हड़प्पा सभ्यता : सिंधु घाटी की प्रथम नगरीय सभ्यता
➣ सिन्धु घाटी सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है। यह टिगरिस और यूफ्रेटस के तट पर स्थित मेसोपोटामिया, नील नदी के तट पर स्थित मिस्र की सभ्यता एवं ह्वांगहो के तट पर स्थित चीनी सभ्यता के समकालीन थी।
➣ पुरातात्विक स्रोतों के आधार पर सिन्धु घाटी सभ्यता अपने समकालीन सभ्यताओं में से उत्तम नगरीय संरचना व अनुपम चित्रकला के साथ धार्मिक जीवन शैली का उदाहरण प्रस्तुत करता है।
➣ हड़प्पा की जानकारी सबसे पहले 1921 ई. में पाकिस्तान में अवस्थित हड़प्पा नामक आधुनिक स्थल से प्राप्त हुई थी इसलिए इसका नाम हड़प्पा संस्कृति पड़ा।
भारतीय पुरातत्व विभाग के नियमानुसार जब किसी प्राचीन सभ्यता का खनन होता है तो उस जगह या संस्कृति का नाम उसके आधुनिक स्थल के नाम पर रखा जाता है।
➣ इस संस्कृति का विकास सिन्धु और घघ्घर/हकड़ा (प्राचीन सरस्वती) के किनारे हुआ था। इसलिए इसे सिंधु घाटी सभ्यता भी कहा जाता है। हालाँकि बाद में अन्य स्थलों से भी इस सभ्यता के स्थल अस्तित्व में आने लगे। जिस कारण यह उपयुक्त नाम नहीं रह गया।
➣ हड़प्पा का मुख्य क्षेत्र सिंधु नदी नहीं बल्कि सरस्वती नदी तथा उसकी सहायक नदियों का क्षेत्र था जो सिंधु व गंगा नदी के मध्य स्थित था। इसलिए कुछ विद्वानों ने इसे सिंधु-सरस्वती सभ्यता भी कहा।
➣ सिंधुवासियों ने पहली बार कांस्य (टिन + ताम्बा) का प्रयोग किया। इसलिए इस आधार पर इसका अन्य नाम कांस्य युगीन सभ्यता अथवा ताम्रपाषणिक सभ्यता भी मिलता है।
➣ प्रथम बार नगरों के उदय के कारण इसे प्रथम नगरीकरण/शहरीकरण सभ्यता भी कहा जाता है।
भौगोलिक स्थिति
➣ हड़प्पा सभ्यता का उदय ताम्रपाषाणिक पृष्ठभूमि में भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमोत्तर भाग में हुआ था।
➣ पंजाब प्रान्त (पाकिस्तान) में स्थित माण्टगोमरी ज़िले में रावी नदी के बायें तट पर हड़प्पा और सिन्ध में मुहनजोदड़ो ,जिसका शाब्दिक अर्थ है मुर्दो का टीला, दोनों पाकिस्तानी हिस्से में है।
➣ शहरी हड़प्पा संस्कृति का केन्द्र पंजाब और सिंध में, मुख्यतः सिंधु घाटी में पड़ता है, 1921 में पहली बार यहीं खनन हुआ था। वहाँ से यह दक्षिण और पूर्व की ओर फैली।
➣ हडप्पा संस्कृति के अंतर्गत पश्चिमोत्तर में पंजाब, सिंध और बलूचिस्तान ,गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, उत्तर में जम्मू – कश्मीर(माण्डा) और दक्षिण में अरब समुद्र ,महाराष्ट्र (नर्मदा नदी) तथा उत्तर-पूर्व में मेरठ तक फैला था।
| अफगानिस्तान | मुंडीगाक, शोर्तुघई। |
| बलूचिस्तान(पाकिस्तान) | मेहरगढ़, सुत्कागेनडोर, सोत्काकोह, बालाकोट, रानापुंडई, कुल्ली, क्वेटा घाटी, दम्बसादात एवं डाबरकोट । |
| सिन्ध (पाकिस्तान) | कोटदीजी, आमरी, मोहनजोदड़ो, अलीमुराद, चन्हूदड़ो, जुड़ीदरो। |
| पश्चिमी पंजाब(पाकिस्तान) | हड़प्पा, डेरा इस्माइल खान, रहमान डेरी, जलीलपुर, गुमला, चकपुरवाने। |
| पंजाब (भारत) | रोपण (रूपनगर) चक्र 86 बाड़ा संघोल, कोटला, निहंगखान, डेरमजरा। |
| हरियाणा | राखीगढ़ी, बनावली, मित्ताथल, सिसवल, बखाबली, बालू। |
| जम्मू-कश्मीर | माण्डा। |
| पश्चिमी उत्तर प्रदेश | आलमगीरपुर, अम्बाखेड़ा, बड़ागाँव, हुलास। |
| गुजरात | काठियावाड़ (खम्भात क्षेत्र) लोथल, रंगपुर, रोजदी, प्रभासपाटन, सोमनाथ, भगतराव मेघम, नागेश्वर कौंतसी, शिकारपुर, कच्छ की रन, धौलावीरा, देवलपुर, सुरकोटदा। |
| राजस्थान | कालीबंगा। |
उदय व खनन
➣ हड़प्पा सभ्यता 7वीं शताब्दी में पहली बार प्रकाश में आया जब पंजाब प्रान्त के लोगों ने में ईंटो के लिए मिट्टी की खुदाई की तब उन्हें वहाँ से बनी बनाई ईंटें मिली।
➣ उसके बाद 1826 ई. में चार्ल्स मैसेन ने पहली बार इस पुरानी सभ्यता का उल्लेख किया। ततपश्चात ब्रिटिश उत्खननकर्ता एंव खोजी कनिंघम ने 1856 में इस सभ्यता के बारे में सर्वेक्षण किया।
➣ 1856 में कराची से लाहौर के मध्य रेलवे लाइन के निर्माण के दौरान बर्टन बन्धुओं द्वारा हड़प्पा स्थल की सूचना सरकार को दी गयी।
➣ 1861 में एलेक्जेण्डर कनिंघम के निर्देशन में भारतीय पुरातत्व विभाग की स्थापना की गयी।
1906 में भारतीय पुरातत्व विभाग को एक संस्था बनाया गया था।, जो कला एंव संस्कृति मंत्रालय के अधीन है।
➣ हड़प्पा स्थलों की क्षमता की पहचान बहुत बाद में सन् 1921 में की गई, जब भारतीय पुरातत्वविद् दया राम साहनी ने इसकी खुदाई शुरू करवायी।
➣ 1902 में लार्ड कर्जन द्वारा जॉन मार्शल को भारतीय पुरातात्विक विभाग का महानिदेशक बनाया गया।
➣ जॉन मार्शल के निर्देशन में रायबहादुर दयाराम साहनी ने 1921 ई. में हड़प्पा का एवं राखालदास बनर्जी ने 1922 ई. में मोहनजोदड़ो की खुदाई करवायी थी।
➣ इसी क्रम में सन् 1931 में मार्शल के सामान्य पर्यवेक्षण में बड़े पैमाने पर मुहनजो-दड़ो की तथा 1938 में मेके ने उसी जगह की खुदाई की। 1940 में वत्स ने तथा 1946 में मोर्तिमेर व्हीलर ने हड़प्पा में खुदाई की।
