थे। वे विशेष रूप से पत्थर की कुल्हाड़ियाँ प्रयुक्त करते थे, जो देश के पहाड़ी क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में पायी गयी हैं।

    ❑ नवपाषाण युग के निवासियों को सबसे पहले अन्न उगाने का श्रेय जाता है। कृषि कार्य की प्रक्रिया में वे पत्थर की कुदालों और नुकीले पाषाण डंडों जमीन तोड़ते थे।

    ❑ पॉलिशदार पाषाण हथियारों के अतिरिक्त वे सूक्ष्म पाषाण फलकों का भी प्रयोग करते थे। वे मिट्टी और सरकंडे से निर्मित गोलाकार तथा आयताकार घरों में निवास करते थे।

    ❑ इस युग में लोग घर बनाकर स्थायी रूप से रहना सीख गये थे; बुर्जाहोम, (कश्मीर) तथा चिंराद (छपरा, सारण) में पाषाणयुगीन लोग पॉलिशदार पाषाण उपकरणों के अतिरिक्त बड़ी मात्रा में हड्डियों से निर्मित उपकरणों का भी प्रयोग करते थे।

    ❑ बुर्जाहोम के लोग धूसर मृद्भांडों का प्रयोग करते थे। यहाँ कब्रों में पालतू कुत्ते भी अपने मालिकों के शवों के साथ दफनाये जाते थे। यह प्रथा भारत के अतिरिक्त अन्य कहीं नहीं पायी गयी है।

    ❑ इस काल के लोग कृषि के अतिरिक्त पशुपालन भी करते थे। वे गाय, बैल, भेड़ एवं बकरी पालते थे।

    ❑ मेहरगढ़ के नव पाषाणीय लोग गेहूँ, जौ और रूई उपजाते थे, जबकि इलाहाबाद के पास कोल्डिहवा से चावल उगाने का प्रमाण मिलता है।

    ❑ नवपाषाण कालीन अनेक स्थायी निवासियों को कृषि कार्य के कारण अनाज रखने तथा पकाने, खाने और पीने के लिए बर्तनों की आवश्यकता महसूस हुई। अतः कुम्भकारी सर्वप्रथम इसी युग में परिलक्षित होती है।

    ❑ यहाँ आरम्भ में हाथ से मृद्भांड निर्मित होते थे, बाद में मिट्टी के अधि कांश बर्तन चाक पर बनने लगे। इनमें पॉलिशयुक्त काला मृद्भांड, धूसर मृद्भांड एवं मन्द वर्ण मृद्भांड सम्मिलित हैं।

    ❑ नवपाषाण युगीन सेल्ट, कुल्हाड़ियां, बसूले, छेनी आदि उपकरण उड़िसा (ओडिशा) और छोटानागपुर (झारखंड) के पहाड़ी क्षेत्रों में भी पाये गये हैं।

    ❑ कालान्तर में मानव को लोहे का ज्ञान हो गया तो उसकी चरम उन्नति का मार्ग भी प्रशस्त हो गया।

    ❑ लोहे के फल से युक्त हलों के कारण मैदानी इलाकों में वनों को काट कर खेत बनाना और गहरी जुताई करना संभव हो गया, जिससे अधिशेष उत्पादन होने लगा और नगरीय जीवन का आरम्भ हो सका।

    ताम्र पाषाण काल (Chalcolithic Age)

    ❑ नव पाषाण युग का अंत होते-होते धातुओं का प्रयोग आरम्भ हो गया था। पत्थर के साथ-साथ पहली धातु के रूप में ताँबे के उपकरणों का भी प्रयोग होने लगा था।

    ❑ ताम्रपाषाण युग को चालकोलिथिक युग भी कहा जाता है।

    ❑ ताम्र पाषाणकालीन लोग मुख्यतः ग्रामीण समुदाय के थे और देश के ऐसे भागों में फैले थे, जहाँ पहाड़ी जमीन और नदियां थीं।

    ❑ भारत में इस अवस्था से सम्बद्ध स्थल दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, पश्चिमी मध्य प्रदेश, पश्चिमी महाराष्ट्र तथा दक्षिण-पूर्वी भारत में पाये गये हैं।

    ❑ राजस्थान में अहार और गिलुंड में उत्खनन हुआ है, जो बनास घाटी के सूखे भागों में स्थित हैं।

    ❑ पश्चिमी मध्यप्रदेश में मालवा, कयथा और एरण में उत्खनन हुआ है। मालवा से प्राप्त मृद्भांडों को ताम्र पाषाणीय मृद्धांडों में उत्कृष्ट माना गया है।

    ❑ पश्चिमी महाराष्ट्र के जोरवे, नेवासा एवं दैमाबाद (अहमदनगर); चंदोली, सोनगाँव, इनामगाँव, झामगाँव, प्रकाश और नासिक में विस्तृत उत्खनन किए गये हैं। ये सभी स्थल जोरवे संस्कृति के हैं।

    ❑ अहार संस्कृति का काल 2100 ई.पू.-1500 ई.पू. माना जाता है।

    ❑ ताम्र पाषाण युग के लोग गाय, भेड़, बकरी, सुअर और भैंस पालते थे। हिरण का शिकार करते थे।

    ❑ ऊँट के अवशेष भी मिले हैं। यह स्पष्ट नहीं होता कि वे घोड़े से परिचित थे या नहीं।

    ❑ वे गेहूँ, चावल, बाजरा, मसूर, उड़द, मूँग, मटर, रागी (मडुवा), अलसी तथा कपास उगाते थे।

    ❑ वे अपना घर गीली मिट्टी थोप कर बनाते थे, अहार के लोग पत्थर से बने घरों में रहते थे।

    ❑ वे ताँबे का शिल्प कर्म और पत्थर का कार्य भी करते थे। पत्थरों के मनके या गुटिकायें भी बनाते थे। वस्त्र निर्माण से भी वे सुपरिचित थे।

    ❑ लोग मृतक को अस्थिकलश में रखकर अपने घर में फर्श के नीचे उत्तर-दक्षिण स्थिति में गाड़ते थे।

    ❑ ताम्रपाषाणीय लोग मातृ देवी की पूजा करते थे। अनेक कच्ची मिट्टी की नग्न पुतलियाँ भी पूजी जाती थीं।

    ❑ इस सभ्यता की खुदाई से प्राप्त ताम्र वस्तुयें हैं-तीर के नोक, बरछे के फल, बॅसियाँ, सेल्ट, कंगन, छेनी आदि।

    ❑ यहाँ गैरिक मृद्भांड (OCP) भी पाया गया है। यह एक लाल अनुलेपित भांड है जो अक्सर काले रंग से रंगा होता है और प्रायः कलश के आकार में होता है।

    ❑ तिथिक्रम की दृष्टि से भारत में ताम्रपाषाणीय बस्तियों की अनेक शृंखलायें हैं। कुछ प्राक् हड़प्पीय हैं, कुछ हड़प्पाकालीन, तो कुछ हड़प्पेत्तर।

    ❑ राजस्थान का कालीबंगा और हरियाणा का बनवाली प्राक् हड़प्पीय ताम्र-पाषाणिक अवस्था है।

    ❑ कोटदीजी और कयथा की संस्कृति हड़प्पाकालीन है।

    ❑ ताम्रपाषाणीय संस्कृतियाँ 1200 ई.पू तक बनी रही। इसके लुप्त होने का कारण 1200 ईपू के बाद से वर्षा की मात्रा में कमी आना माना जाता है।

    ❑ वे लघु पाषाण उपकरणों के साथ ताँबे के उपकरण भी प्रयुक्त करते थे। वे चाकों पर बने काले-लाल मृद्भांडों का प्रयोग करते थे।

    ❑ उनकी प्राक् कांस्य अवस्था से लगता है कि उन्होंने सर्वप्रथम चित्रित मृद्भांडों का प्रयोग किया। वे पकाने, खाने, पीने और समान रखने के लिए इन मृद्भांडों का प्रयोग करते थे।

    ❑ ताम्र पाषाण काल में पशुपालन-गाय, भेड़, बकरी, सुअर, भैंस, हिरण, ऊँट।

    ❑ कयथा (मालवा) और एरण (मध्य भारत) उनकी सबसे पुरानी बस्तियाँ हैं। उन्होंने ही सर्वप्रथम बड़े-बड़े गाँव बसाये।

    ❑ ताम्र पाषाणीय लोग पशुपालन का सदुपयोग नहीं कर सके। वे विस्तृत कृषि भी न कर सके। हल और फावड़ा न होने से वे केवल झूम खेती कर पाते थे।

    ❑ कांसे के उपकरणों के प्रयोग से क्रीट, मिस्र, मेसोपोटामिया और सिंधु में घाटी भी प्राचीनतम सभ्यताओं के विकास में सहायता मिली।

    ❑ ताम्र पाषाणीय लोग लिखने की कला नहीं जानते थे और न ही वे नगरों में रहते थे, जबकि कांस्ययुगीन लोग नगरवासी हो गये थे।

    ❑ नवदाटोली, मध्य प्रदेश का एक महत्पवूर्ण ताम्रपाषाणिक पुरास्थल है जो इंदौर के निकट स्थित है। यहाँ से मिट्टी, बांस तथा फूस के बने चौकोर एवं वृत्ताकार घर मिले हैं।

