राष्ट्रकूट वंश
❑ आदिपुराण के रचनाकार जिनसेन, गणितसार संग्रह के लेखक महावीराचार्य तथा अमोघवृत्ति के लेखक सक्तायना अमोघवर्ष के दरबार में रहते थे।
❑ अमोघवर्ष तुंगभद्रा नदी में जल समाधि लेकर अपने जीवन का अंत किया।
❑ अलमसूदी इन्द्र तृतीय के समय भारत आया था। अलमसूदी ने तत्कालीन भारत का सर्वश्रेष्ठ शासक इन्द्र तृतीय को कहा।
❑ कृष्ण तृतीय ने चोलों को परास्त कर कांची एवं तंजावुर पर अधिकार कर लिया।
❑ कृष्ण प्रथम तंजावुर में विजय स्तम्भ बनवाया था।
❑ एलोरा गुफाओं का सर्वप्रथम वर्णन थेविनेट (फ्रांसीसी यात्री) ने 17वीं शताब्दी में किया था।
❑ बौद्ध गुफाओं में सबसे प्रसिद्ध विश्वकर्मा गुफा (संख्या-10) है।
❑ एलोरा की गुफा 15 में विष्णु को नरसिंह अर्थात् पुरुष-सिंह के रूप में दिखलाया गया है।
❑ एलोरा एवं एलिफेंटा गुहा मंदिरों का निर्माण राष्ट्रकूटों के समय हुआ।
❑ राष्ट्रकूट शैव, वैष्णव, शाक्त सम्प्रदायों के साथ-साथ जैन धर्म के भी उपासक थे।
❑ राष्ट्रकूटों ने अपने राज्यों में मुसलमान व्यापारियों को बसने तथा इस्लाम प्रचार की स्वीकृति दी थी।
❑ सियक परमार ने राष्ट्रकूटों की राजधानी मान्यखेत पर आक्रमण कर इसे पूर्णत: ध्वस्त कर दिया।
पल्लव वंश
❑ पल्लव राजवंश का संस्थापक बप्पदेव (तीसरी-चौथी सदी में) था। पल्लव राजवंश की स्थापना उस समय हुई जब सातवाहन शक्ति का पतन हो रहा था।
❑ वप्पदेव ने आन्ध्र प्रदेश एवं तोण्डैमण्डलम पर शासन किया।
❑ सिंहविष्णु (575-600 ई.) को पल्लव वंश का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।
❑ सिंहविष्णु को अन्य अवनिसिंह तथा सिंहविष्णुपोतरयण के नाम से जाना जाता है।
❑ यह वैष्णव धर्म के अनुयायी था। इसने मामल्लपुरम में वराहगुहा मंदिर का निर्माण कराया।
❑ महेन्द्रवर्मन प्रथम के समय (600-630 ई.) पल्लव-चालुक्य संघर्ष आरम्भ हुआ।
❑ महेन्द्रवर्मन प्रथम एक महान निर्माता, कवि एंव संगीतज्ञ था। उसने मत्तविलास प्रहसन की रचना की।
❑ सिंहविष्णु द्वारा चोलों की पराजय का वर्णन वैलूर पालैयम ताम्रपत्र से मिलता है।
❑ महेन्द्रवर्मन प्रथम ने विचित्रचित, मत्तविलास एवं गुणभर उपाधियाँ धारण की थी।
❑ महेन्द्रवर्मन प्रथम प्रसिद्ध संगीतज्ञ रुद्राचार्य से संगीत की शिक्षा ली थी।
❑ महेन्द्रवर्मन ने शैव सन्त अप्पर के प्रभाव से जैन-धर्म त्यागकर शैव मत ग्रहण कर लिया।
❑ महेन्द्रवर्मन ने महेन्द्रवाड़ी एवं चित्रमेघ तालाबों का निर्माण कराया।
❑ महेन्द्रवर्मन को पुलकेशिन द्वितीय से पराजित होना पड़ा।
