पाषाणकालीन सभ्यता : प्रारंभिक मानव जीवन और सांस्कृतिक विकास

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पाषाण काल : परिचय

प्रागैतिहासिक काल जिस काल का कोई लिखित साक्ष्य नहीं मिलता है, जैसे – पाषाण कालीन सभ्यता (पुरा पाषाण काल, मध्य पाषाण काल एवं नव पाषाण काल)।

आद्य-ऐतिहासिक काल जिस काल के लिपि के साक्ष्य तो हैं किंतु उनके अपठ्य या दुर्बोध होने के कारण उनसे कोई निष्कर्ष नहीं निकलता, जैसे – सिंधु घाटी सभ्यता एवं ताम्र सभ्यता

ऐतिहासिक काल जिस काल से लिखित विवरण मिलते हैं, जैसे – छठी शताब्दी ईसा पूर्व के आस-पास का काल, वैदिक काल, बौद्ध धर्म एवं जैन धर्म का जन्म।

पृथ्वी की रचना 4600 मिलियन वर्ष पूर्व
जीवन की उत्पति 3500 मिलियन वर्ष पूर्व
मेसोजोइक युग (डायनोसर का स्वर्ण युग) 200 मिलियन वर्ष पूर्व
स्तनधारी जीवों की उत्पति 65 मिलियन वर्ष पूर्व
पृथ्वी पर प्रथम मानव 30 करोड़ वर्ष पूर्व

➣ भारत में पाषाणकालीन सभ्यता की खोज का कार्य सर्वप्रथम 1863 ई. में आरम्भ हुआ।

➣ सर्वप्रथम भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग के विद्वान रॉबर्ट ब्रूस फुट ने पल्लवरम् (मद्रास) से पूर्व पाषाण कालीन उपकरण, पत्थर के हाथ की कुल्हाड़ी प्राप्त किया।

➣ ब्रिटिश भू-वैज्ञानिक और पुरातत्वविद् रॉबर्ट ब्रूस फुट ने भारतीय संस्थान जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के लिए भारत में इतिहास पूर्व स्थानों का भू-विज्ञान संबंधी सर्वेक्षण किया था जिन्हें भारत के इतिहास पूर्व अध्ययन का संस्थापक माना जाता है।

पुरापाषाण काल (प्राचीन पत्थर काल)
अन्य नाम – शिकार व खाद्य संग्रह युग
प्रथम खोजकर्ता : रोबर्ट ब्रूस फुट
प्रथम ज्ञात मानव होमोनिडस (दक्षिणी व पूर्वी अफ्रीका)
आवास : वृक्षों पर
अस्ट्रेलोपैथिकस
हिम नदी युग का प्रारम्भ –नियंडरथल मानव
मानव कंकाल दफ़नाने की प्रक्रिया
भाषा की उत्पत्ति, हस्त कुठार का निर्माण
आग की खोज
आवास : गुफा
हिम नदी युग का अंत
मध्य पाषाण काल (मध्य पत्थर काल)
अन्य नाम – शिकार व पशुपालन युग
प्रथम खोजकर्ता : जॉन इवांस
नव पाषाण काल (नवीन पत्थर काल)
अन्य नाम – अन्न उत्पादक युग
प्रथम खोजकर्ता : डॉ. प्राइमरोज
प्रथम पालतू पशु कुत्ता
पहिये व कृषि का अविष्कार, प्रथम फसल जौ
वस्त्र निर्माण की कला
आवास : कच्चे / पक्के मकान
मानव कंकाल दफ़नाने की प्रक्रिया
धातु युग का आरम्भ
ताम्र पाषाण काल (तांबा +पत्थर काल)
मानव द्वारा प्रयुक्त पहली धातु ताम्बा
सिंधु घाटी सभ्यता (कांस्य युगीन संभ्यता)
वैदिक सभ्यता (लौह युग का आरम्भ)

पूर्व/पुरा-पाषाण काल शिकार एवं खाद्य संग्रह युग (25 लाख ई.पू.)

➣ आरंभिक काल में मानव पत्थर का प्रयोग करता था, इसलिए पुरातत्त्वविदों ने इसे पुरापाषाण काल नाम दिया है। यह शब्द प्राचीन और पाषाण (पत्थर) से बना है।

➣ भारत में मानव के प्राचीनतम अस्तित्व का संकेत द्वितीय हिमावर्त्तन (ग्लेसिएशन) काल की परतों से प्राप्त पत्थर के उपकरणों से मिलता है, जिसका काल 25,00,000 ई.पू. बताया जाता है।

➣ आदिम मानव को धातुओं का ज्ञान नहीं था, उसके पास निश्चित घरों का अभाव था। हालाँकि जानवरों का भय बराबर बना रहता था।

खेती करना, आग जलाना और बर्तन बनाने की कला का ज्ञान नहीं था। वे शिकार द्वारा जानवरों के मांस और ऐसे फलों एवं सब्जियों, कंद-मूलों (खाद्य संग्रह) पर जीवन व्यतीत करते जो जंगलों में उपजाते थे।

➣ पुरापाषाण युग को मानवीय व जलवायु परिवर्तनों के आधार पर तीन वर्गों में बाँटा गया है –

पुरापाषाण युग का विभाजन

  1. निम्न पुरापाषाण युग (Lower Palaeolithic Age) – लगभग 25,00,000 से 1,00,000 ई.पू.
  2. मध्य पुरापाषाण युग (Middle Palaeolithic Age) – लगभग 1,00,000 से 40,000 ई.पू.
  3. उत्तर या उच्च पुरापाषाण युग (Upper Palaeolithic Age) – लगभग 40,000 से 10,000 ई.पू.

