Subject: भारतीय इतिहास

  • वैदिक साहित्य : वेद, उत्तरवैदिक ग्रंथ और दार्शनिक परंपरा

    📚 विषय सूची

    वैदिक कालीन धर्म ग्रन्ध

    ग्रंथ / साहित्य परिचय / प्रमुख तथ्य
    ऋग्वेद सबसे प्राचीन वेद, जिसमें 10 मंडल और 1028 सूक्त हैं। देवताओं की स्तुति, आर्यों के प्रारंभिक जीवन, समाज और संस्कृति की जानकारी मिलती है।
    यजुर्वेद यज्ञ और कर्मकांड से संबंधित वेद। इसमें यज्ञ की विधियाँ और मंत्र दिए गए हैं। इसके दो भाग हैं — कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद।
    सामवेद संगीत और गायन प्रधान वेद, इसके अधिकांश मंत्र ऋग्वेद से लिए गए हैं। भारतीय संगीत का प्रारंभिक स्रोत माना जाता है।
    अथर्ववेद जादू-टोना, चिकित्सा, लोकजीवन और दैनिक जीवन से संबंधित वेद। इसमें रोग निवारण और तांत्रिक मंत्रों का उल्लेख मिलता है।
    उपवेद वेदों से संबंधित सहायक ज्ञान। आयुर्वेद (चिकित्सा), धनुर्वेद (युद्धकला), गंधर्ववेद (संगीत) और स्थापत्यवेद (वास्तुकला) प्रमुख हैं।
    आरण्यक वनों में रहकर अध्ययन हेतु रचित ग्रंथ। इनमें यज्ञों की दार्शनिक व्याख्या और आध्यात्मिक चिंतन मिलता है।
    वेदांग वेदों को समझने हेतु सहायक शास्त्र। शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष — ये छह वेदांग हैं।
    सूत्र संक्षिप्त नियमात्मक ग्रंथ, जिनमें सामाजिक, धार्मिक और यज्ञ संबंधी नियम दिए गए हैं। श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र और धर्मसूत्र प्रमुख हैं।
    ब्राह्मण ग्रंथ वेदों की गद्यात्मक व्याख्या करने वाले ग्रंथ। इनमें यज्ञ, कर्मकांड और धार्मिक अनुष्ठानों का विस्तृत वर्णन मिलता है।
    उपनिषद् दार्शनिक ग्रंथ, जिन्हें वेदांत भी कहा जाता है। आत्मा, ब्रह्म, मोक्ष और ज्ञान पर विशेष बल दिया गया है।
    स्मृति साहित्य सामाजिक और धार्मिक नियमों पर आधारित ग्रंथ। मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति आदि प्रमुख हैं।
    पुराण धार्मिक कथाओं, देवताओं, वंशावलियों और प्राचीन इतिहास का वर्णन करने वाले ग्रंथ। कुल 18 महापुराण प्रसिद्ध हैं।
    षड्दर्शन भारतीय दर्शन की छह प्रमुख शाखाएँ — सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदांत।
    रामायण महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित महाकाव्य, जिसमें भगवान राम के जीवन और आदर्शों का वर्णन है।
    महाभारत / जयसंहिता महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य। प्रारंभिक नाम जयसंहिता था, बाद में महाभारत कहलाया।
    श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत का भाग, जिसमें श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद हैं। कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग का उपदेश दिया गया है।

    ➣ भारत का सबसे प्राचीन धर्मग्रंथ वेद है। वेद का अर्थ सम्भवत: ज्ञान प्राप्त करने से है, इन्हें सहिंता व श्रुति भी कहा जाता है।

    उत्तर वैदिक काल का इतिहास मुख्यतः वैदिक ग्रंथों पर आधारित है, जिनकी रचना ऋग्वैदिक काल के बाद, उत्तर वैदिक काल में हुई।

    ➣ सभी धार्मिक ग्रन्थों, जिन्हे उत्तर-वैदिक ग्रन्थ भी कहा जाता है , की रचना उत्तरी गंगा के मैदान में लगभग लगभग 1000-500 ई.पू. में हुई मानी गई है।

    ➣ उत्तर वैदिक काल में सामवेद, यजुर्वेद एवं अथर्ववेद तथा ब्राह्मण ग्रंथों, आरण्यकों एवं उपनिषदों की रचना हुई। इसमें सबसे प्राचीन वेद ऋग्वेद है तथा सबसे नवीनतम वेद अथर्ववेद है।

    ➣ वेद मंत्रों के समूह को सूक्त कहा जाता है, जिसमें एकदैवत्व तथा एकार्थ का ही प्रतिपादन रहता है।

    ➣ ऋग्वेद संहिता सबसे पुराना वैदिक ग्रन्थ में, प्रारम्भिक वैदिक काल का सर्वाधिक वर्णन मिलता है।

    ➣ प्रारम्भिक काल में एक ही वेद , ऋग्वेद था। एक ही वेद में अनेकों ऋचाएँ थीं, जो वेद-सूत्र कहलाते थे।

    ➣ ऋग्वेद के सूक्तो को गाया जा सके इस उद्देश्य से ऋग्वेद के सूक्तों को चुनकर इसे लयबद्ध किया गया और एक संशोधित संग्रह का उदय हुआ जिसे सामवेद कहा गया।

    ➣ उत्तर-वैदिक काल में दो और संकलन तैयार किए गए जिन्हें यजुर्वेद संहिता और अथर्ववेद संहिता के नाम से जाना गया।

    ➣ वेदों को चार भागों में विभाजित करने का श्रेय महर्षि कृष्ण-द्वैपायन को दिया गया है। वेदों का व्यास (विभाग) करने के कारण इनका नाम वेदव्यास पड़ा।

    वेदसूक्तप्रथम द्रष्टाअध्येताउपवेद
    ऋग्वेद1028 मंत्रपैलहोतृ आयुर्वेद
    यजुर्वेद वैशम्पायनअध्वर्युधनुर्वेद
    सामवेद 1875 मंत्र जैमिनी उदगातागंधर्व वेद
    अथर्ववेद 6000 मंत्रसुमन्तुब्रह्मशिल्पवेद

    ऋग्वेद : सबसे प्राचीन वैदिक ग्रंथ

    ➣ ऋग्वेद भारत की ही नहीं सम्पूर्ण विश्व की प्राचीनतम रचना है। इसकी तिथि 1500 से 1000 ई.पू. मानी जाती है।

    ➣ ऋग्वेद अर्थात् ऐसा ज्ञान, जो ऋचाओं में बद्ध हो। ऋग्वेद से आर्यों की राजनीतिक प्रणाली एवं इतिहास के बारे में सर्वाधिक जानकारी प्राप्त होती है।

    ➣ सबसे प्राचीन वेद ऋग्वेद में, 10 मंडल, 1028 सूक्त (11 बालखिल्या सूक्त मिलकर ) और 10,462 मंत्र या ऋचाएं है ऋचाओं के पढ़ने वाले ऋषि को होतृ कहा गया है।

    ➣ ऋग्वेद की लिपि ब्राह्मी है जिसकी रचना सम्भवत: सप्त-सैंधव प्रदेश में हुई थी।

    ➣ ऋग्वेद की पांच शाखायें हैं- शाकल, वाष्कल, आश्वलायन, शांखायन , मांडूकायन

    ➣ ऋग्वेद और ईरानी ग्रन्थ जेंद अवेस्ता में समानता पाई जाती है।

    ➣ चौथे मण्डल के तीन मंत्रों की रचना तीन राजाओं ने की है। त्रासदस्यु, अजमीढ़ तथा पुरमीढ़।

    ➣ ऋग्वेद के पहले व 10वें मंडल की रचना अंत में हुयी, जिन्हे क्षेपक भी कहा जाता है जबकि दूसरे से सातवे मडल प्राचीन माने जाते है जिसे वंश मंडल (एक ही ऋषि परिवार द्वारा रचे होने के कारण) कहा जाता है

    ➣ ऋग्वेद का पाठ करने वाले ऋषि को होतृ कहा जाता है जिसमे कई सूक्तों में विभिन्न वैदिक देवताओं की स्तुति करने वाले मंत्र हैं।

    ➣ ऋग्वेद में यातुधानों को यज्ञों में बाधा डालने वाला तथा पवित्रात्माओं को कष्ट पहुँचाने वाला कहा गया है।

    ➣ ऋग्वेद के मन्त्रों या ऋचाओं की रचना किसी एक ऋषि ने एक निश्चित अवधि में नहीं की, अपितु विभिन्न काल में विभिन्न ऋषियों द्वारा की गयी है।

    ➣ ऋग्वेद के 2वें से 8वें मंडल की रचनाएँ क्रमश वशिष्ठ, विश्वामित्र, भारद्वाज, वामदेव, अत्रि, गृत्समद व कण्व या अंगिरस ने की।

    ➣ ऋग्वेद के तीसरे मंडल में गायत्री मंत्र का उल्लेख है, जो देवी सावित्री को समर्पित है जिसकी रचना महर्षि विश्वामित्र ने की। यह मंडल वरुण देवता को समर्पित है।

    ➣ ऋग्वेद के 10वें मंडल के पुरुष सूक्त में चार वर्णो का प्रयोग हुआ है- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र। यह वर्ण व्यवस्था उत्तर वैदिक काल की देन है।

    ➣ ऋग्वेद में लोपामुद्रा, अपाला , सिकता , घोषा आदि विदुषी महिला का तथा जंगल की देवी अरण्यनी का उल्लेख भी मिलता है

    ➣ इसमें लोपामुद्रा प्रमुख है जो क्षत्रिय वर्ण की थी इनका विवाह अगस्त्य ऋषि से हुआ था।

    ➣ ऋग्वेद में इन्द्र देवता के लिए 250 ऋचाएँ व अग्नि देवता के लिए 200 ऋचाएँ का उल्लेख किया गया है।

    ➣ ऋग्वेद में सरस्वती नदी नदीतम अर्थात् सर्वश्रेष्ठ नदी या सबसे पवित्र नदी कहा गया है। 10वें मड़ल में गंगा का एक बार व यमुना नदी का 3 बार उल्लेख है।

    ➣ ऋग्वेद में 25 नदियों का वर्णन मिलता है, जिसमें सर्वाधिक बार सिंधु नदी का वर्णन मिलता है। आर्यों की सबसे प्रमुख नदी सिंधु है।

    ➣ सर्वप्रथम स्तूप शब्द का प्रयोग ऋग्वेद ही मिलता है।

    ➣ ऋग्वेद में निम्न शब्दों का उल्लेख मिलता है-

    शब्दउल्लेख
    पिता335
    जन275
    इन्द्र250
    माता234
    अश्व215
    अग्नि200
    गौ (गाय)176
    विश170
    सोम देवता144
    विदथ122
    विष्णु100
    गण46
    ब्रज गोशाला45
    कृषि33
    वरुण30
    वर्ण23
    सेना20
    ब्राह्मण15
    ग्राम13
    वृहस्पति11
    राष्ट्र10
    क्षत्रिय9
    समिति9
    सभा8
    यमुना3
    रूद्र3
    वैश्य1
    गंगा1
    राजा1
    पृथ्वी1

    ऋग्वेद के प्रमुख मण्डल व उनके रचयिता

    रचयितामण्डल
    द्वितीयगृत्समद भार्गव
    तृतीयविश्वामित्र (गायत्री मंत्र का उल्लेख)
    चौथावामदेव (कृषि सम्बंधी प्रक्रिया)
    पाँचवाँअत्रि
    छठाभारद्वाज
    सातवावशिष्ठ
    आठवाकण्व ऋषि व अंगिरस
    नौवाँपवमान अंगिरा (सोम का वर्णन)
    दसवाँक्षुद्रसूक्तीय, महासूक्तीय

    यजुर्वेद : यज्ञ एवं कर्मकाण्ड

    यजुष शब्द का अर्थ है- यज्ञ। यर्जुवेद सम्बन्ध मूलतः कर्मकाण्ड से है। इसकी रचना कुरुक्षेत्र में मानी जाती है।

    ➣ इस वेद में अनेक प्रकार के यज्ञ व हवन को सम्पन्न करने की विधियों का उल्लेख है। यह गद्य तथा पद्य दोनों में लिखा गया है।

    ➣ यजुर्वेद दो भागों में विभाजित है कृष्ण यजुर्वेद व शुक्ल यजुर्वेद। जिसमे कृष्ण यजुर्वेद की रचना गद्य व शुक्ल यजुर्वेद की रचना पद्य में हुयी है।

    ➣ इस वेद में ही सर्वप्रथम राजसूय तथा वाजपेय यज्ञों का वर्णन मिलता है।

    ➣ यज्ञ में कहे जाने वाले गद्यात्मक मन्त्रों को यजुस तथा मंत्रों का उच्चारण करने वाले पुरोहित को अध्वुर्य कहा गया है।

    ➣ यजुर्वेद में हाथियों के पालने का उल्लेख है तथा कृषि व सिंचाई का उल्लेख मिलता है।

    ➣ यजुर्वेद का अन्तिम अध्याय ईशावास्य उपनिषयद है, जिसका सम्बन्ध आध्यात्मिक चिन्तन से है।

    ➣ यजुर्वेद में 5 प्रकार के चावल का उल्लेख है – महाब्राहि, कृष्णव्रीहि, शुक्लव्रीही, आशुधान्य और हायन।

    ➣ शुक्ल यजुर्वेद की शाखा को वाजसनेय तथा कृष्ण यजुर्वेद की शाखा को आपस्तम्ब संहिता भी कहा जाता है।

    ➣ शुक्ल यजुर्वेद की मुख्य शाखायें है- माध्यन्दिन, काण्व तथा कृष्ण यजुर्वेद इसकी 4 शाखाएँ हैं- काठक, कपिष्ठल, मैत्रेयी ,तैत्तरीय संहिता।

    सामवेद : संगीत प्रधान वेद

    साम समन धातु से निकला है, जिसका अर्थ है लय या ताल। इस प्रकार सामवेद से तात्पर्य उस ग्रंथ से है जिसके मंत्र गाये जा सकते हैं और जो संगीतमय हों। सामवेद में संकलित मंत्रों को देवताओं की स्तुति के समय गाया जाता था।

    ➣ सामवेद में कुल 1875 ऋचायें हैं। जिनमें 99 ऋचायें मूल है जबकि शेष ऋग्वेद से ली गयी हैं।

    ➣ सामवेद का प्रथम द्रष्टा वेदव्यास के शिष्य जैमिनी को माना जाता है।

    ➣ सामवेद में मंत्रो का गायन करने वाले पुरोहित का उदगाता कहा जाता है। वेदगान में केवल तीन स्वरों के प्रयोग का उल्लेख है जो उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित कहलाते हैं।

    ➣ सामदेव की तीन महत्त्वपूर्ण शाखायें हैं- कौथुमीय, जैमिनीय एवंराणायनीय।

    ➣ सामवेद का प्रमुख देवता सविता या सूर्य है, इसमें मुख्यतः सूर्य की स्तुति के मंत्र हैं, इंद्र, सोम का भी उल्लेख है।

    ➣ भारतीय संगीत के इतिहास के क्षेत्र में सामवेद का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। इसे भारतीय संगीत का जनक माना जाता है।

    लगभग 1700 ई. पू. में रचित प्रथम तीन वेदों (ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद) को संयुक्त रूप में त्रयी या वेदत्रयी कहा जाता है।

    अथर्ववेद : चिकित्सा एवं तंत्र-मंत्र

    ➣ अथर्ववेद सबसे नवीनतम वेद है। इस वेद की रचना सबसे बाद में हुई थी। जिसे ब्रह्मवेद भी कहा जाता है।

    ➣ इसकी रचना लगभग 1000 ई.पू. का माना जाता है। इसमें 20 अध्याय, 731 सूक्त व 6000 मंत्र हैं। मंत्रों का उच्चारण करने वाले पुरोहित को ब्रह्म कहा जाता था।

    ➣ अथर्ववेद की रचना अथवर्ण तथा आगिरस ऋषियों द्वारा की गयी है। इसलिए इसको अन्य नाम अधांगिरस वेद, भी कहा जाता है।

    अथर्वा ऋषि के नाम पर इस वेद का नाम अथर्ववेद पड़ा। पृथ्वीसूक्त इस वेद का अति महत्वपूर्ण सूक्त है। इस कारण इसे महीवेद भी कहते हैं।

    ➣ अथर्ववेद में याज्ञिक अनुष्ठानों का वर्णन नहीं मिलता। इस वेद के महत्त्वपूर्ण विषय-ब्रह्मज्ञान , औषधि ,रोग निवारण, तंत्र-मंत्र व जादू टोना आदि हैं।

    ➣ आयुर्वेद, चिकित्सा, औषधियों आदि के वर्णन होने के कारण भैषज्य वेद भी कहा जाता है।

    पृथ्वीसूक्त इस वेद का अति महत्त्वपूर्ण सूक्त है। इस कारण इसे महीवेद भी कहते हैं।

    ➣ 13 से 20 अध्याय तक में ब्रह्मांडीय सिद्धांत (13 कांड), विवाह प्राथनाएं (अध्याय14), अंतिम संस्कार के मंत्र (अध्याय 18) और अन्य मन्त्र व जादू टोना हैं।

    ➣ अथर्ववेद में राजा का चयन करने के कारण , सभा व समिति को प्रजापति की दो पुत्रियाँ कहा गया है।

    ➣ राष्ट्रीय भावना का सुदृढ़ प्रतिपादन सर्वप्रथम इसी वेद में हुआ है। इनके उपनिषदों में- मुण्डकोपनिषद्, प्रश्नोपनिषद् तथा माडूक्योपनिषद् मुख्य हैं।

    ➣ इस वेद की दो अन्य शाखायें हैं- पिप्पलाद, शौनक।

    ➣ अथर्ववेद में कुरू के राजा परीक्षित का उल्लेख मिलता है, जिसे मृत्युलोक का देवता बताया गया है।

    उपवेद : अनुप्रयुक्त वैदिक ज्ञान

    वेदउपवेद प्रर्वतकविवरण
    ऋग्वेदआयुर्वेदप्रजापतिचिकित्सा शास्त्र
    यजुर्वेदधनुर्वेदविश्वामित्रयुद्ध कला
    सामवेदगंधर्ववेदनारदकला एवं संगीत
    अथर्ववेदशिल्पवेदविश्वकर्माभवन निर्माण कला

    आरण्यक : दार्शनिक ग्रंथ

    ➣ ऋषियों द्वारा जगल या एकांत में रचित ग्रंथों को आरण्यक कहा जाता है।

    ➣ आरण्यक में दार्शनिक सिद्धांतों और रहस्यवाद का उल्लेख मिलता है। जैसे , आत्मा, मृत्यु, जीवन आदि का।

    ➣ वर्तमान में उपलब्ध 7 प्रमुख आरण्यक ऐतरेय, तैत्तरीय, माध्यन्दिन, शंखायन, मैत्रायणी, तलवकार और वृहदारण्यक है।

    वेदआरण्यक
    ऋग्वेद ऐतरेय , शांखायन या कौषीतकि
    यजुर्वेद बृहदारण्यक, मैत्रायणी, तैत्तिरीय
    सामवेद जैमनीयोपनिषद या तवलकार
    अथर्ववेद कोई आरण्यक नहीं

    ➣ प्रस्थानत्रयी में तीन ग्रंथ- भगवद्गीता, ब्रह्मसूत्र और उपनिषद् सम्मिलित हैं।

    वेदांग : वेदों की सहायक विद्याएँ

    ➣ वेदांगों की संख्या 6 बतायी गयी है- छंद (वेद के पैर), कल्प (वेद के हाथ), ज्योतिष (वेद के आँखे), निरुक्त (वेद के कान), शिक्षा (वेद की नासिका) तथा व्याकरण (वेद के मुख)।

    शिक्षा – वैदिक वाक्यों के स्पष्ट उच्चारण हेतु इसका निर्माण हुआ। वैदिक शिक्षा सम्बंधी प्राचीनतम साहित्य प्रातिशाख्य है।

    कल्प – वैदिक कर्मकाण्डों में अर्थात वेदों के किस मन्त्र का प्रयोग किस कर्म में करना चाहिये, का वर्णन किया गया है। इसकी शाखायें हैं- श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र, धर्मसूत्र व शुल्व सूत्र

    व्याकरण – समास एवं सन्धि के नियम, नामों एवं धातुओं की रचना, उपसर्ग एवं प्रत्यय आदि के का वर्णन हैं। पाणिनि की अष्टाध्यायी प्रसिद्ध व्याकरण ग्रंथ है।

    निरूक्त – शब्दों की व्युत्पत्ति एवं निर्वचन बतलाने वाले शास्त्र निरूक्त कहलातें है। यास्क ने निरूक्त की रचना की थी, जो भाषा शास्त्र का प्रथम ग्रंथ माना जाता है।

    छन्द – वैदिक साहित्य में मुख्य रूप से गायत्री, त्रिष्टुप, जगती, वृहती आदि छन्दों का प्रयोग किया गया है। पिंगल का छन्दशास्त्र प्रसिद्ध है।

    ज्योतिष – इसमें ज्योतिष शास्त्र के विकास को दिखाया गया है। इसकें प्राचीनतम आचार्य लगध मुनि है। शुल्व सूत्र ज्यामीतिय गणना से सम्बन्धित रचना है

    वेदांगप्राचीनतम् ग्रंथ ग्रन्थ पर्वतक
    शिक्षाध्वनिशास्त्र ऋत् शौनक
    कल्पसूत्र धार्मिक आचारशास्त्रश्रौतसूत्र, गृह्य सूत्र
    धर्म सूत्र, शुल्व सूत्र
    आश्वलायन
    बौधायन
    ज्यातिषखगोल विज्ञान वेदांग ज्योतिष लगध मुनि
    व्याकरणव्याकरण अष्टाध्यायी पाणिनी
    निरुक्त व्युत्पत्तिशास्त्र निरुक्त महर्षि यास्क
    छद मापसिद्धांत छंद सूत्र पिंगल ऋषि

    सूत्र : नियम एवं विधि ग्रंथ

    इस साहित्य की रचना ई.पू. छठी शताब्दी के आस-पास शुरू हुई। सूत्र ग्रंथों को कल्प कहा जाता है। ऐसे सूत्र जिनमें विधि और नियमों का प्रतिपादन किया गया है, कल्पसूत्र कहलाते हैं। ये चार प्रकार के हैं:

    1. श्रौत सूत्र : यज्ञ संबंधी नियमों का उल्लेख
    2. गृह सूत्र : मनुष्यों के लौकिक तथा पारलौकिक कर्तव्यों से संबंधित
    3. धर्मसूत्र : धार्मिक, सामाजिक एवं राजनीतिक कर्तव्यों का उल्लेख
    4. शुल्व सूत्र : यज्ञीय वेदियों को नापने, उनके स्थान-चयन तथा निर्माण आदि का वर्णन

    ब्राह्मण ग्रंथ : वैदिक कर्मकाण्ड व्याख्या

    ब्रह्म का शाब्दिक अर्थ हैं- यज्ञ अर्थात् यज्ञ के विषयों का अच्छी तरह से प्रतिपादन करने वाले ग्रंथ, ब्राह्मण ग्रंथ कहे गये। जो गद्य में रचित थे

    ➣ ऋग्वेद के ब्राह्मण ग्रंथ ऐतरेय व कौषितकी, यजुर्वेद के ब्राह्मण ग्रंथ तैतरीय व शतपथ, सामवेद के पंचविश, जैमनीय, षड्विश व ताण्ड्य और अथर्ववेद का एक मात्र ब्राह्मण ग्रंथ गोपथ है।

    शतपथ ब्राह्मण ग्रंथ में स्त्री को पुरूष की अर्धागिनी कहा गया है एंव इसमें जल-प्रलय की कथा और पुरूरवा-उर्वशी आख्यान मिलता है।

    ➣ शतपथ ब्राह्मण की रचना याज्ञवाल्क्य ऋषि ने की जबकि पंचविश ब्राह्मण ग्रंथ की रचना तांडय ऋषि ने की।

    ➣ सामवेद का ब्रह्माण ग्रंथ षडविश जिसकी रचना अद्भुत ब्रह्माण ने की इसमें भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाओं से मुक्ति के बारे में बताया गया है।

    ➣ शतपथ ब्राह्मण में महाजनी प्रथा का प्रथम बार उल्लेख हुआ है।

    आश्रम प्रणाली का सर्वप्रथम उल्लेख ऐतरेय ब्राह्मण में मिलता है।

    ➣ शतपथ ब्राह्मण में एक स्थान पर क्षत्रियों को ब्राह्मणों से श्रेष्ठ कहा गया है।

    ➣ ऐतरेय ब्राह्मण में पुत्री को कृपण अर्थात दुखों का स्रोत, कहा गया है।

    ओम शब्द का पहली बार उल्लेख कठोपनिषद में किया गया है।

    ➣ शतपथ ब्राह्मण में कृषि की चारों क्रियाओं जुताई, बुआई, कटाई तथा मड़ाई का वर्णन मिलता है।

    वेदब्राह्मण
    ऋग्वेद ऐतरेय, शांखायन या कौषीतकि ब्राह्मण
    शुक्ल यजुर्वेद शतपथ ब्राह्मण
    कृष्ण यजुर्वेद तैत्तिरीय ब्राह्मण
    सामवेद पंचविंश या ताण्ड्य , षडविंश , सामविधान , वंश , मंत्र , जैमिनीय
    अथर्ववेद गोपथ ब्राह्मण
    पूर्वसाम्राज्य-सम्राट
    पश्चिम स्वराज-स्वराट
    उत्तर वैराज्य-विराट
    दक्षिण भोज्य-भोज
    मध्यदेश राज्य-राजा

    उपनिषद् : आत्मा एवं ब्रह्म ज्ञान

    ➣ वैदिक काल के अन्त में 600 ई.पू. के आस-पास उपनिषदों का संकलन हुआ। इन दार्शनिक ग्रन्थों ने सही मत एवं ज्ञान के मूल्यों पर जोर दिया।

    ➣ उपनिषदों को वेदान्त (वेदों का अन्त) भी कहा जाता है। क्योंकि इनकी रचना वैदिक साहित्य के अंत में हुई।

    ➣ उपनिषदों की संख्या 108 है। उपनिषदों में स्पष्ट रूप से यज्ञों तथा कर्मकांडों की निंदा की गयी है।

    ➣ उपनिषद शब्द की व्युत्पत्ति उप (निकट), नि (नीचे), और षद (बैठो) से है जिसका अर्थ गुरू के समीप बैठकर ज्ञान प्राप्त करना।

    विश्व ईश्वर है तथा ईश्वर मेरी आत्मा है। यह दर्शन उपनिषद् नामक दार्शनिक ग्रंथ में मिलता है।

    ➣ प्रमुख उपनिषद हैं- ईश, केन, कठ, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, श्वेताश्वतर, बृहदारण्यक, कौषीतकि, मुण्डक, प्रश्न, मैत्राणीय आदि। ये वेदों से सम्बंधित हैं।

    ➣ उपनिषद गद्य और पद्य दोनों में हैं, जिसमें प्रश्न, माण्डूक्य, केन, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक और कौषीतकि उपनिषद गद्य में हैं तथा केन, ईश, कठ और श्वेताश्वतर उपनिषद पद्य में हैं।

    ➣ उपनिषदों को भारतीय दर्शन का स्रोत अथवा पिता माना जाता है।

    वृहदारण्यक उपनिषद में पुनर्जन्म के सिद्धांत का पहली बार उल्लेख किया गया।

    ➣ सर्वप्रथम जावालो उपनिषद में चार आश्रमों (ब्रह्मचर्य , गृहस्थ , वानप्रस्थ , सन्यास ) का वर्णन मिलता है।

    आश्रम आयुकार्यपुरुषार्थ
    ब्रह्मचर्य 0-25वेदों का अध्ययन , ज्ञान प्राप्ति धर्म व ज्ञान
    गृहस्थ25-50भौतिक सुखों का भोग करना अर्थ व काम
    वानप्रस्थ50-75विरक्त जीवन , ईश्वर का ध्यांन करना अध्यात्म ज्ञान
    सन्यास75-100गृहत्याग कर, तपस्यामोक्ष

    ➣ कठोपनिषद में यम-नचिकेता संवाद है। जबकि वृहदारण्यक उपनिषद में गार्गी-याज्ञवलक्य संवाद का उल्लेख मिलता है।

    निष्काम कर्म सिद्धांत का प्रथम प्रतिपादन इषोपनिषद में किया गया।

    ➣ सामवेद से सम्बंधित छान्दोग्य उपनिषद् में तत्वमसि का प्रथम उल्लेख है।

    ➣ सबसे बड़ा उपनिषद वृहदारण्यकोपनिषद् है जिसमें अश्वमेध यज्ञ का वर्णन किया गया है।

    ➣ छन्दोग्य उपनिषद में देवकी पुत्र कृष्ण का तथा श्वेतकेतू व उसके पिता का संवादउल्लेख मिलता है।

    ➣ भारत का राष्ट्रीय आदर्श वाक्य सत्यमेव जयते मुण्डकोपनिषद् से लिया गया है। मुण्डकोपनिषद् में शिक्षा के विषयों में वेदांगों को भी शामिल किया गया है।

    राजा की उत्पत्ति का सिद्धात का वर्णन सर्वप्रथम ऐतरेय ब्राह्मण में मिलता है।

    वेदउपनिषद
    ऋग्वेद ऐतरेयोपनिषद
    यजुर्वेद बृहदारण्यकोपनिषद
    शुक्ल यजुर्वेद ईशावास्योपनिषद
    कृष्ण यजुर्वेद तैत्तिरीयोपनिषद, कठोपनिषद, श्वेताश्वतरोपनिषद, मैत्रायणी
    सामवेद वाष्कल, छान्दोग्य , केनोपनिषद
    अथर्ववेद माण्डूक्योपनिषद, प्रश्नोपनिषद, मुण्डकोपनिषद

    ➣ 24 बैलों द्वारा खींचे जाने वाले हल का उल्लेख काठक संहिता में मिलता है।

    स्मृति साहित्य : सामाजिक एवं धार्मिक नियम

    ➣ स्मृतियों की रचना वेदों की रचना के बाद लगभग 500ई.पू.के लगभग हुई। मुख्यत: स्मृतियां 18 मानी गयी हैं।

    ➣ स्मृति कोई धार्मिक ग्रन्थ नहीं थे बल्कि ऋषियों द्वारा रचित साहित्य थे। जिसमे नई परिस्थिति को देखते हुए सरल माध्यम का प्रयोग किया गया था। जिससे समाज का मार्ग दर्शन हो सके।

    ➣ स्मृति का नाम मुख्यत: उसके रचनाकार के नाम पर हैं। जैसे- मनु द्वारा रचित स्मृति मनुस्मृति।

    मनुस्मृति सबसे प्राचीन और प्रथम स्मृति है, जिसका सम्बन्ध नियम-कानून से था।

    ➣ स्मृति साहित्य हिन्दू धर्म के धर्मग्रन्थों जैसे पुराण, स्मृति व धर्मशास्त्र का समूह है इसमें वेद या श्रुति नहीं आते।

    ➣ धर्मशास्त्र में रामायण, महाभारत, गीता, पुराण सम्मलित हैं जिनकी रचना लगभग 1000 ई.पू. के बाद हुई।

    ➣ मनु स्मृति शुंग काल या दूसरी सदी की प्रसिद्ध रचना है जबकि नारद स्मृति गुप्तकाल से सम्बन्धित है।

    ➣ प्रमुख स्मृतियां – मनु ,याज्ञवल्क्य ,अत्रि ,विष्णु ,हारीत ,औशनस ,अंगिरा ,यम ,कात्यायन ,बृहस्पति ,पराशर ,व्यास ,दक्ष ,गौतम ,वशिष्ठ ,आपस्तम्ब ,संवर्त ,शंख ,लिखित ,देवल ,तातप

    मनुस्मृतिई.पू. 200-200 ई.
    याज्ञवल्क्य स्मृति100 ई.से 300
    नारद स्मृति300 ई. से 400 ई.
    पराशर स्मृति300 ई. से 500
    बृहस्पति स्मृति300 ई. से 600 ई.
    कात्यायन स्मृति300 ई. से 600 ई.

    पुराण : पौराणिक कथाएँ

    ➣ पुरा का शाब्दिक अर्थ –पुराना अथवा प्राचीन , अण शब्द का अर्थ – कहना या बतलाना अर्थात् जो अतीत के तथ्यों, सिद्धांतों, शिक्षाओं, नीतियों, नियमों और घटनाओं का विवरण प्रस्तुत करे।

    ➣ पुराण स्मृति के अंतर्गत आते हैं जिनकी रचना वेदो के बाद हुई।

    ➣ पुराणों के रचनाकार महर्षि लोमहर्ष व उनके पुत्र उगनवा थे।

    ➣ पुराणों की संख्या 18 है, इनमें सबसे प्राचीन व प्रामाणिक पुराण मत्स्य पुराण में विष्णु दशवतार का उल्लेख है।

    ➣ मत्स्य पुराण में आधंसातवहन वंश, विष्णु पुराण में मौर्य वंश, वायु पुराण में गुप्त वंश का वर्णन मिलता है।

    ➣ प्रमुख पुराण- विष्णु पुराण, ब्रह्म पुराण, शिव पुराण, भागवत पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, लिङ्ग पुराण, नारद पुराण, ब्रह्म वैवर्त पुराण, स्कन्द पुराण,

    ➣ गरुड़ पुराण, मार्कण्डेय पुराण, अग्नि पुराण, पद्म पुराण, भविष्य पुराण, मत्स्य पुराण, वराह पुराण, वामन पुराण, कूर्म पुराण आदि।

    षड्दर्शन : भारतीय दर्शन की शाखाएँ

    ➣ दर्शन-शास्त्र का सामान्य अर्थ है- देखने का माध्यम या साधन।

    ➣ षडदर्शन दर्शन शास्त्र से सम्बन्धित हैं जिसमे 6 दर्शन अधिक प्रसिद्ध और प्राचीन हैं।

    ➣ ये सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदान्त के नाम से विदित है। इन दर्शनों की रचना उत्तर बौद्ध काल में हुई।

    न्याय दर्शन भारत के छह वैदिक दर्शनों में से एक दर्शन है। न्यायसूत्र इस दर्शन का सबसे प्राचीन एवं प्रसिद्ध ग्रन्थ है।

    वात्स्यायन (कामसूत्र ग्रन्थ के रचयिता ) ने न्याय को समस्त विद्याओं का प्रदीप कहा है।

    पूर्व मीमांसा महिर्ष जैमिनी
    वेदान्त (उत्तर मीमांसा) महिर्ष बादरायण
    सांख्य दर्शन महिर्ष कपिल
    वैशेषिक दर्शन महिर्ष कणाद
    न्याय दर्शन महिर्ष गौतम
    योग दर्शन महिर्ष पतंजलि

    रामायण : श्रीराम का महाकाव्य

    ➣ रामायण एक धर्मशास्त्र है ,जिसका विश्लेषित रूप राम का अयन है, जिसका अर्थ है राम की यात्रा। जो त्रेतायुग से सम्बंधित है।

    ➣ रामायण की रचना संस्कृत भाषा में महर्षि वाल्मीकि ने की। जिस के कारण महर्षि वाल्मीकि को आदिकवि भी कहा जाता है। इसका अन्य नाम बाल्मीकि रामायण भी मिलता है।

    ➣ रामायण संस्कृत भाषा में रचित सर्वप्रथम काव्य है। प्रथम काव्य होने के कारण इसे आदिकाव्य भी कहा जाता है। रामायण 500 ई.पू. के लगभग लिखी गयी।

    ➣ रामायण में मूलतः 6000 श्लोक थे, जो बढ़कर 12,000 और अंततः 24,000 हो गये। जिस कारण इसे चतुर्विशती साहस्त्री संहिता कहा गया।

    ➣ रामायण 7 काण्डों में विभक्त है। इन सात काण्डो के नाम – बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, लंकाकाण्ड (युदध्काण्ड) तथा उत्तरकाण्ड है। इनमें से सबसे बड़ा अध्याय बालकाण्ड तथा सबसे छोटा किष्किन्धाकाण्ड है।

    सन्त तुलसीदास ने श्रीराम की पवित्र कथा को देसी भाषा में लिपिबद्ध किया। इस ग्रंथ का नाम रामचरितमानस रखा। इसे तुलसी रामायण के नाम से भी जाना जाता है।

    ➣ तुलसीदास जी के अनुसार सर्वप्रथम श्रीराम की कथा भगवान शंकर ने पार्वती को सुनाई। जिसे अध्यात्म रामायण के नाम से जाना जाता है।

    ➣ रामायण का तमिल भाषा में अनुवाद कवि कम्बन ने तथा बांग्ला भाषा में कृतिवास ने किया।

    ➣ रामायण का फारसी भाषा में अनुवाद अकबर काल में अब्दुल कादिर बदायूंनी ने किया।

    ➣ रामायण का अंग्रेजी अनुवाद सर्वप्रथम आरटीएच ग्रिफिथ ने किया।

    ज्ञातव्य हो रामायण की रचना महाभारत के बाद हुई है।

    महाभारत / जयसंहिता : कुरुक्षेत्र युद्ध कथा

    ➣ हिन्दू धर्म के मुख्यतम ग्रंथों में से एक , इस ग्रन्थ की रचना महर्षि वेदव्यास ने की। यह विश्व का सबसे लम्बा साहित्यिक ग्रंथ है।

    ➣ जय संहिता नाम से ज्ञात महाभारत में 8800 श्लोक थे, जो बढ़कर 24,000 और अंततः एक लाख श्लोक हो गये। जिस कारण यह शतसाहस्री संहिता या महाभारत कहलाने लगा।

    ➣ चूँकि महाभारत में भरत के वंशजों (कौरवों-पांडवों का युद्ध ) की कथा का वर्णन मिलता है इसलिए इस ग्रन्थ को भारत भी कहा जाता है।

    ➣ इसके आलावा इसमें हरिवंश पुराण (हरि या विष्णु की वंशावली) और भगवद्गीता (ईश्वर का गीत) भी सम्मिलित है। हरिवंश पुराण में ही कृष्ण एवं गोपियों के प्रेम का वर्णन है।

    ➣ महाभारत में कुल 18 पर्व हैं – 1. आदि पर्व 2. सभा पर्व 3. वन पर्व 4. विराट पर्व 5. उद्योग पर्व 6. भीष्म पर्व 7, द्रोण पर्व 8. कर्ण पर्व 9. शल्य पर्व 10. सौप्तिक पर्व 11. स्त्री पर्व 12. शांति पर्व 13. अनुशासन पर्व 14. अश्वमेध पर्व 15. आश्रमवासी पर्व 16. मौसल पर्व 17, महाप्रस्थानिक पर्व 18. स्वर्गारोहण पर्व।

    ➣ महाभारत का तमिल भाषा में अनुवाद पेरून्देवनार ने भारतम् नाम से किया जबकि बांग्ला भाषा में अनुवाद अलाउद्दीन नुशरत शाह ने किया।

    ➣ महाभारत का फारसी अनुवाद रज्मनामा नाम से बंदायूनीफैजी ने किया।

    श्रीमद्भगवद्गीता : कर्मयोग एवं ज्ञानयोग

    ➣ यह महाभारत का एक अंश है। जो महाभारत के 6वें पर्व भीष्म पर्व से लिया गया है।

    ➣ श्री कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध भूमि में जो उपदेश दिए थे। उन उपदेशों को भगवत गीता नामक ग्रंथ में संकलित किया गया है।

    ➣ इसमें 18 अध्याय व 700 श्लोक हैं। इसे उपनिषदों का सार कहा जाता है। उपनिषदों को गौ (गाय) और गीता को उसका दुग्ध कहा गया है।

    ➣ इसमें मोक्ष प्राप्ति के 3 मार्गो-1. कर्म, 2. ज्ञान और 3. भक्ति का सुन्दर समन्वय है। भक्ति के सिद्धान्त को सबसे पहले गीता में ही स्पष्ट रूप से निरूपित किया गया है।

    ➣ गीता पर टीका लिखने वाले प्रमुख मध्यकालीन विद्वान्–शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मधुसूदन सरस्वती, सन्त ज्ञानेश्वर, आदि।

    ➣ आधुनिक काल में भारतीय कई राष्ट्रवादी नेताओं ने भगवद्गीता पर टीकाएँ लिखीं, जैसे-बाल गंगाधर तिलक (गीता रहस्य), अरविन्द घोष (एक्सेज ऑन द गीता), महात्मा गाँधी (भगवद्गीता) है।

    ➣ हिन्दुओं की गीता को मुस्लिमों के कुरान व ईसाइयों के बाइबिल के समतुल्य पवित्र धर्मग्रन्थ माना जाता है।

    ➣ श्रीमद् भागवत गीता का सर्वप्रथम अंग्रेजी अनुवाद चार्ल्स विलकिन्स ने 1785 में किया।

  • उत्तर वैदिक काल (1000-600 ई. पू.) : समाज, वर्ण व्यवस्था और सांस्कृतिक परिवर्तन

    📚 विषय सूची

    उत्तर-वैदिक संस्कृति

    ➣ वैदिक सभ्यता के अंत का काल उत्तर-वैदिक काल के नाम से जाना जाता है जिसमे आर्यों के क्षेत्र-विस्तार , सामाजिक, राजनीतिक एंव धार्मिक रीतियों के बदलाव आदि की जानकारी प्राप्त होती है।

    ऋग्वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था का आधार कर्म था। उत्तर वैदिक काल में जो जाति पर आधारित हो गया। इस काल में केवल वैश्य वर्ण को कर चुकाना पड़ता था।

    ➣ उत्तर वैदिक काल का इतिहास मुख्यतः वैदिक ग्रंथों पर आधारित है, जिनकी रचना ऋग्वैदिक काल के बाद, उत्तर वैदिक काल में हुई।

    ➣ उत्तर वैदिक काल में सामवेद, यजुर्वेद एवं अथर्ववेद तथा ब्राह्मण ग्रंथों, आरण्यकों एवं उपनिषदों की रचना हुई। उल्लेखनीय है ऋग्वेद की रचना ऋग्वेदीक काल में हुई थी।

    भौगोलिक विस्तार क्षेत्र

    ➣ उत्तर-वैदिक ग्रन्थों से पता चलता है कि आर्य लोगों ने पंजाब से लेकर गंगा-यमुना दोआब के साथ पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक अपना विस्तार कर लिया था।

    ➣ उत्तर वैदिक काल में भू-भाग आधारित बड़े राज्यों की स्थापना हुई, जिनमें कौशल, विदेह, अंग,कुरु और पांचाल शामिल थे। पुरु एवं भरत मिलकर कुरु बना और तुर्वशक्रिवि मिलकर पांचाल राज्य बने।

    ➣ आरंभ में वे लोग दोआब के ठीक छोर पर सरस्वती और दृष्टावती नदियों के प्रदेश में बसे । शीघ्र ही कुरूओं ने दिल्ली क्षेत्र और दोआब के ऊपरी भाग पर अधिकार कर लिया, जो कुरूक्षेत्र नाम से प्रसिद्ध हुआ।

    ➣ धीरे-धीरे वे पंचालों से भी मिल गए जो दोआब के मध्य भाग पर अधिकार प्राप्त किये और इस प्रकार कुरू-पंचालों की सत्ता दिल्ली क्षेत्र पर और दोआब के ऊपरी भाग और मध्य भागों पर फैल गई।

    ➣ उन्होंने हस्तिनापुर को अपनी राजधानी बनाया जो मेरठ जिले में पड़ता है। कुरू कुल का इतिहास भारत-युद्ध से प्रसिद्ध है जिस पर महाभारत नाम का विख्यात महाकाव्य है।

    ➣ यह माना जाता है कि भारत युद्ध 950 ई.पू. के आस-पास कौरवों और पांडवों के बीच हुआ था, हालांकि ये दोनों कुरू कुल के ही थे। इस युद्ध के फलस्वरूप वस्तुतः कौरवों का नाश हो गया।

    उत्तर-वैदिक का भौगोलिक विस्तार क्षेत्र

    ➣ उत्तर वैदिक कालीन क्षेत्र (गंगा यमुना दोआब क्षेत्र, गांधार क्षेत्र ) के खनन से चित्रित मिट्टी के बर्तन प्राप्त हुए हैं, जो भूरे रंग के थे। इन्हे धूसर मृदभांड (पी. जी. डब्ल्यू.) कहा गया है।

    ➣ उत्खनन में केवल अतरंजीखेड़ा स्थल से कृषि से सम्बन्धित लौह उपकरण प्राप्त हुए हैं। जो लोहे के प्रयोग के साक्ष्य को दर्शाते हैं।

    ➣ उत्तर-वैदिक ग्रन्थों में पांचाल राज्य अपने दार्शनिक राजाओं और ब्राह्मण धर्मशास्त्रियों के लिए प्रसिद्ध था।

    ➣ कुरु कबीले में कौरवों और पाण्डवों का इतिहास प्रसिद्ध है, जिस पर महाभारत नामक महाकाव्य आधारित है।

    ➣ अथर्ववेद में कुरू देश के राजा परीक्षित को मृत्युलोक का देवता कहा गया है।

    ➣ माना जाता है कि महाभारत युद्ध ई.पू. 950 में कौरवों और पाण्डवों के बीच लड़ा गया। परिणामस्वरूप पूरे कौरव परिवार का अंत हो गया।

    ➣ महाभारत नामक महाकाव्य महाकाव्य का रचना काल लगभग चौथी शताब्दी के आस-पास माना गया है।

    ➣ उत्तर-वैदिक काल के अन्त तक, ई.पू. 500 के आस-पास वैदिक लोग बड़ी संख्या में दोआब से पूरब की ओर, पूर्वी उत्तर-प्रदेश के कोसल और उत्तर बिहार के विदेह तक फैल गए।