❑ पल्लव वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक नरसिंहवर्मन प्रथम (630-668 ई.) हुआ।
❑ पुलकेशिन द्वितीय को नरसिंह वर्मन प्रथम ने (कुर्रम अभिलेख के अनुसार) तीन युद्धों में पराजित किया।
❑ नरसिंहवर्मन ने पुलकेशिन द्वितीय के पीठ पर विजयाक्षर अंकित किया तथा विजय स्तम्भ का निर्माण वातापी में करवाया।
❑ नरसिंहवर्मन ने वातापीकोण्ड, महामामल्ल की उपाधि धारण की।
❑ नरसिंहवर्मन का पराक्रमी सेनापति शितोण्ड था।
❑ महाबलीपुरम् के कुछ एकाश्मक रथों का निर्माण कार्य नरसिंहवर्मन प्रथम के काल में शुरू हुआ।
❑ नरसिंहवर्मन के काल में चीनी यात्री ह्वेनसांग कांची गया था।
❑ नरसिंहवर्मन की लंका विजय का उल्लेख काशाक्कुड़ि ताम्रपत्र में तथा महावंश में मिलता है।
❑ चालुक्य नरेश विक्रमादित्य को परमेश्वर वर्मन प्रथम ने पराजित किया।
❑ परमेश्वर वर्मन शैव धर्म का अनुयायी था।
❑ परमेश्वर वर्मन ने रणंजय, लोकादित्य, अत्यन्तकाम, उग्रदण्ड, गुणभाजन एवं विद्याविनीत की उपाधियाँ धारण की।
❑ माम्मलपुरम् में परमेश्वर वर्मन प्रथम ने गणेश मन्दिर बनवाया।
❑ कांची का कैलाशनाथ मन्दिर तथा महाबलीपुरम् के तट मन्दिर का निर्माण नरसिंह वर्मन द्वितीय ने करवाया।
❑ नरसिंहवर्मन द्वितीय ने राजसिंह, शंकरभक्त तथा आगमप्रिय की उपाधियाँ धारण की थी।
❑ संस्कृत के प्रसिद्ध विद्वान दण्डी नरसिंह वर्मन द्वितीय के राजसभा मे रहते थे।
❑ वैष्णव परम्परा का अन्तिम पल्लव शासक परमेश्वर वर्मन द्वितीय था।
❑ कांची का मुक्तेश्वर मन्दिर तथा बैकुण्ठपेरुमाल मन्दिर का निर्माण नन्दिवर्मन द्वितीय ने करवाया।
❑ प्रसिद्ध वैष्णव सन्त तिरुमंङगई आलवार नन्दिवर्मन द्वितीय का समकालीन था।
❑ प्रसिद्ध दार्शनिक शंकराचार्य दन्तिवर्मन पल्लव शासक समकालीन थे।
❑ पल्लव साम्राज्य को चोल शासकों ने विजित कर अपने राज्य में मिला लिया।
❑ पल्लव वंश का अंतिम शासक कम्पवर्मा (948-980 ई.) था।
❑ पल्लव नरेश ब्राह्मण धर्म के अनुयायी थे।
❑ दशकुमार चरित तथा काव्यादर्श के लेखक दण्डी थे।
❑ पल्लव शासकों के अधिकांश लेख विशुद्ध संस्कृत भाषा में लिखे गए हैं।
❑ कन्दरा शैली की भवन निर्माण कला को महेन्द्र वर्मन ने प्रचलित किया।
❑ सप्तपैगोडा पल्लव शासकों द्वारा, बनवाये गये रथ मन्दिरों को कहा जाता है।
❑ कांची का कैलाशनाथ मन्दिर राजसिंह शैली में बना है।
बादामी या वातापी के चालुक्य
❑ बादामी के चालुक्य वंश की स्थापना पुलकेशिन प्रथम ने की थी। पुलकेशिन-I ने अश्वमेध यज्ञ किया था।