➣ सिन्धु सभ्यता का विस्तार भारत एवं पाकिस्तान में लगभग 2800 हड़प्पा स्थलों की पहचान हुई है। विकसित हड़प्पा बस्तियों की संख्या 1022 है उनमें से 406 पाकिस्तान में स्थित हैं और 616 भारत में।
➣ हड़प्पा लगभग 150 हेक्टेयर और मोहनजोदड़ो 500 हेक्टेयर में फैला था। सबसे बड़ा ज्ञात स्थल मोहनजोदड़ो है।
➣ त्रिभुजाकार हड़प्पा संस्कृति का समूचा क्षेत्रफल 1,299,600 वर्ग किलोमीटर था, जो तत्कालीन मिस्र एवं मेसापोटामियाई क्षेत्रफल से काफी अधिक था।
➣ दिसम्बर 2014 में भिरड़ाणा को सिन्धु घाटी सभ्यता का अब तक का खोजा गया सबसे प्राचीन नगर माना गया है।
➣ भारतीय पुरातत्व विभाग के आलावा अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और इटली के पुरातत्वविदों ने भी हड़प्पा सहित कई स्थलों पर काम किया है।
➣ हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, कालीबंगा, लोथल, धोलावीरा और राखीगढ़ी इसके प्रमुख केन्द्र थे।
➣ सभी उत्खननकर्ता हड़प्पा संस्कृति के शहरीकरण के रूप में विकसित होने पर एकमत हैं।
काल निर्धारण
➣ सिंधु घाटी सभ्यता के नगरीकरण व्यवस्था पर विद्वान एकमत थे परन्तु समय के बारे में एकमत प्राप्त नहीं हुआ।
➣ इस दिशा में सर्वप्रथम जॉन मार्शल ने 1931 ई. में इस सभ्यता की तिथि लगभग 3250 ई.पू. से 2750 ई. निर्धारित की थी।
➣ डी० पी० अग्रवाल के अनुसार सिंधु सभ्यता का काल 2350 ई० पू० से 1750 ई. पू. माना जाता है।
➣ मृण्मुद्राओं के आधार पर पर सिंधु सभ्यता का काल 2500 ई० पू० से 1800 ई. पू. माना जाता है।
➣ हड़प्पा संस्कृति के अध्ययन के साथ चार्ल्स मैस्सन, कनिंघम, एम. व्हीलर, माधो स्वरूप वत्स आदि जुड़े थे। ह्वीलर के अनुसार सिंधु सभ्यता का काल 2500 ई. पू. से 1500 तक रहा।
➣ रेडियो कार्बन-14 (C14) जैसी नवीन विश्लेषण पद्धति के द्वारा हड़प्पा सभ्यता की तिथि 2350 ई.पू. से 1750 ई.पू. मानी गयी है।
➣ प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि यह सभ्यता आरम्भ से ही विकसित रूप में थी तथा इसका पतन भी आकस्मिक हुआ। ऐसी स्थिति में कुछ भी निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता है।
रेडियो कार्बन तकनीक को सर्वाधिक मान्य माना गया है जिसके अनुसार सिंधु घाटी सभ्यता को 2350 ई. पू. – 1750 ई. पू. बताया गया है।
| जॉन मार्शल | 3250 ई.पू.-2750 ई.पू. |
| अर्नेस्ट मैके | 2800 ई.पू.-2500 ई.पू. |
| माधोस्वरुप वत्स | 3500 ई.पू.-2700 ई.पू. |
| सी.जे. गैड | 2300 ई.पू.-1750 ई.पू. |
| मार्टीमर व्हीलर | 2500 ई.पू.-1500 ई.पू. |
| फेयर सर्विस | 2000 ई.पू.-1500 ई.पू. |
| रेडियो कार्बन | 2500 ई.पू.-1750 ई.पू. |
| एनसीआरटी | 2350 ई.पू.-1800 ई.पू. |
| डी.पी. अग्रवाल | 2300 ई.पू.-1700 ई.पू. |
शहरीकरण या नगरीकरण संरचना
➣ हड़प्पा संस्कृति की प्रमुख विशेषता इसकी नगर योजना प्रणाली थी। प्रथम बार नगरों के उदय इसी सभ्यता से मिलता है जिसके कारण इसे प्रथम नगरीकरण भी कहा जाता है।
➣ नगरों में बने भवनों के बारे में विशिष्ट बात यह थी कि वे एक खास संरचनात्मक प्रणाली का पालन करते हुए बनाए गए थे, जिसमें सड़कें एक दूसरे को समकोण पर काटती थीं तथा खंडों में विभक्त थे।
➣ सड़को का निर्माण मिट्टी से किया गया था। जबकि सड़को के दोनो ओर नालियों का निर्माण पक्की ईटों द्वारा किया गया था।
➣ भवनों का निर्माण एक सीध में सड़कों के किनारे व्यवस्थित रूप में किया जाता था। सभी मकान पक्की ईंटो से बने थे।
➣ अवशेषो से स्पष्ट होता है कि प्रत्येक मकान के बीच में एक आंगन होता था, आंगन के चारों ओर चार-पांच बड़े कमरे, रसोईघर एवं स्नानागार की व्यवस्था थी। दरवाजे और खिड़कियाँ सड़क की ओर न खुलकर पीछे की ओर खुलते थे (लोथल इसका अपवाद है।)। भवन दो मंजिले भी थे।
➣ ईटों के निर्माण का निश्चित अनुपात 4:2:1 था। यहाँ पर मिले भवन अलंकरण रहित हैं।, केवल कालीबंगा में फर्श के निर्माण में अलंकृत ईंट के प्रयोग का साक्ष्य मिले हैं।
➣ ढाँचे के मामले में मोहनजोदड़ो, हड़प्पा से ज्यादा विकसित था। मुहनजो-दड़ो का सबसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्थान विशाल स्नानागार है। जिसमें तालाब शामिल हैं जो गढ़ों टीलों में स्थित हैं।
➣ विशाल स्नानागार 11.88 मी. लम्बा, 7.01 मी. चौड़ा और 2.43 मी. गहरा है। जिसमे उतरने के लिये उत्तर तथा दक्षिण की ओर सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। कपड़े बदलने के लिए किनारे में कमरे थे। स्नानागार का फर्श पकी ईंटों का बना है एवं इसके मध्य में स्नानकुंड स्थित था।
➣ ऐसा मानना है कि स्नानागार मुख्य रूप से धार्मिक स्नान के लिए था। यह जलपूजा का एकमात्र साक्ष्य है।
➣ धौलावीरा स्थल में पाए जाने तालाब का इस्तेमाल शायद उसी उद्देश्य के लिए किया गया था। जिसके लिए मुहनजो-दड़ो के स्नानागार का उपयोग किया जाता था।