उपकरणों की भिन्नता के आधार पर

  1. पूर्व पुरापाषाण काल – क्रोड उपकरण (हस्तकुठार, खंडक एवं विदारिणी)
  2. मध्य पुरापाषाण काल – फलक उपकरण
  3. उच्च पुरापाषाण काल – तक्षिणी एवं खुरचनी उपकरण

➣ फलकों की अधिकता के कारण मध्य पुरापाषाण काल को फलक संस्कृति भी कहा जाता है।

हिमनद युग का प्रारम्भ 10 लाख वर्ष ई०पू०
प्रथम हिम नदी युगजावा मानव- 5 लाख वर्ष ई०पू०
द्वितीय हिम नदी युगपीकिंग मानव- 120,000 वर्ष ई०पू०
तृतीय हिम नदी युगनियंडरथल मानव- 50,000 वर्ष ई०पू०
चतुर्थ हिम नदी युगक्रोमैग्नन मानव- 25,000 वर्ष ई०पू०
उत्तर हिम नदी युगउत्तर पाषाण काल- 10,000 वर्ष ई०पू०

निम्न पुरापाषाण युग या पूर्व पुरापाषाण काल (25 लाख -1 लाख ई.पू. )


➣ अधिकांश हिमयुग आरम्भिक पुरापाषाण युग में ही व्यतीत हुआ माना जाता है।

➣ प्राचीन पुरापाषाण-युग लगभग 20 लाख साल पहले अफ्रीका में शुरू हुआ लेकिन भारत में यह 6 लाख वर्ष से अधिक प्राचीन नहीं है। इसका प्रमाण है- कुल्हाड़ी या हस्त-कुठार, विदारणी (क्लीवर) और गंडासा (खंडक) का उपयोग।

➣ उपकरणों के अतिरिक्त बेलन के लोंहदा नाला क्षेत्र से इस काल की अस्थि निर्मित मातृदेवी की एक प्रतिमा मिली है, जो संप्रति कौशाम्बी संग्रहालय में सुरक्षित है।

रेमण्ड डार्ट ने 1924 ई. में दक्षिण अफ्रीका के वेचुआनालेंड की टांग घाटी से अस्ट्रेलोपैथिकस अफ्रिकेनस अर्थात दक्षिण अफ़्रीकी कपि मानव की खोज की। इसका काल 10 लाख ई. पू. निर्धारित किया गया।

➣ एशिया में जावा द्वीप (इंडोनेशिया) से 1891 ई. में डॉ यूजीन डुवाय ने 9 लाख ई. पू. के जावा कपि मानव की खोज की एंव इसे पीठिकेन्थरोंपरस इरेक्टस नाम दिया। इसी क्रम में 1927 ई. में चीन- काओ तिन से बोहलिन ने पीकिंग मानव के 10 लाख ई. पू. जीवाश्म प्राप्त किये।

➣ निम्न पूरा पाषाण काल में मानव का चार पैरों से उठकर दो पैरों पर खड़ा होना महत्वपूर्ण था। जिसने मानव ने स्वंय को अन्य जीवों की श्रेणी से पृथक कर लिया। अब वह पेड़ों से उतरकर धरती पर चलने लगा था।

चार पैरों वाला मानव रामा पिथिकस था जबकि दो पैरों पर खड़े होने वाला अस्ट्रेलोपैथिकस। अस्ट्रेलोपैथिकस को मानव विकास में महत्वपूर्ण घटना माना गया है।

➣ चूँकि मानव अब पेड़ों से उतरकर जमीन पर चलने लगा। सम्भवत: ऐसे में उसका सामना जंगली जानवरों से होने लगा। फलत: वह पत्थरों का उपयोग करने लगा।

प्रमुख पुरापाषाणीय संस्कृतियाँ

➣ पत्थरों के हथियारों के आधार पर पूरा-पाषाण कालीन संस्कृतियों-

  • पूर्व चेलियन संस्कृति
  • चेलियन संस्कृति
  • अबेविलियन (Abbevillian) संस्कृति
  • सोहन संस्कृति

➣ अब मानव हाथ से इस्तेमाल करने वाले औजार कुल्हाड़ियों, गडाँसों और चाकुओं का उपयोग करने लग गया था।

➣ भारत में प्राप्त हुई प्रस्तर कुल्हाड़ियाँ प्रायः पश्चिम एशिया, यूरोप एवं अफ्रीका से प्राप्त कुल्हाड़ियों जैसी ही हैं।

➣ भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण के वैज्ञानिक रॉबर्ट ब्रूस फुट ब्रिटिश भूगर्भ वैज्ञानिक और पुरातत्वविद थे। 1863 ई. में रॉबर्ट ब्रूस फुट ने मद्रास के पास पल्लवरम नामक स्थान से पहला हैंडऐक्स प्राप्त किया था।

➣ पत्थर के औजारों का इस्तेमाल मुख्यतः काटने, खुदाई और चमड़ा निकालने के लिए किया जाता था।

➣ प्राचीन पुरापाषाण स्थल पंजाब के सोहन या सोन नदी की घाटी में पाए गए हैं, जो अब पकिस्तान में हैं। वर्ष 1935 में डी. टेरा के नेतृत्व में एल कैम्ब्रिज अभियान दल ने सोहन घाटी में सबसे महत्वपूर्ण अनुसंधान किया।

➣ पहली बार सोहन क्षेत्र से सम्बन्धित साक्ष्य मिलने के कारण इसे सोहन संस्कृति की संज्ञा भी दी गयी है।