  • पाषाण काल (2500 ईसा पूर्व) MCQ प्रश्न | UPSC

    1.भारत में मानव का सर्वप्रथम साक्ष्य कहां मिला है?
    (a) नीलगिरि
    (b) शिवालिक पहाड़ियां
    (c) नल्लगाला पहाड़ियां
    (d) नर्मदा घाटी
    Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2006
    उत्तर-(d)
    भारत में आदि मानव का सबसे पुराना ज्ञात साक्ष्य मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले में नर्मदा नदी के किनारे स्थित ‘हथनौरा’ नामक स्थल से मिला है। यह खोज प्रसिद्ध भारतीय पुरातत्वविद् डॉ. अरुण सोनकिया ने 5 दिसंबर, 1982 को की थी। प्राप्त जीवाश्म एक कपाल (Skull Cap) का था जिसे ‘नर्मदा मानव’ (Narmada Man) या होमो इरेक्टस नर्मदेंसिस कहा जाता है। यह जीवाश्म लगभग 2.5 से 5 लाख वर्ष पुराना माना जाता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: नर्मदा घाटी में पाषाणकालीन औजारों के भी प्रचुर साक्ष्य मिले हैं, जो इस क्षेत्र में मानव बसाव की प्राचीनता को और पुष्ट करते हैं।
    2. खाद्यान्नों की कृषि सर्वप्रथम प्रारंभ हुई थी
    (a) नवपाषाण काल में
    (b) मध्यपाषाण काल में
    (c) पुरापाषाण काल में
    (d) प्रोटोऐतिहासिक काल में
    U.P.P.C.S. (Mains ) 2005
    उत्तर-(a)
    खाद्यान्नों की कृषि का सर्वप्रथम प्रारंभ नवपाषाण काल (Neolithic Age) में हुआ। इसी युग में मनुष्य ने भोजन के लिए शिकार और संग्रह पर निर्भरता छोड़कर स्थायी कृषि जीवन अपनाया, जिसे ‘नवपाषाण क्रांति’ या ‘कृषि क्रांति’ भी कहते हैं। भारत में नवपाषाण काल के कृषि के प्रमाण मेहरगढ़ (वर्तमान पाकिस्तान, लगभग 7000 ई.पू.) से गेहूँ और जौ की खेती के रूप में मिलते हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:दक्षिण भारत में कर्नाटक के पिकलीहल और टेक्कलकोट जैसे नवपाषाणकालीन स्थलों से रागी व अन्य अनाज उगाए जाने के साक्ष्य भी प्राप्त हुए हैं।
    3.एक ही कब्र से तीन मानव कंकाल निकले हैं-
    (a) सराय नाहर राय से
    (b) दमदमा से
    (c) महदहा से
    (d) लंघनाज से
    U.P.P.C.S. (Pre) 2016
    उत्तर-(b)
    उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में स्थित दमदमा एक महत्त्वपूर्ण मध्यपाषाणकालीन स्थल है। यहाँ पाँच वर्षों तक किए गए उत्खनन में पश्चिमी व मध्यवर्ती क्षेत्रों से कुल 41 मानव शवाधान (burials) मिले। इनमें से 5 शवाधान युग्म (दो कंकाल एक साथ) थे और एक विशेष शवाधान में तीन मानव कंकाल एक ही कब्र में दफनाए हुए पाए गए। दमदमा, सराय नाहर राय और महदहा — ये तीनों स्थल मध्य गंगा घाटी की मेसोलिथिक सभ्यता के प्रमुख केंद्र हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:दमदमा से प्राप्त शवाधानों में मृतकों के साथ पशु अस्थियाँ और सूक्ष्मपाषाण उपकरण (microliths) भी रखे मिले, जो तत्कालीन अंत्येष्टि प्रथाओं पर प्रकाश डालते हैं।
    4.उत्खनित प्रमाणों के अनुसार, पशुपालन का प्रारंभ हुआ था-
    (a) निचले पूर्वपाषाण काल में
    (b) मध्य पूर्वपाषाण काल में
    (c) ऊपरी एवं पाषाण काल में
    (d) मध्यपाषाण काल में
    U.P.P.C.S. (Mains) 2006
    उत्तर-(d)
    उत्खनन से प्राप्त साक्ष्यों के अनुसार पशुपालन का आरंभ मध्यपाषाण काल के अंतिम चरण में हुआ। भारत में इसके प्रमाण मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले में स्थित आदमगढ़ तथा राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में स्थित बागोर नामक स्थलों से मिले हैं, जो लगभग 5000 ई.पू. से 2000 ई.पू. के बीच के हैं। यहाँ गाय, भेड़, बकरी जैसे पशुओं की हड्डियाँ बड़ी मात्रा में पाई गई हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:उल्लेखनीय तथ्य यह है कि बागोर स्थल को भारत में पशुपालन का सबसे प्राचीन केंद्र माना जाता है और यहाँ से प्राप्त साक्ष्य लगभग 5000-6000 ई.पू. तक के हैं, जो इसे एशिया के प्राचीनतम पशुपालन स्थलों में से एक बनाते हैं।
    5. कोपेनहेगन संग्रहालय की सामग्री से पाषाण, कांस्य और लौह युग का त्रियुगीय विभाजन किया था –
    (a) थॉमसन ने
    (b) लुब्बाक ने
    (c) टेलर
    (d) चाइल्ड ने
    U.P.P.C.S. (Pre) 2010
    उत्तर-(a)
    डेनमार्क के कोपेनहेगन संग्रहालय की पुरातात्विक सामग्री के आधार पर पाषाण, कांस्य और लौह युग का त्रियुगीय (Three-Age System) वर्गीकरण डेनिश पुरातत्वविद् क्रिश्चियन जर्गेनसन थॉमसन (Christian Jürgensen Thomsen) ने किया था। थॉमसन ने 1836 ई. में अपनी पुस्तक ‘Ledetraad til Nordisk Oldkyndighed’ में इस वर्गीकरण को औपचारिक रूप से प्रकाशित किया। बाद में जॉन लुब्बाक ने 1865 में अपनी पुस्तक ‘Pre-Historic Times’ में पाषाण काल को आगे पुरापाषाण (Palaeolithic) और नवपाषाण (Neolithic) काल में विभाजित किया, जो आधुनिक पुरातत्व का आधार बना।
    6. हड्डी से निर्मित आभूषण भारत में मध्यपाषाण काल के संदर्भ में प्राप्त हुए हैं-
    (a) सराय नाहर राय से
    (b) महदहा से
    (c) लेखहिया से
    (d) चोपनी मांडो से 95
    U.P.R.O. / A.R.O. (Mains) 2013
    उत्तर-(a&b)
    उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में स्थित सराय नाहर राय और महदहा दोनों मध्यपाषाणकालीन स्थलों से हड्डी निर्मित आभूषण मिले हैं। महदहा के ‘बूचड़खाना संकुल क्षेत्र’ से विशेष रूप से हड्डी व सींग से बने उपकरण और आभूषण बड़े पैमाने पर पाए गए हैं। महदहा का उत्खनन इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रो. जी. आर. शर्मा के निर्देशन में हुआ था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: उल्लेखनीय है कि इन स्थलों पर पाए गए हड्डी के मनके (bone beads) और पेंडेंट इस बात के प्रमाण हैं कि मध्यपाषाण काल में भी मनुष्यों में सौंदर्य-बोध और आत्म-अलंकरण की प्रवृत्ति विद्यमान थी, जो मानव सांस्कृतिक विकास की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
    7. मध्यपाषाणिक प्रसंग में पशुपालन के प्रमाण जहां मिले, वह स्थान है-
    (a) लंघनाज
    (b) बीरभानपुर
    (c) आदमगढ़
    (d) चोपनी मांडो
    U.P.P.C.S. (Spl.) (Pre) 2008
    उत्तर-(c)
    मध्यपाषाण काल में पशुपालन के पुरातात्विक साक्ष्य मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले में स्थित आदमगढ़ तथा राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में स्थित बागोर से प्राप्त हुए हैं। आदमगढ़ से गाय, भैंस, भेड़, बकरी तथा कुत्ते की हड्डियाँ मिली हैं जो पशुपालन की ओर संकेत करती हैं। विशेष तथ्य यह है कि लंघनाज (गुजरात) भी एक महत्त्वपूर्ण मध्यपाषाणकालीन स्थल है, जहाँ से मानव कंकाल तथा सूक्ष्मपाषाण (microliths) उपकरण मिले हैं, परंतु वहाँ पशुपालन के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिले।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:चोपनी मांडो (इलाहाबाद, उ.प्र.) भारत का एकमात्र ऐसा स्थल है जहाँ हस्तनिर्मित मृद्भांड (handmade pottery) के साथ-साथ मध्यपाषाणकालीन उपकरण एक साथ पाए गए हैं।
    8.रॉबर्ट ब्रूस फुट थे, एक-
    (a) भूगर्भ-वैज्ञानिक
    (b) पुरातत्वविद्
    (c) पुरावंस्पतिशास्त्री
    (d) इतिहासकार
    U.P. Lower Sub. (Pre) 2015
    उत्तर-(a&b)
    इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका के अनुसार रॉबर्ट ब्रूस फुट (1834–1912) ब्रिटिश भूगर्भ-वैज्ञानिक (Geologist) और पुरातत्वविद् (Archaeologist) दोनों थे। वे भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (Geological Survey of India) से संबद्ध थे और उन्होंने 1863 ई. में मद्रास के निकट पल्लवरम् (Pallavaram) नामक स्थल पर भारत का पहला पुरापाषाणकालीन पत्थर का हाथ-कुल्हाड़ी (hand axe) उपकरण खोजकर भारत में पाषाणकालीन संस्कृति के अध्ययन की नींव रखी। इसीलिए रॉबर्ट ब्रूस फुट को ‘भारतीय पाषाण काल के जनक’ (Father of Indian Prehistory) की संज्ञा दी जाती है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:उन्होंने अपने जीवन में 460 से अधिक पाषाणकालीन स्थलों की पहचान की।
    9. निम्नलिखित में से किस स्थल से हड्डी के उपकरण प्राप्त हुए
    (a) चोपनी मांडो से
    (b) काकोरिया से
    (c) महदहा से
    (d) सराय नाहर राय से
    U.P.P.C.S. (Mains) 2010
    उत्तर-(c&d)
    मध्यपाषाणकालीन स्थल महदहा (उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में) से बड़ी संख्या में हड्डी और सींग से निर्मित उपकरण प्राप्त हुए हैं। प्रो. जी. आर. शर्मा ने महदहा को तीन क्षेत्रों में विभाजित किया — झील क्षेत्र, बूचड़खाना संकुल क्षेत्र और कब्रिस्तान-निवास क्षेत्र। बूचड़खाना क्षेत्र से ही सर्वाधिक हड्डी के उपकरण और आभूषण पाए गए हैं। सराय नाहर राय से भी अल्प मात्रा में हड्डी के उपकरण मिले हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:उल्लेखनीय है कि महदहा से प्राप्त हड्डी के उपकरणों में बाण की नोकें (bone points), सुइयाँ और खुरचनी (scrapers) प्रमुख हैं, जो शिकार और चर्म-शोधन जैसी गतिविधियों के प्रमाण हैं। ये उपकरण लगभग 8000–5000 ई.पू. काल के माने जाते हैं।
    10. प्रथम मानव जीवाश्म भारत की किस नदी घाटी से प्राप्त हुआ था?
    (a) गंगा नदी
    (b) यमुना घाटी
    (c) नर्मदा घाटी
    (d) ताप्ती घाटी
    (e) कोई नहीं / उपर्युक्त में से एक से अधिक
    66th B.P.S.C. Re-Exam 2020
    उत्तर-(c)
    भारत में प्रथम मानव जीवाश्म नर्मदा घाटी (मध्य प्रदेश) के हथनौरा स्थल से प्राप्त हुआ था। यह जीवाश्म एक मानव कपाल का टुकड़ा (Skull Cap) है, जिसे ‘नर्मदा मानव’ या वैज्ञानिक भाषा में होमो इरेक्टस नर्मदेंसिस कहा जाता है। यह भारत में पाए गए होमो इरेक्टस (Homo Erectus) का एकमात्र ज्ञात जीवाश्म है और इसे लगभग 2,50,000 से 5,00,000 वर्ष पुराना माना जाता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:इस खोज का विशेष महत्त्व यह है कि इसने यह सिद्ध किया कि भारतीय उपमहाद्वीप में मानव विकास की प्रक्रिया अत्यंत प्राचीन काल से चली आ रही है। नर्मदा घाटी को भारत की ‘सांस्कृतिक पालना’ (Cradle of Indian Civilization) भी कहा जाता है क्योंकि यहाँ पाषाण काल से लेकर ऐतिहासिक काल तक के निरंतर मानव बसाव के साक्ष्य मिले हैं।
    11. निम्नलिखित में से किसको चालकोलिथिक युग भी कहा जाता है ?
    (a) पुरापाषाण युग
    (b) नवपाषाण युग
    (c) ताम्रपाषाण युग
    (d) लौह युग
    44th B.P.S. C. (Pre) 2000
    उत्तर-(c)
    ताम्रपाषाण युग को चालकोलिथिक (Chalcolithic) युग भी कहते हैं। यह नाम दो ग्रीक शब्दों — ‘Chalcos’ (तांबा) और ‘Lithos’ (पत्थर) — से मिलकर बना है। यह काल पाषाण युग और कांस्य युग के बीच का संक्रमण काल था, जिसमें मनुष्य ने पहली बार धातु (तांबे) का उपयोग पत्थर के औजारों के साथ-साथ शुरू किया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:भारत में ताम्रपाषाण संस्कृतियों के प्रमुख स्थल अहाड़ (राजस्थान), कायथा (मध्य प्रदेश), जोर्वे (महाराष्ट्र) और मालवा (मध्य प्रदेश) हैं। तांबा विश्व में मानव द्वारा उपयोग की गई पहली धातु मानी जाती है, जिसका उपयोग लगभग 9000 ई.पू. में पश्चिम एशिया में शुरू हुआ था।
    12. भारतीय उपमहाद्वीप में कृषि के प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुए हैं-
    (a) लोथल
    (b) हड़प्पा
    (c) मेहरगढ़
    (d) मुंडिगाक
    U.P.P.C.S. (Mains) 2007
    उत्तर-(c)
    मेहरगढ़ पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में बोलान दर्रे के पास कच्छी मैदान में स्थित है। यहाँ से लगभग 7000 ई.पू. के गेहूं और जौ की खेती के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं, जो भारतीय उपमहाद्वीप में कृषि की प्राचीनतम जानकारी देते हैं। यहाँ के निवासी पशुपालन भी करते थे और मिट्टी की कच्ची ईंटों से मकान बनाते थे।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:मेहरगढ़ की खुदाई 1974 में फ्रांसीसी पुरातत्वविद् Jean-François Jarrige के नेतृत्व में शुरू हुई थी। यह स्थल सिंधु घाटी सभ्यता का पूर्वज माना जाता है, क्योंकि यहाँ से सिंधु सभ्यता की अनेक विशेषताओं जैसे मिट्टी के बर्तन, मूर्तियाँ और कृषि के प्रारंभिक रूप देखने को मिलते हैं।
    13. आहड़ सभ्यता के बारे में निम्न कथनों पर विचार कीजिए-
    1. आहड़वासी तांबा गलाना जानते थे।
    2. ये लोग चावल से परिचित नहीं थे।
    3. धातु का काम आहड़वासियों की अर्थव्यवस्था का एक साधन था।
    4. यहां से काले-लाल रंग के मृद्भांड मिले हैं, जिन सामान्यतः सफेद रंग से ज्यामितीय आकृतियां उकेरी हैं। सही विकल्प का चयन कीजिए-
    (a) 1, 3 एवं 4 सही हैं।
    (b) 1 एंव 2 सही हैं।
    (c) 1, 2 एवं 3 सही हैं।
    (d) 3 एवं 4 सही हैं।
    R.AS. / R.T.S. (Pre) 2021
    उत्तर-(a)
    अहाड़ दक्षिण-पूर्वी राजस्थान के उदयपुर जिले में बेड़च नदी के किनारे स्थित एक प्रमुख ताम्रपाषाणिक संस्कृति का स्थल है। यहाँ के निवासी गेहूं, जौ और चावल की खेती करते थे, अतः कथन 2 गलत है। ‘तांबवती’ (तांबे वाला स्थान) इसका प्राचीन नाम था, जो यहाँ तांबे की प्रचुरता को दर्शाता है। अहाड़वासी तांबे को गलाकर औजार और आभूषण बनाते थे, जो उनकी अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग था। यहाँ से प्राप्त काले-लाल मृद्भांडों पर सफेद रंग की ज्यामितीय आकृतियाँ इस संस्कृति की विशिष्ट पहचान है। अतः कथन 1, 3 और 4 सही हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:अहाड़ स्थल की खुदाई 1953-54 में अक्षय कीर्ति व्यास और 1961-62 में H.D. Sankalia के नेतृत्व में हुई थी। अहाड़ संस्कृति का काल लगभग 2800 ई.पू. से 1500 ई.पू. माना जाता है और यह राजस्थान की सबसे विकसित ताम्रपाषाण संस्कृतियों में से एक थी।
    14. मानव द्वारा सर्वप्रथम प्रयुक्त अनाज था-
    (a) गेहूं
    (b) चावल
    (c) जौ
    (d) बाजरा
    J.P.P.C.S. (Pre) 1997
    उत्तर-(c)
    वैश्विक दृष्टि से देखें तो मानव द्वारा सर्वप्रथम प्रयुक्त अनाज जौ (Barley) है, जिसे लगभग 8000 ई.पू. में पश्चिमी एशिया के ‘उर्वर अर्धचंद्र’ (Fertile Crescent) क्षेत्र में उगाया गया था। यह क्षेत्र भूमध्य सागर और ईरान के मध्य स्थित था। गेहूं की खेती भी लगभग इसी समय और इसी क्षेत्र में शुरू हुई। आधुनिक मानव समाज द्वारा मुख्यतः 8 खाद्य अनाज — जौ, गेहूं, चावल, मक्का, बाजरा, सोरघम, राई एवं जई — उपभोग किए जाते हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:जौ को संस्कृत में ‘यव’ कहा जाता है और यह ऋग्वेद में उल्लिखित प्राचीनतम अनाजों में से एक है। जौ की यह विशेषता है कि यह अत्यधिक ठंड, सूखे और खराब मिट्टी में भी उग सकता है, इसीलिए इसे प्राचीन काल में सर्वाधिक उगाया गया।
    15. उस स्थल का नाम बताइए, जहां से प्राचीनतम स्थायी जीवन के प्रमाण मिले हैं?
    (a) धौलावीरा
    (b) किली गुल मोहम्मद से
    (c) कालीबंगा
    (d) मेहरगढ़
    U.P.P.C.S. (Spl.) ( Mains ) 2008
    उत्तर-(d)
    दिए गए विकल्पों में प्राचीनतम स्थायी जीवन के प्रमाण बलूचिस्तान के कच्छी मैदान में स्थित मेहरगढ़ से मिले हैं, जिसकी प्रामाणिक तिथि लगभग 7000 ई.पू. है। यहाँ से मिट्टी की कच्ची ईंटों से बने मकान, अनाज भंडारण के गड्ढे और पशुओं की हड्डियाँ मिली हैं जो स्थायी बसावट और सुनियोजित जीवन के स्पष्ट प्रमाण हैं। किली गुल मोहम्मद की प्राचीनतम तिथि लगभग 4000 ई.पू. और कालीबंगा की 3500 ई.पू. है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:मेहरगढ़ में पाए गए मानव दंत-अवशेषों पर की गई ड्रिलिंग के साक्ष्य बताते हैं कि यहाँ के लोग 7000-5500 ई.पू. के बीच दाँतों का उपचार करते थे — यह विश्व की सबसे प्राचीन दंत-चिकित्सा (Dentistry) का प्रमाण माना जाता है।
    16. भारतीय उपमहाद्वीप में कृषि के प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुए हैं-
    (a) कोलडिहवा से
    (b) लहुरादेव से
    (c) मेहरगढ़
    (d) टोकवा से
    U.P. Lower Sub. (Pre) 2004
    U.P. Lower Sub. (Pre) 2008)
    उत्तर-(b)
    नवीनतम पुरातात्विक खोजों के आधार पर भारतीय उपमहाद्वीप में कृषि के प्राचीनतम साक्ष्य उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर जिले में स्थित लहुरादेव से प्राप्त हुए हैं। यहाँ से 9000 ई.पू. से 7000 ई.पू. के मध्य के चावल की खेती के साक्ष्य मिले हैं। इस खोज से पूर्व प्राचीनतम साक्ष्य वाला स्थल मेहरगढ़ (7000 ई.पू., गेहूं) तथा प्राचीनतम चावल साक्ष्य वाला स्थल कोलडिहवा (6500 ई.पू.) माना जाता था। यदि परीक्षा में लहुरादेव विकल्प में न हो तो उत्तर मेहरगढ़ होगा।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:लहुरादेव की खोज 2002-03 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय के संयुक्त उत्खनन में हुई थी। यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह सिद्ध हुआ कि गंगा के मैदान में भी चावल की खेती पश्चिम एशिया की कृषि परंपरा के समकालीन थी।
    17. भारत में पशुपालन एवं कृषि के प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुए हैं-
    (a) अंजिरा से
    (b) दम्ब सदात से
    (c) किली गुल मोहम्मद से
    (d) मेहरगढ़ से
    64th B.P.S.C. (Pre) 2018
    उत्तर-(d)
    भारतीय उपमहाद्वीप में पशुपालन एवं कृषि दोनों के सबसे पुराने साक्ष्य एक साथ मेहरगढ़ (बलूचिस्तान) से मिले हैं। यहाँ गेहूं और जौ की खेती के साथ-साथ भेड़, बकरी और मवेशियों के पालन के प्रमाण भी 7000 ई.पू. के मिले हैं। किली गुल मोहम्मद, दम्ब सदात आदि स्थल बाद के काल के हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:मेहरगढ़ में पाए गए पशु-अवशेषों के अध्ययन से पता चलता है कि यहाँ गाय को पालतू बनाने की प्रक्रिया लगभग 6000 ई.पू. तक पूरी हो गई थी। मेहरगढ़ के निवासी कपास की खेती भी करते थे, जो इस क्षेत्र में कपास की कृषि के सबसे प्रारंभिक प्रमाणों में से एक है।
    18. नवपाषाण युग में भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर पश्चिमी क्षेत्र में निम्नलिखित में से किस स्थान पर कृषि के अभ्युदय के प्रारंभिक प्रमाण प्राप्त हुए हैं ?
    (a) मुंडिगाक
    (b) मेहरगढ़
    (c) दम्ब सादत
    (d) बालाकोट
    Chhattisgarh P.S.C. (Pre) 2017
    उत्तर-(b)
    भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में नवपाषाण काल में कृषि के उदय के सबसे प्रारंभिक प्रमाण मेहरगढ़ से मिलते हैं। मेहरगढ़ बोलान दर्रे (बलूचिस्तान) के निकट स्थित है और यहाँ से 7000 ई.पू. की नवपाषाणिक कृषि के स्पष्ट साक्ष्य मिले हैं। मुंडिगाक (अफगानिस्तान) और बालाकोट (पाकिस्तान) के साक्ष्य अपेक्षाकृत बाद के हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:मेहरगढ़ को 7 पुरातात्विक कालखंडों (Period I–VII) में विभाजित किया गया है। प्रथम काल (7000–5500 ई.पू.) में यहाँ कोई मिट्टी के बर्तन नहीं मिलते (Pre-pottery Neolithic), जो इसे विश्व के प्राचीनतम नवपाषाण स्थलों में विशिष्ट बनाता है।
    19. भारतीय उपमहाद्वीप में कृषि के प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुए हैं-
    (a) ब्रह्मगिरि से
    (b) बुर्जहोम
    (c) कोलडिहवा से
    (d) मेहरगढ़ से
    U.P.P.C.S. (Mains ) 2010
    उत्तर-(d)
    जब विकल्पों में लहुरादेव न हो तो भारतीय उपमहाद्वीप में कृषि के प्राचीनतम साक्ष्य वाला स्थल मेहरगढ़ माना जाता है। यह पाकिस्तान के बलूचिस्तान में स्थित है और यहाँ से 7000 ई.पू. की गेहूं-जौ की खेती के प्रमाण मिले हैं। बुर्जहोम जम्मू-कश्मीर में स्थित नवपाषाण स्थल है, जहाँ से गड्ढों में रहने (pit-dwellers) के प्रमाण मिले हैं। कोलडिहवा इलाहाबाद के निकट बेलन नदी तट पर स्थित है जहाँ 6500 ई.पू. के चावल के साक्ष्य मिले हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:बुर्जहोम (कश्मीर) के नवपाषाण निवासी अपने पालतू कुत्तों को मृत्यु के बाद अपने साथ दफनाते थे, जो उनके कुत्तों के प्रति विशेष लगाव और अनुष्ठानिक विश्वास को दर्शाता है — यह भारत में ऐसे साक्ष्य का अनूठा उदाहरण है।
    20. निम्नलिखित में से किन स्थानों से मध्यपाषाण काल में पशुपालन के प्रमाण मिलते हैं?
    (a) औदे
    (b) बोरी
    (c) बागोर
    (d) लखनियां
    U.P.P.C.S. (Pre) 2018
    उत्तर-(c)
    मध्यपाषाण काल में पशुपालन के प्रारंभिक साक्ष्य मध्य प्रदेश के होशंगाबाद के निकट आदमगढ़ और राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में स्थित बागोर से मिलते हैं। बागोर को भारत में पशुपालन के सबसे पुराने स्थलों में से एक माना जाता है। यहाँ से लगभग 5000-2000 ई.पू. के काल के लघु पाषाण उपकरण (Microliths) और पालतू पशुओं की हड्डियाँ मिली हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:बागोर स्थल कोठारी नदी के किनारे स्थित है और यहाँ की खुदाई 1967-68 में V.N. Misra के नेतृत्व में हुई थी। आदमगढ़ (होशंगाबाद) की शैलचित्र गुफाओं में भी पशुपालन और शिकार के दृश्य अंकित हैं, जो मध्यपाषाणकालीन जीवन-शैली पर महत्वपूर्ण प्रकाश डालते हैं।
    21. भीमबेटका को किसने खोजा था ?
    (a) डॉ. एच. डी. सांखलिया
    (b) डॉ. श्याम सुंदर निगम
    (c) डॉ. विष्णुधर वाकणकर
    (d) डॉ. राजबली पाण्डेय
    M.P.P.C.S. (Pre) 2020
    उत्तर-(c)
    भीमबेटका की खोज वर्ष 1957-58 में प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता डॉ. विष्णुधर श्रीधर वाकणकर ने की थी। यह स्थल मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में विंध्य पर्वत श्रृंखला में स्थित है। यहाँ की गुफाओं में मानव निवास के प्रमाण लगभग 1 लाख वर्ष पुराने हैं। अतिरिक्त तथ्य: भीमबेटका को वर्ष 2003 में यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया। यहाँ की शैल चित्रकारी में प्रयुक्त रंग मुख्यतः गेरू (लाल व पीला), सफेद और हरे रंग के हैं, जो वनस्पति एवं खनिज स्रोतों से तैयार किए जाते थे।
    22. वृहत्पाषाण स्मारकों की पहचान की गई है-
    (a) संन्यासी गुफाओं के रूप में
    (b) मृतक को दफनाने के स्थान के रूप में
    (c) मंदिर के रूप में
    (d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
    U.P.P.C.S. (Mains) 2005
    उत्तर-(b)
    वृहत्पाषाण (Megalith) विशाल पत्थरों से निर्मित वे संरचनाएं हैं जिनका उपयोग मृतकों को दफनाने के लिए किया जाता था। इनका निर्माण मुख्यतः दक्षिण भारत में लौह युग (लगभग 1000-100 ई.पू.) के दौरान हुआ। इनके प्रकारों में डोल्मेन, सिस्ट, कैर्न-सर्किल, टोपीकल शिला तथा मेहिर प्रमुख हैं। अतिरिक्त तथ्य: भारत में सर्वाधिक वृहत्पाषाण स्मारक कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश में पाए जाते हैं। इन समाधियों में शव के साथ लोहे के औजार, मृदभांड और आभूषण भी रखे जाते थे, जो परलोक में जीवन की मान्यता को दर्शाते हैं।
    23. नवदाटोली का उत्खनन किसने किया था ?
    (a) के. डी. बाजपेयी ने
    (b) वी. एस. वाकंकड़ ने
    (c) एच.डी. सांकलिया ने
    (d) डीलर ने
    U.P. Lower Sub. (SpL.) (Pre) 2009
    उत्तर-(c)
    नवदाटोली (मध्य प्रदेश) का उत्खनन दक्कन कॉलेज, पुणे के प्रोफेसर एच. डी. सांकलिया ने 1952-53 में करवाया था। यह भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे बड़ा उत्खनित ताम्रपाषाणिक ग्रामीण स्थल है, जिसकी तिथि लगभग 1600-1300 ई.पू. के मध्य निर्धारित की गई है। अतिरिक्त तथ्य: नवदाटोली नर्मदा नदी के दक्षिणी तट पर महेश्वर के निकट स्थित है। यहाँ से ताम्रपाषाण काल के मृदभांड, तांबे के औजार, अनाज के अवशेष (गेहूँ, जौ, मसूर) तथा पक्की मिट्टी की मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं।
24. ‘राख का टीला’ निम्नलिखित किस नवपाषाणिक स्थल से संबंधित है ?
(a) बुदिहाल
(b) संगनकल्लू
(c) कोलडिहवा
(d) ब्रह्मगिरि
U.P.P.C.S. (Mains ) 2009
उत्तर-(b)
कर्नाटक के बेल्लारी जनपद में स्थित संगनकल्लू (Sanganakallu) नवपाषाण कालीन पुरास्थल से ‘राख के टीले’ (Ashmounds) प्राप्त हुए हैं। ये टीले पशुओं के गोबर और जैविक पदार्थों के जलाने से निर्मित माने जाते हैं, जो सामूहिक उत्सवों या कर्मकांडों का प्रमाण हो सकते हैं। अतिरिक्त तथ्य: दक्षिण भारत में राख के टीले (Ashmounds) मुख्यतः कर्नाटक में पाए जाते हैं — संगनकल्लू के अतिरिक्त उत्नूर, कुप्पगल और ब्रह्मगिरि में भी ऐसे टीले मिले हैं। इन टीलों का काल लगभग 3000-1800 ई.पू. निर्धारित किया गया है।
25. निम्न में से किस एक पुरास्थल से पाषाण संस्कृति से लेकर हड़प्पा सभ्यता तक के सांस्कृतिक अवशेष प्राप्त हुए हैं?
(a) आम्री
(b) मेहरगढ़
(c) कोटदीजी
(d) कालीबंगा
U.P.P.C.S. (Pre) 2008
उत्तर-(b)
बलूचिस्तान (पाकिस्तान) में बोलन दर्रे के निकट स्थित मेहरगढ़ से नवपाषाण काल से लेकर परिपक्व हड़प्पा सभ्यता तक के सांस्कृतिक अवशेष प्राप्त हुए हैं। इसकी खोज 1974 में फ्रांसीसी पुरातत्ववेत्ता जीन-फ्रैंकोइस जैरिज ने की थी। यह स्थल दक्षिण एशिया में कृषि और पशुपालन के सबसे प्राचीन प्रमाणों (लगभग 7000 ई.पू.) के लिए प्रसिद्ध है। अतिरिक्त तथ्य: मेहरगढ़ से विश्व की सबसे प्राचीन दंत-चिकित्सा (दाँत ड्रिलिंग) के साक्ष्य मिले हैं, जो लगभग 7500-9000 वर्ष पुराने हैं। यहाँ से कपास की खेती के भी प्राचीनतम प्रमाण प्राप्त हुए हैं।
26. भारत में किस शिलाश्रय से सर्वाधिक चित्र प्राप्त हुए हैं?
(a) घघरिया
(b) भीमबेटका
(c) लेखाहिया
(d) आदमगढ़
U.P.P.C.S. (Pre) 2008
उत्तर-(d)
भारत में सर्वाधिक शैल चित्र भीमबेटका (मध्य प्रदेश) के शिलाश्रयों से प्राप्त हुए हैं। यहाँ अब तक लगभग 700 से अधिक शिलाश्रयों की पहचान हो चुकी है, जिनमें से 400 से अधिक में चित्र उत्कीर्ण हैं। इन चित्रों में शिकार के दृश्य, नृत्य, युद्ध, पशु-आखेट एवं सामाजिक जीवन का चित्रण है। अतिरिक्त तथ्य: भीमबेटका के शैल चित्रों की शैलियाँ पाँच सांस्कृतिक कालखंडों में विभाजित की गई हैं — पुरापाषाण काल से लेकर मध्यकाल तक। यहाँ के कुछ चित्र ऑस्ट्रेलिया के कलाकूर्रा शैल चित्रों से समानता रखते हैं, जो प्रागैतिहासिक कला की वैश्विक एकरूपता को दर्शाता है।
27. नवदाटोली किस राज्य में अवस्थित है?
(a) गुजरात
(b) महाराष्ट्र
(c) छत्तीसगढ़
(d) मध्य प्रदेश
U.P.P.C.S. (Mains) 2009
उत्तर-(d)
नवदाटोली मध्य प्रदेश के खरगोन जिले में नर्मदा नदी के तट पर स्थित एक महत्वपूर्ण ताम्रपाषाण कालीन पुरास्थल है। यह महेश्वर नगर के समीप है और इसका उत्खनन 1952-53 तथा 1957-59 में दो चरणों में सम्पन्न हुआ था। अतिरिक्त तथ्य: नवदाटोली की संस्कृति को ‘मालवा संस्कृति’ के नाम से जाना जाता है। यहाँ से प्राप्त मृदभांड अपनी विशिष्ट चित्रकारी के कारण पुरातत्व जगत में ‘मालवा मृदभांड’ कहलाते हैं।
28. निम्नलिखित में से किस भारतीय पुरातत्ववेत्ता ने पहली बार ‘भीमबेटका गुफा’ को देखा और उसके शैलचित्रों के प्रागैतिहासिक महत्व को खोजा?
(a) माघो स्वरूप वत्स
(b) एच. डी. संकालिया
(c) वी. एस. वाकंकर
(d) वी. एन. मिश्रा
U.P.P.C.S. (Pre) 2020
उत्तर-(c)
वर्ष 1957 में वी. एस. वाकंकर (विष्णु श्रीधर वाकणकर) ने भीमबेटका के शैलचित्रों की प्रागैतिहासिक महत्ता को पहचाना। वे भोपाल से उज्जैन जाते समय ट्रेन से इन पहाड़ियों को देखकर रुक गए और उन्होंने इनका विस्तृत अध्ययन किया। उन्हें ‘प्रागैतिहासिक कला का खोजकर्ता’ भी कहा जाता है। अतिरिक्त तथ्य: वाकणकर को ‘आदिमानव का चितेरा’ भी कहा जाता है। भीमबेटका नाम महाभारत के पात्र भीम से लिया गया है — स्थानीय मान्यता के अनुसार पांडव वनवास के दौरान यहाँ रुके थे और भीम यहाँ बैठते (बैठका) थे।
29. ‘भीमबेटका’ किसके लिए प्रसिद्ध है?
(a) गुफाओं के शैल चित्र
(b) खनिज
(c) बौद्ध प्रतिमाएं
(d) नदी का उपागम स्थल
M.P.P.C.S. (Spl.) (Pre) 2004
उत्तर-(a)
भीमबेटका मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में विंध्याचल पर्वत श्रृंखला में स्थित है और यह प्रागैतिहासिक शैल चित्रकला के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इन गुफाओं में हाथी, बारहसिंगा, शेर, जंगली सूअर तथा शिकार के दृश्य चित्रित हैं। यहाँ के चित्र उच्च पुरापाषाण काल से लेकर मध्यकाल तक के माने जाते हैं। अतिरिक्त तथ्य: भीमबेटका के शैलचित्रों में सबसे प्रमुख रंग गेरू का लाल रंग है। यह स्थल उत्तर में विंध्य पर्वत श्रृंखला और दक्षिण में सतपुड़ा पर्वतमाला के मध्य स्थित है, जो इसे जैव विविधता की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाता है।
30. निम्न में से कौन-सा स्थल प्रागैतिहासिक चित्रकला के लिए प्रसिद्ध है?
(a) अजंता
(b) भीमबेटका
(c) बाघ
(d) अमरावती
Uttarakhand U.D.A./L.D.A. (Mains) 2007
U.P.P.C.S. (Mains) 2011
उत्तर-(b)
दिए गए विकल्पों में भीमबेटका ही एकमात्र प्रागैतिहासिक चित्रकला स्थल है। अजंता और बाघ की गुफाएं बौद्ध धर्म से संबंधित ऐतिहासिक काल की चित्रकारी के लिए तथा अमरावती बौद्ध मूर्तिकला के लिए प्रसिद्ध हैं। भीमबेटका के चित्र लाखों वर्ष पुरानी मानव सभ्यता के जीवन्त प्रमाण हैं। अतिरिक्त तथ्य: अजंता की चित्रकारी गुप्त काल (चौथी-पाँचवीं शताब्दी ई.) में की गई थी और ये भित्तिचित्र (Fresco) तकनीक से निर्मित हैं, जो प्रागैतिहासिक भीमबेटका की शैल (Rock) कला से सर्वथा भिन्न हैं।
31. भीमबेटका की गुफाएं कहां स्थित हैं?
(a) भोपाल
(b) पंचमढ़ी
(c) सिंगरौली
(d) अब्दुलागंज-रायसेन
M.P.P.C.S. (Pre) 2013
उत्तर-(b)
भीमबेटका की गुफाएं मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में अब्दुलागंज के समीप स्थित हैं। ये भोपाल से लगभग 45 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में विंध्य पर्वत श्रृंखला में हैं। इस क्षेत्र का कुल क्षेत्रफल लगभग 10 वर्ग किलोमीटर है। अतिरिक्त तथ्य: भीमबेटका की पहाड़ियों में बलुआ पत्थर की चट्टानें पाई जाती हैं जिन पर शैल चित्र उत्कीर्ण हैं। यह स्थल रातापानी वन्यजीव अभयारण्य के भीतर स्थित है, जो इसे पर्यावरणीय दृष्टि से भी संरक्षित रखता है।
32. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण निम्नलिखित विभागों/मंत्रालयों में से किसका संलग्न कार्यालय है?
(a) संस्कृति
(b) पर्यटन
(c) विज्ञान और प्रौद्योगिकी
(d) मानव संसाधन विकास
Jharkhand P.C.S. (Pre) 2011
उत्तर-(a)
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (Archaeological Survey of India – ASI) संस्कृति मंत्रालय के अधीन एक प्रमुख संलग्न कार्यालय है, जो देश की पुरातात्विक धरोहरों के संरक्षण और उत्खनन कार्य का दायित्व निभाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:ASI की स्थापना 1861 में अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा की गई थी, जिन्हें “भारतीय पुरातत्व का पिता” भी कहा जाता है। ASI वर्तमान में 3,693 से अधिक स्मारकों और पुरातात्विक स्थलों का संरक्षण करता है, जिनमें 40 UNESCO विश्व धरोहर स्थल भी शामिल हैं।
33. गर्त आवास के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं-
(a) बुर्जहोम से
(b) कोलडिहवा से
(c) ब्रह्मगिरि से
(d) संगनकल्लू से
U.P.P.C.S. (Mains) 2011
उत्तर-(a)
जम्मू-कश्मीर में स्थित नवपाषाणिक पुरास्थल बुर्जहोम से गर्त आवास (गड्ढों में बने घर) के स्पष्ट साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। ये गड्ढे ज़मीन में खोदे जाते थे और लोग उनमें निवास करते थे, जो संभवतः कठोर शीत ऋतु से बचने का उपाय था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:बुर्जहोम में मानव कंकाल के साथ कुत्ते का कंकाल भी शवाधान में मिला है, जो भारतीय उपमहाद्वीप में मानव-पशु सहजीवन का दुर्लभ प्रमाण है। इस स्थल की खोज 1935 में डी. टेरा और पीटरसन ने की थी। यहाँ से हड्डी से बने औज़ार और हड्डी की सुइयाँ भी मिली हैं जो नवपाषाण काल की शिल्पकारी का प्रमाण हैं।
34. विंध्य क्षेत्र के किस शिलाश्रय से सर्वाधिक मानव कंकाल मिले हैं?
(a) मोरहना पहाड़
(b) घघरिया
(c) बघही खोर
(d) लेखहिया
U.P.P.C.S. (Pre) 2016
उत्तर-(d)
विंध्य क्षेत्र के लेखहिया शिलाश्रय (संख्या 1) से मध्यपाषाणिक लघु पाषाण उपकरणों के साथ-साथ 17 से अधिक मानव कंकाल प्राप्त हुए हैं — यह संख्या विंध्य क्षेत्र में किसी एकल शिलाश्रय से प्राप्त सर्वाधिक मानव कंकालों की है। अमेरिकी शोधकर्ता जॉन आर. लुकास के अनुसार यहाँ कुल 27 कंकालों की अस्थियाँ मिली हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:लेखहिया उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में स्थित है और इसकी खुदाई जी.आर. शर्मा के नेतृत्व में इलाहाबाद विश्वविद्यालय द्वारा की गई थी। यहाँ से प्राप्त कंकाल लगभग 8000-5000 ईसा पूर्व के मध्यपाषाण काल के माने जाते हैं, जो तत्कालीन मानव जीवनशैली और दफन परंपराओं पर महत्त्वपूर्ण प्रकाश डालते हैं।
35. निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए- (ऐतिहासिक स्थान ) (ख्याति का कारण)
1. बुर्जहोम : शैल कृत देव मंदिर
2. चंद्रकेतुगढ़ टेराकोटा कला
3. गणेश्वर ताम्र कलाकृतिया उपर्युक्त युग्मों में से कौन-सा / कौन-से सही
(a) केवल 1
(b) 1 और 2
(c) केवल 3
(d) 2 और 3
I.A.S. (Pre) 2021
उत्तर-(d)
बुर्जहोम (जम्मू-कश्मीर) नवपाषाण युग का पुरास्थल है जो गर्त आवासों और मानव-कुत्ता सह-शवाधान के लिए प्रसिद्ध है, न कि शैलकृत देव मंदिर के लिए — अतः युग्म 1 गलत है। चंद्रकेतुगढ़ (पश्चिम बंगाल) विद्याधरी नदी के तट पर स्थित एक प्रमुख पुरातात्विक स्थल है, जहाँ से ऐतिहासिक काल की उत्कृष्ट टेराकोटा कला के नमूने मिले हैं — युग्म 2 सही है। गणेश्वर (राजस्थान, सीकर जिला) से बड़ी मात्रा में ताम्र कलाकृतियाँ प्राप्त हुई हैं जिनमें दोहरी पेंचदार शिरे वाली बाणाग्र और मछली पकड़ने के कांटे शामिल हैं — युग्म 3 सही है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:गणेश्वर को “ताम्र संचयों की जननी” (Mother of Copper Hoards) कहा जाता है क्योंकि यहाँ से प्राप्त ताम्र वस्तुओं की संख्या और विविधता भारत में अन्यत्र दुर्लभ है। चंद्रकेतुगढ़ की टेराकोटा मूर्तियाँ मौर्य और शुंग काल (लगभग 3री-1ली शताब्दी ईसा पूर्व) की हैं और बंगाल की लोक कला परंपरा को समझने में महत्त्वपूर्ण हैं।
36. गैरिक मृद्भांड पात्र (ओ.सी.पी.) का नामकरण हुआ था-
(a) हस्तिनापुर में
(b) अहिच्छत्र में
(c) नोंह में
(d) लाल किला में
U.P.P.C.S. (Mains ) 2006
उत्तर-(a)
गेरूवर्णी मृद्भांड संस्कृति (Ochre Coloured Pottery – OCP) का नामकरण हस्तिनापुर में हुआ। प्रसिद्ध पुरातत्त्वविद् बी.बी. लाल ने 1951 में हस्तिनापुर की खुदाई के दौरान सर्वप्रथम इस विशिष्ट गेरुए रंग के मृद्भांड की पहचान की और वहीं इसका नामकरण किया। यह संस्कृति मुख्यतः गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र से जुड़ी है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:OCP संस्कृति का काल लगभग 2000-1500 ईसा पूर्व माना जाता है और इसे कुछ विद्वान हड़प्पा संस्कृति के पतन के बाद की संस्कृति से जोड़ते हैं। OCP के बर्तन अत्यंत भंगुर (कच्चे) होते थे और उन पर गेरू (लाल-नारंगी रंग) का लेप चढ़ा होता था, जो प्रायः छूने मात्र से उतर जाता था — यही इसकी सबसे विशिष्ट पहचान है।
37. निम्नलिखित में से किस स्थल से मानव कंकाल के साथ कुत्ते का कंकाल भी शवाधान से प्राप्त हुआ है?
(a) ब्रह्मगिरि
(b) बुर्जहोम
(c) चिरांद
(d) मास्की
U.P. Lower Sub. (Pre) 2008
उत्तर-(b)
जम्मू-कश्मीर में श्रीनगर के निकट स्थित नवपाषाणिक पुरास्थल बुर्जहोम से मानव कंकाल के साथ कुत्ते का कंकाल भी शवाधान में मिला है। यह इस बात का प्रमाण है कि तत्कालीन लोग कुत्ते को अपने जीवन का अभिन्न अंग मानते थे और मृत्यु के बाद भी उसे साथ दफनाते थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:बुर्जहोम में कुत्तों के अतिरिक्त हिरण और अन्य जानवरों की हड्डियाँ भी शवाधानों में मिली हैं, जो संभवतः मृत्यु के बाद के जीवन में भोजन की आपूर्ति की धारणा को दर्शाता है। यह परंपरा मध्य एशिया की नवपाषाणिक संस्कृतियों से काफी मिलती-जुलती है, जिससे संभावित सांस्कृतिक संपर्क का संकेत मिलता है।
38. ताम्राश्म काल में महाराष्ट्र के लोग मृतकों को घर के फर्श के नीचे किस तरह रखकर दफनाते थे?
(a) उत्तर से दक्षिण की ओर
(b) पूर्व से पश्चिम की ओर
(c) दक्षिण से उत्तर की ओर
(d) पश्चिम से पूर्व की ओर
U.P.P.C.S. (Pre) 1997
उत्तर-(a)
महाराष्ट्र की ताम्रपाषाण कालीन जोर्वे संस्कृति (लगभग 1400-700 ईसा पूर्व) के प्रमुख पुरास्थलों — नेवासा, दैमाबाद, इनामगांव, चंदोली आदि — में मृतकों को उत्तर-दक्षिण दिशा में, अस्थिकलश में रखकर, घरों के फर्श के नीचे दफनाने के साक्ष्य मिले हैं। कब्र के साथ मिट्टी के बर्तन और तांबे की वस्तुएं भी रखी जाती थीं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:इनामगांव (पुणे जिला) जोर्वे संस्कृति का सबसे अधिक उत्खनित पुरास्थल है जहाँ घर के भीतर शवाधान की यह परंपरा स्पष्ट रूप से प्रमाणित हुई है। उल्लेखनीय है कि कुछ बच्चों के शवों को उरण (घड़े) में रखकर दफनाया जाता था — इसे “उरण शवाधान” कहते हैं, जो बालमृत्यु और अंत्येष्टि संस्कारों की विविधता को दर्शाता है।
39. नीचे दो कथन दिए गए हैं, एक को अभिकथन (a) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (a) : विध्य क्षेत्र के पाषाण युगीन लोगों ने नूतन भूतल काल के अंत में गंगा घाटी में प्रव्रजन किया।
कारण (R) : जलवायु परिवर्तन के कारण इस काल में शुष्कता का चरण था। नीचे दिए गए कूट से राही कूट : उत्तर का चयन कीजिए।
(a) (a) और (R) दोनों सही हैं, तथा (R), (a) की सही व्याख्या करता है।
(b) (a) और (R) दोनों सही हैं, परन्तु (R), (a) की सही व्याख्या नहीं करता है।
(c) (a) सही है, परंतु (R) गलत है।
(d) (a) गलत है, परंतु (R) सही है।
U.P.R.O./ A.R.O. (Mains) 2016
उत्तर-(a)
पुरातत्त्वविद् जी.आर. शर्मा ने सराय नाहर राय (प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश) में उत्खनन के आधार पर यह अवधारणा प्रस्तुत की कि नूतन भूतल काल (Holocene) के अंत में जलवायु में शुष्कता आने से विंध्य क्षेत्र में भोजन और जल की कमी हो गई, जिसके कारण वहाँ के लोगों ने गंगा घाटी की ओर प्रव्रजन किया। अतः अभिकथन और कारण दोनों सही हैं और कारण, अभिकथन की उचित व्याख्या करता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:सराय नाहर राय से मध्यपाषाण कालीन मानव कंकाल और हड्डी के उपकरण प्राप्त हुए हैं। यह स्थल लगभग 10,000-5,000 ईसा पूर्व के मानव प्रव्रजन और बस्ती निर्माण को समझने में सहायक है। विंध्य से गंगा घाटी की ओर यह प्रव्रजन भारत में आद्य कृषि सभ्यता के उद्भव की पृष्ठभूमि भी तैयार करता है।
40. भीमबेटका को किसने खोजा था ?
(a) डॉ. एच. डी. सांखलिया
(b) डॉ. श्याम सुंदर निगम
(c) डॉ. विष्णुधर वाकणकर
(d) डॉ. राजबली पाण्डेय
M.P.P.C.S. (Pre) 2020
उत्तर-(c)
भीमबेटका शैलाश्रय की खोज 1957-58 में प्रसिद्ध पुरातत्त्वविद् डॉ. विष्णुधर श्रीधर वाकणकर ने की थी। मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में विंध्याचल पर्वत श्रृंखला में स्थित यह स्थल प्रागैतिहासिक शैल चित्रकला के लिए विश्वप्रसिद्ध है। यहाँ 700 से अधिक शिलाश्रयों में मानव जीवन के लगभग 30,000 वर्ष पुराने चित्र अंकित हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:भीमबेटका को 2003 में UNESCO विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया। यहाँ के शैल चित्रों में शिकार के दृश्य, नृत्य, युद्ध, और पशु-पक्षियों के चित्र शामिल हैं जो मुख्यतः लाल और सफेद रंग से बनाए गए हैं। कुछ चित्र मौर्य और मध्यकालीन काल तक के भी पाए गए हैं, जो इस स्थल की निरंतर मानव उपस्थिति को प्रमाणित करते हैं।
41. निम्नलिखित में से किस स्थान पर मानव के साथ कुत्ते को दफनाए जाने का साक्ष्य मिला है ?
(a) बुर्जहोम
(b) कोलडिहवा
(c) चोपानी-मांडो
(d) मांडो
Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2010
उत्तर-(a)
जम्मू-कश्मीर स्थित नवपाषाणिक पुरास्थल बुर्जहोम से ही मानव के साथ कुत्ते को दफनाने का स्पष्ट पुरातात्विक प्रमाण मिला है। यह शवाधान परंपरा भारतीय उपमहाद्वीप में अपनी तरह का अनूठा उदाहरण है, जो मनुष्य और कुत्ते के बीच के गहरे भावनात्मक और सामाजिक संबंध को दर्शाती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:कोलडिहवा (उत्तर प्रदेश) चावल की खेती के प्राचीनतम साक्ष्यों (लगभग 6000 ईसा पूर्व) के लिए प्रसिद्ध है, न कि पशु-शवाधान के लिए। चोपानी-मांडो (इलाहाबाद के पास) मध्यपाषाण कालीन पुरास्थल है जहाँ से मिट्टी के आदिम बर्तनों के साक्ष्य मिले हैं — इसे विश्व के प्राचीनतम मृद्भांड-निर्माण स्थलों में गिना जाता है।
  • पाषाणकालीन सभ्यता : जीवन शैली एक नजर में

