हड़प्पाकालीन स्थलों की अवस्थिति
➣ हड़प्पा सभ्यता के लगभग 1000 स्थलों भी ज्यादा स्थलों के बारे में जानकारी प्राप्त हो चुकी है, लेकिन इनमें से केवल 6 को ही नगर माना जाता है, ये हैं – हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, सिंध का चन्हूदड़ो, गुजरात का लोथल, उत्तरी राजस्थान का कालीबंगा तथा हरियाणा के हिसार जिले में स्थित बनवाली।
➣ इसमें दो नगर हड़प्पा लगभग 150 हेक्टेयर और मोहनजोदड़ो 500 हेक्टेयर (सबसे बड़ा ज्ञात स्थल ) में फैला था। इन दोनों नगरों के अपने स्नानागार , अन्र्गनागार व दुर्ग थे। जहाँ कोई शासक वर्ग के लोग रहते थे।
➣ हड़प्पा पंजाब प्रान्त (पाकिस्तान) में माण्टगोमरी ज़िले में रावी नदी के बायें तट पर तथा मोहनजोदड़ो सिन्ध प्रान्त के लरकाना ज़िले में सिंधु नदी के दाहिने किनारे पर स्थित हैं।
➣ सिंधु घाटी में पकी हुई मिट्टी के दीपक प्राप्त हुए हैं और मोहनजोदड़ो में प्राप्त भवनों में दीपकों को रखने हेतु ताख बनाए गए थे जो मुख्य द्वार को प्रकाशित करने हेतु आलों की श्रृंखला थी।
➣ बन्दरगाह लोथल की महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों में से है। इस बन्दरगाह पर मिस्र तथा मेसोपोटामिया से जहाज़ आते जाते थे।
➣ कालीबंगा प्राचीन समय में चूडियों के लिए प्रसिद्ध था। जो पत्थर की बनी होती थी।
हड़प्पा सभ्यता के प्रमुख स्थल
हड़प्पा
मोहनजोदड़ो
चन्हूदड़ो
लोथल
कालीबंगा
बनवाली
रंगपुर
रोपड़
कोटदीजी
सुत्कागेंडोर
सुरकोटदा
राखीगढ़ी
आलमगीरपुर
हड़प्पा के चार भौगोलिक स्थल
➣ अखनूर जिले में चिनाव नदी के दक्षिणी तट पर स्थित है। यह विकसित हड़प्पा सभ्यता का सर्वाधिक उत्तरी स्थल है।
➣ इसका उत्खनन 1982 ई. में जगपत जोशी व मधुबाला ने करवाया था।
➣ हड़प्पाकालीन मृद्भाण्ड तथा मिट्टी के ठीकरे मिले थे।
➣ माण्डा में 3 सांस्कृतिक स्तर-प्राक सैन्धव तथा उत्तर सैन्धव मिले हैं।
➣ मेरठ जिले में, हिंडन नदी (यमुना की सहायक) के तट पर स्थित है।
➣ इस स्थल की खोज 1958 ई. में भारत सेवक समाज संस्था द्वारा की गयी थी।
➣ इसका उत्खनन कार्य यज्ञ दत्त शर्मा द्वारा किया गया था।
➣ यह सिंधु सभ्यता का सर्वाधिक पूर्वी स्थल है।
➣ यहां से सिंधु सभ्यता के उत्तरकालीन अवशेष मिले हैं।
➣ रोटी बेलने की चौकी तथा कटोरे के अनेक टुकड़े प्राप्त हुए हैं।
➣ महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में प्रवरा नदी के बायें किनारे पर स्थित है।
➣ सैंधव प्रकार का एक मानव-शवाधान भी मिलता है जहां एक गर्त में युवा पुरूष का शव पाया गया है। इसे उत्तर-दक्षिण में लिटाया गया है।