जॉन मार्शल ने विशाल स्नानागार को विश्व का आश्चर्यजनक निर्माण बताया था।
➣ मुहनजोदड़ो में सबसे बड़ा भवन 45.71 मीटर लम्बा और 15.23 मीटर चौड़ा एक अन्न-भण्डार है।
➣ हड़प्पा के गढ़ में छह अन्नागार प्राप्त हुए हैं , जो ईंटों के बने चबूतरों पर दो पंक्तियों में बनाये हुए हैं। प्रत्येक अन्नागार 15.23 मीटर लम्बा और 6.09 मीटर चौड़ा है।
➣ कालीबंगा में उसके दक्षिणी हिस्से में प्राप्त ईंटों का चबतुरा सम्भवत: अन्नागार के लिए प्रयुक्त होता था।
➣ मोहनजोदड़ो की जल निकास प्रणाली बहुत प्रभावशाली थी। सभी नगरों के प्रत्येक छोटे व बड़े मकानों में प्रांगण व स्नानागार होते थे। सड़कों के दोनों और जल – निकासी के लिए नालियों का निर्माण पक्की ईटों से किया गया था।
➣ कालीबंगा में कई घरों में अपने कुएँ थे। घरों का पानी बहकर सड़कों तक आता था, जहाँ इनके नीचे मोरियाँ बनी हुई थीं। ये मोरियाँ ईंटों और पत्थरों की तख्तियों से ढकी रहती थीं।
➣ हड़प्पा की जलनिकासी व्यवस्था अनूठी है। शायद ही किसी अन्य समकालीन सभ्यता (मिस्र तथा मेसोपोटामिया की सभ्यता) ने स्वास्थ्य और स्वच्छता पर इतना ध्यान दिया, जितना कि हड़प्पा सभ्यता ने दिया।
➣ यद्यपि हड़प्पा सभ्यता के लगभग 1000 स्थलों भी ज्यादा स्थलों के बारे में जानकारी प्राप्त हो चुकी है, लेकिन इनमें से केवल 6 को ही नगर माना जाता है, ये हैं – हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, सिंध का चन्हूदड़ो, गुजरात का लोथल, उत्तरी राजस्थान का कालीबंगा तथा हरियाणा के हिसार जिले में स्थित बनवाली।
कृषि
कृषि का प्रथम उदाहरण मेहरगढ़ से प्राप्त हुआ है।
➣ वर्तमान में बहुत कम वर्षा वाला सिन्धु प्रदेश आज बहुत उपजाऊ नहीं है लेकिन अतीत के समृद्ध गाँव और कस्बों से ज्ञात होता है यह प्राचीन समय में अत्यधिक उपजाऊ भूमि था।
➣ प्राचीन समय में सिन्धु क्षेत्र में अधिक प्राकृतिक वनस्पति थी, जो बारिश कराने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती थी।
➣ क्षेत्र की उर्वरता का इससे भी अधिक महत्वपूर्ण कारण सिन्धु नदी का वार्षिक जलमग्न होना था जो कि हिमालय की सबसे लम्बी नदी है।
जिस तरह नील नदी ने मिस्त्र का निर्माण कर वहाँ के लोगों की सहायता की, उसी तरह सिन्धु नदी ने सिन्ध का निर्माण कर उन्हें समृद्ध बनाया।
➣ नगर की सुरक्षा के लिए ईंटों से बनी दीवारों से संकेत मिलता है कि बाढ़ प्रति वर्ष आती थी।
➣ जल-संग्रह के लिए बान्धों से घिरे गबरबन्द या नाला एक विशेषता थी, लेकिन धारा या नहर का इस्तेमाल सम्भवत: सिंचाई के लिए नहीं किया जाता था।
➣ बाढ़ उतर जाने पर नवम्बर में सिन्धु के लोग बाढ़ के मैदानों में बीज बोते और अगली बाढ़ से पहले अप्रैल में अपनी फसल गेहूँ और जौ काट लेते थे।
➣ वहाँ कोई कुदाल या हल नहीं पाया गया है। इस समय खेती के कार्यो में प्रस्तर एवं कांस्य धातु के बने औजार प्रयुक्त होते थे।
➣ लेकिन कालीबंगा में पूर्व-हड़प्पा काल में मिले नालों (हलरेखा) से पता चलता है कि हड़प्पा काल के दौरान राजस्थान में खेतों की जुताई होती थी। बणावली में मिट्टी का बना हुआ एक हल – खिलौना मिला है।
➣ हड़प्पा के लोगों ने बैल द्वारा खींचने वाले लकड़ी के हल का इस्तेमाल खेती में किया और इसके लिए ऊँटों का भी इस्तेमाल होता था।
➣ फसलों की कटाई के लिए पत्थर की हँसिया का इस्तेमाल किया गया होगा।
➣ अभी तक 9 फसलों की पहचान हो पायी है जिसमे चावल (गुजरात, लोथल , राजस्थान ), जौ की दो किस्में , गेहूँ की तीन किस्में, खजूर, तरबूज मटर हैं । इसके अतिरिक्त मटर, सरसों, तिल एवं कपास की भी खेती होती थी। गन्ने का कोई साक्ष्य नहीं मिला है।
➣ लोथल में हुई खुदाई में धान तथा बाजरे की खेती के अवशेष मिले है तथा आटा पीसने की पत्थर की चक्की के दो पाट मिले हैं। पेड़-पौधों में पीपल, खजूर, नीम, नीबू एवं केला साक्ष्य मिले हैं।
➣ सिन्धुवासियों को सबसे पहले कपास उत्पादन करने का श्रेय जाता है। और इस वजह से यूनानियों ने इस क्षेत्र को सिन्धन नाम दिया जो सिन्ध से लिया गया है।
सिन्धुवासियों को सबसे पहले कपास उत्पादन करने का श्रेय जाता है
➣ आपातकालीन स्थिति के लिए बड़े-बड़े अन्नागारों में अनाज संग्रह किया जाता था।
➣ हड़प्पा गाँव, जो ज्यादातर बाढ़ के मैदानों के पास स्थित थे, केवल अपने लिए ही नहीं बल्कि कस्बे के लोगों के लिए भी पर्याप्त अनाज का उत्पादन करते थे।
पशुपालन
➣ हड़प्पा के लोगों ने खेती के साथ-साथ बड़े पैमाने पर पशुपालन भी किया। मुख्य पालतू पशुओं में बैल, भैंस, गाय, भेड़-बकरी,ऊँट, कुत्ते, बिल्ली, गधे, खच्चर और सुअर आदि है। इन्हें कूबड़ वाला साँड़ विशेष प्रिय था।
➣ इसके आलावा उन्हें बंदर, भालू, खरहा आदि जंगली जानवरों का भी ज्ञान था। जिसकी पुष्टि मुहरों, ताम्र तश्तरियों आदि पर अंकित चित्रों से होती है।
➣ शेर का कोई साक्ष्य नहीं मिला है। यहाँ गाय के अवशेष नहीं मिले।