    पुरापाषाण युग

    ➣ पृथ्वी की उत्पति 4600 मिलियन वर्ष पूर्व मानी गयी है। जबकि पृथ्वी पर 3500 मिलियन वर्ष पूर्व जीवन अस्तित्व में आया।

    ➣ प्रथम मानव लगभग 30 करोड़ वर्ष, जो एक लंगूर जैसा था, हुआ।

    ➣ मानव विकास के क्रम में लगभग 6 करोड़-60 लाख वर्ष होमिनिडास नामक जीव दक्षिण व पूर्वी अफ्रीका में रहता था।

    ➣ प्राचीनतम मानव के रूप में जिस जीव का विकास हुआ था वह तक़रीबन 30 मिलियन वर्ष पहले विकसित हुआ था। मानव विकास के क्रम में आस्ट्रलोपेथीकस नामक प्राणी को महत्वपूर्ण माना गया है।

    ➣ यह प्राचीन पुरापाषाण का काल था। इस समय मानव जीव को खेती करना, आग जलाना और बर्तन बनाने जैसी कला का ज्ञान नहीं था।

    ➣ सम्भवत: वह ऐसे फलों एवं सब्जियों, कंद-मूलों (खाद्य संग्रह) पर जीवन व्यतीत करते जो जंगलों में उपजते थे।

    ➣ 1. 8 सहस्त्राब्दी वर्ष मानव विकास के क्रम होमो इरेक्टस अस्तित्व में आया। सम्भवः है यह काल पुरापाषाण युग का मध्य काल ( लगभग 1 लाख से 40 हजार ई. पू.) था। इस समय मानव जीव पत्थर का उपयोग करने लग गया था। पत्थर की बनी पहली हाथ कुल्हाड़ी एंव आग की खोज इस समय की महत्वपूर्ण दें थी।

    ➣ मानव शिकार करना सीख गया था। परन्तु पशुपालन , खेती व अभी तक नहीं हुआ था। हालाँकि भाषा का ज्ञान हो गया। इसलिए इस युग को शिकार एंव खाद्य संग्रह युग नाम से भी जाना जाता है।

    ➣ आधुनिक मानव होमो सेपियंस सेपियंस दक्षिण अफ्रीका में , उत्तर पुरापाषाण युग यानि पुरापाषाण युग के अंत में अस्तित्व में आये। यह हिमयुग की अंतिम अवस्था थी जब बर्फ पिघलने लगी।

    ➣ पुरापाषाण युग के पश्चात् मध्यपाषाण युग की शुरुवात होती है। यह युग उत्तर पाषाण काल के अंत तथा नवपाषाण काल के मध्य का काल था।

    ➣ इस समय जलवायु गर्म होने लग गयी। जलवायु परिवर्तन ने जीव और वनस्पतियों में परिवर्तन लाए। पर्याप्त वर्षा व सघन वनस्पति ने मानव जीवन का नया अध्याय आरम्भ किया।

    ➣ इसमें मानव को पशुपालन ज्ञान हो जाता है। उनके द्वारा पहला पाला गया पशु कुत्ता था। इसलिए इसे पशुपालन युग भी कहा जाता है।

    शिकार (पुरापाषाण युग की देन) के लिए बने हथियार अभी भी पत्थर या पाषाण के थे मानव को अभी खेती तथा धातु का ज्ञान नहीं था।

    नव पाषाण युग (7 हजार – 7000 ई. पू.)

    ➣ मध्यपाषाण युग के पश्चात् नव पाषाण युग का उदय होता है इस युग में मानव-जीवन में बहुत अधिक परिवर्तन आया।

    खेती के साथ-साथ मिटटी के बर्तन बनाना सीख गया। मानव द्वारा पहला उपयुक्त अनाज जौ था।

    ➣ क्योंकि नव पाषाण युग के लोगों को अन्न उगाने का श्रेय जाता है इसलिए इस युग को अन्न उत्पादक युग भी कहा जाता है।

    ➣ नव पाषाण युग में मानव को धातु का ज्ञान हो गया था। वे लोग धातु और पत्थर-शिल्प के कुशल कारीगर बने। काल के अंत तक उसे कताई व बुनाई का भी ज्ञान हो गया।

    ➣ मानव अब सामाजिक ढांचे में ढलने लग गया था। अंतिम संस्कार और धार्मिक क्रियाकलाप अस्तित्व में आये। अब मृत मानव शरीर को अस्थि – कलश में अपने घर के निचे उत्तर – दक्षिण की स्थिति में समाधिस्थ करते थे। साथ ही देवी देवताओं की पूजा होने लगी थी।

    हालाँकि मध्यपाषाण काल में पहली बार मानव कंकालों को विधिवत रूप से दफ़न करने की प्रकिया शुरू हुई थी।

    ➣ धातु के आधार पर समय को तीन भागों में बांटा गया है – ताम्र युग (तांबा ), कांस्य युग (हड़प्पा संभ्यता), लौह युग (लगभग 1200 ई. पू. तक )

    ➣ मानव द्वारा प्रयोग की जाने वाली पहली धातु तांबा थी। वह पाषाण व तांबे का साथ साथ प्रयोग करने लगे इसलिए इस धातु के प्रारंभिक उपयोग को ताम्र पाषाण युग नाम से भी जाना जाता है।

    सिंधु घाटी सभ्यता यानी हड़प्पा संभ्यता नवपाषाण काल के कांस्य युग से ही सम्बंधित है। इसलिए हड़प्पा संभ्यता को कांस्य युगीन संभ्यता नाम से भी जाना जाता है। इसके आलावा मेसोपोटामिया , मिस्र सभ्यता व् चीनी सभ्यता समकालीन रहे।

  • पाषाणकालीन सभ्यता से धातु युग की ओर संक्रमण

    📚 विषय सूची

    ➣ पाषाण युग में मनुष्य की किसी भी धातु का खनन कर पाने की असमर्थता थी। लेकिन इस युग में मनुष्यों ने तांबे, कांसे और लोहे के अलावा कुछ अन्य ठोस धातुओं की खोज तथा उनका उपयोग करना भी सीख गया था।

    ➣ हालाँकि अभी भी धातु के साथ पाषाण का भी प्रयोग हो रहा था।

    ताम्रपाषाण युग

    ➣ सर्वप्रथम जिस धातु को औजारों से प्रयुक्त किया गया वह तांबा था। ऐसा माना जाता है कि तांबे का सर्वप्रथम प्रयोग लगभग 5000 ई.पू. में किया गया। इसका प्रमाण अतिरम्पक्कम (मद्रास) से प्राप्त तांबे का कुल्हाड़ी था ।

    ➣ इस चरण में पत्थर एवं तांबे के उपकरणों का साथ-साथ प्रयोग जारी रहा। इसी कारण इसे ताम्रपाषाणिक संस्कृति (कैल्कोलिथिक कल्चर) कहा जाता है। ताम्रपाषाणिक का अर्थ है-पत्थर एवं तांबे के प्रयोग की अवस्था।

    ➣ भारत में ताम्रपाषाण युग की बस्तियां दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, पश्चिमी मध्य प्रदेश, पश्चिमी महाराष्ट्र तथा दक्षिण-पूर्वी भारत में पाई गई हैं।

    दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में अनेक पुरास्थलों की खुदाई हुई है, ये हैं अहाड़, बालाथल, बागोर, ओजियाना एवं गिलुंद। ये पुरास्थल बनास घाटी में स्थित हैं। बनास घाटी में स्थित होने के कारण इसे बनास संस्कृति भी कहते हैं। अहाड़ का प्राचीन नाम तांबवती अर्थात तांबा वाली जगह है।

    गिलुंद बालाथल, ओजियाना में घरों को चाहरदीवारी से घेरा गया है। अहाड़ के पास गिलुंद में मिट्टी की इमारत बनी है, किंतु कहीं-कहीं पक्की ईंटें भी लगी हैं। गिलुंद में तांबे के टुकड़े मिले हैं।

    ➣ ताम्रपाषाण युग के लोग शिल्प-कर्म में निःसंदेह बड़े दक्ष थे और पत्थर का काम भी अच्छा करते थे। वे कार्नेलियन, स्टेटाइट और क्वार्ट्ज क्रिस्टल जैसे अच्छे पत्थरों के मनके या गुटिकाएं भी बनाते थे।

    ➣ वे लोग कताई और बुनाई जानते थे, क्योंकि मालवा में चरखे और तकलियां हैं। महाराष्ट्र में कपास, सन और सेमल की रूई के बने धागे भी मिले हैं।

    ➣ इनामगांव में कुंभकार, धातुकार, हाथी-दांत के शिल्पी, चूना बनाने वाले और खिलौने की मिट्टी की मूर्ति (टेराकोटा) बनाने वाले कारीगर भी दिखाई देते हैं।

    ➣ इनामगांव में मातृ-देवी की प्रतिमा मिली है, जो पश्चिमी एशिया में पाई जाने वाली ऐसी प्रतिमा की प्रतिरूप है।

    मालवा और राजस्थान में मिली रूढ़ शैली से बनी मिट्टी की वृषभ-मूर्तिकाएं यह सूचित करती हैं कि वृषभ (सांड) धार्मिक पंथ का प्रतीक था।

    पश्चिमी महाराष्ट्र की चंदोली और नेवासा बस्तियों में कुछ बच्चों के गलों में तांबे के मनकों का हार पहनाकर उन्हें दफनाया गया है, जबकि अन्य बच्चों की कब्रों में सामान के तौर पर कुछ बर्तन मात्र हैं।

    ➣ महाराष्ट्र में मृतक को उत्तर-दक्षिण की दिशा में रखा जाता था, किंतु दक्षिण भारत में पूर्व-पश्चिम की दिशा में।

    ➣ महाराष्ट्र की ताम्रपाषाण कालीन संस्कृति (जोर्वे संस्कृति) के नेवासा, दैमाबाद, चंदोली, इनामगांव आदि पुरास्थलों में मृतकों को अस्थि कलश में रखकर उत्तर से दक्षिण दिशा में घरों के फर्श के नीचे दफनाए जाने के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।

    ➣ पश्चिमी भारत में लगभग संपूर्ण शवाधान (एक्सटेंडेड बरिअल) प्रचलित था, जबकि पूर्वी भारत में आंशिक शवाधान (फ्रैक्शनल बरिअल) चलता था।

    ➣ सबसे बड़ी निधि मध्य प्रदेश के गुंगेरिया से प्राप्त हुई है। इसमें 424 तांबे के औजार एवं हथियार तथा 102 चांदी के पतले पत्तर हैं।

    कायथा के एक घर में तांबे के 28 कंगन और दो अद्वितीय ढंग की कुल्हाड़ियां पाई गई हैं। इसी स्थान में स्टेटाइट और कार्नेलियन जैसे कीमती पत्थरों की गोलियों के हार पात्रों में जमा पाए गए हैं।

    गणेश्वर स्थल राजस्थान में खेत्री ताम्र-पट्टी के सीकर-झुंझनू क्षेत्र के तांबे की समृद्ध खानों के निकट पड़ता है।

    ➣ दक्षिण भारत में ब्रह्मगिरि, पिकलीहल, संगलनकल्लू, मस्की, हल्लूर आदि से ताम्रपाषाण युगीन बस्तियों के साक्ष्य मिले हैं। दक्षिण की अपेक्षा चरवाहा संस्कृति का अधिक प्रमाण मिला है।

    ➣ आरंभिक ताम्रपाषाण अवस्था के इनामगांव स्थल पर चूल्हों सहित बड़े-बड़े कच्ची मिट्टी के मकान और गोलाकार गड्ढों वाले मकान मिले हैं। पश्चात की अवस्था (1300-1000 ई.पू.) में पांच कमरों वाला एक मकान मिला है, जिसमें चार कमरे आयताकार हैं और एक वृत्ताकार।

    ➣ इनामगांव में 130 से अधिक घर और अनेक कब्रें पाई गई हैं। यह बस्ती किलाबंद है और खाई से घिरी हुई है। यहां शिल्पी या पंसारी लोग पश्चिम छोर पर रहते थे, जबकि सरदार प्रायः केंद्र स्थल में रहता था। यहां से अन्नागार भी मिला है।

    ➣ पूर्वी भारत में गंगा तटवर्ती चिरांद के अलावा, पश्चिम बंगाल के बर्दवान जिले के पांडु राजर ढिब और बीरभूम जिले में महिषदल उल्लेखनीय ताम्रकालीन स्थल हैं।

    ➣ कुछ अन्य पुरास्थल जहां खुदाई हुई, वे हैं- बिहार में सेनुवार, सोनपुर और ताराडीह तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश में खैराडीह और नरहन।

    बिहार, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में रहने वाले लोग टोटी वाले जलपात्र, गोड़ीदार तश्तरियां और गोड़ीदार कटोरे बनाते थे।

    दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, पश्चिमी मध्य प्रदेश, पश्चिमी महाराष्ट्र और अन्यत्र रहने वाले ताम्रपाषाण युग के लोग मवेशी पालन और कृषि करते थे। वे गाय, भेड़, बकरी और भैंस रखते थे और हिरण का शिकार भी करते थे।

    ➣ यहा से ऊंट के अवशेष प्राप्त हुए हैं। मुख्य अनाज गेहूं और चावल के अतिरिक्त वे बाजरे की भी खेती करते थे।

    ➣ तिथिक्रम की दृष्टि से भारत में ताम्रपाषाणीय बस्तियों की अनेक शृंखलायें हैं। कुछ प्राक् हड़प्पीय(हड़पा पूर्व ) है, कुछ हड़प्पाकालीन, तो कुछ हड़प्पेत्तर यानी हड़पा के बाद की।

    संबंधित संस्कृतियों का वर्गीकरण

    1. हड़प्पा पूर्व (4000–2500 ई.पू.)
      सौथी संस्कृति (बीकानेर क्षेत्र) तथा झाकर संस्कृति (सिंध क्षेत्र)
    2. हड़प्पाकालीन (2500–1800 ई.पू.)
      आहड़ संस्कृति (राजस्थान क्षेत्र), गणेश्वर संस्कृति, OCP (गेरूआ मृदभांड संस्कृति)
    3. हड़प्पेत्तर संस्कृति (1800–1300 ई.पू.)
      मालवा, कायथा, एरण, जौरवे संस्कृति

    तांबा और पत्थर के औजारों के उपयोग पर कई संस्कृतियाँ आधारित थी। इस तरह की संस्कृति को ताम्रयुग संस्कृति कहा जाता है –

    ताम्र पाषाण युग की संस्कृति

    अहाड़ संस्कृतिलगभग 1700-1500 ई.पू.
    कायथ संस्कृतिलगभग 2000-1800 ई.पू.
    मालवा संस्कृतिलगभग 1500-1200 ई.पू.
    सावलदा संस्कृतिलगभग 2300-2200 ई.पू
    जोर्वे संस्कृतिलगभग 1400-700 ई.पू.
    प्रभास संस्कृतिलगभग 1800-1200 ई.पू.
    रंगपुर संस्कृतिलगभग 1500-1200 ई.पू.