उत्तर प्रदेश में बेलन और राजस्थान के दिदवाना के रेगिस्तानी क्षेत्र में लोवर पुरापाषाण काल के औजार पाए गए हैं। बेलन घाटी में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के जी.आर. शर्मा के निर्देशन में अनुसंधान किया गया। पूर्व पुरापाषाण काल से संबंधित यहां 44 पुरास्थल प्राप्त हुए हैं।

➣ आन्ध्र प्रदेश में नागार्जुन कोण्डा एक महत्त्वपूर्ण स्थल है और भोपाल के पास भीमबेटका की गुफाएँ और चट्टानी आश्रय भी लोवर पुरापाषाण-युग की विशेषताएँ दर्शाते हैं। अनेक स्थल कश्मीर तथा थार के मरुस्थल (डिडवाना क्षेत्र) में भी मिले हैं।

मध्य पुरापाषाण युग या शल्क संस्कृति (1 लाख – 40 हजार ई.पू. )

➣ मध्य पूरा पाषाण कालीन संस्कृति का प्रमुख प्रतिनिधि नियन्डरस्थल मानव था एंव इस संस्कृति को मॉस्टेरियन संस्कृति कहा जाता है। मॉस्टेरियन संस्कृति के साक्ष्य पश्चिमी जर्मनी , स्विट्जरलैंड , हंगरी , इटली तथा पश्चिमी एशिया से मिले हैं।

➣ नियन्डरसथल मानव ने अत्यधिक सर्दी से बचने के लिए गुफाओं में रहना प्रारम्भ किया। सम्भवत नियन्डरसथल मानव ने ही सर्वप्रथम आग का प्रयोग आरम्भ किया।

शिकार एंव खाद्य संग्रह अभी भी आजीविका का प्रमुख साधन था। अग्नि के अविष्कार के बाद अब वे उन्हें भून कर खाने लगे।

➣ नियन्डरस्थल इतिहास का वह सर्वप्रथम मानव था जिसने मृतकों को दफनाना आरम्भ किया। नियन्डरस्थल मानव को इतिहास का प्रथम दार्शनिक मानव माना जाता है।

➣ इस युग में पत्थरों से निर्मित विभिन्न प्रकार के फलक, वेधनी, छेदनी, पत्ती, बरछी, बरमा और खुरचन का प्रयोग होता था। ये सभी पत्थर के बने होते थे। जो सम्पूर्ण भारत में पाये गये हैं।

➣ इस युग का कलाकृतियाँ नर्मदा नदी के किनारे-किनारे अनेक स्थानों पर और तुंगभद्रा नदी के दक्षिणवर्ती स्थानों पर भी पाए गए हैं।

विन्ध्य की तलहटी में स्थित बेलान घाटी (उत्तर प्रदेश), पत्थर के औजार और ढोर-डंगर, हिरण सहित पशु जीवाश्मों के मामले में काफी समृद्ध है। जो पूर्व और मध्य पाषाण-युग दोनों से सम्बन्धित हैं।

उच्च पुरापाषाण युग या शल्क-फलक संस्कृति (40 हजार – 10 हजार ई.पू. )

➣ इस युग में आद्रता कम हो गयी थी और जलवायु अपेक्षाकृत गर्म होले जाने से हिमयुग की अंतिम अवस्था आरम्भ हो चुकी थी।

➣ इसी युग में आधुनिक प्रारूप के मानव (होमोसेपियन्स) का उदय माना जाता है।

➣ नियन्डरस्थल मानव जाती बिल्कुत समाप्त हो गयी उसका स्थान अन्य मानव जातियों द्वारा ले लिए गया – क्रोमैग्नन मानव, ग्रीमालदी मानव, कोंब कोपेल मानव, चांसलेड मैन

➣ उत्तर पूरा पाषाण कालीन उक्त मानवो ने ऑरिग्नेशियन संस्कृति, संस्कृति, मैग्डेलियन संस्कृति को जन्म दिया।

➣ मैग्डेलियन संस्कृति महत्वपूर्ण है। कला के क्षेत्र में यह संस्कृति अल्टामीरा में प्राप्त चित्रों का युग था जिन्हे क्रो-मैग्नन मानव द्वारा बनाये गए थे। इस काल को रेनडियर काल के नाम से भी जाना जाता है।

➣ इस काल में मानव ने पत्थरों से बने हथियारों के साथ हाथी दांत , सींग एंव अस्थियों का प्रयोग आरम्भ कर दिया। साथ ही वह मिट्टी की मूर्तियों भी बनाने लग गया था।

➣ इस युग के प्रस्तर फलक और कुल्हाड़ियाँ आंध्र, कर्नाटक, महाराष्ट्र, केन्द्रीय मध्य प्रदेश, दक्षिण उनर प्रदेश, पर्व बिहार (वर्तमान झारखंड) के पठारी भाग में पाये गये है।

➣ मानवों द्वारा गुफाएँ और चट्टानी आश्रयों का इस्तेमाल अपर पुरापाषाण-युग में भोपाल से 45 किलोमीटर दक्षिण में भीमबेटका में खोजा गया है।

➣ गुजरात के टिब्बों के ऊपरी तलों पर एक उच्च पुरापाषाणीय भंडार भी मिला है, जिसमें शल्क फलक, तक्षणियाँ और खुरचनियाँ सम्मिलित हैं।