    जनजातीय संघर्ष

    ➣ वैदिक लोगों का पूर्वी उत्तर प्रदेश और उत्तर बिहार में, ताम्र के औजारों और काली एवं लाल मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल करने वाले लोगों से संघर्ष हुआ।

    पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उन्हें ऐसे लोगों का सामना करना पड़ा जो ताम्बे के औजारों के साथ गेरू या लाल रंग के बर्तन का इस्तेमाल करते थे।

    ➣ उन्हें उत्तर-हड़प्पाई संस्कृति के लोगों का भी सामना करना पड़ा। ग्रन्थों के संकलन के आधार से पता चलता है कि उत्तर-वैदिक लोगों ने इस क्षेत्र में मुण्डा भाषियों का भी सामना किया।

    उत्तर वैदिक अर्थव्यवस्था

    ➣ प्रारम्भिक वैदिक काल में मुख्य व्यवसाय पशुपालन था। उत्तर वैदिक काल में कृषि, लोगों का मुख्य व्यवसाय बन गया।

    कृषि

    ➣ कृषि का स्थान गौण था। लोगों को जौ , गेहूँचावल जैसी फसलों का ज्ञान था। जिसमे गेहूँचावल मुख्य फसल हुई।

    ➣ ऋग्वेद के चतुर्थ मण्डल में खेती की प्रक्रिया का वर्णन मिलता है। जिसमे कृषि का उल्लेख मात्र 24 बार हुआ है।

    ➣ यजुर्वेद के शतपथ ब्राह्मण में जुताई के अनुष्ठान पर विस्तृत चर्चा की गई है।

    ➣ ऋग्वेद में हांसिया , कोठार, चलनी (तिउत), सूप (शूर्प), अनाज का ओसने वाला (धान्यकृत) आदि शब्दों का उल्लेख मिलता है।

    ➣ वैदिक ग्रन्थों के अनुसार वैदिक लोग व्रीहि अर्थात चावल से परिचय सबसे पहले दोआब में हुआ।

    ➣ यजुर्वेद में 5 प्रकार के चावल का उल्लेख है – महाब्राहि, कृष्णव्रीहि, शुक्लव्रीही, आशुधान्य और हायन

    ➣ अथर्ववेद में उल्लेख मिलता है कि सर्वप्रथम पृथुवेन्य ने ही कृषि कार्य किया था।

    ➣ अथर्ववेद में 6,8 ,1224 बैलों को हल में जोते जाने का वर्णन मिलता है। लोहे के कृषि औजार कम पाए गए हैं। जुताई एक लकड़ी के बने हल से की जाती थी।

    ➣ अथर्ववेद में सिंचाई के लिए नहर खोदने तथा टिड्डियों द्वारा फसल नष्ट होने की जानकारी मिलती है।

    ➣ ऋग्वेद में दो प्रकार के सिंचाई का उल्लेख है- खनित्रिमा (खोदकर प्राप्त किया गया जल), स्वयंजा (प्राकृतिक जल)

    ➣ कहा जाता है, विदेह के राजा और सीता के पिता, जनक ने अपने हाथों से जुताई की। कृष्ण के भाई बलराम को हलधर या हल को धारण करने वाला कहा जाता है।

    बोधगया की एक मूर्तिकला में गौतम बुद्ध को बैलों के साथ हल चलाते हुए दर्शाया गया है।

    ➣ उत्तर वैदिक काल में व्यापार का विकास हुआ और व्यापारी श्रेणियों में संगठित हुए।

    निष्क, शतमान, पाद, कृष्णल आदि माप की इकाइयां थीं। बाट की मूलभूत इकाई कृष्णल थी। बाट की सबसे छोटी इकाई रत्तिका थी।

    ➣ व्यापार के दौरान लेनदेन का माध्यम निष्क के अलावा गाय बनाया जाता था।

    ➣ श्रमिक वर्ग के अन्तर्गत भूसी साफ़ करने वाले को उपप्रक्षणी कहा जाता था। भूमि की माप ईकाई खिल्य थी।

    ➣ वैदिक काल में हल को सिरा, जूते हुए खेत को उर्वराहल रेखा को सीता कहा जाता था।

    .धातुकर्म : लौह का उपयोग

    ➣ वैदिक लोग शुरुआती दौर से ही ताम्बे से परिचित थे। 1500 ई.पू. के तांबे के अत्यधिक मात्रा में औजार पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बिहार में मिले हैं।

    ➣ वैदिक लोग संभवत: राजस्थान के खेतड़ी की ताँबे की खानों का उपयोग करते थे।

    ➣ ताँबे की वस्तुएँ चित्रित धूसर मृदभांड स्थलों में पाई गई हैं। इनका उपयोग मुख्यत: युद्ध और शिकार के लिए होता था।

    ➣ गांधार क्षेत्र से मृतकों के साथ कब्रों में गाड़े गए लोहे के औजार अत्यधिक मात्रा में खुदाई से निकले हैं।

    ➣ इसी काल में पूर्वी पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश में लोहे का प्रयोग किया जाता था।

    ➣ लौह को श्याम या कृष्ण अयस (काला धातु) कहा जाता था।

    मृदभांड एवं शिल्प-कला

    उत्तर-वैदिक लोग चार प्रकार के मिट्टी के बर्तनों (मृदभांड) से परिचित थे:

    1. काला व लाल मृदभांड
    2. काली पॉलिशदार मृदभांड
    3. चित्रित धूसर मृदभांड
    4. लाल मृदभांड

    लाल मिट्टी के बर्तन सबसे लोकप्रिय थे और ये लगभग पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पाए गए।

    धूसर मृदभाण्ड संस्कृति के रचयिता मुख्यत: आर्यों को माना जाता है। सिंधु घाटी सभ्यता से लाल व गुलाबी मृदभाण्ड प्राप्त हुए हैं।

    ➣ सबसे विशिष्ट मृदभांड चित्रित भूरे प्रकार के होते थे जिनका उपयोग उच्च वर्ग के लोगों द्वारा किया जाता था।

    ➣ चित्रित भूरे बर्तन की परतों में मिले शीशे के ढेर और चूड़ियाँ सम्भवत: कुछ व्यक्तियों द्वारा प्रतिष्ठा की वस्तुओं के रूप में इस्तेमाल की गई होंगी।

    ➣ ग्रन्थों और उत्खनन, दोनों से शिल्प कला के बारे में पता चलता है। उत्तर-वैदिक ग्रन्थों में जौहरी या आभूषण निर्माताओं का भी उल्लेख किया गया है

    ➣ बुनाई व्यापक पैमाने पर होती थी लेकिन महिलाओं तक ही सीमित थी। चमड़े का काम, वर्तन और बढ़ईगीरी के काम में भी विकास हुआ।

    राजनीतिक संगठन

    ➣ उत्तर-वैदिक काल में ऋग्वैदिक कबीलाई सभाओं का महत्त्व कम हो गया तथा शाही सत्ता विस्तार हुआ।

    ➣ इस काल में विदथ संस्था लुप्त हो गई। साथ ही सभा और समिति का ढांचा बदल गया।

    ➣ सभा में महिलाओं का प्रवेश निषिद्ध हो गया। सभा अब कुलीन और पुरोहित वर्गों द्वारा नियन्त्रित होते थे।

    ➣ राज्यों के क्षेत्रफल बढ़ने के कारण राजा की शक्ति बढ़ने लगी। कबीले के अधिकार को सीमित कर दिया गया।

    ➣ प्रारंभिक काल में प्रत्येक क्षेत्र का नाम उस कबीले के नाम पर रखा गया जो वहाँ पहले बसे थे। प्रमुख कबीलों ने अपने नाम पर इलाकों का गठन किया।

    राष्ट्र शब्द, जिसका अर्थ क्षेत्र है, इसी समय आया। लोगों को नियन्त्रित करने की अवधारणा भी इसी वक्त दिखी।

    ➣ प्रारम्भिक काल में शारीरिक और अन्य विशेषताओं में सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति को राजा या कबीले का मुखिया चुना जाता था। जबकि उत्तर-वैदिक काल में राजा अब वंशानुगत हो गया।

    ➣ राजा के प्रभाव को अनुष्ठानों द्वारा सुदृढ़ किया जाता था। वे राजसूयअश्वमेध यज्ञ करते थे, जिससे उन्हें सर्वोच्च शक्ति प्राप्त होती थी।

    ➣ राजसूय का सर्वप्रथम उल्लेख ऐतरेय ब्राह्मण तथा अश्वमेध यज्ञ का शतपथ ब्राह्मण में मिलता है।

    ➣ राजसूय यज्ञ चक्रवर्ती राजा बनने के लिए किया जाता था। राज्यों को जीतने के पश्चात् राजसूय यज्ञ किया जाता था।

    अश्वमेध यज्ञ में राजा का छोड़ा गया घोड़ा जिन-जिन क्षेत्रों से गुज़रता था, उन सारे क्षेत्रों पर उस राजा का अधिकार माना जाता था। जिसमे विरोध करने पर उसे राजा से युद्ध करना पड़ता था।

    राजसूय यज्ञ , जो राजा के सिंहासनारोहण से, जबकि अश्वमेध यज्ञ राजनीतिक विस्तार से सम्बंधित यज्ञ था।

    ➣ राजसूय यज्ञ में 2,40,000 गायें दक्षिणा या उपहार के रूप दी जाती थीं।

    ➣ उत्तर वैदिक काल के लोग वाजपेय यज्ञ या रथ दौड़ भी करते थे, जिसमें घोड़े द्वारा खींचे गए शाही रथ का उपयोग रिश्तेदारों पर विजय हासिल करने के लिए किया जाता था। यह शौर्य प्रदर्शन एंव प्रजा के मनोजरन के लिए किये जाने वाला यज्ञ। था।

    ➣ यजुर्वेद में सर्वप्रथम राजसूय तथा वाजपेय यज्ञों का वर्णन मिलता है।

    ➣ इस काल में, कर और नजराने का संग्रह सामान्य हो गया था। जिसे संगृहित्री नामक अधिकारी के पास जमा किया जाता था। अर्थवेद के अनुसार राजा को 16वां भाग दिया जाता था।

    ➣ कर्तव्यों को पूरा करने के लिए राजा को पुजारी, सेनापति, महारानी और कुछ अन्य उच्च अधिकारी सहयोग प्राप्त था।

    ➣ निचले स्तर पर, प्रशासन सम्भवतः ग्रामीण सभाओं द्वारा संचालित होता था, जिसको समुदाय के प्रधान या नेता नियन्त्रित करते थे।

    ➣ उत्तर-वैदिक काल में भी राजा के पास स्थायी सेना नहीं थी। युद्ध के समय कबीले की इकाइयों को शामिल किया जाता था।

    सामाजिक संगठन

    ➣ भारत में वर्ण व्यवस्था व्यावसायिक श्रम विभाजन के आधार पर बनायी गयी थी। जिसने सामाजिक असमानताओं के चलते समय के साथ जाति का स्वरूप ले लिया।

    ऋग्वैदिक काल समाज कर्म के आधार पर तीन वर्गों में विभक्त था जो उत्तर वैदिक काल में जन्म के आधार पर चार वर्गों में विभक्त हो गया।

    ➣ उत्तर वैदिक काल का समाज चार वर्गों में विभक्त था- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। इस प्रकार, वैदिक आर्यों ने वर्ण व्यवस्था की शुरुआत की।

    ➣ शूद्र शब्द का उल्लेख ऋग्वेद के दसवें अध्याय में मिलता है। जिसे सबसे अन्त में जोड़ा गया है। ऋग्वेद के शेष भाग में कही भी वैश्य और शूद्र का वर्णन नहीं है।

    ➣ ऋग्वेद मे कहा गया कि ब्राह्मण परम-पुरुष के मुख से, क्षत्रिय उसकी भुजाओं से, वैश्य उसकी जाँघों से एवं शूद्र उसके पैरों से उत्पन्न हुआ है।

    ➣ ब्राह्मणों का उदय एक आश्चर्यजनक विकास है। बलि प्रथा ने ब्राह्मणों की शक्ति में काफी वृद्धि की।

    ➣ ब्राह्मण वर्ण अपने व अपने यजमानों के लिए धार्मिक अनुष्ठान व यज्ञ करते थे। वे युद्ध में अपने राजा की विजय के लिए प्रार्थना करते थे तथा राजा ने उनकी सुरक्षा का वचन दिया।

    क्षत्रिय वर्ण का स्थान दूसरा था। वे युद्ध, शासन व् राष्ट्र की रक्षा करते थे। शतपथ ब्राह्मण में एक स्थान पर क्षत्रियों को ब्राह्मणों से श्रेष्ठ कहा गया है।

    ➣ वैश्य आम लोगों में आते थे और उन्हें कृषि, पशुपालन आदि जैसे कार्य सौंपे गए। वैदिक काल में सिर्फ वैश्य आर्थिक सहायता-कर चुकाते थे।

    ➣ शूद्र को अन्य वर्गों का सेवक बतलाया गया है। वह दूसरे की इच्छा अनुसार काम करने वाला है।

    ➣ तीन उच्च वर्गों की एक सामान्य विशेषता थी-वे उपनयन संस्कार के अधिकारी थे अर्थात् वे वैदिक शिक्षा के साथ पवित्र धागा (जनेऊ) धारण कर सकते थे।

    स्थायी जीवन

    ➣ उत्तर-वैदिक काल में लोगों के भौतिक जीवन में काफी विकास हुआ। खानाबदोश और घुमन्तू जीवन का अन्त होने लगा।

    कृषि और विभिन्न शिल्प की कारीगरी उत्तर-वैदिक लोगों के जीवन को स्थिर बना दिया।

    ➣ विविध कलाओं और शिल्प-कौशल से सम्पन्न, वैदिक लोग ऊपरी गंगा के मैदानी इलाकों में स्थायी रूप से बस गए।

    ➣ लोग मिट्टी के बने ईंटों के घरों में रहते व लकड़ी के खम्भों वाले झोपड़ीनुमा मकानों में रहते थे।

    ➣ स्थलों से प्राप्त चूल्हे और अनाज (चावल) से पता चलता है कि चित्रित भूरे मृदभाण्ड के लोग उत्तर-वैदिक लोगों के समतुल्य थे, वे किसान एंव स्थायी जीवन जीते थे।

    ➣ वैदिक ग्रन्थों में समुद्र और समुद्री यात्राओं का भी उल्लेख मिलता है।

    प्रमुख 16 संस्कार

    1. गर्भाधान संस्कारसन्तान उत्पन्न करने हेतु पुरुष एवं स्त्री द्वारा की जाने वाली क्रिया।
    2. पुंसवन संस्कार गर्भधारण के तीसरे, चौथे तथा आठवें महीने में, पुत्र-प्राप्ति हेतु।
    3. सीमान्तोन्नयन संस्कारगर्भवती स्त्री के गर्भ की रक्षा हेतु।
    4. जातकर्म संस्कारजन्म के पश्चात् पिता द्वारा शिशु को आशीर्वाद देने एंव घृत या शहद चटाने का क्रम।
    5. नामकरण संस्कारशिशु का नाम रखा जाने का कार्यक्रम।
    6. निष्क्रमण संस्कारजन्म के 12वें दिन से लेकर चौथे महीने में, घर से बाहर लाने का कर्म (शिशु के पिता या मामा द्वारा)।
    7. अन्नप्राशन संस्कारइसमें शिशु को छठे मास में अन्न खिलाया जाता था।
    8. चूडाकर्म संस्कारशिशु का तीसरे से आठवें वर्ष के बीच, मुंडन केश मुंडन का कर्म (केवल बालकों तक सीमित)।
    9. कर्णवेध संस्काररोगों से बचने हेतु तथा आभूषण धारण करने हेतु , कान छेदने का कर्म।
    10. विद्यारंभ संस्कारपाँचवें वर्ष में , बच्चे को अक्षर-ज्ञान कराने का कर्म।
    11. उपनयन संस्कार यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण कर ब्रह्मचर्य आश्रम में प्रवेश। ज्ञान प्राप्ति हेतु।
    12. वेदारम्भ संस्कारवेद अध्ययन करने के लिए किया जाने वाला संस्कार।
    14. समावर्तन संस्कारविद्याध्ययन समाप्त कर घर लौटने पर किया जाता था। ब्रह्मचर्य आश्रम की समाप्ति का सूचक।
    15. विवाह संस्कारवर-वधू के परिणय-सूत्र में बँधने के समय किया जाने वाला संस्कार । गृह आश्रम में प्रवेश।
    16. अंत्येष्टि संस्कारनिधन के बाद होने वाला संस्कार, अंतिम संस्कार।

    ➣ चौथा वर्ण (शूद्र) को जनेऊ संस्कार और गायत्री मन्त्र के उच्चारण का अधिकार नहीं था। महिलाओं के लिए भी उपनयन और गायत्री मन्त्र वर्जित था।

    ➣ वैश्य सहायता-कर देने वाला कहलाता था, जिसे इच्छानुसार दंडित और प्रताड़ित भी किया जा सकता था।

    ➣ समाज में सबसे ख़राब स्थिति शूद्रों की थी। सामान्यतः उत्तर-वैदिक ग्रन्थों में, तीन उच्च वर्णों और शूद्रों के बीच विभाजन की रेखा खींच दी गई थी।

    ➣ यद्यपि राजा के राज्याभिषेक से जुड़े कई सार्वजनिक अनुष्ठानों में शूद्रहिस्सा लेते थे, सम्भवत: वे भी मूलतः आर्य समुदाय के वंशज माने जाते थे।

    रथकार या रथ निर्माता जैसे कुछ कारीगर वर्गों को उच्चाधिकार और जनेऊ धारण का अधिकार प्राप्त था।

    ➣ प्रारंभिक काल से परिवार में पिता का वर्चस्व था पिता अपने बेटे को भी अधिकार से वंचित कर सकता था। परिवार संयुक्त होता था।

    ➣ उत्तर-वैदिक काल में गोत्र नामक संस्था का उदय हुआ। जिसका शाब्दिक अर्थ गोशाला या वह स्थान, जहाँ पूरे कबीले के पशु रखे जाते थे , लेकिन समय के साथ यह एक ही पूर्वज के वंश का सूचक हो गया।

    ➣ लोगों ने गोत्र के अनुसार विजातीय विवाह प्रारम्भ कर दिया। एक ही गोत्र या वंश से सम्बन्धित व्यक्तियों के बीच कोई विवाह नहीं हो सकता था अर्थात सगोत्रीय विवाह प्रतिबंधित था।

    ➣ मनुस्मृति में विवाह के 8 प्रकारों का उल्लेख किया गया जिनमें प्रथम 4 विवाह प्रशंसनीय तथा शेष 4 निंदनीय माने जाते थे।

    विवाह के प्रकार

    ब्रह्म विवाह दहेज सहित उसी वर्ग के पुरुष के साथ। इसे सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
    दैव विवाहयज्ञकर्ता पुरोहित के साथ।
    आर्ष विवाह वर पक्ष को एक जोड़ी गाय और बैल देना होता था।
    प्रजापत्य विवाह बिना दहेज के वाला विवाह
    गन्धर्व विवाह माता-पिता की इच्छा के बिना होता था। प्रेम विवाह
    असुर विवाह वर या वधू का शुल्क दिया जाता था। यह ग्राम विवाह है।
    राक्षस विवाह कन्या का अपहरण कर बलपूर्वक विवाह।
    पैशाच विवाहमूर्छित अवस्था व मानसिक विक्षिप्तता में कन्या के शरीर पर अधिकार करने के पश्चात् होने वाला विवाह।
    1. ब्राह्मणों के लिए केवल प्रथम चार विवाह ही विहित थे।
    2. असुर विवाह केवल वैश्य एवं शूद्र वर्णों में प्रचलित था।
    3. गंधर्व विवाह मुख्य रूप से क्षत्रियों में प्रचलित था।
    4. राक्षस विवाह क्षत्रियों के लिए विहित माना गया था।
    5. राक्षस और पैशाच विवाह निंदनीय (अस्वीकृत) माने जाते थे।

    अनुलोम तथा प्रतिलोम विवाह

    ➣ अनुलोम उच्च वर्ग या जाति का व्यक्ति अपने से निचले वर्ग की कन्या के साथ विवाह करता था। जबकि प्रतिलोम उच्च वर्ग की कन्या का विवाह निचले वर्ग के व्यक्ति के साथ होता था। दोनों विवाह , अंतर्जातीय विवाह के उदहारण हैं।

    नियोग प्रथा

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    ➣ प्राचीन समाज में नियोग प्रथा का प्रचलन था, जिसमें किसी नि:संतान स्त्री अथवा विधवा को संतान प्राप्त करने के पवित्र उद्देश्य से अपने पति अथवा विधवा होने पर परिवार के अन्य सदस्य की सहमति से, पति के भाई अथवा किसी अन्य योग्य व्यक्ति से सम्बंध स्थापित करने की अनुमति थी।

    ➣ इसका उदाहरण महाभारत में मिलता है।

    आश्रम व्यवस्था

    ➣ प्रारंभिक वैदिक काल में आश्रमों या जीवन के चार चरण स्थापित नहीं हुए थे।

    ➣ उत्तर वैदिक काल में चार आश्रम व्यवस्था स्थापित हुई। ये हैं – ब्रह्मचारी या विद्यार्थी, गृहस्थ, वानप्रस्थ या सन्यास

    ➣ गृहस्थ आश्रम को सभी आश्रमों में श्रेष्ठ बताया गया है। इस आश्रम में पंच महायज्ञ , त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ ,काम ) तथा त्रि – ऋण से निवृत होना आवश्यक था।

    पंच महायज्ञ

    यज्ञ विवरण
    ब्रह्मयज्ञ वेदों और धार्मिक ग्रंथों का स्व-ध्ययन
    देवयज्ञ देवताओं का पूजन
    पितृयज्ञ तर्पण, पिण्डदान और श्राद्ध
    भूतयज्ञ अपने अन्न का कुछ भाग दूसरे जीव के लिए अर्पित करना
    अतिथियज्ञ अतिथि आदर से सत्कार करना एंव सेवा करना।
    ऋण विवरण
    ऋषि ऋण वैदिक ग्रंथो का ज्ञान फैलाना (शिव )
    पुत्र ऋण सन्तानोपत्ति करना (ब्रम्हा )
    देव ऋण धार्मिक अनुष्ठान व यज्ञ करना (विष्णु )

    ➣ सर्वप्रथम जाबालो उपनिषद में चार आश्रम बताये गए हैं जबकि छान्दोग्य उपनिषद में केवल तीन आश्रमों का उल्लेख मिलता है।

    ➣ मानव जीवन को 100 वर्ष मानते हुए प्रत्येक आश्रम की संभावित अवधि 25 वर्ष मानी गई।

    आश्रम आयुकार्यपुरुषार्थ
    ब्रह्मचर्य 0-25वेदों का अध्ययन , ज्ञान प्राप्ति धर्म व ज्ञान
    गृहस्थ25-50भौतिक सुखों का भोग करना अर्थ व काम
    वानप्रस्थ50-75विरक्त जीवन , ईश्वर का ध्यांन करना अध्यात्म ज्ञान
    सन्यास75-100गृहत्याग कर, तपस्यामोक्ष

    देवता, रीति-रिवाज और दर्शन

    ऋग्वैदिक काल में जिन भौतिक कारणों से देवताओं की पूजा की जाती थी अभी भी वह चलन में था हालाँकि, पूजा रीति-रिवाजों और अनुष्ठान में काफी बदलाव हुए।

    ➣ प्रार्थनाएँ पहले की तरह गाई जाती रहीं, परन्तु अब वे देवताओं को प्रसन्न करने के लिए मुख्य रीति नहीं थी। बलि रीति अधिक महत्त्वपूर्ण हो गए।

    ➣ ब्राह्मण द्वारा बलि-दान की रीतियां आविष्कृत, अधिगृहीत और विस्तारित होती थीं। ब्राह्मण ज्ञान एवं विशेषज्ञता के एकाधिकार का दावा करते थे।

    ➣ यज्ञ में बड़े पैमाने पर बलि दी जाती थी। जिसमें पशु धन नष्ट होते थे। इसमें अतिथि को गोघना या गोहन्ता कहा जाता था जिन्हें इन पशुओं का मांस खिलाया जाता था।

    ➣ बलि देने वाला बलि की रीति को बड़े ध्यान से सम्पन्न करता था। इस बलिकर्ता को यजमान कहा जाता था अर्थात यज्ञ करने वाला

    स्वामी विवेकानन्द ने वैदिक काल के रूढ़िवादी और गोमांस खाने वाले ब्राह्मणों का वर्णन किया है।

    ➣ ब्राह्मणों का आश्चर्यजनक विकास हुआ। बलि के उपहार स्वरूप दिए गए दान में, गायों के अलावा, सोने, कपड़े और घोड़े भी होते थे। कभी-कभी पुरोहित दक्षिणा के रूप में क्षेत्र के कुछ हिस्सों की माँग करते थे।

    ➣ वैदिक काल के अन्त में पुरोहित के वर्चस्व, और अनुष्ठानों के प्रभाव का कड़ा विरोध हुआ। ई.पू. 600 के आस-पास उपनिषदों का संकलन हुआ। इन दार्शनिक ग्रन्थों ने अनुष्ठानों की आलोचना की तथा सही मत एवं ज्ञान के मूल्यों पर जोर दिया।

    ➣ उपनिषदों ने बताया कि आत्मा या स्व का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए, आत्मा और ब्रह्म के सम्बन्ध को ठीक से समझा जाना चाहिए।

    पांचाल और विदेह के कुछ क्षत्रिय शासकों ने इस विचार को सराहा और पौरोहित्य-वर्चस्व वाले धर्म के सुधार के लिए वातावरण का निर्माण किया।

  • ऋग्वेदिक काल (1500-1000 ई. पू.) : आर्यों का प्रारंभिक जीवन और जनजातीय व्यवस्था

    📚 विषय सूची

    वैदिक संस्कृति

    सिंधु सभ्यता का पतन लगभग 1500 ई.पू. तक हो गया था इसके पश्चात् बाद एक नई सभ्यता प्रकाश में आयी जिसे वैदिक संस्कृति या वैदिक सभ्यता के नाम से जाना जाता है।

    ➣ चूँकि वैदिक सभ्यता के संस्थापक आर्य थे, इसलिए इसे आर्य सभ्यता भी कहा जाता है। यह सभ्यता मूलतः ग्रामीण थी।

    सिंधु सभ्यता का स्वरूप नगरीय था जबकि वैदिक सभ्यता ग्रामीण थी

    ➣ इस संभ्यता की सम्पूर्ण जानकारी वेदों से मिलती है। इसलिए इस काल को वैदिक काल भी कहा गया है। यह काल 1500 ई.पू. से 600 ई.पू. तक अस्तित्व में रहा।

    ➣ वैदिक- काल के अध्ययन के लिए दो प्रकार के साक्ष्य उपलब्ध हैं-

    पुरातात्विक स्रोत चित्रित धूसर मृदभांड, लोहा, निवास-स्थान।
    साहित्यिक स्रोत वेद (ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद , अथर्ववेद ), आरण्यक, उपनिषद्

    ➣ ज्ञातव्य हो हड़प्पावासी लौह से परिचित नहीं थे (केवल ताम्र व कांस्य)। लौह युग की शुरुवात सिंधु सभ्यता के पतन के बाद 1200 ई.पू. के बाद हुआ है।

    ➣ चार पुरातात्विक स्थलों की खुदाई जखेड़ा, हस्तिनापुर, नोह तथा अतरंजीखेड़ा में सर्वाधिक लौहास्त्र मिले हैं।

    ➣ वैदिक काल दो हिस्सों में विभाजित है-

    ऋग्वैदिक काल 1500-1000 ई.पू. आर्य संस्कृति व आगमन
    उत्तर वैदिक काल 1000-600 ई.पू. वेद एंव अन्य ग्रंथो की रचना

    ➣ ऋग्वैदिक काल में आर्य के उदय जबकि उत्तर वैदिक काल में आर्यों के विस्तार की जानकारी मिलती है।

    आर्य का शाब्दिक अर्थ श्रेष्ठ या कुलीन होता है। आर्यों के लिए द्विज शब्द का प्रयोग मिलता है जिसका अर्थ होता है दो बार जन्मा

    स्रोत

    ➣ आर्यों के आरंभिक इतिहास की जानकारी का मुख्य स्रोत ऋग्वेद है। इस वेद में आर्य शब्द का उल्लेख 36 बार हुआ है।

    ➣ भारत में आर्य ईरान से होते हुए आये थे। ऋग्वेद की कई तथ्य ईरानी भाषा के प्राचीनतम ग्रंथ अवेस्ता से मिलती हैं।

    ➣ आरम्भिक आर्यों का निवास भारत के पंजाब और हरियाणा के अलावा पूर्वी अफगानिस्तान और पाकिस्तान भी था।

    भारत में आर्यो का आगमन

    भारत में आर्यो का आगमन

    ➣ आर्यो के आगमन के विषय में विद्धानों में मतभेद है। आर्यों का मूल निवास आल्प्स पर्वत के पूर्वी भाग में बताया जाता है। जो वर्तमान में यूरेशिया कहलाता है।

    मैक्समूलर के अनुसार, आर्यों का निवास स्थान मध्य एशिया माना गया है जिसका उल्लेख लेक्चर्स ऑन द साइंस ऑफ़ लैंग्युएजेज में किया है।

    अविनाश चन्द्र द्रास की पुस्तक ऋग्वैदिक इंडिया में आर्यो का मूल निवास भारत में सप्त सैंधव प्रदेश को बताया गया है।

    स्वामी दयानन्द सरस्वती की पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश एवं इण्डियन हिस्टोरिकल ट्रेडिशन आर्यो के बारे में उल्लेख किया गया है जिसमे तिब्बत को आर्यो का मूल निवास स्थान माना गया है।

    बाल गंगाधर तिलक ने उत्तरी ध्रुव को आर्यो का मूल निवास माना है। जिसका वर्णन इनकी पुस्तक The Arctic Home of the Aryans में मिलता है। इसमें आर्यो का आगमन तिथि 6000 ई.पू. निर्धारित की गई है।

    प्राचीन नाम आधुनिक नाम
    क्रुमकुर्रम
    कुभाकाबुल
    वितस्ताझेलम
    आस्किनीचिनाब
    परुष्णीरावी
    सद्रिसतलज
    विपाशाव्यास
    सदानीरागंडक
    दृसद्वतीघग्घर
    गोमतीगोमल
    सुवस्तुस्वात्
    सिन्धुइण्डस
    डॉ.राजबली पाण्डेय भारत में मध्य देश
    एल.डी. कल्ला कश्मीर अथवा हिमालय प्रदेश
    श्री डी.एस. त्रिवेदी मुल्तान प्रदेश में देविका नदी
    जे.जी.रोड बैक्ट्रिया (अफ़ग़ानिस्तान )
    पी. गाइल्स न यूरोप डेन्यूब नदी की घाटी एवं हंगरी
    पेन्का जर्मनी
    एडवर्ड मेयर, ओल्डेनवर्ग, कीथ पामीर क्षेत्र, मध्य एशिया
    नेहरिंग एवं गार्डन चाइल्स दक्षिणी रूस

    ➣ वर्तमान समय में मैक्सूमूलन का मत सर्वाधिक मान्य हैं। मैक्समूलर के अनुसार इनके आगमन की तिथि 1500 ई.पू. है।

    भौगौलिक विस्तार

    ➣ प्राचीन आर्य लोग सप्त-सिंधु नाम के क्षेत्र में रहते थे, जिसका अर्थ 7 नदियों वाला क्षेत्र है। यह क्षेत्र मुख्यतय: दक्षिण एशिया के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र से लेकर यमुना नदी तक के क्षेत्र में फैला है।

    ➣ आर्यों के पांच कबीलों (अनु. द्रहु, पुरु, यदु, तुर्वस) को पंचजन अथवा पंचजन्य कहा जाता था। जिनका विस्तार भारतीय महाद्वीप के पश्चिमोत्तर तथा उत्तर-पूर्वी भागों में था।

    पंचजन क्षेत्र

    ऋग्वैदिक काल में पंचजन क्षेत्र

    सैंधव प्रदेश – 1. सिंधु, वितस्ता (झेलम), 3. असिकनी (चिनाब), 4. परूष्णी (रावी), 5. विपाशा (व्यास), 6. शुतुद्री (सतलज), 7. सरस्वती (घग्घर)।

    ➣ आर्यों की सबसे प्रमुख नदी सिंधु थी। जबकि सरस्वती नदी को नदीतम अर्थात् सर्वश्रेष्ठ नदी या सबसे पवित्र नदी कहा गया है।

    जनजातीय संघर्ष

    ➣ भारत आने पर आर्यों का दास और दस्यु नामक स्थानीय लोगों के साथ संघर्ष हुआ। ऋग्वेद में इनमें से बस्यु हत्या का उल्लेख बार-बार मिलता है।

    भरत, क्रिव एवं त्रित्सु आर्यों के शासक वंश थे तथा इनके पुरोहित वशिष्ठ थे। भरत कुल के नाम से ही इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा।

    ➣ इस कुल कबीले का उल्लेख सबसे पहले ऋग्वेद में मिलता है।

    ➣ भरत वंश के राजा सुदास तथा अन्य दस जनों- पुरु, यदु, तुर्वश, अनु, द्रह्म अकिन, पक्थ, भलानस, विषणिन और शिव के मध्य दाशराज्ञ यु़द्ध परुष्णी (रावी) नदी के किनारे लड़ा गया जिसमें सुदास को विजय मिली।

    ➣ इस युद्ध का कारण भरत वंश के राजा सुदास द्वारा अपने पुरोहित विश्वामित्र को निष्कासित कर उनके स्थान पर वशिष्ठ को नियुक्त करना था।

    ➣ ऋग्वेद के 7वें मंडल में दशराज्ञ युद्ध का उल्लेख है। जिसका एक कारण राज्य-विस्तार भी माना जाता है।

    ➣ उत्तर वैदिक काल में पराजित राजा पुरु और भरत के बीच मैत्री सम्बन्ध स्थापित होने से एक नवीन कुरु वंश की स्थापना की गयी।

    ➣ पराजित जनों में पुरूजन सबसे महान थे। उत्तर वैदिक काल में भरतों और पुरूओं के बीच मैत्री हो गई और दोनों ने मिलकर नया शासक कुल बनाया जो कुरू (भरत+पुरू) के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

    ➣ कुरू जनों ने पंचालों के साथ मिल कर उच्च गंगा मैदान में अपना संयुक्त राज्य स्थापित किया। यहां कुरू-पंचालों ने उत्तर वैदिक काल में बड़ा महत्व प्राप्त किया।

    आर्थिक जीवन शैली

    ➣ आर्यो के आर्थिक जीवन के बारे में अधिंकाश जानकारी ऋग्वेद से प्राप्त होती है।

    ➣ आर्यो के जीवन में रथों एंव घोंड़ो का अधिक महत्व था। जो भारत में उनकी सफलता के कारण माने जाते है।

    ➣ आर्यो के मुख्य व्यवसाय के रूप में पशुपालन का उल्लेख मिलता है। घोड़ा उन का प्रिय पशु था

    ➣ उन्हें कृषि का भी ज्ञान था सम्भवत: इसका प्रयोग चरागाह के लिए होता था।

    ➣ ऋग्वेद में अवि (भेड़), अजा (बकरी) का अनेक बार उल्लेख हुआ है। सम्भवत: आर्य लोग हाथी, बाघ, बतख, गिद्ध से आर्य लोग परिचित नहीं थे।

    ➣ ऋग्वेद में गाय को अघन्या कहा गया है अर्थात कभी न मारने योग्य। गाय का प्रयोग मुद्रा के रूप मे भी ईस्तमाल होता था।

    ➣ गाय को सर्वोत्तम धन माना जाता था। ऋग्वैदिक काल में आर्यों के अधिकांश युद्ध गाय को लेकर हुए हैं। ऋग्वेद में युद्ध का पर्याय गविष्टि अर्थात गायों की खोज

    ➣ ऋग्वैदिक काल में भूमि, निजी संपत्ति नहीं होती थी। लोग गाय चराने, खेती करने और बसने के लिए भूमि पर अधिकार करते थे,

    ➣ ऋग्वैदिक सभ्यता ग्रामीण सभ्यता थी। इस वेद में गव्य एवं गव्यति शब्द चारागाह के लिए प्रयुक्त है।

    ➣ आर्यों द्वारा जिस विस्तृत क्षेत्र का निर्माण किया उसे सप्त सैंधव प्रदेश कहा गया है।

    ➣ पुरोहितों को दक्षिणा के रूप में भूमि न देकर गायें और दासियाँ दी जाती थी।

    ➣ धातुकर्म की जानकारी थी। आर्यों द्वारा खोजी गयी धातु लोहा थी, जिसे स्याम अयस कहा जाता था।

    ➣ तांबा खेतड़ी राजस्थान से लाया जाता था। जिसका अन्य नाम अयस मिलता है।

    ➣ निष्क, शतमान, रजत, कृप्या स्वर्ण और चांदी की इकाइयां थी, जिसका प्रयोग मुना रूप में होता था।

    ➣ धनी व्यक्ति अथवा राजा को गोपति कहा जाता था युद्ध के लिए गविष्ट, गेसू, गव्य ओर गम्य शब्द प्रचलित थे।

    ➣ समय की माप के लिए गोधुल शब्द का प्रयोग किया जाता था। दूरी का मान के लिए गवयतु

    ➣ ऋग्वैदिक काल में बढ़ई, रथकार, बुनकर, चर्मकार, कुम्हार आदि शिल्पियों के उल्लेख मिलते हैं। चर्मकार एवं कुम्हार का भी उल्लेख मिलता है।

    ➣ वैदिककाल में निष्कशतमान नामक सिक्कों का उल्लेख है।

    अयस शब्द का उपयोग ऋग्वेद में करघा के लिए, ओत एवं तन्तु शब्द का प्रयोग ताने-बाने के लिए एवं शुध्यव शब्द का प्रयोग ऊन के लिए किया जाता था।

    ➣ ऋग्वेद में कपास का उल्लेख नहीं मिलता है। ऋग्वेद में हिरण्य एवं सुवर्ण शब्द का प्रयोग सोने के लिए जबकि तक्षनतष्ट शब्द का प्रयोग बढ़ई के के लिए किया गया है। निष्क सोने की मुद्रा थी।

    राजनीतिक संगठन

    ➣ ऋग्वैदिक काल का राजनीतिक ढाँचा आरोही क्रम में –

    सामाजिक संगठन की संरचना (वैदिक काल)

    कुल > ग्राम > विश > जन > राष्ट्र

    जनपति / राजा
    इकाई: जन
    (विशों का समूह)
    विशपति
    विश / वंश
    (ग्रामों का समूह)
    ग्रामणी
    ग्राम
    (परिवारों का समूह)
    कुलप
    कुल या परिवार
    (एक ही रक्त के लोगों का समूह)

    वृहतम इकाई जन व जबकि लघुतम इकाई कुल या परिवार

    ➣ ऋग्वैदिक काल में समाज कबीले के रूप में संगठित था जिसे जन भी कहा जाता था।

    ➣ जन का प्रशासन कबीले का मुखिया या प्रधान करता था, जिसे राजन अर्थात राजा कहा जाता था। उत्तर वैदिक काल तक राजा वंशानुगत हो जाता है।

    ➣ राजा कबीलों से सलाह से लेता था। राजा की सहायता हेतु पुरोहित, सेनानी, एवं ग्रामणी नामक प्रमुख अधिकारी थे।

    ➣ ऋग्वेद में सभा, समिति, विदाधा और गण जैसे कई कबीलाई आधारित जनसमूहों का उल्लेख है। जो विचार-विमर्श व सामरिक और धार्मिक आयोजन भी करते थे।

    ➣ राजा का मुख्य कर्तव्य मवेशियों की रक्षा करना, कबीले की रक्षा के लिए युद्ध करना तथा धन-धान्य के लिए कबीले की ओर से प्रार्थना करना था। इसके बदले में प्रजा राजा को स्वैच्छिक कर के रूप में बलि देती थी। उत्तर वैदिक काल में अनिवार्य हो गया था .

