➣ गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद जब उत्तर भारत अनेक छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित होकर लगातार संघर्षों और विदेशी आक्रमणों से कमजोर हो रहा था,
➣ तब दक्षिण भारत में कदम्ब, पल्लव, चालुक्य, राष्ट्रकूट, पांड्य, चोल, होयसल और काकतीय जैसे शक्तिशाली क्षेत्रीय राजवंश उभर रहे थे।
➣ प्रारंभ में इनमें से कई राजवंश बड़े साम्राज्यों के सामंत थे, लेकिन समय के साथ इन्होंने स्वतंत्र होकर विशाल राज्यों की स्थापना की। दक्षिण भारत की राजनीति में अधिकांश संघर्ष क्षेत्रीय प्रभुत्व, व्यापारिक मार्गों और उपजाऊ क्षेत्रों पर नियंत्रण के लिए होते थे।
➣ यहाँ के शासकों ने मजबूत प्रशासन, स्थायी सेना तथा स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था विकसित की, जिससे उनके राज्य लंबे समय तक स्थिर बने रहे।
➣ इसी काल में दक्षिण भारत में मंदिर केवल धार्मिक केंद्र नहीं रहे, बल्कि प्रशासन, शिक्षा, व्यापार और सांस्कृतिक गतिविधियों के प्रमुख केंद्र भी बन गए।
➣ इस काल में द्रविड़ मंदिर वास्तुकला का स्वर्ण युग शुरू हुआ – पल्लवों ने महाबलीपुरम की शिल्पकला और रथ मंदिरों, चालुक्यों ने बादामी के गुफा मंदिरों, राष्ट्रकूटों ने एलोरा के कैलाश मंदिर, होयसलों ने हलेबिडु-बेलूर के उत्कृष्ट नक्काशीदार मंदिरों और पांड्यों ने विशाल मंदिर परिसरों का निर्माण करवाया।
➣ साहित्य में तमिल, कन्नड़ और संस्कृत का विकास हुआ; भक्ति आंदोलन की नींव पड़ी, जिसने बाद में पूरे भारत को प्रभावित किया।
➣ प्रशासनिक रूप से स्थानीय स्वशासन, कुशल सिंचाई व्यवस्था और व्यापार (विशेषकर रोम व दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ) फला-फूला। समाज में ब्राह्मणवाद, जैन और बौद्ध प्रभाव के साथ-साथ लोक देवताओं की पूजा भी जारी रही।
दक्षिण-भारत के राजवंशों का संक्षिप्त परिचय
| क्रम | राजवंश | मुख्य संस्थापक / राजा | समयकाल | राजधानी | कैसे सत्ता में आए / स्वतंत्र हुए |
|---|---|---|---|---|---|
| 1 | कदम्ब वंश (बनवासी) | मयूरशर्मन | 345-570 ई. | बनवासी | पल्लवों की प्रशासनिक उपेक्षा और अपमान से क्षुब्ध होकर मयूरशर्मन ने विद्रोह किया और सैन्य शक्ति संगठित कर स्वतंत्र कदम्ब राज्य की स्थापना की। |
| 2 | गंग वंश (मैसूर) | दुर्विनीत | 400-1004 ई. | तलकाड / गंगवाड़ी | दक्षिण भारत में पल्लवों और अन्य शक्तियों के कमजोर पड़ने का लाभ उठाकर गंग शासकों ने धीरे-धीरे अपनी स्वायत्तता स्थापित की और पूर्ण स्वतंत्र सत्ता बन गए। |
| 3 | पल्लव वंश (कांची) | सिंह विष्णु / नरसिंहवर्मन प्रथम | 575-897 ई. | कांची (Kanchipuram) | सातवाहनों के पतन के बाद सत्ता शून्य में पल्लवों ने उभार लिया और बाद में चोलों को पराजित कर दक्षिण भारत में एक मजबूत स्वतंत्र शक्ति के रूप में स्थापित हुए। |
| 4 | पांड्य वंश (मदुरै) | जाटवर्मन सुंदर पांड्य प्रथम | 590-1345 ई. | मदुरै (Madurai) | पल्लवों और चोलों के साथ निरंतर संघर्ष के बीच पांड्यों ने अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाई और विजयों के बाद पुनः दक्षिण भारत में स्वतंत्र वर्चस्व स्थापित किया। |
| 5 | चालुक्य वंश | पुलकेशिन प्रथम / पुलकेशिन द्वितीय | 543-753 ई. (बादामी) | बादामी, वेंगी, कल्याणी | 543 ई. में पुलकेशिन प्रथम ने स्थानीय शक्तियों को पराजित कर बादामी में स्वतंत्र राज्य की स्थापना की और बाद में पुलकेशिन द्वितीय ने साम्राज्य को विस्तार दिया। |