➣ अपर पुरापाषाण काल में संग्रहित पपड़ियों, पत्तियों, खन्तियों और खुरचनों का आकार अपेक्षाकृत बड़ा देखा गया है। ये गुजरात के रेत के टीलों के ऊपरी भाग में भी पाए गए हैं।

➣ खुले आसमान के नीचे रहना सम्भव हो गया। अब मानव गुफाओं के साथ साथ झोपड़ियों में भी रहने लगा था। मानव पशुओं की खालकर सिलकर उन्हें वस्त्रों का रूप प्रदान करने लगा।

पुरापाषाण औजार व हथियार

पुरापाषाण औजार व हथियार

पुरा – पाषाणकाल स्थल

पुरा - पाषाणकाल स्थल
पहलगामकश्मीर लिद्दर नदी के निकट हाथ की कुल्हाड़ी प्राप्त हुई।
पोतवार (पिंडीदोब)पंजाब/पाकिस्तान हस्तकुठार व काटने के औजार मिले।
हथनोरमध्य प्रदेशनर्मदा नदी के निकट मानव खोपड़ी का प्रथम प्रमाण 1982 में अरुण सोनकिया द्वारा उत्खनन से प्राप्त हुआ था।
भीमबेटकामध्य प्रदेशनर्मदा के निकट भोपाल से 40 किमी दक्षिण में सबसे पुराने शैलाश्रय निवास (मानव निर्मित गुफाओं का घर) मिले।
आदमगढ़मध्य प्रदेशशिल्प उपकरण प्राप्त हुए।
लोहदानालाउत्तर प्रदेशबोलन नदी घाटी में अस्थि निर्मित मातृदेवी की प्रतिमा प्राप्त ।
पल्लवरम्मद्रास (चेन्नई)भारत में सर्वप्रथम हैण्ड-एक्स (हाथ की कुल्हाड़ी) का प्रमाण।
अतिरमपक्कम्मद्रास (चेन्नई) हैण्डएक्स, क्लीवर व फलक उपकरण मिले।
गुडियाममद्रास (चेन्नई)फलक व क्लीवर उपकरण के साक्ष्य मिले।
नेवासा व चिरकीमहाराष्ट्रमध्य पुरातात्विक युगीन उच्चकोटि के उपकरण।

➣ 10,000ई.पू. के आस-पास हिम-युग के अन्त के साथ अपर पुरापाषाण-युग समाप्त हुआ तथा बीच का युग मध्य पाषाण-युग की शुरुवात हुई।

➣ ज्ञातव्य हो मध्यपाषाण काल शुरू होने से पहले ही अर्थात पुरापाषाण-युग की देन थी –

  1. दक्षिण अफ्रीका में आधुनिक मानव होमो सेपियंस सेपियंस की उपस्थिति – लगभग 1.5 लाख वर्ष पूर्व
  2. आग की खोज
  3. भाषा की उत्पत्ति – लगभग 50,000 ई.पू.
  4. मानव ने अभी तक खेती करना नहीं सीखा था, वह शिकार और संग्रह पर आधारित जीवन निर्वाह करता था।

➣ पुरा पाषाण काल से सम्बन्धित जानकारी के स्त्रोत केवल उपकरण ही हैं, अतः इस काल की जानकारी सीमित है।

मध्य पाषाण काल या शिकार एवं पशुपालन युग (9000 – 4000 ई.पू.)

➣ पुरापाषाण युग के पश्चात मध्य पाषाण काल आता है। इसे उत्तरीय प्रस्तर का काल (उत्तर पाषाण युग) या Mesolithic Age भी कहा जाता है। यह काल नव पाषाण काल से पहले का है।

➣ मध्य पाषाण काल में तापमान में वृद्धि हुई। हिमवर्ती क्षेत्रों का बर्फ पिघलने लगा तथा समुद्र का स्तर बढ़ा।

➣ जलवायु में परिवर्तनों के साथ-साथ वनस्पति व जीव-जन्तुओं में भी परिवर्तन हुए। विशाल क्षेत्रों में जंगलों का अस्तित्व सामने आया। मानव के लिए नए क्षेत्रों की ओर आगे बढ़ना संभव हुआ।

➣ भारत में मध्यपाषाण काल के विषय में जानकारी सर्वप्रथम 1867-68 ई. में हुई, जब आर्कीबाल्ड कार्लाइल ने विंध्य क्षेत्र से शैल चित्र खोज निकाले। भारत में मानव अस्थि पंजर सर्वप्रथम मध्यपाषाण काल से ही प्राप्त होने लगता है।

➣ मध्य पाषाण काल में पत्थर के बहुत छोटे औजार होते थे। प्रमुख औजार तीर , बरछे , भाले एंव चाक़ू, फलक, खुरचन आदि थे। ये तिकोने ,आयताकार , चंद्राकार, त्रिभुजाकार होते थे।

➣ पशुपालन का प्रारंभ मध्यपाषाण काल में हुआ। मध्यपाषाण काल के मानव शिकार करके, मछली पकड़कर और खाद्य वस्तुओं का संग्रह कर पेट भरते थे।

➣ मानव ने शिकार के लिए कुत्ते का प्रयोग किया। इस तरह मानव द्वारा पहला पालतू पशुओं में सर्वप्रथम कुत्ता था।

➣ मध्य पाषाणकालीन मानवपक्षी व मछली पकड़ कर, शहद जमा करना तथा जंगली कंद-मूल का संग्रह कर उसी से अपना पेट भरते थे।