    ऋग्वेद के 10 वें मण्डल में राजा से राष्ट्र की रक्षा करने का कहा गया है।

    ➣ ऋग्वैदिक काल में राजा का चुनाव करने की वजह से अथर्ववेद में सभा और समिति को प्रजापति की दो पुत्रियाँ कहा गया है।

    सभा

    ➣ सभा की उत्पत्ति ऋग्वेद के उत्तरकाल में हुई थी। ऋग्वेद में 8 बार सभा की चर्चा की गई है।

    ➣ यह वुद्ध (श्रेष्ठ) एवं अभिजात (संभ्रान्त) लोगों की संस्था थीं। यह समिति की अपेक्षा छोटी थी।

    ➣ सभा में पुरुष सदस्यों के लिए सभेय शब्द तथा स्त्री सदस्यों के लिए सभावती शब्द प्रयुक्त हुआ है।

    ➣ इसका अध्यक्ष सभापति होता था। सभा का प्रमुख कार्य न्याय प्रदान करना था।

    समिति

    ➣ ऋग्वेद में समिति का उल्लेख 9 बार हुआ है। यह एक आम जनप्रतिनिधि सभा (केन्द्रीय राजनीतिक) थी।

    ➣ इस समिति के अध्यक्ष कोपति या ईशान कहा जाता था।

    ➣ समिति में राजकीय विषयों पर चर्चा होती थी तथा आपसी सहमति से निर्णय होता था।

    ➣ समिति का मुख्य कार्य राजा का निर्वाचन करना तथा उस पर नियन्त्रण रखना था।

    विदथ

    ➣ यह आर्यो की सबसे प्राचीन संस्था थी। इसे जनसभा भी कहा जाता था।

    ➣ ऋग्वेद में विद्थ शब्द का उल्लेख 122 बार हुआ है।

    ➣ रॉथ के अनुसार विदथ संस्था सैनिक असैनिक तथा धार्मिक कार्यो से संम्बद्ध थी।

    ➣ ऋग्वैदिक काल की सभा और विद्थ में स्त्रियाँ भी भाग लेती थीं। इस प्रकार, सभा, समिति, विद्थ वैदिक राजतंत्र में सहायक के रूप में काम करती थी।

    उत्तर वैदिक काल में यह संस्था लुप्त हो गयी थी।

    ➣ प्रशासन का सबसे महत्वपूर्ण अंग पुरोहित था। ऋग्वैदिक काल में जिन दो पुरोहितों ने प्रमुख भूमिका निभाई, वे- वशिष्ठ और विश्वामित्र थे। वशिष्ठ रूढ़िवादी और विश्वामित्र उदारवादी थे।

    विश्वामित्र ने आर्यों की समृद्धि के लिए गायत्री मन्त्र की रचना की।

    ➣ पुरोहित के पश्चात्, सेनानी या सेना प्रमुख का पद होता था। जो भाला, कुल्हाड़ी, तलवार आदि जैसे शस्त्र चलाना जानता था।

    ➣ राजा, किसी स्थायी सैन्य-बल का निर्माण नहीं करते थे। युद्ध के समय विभिन्न कबीलाई समूहों द्वारा सेना संगठित होती थीं, जिन्हें व्रत, गण, ग्राम, सरधा कहा जाता था।

    ➣ ऋग्वेद में युद्ध प्रायः धनुष-वाणों से होता था। ऋग्वेद में पुरपथरिष्णु का उल्लेख हुआ है,जो प्रायः दुर्गो को गिराने के लिए एक यन्त्र था।

    ➣ बड़े पैमाने पर भूमि या कृषि योग्य भूमि के प्रधान को व्रजपति कहा जाता था।

    ➣ परिवारों के प्रधान को कुलप, छोटे कबीलाई समुदाय को ग्राम कहा जाता था तथा ग्राम के मुखिया को ग्रामणी कहा जाता था।

    स्पश जनता की गतिविधियों को देखने वाली एक गुप्तचर संस्था होती थी।

    दूत समय समय पर सन्धि-विग्रह के प्रस्तावों को लेकर राजा के पास जाता था।

    कबीला एंव परिवार

    ➣ ऋग्वैदिक समाज की सबसे छोटी इकाई परिवार या कुल होती थी। समाज पितृसत्तात्मक था।

    ➣ ऋग्वेद में परिवार (कुल) शब्द का उल्लेख नाममात्र का उल्लेख मिलता है। आरम्भिक वैदिक काल में परिवार को गृह शब्द से बार-बार उल्लेखित किया गया है।

    ➣ कई परिवार मिलकर ग्राम या गोत्र तथा कई ग्राम मिलकर कबिले का निर्माण का निर्माण करते थे। जिसे जन कहा जाता था।

    ➣ व्यक्ति की पहचान उसके कुल या गोत्र से होती थी। लोगों की मूल आस्था अपनी जनजाति या कबीले के प्रति होती थी।

    ➣ ऋग्वेद में जन शब्द का उल्लेख लगभग 275 बार हुआ परन्तु जनपद या क्षेत्र शब्द का प्रयोग एक बार भी नहीं हुआ है।

    ➣ लोग जनजाति से जुड़े थे क्योंकि अभी तक न तो जमीन पर नियन्त्रण था और न ही साम्राज्य की स्थापना हुई थी।

    ➣ ऋग्वेद में कबीले के लिए प्रयुक्त एक अन्य महत्वपूर्ण शब्द विस है, जिसका उल्लेख वेद में 170 बार हुआ है । बहुसंख्यक वैश्य वर्ग का उदय विस या जनजातीय लोगों से ही हुआ है।

    परिवार संयुक्त होता था। परिवार का मुखिया पिता होता था। कई पीढ़ियाँ एक ही छत के नीचे रहती थी।

    ➣ परिवार में पिता, माता, गुरु, बड़ों और अतिथि का सत्कार करना पांच धार्मिक कर्तव्य माने जाते थे। जिसे पंच महायज्ञ कहा जाता था।

    ➣ पिता को पुत्र को दान अथवा बेचने का अधिकार प्राप्त था। परन्तु इसका यह तात्पर्य कदापि नहीं है कि पिता पुत्र का सबंध कट्टरवादी था।

    ➣ लोगों ने युद्ध लड़ने के लिए वीर पुत्रों की प्राप्ति के लिए देवताओं से प्रार्थना करते थे।

    ➣ ऋग्वेद में बच्चों और मवेशियों की वृद्धि की इच्छा बार बार उल्लेख मिलता है परन्तु पुत्रियों के लिए ऐसा कोई उल्लेख नहीं मिलता।

    ➣ महिलाएं अपने पति के साथ सभाओं में भाग लेती थीं और बलि चढ़ाती थीं।

    ➣ ऋग्वेद में नियोग-प्रथा और विधवा-पुनर्विवाह का उल्लेख मिलता है। परन्तु बाल-विवाह के कोई उदाहरण नहीं मिलता हैं, ऋग्वेद में विवाह योग्य आयु 16 से 17 बताई गई है।

    सामाजिक या वर्ण व्यवस्था

    ब्राह्मण
    (मुख से)
    क्षत्रिय
    (भुजा से)
    वैश्य
    (जंघा से)
    शूद्र
    (पैर से)

    वर्ण व्यवस्था का आधार कर्म था। जो उत्तरवैदिक काल में जन्म हो गया।

    ➣ वर्ण शब्द का प्रयोग रंग के लिए किया गया है और ऐसा लगता है कि इण्डो-आर्यन भाषी श्वेत वर्ण के थे जबकि मूल निवासी श्याम वर्ण के।

    ➣ ऋग्वेद में आर्य वर्ण और दास वर्ण का उल्लेख है। आर्यो को गौर वर्ण तथा दासों को कृष्ण वर्ण कहा जाता था।

    वर्ण शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद के 10वे मंडल के पुरुष सूक्त में हुआ जबकि जाति शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम महर्षि यास्क के निरुक्त में कृष्ण जाति के रूप में मिलता है।

    ➣ आर्यों द्वारा दास और दस्यु पर विजय प्राप्त करने के बाद गुलामों जैसा व्यवहार किया। जिससे जनजाति में सामाजिक असमानताएँ पनपी।

    ➣ जनजातीय प्रमुखों और पुजारियों ने लूट का बड़ा हिस्सा हासिल कर लिया और स्वाभाविक रूप से अपने रिश्तेदारों की तुलना में अधिक धनी हो गए,

    ➣ धीरे-धीरे कबीलाई समाज तीन तीन वर्गों में विभक्त हो गया – योद्धा, पुरोहित-वर्ग और आम -जनता। शूद्र -वर्ग ऋग्वैदिक काल के अन्त (उत्तर वैदिक काल) में सामने आया।

    ऋग्वैदिक काल में जाति या समाज (तीन वर्गों ) का निर्धारण कर्म के आधार पर होता था जबकि उत्तर वैदिक काल में जाति के आधार पर हुआ।

    ➣ ऋग्वेद काल में, व्यवसायों पर आधारित भेदभाव शुरू हो गया था। दासों का इस्तेमाल कृषि या अन्य उत्पादक गतिविधियों में सीधे नहीं किया जाता था।

    ➣ ऋग्वेद में एक ऐसे परिवार का उल्लेख है जिसमें एक सदस्य कहता है-मैं एक कवि हूँ, पिता वैद्य हैं और माता चक्की चलानेवाली है। विभिन्न तरीकों से जीवन-यापन कर हम एक साथ रहते हैं…।

    ऋग्वैदिक देवता

    ➣ 1400 ई.पू.योगाजकोई अभिलेखों में मितनी शासकों द्वारा वैदिक देवताओं इंद्र, वरुण, मित्र और नासत्व के आह्वान का उल्लेख मिलता है।

    ➣ ऋग्वेद में कई देवी-देवताओं का उल्लेख मिलता है। जिन्हें प्राकृतिक शक्तियों को आदर्श व प्रधान मानकर पूजा की जाती थी।

    ➣ ऋग्वेद में सबसे महत्वपूर्ण देव इन्द्र हैं, जिन्हें पुरन्दर या किले को तोड़ने वाला कहा गया है।

    ➣ इंद्र को 250 सूक्त (श्लोक) समर्पित हैं। उन्हें वृष्टि-देव माना जाता है, अर्थात् वर्षा कराने वाले देवता

    ➣ दूसरा स्थान अग्नि (अग्नि देव) का है, जिनके लिए 200 श्लोक समर्पित हैं। आग की भूमिका जंगल जलाने, खाना पकाने जैसे कार्यों में थी ।

    ➣ वैदिक काल में, अग्नि ने एक ओर देवताओं और दूसरी ओर लोगों के बीच मध्यस्थता का काम किया। अग्नि में होम की जाने वाली वस्तुएँ धुआँ के रूप में आकाश तक, अर्थात् देवताओं तक पहुँचती थी।

    ➣ तीसरा महत्वपूर्ण स्थान वरुण का था, जो जल के देवता थे। वरुण पर प्राकृतिक सन्तुलन बनाए रखने की जिम्मेदारी थी।

    सोम को पौधों का देवता माना जाता था, उनके नाम पर एक मादक पेय रखा गया था। इन्ही के नाम पर सोमरस पड़ा। ऋग्वेद का नवम् मण्डल सोम की स्तुति है।

    ➣ ऋग्वेद में पौधों से इस पेय को तैयार करने की विधि की व्याख्या की गई है,

    मरुत पवन,आँधी के देवता, पूषन को पशुओं का देवता तथा आश्विन को विपतियों को हरने वाला देवता कहा गया।

    पूषन ऋग्वैदिक काल में पशुओं के देवता थे जो उत्तर वैदिक काल में शूद्रों के देवता हो गये।

    ➣ ऋग्वेद में सरस्वती नदी को नदीतम अर्थात् सर्वश्रेष्ठ नदी या सबसे पवित्र नदी कहा गया है।

    ➣ ऋग्वेद में अदिति और उषा जैसी कुछ देवियों का उल्लेख है। जो सुबह की उपस्थिति में परिलक्षित मानी गई हैं, लेकिन वे ऋग्वेद काल में प्रमुख नहीं थीं।

    ➣ ऋग्वैदिक काल पितृसत्तात्मक प्रधान था , देवता की महत्ता देवियों से कहीं अधिक थी।

    ➣ प्रार्थना देवताओं की पूजा करने का प्रमुख तरीका होता था। देवताओं को सब्जी, जौ इत्यादि अर्पित किए जाते थे,

    ➣ हर जनजाति या कबीले का अपना अपना देवता होता था। ऐसा लगता है कि पूरी जनजाति के सदस्यों द्वारा समूह में देवताओं की प्रार्थना की जाती थी।

    ➣ ऋग्वैदिक काल में पूजा किसी भी अनुष्ठान या बलि के सूत्र के रूप में नहीं था। जितना कि बाद के उत्तर वैदिक काल में।

    ➣ ऋग्वैदिक काल लोगों ने देवताओं की पूजा अपने आध्यात्मिक उत्थान या जीवन के दुःख की समाप्ति के लिए नहीं, बल्कि भौतिक सुख जैसे-पुत्र, भोजन, धन, स्वास्थ्य, की कामना के लिए किया था।

    ऋग्वैदिक देवी-देवता

    देवीसम्बंधित क्षेत्र
    सावित्रीसूर्य को प्रेरणा प्रदान करने वाली देवी
    पृथ्वीजगत की माता
    ऊषाअरूणोदय (प्रातः काल) की देवी
    अदितिदेवों की महान माता; देवों की जननी; सृष्टि का मूल आधार
    सिंधुनदी देवी
    पुरापाधिउर्वरता की देवी
    रात्रिरात की देवी
    इलाआराधना की देवी
    अरण्यानीवन देवी
    दिशानवनस्पति की देवी
    आप:जल देवी
    सूर्यासूर्य देवता की पुत्री
    इन्द्रऋग्वेद का प्रमुख , युद्ध का नेता एवं वर्षा का देवता।
    अग्निदेवता एवं मनुष्य के बीच मध्यस्थ।
    वरुणपृथ्वी एवं सूर्य के निर्माता, समुद्र का देवता, सत्य का प्रतीक, ऋतु-परिवर्तन एवं दिन-रात का कर्ता।
    द्यौआकाश का देवता (सबसे प्राचीन)।
    सोमवनस्पति देवता।
    पर्जन्यवर्षा के देवता
    सूर्यतेज का देवता, विश्व के रक्षक, आकाश के सर्वश्रेष्ठ देवता।
    उषाप्रगति एवं उत्थान-देवता।
    आश्विनविपत्तियों को हरने वाले देवता
    पूषनआरम्भ में पशुओं का देवता जबकि उत्तर वैदिक काल में शूद्रों के देवता।
    मित्र प्रकाश का देवता, उदित होते हुए सूर्य को मित्र देवता कहा गया है।
    विष्णुविश्व के संरक्षक एवं पालनकर्ता।
    मारुतआँधी-तूफान का देवता।
  • हड़प्पा सभ्यता और वैदिक सभ्यता MCQ प्रश्न | SSC

    1. हड़प्पा के लोगों की सामाजिक पद्धति थी ?
    (a) उचित समतावादी
    (b) दास-श्रमिक आधारित
    (c) वर्ण आधारित
    (d) जाति आधारित
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 1999
    उत्तर-(a)
    हड़प्पा के लोगों की सामाजिक पद्धति उचित समतावादी थी। सैन्धव नगर अनेकानेक परम्पराओं और प्रथाओं की पृष्ठभूमि वाले अनेकानेक लोगों के सम्मिलन केन्द्र थे तथा समाज में किसी अन्तः संघर्ष के चिह्न हमें प्राप्त नहीं होते हैं।
    2.हड़प्पा की सभ्यता के बारे में कौन-सी उक्ति सही है?
    (a) उन्हें ‘अश्वमेध’ की जानकारी थी
    (b) गाय उनके लिए पवित्र थी
    (c) उन्होंने ‘पशुपति’ का सम्मान करना आरंभ किया
    (d) उनकी संस्कृति सामान्यतः स्थिर नहीं थी
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 1999
    उत्तर-(c)
    हड़प्पा सभ्यता के लोग मुख्यतः मातृदेवी की उपासना करते थे, साथ ही ‘पशुपति’ की उपासना भी करते थे। इस देवता के कई रूपों का अंकन हमें सैन्धव पुरावशेषों में परिलक्षित होता है। मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मुहर पर अंकित त्रिमुखी पुरुष को मार्शल ने ऐतिहासिक काल के शिव का प्राक्- रूप’ कहा है।
    3. सिंधु घाटी के घर किससे बनाए जाते थे?
    (a) ईंट
    (b) बांस
    (c) पत्थर
    (d) लकड़ी
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 2001
    उत्तर-(a)
    सिंधु घाटी संस्कृति की विशेषता इसकी नगर-योजना प्रणाली थी। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो दोनों नगरों के अपने-अपने दुर्ग थे, जहां शासक वर्ग के लोग रहते थे। प्रत्येक नगर में दुर्ग के बाहर एक-एक उससे निम्न स्तर का शहर था, जहां ईंटों के मकानों में सामान्य लोग रहते थे। इस संस्कृति के अधिकांश मकान ईंटों के बने थे।
    4. सिंधु घाटी सभ्यता के शहरों की गलियां थीं-
    (a) चौड़ी और सीधी
    (b) तंग और मैली
    (c) फिसलन वाली
    (d) तंग और टेढ़ी
    S.S.C.F.C.I. परीक्षा, 2012
    उत्तर-(a)
    सिंधु घाटी सभ्यता में शहरों की गलियां चौड़ी और सीधी होती थीं। यहां की सड़कें पूर्व से पश्चिम एवं उत्तर से दक्षिण की ओर जाती हुई एक दूसरे को समकोण पर काटती थीं।
    5.हड़प्पा के निवासी-
    (a) ग्रामीण थे
    (b) शहरी थे
    (c) यायावर ( खानाबदोश ) थे
    (d) जनजातीय थे
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2001
    उत्तर-(b)
    हड़प्पा सभ्यता एक नगरीय सभ्यता थी अतः यहां के अधिकांश निवासी शहरी थे।
    6.हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के खंडहर निम्नांकित में से किस नदी के तट पर पाए जाते हैं ?
    (a) रावी
    (b) झेलम
    (c) व्यास
    (d) सतलज
    S.S.C. (स्टेनोग्राफर) ग्रेड ‘डी’ परीक्षा, 2005, 2010
    उत्तर – (*)
    हड़प्पा रावी नदी के किनारे पर, जबकि मोहनजोदड़ो सिन्धु नदी के किनारे पर अवस्थित है।
    7. हड़प्पा-वासी किस वस्तु के उत्पादन में सर्वप्रथम थे ?
    (a) मुद्राएं
    (b) कांसे के औजार
    (c) कपास
    (d) जौ
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2001
    उत्तर-(c)
    सर्वप्रथम कपास का उत्पादन हड़प्पा-वासियों ने किया था। कपास सैंधव लोगों की मूल फसल थी। इसी कारण यूनानी सिंधु सभ्यता को सिंडन (Sindon) कहने लगे, जो सिंधु शब्द से निकला है।
    8. सिंधु घाटी की खुदाई में मिले अवशेषों में तत्कालीन व्यापारिक और आर्थिक विकास के द्योतक निम्न में से कौन से हैं?
    (a) मिट्टी के बर्तन
    (b) मुद्राएँ
    (c) नावें
    (d) मकान
    S.S.C. CPO परीक्षा, 2003
    उत्तर-(b)
    सिंधु सभ्यता के लोगों के जीवन में व्यापार का बड़ा महत्त्व था। इसकी पुष्टि हड़प्पा, मोहनजोदड़ो और लोथल में अनाज के बड़े-बड़े कोठारों के पाये जाने से ही नहीं होती, बल्कि बड़े भू-भाग में ढेर सारी मिट्टी की मुहरों, एक रूप लिपि और मानकीकृत माप-तौल प्रणाली के अस्तित्व से भी होती है। हड़प्पाई लोग सिंधु सभ्यता क्षेत्र के भीतर पत्थर, धातु, हड्डी आदि का व्यापार करते थे। ये लोग अपने तैयार माल को पड़ोस के इलाकों में लिए नावों और बैलगाड़ियों का प्रयोग करते थे। बहुत सी हड़प्पाई मुहरें मेसोपोटामिया की खुदाई में निकली हैं जिससे प्रतीत होता है कि हड़प्पाई लोगों ने मेसोपोटामियाई नागरिकों के कई प्रसाधनों का अनुकरण किया है। अत: अवशेषों की खुदाई में प्राप्त मुद्राओं से इस सभ्यता के व्यापार एवं आर्थिक गतिविधि का पता चलता है।
    9.हड़प्पा की सभ्यता किस युग की थी?
    (a) कांस्य युग
    (b) नवपाषाण युग
    (c) पुरापाषाण युग
    (d) लौह युग
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2001
    उत्तर-(a)
    हड़प्पा की सभ्यता का संबंध कांस्य युग से था।
    10. सिंधु घाटी की सभ्यता के लोगों का मुख्य व्यवसाय क्या था ?
    (a) व्यापार
    (b) पशु-पालन
    (c) शिकार
    (d) कृषि
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2001
    उत्तर-(d)
    सिंधु सभ्यता के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था। कृषि के अधिशेष उत्पादन ने ही उन्हें व्यापार करने के लिए प्रोत्साहित किया जिससे कि व्यापार व्यवसाय उन्नत अवस्था में पहुँचा।
    11. सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि कौन-सी है?
    (a) तमिल
    (b) खरोष्ठी
    (c) अज्ञात
    (d) ब्राह्मी
    S.S.C. संयुक्त हायर सेकण्डरी (10+2) स्तरीय परीक्षा, 2013
    उत्तर-(c)
    सिंधु लिपि में लगभग 64 मूल चिन्ह 250 से 400 तक अक्षर हैं जो सेलखड़ी की आयताकार मुहरों, तांबे की गुटिकाओं आदि पर मिलते हैं। यह लिपि चित्रात्मक थी। यह लिपि अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है।
    12. बिना दुर्ग के एक मात्र सिंधु नगर कौन-सा था?
    (a) कालीबंगन
    (b) हड़प्पा
    (c) मोहनजोदड़ो
    (d) चन्हुदड़ो
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 2005
    उत्तर-(d)
    चन्हुदड़ो बिना दुर्ग का एक मात्र सिंधु नगर है। यह सिंधु नदी के बायें तट पर स्थित है। यहां से बड़ी मात्रा में प्रसाधन सामग्री मिली है। यह एक औद्योगिक नगर था। मैके ने यहां से मनके बनाने का कारखाना ढूंढ़ा।
    13. भारत में खोजा गया सबसे पहला पुराना शहर था-
    (a) हड़प्पा
    (b) पंजाब
    (c) मोहनजोदड़ो
    (d) सिंघ
    S.S.C. CPO परीक्षा, 2003
    उत्तर-(a)
    भारत में खोजा गया सबसे पहला पुराना शहर हड़प्पा था। हड़प्पा की जब खोज (1921 ई.) हुई थी तब यह अखण्ड भारत का भाग था, वर्तमान में यह पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त में अवस्थित है। हड़प्पा क्षेत्रफल की दृष्टि से सिंधु सभ्यता का दूसरा सबसे बड़ा स्थल है जबकि मोहनजोदड़ो क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा नगर है। यह 250 हेक्टेयर में बसा था।
    14. मोहनजोदड़ो में सबसे बड़ा भवन कौन-सा है ?
    (a) विशाल स्नानागार
    (b) धान्यागार
    (c) सस्तंभ हॉल
    (d) दो मंजिला मकान
    S.S.C.F.C.I. परीक्षा, 2012
    उत्तर-(b)
    मोहनजोदड़ो का विशाल स्नानागार वहां पाया गया सबसे बड़ा स्मारक था। इसकी उत्तर से दक्षिण की ओर लंबाई 54.85 मीटर तथा पूर्व से पश्चिम की ओर चौड़ाई 32.90 मीटर थी। मोहनजोदड़ो का धान्यागार 45.72 मीटर लंबा तथा 22.86 मीटर चौड़ा था जो कि वहां का सबसे बड़ा भवन था।
    15. पुरालेख विद्या का अभिप्राय है-
    (a) सिक्कों का अध्ययन
    (b) शिलालेखों का अध्ययन
    (c) महाकाव्यों का अध्ययन
    (d) भूगोल का अध्ययन
    S.S.C. CPO परीक्षा, 2003
    उत्तर-(b)
    पुरालेख विद्या का अभिप्राय शिलालेखों के अध्ययन से है।
    16. ‘अपवाह तंत्र’ का निर्माण- सबसे पहले निम्नलिखित में से किस सभ्यता के लोगों ने किया था?
    (a) मिस्री सभ्यता के लोगों ने
    (b) सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों ने
    (c) चीनी सभ्यता के लोगों ने
    (d) मेसोपोटामिया सभ्यता के लोगों ने
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2002
    उत्तर-(b)
    अपवाह तंत्र (Drainage System) का सर्वप्रथम निर्माण सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों ने किया था।
    17. पैमानों की खोज ने यह सिद्ध कर दिया है कि सिंधु घाटी लोग माप और तौल से परिचित थे। यह खोज कहां पर हुई ?
    (a) कालीबंगन
    (b) हड़प्पा
    (c) चन्हुदड़ो
    (d) लोथल
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 1999
    उत्तर- (d)
    माप-तौल से संबंधित साक्ष्य मोहनजोदड़ो और लोथल से प्राप्त हुए हैं। लोथल से हाथी दांत का बना मापक मिला है। यहां से गोदीवाड़ा (Duck-yard) का भी साक्ष्य मिला है।
    18. निम्नलिखित में से किस द्रव्य का उपयोग हड़प्पा-काल की मुद्राओं के निर्माण में मुख्य रूप से किया गया था?
    (a) टेराकोटा
    (b) कांसा
    (c) तांबा
    (d) लोहा
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2000, 2002
    उत्तर-(a)
    हड़प्पा काल की मुद्राओं के निर्माण में मुख्य रूप से सेलखड़ी का प्रयोग किया गया इसके अतिरिक्त मिट्टी, चर्ट, गोमेद आदि का भी प्रयोग किया जाता था। मिट्टी से बनी आकृतियों को टेराकोटा कहा जाता है। अतः उपर्युक्त विकल्प
    (a) होगा।
    19. सिंधु घाटी के लोगों की एक महत्त्वपूर्ण रचना निम्नलिखित में से किसकी मूर्ति थी ?
    (a) नटराज
    (b) नृत्य करती हुई बालिका
    (c) बुद्ध
    (d) नरसिम्हा
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2006
    उत्तर-(b)
    सिंधु घाटी के लोगों की एक महत्त्वपूर्ण रचना नृत्य करती हुई बालिका की मूर्ति है जो कांसे से निर्मित है। यह मूर्ति मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुई है।
    20. देवी माता की पूजा सम्बन्धित थी –
    (a) आर्य सभ्यता के साथ
    (b) भूमध्यसागरीय सभ्यता के साथ
    (c) सिन्धु घाटी सभ्यता के साथ
    (d) उत्तर वैदिक सभ्यता के साथ
    S.S.C.F.C.I. परीक्षा, 2012
    उत्तर-(c)
    देवी माता या मातृ देवी की पूजा सिंधु घाटी सभ्यता का एक विशिष्ट लक्षण था। पुरातात्विक साक्ष्यों से प्राप्त मातृदेवी की मृण्मूर्तियों से इस बात का ज्ञान होता है।
    21. निम्नलिखित में से कौन हड़प्पा संस्कृति के अध्ययन के साथ संबद्ध नहीं है?
    (a) चार्ल्स मैसन
    (b) कनिंघम
    (c) एम. व्हीलर
    (d) पी. एस. वत्स
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2000
    उत्तर- (d)
    हड़प्पा संस्कृति के अध्ययन के साथ चार्ल्स मैसन, कनिंघम और मार्टीमर ह्वीलर जुड़े थे। पी. एस. वत्स का इससे कोई संबंध न था, बल्कि माधो स्वरूप वत्स द्वारा हड़प्पा का अध्ययन किया गया था।
    22. कालीबंगा किस प्रदेश में विद्यमान है?
    (a) उत्तर प्रदेश
    (b) सिन्ध
    (c) राजस्थान
    (d) गुजरात
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 1999
    उत्तर-(c)
    कालीबंगा राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में घग्घर नदी के बायें किनारे पर स्थित सैंधव सभ्यता का एक महत्त्वपूर्ण स्थल है। कालीबंगा के लोग एक ही खेत में दो फसलें उगाना जानते थे। यहां से भूकंप आने के प्राचीनतम साक्ष्य मिलते हैं।
    23. निम्नलिखित विद्वानों में से हड़प्पा सभ्यता का सर्वप्रथम खोजकर्ता कौन था ?
    (a) सर जॉन मार्शल
    (b) आर.डी. बनर्जी
    (c) ए. कनिंघम
    (d) दयाराम साहनी
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 1999
    उत्तर-(d)
    हड़प्पा के टीले का सर्वप्रथम उल्लेख 1826 ई. में चार्ल्स मैसन ने किया था। 1912 ई. में जे. एफ. फ्लीट ने यहां से प्राप्त की गयी सामग्रियों पर रायल एशियाटिक सोसायटी द्वारा प्रकाशित पत्रिका में एक लेख प्रकाशित किया। जनरल कनिंघम ने 1853 तथा 1873 ई. में इसका सर्वेक्षण कर कुछ पुरावस्तुएं प्राप्त की। कनिंघम एवं फ्लीट हड़प्पा के पुरातात्विक महत्त्व का सही-सही मूल्यांकन करने में असमर्थ रहे। 1921-22 ई. में सर जान मार्शल के निर्देशन में दयाराम साहनी ने पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में तत्कालीन मांटगोमरी, सम्प्रति शाहीवाल जिले में स्थित हड़प्पा | सभ्यता के पुरातात्विक महत्त्व को उजागर किया।
    24. हड़प्पा सभ्यता की खोज किस वर्ष में हुई थी?
    (a) 1935
    (b) 1942
    (c) 1901
    (d) 1922
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 2004
    उत्तर-(d)
    उपर्युक्त प्रश्न की व्याख्या देखे।
    25. सिंधु घाटी सभ्यता का पत्तन नगर (बन्दरगाह) कौन-सा है?
    (a) कालीबंगन
    (b) लोथल
    (c) रोपड
    (d) मोहनजोदड़ो
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 1999
    S.S.C. स्टेनोग्राफर परीक्षा, 2011
    उत्तर-(b)
    लोथल अहमदाबाद (गुजरात) जिले में सरगवल (Saragvala) नामक ग्राम के समीप स्थित है। 1955 तथा 1962 के मध्य यहां एस. आर. राव के निर्देशन में खुदाई की गयी जहां दो मील के घेरे में बसे हुए एक नगर के अवशेष प्राप्त हुए। यह छः खण्डों में विभक्त था। यहां ऊंचे चबूतरे, रक्षा प्राचीर, सड़क तथा मकानों के अवशेष मिले हैं। यहां की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि पकी ईंटों का बना हुआ विशाल आकार (214×36 मीटर) का एक घेरा है जिसे राव महोदय ने ‘जहाजों की गोदी’ बताया है। इस प्रकार लोथल एक पत्तन नगर था। यह भोगवा नदी के किनारे स्थित था। लोथल में दो भिन्न-भिन्न टीले नहीं मिलते। पूरी की पूरी बस्ती एक ही दीवार से घिरी थी।
    26. लोयल नामक स्थान पर, निम्नोक्त सभ्यताओं में से किसका जहाजी मालघाट था?
    (a) सिंधु घाटी
    (b) मेसोपोटामियाई
    (c) मिस्री
    (d) फारसी
    S.S.C. Section Off. परीक्षा, 2006
    उत्तर-(a)
    लोथल नामक स्थान पर सिंधु घाटी सभ्यता का जहाजी मालघाट था।
    27. सिंधु सभ्यता के टेराकोटा में निम्नलिखित में से कौन-सा पालतू जानवर विद्यमान नहीं था?
    (a) भैंस
    (b) भेड़
    (c) गाय
    (d) सूअर
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 2005
    उत्तर-(c)
    सिंधु सभ्यता के टेराकोटा (मिट्टी से बनी आकृतियों) में गाय की आकृति का कोई साक्ष्य मौजूद नहीं है। अन्य दिये गये सभी जानवरों का इस संदर्भ में साक्ष्य मौजूद है।
    1. निम्नलिखित में से किस वेद में प्राचीन वैदिक युग की सभ्यता के बारे में सूचना दी गई है?
    (a) ऋग्वेद
    (b) यजुर्वेद
    (c) अथर्ववेद
    (d) सामवेद
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 1999
    उत्तर – (a )
    ऋग्वेद भारतीय आर्यों की ही नहीं अपितु समस्त आर्य जाति की प्राचीनतम रचना है, यह भारत तथा भारतोत्तर प्रदेश के आर्यों के इतिहास, भाषा, धर्म एवं उनकी सामान्य संस्कृति पर प्रकाश डालता है। इसमें 10 मण्डल तथा 1028 सूक्त हैं।
    2. वैदिक गणित का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है-
    (a) शतपथ ब्राह्मण
    (b) अथर्ववेद
    (c) शुल्वसूत्र
    (d) छान्दोग्य उपनिषद्
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 2000
    उत्तर-(c)
    वैदिक गणित का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ शुल्वसूत्र है, इसमें यज्ञस्थल तथा अग्नि वेदी के निर्माण तथा माप से संबंधित नियम वर्णित हैं।
    3. वैदिक आर्यों का प्रमुख भोजन था-
    (a) जौ और चावल
    (b) दूध और इसके उत्पाद
    (c) चावल और दालें
    (d) सब्जियां और फल
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2008
    उत्तर-(b)
    वैदिक आर्यों के भोजन में दूध, घी, दहीं आदि का प्रमुख महत्त्व था। ऋग्वेद में दूध में यव (जौ) डाल कर क्षीर पकोदन तथा दही में बनने वाले पनीर का उल्लेख मिलता है। जौ के सत्तू को दही में डालकर करंभ नामक भोज्य पदार्थ तैयार किया जाता था। ऋग्वेद में चावल और नमक का उल्लेख नहीं है।
    4.निम्नलिखित में से कौन-सा अन्न मनुष्य द्वारा सबसे पहले प्रयोग होने वालों में से था?
    (a) जौ (यव)
    (b) जई (ओट)
    (c) राई
    (d) गेहूं
    S.S.C. संयुक्त स्नातक स्तरीय परीक्षा, 2012
    उत्तर-(a)
    मनुष्य द्वारा सर्वप्रथम जौ (यव) का प्रयोग करने के साक्ष्य प्राप्त होते हैं।
    5. वैदिक लोगों द्वारा किस धातु का प्रयोग पहले किया गया था?
    (a) चांदी
    (b) सोना
    (c) लोहा
    (d) तांबा
    S.S.C. Tax Asst. परीक्षा 2007
    उत्तर- (d)
    ऋग्वैदिक लोगों द्वारा सर्वप्रथम तांबे का प्रयोग किया गया था। ऋग्वेद में आयस नामक धातु का उल्लेख है किंतु इसकी पहचान संदिग्ध है। कुछ विद्वान इसे तांबा, कांसा, या लोहा बताते हैं। किंतु ऋग्वैदिक आर्य लोहे से परिचित नहीं थे।
    6.’वेद’ शब्द का अर्थ है-
    (a) ज्ञान
    (b) बुद्धिमत्ता
    (c) कुशलता
    (d) शक्ति
    S.S.C. Tax Asst. परीक्षा, 2007
    उत्तर- (a)
    ‘वेद’ शब्द का अर्थ ज्ञान होता है।
    7. आर्य, आर्य-पूर्वी के साथ अपने संघर्षों में सफल रहे, क्योंकि-
    (a) उन्होंने बड़े पैमाने पर हाथियों का प्रयोग किया
    (b) वे अधिक लंबे और अधिक बलवान थे
    (c) वे एक उन्नत शहरी संस्कृति से थे
    (d) उन्होंने घोड़ों द्वारा चलाए जा रहे रथों का प्रयोग किया
    S.S.C. संयुक्त हायर सेकण्डरी (10+2) स्तरीय परीक्षा, 2010
    उत्तर-(d)
    आर्य, आर्य-पूर्वो के साथ अपने संघर्षों में सफल रहे इसका प्रमुख कारण उन्होंने घोड़ों द्वारा चलाए जा रहे रथों का प्रयोग किया।
    8. इनमें से किस फसल का ज्ञान, वैदिक काल के लोगों को नहीं था?
    (a) जौ
    (b) गेहूं
    (c) चावल
    (d) तम्बाकू
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2001
    उत्तर-(d)
    वैदिक काल के लोगों को तम्बाकू फसल का ज्ञान नहीं था। भारत में तंबाकू पुर्तगालियों द्वारा ब्राजील से लाया गया।
    9.आर्य सभ्यता में मनुष्य के जीवन के आयु के आरोही क्रमानुसार निम्नलिखित चरणों में से कौन-सा विकल्प सही है?
    (a) ब्रह्मचर्य-गृहस्थ-वानप्रस्थ-सन्यास
    (b) गृहस्थ- ब्रह्मचर्य वानप्रस्थ-सन्यास
    (c) ब्रह्मचर्य- वानप्रस्थ -सन्यास- गृहस्थ
    (d) गृहस्थ-सन्यास- वानप्रस्थ ब्रह्माचर्य
    S.S.C. (डाटा एंट्री ऑपरेटर) परीक्षा, 2009
    उत्तर-(a)
    हिन्दू धर्म में मानव जीवन को चार आवस्थाओं में विभाजित कर आश्रम व्यवस्था का प्रावधान किया गया है। हिन्दू धर्मशास्त्र मनुष्य की आयु सौ वर्ष मानते हैं तथा प्रत्येक आश्रम के निमित्त 25-25 वर्ष की अवधि निर्धारित करते हैं। यथा-ब्रह्मचर्य के लिए आरंभिक अवस्था से 25 वर्ष तक, गृहस्थ के लिए 25 वर्ष से 50 वर्ष, वानप्रस्थ के लिए 50 वर्ष से 75 वर्ष तथा सन्यास के लिए 75 वर्ष से 100 वर्ष तक जाबालोपनिषद में सर्वप्रथम चारों आश्रमों का उल्लेख मिलता है।
    10. प्रारंभिक आर्यों के बारे में निम्नोक्त कथनों में से कौन-सा सही नहीं है?
    (a) वे संस्कृत बोलने वाले थे
    (b) वे घुड़सवारी किया करते थे
    (c) वे कई झुण्डों में भारतवर्ष पहुँचे
    (d) वे मुख्यतः नगरों में निवास करते थे
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2001
    उत्तर-(d)
    प्रारंभिक आर्य मुख्यतः गांवों में निवास करते थे नगरों में नहीं।
    11. आरंभिक वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था आधारित थी –
    (a) शिक्षा पर
    (b) जन्म पर
    (c) व्यवसाय पर
    (d) प्रतिमा पर
    S.S.C. स्टेनोग्राफर परीक्षा, 2011
    S.S.C. संयुक्त हायर सेकण्डरी (10+2) स्तरीय परीक्षा, 2010
    उत्तर-(c)
    आरंभिक वैदिक काल में वर्णव्यवस्था व्यवसाय पर आधारित थी। ऋग्वेद के नवें मण्डल में एक स्थान पर उल्लेख मिलता है कि मेरे पिता वृषज (वैद्य) हैं, मेरी माता चक्की चलाने वाली और मैं कवि हूँ।
    12.ऋग्वैदिक आर्य पशुचारी लोग थे, यह इस तथ्य से पुष्ट होता है, कि
    (a) ऋग्वेद में गाय के अनेक संदर्भ हैं
    (b) अधिकांश युद्ध गायों के लिए लड़े गए थे
    (c) पुरोहितों को दिए जाने वाला उपहार प्रायः गायें होती थीं, न कि जमीन
    (d) उपर्युक्त सभी
    S.S.C. संयुक्त हायर सेकण्डरी (10+2) स्तरीय परीक्षा, 2010
    उत्तर-(d)
    ऋग्वेद में गाय और सांड की इतनी चर्चा है कि ऋग्वैदिक आर्यों को मुख्य रूप से पशुचारक कहा जा सकता है। उनकी अधिकांश लड़ाईयां गाय को लेकर हुई हैं। ऋग्वेद में युद्ध का पर्याय गविष्टि (गाय का अन्वेषण) है। गाय सबसे उत्तम धन मानी जाती थी। जहां | कहीं पुरोहितों को दी जाने वाली दक्षिणा की बात आई उसमें आम तौर पर गायें और दासियां होती थीं और भूमि कभी न होती थी। ऋग्वैदिक लोग गाय चराने, खेती करने और बसने के लिए जमीन पर कब्जा करते होंगे परंतु भूमि निजी संपत्ति नहीं होती थी।
    13. ‘आर्यों को एक जाति कहने वाला पहला यूरोपियन कौन था?
    (a) सर विलियम जोन्स
    (b) एच. एच. विल्सन
    (c) मैक्समूलर
    (d) जनरल कनिंघम
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 2006
    उत्तर-(c)
    मैक्समूलर महोदय आर्यों का आदि देश मध्य एशिया, रोड्स, बैक्ट्रिया को मानते हैं। मूलर के अनुसार पामीर के पठार से ही इण्डो-ईरानी जाति पूर्व में पंजाब तथा पश्चिम में मेसोपोटामिया की ओर गयी।
    14. वैदिक युग में राजा अपनी जनता से जो कर वसूल करते थे, उसे क्या कहते थे?
    (a) बलि
    (b) विदथ
    (c) वर्मन
    (d) कर
    S.S.C. (डाटा एंट्री) परीक्षा, 2008
    उत्तर-(a)
    वैदिक युग में राजा अपनी जनता से जो कर वसूल करते थे उसे ‘बलि’ कहा जाता था, ‘बलि’ को संग्रहीत करने वाला अधिकारी भागदुध या भागद्ग कहलाता था जबकि ‘संग्रहिता कोषाध्यक्ष का कार्य संभालते थे।
    15. प्रसिद्ध ‘गायत्री मंत्र कहां से लिया गया है?
    (a) यजुर्वेद
    (b) अथर्ववेद
    (c) ऋग्वेद
    (d) सामवेद
    S.S.C. स्टेनोग्राफर (ग्रेड’सी’ एवं ‘डी’) परीक्षा, 2012
    उत्तर-(c)
    प्रसिद्ध ‘गायत्री मंत्र’ ऋग्वेद के तृतीय मंडल से लिया गया है। यह मंत्र सूर्य देव को समर्पित है।
    16. भारतीय प्रतीक पर उत्कीर्ण ‘सत्यमेव जयते’ लिया गया है-
    (a) ऋग्वेद से
    (b) मत्स्य पुराण से
    (c) भगवद्गीता से
    (d) मुण्डकोपनिषद से
    S.S.C. संयुक्त हायर सेकण्डरी (10+2) स्तरीय परीक्षा, 2011
    S.S.C. CPO परीक्षा, 2003/
    उत्तर-(d)
    भारतीय प्रतीक (राज चिह्न) पर उत्कीर्ण सत्यमेव जयते’ मुण्डकोपनिषद से लिया गया है। इसका अर्थ है, ‘सत्य की ही विजय होती है।
    17. निम्नलिखित में से वह दस्तकारी कौन-सी है जो आर्यों द्वारा व्यवहार में नहीं लाई गई थी?
    (a) मृद्भांड (पॉटरी)
    (b) आभूषण
    (c) बढ़ईगीरी (काष्ठकारिता)
    (d) लुहार (लुहारगीरी)
    S.S.C. CPO परीक्षा, 2003
    उत्तर-(d)
    ऋग्वेद में बढ़ई, रथकार, बुनकर, चर्मकार, कुम्हार, स्वर्णकार आदि दस्तकारों का वर्णन है जबकि उत्तरवैदिक आर्यों की प्रमुख दस्तकारी में भी लुहार का वर्णन नहीं है। हालांकि इस काल में लोहे की जानकारी आर्यों को हो गयी थी।
    18. उत्तर वैदिक काल के वेद विरोधी और ब्राह्मण विरोधी धार्मिक अध्यापकों को किस नाम से जाना जाता था?
    (a) यजमान
    (b) श्रमण
    (c) अथर्वन्
    (d) श्रेष्ठ)
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2000
    उत्तर-(b)
    उत्तर वैदिक काल के वेद विरोधी और ब्राह्मण विरोधी धार्मिक अध्यापकों को श्रमण’ नाम से जाना जाता था।
    9. निम्न में से किस विदुषी ने, वाद-विवाद में अजेय याज्ञवल्क्य को चुनौती दी थी?
    (a) घोषा
    (b) अपाला
    (c) मैत्रेयी
    (d) गार्गी
    S.S.C. संयुक्त स्नातक स्तरीय परीक्षा, 2012
    उत्तर-(d)
    याज्ञवल्क्य को गार्गी द्वारा चुनौती दी गई थी। याज्ञवल्क्य-गार्गी संवाद का उल्लेख वृहदारण्यकोपनिषद में मिलता है।
    20. भारतीय संगीत का उद्गम किसमें खोजा जा सकता है?
    (a) ऋग्वेद की संहिता में
    (b) यजुर्वेद की संहिता में
    (c) सामवेद की संहिता में
    (d) अथर्ववेद की संहिता में
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2000
    उत्तर-(c)
    भारतीय संगीत का उद्गम सामवेद की संहिता में खोजा जा सकता है। साम का अर्थ गेय है अर्थात जिसे गाया जा सके संगीत के सात स्वरों का उल्लेख सर्व प्रथम में मिलता है।
  • सिंधु सभ्यता (2350-1750 ई.पू.) | Q&A Practice

    ➣ वर्ष 1921 में किसने सिंधु सभ्यता के पहले स्थल हड़प्पा की खोज की, इसीलिए सिंधु सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता भी कहा जाता है ?
    उत्तर : दयाराम साहनी

    ➣ सिंधु घाटी सभ्यता का दूसरा महत्त्वपूर्ण स्थल मोहनजोदड़ो है। ‘मोहनजोदड़ो’ का शाब्दिक अर्थ क्या है?
    उत्तर : मृतकों या प्रेतों का टीला

    ➣ मोहनजोदड़ो में उत्खनन कार्य 1922 में राखालदास बनर्जी के नेतृत्व में आरम्भ हुआ। यह स्थल इस समय कहां स्थित है?
    उत्तर : लरकाना जिला, सिंध प्रांत, पाकिस्तान

    ➣ भारतीय पुरातत्त्व महानिदेशक ने 1924 ई. में सिंधु सभ्यता (कांस्ययुगीन) के खोज की विधिवत घोषणा की। उस समय भारतीय पुरातत्त्व का महानिदेशक कौन था ?
    उत्तर : सर जॉन मार्शल

    ➣ जे. एफ. मैके ने 1927 से 1931 तक तथा जी. एफ. डेल्स ने 1963 में हड़प्पा सभ्यता के किस स्थल में उत्खनन कार्य किया ?
    उत्तर : मोहनजोदड़ो

    ➣ सिंधु घाटी सभ्यता के करीब 1500 स्थलों का अभी तक पता चला है। इनमें से केवल सात को ही नगर की संज्ञा दी गयी है। ये सातों स्थल कौन-कौन से हैं?
    उत्तर : हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, चन्द्रुदड़ो, लोथल, कालीबंगा, सुतकांगेडोर एवं सुरकोटदा

    ➣ सिंधु घाटी सभ्यता के विस्तार के कारण किसने हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो को एक विस्तृत साम्राज्य की जुड़वा राजधानियां बताया है?
    उत्तर : स्टुअर्ट पिग्गट

    ➣ मोहनजोदड़ो के लोग मुख्यतः किस प्रजाति के माने जाते हैं?
    उत्तर : भूमध्य सागरीय प्रजाति

    ➣ किस सभ्यता के निवासियों को कुओं, खंभों और नालियों के निर्माण का ज्ञान था, किंतु मेहराब के निर्माण के बारे में नहीं पता था?
    उत्तर : हड़प्पा

    ➣ हड़प्पा पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित मॉन्टगोमरी जिले में किस नदी के बायें तट पर स्थित है?
    उत्तर : रावी नदी

    ➣ हड़प्पा के टीले के विषय में सर्वप्रथम जानकारी 1826 ई. में चार्ल्स मेसन ने दी थी। इसके पूर्वी टीले को नगर टीला कहा जाता है। पश्चिमी टीले को क्या कहा जाता है?
    उत्तर : दुर्ग टीला

    ➣ छह-छह की दो पंक्तियों में निर्मित कुल 12 कक्षों वाले एक अन्नागार का अवशेष कहां प्राप्त हुआ है?
    उत्तर : हड़प्पा

    ➣ हड़प्पा के लोगों की सामाजिक पद्धति कैसी थी?
    उत्तर : उचित समतावादी

    ➣ हड़प्पा के लोगों की राजव्यवस्था, जैसा कि वस्तुपरक साक्ष्य से प्रमाणित होता है, कैसी थी ?
    उत्तर : कुलीनतंत्रीय

    ➣ हड़प्पाकालीन मुहरों पर किसके अंकित चित्र से यह परिलक्षित होता है कि हड़प्पा समाज में महिलाओं की स्थिति काफी अच्छी थी?
    उत्तर : मातृदेवी

    ➣ मोहनजोदड़ो की खोज सन् 1922 में किसने की थी ?
    उत्तर : राखालदास बनर्जी

    ➣ मोहनजोदड़ो का सबसे महत्त्वपूर्ण स्थल कौन-सा है, जो 11.88 मी. लंबा, 7.01 मी. चौड़ा एवं 2.43 मी. गहरा है?
    उत्तर : विशाल स्नानागार

    ➣ किसने इस विशाल स्नानागार को तत्कालीन विश्व का एक आश्चर्यजनक निर्माण कहा है?
    उत्तर : सर जॉन मार्शल

    ➣ कुओं के लिए फन्नीदार ईंटों का प्रयोग किया गया है। इन ईंटों की चिनाई किस पद्धति से हुई है?
    उत्तर : इंग्लिश बांड पद्धति

    ➣ मोहनजोदड़ो की दीवारों की चिनाई में पक्की ईंटों का प्रयोग किस पद्धति पर किया गया है?
    उत्तर : इंग्लिश बांड पद्धति

    ➣ मोहनजोदड़ो में मातृदेवी की मूर्तियां मिली हैं। मोहनजोदड़ो में हड़प्पा की तुलना में पुरुष मूर्तियां ज्यादा मिली हैं या नारी मूर्तियां ?
    उत्तर : नारी मूर्तियां

    ➣ राजस्थान के गंगानगर जिले में स्थित कालीबंगा स्थल की खोज किसने 1953 में की थी?
    उत्तर : ए. घोष

    ➣ प्राक् हड़प्पा युगीन जुते हुए खेत और हवन कुण्डों का साक्ष्य किस स्थल से प्राप्त हुआ है?
    उत्तर : कालीबंगा

    ➣ वह एकमात्र सैंधव शहर कौन-सा है, जहां से ईंटों के एक कृत्रिम गोदीबाड़े का साक्ष्य मिला है?
    उत्तर : लोथल