    अहाड़ संस्कृति (2100-1500 ई.पू.) अन्य ताम्रपाषाणिक संस्कृतियों से भिन्न है, क्योंकि जहां दूसरे केंद्रों में लालकाले लेप के मृद्भांड बने हैं, वहीं यहां पर इस लेप के ऊपर सफेद रंग से चित्रकारी की गई कृष्ण लोहित मृद्भांड परंपरा विशिष्ट रही है।

    ➣ पश्चिमी मध्य प्रदेश में मालवा, कायथा, एरण और नवदाटोली प्रमुख स्थल हैं।

    नवदाटोली, मध्य प्रदेश का एक महत्वपूर्ण ताम्रपाषाणिक पुरास्थल है, जो खारगोन जिले में स्थित है। इसका उत्खनन एच.डी. संकालिया ने कराया था।

    ➣ यहां से मिट्टी, बांस एवं फूस के बने चौकोर एवं वृत्ताकार घर मिले हैं।

    ➣ यहां के मूल मृद्भांड लाल-काले रंग के हैं, जिन पर ज्यामितीय आरेख उत्कीर्ण है।

    ➣ कायथा संस्कृति जो हड़प्पा संस्कृति की कनिष्ठ समकालीन है, इसके मृद्भांडों में कुछ प्राक् हड़प्पीय लक्षण दिखाई देते हैं, साथ ही इन पर हड़प्पाई प्रभाव भी स्पष्ट दिखाई देता है।

    ➣ इस संस्कृति की लगभग 40 बस्तियां मालवा क्षेत्र से प्राप्त हुई हैं, जो अत्यंत छोटी-छोटी हैं।

    ➣ गुलाबी रंग लिये सफेद रंग के मृद्भाण्ड, जिन पर काले रंग की ज्यामितीय चित्रकारी की गयी है, इस संस्कृति की प्रमुख विशेषता है।

    ➣ यहां से कच्चे घर,अस्थि एवं प्रस्तर उपकरण तथा अफगानिस्तान और ईरान के साथ संपर्क का साक्ष्य मिला है।

    किलीगुलमुहम्मद, दाबसादात, पिराकदंब आदि इस संस्कृति के प्रमुख स्थल हैं।

    ➣ यहां से मिले मृद्भाण्डों पर वृक्षों से घिरे कुकुदमान (डीलवाले) वृषभ का चित्रांकन मिला है, जिसके पैरों के बीच हिरन का अंकन है।

    ➣ यहां से अलंकरणयुक्त नारी की मृण्मूर्तियां भी मिली हैं। यहां पत्थरों की दीवारों पर सफेद चूने लगाये जाते थे। मकान दोमंजिले होते थे कच्ची ईंटों से बनाये जाते थे।

    पश्चिमी बलूचिस्तान में विकसित यह संस्कृति सिंध तक विस्तृत थी।

    ➣ यहां से पूर्ण शवाधान का अवशेष मिला है। इस संस्कृति से पशु एवं नारी मृण्मूर्तियां नहीं मिली हैं।

    ➣ मृद्भाण्डों पर दूधिया, काले, लाल, नीले एवं हरे रंग से चित्रकारी की जाती थी।

    ➣ यहां पर लाल मृद्भाण्डों पर काले रंग का अलंकरण पाया जाता है।

    राना घुडई, मुगल धुंडई, पेरिआनो धुंडई, सूरजंगल, डाबरकोट, कौदानी आदि इस संस्कृति के प्रमुख स्थल हैं।

    पेंदीदार कटोरे यहां के प्रमुख पात्र थे। यहां से नारी, पशु, लिंग, योनि की मृण्मूर्तियां बनाने के साक्ष्य भी मिले।

    ➣ पश्चिमी महाराष्ट्र के प्रमुख पुरास्थल हैं-अहमदनगर जिले में जोर्वे, नेवासा और दैमाबाद; पुणे जिले में चंदोली, सोनगांव, इनामगांव, प्रकाश और नासिक। ये सभी पुरास्थल जोर्वे संस्कृति (1400-700 ई.पू.) के हैं।

    ➣ अब तक ज्ञात 200 जोर्वे स्थलों में गोदावरी का दैमाबाद सबसे बड़ा है। यह लगभग 20 हेक्टेयर में फैला है, जिसमें लगभग 4000 लोग रह सकते थे।

    ➣ कोटदिजी संस्कृति सिंध प्रांत आधुनिक पाकिस्तान के खैरपुर नामक स्थान पर स्थित प्राचीन सैंधव सभ्यता का एक केन्द्र था। जिसकी खोज धुर्ये ने 1935 ई. में की ।

    ➣ बस्ती के चारों ओर विशाल सुरक्षात्मक दीवार के अवशेष, पत्थर का चाक, कांसे की बनी मोटी चूड़ी, छह दलीय पुष्पाकृति आदि मिले हैं। जो लगभग 3000ई. पू. की प्रतीत होती है।

    ➣ यहाँ के मृद् भाण्डों में मोर, मृग, मत्स्य, शल्क और गेंदों की जुड़ी हुई आकृतियों का अपरिष्कृत चित्रण हुआ है।

    ➣ सम्भवतः यहाँ पर पत्थरों का उपयोग घर बनाने में किया जाता था, इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि पाषाणयुगीन सभ्यता का अंत यही पर हुआ था।

    ➣ कोटदीजी के विस्तृत स्तर में कांस्य की चपटे फलक वाली कुल्हाड़ी, तीराग्र ,छेनी, अंगूठी व दोहरी एवं इकहरी चूड़ियाँ आदि वस्तुएँ मिली हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ से मृत्पिण्ड भी मिले हैं।

    ➣ यहाँ लगभग 4000 ई. पू. में ही नगरीकरण प्रारम्भ हो गया था। यहाँ से प्राप्त फिरोजा तथा नीलम के मनको से मध्य आईसीए के साथ सबंधो का पता चलता है।

    आयताकार नगर के अवशेष, नगर की सुरक्षा हेतु विशाल दीवार आदि यहां की विशेषताएं हैं।

    ➣ यहाँ से 7000-6000 ई. पू. के कृषि एंव पशुपालन के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। यह भारत में सर्वप्रथम गेहूंजौ की खेती का स्थल है।

    ➣ यहाँ से मानव के साथ बकरी दफनाने जाने का साक्ष्य मिला है।

    ➣ मिट्टी की बनी मातृदेवी की प्रतिमाएं, कपास की खेती का प्राचीनतम साक्ष्य आदि यहां से प्राप्त हुए हैं।

    ➣ किलेबंदी के अवशेष, गेहूं, जौ, मूंग-मसूर दाल, मटर के साक्ष्य, लीवान नामक स्थान, जहां से पत्थर से औजार बनाने के विशाल कारखाने आदि मिले हैं।

    ➣ महल सदृश्य दो विशाल भवन, धूप में सुखाई गयी ईंट का प्रयोग, मातृदेवी की प्रतिमाएं, कांसे की मूठदार कुल्हाड़ियां आदि मिले हैं।

    ➣ यह स्थल एक बन्दरगाह के रूप में था। जहाँ से हड़प्पा पूर्व एवं हड़प्पा कालीन अवशेष प्राप्त हुए हैं।

    ➣ सिंधु सभ्यता के विपरीत, भवन निर्माण के लिए मुख्यतः कच्ची ईटों का ही प्रयोग किया जाता था।

    ➣ बालाकोट का सबसे समृद्ध उद्योग सीप उद्योग था। खुदाई में यहाँ से हज़ारों की संख्या में सीप की बनी चूड़ियों के टुकड़े मिले हैं।

    विशाल इमारत, कुबड़े बैल एवं पीपल के पेड़, अंकित सुन्दर मिट्टी के बर्तन आदि प्राप्त हुए हैं।

    ➣ ताम्रपाषाणीय संस्कृतियाँ 1200 ई.पू. तक अस्तित्व में रही। इसके लुप्त होने का कारण 1200 ई.पू. के बाद से वर्षा की मात्रा में कमी आना माना जाता है।

    ➣ इसमें जोरवे संस्कृति 1200 ई. पू. के बाद भी 700 ई. पू. तक जीवित रही।

    ताम्रपाषाण युगीन स्थल

    ताम्रपाषाण युगीन स्थल
    स्थल राज्य प्राप्त साक्ष्य
    नवादाटोली मध्य प्रदेश इस स्थल का उत्खनन एच.डी. सांकलिया द्वारा किया गया। इंदौर के गिकट नर्मदा नदी के दक्षिणी तट पर अवस्थित है। चित्रित काले व लाल मृदभांड जिन्हें मालवा मृदभाण्ड के नाम से जाते हैं। कताई बुनाई व चरखे तकलियां प्राप्त हुई।
    ताम्बवती राजस्थान काले व लाल मृदभाण्ड जिन पर सफेद रैखिक चित्रों से सजे रहते हैं।
    दैमाबाद महाराष्ट्र गोदावरी नदी के तट पर स्थित है। तांबे की 4 प्रमुख वस्तुएं (1. रथ चलाते हुए मनुष्य, 2. साड़, 3. गैंड़ा, 4. हाथी) ठोस धातु से निर्मित प्राप्त हुई। कलश शवाधान के प्रमाण कलश घरों के फर्श के नीचे रखने का प्रमाण।
    इमाम गाँव महाराष्ट्र कच्ची मिट्टी के मकान व गोलाकार गड्डो वाले मकान के साक्ष्य।
    नेवासा महाराष्ट्र पटसन का प्रथम साक्ष्य व मृदभाण्ड लाल तल पर काली डिजाइन वाले चाक निर्मित बर्तनों के प्रमाण मिले।

    धातु युग

    ➣ नवपाषाण-युग के अंतिम चरण से धातु (तांबे) का व्यवहार आरंभ हुआ। कालांतर में कांसा और लौंह से भी लोग परिचित हुए। अतः, पाषाण-युग के पश्चात धातुयुग, का प्रारंभ हुआ।

    ➣ धातुयुग क्रमानुसार 3 कालों में विभक्त। इन्हीं तीन चरणों में मानव सभ्यता का उदय हुआ।

    1. ताम्र युग
    2. कांस्य युग
    3. लौह युग

    ताम्र युग

    ➣ यह ताबें के प्रयोग का युग था। जिसे सैंधव-पूर्व सभ्यता का नाम दिया जाता है। इसे सैंधव सभ्यता का मूल माना जाता है।

    ➣ इस समय तक लोगों को कांसे और लोहे के बारें में ज्ञान नहीं था। धातु के रूप में ये लोग सिर्फ ताम्बें का उपयोग करते थे।

    कुल्हाड़ी, भाले, तलवार तथा आवश्यकता की सभी वस्तुयें तॉबे से बनाई जाने लगी।

    ➣ इस संस्कृति में चाक-निर्मित लाल एवं काले मृद्भाण्डों का प्रयोग किया जाता था। मृद्भाण्डों के आधार पर इस संस्कृति को क्षेत्रीय उपखण्डों में विभाजित किया गया है।

    ➣ पहला, पांडुरंग के मृद्भाण्ड वाली दक्षिण क्षेत्र की संस्कृति, जिसमें क्वेटा, कुल्ली एवं अमरीनाल प्रमुख संस्कृतियां हैं तथा दूसरा, लाल रंग के मद्भाण्ड वाली उत्तरी क्षेत्र की संस्कृति, जिसमें जोब प्रमुख संस्कृति है।

    ➣ भारत में उत्तरी गंगा घाटीगंगा-यमुना दोआब क्षेत्र के स्थलों से ताम्र-उपकरण जैसे- हाथ की कुल्हाड़ी मत्स्य भाले, मानवतारोपी मूर्तियाँ प्राप्त हुए हैं। इन उपकरणों को गंगाघाटी ताम्रनिधि के नाम से पुकारा जाता है।

    कांस्य युग (2000-1500 ई. पू)

    ➣ इस यगु में मानव ने तांबा और टिन मिलाकर एक नवीन धातु कांसा बनाया जो अत्यंत कठोर था। यह युग पाषाण युग तथा लौह युग के बीच का है।

    ➣ कांस्य युग में लोहे की खोज नहीं हो पाई थी और लौह युग में तांबा, कांसा और लोहे के अलावा मनुष्य कुछ अन्य ठोस धातुओं की खोज तथा उनका उपयोग भी सीख गया था।

    ➣ उत्तरी भारत में प्राप्त हुये इन कांसे के औजार में चित्र भी थे।

    ➣ इस युग मानव शहरी सभ्यताओं में बसने लगा और इसी कारण से विश्व की कई जगहों में पौराणिक सभ्यताओं का विकास हुआ। साथ ही सभ्यताओं में अलग-अलग लिपिओं का विकास हुआ जिनकी मदद से आज के पुरातत्व शास्त्रियों को उस युग के बारे में महत्वपूर्ण तथ्य हासिल होते हैं।

    हड़पा सभ्यता (2500-1750 ई.पू. ) कांस्य युग से सम्बंधित था। इसलिए इसे कांस्य युगीन सभ्यता भी कहा जाता है। इसके अलावा मिस्र सभ्यता व चीनी सभ्यता समकालीन थे।

    लौह युग (1200-600 ई. पू)

    ➣ इस युग में मानव ने लोहे का इस्तेमाल किया। इतिहास में यह युग पाषाण युग तथा कांस्य युग के बाद का काल है। इस काल में लोहे के अस्त्र शस्त्रों का निर्माण किया जाने लगा।

    ➣ मानव सभ्यता के विकास क्रम में लोहे का प्रयोग मनुष्य ने 2000 ई.पू. के आस-पास ही सीख लिया था, परंतु उस समय इसका प्रयोग कुछ समुदायों तक ही सीमित रहा।

    एशिया माइनर (तुर्की) की हिट्टाइट जाति ने लोहे के निर्माण की तकनीक खोज निकाली तथा इसके साथ ही लौहे की ढलाई का कार्य 1400 ई. पू. के लगभग प्रारंभ हो गया।

    ➣ 1200 ई.पू. तक फिलिस्तीन, तुर्की, सीरिया, ईरान, इराक तथा यूनान के निवासी लोहे के औजारों तथा उपकरणों का प्रयोग करने लगें इस प्रकार 1200 ई.पू. से लौह युग का प्रारंभ हुआ।

    भारत में लौह युग का प्रारंभ 1000 ई.पू. के लगभग माना जाता है। दक्षिण भारत में उत्तर पाषाण काल के बाद लौह काल प्रारम्भ हुआ जबकि उत्तरी भारत में ताम्रकाल के बाद लौह काल प्रारम्भ हुआ।

    ➣ सुप्रसिद्ध पुराविद् ह्वीलर की मान्यता है कि भारत में सर्वप्रथम लोहे का प्रचलन ईरान के हखामनी शासकों द्वारा किया गया था।

    ➣ इसी प्रकार कुछ अन्य विद्वान यूनानियों को इसे लाने का श्रेय प्रदान करते हैं। किंतु ये मत समीचीन नहीं लगते।

    ➣ यूनानी साहित्य में इस बात का उल्लेख मिलता है कि कारीगर लौह उपकरणों का निर्माण करने में कुशल थे।

    ➣ संभवत: यह शब्द सामान्य धातु के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है तथा भारत के पास ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जिसके आधार पर यह सिद्ध किया जा सके कि ऋग्वैदिक आर्य लोहे से परिचित थे।

    ➣ सामान्यतः यह माना जाता है कि भारत में आर्यों के आगमन के साथ लौहे का प्रचलन आरंभ हुआ। सर्वप्रथम उत्तर वैदिक काल (1000-600 ई. पू.) के ग्रंथों में हमें इस धातु के स्पष्ट संकेत प्राप्त होते हैं।

    ➣ इसमें मनुष्य ने विभिन्न भाषाओं की वर्णमालाओं का विकास किया जिसकी मदद से उस काल में साहित्य और इतिहास लिखे जा सके। संस्कृत और चीनी भाषाओं का

    ➣ साहित्य इस काल में फला-फूला। ऋग्वेद और अवस्ताई गाथाएँ इसी काल में लिखी गई थीं।

    ➣ ऋग्वेद में अयस् नामक धातु का उल्लेख प्राप्त होता है जिसके वास्तविक अर्थ के विषय में मतभेद है।

    ➣ अथर्ववेद में लोहायस् तथा श्याम अयस् शब्द मिलते हैं। विद्वानों ने लौह शब्द को तांबे के अर्थ में तथा श्याम शब्द को लोहे के अर्थ से ग्रहण किया है। इस प्रकार

    ➣ अथर्ववेद में उल्लिखित श्यामअयस् से तात्पर्य लौह धातु से ही है। इसके बाद अयस् शब्द लोहे का ही पर्याय बन गया।

    ➣ काठक संहिता में चौबीस बैलों द्वारा खींचे जाने वाले भारी हलों का उल्लेख मिलता है। इनमें अवश्य ही लोहे की फाल लगाई गयी होगी।

    अथर्ववेद भी लोहे से बने हुए फाल का उल्लेख करता है। इस प्रकार साहित्यक प्रमाणों के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि ईसा-पूर्व 8वीं सदी में भारतीय को लौहे का ज्ञान प्राप्त हो चुका था।

    ➣ विश्व के संदर्भ में लौह युग लगभग 1300 ई.पू. में आरंभ हुआ। भारत में लोहे का साक्ष्य 1000 ई.पू. के आस-पास एटा जिले के अतरंजीखेड़ा से प्राप्त हुआ।

    ➣ हाल के वर्षों में लौह युग के आरंभ का संबंध चित्रित धूसर मृद्भाण्ड से स्थापित किया गया है। जिनमें सबसे पहले अहिच्छत्र के उत्कृष्ट मृदभाण्डों और उसके बाद हस्तिनापुर के मृद्भाण्ड का उल्लेख किया जाता है।

    ➣ इस युग में चाक की सहायता से विशेष प्रकार के मिट्टी के बने बर्तन चित्रित धूसर मृद्भांड (PGW: Painted Grey Ware) प्रमुख रूप से पाये जाते हैं। अतः इस संस्कृति को चित्रित धूसर मृद्भांड संस्कृति कहा जाता है।

    साक्ष्य

    ➣ भारत में इस अवस्था से सम्बद्ध स्थल दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, पश्चिमी मध्य प्रदेश, पश्चिमी महाराष्ट्र तथा दक्षिण-पूर्वी भारत में पाये गये हैं।

    ➣ दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में अहर और गिलुन्द, दो स्थलों की खुदाई की गई। जो बनास बाटी के सूख भागों में स्थित हैं।

    ➣ पश्चिमी मध्य प्रदेश या मालवा में कयथ और एरन की खुदाई हुई है। मालवा से प्राप्त मृद्भांडों को ताम्र पाषाणीय मृद्भाडा में उत्कृष्ट माना गया है।

    ➣ पश्चिमी महाराष्ट्र के जोरवे, नेवासा एवं दैमाबाद (अहमदनगर), चंदाली, सोनगाँव, इनामगाँव, झामगाँव, प्रकाश और नासिक में विस्तृत उत्खनन किए गये हैं। ये सभी स्थल जोरवे संस्कृति से सम्बंधित हैं।

    ➣ ये केन्द्रीय और पश्चिम भारत की मालवा ताम्र-पाषाण संस्कृति से पाए गए हैं। मिट्टी के इन बर्तनों और इनके कुछ अन्य सांस्कृतिक तत्व महाराष्ट्र में भी दिखाई देते हैं।

    जलोढ़ मिट्टी वाले मैदानों और घने जंगल वाले इलाकों को छोड़कर प्राय: समूचे देश में ताम्र पाषाणीय संस्कृतियाँ प्राप्त हुई हैं।

    लौह उपकरण प्राप्ति स्थल

    धातु युग में लौह उपकरण प्राप्ति स्थल

    सबंधित तथ्य

    ➣ ताम्रपाषाण लोग ज्यादातर पत्थर और ताम्बे की वस्तुओं का इस्तेमाल करते थे लेकिन के कभी-कभी निम्न श्रेणी के काँसे और लोहे का भी इस्तेमाल करते थे।

    ➣ ताम्र पाषाणकालीन लोग मुख्यत: ग्रामीण समुदाय के थे और देश के ऐसे भागों में फैले थे, जहाँ पहाड़ी जमीन और नदियां थीं।

    ➣ ताम्र पाषाण युग के लोग गाय, भेड, बकरी, सुअर और भैंस पालते थे तथा हिरण का शिकार करते थे। ऊँट के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं।

    ➣ ताम्र पाषाणीय लोग पशुपालन का सदुपयोग नहीं कर सके। वे विस्तृत कृषि भी न कर सके। हल और फावड़ा न होने से वे केवल झूम खेती कर पाते थे।

    ➣ इस सभ्यता के लोग घोड़े से परिचित नहीं थे हालाँकि यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा जा सकता है।

    ➣ वे गेहूँ, चावल, बाजरा, मसूर, उड़द, मूंग, मटर, रागी (मडुवा), अलसी तथा कपास उगाते थे और मछली पकड़ने के काटे (ब्रसी) का प्रयोग करते थे।

    ➣ बस्तियाँ छोटी और बड़ी होती थीं। वे अपना घर गीली मिट्टी थोप कर बनाते थे, अहार के लोग पत्थर से बने घरों में रहते थे।

    कयथा (मालवा) और एरण (मध्य भारत) उनकी सबसे पुरानी बस्तियाँ हैं। उन्होंने ही सर्वप्रथम बड़े-बड़े गाँव बसाये।

    ➣ वे चाकों पर बने काले-लाल मृद्भांडों का प्रयोग करते थे। उनकी प्राक् कांस्य अवस्था से लगता है कि उन्होंने सर्वप्रथम चित्रित मृद्भाडों का प्रयोग किया।

    ➣ वे पकाने, खाने, पीने और समान रखने के लिए इन मृभांडों का प्रयोग करते थे। लोटा एवं थाली दोनों उनके द्वारा प्रयुक्त होता था।

    ➣ वे लोग ताम्र तथा पत्थर शिल्प के बेहद कुशल कारीगर भी थे। खुदाई में औजार, हथियार और ताम्बे की चूड़ियों का भी पता चला है।

    मालवा में बुनाई वाले यन्त्र से ज्ञात होता है कि उन्हें कताई और बुनाई का भी ज्ञान था। सूती रेशम और सेमल रेशम (कपास के पेड़) से बने कपास-सूत और रेशमी धागे महाराष्ट्र में मिले जो कपड़ा निर्माण की कुशलता के द्योतक हैं।

    इनामगाँव में कुम्हार, लोहार, हाथी दाँत निकालने वाले, चूना-निर्माता और टेराकोटा जैसे विभिन्न शिल्पों के काम करने वाले कारीगर भी थे।

    ➣ लोग मृतक को अस्थिकलश में रखकर अपने घर में फर्श के नीचे उत्तर दक्षिण स्थिति में गाड़ते थे। मृतकों के साथ बर्तन और कुछ ताम्बे की वस्तुएँ कब्र में डाली जाती थीं। हड़प्पा के लोगों की तरह उन्होंने अलग कब्रिस्तान का इस्तेमाल नहीं किया।

    ➣ महिलाओं की टेराकोटा मूर्तियों से पता चलता है कि ताम्रपाषाणीय लोग मातृ देवी की पूजा करते थे। अनेक कच्ची मिट्टी की नग्न पुतलियाँ भी पूजी जाती थीं।

    ➣ इस सभ्यता की खुदाई से प्राप्त ताम्र वस्तुयें हैं-तीर के नोक, बरछे के फल, बसियाँ, सेल्ट, कंगन, औजारों की मूठे, चूड़ियाँ, छेनियाँ आदि।

    ➣ ताम्र पाषाणीय लोग लिखने की कला नहीं जानते थे और न ही वे नगरों में रहते थे, जबकि कांस्ययुगीन लोग नगरवासी हो गये थे।

    ➣ ताम्र पाषाणीय गैरिक मदभांड वाले लोग हड़प्पावासियों के सम-सामयिक थे और वे जिस क्षेत्र में रहते थे वह भी हड़प्पाइयों के क्षेत्र से बहुत दूर नहीं था।

    नवदाटोली, मध्य प्रदेश का एक महत्पवूर्ण ताम्रपाषाणिक पुरास्थल है जो इंदौर के निकट स्थित है। यहाँ से मिट्टी, बांस तथा फूस के बने चौकोर एवं वृत्ताकार घर मिले हैं।

    ➣ ताम्रपाषाण युग में सामाजिक संरचना, अनाज, मिट्टी के बर्तनों आदि से क्षेत्रीय अन्तर स्पष्ट हो जाते हैं। पूर्वी भारत में चावल का उत्पादन हुआ और पश्चिम भारत में जौ और गेहूँ की खेती की गई।

    ➣ कांसे के उपकरणों के प्रयोग से क्रीट, मिस्र, मेसोपोटामिया और सिंधु में घाटी भी प्राचीनतम सभ्यताओं के विकास में सहायता मिली।

  • पाषाणकालीन सभ्यता : प्रारंभिक मानव जीवन और सांस्कृतिक विकास

    📚 विषय सूची

    पाषाण काल : परिचय

    प्रागैतिहासिक काल जिस काल का कोई लिखित साक्ष्य नहीं मिलता है, जैसे – पाषाण कालीन सभ्यता (पुरा पाषाण काल, मध्य पाषाण काल एवं नव पाषाण काल)।

    आद्य-ऐतिहासिक काल जिस काल के लिपि के साक्ष्य तो हैं किंतु उनके अपठ्य या दुर्बोध होने के कारण उनसे कोई निष्कर्ष नहीं निकलता, जैसे – सिंधु घाटी सभ्यता एवं ताम्र सभ्यता

    ऐतिहासिक काल जिस काल से लिखित विवरण मिलते हैं, जैसे – छठी शताब्दी ईसा पूर्व के आस-पास का काल, वैदिक काल, बौद्ध धर्म एवं जैन धर्म का जन्म।

    पृथ्वी की रचना 4600 मिलियन वर्ष पूर्व
    जीवन की उत्पति 3500 मिलियन वर्ष पूर्व
    मेसोजोइक युग (डायनोसर का स्वर्ण युग) 200 मिलियन वर्ष पूर्व
    स्तनधारी जीवों की उत्पति 65 मिलियन वर्ष पूर्व
    पृथ्वी पर प्रथम मानव 30 करोड़ वर्ष पूर्व

    ➣ भारत में पाषाणकालीन सभ्यता की खोज का कार्य सर्वप्रथम 1863 ई. में आरम्भ हुआ।

    ➣ सर्वप्रथम भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग के विद्वान रॉबर्ट ब्रूस फुट ने पल्लवरम् (मद्रास) से पूर्व पाषाण कालीन उपकरण, पत्थर के हाथ की कुल्हाड़ी प्राप्त किया।

    ➣ ब्रिटिश भू-वैज्ञानिक और पुरातत्वविद् रॉबर्ट ब्रूस फुट ने भारतीय संस्थान जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के लिए भारत में इतिहास पूर्व स्थानों का भू-विज्ञान संबंधी सर्वेक्षण किया था जिन्हें भारत के इतिहास पूर्व अध्ययन का संस्थापक माना जाता है।

    पुरापाषाण काल (प्राचीन पत्थर काल)
    अन्य नाम – शिकार व खाद्य संग्रह युग
    प्रथम खोजकर्ता : रोबर्ट ब्रूस फुट
    प्रथम ज्ञात मानव होमोनिडस (दक्षिणी व पूर्वी अफ्रीका)
    आवास : वृक्षों पर
    अस्ट्रेलोपैथिकस
    हिम नदी युग का प्रारम्भ –नियंडरथल मानव
    मानव कंकाल दफ़नाने की प्रक्रिया
    भाषा की उत्पत्ति, हस्त कुठार का निर्माण
    आग की खोज
    आवास : गुफा
    हिम नदी युग का अंत
    मध्य पाषाण काल (मध्य पत्थर काल)
    अन्य नाम – शिकार व पशुपालन युग
    प्रथम खोजकर्ता : जॉन इवांस
    नव पाषाण काल (नवीन पत्थर काल)
    अन्य नाम – अन्न उत्पादक युग
    प्रथम खोजकर्ता : डॉ. प्राइमरोज
    प्रथम पालतू पशु कुत्ता
    पहिये व कृषि का अविष्कार, प्रथम फसल जौ
    वस्त्र निर्माण की कला
    आवास : कच्चे / पक्के मकान
    मानव कंकाल दफ़नाने की प्रक्रिया
    धातु युग का आरम्भ
    ताम्र पाषाण काल (तांबा +पत्थर काल)
    मानव द्वारा प्रयुक्त पहली धातु ताम्बा
    सिंधु घाटी सभ्यता (कांस्य युगीन संभ्यता)
    वैदिक सभ्यता (लौह युग का आरम्भ)

    पूर्व/पुरा-पाषाण काल शिकार एवं खाद्य संग्रह युग (25 लाख ई.पू.)