❑ महाकूद अभिलेख में पुलकेशिन-1 से पूर्व दो शासकों जयसिंह तथा रणराम के नाम मिलते हैं।
❑ कीर्तिवर्मन प्रथम ने गोवा को जीतकर उसका नाम खेतद्वीप रखा।
❑ कीर्तिवर्मन प्रथम ने बहुसुवर्ण एवं अग्निष्टोम्, दो यज्ञों को न्न करवाया।
❑ पुलकेशिन द्वितीय का संरक्षक चाचा मंगलेश था। पुलकेशिन द्वितीय 610 ई. में चाचा मंगलेश को हराकर शासक बना।
❑ पश्चिमी समुद्र की लक्ष्मी पुरी (हाथियों का द्वीप) जो कोंकण तट पर था, को कहा जाता था।
❑ समकालीन शासक हर्षवर्धन ने पुलकेशिन द्वितीय को दक्षिण का स्वामी स्वीकार किया।
❑ पुलकेशिन द्वितीय को पल्लव शासक नरसिंह वर्मन प्रथम ने हराकर मार डाला था।
❑ फारस के शासक खुसरो द्वितीय के दरबार में पुलकेशिन द्वितीय ने शिष्टमडल भेजा था।
❑ पुलकेशिन द्वितीय के समय ह्वेनसांग चीनी यात्री दक्षिण भारत आया था।
❑ पुलकेशिन द्वितीय ने सत्याश्रय एवं श्री पृथ्वी वल्लभ महाराज की उपाधि धारण की थी।
❑ पुलकेशिन द्वितीय ने हर्ष को पराजित कर परमेश्वर की उपाधि धारण की।
❑ पुलकेशिन द्वितीय को मारने के बाद नरसिंहवर्मन ने वातापीकोण्ड की उपाधि धारण की।
❑ विनयादित्य द्वितीय ने सकलोत्तरपथनाथ की उपाधि धारण की थी।
❑ विक्रमादित्य द्वितीय ने कांचीकोण्ड की उपाधि धारण की थी।
❑ पाण्डयों, चोलों, केरों एवं कलभ्रों को विक्रमादित्य द्वितीय ने पराजित किया।
❑ त्रैलोकेश्वर मन्दिर का निर्माण त्रैलोक्य महादेवी ने करवाया।
❑ पट्टदकल के विरुपाक्षमहादेव मन्दिर का निर्माण लोकमहादेवी ने करवाया।
वेंगी (आन्ध्र) के पूर्वी चालुक्य
❑ वेंगी के चालुक्य वंश का संस्थापक विष्णुवर्द्धन था। विष्णुवर्द्धन ने 615 ई. से 633 ई. तक शासन किया।
❑ विष्णुवर्द्धन भागवत धर्म का अनुयायी था।
❑ विजयवाड़ा में जैन मन्दिर का निर्माण विष्णुवर्द्धन की पत्नी आयना महादेवी ने करवाया।
❑ वेंगी के चालुक्य वंश की राजधानी वेंगी (आन्ध्र प्रदेश) थी।
❑ इस वंश का सबसे प्रतापी शासक विजयादित्य तृतीय (848-892 ई.) था।
कल्याणी के चालुक्य
❑ कल्याणी के चालुक्य वंश का संस्थापक तैलप द्वितीय (973-997 ई.) था।
❑ तैलप द्वितीय ने अश्वमल और भुवनैकमल्ल की उपाधि धारण की।
❑ मेरूतुंग कृत प्रबन्ध चिन्तामणि से ज्ञात होता है कि तैलप द्वितीय ने मुंज के ऊपर छ: बार आक्रमण किया किन्तु प्रत्येक बार पराजित हुआ।
❑ सोमेश्वर प्रथम 1043 ई. में शासक बना। उसने अपनी राजधानी मान्यखेत से कल्याणी में स्थानान्तरित किया।
❑ चोलों से पराजित होने के कारण सोमेश्वर प्रथम ने करुवती के पास तुंगभद्रा नदी में डूबकर आत्महत्या की।