    ➣ अहमदाबाद जिले के सरागवाला ग्राम से 80 किलोमीटर दक्षिण में किस नदी के तट पर स्थित लोथल स्थल की खोज 1957 में डॉ. एस. आर. राव ने की थी ?
    उत्तर : भोगवा नदी

    ➣ सागर तट पर स्थित लोथल कहां से व्यापार का प्रमुख बंदरगाह था ?
    उत्तर : पश्चिम एशिया

    ➣ किस हड़प्पा केंद्र के बारे में माना जाता है कि मेसोपोटामिया के साथ सीधा समुद्र व्यापार होता था?
    उत्तर : लोथल

    ➣ किस मुद्रा से प्रतीत होता है कि लोथल सामुद्रिक व्यापारिक गतिविधियों का केंद्र था?
    उत्तर : फारस की मुद्रा

    ➣ लोथल से प्राप्त एक मृदभांड पर ऐसा चित्र बना मिला है, जिसपर पंचतंत्र की कहानी ‘चालाक लोमड़ी’ का रूपांकन लगता है। यहां किस पक्षी का चित्रण सबसे अधिक किया गया है?
    उत्तर : बत्तख

    ➣ किस स्थल पर दरवाजे बगल की गलियों में न खुलकर सामने सड़क पर खुलते थे?
    उत्तर : लोथल

    ➣ हड़प्पाकालीन वह एकमात्र सिंधु शहर कौन-सा था, जिसमें नगर दुर्ग का अभाव था?
    उत्तर : चन्हुदड़ो

    ➣ मोहनजोदड़ो से 130 किमी. दक्षिण में स्थित चन्हुदड़ो स्थल का उत्खनन 1931 ई. में किसके नेतृत्व में हुआ?
    उत्तर : गोपाल मजुमदार

    ➣ वह एकमात्र स्थल कौन-सा है, जहां से मनके बनाने का कारखाना और वक्राकार प्राप्त हुई हैं?
    उत्तर : चन्द्रुदड़ो

    ➣ हरियाणा के हिसार जिले में स्थित वह कौन-सा स्थल है, जिसकी खोज आर. एस. बिष्ट ने की थी?
    उत्तर : बनवाली

    ➣ गुजरात के कच्छ जिले में स्थित एक बन्दरगाह नगर सुरकोतड़ा की खोज वर्ष 1964 में किसने की थी?
    उत्तर : जगपति जोशी

    ➣ बलूचिस्तान के दक्षिण भाग में द्रास नदी के तट पर स्थित हड़प्पा के पश्चिम की ओर का अंतिम हड़प्पाई स्थल कौन-सा है?
    उत्तर : सुतकागेंडोर

    ➣ सुतकागेंडोर एक बन्दरगाह नगर था, जहां से मिट्टी की चूड़िया और चारों ओर पत्थर की दीवार मिली है। 1927 ई. में इसका पता किसने लगाया था ?
    उत्तर : सर ओरियल स्टेन

    ➣ कांटदीजी सिंधु नदी के बायें किनारे पर सिंध प्रांत (पाकिस्तान) में अवस्थित है। इसका उत्खनन किसने किया?
    उत्तर : फजल अहमद (1953)

    ➣ हड़प्पाकालीन स्थल रंगपुर गुजरात के जलवार जिले के भादर में स्थित है, इसका उत्खनन किसने किया ?
    उत्तर : माधव स्वरूप वत्स एवं रंगनाथ राव ( 1931-53 में)

    ➣ हड़प्पाकालीन स्थल रंगपुर स्थल किस नदी के किनारे स्थित है?
    उत्तर : भावर नवी

    ➣ गुजरात के कच्छ के रन में स्थित धौलावीरा सिंधु सभ्यता के विशालतम स्थलों में से एक है। इसका उत्खनन 1990-91 में किसने किया?
    उत्तर : आर. एस. बिष्ट

    ➣ हड़प्पा में सामान्य आवास क्षेत्र के दक्षिण में एक ऐसा कब्रिस्तान स्थित है, जिसे समाधि आर 37 नाम दिया गया है। इस कब्रिस्तान से जो ताबूत मिला है, वह किस लकड़ी का बना है?
    उत्तर : देवदार

    ➣ पंजाब के सतलज नदी के तट पर स्थित हड़प्पाकालीन स्थल रोपड़ की खोज किसने की थी ?
    उत्तर : वाई.डी. शर्मा ने

    ➣ मानव के साथ कुत्ता दफनाये जाने के साक्ष्य किस स्थल से प्राप्त हुए हैं?
    उत्तर : रोपड़ से

    ➣ लोथल से युग्म शवाधान के साक्ष्य मिले हैं। ताबूत शवाधान के साक्ष्य कहां से प्राप्त हुए हैं?
    उत्तर : हड़प्पा से

    ➣ दोनों हड़प्पा सभ्यता के लोग शाकाहारी थे या मांसाहारी ?
    उत्तर : दोनों

    ➣ हड़प्पा में मिट्टी के बर्तनों पर सामान्यतः किस रंग का उपयोग किया जाता था ?
    उत्तर : लाल

    ➣ हड़प्पा संस्कृति किस युग की थी ?
    उत्तर : कांस्य युग

    ➣ हड़प्पा काल में लोंगों को कांसे के निर्माण का भी ज्ञान था। कांसा बनाने लिए तांबा कहाँ से आता था?
    उत्तर : राजस्थान की खेतड़ी से

    ➣ हड़प्पा सभ्यता के औजार और हथियार अधिकतर किसके बने होते थे?
    उत्तर : ताम्र, टिन तथा कांस्य

    ➣ हड़प्पा काल में प्रयुक्त टिन कहां से मंगाया जाता था?
    उत्तर : अफगानिस्तान से

    ➣ हड़प्पा काल में टिन के अलावा अफगानिस्तान से कौन से धातु का आयात किया जाता था?
    उत्तर : सोना व चांदी

    ➣ सिंधु घाटी सभ्यता के खुदाई में मिले अवशेषों में तत्कालीन व्यापारिक और आर्थिक विकास के द्योतक क्या हैं?
    उत्तर : मुद्राएं

    ➣ हड़प्पा काल की मुद्राओं के निर्माण में मुख्य रूप से किस द्रव्य का उपयोग किया गया था?
    उत्तर : टेराकोटा

    ➣ मेसोपोटामिया की सिलेंडरनुमा (बेलनाकार) मुहरे कहां से प्राप्त हुई हैं?
    उत्तर : लोथल से

    ➣ हड़प्पावासियों को माप की किस प्रणाली का जनक कहा जाता है?
    उत्तर : रैखिक प्रणाली

    ➣ सिंधु घाटी सभ्यता के समय वजन और माप की संख्या थी?
    उत्तर : 16

    ➣ सिंधु सभ्यता के बाटों की तोल में किस प्रकार का अनुपात था?
    उत्तर : 1, 2, 4, 8, 16, 32 आदि

    ➣ संख्या के आधार पर किस प्रकार वाले बाट सबसे ज्यादा प्रयोग होता था?
    उत्तर : 16 इकाई वाले बाट का

    ➣ सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों का मुख्य व्यवसाय क्या था?
    उत्तर : कृषि

    ➣ हड़प्पावासी किस वस्तु के उत्पादन में अग्रणी थे?
    उत्तर : कपास

    ➣ सिंधुवासियों को सबसे पहले किस फसल को उगाने का श्रेय प्राप्त है?
    उत्तर : कपास

    ➣ वस्त्रों के लिए कपास की खेती का आरंभ सबसे पहले किसने किया?
    उत्तर : भारत (हड़प्पावासी)

    ➣ यूनान के लोग कपास को क्या कहते थे?
    उत्तर : फ्लूनू (FLUNU)

    ➣ हड़प्पा काल में कौन-कौन सी मुख्य फसलें थीं?
    उत्तर : गेहूं और जौ

    ➣ जौ और गेहूं के साक्ष्य कहाँ से प्राप्त हुए हैं?
    उत्तर : राजस्थान से जौ तथा गुजरात से बाजरा एंव गेहूं

    ➣ हड़प्पा काल में चावल की खेती के प्रमाण किन दो स्थलों से मिले हैं?
    उत्तर : लोथल और रंगपुर

    ➣ गुजरात में गेहूं की कौन-सी दो प्रजातियां उपजाई जाती थीं?
    उत्तर : क्लब ह्वीट तथा भारतीय ड्वार्फ ह्वीट

    ➣ ट्रिटिकम कम्पैक्टम और ट्रिटिकम स्फीरोकोकम हड़प्पा काल में पायी जानी वाली किस फसल की किस्में हैं?
    उत्तर : गेहूं

    ➣ हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो से छह कतारों एवं छोटे बीजों वाले जौ की प्रजाति प्राप्त हुई है। बढ़िया किस्म का जौ किस स्थल से प्राप्त हुआ है?
    उत्तर : बनवाली

    ➣ राजस्थान स्थित किस स्थल का अर्थ काले रंग की चूड़ियां है?
    उत्तर : कालीबंगा

    ➣ ऊंट की अस्थियां सिर्फ कालीबंगा से प्राप्त हुई हैं। गैंडे का एकमात्र साक्ष्य कहां से मिला है?
    उत्तर : आमरी

    ➣ स्वतंत्रता के बाद भारत में हड़प्पा के सबसे अधिक स्थल किस राज्य में खोजे गये हैं?
    उत्तर : गुजरात

    ➣ हड़प्पन संस्कृति के संदर्भ में शैलकृत स्थापत्य के प्रमाण कहां से मिले हैं?
    उत्तर : धौलावीरा

    ➣ मोहनजोदड़ों से किस तरह की नर्तकी की प्रतिमा मिली है?
    उत्तर : कांस्य नर्तकी

    ➣ धातुओं से लघु मूर्तियां बनाने के लिए किस विधि का प्रयोग किया जाता था?
    उत्तर : भ्रष्ट मोम विधि

    ➣ मुहरें (सेलखड़ी) हड़प्पा संस्कृति की सर्वोत्तम कलाकृतियां हैं। सीलों पर कौन-कौन से जानवरों की आकृतियां उकेरी गयी हैं?
    उत्तर : एक सिंगी जानवर ( बिना कूबड़ का सांड), भैंस, बाघ, बकरी और हाथी

    ➣ किन स्थलों से अग्निवेदी के साक्ष्य मिले हैं?
    उत्तर : कालीबंगा तथा लोथल

    ➣ हड़प्पा सभ्यता में किस प्रकार के वृक्षों को पूजा जाता था?
    उत्तर : पीपल वृक्ष और डोभ पक्षी

    ➣ सिंधुवासी किस जलीय जीव की पूजा करते थे और उसे सिंधु नदी का देवता का मानते थे?
    उत्तर : घड़ियाल

    ➣ सिंधु घाटी की प्राचीन संस्कृति और आज के हिंदू धर्म के बीच ऑर्गेनिक संबंध का प्रमाण किसकी पूजा से मिलता है?
    उत्तर : पत्थर, पेड़ और पशु

    ➣ हड़प्पा संस्कृति में एकशृंगी वृषभ (बैल), वृक्ष और मातृदेवी की पूजा होती थी। क्या ये लोग विष्णु की पूजा करते थे?
    उत्तर : नहीं

    ➣ सिंधु घाटी के लोगों की मुहर में किस भगवान की प्रतिकृति का मुद्रण मिलता था?
    उत्तर : पशुपति

    ➣ मातृदेवो के अलावा मुख्य पुरुष देवता कौन थे, जिनको मुहरों में योग की मुद्रा में बैठा हुआ तीन मुखों एवं दो सींगों से युक्त दिखाया गया है?
    उत्तर : पशुपति महादेव (आद्य शिव)

    ➣ सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि किस प्रकार की है?
    उत्तर : अज्ञात

    ➣ हड़प्पावासी किस प्रकार की प्राचीन लिपि का उपयोग करते थे?
    उत्तर : चित्रलिपि

    ➣ सिंधु लिपि का अर्थ निकालने का प्रयास किसने किया है?
    उत्तर : डॉ. अस्को परपोला, एस. आर. राव, आई. महादेवन आदि

    ➣ हड़प्पावासियों ने लेखन कला का आविष्कार किया था। हड़प्पा लिपि किस प्रकार की है?
    उत्तर : वर्णात्मक और चित्रलेखात्मक

    ➣ कालीबंगा से किस लिपि के साक्ष्य मिले हैं, जो दायें से बायें तथा बायें से दायें लिखी जाती थी?
    उत्तर : बुस्ट्रोफेडन लिपि

    ➣ किंस इतिहासकार का मानना है कि आर्यों के आक्रमण के कारण सिधुवासी अपनी जमीन छोड़कर भाग गये?
    उत्तर : सर मार्टियर व्हीलर

    ➣ किंस इतिहासकार ने हड़प्पा के विलुप्त होने का कारण प्राकृतिक विपदा को बताया ?
    उत्तर : जी. एफ. डेल्स

  • सिंधु घाटी / हड़प्पा सभ्यता | One-Liner Practice

    ❑ सैधव सभ्यता आध ऐतिहासिक काल की सभ्यता थी। हड़प्पा संस्कृति को कांस्य युगीन सभ्यता भी कहते हैं।

    ❑ हड़प्पा के लोगों को ताँबे (Cu) में टिन (Sn) मिलाकर कांसा (Bronze) बनाने की विधि आती थी।

    ❑ ताम्र पाषाणिक पृष्ठभूमि पर सिंधु घाटी नामक विकसित सभ्यता का आविर्भाव हुआ, जिसका केंद्र भारतीय उपमहाद्वीप के पश्चिमोत्तर भाग में था।

    ❑ हड़प्पा टीले का सर्वप्रथम उल्लेख 1826 ई. में चार्ल्स मैस्सन द्वारा किया गया।

    ❑ लेकिन एक प्राचीन उन्नत सभ्यता का रहस्योद्घाटन 1856 में करांची और लाहौर के बीच रेल पटरी बिछाने के दौरान हुआ, जब जॉन ब्रंटन और विलियम ब्रटन नामक अंग्रेजों ने दो प्राचीन नगरों हड़प्पा और मोहनजोदड़ो का पता लगाया।

    ❑ इस सभ्यता का नाम हड़प्पा संस्कृति इसलिए पड़ा क्योंकि 1921 ई. में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित हड़प्पा (मोंटगुमरी जिला) नामक स्थल पर ही सर्वप्रथम दयाराम साहनी और माधव स्वरूप वत्स के नेतृत्व में उत्खनन कार्य किया गया।

    ❑ इस प्राचीन सभ्यता के दूसरे महत्त्वपूर्ण स्थल मोहनजोदड़ों (मृतकों का टीला) में उत्खनन कार्य 1922 ई. में राखालदास बनर्जी के नेतृत्व में आरम्भ हुआ, जो वर्तमान पाकिस्तान के सिंध प्रांत के लरकाना जिले में स्थित है।

    ❑ उक्त दोनों स्थलों पर संयुक्त उत्खनन कार्य के पश्चात् भारतीय पुरातत्व विभाग के तत्कालीन महानिदेशक सर जॉन मार्शल ने 1924 ई. में सिंधु सभ्यता (कांस्य युगीन) नामक एक उन्नत नगरीय व्यवस्था के खोज की विधिवत घोषणा की।

    ❑ बाद में जे.एफ. मैके ने 1927 ई. से 1931 ई. तक तथा जी. एफ. डेल्स ने 1963 ई. में मोहनजोदड़ो में उत्खनन कार्य किया।

    ❑ पिगट ने हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो को एक विस्तृत साम्राज्य की जुड़वां राजधानियाँ बताया है।

    ❑ वैसे तो हड़प्पा सभ्यता का केन्द्र पंजाब और सिंध (मुख्यत: सिंधु घाटी) में है, लेकिन सैन्धव सभ्यता दक्षिण और पूर्व में ब्लूचिस्तान, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जम्मू और उत्तरी अफगानिस्तान तक विस्तृत है।

    ❑ यद्यपि हड़प्पा सभ्यता के लगभग 1000 स्थलों के बारे में जानकारी प्राप्त हो चुकी है, लेकिन इनमें से केवल 6 को ही नगर माना जाता है-हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, सिंध का चन्हूदड़ो, गुजरात का लोथल, उत्तरी राजस्थान का कालीबंगा तथा हरियाणा के हिसार जिले में स्थित बनवाली।

    ❑ त्रिभुजाकार हड़प्पा संस्कृति का समूचा क्षेत्रफल 1,299,600 वर्ग किलोमीटर था, जो तत्कालीन मिस्र एवं मेसापोटामियाई क्षेत्रफल से काफी अधिक था।

    ❑ कालीबंगा और बनवाली में हड़प्पा पूर्व और हड़प्पा कालीन संस्कृतियों का प्रमाण मिलता है। यहाँ बिना पकी ईंटों के चबूतरों, सड़कों तथा नालियों के अवशेष हड़प्पा युगीन हैं।

    ❑ सुतकांगेडोर और सुरकोतदा जैसे समुद्रतटीय नगरों में भी इस सभ्यता के उन्नत रूप के दर्शन मिलते हैं। जहाँ नगर दुर्ग प्राप्त होते हैं।

    ❑ गुजरात के काठियावाड़ प्रायद्वीप में स्थित रंगपुर और रोजड़ी नामक स्थलों में इस सभ्यता की उत्तरावस्था का संकेत मिलता है।

    ❑ हड़प्पा संस्कृति की सर्वोत्कृष्ट विशेषता इसका नगर नियोजन है। यह विश्व का प्रथम नगर नियोजन का उदाहरण है।

    ❑ अलेक्जैंडर कनिघंम को भारतीय पुरातत्व का जनक कहा जाता है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, संस्कृति मंत्रालय के अधीन एक विभाग है। सिंधु घाटी सभ्यता का काल निर्धारण

    ❑ रेडियो कार्बन-2500 ई. पू. से 1750 ई. पू. सर्वाधिक मान्य है।

    ❑ डी० पी० अग्रवाल के अनुसार सिंधु सभ्यता का काल 2350 ई० पू० से 1750 ई० पू० माना जाता है।

    ❑ मृण्मुद्राओं के आधार पर – मृण्मुद्राओं के आधार पर सिंधु सभ्यता का काल 2500 ई०पू० से 1800 ई० पू०. माना जाता

    ❑ मार्शल के अनुसार – मार्शल ने सिंधु सभ्यता का काल 3250 ई० पू० से 2750 ई० पू० माना है।

    ❑ ह्वीलर के अनुसार – सिंधु सभ्यता का काल 2500 ई. पू. से 1500 ई. पू.

    ❑ हड़प्पा संस्कृति के अध्ययन के साथ चार्ल्स मैस्सन, कनिंघम, एम. व्हीलर, माधो स्वरूप वत्स आदि जुड़े थे।

    ❑ सिंधु सभ्यता के उत्थान का चरमोत्कर्ष काल 2100 ई० पू० माना जाता है।

    ❑ इखाथम महादेवन एक भारतीय पुरा लेखशास्त्री और भूतपूर्व लोक सेवक हैं, जो सिंधु घाटी सभ्यता के पुरालेखशास्त्री पर अपनी सुविज्ञता और तमिल-ब्राह्मी अभिलेखों का सफलतापूर्वक अर्थ निकालने के लिए जाने जाते हैं।

    ❑ सैंधववासी दशमलव प्रणाली पर आधारित बाटों का प्रयोग करते थे। खुदाई में 16 के गुणकों में बाट प्राप्त हुए हैं, जैसे 16, 64, 160, 320, 640 आदि।

    ❑ सिन्धु सभ्यता में ईटों का अनुपात 4:2:1 था।

    ❑ टेराकोटा का उपयोग हड़प्पा-काल की मुद्राओं के निर्माण में मुख्य रूप से किया गया था।

    ❑ सैंधववासियों के जीवन का मुख्य व्यवसाय कृषि कार्य था।

    ❑ सिन्धु घाटी सभ्यता के विषय में जानकारी कम प्राप्त हुई हैं क्योंकि उस काल की लिपि आज तक पढ़ी नहीं जा सकी। इसकी लिपि भावचित्रात्मक है।

    ❑ सिन्धु घाटी के लोगों द्वारा प्रयोग में लाए जाने वाले बर्तन चाक पर बने होते थे।

    ❑ पतली गर्दन वाले बड़े आकार के घड़े तथा लाल रंग के बर्तनों पर काले रंग की चित्रकारी हड़प्पा के बर्तनों की मुख्य विशेषता है।

    ❑ सिन्धु सभ्यता से प्राप्त अनाज चावल, जौ, खजूर, गेहूँ, कपास, तरबूज, मटर, ब्रासिका, जुंसी, तिल एवं सरसों ।

    ❑ हड़प्पा सभ्यता के सर्वाधिक स्थल गुजरात राज्य में मिले हैं।

    ❑ पहली बार कपास उपजाने का श्रेय हड़प्पावासियों को प्राप्त है।

    ❑ यहाँ के लोग लकड़ी के हलों का प्रयोग जुताई के लिए तथा पत्थर के हंसियों का प्रयोग फसल काटने के लिए करते थे।

    ❑ सर्वप्रथम स्वास्तिक चिह्न के अवशेष हड़प्पा सभ्यता से मिले हैं।

    ❑ लोथल में मिट्टी से निर्मित घोड़े की प्रतिमा प्राप्त हुई है।

    ❑ सैन्धववासी मातृदेवी की पूजा करते थे।

    ❑ चावल के प्रथम साक्ष्य लोथल एवं रंगपुर से मिले हैं।

    ❑ सिन्धु क्षेत्र का प्राचीन नाम मेलुहा था। सिन्धु मुहरों पर एकशृंगी सांड के चित्र सर्वाधिक मिले हैं।

    ❑ सिन्धु सभ्यता के लोथल एवं कालीबंगा से हवनकुण्ड का साक्ष्य मिला है।

    ❑ पालतु पशु-बैल, भैंस, भेड़, बकरी, सुअर, कुत्ता, बिल्ली, गधा, ऊँट, कूबड़वाला सांड़, हाथी, गैंडा। यहाँ गाय के साक्ष्य नहीं मिले हैं।

    ❑ ऋग्वेद में हड़प्पा सभ्यता को हरयूपिया कहा गया है।

    ❑ विश्व में चाँदी सर्वप्रथम भारत (हड़प्पा सभ्यता) में पाई गई।

    ❑ सिन्धु सभ्यता का मुख्य केन्द्र हड़प्पा था। सिन्धुवासी लोहे से परिचित नहीं थे।

    ❑ सैन्धववासियों का मुख्य भोजन जौ और गेहूँ था।

    ❑ मोहनजोदड़ो की मुख्य सड़क 10 मीटर चौड़ी थी।

    ❑ हड़प्पाई लोग नाव बनाने का काम भी करते थे।

    ❑ सैंधव कालीन मुहरें बनाने में सर्वाधिक उपयोग सेलखड़ी का किया गया है।

    ❑ स्त्री मृणमूर्तियाँ (मिट्टी की मूर्तियाँ) अधिक मिलने से ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि सैंधव समाज मातृसत्तात्मक था।

    ❑ सैंधव मुहरें बेलनाकार, वर्गाकार, आयताकार और वृत्ताकार हैं।

    ❑ सिंधु घाटी की खुदाई में मिले अवशेषों में तत्कालीन व्यापारिक और आर्थिक विकास के द्योतक मुद्राएँ हैं।

    ❑ वर्गाकार मुहरें सर्वाधिक प्रचलित थीं। सैंधवकालीन सर्वाधिक मुहरें मोहनजोदड़ो से मिली हैं।

    ❑ लोथल एवं कालीबंगा से युग्म समाधियां मिली हैं।

    ❑ हड़प्पा में शवों को दफनाने जबकि मोहनजोदड़ो में जलाने की प्रथा विद्यमान थी।

    ❑ लोथल एवं सुरकोतदा सिन्धु सभ्यता का बन्दरगाह था। लोथल से एक तराजू पाया गया है।

    ❑ सैंधववासी मिठास के लिए शहद का प्रयोग करते थे।

    ❑ पर्दा-प्रथा एवं वेश्यावृत्ति सैंधव सभ्यता में प्रचलित थी।

    ❑ सिन्धुवासी बतख को अत्यधिक पवित्र मानते थे।

    ❑ हड़प्पा संस्कृति के विनाश का ठीक कारण ज्ञात नहीं है। सिन्धु नदी की बाढ़, सिन्धु नदी का मार्ग बदलना, वर्षा की कमी, भूकम्प एवं विदेशी आक्रमण जैसे कारण समय-समय पर बताए गए हैं।

    ❑ सैंधव सभ्यता के विनाश का संभवतः सबसे प्रभावी कारण बाढ़ था।

    ❑ मोहनजोदड़ो में सबसे बड़ा भवन विशाल अन्नागार था।

    ❑ मोहनजोदड़ो से सूती कपड़े का साक्ष्य तथा नर्तकी की एक कांस्य मूर्ति मिली है। कांसे की नर्तकी उनकी मूर्तिकला का सर्वश्रेष्ठ नमूना है।

    ❑ सिंधु सभ्यता के प्रमुख स्थल लोथल में बन्दरगाह का अस्तित्व मिला है, जहाँ विदेशी जलयानों का आवागमन होता था।