➣ गधे का उपयोग बोझ उठाने और ऊँट को खेतों में जुताई के लिए भी इस्तेमाल किया जाता था।
➣ हड़प्पा के लोग हाथी से अच्छी तरह परिचित थे परन्तु उनके पालने के साक्ष्य प्राप्त नहीं हो सके हैं। सम्भवत वे उन्हें पालतू बनाने में सफल नहीं हो सके थे।
➣ घोड़े के साक्ष्य मोहनजोदड़ो और लोथल के एक संदिग्ध टेराकोटा मूर्ति से मिलता है। एक घोड़े के अवशेष, पश्चिम गुजरात में स्थित सुरकोतडा से मिला है जो ई.पू. 2000 के आस-पास का है। संभवत: हड़प्पा संस्कृति घोड़ों पर केन्द्रित नहीं थी।
➣ वे गैण्डे से भी परिचित थे। जिसका का प्रमाण आमरी से मिला है तथा बत्तख का चित्रण लोथल से प्राप्त मृदभाण्ड पर मिलता है।
➣ कुछ पशु-पक्षियों, जैसे बन्दर, खरगोश, हिरन, मुर्गा, मोर, तोता, उल्लू के अवशेष खिलौनों और मूर्तियों के रूप में मिले हैं।
मेहरगढ़ और बुर्जहोम में भारत के प्राचीनतम कृषि एंव पशुपालन के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
कारीगरी एंव शिल्प-कौशल
➣ हड़प्पा के लोग पत्थरों के औजारों का इस्तेमाल करते थे, लेकिन वे काँस्य के निर्माण और उपयोग से भी परिचित थे।
➣ हड़प्पा की शहरी संस्कृति काँस्य युगीन सभ्यता भी कहा जाता है वे लोग लौह धातु से परिचित नहीं थे।
➣ आम तौर पर ताम्बे के साथ टिन के मिश्रण से काँस्य बनाया जाता था, लेकिन इस उद्देश्य के लिए वे कभी-कभी ताम्बे के साथ आर्सेनिक भी मिलाते थे।
➣ हड़प्पाई स्थलों में प्राप्त काँसे के औजार व हथियार में टिन की मात्रा अत्यन्त कम है। जिसे पता चलता है कि हड़प्पा में आसानी से न तो टिन उपलब्ध थे, न ताम्बे।जिससे इस क्षेत्र में कांस्य के औजारों का विस्तार नहीं हुआ।
➣ अयस्कों की अशुद्धता से ज्ञात होता है कि ताम्बे को खेतड़ी, राजस्थान से प्राप्त किया गया था। हालाँकि इसे बलूचिस्तान से भी लाया जा सकता है तथा टिन को अफगानिस्तान से।
➣ हड़प्पा समाज में काँस्य कारीगरों का महत्वपूर्ण समूह था। उन्होंने मूर्तियों और वर्तनों के साथ साथ कुल्हाड़ी, आरी, चाकू और भाले जैसे विभिन्न उपकरण और हथियारों का भी उत्पादन किया।
➣ बुने हुए कपास का एक टुकड़ा मुहनजोदड़ो से मिला है और कई वस्तुओं पर कपड़ों के निशान पाए गए हैं।
➣ धुनाई यन्त्र का उपयोग कताई के लिए किया गया था। बुनकर ऊन और कपास का कपड़ा बुनते थे।
➣ ईंटों की विशाल संरचना, ईंट-निर्माण-शिल्प तथा राजमिस्त्री वर्ग के अस्तित्व का प्रमाण दर्शाती है।
➣ हड़प्पा के लोग नाव भी बनाते थे, मुहर निर्माण और टेराकोटा निर्माण भी महत्वपूर्ण शिल्प थे।
➣ सोनार सोने, चाँदी और बहुमूल्य पत्थरों के गहने बनाते थे। इसमें पहली दो सामग्रियाँ अफगानिस्तान से प्राप्त होती थीं और अन्तिम दक्षिण भारत से।
➣ हड़प्पा के लोग मटका निर्माण के विशेषज्ञ भी थे। कुम्हार के पहिये का काफी उपयोग किया गया था। ये मृदभांडों को चिकना और चमकीला बनाते थे।
➣ चालाक लोमड़े और प्यासे कौवे की कहानियाँ हड़प्पा के मृदभांडों पर चित्रित हैं।
व्यापार एवं वाणिज्य
➣ सिन्धु लोगों के व्यापार की जानकारी हड़प्पा, मुहनजोदड़ो और लोथल में पाए जाने वाले भण्डारों के आलावा कई मुहरों व माप-तौल प्रणाली से भी मिलती है।
➣ सिंन्धुवासी सिंधु-सभ्यता क्षेत्र के अंतर्गत पत्थर, धातु, खाल आदि का व्यापार करते थे।
➣ अपेक्षित कच्चा माल उनके नगरों में उपलब्ध नहीं था। अतः उन्हें बाह्य देशों से व्यापारिक सम्पर्क स्थापित करना पड़ता था।
➣ व्यापार में धातु के सिक्कों का प्रयोग नहीं होता था। संभवतः वस्तु-विनिमय प्रणाली द्वारा आदान-प्रदान करते थे। तैयार माल और सम्भावित अनाज के बदले वे नाव और बैलगाड़ी के साथ पड़ोसी क्षेत्रों से धातु खरीदते थे।
➣ वे पहियों का उपयोग जानते थे। हड़प्पा में ठोस पहियों वाली गाड़ियाँ उपयोग में थीं। मोहनजोदड़ो से मिट्टी व काँसे की दो पहियों वाली खिलौना गाड़ी एवं चन्हुदड़ो से मिट्टी की चार पहियों वाली खिलौना गाड़ी मिली है।
➣ लोथल से अलवेस्टर पत्थर का एक बड़ा पहिया व बनावली से सड़कों पर बैलगाड़ी के पहिये के निशान मिले हैं।
➣ हड़प्पा का व्यावसायिक सम्बन्ध राजस्थान, अफगानिस्तान और ईरान के साथ था। उन्होंने उत्तरी अफगानिस्तान में एक व्यापार कॉलोनी की स्थापना की, जिससे मध्य एशिया के साथ व्यापार करने में मदद मिली।
➣ मेसोपोटामिया ग्रन्थ के अनुसार ई.पू. 2350 के आस-पास से मेलुहा (सिन्धु क्षेत्र का प्राचीन नाम) के साथ व्यापार सम्बन्धों के संकेत मिलते हैं।
➣ मेसोपोटामिया में प्रवेश हेतु उर एक महत्त्वपूर्ण बन्दरगाह था जबकि लोथल व सुरकोतदा सिंधु सभ्यता का प्रमुख बंदरगाह में से था।
➣ मेसोपोटामिया पुरालेखों में दिलमुन और मकन नामक दो मध्यवर्ती व्यापारिक केंद्रों का उल्लेख मिलता है, जो मेसोपोटामिया और मेलुहा के मध्य स्थित थे।