    ➣ आरंभिक काल में मानव पत्थर का प्रयोग करता था, इसलिए पुरातत्त्वविदों ने इसे पुरापाषाण काल नाम दिया है। यह शब्द प्राचीन और पाषाण (पत्थर) से बना है।

    ➣ भारत में मानव के प्राचीनतम अस्तित्व का संकेत द्वितीय हिमावर्त्तन (ग्लेसिएशन) काल की परतों से प्राप्त पत्थर के उपकरणों से मिलता है, जिसका काल 25,00,000 ई.पू. बताया जाता है।

    ➣ आदिम मानव को धातुओं का ज्ञान नहीं था, उसके पास निश्चित घरों का अभाव था। हालाँकि जानवरों का भय बराबर बना रहता था।

    खेती करना, आग जलाना और बर्तन बनाने की कला का ज्ञान नहीं था। वे शिकार द्वारा जानवरों के मांस और ऐसे फलों एवं सब्जियों, कंद-मूलों (खाद्य संग्रह) पर जीवन व्यतीत करते जो जंगलों में उपजाते थे।

    ➣ पुरापाषाण युग को मानवीय व जलवायु परिवर्तनों के आधार पर तीन वर्गों में बाँटा गया है –

    पुरापाषाण युग का विभाजन

    1. निम्न पुरापाषाण युग (Lower Palaeolithic Age) – लगभग 25,00,000 से 1,00,000 ई.पू.
    2. मध्य पुरापाषाण युग (Middle Palaeolithic Age) – लगभग 1,00,000 से 40,000 ई.पू.
    3. उत्तर या उच्च पुरापाषाण युग (Upper Palaeolithic Age) – लगभग 40,000 से 10,000 ई.पू.

    उपकरणों की भिन्नता के आधार पर

    1. पूर्व पुरापाषाण काल – क्रोड उपकरण (हस्तकुठार, खंडक एवं विदारिणी)
    2. मध्य पुरापाषाण काल – फलक उपकरण
    3. उच्च पुरापाषाण काल – तक्षिणी एवं खुरचनी उपकरण

    ➣ फलकों की अधिकता के कारण मध्य पुरापाषाण काल को फलक संस्कृति भी कहा जाता है।

    हिमनद युग का प्रारम्भ 10 लाख वर्ष ई०पू०
    प्रथम हिम नदी युगजावा मानव- 5 लाख वर्ष ई०पू०
    द्वितीय हिम नदी युगपीकिंग मानव- 120,000 वर्ष ई०पू०
    तृतीय हिम नदी युगनियंडरथल मानव- 50,000 वर्ष ई०पू०
    चतुर्थ हिम नदी युगक्रोमैग्नन मानव- 25,000 वर्ष ई०पू०
    उत्तर हिम नदी युगउत्तर पाषाण काल- 10,000 वर्ष ई०पू०

    निम्न पुरापाषाण युग या पूर्व पुरापाषाण काल (25 लाख -1 लाख ई.पू. )


    ➣ अधिकांश हिमयुग आरम्भिक पुरापाषाण युग में ही व्यतीत हुआ माना जाता है।

    ➣ प्राचीन पुरापाषाण-युग लगभग 20 लाख साल पहले अफ्रीका में शुरू हुआ लेकिन भारत में यह 6 लाख वर्ष से अधिक प्राचीन नहीं है। इसका प्रमाण है- कुल्हाड़ी या हस्त-कुठार, विदारणी (क्लीवर) और गंडासा (खंडक) का उपयोग।

    ➣ उपकरणों के अतिरिक्त बेलन के लोंहदा नाला क्षेत्र से इस काल की अस्थि निर्मित मातृदेवी की एक प्रतिमा मिली है, जो संप्रति कौशाम्बी संग्रहालय में सुरक्षित है।

    रेमण्ड डार्ट ने 1924 ई. में दक्षिण अफ्रीका के वेचुआनालेंड की टांग घाटी से अस्ट्रेलोपैथिकस अफ्रिकेनस अर्थात दक्षिण अफ़्रीकी कपि मानव की खोज की। इसका काल 10 लाख ई. पू. निर्धारित किया गया।

    ➣ एशिया में जावा द्वीप (इंडोनेशिया) से 1891 ई. में डॉ यूजीन डुवाय ने 9 लाख ई. पू. के जावा कपि मानव की खोज की एंव इसे पीठिकेन्थरोंपरस इरेक्टस नाम दिया। इसी क्रम में 1927 ई. में चीन- काओ तिन से बोहलिन ने पीकिंग मानव के 10 लाख ई. पू. जीवाश्म प्राप्त किये।

    ➣ निम्न पूरा पाषाण काल में मानव का चार पैरों से उठकर दो पैरों पर खड़ा होना महत्वपूर्ण था। जिसने मानव ने स्वंय को अन्य जीवों की श्रेणी से पृथक कर लिया। अब वह पेड़ों से उतरकर धरती पर चलने लगा था।

    चार पैरों वाला मानव रामा पिथिकस था जबकि दो पैरों पर खड़े होने वाला अस्ट्रेलोपैथिकस। अस्ट्रेलोपैथिकस को मानव विकास में महत्वपूर्ण घटना माना गया है।

    ➣ चूँकि मानव अब पेड़ों से उतरकर जमीन पर चलने लगा। सम्भवत: ऐसे में उसका सामना जंगली जानवरों से होने लगा। फलत: वह पत्थरों का उपयोग करने लगा।

    प्रमुख पुरापाषाणीय संस्कृतियाँ

    ➣ पत्थरों के हथियारों के आधार पर पूरा-पाषाण कालीन संस्कृतियों-

    • पूर्व चेलियन संस्कृति
    • चेलियन संस्कृति
    • अबेविलियन (Abbevillian) संस्कृति
    • सोहन संस्कृति

    ➣ अब मानव हाथ से इस्तेमाल करने वाले औजार कुल्हाड़ियों, गडाँसों और चाकुओं का उपयोग करने लग गया था।

    ➣ भारत में प्राप्त हुई प्रस्तर कुल्हाड़ियाँ प्रायः पश्चिम एशिया, यूरोप एवं अफ्रीका से प्राप्त कुल्हाड़ियों जैसी ही हैं।

    ➣ भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण के वैज्ञानिक रॉबर्ट ब्रूस फुट ब्रिटिश भूगर्भ वैज्ञानिक और पुरातत्वविद थे। 1863 ई. में रॉबर्ट ब्रूस फुट ने मद्रास के पास पल्लवरम नामक स्थान से पहला हैंडऐक्स प्राप्त किया था।

    ➣ पत्थर के औजारों का इस्तेमाल मुख्यतः काटने, खुदाई और चमड़ा निकालने के लिए किया जाता था।

    ➣ प्राचीन पुरापाषाण स्थल पंजाब के सोहन या सोन नदी की घाटी में पाए गए हैं, जो अब पकिस्तान में हैं। वर्ष 1935 में डी. टेरा के नेतृत्व में एल कैम्ब्रिज अभियान दल ने सोहन घाटी में सबसे महत्वपूर्ण अनुसंधान किया।

    ➣ पहली बार सोहन क्षेत्र से सम्बन्धित साक्ष्य मिलने के कारण इसे सोहन संस्कृति की संज्ञा भी दी गयी है।

    उत्तर प्रदेश में बेलन और राजस्थान के दिदवाना के रेगिस्तानी क्षेत्र में लोवर पुरापाषाण काल के औजार पाए गए हैं। बेलन घाटी में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के जी.आर. शर्मा के निर्देशन में अनुसंधान किया गया। पूर्व पुरापाषाण काल से संबंधित यहां 44 पुरास्थल प्राप्त हुए हैं।

    ➣ आन्ध्र प्रदेश में नागार्जुन कोण्डा एक महत्त्वपूर्ण स्थल है और भोपाल के पास भीमबेटका की गुफाएँ और चट्टानी आश्रय भी लोवर पुरापाषाण-युग की विशेषताएँ दर्शाते हैं। अनेक स्थल कश्मीर तथा थार के मरुस्थल (डिडवाना क्षेत्र) में भी मिले हैं।

    मध्य पुरापाषाण युग या शल्क संस्कृति (1 लाख – 40 हजार ई.पू. )

    ➣ मध्य पूरा पाषाण कालीन संस्कृति का प्रमुख प्रतिनिधि नियन्डरस्थल मानव था एंव इस संस्कृति को मॉस्टेरियन संस्कृति कहा जाता है। मॉस्टेरियन संस्कृति के साक्ष्य पश्चिमी जर्मनी , स्विट्जरलैंड , हंगरी , इटली तथा पश्चिमी एशिया से मिले हैं।

    ➣ नियन्डरसथल मानव ने अत्यधिक सर्दी से बचने के लिए गुफाओं में रहना प्रारम्भ किया। सम्भवत नियन्डरसथल मानव ने ही सर्वप्रथम आग का प्रयोग आरम्भ किया।

    शिकार एंव खाद्य संग्रह अभी भी आजीविका का प्रमुख साधन था। अग्नि के अविष्कार के बाद अब वे उन्हें भून कर खाने लगे।

    ➣ नियन्डरस्थल इतिहास का वह सर्वप्रथम मानव था जिसने मृतकों को दफनाना आरम्भ किया। नियन्डरस्थल मानव को इतिहास का प्रथम दार्शनिक मानव माना जाता है।

    ➣ इस युग में पत्थरों से निर्मित विभिन्न प्रकार के फलक, वेधनी, छेदनी, पत्ती, बरछी, बरमा और खुरचन का प्रयोग होता था। ये सभी पत्थर के बने होते थे। जो सम्पूर्ण भारत में पाये गये हैं।

    ➣ इस युग का कलाकृतियाँ नर्मदा नदी के किनारे-किनारे अनेक स्थानों पर और तुंगभद्रा नदी के दक्षिणवर्ती स्थानों पर भी पाए गए हैं।

    विन्ध्य की तलहटी में स्थित बेलान घाटी (उत्तर प्रदेश), पत्थर के औजार और ढोर-डंगर, हिरण सहित पशु जीवाश्मों के मामले में काफी समृद्ध है। जो पूर्व और मध्य पाषाण-युग दोनों से सम्बन्धित हैं।

    उच्च पुरापाषाण युग या शल्क-फलक संस्कृति (40 हजार – 10 हजार ई.पू. )

    ➣ इस युग में आद्रता कम हो गयी थी और जलवायु अपेक्षाकृत गर्म होले जाने से हिमयुग की अंतिम अवस्था आरम्भ हो चुकी थी।

    ➣ इसी युग में आधुनिक प्रारूप के मानव (होमोसेपियन्स) का उदय माना जाता है।

    ➣ नियन्डरस्थल मानव जाती बिल्कुत समाप्त हो गयी उसका स्थान अन्य मानव जातियों द्वारा ले लिए गया – क्रोमैग्नन मानव, ग्रीमालदी मानव, कोंब कोपेल मानव, चांसलेड मैन

    ➣ उत्तर पूरा पाषाण कालीन उक्त मानवो ने ऑरिग्नेशियन संस्कृति, संस्कृति, मैग्डेलियन संस्कृति को जन्म दिया।

    ➣ मैग्डेलियन संस्कृति महत्वपूर्ण है। कला के क्षेत्र में यह संस्कृति अल्टामीरा में प्राप्त चित्रों का युग था जिन्हे क्रो-मैग्नन मानव द्वारा बनाये गए थे। इस काल को रेनडियर काल के नाम से भी जाना जाता है।

    ➣ इस काल में मानव ने पत्थरों से बने हथियारों के साथ हाथी दांत , सींग एंव अस्थियों का प्रयोग आरम्भ कर दिया। साथ ही वह मिट्टी की मूर्तियों भी बनाने लग गया था।

    ➣ इस युग के प्रस्तर फलक और कुल्हाड़ियाँ आंध्र, कर्नाटक, महाराष्ट्र, केन्द्रीय मध्य प्रदेश, दक्षिण उनर प्रदेश, पर्व बिहार (वर्तमान झारखंड) के पठारी भाग में पाये गये है।

    ➣ मानवों द्वारा गुफाएँ और चट्टानी आश्रयों का इस्तेमाल अपर पुरापाषाण-युग में भोपाल से 45 किलोमीटर दक्षिण में भीमबेटका में खोजा गया है।

    ➣ गुजरात के टिब्बों के ऊपरी तलों पर एक उच्च पुरापाषाणीय भंडार भी मिला है, जिसमें शल्क फलक, तक्षणियाँ और खुरचनियाँ सम्मिलित हैं।

    ➣ अपर पुरापाषाण काल में संग्रहित पपड़ियों, पत्तियों, खन्तियों और खुरचनों का आकार अपेक्षाकृत बड़ा देखा गया है। ये गुजरात के रेत के टीलों के ऊपरी भाग में भी पाए गए हैं।

    ➣ खुले आसमान के नीचे रहना सम्भव हो गया। अब मानव गुफाओं के साथ साथ झोपड़ियों में भी रहने लगा था। मानव पशुओं की खालकर सिलकर उन्हें वस्त्रों का रूप प्रदान करने लगा।

    पुरापाषाण औजार व हथियार

    पुरापाषाण औजार व हथियार

    पुरा – पाषाणकाल स्थल

    पुरा - पाषाणकाल स्थल
    पहलगामकश्मीर लिद्दर नदी के निकट हाथ की कुल्हाड़ी प्राप्त हुई।
    पोतवार (पिंडीदोब)पंजाब/पाकिस्तान हस्तकुठार व काटने के औजार मिले।
    हथनोरमध्य प्रदेशनर्मदा नदी के निकट मानव खोपड़ी का प्रथम प्रमाण 1982 में अरुण सोनकिया द्वारा उत्खनन से प्राप्त हुआ था।
    भीमबेटकामध्य प्रदेशनर्मदा के निकट भोपाल से 40 किमी दक्षिण में सबसे पुराने शैलाश्रय निवास (मानव निर्मित गुफाओं का घर) मिले।
    आदमगढ़मध्य प्रदेशशिल्प उपकरण प्राप्त हुए।
    लोहदानालाउत्तर प्रदेशबोलन नदी घाटी में अस्थि निर्मित मातृदेवी की प्रतिमा प्राप्त ।
    पल्लवरम्मद्रास (चेन्नई)भारत में सर्वप्रथम हैण्ड-एक्स (हाथ की कुल्हाड़ी) का प्रमाण।
    अतिरमपक्कम्मद्रास (चेन्नई) हैण्डएक्स, क्लीवर व फलक उपकरण मिले।
    गुडियाममद्रास (चेन्नई)फलक व क्लीवर उपकरण के साक्ष्य मिले।
    नेवासा व चिरकीमहाराष्ट्रमध्य पुरातात्विक युगीन उच्चकोटि के उपकरण।

    ➣ 10,000ई.पू. के आस-पास हिम-युग के अन्त के साथ अपर पुरापाषाण-युग समाप्त हुआ तथा बीच का युग मध्य पाषाण-युग की शुरुवात हुई।

    ➣ ज्ञातव्य हो मध्यपाषाण काल शुरू होने से पहले ही अर्थात पुरापाषाण-युग की देन थी –

    1. दक्षिण अफ्रीका में आधुनिक मानव होमो सेपियंस सेपियंस की उपस्थिति – लगभग 1.5 लाख वर्ष पूर्व
    2. आग की खोज
    3. भाषा की उत्पत्ति – लगभग 50,000 ई.पू.
    4. मानव ने अभी तक खेती करना नहीं सीखा था, वह शिकार और संग्रह पर आधारित जीवन निर्वाह करता था।

    ➣ पुरा पाषाण काल से सम्बन्धित जानकारी के स्त्रोत केवल उपकरण ही हैं, अतः इस काल की जानकारी सीमित है।

    मध्य पाषाण काल या शिकार एवं पशुपालन युग (9000 – 4000 ई.पू.)

    ➣ पुरापाषाण युग के पश्चात मध्य पाषाण काल आता है। इसे उत्तरीय प्रस्तर का काल (उत्तर पाषाण युग) या Mesolithic Age भी कहा जाता है। यह काल नव पाषाण काल से पहले का है।

    ➣ मध्य पाषाण काल में तापमान में वृद्धि हुई। हिमवर्ती क्षेत्रों का बर्फ पिघलने लगा तथा समुद्र का स्तर बढ़ा।

    ➣ जलवायु में परिवर्तनों के साथ-साथ वनस्पति व जीव-जन्तुओं में भी परिवर्तन हुए। विशाल क्षेत्रों में जंगलों का अस्तित्व सामने आया। मानव के लिए नए क्षेत्रों की ओर आगे बढ़ना संभव हुआ।

    ➣ भारत में मध्यपाषाण काल के विषय में जानकारी सर्वप्रथम 1867-68 ई. में हुई, जब आर्कीबाल्ड कार्लाइल ने विंध्य क्षेत्र से शैल चित्र खोज निकाले। भारत में मानव अस्थि पंजर सर्वप्रथम मध्यपाषाण काल से ही प्राप्त होने लगता है।

    ➣ मध्य पाषाण काल में पत्थर के बहुत छोटे औजार होते थे। प्रमुख औजार तीर , बरछे , भाले एंव चाक़ू, फलक, खुरचन आदि थे। ये तिकोने ,आयताकार , चंद्राकार, त्रिभुजाकार होते थे।

    ➣ पशुपालन का प्रारंभ मध्यपाषाण काल में हुआ। मध्यपाषाण काल के मानव शिकार करके, मछली पकड़कर और खाद्य वस्तुओं का संग्रह कर पेट भरते थे।

    ➣ मानव ने शिकार के लिए कुत्ते का प्रयोग किया। इस तरह मानव द्वारा पहला पालतू पशुओं में सर्वप्रथम कुत्ता था।

    ➣ मध्य पाषाणकालीन मानवपक्षी व मछली पकड़ कर, शहद जमा करना तथा जंगली कंद-मूल का संग्रह कर उसी से अपना पेट भरते थे।

    साक्ष्य

    ➣ गुजरात स्थित लंघनाज सबसे महत्वपूर्ण पुरास्थल है। यहां से लघु पाषाणोपकरणों के अतिरिक्त पशुओं की हड्डियां, कब्रिस्तान तथा कुछ मिट्टी के बर्तन भी प्राप्त हुए हैं। यहां से 14 मानव कंकाल भी मिले हैं।

    ➣ मध्य पाषाण काल को नौवासा चरण की संज्ञा दी गयी , क्योंकि इस काल के उच्च कोटि के औजार नौवासा (महाराष्ट) नामक स्थान से प्राप्त हुए थे।

    ➣ मध्य पाषाणीय स्थल राजस्थान, दक्षिणी उत्तर प्रदेश, मध्य और पूर्वी भारत और कृष्णा नदी के दक्षिण में भी हैं। इनमे से राजस्थान के बागोर में अच्छी खुदाई हुई है।

    ➣ मध्यपाषाण कालीन महदहा (प्रतापगढ़, उ.प्र.) से हड्डी एवं सींग निर्मित उपकरण प्राप्त हुए हैं।

    जी. आर. शर्मा ने महदहा के तीन क्षेत्रों का उल्लेख किया है, जो झील क्षेत्र, वूचड़खाना संकुल क्षेत्र एवं कब्रिस्तान निवास क्षेत्र में बंटा था।

    ➣ बूचड़खाना संकुल क्षेत्र से ही हड्डी एवं सींग निर्मित उपकरण एवं आभूषण बड़े पैमाने पर पाए गए हैं।

    डॉ. जयनारायण पाण्डेय द्वारा लिखित पुस्तक पुरातत्व विमर्श में महदहा, सराय नाहर राय एवं दमदमा तीनों ही स्थलों से हड्डी के उपकरण एवं आभूषण पाए जाने का उल्लेख है।

    ➣ दमदमा में किए गए उत्खनन के फलस्वरूप पश्चिमी तथा मध्यवर्ती क्षेत्रों से कुल मिलाकर 41 मानव शवाधान ज्ञात हुए हैं।

    ➣ इन शवाधानों में से 5 शवाधान युग्म-शवाधान हैं और एक शवाधान में 3 मानव कंकाल एक साथ दफनाए हुए मिले हैं। शेष शवाधानों में एक-एक कंकाल मिले हैं। इस प्रकार कुल 48 मानव कंकाल प्राप्त हुए हैं।

    ➣ सराय नाहर राय से ऐसी समाधि मिली है, जिसमें चार मानव कंकाल एक साथ दफनाए गए थे। यहां की कब्रें (समाधियां) आवास क्षेत्र के अंदर स्थित थीं। कब्रें छिछली तथा अंडाकार थीं।

    ➣ विंध्य क्षेत्र के लेखहिया के शिलाश्रय संख्या 1 से मध्यपाषाणिक लघु पाषाण उपकरणों के अतिरिक्त 17 मानव कंकाल प्राप्त हुए हैं, जिनमें से कुछ सुरक्षित हालत में हैं तथा अधिकांश क्षत-विक्षत अवस्था में हैं।

    ➣ अमेरिका के ओरेगॉन विश्वविद्यालय के जॉन आर. लुकास के अनुसार, लेखहिया में कुल 27 मानव कंकालों की अस्थियां मिली हैं।

    ➣ पशुपालन के साक्ष्य भारत में आदमगढ़ (होशंगाबाद, म.प्र.) तथा बागोर (भीलवाड़ा, राजस्थान) से प्राप्त हुए हैं।

    मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित भीमबेटका प्रागैतिहासिक शैल चित्रकला का श्रेष्ठ उदाहरण है। यूनेस्को ने भीमबेटका शैल चित्रों को विश्वविरासत सूची में सम्मिलित किया है।

    ➣ भारत में सर्वाधिक 700 से अधिक शिलाश्रय प्राप्त हुए हैं, जिसमें से 243 को क्रमांक दिया गया है, इसमें से 133 शिलाश्रयों में चित्रकारी प्राप्त हुई है।

    ➣ भारतीय उपमहाद्वीप में मध्य प्रदेश के आदमगढ़ और राजस्थान के बागोर में पशुपालन का सबसे पहला प्रमाण मिलता है। जिसका समय 5000 ई.पू. हो सकता है।

    ➣ मध्य पाषाण कालीन महादहा (उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले) से बड़ी मात्रा में हड्डी एवं सींग निर्मित उपकरण प्राप्त हुए हैं।

    राजस्थान में ई.पू. 7000-6000 के आस-पास खेती का अनुमान लगाया जाता है जो कि खारे पानी के झील बनने और सांभर के एकत्रित होने से पहले का है।

    ➣ इस समय के लोग भी गुफाओं में रहते थे। पश्चिम, मध्य भारत और मैसूर (कर्नाटक) में इस युग की कई गुफाएँ मिलीं हैं।

    ➣ मध्य पाषाण काल में पहली बार मानव कंकालों को विधिवत रूप से दफ़न करने की प्रकिया शुरू हुई।

    ➣ इस युग की महत्वपूर्ण उपलब्ध खेती करना, शिकार करना तथा पशुपालन। इस प्रकार मध्यपाषाण काल को शिकार एवं पशुपालन युग भी कहा जाता है।

    मध्य पाषाणकालीन औजार व हथियार

    मध्य पाषाणकालीन औजार व हथियार

    मध्य पाषाणकालीन स्थल

    मध्य पाषाणकालीन स्थल
    1.बागोरराजस्थानभीलवाड़ा जिले में कोठरी नदी के तट पर स्थित भारत का सबसे बड़ा मध्यपाषाणिक आवास स्थल जिसका उत्खनन बी. एन. मिश्र द्वारा कराया गया था।
    2.लंघनाजगुजरातप्रथम शुष्क क्षेत्र का स्थल उत्खनन एच. डी. शांकलिया द्वारा हुआ। रेत के ठोस टीले व 14 मानव कंकाल प्राप्त हुए।
    3.सराय नहर रायउत्तर प्रदेशस्तम्भगर्त के प्रमाण, मृतक संस्कार विधि के अन्तर्गत समाधिस्थल में शवों का सिर पश्चिम व पैर पूरब की ओर होती थी। हत्या का प्रथम साक्ष्य में कंकाल के सिर में पत्थर घुसा हुआ मिला।
    4.महदहाउत्तर प्रदेशप्रतापगढ़ जिले में स्थित यह स्थल हड्डी व सींग के उपकरण व आभूषण मिले। स्त्री-पुरुष एक साथ दफनाने के साक्ष्य।
    5.वीरभानपुरपश्चिम बंगालबी. बी. लाल द्वारा उत्खनन कार्य से आवासीय बस्ती व पत्थर के औजार की निर्माण स्थली के रूप में पहचान हुई।
    6.आदमगढ़मध्य प्रदेशएक स्थल होशंगाबाद जिले में स्थित है। यहाँ से शैलाश्रय समूह के सूक्ष्म पत्थर के औजार प्राप्त हुए। पशुपालन का प्रथम साक्ष्य प्राप्त हुआ।
    7.पंचमढ़ीमध्य प्रदेश2 प्रसिद्ध शैलाश्रय-जम्मूद्वीव व डोरोबीद्वीप मिले थे।
    8.जलाहल्लीकर्नाटकरोमन लिपि के D अक्षर के आकार के तिरक्षे फलक का प्रमाण मिला।
    9.टेरीतमिलनाडुप्रस्तर (पत्थर) उद्योग का कच्चा माल (स्फटिक व हल्का भूरा मृग पत्थर) प्राप्त हुए।

    ➣ भारत में इस युग का आरम्भ 8000 ई.पू. से माना जाता है। लगभग 4000 ई.पू. के आस-पास उच्च पुरा पाषाण युग का अंत हो गया और जलवायु उष्ण और शुष्क हो गई और एक नए युग की शुरुवात हुई।

    नव पाषाण काल या अन्न उत्पादक युग (7000 – 1000 ई.पू.)