    ❑ लोथल में महिला-पुरुष को एक साथ दफनाया गया है।

    ❑ ऊँट की हड्डियाँ कालीबंगा से प्राप्त हुई हैं।

    ❑ घोड़े की अस्थियों का अवशेष सुरकोटदा से मिला है।

  • सैन्धव सभ्यता और संस्कृति MCQ प्रश्न | UPSC

    1. सिंधु घाटी संस्कृति वैदिक सभ्यता से भिन्न थी, क्योंकि-
    (a) इसके पास विकसित शहरी जीवन की सुविधाएं थीं।
    (b) इसके पास चित्रलेखीय लिपि थी।
    (c) इसके पास लोहे और रक्षा शस्त्रों के ज्ञान का अभाव था।
    (d) उपर्युक्त सभी।
    U.P.P.C.S. (Spl.) (Mains) 2004
    उत्तर-(d)
    सिंधु घाटी संस्कृति कई महत्वपूर्ण पहलुओं में वैदिक सभ्यता से अलग थी। सिंधु सभ्यता एक विकसित नगरीय सभ्यता थी जिसमें सुनियोजित नगर, ढकी हुई नालियाँ और बहुमंजिली इमारतें पाई जाती थीं, जबकि वैदिक सभ्यता मुख्यतः ग्रामीण एवं पशुपालक थी। सिंधु सभ्यता की लिपि भावचित्रात्मक (Pictographic) थी जिसे अभी तक पूर्णतः पढ़ा नहीं जा सका है, जबकि वैदिक साहित्य संस्कृत भाषा में रचा गया। सिंधु सभ्यता में लोहे का कोई प्रमाण नहीं मिला — यह एक कांस्य युगीन सभ्यता थी — जबकि वैदिक काल के उत्तरार्ध में लोहे का प्रयोग होने लगा था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सिंधु सभ्यता में घोड़े के अस्तित्व के प्रमाण अत्यंत सीमित और विवादास्पद हैं, जबकि वैदिक सभ्यता में घोड़ा (अश्व) अत्यंत महत्वपूर्ण था और अश्वमेध यज्ञ इसका प्रमुख उदाहरण है। इसके अलावा, सिंधु सभ्यता में अग्नि-वेदिका (Sacrificial Fire) के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिले, जबकि वैदिक धर्म में यज्ञ-अग्नि केंद्रीय भूमिका निभाती थी।
    2. हड़प्पा सभ्यता की उत्पत्ति के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा जोड़ा सही नहीं है ?
    (a) एम. रफीक मुगल – हड़प्पा सभ्यता ने मेसोपोटामिया सभ्यता से प्रेरणा ली
    (b) ई. जे.एच. मैके – सुमेर से लोगों का पलायन
    (c) मार्टीमर ह्वीलर – पश्चिमी एशिया से सभ्यता के विचार’ का प्रवसन
    (d) अमलानंद घोष – हड़प्पा सभ्यता का उद्भव पूर्व हड़प्पा सभ्यता की परिपक्वता के परिणामस्वरूप हुआ
    R.A.S. / R.T.S. (Pre) (Re-Exam) 2013
    उत्तर-(a)
    हड़प्पा सभ्यता की उत्पत्ति को लेकर विद्वानों में मतभेद रहा है। ई. जे. एच. मैके और मार्टीमर ह्वीलर जैसे विद्वान बाहरी प्रभाव के सिद्धांत में विश्वास रखते थे। अमलानंद घोष ने स्थानीय उत्पत्ति का समर्थन करते हुए कहा कि हड़प्पा सभ्यता पूर्व-हड़प्पा संस्कृतियों की क्रमिक परिपक्वता का परिणाम थी। एम. रफीक मुगल ने भी स्थानीय उत्पत्ति के सिद्धांत का समर्थन किया और यह स्थापित किया कि हड़प्पा सभ्यता का उद्भव रावी नदी के क्षेत्र में हुआ — उन्होंने मेसोपोटामिया से प्रेरणा के विचार का खंडन किया। इसीलिए विकल्प (a) में दिया गया जोड़ा गलत है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: हड़प्पा सभ्यता और मेसोपोटामिया सभ्यता के बीच व्यापारिक संबंधों के साक्ष्य मिले हैं — मेसोपोटामिया के अभिलेखों में “मेलुहा” का उल्लेख है, जिसे अधिकांश विद्वान सिंधु क्षेत्र से जोड़ते हैं। इसके अलावा, हड़प्पा से पूर्व की “हाकरा संस्कृति” को रफीक मुगल ने सिंधु सभ्यता का प्रारंभिक चरण माना है।
    3.मानव समाज विलक्षण है, क्योंकि वह मुख्यतया आश्रित होता है-
    (a) संस्कृति पर
    (b) अर्थव्यवस्था पर
    (c) धर्म पर
    (d) विज्ञान पर
    U.P.P.C.S. (Spl.) (Mains) 2004
    उत्तर-(b)
    मानव समाज की विशिष्टता इस बात में निहित है कि वह अपनी जीविका, संगठन और विकास के लिए मुख्यतः अर्थव्यवस्था पर निर्भर रहता है। मानव इतिहास के विभिन्न चरण — जैसे खाद्य-संग्राहक समाज, कृषि समाज और औद्योगिक समाज — इसी अर्थव्यवस्था के बदलाव की कहानी हैं। जैसे-जैसे उत्पादन के साधन और तरीके बदले, सामाजिक संरचना, वर्ग-विभाजन और सांस्कृतिक मूल्य भी बदलते गए। धर्म, विज्ञान और संस्कृति ये सभी भी अर्थव्यवस्था से प्रभावित होते हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कार्ल मार्क्स के ऐतिहासिक भौतिकवाद (Historical Materialism) के सिद्धांत के अनुसार समाज की आर्थिक संरचना (Base) ही उसकी राजनीतिक, कानूनी और वैचारिक संरचना (Superstructure) को निर्धारित करती है। इसी आधार पर मार्क्स ने मानव इतिहास को दास समाज, सामंती समाज, पूँजीवादी समाज आदि चरणों में विभाजित किया।
    4. सिंधु घाटी सभ्यता को आर्यों से पूर्व की रखे जाने का महत्वपूर्ण कारक है-
    (a) लिपि
    (b) नगर नियोजन
    (c) तांबा
    (d) मृद्भाड
    U.P.P.C.S. (Pre) 1990
    उत्तर-(d)
    पुरातात्विक खुदाइयों में विभिन्न कालक्रमों में पाए गए मृद्भांड (मिट्टी के बर्तन) यह प्रमाणित करते हैं कि सिंधु घाटी सभ्यता आर्यों से पुरानी थी। हड़प्पा सभ्यता से संबंधित मृद्भांड लाल रंग के होते थे जिन पर काली आकृतियाँ चित्रित होती थीं। इसके विपरीत, आर्यों से संबंधित मृद्भांड धूसर (Grey) रंग के थे, विशेषकर “चित्रित धूसर मृद्भांड” (Painted Grey Ware – PGW) जो बाद के काल के हैं। इस भिन्नता के आधार पर पुरातत्वविदों ने दोनों सभ्यताओं के कालक्रम को अलग-अलग निर्धारित किया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: “चित्रित धूसर मृद्भांड संस्कृति” (PGW Culture) का काल लगभग 1200–600 ई.पू. माना जाता है और इसे महाभारत काल से जोड़ा जाता है। इससे पहले का “उत्तरी काले पॉलिश मृद्भांड” (Northern Black Polished Ware – NBPW) मौर्यकाल से संबंधित है। इस प्रकार मृद्भांड पुरातात्विक काल-निर्धारण का सबसे विश्वसनीय साधन हैं।
    5.सिंधु घाटी के निवासियों की सभ्यता को जानने का मूल स्रोत है, वहां पाई गई
    (a) मोहरें
    (b) बर्तन, जेवर, हथियार तथा औजार
    (c) मंदिर
    (d) लिपि
    R.A.S. / R.T.S. (Pre) 1996
    उत्तर-(a)
    सिंधु घाटी सभ्यता के बारे में जानकारी का सबसे प्रमुख और समृद्ध स्रोत वहाँ से प्राप्त मोहरें हैं। अब तक लगभग 3500 से अधिक मोहरें खोजी जा चुकी हैं। इन मोहरों पर विभिन्न पशुओं (जैसे एकशृंगी पशु — Unicorn, हाथी, बैल) और लिपि के चिह्न अंकित हैं, जो तत्कालीन धार्मिक विश्वासों, व्यापारिक गतिविधियों और प्रशासनिक व्यवस्था पर प्रकाश डालते हैं। ये मोहरें प्रायः स्टेटाइट (Steatite) पत्थर से बनी हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सिंधु मोहरों में सर्वाधिक प्रचलित चित्र “एकशृंगी पशु” (Unicorn) का है। मोहनजोदड़ो से प्राप्त “पशुपति मुहर” अत्यंत प्रसिद्ध है जिसमें एक योगी मुद्रा में बैठे देवता के चारों ओर हाथी, बाघ, गैंडा और भैंसा दर्शाए गए हैं — इन्हें प्रोटो-शिव (आद्य शिव) के रूप में पहचाना जाता है।
    6. हड़प्पा निम्नलिखित में से किस सभ्यता से संबद्ध है?
    (a) सुमेरियन सभ्यता
    (b) सिन्धु घाटी सभ्यता
    (c) वैदिक सभ्यता
    (d) मेसोपोटामिया सभ्यता
    M.P.P.C.S. (Pre) 1990
    उत्तर-(b)
    हड़प्पा, सिंधु घाटी सभ्यता का एक प्रमुख पुरास्थल है जो वर्तमान पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में रावी नदी के तट पर स्थित है। 1921 में दयाराम साहनी के नेतृत्व में इस स्थल की पहली बार व्यवस्थित खुदाई की गई। चूँकि इस सभ्यता के प्रमाण सर्वप्रथम यहीं से मिले, इसलिए इसे हड़प्पा सभ्यता भी कहते हैं। यह सभ्यता कालानुक्रम में मिस्र और मेसोपोटामिया की सभ्यताओं की समकालीन थी, किन्तु उनसे स्वतंत्र रूप से विकसित हुई।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: हड़प्पा सभ्यता का विस्तार लगभग 12.5 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में था, जो मिस्र और मेसोपोटामिया की सभ्यताओं से भी बड़ा था। इस सभ्यता के प्रमुख नगरों में मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, कालीबंगा, लोथल, धोलावीरा और राखीगढ़ी शामिल हैं। राखीगढ़ी (हरियाणा) को हाल के उत्खनन के आधार पर इस सभ्यता का सबसे बड़ा ज्ञात नगर माना जाने लगा है।
    7. सिंधु घाटी की सभ्यता गैर आर्य थी, क्योंकि-
    (a) वह नगरीय सभ्यता थी।
    (b) उसकी अपनी लिपि थी।
    (c) उसकी खेतिहर अर्थव्यवस्था थी।
    (d) उसका विस्तार नर्मदा घाटी तक था।
    U.P.P.S.C. (GIC ) 2010
    उत्तर-(a)
    सिंधु घाटी सभ्यता को गैर-आर्य इसलिए माना जाता है क्योंकि वह एक परिपक्व नगरीय सभ्यता थी, जबकि आर्य मूलतः एक ग्रामीण और पशुचारक समाज थे। आर्यों के वैदिक साहित्य में नगरों का वर्णन प्रायः शत्रु के “पुर” (किलेबंद नगर) के रूप में है, जिसे इंद्र नष्ट करते हैं — यह सिंधु नगरों की ओर इशारा हो सकता है। इसके अलावा, सिंधु सभ्यता में अश्व के प्रमाण नगण्य हैं, जबकि आर्य संस्कृति में घोड़ा अत्यंत महत्वपूर्ण था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सिंधु सभ्यता की नगर योजना अत्यंत वैज्ञानिक थी — नगरों को “ग्रिड पैटर्न” में बसाया गया था, सड़कें एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं और घरों में स्नानागार तथा उन्नत जल-निकासी प्रणाली थी। यह नगर नियोजन की दक्षता किसी भी समकालीन सभ्यता में नहीं पाई जाती।
    8.सिंधु सभ्यता संबंधित है-
    (a) प्रागैतिहासिक युग से
    (b) आद्य-ऐतिहासिक युग से
    (c) ऐतिहासिक युग से
    (d) मेसोपोटामिया सभ्यता
    U.P.P.C.S. (Pre) 1996
    39th B.P.S. C. (Pre) 1994
    उत्तर-(b)
    सिंधु सभ्यता आद्य-ऐतिहासिक (Proto-Historic) काल से संबंधित है। इतिहास के कालखंडों में “प्रागैतिहासिक” वह काल है जिसमें लेखन कला का अभाव होता है, “ऐतिहासिक” वह काल है जिसकी लिपि पढ़ी जा चुकी हो, और “आद्य-ऐतिहासिक” वह मध्यवर्ती स्थिति है जिसमें लेखन के साक्ष्य तो हैं किन्तु उन्हें अभी पूरी तरह समझा नहीं जा सका। सिंधु लिपि में लगभग 400-600 चिह्न हैं, परन्तु आज तक इसे पूर्णतः पढ़ा नहीं जा सका है, इसीलिए यह आद्य-ऐतिहासिक श्रेणी में आती है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सिंधु लिपि को दाईं से बाईं ओर (Right to Left) लिखा जाता था और कभी-कभी “बुस्त्रोफेदन” शैली में भी — जिसमें एक पंक्ति दाईं से बाईं और अगली पंक्ति बाईं से दाईं लिखी जाती है। इस लिपि को पढ़ने के लिए दुनिया भर में सैकड़ों प्रयास हो चुके हैं, किन्तु अभी तक कोई सर्वमान्य समाधान नहीं मिला है।
    9.हड़प्पा संस्कृति की जान का प्रमुख स्रोत है—
    (a) शिलालेख
    (b) पकी मिट्टी की मुहरों पर अंकित लेख
    (c) पुरातात्विक खुदाई
    (d) उपर्युक्त सभी
    U.P.P.C.S. (Pre) 1996
    U.P.P.C.S. (Pre) 1994
    उत्तर-(c)
    हड़प्पा संस्कृति की जानकारी का सर्वप्रमुख स्रोत पुरातात्विक उत्खनन है। चूँकि सिंधु लिपि अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है, इसलिए शिलालेखों और मुहरों पर अंकित लेखों का उपयोग इतिहास लेखन में नहीं हो सकता। खुदाई में प्राप्त अवशेष — जैसे भवन, मुहरें, मिट्टी के बर्तन, आभूषण, औजार, और मूर्तियाँ — ही इस सभ्यता के सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक जीवन पर प्रकाश डालते हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: हड़प्पा सभ्यता का पहला उत्खनन 1921 में हड़प्पा में दयाराम साहनी द्वारा और 1922 में मोहनजोदड़ो में राखालदास बनर्जी द्वारा किया गया था। दोनों खुदाइयाँ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के तत्कालीन महानिदेशक जॉन मार्शल के निर्देशन में हुईं। 1924 में जॉन मार्शल ने ही आधिकारिक रूप से इस सभ्यता की घोषणा विश्व के समक्ष की थी।
    10.निम्नलिखित में से कौन-सा सिंधु घाटी की सभ्यता पर प्रकाश डालता है?
    (a) शिलालेख
    (b) पुरातत्व संबंधी खुदाई
    (c) बर्तनों की मुहरों पर लिखावट
    (d) धार्मिक ग्रंथ
    U.P.P.C.S. (Pre) 1993
    उत्तर-(b)
    सिंधु घाटी सभ्यता पर सबसे अधिक प्रकाश पुरातात्विक खुदाइयों से पड़ता है। धार्मिक ग्रंथ इस सभ्यता के बारे में मौन हैं, शिलालेख नहीं पाए गए हैं, और मुहरों की लिपि अभी अपठित है। इसीलिए उत्खनन से प्राप्त भौतिक साक्ष्य ही एकमात्र विश्वसनीय जानकारी का स्रोत हैं। मोहनजोदड़ो का विशाल स्नानागार (Great Bath), हड़प्पा के अन्नागार (Granaries), और लोथल का बंदरगाह इसी पुरातात्विक खुदाई के परिणाम हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मोहनजोदड़ो का “विशाल स्नानागार” (Great Bath) 11.88 मीटर लंबा, 7.01 मीटर चौड़ा और 2.43 मीटर गहरा है और इसे जल-रोधी बनाने के लिए पक्की ईंटों के साथ जिप्सम का प्रयोग किया गया था — यह तत्कालीन इंजीनियरिंग की उत्कृष्टता का प्रमाण है। यह संभवतः धार्मिक स्नान-अनुष्ठानों के लिए प्रयुक्त होता था।
    11. निम्नलिखित पशुओं में से किस एक हड़प्पा संस्कृति में पाई मुहरों और टेराकोटा कलाकृतियों में निरूपण (Representation) नहीं हुआ था ?
    (a) गाय
    (b) हाथी
    (c) गैंडा
    (d) बाघ
    I.A.S. (Pre) 2001
    उत्तर-(a)
    हड़प्पा सभ्यता की मुहरों एवं टेराकोटा कलाकृतियों में गाय का चित्रण नहीं मिलता है। इन कलाकृतियों में हाथी, गैंडा, बाघ, भेड़, हिरण और एकश्रृंग काल्पनिक पशु (Unicorn) जैसे जीवों का चित्रण मिलता है। गाय को धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व बाद के वैदिक काल में प्राप्त हुआ, जहाँ उसे ‘अघ्न्या’ (न मारी जाने योग्य) कहा गया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: हड़प्पा मुहरों में सबसे अधिक चित्रित पशु एकश्रृंग बैल (Unicorn Bull) है, जो शायद किसी धार्मिक या व्यापारिक प्रतीक के रूप में प्रयुक्त होता था। इसके अतिरिक्त, मोहनजोदड़ो से प्राप्त ‘पशुपति मुहर’ में एक ध्यानमग्न देवता को हाथी, गैंडा, बाघ और भैंस जैसे पशुओं से घिरा दर्शाया गया है, जिसे प्रोटो-शिव का रूप माना जाता है।
    12. सूची-1 (प्राचीन रथल) को सूची-II (पुरातत्वीय खोज) के साथ सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही
    सूची-I ( प्राचीन स्थल) सूची-II ( पुरातत्वीय खोज)
    A. लोथल – 1. जुता हुआ खेत
    B. कालीबंगा – 2. गोदीबाड़ा
    C. धौलावीरा – 3. पक्की मिट्टी की बनी हुई हल की प्रतिकृति
    D. बनावली – 4. हड़प्पन लिपि के बड़े आकार के दस चिह्नों वाला एक शिलालेख कूट : उत्तर चुनिए-
    A B C D
    (a) 1 2 3 4
    (b) 2 1 4 3
    (c) 1 2 4 3
    (d) 2 1 3 4
    I.A.S. (Pre) 2002
    उत्तर-(b)
    इन हड़प्पाकालीन स्थलों और उनकी पुरातात्त्विक खोजों का सुमेलन इस प्रकार है — लोथल (गुजरात, खम्भात की खाड़ी के निकट) से विश्व की प्राचीनतम गोदीबाड़ा (Dockyard) के अवशेष प्राप्त हुए हैं। कालीबंगा (राजस्थान, घग्गर नदी तट) से जुते हुए खेत के साक्ष्य मिले हैं। धौलावीरा (गुजरात, कच्छ) से हड़प्पा लिपि के बड़े आकार के 10 चिह्नों वाला शिलालेख मिला है। बनावली (हरियाणा, फतेहाबाद) से पकी मिट्टी की बनी हल की प्रतिकृति प्राप्त हुई है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: लोथल का गोदीबाड़ा (Dockyard) लगभग 37 मीटर × 22 मीटर आकार का है और यह सिंधु नदी की एक सहायक नहर से जुड़ा था, जो इसके उन्नत समुद्री व्यापार का प्रमाण है। धौलावीरा हड़प्पा सभ्यता के तीन चरणों — प्रारम्भिक, परिपक्व और उत्तर — तीनों के अवशेष एक साथ देने वाला दुर्लभ स्थल है। इसे वर्ष 2021 में UNESCO विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया।
    13. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग करते हुए सही
    सूची-I सूची-II
    A. हड़प्पा – 1. गोदावरी
    B. हस्तिनापुर – 2. रावी
    C. नागार्जुन कोंडा – 3. गंगा
    D. पैठन – 4. कृष्णा कूट :
    उत्तर चुनिए।
    (a) 1 2 3 4
    (b) 2 3 4 1
    (c) 4 3 2 1
    (d) 3 4 1 2
    U.P.P.C.S. (Spl.) (Mains) 2008
    उत्तर-(b)
    इन प्राचीन स्थलों और उनसे संबंधित नदियों का सुमेलन इस प्रकार है — हड़प्पा → रावी नदी (वर्तमान पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में), हस्तिनापुर → गंगा नदी (उत्तर प्रदेश, मेरठ के निकट), नागार्जुन कोंडा → कृष्णा नदी (आंध्र प्रदेश), पैठन → गोदावरी नदी (महाराष्ट्र, औरंगाबाद जिले के निकट)।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: नागार्जुन कोंडा आंध्र प्रदेश में कृष्णा नदी पर बने नागार्जुन सागर बाँध के जलाशय में डूब गया था; इसलिए इसके अवशेषों को नागार्जुन द्वीप (Nagarjuna Island) पर संरक्षित किया गया है। पैठन (प्राचीन नाम: प्रतिष्ठान) सातवाहन राजाओं की राजधानी थी और दक्षिण भारत के इतिहास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है।
14. भारत में चांदी की उपलब्धता के प्राचीनतम साक्ष्य मिलते हैं-
(a) हड़प्पा संस्कृति में
(b) पश्चिमी भारत की ताम्रपाषाण संस्कृति में
(c) वैदिक संहिताओं में
(d) चांदी के आहत सिक्कों में
I.A.S. (Pre) 1994
उत्तर-(a)
भारत में चाँदी के उपयोग के सबसे प्राचीनतम साक्ष्य हड़प्पा/सिंधु सभ्यता से प्राप्त होते हैं। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की खुदाई में चाँदी के बर्तन, आभूषण और अन्य वस्तुएँ मिली हैं। विद्वानों का मानना है कि हड़प्पावासी राजस्थान की जावर (उदयपुर) तथा अजमेर की खानों से चाँदी प्राप्त करते थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: हड़प्पाई लोगों को सोने, चाँदी, ताँबे और टिन — चार धातुओं का ज्ञान था, परंतु लोहे का ज्ञान नहीं था, इसीलिए इसे ताम्र-कांस्य सभ्यता कहा जाता है। हड़प्पा से प्राप्त चाँदी के ‘ठोस’ आभूषण उस काल की उत्कृष्ट धातु-शिल्प तकनीक के प्रमाण हैं, जो इस सभ्यता की समृद्धि को दर्शाते हैं।
15. सूची I को सूची II से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट से सही
सूची I सूची II
A. हड़प्पा – 1. एन. जी. मजूमदार (1936-37)
B. हस्तिनापुर – 2. जॉन मार्शल (1913-34)
C, तक्षशिला – 3. दयाराम साहनी (1923-24 तथा 1924-25)
D. कौशाम्बी – 4. बी. बी. लाल (1950-52) कूट :
A B C D उत्तर चुनिए –
(a) 4 2 1 3
(b) 1 3 4 2
(c) 3 4 2 1
(d) 4 1 3 2
U.P. R.O/A.R.O. (Mains) 2017
उत्तर-(c)
इन पुरातात्त्विक स्थलों और उनके उत्खनन-कर्ताओं का सही सुमेलन इस प्रकार है — हड़प्पा → दयाराम साहनी (1923-24 व 1924-25), हस्तिनापुर → बी. बी. लाल (1950-52), तक्षशिला → जॉन मार्शल (1913-34), कौशाम्बी → एन. जी. मजूमदार (1936-37)।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: हड़प्पा की प्रारंभिक खोज का श्रेय दयाराम साहनी को जाता है, लेकिन इस सभ्यता को व्यापक पहचान दिलाने और वैज्ञानिक उत्खनन की नींव रखने का कार्य सर जॉन मार्शल के निर्देशन में हुआ। बी. बी. लाल ने हस्तिनापुर उत्खनन में चित्रित धूसर मृद्भांड (Painted Grey Ware) की खोज की, जो उत्तर वैदिक काल से संबंधित है और महाभारत-कालीन बस्तियों से जोड़ी जाती है।
16. मूर्ति पूजा का आरंभ कब से माना जाता है? उत्तर वैदिक काल
(a) पूर्व आर्य
(b)
(c) मौर्य काल
(d) कुषाण काल
U.P.P.C.S. (Pre) 1992
उत्तर-(a)
मूर्ति पूजा का प्रारंभ पूर्व आर्य काल अर्थात् सैंधव (हड़प्पा) सभ्यता के समय से माना जाता है। इस सभ्यता के विभिन्न पुरास्थलों से मातृ देवी (Mother Goddess) की असंख्य मृण्मूर्तियाँ तथा मुहरों पर देवी-देवताओं के अंकन प्राप्त हुए हैं, जो संगठित धार्मिक पूजा का संकेत देते हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मुहर पर योगासन में बैठी आकृति को ‘आद्य शिव’ या ‘पशुपति’ माना गया है, जिसके चारों ओर हाथी, बाघ, गैंडा व भैंसा अंकित हैं — यह मूर्ति पूजा की प्राचीनता का प्रमाण है। इसके अतिरिक्त, सैंधव स्थलों पर अग्नि-वेदिकाएँ (Fire Altars) भी मिली हैं, विशेषतः कालीबंगा में, जो अनुष्ठानिक धर्म की विद्यमानता सिद्ध करती हैं।
17. हड़प्पा में मिट्टी के बर्तनों पर सामान्यतः किस रंग का उपयोग हुआ था ?
(a) लाल
(b) नीला-हरा
(c) पांडु
(d) नीला
40th B.P.S.C. (Pre) 1995
उत्तर-(a)
हड़प्पा सभ्यता के मृद्भांडों (मिट्टी के बर्तनों) पर मुख्यतः लाल रंग का प्रयोग होता था। इन बर्तनों को पैर से चालित चाक पर बनाया जाता था। बर्तनों के ऊपरी भाग पर लाल रंग की पुताई की जाती थी और निचले भाग में काले रंग से ज्यामितीय एवं प्राकृतिक चित्रकारी की जाती थी, जिसे ‘लाल और काला मृद्भांड’ (Red and Black Ware) कहा जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: हड़प्पाई मृद्भांडों पर काले रंग की चित्रकारी में मछली, पत्तियाँ, मोर, पीपल के पत्ते और ज्यामितीय आकृतियाँ प्रमुखता से मिलती हैं। ये मृद्भांड उच्च तापमान वाली भट्ठियों में पकाए जाते थे, जिससे इनकी टिकाऊपन असाधारण थी और ये पानी के प्रति अपेक्षाकृत अभेद्य बन जाते थे।
18. निम्नलिखित में से कौन-सा एक हड़प्पा स्थल नहीं है?
(a) चन्हूदड़ो
(b) कोटदीजी
(c) सोहगौरा
(d) देसलपुर
I.A.S. (Pre) 2019
उत्तर-(c)
सोहगौरा उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में राप्ती नदी के किनारे स्थित एक गाँव है। यह स्थल हड़प्पा सभ्यता से संबंधित नहीं है, बल्कि यहाँ से मौर्यकालीन ताम्रपत्र अभिलेख प्राप्त हुआ है जिसमें अन्नागार (Granary/Food store) के होने का उल्लेख है। चन्हूदड़ो और कोटदीजी पाकिस्तान के सिंध प्रांत में तथा देसलपुर गुजरात के कच्छ में हड़प्पाई स्थल हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चन्हूदड़ो की विशेषता यह है कि यह एकमात्र हड़प्पाकालीन नगर था जहाँ किले (Citadel) के कोई प्रमाण नहीं मिले। यहाँ से मनके बनाने (Bead-making), शंख की चूड़ियाँ बनाने और मुहर निर्माण की कारखाना-शैली के अवशेष प्राप्त हुए हैं, जो इसे एक प्रमुख औद्योगिक केंद्र सिद्ध करते हैं।
19. एक जुते हुए खेत की खोज की गई थी-
(a) मोहनजोदड़ो में
(b) कालीबंगा
(c) हड़प्पा में
(d) लोथल
U.P.P.C.S. (Mains) 2005
उत्तर-(b)
जुते हुए खेत (Ploughed Field) के साक्ष्य कालीबंगा (राजस्थान, हनुमानगढ़ जिला, घग्गर नदी तट) से प्राप्त हुए हैं। यह विश्व का सबसे पुराना ज्ञात जुता हुआ खेत है। इस खेत में दो दिशाओं में हल की लकीरें मिलती हैं, जो यह संकेत देती हैं कि दो अलग-अलग फसलें एक साथ बोई जाती थीं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कालीबंगा की एक और विशेषता यह है कि यहाँ से अग्नि-वेदिकाओं (Fire Altars) की एक श्रृंखला प्राप्त हुई है, जो हड़प्पा सभ्यता में अग्नि-पूजा या यज्ञ परंपरा की ओर संकेत करती है। साथ ही, कालीबंगा में प्राक्-हड़प्पा (Pre-Harappan) और परिपक्व हड़प्पा दोनों चरणों के अवशेष मिले हैं, जो इसे सभ्यता के विकास-क्रम को समझने हेतु अत्यंत महत्त्वपूर्ण बनाते हैं।
20. निम्न में से किस हड़प्पन नगर में जुते हुए खेतों के निशान मिले-
(a) कालीबंगा
(b) धौलावीरा
(c) मोहनजोदड़ो
(d) लोथल
66th B.P.S.C. (Pre) 2020
उत्तर-(a)
जुते हुए खेत के निशान कालीबंगा से ही प्राप्त हुए हैं। यहाँ से मिले खेतों में हल की दो परस्पर-काटती लकीरें (criss-cross furrows) मिली हैं। आधुनिक राजस्थान में आज भी इसी प्रकार की दोहरी फसल तकनीक प्रयोग में लाई जाती है, जिसमें एक दिशा में गेहूँ और दूसरी में सरसों बोई जाती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: हड़प्पा सभ्यता में कृषि उपकरणों में पत्थर और ताम्बे के औजार प्रयुक्त होते थे; लकड़ी का हल भी उपयोग में था, परंतु लोहे के हल का प्रमाण नहीं है। बनावली (हरियाणा) से प्राप्त पकी मिट्टी की हल की प्रतिकृति इस सभ्यता में हल-आधारित कृषि की पुष्टि करती है।
21. सिंधु सभ्यता के बारे में निम्न में से कौन-सा कथन असत्य है?
(a) नगरों में नालियों की सुदृढ़ व्यवस्था थी।
(b) व्यापार और वाणिज्य उन्नत दशा में था।
(c) मातृदेवी की उपासना की जाती थी।
(d) लोग लोहे से परिचित थे।
U.P.P.C.S. (Pre) 1992
उत्तर-(d)
सिंधु सभ्यता एक कांस्य-युगीन सभ्यता थी। यहाँ के निवासी ताँबे और टिन की मिश्रधातु अर्थात् काँसे का उपयोग करते थे, किंतु लोहे से वे पूर्णतः अपरिचित थे। नगरों में जल-निकासी की व्यवस्था अत्यंत सुनियोजित थी — ढकी हुई नालियाँ घर-घर से जुड़ती थीं। व्यापार के प्रमाण मेसोपोटामिया (इराक) तक के सम्बन्धों से मिलते हैं। मातृदेवी की अनेक मृण्मूर्तियाँ विभिन्न स्थलों पर मिली हैं जो धार्मिक आस्था को दर्शाती हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:सिंधु सभ्यता में ताँबे का प्रयोग सर्वाधिक होता था। खेतड़ी (राजस्थान) की ताँबे की खानों से यहाँ के लोग धातु प्राप्त करते थे।
सैंधव लिपि अभी तक पूर्णतः पढ़ी नहीं जा सकी है; यह लिपि भावचित्रात्मक (Pictographic) है और दाईं से बाईं ओर लिखी जाती थी।
22. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर का चयन कीजिए।
सूची-I (हड़प्पीय स्थल) सूची-II (स्थिति)
A. मांडा 1. राजस्थान
B. दैमाबाद 2. हरियाणा
C. कालीबंगा 3. जम्मू एवं कश्मीर
D. राखीगढ़ी 4. महाराष्ट्र
कूट :
A B C D
(a) 1 2 3 4
(b) 2 3 4 1
(c) 3 4 1 2
(d) 4 1 2 3
U.P.P.C.S. (Pre) 2012
उत्तर-(c)
सही सुमेलन इस प्रकार है — मांडा: जम्मू एवं कश्मीर (चिनाब नदी के तट पर), दैमाबाद: महाराष्ट्र (अहमदनगर जिला, प्रवरा नदी तट), कालीबंगा: राजस्थान (हनुमानगढ़ जिला, घग्गर नदी तट), राखीगढ़ी: हरियाणा (हिसार जिला)। मांडा हड़प्पा सभ्यता का सबसे उत्तरी ज्ञात स्थल है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:राखीगढ़ी को क्षेत्रफल की दृष्टि से भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे बड़ा हड़प्पाकालीन नगर माना जाता है — यह मोहनजोदड़ो से भी बड़ा हो सकता है।
>दैमाबाद से काँसे की चार उत्कृष्ट मूर्तियाँ मिली हैं जिनमें एक बैलगाड़ी और एक भैंसे की मूर्ति प्रमुख हैं; यह स्थल हड़प्पा सभ्यता का दक्षिणतम बिंदु माना जाता है।
23. सैंधव सभ्यता का महान स्नानागार प्राप्त हुआ है?
(a) मोहनजोदड़ो
(b) हड़प्पा
(c) लोथल
(d) कालीबंगा
U.P.P.C.S. (Pre) 1992
उत्तर-(a)
मोहनजोदड़ो (सिंध, पाकिस्तान) से प्राप्त महान स्नानागार सैंधव स्थापत्य का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। इसकी लंबाई उत्तर-दक्षिण में 55 मीटर तथा चौड़ाई पूर्व-पश्चिम में 33 मीटर है। केंद्रीय जलकुंड 11.88 मीटर लंबा, 7.01 मीटर चौड़ा और 2.43 मीटर गहरा है। कुंड को जलरोधक बनाने के लिए पक्की ईंटों पर डामर का लेप किया गया था। यह किसी धार्मिक अनुष्ठान से सम्बद्ध सार्वजनिक स्नानागार था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:महान स्नानागार के चारों ओर स्तम्भों वाले बरामदे और आठ छोटे-छोटे स्नानकक्ष थे, जो संभवतः पुजारियों या अभिजात वर्ग के व्यक्तिगत उपयोग के लिए बने थे।
लोथल (गुजरात) में एक विशाल डॉकयार्ड (बंदरगाह) मिला है जो समुद्री व्यापार का प्रमाण है — इसकी लंबाई लगभग 214 मीटर और चौड़ाई 36 मीटर थी।
24. निम्न में से सिंधु सभ्यता से संबंधित कौन-से केंद्र उत्तर प्रदेश में स्थित हैं?
नीचे दिए कूटों में से सही उत्तर का चयन कीजिए-
I. कालीबंगा
II. लोथल
III. आलमगीरपुर
IV. हुलास
>कूट :
(a) I, II, III, IV
(b) I, II
(c) II, III
(d) III, IV
U.P.P.C.S. (Pre) 2018
उत्तर-(d)
कालीबंगा राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में और लोथल गुजरात के अहमदाबाद जिले में स्थित है। आलमगीरपुर उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में हिंडन नदी के किनारे स्थित है, जबकि हुलास सहारनपुर जिले में स्थित है। ये दोनों ही उत्तर प्रदेश में हड़प्पाकालीन पुरास्थल हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:आलमगीरपुर को हड़प्पा सभ्यता का सबसे पूर्वी ज्ञात स्थल माना जाता है; इसकी खोज 1958 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा की गई थी।
उत्तर प्रदेश में सिंधु सभ्यता के अन्य स्थल भी हैं जैसे बड़ागाँव (सहारनपुर), माँट (मथुरा) — ये सभी इस सभ्यता के पूर्वी विस्तार को प्रमाणित करते हैं।
25. निम्नांकित में किसका सुमेल नहीं है?
(a) आलमगीरपुर – उत्तर प्रदेश
(b) लोथल – गुजरात
(c) कालीबंगा – हरियाणा
(d) रोपड़ – पंजाब
U.P.P.C.S. (Pre) 1996
उत्तर-(c)
कालीबंगा राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में घग्गर नदी के किनारे स्थित है, न कि हरियाणा में। इसकी पहचान सर्वप्रथम 1951 में पुरातत्वविद् अमलानंद घोष ने की थी और बाद में 1961-69 के मध्य बी. बी. लाल तथा बी. के. थापर ने इसका व्यवस्थित उत्खनन किया। शेष तीनों युग्म सुमेलित हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:कालीबंगा से पूर्व-हड़प्पाकालीन और हड़प्पाकालीन दोनों स्तरों के साक्ष्य मिले हैं। यहाँ से विश्व के सबसे प्राचीन जुते हुए खेत (Ploughed Field) का साक्ष्य प्राप्त हुआ है।
कालीबंगा से अग्निवेदियाँ (Fire Altars) मिली हैं जो हड़प्पा स्थलों में असाधारण है और यज्ञ-अनुष्ठानों की ओर संकेत करती हैं।
26. हड़प्पा संस्कृति के स्थल एवं उनकी स्थिति संबंधी निम्नलिखित युग्मों में से कौन एक सही सुमेलित नहीं है?
(a) आलमगीरपुर – उत्तर प्रदेश
(b) बनावली – हरियाणा
(c) दैगाबाद – महाराष्ट्र
(d) राखीगढ़ी – राजस्थान
U.P. U.D.A./L.D.A. (Pre) 2006
उत्तर-(d)
राखीगढ़ी हरियाणा के हिसार जिले में घग्गर नदी के तट पर स्थित है, राजस्थान में नहीं। इसकी खोज 1969 में सूरजभान ने की थी। बनावली भी हरियाणा (फतेहाबाद जिला) में है। शेष सभी युग्म सुमेलित हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:राखीगढ़ी में हाल के उत्खनन कार्यों (2013-2016) के दौरान DNA विश्लेषण हेतु मानव कंकाल प्राप्त हुए हैं जो सैंधव जनसंख्या की उत्पत्ति को समझने में क्रांतिकारी सिद्ध हो सकते हैं।
बनावली से मिट्टी से बना हल (Toy Plough) मिला है जो कृषि गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण साक्ष्य है।
27. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए।
सूची-I सूची-II
(हड़प्पा संस्कृति की बस्ती) (नदी जिस पर अवस्थित है)
A. हड़प्पा – भोगवा
B. कालीबंगा – घग्गर
C. लोथल – रावी
D. रोपड़ – सतलज
कूट :
(a) 3 2 1 4
(b) 3 4 1 2
(c) 4 2 3 1
(d) 1 3 2 4
U.P.U.D.A./L.D.A. (Mains) 2010
उत्तर-(a)
सही सुमेलन इस प्रकार है — हड़प्पा: रावी नदी (पंजाब, पाकिस्तान), कालीबंगा: घग्गर नदी (राजस्थान), लोथल: भोगवा नदी (गुजरात), रोपड़: सतलज नदी (पंजाब, भारत)। सूची में A के सामने ‘भोगवा’ और C के सामने ‘रावी’ दिया गया है — ये आपस में अदला-बदली हैं, इसलिए A=3 (रावी), C=1 (भोगवा) सही है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:हड़प्पा को 1826 में चार्ल्स मैसन ने पहली बार देखा था और 1921 में दयाराम साहनी ने इसका प्रथम वैज्ञानिक उत्खनन किया था — इसीलिए इस सभ्यता का नाम हड़प्पा सभ्यता पड़ा।
रोपड़ (वर्तमान नाम: रूपनगर) स्वतंत्र भारत में खोजा गया पहला हड़प्पाकालीन स्थल था; इसकी खोज 1953 में यज्ञदत्त शर्मा ने की थी।
28. सिंधु घाटी सभ्यता जानी जाती है-
(1) अपने नगर नियोजन के लिए
(2) मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के लिए
(3) अपने कृषि संबंधी कार्य के लिए एवं
(4) अपने उद्योगों के लिए
नीचे दिए गए कूटों में से सही उत्तर का चयन कीजिए
कूट :
(a) 1 और 2
(b) 1, 2 और 3
(c) 2, 3 और 4
(d) उपर्युक्त सभी
Uttarakhand U.D.A./L.D.A. (Pre) 2003
उत्तर-(d)
सिंधु घाटी सभ्यता चारों उल्लिखित विशेषताओं के लिए प्रसिद्ध है। नगर नियोजन में ग्रिड पैटर्न, पक्की ईंटें और जल-निकासी व्यवस्था अद्वितीय थी। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो इसके दो प्रमुख नगर हैं। कालीबंगा से जुते हुए खेत के और बनावली से हल के साक्ष्य कृषि-कार्य की पुष्टि करते हैं। मोहनजोदड़ो, हड़प्पा और चन्हूदड़ो में मनका निर्माण व शंख उद्योग के साक्ष्य मिले हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:सिंधु सभ्यता में मानकीकृत बाट और माप (Standardized Weights & Measures) का प्रयोग होता था। ये बाट घनाभ (Cuboid) आकार के थे और 16 के गुणकों में बढ़ते थे।
सिंधु सभ्यता की नगर-योजना में सड़कें एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं और मुख्य सड़क की चौड़ाई लगभग 9-10 मीटर तक होती थी — इसे ‘प्रथम ग्रिड नगर’ की संज्ञा दी जाती है।
29. हड़प्पा किस नदी के किनारे अवस्थित है?
(a) व्यास
(b) सतलज
(c) रावी
(d) घग्गर
Jharkhand P.C.S. (Mains) 2016
उत्तर-(c)
हड़प्पा पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के मोंटगोमरी (वर्तमान साहिवाल) जिले में रावी नदी के बाएँ तट पर स्थित है। यह सभ्यता का प्रथम खोजा गया नगर था और इसी के नाम पर पूरी सभ्यता को ‘हड़प्पा सभ्यता’ कहा जाता है। दयाराम साहनी ने 1921 में इसे पुरातात्विक दृष्टि से विश्व के सामने प्रस्तुत किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:हड़प्पा में दो टीले मिले हैं — पश्चिमी टीले पर दुर्ग (Citadel) और पूर्वी टीले पर निचला नगर था। अनाज भंडारगृह (Granaries) भी यहाँ मिले हैं जो राज्य-नियंत्रित आर्थिक व्यवस्था का संकेत देते हैं।
हड़प्पा से ‘R-37’ नामक एक विशाल कब्रिस्तान मिला है जो हड़प्पाकालीन अंत्येष्टि प्रथाओं को समझने का प्रमुख स्रोत है।
30. ‘विशाल स्नानागार’ किस पुरातत्व-स्थल से पाया गया था?
(a) रोपड़
(b) हड़प्पा
(c) मोहनजोदड़ो
(d) कालीबंगा
Uttarakhand U.D.A./L.D.A. (Mains) 2007 | U.P.P.S.C. (GIC) 2010
उत्तर-(c)
विशाल स्नानागार मोहनजोदड़ो (सिंध, पाकिस्तान) के पश्चिमी टीले पर स्थित है। इसे उत्खनन में 1922 में राखालदास बनर्जी ने प्रकाश में लाया था। इस स्नानागार की विशेषता यह थी कि इसकी दीवारें और फर्श जलरोधक बनाने के लिए डामर (Bitumen/Tar) से लीपी गई थीं। पुरातत्वविद् जॉन मार्शल ने इसे “प्राचीन विश्व का सबसे प्रभावशाली स्मारक” कहा है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:महान स्नानागार से सटे एक विशाल अन्नागार (Granary) के भी अवशेष मिले हैं — यह संभवतः नगर का सबसे बड़ा भवन था जो केंद्रीय प्रशासन से जुड़ा था।
मोहनजोदड़ो का अर्थ सिंधी भाषा में ‘मृतकों का टीला’ है। इसकी खोज 1922 में हुई और यह यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित है।
31. सिंधु सभ्यता का कौन-सा स्थान भारत में स्थित है ?
(a) हड़प्पा
(b) मोहनजोदड़ो
(c) लोथल
(d) इनमें से कोई नहीं
U.P.P.C.S. (Pre) 1995
उत्तर-(c)
लोथल सिंधु सभ्यता का एक प्रमुख नगर था जो वर्तमान गुजरात राज्य के अहमदाबाद जिले में भोगवा नदी के तट पर, सरगवाल ग्राम के निकट स्थित है। इसके विपरीत हड़प्पा पाकिस्तान के पंजाब में तथा मोहनजोदड़ो पाकिस्तान के सिंध प्रांत में स्थित हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:लोथल में एक विशाल गोदी (Dockyard) के अवशेष मिले हैं, जो विश्व की प्राचीनतम ज्ञात बंदरगाहों में से एक मानी जाती है। यहाँ से चावल की भूसी और घोड़े की मूर्ति के प्रमाण भी मिले हैं, जो इसे अन्य हड़प्पाई स्थलों से विशिष्ट बनाते हैं।
32. सिंधु घाटी सभ्यता का कौन-सा स्थान अब पाकिस्तान में है?
(a) कालीबंगा
(b) हड़प्पा
(c) लोथल
(d) आलमगीरपुर
U.P.P.C.S. (Spl.) (Pre) 1994
उत्तर-(b)
हड़प्पा के अवशेष आधुनिक पाकिस्तान के मांटगोमरी (वर्तमान नाम: शाहीवाल) जिले में स्थित हैं। यह नगर रावी नदी के बाएं तट पर बसा था। कालीबंगा राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में, लोथल गुजरात में तथा आलमगीरपुर उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में स्थित है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:हड़प्पा की खोज सर्वप्रथम 1826 में चार्ल्स मेसन ने की थी और 1921 में दयाराम साहनी ने इसका विधिवत उत्खनन करवाया। यहाँ से अन्नागार (Granary) के अवशेष मिले हैं जो हड़प्पाई अर्थव्यवस्था की सुदृढ़ता को दर्शाते हैं।
33. हड़प्पा संस्कृति के निम्नलिखित स्थलों में कौन सिंध में अवस्थित है?
1. हड़प्पा
2. मोहनजोदड़ो
3. चन्हूदड़ों
4. सुरकोटडा
नीचे दिए गए कूट में से सही कूट :
उत्तर निर्दिष्ट कीजिए
(a) 1 एवं 2
(b) 2 एंव 3
(c) 2, 3 एवं 4
(d) 1, 2, 3 एंव 4
U.P.P.S.C. (GIC) 2010
उत्तर-(b)
हड़प्पा पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित है, जबकि मोहनजोदड़ो और चन्हूदड़ो दोनों पाकिस्तान के सिंध प्रांत में अवस्थित हैं। सुरकोटडा भारत के गुजरात राज्य में स्थित एक हड़प्पाकालीन पुरास्थल है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:सुरकोटडा (गुजरात) से घोड़े की अस्थियों के अवशेष मिले हैं, जो हड़प्पा सभ्यता में घोड़े की उपस्थिति का संकेत देते हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ से एक विशेष प्रकार के कब्रिस्तान के प्रमाण भी मिले हैं।
34. हड़प्पा सभ्यता स्थल लोथल, स्थित है-
(a) गुजरात में
(b) पंजाब में
(c) राजस्थान में
(d) सिंध में
U.P.P.C.S. (Mains) 2009
Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2010
उत्तर-(a)
लोथल गुजरात राज्य के अहमदाबाद जिले में भोगवा नदी के तट पर स्थित है। यह हड़प्पा सभ्यता का एक महत्त्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था। इसकी खोज एस. आर. राव ने 1954 में की थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:लोथल में मिली गोदीवाड़ा (Dockyard) संरचना लगभग 37 मीटर × 22 मीटर आकार की है और यह ईंटों से निर्मित है — यह प्राचीन विश्व की सबसे सुनियोजित बंदरगाहों में से एक मानी जाती है। यहाँ से द्विमुखी आरी (Double-edged saw) भी प्राप्त हुई है।
35. मोहनजोदड़ो निम्नलिखित में से कहां पर स्थित है ?
(a) भारत के गुजरात राज्य में
(b) भारत के पंजाब राज्य में
(c) पाकिस्तान के सिंध प्रांत में
(d) अफगानिस्तान में
M.P.P.C.S. (Pre) 2012
उत्तर-(c)
मोहनजोदड़ो पाकिस्तान के सिंध प्रांत में सिंधु नदी के दाहिने तट पर स्थित है। इसकी खोज राखालदास बनर्जी ने 1922 में की थी। मोहनजोदड़ो का अर्थ सिंधी भाषा में ‘मुर्दों का टीला’ होता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:मोहनजोदड़ो से प्रसिद्ध ‘पुरोहित राजा की मूर्ति’ (Priest-King), ‘नर्तकी की कांस्य प्रतिमा’ तथा विशाल स्नानागार (Great Bath) के अवशेष प्राप्त हुए हैं। विशाल स्नानागार लगभग 12 × 7 मीटर का है और इसे धार्मिक शुद्धिकरण के लिए उपयोग किया जाता था।
36. दधेरी एक परवर्ती हड़प्पीय पुरास्थल है- उत्तर प्रदेश का
(a) जम्मू का
(b) पंजाब का
(c) हरियाणा का
(d)
U.P.P.C.S. (Mains) 2014
उत्तर-(b)
दधेरी एक परवर्ती हड़प्पाकालीन पुरास्थल है जो पंजाब राज्य के लुधियाना जिले में गोविंदगढ़ के समीप स्थित है। यह स्थल चित्रित धूसर मृद्भांड (Painted Grey Ware) संस्कृति से संबद्ध है, जिसे प्रायः वैदिक-उत्तर काल से जोड़ा जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:चित्रित धूसर मृद्भांड (PGW) संस्कृति का काल लगभग 1200–600 ईसा पूर्व माना जाता है और इसे महाभारत काल की भौतिक संस्कृति से भी जोड़ा जाता है। दधेरी में मिले साक्ष्य हड़प्पा सभ्यता के पतन के बाद की सांस्कृतिक निरंतरता को दर्शाते हैं।
37. रंगपुर जहां हड़प्पा की समकालीन सभ्यता थी, है- उत्तर प्रदेश में
(a) पंजाब में
(b) पूर्वी
(c) सौराष्ट्र में
(d) राजस्थान में
R.A.S. / R.T.S. (Pre) 1999
उत्तर-(c)
रंगपुर गुजरात राज्य के सौराष्ट्र क्षेत्र में भादर नदी के तट पर स्थित है। यहाँ उत्खनन से प्राक्-हड़प्पा, हड़प्पा और उत्तर-हड़प्पाकालीन तीनों चरणों के पुरातात्विक साक्ष्य प्राप्त हुए हैं, जो इसे एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थल बनाते हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:रंगपुर से धान की भूसी (Rice Husk) के अवशेष प्राप्त हुए हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि हड़प्पाकालीन लोग चावल की खेती से परिचित थे। यह साक्ष्य हड़प्पा सभ्यता की कृषि विविधता को उजागर करता है।
38. चन्हूदड़ो के उत्खनन का निर्देशन किया था –
(a) जे.एच. मैके ने
(b) सर जॉन मार्शल ने
(c) आइ. ई. एम. ह्वीलर ने
(d) सर आरेल स्टीन ने
U.P. Lower Sub. (Pre) 2015
उत्तर-(a)
चन्हूदड़ो मोहनजोदड़ो से लगभग 130 किमी. दक्षिण-पूर्व में स्थित है। इसकी प्रारंभिक खोज 1931 में एन. जी. मजूमदार ने की थी। तत्पश्चात् 1935–36 में जे. एच. मैके ने यहाँ व्यवस्थित उत्खनन करवाया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:चन्हूदड़ो एकमात्र हड़प्पाई नगर है जहाँ किले (Citadel) के अवशेष नहीं मिले। यहाँ से मनके बनाने के कारखाने (Bead-making factory) के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं, जो इसे एक प्रमुख शिल्प केंद्र सिद्ध करते हैं।
39. सूची I को सूची II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे कूट से सही दिए गए
सूची – I (हड़प्पा पुरास्थल) सूची II ( संघ राज्यक्षेत्र / भारत के राज्य)
A. बालू-1. उत्तर प्रदेश
B. मांडा-2. जम्मू एवं कश्मीर
C. पाडरी-3. हरियाणा
D. हुलास 4. गुजरात
कूट :
A B C D उत्तर चुनिए –
(a) 3 2 1 4
(b) 2 3 4 1
(c) 3 4 3 1
(d) 3 2 4 1
U.P.P.S.C. (Pre) 2020
उत्तर-(d)
सही सुमेलन इस प्रकार है — बालू: हरियाणा, मांडा: जम्मू एवं कश्मीर, पाडरी: गुजरात, हुलास: उत्तर प्रदेश। मांडा, जम्मू जिले में चिनाब नदी के तट पर स्थित है और यह हड़प्पा सभ्यता का सबसे उत्तरी ज्ञात स्थल है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:बालू (हरियाणा) से हड़प्पाकालीन अग्निकुंड के अवशेष मिले हैं जो धार्मिक अनुष्ठानों की ओर संकेत करते हैं। हुलास (उत्तर प्रदेश) गंगा-यमुना दोआब में स्थित है, जो हड़प्पा सभ्यता के पूर्वी विस्तार का प्रमाण है।
40. सिंधु घाटी सभ्यता का कौन-सा स्थान अब पाकिस्तान में है?
(a) कालीबंगा
(b) हड़प्पा
(c) लोथल
(d) आलमगीरपुर
U.P.P.C.S. (Spl.) (Pre) 1994
उत्तर-(b)
हड़प्पा नगर आधुनिक पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के शाहीवाल (पूर्व नाम: मांटगोमरी) जिले में रावी नदी के तट पर स्थित है। कालीबंगा राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में घग्घर नदी के किनारे, लोथल गुजरात में भोगवा नदी के तट पर, और आलमगीरपुर उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में हिंडन नदी के किनारे स्थित है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: हड़प्पा स्थल की खोज सर्वप्रथम 1826 ई. में चार्ल्स मेसन ने की थी, लेकिन वैज्ञानिक उत्खनन दयाराम साहनी ने 1921 में करवाया। हड़प्पा में दो अलग-अलग टीले मिले हैं — एक दुर्ग क्षेत्र और एक आवासीय क्षेत्र — जो इस नगर की सुनियोजित नगर-व्यवस्था को दर्शाते हैं।
41. सिंधु सभ्यता का कौन-सा स्थान भारत में स्थित है ?
(a) हड़प्पा
(b) मोहनजोदड़ो
(c) लोथल
(d) इनमें से कोई नहीं
U.P.P.C.S. (Pre) 1995
उत्तर-(c)
लोथल गुजरात के अहमदाबाद जिले में भोगवा नदी के तट पर सरगवाल गाँव के समीप स्थित है। यह सिंधु सभ्यता का एकमात्र ऐसा स्थल है जहाँ एक विशाल बंदरगाह (Dockyard) के साक्ष्य मिले हैं, जो इसे एक महत्त्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र सिद्ध करता है। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो दोनों वर्तमान पाकिस्तान में स्थित हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: लोथल का उत्खनन 1955-62 के बीच भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (ASI) के एस. आर. राव ने करवाया था। यहाँ से प्राप्त चावल के साक्ष्य यह सिद्ध करते हैं कि हड़प्पा काल में चावल की खेती भी होती थी।
42. मोहनजोदड़ो निम्नलिखित में से कहां पर स्थित है ?
(a) भारत के गुजरात राज्य में
(b) भारत के पंजाब राज्य में
(c) पाकिस्तान के सिंध प्रांत में
(d) अफगानिस्तान में
M.P.P.C.S. (Pre) 2012
उत्तर-(c)