➣ मोहनजोदाड़ो से प्राप्त एक मुहर पर अंकित नाव का चित्र एवं लोथल से मिट्टी की खिलौना नाव से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि इस सभ्यता के लोक आन्तरिक एवं बाह्य व्यापार में मस्तूल वाली नावों का उपयोग करते थे।
| आयातित वस्तु | स्थल (स्रोत) |
|---|---|
| सीसा | ईरान, राजस्थान, अफगानिस्तान, दक्षिण भारत |
| शिलाजीत, देवदार | हिमालय |
| नील रत्न | बदख्शाँ (अफगानिस्तान) |
| टिन | ईरान, अफगानिस्तान |
| ताँबा | खेतड़ी (राजस्थान) व बलूचिस्तान, अफगानिस्तान |
| चाँदी | ईरान, अफगानिस्तान |
| सोना | अफगानिस्तान, फारस, दक्षिण भारत (कर्नाटक) |
| लाजवर्द मणि | बदख्शाँ (अफगानिस्तान), मेसोपोटामिया |
| फिरोजा | ईरान |
राजनीतिक संगठन
➣ हड़प्पा संस्कृति की व्यापकता एवं विकास को देखने से ऐसा लगता है कि, यह सभ्यता किसी केन्द्रीय शक्ति (सत्ता) से संचालित होती थी। वैसे हड़प्पा कालीन राजनीतिक व्यवस्था के वास्तविक स्वरूप का विषय विवादस्पद है।
➣ राजनीतिक व्यवस्था के सम्बन्ध में विद्वान एकमत नहीं हैं –
| व्हीलर | मध्यम वर्गीय जनतंन्त्रात्मक शासन कहा और उसमें धर्म की महत्ता को स्वीकार किया। |
| स्टुअर्ट पिग्गट | मोहनजोदड़ों का शासन राजतन्त्रात्मक न होकर जनतंत्रात्मक था। |
| मैके | मोहनजोदड़ों का शासन एक प्रतिनिधि शासक के हाथों था |
| वी.वी स्टुर्ब | गुलामों पर आधारित |
| लोकमत | सम्रद्ध व्यापारी वर्ग के हाथों में था |
➣ हड़प्पा कालीन व्यापारिक ढांचे से लगता है कि हडप्पावासी वाणिज्य की ओर अधिक आकर्षित थे, इसलिए ऐसा माना जाता है कि सम्भवतः हड़प्पा सभ्यता का शासन व्यापारी वर्ग के हाथों में था।
➣ वाणिज्य प्रणाली दृष्टि से कहा जा सकता है मुहनजोदड़ो का विशाल अन्नागार ही खजाना या राजकोष होता था। कर के रूप में अनाज एकत्र किया जाता था।
➣ किलाबन्दी कई शहरों की विशेषताएँ होती थीं। धौलावीरा में विशेषकर, किलों के अन्दर किले होते थे।
➣ किसी संगठित बल या स्थाई सेना का कोई स्पष्ट अनुमान नहीं है, लेकिन पत्थरों व सुरकोतड़ा के बर्तनों में सैनिक के चित्रण से स्थाई सेना का अनुमान लगाया जा सकता है। हालांकि हड़प्पा में कोई हथियार नहीं था।
➣ किसी भी हड़प्पा स्थल पर किसी भी मन्दिर का अवशेष नहीं मिला है। हालाँकि पूजा के साक्ष्य मिले हैं। महान स्नानागार धार्मिक क्रियाकलापों को दर्शाता है इसलिए, यह कहना गलत होगा कि पुरोहित वर्ग ने हड़प्पा में शासन किया।
इसके विपरीत मिस्र और मेसोपोटामिया में मंदिर के साक्ष्य मिले हैं जिससे लगता है मेसोपोटामिया के निचले शहरों में पुरोहित वर्ग का शासन रहा होगा।
➣ ऐसा अनुमान है कि सिन्धुवासियों की नगरीकरण संरचना तथा व्यापारिक स्तर पर उत्पादन के लिए कोई प्रशासन व्यवस्था रही होगी।
सामाजिक जीवन
➣ सामाजिक व्यवस्था का मुख्य आधार परिवार था। मातृदेवी की पूजा तथा मुहरों पर अंकित चित्रों से यह परिलक्षित होता है कि हड़प्पा समाज सम्भवतः मातृसत्तात्मक था।
➣ दुर्ग, मकानों के आकार व रूपरेखा तथा शवों के दफनाने व अंतिम संस्कार के विभिन्न ढंग से प्रतीत होता है कि समाज अनेक वर्गों जैसे पुरोहित, व्यापारी, अधिकारी, शिल्पी एवं मजदूरों में विभाजित रहा होगा।
➣ विभिन्न आवासीय संरचनाओं में हड़प्पा समाज में जो दो कमरे वाले घर थे, वे सम्भवत: कारीगरों और मजदूरों के लिए होते थे।
➣ सिंधुवासी शाकाहारी तथा मांसाहारी दोनों थे। भोज्य पदार्थों में गेहूँ, जौ, मटर, तिल, सरसों, खजूर, तरबूज के साथ गाय, सूअर, बकरी और मछली आदि का मांस प्रमुख रूप से प्रयोग में लाया जाता था।
➣ मिट्टी के बर्तनों के अतिरिक्त ताम्र तथा काँस्य के बर्तनों का उपयोग भी हड़प्पाई लोगों द्वारा किया जाता था। बर्तन के रूप में मिट्टी एवं धातु के बने कलश, थाली, कटोरे, तश्तरी, गिलास एवं चम्मच का प्रयोग करते थे।
➣ मोहनजोदड़ो से प्राप्त अवशेषों में मिट्टी की एक मूर्ति के अनुसार उस समय भी दीपावली मनाई जाती थी। उस मूर्ति में मातृ-देवी के दोनों ओर दीप जलते दिखाई देते हैं।
➣ सूती एवं ऊनी दोनों प्रकार के वस्त्रों का उपयोग होता था। स्त्री तथा पुरुषों में बहुमूल्य धातुओं जैसे सोने, चाँदी, हाथीदाँत, ताम्र तथा सीपियों से निर्मित आभूषण प्रचलित थे।
➣ आभूषणों में कण्ठार, भुजबन्ध, कर्णफूल, छल्ले, चूडियाँ, (कालीबंगा से प्राप्त), करघनी, पायजेब आदि ऐसे आभूषण मिले हैं।
➣ मनकों के हार सामान्य रूप से प्रचलित थे। जिसकी निर्माण कार्यशाला चन्हूदड़ो में अवस्थित थी। यहाँ से सौन्दर्य प्रसाधन की सामग्रियों के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं।
➣ सिन्धुकालीन स्थल चन्हूदड़ो से एक ईंट पर बिल्ली का पीछा करते हुए कुत्ते के पंजों के निशान मिले हैं।
➣ मनोरंजन के लिए मछली पकड़ना, शिकार करना, नृत्य, शिकार, पशुओं की लड़ाई, चौपड़, पासा खेलना आदि शामिल थे। साथ ही धार्मिक समारोह समय-समय पर धूम-धाम से मनाये जाते थे।