साक्ष्य

➣ गुजरात स्थित लंघनाज सबसे महत्वपूर्ण पुरास्थल है। यहां से लघु पाषाणोपकरणों के अतिरिक्त पशुओं की हड्डियां, कब्रिस्तान तथा कुछ मिट्टी के बर्तन भी प्राप्त हुए हैं। यहां से 14 मानव कंकाल भी मिले हैं।

➣ मध्य पाषाण काल को नौवासा चरण की संज्ञा दी गयी , क्योंकि इस काल के उच्च कोटि के औजार नौवासा (महाराष्ट) नामक स्थान से प्राप्त हुए थे।

➣ मध्य पाषाणीय स्थल राजस्थान, दक्षिणी उत्तर प्रदेश, मध्य और पूर्वी भारत और कृष्णा नदी के दक्षिण में भी हैं। इनमे से राजस्थान के बागोर में अच्छी खुदाई हुई है।

➣ मध्यपाषाण कालीन महदहा (प्रतापगढ़, उ.प्र.) से हड्डी एवं सींग निर्मित उपकरण प्राप्त हुए हैं।

जी. आर. शर्मा ने महदहा के तीन क्षेत्रों का उल्लेख किया है, जो झील क्षेत्र, वूचड़खाना संकुल क्षेत्र एवं कब्रिस्तान निवास क्षेत्र में बंटा था।

➣ बूचड़खाना संकुल क्षेत्र से ही हड्डी एवं सींग निर्मित उपकरण एवं आभूषण बड़े पैमाने पर पाए गए हैं।

डॉ. जयनारायण पाण्डेय द्वारा लिखित पुस्तक पुरातत्व विमर्श में महदहा, सराय नाहर राय एवं दमदमा तीनों ही स्थलों से हड्डी के उपकरण एवं आभूषण पाए जाने का उल्लेख है।

➣ दमदमा में किए गए उत्खनन के फलस्वरूप पश्चिमी तथा मध्यवर्ती क्षेत्रों से कुल मिलाकर 41 मानव शवाधान ज्ञात हुए हैं।

➣ इन शवाधानों में से 5 शवाधान युग्म-शवाधान हैं और एक शवाधान में 3 मानव कंकाल एक साथ दफनाए हुए मिले हैं। शेष शवाधानों में एक-एक कंकाल मिले हैं। इस प्रकार कुल 48 मानव कंकाल प्राप्त हुए हैं।

➣ सराय नाहर राय से ऐसी समाधि मिली है, जिसमें चार मानव कंकाल एक साथ दफनाए गए थे। यहां की कब्रें (समाधियां) आवास क्षेत्र के अंदर स्थित थीं। कब्रें छिछली तथा अंडाकार थीं।

➣ विंध्य क्षेत्र के लेखहिया के शिलाश्रय संख्या 1 से मध्यपाषाणिक लघु पाषाण उपकरणों के अतिरिक्त 17 मानव कंकाल प्राप्त हुए हैं, जिनमें से कुछ सुरक्षित हालत में हैं तथा अधिकांश क्षत-विक्षत अवस्था में हैं।

➣ अमेरिका के ओरेगॉन विश्वविद्यालय के जॉन आर. लुकास के अनुसार, लेखहिया में कुल 27 मानव कंकालों की अस्थियां मिली हैं।

➣ पशुपालन के साक्ष्य भारत में आदमगढ़ (होशंगाबाद, म.प्र.) तथा बागोर (भीलवाड़ा, राजस्थान) से प्राप्त हुए हैं।

मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित भीमबेटका प्रागैतिहासिक शैल चित्रकला का श्रेष्ठ उदाहरण है। यूनेस्को ने भीमबेटका शैल चित्रों को विश्वविरासत सूची में सम्मिलित किया है।

➣ भारत में सर्वाधिक 700 से अधिक शिलाश्रय प्राप्त हुए हैं, जिसमें से 243 को क्रमांक दिया गया है, इसमें से 133 शिलाश्रयों में चित्रकारी प्राप्त हुई है।

➣ भारतीय उपमहाद्वीप में मध्य प्रदेश के आदमगढ़ और राजस्थान के बागोर में पशुपालन का सबसे पहला प्रमाण मिलता है। जिसका समय 5000 ई.पू. हो सकता है।

➣ मध्य पाषाण कालीन महादहा (उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले) से बड़ी मात्रा में हड्डी एवं सींग निर्मित उपकरण प्राप्त हुए हैं।

राजस्थान में ई.पू. 7000-6000 के आस-पास खेती का अनुमान लगाया जाता है जो कि खारे पानी के झील बनने और सांभर के एकत्रित होने से पहले का है।

➣ इस समय के लोग भी गुफाओं में रहते थे। पश्चिम, मध्य भारत और मैसूर (कर्नाटक) में इस युग की कई गुफाएँ मिलीं हैं।

➣ मध्य पाषाण काल में पहली बार मानव कंकालों को विधिवत रूप से दफ़न करने की प्रकिया शुरू हुई।

➣ इस युग की महत्वपूर्ण उपलब्ध खेती करना, शिकार करना तथा पशुपालन। इस प्रकार मध्यपाषाण काल को शिकार एवं पशुपालन युग भी कहा जाता है।