❑ कल्याणी के चालुक्य वंश का महानतम शासक विक्रमादित्य षष्ठ (1076-1126) था।
❑ विक्रमांकदेवचरित के लेखक विल्हण थे।
❑ बिल्हण और मिताक्षरा के लेखक विज्ञानेश्वर विक्रमादित्य षष्ठ के दरबार में रहते थे।
❑ चालुक्य विक्रम संवत् विक्रमादित्य षष्ठ ने, 1076 ई. में प्रारम्भ किया था।
❑ मानसोल्लास और अभिलाषितार्थ चिंतामणि की रचना सोमेश्वर तृतीय ने की थी।
❑ इस वंश का अंतिम शासक तैलप तृतीय का पुत्र सोमेश्वर चतुर्थ था।
❑ चोलों का सर्वप्रथम वर्णन अशोक के तेरहवें शिलालेख में मिलता है।
❑ प्रारम्भिक चोलों की राजधानी तंजौर थी।
❑ परवर्ती चोल वंश का संस्थापक विजयालय (850 ई.) था।
❑ विज्यालय पल्लवों का सामंत था। विजयालय ने नरकेसरी की उपाधि धारण की।
❑ विजयालय चोल ने तंजौर में दुर्गादेवी का मन्दिर तथा नत्तामलाई में विजय चोलेश्वर मन्दिर बनवाये।
❑ चालुक्यों का पारिवारिक चिह्न वराह था।
❑ विक्रमादित्य षष्ठ के बाद सोमेश्वर तृतीय (1126-1138) बना, वह स्वयं बड़ा विद्वान था। सोमेश्वर तृतीय ने भूलोकमल्ल तथा त्रिभुवनमल्ल जैसी उपाधियां ग्रहण की।
❑ परान्तक प्रथम ने पाण्डय शासक राजसिंह को हराकर मदुरैकोण्ड की उपाधि धारण की।
❑ परान्तक प्रथम को तक्कोलम के युद्ध में राष्ट्रकूट शासक कृष्ण तृतीय ने हराया।
❑ राजराज प्रथम ने श्रीलंका के महेन्द्र पंचम को हराया।
❑ राजराज ने उत्तरी श्रीलंका में चोल साम्राज्य का एक नया प्रान्त बनाया तथा इसका नाम मुन्डि चोल मण्डलम दिया।
❑ राजराज ने अनुराधापुर के स्थान पर पोलोन्नारूव को राजधानी बनाई, तथा इसका नाम जगन्नाथ मंगलम रखा।
❑ चोलों की नौसेना सर्वाधिक मजबूत थी।
❑ अपने राज्य की समस्त भूमि की माप राजराज प्रथम ने करवाई।
❑ तंजौर के राजराजेश्वर मन्दिर का निर्माण राजराज प्रथम ने करवाया।
❑ राजराज प्रथम ने श्री विजय के शैलेन्द्र शासक श्रीमार विजयोतुंग वर्मन को नागपट्टिनम में एक बौद्ध मठ बनाने की अनुमति दी।
❑ श्रीलंका के शासक महेन्द्र पंचम को राजेन्द्र प्रथम (1014-1044 ई.) ने बन्दी बनाकर लाया। श्रीलंका में बौद्ध विहारों को राजेन्द्र प्रथम ने नुकसान पहुँचाया।
❑ गंगा घाटी की विजय के उपलक्ष्य में राजेन्द्र प्रथम ने गंगईकोण्ड चोल की उपाधि धारण की।
❑ राजेन्द्र प्रथम ने अपनी नई राजधानी गंगईकोण्डचोलपुरम् में बनाई।
❑ दक्षिण-पूर्व एशिया (मलय प्रायद्वीप, जावा, सुमात्रा) की विजय राजेन्द्र प्रथम ने की।
❑ राजेन्द्र प्रथम के समय श्रीविजय साम्राज्य का शासक संग्राम विजयोतुंग वर्मन था।
❑ राजराज प्रथम का वास्तविक नाम अरमोलि वर्मन था।