    ➣ नवपाषाण युग का आरम्भ विभिन्न क्षेत्रों में अलग – अलग समय पर हुआ। विभिन्न क्षेत्रों में 7000 – 4000ई. पू. तक नव पाषाण काल का आरम्भ माना जाता है।

    ➣ मध्यपाषाण काल के बाद नवपाषाण युग में मानव के जीवन में बहुत अधिक परिवर्तन आया। इस युग में उसे कृषि पद्धति का अच्छा ज्ञान हो गया। फलस्वरूप अनाज का उत्पादन पर्याप्त मात्रा में होने लगा तथा भण्डारण भी शुरू हुआ।

    ➣ भारतीय उपमहाद्वीप में ई.पू. 7000 का एकमात्र ज्ञात नवपाषाण बसावट मेहरगढ़ में है, जो पाकिस्तान के एक प्रान्त बलूचिस्तान में स्थित है।

    ➣ कृषि कार्य की प्रक्रिया में वे पत्थर की कुदालों और नुकीले पाषाण डंडों से जमीन तोड़ते थे।

    ➣ इस युग के लोग पॉलिशदार पाषाण हथियारों का प्रयोग करते थे। वे विशेष पत्थर की कुल्हाड़ियाँ प्रयुक्त करते थे, जो देश के पहाड़ी क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में पायी गयी हैं।

    ➣ नवपाषाण युगीन सेल्ट, कुल्हाड़ियां, बसूले, छेनी आदि उपकरण उड़िसा (ओडिशा) और छोटानागपुर (झारखंड) के पहाड़ी क्षेत्रों में भी पाये गये हैं।

    ➣ विशेष रूप से पत्थर की कुल्हाड़ियों का इस्तेमाल करते थे जो कि भारत के पहाड़ी इलाकों के महत्त्वपूर्ण हिस्से में बड़ी संख्या में पाई गई हैं।

    ➣ लोगों ने पत्थर कुल्हाड़ी का विभिन्न प्रकार से किया। प्राचीन किंवदन्ती के अनुसार परशुराम को ऐसा ही एक महत्त्वपूर्ण कुल्हाड़ी चलाने वाला नायक माना जाता है।

    ➣ नवपाषाण युगीन लोगों द्वारा विभिन्न कुल्हाड़ियों के इस्तेमाल के आधार पर नवपाषाण के तीन महत्त्वपूर्ण इलाके हैं-उत्तर-पश्चिमी, उत्तर-पूर्वी और दक्षिणी।

    बुर्जाहोम, (कश्मीर) तथा चिंराद (छपरा, सारण) में पाषाण युगीन लोग पॉलिशदार पाषाण उपकरणों के अतिरिक्त बड़ी मात्रा में हड्डियों से निर्मित उपकरणों का भी प्रयोग करते थे।

    ➣ नवपाषाण युग में मानव छोटी-छोटी बस्तियाँ बनाकर रहने लग गया जिसने आगे चलकर जनजाति को जन्म दिया। इन जनजातियों में ज्येष्ठ और बलशाली पुरुष सरदारनेता होता था।

    ➣ इस युग में मानव घर बनाकर स्थायी रूप से रहना सीख गये थे। वे मिट्टी और सरकंडे से निर्मित गोलाकार तथा आयताकार घरों में निवास रूप करते थे।

    विन्ध्य के उत्तरी क्षेत्रों में पाए जाने वाले कुछ नए नवपाषाण स्थल को 5000 ई.पू. का माना जाता है लेकिन दक्षिण भारत में आम तौर पर नवपाषाण बस्तियाँ 2500ई.पू. से अधिक पुरानी नहीं हैं।

    ➣ इस काल के लोग कृषि के अतिरिक्त पशुपालन भी करते थे। इनमे मुख्य गाय, बैल, भेड़ एवं बकरी थे।

    ➣ मेहरगढ़ कोची के समतल मैदान में बोलन नदी के किनारे है, जिसे बलूचिस्तान में अनाज की टोकरी कहा जाता है।

    ➣ नवपाषाण युग के निवासियों को सबसे पहले अन्न उगाने का श्रेय जाता है। इसी युग मानव बीज बोने लगा।

    ➣ मेहरगढ़ के नव पाषाणीय लोग गेहूँ, जौ और रूई उपजाते थे, जबकि इलाहाबाद के पास कोल्डिहवा से चावल उगाने का प्रमाण मिलता है।

    ➣ नवपाषाण कालीन अनेक स्थायी निवासियों का कृषि कार्य के कारण अनाज रखने तथा पकाने, खाने और पीने के लिए बर्तनों की आवश्यकता महसूस हुई। अत: कुम्भकारी सर्वप्रथम इसी युग में परिलक्षित होती है।

    ➣ उत्तर -पश्चिम में मेहरगढ़ (पाकिस्तान में), गुफकराल और बुर्जहोम (कश्मीर में), कोल्डिहवा और महागढ़ा (उत्तर प्रदेश में), चिरांद (बिहार में), हल्लूर और पैय्य्मपल्ली (आंध्र प्रदेश में) गेहूँ, जौ, चावल, ज्वार-बाजरा, दलहन, काला चना और हरा चना जैसी फसलें उगाने के प्रमाण मिले हैं।

    ➣ नवीनतम खोजों के आधार पर भारतीय उपमहाद्वीप में प्राचीनतम कृषि साक्ष्य वाला स्थल उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर जिले में स्थित लहुरादेव है। यहां से 9000 ई.पू. से 7000 ई.पू. मध्य के चावल के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।

    ➣ उल्लेखनीय है कि इस नवीनतम खोज के पूर्व भारतीय उपमहाद्वीप का प्राचीनतम कृषि साक्ष्य वाला स्थल मेहरगढ़ (पाकिस्तान के बलूचिस्तान में स्थित; यहां से 7000 ई.पू. के गेहूं के साक्ष्य मिले हैं),

    ➣ जबकि प्राचीनतम चावल के साक्ष्य वाला स्थल कोलडिहवा (इलाहाबाद जिले में बेलन नदी के तट पर स्थित; यहां से 6500 ई.पू. के चावल की भूसी के साक्ष्य मिले हैं) माना जाता था।

    ➣ फसलों के सबसे पहले साक्ष्य इन जगहों से पाए गए हैं-

    फसलेंसमयावधिअवस्थिति
    चावल लगभग 7000 ई.पू. चीन के यांग्त्जी नदी घाटी क्षेत्र में
    मक्का लगभग 6000 ई.पू.) मैक्सिको में
    बाजरा 5500 ई.पू. चीन में,
    सोरघम 5000 ई.पू. पूर्वी अफ्रीका में,
    राई 5000 ई.पू. दक्षिण-पूर्व एशिया में
    जई 2300 ई.पू. यूरोप में

    ➣ यहाँ कब्रों में पालतू कुत्ते भी अपने मालिकों के शवों के साथ दफनाये जाते थे। यह प्रथा केवल भारत में ही पायी गयी है।

    ➣ मानव कंकाल के साथ कुत्ते का कंकाल वुर्जहोम (जम्मू-कश्मीर) से प्राप्त हुआ। गर्त आवास के साक्ष्य भी यहीं से प्राप्त हुए। इस पुरास्थल की खोज वर्ष 1935 में डी. टेरा एवं पीटरसन ने की थी।

    गुफकराल कश्मीर में स्थित नवपाषाणिक स्थल है। गुफकराल का अर्थ होता है-कुलाल अर्थात कुम्हार की गुहा।

    ➣ यहां के लोग कृषि एवं पशुपालन का कार्य करते थे। चिरांद बिहार के सारण जिले में स्थित है। यहां से हड्डी के अनेक उपकरण प्राप्त हुए हैं। यहां से प्राप्त उपकरण हिरण के सींगों से निर्मित हैं।

    ➣ नवपाषाण युगीन दक्षिण भारत में मृतक को दफनाने के स्थल के रूप में बृहत्पाषाण स्मारकों की पहचान की गई।

    ➣ नवपाषाण कालीन पुरास्थल से राख के टीले’ कर्नाटक में मैसूर के पास वेल्लारी जनपद में स्थित संगनकल्लू नामक स्थान से प्राप्त हुए। पिकलीहल, उतनूर आदि स्थलों से भी के टीले मिले हैं।

    ➣ नवपाषाण काल में जनजातियों की अपनी संस्कृति और परम्पराएँ विकसित हो गयी थी। भाषा, संगीत, चित्रकारी आदि से इनकी संस्कृति का ज्ञान होता है।

    ➣ ई.पू. 5000 तक लोग बर्तन नहीं बनाते थे लेकिन ई.पू. 4500 के बाद कुम्हार का चाक अस्तित्व में आया। बर्तन तेजी से बनने लगे। मिट्टी के बर्तनों में काले पके हुए , धूसर और चिकने एंव चमकीले बर्तन शामिल थे।

    नवपाषाण कालीन औजार व हथियार

    नवपाषाण कालीन औजार व हथियार

    नवपाषाणकालीन स्थल

    नवपाषाणकालीन स्थल
    मेहरगढ़बलूचिस्तान/ पाकिस्ताननवपाषाणकाल में कृषि का प्राचीनतम साक्ष्य के अन्तर्गत गेहूँ की 3 व जौ की 2 किस्मों की खेती व कच्ची ईंटों के आयताकार मकानों के साक्ष्य, प्राचीनतम स्थायी जीवन के प्रथम प्रमाण मिले।
    बुर्जहोमकश्मीरश्रीनगर स्थित झील के किनारे गर्तावास (गड्डाघर) का प्रमाण 1835 में डी. टेरा व पीटरसन द्वारा खोजा गया था। खेती से परिचित थे। यहाँ कब्रों में पालतू कुत्ते भी अपने मालिकों के शवों के साथ दफनाए जाते थे।
    गुफकराल (कुम्हार की गुफा)कश्मीरयह श्रीनगर से 41 किमी. दक्षिण-पश्चिमी में स्थित कृषि व पशुपालन के साक्ष्य मिले। हड्डी के औजार व धूसर मृदभांडों का प्रमाण। सिलबट्टा-मसाला पीसने वाला घरेलू उपकरण व हड्डी से निर्मित सुई प्राप्त हुई।
    कोहडिहवाउत्तर प्रदेशबोलन नदी पर इलाहाबाद के दक्षिण में स्थित है। यहाँ के उत्खनन से 6500 ई. पू. के धान की खेती का प्रमाण जो धान की खेती का भारत में नहीं विश्व का सबसे पुराना साक्ष्य माना जाता है।
    मगहराउत्तर प्रदेशगंगा नदी के दक्षिण में विन्ध्य क्षेत्र का उत्खनन से गोलाकार झोपड़ियों के प्रमाण । धान के अलावा जी की खेती व पशुवाड़ा के साक्ष्य मिले।
    चौपानी मांडोउत्तर प्रदेशइलाहाबाद के निकट मधुमक्खी के छत्ते जैसी झोपड़ियाँ, ज्यामितीय आकार के सूक्ष्म पाषाण व हस्त निर्मित मृद्भांड के प्रमाण।
    चिरांदबिहारसारण जिले में स्थित है। नवपाषाणकालीन एकमात्र स्थल जहाँ से प्रचुर मात्रा में हड्डी के उपकरण मिले जो प्रायः हिरणों के सींगों से निर्मित थे।
    दावोजली हाडिंगअसमकृषि व पशुपालन के प्रमाण मिले।
    सारूतारूअसमगुवाहाटी के निकट उत्खनन से आदिम कुल्हाड़ियाँ व अंकित मृदभांड प्राप्त हुए।
    संगनकल्लूकर्नाटकमैसूर के निकट बेल्लारी जिले में स्थित है। यहाँ से राख के टीले प्राप्त हुए हैं। ये टीले मवेशी बाड़ों के स्थल थे।
    पिकली हलकर्नाटकनवपाषाण युगीन निवासी पशुपालक थे। ये गाय, बैल, बकरी, भेड़ को पालते थे। यहाँ से राख का ढेर व निवास स्थल दोनों मिले।

    आदिमानव के मूल स्थान

    आदिमानव के मूल स्थान
    1. होमिनिडस रामापिथेकस, अफ्रीका
    2. ऑस्ट्रेलोपिथिकस नर वानर दक्षिण अफ्रीका
    3. जिंजानथ्रोपस नर वानर पूर्वी अफ्रीका
    4. जावा मानव जावा
    5. पेकिंग मानव चीन
    6. निएंडरथल मानव जर्मनी
    7. पिल्टडाउन मानव इंग्लैंड
    8. क्रोमैगनॉन मानव फ्रांस
    9. होमोसेपियंस मानव पामीर-एशिया

    महत्वपूर्ण पुरापाषाण एवं नवपाषाण तथ्य

    • आधुनिक मानव होमो सेपियंस का हिमयुग की अंतिम अवस्था में उदय हुआ।
    • मानव कंकालों को विधिवत दफन करने की प्रक्रिया मध्य पाषाण काल से प्रारंभ हुई।
    • आदिमानव ने सबसे पहले आग जलाना सीखा था।
    • मानव द्वारा सर्वप्रथम प्रयुक्त अनाज जौ था।
    • भारत में पशुपालन एवं कृषि के प्राचीनतम साक्ष्य मेहरगढ़ से प्राप्त हुए हैं।
    • नवपाषाण काल के लोगों द्वारा पाला गया प्रथम पशु कुत्ता था।
    • हस्तकुठार एवं विदारणी प्राचीनकाल के प्रमुख उपकरण थे।
    • हैंडीमेन को प्रथम उपकरण निर्माता कहा जाता है।
    • भारत में मानव कंकाल मध्य पाषाण युग से प्राप्त होते हैं।
    • रामापिथेकस के जीवाश्म शिवालिक क्षेत्र से प्राप्त हुए हैं।
    • वस्त्र निर्माण कला मनुष्य ने नवपाषाण युग में सीखी।
    • गंगा घाटी में धान की खेती का प्राचीनतम प्रमाण लहुरादेव (उत्तर प्रदेश) से मिला है।
    • दमदमा (हरियाणा) से एक ही कब्र में तीन मानव कंकाल मिले हैं।
    • लेखहिया (उत्तर प्रदेश) से सर्वाधिक मानव कंकाल मिले हैं।
    • आग के आविष्कार को जावा मानव, होमो इरेक्टस और होमो सेपियंस नियंडरथल से जोड़ा जाता है।
  • उत्तर-भारत के राजपूत राजवंश | Q&A Practice

    📚 विषय सूची

    चंदेल वंश

    ➣ लगभग 831 ई. में बुंदेलखंड में किसने चंदेल वंश की स्थापना की ?
    उत्तर : नन्नुक चंदेल

    ➣ आधुनिक बुंदेलखंड का प्राचीन नाम क्या था?
    उत्तर : जेजाकभुक्ति

    ➣ चंदेल वंश का सातवां राजा व्यावहारिक दृष्टि से इसका पहला स्वतंत्र शासक था। उसका क्या नाम था ?
    उत्तर : यशोवर्मा

    ➣ चंदेल वंश का सबसे शक्तिशाली कौन शासक था?
    उत्तर : यशोवर्मा

    ➣ यशोवर्मा ने कालिंजर के प्रसिद्ध दुर्ग को जीतकर अपनी राजधानी कहां बनाई ?
    उत्तर : महोबा

    ➣ यशोवर्मा ने कन्नौज पर आक्रमण कर खजुराहो मंदिर (कंदरिया महादेव मंदिर) में स्थापना के लिए विष्णु की बहुमूल्य प्रतिमा उपहारस्वरूप देने के लिए किस प्रतिहार राजा को मजबूर किया?
    उत्तर : देवपाल

    ➣ 999 ई. में खजुराहो मंदिर (कंदरिया महादेव मंदिर) का निर्माण किसने करवाया?
    उत्तर : धंगदेव ( यशोवर्मा पुत्र)

    ➣ धंगदेव ने अपनी राजधानी कालिंजर से स्थानांतरित कर कहां की?
    उत्तर : खजुराहो

    ➣ धंगदेव 989 या 990 ई. में अफगानिस्तान से होने वाले सुबुक्तगीन के आक्रमण को रोकने के लिए किस पंजाब नरेश द्वारा बनाये गये संघ में शामिल था, लेकिन सुबुक्तगीन के हाथों इस संघ की पराजय हुई?
    उत्तर : जयपाल

    ➣ किस चंदेल शासक ने गंगा-यमयुना के संगम में शिव की अराधना करते हुए अपने शरीर का त्याग किया?
    उत्तर : धंगदेव

    ➣ धंगदेव ने कौन-सी उपाधि धारण की ?
    उत्तर : महाराजाधिराज

    ➣ धंगदेव के बाद उसके पुत्र गंडदेव ने पंजाब नरेश आनंदपाल (जयपाल का पुत्र) के साथ संघ बनाकर किस विदेशी आक्रमणकारी से मोर्चा लिया, किंतु दुर्भाग्य से यह संघ पराजित हुआ ?
    उत्तर : महमूद गजनवी

    ➣ किस कन्नौज नरेश ने महमूद गजनवी के आगे आत्मसमर्पण कर दिया था?
    उत्तर : राज्यपाल ने

    ➣ महमूद गजनवी के आगे आत्मसमर्पण से नाराज होकर किस चंदेल राजा ने राज्यपाल पर आक्रमण कर उसे मार डाला?
    उत्तर : विद्याधर

    ➣ बारहवें राजा कीर्तिवर्मा (1060-1100 ई.) ने महोबा के पास किस जलाशय का निर्माण करवाया ?
    उत्तर : कीर्तिसागर

    ➣ कीर्तिवर्मा की किस राजदरबारी ने ‘प्रबोध चन्द्रोदय’ की रचना की ?
    उत्तर : कृष्ण मिश्र

    ➣ चंदेल वंश का अंतिम शासक कौन था, जिसने 1202 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक की अधीनता स्वीकार कर ली?
    उत्तर : परमार्दिदेव या परिमल

    ➣ किस वर्ष में चंदेल राज्य को दिल्ली सलतनत में मिला लिया गया ?
    उत्तर : 1305 ई.

    ➣ कुतुबुद्दीन ऐबक की अधीनता स्वीकार करने के कारण परमार्दिदेव की उसके किस मंत्री ने हत्या कर दी?
    उत्तर : अजयदेव

    ➣ परमार्दिदेव के राजदरबार के उन दो सेनानायकों का क्या नाम है, जिन्होंने पृथ्वीराज चौहान के साथ युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गये?
    उत्तर : आल्हा व उदल

    गहड़वाल / राठौर वंश

    ➣ लगभग 1085 ई. में कन्नौज पर अधिकार कर किसने गहड़वाल वंश की स्थापना की?
    उत्तर : चंद्रदेव

    ➣ इस वंश का तीसरा शासक गोविंद चंद्र ( 1114 1154 ई) ने किस पाल शासक का हराकर मगध पर आधिपत्य स्थापित कर लिया?
    उत्तर : रामपाल

    ➣ गोविंद चंद्र को उसके लेखों में क्या कहा गया है?
    उत्तर : विविध विद्याविचारवाचस्पति

    ➣ गोविंद चंद्र के मंत्री लक्ष्मी धर द्वारा किस प्रसिद्ध पुस्तक की रचना की गयी?
    उत्तर : कृत्य कल्पतरु

    ➣ गोविंद चंद्र के बाद उसका पुत्र विजयचंद शासक बना। उसके समय दिल्ली का प्रदेश गहड़वालों के हाथ से निकलकर किस वंश के नरेशों के हाथ में चला गया?
    उत्तर : चौहान वंश

    ➣ गहड़वाल वंश का अंतिम शासक कौन था?
    उत्तर : विजयचंद का पुत्र जयचंद

    ➣ जयचंद (1170-94 ई.) का समकालीन दिल्ली और अजमेर का चौहान शासक कौन था ?
    उत्तर : पृथ्वीराज (चौहान) तृतीय

    ➣ किस गहड़वाल शासक ने देवगिरि के यादवों, गुजरात के सोलंकियों और तुर्कों को कई बार हराया ?
    उत्तर : जयचंद

    ➣ किस चौहान राजा पर मुहम्मद गोरी के आक्रमण के समय जयचंद तटस्थ रहा?
    उत्तर : पृथ्वीराज तृतीय

    ➣ दिल्ली विजय के बाद कुतुबुद्दीन ऐबक तथा मुहम्मद गोरी ने 1194 ई. में किस युद्ध में जयचंद पराजित कर उसे मार डाला?
    उत्तर : चंदावर का युद्ध

    ➣ कन्नौज के शासक जयचंद के चंदावर के युद्ध में पराजित होने के बाद गढ़वाल सिक्कों पर किस भारतीय चिन्ह और लिपि को अपनाया गया?
    उत्तर : लक्ष्मी और नागरी लिपि

    ➣ जयचंद ने अपने राजदरबार में संस्कृत के किस प्रख्यात को संरक्षण प्रदान किया था?
    उत्तर : कवि श्री हर्ष

    ➣ जयचंद के शासन काल में श्री हर्ष ने किन दो प्रसिद्ध पुस्तकों की रचना की ?
    उत्तर : नैषधीयचरितम् और खंडनखंडखाद्य

    ➣ इल्तुतमिश ने किस वर्ष कन्नौज में स्थायी रूप सल्तनत की सत्ता स्थापित कर ली?
    उत्तर : 1225 ई. में

    परमार वंश

    ➣ परमार वंश की स्थापना किसने की?
    उत्तर : उपेंद्रराज / कृष्णराज

    ➣ मालवा के परमार वंश के प्रारंभिक राजा किनके सामंत थे ?
    उत्तर : राष्ट्रकूट राजाओं के

    ➣ उदयपुर लेख में उपेंद्रराज को क्या कहा गया है ?
    उत्तर : द्विजवर्गरत्न

    ➣ परमार वंश के प्रारंभिक इतिहास को जानने का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत क्या है?
    उत्तर : उदयपुर प्रशस्ति

    ➣ किसको परमारों की स्वतंत्रता का जन्मदाता और परमार वंश का वास्तविक संस्थापक कहा जाता है?
    उत्तर : हर्ष या सीयक द्वितीय (949-972 ई.)

    ➣ हर्ष ने अपने दत्तक पुत्र को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। उसका क्या नाम था ?
    उत्तर : वाक्पति मुंज (972-994 ई.)