मध्य पाषाणकालीन औजार व हथियार

मध्य पाषाणकालीन औजार व हथियार

मध्य पाषाणकालीन स्थल

मध्य पाषाणकालीन स्थल
1.बागोरराजस्थानभीलवाड़ा जिले में कोठरी नदी के तट पर स्थित भारत का सबसे बड़ा मध्यपाषाणिक आवास स्थल जिसका उत्खनन बी. एन. मिश्र द्वारा कराया गया था।
2.लंघनाजगुजरातप्रथम शुष्क क्षेत्र का स्थल उत्खनन एच. डी. शांकलिया द्वारा हुआ। रेत के ठोस टीले व 14 मानव कंकाल प्राप्त हुए।
3.सराय नहर रायउत्तर प्रदेशस्तम्भगर्त के प्रमाण, मृतक संस्कार विधि के अन्तर्गत समाधिस्थल में शवों का सिर पश्चिम व पैर पूरब की ओर होती थी। हत्या का प्रथम साक्ष्य में कंकाल के सिर में पत्थर घुसा हुआ मिला।
4.महदहाउत्तर प्रदेशप्रतापगढ़ जिले में स्थित यह स्थल हड्डी व सींग के उपकरण व आभूषण मिले। स्त्री-पुरुष एक साथ दफनाने के साक्ष्य।
5.वीरभानपुरपश्चिम बंगालबी. बी. लाल द्वारा उत्खनन कार्य से आवासीय बस्ती व पत्थर के औजार की निर्माण स्थली के रूप में पहचान हुई।
6.आदमगढ़मध्य प्रदेशएक स्थल होशंगाबाद जिले में स्थित है। यहाँ से शैलाश्रय समूह के सूक्ष्म पत्थर के औजार प्राप्त हुए। पशुपालन का प्रथम साक्ष्य प्राप्त हुआ।
7.पंचमढ़ीमध्य प्रदेश2 प्रसिद्ध शैलाश्रय-जम्मूद्वीव व डोरोबीद्वीप मिले थे।
8.जलाहल्लीकर्नाटकरोमन लिपि के D अक्षर के आकार के तिरक्षे फलक का प्रमाण मिला।
9.टेरीतमिलनाडुप्रस्तर (पत्थर) उद्योग का कच्चा माल (स्फटिक व हल्का भूरा मृग पत्थर) प्राप्त हुए।

➣ भारत में इस युग का आरम्भ 8000 ई.पू. से माना जाता है। लगभग 4000 ई.पू. के आस-पास उच्च पुरा पाषाण युग का अंत हो गया और जलवायु उष्ण और शुष्क हो गई और एक नए युग की शुरुवात हुई।

नव पाषाण काल या अन्न उत्पादक युग (7000 – 1000 ई.पू.)

➣ नवपाषाण युग का आरम्भ विभिन्न क्षेत्रों में अलग – अलग समय पर हुआ। विभिन्न क्षेत्रों में 7000 – 4000ई. पू. तक नव पाषाण काल का आरम्भ माना जाता है।

➣ मध्यपाषाण काल के बाद नवपाषाण युग में मानव के जीवन में बहुत अधिक परिवर्तन आया। इस युग में उसे कृषि पद्धति का अच्छा ज्ञान हो गया। फलस्वरूप अनाज का उत्पादन पर्याप्त मात्रा में होने लगा तथा भण्डारण भी शुरू हुआ।

➣ भारतीय उपमहाद्वीप में ई.पू. 7000 का एकमात्र ज्ञात नवपाषाण बसावट मेहरगढ़ में है, जो पाकिस्तान के एक प्रान्त बलूचिस्तान में स्थित है।

➣ कृषि कार्य की प्रक्रिया में वे पत्थर की कुदालों और नुकीले पाषाण डंडों से जमीन तोड़ते थे।

➣ इस युग के लोग पॉलिशदार पाषाण हथियारों का प्रयोग करते थे। वे विशेष पत्थर की कुल्हाड़ियाँ प्रयुक्त करते थे, जो देश के पहाड़ी क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में पायी गयी हैं।

➣ नवपाषाण युगीन सेल्ट, कुल्हाड़ियां, बसूले, छेनी आदि उपकरण उड़िसा (ओडिशा) और छोटानागपुर (झारखंड) के पहाड़ी क्षेत्रों में भी पाये गये हैं।

➣ विशेष रूप से पत्थर की कुल्हाड़ियों का इस्तेमाल करते थे जो कि भारत के पहाड़ी इलाकों के महत्त्वपूर्ण हिस्से में बड़ी संख्या में पाई गई हैं।

➣ लोगों ने पत्थर कुल्हाड़ी का विभिन्न प्रकार से किया। प्राचीन किंवदन्ती के अनुसार परशुराम को ऐसा ही एक महत्त्वपूर्ण कुल्हाड़ी चलाने वाला नायक माना जाता है।

➣ नवपाषाण युगीन लोगों द्वारा विभिन्न कुल्हाड़ियों के इस्तेमाल के आधार पर नवपाषाण के तीन महत्त्वपूर्ण इलाके हैं-उत्तर-पश्चिमी, उत्तर-पूर्वी और दक्षिणी।

बुर्जाहोम, (कश्मीर) तथा चिंराद (छपरा, सारण) में पाषाण युगीन लोग पॉलिशदार पाषाण उपकरणों के अतिरिक्त बड़ी मात्रा में हड्डियों से निर्मित उपकरणों का भी प्रयोग करते थे।

➣ नवपाषाण युग में मानव छोटी-छोटी बस्तियाँ बनाकर रहने लग गया जिसने आगे चलकर जनजाति को जन्म दिया। इन जनजातियों में ज्येष्ठ और बलशाली पुरुष सरदारनेता होता था।

➣ इस युग में मानव घर बनाकर स्थायी रूप से रहना सीख गये थे। वे मिट्टी और सरकंडे से निर्मित गोलाकार तथा आयताकार घरों में निवास रूप करते थे।