➣ रूपनगर (रोपड़) की एक क़ब्र में मालिक के साथ कुत्ते के भी अवशेष मिले हैं। लोथल में प्राप्त कब्रों में शव को विभिन्न तरीकों से दफनाए गए हैं।
धामिक प्रथा व परंम्परा
➣ हड़प्पा संस्कृति में उनके धार्मिक जीवन की जानकारी मूर्तियों, मुहरें, मृद्भांण्ड, पत्थर तथा अन्य पदार्थो से निर्मित लिंग, क़ब्रिस्तान आदि से मिलती है। इसमें मोहनजोदड़ो का विशाल महास्नानागर उनके जल-पूजा का एकमात्र साक्ष्य है।
➣ मोहनजोदाड़ो एवं हडप्पा से भारी मात्रा में मिली मिट्टी की मृण्मूर्तियों (टेराकोटा) मिली हैं।
➣ एक स्त्री मृण्मूर्ति के गर्भ से एक पौधा निकलता हुआ दिखाया गया है, इससे यह मालूम होता है कि हड़प्पा सभ्यता के लोग धरती को उर्वरता की देवी मान कर इसकी पूजा करते थे।
हड़प्पा के लोगों ने उसी तरह उसकी पूजा करते थे जिस तरह मिस्र ने नील देवी आइसिस की पूजा की थी।
सिन्धु घाटी में पुरुष देवता
➣ मोहनजोदाड़ो से प्राप्त एक मुहर पर तीन मुख वाले पुरुष देवता का चित्रण प्राप्त किया गया है।
➣ एक पुरुष ध्यान की मुद्रा (पद्मासन मुद्रा) में बैठा हुआ है उसके सिर पर तीन सींग हैं, उसके बायी ओर एक गैंडा व भैसा है तथा दांयी ओर एक हाथी, एक व्याघ्र एवं हिरण है। चित्रित इस पुरुष देवता को पशुपति महादेव के रूप में पहचाना गया है।
➣ इसके इसके आलावा हड़प्पा एवं मोहनजोदाड़ो से मिले पत्थर के बने लिंग और योनि से उनकी पूजा के प्रचलन में होने का भी प्रमाण मिला है।
वृक्षों और पशुओं की पूजा
➣ मोहनजोदाड़ो से प्राप्त एक मुहर पर वृक्षपूजा के प्रमाण प्राप्त हुए हैं। मुहर पर पीपल की डालों के मध्य एक देवता का चित्रण मिला है।
➣ सिन्धु वासी पशुओं की भी पूजा करते थे। मुहरों पर पशुओं की आकृतियाँ अंकित हैं। जिसमे कूबड़ वाला साँड़ उनके लिए विशेष पूज्यनीय था। यहाँ से गौपूजन का प्रमाण नहीं मिलता है।
➣ अधिक मात्रा में मिली ताबीज़ों से ऐसा लगता है कि हड़प्पाई लोग भूत-प्रेत एवं तंत्र-मंत्र में भी विश्वास करते थे। सम्भवत: उनके अनिष्ट से बचने के लिए ताबीज धारण करते थे
➣ लोथल एवं कालीबंगा से हवन कुंडों एवं यज्ञवेदियों का उपलब्ध होना अग्नि पूजा के प्रचलन का प्रमाण प्रस्तुत करता है। नाग पूजा के भी प्रमाण मिले हैं।
➣ हड़प्पा से प्राप्त एक मिट्टी की पट्टी पर एक महिष यज्ञ का दृश्य चित्रित है, जो महिषासुर-मर्दिनी की याद दिलाता है।
➣ हड़प्पा संस्कृति में कही से किसी भी मंदिर के अवशेष नहीं मिले है। सिंधुवासी वृक्ष, पशु, पुरुष व स्त्री के स्वरूप में देवताओं की पूजा करते थे, परन्तु वे इन देवताओं के लिए मंदिर नहीं बनाते थे।
मन्दिरों वाली प्रथा प्राचीन मिस्र और मेसोपोटामिया सम्भ्यताओं में पायी गयी हैं।
➣ हड़प्पा के लोगों में जो धार्मिक रीति-रिवाज प्रचलित थे जैसे – माँग में सिन्दूर भरता विवाहित हिन्दू स्त्रियों के लिए सुहाग का प्रतीक होना , स्वास्तिक को पवित्र मांगलिक चिन्ह् मानना तथा कूबड़ वाला सांड जैसे तथ्य आज भी हिन्दुओं में पाए जाते हैं। परन्तु गौपूजन का प्रमाण नहीं मिलता बल्कि मांसाहार में गाय का उल्लेख मिलता है
| ताबीज | भूत प्रेत से बचने के लिए। |
| स्वास्तिक | सूर्योपासना का प्रतीक। यह चिह्न संभवतः हड़प्पा सभ्यता की देन है। |
| योगी के रूप में बैठे पुरुष | योगीश्वर, शिव का स्वरुप |
| शृंग | शिव से संबंधित |
| बैल | संहारकारी देवता शिव का वाहन था |
| बकरा | बलि हेतु प्रयुक्त होता था। |
| भैंसा | किसी देवता की शत्रुओं पर विजय का प्रतीक है। |
| नाग | इनकी भी पूजा होती थी। |
| बैल, भेड़ एवं बकरी | पशुबलि का द्योतक। |
| शवों के साथ बर्तन व अन्य सामग्री | मृत्यु के बाद जीवन में विश्वास। |
| शवों को उत्तर | दक्षिण दिशा में लिटाना धार्मिक विश्वास का द्योतक। |
| दो शवों का एक साथ गाड़ा जाना | पुरुष की मृत्यु के बाद संभवतः स्त्री का सती होना। |
हड़प्पा काल के बाद उत्तर वैदिक युग में मूर्ति पूजा के प्रारम्भ का संकेत मिलता है हालांकि मूर्ति पूजा गुप्त काल से प्रचलित हुई जब पहली बार मन्दिरों का निर्माण प्रारम्भ हुआ।
हड़प्पा लिपि
➣ हड़प्पा के लोगों ने प्राचीन मेसोपोटामिया के लोगों की तरह लेखन की कला का आविष्कार किया।
➣ हड़प्पा लिपि की खोज सर्वप्रथम सन् 1853 में अलेक्जेंडर कनिंघम ने की। जिसमे हड़प्पाई लिपि का सम्बंध ब्राह्मी लिपि से बताया गया ।
➣ सम्पूर्ण लिपि की खोज सन् 1923 में पूरी हुई,परन्तु अभी तक इसकी व्याख्या नहीं हुई है। कुछ विद्वानों ने इसे प्रोटो-द्रविड़ भाषा के साथ, कुछ ने संस्कृत के साथ जबकि अन्य विद्वानों ने सुमेरियाई भाषा के साथ।
➣ चूंकि लिपि ना पढ़े जाने के कारण साहित्य में हड़प्पाई लोगों के मूल्यांकन के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता।
➣ हड़प्पा लिपि वर्णमाला के अनुसार नहीं है, यह एक चित्रकारी के रूप में है। लिपि में मछली, चिड़ियाँ, मानवाकृति आदि के चिन्ह मिलते हैं।