    ➣ वाक्यपति मुंज को किन अन्य नामों से जाना जाता था?
    उत्तर : उत्पलराज श्रीवल्लभ और अमोघवर्ष

    ➣ वाक्पति मुंज की सभा में दक्षिण भारत से कौन विद्वान आया था ?
    उत्तर : हलायुध

    ➣ मुंज के बाद उसका छोटा भाई सिंधुराज अगला परमार नरेश बना। यह गुजरात के किस चालुक्य शासक से पराजित हुआ?
    उत्तर : चामुंडराज

    ➣ भोज परमार (1000-1055 ई.) इस वंश का सबसे प्रसिद्ध व लोकप्रिय राजा था। उसने भोपाल के दक्षिण में किस झील का निर्माण करवाया ?
    उत्तर : भोजसर

    ➣ भारतीय इतिहास में किस राजा के काल को आर्थिक समृद्धि के लिए जाना जाता है ?
    उत्तर : भोज का काल

    ➣ कहां राजा भोज, कहां गंगू तेली’ नामक कहावत किस परमार वंशीय राजा से संबंधित है?
    उत्तर : राजाभोज

    ➣ राजा भोज किस नाम से विख्यात था?
    उत्तर : कविराज

    ➣ परमारों की प्रारम्भिक राजधानी कहाँ थी?
    उत्तर : उज्जैन

    ➣ राजा भोज ने अपनी राजधानी उज्जैन से हटाकर क्षिप्रा नदी पर अवस्थित किस नगरी में स्थापित की?
    उत्तर : धार, मध्य प्रवेश

    ➣ राजा भोज ने कोकण विजय किस वर्ष में की?
    उत्तर : 1024 ई. में

    ➣ बिहार के पश्चिमी भाग पर परमारों के आधिपत्य के कारण ही आरा और उसके आसपास का प्रदेश किस नाम से जाना जाता है?
    उत्तर : भोजपुर

    ➣ अलाउद्दीन खिलजी ने किस वर्ष मालवा को अपनी सल्तनत में मिला लिया?
    उत्तर : 1305 ई. में

    चौहान (चहमान)

    ➣ सातवीं शताब्दी में चौहान (चहमान) वंश की स्थापना किसने की?
    उत्तर : वासुदेव

    ➣ चौहान वंश के किस शासक ने ‘अजमेर’ नगर बसाया और वहां कई महल और मंदिरों का निर्माण करवाया?
    उत्तर : अजयराज

    ➣ अजयराज का उत्तराधिकारी अर्णोराज (अजरराज) ने अजमेर के निकट किसको पराजित किया ?
    उत्तर : सुल्तान महमूद

    ➣ अर्णोराज का पुत्र विग्रहराज चतुर्थ अथवा बीसलदेव (लगभग 1153-63 ई.) के किस लेख से ज्ञात होता है कि उसने तुर्क आक्रमणकारियों से देश की रक्षा की?
    उत्तर : दिल्ली-शिवालिक लेख

    ➣ विग्रहराज यशस्वी कवि और लेखक भी था। उसने किन दो नाटकों की रचना की?
    उत्तर : ‘हरिकेल’ और ‘ललित विग्रहराज’

    ➣ महाकवि सोमदेव ने बोसलदेव के चरित्र के बखान में किस पुस्तक की रचना को ?
    उत्तर : ललित विग्रहराज

    ➣ विग्रहराज ने किस वंश के शासक से दिल्ली जीती थी?
    उत्तर : तोमर वंश

    ➣ विद्यालय ‘अढाई दिन का झोंपड़ा’ आरंभ में किस चौहान शासक बनवाया गया था?
    उत्तर : विग्रहराज

    ➣ सोमेश्वर के पुत्र पृथ्वीराज तृतीय (चौहान) किस वर्ष शासक बना ?
    उत्तर : 1178 ई. में

    ➣ पृथ्वीराज चौहान को कथाओं में किस नाम से सम्बोधित किया गया है?
    उत्तर : रायपिथौरा

    ➣ किस चौहान शासक से बुंदेलखंड के चंदेल शासक परमार्दिदेव के आल्हा व ऊदल नामक लोकप्रसिद्ध सेनानायकों ने भयंकर युद्ध किया?
    उत्तर : पृथ्वीराज चौहान

    ➣ पृथ्वीराज चौहान के किस राजकवि ने ‘पृथ्वीराज विजय’ की रचना की?
    उत्तर : जयानक

    ➣ हम्मीर महाकाव्य’ की रचना किसने की ?
    उत्तर : जयचंद्र

    ➣ रणथम्भौर के जैन मंदिर का शिखर किस चौहान शासक ने बनवाया था ?
    उत्तर : पृथ्वीराज चौहान

    ➣ मुहम्मद गोरी और पृथ्वीराज चौहान के बीच तराइन का प्रथम युद्ध कब हुआ, जिसमें मुहम्मद गोरी पराजित हुआ?
    उत्तर : सन् 1191 में

    ➣ सन् 1192 में मुहम्मद गोरी और पृथ्वीराज चौहान के बीच तराइन का दूसरा युद्ध हुआ। इस युद्ध में कौन पराजित हुआ और बाद में उसकी हत्या कर दी गयी ?
    उत्तर : पृथ्वीराज चौहान

    ➣ तराइन के किस युद्ध के बाद भारत में तुर्की राज्य की स्थापना हुई?
    उत्तर : तराइन का दूसरा युद्ध

  • उत्तर भारत के क्षेत्रीय राजपूत राज्य : परिचय

    📚 विषय सूची

    4वीं-6वीं शताब्दी में गुप्त साम्राज्य के पतन के साथ उत्तर भारत में एक शक्तिशाली केंद्रीय सत्ता समाप्त हो गई थी। स्कंदगुप्त के बाद हूण आक्रमणों ने उत्तर भारत को और कमजोर कर दिया।

    7वीं शताब्दी में हर्षवर्धन (606-647 ई.) ने कन्नौज को राजधानी बनाकर उत्तर भारत को पुनः एकछत्र शासन के अंतर्गत संगठित किया, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद फिर राजनीतिक अराजकता फैल गई।

    ➣ इसी काल में 712 ई. में अरब सेनापति मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर आक्रमण किया, जिससे भारत में अरबों के राजनीतिक प्रवेश की शुरुआत हुई।

    ➣ हालांकि पश्चिम भारत में प्रतिहार वंश ने आगे चलकर अरब आक्रमणों को उत्तर भारत में फैलने से काफी हद तक रोका।

    गहलौत वंश ने चित्तौड़ को राजपूत शक्ति का प्रमुख केंद्र बनाया। इस काल में मंदिर स्थापत्य, संस्कृत साहित्य, क्षेत्रीय भाषाओं और व्यापार का भी विकास हुआ।

    8वीं-10वीं शताब्दी के बीच तीन प्रमुख शक्तियाँ – प्रतिहार (उत्तर भारत), पाल (पूर्वी भारत/बंगाल) और राष्ट्रकूट (दक्षिण भारत) उभरीं।

    ➣ इनके बीच कन्नौज पर अधिकार को लेकर प्रसिद्ध त्रिपक्षीय संघर्ष चला, जिसने कई शताब्दियों तक उत्तर भारतीय राजनीति को प्रभावित किया।

    ➣ इसी समय पूर्वी भारत में पाल वंश ने बौद्ध धर्म तथा नालंदा और विक्रमशिला जैसे महान शिक्षा केंद्रों को संरक्षण दिया।

    धर्मपाल और देवपाल के समय नालंदा विश्वविद्यालय विश्व प्रसिद्ध बन गया, जहाँ दक्षिण-पूर्व एशिया से भी विद्यार्थी अध्ययन करने आते थे।

    10वीं-12वीं शताब्दी में उत्तर भारत में राजपूत राजवंशों जैसे चौहान, चंदेल, परमार, गहड़वाल और गहलौत वंश का उदय हुआ। ये राज्य आपस में संघर्ष करते रहते थे, जिससे राजनीतिक एकता कमजोर होती गई।

    ➣ मध्य भारत में चंदेलों ने खजुराहो मंदिरों का निर्माण कराया, जबकि परमार वंश के राजा भोज ने भोजपुर मंदिर, शिक्षा और साहित्य को बढ़ावा दिया।

    राजस्थान और दिल्ली क्षेत्र में चौहान तथा गहलौत राजवंशों ने वीरता, दुर्ग निर्माण और सामंतवादी व्यवस्था को विशेष महत्व दिया।

    ➣ लगातार आपसी संघर्षों के कारण उत्तर भारतीय राज्य राजनीतिक रूप से कमजोर होते गए। इसी कमजोरी का लाभ उठाकर महमूद गजनवी ने कई बार उत्तर भारत पर आक्रमण किया

    ➣ कालांतर में तराइन के दुसरे युद्ध में मोहम्मद गौरी द्वारा पृथ्वीराज राज चौहान की हार के साथ ही दिल्ली सल्तनत की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ।

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    उत्तर भारत के राजपूत राजवंशों का संक्षिप्त परिचय

    क्रम राजवंश मुख्य राजा समयकाल राजधानी कैसे सत्ता में आए / स्वतंत्र हुए
    1 कश्मीर के राजवंश ललितादित्य मुक्तापीड 7वीं शताब्दी – 1339 ई. श्रीनगर / परिहासपुर कर्कोट वंश के रूप में स्थानीय शक्तियों को एकीकृत कर उभरे, ललितादित्य ने सैन्य विजय और प्रशासनिक विस्तार के माध्यम से कश्मीर में मजबूत स्वतंत्र साम्राज्य स्थापित किया।
    2 प्रतिहार वंश मिहिर भोज 730-1036 ई. कन्नौज अरब आक्रमणों का सफल प्रतिरोध कर उत्तर भारत में शक्ति संतुलन स्थापित किया और कन्नौज पर अधिकार कर साम्राज्य को विस्तार दिया।
    3 पाल वंश धर्मपाल 750-1150 ई. मुद्गगिरि / पाटलिपुत्र बंगाल में अराजकता और गुप्तोत्तर कमजोरियों के बाद गोपाल द्वारा सत्ता स्थापित हुई, धर्मपाल ने इसे विस्तारित कर स्वतंत्र और शक्तिशाली साम्राज्य बनाया।
    4 चन्देल वंश (बुन्देलखंड) विद्याधर 831-1203 ई. खजुराहो प्रतिहारों के सामंत के रूप में शुरुआत की, बाद में उनकी कमजोर स्थिति का लाभ उठाकर बुन्देलखंड में स्वतंत्र राज्य स्थापित किया।
    5 हिंदूशाही वंश जयपाल 9वीं शताब्दी काबुल / वहींद काबुल-गांधार क्षेत्र में स्थानीय हिंदू शक्तियों को संगठित कर स्वतंत्र राज्य बनाया और तुर्क आक्रमणों के विरुद्ध संघर्ष किया।
    6 कलचुरी वंश (त्रिपुरी) गांगेयदेव 9वीं शताब्दी त्रिपुरी (जबलपुर) प्रतिहार साम्राज्य के पतन और क्षेत्रीय सत्ता शून्य का लाभ उठाकर मध्य भारत में स्वतंत्र कलचुरी राज्य स्थापित किया।
    7 परमार वंश (मालवा) राजा भोज 945-1055 ई. धार प्रतिहारों के अधीन सामंत के रूप में कार्य किया, बाद में मालवा क्षेत्र में स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर एक सांस्कृतिक-राजनीतिक केंद्र बनाया।
    8 चालुक्य (सोलंकी) वंश सिद्धराज जयसिंह 941-1197 ई. अनहिलवाड़ा (पाटन) स्थानीय शक्तियों को संगठित कर गुजरात क्षेत्र में स्वतंत्र चालुक्य (सोलंकी) सत्ता स्थापित की और साम्राज्य का विस्तार किया।
    9 गहड़वाल वंश (कन्नौज) जयचंद्र 1080-1194 ई. कन्नौज प्रतिहारों के पतन के बाद कन्नौज क्षेत्र पर अधिकार स्थापित कर गहड़वाल वंश ने स्वतंत्र शासन शुरू किया।
    10 सेन वंश (बंगाल) बल्लालसेन 1070-1230 ई. विक्रमपुर / नदिया पाल वंश की कमजोरी और विघटन का लाभ उठाकर बंगाल में सत्ता हासिल की और सेन वंश की स्वतंत्र स्थापना की।
    11 चौहान वंश (दिल्ली-आजमेर) पृथ्वीराज चौहान 8वीं शताब्दी – 1192 ई. आजमेर / दिल्ली राजपूत शक्ति के रूप में उभरकर स्थानीय शासकों को पराजित किया और दिल्ली-आजमेर क्षेत्र में स्वतंत्र शासन स्थापित किया।
    12 गहलौत वंश (चितौड़) बप्पा रावल 7वीं शताब्दी – 1303 ई. चितौड़गढ़ स्थानीय राजपूत संघों को संगठित कर मेवाड़ क्षेत्र में स्वतंत्र राज्य स्थापित किया और विदेशी आक्रमणों का लगातार प्रतिरोध किया।

    उत्तर- भारत के राजपूत राजवंशों की उपलब्धियाँ एवं स्थिति

    राजवंश उत्तर भारत में विकास व स्थिति दक्षिण भारत / भारत पर प्रभाव विदेशी आक्रमण / संपर्क
    कश्मीर के राजवंश कश्मीर शिक्षा, संस्कृति और व्यापार का केंद्र बना उत्तर-पश्चिम भारत में सांस्कृतिक प्रभाव बढ़ा मध्य एशिया से संपर्क, बाद में मुस्लिम आक्रमण
    प्रतिहार वंश उत्तर भारत में शक्तिशाली साम्राज्य, अरब आक्रमणों को रोका उत्तर भारत में स्थिरता बनी रही अरब आक्रमणकारियों से संघर्ष
    पाल वंश बंगाल बौद्ध धर्म, नालंदा-विक्रमशिला विश्वविद्यालयों का विकास बौद्ध धर्म का एशिया में प्रसार तिब्बत व दक्षिण-पूर्व एशिया से संपर्क
    चन्देल वंश बुन्देलखंड खजुराहो मंदिर, कला और स्थापत्य का विकास भारतीय मंदिर कला प्रसिद्ध हुई महमूद गजनवी के आक्रमणों का सामना
    हिंदूशाही वंश गांधार उत्तर-पश्चिम सीमा की रक्षा विदेशी आक्रमणों को रोकने का प्रयास महमूद गजनवी से संघर्ष
    कलचुरी वंश त्रिपुरी मध्य भारत में शक्ति विस्तार, मंदिर निर्माण मध्य भारत की राजनीति में प्रभाव क्षेत्रीय संघर्ष अधिक, बड़े विदेशी संपर्क कम
    परमार वंश मालवा धारा नगरी शिक्षा व साहित्य का केंद्र, राजा भोज का संरक्षण संस्कृत साहित्य और विद्या का विकास क्षेत्रीय युद्ध, बाद में मुस्लिम आक्रमण
    चालुक्य (सोलंकी) वंश गुजरात में व्यापार, मंदिर और नगरों का विकास पश्चिमी भारत समृद्ध व्यापारिक क्षेत्र बना अरब व्यापारियों से संपर्क, मुस्लिम आक्रमणों का सामना
    गहड़वाल वंश कन्नौज कन्नौज पुनः शक्तिशाली केंद्र बना गंगा क्षेत्र की राजनीति पर प्रभाव मुहम्मद गोरी के आक्रमण
    सेन वंश बंगाल ब्राह्मण धर्म और बंगाली संस्कृति का विकास पूर्वी भारत में हिंदू संस्कृति मजबूत हुई तुर्क आक्रमणों से पतन
    चौहान वंश दिल्ली राजपूत शक्ति का उत्कर्ष, दुर्ग निर्माण विदेशी आक्रमणों के विरुद्ध प्रतिरोध मुहम्मद गोरी से तराइन युद्ध
    गहलौत वंश चितौड़ राजपूत वीरता और मेवाड़ शक्ति का विकास राजपूत संस्कृति और स्वाभिमान मजबूत हुआ अलाउद्दीन खिलजी का चित्तौड़ आक्रमण
  • दक्षिण भारत के प्राचीन राजवंश | Q&A Practice

    📚 विषय सूची

    राष्ट्रकूट वंश

    ❑ आदिपुराण के रचनाकार जिनसेन, गणितसार संग्रह के लेखक महावीराचार्य तथा अमोघवृत्ति के लेखक सक्तायना अमोघवर्ष के दरबार में रहते थे।

    ❑ अमोघवर्ष तुंगभद्रा नदी में जल समाधि लेकर अपने जीवन का अंत किया।

    ❑ अलमसूदी इन्द्र तृतीय के समय भारत आया था। अलमसूदी ने तत्कालीन भारत का सर्वश्रेष्ठ शासक इन्द्र तृतीय को कहा।

    ❑ कृष्ण तृतीय ने चोलों को परास्त कर कांची एवं तंजावुर पर अधिकार कर लिया।

    ❑ कृष्ण प्रथम तंजावुर में विजय स्तम्भ बनवाया था।

    ❑ एलोरा गुफाओं का सर्वप्रथम वर्णन थेविनेट (फ्रांसीसी यात्री) ने 17वीं शताब्दी में किया था।

    ❑ बौद्ध गुफाओं में सबसे प्रसिद्ध विश्वकर्मा गुफा (संख्या-10) है।

    ❑ एलोरा की गुफा 15 में विष्णु को नरसिंह अर्थात् पुरुष-सिंह के रूप में दिखलाया गया है।

    ❑ एलोरा एवं एलिफेंटा गुहा मंदिरों का निर्माण राष्ट्रकूटों के समय हुआ।

    ❑ राष्ट्रकूट शैव, वैष्णव, शाक्त सम्प्रदायों के साथ-साथ जैन धर्म के भी उपासक थे।

    ❑ राष्ट्रकूटों ने अपने राज्यों में मुसलमान व्यापारियों को बसने तथा इस्लाम प्रचार की स्वीकृति दी थी।

    ❑ सियक परमार ने राष्ट्रकूटों की राजधानी मान्यखेत पर आक्रमण कर इसे पूर्णत: ध्वस्त कर दिया।

    पल्लव वंश

    ❑ पल्लव राजवंश का संस्थापक बप्पदेव (तीसरी-चौथी सदी में) था। पल्लव राजवंश की स्थापना उस समय हुई जब सातवाहन शक्ति का पतन हो रहा था।

    ❑ वप्पदेव ने आन्ध्र प्रदेश एवं तोण्डैमण्डलम पर शासन किया।

    ❑ सिंहविष्णु (575-600 ई.) को पल्लव वंश का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।

    ❑ सिंहविष्णु को अन्य अवनिसिंह तथा सिंहविष्णुपोतरयण के नाम से जाना जाता है।

    ❑ यह वैष्णव धर्म के अनुयायी था। इसने मामल्लपुरम में वराहगुहा मंदिर का निर्माण कराया।

    ❑ महेन्द्रवर्मन प्रथम के समय (600-630 ई.) पल्लव-चालुक्य संघर्ष आरम्भ हुआ।

    ❑ महेन्द्रवर्मन प्रथम एक महान निर्माता, कवि एंव संगीतज्ञ था। उसने मत्तविलास प्रहसन की रचना की।

    ❑ सिंहविष्णु द्वारा चोलों की पराजय का वर्णन वैलूर पालैयम ताम्रपत्र से मिलता है।

    ❑ महेन्द्रवर्मन प्रथम ने विचित्रचित, मत्तविलास एवं गुणभर उपाधियाँ धारण की थी।

    ❑ महेन्द्रवर्मन प्रथम प्रसिद्ध संगीतज्ञ रुद्राचार्य से संगीत की शिक्षा ली थी।

    ❑ महेन्द्रवर्मन ने शैव सन्त अप्पर के प्रभाव से जैन-धर्म त्यागकर शैव मत ग्रहण कर लिया।

    ❑ महेन्द्रवर्मन ने महेन्द्रवाड़ी एवं चित्रमेघ तालाबों का निर्माण कराया।

    ❑ महेन्द्रवर्मन को पुलकेशिन द्वितीय से पराजित होना पड़ा।

    ❑ पल्लव वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक नरसिंहवर्मन प्रथम (630-668 ई.) हुआ।

    ❑ पुलकेशिन द्वितीय को नरसिंह वर्मन प्रथम ने (कुर्रम अभिलेख के अनुसार) तीन युद्धों में पराजित किया।

    ❑ नरसिंहवर्मन ने पुलकेशिन द्वितीय के पीठ पर विजयाक्षर अंकित किया तथा विजय स्तम्भ का निर्माण वातापी में करवाया।

    ❑ नरसिंहवर्मन ने वातापीकोण्ड, महामामल्ल की उपाधि धारण की।

    ❑ नरसिंहवर्मन का पराक्रमी सेनापति शितोण्ड था।

    ❑ महाबलीपुरम् के कुछ एकाश्मक रथों का निर्माण कार्य नरसिंहवर्मन प्रथम के काल में शुरू हुआ।

    ❑ नरसिंहवर्मन के काल में चीनी यात्री ह्वेनसांग कांची गया था।

    ❑ नरसिंहवर्मन की लंका विजय का उल्लेख काशाक्कुड़ि ताम्रपत्र में तथा महावंश में मिलता है।

    ❑ चालुक्य नरेश विक्रमादित्य को परमेश्वर वर्मन प्रथम ने पराजित किया।

    ❑ परमेश्वर वर्मन शैव धर्म का अनुयायी था।

    ❑ परमेश्वर वर्मन ने रणंजय, लोकादित्य, अत्यन्तकाम, उग्रदण्ड, गुणभाजन एवं विद्याविनीत की उपाधियाँ धारण की।

    ❑ माम्मलपुरम् में परमेश्वर वर्मन प्रथम ने गणेश मन्दिर बनवाया।

    ❑ कांची का कैलाशनाथ मन्दिर तथा महाबलीपुरम् के तट मन्दिर का निर्माण नरसिंह वर्मन द्वितीय ने करवाया।

    ❑ नरसिंहवर्मन द्वितीय ने राजसिंह, शंकरभक्त तथा आगमप्रिय की उपाधियाँ धारण की थी।

    ❑ संस्कृत के प्रसिद्ध विद्वान दण्डी नरसिंह वर्मन द्वितीय के राजसभा मे रहते थे।

    ❑ वैष्णव परम्परा का अन्तिम पल्लव शासक परमेश्वर वर्मन द्वितीय था।

    ❑ कांची का मुक्तेश्वर मन्दिर तथा बैकुण्ठपेरुमाल मन्दिर का निर्माण नन्दिवर्मन द्वितीय ने करवाया।

    ❑ प्रसिद्ध वैष्णव सन्त तिरुमंङगई आलवार नन्दिवर्मन द्वितीय का समकालीन था।

    ❑ प्रसिद्ध दार्शनिक शंकराचार्य दन्तिवर्मन पल्लव शासक समकालीन थे।

    ❑ पल्लव साम्राज्य को चोल शासकों ने विजित कर अपने राज्य में मिला लिया।

    ❑ पल्लव वंश का अंतिम शासक कम्पवर्मा (948-980 ई.) था।

    ❑ पल्लव नरेश ब्राह्मण धर्म के अनुयायी थे।

    ❑ दशकुमार चरित तथा काव्यादर्श के लेखक दण्डी थे।

    ❑ पल्लव शासकों के अधिकांश लेख विशुद्ध संस्कृत भाषा में लिखे गए हैं।

    ❑ कन्दरा शैली की भवन निर्माण कला को महेन्द्र वर्मन ने प्रचलित किया।

    ❑ सप्तपैगोडा पल्लव शासकों द्वारा, बनवाये गये रथ मन्दिरों को कहा जाता है।

    ❑ कांची का कैलाशनाथ मन्दिर राजसिंह शैली में बना है।

    बादामी या वातापी के चालुक्य

    ❑ बादामी के चालुक्य वंश की स्थापना पुलकेशिन प्रथम ने की थी। पुलकेशिन-I ने अश्वमेध यज्ञ किया था।

    ❑ महाकूद अभिलेख में पुलकेशिन-1 से पूर्व दो शासकों जयसिंह तथा रणराम के नाम मिलते हैं।

    ❑ कीर्तिवर्मन प्रथम ने गोवा को जीतकर उसका नाम खेतद्वीप रखा।

    ❑ कीर्तिवर्मन प्रथम ने बहुसुवर्ण एवं अग्निष्टोम्, दो यज्ञों को न्न करवाया।

    ❑ पुलकेशिन द्वितीय का संरक्षक चाचा मंगलेश था। पुलकेशिन द्वितीय 610 ई. में चाचा मंगलेश को हराकर शासक बना।

    ❑ पश्चिमी समुद्र की लक्ष्मी पुरी (हाथियों का द्वीप) जो कोंकण तट पर था, को कहा जाता था।

    ❑ समकालीन शासक हर्षवर्धन ने पुलकेशिन द्वितीय को दक्षिण का स्वामी स्वीकार किया।

    ❑ पुलकेशिन द्वितीय को पल्लव शासक नरसिंह वर्मन प्रथम ने हराकर मार डाला था।

    ❑ फारस के शासक खुसरो द्वितीय के दरबार में पुलकेशिन द्वितीय ने शिष्टमडल भेजा था।

    ❑ पुलकेशिन द्वितीय के समय ह्वेनसांग चीनी यात्री दक्षिण भारत आया था।

    ❑ पुलकेशिन द्वितीय ने सत्याश्रय एवं श्री पृथ्वी वल्लभ महाराज की उपाधि धारण की थी।

    ❑ पुलकेशिन द्वितीय ने हर्ष को पराजित कर परमेश्वर की उपाधि धारण की।

    ❑ पुलकेशिन द्वितीय को मारने के बाद नरसिंहवर्मन ने वातापीकोण्ड की उपाधि धारण की।

    ❑ विनयादित्य द्वितीय ने सकलोत्तरपथनाथ की उपाधि धारण की थी।

    ❑ विक्रमादित्य द्वितीय ने कांचीकोण्ड की उपाधि धारण की थी।

    ❑ पाण्डयों, चोलों, केरों एवं कलभ्रों को विक्रमादित्य द्वितीय ने पराजित किया।

    ❑ त्रैलोकेश्वर मन्दिर का निर्माण त्रैलोक्य महादेवी ने करवाया।

    ❑ पट्टदकल के विरुपाक्षमहादेव मन्दिर का निर्माण लोकमहादेवी ने करवाया।

    वेंगी (आन्ध्र) के पूर्वी चालुक्य

    ❑ वेंगी के चालुक्य वंश का संस्थापक विष्णुवर्द्धन था। विष्णुवर्द्धन ने 615 ई. से 633 ई. तक शासन किया।

    ❑ विष्णुवर्द्धन भागवत धर्म का अनुयायी था।

    ❑ विजयवाड़ा में जैन मन्दिर का निर्माण विष्णुवर्द्धन की पत्नी आयना महादेवी ने करवाया।