मोहनजोदड़ो पाकिस्तान के सिंध प्रांत में सिंधु नदी के दाहिने तट पर स्थित है। इसका अर्थ सिंधी भाषा में “मृतकों का टीला” होता है। यहाँ से विशाल स्नानागार (Great Bath), अन्नागार और एक नृत्यरत नारी की कांस्य मूर्ति जैसे महत्त्वपूर्ण पुरावशेष प्राप्त हुए हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मोहनजोदड़ो की खोज 1922 में आर. डी. बनर्जी ने की थी। यहाँ से प्राप्त महान स्नानागार (Great Bath) की लंबाई 11.88 मीटर, चौड़ाई 7.01 मीटर और गहराई 2.43 मीटर है, जो धार्मिक स्नान के लिए उपयोग किया जाता था।
43. हड़प्पा संस्कृति के निम्नलिखित स्थलों में कौन सिंध में अवस्थित है? q1. हड़प्पा z2. मोहनजोदड़ो q3. चन्हूदड़ों z4. सुरकोटडा नीचे दिए गए कूट में से सही कूट :
उत्तर निर्दिष्ट कीजिए
(a) 1 एवं 2
(b) 2 एंव 3
(c) 2, 3 एवं 4
(d) 1, 2, 3 एंव 4
U.P.P.S.C. (GIC) 2010
उत्तर-(b)
हड़प्पा पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में रावी नदी के तट पर स्थित है। मोहनजोदड़ो और चन्हूदड़ो दोनों पाकिस्तान के सिंध प्रांत में स्थित हैं। सुरकोटडा भारत के गुजरात राज्य में स्थित है जहाँ से घोड़े की हड्डियों के प्रारंभिक साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चन्हूदड़ो सिंध का एकमात्र ऐसा हड़प्पाकालीन स्थल है जहाँ कोई दुर्ग (Citadel) नहीं मिला। यहाँ से मनके (Beads) बनाने के कारखाने के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं, जो इसे एक प्रमुख शिल्प-उत्पादन केंद्र दर्शाते हैं।
44. रंगपुर जहां हड़प्पा की समकालीन सभ्यता थी, है- उत्तर प्रदेश में
(a) पंजाब में
(b) पूर्वी
(c) सौराष्ट्र में
(d) राजस्थान में
R.A.S. / R.T.S. (Pre) 1999
उत्तर-(c)
रंगपुर गुजरात राज्य के सौराष्ट्र क्षेत्र में भादर नदी के तट पर स्थित है। यहाँ से प्राक्-हड़प्पा, परिपक्व हड़प्पा और उत्तर-हड़प्पाकालीन — तीनों अवस्थाओं के साक्ष्य मिले हैं, जो इसे एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पुरास्थल बनाते हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: रंगपुर का उत्खनन 1953-54 में ए. रंगनाथ राव ने करवाया था। यहाँ से धान की भूसी (Rice Husk) के साक्ष्य मिले हैं, जो सिंधु सभ्यता में चावल के उपयोग का प्रमाण देते हैं।
45. चन्हूदड़ो के उत्खनन का निर्देशन किया था –
(a) जे.एच. मैके ने
(b) सर जॉन मार्शल ने
(c) आइ. ई. एम. ह्वीलर ने
(d) सर आरेल स्टीन ने
U.P. Lower Sub. (Pre) 2015
उत्तर-(a)
चन्हूदड़ो मोहनजोदड़ो से लगभग 130 किमी. दक्षिण-पूर्व में सिंध प्रांत में स्थित है। इसकी खोज सर्वप्रथम 1931 में एन. जी. मजूमदार ने की थी। तत्पश्चात् 1935-36 में अमेरिकन स्कूल ऑफ इंडिक एंड ईरेनियन स्टडीज़ के अंतर्गत जे. एच. मैके ने यहाँ व्यवस्थित उत्खनन करवाया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चन्हूदड़ो में उत्खनन से बिल्ली के पीछे कुत्ते के पंजों के निशान वाली एक ईंट मिली है, जो उस काल में पालतू पशुओं की उपस्थिति का रोचक प्रमाण है। यह स्थल हड़प्पाकालीन मनकों (Beads) और सीप की कलाकृतियों के निर्माण के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध था।
46. दधेरी एक परवर्ती हड़प्पीय पुरास्थल है- उत्तर प्रदेश का
(a) जम्मू का
(b) पंजाब का
(c) हरियाणा का
(d)
U.P.P.C.S. (Mains) 2014
उत्तर-(b)
दधेरी एक परवर्ती हड़प्पाकालीन पुरास्थल है जो भारतीय पंजाब के लुधियाना जिले में गोविंदगढ़ के निकट स्थित है। यह स्थल चित्रित धूसर मृद्भांड (Painted Grey Ware) संस्कृति से संबंधित है, जो प्रायः आर्यों के आगमन के काल से जोड़ी जाती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: दधेरी से ताँबे की वस्तुएँ और हड्डी के उपकरण प्राप्त हुए हैं। यह स्थल हड़प्पा सभ्यता के पतन के बाद की संक्रमणकालीन सांस्कृतिक स्थिति को समझने के लिए पुरातत्त्वविदों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
47. हड़प्पा सभ्यता स्थल लोथल, स्थित है-
(a) गुजरात में
(b) पंजाब में
(c) राजस्थान में
(d) सिंध में
U.P.P.C.S. (Mains) 2009
Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2010
उत्तर-(a)
लोथल गुजरात के अहमदाबाद जिले में भोगवा नदी के तट पर स्थित है। यह हड़प्पा सभ्यता का एक प्रमुख बंदरगाह नगर था। यहाँ से एक सुनियोजित बंदरगाह (Dockyard) के स्पष्ट साक्ष्य मिले हैं, जो दर्शाते हैं कि यह नगर अरब सागर के रास्ते मेसोपोटामिया से व्यापार का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: लोथल से एक युगल शवाधान (Double Burial) का साक्ष्य मिला है। यहाँ से प्राप्त बंदरगाह की लंबाई 219 मीटर और चौड़ाई 37 मीटर थी, जो उस काल की उन्नत इंजीनियरिंग का प्रमाण है।
48. सूची I को सूची II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे कूट से सही दिए गए
सूची – I (हड़प्पा पुरास्थल) सूची II ( संघ राज्यक्षेत्र / भारत के राज्य)
A. बालू-1. उत्तर प्रदेश
B. मांडा-2. जम्मू एवं कश्मीर
C. पाडरी-3. हरियाणा
D. हुलास 4. गुजरात
कूट :
A B C D उत्तर चुनिए –
(a) 3 2 1 4
(b) 2 3 4 1
(c) 3 4 3 1
(d) 3 2 4 1
U.P.P.S.C. (Pre) 2020
उत्तर-(d)
सही सुमेलन इस प्रकार है — बालू: हरियाणा (कैथल जिले में घग्घर नदी के तट पर स्थित), मांडा: जम्मू एवं कश्मीर (चिनाब नदी के तट पर, यह सिंधु सभ्यता का सर्वाधिक उत्तरी पुरास्थल है), पाडरी: गुजरात (समुद्र तट के निकट स्थित, नमक उत्पादन के साक्ष्य मिले हैं), हुलास: उत्तर प्रदेश (सहारनपुर जिले में स्थित)।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मांडा (जम्मू-कश्मीर) हड़प्पा सभ्यता का सबसे उत्तरी छोर पर स्थित पुरास्थल है। पाडरी (गुजरात) से नमक के उत्पादन के सबसे प्राचीन साक्ष्य मिले हैं, जो समुद्री व्यापार में इसकी भूमिका को रेखांकित करते हैं।
49. सिंधु घाटी के लोग पूजा करते थे-
(a) पशुपति की
(b) इंद्र और वरुण की
(c) ब्रह्मा की
(d) विष्णु की
Uttarakhand P.C.S. (Mains) 2006
उत्तर-(a)
मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक प्रसिद्ध मोहर पर ध्यान-मुद्रा में बैठे एक योगी का चित्र उत्कीर्ण है, जिसके चारों ओर विभिन्न पशु अंकित हैं। इस आकृति को विद्वानों ने ‘आद्य-शिव’ या ‘पशुपति’ की संज्ञा दी है। यह हड़प्पा सभ्यता में शिव-उपासना की प्राचीनतम साक्ष्य मानी जाती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:इस मोहर की खोज 1928 में जॉन मार्शल ने की थी। हड़प्पावासियों में वृक्ष-पूजा (विशेषतः पीपल) और नाग-पूजा के भी प्रमाण मिले हैं।
50. भारत में हड़प्पा का वृहद स्थल है-
(a) राखीगढ़ी
(b) धौलावीरा
(c) कालीबंगा
(d) लोथल
Jharkhand P.C.S. (Pre) 2016
उत्तर-(a)
हरियाणा के हिसार जिले में स्थित राखीगढ़ी, भारत में हड़प्पा सभ्यता का सबसे विस्तृत पुरास्थल है। इसका क्षेत्रफल लगभग 350 हेक्टेयर आँका गया है। समग्र रूप से मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, गनवेरीवाला (पाकिस्तान) तथा राखीगढ़ी और धौलावीरा (भारत) — ये पाँचों वृहद स्थलों की श्रेणी में आते हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:राखीगढ़ी में 2018–19 में किए गए DNA विश्लेषण (CCMB, हैदराबाद) ने यहाँ के निवासियों के आनुवंशिक स्वरूप को समझने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
51. निम्न में से किस हड़प्पाकालीन स्थल से ‘हल’ का टेराकोटा प्राप्त हुआ?
(a) धौलावीरा
(b) बनावली
(c) कालीबंगा
(d) लोथल
60th to 62nd B.P.S.C. (Pre) 2016
उत्तर-(b)
हरियाणा के फतेहाबाद जिले में स्थित बनावली से मिट्टी से बना हल (टेराकोटा) प्राप्त हुआ है, जो हड़प्पाकालीन कृषि-उपकरणों का दुर्लभ साक्ष्य है। इससे सिद्ध होता है कि हड़प्पावासी उन्नत कृषि पद्धतियों से परिचित थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:कालीबंगा (राजस्थान) से जुते हुए खेत के निशान (ploughed field) प्राप्त हुए हैं, जो विश्व में अब तक के सबसे प्राचीन जुते हुए खेत के प्रमाण माने जाते हैं।
52. सिंधु घाटी सभ्यता का पत्तन नगर था-
(a) हड़प्पा
(b) कालीबंगा
(c) लोथल
(d) मोहनजोदड़ो
U.P.P.C.S. (Pre) 1999
उत्तर-(c)
गुजरात के अहमदाबाद जिले में भोगावा नदी के तट पर स्थित लोथल सिंधु घाटी सभ्यता का प्रमुख बंदरगाह नगर था। यहाँ एक विशाल ‘डॉकयार्ड’ (गोदी) के अवशेष मिले हैं जो समुद्री व्यापार की गतिविधियों का प्रमाण देते हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:लोथल की खोज 1954–55 में भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के डॉ. एस.आर. राव ने की थी। यहाँ से धान (चावल) की भूसी के भी साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
53. स्थापित सिंधु घाटी सभ्यता जिन नदियों के तट पर बसी थी, वे थीं — नीचे दिए गए कूट में सही उत्तर का चयन कीजिए।
1. सिंधु
2. चेनाब
3. झेलम
4. गंगा
कूट:
(a) 1 और 2
(b) 1, 2 और 3
(c) 2, 3 और 4
(d) सभी चारों
U.P.P.C.S. (Pre) 2009
उत्तर-(b)
सिंधु घाटी सभ्यता मुख्यतः सिंधु, चेनाब और झेलम नदियों के तटीय क्षेत्रों में पल्लवित हुई। इसका विस्तार उत्तर में झेलम के पूर्वी तट से लेकर दक्षिण में यमुना की सहायक नदी हिंडन तक था। गंगा नदी इस सभ्यता के प्रमुख क्षेत्र में सम्मिलित नहीं थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:हड़प्पा सभ्यता का भौगोलिक विस्तार लगभग 12.5 लाख वर्ग किमी था, जो मेसोपोटामिया और मिस्र की सभ्यताओं से भी अधिक था।
54. निम्नलिखित में से कौन-सा एक हड़प्पा का बंदरगाह है?
(a) सिकंदरिया
(b) लोथल
(c) महास्थानगढ़
(d) नागपट्टनम
53rd to 55th B.P.S.C. (Pre) 2011
उत्तर-(b)
लोथल हड़प्पा सभ्यता का एकमात्र ज्ञात बंदरगाह नगर है जहाँ एक सुनियोजित गोदीबाड़ा (डॉकयार्ड) मिला है। इसकी माप लगभग 216×37 मीटर है और यह ईंटों से निर्मित था। यह गोदी ज्वार-भाटे के अनुसार जहाजों के ठहरने के लिए उपयुक्त थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:लोथल से प्राप्त मनकों, माप-बाटों और मुहरों से यह स्पष्ट होता है कि यहाँ से मेसोपोटामिया (वर्तमान इराक) के साथ समुद्री व्यापार होता था।
55. भारत का सबसे बड़ा हड़प्पन पुरास्थल है-
(a) आलमगीरपुर
(b) कालीबंगा
(c) लोथल
(d) राखीगढ़ी
U.P.P.C.S. (Spl.) (Mains) 2004
उत्तर-(d)
राखीगढ़ी (हिसार, हरियाणा) भारत का सबसे बड़ा हड़प्पन पुरास्थल है। इसमें कम से कम सात टीले (mounds) शामिल हैं और यह लगभग 350 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है। यह समग्र हड़प्पा सभ्यता के पाँच वृहद स्थलों में से एक है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:राखीगढ़ी में उत्खनन कार्य 1969 में सूरजभान ने आरंभ किया था। यहाँ से नालियों की उन्नत व्यवस्था, बड़े अन्नागार और अग्नि-वेदिकाएँ प्राप्त हुई हैं।
56. निम्नलिखित में से कौन-सा घाटी की सभ्यता से संबंधित स्थल नहीं है?
(a) कालीबंगा
(b) रोपड़
(c) पाटलिपुत्र
(d) लोथल
M.P.P.C.S. (Pre) 2013
उत्तर-(c)
कालीबंगा (राजस्थान), रोपड़ (पंजाब) और लोथल (गुजरात) — ये तीनों सिंधु घाटी सभ्यता के महत्त्वपूर्ण स्थल हैं। पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना, बिहार) का संबंध महाजनपद काल और मौर्य साम्राज्य से है, न कि हड़प्पा सभ्यता से।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:पाटलिपुत्र की स्थापना लगभग 490 ई.पू. में अजातशत्रु के काल में हुई थी और यह मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य की राजधानी थी।
57. सिंधु घाटी के लोग विश्वास करते थे-
(a) आत्मा और ब्रह्म में
(b) कर्मकांड में
(c) यज्ञ प्रणाली में
(d) मातृ शक्ति में
R.A.S./R.T.S. (Pre) 1993
उत्तर-(*)
सिंधु सभ्यता की लिपि अद्यावधि अपठित है, इसलिए इन लोगों के धार्मिक विश्वासों के बारे में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। उत्खनन में मिली असंख्य स्त्री-मूर्तियाँ मातृ शक्ति की उपासना का संकेत देती हैं। पशुपति-मुद्रा शिव-पूजा का, अग्निकुंड यज्ञ का और मृतकों के साथ वस्तुएँ दफनाने की परंपरा आत्मा में विश्वास का संकेत देती है। किसी एक विकल्प को निश्चित उत्तर नहीं माना जा सकता, इसलिए यह प्रश्न विवादास्पद (*) है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:हड़प्पा सभ्यता में लिंग-पूजा और योनि-पूजा के भी अनेक साक्ष्य प्राप्त हुए हैं, जो शैव परंपरा की प्राचीनता को दर्शाते हैं।
58. हड़प्पाकालीन स्थलों में अभी तक किस धातु की प्राप्ति नहीं हुई?
(a) तांबा
(b) स्वर्ण
(c) चांदी
(d) लोहा
Chhattisgarh P.C.S.(Pre) 2011
उत्तर-(d)
हड़प्पा सभ्यता एक कांस्ययुगीन (Bronze Age) सभ्यता थी, अर्थात् यहाँ के लोग तांबे और टिन को मिलाकर कांसा बनाना जानते थे। उत्खनन में तांबा, कांसा, सोना और चांदी से बनी वस्तुएँ प्राप्त हुई हैं, लेकिन लोहे का कोई भी साक्ष्य नहीं मिला। इसका कारण यह है कि हड़प्पा सभ्यता के लोग लोहे से पूर्णतः अपरिचित थे। भारत में लौह युग का आरम्भ उत्तर वैदिक काल (लगभग 1000 ई.पू.) से माना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: हड़प्पा सभ्यता में तांबे की अधिकांश आपूर्ति राजस्थान के खेतड़ी क्षेत्र की खानों से होती थी। इसके अलावा, हड़प्पाई कारीगर विश्व में पहली बार कांसे में आर्सेनिक मिलाकर उसे और कठोर बनाने की तकनीक जानते थे।
59. निम्न में से कौन-सा स्थल घग्गर और उसकी सहायक नदियों की घाटी में स्थित है?
(a) आलमगीरपुर
(b) लोथल
(c) मोहनजोदड़ो
(d) बनावली
R.A.S./R.T.S.(Pre) 2010
उत्तर-(d)
बनावली हरियाणा के हिसार जिले में स्थित एक प्रमुख हड़प्पाई पुरास्थल है, जो घग्गर नदी (प्राचीन सरस्वती नदी) और उसकी सहायक नदियों की घाटी में अवस्थित है। इस स्थल की खुदाई में जौ की अच्छी फसल और मिट्टी के हल जैसी दुर्लभ वस्तुएँ मिली हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बनावली से हड़प्पा पूर्व काल और परिपक्व हड़प्पा काल दोनों के साक्ष्य मिले हैं, जो इसे सभ्यता के विकास-क्रम को समझने के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण बनाते हैं। यहाँ से मिट्टी से बना एक हल (plough) मिला है जो हड़प्पाई कृषि का दुर्लभ प्रमाण है।
60. सर्वप्रथम मानव ने निम्न धातु का उपयोग किया –
(a) सोना
(b) चांदी
(c) तांबा
(d) लोहा
R.A.S. / R.T.S. (Pre) 2012
उत्तर-(c)
तांबा (Copper) विश्व की पहली धातु है जिसे मानव ने उपयोग में लाया। यह प्रकृति में शुद्ध अवस्था में भी पाई जाती है, इसलिए इसे गलाने और आकार देने की तकनीक आसानी से विकसित हुई। विभिन्न क्षेत्रों में इसके प्रयोग का काल अलग-अलग रहा है, परन्तु समग्र रूप से मानव इतिहास में तांबे का प्रयोग सर्वप्रथम हुआ।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तांबे के प्रयोग का सबसे पुराना साक्ष्य लगभग 9000 ई.पू. का है, जो आधुनिक तुर्की (अनातोलिया) में मिला है। भारत में ताम्र पाषाण काल (Chalcolithic Age) में तांबे और पत्थर के उपकरण साथ-साथ प्रयोग किए जाते थे; इस काल की प्रमुख संस्कृतियाँ अहार, मालवा और जोर्वे थीं।
61. मोहनजोदड़ो एवं हड़प्पा की पुरातात्विक खुदाई के प्रभारी थे-
(a) लॉर्ड मैकाले
(b) जॉन मार्शल
(c) क्लाइव
(d) कर्नल टाड
R.A.S. / R.T.S. (Pre) 1997
उत्तर-(b)
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) के तत्कालीन महानिदेशक सर जॉन मार्शल के निर्देशन में वर्ष 1921 में दयाराम साहनी ने हड़प्पा तथा वर्ष 1922 में राखालदास (R.D.) बनर्जी ने मोहनजोदड़ो स्थल की खोज की। दोनों स्थलों की विधिवत् खुदाई की जिम्मेदारी जॉन मार्शल की देखरेख में हुई।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जॉन मार्शल ने वर्ष 1924 में लंदन के ‘Illustrated London News’ में सिंधु घाटी सभ्यता की आधिकारिक घोषणा की थी। उन्होंने ही इस सभ्यता को ‘Indus Valley Civilisation’ नाम दिया। वे 1902 से 1928 तक ASI के महानिदेशक रहे।
62. हाथी दांत का पैमाना हड़प्पीय संदर्भ में मिला है-
(a) कालीबंगा में
(b) लोथल में
(c) धौलावीरा में
(d) बनावली में
U.P.R.O./A.R.O. (Mains) 2014
उत्तर-(b)
गुजरात में भोगवा नदी के तट पर स्थित लोथल से हाथी दाँत (ivory) से निर्मित एक मापनी (scale/ruler) प्राप्त हुई है। इससे यह सिद्ध होता है कि हड़प्पाई लोग सटीक माप-तोल की उन्नत प्रणाली से परिचित थे और उनका व्यापार मानकीकृत था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: लोथल से एक पूर्ण डॉकयार्ड (बंदरगाह) के अवशेष भी मिले हैं, जो विश्व के प्राचीनतम कृत्रिम बंदरगाहों में से एक माना जाता है। यहाँ से युगल शवाधान (double burial) का साक्ष्य भी मिला है, जो उस काल के सामाजिक रीति-रिवाजों को दर्शाता है।
63. सिंधु घाटी सभ्यता को खोज निकालने में जिन दो भारतीयों का नाम जुड़ा है, वे हैं-
(a) राखालदास बनर्जी तथा दयाराम साहनी
(b) जॉन मार्शल तथा ईश्वरी प्रसाद
(c) आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव तथा रंगनाथ राव
(d) माधोस्वरूप वत्स तथा वी.राव
Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2003
उत्तर-(a)
सिंधु घाटी सभ्यता की खोज का श्रेय दो भारतीय पुरातत्वविदों को जाता है — दयाराम साहनी, जिन्होंने 1921 में हड़प्पा की खोज की, और राखालदास (R.D.) बनर्जी, जिन्होंने 1922 में मोहनजोदड़ो की खोज की। दोनों ने अपने-अपने स्थलों के महत्व को पहचाना और जॉन मार्शल को सूचित किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: राखालदास बनर्जी एक बौद्ध स्तूप की खोज करने गए थे, जब उन्हें मोहनजोदड़ो के टीले मिले। दयाराम साहनी ने अपनी खोज में हड़प्पा से कई मुहरें (seals) प्राप्त कीं, जिन्हें देखकर पहली बार यह अनुमान लगाया गया कि यह कोई महत्वपूर्ण प्राचीन सभ्यता है।
7. भारत में निम्नलिखित के आने का सही कालानुक्रम क्या है? उत्तर चुनिए-
1. सोने के सिक्के
2. आहत मुद्रा चांदी के सिक्के
3. लोहे का हल
4. नगर संस्कृति
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर उत्तर चुनिए।
कूट : A B C D
(a) 3 4 1 2
(b) 3 4 2 1
(c) 4 3 1 2
(d) 4 3 2 1
I.A.S. (Pre) 1998
उत्तर-(d)
भारत में सर्वप्रथम नगर संस्कृति का उदय हड़प्पा सभ्यता (लगभग 2600-1900 ई.पू.) में हुआ। इसके बाद उत्तर वैदिक काल (लगभग 1000 ई.पू.) में लोहे के हल का प्रयोग प्रारम्भ हुआ, जिसने कृषि क्रांति को गति दी। आहत मुद्रा (Punch-Marked Coins) के रूप में चांदी के सिक्के छठी शताब्दी ई.पू. में प्रचलन में आए। सोने के सिक्के सर्वप्रथम हिन्द-यवन (Indo-Greek) शासकों ने दूसरी शताब्दी ई.पू. में जारी किए और कुषाण काल में इनका प्रचलन व्यापक हुआ। अतः सही क्रम है: नगर संस्कृति → लोहे का हल → आहत मुद्रा → सोने के सिक्के।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: भारत के सबसे प्राचीन आहत सिक्के ‘कार्षापण’ कहलाते थे और इनका उल्लेख पाणिनि की ‘अष्टाध्यायी’ में मिलता है। कुषाण शासक विम कडफिसेस को भारत में स्वर्ण सिक्कों को बड़े पैमाने पर प्रचलित करने का श्रेय दिया जाता है।
64. निम्नलिखित में से कौन सुमेलित नहीं है?
(a) हड़प्पा – दयाराम साहनी
(b) लोथल – एस. आर. राव
(c) सुरकोटडा – जे.पी. जोशी
(d) धौलावीरा – वी. के. थापड़
U.P.P.C.S. (Mains) 2006
उत्तर-(d)
हड़प्पा का उत्खनन दयाराम साहनी (1921), लोथल का उत्खनन एस.आर. राव (1955-62) और सुरकोटडा का उत्खनन जे.पी. जोशी ने कराया — ये तीनों युग्म सही हैं। परन्तु धौलावीरा का उत्खनन वी.के. थापड़ ने नहीं, बल्कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के आर.एस. बिष्ट ने 1989 से 2005 तक कराया था। अतः विकल्प (d) असुमेलित है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: धौलावीरा (गुजरात के कच्छ जिले में) को वर्ष 2021 में UNESCO की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया। यह भारत में स्थित हड़प्पा सभ्यता का सबसे बड़ा पुरास्थल है और यहाँ से विश्व का सबसे पुराना साइनबोर्ड (दस हड़प्पाई अक्षरों में) मिला है।
65. सभ्यता की विकसित अवस्था में निम्नलिखित में से किस स्थल से घरों में कुओं के अवशेष मिले हैं?
(a) हड़प्पा
(b) कालीबंगा
(c) लोथल
(d) मोहनजोदड़ो (3)
U.P.P.C.S. (Pre) 2004
उत्तर-(*)
सिंधु सभ्यता के अधिकांश नगरों के घरों में निजी कुएँ एवं स्नानागार के साक्ष्य मिले हैं। विभिन्न स्रोतों के अनुसार, रामशरण शर्मा की पुस्तक ‘प्राचीन भारत का इतिहास’ में कालीबंगा के लगभग सभी घरों में कुओं का उल्लेख है, जबकि मोहनजोदड़ो से भी घरेलू कुओं के प्रचुर साक्ष्य मिले हैं। इस प्रश्न का उत्तर स्रोत के अनुसार भिन्न हो सकता है, इसलिए इसे (*) यानी विवादास्पद माना गया है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मोहनजोदड़ो में लगभग 700 कुओं की पहचान की गई है, जो किसी भी कांस्य युगीन नगर में सर्वाधिक हैं। हड़प्पा सभ्यता की जल-प्रबंधन प्रणाली इतनी उन्नत थी कि उसे आधुनिक नगर नियोजन का पूर्वज माना जाता है।
66. हड़प्पा का उत्खनन करने वाला प्रथम पुरातत्वविद, जो इसके महत्व को नहीं समझ पाया था-
(a) ए. कनिंघम
(b) सर जॉन मार्शल
(c) मार्टिमर हीलर
(d) जॉर्ज एफ. डेल्स
U.P.P.C.S. (Mains) 2006
उत्तर-(a)
अलेक्जेंडर कनिंघम, जो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पहले महानिदेशक (1861-1865 और 1870-1885) थे, ने 1853 और 1873 में हड़प्पा का दौरा किया था। उन्हें वहाँ कुछ मुहरें और पुरावशेष मिले, परन्तु वे इन्हें किसी अज्ञात लिपि की सामग्री मानकर इसके ऐतिहासिक महत्व को पहचानने में असफल रहे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कनिंघम ने हड़प्पा से प्राप्त एक मुहर को बौद्ध काल की वस्तु समझ लिया था। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में हड़प्पा का उल्लेख तो किया, लेकिन इसे किसी स्वतंत्र और अज्ञात सभ्यता से नहीं जोड़ा। इस चूक के कारण इस महान् सभ्यता की पहचान लगभग 50 वर्षों तक अधूरी रही।
67. निम्नलिखित में से कौन हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के उत्खनन से संबंधित नहीं थे?
(a) आर. डी. बनर्जी
(b) के. एन. दीक्षित
(c) एम. एस. वत्स
(d) वी.ए. स्मिथ
56th to 59th B.P.S.C. (Pre) 2015
उत्तर-(d)
आर.डी. बनर्जी (मोहनजोदड़ो, 1922), के.एन. दीक्षित और एम.एस. वत्स (हड़प्पा, 1926) — ये तीनों विद्वान सिंधु सभ्यता की खुदाई से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े थे। इनके अतिरिक्त अर्नेस्ट मैके, आरेल स्टीन, ए. घोष, जे.पी. जोशी आदि ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। परन्तु वी.ए. स्मिथ (Vincent Arthur Smith) का इस सभ्यता की खोज से कोई सम्बंध नहीं था; वे एक प्रसिद्ध इतिहासकार और कला इतिहासकार थे, जो मुख्यतः मौर्य और गुप्त काल पर अपने कार्य के लिए जाने जाते हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वी.ए. स्मिथ ने ‘Early History of India’ (1904) और ‘The Oxford History of India’ जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं। उन्होंने अशोक के शिलालेखों के अध्ययन में भी उल्लेखनीय कार्य किया, परन्तु सिंधु सभ्यता की खोज उनके कार्यकाल के बाद हुई।
68. धौलावीरा जिस राज्य में स्थित है,
(a) गुजरात
(b) हरियाणा
(c) पंजाब
(d) राजस्थान
U.P.P.C.S. (Mains) 2010
उत्तर-(a)
धौलावीरा गुजरात राज्य के कच्छ जिले के खदिर द्वीप पर स्थित एक प्रमुख हड़प्पाकालीन नगर है। यह भारत में हड़प्पा सभ्यता की दूसरी सबसे बड़ी बस्ती है — पहले स्थान पर हरियाणा स्थित राखीगढ़ी है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:यहाँ से हड़प्पा सभ्यता का एकमात्र बड़ा शिलालेख (साइनबोर्ड) मिला है जिसमें 10 बड़े अक्षर उकेरे गए हैं, हालाँकि इसे अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है। वर्ष 2021 में धौलावीरा को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा प्राप्त हुआ।
69. निम्नलिखित में से किस स्थल से द्वि-शव संस्कार (डबल बरिअल) का प्रमाण मिला है?
(a) कुन्तासी
(b) धौलावीरा
(c) लोथल
(d) कालीबंगा
U.P.P.C.S. (Mains) 2016
उत्तर-(*)
युगल समाधीकरण (Double Burial) से तात्पर्य एक ही कब्र में दो व्यक्तियों को एक साथ दफनाने की प्रथा से है। लोथल से सर्वाधिक तीन युगल समाधीकरण के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं, जबकि कालीबंगा और राखीगढ़ी से भी एक-एक युगल समाधि के प्रमाण मिले हैं। अतः यदि संख्या के आधार पर उत्तर चुना जाए तो (c) लोथल सही है, और यदि प्रमाण को आधार मानें तो (c) व (d) दोनों सही हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:सिंधु सभ्यता में मृतकों को प्रायः उत्तर-दक्षिण दिशा में लिटाकर दफनाया जाता था और साथ में मृद्भांड व आभूषण भी रखे जाते थे। हड़प्पा से शवाधान के तीन प्रकार के साक्ष्य — पूर्ण दफन, आंशिक दफन और दाह-संस्कार — मिले हैं।
70. निम्नलिखित में से कौन-से स्थल में तीन नगरों के अवशेष प्राप्त हुए हैं?
(a) मोहनजोदड़ो
(b) संघोल
(c) कालीबंगा
(d) धौलावीरा
Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2015
उत्तर-(d)
धौलावीरा नगर को तीन स्पष्ट भागों में विभाजित किया गया था — ऊपरी दुर्ग (किला), मध्य नगर और निचला नगर। यह आयताकार नगर योजना हड़प्पा सभ्यता की नगर-निर्माण कुशलता का उत्कृष्ट उदाहरण है। विशेष रूप से यहाँ से एक विशाल स्टेडियम-नुमा संरचना के अवशेष मिले हैं जो सार्वजनिक समारोहों अथवा सभाओं के लिए उपयोग में लाई जाती थी — यह हड़प्पा सभ्यता के किसी अन्य स्थल से प्राप्त नहीं हुई।
71. एक उन्नत जल प्रबंधन व्यवस्था का साक्ष्य प्राप्त हुआ है-
(a) आलमगीरपुर से
(b) धौलावीरा से
(c) कालीबंगा से
(d) लोथल से
U.P.P.C.S. (Mains) 2010
उत्तर-(b)
धौलावीरा में हड़प्पा सभ्यता की सबसे परिष्कृत जल प्रबंधन प्रणाली विद्यमान थी। यहाँ वर्षाजल संचयन के लिए 16 से अधिक बड़े जलाशयों का निर्माण किया गया था जो नहरों और बाँधों की एक सुव्यवस्थित श्रृंखला से जुड़े थे। इस नगर में जल की माँग और आपूर्ति को नियंत्रित करने की अत्यंत वैज्ञानिक व्यवस्था थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:उल्लेखनीय है कि धौलावीरा एक शुष्क क्षेत्र में स्थित था, जहाँ वर्षा बहुत कम होती थी, इसलिए यहाँ की जल-संचयन प्रणाली और भी अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है।
72. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए एवं नीचे दिए गए कूट से सही
1. मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, रोपड़ एवं कालीबंगा सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख स्थल हैं।
2. हड़प्पा के लोगों ने सड़कों तथा नालियों के जाल के साथ नियोजित शहरों का विकास किया।
3. हड़प्पा के लोगों को धातुओं के उपयोग का पता नहीं था।
कूट :
उत्तर चुनिए ।
(a) 1 एवं 2 सही हैं।
(b) 1 एवं 3 सही हैं।
(c) 2 एवं 3 सही हैं।
(d) 1 2 एवं 3 सही हैं।
M.P.P.C.S. (Pre) 2008
उत्तर-(a)
कथन 1 आंशिक रूप से सही है क्योंकि लोथल भी एक प्रमुख स्थल है जिसे सूची में सम्मिलित नहीं किया गया है। कथन 2 पूर्णतः सही है — सैंधव नगरों की सड़कें एक-दूसरे को समकोण (ऑक्सफोर्ड प्रणाली) पर काटती थीं और सड़कों के किनारे पक्की ढकी हुई नालियाँ होती थीं। कथन 3 पूर्णतः गलत है क्योंकि हड़प्पावासी ताँबा, काँसा, सोना और चाँदी जैसी धातुओं का भली-भाँति उपयोग करते थे। विशेष रूप से, हड़प्पा सभ्यता को काँस्य युगीन (Bronze Age) सभ्यता कहा जाता है क्योंकि यहाँ के लोग ताँबे में टिन मिलाकर काँसा बनाने में दक्ष थे।
73. कथन (a) : मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा नगर अब विलुप्त हो गए हैं। कारण (R) : वह खुदाई के दौरान प्रकट हुए थे। उपर्युक्त के संदर्भ में निम्न में से कौन एक सही है?
(a) और (R) दोनों सही हैं तथा (R) सही स्पष्टीकरण है (a) का।
(b) (a) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R) सही स्पष्टीकरण नहीं है (a) का।
(c) (a) सही है, किंतु (R) गलत है।
(d) (a) गलत है, किंतु (R) सही है।
U.P.P.C.S. (Pre) 2009
उत्तर-(b)
कथन सत्य है — मोहनजोदड़ो और हड़प्पा, दोनों नगर वर्तमान में मृतप्राय अवस्था में हैं। कारण भी सत्य है क्योंकि इन्हें उत्खनन के दौरान खोजा गया था — हड़प्पा की खोज 1921 में दयाराम साहनी ने और मोहनजोदड़ो की खोज 1922 में राखालदास बनर्जी ने की थी। परंतु कारण, कथन की सही व्याख्या नहीं करता — ये नगर खुदाई के कारण नहीं, बल्कि समय के साथ बाढ़, जलवायु परिवर्तन, आक्रमण अथवा पर्यावरणीय कारणों से विलुप्त हुए। मोहनजोदड़ो का शाब्दिक अर्थ सिंधी भाषा में “मृतकों का टीला” होता है, जो इसकी विलुप्तता को स्वयं इंगित करता है।
74. हड़प्पन संस्कृति के संदर्भ में शैलकृत स्थापत्य के प्रमाण कहां से मिले हैं?
(a) कालीबंगा
(b) धौलावीरा
(c) कोटदीजी
(d) आमरी
U.P.P.C.S. (Pre) 2006
उत्तर-(b)
धौलावीरा से हड़प्पा सभ्यता में शैलकृत (पत्थर को काटकर बनाई गई) स्थापत्य कला के दुर्लभ प्रमाण प्राप्त हुए हैं। यहाँ पाषाण-निर्मित जलकुंड और प्रवेशद्वार विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। धौलावीरा का विशेष महत्त्व यह है कि यहाँ की अधिकांश संरचनाएँ पकी ईंटों के स्थान पर पत्थर से निर्मित हैं, जो इसे हड़प्पा के अन्य नगरों से अलग बनाती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:यहाँ के उत्खनन का कार्य 1990 से 2005 के बीच भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के आर. एस. बिष्ट के नेतृत्व में सम्पन्न हुआ।
75. कौन-सा हड़प्पीय (Harappan) नगर तीन भागों में विभक्त है?
(a) लोथल
(b) कालीबंगा
(c) धौलावीरा
(d) सुरकोटडा
U.P.R.O./A.R.O. (Mains) 2013
उत्तर-(c)
धौलावीरा एकमात्र हड़प्पाकालीन नगर है जो तीन सुस्पष्ट भागों — ऊपरी दुर्ग (Citadel), मध्य नगर (Middle Town) और निचला नगर (Lower Town) — में विभाजित था। अधिकांश अन्य हड़प्पा नगर केवल दो भागों में विभाजित थे — दुर्ग और निचला नगर।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:धौलावीरा की एक अन्य विशेषता यह भी है कि यहाँ नगर की चारदीवारी के भीतर एक बड़ा सार्वजनिक प्रांगण (Ceremonial Ground) था, जो संभवतः उत्सव या सामाजिक कार्यों के लिए प्रयुक्त होता था।
76. निम्नलिखित में से कौन-सा प्राचीन नगर अपने उन्नत जल संचयन और प्रबंधन प्रणाली के लिए सुप्रसिद्ध है, जहां बांधों की श्रृंखला का निर्माण किया गया था और संबद्ध जलाशयों में नहर के माध्यम से जल को प्रवाहित किया जाता था?
(a) धौलावीरा
(b) कालीबंगा
(c) राखीगढ़ी
(d) रोपड़
I.A.S. (Pre) 2021
उत्तर-(a)
धौलावीरा अपनी अद्वितीय जल संचयन और प्रबंधन प्रणाली के लिए विश्वप्रसिद्ध है। यह नगर दो मौसमी नदियों — मनसर और मनहर — के बीच स्थित था, परंतु उनका जल वर्षभर उपलब्ध नहीं रहता था। इसीलिए यहाँ के निवासियों ने बाँधों की श्रृंखला और नहरों के माध्यम से जलाशयों को भरने की एक वैज्ञानिक प्रणाली विकसित की।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:यहाँ से प्राप्त जलाशयों की कुल संख्या लगभग 16 बताई जाती है। उल्लेखनीय है कि इतनी उन्नत जल प्रबंधन प्रणाली तत्कालीन विश्व की किसी भी अन्य सभ्यता में नहीं मिलती।
77. लेखन कला की उचित प्रणाली विकसित करने वाली सर्वप्रथम प्राचीन सभ्यता थी –
(a) सिंधु
(b) मिस्र
(c) सुमेरिया
(d) चीन
R.A.S. / R.T.S. (Pre) 1992
उत्तर-(c)
सुमेरिया (वर्तमान इराक का दक्षिणी भाग) के निवासियों ने विश्व में सर्वप्रथम एक व्यवस्थित लिपि का आविष्कार किया जिसे ‘क्यूनीफार्म’ (Cuneiform) लिपि कहा जाता है। यह लिपि पच्चर (कील) के आकार के चिह्नों से मिलकर बनती थी और मिट्टी की पट्टियों पर उकेरी जाती थी। इस लिपि का विकास लगभग 3200 ई.पू. में हुआ था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: क्यूनीफार्म लिपि को पढ़ने में सफलता सर्वप्रथम जॉर्ज फ्रेडरिक ग्रोटेफेंड (George Friedrich Grotefend) ने 1802 ई. में प्राप्त की थी। सुमेरिया में लिखित साहित्य का सबसे प्राचीन ज्ञात उदाहरण ‘गिलगमेश महाकाव्य’ (Epic of Gilgamesh) है, जो संसार का सबसे पुराना लिखित महाकाव्य माना जाता है।
78. निम्नलिखित में से किस पशु का अंकन हड़प्पा संस्कृति की मुहरों पर नहीं मिलता है ?
(a) बैल
(b) हाथी
(c) घोड़ा
(d) भेड़
U.P.P.C.S. (Spl.) (Mains) 2009
उत्तर-(c)
हड़प्पा सभ्यता की मुहरों पर बैल, हाथी, गैंडा, बाघ, भैंसा जैसे अनेक पशुओं का चित्रण मिलता है, परंतु घोड़े का अंकन किसी भी मुहर पर अब तक प्राप्त नहीं हुआ है। हालाँकि लोथल, सुरकोटडा और कालीबंगा जैसे स्थलों से घोड़े की अस्थियों के कुछ अवशेष मिले हैं, जो विद्वानों के बीच बहस का विषय बने हुए हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: हड़प्पा मुहरों में ‘एककोणी पशु’ (Unicorn) का चित्रण सर्वाधिक मात्रा में मिलता है, जो संभवतः किसी धार्मिक या प्रशासनिक महत्त्व का प्रतीक था। इसके अलावा मोहनजोदड़ो से प्राप्त ‘पशुपति मुहर’ में एक योगी आकृति के चारों ओर हाथी, बाघ, गैंडा और भैंसा अंकित हैं, जिसे आद्य-शिव का प्रतीक माना जाता है।
79. निम्नलिखित में से कौन-सी सभ्यता नील नदी के तट पर पनपी ?
(a) रोमन सभ्यता
(b) सिंधु घाटी की सभ्यता
(c) यूनानी सभ्यता
(d) मिस्र की सभ्यता
U.P.P.C.S. (Mains) 2004
उत्तर-(d)
मिस्र की सभ्यता का उद्भव और विकास नील नदी की उपजाऊ घाटी में हुआ। यूनानी इतिहासकार हेरोडोटस ने मिस्र को ‘नील नदी का उपहार’ (Gift of the Nile) कहा था, क्योंकि नील की वार्षिक बाढ़ से आने वाली उपजाऊ मिट्टी ही इस सभ्यता की कृषि और समृद्धि का आधार थी। मिस्र की सभ्यता लगभग 3100 ई.पू. में प्रारंभ हुई और यह सिंधु घाटी सभ्यता तथा मेसोपोटामिया सभ्यता की समकालीन थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मिस्र की सभ्यता विश्व की सबसे दीर्घजीवी सभ्यताओं में से एक है, जो लगभग 3000 वर्षों तक निरंतर फलती-फूलती रही। मिस्रवासियों ने 365 दिन के सौर कैलेंडर का आविष्कार किया था, जो आधुनिक कैलेंडर का आधार है।
80. सिंधु घाटी सभ्यता के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए ।
1. यह प्रमुखतः लौकिक सभ्यता थी तथा उसमें धार्मिक तत्व, यद्यपि उपस्थित था, वर्चस्वशाली नहीं था।
2. उस काल में भारत में कपास से वस्त्र बनाए जाते थे। उपर्युक्त में से कौन-सा / कौन-से कथन सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
I.A.S. (Pre) 2011
M.P.P.C.S. (Pre) 2012
उत्तर-(c)
सिंधु घाटी सभ्यता की नगर-योजना, जल-निकासी प्रणाली और व्यापारिक संगठन यह सिद्ध करते हैं कि यह मूलतः एक लौकिक (Secular) सभ्यता थी। धर्म का स्थान अवश्य था, परंतु इसने प्रशासन और नगर-निर्माण को नियंत्रित नहीं किया जैसा कि मेसोपोटामिया में देखा जाता है। मोहनजोदड़ो के उत्खनन में कपास के रेशों के अवशेष मिले हैं जो प्रमाणित करते हैं कि इस काल में भारत में कपास से वस्त्र निर्माण होता था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यूनानी भाषा में कपास को ‘Sindon’ कहा जाता था, जो ‘सिंध’ शब्द से व्युत्पन्न है, यह इस बात का प्रमाण है कि कपास का व्यापार भारत से पश्चिम की ओर होता था। सिंधु घाटी की मुहरों पर किसी देवालय या पुजारी-राज्य के स्पष्ट प्रमाण न मिलने से इसकी लौकिक प्रकृति और भी पुष्ट होती है।
81. हड़प्पन स्थल सनौली के अभी हाल में उत्खननों से प्राप्त हुए हैं-
(a) मानव शवाधान
(b) पशुओं के शवाधान
(c) आवासीय भवन
(d) रक्षा दीवार
U.P. Lower (Sub.) (Pre) 2004
उत्तर-(a)
उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में स्थित सनौली (Sanauli) हड़प्पाकालीन पुरास्थल से 125 से अधिक मानव शवाधान क्रमबद्ध रूप से प्राप्त हुए हैं। ये शवाधान उत्तर-दक्षिण दिशा में व्यवस्थित थे और इनके साथ मृतकों की दैनिक उपयोग की वस्तुएं, विशेषकर आभूषण, मिट्टी के बर्तन आदि भी रखे गए थे, जो तत्कालीन अंत्येष्टि परंपरा को दर्शाते हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: 2018-19 में सनौली में हुई नवीनतम खुदाई में ताम्र-निर्मित रथ, ढाल और तलवारें भी प्राप्त हुई हैं, जो भारतीय उपमहाद्वीप में युद्ध-रथों के प्राचीनतम पुरातात्विक साक्ष्य माने जाते हैं। यह खोज सिंधु-सरस्वती सभ्यता के उत्तरवर्ती काल (लगभग 2000-1800 ई.पू.) की है।
82. निम्न स्थानों पर किस एक स्थान पर सिंधु घाटी सभ्यता से संबद्ध विख्यात वृषभ-मुद्रा प्राप्त हुई थी ?
(a) हड़प्पा
(b) चन्हुदडो
(c) लोथल
(d) मोहनजोदड़ो
R.A.S. / R.T.S. (Pre) 2008
उत्तर-(d)
मोहनजोदड़ो से प्राप्त कूबड़ वाले बैल (वृषभ) की आकृति युक्त मुहर हड़प्पा कला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। पुरातत्त्वविद् जॉन मार्शल ने इस मुहर की कलात्मकता की विशेष प्रशंसा की थी। बैल की मांसपेशियों का सजीव चित्रण और शारीरिक अनुपात की सटीकता इस मुहर को असाधारण बनाती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सिंधु सभ्यता में मुहरें मुख्यतः सेलखड़ी (Steatite) पत्थर से बनाई जाती थीं। इन मुहरों का उपयोग व्यापारिक वस्तुओं पर मालिकाना पहचान अंकित करने और संभवतः प्रशासनिक कार्यों के लिए किया जाता था। अब तक खुदाई में 2000 से अधिक मुहरें प्राप्त हो चुकी हैं।
83. निम्नलिखित सभ्यताओं का उत्तर से दक्षिण का सही क्रम कौन-सा है?
(a) माया एजटेक मुझस्का इंका
(b) माया मुझस्काइंका एजटेक
(c) एजटेक मुझस्का माया इंका
(d) एजटेक माया मुझस्का इंका
U.P.R.O/A.R.O. (Pre) 2016
उत्तर-(d)
भौगोलिक दृष्टि से उत्तर से दक्षिण की ओर इन सभ्यताओं का क्रम इस प्रकार है — एजटेक सभ्यता मध्य मेक्सिको (उत्तरी मेसोअमेरिका) में, माया सभ्यता दक्षिणी मेक्सिको, बेलिज, ग्वाटेमाला और होंडुरास में, मुझस्का (Muisca) सभ्यता दक्षिण अमेरिका के कोलंबिया के पूर्वी पठारी क्षेत्र में, और इंका सभ्यता दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर क्वीटो (इक्वाडोर) से सेंटियागो (चिली) तक विस्तृत थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मुझस्का सभ्यता ही वह सभ्यता थी जिससे प्रसिद्ध ‘एल्डोरैडो’ (El Dorado – सोने का शहर) की किंवदंती जन्मी, क्योंकि इनके राजा सोने की धूल से लेपित होकर पवित्र झील गुआटाविटा में स्नान करते थे। इंका सभ्यता की सड़क प्रणाली लगभग 40,000 किलोमीटर लंबी थी जो आधुनिक युग में भी एक अद्भुत इंजीनियरिंग उपलब्धि मानी जाती है।
84. किस पशु के अवशेष सिंधु घाटी सभ्यता में प्राप्त नहीं हुए हैं ?
(a) शेर
(b) घोड़ा
(c) गाय
(d) हाथी
Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2011
उत्तर-(a)
सिंधु घाटी सभ्यता के उत्खनन से गाय, हाथी, भैंसा, बाघ और चीता जैसे पशुओं के अवशेष प्राप्त हुए हैं। घोड़े के अवशेषों के संदर्भ में विद्वानों में मतभेद है — कुछ स्थलों से अस्थि अवशेष मिले हैं परंतु यह विवादास्पद है। शेर के अस्थि अवशेष या उसका कोई चित्रण अब तक किसी भी हड़प्पाकालीन स्थल से प्राप्त नहीं हुआ है, इसलिए इस प्रश्न का सर्वाधिक उचित उत्तर शेर (विकल्प a) है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सिंधु सभ्यता में कुत्ते को पालतू पशु के रूप में रखा जाता था — हड़प्पा स्थल से एक मुहर पर कुत्ते की आकृति भी मिली है। लोथल से मिली एक मुहर पर लोमड़ी जैसे पशु का चित्रण है जिसे कुछ विद्वान ‘पंचतंत्र’ की कहानियों से भी जोड़ते हैं।
85. वस्त्रों के लिए कपास की खेती का आरंभ सबसे पहले किया गया-
(a) मिस्र में
(b) मेसोपोटामिया में
(c) मध्य अमेरिका में
(d) भारत में
U.P.P.C.S. (Pre) 2006
उत्तर-(d)
वस्त्र निर्माण के लिए कपास की खेती सर्वप्रथम भारत में की गई। 1922 में राखालदास बनर्जी के नेतृत्व में हुई मोहनजोदड़ो की खुदाई में कपास के सूत के अवशेष प्राप्त हुए, जो लगभग 3000 ई.पू. के थे। यह प्रमाण सिद्ध करता है कि भारत के लोग विश्व में सबसे पहले कपास से वस्त्र बनाना जानते थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: प्राचीन यूनानी लेखकों ने भारतीय कपास का उल्लेख ‘ऊन उगाने वाले पेड़’ (Tree bearing wool) के रूप में किया था, क्योंकि वे इस फसल से अपरिचित थे। भारत से कपास का निर्यात मेसोपोटामिया तक होता था — यह तथ्य मेसोपोटामियाई व्यापारिक अभिलेखों में भी उल्लिखित है।
86. मृण-पट्टिका पर उत्कीर्ण सींगयुक्त देवता की कृति प्राप्त हुई-
(a) बनावली से
(b) कालीबंगा से
(c) लोथल से
(d) सुरकोटडा से
U.P. Lower Sub. (Spl.) (Pre) 2008
उत्तर-(b)
राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में स्थित कालीबंगा हड़प्पाकालीन स्थल से प्राप्त मृण-पट्टिका (Terracotta tablet) पर दोहरे सींगों वाले एक देवता का अंकन मिलता है। यह चित्रण आद्य-शिव अथवा किसी पशुपति देवता की उपासना का संकेत देता है। मोहनजोदड़ो से भी एक मुहर पर सींगयुक्त देवता का चित्र प्राप्त हुआ है जिसे ‘पशुपति मुहर’ कहते हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कालीबंगा ही एकमात्र हड़प्पाकालीन स्थल है जहाँ से प्राक्-हड़प्पा काल के जुते हुए खेत (Ploughed Field) के साक्ष्य मिले हैं — यह विश्व का सबसे पुराना जुते हुए खेत का पुरातात्विक प्रमाण है। इसके अतिरिक्त कालीबंगा से अग्निकुंड (Fire-altars) के भी साक्ष्य प्राप्त हुए हैं जो धार्मिक अनुष्ठानों की ओर संकेत करते हैं।
87. निम्नलिखित में से कौन-सा/से लक्षण सिंधु सभ्यता के लोगों का सही चित्रण करता है/ करते हैं?
1. उनके विशाल महल और मंदिर होते थे।
2. ये देवियों और देवताओं, दोनों की पूजा करते थे।
3. वे युद्ध में घोड़ों द्वारा खींचे गए रथों का प्रयोग करते थे। नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही कथन/कथनों को चुनिए ।
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2
(c) 1, 2 और 3
(d) उपर्युक्त कथनों में से कोई भी सही नहीं है।
I.A.S. (Pre) 2013
उत्तर-(b)
सिंधु घाटी सभ्यता के किसी भी स्थल से अब तक किसी मंदिर या राजमहल का स्पष्ट साक्ष्य नहीं मिला है। धार्मिक जीवन की जानकारी मुख्यतः मुहरों और मिट्टी की मूर्तियों से होती है जिनमें मातृदेवी, पशुपति तथा लिंग-योनि पूजा के संकेत मिलते हैं, अर्थात देवी और देवता दोनों की उपासना के प्रमाण हैं। घोड़े द्वारा खींचे गए रथ के उपयोग के कोई पुरातात्विक साक्ष्य नहीं मिले हैं, यद्यपि सनौली में 2018-19 में ताम्र-रथ के अवशेष मिले हैं जो हड़प्पा सभ्यता के उत्तरवर्ती काल के हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सिंधु सभ्यता में पाई गई मातृदेवी की मूर्तियाँ (Mother Goddess figurines) इस बात का संकेत देती हैं कि उस समाज में स्त्री-शक्ति की उपासना का विशेष महत्त्व था। मोहनजोदड़ो में मिला ‘महाजलकुंड’ (Great Bath) संभवतः धार्मिक स्नान के लिए प्रयुक्त होता था, जो अप्रत्यक्ष रूप से धर्म के महत्त्व को दर्शाता है।
88. हड़प्पा सभ्यता का स्थल मांडी, भारत के किस राज्य में स्थित है?
(a) गुजरात
(b) हरियाणा
(c) राजस्थान
(d) उत्तर प्रदेश
U.P.P.C.S. (Pre) 2021
उत्तर-(d)
उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के बघरा ब्लॉक में स्थित मांडी गाँव जून 2000 में उस समय चर्चा में आया जब वहाँ एक खेत की खुदाई के दौरान प्राचीन आभूषण, मृद्भांड (मिट्टी के बर्तन) और अन्य पुरावस्तुएं मिलीं। इन्हें हड़प्पा सभ्यता से संबद्ध माना गया। यह स्थल ऊपरी गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र में पड़ता है जो हड़प्पाकालीन बस्तियों के विस्तार की पूर्वी सीमा के निकट है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: उत्तर प्रदेश में हड़प्पा सभ्यता से संबंधित अन्य महत्त्वपूर्ण स्थल हैं — बागपत जिले में सनौली, आलमगीरपुर (मेरठ जिला) और हुलास (सहारनपुर जिला)। आलमगीरपुर को हड़प्पा सभ्यता का सबसे पूर्वी ज्ञात स्थल माना जाता है।
  • हड़प्पा सभ्यता : प्रमुख स्थल, साक्ष्य और उत्तर-हड़प्पा संस्कृति