➣ गर्त में ईंटों की चिनाई करने के उसे मिट्टी तथा ईंटों से ढका गया है तथा कब्र के उत्तर की ओर एक पत्थर भी मिला था। यहां से तांबे का रथ प्राप्त हुआ है।
➣ दैमाबाद सैंधव सभ्यता का सबसे दक्षिणी स्थल है।
➣ यह दाश्क नदी के किनारे स्थित हड़प्पा सभ्यता का सबसे पश्चिमी स्थल है।
➣ इसकी खोज 1927 ई. में सर मार्क ऑरेल स्टाइन ने की थी।
➣ इसका दुर्ग एक प्राकृतिक चट्टान पर स्थित था।
➣ यहां से कोई मुहर अथवा उत्कीर्ण वस्तु नहीं मिली है।
हड़प्पाकालीन स्थलों से प्राप्त साक्ष्य
नर्तकी की मूर्ति
➣ मोहनजोदड़ो से प्राप्त कांसे की बनी नर्तकी की मूर्ति सिंधु कला का सर्वश्रेष्ठ नमूना है।
➣ पूरी मूर्ति गले में पड़े हार के अलावा पूर्णतः नग्न है। सिर के पीछे उसके बालों की छोटी लटे एक बुनी हुई पट्टिका द्वारा संवारी गई है।
➣ सिर पीछे की ओर झुकाएं, आंखें झुकी हुई, दायीं भुजा कूल्हे पर टिकाए व बायीं भुजा नीचे लटकी हुई यह मूर्ति नृत्य की स्थिर मुद्रा को दर्शाती है।
स्वास्तिक चिन्ह
➣ मोहनजोदड़ो से प्राप्त मुहर पर स्वास्तिक का अंकन सूर्य पूजा का प्रतीक माना जाता है।
➣ हिंदू धर्म में आज भी स्वास्तिक को पवित्र मांगलिक चिन्ह माना जाता है। इसे चतुर्भुज ब्रह्मा का रूप स्वीकार किया जाता है।
➣ धौलावीरा से प्राप्त सिंधु लिपि के 10 बड़े अक्षर जो कि प्राचीन सूचना पट्ट के रूप में प्रयुक्त होते थे। यह स्थल जल प्रबंधन का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण था।
मातृदेवी
➣ हड़प्पा से प्राप्त एक मूर्तिका में स्त्री के गर्भ से निकलता पौधा दिखाया गया है।
➣ यह सम्भवतः पृथ्वी देवी की प्रतिमा है और इसका निकट संबंध पौधों के जन्म व वृद्धि से रहा होगा।
➣ हड़प्पाई लोग इसे पृथ्वी की उर्वरता देवी मानते थे और इसकी पूजा उसी तरह करते थे। जिस प्रकार मिस्र के लोग नील नदी की देवी आइसिस की पूजा करते थे।
विशाल स्नानागार
➣ यह मोहनजोदड़ो का सर्वाधिक प्रसिद्ध स्मारक था। इसका निर्माण पकी ईंटों से दुर्ग क्षेत्र में किया गया था। इसके मध्य में स्थित स्नानकुंड था।
➣ कुछ के पूरब दिशा में बड़ा कुआं बनाया गया था। इस विशाल स्नानागार का उपयोग सार्वजनिक रूप से धर्मानुष्ठान संबंधी स्नान के लिए होता था।
➣ जॉन मार्शल ने विशाल स्नानागार को विश्व का आश्चर्यजनक निर्माण बताया था। यह जलपूजा का एकमात्र साक्ष्य है।
पशुपति मुहर
➣ मोहनजोदड़ो से प्राप्त पशुपति शिव मुहर को जॉन मार्शल ने आद्यशिव की संज्ञा दी थी। इसमें एक त्रिमुखी पुरुष को एक चौकी पर पद्मासन मुद्रा में बैठे हुए दिखाया गया है।
➣ उसके सिर में सींग है तथा कलाई से कंधे तक उसकी दोनों भुजाएं चूड़ियों से युक्त है।