| 6 | राष्ट्रकूट वंश | दंतिदुर्ग / अमोघवर्ष प्रथम | 736-973 ई. | मन्यखेत (Manyakheta) | शुरुआत में चालुक्यों के अधीन सामंत के रूप में कार्य करते थे, लेकिन दंतिदुर्ग ने 8वीं शताब्दी में विद्रोह कर चालुक्यों को पराजित किया और स्वतंत्र साम्राज्य स्थापित किया। |
| 7 | काकतीय वंश (वारंगल) | प्रोला द्वितीय / गणपति देव | 1000-1323 ई. | वारंगल (Orugallu) | चालुक्य साम्राज्य के कमजोर होने पर काकतीय शासकों ने अपनी शक्ति बढ़ाई और धीरे-धीरे स्वतंत्र राज्य स्थापित कर वारंगल को राजधानी बनाया। |
| 8 | होयसल वंश | विष्णुवर्धन | 1040-1346 ई. | हलेबिडु (द्वारसमुद्र) | प्रारंभ में पश्चिमी चालुक्यों के अधीन थे, लेकिन विष्णुवर्धन ने तालकाड के युद्ध में चोलों को हराकर अपनी स्वतंत्र राजनीतिक सत्ता स्थापित की। |
| 9 | यादव वंश (देवगिरि) | भिल्लम पंचम / सिंघण | 1187-1312 ई. | देवगिरि (Daulatabad) | चालुक्यों के सामंत के रूप में कार्य करते हुए भिल्लम पंचम ने 1187 ई. में विद्रोह कर देवगिरि पर अधिकार किया और स्वतंत्र यादव राज्य की स्थापना की। |
दक्षिण भारत के राजवंशों की उपलब्धियाँ एवं स्थिति
| राजवंश | दक्षिण भारत में विकास व स्थिति | उत्तर भारत पर प्रभाव | विदेशी संपर्क / आक्रमण |
|---|---|---|---|
| बनवासी का कदम्ब वंश | कन्नड़ भाषा व स्थानीय संस्कृति को बढ़ावा, ब्राह्मणों को भूमि दान | क्षेत्रीय राज्यों की परंपरा मजबूत हुई | बड़े विदेशी आक्रमण नहीं |
| मैसूर का गंग वंश | जैन धर्म, सिंचाई और कृषि का विकास | जैन विद्वानों का प्रभाव पूरे भारत में फैला | बड़े विदेशी आक्रमण नहीं |
| कांची के पल्लव | महाबलीपुरम मंदिर, द्रविड़ स्थापत्य, समुद्री व्यापार | मंदिर स्थापत्य व संस्कृत संस्कृति का प्रभाव | दक्षिण-पूर्व एशिया से व्यापारिक संबंध |
| मदुरै के पांड्य | मोती व्यापार, समुद्री व्यापार, मंदिरों को दान | दक्षिण भारत की समृद्धि प्रसिद्ध हुई | अरब व्यापारियों का आगमन, बाद में मलिक काफूर का आक्रमण |
| चालुक्य वंश | ऐहोल-पट्टदकल मंदिर, कला व स्थापत्य विकास | हर्षवर्धन को नर्मदा पर रोका | फारस (सासानी साम्राज्य) से संबंध |
| राष्ट्रकूट वंश | एलोरा कैलाश मंदिर, कन्नड़ साहित्य विकास | कन्नौज के त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग | अरब व्यापारियों से संपर्क |
| काकतीय वंश | सिंचाई टैंक, वारंगल व्यापार केंद्र | महिला शासन की सफल मिसाल | दिल्ली सल्तनत के आक्रमण |
| होयसल वंश | बेलूर-हलेबीडु मंदिर, मूर्तिकला विकास | दक्षिण भारतीय कला प्रसिद्ध हुई | दिल्ली सल्तनत के हमले |
| यादव वंश देवगिरि | मराठी संस्कृति व व्यापार का विकास | उत्तर-दक्षिण व्यापार मार्ग मजबूत हुए | अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण |
➣ दक्षिण भारत के इन प्राचीन राजवंशों के काल (लगभग 4वीं से 14वीं शताब्दी ई.) में भारत, खासकर दक्षिण भारत, सांस्कृतिक रूप से अत्यंत समृद्ध और गतिशील था। इस पूरे काल में दक्षिण
➣ भारत राजनीतिक रूप से खंडित रहा, लेकिन सांस्कृतिक और वास्तुकीय दृष्टि से अत्यंत समृद्ध बना रहा, जब तक 14वीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत की सेनाएँ दक्षिण तक नहीं पहुँच गईं।
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