    📚 विषय सूची

    हड़प्पाकालीन स्थलों की अवस्थिति

    ➣ हड़प्पा सभ्यता के लगभग 1000 स्थलों भी ज्यादा स्थलों के बारे में जानकारी प्राप्त हो चुकी है, लेकिन इनमें से केवल 6 को ही नगर माना जाता है, ये हैं – हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, सिंध का चन्हूदड़ो, गुजरात का लोथल, उत्तरी राजस्थान का कालीबंगा तथा हरियाणा के हिसार जिले में स्थित बनवाली।

    ➣ इसमें दो नगर हड़प्पा लगभग 150 हेक्टेयर और मोहनजोदड़ो 500 हेक्टेयर (सबसे बड़ा ज्ञात स्थल ) में फैला था। इन दोनों नगरों के अपने स्नानागार , अन्र्गनागारदुर्ग थे। जहाँ कोई शासक वर्ग के लोग रहते थे।

    हड़प्पा पंजाब प्रान्त (पाकिस्तान) में माण्टगोमरी ज़िले में रावी नदी के बायें तट पर तथा मोहनजोदड़ो सिन्ध प्रान्त के लरकाना ज़िले में सिंधु नदी के दाहिने किनारे पर स्थित हैं।

    ➣ सिंधु घाटी में पकी हुई मिट्टी के दीपक प्राप्त हुए हैं और मोहनजोदड़ो में प्राप्त भवनों में दीपकों को रखने हेतु ताख बनाए गए थे जो मुख्य द्वार को प्रकाशित करने हेतु आलों की श्रृंखला थी।

    ➣ बन्दरगाह लोथल की महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों में से है। इस बन्दरगाह पर मिस्र तथा मेसोपोटामिया से जहाज़ आते जाते थे।

    कालीबंगा प्राचीन समय में चूडियों के लिए प्रसिद्ध था। जो पत्थर की बनी होती थी।

    हड़प्पा सभ्यता के प्रमुख स्थल

    हड़प्पा

    उत्खननकर्ता
    दयाराम साहनी, एम.एस. वत्स, व्हीलर
    खनन वर्ष
    1921, 1946
    आधुनिक स्थिति
    मांटगोमरी जिला, पंजाब (रावी प्रान्त, पाकिस्तान)
    नदी
    रावी
    प्राप्त साक्ष्य
    कांस्य गाड़ी, अनाज भंडार गृह, धोती पहने मूर्ति, गरुड़ चित्रित मुद्रा, श्रमिकों का आवास, कांस्य दर्पण, शंख का बैल, मछुआरे का चित्र, तान पैमाना, गधे की हड्डी, कांस्य इक्कागाड़ी, अन्नागार आदि।

    मोहनजोदड़ो

    उत्खननकर्ता
    राखालदास बनर्जी, मार्टिमर व्हीलर
    खनन वर्ष
    1922 ई.
    आधुनिक स्थिति
    लरकाना जिला, सिंध (पाकिस्तान)
    नदी
    सिंधु
    प्राप्त साक्ष्य
    पशुपति (तीन मुख वाला देवता), महास्नानागार, पुरोहित आवास, दाढ़ी वाले साधु की मूर्ति, नग्न नारी कांस्य मूर्ति, कुम्हार के भट्टे, 16 मकानों की बैरक, हाथी का कपाल खंड आदि।

    चन्हूदड़ो

    उत्खननकर्ता
    एन. जी. मजूमदार, मैके
    खनन वर्ष
    1931 ई.
    आधुनिक स्थिति
    पंजाब (पाकिस्तान)
    नदी
    सिंधु
    प्राप्त साक्ष्य
    मनका निर्माण कारखाना, काजल, पाउडर, कंघा, उस्तरा, मिट्टी की बैलगाड़ी, लिपिस्टिक, घड़ियाल-मछली अंकित मृदभांड आदि।

    लोथल

    उत्खननकर्ता
    रंगनाथ राव
    खनन वर्ष
    1957 ई.
    आधुनिक स्थिति
    अहमदाबाद, गुजरात
    नदी
    भोगवा
    प्राप्त साक्ष्य
    डॉकयार्ड (बंदरगाह), गोदी-बाड़ा, फारस की मुहर, युग्म शवाधान, घोड़े की मूर्ति, हाथी दांत के अवशेष आदि।

    कालीबंगा

    उत्खननकर्ता
    अमलानंद घोष, बी. बी. लाल
    खनन वर्ष
    1953, 1960 ई.
    आधुनिक स्थिति
    गंगानगर, राजस्थान
    नदी
    घग्घर (सरस्वती)
    प्राप्त साक्ष्य
    जुते हुए खेत, अग्नि वेदिका, अलंकृत ईंटें, चूड़ियाँ, हल चलाने के प्रमाण, दो फसल बोने के साक्ष्य आदि।

    बनवाली

    उत्खननकर्ता
    रवीन्द्र सिंह विष्ट
    खनन वर्ष
    1973 ई.
    आधुनिक स्थिति
    हिसार, हरियाणा
    नदी
    सरस्वती
    प्राप्त साक्ष्य
    जौ, मिट्टी का हल, नगर योजना, मछली पकड़ने की बंसी, स्वर्ण पट्ट, मनके आदि।

    रंगपुर

    उत्खननकर्ता
    एम. एस. वत्स
    खनन वर्ष
    1931 ई.
    आधुनिक स्थिति
    गुजरात
    नदी
    मादर
    प्राप्त साक्ष्य
    गेहूं की खेती, ज्वार-बाजरा, कच्चे ईंट के दुर्ग, नालियां, घोड़े की मृणमूर्ति आदि।

    रोपड़

    उत्खननकर्ता
    यज्ञदत्त शर्मा
    खनन वर्ष
    1955-56 ई.
    आधुनिक स्थिति
    पंजाब
    नदी
    सतलज
    प्राप्त साक्ष्य
    मानव के साथ कुत्ते के दफनाने का प्रमाण, तांबे की कुल्हाड़ी आदि।

    कोटदीजी

    उत्खननकर्ता
    पुरिए, अफजल खाँ
    खनन वर्ष
    1935, 1955 ई.
    आधुनिक स्थिति
    सिंध (पाकिस्तान)
    नदी
    सिंधु
    प्राप्त साक्ष्य
    पत्थर के औजार, कच्चे ईंटों के घर, आभूषण आदि।

    सुत्कागेंडोर

    उत्खननकर्ता
    आरेल स्टीन
    खनन वर्ष
    1927 ई.
    आधुनिक स्थिति
    बलूचिस्तान (पाकिस्तान)
    नदी
    दाश्क
    प्राप्त साक्ष्य
    बंदरगाह, व्यापारिक प्रमाण, अस्थि-राख पात्र आदि।

    सुरकोटदा

    उत्खननकर्ता
    जगपति जोशी
    खनन वर्ष
    1964-1982
    आधुनिक स्थिति
    कच्छ (गुजरात)
    नदी
    चेनाब
    प्राप्त साक्ष्य
    घोड़े के अवशेष, कलश शवाधान आदि।

    राखीगढ़ी

    उत्खननकर्ता
    सूरज भान
    आधुनिक स्थिति
    हरियाणा
    प्राप्त साक्ष्य
    ताम्र उपकरण, हड़प्पा लिपियुक्त मुद्रा आदि।

    आलमगीरपुर

    उत्खननकर्ता
    यज्ञदत्त शर्मा
    खनन वर्ष
    1958 ई.
    आधुनिक स्थिति
    मेरठ, उत्तर प्रदेश
    नदी
    हिंडन
    प्राप्त साक्ष्य
    मृदभांड, मोर और गिलहरी की चित्रकारी आदि।

    हड़प्पा के चार भौगोलिक स्थल

    हड़प्पा के चार भौगोलिक स्थल

    अखनूर जिले में चिनाव नदी के दक्षिणी तट पर स्थित है। यह विकसित हड़प्पा सभ्यता का सर्वाधिक उत्तरी स्थल है।

    ➣ इसका उत्खनन 1982 ई. में जगपत जोशीमधुबाला ने करवाया था।

    ➣ हड़प्पाकालीन मृद्भाण्ड तथा मिट्टी के ठीकरे मिले थे।

    ➣ माण्डा में 3 सांस्कृतिक स्तर-प्राक सैन्धव तथा उत्तर सैन्धव मिले हैं।

    ➣ मेरठ जिले में, हिंडन नदी (यमुना की सहायक) के तट पर स्थित है।

    ➣ इस स्थल की खोज 1958 ई. में भारत सेवक समाज संस्था द्वारा की गयी थी।

    ➣ इसका उत्खनन कार्य यज्ञ दत्त शर्मा द्वारा किया गया था।

    ➣ यह सिंधु सभ्यता का सर्वाधिक पूर्वी स्थल है।

    ➣ यहां से सिंधु सभ्यता के उत्तरकालीन अवशेष मिले हैं।

    रोटी बेलने की चौकी तथा कटोरे के अनेक टुकड़े प्राप्त हुए हैं।

    महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में प्रवरा नदी के बायें किनारे पर स्थित है।

    ➣ सैंधव प्रकार का एक मानव-शवाधान भी मिलता है जहां एक गर्त में युवा पुरूष का शव पाया गया है। इसे उत्तर-दक्षिण में लिटाया गया है।

    ➣ गर्त में ईंटों की चिनाई करने के उसे मिट्टी तथा ईंटों से ढका गया है तथा कब्र के उत्तर की ओर एक पत्थर भी मिला था। यहां से तांबे का रथ प्राप्त हुआ है।

    ➣ दैमाबाद सैंधव सभ्यता का सबसे दक्षिणी स्थल है।

    ➣ यह दाश्क नदी के किनारे स्थित हड़प्पा सभ्यता का सबसे पश्चिमी स्थल है।

    ➣ इसकी खोज 1927 ई. में सर मार्क ऑरेल स्टाइन ने की थी।

    ➣ इसका दुर्ग एक प्राकृतिक चट्टान पर स्थित था।

    ➣ यहां से कोई मुहर अथवा उत्कीर्ण वस्तु नहीं मिली है।

    हड़प्पाकालीन स्थलों से प्राप्त साक्ष्य

    नर्तकी की मूर्ति

    मोहनजोदड़ो से प्राप्त कांसे की बनी नर्तकी की मूर्ति सिंधु कला का सर्वश्रेष्ठ नमूना है।

    ➣ पूरी मूर्ति गले में पड़े हार के अलावा पूर्णतः नग्न है। सिर के पीछे उसके बालों की छोटी लटे एक बुनी हुई पट्टिका द्वारा संवारी गई है।

    ➣ सिर पीछे की ओर झुकाएं, आंखें झुकी हुई, दायीं भुजा कूल्हे पर टिकाए व बायीं भुजा नीचे लटकी हुई यह मूर्ति नृत्य की स्थिर मुद्रा को दर्शाती है।

    स्वास्तिक चिन्ह

    मोहनजोदड़ो से प्राप्त मुहर पर स्वास्तिक का अंकन सूर्य पूजा का प्रतीक माना जाता है।

    हिंदू धर्म में आज भी स्वास्तिक को पवित्र मांगलिक चिन्ह माना जाता है। इसे चतुर्भुज ब्रह्मा का रूप स्वीकार किया जाता है।

    धौलावीरा से प्राप्त सिंधु लिपि के 10 बड़े अक्षर जो कि प्राचीन सूचना पट्ट के रूप में प्रयुक्त होते थे। यह स्थल जल प्रबंधन का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण था।

    मातृदेवी

    हड़प्पा से प्राप्त एक मूर्तिका में स्त्री के गर्भ से निकलता पौधा दिखाया गया है।

    ➣ यह सम्भवतः पृथ्वी देवी की प्रतिमा है और इसका निकट संबंध पौधों के जन्म व वृद्धि से रहा होगा।

    ➣ हड़प्पाई लोग इसे पृथ्वी की उर्वरता देवी मानते थे और इसकी पूजा उसी तरह करते थे। जिस प्रकार मिस्र के लोग नील नदी की देवी आइसिस की पूजा करते थे।

    विशाल स्नानागार

    ➣ यह मोहनजोदड़ो का सर्वाधिक प्रसिद्ध स्मारक था। इसका निर्माण पकी ईंटों से दुर्ग क्षेत्र में किया गया था। इसके मध्य में स्थित स्नानकुंड था।

    ➣ कुछ के पूरब दिशा में बड़ा कुआं बनाया गया था। इस विशाल स्नानागार का उपयोग सार्वजनिक रूप से धर्मानुष्ठान संबंधी स्नान के लिए होता था।

    जॉन मार्शल ने विशाल स्नानागार को विश्व का आश्चर्यजनक निर्माण बताया था। यह जलपूजा का एकमात्र साक्ष्य है।

    पशुपति मुहर

    मोहनजोदड़ो से प्राप्त पशुपति शिव मुहर को जॉन मार्शल ने आद्यशिव की संज्ञा दी थी। इसमें एक त्रिमुखी पुरुष को एक चौकी पर पद्मासन मुद्रा में बैठे हुए दिखाया गया है।

    ➣ उसके सिर में सींग है तथा कलाई से कंधे तक उसकी दोनों भुजाएं चूड़ियों से युक्त है।

    ➣ उसके दायीं ओर बाघहाथी, बायीं ओर गैंडाभैंसा तथा चौकी के नीचे 2 हिरण उत्कीर्ण हैं। इस मुहर में जानवरों की कुल संख्या 6 है जबकि प्रकार 5 हैं।

    ➣ इस आकृति को शिव (हिंदू धर्म) का रूप माना गया है जो कि योग मुद्रा में दर्शाया गया है।

    ➣ पैरों के नीचे 2 मोर अंकित थे।

    ➣ आरंभिक धार्मिक ग्रंथ ऋग्वेद में रूद्र नामक देवता का उल्लेख मिलता है जो बाद में शिव के लिए प्रयुक्त नाम है।

    टेराकोटा फिगरिन

    ➣ आग में पकी मिट्टी से बनी मूर्तिकाएं को टेराकोटा फिगरिन (मृण्मूर्तिकाएं) कहते हैं।

    ➣ इसका प्रयोग खिलौनेपूज्य प्रतिमाओं के निर्माण में होता था। ये प्रायः मानवपशु-पक्षियों की प्राप्त हुई हैं। मानव मृण्मूर्तियां ठोस जबकि पशु-पक्षियों की मूर्तियां खोखली थीं। आश्चर्य की बात है कि गाय की मृण्मूर्तियां नहीं प्राप्त हुई हैं जबकि हाथी, गैंडा, हिरण, मछली, घड़ियाल आदि का अंकन मिलता है। गाय का महत्व वैदिक काल से प्राप्त होता है।

    ➣ मोहनजोदड़ो से प्राप्त वृषभ की मृण्मूर्ति शक्ति का प्रतीक कूबड़ वाला बैल था।

    उत्तर हड़प्पाकालीन संस्कृतियां

    ➣ हालाँकि बाढ़ को सिंधु संस्कृति के पतन का प्रमुख कारण माना गया है परन्तु हड़प्पा का पतन आज भी एक विवादस्पद विषय है।

    ➣ माना जाता है कि हड़प्पा की नगरीय संस्कृति के साथ-साथ चलने वाली ग्रामीण संस्कृतियों में ही यह संस्कृति समाहित हो गयी। इन ग्रामीण संस्कृतियों के विकास का साक्ष्य भारत के अनेक हिस्सों में पाया गया है, जो इस प्रकार हैं-

     संस्कृतिअवधिक्षेत्र
     कायथा संस्कृति 2000-1800 ई.पू. चम्बल नदी के क्षेत्र
     मालवा संस्कृति 1700-1200 ई.पू. नर्मदा नदी क्षेत्र
     अहार संस्कृति 2100-1500 ई.पू. राजस्थान के उदयपुर
     प्रभास संस्कृति 2000-1400 ई.पू. गुजरात का तटीय क्षेत्र
     सावाल्दा संस्कृत 2300-2000 ई.पू. महाराष्ट्र का धुलिया
     रंगपुर संस्कृति 1700-1400 ई.पू. गुजरात का तटीय क्षेत्र
     जोर्वे संस्कृति 1400-700 ई.पू. महाराष्ट्र का दायमाबाद व इनामगाँव

    ➣ इस क्षेत्र में अहाड़ एवं गिलुद प्रमुख स्थल हैं। बनास नदी घाटी में विकसित होने वाली इस संस्कृति को वनास संस्कृति कहा जाता है।

    ➣ यहां से पकी एवं कच्ची ईंटों का साक्ष्य तथा पत्थर की दीवारों का साक्ष्य मिला है।

    ➣ यहां से तांबे के प्रचलन एवं चावल तथा बाजरे का साक्ष्य भी प्राप्त हुआ है।

    कायथा एवं नवदाटोली इस संस्कृति के प्रमुख स्थल हैं।

    ➣ यहां से चौकोर एवं वृत्ताकार घर के साक्ष्य, लाल एवं काले मृद्भाण्ड, गेहूं, अलसी, मसूर तथा चावल का साक्ष्य प्राप्त हुआ है।

    नासिक, जोरवे, नैवासा, दैमाबाद, सोनेगांव, इनामगांव आदि इस संस्कृति के प्रमुख स्थल हैं।

    ➣ यहां से आयताकार, वर्गाकार एवं वृत्ताकार मकान के साक्ष्य मिले हैं। नैवासा से टोटीदार एवं नौतली बर्तन के साक्ष्य मिले हैं।

    ➣ दैमाबाद से ताम्र निर्मित रथ चलाते हुए मनुष्य, सांड़, गैंडा एवं हाथी की आकृतियाँ प्राप्त हुई हैं।

    कृष्णा एवं तुंगभद्रा के बीच इस संस्कृति का विस्तार पाया जाता है।

    ब्रह्मागिरि, पिकलिहल, उतनूर, मास्की, संगनकल्लू एवं नागार्जुनकोंडा आदि इस संस्कृति के प्रमुख स्थल हैं।

    ➣ इस क्षेत्र की बस्तियों में वर्धमान, वीरभूम, मिदनापुर, बांकुरा आदि प्रमुख स्थल हैं।

    ➣ यहां से चावल पर आधारित विस्तृत ताम्रपाषाणिक संस्कृति मिली है।

  • सिन्धु घाटी सभ्यता (2350-1750 ई.पू. ) : परीक्षोपयोगी नोट्स एक नजर में

    विषय परिचय / प्रमुख तथ्य
    हड़प्पा सभ्यता सिन्धु घाटी की एक विकसित नगरीय सभ्यता थी, जिसे सिंधु सभ्यता भी कहा जाता है। यह विश्व की सबसे प्राचीन नगर सभ्यताओं में से एक मानी जाती है।
    भौगोलिक स्थिति यह सभ्यता सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों के किनारे फैली थी। वर्तमान में यह पाकिस्तान, उत्तर-पश्चिम भारत और अफगानिस्तान के कुछ भागों तक विस्तृत थी।
    उदय व खनन इस सभ्यता का उदय नवपाषाण काल के बाद हुआ। प्रमुख उत्खनन स्थल: हड़प्पा (1921), मोहनजोदड़ो (1922) जैसे पुरातात्विक स्थलों से इसकी खोज हुई।
    काल निर्धारण लगभग 2600 ई.पू. से 1900 ई.पू. तक इसका परिपक्व (Urban Phase) काल माना जाता है।
    शहरीकरण / नगरीकरण संरचना सुनियोजित नगर योजना, ग्रिड पैटर्न सड़कें, पक्की ईंटों के मकान, जल निकासी प्रणाली और स्नानागार (Great Bath) इसकी प्रमुख विशेषताएँ थीं।
    कृषि गेहूं, जौ, कपास आदि प्रमुख फसलें थीं। सिंचाई के लिए नदी जल और वर्षा पर निर्भरता थी।
    पशुपालन गाय, बैल, भेड़, बकरी और भैंस पाली जाती थीं। बैल कृषि कार्यों में महत्वपूर्ण थे।
    कारीगरी एवं शिल्प-कौशल मिट्टी के बर्तन, आभूषण, मनके (beads), धातु कार्य और तांबा-पीतल के उपकरणों का निर्माण अत्यधिक विकसित था।
    व्यापार एवं वाणिज्य आंतरिक और बाह्य व्यापार विकसित था। मेसोपोटामिया से व्यापार के प्रमाण मिले हैं। तौल-मानक प्रणाली व्यापार में सहायक थी।
    राजनीतिक संगठन केंद्रीय राजा के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलते। संभवतः नगर-राज्य या व्यापारी वर्ग द्वारा प्रशासन संचालित होता था।
    सामाजिक जीवन समाज सुव्यवस्थित था, जिसमें श्रम विभाजन स्पष्ट था। स्त्रियों की स्थिति अपेक्षाकृत सम्मानजनक मानी जाती है।
    धार्मिक प्रथा व परंपरा प्रकृति पूजा, मातृ देवी की उपासना, पशुपति (proto Shiva) की पूजा के प्रमाण मिलते हैं। मंदिरों के स्पष्ट प्रमाण नहीं हैं।
    हड़प्पा लिपि अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है (undeciphered script)। यह दाईं से बाईं ओर लिखी जाती थी।
    माप-तौल प्रणाली मानकीकृत वजन प्रणाली (binary system आधारित) का उपयोग व्यापार और लेन-देन में होता था।
    हड़प्पा बर्तन लाल रंग के पॉलिश किए हुए मिट्टी के बर्तन (Red Ware) प्रमुख थे, जिन पर काले रंग की चित्रकारी मिलती है।
    मुहर और मुद्रण स्टेटाइट (soapstone) से बनी मुहरें व्यापार और पहचान के लिए उपयोग होती थीं। इनमें पशु आकृतियाँ और लिपि अंकित होती थी।
    मूर्तियाँ / प्रतिमाएँ मातृ देवी की मूर्तियाँ, नर्तकी (bronze dancing girl) और पशु मूर्तियाँ प्रमुख हैं।
    अंत्येष्टि / अंतिम संस्कार तीन प्रकार के दफन प्रमाण मिले हैं: पूर्ण दफन, आंशिक दफन और दाह संस्कार। सामाजिक भिन्नता के संकेत मिलते हैं।
    सिन्धु सभ्यता का पतन जलवायु परिवर्तन, नदी मार्ग परिवर्तन, बाढ़, व्यापार में गिरावट और बाहरी आक्रमण जैसी विभिन्न वजहों से इसका पतन हुआ।

    ➣ इस संस्कृति का विकास सिन्धु और घघ्घर/हकड़ा (प्राचीन सरस्वती) के किनारे हुआ था। इसलिए इसे सिंधु घाटी सभ्यता भी कहा जाता है।

    ➣ 1826 ई. में चार्ल्स मैसेन ने पहली बार इस पुरानी सभ्यता का उल्लेख किया। ततपश्चात ब्रिटिश उत्खननकर्ता एंव खोजी कनिंघम ने 1856 में इस सभ्यता के बारे में सर्वेक्षण किया। परन्तु यह अभी तक अनभिग्य रहा।

    ➣ सिन्धु घाटी की सभ्यता की खोज का श्रेय रायबहादुर दयाराम साहनी को जाता है।

    ➣ पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग के महानिदेशक सर जॉन मार्शल के निर्देशन में सन 1921 में रायबहादुर दयाराम साहनी ने इस स्थान की खुदाई करवायी।

    रेडियो कार्बन-14 (C14) नवीन विश्लेषण पद्धति के द्वारा हड़प्पा सभ्यता की तिथि 2350 ई.पू. से 1750 ई.पू. मानी गयी है।

    ➣ सिन्धु घाटी सभ्यता का स्वरूप नगरीय था। प्राप्त स्थलों में से केवल 6 को ही नगर माना जाता है, ये हैं – हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, सिंध का चन्हूदड़ो, गुजरात का लोथल, उत्तरी राजस्थान का कालीबंगा तथा हरियाणा के हिसार जिले में स्थित बनवाली।

    ➣ हड़प्पा सभ्यता के सर्वाधिक स्थल गुजरात राज्य में मिले हैं।

    ➣ प्रथम बार नगरों के उदय के कारण इसे प्रथम नगरीकरण/शहरीकरण भी कहा जाता है।

    ➣ सिन्धु सभ्यता में ईटों का अनुपात 4:2:1 था। सभी मक्कन पक्की ईंटों के बने थे।

    मुहनजो-दड़ो का सबसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्थान महान स्नानागार है। जो 11.88 मी. लम्बा, 7.01 मी. चौड़ा और 2.43 मी. गहरा है।

    ➣ एक सड़क 11 मीटर चौड़ी थी जो सम्भवतः राजमार्ग रही होगी। नगर की सभी सड़कें राजमार्ग से मिलती थीं।

    ➣ सैंधववासियों के जीवन का मुख्य व्यवसाय कृषि कार्य था। मुख्यतः नौ प्रकार की फसल उगाते थे।

    जिस तरह नील ने मिस्त्र का निर्माण कर वहाँ के लोगों की सहायता की, उसी तरह सिन्धु नदी ने सिन्ध का निर्माण कर उन्हें समृद्ध बनाया।

    ➣ सिन्धु सभ्यता से प्राप्त अनाज चावल, जौ, खजूर, गेहूँ, कपास, तरबूज, मटर, ब्रासिका, जुसी, तिल एवं सरसों। जिसमे गहूं और जौ प्रमुख थे।

    ➣ हड़प्पा के लोगों ने बैल द्वारा खींचने वाले लकड़ी के हल का इस्तेमाल खेती में किया और इसके लिए ऊँटों का भी इस्तेमाल होता था।

    ➣ फसलों की कटाई के लिए पत्थर की हँसिया का इस्तेमाल किया गया होगा।

    ➣ सिन्धुवासियों को सबसे पहले कपास उत्पादन करने का श्रेय जाता है। इस वजह से यूनानियों ने इस क्षेत्र को सिन्डन नाम दिया।

    ➣ मुख्य पालतू पशुओं में बैल, भैंस, गाय, भेड़-बकरी,ऊँट, कुत्ते, बिल्ली, गधे, खच्चर और सुअर आदि है। इन्हें कूबड़ वाला साँड़ विशेष प्रिय था।

    ➣ इसके आलावा उन्हें बंदर, भालू, खरहा आदि जंगली जानवरों का भी ज्ञान था। शेर का कोई साक्ष्य नहीं मिला है। यहाँ गाय के अवशेष नहीं मिले।

    ➣ हड़प्पा के लोग हाथी से अच्छी तरह परिचित थे परन्तु उनके पालने के साक्ष्य प्राप्त नहीं हो सके हैं।

    ➣ हड़प्पा की शहरी संस्कृति काँस्य युगीन सभ्यता भी कहा जाता है वे लोग लौह से परिचित नहीं थे।

    ➣ हड़प्पा के लोग पत्थरों के औजारों का इस्तेमाल करते थे, लेकिन वे काँस्य के निर्माण और उपयोग से भी परिचित थे।

    ➣ हड़प्पा के लोग नाव भी बनाते थे, मुहर निर्माण और टेराकोटा निर्माण भी महत्वपूर्ण शिल्प थे।

    ➣ सिन्धु घाटी के लोगों द्वारा प्रयोग में लाए जाने वाले बर्तन कुम्हार चाक पर बने होते थे।

    चालाक लोमड़े और प्यासे कौवे की कहानियाँ हड़प्पा के मृदभांडों पर चित्रित हैं।

    ➣ पतली गर्दन वाले बड़े आकार के घड़े तथा लाल रंग के बर्तनों पर काले रंग की चित्रकारी हड़प्पा के बर्तनों की मुख्य विशेषता है।

    ➣ सिंन्धुवासी सिंधु-सभ्यता क्षेत्र के अंतर्गत पत्थर, धातु, खाल आदि का व्यापार करते थे।

    ➣ बाट-माप आकार धनाकार, वर्तुलाकार, बेलनाकार, शंक्वाकार एवं ढोलाकार थे।

    ➣ सैंधववासी दशमलव प्रणाली पर आधारित बाटों का प्रयोग करते थे। तौल की इकाई संभवतः 16 अनुपात में थी जैसे 16, 64, 160, 320, 640 आदि।

    ➣ मोहनजोदड़ो से सीप का , हड़प्पा से ताम्बे का, कालीबंगा से मिट्टी का तथा लोथल से हाथी दाँत का पैमाना मिला है।

    ➣ मेसोपोटामिया में प्रवेश हेतु उर एक महत्त्वपूर्ण बन्दरगाह था जबकि लोथल व सुरकोतदा सिंधु सभ्यता का बंदरगाह था।

    ➣ सामाजिक व्यवस्था का मुख्य आधार परिवार था। हड़प्पा समाज सम्भवतः मातृसत्तात्मक था।

    ➣ घरों में बर्तन के रूप में मिट्टी एवं धातु के बने कलश, थाली, कटोरे, तश्तरी, गिलास एवं चम्मच का प्रयोग करते थे।

    ➣ सिंधुवासी शाकाहारी तथा मांसाहारी दोनों थे।

    ➣ भोज्य पदार्थों में गेहूँ, जौ, मटर, तिल, सरसों, खजूर, तरबूज के साथ गाय, सूअर, बकरी और मछली आदि का मांस प्रमुख रूप से प्रयोग में लाया जाता था।

    ➣ स्त्रियों और पुरुषों के वस्त्रों में विशेष अन्तर नहीं था। सूती एवं ऊनी दोनों प्रकार के वस्त्रों का उपयोग होता था।

    ➣ स्त्री-पुरुष दोनों ही आभूषणों में कण्ठार, भुजबन्ध, कर्णफूल, छल्ले, चूडियाँ, (कालीबंगा से प्राप्त), करघनी, पायजेब आदि पहनते थे।

    ➣ स्त्री वर्ग लिपस्टिक का प्रयोग करती थीं। लिपस्टिक चन्हूदड़ों से प्राप्त हुई है।

    ➣ सिन्धु वासी औषधियों से परिचित थे। इस सभ्यता में खोपड़ी की शल्य चिकित्सा के उदाहरण कालीबंगा एवं लोथल से प्राप्त होते हैं।

    ➣ मनोरंजन में मछली पकड़ना, शिकार करना, नृत्य, शिकार, पशुओं की लड़ाई, चौपड़, पासा खेलना आदि शामिल थे।

    ➣ हड़प्पा संस्कृति के समय से मूर्ति पूजा प्रारम्भ हो गई थी। परन्तु हड़प्पा संस्कृति में कही से किसी भी मंदिर के अवशेष नहीं मिले है।

    ➣ मन्दिरों वाली प्रथा प्राचीन मिस्र और मेसोपोटामिया सम्भ्यताओं में पायी गयी हैं।

    ➣ सिंधु घाटी सभ्यता में वृक्ष पूजा का प्रचलन था।

    ➣ सर्वप्रथम स्वास्तिक चिह्न के अवशेष हड़प्पा सभ्यता से मिले हैं।

    ➣ सैन्धववासी मातृदेवी की पूजा करते थे। जो शाक्त धर्म का द्योतक है।

    ➣ सिन्धु सभ्यता के लोथल एवं कालीबंगा से हवनकुण्ड का साक्ष्य मिला है।

    ➣ मोहनजोदड़ो से एक मुहर प्राप्त हुई जिस पर अंकित देवता को शिव की पूजा से सम्बन्ध माना गया।

    ➣ मोहनजोदड़ो का विशाल स्नानागार से जलपूजा के साक्ष्य का प्रमाण मिलता है।

    ➣ सूर्य पूजा की पूजा भी होती थी। मोहनजोदड़ो से प्राप्त स्वास्तिक चिन्हों का सम्बन्ध सूर्य पूजा से लगाया जाता है।

    ➣ भूत प्रेत व् अनिष्ट से बचने के लिए ताबीज भी धारण किया जाता था।

    ➣ हड़प्पा लिपि का सर्वाधिक पुराना नमूना 1853 ई. में (अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा) मिला था पर स्पष्टतः यह लिपि 1923 तक प्रकाश में आई।

    ➣ हड़प्पा लिपि वर्णमाला के अनुसार नहीं है, यह एक भावनात्मक चित्रकारी के रूप में है। लिपि में मछली, चिड़ियाँ, मानवाकृति आदि के चिन्ह मिलते हैं।

    ➣ लिपि-संकेत (चित्रलिपि) दो पंक्तियों में हैं, वहाँ पर ब्युस्त्रफीदान पद्धति का प्रयोग हुआ है

    ➣ अब तक 3000 से अधिक मुहरे प्राप्त हुई हैं। जिसमे लगभग 1300 मुहरे अकेले मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुई हैं।

    ➣ अधिकांश मुहरों पर छोटे चित्रों में एक सिंगी पशु, भैंस, बाघ, गैण्डे, बकरियाँ, हाथी, हिरण और मगरमच्छ जैसी तस्वीरें अंकित हैं।

    ➣ मुहरों के निर्माण में सर्वाधिक उपयोग सेलखड़ी या शैलखटी का किया गया है।

    ➣ मिट्टी की मूर्तियाँ जिन्हे आग में पकाया जाता उन्हें आम तौर पर टेराकोटा या मृण्मूर्तियाँ कहा जाता है।

    ➣ संगीत सम्बन्धी उपकरण ढोल, तबला आदि खुदाई से प्राप्त हुए हैं।

    ➣ हड़प्पा कालीन मूर्तियों में काँस्य-निर्मित एक महिला नर्तकी, मूर्तिकला का उत्कृष्ट नमूना है।

    नर एवं नारी- मृण्मूर्तियां में सर्वाधिक नारी मृण्मूर्तियां मिली है।

    ➣ मानव मृण्मूर्तियां ठोस है जबकि पशुओं की मृण्मूर्तियां खोखली।

    ➣ धातु मूर्तियों में ढलाई में मधूच्छिष्ट विधि का प्रयोग किया गया है।

    ➣ हड़प्पा में शवों को दफनाने जबकि मोहनजोदड़ो में जलाने की प्रथा विद्यमान थी।

    ➣ सिंधु सभ्यता में शवों की अंतिम संस्कार में तीन प्रथाओं के प्रमाण मिले हैं- दाह संस्कार , पूर्ण समाधिकरण आशिंक समाधिकरण।

    रूपनगर (रोपड़) की एक क़ब्र में मालिक के साथ कुत्ते के भी अवशेष मिले हैं।

    लोथल की एक कब्र से मृतक के साथ बकरे को दफनाए जाने के प्रमाण मिले हैं।

    ➣ हड़प्पा संस्कृति के विनाश का ठीक कारण ज्ञात नहीं है। सिन्धु नदी की बाढ़, सिन्धु नदी का मार्ग बदलना, वर्षा की कमी, भूकम्प एवं विदेशी आक्रमण जैसे कारण समय-समय पर बताए गए हैं।

    ➣ सैंधव सभ्यता के विनाश का संभवतः सबसे प्रभावी कारण बाढ़ था।

    ➣ हड़प्पा सभ्यता से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य:

    • चावल के प्रथम साक्ष्य लोथल एवं रंगपुर से मिले हैं।
    • सिंधु क्षेत्र का प्राचीन नाम मेलुहा था।
    • विश्व में चाँदी सर्वप्रथम भारत (हड़प्पा सभ्यता) में पाई गई।
    • सिंधु सभ्यता का मुख्य केन्द्र हड़प्पा था।
    • ऋग्वेद में हड़प्पा सभ्यता को हरयूपिया कहा गया है।
    • सैंधवकालीन सर्वाधिक मुहरें मोहनजोदड़ो से मिली हैं।
    • लोथल एवं कालीबंगा से युग्म समाधियां मिली हैं।
    • हड़प्पाकालीन पुरास्थल कुणाल से चाँदी के दो मुकुट मिले हैं।
    • लोथल एवं सुरकोतदा सिंधु सभ्यता के प्रमुख बंदरगाह थे।
    • लोथल से एक तराजू प्राप्त हुआ है।
    • सैंधववासी मिठास के लिए शहद का प्रयोग करते थे।
    • पर्दा-प्रथा एवं वेश्यावृत्ति सैंधव सभ्यता में प्रचलित थी।
    • सिंधुवासी बतख को अत्यधिक पवित्र मानते थे।
  • हड़प्पा सभ्यता (2350–1750 ई. पू.) : उदय, नगर व्यवस्था, संस्कृति एवं पतन

    📚 विषय सूची

    हड़प्पा सभ्यता : सिंधु घाटी की प्रथम नगरीय सभ्यता

    ➣ सिन्धु घाटी सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है। यह टिगरिस और यूफ्रेटस के तट पर स्थित मेसोपोटामिया, नील नदी के तट पर स्थित मिस्र की सभ्यता एवं ह्वांगहो के तट पर स्थित चीनी सभ्यता के समकालीन थी।

    ➣ पुरातात्विक स्रोतों के आधार पर सिन्धु घाटी सभ्यता अपने समकालीन सभ्यताओं में से उत्तम नगरीय संरचना व अनुपम चित्रकला के साथ धार्मिक जीवन शैली का उदाहरण प्रस्तुत करता है।

    ➣ हड़प्पा की जानकारी सबसे पहले 1921 ई. में पाकिस्तान में अवस्थित हड़प्पा नामक आधुनिक स्थल से प्राप्त हुई थी इसलिए इसका नाम हड़प्पा संस्कृति पड़ा।

    भारतीय पुरातत्व विभाग के नियमानुसार जब किसी प्राचीन सभ्यता का खनन होता है तो उस जगह या संस्कृति का नाम उसके आधुनिक स्थल के नाम पर रखा जाता है।

    ➣ इस संस्कृति का विकास सिन्धु और घघ्घर/हकड़ा (प्राचीन सरस्वती) के किनारे हुआ था। इसलिए इसे सिंधु घाटी सभ्यता भी कहा जाता है। हालाँकि बाद में अन्य स्थलों से भी इस सभ्यता के स्थल अस्तित्व में आने लगे। जिस कारण यह उपयुक्त नाम नहीं रह गया।

    ➣ हड़प्पा का मुख्य क्षेत्र सिंधु नदी नहीं बल्कि सरस्वती नदी तथा उसकी सहायक नदियों का क्षेत्र था जो सिंधु व गंगा नदी के मध्य स्थित था। इसलिए कुछ विद्वानों ने इसे सिंधु-सरस्वती सभ्यता भी कहा।

    ➣ सिंधुवासियों ने पहली बार कांस्य (टिन + ताम्बा) का प्रयोग किया। इसलिए इस आधार पर इसका अन्य नाम कांस्य युगीन सभ्यता अथवा ताम्रपाषणिक सभ्यता भी मिलता है।

    ➣ प्रथम बार नगरों के उदय के कारण इसे प्रथम नगरीकरण/शहरीकरण सभ्यता भी कहा जाता है।

    भौगोलिक स्थिति

    सिन्धु घाटी सभ्यता की भौगोलिक स्थिति

    ➣ हड़प्पा सभ्यता का उदय ताम्रपाषाणिक पृष्ठभूमि में भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमोत्तर भाग में हुआ था।

    ➣ पंजाब प्रान्त (पाकिस्तान) में स्थित माण्टगोमरी ज़िले में रावी नदी के बायें तट पर हड़प्पा और सिन्ध में मुहनजोदड़ो ,जिसका शाब्दिक अर्थ है मुर्दो का टीला, दोनों पाकिस्तानी हिस्से में है।

    ➣ शहरी हड़प्पा संस्कृति का केन्द्र पंजाब और सिंध में, मुख्यतः सिंधु घाटी में पड़ता है, 1921 में पहली बार यहीं खनन हुआ था। वहाँ से यह दक्षिण और पूर्व की ओर फैली।

    ➣ हडप्पा संस्कृति के अंतर्गत पश्चिमोत्तर में पंजाब, सिंध और बलूचिस्तान ,गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, उत्तर में जम्मू – कश्मीर(माण्डा) और दक्षिण में अरब समुद्र ,महाराष्ट्र (नर्मदा नदी) तथा उत्तर-पूर्व में मेरठ तक फैला था।

    अफगानिस्तानमुंडीगाक, शोर्तुघई।
    बलूचिस्तान(पाकिस्तान)मेहरगढ़, सुत्कागेनडोर, सोत्काकोह, बालाकोट, रानापुंडई, कुल्ली, क्वेटा घाटी, दम्बसादात एवं डाबरकोट ।
    सिन्ध (पाकिस्तान) कोटदीजी, आमरी, मोहनजोदड़ो, अलीमुराद, चन्हूदड़ो, जुड़ीदरो।
    पश्चिमी पंजाब(पाकिस्तान) हड़प्पा, डेरा इस्माइल खान, रहमान डेरी, जलीलपुर, गुमला, चकपुरवाने।
    पंजाब (भारत)रोपण (रूपनगर) चक्र 86 बाड़ा संघोल, कोटला, निहंगखान, डेरमजरा।
    हरियाणाराखीगढ़ी, बनावली, मित्ताथल, सिसवल, बखाबली, बालू।
    जम्मू-कश्मीरमाण्डा।
    पश्चिमी उत्तर प्रदेशआलमगीरपुर, अम्बाखेड़ा, बड़ागाँव, हुलास।
    गुजरातकाठियावाड़ (खम्भात क्षेत्र) लोथल, रंगपुर, रोजदी, प्रभासपाटन, सोमनाथ, भगतराव मेघम, नागेश्वर कौंतसी, शिकारपुर, कच्छ की रन, धौलावीरा, देवलपुर, सुरकोटदा।
    राजस्थानकालीबंगा।

    उदय व खनन

    ➣ हड़प्पा सभ्यता 7वीं शताब्दी में पहली बार प्रकाश में आया जब पंजाब प्रान्त के लोगों ने में ईंटो के लिए मिट्टी की खुदाई की तब उन्हें वहाँ से बनी बनाई ईंटें मिली।

    ➣ उसके बाद 1826 ई. में चार्ल्स मैसेन ने पहली बार इस पुरानी सभ्यता का उल्लेख किया। ततपश्चात ब्रिटिश उत्खननकर्ता एंव खोजी कनिंघम ने 1856 में इस सभ्यता के बारे में सर्वेक्षण किया।

    1856 में कराची से लाहौर के मध्य रेलवे लाइन के निर्माण के दौरान बर्टन बन्धुओं द्वारा हड़प्पा स्थल की सूचना सरकार को दी गयी।

    ➣ 1861 में एलेक्जेण्डर कनिंघम के निर्देशन में भारतीय पुरातत्व विभाग की स्थापना की गयी।

    1906 में भारतीय पुरातत्व विभाग को एक संस्था बनाया गया था।, जो कला एंव संस्कृति मंत्रालय के अधीन है।

    ➣ हड़प्पा स्थलों की क्षमता की पहचान बहुत बाद में सन् 1921 में की गई, जब भारतीय पुरातत्वविद् दया राम साहनी ने इसकी खुदाई शुरू करवायी।

    ➣ 1902 में लार्ड कर्जन द्वारा जॉन मार्शल को भारतीय पुरातात्विक विभाग का महानिदेशक बनाया गया।

    ➣ जॉन मार्शल के निर्देशन में रायबहादुर दयाराम साहनी ने 1921 ई. में हड़प्पा का एवं राखालदास बनर्जी ने 1922 ई. में मोहनजोदड़ो की खुदाई करवायी थी।

    ➣ इसी क्रम में सन् 1931 में मार्शल के सामान्य पर्यवेक्षण में बड़े पैमाने पर मुहनजो-दड़ो की तथा 1938 में मेके ने उसी जगह की खुदाई की। 1940 में वत्स ने तथा 1946 में मोर्तिमेर व्हीलर ने हड़प्पा में खुदाई की।

    ➣ सिन्धु सभ्यता का विस्तार भारत एवं पाकिस्तान में लगभग 2800 हड़प्पा स्थलों की पहचान हुई है। विकसित हड़प्पा बस्तियों की संख्या 1022 है उनमें से 406 पाकिस्तान में स्थित हैं और 616 भारत में।

    ➣ हड़प्पा लगभग 150 हेक्टेयर और मोहनजोदड़ो 500 हेक्टेयर में फैला था। सबसे बड़ा ज्ञात स्थल मोहनजोदड़ो है।

    ➣ त्रिभुजाकार हड़प्पा संस्कृति का समूचा क्षेत्रफल 1,299,600 वर्ग किलोमीटर था, जो तत्कालीन मिस्र एवं मेसापोटामियाई क्षेत्रफल से काफी अधिक था।

    ➣ दिसम्बर 2014 में भिरड़ाणा को सिन्धु घाटी सभ्यता का अब तक का खोजा गया सबसे प्राचीन नगर माना गया है।

    ➣ भारतीय पुरातत्व विभाग के आलावा अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और इटली के पुरातत्वविदों ने भी हड़प्पा सहित कई स्थलों पर काम किया है।

    ➣ हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, कालीबंगा, लोथल, धोलावीरा और राखीगढ़ी इसके प्रमुख केन्द्र थे।

    ➣ सभी उत्खननकर्ता हड़प्पा संस्कृति के शहरीकरण के रूप में विकसित होने पर एकमत हैं।

    काल निर्धारण

    ➣ सिंधु घाटी सभ्यता के नगरीकरण व्यवस्था पर विद्वान एकमत थे परन्तु समय के बारे में एकमत प्राप्त नहीं हुआ।

    ➣ इस दिशा में सर्वप्रथम जॉन मार्शल ने 1931 ई. में इस सभ्यता की तिथि लगभग 3250 ई.पू. से 2750 ई. निर्धारित की थी।

    डी० पी० अग्रवाल के अनुसार सिंधु सभ्यता का काल 2350 ई० पू० से 1750 ई. पू. माना जाता है।

    मृण्मुद्राओं के आधार पर पर सिंधु सभ्यता का काल 2500 ई० पू० से 1800 ई. पू. माना जाता है।

    ➣ हड़प्पा संस्कृति के अध्ययन के साथ चार्ल्स मैस्सन, कनिंघम, एम. व्हीलर, माधो स्वरूप वत्स आदि जुड़े थे। ह्वीलर के अनुसार सिंधु सभ्यता का काल 2500 ई. पू. से 1500 तक रहा।

    रेडियो कार्बन-14 (C14) जैसी नवीन विश्लेषण पद्धति के द्वारा हड़प्पा सभ्यता की तिथि 2350 ई.पू. से 1750 ई.पू. मानी गयी है।

    ➣ प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि यह सभ्यता आरम्भ से ही विकसित रूप में थी तथा इसका पतन भी आकस्मिक हुआ। ऐसी स्थिति में कुछ भी निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता है।

    रेडियो कार्बन तकनीक को सर्वाधिक मान्य माना गया है जिसके अनुसार सिंधु घाटी सभ्यता को 2350 ई. पू. – 1750 ई. पू. बताया गया है।

    जॉन मार्शल3250 ई.पू.-2750 ई.पू.
    अर्नेस्ट मैके2800 ई.पू.-2500 ई.पू.
    माधोस्वरुप वत्स3500 ई.पू.-2700 ई.पू.
    सी.जे. गैड2300 ई.पू.-1750 ई.पू.
    मार्टीमर व्हीलर2500 ई.पू.-1500 ई.पू.
    फेयर सर्विस2000 ई.पू.-1500 ई.पू.
    रेडियो कार्बन2500 ई.पू.-1750 ई.पू.
    एनसीआरटी 2350 ई.पू.-1800 ई.पू.
    डी.पी. अग्रवाल2300 ई.पू.-1700 ई.पू.