विन्ध्य के उत्तरी क्षेत्रों में पाए जाने वाले कुछ नए नवपाषाण स्थल को 5000 ई.पू. का माना जाता है लेकिन दक्षिण भारत में आम तौर पर नवपाषाण बस्तियाँ 2500ई.पू. से अधिक पुरानी नहीं हैं।

➣ इस काल के लोग कृषि के अतिरिक्त पशुपालन भी करते थे। इनमे मुख्य गाय, बैल, भेड़ एवं बकरी थे।

➣ मेहरगढ़ कोची के समतल मैदान में बोलन नदी के किनारे है, जिसे बलूचिस्तान में अनाज की टोकरी कहा जाता है।

➣ नवपाषाण युग के निवासियों को सबसे पहले अन्न उगाने का श्रेय जाता है। इसी युग मानव बीज बोने लगा।

➣ मेहरगढ़ के नव पाषाणीय लोग गेहूँ, जौ और रूई उपजाते थे, जबकि इलाहाबाद के पास कोल्डिहवा से चावल उगाने का प्रमाण मिलता है।

➣ नवपाषाण कालीन अनेक स्थायी निवासियों का कृषि कार्य के कारण अनाज रखने तथा पकाने, खाने और पीने के लिए बर्तनों की आवश्यकता महसूस हुई। अत: कुम्भकारी सर्वप्रथम इसी युग में परिलक्षित होती है।

➣ उत्तर -पश्चिम में मेहरगढ़ (पाकिस्तान में), गुफकराल और बुर्जहोम (कश्मीर में), कोल्डिहवा और महागढ़ा (उत्तर प्रदेश में), चिरांद (बिहार में), हल्लूर और पैय्य्मपल्ली (आंध्र प्रदेश में) गेहूँ, जौ, चावल, ज्वार-बाजरा, दलहन, काला चना और हरा चना जैसी फसलें उगाने के प्रमाण मिले हैं।

➣ नवीनतम खोजों के आधार पर भारतीय उपमहाद्वीप में प्राचीनतम कृषि साक्ष्य वाला स्थल उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर जिले में स्थित लहुरादेव है। यहां से 9000 ई.पू. से 7000 ई.पू. मध्य के चावल के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।

➣ उल्लेखनीय है कि इस नवीनतम खोज के पूर्व भारतीय उपमहाद्वीप का प्राचीनतम कृषि साक्ष्य वाला स्थल मेहरगढ़ (पाकिस्तान के बलूचिस्तान में स्थित; यहां से 7000 ई.पू. के गेहूं के साक्ष्य मिले हैं),

➣ जबकि प्राचीनतम चावल के साक्ष्य वाला स्थल कोलडिहवा (इलाहाबाद जिले में बेलन नदी के तट पर स्थित; यहां से 6500 ई.पू. के चावल की भूसी के साक्ष्य मिले हैं) माना जाता था।

➣ फसलों के सबसे पहले साक्ष्य इन जगहों से पाए गए हैं-

फसलेंसमयावधिअवस्थिति
चावल लगभग 7000 ई.पू. चीन के यांग्त्जी नदी घाटी क्षेत्र में
मक्का लगभग 6000 ई.पू.) मैक्सिको में
बाजरा 5500 ई.पू. चीन में,
सोरघम 5000 ई.पू. पूर्वी अफ्रीका में,
राई 5000 ई.पू. दक्षिण-पूर्व एशिया में
जई 2300 ई.पू. यूरोप में

➣ यहाँ कब्रों में पालतू कुत्ते भी अपने मालिकों के शवों के साथ दफनाये जाते थे। यह प्रथा केवल भारत में ही पायी गयी है।

➣ मानव कंकाल के साथ कुत्ते का कंकाल वुर्जहोम (जम्मू-कश्मीर) से प्राप्त हुआ। गर्त आवास के साक्ष्य भी यहीं से प्राप्त हुए। इस पुरास्थल की खोज वर्ष 1935 में डी. टेरा एवं पीटरसन ने की थी।

गुफकराल कश्मीर में स्थित नवपाषाणिक स्थल है। गुफकराल का अर्थ होता है-कुलाल अर्थात कुम्हार की गुहा।

➣ यहां के लोग कृषि एवं पशुपालन का कार्य करते थे। चिरांद बिहार के सारण जिले में स्थित है। यहां से हड्डी के अनेक उपकरण प्राप्त हुए हैं। यहां से प्राप्त उपकरण हिरण के सींगों से निर्मित हैं।

➣ नवपाषाण युगीन दक्षिण भारत में मृतक को दफनाने के स्थल के रूप में बृहत्पाषाण स्मारकों की पहचान की गई।

➣ नवपाषाण कालीन पुरास्थल से राख के टीले’ कर्नाटक में मैसूर के पास वेल्लारी जनपद में स्थित संगनकल्लू नामक स्थान से प्राप्त हुए। पिकलीहल, उतनूर आदि स्थलों से भी के टीले मिले हैं।

➣ नवपाषाण काल में जनजातियों की अपनी संस्कृति और परम्पराएँ विकसित हो गयी थी। भाषा, संगीत, चित्रकारी आदि से इनकी संस्कृति का ज्ञान होता है।

➣ ई.पू. 5000 तक लोग बर्तन नहीं बनाते थे लेकिन ई.पू. 4500 के बाद कुम्हार का चाक अस्तित्व में आया। बर्तन तेजी से बनने लगे। मिट्टी के बर्तनों में काले पके हुए , धूसर और चिकने एंव चमकीले बर्तन शामिल थे।