    ❑ वेंगी के चालुक्य वंश की राजधानी वेंगी (आन्ध्र प्रदेश) थी।

    ❑ इस वंश का सबसे प्रतापी शासक विजयादित्य तृतीय (848-892 ई.) था।

    कल्याणी के चालुक्य

    ❑ कल्याणी के चालुक्य वंश का संस्थापक तैलप द्वितीय (973-997 ई.) था।

    ❑ तैलप द्वितीय ने अश्वमल और भुवनैकमल्ल की उपाधि धारण की।

    ❑ मेरूतुंग कृत प्रबन्ध चिन्तामणि से ज्ञात होता है कि तैलप द्वितीय ने मुंज के ऊपर छ: बार आक्रमण किया किन्तु प्रत्येक बार पराजित हुआ।

    ❑ सोमेश्वर प्रथम 1043 ई. में शासक बना। उसने अपनी राजधानी मान्यखेत से कल्याणी में स्थानान्तरित किया।

    ❑ चोलों से पराजित होने के कारण सोमेश्वर प्रथम ने करुवती के पास तुंगभद्रा नदी में डूबकर आत्महत्या की।

    ❑ कल्याणी के चालुक्य वंश का महानतम शासक विक्रमादित्य षष्ठ (1076-1126) था।

    ❑ विक्रमांकदेवचरित के लेखक विल्हण थे।

    ❑ बिल्हण और मिताक्षरा के लेखक विज्ञानेश्वर विक्रमादित्य षष्ठ के दरबार में रहते थे।

    ❑ चालुक्य विक्रम संवत् विक्रमादित्य षष्ठ ने, 1076 ई. में प्रारम्भ किया था।

    ❑ मानसोल्लास और अभिलाषितार्थ चिंतामणि की रचना सोमेश्वर तृतीय ने की थी।

    ❑ इस वंश का अंतिम शासक तैलप तृतीय का पुत्र सोमेश्वर चतुर्थ था।

    ❑ चोलों का सर्वप्रथम वर्णन अशोक के तेरहवें शिलालेख में मिलता है।

    ❑ प्रारम्भिक चोलों की राजधानी तंजौर थी।

    ❑ परवर्ती चोल वंश का संस्थापक विजयालय (850 ई.) था।

    ❑ विज्यालय पल्लवों का सामंत था। विजयालय ने नरकेसरी की उपाधि धारण की।

    ❑ विजयालय चोल ने तंजौर में दुर्गादेवी का मन्दिर तथा नत्तामलाई में विजय चोलेश्वर मन्दिर बनवाये।

    ❑ चालुक्यों का पारिवारिक चिह्न वराह था।

    ❑ विक्रमादित्य षष्ठ के बाद सोमेश्वर तृतीय (1126-1138) बना, वह स्वयं बड़ा विद्वान था। सोमेश्वर तृतीय ने भूलोकमल्ल तथा त्रिभुवनमल्ल जैसी उपाधियां ग्रहण की।

    ❑ परान्तक प्रथम ने पाण्डय शासक राजसिंह को हराकर मदुरैकोण्ड की उपाधि धारण की।

    ❑ परान्तक प्रथम को तक्कोलम के युद्ध में राष्ट्रकूट शासक कृष्ण तृतीय ने हराया।

    ❑ राजराज प्रथम ने श्रीलंका के महेन्द्र पंचम को हराया।

    ❑ राजराज ने उत्तरी श्रीलंका में चोल साम्राज्य का एक नया प्रान्त बनाया तथा इसका नाम मुन्डि चोल मण्डलम दिया।

    ❑ राजराज ने अनुराधापुर के स्थान पर पोलोन्नारूव को राजधानी बनाई, तथा इसका नाम जगन्नाथ मंगलम रखा।

    ❑ चोलों की नौसेना सर्वाधिक मजबूत थी।

    ❑ अपने राज्य की समस्त भूमि की माप राजराज प्रथम ने करवाई।

    ❑ तंजौर के राजराजेश्वर मन्दिर का निर्माण राजराज प्रथम ने करवाया।

    ❑ राजराज प्रथम ने श्री विजय के शैलेन्द्र शासक श्रीमार विजयोतुंग वर्मन को नागपट्टिनम में एक बौद्ध मठ बनाने की अनुमति दी।

    ❑ श्रीलंका के शासक महेन्द्र पंचम को राजेन्द्र प्रथम (1014-1044 ई.) ने बन्दी बनाकर लाया। श्रीलंका में बौद्ध विहारों को राजेन्द्र प्रथम ने नुकसान पहुँचाया।

    ❑ गंगा घाटी की विजय के उपलक्ष्य में राजेन्द्र प्रथम ने गंगईकोण्ड चोल की उपाधि धारण की।

    ❑ राजेन्द्र प्रथम ने अपनी नई राजधानी गंगईकोण्डचोलपुरम् में बनाई।

    ❑ दक्षिण-पूर्व एशिया (मलय प्रायद्वीप, जावा, सुमात्रा) की विजय राजेन्द्र प्रथम ने की।

    ❑ राजेन्द्र प्रथम के समय श्रीविजय साम्राज्य का शासक संग्राम विजयोतुंग वर्मन था।

    ❑ राजराज प्रथम का वास्तविक नाम अरमोलि वर्मन था।

    ❑ राजराज प्रथम की प्रमुख विजय केरल, पाण्डय, श्रीलंका तथा मालदीव थी।

    ❑ राजराज प्रथम ने काण्डलूर शालैकलमरुत तथा शिवपादशेखर की उपाधि धारण की।

    ❑ अण्डमान-निकोबार, अराकान तथा को राजेन्द्र प्रथम ने विजित किया। चोल साम्राज्य का सर्वाधिक विस्तार राजेन्द्र प्रथम के शासनकाल में हुआ।

    ❑ राजेन्द्र प्रथम ने 1016 और 1033 ई. राजदूत मंडल चीन भेजे।

    ❑ राजेन्द्र प्रथम ने बंगाल विजय के उपरान्त सोलह मील लम्बा चोलगंगम नामक तालाब का निर्माण करवाया।

    ❑ श्रीलंका के शासक महेन्द्र पंचम से इन्द्र का निर्मलहार राजेन्द्र प्रथम ने छीना।

    ❑ राजाधिराज प्रथम ने कल्याणी विजय के बाद विजय राजेन्द्र की उपाधि धारण की।

    ❑ कुलोतुंग प्रथम को अन्य शुड्गम तर्वित्त (करों को हटाने वाला) के नाम से जाना जाता है।

    ❑ चिदम्बरम के मन्दिर तथा श्रीरंगम की समाधि कुलोतुंग प्रथम ने बनवाई।

    ❑ जयगोन्दार कुलोतुंग प्रथम का राजकवि था।

    ❑ कलिंगतुपर्णि की रचना जयगोन्दार ने की थी।

    ❑ आदित्य प्रथम ने कुन्नूर का बालसुब्रह्मण्यम् मंदिर तथा कुम्भकोणम का नागेश्वर मन्दिर बनवाये।

    ❑ दारासुरम के ऐरावतेश्वर मन्दिर का निर्माण राजराज द्वितीय ने करवाया।

    ❑ विक्रमचोल की उपाधि त्याग समुद्र थी।

    ❑ चोल वंश का अंतिम शासक राजेन्द्र तृतीय था।

    ❑ चोल साम्राज्य का अन्त 1279 ई. में पाण्डय नरेश कुलशेखर ने किया।

    ❑ सदैव राजा के पास रहने वाले उच्चाधिकारियों को उड़नकूट्टम कहा जाता था।

    ❑ विशाल चोल साम्राज्य छः प्रान्तों में विभाजित था।

    ❑ समितियों को वारियम कहा जाता था।

    ❑ मणिग्रामम् तथा वलंजियर व्यापारिक संगठन थे।

    ❑ कम्बन द्वारा तमिल रामायण की रचना कुलोतुंग द्वितीय के शासन काल में की गई।

    ❑ सम्राट की रक्षा के लिये प्राण न्योछावर करने वाले सैनिकों को वलैक्कारर कहा जाता था।

    ❑ शैव धर्म सर्वाधिक लोकप्रिय था।

    ❑ शैव धर्म के भक्ति गीत नम्बि आण्डार नम्बि ने लिखे थे।

    ❑ राजेन्द्र चोल के गुरु इशानशिव एवं सर्वशिव थे।

    ❑ विशिष्टाद्वैत के प्रवर्तक रामानुजाचार्य राजेन्द्र प्रथम के समकालीन थे।

    ❑ राजराज प्रथम की बहन कुन्दवै ने एक ही स्थान पर शैव, वैष्णव तथा जैन मन्दिरों का निर्माण कराया था।

    ❑ चोलकाल में वैष्णव लेखकों ने अपने ग्रन्थ संस्कृत में लिखे।

    ❑ अमृतसागर तथा बुद्धिमित्र जैसे जैन एवं बौद्ध भिक्षुओं को चोल शासकों संरक्षण दिया।

    ❑ कोरंगनाथ मंदिर परान्तक प्रथम ने बनवाया।

    ❑ चोलकाल में मन्दिरों के प्रवेश द्वार गोपुरम् कहलाते थे।

    ❑ चोल शासक समुद्री शक्ति के लिये विख्यात थे।

    ❑ चोलकाल की प्रमुख भाषा संस्कृत एवं तमिल थी।

    ❑ लिंगायत सम्प्रदाय की स्थापना बासव ने की।

    ❑ नयनार संत शिव के उपासक थे।

    ❑ अलवार संत विष्णु के उपासक थे।

    ❑ अन्न का मान एक कलम (तीन मन) था।

    ❑ सोने के सिक्के को काशु कहा जाता था।

    ❑ बेलि भूमि माप की इकाई थी।

    ❑ राजस्व विभाग का प्रमुख अधिकारी वरित्पोत्तराक्क कहलाता था।

    ❑ सेना की छावनियों को कडगम कहा जाता था।

    ❑ सेना की टुकड़ियों के प्रमुख को नायक तथा सेनाध्यक्ष या प्रधान सेनापति को महादण्ड नायक या सेनापति कहा जाता था।

    ❑ सेना के मुख्य अंग-धनुर्धर को विल्लिगल, गजारोही को कुजिरमल्लर, घुड़सवार को कुडिरैच्चेवगर तथा पैदल सेना को बडपेई कैक्कोलर कहा जाता था।

    मदुरै के पाण्ड्य

    ❑ परवर्ती पाण्ड्य वंश की स्थापना कंडुगोन (590-620 ई.) ने किया था।

    ❑ मलयादि कुरिचि में चट्टान काटकर जयंत वर्मन ने गुफा मन्दिर बनवाई।

    ❑ श्रीमार श्रीवल्लभ (815-862 ई.) एक पराक्रमी तथा साम्राज्यवादी शासक था।

    ❑ अन्ततः पाण्ड्य सम्राज्य को पल्लव शासक नृपतुंग ने विजित कर लिया।

    ❑ 1310 ई. में अलाउद्दीन के सेनापति मलिक काफूर ने पाण्ड्य राज्य पर आक्रमण कर मदुरा को लूटा तथा ध्वस्त कर दिया।

    ❑ महान खगोलशास्त्री भास्कराचार्य का पुत्र लक्ष्मीधर जैतुंगी का दरबारी कवि था।

    ❑ यादव वंश का अंतिम राजा सिंघन था।

    द्वारसमुद्र के होयसल वंश

    ❑ होयसलों का मूल क्षेत्र मैसूर में गंगवाड़ी के पहाड़ी क्षेत्र में था।

    ❑ होयसल राज्य का वास्तविक संस्थापक विष्णुवर्द्धन था।

    ❑ होयसल यादव वंश से सम्बन्धित थे। अपने को चंद्रवंशी मानते थे।

    ❑ होयसलेश्वर मन्दिर का निर्माण विष्णुवर्द्धन के शासन काल में हुआ।

    ❑ वेल्लूर में चेन्ना केशव मन्दिर का निर्माण विष्णुवर्द्धन ने करवाया था।

    ❑ होयसल वंश का अंतिम शासक वीर बल्लाल तृतीय था। उसने 1210 ई. से 1247 ई. तक शासन किया।

    ❑ सारंगदेव का संगीत रत्नाकर सिंघन के दरबार में लिखा गया।

    ❑ 1310-11 ई. में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति मलिक काफूर ने होयसल वंश के शासक बल्लाल तृतीय को पराजित किया।

    ❑ बल्लाल तृतीय ने अलाउद्दीन को वार्षिक कर देना स्वीकार कर लिया। उसने 1339 ई. तक अलाउद्दीन के करद के रूप में शासन करता रहा।

    ❑ होयसलों की राजधानी द्वारसमुद्र का आधुनिक नाम हलेबिड (कर्नाटक) है।

    कदम्ब राजवंश

    ❑ कदम्ब राजवंश की स्थापना मयूर शर्मन ने की थी।

    ❑ मयूर शर्मन ने लगभग 345 ई. से 360 ई. तक शासन किया।

    ❑ कदम्ब शासकों की राजधानी बनवासी थी। इनकी दूसरी राजधानी का नाम वालासिका था।

    ❑ मयूर शर्मन का उत्तराधिकारी मृगेश वर्मन हुआ। वालासिका में मृगेश वर्मन द्वारा एक मन्दिर का निर्माण मयूर शर्मन की स्मृति में कराया गया।

    ❑ मयूर शर्मन को अठारह अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान कराने वाला कहा गया है।

    ❑ कदम्बवंशी शासकों की वंशावली हमें एकमात्र ताल गुण्ड स्तम्भलेख से ज्ञात होती है।

    गंग वंश

    ❑ गंग वंश की स्थापना वजहस्त-V ने की।

    ❑ कॉकणि वर्मा का समय लगभग 400 ई. माना जाता है।

    ❑ गंग वंश का शासन आधुनिक मैसूर के दक्षिण गंगवाडि क्षेत्र में था।

    ❑ माधव प्रथम ने दत्तक सूत्र पर टीका लिखी थी।

    ❑ गंग शासक श्रीपुरुष ने अपनी राजधानी मान्यपुर में बनाई। श्रीपुरुष 728-788 ई. तक शासन किया।

    ❑ गंगों की प्रारंभिक राजधानी कुवलाल (कोलर) में थी जो बाद में तलकाड हो गयी।

    ❑ काकतीय वंश का संस्थापक बीटा प्रथम था।

    ❑ काकतीय शासक पश्चिमी चालुक्यों के सामन्त थे।

    ❑ प्रोल द्वितीय (काकतीय शासक) ने अपने को चालुक्यों से स्वतन्त्र घोषित किया।

    वारंगल के काकतीय वंश

    ❑ अनुमाकोंडा के हजार स्तम्भों वाले मन्दिर का निर्माण रुद्रदेव ने करवाया। इनकी राजधानी अमकोण्ड थी।

    ❑ ओरुगाल्लु (आधुनिक वारंगल) नामक नया शहर रुद्रदेव ने बसाया।

    ❑ काकतीय वंश का सबसे शक्तिशाली राजा गणपतिदेव था।

    ❑ गणपतिदेव ने अपनी राजधानी वारंगल में स्थापित की।

    ❑ रुद्राम्बादेवी गणपतिदेव की पुत्री थी तथा गणपति के बाद रुद्राम्बा काकतीय राज्य की शासिका बनी।

    ❑ 1323 ई. में मुहम्मद तुगलक ने प्रतापरूद्रदेव के राज्य पर आक्रमण किया।

    ❑ प्रतापरूद्रदेव पराजित हुआ तथा बंदी बना लिया गया और काकतीय राज्य दिल्ली सल्तनत में सम्मिलित कर लिया गया।

    ❑ काकतीय राज में कालामुख तथा पाशुपत धर्म प्रचलित था।

    ❑ अप्पाचार्य ने प्रतिस्थासार लिखी।

    ❑ नीतिशास्त्र मुक्तावली बाद्देना ने लिखी।

    ❑ नीरवचनोत्तर रामायण तिक्काना ने लिखी।

    देवगिरि के यादव

    ❑ देवगिरि के यादव वंश का संस्थापक भिल्लम था।

    ❑ भिल्लम चालुक्य शासक सोमेश्वर चतुर्थ का सामंत था।

    ❑  भिल्लम ने अपनी राजधानी देवगिरी में बनाई। उसने 1187-1191 ई. तक शासन किया।

    ❑ भिल्लम के बाद उसका बेटा जैतुंगी राजा बना।

    ❑ वाराहमिहिर के बृहज्जातक पर अनन्तदेव ने टिप्पणी लिखी।

    ❑ व्रतखांदा का लेखक हेमाद्रि महादेव के दरबार में रहता था।

    ❑ देवगिरि को 1309 ई. में अलाउद्दीन खिलजी द्वारा विजित कर लिया गया।

    ❑ यादव वंश का अंतिम स्वतन्त्र शासक रामचन्द्र था।

    ❑ सिद्धान्त शिरोमणि तथा करणकौतुहल की रचना भास्कराचार्य ने की।

  • दक्षिण भारत के प्रमुख प्राचीन राजवंश : परिचय

    📚 विषय सूची

    गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद जब उत्तर भारत अनेक छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित होकर लगातार संघर्षों और विदेशी आक्रमणों से कमजोर हो रहा था,

    ➣ तब दक्षिण भारत में कदम्ब, पल्लव, चालुक्य, राष्ट्रकूट, पांड्य, चोल, होयसल और काकतीय जैसे शक्तिशाली क्षेत्रीय राजवंश उभर रहे थे।

    ➣ प्रारंभ में इनमें से कई राजवंश बड़े साम्राज्यों के सामंत थे, लेकिन समय के साथ इन्होंने स्वतंत्र होकर विशाल राज्यों की स्थापना की। दक्षिण भारत की राजनीति में अधिकांश संघर्ष क्षेत्रीय प्रभुत्व, व्यापारिक मार्गों और उपजाऊ क्षेत्रों पर नियंत्रण के लिए होते थे।

    ➣ यहाँ के शासकों ने मजबूत प्रशासन, स्थायी सेना तथा स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था विकसित की, जिससे उनके राज्य लंबे समय तक स्थिर बने रहे।

    ➣ इसी काल में दक्षिण भारत में मंदिर केवल धार्मिक केंद्र नहीं रहे, बल्कि प्रशासन, शिक्षा, व्यापार और सांस्कृतिक गतिविधियों के प्रमुख केंद्र भी बन गए।

    ➣ इस काल में द्रविड़ मंदिर वास्तुकला का स्वर्ण युग शुरू हुआ – पल्लवों ने महाबलीपुरम की शिल्पकला और रथ मंदिरों, चालुक्यों ने बादामी के गुफा मंदिरों, राष्ट्रकूटों ने एलोरा के कैलाश मंदिर, होयसलों ने हलेबिडु-बेलूर के उत्कृष्ट नक्काशीदार मंदिरों और पांड्यों ने विशाल मंदिर परिसरों का निर्माण करवाया।

    साहित्य में तमिल, कन्नड़ और संस्कृत का विकास हुआ; भक्ति आंदोलन की नींव पड़ी, जिसने बाद में पूरे भारत को प्रभावित किया।

    प्रशासनिक रूप से स्थानीय स्वशासन, कुशल सिंचाई व्यवस्था और व्यापार (विशेषकर रोमदक्षिण-पूर्व एशिया के साथ) फला-फूला। समाज में ब्राह्मणवाद, जैन और बौद्ध प्रभाव के साथ-साथ लोक देवताओं की पूजा भी जारी रही।

    दक्षिण-भारत के राजवंशों का संक्षिप्त परिचय

    क्रम राजवंश मुख्य संस्थापक / राजा समयकाल राजधानी कैसे सत्ता में आए / स्वतंत्र हुए
    1 कदम्ब वंश (बनवासी) मयूरशर्मन 345-570 ई. बनवासी पल्लवों की प्रशासनिक उपेक्षा और अपमान से क्षुब्ध होकर मयूरशर्मन ने विद्रोह किया और सैन्य शक्ति संगठित कर स्वतंत्र कदम्ब राज्य की स्थापना की।
    2 गंग वंश (मैसूर) दुर्विनीत 400-1004 ई. तलकाड / गंगवाड़ी दक्षिण भारत में पल्लवों और अन्य शक्तियों के कमजोर पड़ने का लाभ उठाकर गंग शासकों ने धीरे-धीरे अपनी स्वायत्तता स्थापित की और पूर्ण स्वतंत्र सत्ता बन गए।
    3 पल्लव वंश (कांची) सिंह विष्णु / नरसिंहवर्मन प्रथम 575-897 ई. कांची (Kanchipuram) सातवाहनों के पतन के बाद सत्ता शून्य में पल्लवों ने उभार लिया और बाद में चोलों को पराजित कर दक्षिण भारत में एक मजबूत स्वतंत्र शक्ति के रूप में स्थापित हुए।
    4 पांड्य वंश (मदुरै) जाटवर्मन सुंदर पांड्य प्रथम 590-1345 ई. मदुरै (Madurai) पल्लवों और चोलों के साथ निरंतर संघर्ष के बीच पांड्यों ने अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाई और विजयों के बाद पुनः दक्षिण भारत में स्वतंत्र वर्चस्व स्थापित किया।
    5 चालुक्य वंश पुलकेशिन प्रथम / पुलकेशिन द्वितीय 543-753 ई. (बादामी) बादामी, वेंगी, कल्याणी 543 ई. में पुलकेशिन प्रथम ने स्थानीय शक्तियों को पराजित कर बादामी में स्वतंत्र राज्य की स्थापना की और बाद में पुलकेशिन द्वितीय ने साम्राज्य को विस्तार दिया।
    6 राष्ट्रकूट वंश दंतिदुर्ग / अमोघवर्ष प्रथम 736-973 ई. मन्यखेत (Manyakheta) शुरुआत में चालुक्यों के अधीन सामंत के रूप में कार्य करते थे, लेकिन दंतिदुर्ग ने 8वीं शताब्दी में विद्रोह कर चालुक्यों को पराजित किया और स्वतंत्र साम्राज्य स्थापित किया।
    7 काकतीय वंश (वारंगल) प्रोला द्वितीय / गणपति देव 1000-1323 ई. वारंगल (Orugallu) चालुक्य साम्राज्य के कमजोर होने पर काकतीय शासकों ने अपनी शक्ति बढ़ाई और धीरे-धीरे स्वतंत्र राज्य स्थापित कर वारंगल को राजधानी बनाया।
    8 होयसल वंश विष्णुवर्धन 1040-1346 ई. हलेबिडु (द्वारसमुद्र) प्रारंभ में पश्चिमी चालुक्यों के अधीन थे, लेकिन विष्णुवर्धन ने तालकाड के युद्ध में चोलों को हराकर अपनी स्वतंत्र राजनीतिक सत्ता स्थापित की।
    9 यादव वंश (देवगिरि) भिल्लम पंचम / सिंघण 1187-1312 ई. देवगिरि (Daulatabad) चालुक्यों के सामंत के रूप में कार्य करते हुए भिल्लम पंचम ने 1187 ई. में विद्रोह कर देवगिरि पर अधिकार किया और स्वतंत्र यादव राज्य की स्थापना की।

    दक्षिण भारत के राजवंशों की उपलब्धियाँ एवं स्थिति

    राजवंश दक्षिण भारत में विकास व स्थिति उत्तर भारत पर प्रभाव विदेशी संपर्क / आक्रमण
    बनवासी का कदम्ब वंश कन्नड़ भाषा व स्थानीय संस्कृति को बढ़ावा, ब्राह्मणों को भूमि दान क्षेत्रीय राज्यों की परंपरा मजबूत हुई बड़े विदेशी आक्रमण नहीं
    मैसूर का गंग वंश जैन धर्म, सिंचाई और कृषि का विकास जैन विद्वानों का प्रभाव पूरे भारत में फैला बड़े विदेशी आक्रमण नहीं
    कांची के पल्लव महाबलीपुरम मंदिर, द्रविड़ स्थापत्य, समुद्री व्यापार मंदिर स्थापत्य व संस्कृत संस्कृति का प्रभाव दक्षिण-पूर्व एशिया से व्यापारिक संबंध
    मदुरै के पांड्य मोती व्यापार, समुद्री व्यापार, मंदिरों को दान दक्षिण भारत की समृद्धि प्रसिद्ध हुई अरब व्यापारियों का आगमन, बाद में मलिक काफूर का आक्रमण
    चालुक्य वंश ऐहोल-पट्टदकल मंदिर, कला व स्थापत्य विकास हर्षवर्धन को नर्मदा पर रोका फारस (सासानी साम्राज्य) से संबंध
    राष्ट्रकूट वंश एलोरा कैलाश मंदिर, कन्नड़ साहित्य विकास कन्नौज के त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग अरब व्यापारियों से संपर्क
    काकतीय वंश सिंचाई टैंक, वारंगल व्यापार केंद्र महिला शासन की सफल मिसाल दिल्ली सल्तनत के आक्रमण
    होयसल वंश बेलूर-हलेबीडु मंदिर, मूर्तिकला विकास दक्षिण भारतीय कला प्रसिद्ध हुई दिल्ली सल्तनत के हमले
    यादव वंश देवगिरि मराठी संस्कृति व व्यापार का विकास उत्तर-दक्षिण व्यापार मार्ग मजबूत हुए अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण

    दक्षिण भारत के इन प्राचीन राजवंशों के काल (लगभग 4वीं से 14वीं शताब्दी ई.) में भारत, खासकर दक्षिण भारत, सांस्कृतिक रूप से अत्यंत समृद्ध और गतिशील था। इस पूरे काल में दक्षिण

    ➣ भारत राजनीतिक रूप से खंडित रहा, लेकिन सांस्कृतिक और वास्तुकीय दृष्टि से अत्यंत समृद्ध बना रहा, जब तक 14वीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत की सेनाएँ दक्षिण तक नहीं पहुँच गईं।

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