➣ पत्थर की मुहरों और अन्य वस्तुओं पर हड़प्पा लेखन के लगभग 4000 नमूने हैं। जिसमे कुल मिलाकर लगभग 250 से 400 चित्रलेख हैं। चित्रलेख के रूप में इसके प्रत्येक अक्षर से कुछ ध्वनि, विचार या वस्तु का अर्थ स्पष्ट होता है।
➣ मिस्र और मेसोपोटामिया के विपरीत, हड़प्पा ने लम्बे समय तक शिलालेख नहीं लिखा था। अधिकांश अभिलेख उनके मुहर पर दर्ज थे और उनमें कुछ ही शब्द होते थे।
➣ मुहरों पर प्राप्त चित्रलेखों या संकेतों के साथ पशु-पक्षियों की जो आकृतियाँ उत्कीर्ण हैं, उनके अध्ययन से ज्ञात होता है कि सिन्धु लिपि दाईं ओर बाईं ओर को लिखी जाती थी।
➣ साथ ही जहाँ लिपि-संकेत (चित्रलिपि) दो पंक्तियों में हैं, वहाँ पर ब्युस्त्रफीदान पद्धति का प्रयोग हुआ है अर्थात पहली पंक्ति दाईं ओर से बाईं ओर जबकि दूसरी पंक्ति बाईं ओर से दाईं ओर को।
➣ इतने अधिक संकेतों वाली लिपि वर्णमालात्मक नहीं हो सकती। अत: यह निष्कर्ष निकाला गया है की हड़प्पा लिपि वर्णात्मक नहीं बल्कि मुख्यतः चित्रलेखात्मक है।
माप-तौल प्रणाली
➣ बाट-माप एवं नाप तोल का व्यापारिक कार्य में महत्त्वपूर्ण योगदान है। सैंधववासी दशमलव प्रणाली पर आधारित बाटों का प्रयोग करते थे।
➣ मोहनजोदाड़ो, हड़प्पा, लोथल एवं कालीबंगा में प्रयुक्त बाटों की तौल का अनुपात 1, 2, 4, 8, 16, 32, 64, 160, 200, 320 आदि था।
➣ बाट धनाकार, वर्तुलाकार, बेलनाकार, शंक्वाकार एवं ढोलाकार थे। तौल की इकाई संभवतः 16 अनुपात में थी।
➣ हड़प्पा के लोग भी माप की कला को जानते थे। माप के निशान के साथ अंकित छड़ पाए गए हैं जिनमे से एक काँस्य का बना है।
➣ मोहनजोदड़ो से सीप का , हड़प्पा से ताम्बे का, कालीबंगा से मिट्टी का तथा लोथल से हाथी दाँत का पैमाना मिला है।
➣ सुरकोटदा जो हड़प्पावासियों के बंदरगाह में से एक था , से तराजू का साक्ष्य मिला है।
हड़प्पा बर्तन
➣ हड़प्पा के कुम्हारों को पहिये के उपयोग में महारत हासिल थी। मृद्भाडों पर सामान्यतः पेड़ों और वृत्तों की आकृतियाँ मिलती है। कुछ बर्तनों पर पुरुषों की छवि भी चित्रित है।
➣ बर्तन अधिकांशतः लाल व गुलाबी रंग के थे। इसमें डिश-ऑन-स्टैण्ड (नीचे से आधारयुक्त तस्तरी) भी शामिल हैं।
➣ विभिन्न प्रकार के मृद्भाडों को अलग-अलग डिजाइन से पेंट भी किया गया है। जिसमे लाल मृद्भाडों पर काले रंग का प्रयोग हुआ है।
➣ मृद्भाण्डो पर आकृतियाँ के साथ सिधु लिपि भी मिलती है।
मुहर और मुद्रण
➣ हड़प्पा संस्कृति की सबसे बड़ी कलात्मक रचनाएँ मुहर हैं। सिन्धु सभ्यता के विभिन्न स्थलों से अब तक 3000 से अधिक प्राप्त हुई हैं। जिसमे लगभग 1300 मुहरे अकेले मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुई हैं।
➣ हड़प्पा सभ्यता में मुहरें बेलनाकार, वर्गाकार, आयताकार एवं वृत्ताकार रूप में मिली हैं।
➣ अधिकांश मुहरों पर छोटे चित्रों में एक सिंगी पशु, भैंस, बाघ, गैण्डे, बकरियाँ, हाथी, हिरण और मगरमच्छ जैसी तस्वीरें अंकित हैं।
➣ कालीबंगा से प्राप्त एक मुहर पर किसी देवता अथवा आराध्य देव की आकृति मिलती है।
➣ लोथल और देसलपुर से ताँव की बनी मुहर तथा मोहनजोदड़ो एवं लोथल से नाव की आकृति अंकित मुहर मिली है।
➣ मुहरों के निर्माण में सर्वाधिक उपयोग सेलखड़ी या शैलखटी का किया गया है। इसके आलावा चीनी मिट्टी तथा हाथीदाँत का भी प्रयोग होता था।
मूर्तियाँ या प्रतिमाएं
➣ हड़प्पा कालीन मूर्तियों में 10 सेमी लम्बी काँस्य-निर्मित एक महिला नर्तकी, मूर्तिकला का सबसे उत्कृष्ट नमूना है। एक हार पहनने के अलावा, नग्न है।
➣ धातु तथा प्रस्तर की बनी मूर्तियां अब तक मोहनजोदाड़ो, चन्हूदड़ों, लोथल एवं कालीबंगा से प्राप्त हुई हैं।
➣ धातु मूर्तियों में ढलाई की जिस विधि का प्रयोग किया गया है। उसे प्राचीन साहित्य में मधूच्छिष्ट विधि कहा गया है।
➣ प्रस्तर मूर्तियों में सर्वाधिक प्रसिद्ध मोहनजोदाड़ो से प्राप्त योगी की मूर्ति महत्वपूर्ण है। योगी के मूंछें नहीं है किन्तु दाढ़ी विशेष रूप से संवारी गयी है।
➣ पाषाण मूतियों में दो सिर रहित मानव मूर्तियां उल्लेखनीय है। मोहनजोदाड़ो से प्राप्त पशुमूर्तियां में सर्वाधिक उल्लेखनीय श्वेत पाषाण निर्मित एक संयुक्त पशुमूर्ति है जिसमें शरीर भेड़ का तथा मस्तक हाथी का है।
➣ कालान्तर में दक्षिण की नटराज मूर्ति तथा सुल्तानगंज की बुद्ध मूर्ति का निर्माण किया गया।
टेराकोटा या मृण्मूर्तियाँ
➣ मिट्टी की मूर्तियाँ जिन्हे आग में पकाया जाता उन्हें आम तौर पर टेराकोटा या मृण्मूर्तियाँ कहा जाता है। पक्की मिट्टी की मूर्तियों का निर्माण चिकोही पद्धति से किया गया हैं।
➣ सिंधु क्षेत्र में मानव के अतिरिक्त पशु पक्षियों में बैल, भैंसा, बकरा, बाघ, सुअर, गैंडा, भालू, बन्दर, मोर, तोता, गिलहरी, सर्प, कछुवा, घड़ियाल,गौरेया, मुर्गा, चील, उल्लू, बत्तख़ एवं कबूतर की मृणमूर्तियां मिली है। गाय और घोड़े की मृण्मूर्तियां का अभाव है।
एस आर राव ने गाय की मृण्मूर्तियाँ मिलने का दावा किया है।