    शहरीकरण या नगरीकरण संरचना

    ➣ हड़प्पा संस्कृति की प्रमुख विशेषता इसकी नगर योजना प्रणाली थी। प्रथम बार नगरों के उदय इसी सभ्यता से मिलता है जिसके कारण इसे प्रथम नगरीकरण भी कहा जाता है।

    ➣ नगरों में बने भवनों के बारे में विशिष्ट बात यह थी कि वे एक खास संरचनात्मक प्रणाली का पालन करते हुए बनाए गए थे, जिसमें सड़कें एक दूसरे को समकोण पर काटती थीं तथा खंडों में विभक्त थे।

    ➣ सड़को का निर्माण मिट्टी से किया गया था। जबकि सड़को के दोनो ओर नालियों का निर्माण पक्की ईटों द्वारा किया गया था।

    ➣ भवनों का निर्माण एक सीध में सड़कों के किनारे व्यवस्थित रूप में किया जाता था। सभी मकान पक्की ईंटो से बने थे।

    ➣ अवशेषो से स्पष्ट होता है कि प्रत्येक मकान के बीच में एक आंगन होता था, आंगन के चारों ओर चार-पांच बड़े कमरे, रसोईघर एवं स्नानागार की व्यवस्था थी। दरवाजे और खिड़कियाँ सड़क की ओर न खुलकर पीछे की ओर खुलते थे (लोथल इसका अपवाद है।)। भवन दो मंजिले भी थे।

    ➣ ईटों के निर्माण का निश्चित अनुपात 4:2:1 था। यहाँ पर मिले भवन अलंकरण रहित हैं।, केवल कालीबंगा में फर्श के निर्माण में अलंकृत ईंट के प्रयोग का साक्ष्य मिले हैं।

    ➣ ढाँचे के मामले में मोहनजोदड़ो, हड़प्पा से ज्यादा विकसित था। मुहनजो-दड़ो का सबसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्थान विशाल स्नानागार है। जिसमें तालाब शामिल हैं जो गढ़ों टीलों में स्थित हैं।

    ➣ विशाल स्नानागार 11.88 मी. लम्बा, 7.01 मी. चौड़ा और 2.43 मी. गहरा है। जिसमे उतरने के लिये उत्तर तथा दक्षिण की ओर सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। कपड़े बदलने के लिए किनारे में कमरे थे। स्नानागार का फर्श पकी ईंटों का बना है एवं इसके मध्य में स्नानकुंड स्थित था।

    ➣ ऐसा मानना है कि स्नानागार मुख्य रूप से धार्मिक स्नान के लिए था। यह जलपूजा का एकमात्र साक्ष्य है।

    धौलावीरा स्थल में पाए जाने तालाब का इस्तेमाल शायद उसी उद्देश्य के लिए किया गया था। जिसके लिए मुहनजो-दड़ो के स्नानागार का उपयोग किया जाता था।

    जॉन मार्शल ने विशाल स्नानागार को विश्व का आश्चर्यजनक निर्माण बताया था।

    ➣ मुहनजोदड़ो में सबसे बड़ा भवन 45.71 मीटर लम्बा और 15.23 मीटर चौड़ा एक अन्न-भण्डार है।

    हड़प्पा के गढ़ में छह अन्नागार प्राप्त हुए हैं , जो ईंटों के बने चबूतरों पर दो पंक्तियों में बनाये हुए हैं। प्रत्येक अन्नागार 15.23 मीटर लम्बा और 6.09 मीटर चौड़ा है।

    कालीबंगा में उसके दक्षिणी हिस्से में प्राप्त ईंटों का चबतुरा सम्भवत: अन्नागार के लिए प्रयुक्त होता था।

    ➣ मोहनजोदड़ो की जल निकास प्रणाली बहुत प्रभावशाली थी। सभी नगरों के प्रत्येक छोटे व बड़े मकानों में प्रांगण व स्नानागार होते थे। सड़कों के दोनों और जल – निकासी के लिए नालियों का निर्माण पक्की ईटों से किया गया था।

    कालीबंगा में कई घरों में अपने कुएँ थे। घरों का पानी बहकर सड़कों तक आता था, जहाँ इनके नीचे मोरियाँ बनी हुई थीं। ये मोरियाँ ईंटों और पत्थरों की तख्तियों से ढकी रहती थीं।

    ➣ हड़प्पा की जलनिकासी व्यवस्था अनूठी है। शायद ही किसी अन्य समकालीन सभ्यता (मिस्र तथा मेसोपोटामिया की सभ्यता) ने स्वास्थ्य और स्वच्छता पर इतना ध्यान दिया, जितना कि हड़प्पा सभ्यता ने दिया।

    ➣ यद्यपि हड़प्पा सभ्यता के लगभग 1000 स्थलों भी ज्यादा स्थलों के बारे में जानकारी प्राप्त हो चुकी है, लेकिन इनमें से केवल 6 को ही नगर माना जाता है, ये हैं – हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, सिंध का चन्हूदड़ो, गुजरात का लोथल, उत्तरी राजस्थान का कालीबंगा तथा हरियाणा के हिसार जिले में स्थित बनवाली।

    कृषि

    कृषि का प्रथम उदाहरण मेहरगढ़ से प्राप्त हुआ है।

    ➣ वर्तमान में बहुत कम वर्षा वाला सिन्धु प्रदेश आज बहुत उपजाऊ नहीं है लेकिन अतीत के समृद्ध गाँव और कस्बों से ज्ञात होता है यह प्राचीन समय में अत्यधिक उपजाऊ भूमि था।

    ➣ प्राचीन समय में सिन्धु क्षेत्र में अधिक प्राकृतिक वनस्पति थी, जो बारिश कराने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती थी।

    ➣ क्षेत्र की उर्वरता का इससे भी अधिक महत्वपूर्ण कारण सिन्धु नदी का वार्षिक जलमग्न होना था जो कि हिमालय की सबसे लम्बी नदी है।

    जिस तरह नील नदी ने मिस्त्र का निर्माण कर वहाँ के लोगों की सहायता की, उसी तरह सिन्धु नदी ने सिन्ध का निर्माण कर उन्हें समृद्ध बनाया।

    ➣ नगर की सुरक्षा के लिए ईंटों से बनी दीवारों से संकेत मिलता है कि बाढ़ प्रति वर्ष आती थी।

    ➣ जल-संग्रह के लिए बान्धों से घिरे गबरबन्द या नाला एक विशेषता थी, लेकिन धारा या नहर का इस्तेमाल सम्भवत: सिंचाई के लिए नहीं किया जाता था।

    ➣ बाढ़ उतर जाने पर नवम्बर में सिन्धु के लोग बाढ़ के मैदानों में बीज बोते और अगली बाढ़ से पहले अप्रैल में अपनी फसल गेहूँ और जौ काट लेते थे।

    ➣ वहाँ कोई कुदाल या हल नहीं पाया गया है। इस समय खेती के कार्यो में प्रस्तर एवं कांस्य धातु के बने औजार प्रयुक्त होते थे।

    ➣ लेकिन कालीबंगा में पूर्व-हड़प्पा काल में मिले नालों (हलरेखा) से पता चलता है कि हड़प्पा काल के दौरान राजस्थान में खेतों की जुताई होती थी। बणावली में मिट्टी का बना हुआ एक हल – खिलौना मिला है।

    ➣ हड़प्पा के लोगों ने बैल द्वारा खींचने वाले लकड़ी के हल का इस्तेमाल खेती में किया और इसके लिए ऊँटों का भी इस्तेमाल होता था।

    ➣ फसलों की कटाई के लिए पत्थर की हँसिया का इस्तेमाल किया गया होगा।

    ➣ अभी तक 9 फसलों की पहचान हो पायी है जिसमे चावल (गुजरात, लोथल , राजस्थान ), जौ की दो किस्में , गेहूँ की तीन किस्में, खजूर, तरबूज मटर हैं । इसके अतिरिक्त मटर, सरसों, तिल एवं कपास की भी खेती होती थी। गन्ने का कोई साक्ष्य नहीं मिला है।

    लोथल में हुई खुदाई में धान तथा बाजरे की खेती के अवशेष मिले है तथा आटा पीसने की पत्थर की चक्की के दो पाट मिले हैं। पेड़-पौधों में पीपल, खजूर, नीम, नीबू एवं केला साक्ष्य मिले हैं।

    ➣ सिन्धुवासियों को सबसे पहले कपास उत्पादन करने का श्रेय जाता है। और इस वजह से यूनानियों ने इस क्षेत्र को सिन्धन नाम दिया जो सिन्ध से लिया गया है।

    सिन्धुवासियों को सबसे पहले कपास उत्पादन करने का श्रेय जाता है

    ➣ आपातकालीन स्थिति के लिए बड़े-बड़े अन्नागारों में अनाज संग्रह किया जाता था।

    ➣ हड़प्पा गाँव, जो ज्यादातर बाढ़ के मैदानों के पास स्थित थे, केवल अपने लिए ही नहीं बल्कि कस्बे के लोगों के लिए भी पर्याप्त अनाज का उत्पादन करते थे।

    पशुपालन

    ➣ हड़प्पा के लोगों ने खेती के साथ-साथ बड़े पैमाने पर पशुपालन भी किया। मुख्य पालतू पशुओं में बैल, भैंस, गाय, भेड़-बकरी,ऊँट, कुत्ते, बिल्ली, गधे, खच्चर और सुअर आदि है। इन्हें कूबड़ वाला साँड़ विशेष प्रिय था।

    ➣ इसके आलावा उन्हें बंदर, भालू, खरहा आदि जंगली जानवरों का भी ज्ञान था। जिसकी पुष्टि मुहरों, ताम्र तश्तरियों आदि पर अंकित चित्रों से होती है।

    शेर का कोई साक्ष्य नहीं मिला है। यहाँ गाय के अवशेष नहीं मिले।

    गधे का उपयोग बोझ उठाने और ऊँट को खेतों में जुताई के लिए भी इस्तेमाल किया जाता था।

    ➣ हड़प्पा के लोग हाथी से अच्छी तरह परिचित थे परन्तु उनके पालने के साक्ष्य प्राप्त नहीं हो सके हैं। सम्भवत वे उन्हें पालतू बनाने में सफल नहीं हो सके थे।

    घोड़े के साक्ष्य मोहनजोदड़ो और लोथल के एक संदिग्ध टेराकोटा मूर्ति से मिलता है। एक घोड़े के अवशेष, पश्चिम गुजरात में स्थित सुरकोतडा से मिला है जो ई.पू. 2000 के आस-पास का है। संभवत: हड़प्पा संस्कृति घोड़ों पर केन्द्रित नहीं थी।

    ➣ वे गैण्डे से भी परिचित थे। जिसका का प्रमाण आमरी से मिला है तथा बत्तख का चित्रण लोथल से प्राप्त मृदभाण्ड पर मिलता है।

    ➣ कुछ पशु-पक्षियों, जैसे बन्दर, खरगोश, हिरन, मुर्गा, मोर, तोता, उल्लू के अवशेष खिलौनों और मूर्तियों के रूप में मिले हैं।

    मेहरगढ़ और बुर्जहोम में भारत के प्राचीनतम कृषि एंव पशुपालन के अवशेष प्राप्त हुए हैं।

    कारीगरी एंव शिल्प-कौशल

    ➣ हड़प्पा के लोग पत्थरों के औजारों का इस्तेमाल करते थे, लेकिन वे काँस्य के निर्माण और उपयोग से भी परिचित थे।

    ➣ हड़प्पा की शहरी संस्कृति काँस्य युगीन सभ्यता भी कहा जाता है वे लोग लौह धातु से परिचित नहीं थे।

    ➣ आम तौर पर ताम्बे के साथ टिन के मिश्रण से काँस्य बनाया जाता था, लेकिन इस उद्देश्य के लिए वे कभी-कभी ताम्बे के साथ आर्सेनिक भी मिलाते थे।

    ➣ हड़प्पाई स्थलों में प्राप्त काँसे के औजार व हथियार में टिन की मात्रा अत्यन्त कम है। जिसे पता चलता है कि हड़प्पा में आसानी से न तो टिन उपलब्ध थे, न ताम्बे।जिससे इस क्षेत्र में कांस्य के औजारों का विस्तार नहीं हुआ।

    ➣ अयस्कों की अशुद्धता से ज्ञात होता है कि ताम्बे को खेतड़ी, राजस्थान से प्राप्त किया गया था। हालाँकि इसे बलूचिस्तान से भी लाया जा सकता है तथा टिन को अफगानिस्तान से।

    ➣ हड़प्पा समाज में काँस्य कारीगरों का महत्वपूर्ण समूह था। उन्होंने मूर्तियों और वर्तनों के साथ साथ कुल्हाड़ी, आरी, चाकू और भाले जैसे विभिन्न उपकरण और हथियारों का भी उत्पादन किया।

    ➣ बुने हुए कपास का एक टुकड़ा मुहनजोदड़ो से मिला है और कई वस्तुओं पर कपड़ों के निशान पाए गए हैं।

    धुनाई यन्त्र का उपयोग कताई के लिए किया गया था। बुनकर ऊन और कपास का कपड़ा बुनते थे।

    ➣ ईंटों की विशाल संरचना, ईंट-निर्माण-शिल्प तथा राजमिस्त्री वर्ग के अस्तित्व का प्रमाण दर्शाती है।

    ➣ हड़प्पा के लोग नाव भी बनाते थे, मुहर निर्माण और टेराकोटा निर्माण भी महत्वपूर्ण शिल्प थे।

    ➣ सोनार सोने, चाँदी और बहुमूल्य पत्थरों के गहने बनाते थे। इसमें पहली दो सामग्रियाँ अफगानिस्तान से प्राप्त होती थीं और अन्तिम दक्षिण भारत से।

    ➣ हड़प्पा के लोग मटका निर्माण के विशेषज्ञ भी थे। कुम्हार के पहिये का काफी उपयोग किया गया था। ये मृदभांडों को चिकना और चमकीला बनाते थे।

    चालाक लोमड़े और प्यासे कौवे की कहानियाँ हड़प्पा के मृदभांडों पर चित्रित हैं।

    व्यापार एवं वाणिज्य

    ➣ सिन्धु लोगों के व्यापार की जानकारी हड़प्पा, मुहनजोदड़ो और लोथल में पाए जाने वाले भण्डारों के आलावा कई मुहरों व माप-तौल प्रणाली से भी मिलती है।

    ➣ सिंन्धुवासी सिंधु-सभ्यता क्षेत्र के अंतर्गत पत्थर, धातु, खाल आदि का व्यापार करते थे।

    ➣ अपेक्षित कच्चा माल उनके नगरों में उपलब्ध नहीं था। अतः उन्हें बाह्य देशों से व्यापारिक सम्पर्क स्थापित करना पड़ता था।

    ➣ व्यापार में धातु के सिक्कों का प्रयोग नहीं होता था। संभवतः वस्तु-विनिमय प्रणाली द्वारा आदान-प्रदान करते थे। तैयार माल और सम्भावित अनाज के बदले वे नाव और बैलगाड़ी के साथ पड़ोसी क्षेत्रों से धातु खरीदते थे।

    ➣ वे पहियों का उपयोग जानते थे। हड़प्पा में ठोस पहियों वाली गाड़ियाँ उपयोग में थीं। मोहनजोदड़ो से मिट्टी व काँसे की दो पहियों वाली खिलौना गाड़ी एवं चन्हुदड़ो से मिट्टी की चार पहियों वाली खिलौना गाड़ी मिली है।

    लोथल से अलवेस्टर पत्थर का एक बड़ा पहिया व बनावली से सड़कों पर बैलगाड़ी के पहिये के निशान मिले हैं।

    ➣ हड़प्पा का व्यावसायिक सम्बन्ध राजस्थान, अफगानिस्तान और ईरान के साथ था। उन्होंने उत्तरी अफगानिस्तान में एक व्यापार कॉलोनी की स्थापना की, जिससे मध्य एशिया के साथ व्यापार करने में मदद मिली।

    मेसोपोटामिया ग्रन्थ के अनुसार ई.पू. 2350 के आस-पास से मेलुहा (सिन्धु क्षेत्र का प्राचीन नाम) के साथ व्यापार सम्बन्धों के संकेत मिलते हैं।

    ➣ मेसोपोटामिया में प्रवेश हेतु उर एक महत्त्वपूर्ण बन्दरगाह था जबकि लोथल व सुरकोतदा सिंधु सभ्यता का प्रमुख बंदरगाह में से था।

    ➣ मेसोपोटामिया पुरालेखों में दिलमुन और मकन नामक दो मध्यवर्ती व्यापारिक केंद्रों का उल्लेख मिलता है, जो मेसोपोटामिया और मेलुहा के मध्य स्थित थे।

    ➣ मोहनजोदाड़ो से प्राप्त एक मुहर पर अंकित नाव का चित्र एवं लोथल से मिट्टी की खिलौना नाव से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि इस सभ्यता के लोक आन्तरिक एवं बाह्य व्यापार में मस्तूल वाली नावों का उपयोग करते थे।

    आयातित वस्तुस्थल (स्रोत)
    सीसाईरान, राजस्थान, अफगानिस्तान, दक्षिण भारत
    शिलाजीत, देवदारहिमालय
    नील रत्नबदख्शाँ (अफगानिस्तान)
    टिनईरान, अफगानिस्तान
    ताँबाखेतड़ी (राजस्थान) व बलूचिस्तान, अफगानिस्तान
    चाँदीईरान, अफगानिस्तान
    सोनाअफगानिस्तान, फारस, दक्षिण भारत (कर्नाटक)
    लाजवर्द मणिबदख्शाँ (अफगानिस्तान), मेसोपोटामिया
    फिरोजाईरान

    राजनीतिक संगठन

    ➣ हड़प्पा संस्कृति की व्यापकता एवं विकास को देखने से ऐसा लगता है कि, यह सभ्यता किसी केन्द्रीय शक्ति (सत्ता) से संचालित होती थी। वैसे हड़प्पा कालीन राजनीतिक व्यवस्था के वास्तविक स्वरूप का विषय विवादस्पद है।

    ➣ राजनीतिक व्यवस्था के सम्बन्ध में विद्वान एकमत नहीं हैं –

    व्हीलरमध्यम वर्गीय जनतंन्त्रात्मक शासन कहा और उसमें धर्म की महत्ता को स्वीकार किया।
    स्टुअर्ट पिग्गटमोहनजोदड़ों का शासन राजतन्त्रात्मक न होकर जनतंत्रात्मक था।
    मैकेमोहनजोदड़ों का शासन एक प्रतिनिधि शासक के हाथों था
    वी.वी स्टुर्बगुलामों पर आधारित
    लोकमत सम्रद्ध व्यापारी वर्ग के हाथों में था

    ➣ हड़प्पा कालीन व्यापारिक ढांचे से लगता है कि हडप्पावासी वाणिज्य की ओर अधिक आकर्षित थे, इसलिए ऐसा माना जाता है कि सम्भवतः हड़प्पा सभ्यता का शासन व्यापारी वर्ग के हाथों में था।

    ➣ वाणिज्य प्रणाली दृष्टि से कहा जा सकता है मुहनजोदड़ो का विशाल अन्नागार ही खजाना या राजकोष होता था। कर के रूप में अनाज एकत्र किया जाता था।

    ➣ किलाबन्दी कई शहरों की विशेषताएँ होती थीं। धौलावीरा में विशेषकर, किलों के अन्दर किले होते थे।

    ➣ किसी संगठित बल या स्थाई सेना का कोई स्पष्ट अनुमान नहीं है, लेकिन पत्थरों व सुरकोतड़ा के बर्तनों में सैनिक के चित्रण से स्थाई सेना का अनुमान लगाया जा सकता है। हालांकि हड़प्पा में कोई हथियार नहीं था।

    ➣ किसी भी हड़प्पा स्थल पर किसी भी मन्दिर का अवशेष नहीं मिला है। हालाँकि पूजा के साक्ष्य मिले हैं। महान स्नानागार धार्मिक क्रियाकलापों को दर्शाता है इसलिए, यह कहना गलत होगा कि पुरोहित वर्ग ने हड़प्पा में शासन किया।

    इसके विपरीत मिस्र और मेसोपोटामिया में मंदिर के साक्ष्य मिले हैं जिससे लगता है मेसोपोटामिया के निचले शहरों में पुरोहित वर्ग का शासन रहा होगा।

    ➣ ऐसा अनुमान है कि सिन्धुवासियों की नगरीकरण संरचना तथा व्यापारिक स्तर पर उत्पादन के लिए कोई प्रशासन व्यवस्था रही होगी।

    सामाजिक जीवन

    ➣ सामाजिक व्यवस्था का मुख्य आधार परिवार था। मातृदेवी की पूजा तथा मुहरों पर अंकित चित्रों से यह परिलक्षित होता है कि हड़प्पा समाज सम्भवतः मातृसत्तात्मक था।

    ➣ दुर्ग, मकानों के आकार व रूपरेखा तथा शवों के दफनाने व अंतिम संस्कार के विभिन्न ढंग से प्रतीत होता है कि समाज अनेक वर्गों जैसे पुरोहित, व्यापारी, अधिकारी, शिल्पी एवं मजदूरों में विभाजित रहा होगा।

    ➣ विभिन्न आवासीय संरचनाओं में हड़प्पा समाज में जो दो कमरे वाले घर थे, वे सम्भवत: कारीगरों और मजदूरों के लिए होते थे।

    ➣ सिंधुवासी शाकाहारी तथा मांसाहारी दोनों थे। भोज्य पदार्थों में गेहूँ, जौ, मटर, तिल, सरसों, खजूर, तरबूज के साथ गाय, सूअर, बकरी और मछली आदि का मांस प्रमुख रूप से प्रयोग में लाया जाता था।

    ➣ मिट्टी के बर्तनों के अतिरिक्त ताम्र तथा काँस्य के बर्तनों का उपयोग भी हड़प्पाई लोगों द्वारा किया जाता था। बर्तन के रूप में मिट्टी एवं धातु के बने कलश, थाली, कटोरे, तश्तरी, गिलास एवं चम्मच का प्रयोग करते थे।

    मोहनजोदड़ो से प्राप्त अवशेषों में मिट्टी की एक मूर्ति के अनुसार उस समय भी दीपावली मनाई जाती थी। उस मूर्ति में मातृ-देवी के दोनों ओर दीप जलते दिखाई देते हैं।

    सूती एवं ऊनी दोनों प्रकार के वस्त्रों का उपयोग होता था। स्त्री तथा पुरुषों में बहुमूल्य धातुओं जैसे सोने, चाँदी, हाथीदाँत, ताम्र तथा सीपियों से निर्मित आभूषण प्रचलित थे।

    ➣ आभूषणों में कण्ठार, भुजबन्ध, कर्णफूल, छल्ले, चूडियाँ, (कालीबंगा से प्राप्त), करघनी, पायजेब आदि ऐसे आभूषण मिले हैं।

    मनकों के हार सामान्य रूप से प्रचलित थे। जिसकी निर्माण कार्यशाला चन्हूदड़ो में अवस्थित थी। यहाँ से सौन्दर्य प्रसाधन की सामग्रियों के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं।

    ➣ सिन्धुकालीन स्थल चन्हूदड़ो से एक ईंट पर बिल्ली का पीछा करते हुए कुत्ते के पंजों के निशान मिले हैं।

    ➣ मनोरंजन के लिए मछली पकड़ना, शिकार करना, नृत्य, शिकार, पशुओं की लड़ाई, चौपड़, पासा खेलना आदि शामिल थे। साथ ही धार्मिक समारोह समय-समय पर धूम-धाम से मनाये जाते थे।

    रूपनगर (रोपड़) की एक क़ब्र में मालिक के साथ कुत्ते के भी अवशेष मिले हैं। लोथल में प्राप्त कब्रों में शव को विभिन्न तरीकों से दफनाए गए हैं।

    धामिक प्रथा व परंम्परा

    ➣ हड़प्पा संस्कृति में उनके धार्मिक जीवन की जानकारी मूर्तियों, मुहरें, मृद्भांण्ड, पत्थर तथा अन्य पदार्थो से निर्मित लिंग, क़ब्रिस्तान आदि से मिलती है। इसमें मोहनजोदड़ो का विशाल महास्नानागर उनके जल-पूजा का एकमात्र साक्ष्य है।

    मोहनजोदाड़ो एवं हडप्पा से भारी मात्रा में मिली मिट्टी की मृण्मूर्तियों (टेराकोटा) मिली हैं।

    ➣ एक स्त्री मृण्मूर्ति के गर्भ से एक पौधा निकलता हुआ दिखाया गया है, इससे यह मालूम होता है कि हड़प्पा सभ्यता के लोग धरती को उर्वरता की देवी मान कर इसकी पूजा करते थे।

    हड़प्पा के लोगों ने उसी तरह उसकी पूजा करते थे जिस तरह मिस्र ने नील देवी आइसिस की पूजा की थी।

    सिन्धु घाटी में पुरुष देवता

    ➣ मोहनजोदाड़ो से प्राप्त एक मुहर पर तीन मुख वाले पुरुष देवता का चित्रण प्राप्त किया गया है।

    ➣ एक पुरुष ध्यान की मुद्रा (पद्मासन मुद्रा) में बैठा हुआ है उसके सिर पर तीन सींग हैं, उसके बायी ओर एक गैंडा व भैसा है तथा दांयी ओर एक हाथी, एक व्याघ्र एवं हिरण है। चित्रित इस पुरुष देवता को पशुपति महादेव के रूप में पहचाना गया है।

    ➣ इसके इसके आलावा हड़प्पा एवं मोहनजोदाड़ो से मिले पत्थर के बने लिंग और योनि से उनकी पूजा के प्रचलन में होने का भी प्रमाण मिला है।

    वृक्षों और पशुओं की पूजा

    ➣ मोहनजोदाड़ो से प्राप्त एक मुहर पर वृक्षपूजा के प्रमाण प्राप्त हुए हैं। मुहर पर पीपल की डालों के मध्य एक देवता का चित्रण मिला है।

    ➣ सिन्धु वासी पशुओं की भी पूजा करते थे। मुहरों पर पशुओं की आकृतियाँ अंकित हैं। जिसमे कूबड़ वाला साँड़ उनके लिए विशेष पूज्यनीय था। यहाँ से गौपूजन का प्रमाण नहीं मिलता है।

    ➣ अधिक मात्रा में मिली ताबीज़ों से ऐसा लगता है कि हड़प्पाई लोग भूत-प्रेत एवं तंत्र-मंत्र में भी विश्वास करते थे। सम्भवत: उनके अनिष्ट से बचने के लिए ताबीज धारण करते थे

    लोथल एवं कालीबंगा से हवन कुंडों एवं यज्ञवेदियों का उपलब्ध होना अग्नि पूजा के प्रचलन का प्रमाण प्रस्तुत करता है। नाग पूजा के भी प्रमाण मिले हैं।

    हड़प्पा से प्राप्त एक मिट्टी की पट्टी पर एक महिष यज्ञ का दृश्य चित्रित है, जो महिषासुर-मर्दिनी की याद दिलाता है।

    ➣ हड़प्पा संस्कृति में कही से किसी भी मंदिर के अवशेष नहीं मिले है। सिंधुवासी वृक्ष, पशु, पुरुष व स्त्री के स्वरूप में देवताओं की पूजा करते थे, परन्तु वे इन देवताओं के लिए मंदिर नहीं बनाते थे।

    मन्दिरों वाली प्रथा प्राचीन मिस्र और मेसोपोटामिया सम्भ्यताओं में पायी गयी हैं।

    ➣ हड़प्पा के लोगों में जो धार्मिक रीति-रिवाज प्रचलित थे जैसे – माँग में सिन्दूर भरता विवाहित हिन्दू स्त्रियों के लिए सुहाग का प्रतीक होना , स्वास्तिक को पवित्र मांगलिक चिन्ह् मानना तथा कूबड़ वाला सांड जैसे तथ्य आज भी हिन्दुओं में पाए जाते हैं। परन्तु गौपूजन का प्रमाण नहीं मिलता बल्कि मांसाहार में गाय का उल्लेख मिलता है

    ताबीजभूत प्रेत से बचने के लिए।
    स्वास्तिकसूर्योपासना का प्रतीक। यह चिह्न संभवतः हड़प्पा सभ्यता की देन है।
    योगी के रूप में बैठे पुरुषयोगीश्वर, शिव का स्वरुप
    शृंगशिव से संबंधित
    बैलसंहारकारी देवता शिव का वाहन था
    बकराबलि हेतु प्रयुक्त होता था।
    भैंसाकिसी देवता की शत्रुओं पर विजय का प्रतीक है।
    नागइनकी भी पूजा होती थी।
    बैल, भेड़ एवं बकरीपशुबलि का द्योतक।
    शवों के साथ बर्तन व अन्य सामग्रीमृत्यु के बाद जीवन में विश्वास।
    शवों को उत्तरदक्षिण दिशा में लिटाना धार्मिक विश्वास का द्योतक।
    दो शवों का एक साथ गाड़ा जानापुरुष की मृत्यु के बाद संभवतः स्त्री का सती होना।

    हड़प्पा काल के बाद उत्तर वैदिक युग में मूर्ति पूजा के प्रारम्भ का संकेत मिलता है हालांकि मूर्ति पूजा गुप्त काल से प्रचलित हुई जब पहली बार मन्दिरों का निर्माण प्रारम्भ हुआ।

    हड़प्पा लिपि

    ➣ हड़प्पा के लोगों ने प्राचीन मेसोपोटामिया के लोगों की तरह लेखन की कला का आविष्कार किया।

    ➣ हड़प्पा लिपि की खोज सर्वप्रथम सन् 1853 में अलेक्जेंडर कनिंघम ने की। जिसमे हड़प्पाई लिपि का सम्बंध ब्राह्मी लिपि से बताया गया ।

    ➣ सम्पूर्ण लिपि की खोज सन् 1923 में पूरी हुई,परन्तु अभी तक इसकी व्याख्या नहीं हुई है। कुछ विद्वानों ने इसे प्रोटो-द्रविड़ भाषा के साथ, कुछ ने संस्कृत के साथ जबकि अन्य विद्वानों ने सुमेरियाई भाषा के साथ।

    ➣ चूंकि लिपि ना पढ़े जाने के कारण साहित्य में हड़प्पाई लोगों के मूल्यांकन के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता।

    ➣ हड़प्पा लिपि वर्णमाला के अनुसार नहीं है, यह एक चित्रकारी के रूप में है। लिपि में मछली, चिड़ियाँ, मानवाकृति आदि के चिन्ह मिलते हैं।

    ➣ पत्थर की मुहरों और अन्य वस्तुओं पर हड़प्पा लेखन के लगभग 4000 नमूने हैं। जिसमे कुल मिलाकर लगभग 250 से 400 चित्रलेख हैं। चित्रलेख के रूप में इसके प्रत्येक अक्षर से कुछ ध्वनि, विचार या वस्तु का अर्थ स्पष्ट होता है।

    मिस्र और मेसोपोटामिया के विपरीत, हड़प्पा ने लम्बे समय तक शिलालेख नहीं लिखा था। अधिकांश अभिलेख उनके मुहर पर दर्ज थे और उनमें कुछ ही शब्द होते थे।

    ➣ मुहरों पर प्राप्त चित्रलेखों या संकेतों के साथ पशु-पक्षियों की जो आकृतियाँ उत्कीर्ण हैं, उनके अध्ययन से ज्ञात होता है कि सिन्धु लिपि दाईं ओर बाईं ओर को लिखी जाती थी।

    ➣ साथ ही जहाँ लिपि-संकेत (चित्रलिपि) दो पंक्तियों में हैं, वहाँ पर ब्युस्त्रफीदान पद्धति का प्रयोग हुआ है अर्थात पहली पंक्ति दाईं ओर से बाईं ओर जबकि दूसरी पंक्ति बाईं ओर से दाईं ओर को।

    ➣ इतने अधिक संकेतों वाली लिपि वर्णमालात्मक नहीं हो सकती। अत: यह निष्कर्ष निकाला गया है की हड़प्पा लिपि वर्णात्मक नहीं बल्कि मुख्यतः चित्रलेखात्मक है।

    माप-तौल प्रणाली

    ➣ बाट-माप एवं नाप तोल का व्यापारिक कार्य में महत्त्वपूर्ण योगदान है। सैंधववासी दशमलव प्रणाली पर आधारित बाटों का प्रयोग करते थे।

    मोहनजोदाड़ो, हड़प्पा, लोथल एवं कालीबंगा में प्रयुक्त बाटों की तौल का अनुपात 1, 2, 4, 8, 16, 32, 64, 160, 200, 320 आदि था।

    ➣ बाट धनाकार, वर्तुलाकार, बेलनाकार, शंक्वाकार एवं ढोलाकार थे। तौल की इकाई संभवतः 16 अनुपात में थी।

    ➣ हड़प्पा के लोग भी माप की कला को जानते थे। माप के निशान के साथ अंकित छड़ पाए गए हैं जिनमे से एक काँस्य का बना है।

    ➣ मोहनजोदड़ो से सीप का , हड़प्पा से ताम्बे का, कालीबंगा से मिट्टी का तथा लोथल से हाथी दाँत का पैमाना मिला है।

    सुरकोटदा जो हड़प्पावासियों के बंदरगाह में से एक था , से तराजू का साक्ष्य मिला है।

    हड़प्पा बर्तन

    ➣ हड़प्पा के कुम्हारों को पहिये के उपयोग में महारत हासिल थी। मृद्भाडों पर सामान्यतः पेड़ों और वृत्तों की आकृतियाँ मिलती है। कुछ बर्तनों पर पुरुषों की छवि भी चित्रित है।

    ➣ बर्तन अधिकांशतः लाल व गुलाबी रंग के थे। इसमें डिश-ऑन-स्टैण्ड (नीचे से आधारयुक्त तस्तरी) भी शामिल हैं।

    ➣ विभिन्न प्रकार के मृद्भाडों को अलग-अलग डिजाइन से पेंट भी किया गया है। जिसमे लाल मृद्भाडों पर काले रंग का प्रयोग हुआ है।

    ➣ मृद्भाण्डो पर आकृतियाँ के साथ सिधु लिपि भी मिलती है।

    मुहर और मुद्रण

    ➣ हड़प्पा संस्कृति की सबसे बड़ी कलात्मक रचनाएँ मुहर हैं। सिन्धु सभ्यता के विभिन्न स्थलों से अब तक 3000 से अधिक प्राप्त हुई हैं। जिसमे लगभग 1300 मुहरे अकेले मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुई हैं।

    ➣ हड़प्पा सभ्यता में मुहरें बेलनाकार, वर्गाकार, आयताकार एवं वृत्ताकार रूप में मिली हैं।

    ➣ अधिकांश मुहरों पर छोटे चित्रों में एक सिंगी पशु, भैंस, बाघ, गैण्डे, बकरियाँ, हाथी, हिरण और मगरमच्छ जैसी तस्वीरें अंकित हैं।

    कालीबंगा से प्राप्त एक मुहर पर किसी देवता अथवा आराध्य देव की आकृति मिलती है।

    लोथल और देसलपुर से ताँव की बनी मुहर तथा मोहनजोदड़ो एवं लोथल से नाव की आकृति अंकित मुहर मिली है।

    ➣ मुहरों के निर्माण में सर्वाधिक उपयोग सेलखड़ी या शैलखटी का किया गया है। इसके आलावा चीनी मिट्टी तथा हाथीदाँत का भी प्रयोग होता था।

    मूर्तियाँ या प्रतिमाएं

    ➣ हड़प्पा कालीन मूर्तियों में 10 सेमी लम्बी काँस्य-निर्मित एक महिला नर्तकी, मूर्तिकला का सबसे उत्कृष्ट नमूना है। एक हार पहनने के अलावा, नग्न है।

    ➣ धातु तथा प्रस्तर की बनी मूर्तियां अब तक मोहनजोदाड़ो, चन्हूदड़ों, लोथल एवं कालीबंगा से प्राप्त हुई हैं।

    ➣ धातु मूर्तियों में ढलाई की जिस विधि का प्रयोग किया गया है। उसे प्राचीन साहित्य में मधूच्छिष्ट विधि कहा गया है।

    ➣ प्रस्तर मूर्तियों में सर्वाधिक प्रसिद्ध मोहनजोदाड़ो से प्राप्त योगी की मूर्ति महत्वपूर्ण है। योगी के मूंछें नहीं है किन्तु दाढ़ी विशेष रूप से संवारी गयी है।

    ➣ पाषाण मूतियों में दो सिर रहित मानव मूर्तियां उल्लेखनीय है। मोहनजोदाड़ो से प्राप्त पशुमूर्तियां में सर्वाधिक उल्लेखनीय श्वेत पाषाण निर्मित एक संयुक्त पशुमूर्ति है जिसमें शरीर भेड़ का तथा मस्तक हाथी का है।

    ➣ कालान्तर में दक्षिण की नटराज मूर्ति तथा सुल्तानगंज की बुद्ध मूर्ति का निर्माण किया गया।

    टेराकोटा या मृण्मूर्तियाँ

    ➣ मिट्टी की मूर्तियाँ जिन्हे आग में पकाया जाता उन्हें आम तौर पर टेराकोटा या मृण्मूर्तियाँ कहा जाता है। पक्की मिट्टी की मूर्तियों का निर्माण चिकोही पद्धति से किया गया हैं।

    ➣ सिंधु क्षेत्र में मानव के अतिरिक्त पशु पक्षियों में बैल, भैंसा, बकरा, बाघ, सुअर, गैंडा, भालू, बन्दर, मोर, तोता, गिलहरी, सर्प, कछुवा, घड़ियाल,गौरेया, मुर्गा, चील, उल्लू, बत्तख़ एवं कबूतर की मृणमूर्तियां मिली है। गाय और घोड़े की मृण्मूर्तियां का अभाव है।

    एस आर राव ने गाय की मृण्मूर्तियाँ मिलने का दावा किया है।

    ➣ भारतीय क्षेत्र में सिधु सभ्यता के स्थलों में केवल बणावली (हरियाणा) से दो स्त्री मूर्ति प्राप्त हुई है इसके अतिरिक्त किसी अन्य स्थल से नारी मृण्मूर्तियां नहीं मिली है।

    ➣ मानव मृण्मूर्तियां ठोस है परन्तु पशुओं की खोखली। नर एवं नारी- मृण्मूर्तियां में सर्वाधिक नारी मृण्मूर्तियां मिली है।

    ➣ डील वाले बैल की तुलना में बिना डील वाले बैलों की मृण्मूर्तियां अधिक संख्या में मिली है।

    ➣ हरियाणा के हिसार ज़िले में स्थित वणावली से खेत की जुताई में प्रयुक्त होने वाले हल के मिट्टी के खिलौने मिले है।

    ➣ मोहनजोदाड़ो से प्राप्त वृषभ की बलिष्ठ मूर्ति विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

    अन्त्येष्टि या अंतिम संस्कार

    ➣ सिंधु घाटी सभ्यता में मृतकों का सामूहिक स्मारक प्राप्त नहीं हुआ है जैसा कि मिस्र सभ्यता में पिरामिड तथा मैसोपोटामिया में राजकीय कब्रिस्तान हैं।

    ➣ सिंधु सभ्यता में शवों के अंतिम संस्कार की तीन प्रथाओं के प्रमाण मिले हैं:

    • दाह संस्कार में शव को पूर्ण रूप से जला कर उसकी भस्म को भूमि में गाड़ा जाता था। इसके साक्ष्य मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुए हैं। यह सर्वप्रमुख प्रथा थी।
    • पूर्ण समाधिकरण में सम्पूर्ण शव को भूमि में दफना दिया जाता था।
    • आंशिक समाधिकरण में पशु-पक्षियों के खाने के बाद बचे शेष भाग को भूमि में दफना दिया जाता था।

    हड़प्पा व कालीबंगा में दक्षिण-उत्तर क्रम (सिर उत्तर की ओर व पैर दक्षिण की ओर) में, लोथल में पूर्व- पश्चिम क्रम में, रोपड़ में पश्चिम-पूर्व क्रम में मृतक को दफनाए जाने के प्रमाण मिले हैं।

    ➣ एक कब्र में एक ही व्यक्ति को दफनाया जाता था परन्तु कालीबंगा और लोथल से युगल के समाधिकरण/शवाधान मिले हैं, जिसमें एक कब्र में दो-दो मृतक दफनाए गए हैं।

    रूपनगर (रोपड़) की एक क़ब्र में मालिक के साथ कुत्ते के भी अवशेष मिले हैं जबकि लोथल की एक कब्र से मृतक के साथ बकरे को दफनाए जाने के प्रमाण मिले हैं।

    सिन्धु सभ्यता का पतन

    ➣ इस सांस्कृतिक पतन का कोई एक कारण ढूढ़ना मुश्किल है। इसके पतन के लिए विद्वानों ने कई कारण बताएं हैं, जैसे – बाढ़, आर्यों का आक्रमण, जलवायु परिवर्तन, भू-तात्विक परिवर्तन, व्यापार में गतिरोध, महामारी एवं साधनों का अधिक उपभोग आदि।

    विकसित हड़प्पा संस्कृति का अस्तित्व संभवतः 2550 ई.पू. से 1900 ई.पू. के मध्य रहा। जो एक ही प्रकार के औजारों, हथियारों, एक तरह की शहर योजना, एक जैसी मुहरें, एक तरह के टेराकोटा तथा घरों का प्रयोग करती थी।

    ➣ मुहनजो-दड़ो काल में कुछ समय बाद बर्तनों में परिवर्तन दिखते हैं। ई.पू. उन्नीसवीं सदी तक हड़प्पा संस्कृति के दो महत्वपूर्ण शहर हड़प्पा और मुहनजोदड़ो गायब हो गए।

    ➣ लेकिन अन्य स्थलों गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बाहरी क्षेत्रों में पर हड़प्पा संस्कृति ई.पू. 1500 तक जीवित रही।

    ➣ सिंधु सभ्यता के पतन का प्रमुख कारण बाढ़ माना जाता है। मार्शल ने मोहनजोदड़ो, मैके ने चन्हूदड़ों तथा एस.आर. राव ने लोथल के पतन का प्रमुख कारण बाढ़ माना है।

    व्हीलर, गार्डन चाइल्ड, मैके, पिगनट आदि विद्वानों ने सिन्धु सभ्यता के पतन का कारण आर्यों का आक्रमण माना है। जो मिथक साबित हुई।

    ➣ अमेरिकी इतिहासकार केनेडी के अनुसार मोहनजोदड़ों के नर-कंकाल मलेरिया जैसी किसी बिमारी से ग्रसित थे।

    आरेल स्टाइन और अमलानन्द घोष आदि विद्वानों के अनुसार जंगलों की अत्यधिक कटाई के कारण जलवायु में परिवर्तन आया। राजस्थान क्षेत्र में जहाँ पहले बहुत वर्षा होती थी, वहाँ वर्षा कम होने लगीं।

    एम.आर. साहनी, आर. एल. राइक्स, जार्ज एफ.डेल्स और एच.टी. लैम्ब्रिक सिन्धु सभ्यता के पतन में भू-तात्विक परिवर्तनों के प्रमुख कारण मानते हैं।

    ➣ भू-तात्विक परिवर्तनों के कारण नदियों के मार्ग बदल गए, जिससे लोगों में सिंचाई, पीने के पानी, आदि का अभाव हो गया। इस कारण वे अपने अपने स्थानों को छोड़कर दूसरे स्थानों को चले गए।

    डब्ल्यू. एफ. अल्ब्राइट ने सैन्धव सभ्यता का अन्त लगभग 1750 ई.पू. में विदेशी व्यापार गतिरोध को बताया।

    ई.पू. 2000 के आस-पास एलाम, मेसोपोटामिया की पूर्वी सीमा तथा ईरान के एक महत्वपूर्ण हिस्से में फैला था, के एक शक्तिशाली राज्य के रूप में उभरने से हड़प्पन सामग्री का मेसोपोटामिया में आयात-निर्यात बाधित हुआ।

    जलवायु परिवर्तनआरेल स्टीन और ए. एन. घोष
    प्राकृतिक आपदाके. यू. आर. केनेडी
    भूकम्परेइक्स, डेल्स, मार्शल
    पारिस्थितिक असन्तुलनफेयर सर्विस
    आर्यों का आक्रमणआर, मार्टीमर ह्वीलर,
    बाह्य आक्रमणगार्डन चाइल्ड, स्टुवर्ट, पिगट
    नदी की शुष्कतासूद और अग्रवाल
    अस्थिर नदी तन्त्रलैम्ब्रिक
    राइक्स व डी डी कौशाम्बीआग लगाकर सामूहिक हत्या
    बाढ़मैके, राव, मार्शल
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