❑ राजराज प्रथम की प्रमुख विजय केरल, पाण्डय, श्रीलंका तथा मालदीव थी।
❑ राजराज प्रथम ने काण्डलूर शालैकलमरुत तथा शिवपादशेखर की उपाधि धारण की।
❑ अण्डमान-निकोबार, अराकान तथा को राजेन्द्र प्रथम ने विजित किया। चोल साम्राज्य का सर्वाधिक विस्तार राजेन्द्र प्रथम के शासनकाल में हुआ।
❑ राजेन्द्र प्रथम ने 1016 और 1033 ई. राजदूत मंडल चीन भेजे।
❑ राजेन्द्र प्रथम ने बंगाल विजय के उपरान्त सोलह मील लम्बा चोलगंगम नामक तालाब का निर्माण करवाया।
❑ श्रीलंका के शासक महेन्द्र पंचम से इन्द्र का निर्मलहार राजेन्द्र प्रथम ने छीना।
❑ राजाधिराज प्रथम ने कल्याणी विजय के बाद विजय राजेन्द्र की उपाधि धारण की।
❑ कुलोतुंग प्रथम को अन्य शुड्गम तर्वित्त (करों को हटाने वाला) के नाम से जाना जाता है।
❑ चिदम्बरम के मन्दिर तथा श्रीरंगम की समाधि कुलोतुंग प्रथम ने बनवाई।
❑ जयगोन्दार कुलोतुंग प्रथम का राजकवि था।
❑ कलिंगतुपर्णि की रचना जयगोन्दार ने की थी।
❑ आदित्य प्रथम ने कुन्नूर का बालसुब्रह्मण्यम् मंदिर तथा कुम्भकोणम का नागेश्वर मन्दिर बनवाये।
❑ दारासुरम के ऐरावतेश्वर मन्दिर का निर्माण राजराज द्वितीय ने करवाया।
❑ विक्रमचोल की उपाधि त्याग समुद्र थी।
❑ चोल वंश का अंतिम शासक राजेन्द्र तृतीय था।
❑ चोल साम्राज्य का अन्त 1279 ई. में पाण्डय नरेश कुलशेखर ने किया।
❑ सदैव राजा के पास रहने वाले उच्चाधिकारियों को उड़नकूट्टम कहा जाता था।
❑ विशाल चोल साम्राज्य छः प्रान्तों में विभाजित था।
❑ समितियों को वारियम कहा जाता था।
❑ मणिग्रामम् तथा वलंजियर व्यापारिक संगठन थे।
❑ कम्बन द्वारा तमिल रामायण की रचना कुलोतुंग द्वितीय के शासन काल में की गई।
❑ सम्राट की रक्षा के लिये प्राण न्योछावर करने वाले सैनिकों को वलैक्कारर कहा जाता था।
❑ शैव धर्म सर्वाधिक लोकप्रिय था।
❑ शैव धर्म के भक्ति गीत नम्बि आण्डार नम्बि ने लिखे थे।
❑ राजेन्द्र चोल के गुरु इशानशिव एवं सर्वशिव थे।
❑ विशिष्टाद्वैत के प्रवर्तक रामानुजाचार्य राजेन्द्र प्रथम के समकालीन थे।
❑ राजराज प्रथम की बहन कुन्दवै ने एक ही स्थान पर शैव, वैष्णव तथा जैन मन्दिरों का निर्माण कराया था।
❑ चोलकाल में वैष्णव लेखकों ने अपने ग्रन्थ संस्कृत में लिखे।
❑ अमृतसागर तथा बुद्धिमित्र जैसे जैन एवं बौद्ध भिक्षुओं को चोल शासकों संरक्षण दिया।
❑ कोरंगनाथ मंदिर परान्तक प्रथम ने बनवाया।
❑ चोलकाल में मन्दिरों के प्रवेश द्वार गोपुरम् कहलाते थे।
❑ चोल शासक समुद्री शक्ति के लिये विख्यात थे।
❑ चोलकाल की प्रमुख भाषा संस्कृत एवं तमिल थी।