➣ भारतीय क्षेत्र में सिधु सभ्यता के स्थलों में केवल बणावली (हरियाणा) से दो स्त्री मूर्ति प्राप्त हुई है इसके अतिरिक्त किसी अन्य स्थल से नारी मृण्मूर्तियां नहीं मिली है।
➣ मानव मृण्मूर्तियां ठोस है परन्तु पशुओं की खोखली। नर एवं नारी- मृण्मूर्तियां में सर्वाधिक नारी मृण्मूर्तियां मिली है।
➣ डील वाले बैल की तुलना में बिना डील वाले बैलों की मृण्मूर्तियां अधिक संख्या में मिली है।
➣ हरियाणा के हिसार ज़िले में स्थित वणावली से खेत की जुताई में प्रयुक्त होने वाले हल के मिट्टी के खिलौने मिले है।
➣ मोहनजोदाड़ो से प्राप्त वृषभ की बलिष्ठ मूर्ति विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
अन्त्येष्टि या अंतिम संस्कार
➣ सिंधु घाटी सभ्यता में मृतकों का सामूहिक स्मारक प्राप्त नहीं हुआ है जैसा कि मिस्र सभ्यता में पिरामिड तथा मैसोपोटामिया में राजकीय कब्रिस्तान हैं।
➣ सिंधु सभ्यता में शवों के अंतिम संस्कार की तीन प्रथाओं के प्रमाण मिले हैं:
- दाह संस्कार में शव को पूर्ण रूप से जला कर उसकी भस्म को भूमि में गाड़ा जाता था। इसके साक्ष्य मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुए हैं। यह सर्वप्रमुख प्रथा थी।
- पूर्ण समाधिकरण में सम्पूर्ण शव को भूमि में दफना दिया जाता था।
- आंशिक समाधिकरण में पशु-पक्षियों के खाने के बाद बचे शेष भाग को भूमि में दफना दिया जाता था।
➣ हड़प्पा व कालीबंगा में दक्षिण-उत्तर क्रम (सिर उत्तर की ओर व पैर दक्षिण की ओर) में, लोथल में पूर्व- पश्चिम क्रम में, रोपड़ में पश्चिम-पूर्व क्रम में मृतक को दफनाए जाने के प्रमाण मिले हैं।
➣ एक कब्र में एक ही व्यक्ति को दफनाया जाता था परन्तु कालीबंगा और लोथल से युगल के समाधिकरण/शवाधान मिले हैं, जिसमें एक कब्र में दो-दो मृतक दफनाए गए हैं।
➣ रूपनगर (रोपड़) की एक क़ब्र में मालिक के साथ कुत्ते के भी अवशेष मिले हैं जबकि लोथल की एक कब्र से मृतक के साथ बकरे को दफनाए जाने के प्रमाण मिले हैं।
सिन्धु सभ्यता का पतन
➣ इस सांस्कृतिक पतन का कोई एक कारण ढूढ़ना मुश्किल है। इसके पतन के लिए विद्वानों ने कई कारण बताएं हैं, जैसे – बाढ़, आर्यों का आक्रमण, जलवायु परिवर्तन, भू-तात्विक परिवर्तन, व्यापार में गतिरोध, महामारी एवं साधनों का अधिक उपभोग आदि।
➣ विकसित हड़प्पा संस्कृति का अस्तित्व संभवतः 2550 ई.पू. से 1900 ई.पू. के मध्य रहा। जो एक ही प्रकार के औजारों, हथियारों, एक तरह की शहर योजना, एक जैसी मुहरें, एक तरह के टेराकोटा तथा घरों का प्रयोग करती थी।
➣ मुहनजो-दड़ो काल में कुछ समय बाद बर्तनों में परिवर्तन दिखते हैं। ई.पू. उन्नीसवीं सदी तक हड़प्पा संस्कृति के दो महत्वपूर्ण शहर हड़प्पा और मुहनजोदड़ो गायब हो गए।
➣ लेकिन अन्य स्थलों गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बाहरी क्षेत्रों में पर हड़प्पा संस्कृति ई.पू. 1500 तक जीवित रही।
➣ सिंधु सभ्यता के पतन का प्रमुख कारण बाढ़ माना जाता है। मार्शल ने मोहनजोदड़ो, मैके ने चन्हूदड़ों तथा एस.आर. राव ने लोथल के पतन का प्रमुख कारण बाढ़ माना है।
➣ व्हीलर, गार्डन चाइल्ड, मैके, पिगनट आदि विद्वानों ने सिन्धु सभ्यता के पतन का कारण आर्यों का आक्रमण माना है। जो मिथक साबित हुई।
➣ अमेरिकी इतिहासकार केनेडी के अनुसार मोहनजोदड़ों के नर-कंकाल मलेरिया जैसी किसी बिमारी से ग्रसित थे।
➣ आरेल स्टाइन और अमलानन्द घोष आदि विद्वानों के अनुसार जंगलों की अत्यधिक कटाई के कारण जलवायु में परिवर्तन आया। राजस्थान क्षेत्र में जहाँ पहले बहुत वर्षा होती थी, वहाँ वर्षा कम होने लगीं।
➣ एम.आर. साहनी, आर. एल. राइक्स, जार्ज एफ.डेल्स और एच.टी. लैम्ब्रिक सिन्धु सभ्यता के पतन में भू-तात्विक परिवर्तनों के प्रमुख कारण मानते हैं।
➣ भू-तात्विक परिवर्तनों के कारण नदियों के मार्ग बदल गए, जिससे लोगों में सिंचाई, पीने के पानी, आदि का अभाव हो गया। इस कारण वे अपने अपने स्थानों को छोड़कर दूसरे स्थानों को चले गए।
➣ डब्ल्यू. एफ. अल्ब्राइट ने सैन्धव सभ्यता का अन्त लगभग 1750 ई.पू. में विदेशी व्यापार गतिरोध को बताया।
➣ ई.पू. 2000 के आस-पास एलाम, मेसोपोटामिया की पूर्वी सीमा तथा ईरान के एक महत्वपूर्ण हिस्से में फैला था, के एक शक्तिशाली राज्य के रूप में उभरने से हड़प्पन सामग्री का मेसोपोटामिया में आयात-निर्यात बाधित हुआ।
| जलवायु परिवर्तन | आरेल स्टीन और ए. एन. घोष |
| प्राकृतिक आपदा | के. यू. आर. केनेडी |
| भूकम्प | रेइक्स, डेल्स, मार्शल |
| पारिस्थितिक असन्तुलन | फेयर सर्विस |
| आर्यों का आक्रमण | आर, मार्टीमर ह्वीलर, |
| बाह्य आक्रमण | गार्डन चाइल्ड, स्टुवर्ट, पिगट |
| नदी की शुष्कता | सूद और अग्रवाल |
| अस्थिर नदी तन्त्र | लैम्ब्रिक |
| राइक्स व डी डी कौशाम्बी | आग लगाकर सामूहिक हत्या |
| बाढ़ | मैके, राव, मार्शल |
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