नवपाषाण कालीन औजार व हथियार

नवपाषाण कालीन औजार व हथियार

नवपाषाणकालीन स्थल

नवपाषाणकालीन स्थल
मेहरगढ़बलूचिस्तान/ पाकिस्ताननवपाषाणकाल में कृषि का प्राचीनतम साक्ष्य के अन्तर्गत गेहूँ की 3 व जौ की 2 किस्मों की खेती व कच्ची ईंटों के आयताकार मकानों के साक्ष्य, प्राचीनतम स्थायी जीवन के प्रथम प्रमाण मिले।
बुर्जहोमकश्मीरश्रीनगर स्थित झील के किनारे गर्तावास (गड्डाघर) का प्रमाण 1835 में डी. टेरा व पीटरसन द्वारा खोजा गया था। खेती से परिचित थे। यहाँ कब्रों में पालतू कुत्ते भी अपने मालिकों के शवों के साथ दफनाए जाते थे।
गुफकराल (कुम्हार की गुफा)कश्मीरयह श्रीनगर से 41 किमी. दक्षिण-पश्चिमी में स्थित कृषि व पशुपालन के साक्ष्य मिले। हड्डी के औजार व धूसर मृदभांडों का प्रमाण। सिलबट्टा-मसाला पीसने वाला घरेलू उपकरण व हड्डी से निर्मित सुई प्राप्त हुई।
कोहडिहवाउत्तर प्रदेशबोलन नदी पर इलाहाबाद के दक्षिण में स्थित है। यहाँ के उत्खनन से 6500 ई. पू. के धान की खेती का प्रमाण जो धान की खेती का भारत में नहीं विश्व का सबसे पुराना साक्ष्य माना जाता है।
मगहराउत्तर प्रदेशगंगा नदी के दक्षिण में विन्ध्य क्षेत्र का उत्खनन से गोलाकार झोपड़ियों के प्रमाण । धान के अलावा जी की खेती व पशुवाड़ा के साक्ष्य मिले।
चौपानी मांडोउत्तर प्रदेशइलाहाबाद के निकट मधुमक्खी के छत्ते जैसी झोपड़ियाँ, ज्यामितीय आकार के सूक्ष्म पाषाण व हस्त निर्मित मृद्भांड के प्रमाण।
चिरांदबिहारसारण जिले में स्थित है। नवपाषाणकालीन एकमात्र स्थल जहाँ से प्रचुर मात्रा में हड्डी के उपकरण मिले जो प्रायः हिरणों के सींगों से निर्मित थे।
दावोजली हाडिंगअसमकृषि व पशुपालन के प्रमाण मिले।
सारूतारूअसमगुवाहाटी के निकट उत्खनन से आदिम कुल्हाड़ियाँ व अंकित मृदभांड प्राप्त हुए।
संगनकल्लूकर्नाटकमैसूर के निकट बेल्लारी जिले में स्थित है। यहाँ से राख के टीले प्राप्त हुए हैं। ये टीले मवेशी बाड़ों के स्थल थे।
पिकली हलकर्नाटकनवपाषाण युगीन निवासी पशुपालक थे। ये गाय, बैल, बकरी, भेड़ को पालते थे। यहाँ से राख का ढेर व निवास स्थल दोनों मिले।

आदिमानव के मूल स्थान

आदिमानव के मूल स्थान
1. होमिनिडस रामापिथेकस, अफ्रीका
2. ऑस्ट्रेलोपिथिकस नर वानर दक्षिण अफ्रीका
3. जिंजानथ्रोपस नर वानर पूर्वी अफ्रीका
4. जावा मानव जावा
5. पेकिंग मानव चीन
6. निएंडरथल मानव जर्मनी
7. पिल्टडाउन मानव इंग्लैंड
8. क्रोमैगनॉन मानव फ्रांस
9. होमोसेपियंस मानव पामीर-एशिया

महत्वपूर्ण पुरापाषाण एवं नवपाषाण तथ्य

  • आधुनिक मानव होमो सेपियंस का हिमयुग की अंतिम अवस्था में उदय हुआ।
  • मानव कंकालों को विधिवत दफन करने की प्रक्रिया मध्य पाषाण काल से प्रारंभ हुई।
  • आदिमानव ने सबसे पहले आग जलाना सीखा था।
  • मानव द्वारा सर्वप्रथम प्रयुक्त अनाज जौ था।
  • भारत में पशुपालन एवं कृषि के प्राचीनतम साक्ष्य मेहरगढ़ से प्राप्त हुए हैं।
  • नवपाषाण काल के लोगों द्वारा पाला गया प्रथम पशु कुत्ता था।
  • हस्तकुठार एवं विदारणी प्राचीनकाल के प्रमुख उपकरण थे।
  • हैंडीमेन को प्रथम उपकरण निर्माता कहा जाता है।
  • भारत में मानव कंकाल मध्य पाषाण युग से प्राप्त होते हैं।
  • रामापिथेकस के जीवाश्म शिवालिक क्षेत्र से प्राप्त हुए हैं।
  • वस्त्र निर्माण कला मनुष्य ने नवपाषाण युग में सीखी।
  • गंगा घाटी में धान की खेती का प्राचीनतम प्रमाण लहुरादेव (उत्तर प्रदेश) से मिला है।
  • दमदमा (हरियाणा) से एक ही कब्र में तीन मानव कंकाल मिले हैं।
  • लेखहिया (उत्तर प्रदेश) से सर्वाधिक मानव कंकाल मिले हैं।
  • आग के आविष्कार को जावा मानव, होमो इरेक्टस और होमो सेपियंस नियंडरथल से जोड़ा जाता है।

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