❑ लिंगायत सम्प्रदाय की स्थापना बासव ने की।
❑ नयनार संत शिव के उपासक थे।
❑ अलवार संत विष्णु के उपासक थे।
❑ अन्न का मान एक कलम (तीन मन) था।
❑ सोने के सिक्के को काशु कहा जाता था।
❑ बेलि भूमि माप की इकाई थी।
❑ राजस्व विभाग का प्रमुख अधिकारी वरित्पोत्तराक्क कहलाता था।
❑ सेना की छावनियों को कडगम कहा जाता था।
❑ सेना की टुकड़ियों के प्रमुख को नायक तथा सेनाध्यक्ष या प्रधान सेनापति को महादण्ड नायक या सेनापति कहा जाता था।
❑ सेना के मुख्य अंग-धनुर्धर को विल्लिगल, गजारोही को कुजिरमल्लर, घुड़सवार को कुडिरैच्चेवगर तथा पैदल सेना को बडपेई कैक्कोलर कहा जाता था।
मदुरै के पाण्ड्य
❑ परवर्ती पाण्ड्य वंश की स्थापना कंडुगोन (590-620 ई.) ने किया था।
❑ मलयादि कुरिचि में चट्टान काटकर जयंत वर्मन ने गुफा मन्दिर बनवाई।
❑ श्रीमार श्रीवल्लभ (815-862 ई.) एक पराक्रमी तथा साम्राज्यवादी शासक था।
❑ अन्ततः पाण्ड्य सम्राज्य को पल्लव शासक नृपतुंग ने विजित कर लिया।
❑ 1310 ई. में अलाउद्दीन के सेनापति मलिक काफूर ने पाण्ड्य राज्य पर आक्रमण कर मदुरा को लूटा तथा ध्वस्त कर दिया।
❑ महान खगोलशास्त्री भास्कराचार्य का पुत्र लक्ष्मीधर जैतुंगी का दरबारी कवि था।
❑ यादव वंश का अंतिम राजा सिंघन था।
द्वारसमुद्र के होयसल वंश
❑ होयसलों का मूल क्षेत्र मैसूर में गंगवाड़ी के पहाड़ी क्षेत्र में था।
❑ होयसल राज्य का वास्तविक संस्थापक विष्णुवर्द्धन था।
❑ होयसल यादव वंश से सम्बन्धित थे। अपने को चंद्रवंशी मानते थे।
❑ होयसलेश्वर मन्दिर का निर्माण विष्णुवर्द्धन के शासन काल में हुआ।
❑ वेल्लूर में चेन्ना केशव मन्दिर का निर्माण विष्णुवर्द्धन ने करवाया था।
❑ होयसल वंश का अंतिम शासक वीर बल्लाल तृतीय था। उसने 1210 ई. से 1247 ई. तक शासन किया।
❑ सारंगदेव का संगीत रत्नाकर सिंघन के दरबार में लिखा गया।
❑ 1310-11 ई. में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति मलिक काफूर ने होयसल वंश के शासक बल्लाल तृतीय को पराजित किया।
❑ बल्लाल तृतीय ने अलाउद्दीन को वार्षिक कर देना स्वीकार कर लिया। उसने 1339 ई. तक अलाउद्दीन के करद के रूप में शासन करता रहा।
❑ होयसलों की राजधानी द्वारसमुद्र का आधुनिक नाम हलेबिड (कर्नाटक) है।
कदम्ब राजवंश
❑ कदम्ब राजवंश की स्थापना मयूर शर्मन ने की थी।
❑ मयूर शर्मन ने लगभग 345 ई. से 360 ई. तक शासन किया।
❑ कदम्ब शासकों की राजधानी बनवासी थी। इनकी दूसरी राजधानी का नाम वालासिका था।
❑ मयूर शर्मन का उत्तराधिकारी मृगेश वर्मन हुआ। वालासिका में मृगेश वर्मन द्वारा एक मन्दिर का निर्माण मयूर शर्मन की स्मृति में कराया गया।
❑ मयूर शर्मन को अठारह अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान कराने वाला कहा गया है।
❑ कदम्बवंशी शासकों की वंशावली हमें एकमात्र ताल गुण्ड स्तम्भलेख से ज्ञात होती है।
गंग वंश
❑ गंग वंश की स्थापना वजहस्त-V ने की।
❑ कॉकणि वर्मा का समय लगभग 400 ई. माना जाता है।
❑ गंग वंश का शासन आधुनिक मैसूर के दक्षिण गंगवाडि क्षेत्र में था।
❑ माधव प्रथम ने दत्तक सूत्र पर टीका लिखी थी।
❑ गंग शासक श्रीपुरुष ने अपनी राजधानी मान्यपुर में बनाई। श्रीपुरुष 728-788 ई. तक शासन किया।
❑ गंगों की प्रारंभिक राजधानी कुवलाल (कोलर) में थी जो बाद में तलकाड हो गयी।
❑ काकतीय वंश का संस्थापक बीटा प्रथम था।
❑ काकतीय शासक पश्चिमी चालुक्यों के सामन्त थे।
❑ प्रोल द्वितीय (काकतीय शासक) ने अपने को चालुक्यों से स्वतन्त्र घोषित किया।
वारंगल के काकतीय वंश
❑ अनुमाकोंडा के हजार स्तम्भों वाले मन्दिर का निर्माण रुद्रदेव ने करवाया। इनकी राजधानी अमकोण्ड थी।
❑ ओरुगाल्लु (आधुनिक वारंगल) नामक नया शहर रुद्रदेव ने बसाया।
❑ काकतीय वंश का सबसे शक्तिशाली राजा गणपतिदेव था।
❑ गणपतिदेव ने अपनी राजधानी वारंगल में स्थापित की।
❑ रुद्राम्बादेवी गणपतिदेव की पुत्री थी तथा गणपति के बाद रुद्राम्बा काकतीय राज्य की शासिका बनी।
❑ 1323 ई. में मुहम्मद तुगलक ने प्रतापरूद्रदेव के राज्य पर आक्रमण किया।
❑ प्रतापरूद्रदेव पराजित हुआ तथा बंदी बना लिया गया और काकतीय राज्य दिल्ली सल्तनत में सम्मिलित कर लिया गया।
❑ काकतीय राज में कालामुख तथा पाशुपत धर्म प्रचलित था।
❑ अप्पाचार्य ने प्रतिस्थासार लिखी।
❑ नीतिशास्त्र मुक्तावली बाद्देना ने लिखी।
❑ नीरवचनोत्तर रामायण तिक्काना ने लिखी।
देवगिरि के यादव
❑ देवगिरि के यादव वंश का संस्थापक भिल्लम था।
❑ भिल्लम चालुक्य शासक सोमेश्वर चतुर्थ का सामंत था।
❑ भिल्लम ने अपनी राजधानी देवगिरी में बनाई। उसने 1187-1191 ई. तक शासन किया।
❑ भिल्लम के बाद उसका बेटा जैतुंगी राजा बना।
❑ वाराहमिहिर के बृहज्जातक पर अनन्तदेव ने टिप्पणी लिखी।
❑ व्रतखांदा का लेखक हेमाद्रि महादेव के दरबार में रहता था।
❑ देवगिरि को 1309 ई. में अलाउद्दीन खिलजी द्वारा विजित कर लिया गया।
❑ यादव वंश का अंतिम स्वतन्त्र शासक रामचन्द्र था।
❑ सिद्धान्त शिरोमणि तथा करणकौतुहल की रचना भास्कराचार्य ने की।
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