➣ उसके दायीं ओर बाघ व हाथी, बायीं ओर गैंडा व भैंसा तथा चौकी के नीचे 2 हिरण उत्कीर्ण हैं। इस मुहर में जानवरों की कुल संख्या 6 है जबकि प्रकार 5 हैं।
➣ इस आकृति को शिव (हिंदू धर्म) का रूप माना गया है जो कि योग मुद्रा में दर्शाया गया है।
➣ पैरों के नीचे 2 मोर अंकित थे।
➣ आरंभिक धार्मिक ग्रंथ ऋग्वेद में रूद्र नामक देवता का उल्लेख मिलता है जो बाद में शिव के लिए प्रयुक्त नाम है।
टेराकोटा फिगरिन
➣ आग में पकी मिट्टी से बनी मूर्तिकाएं को टेराकोटा फिगरिन (मृण्मूर्तिकाएं) कहते हैं।
➣ इसका प्रयोग खिलौने व पूज्य प्रतिमाओं के निर्माण में होता था। ये प्रायः मानव व पशु-पक्षियों की प्राप्त हुई हैं। मानव मृण्मूर्तियां ठोस जबकि पशु-पक्षियों की मूर्तियां खोखली थीं। आश्चर्य की बात है कि गाय की मृण्मूर्तियां नहीं प्राप्त हुई हैं जबकि हाथी, गैंडा, हिरण, मछली, घड़ियाल आदि का अंकन मिलता है। गाय का महत्व वैदिक काल से प्राप्त होता है।
➣ मोहनजोदड़ो से प्राप्त वृषभ की मृण्मूर्ति शक्ति का प्रतीक कूबड़ वाला बैल था।
उत्तर हड़प्पाकालीन संस्कृतियां
➣ हालाँकि बाढ़ को सिंधु संस्कृति के पतन का प्रमुख कारण माना गया है परन्तु हड़प्पा का पतन आज भी एक विवादस्पद विषय है।
➣ माना जाता है कि हड़प्पा की नगरीय संस्कृति के साथ-साथ चलने वाली ग्रामीण संस्कृतियों में ही यह संस्कृति समाहित हो गयी। इन ग्रामीण संस्कृतियों के विकास का साक्ष्य भारत के अनेक हिस्सों में पाया गया है, जो इस प्रकार हैं-
| संस्कृति | अवधि | क्षेत्र |
|---|---|---|
| कायथा संस्कृति | 2000-1800 ई.पू. | चम्बल नदी के क्षेत्र |
| मालवा संस्कृति | 1700-1200 ई.पू. | नर्मदा नदी क्षेत्र |
| अहार संस्कृति | 2100-1500 ई.पू. | राजस्थान के उदयपुर |
| प्रभास संस्कृति | 2000-1400 ई.पू. | गुजरात का तटीय क्षेत्र |
| सावाल्दा संस्कृत | 2300-2000 ई.पू. | महाराष्ट्र का धुलिया |
| रंगपुर संस्कृति | 1700-1400 ई.पू. | गुजरात का तटीय क्षेत्र |
| जोर्वे संस्कृति | 1400-700 ई.पू. | महाराष्ट्र का दायमाबाद व इनामगाँव |
➣ इस क्षेत्र में अहाड़ एवं गिलुद प्रमुख स्थल हैं। बनास नदी घाटी में विकसित होने वाली इस संस्कृति को वनास संस्कृति कहा जाता है।
➣ यहां से पकी एवं कच्ची ईंटों का साक्ष्य तथा पत्थर की दीवारों का साक्ष्य मिला है।
➣ यहां से तांबे के प्रचलन एवं चावल तथा बाजरे का साक्ष्य भी प्राप्त हुआ है।
➣ कायथा एवं नवदाटोली इस संस्कृति के प्रमुख स्थल हैं।
➣ यहां से चौकोर एवं वृत्ताकार घर के साक्ष्य, लाल एवं काले मृद्भाण्ड, गेहूं, अलसी, मसूर तथा चावल का साक्ष्य प्राप्त हुआ है।
➣ नासिक, जोरवे, नैवासा, दैमाबाद, सोनेगांव, इनामगांव आदि इस संस्कृति के प्रमुख स्थल हैं।
➣ यहां से आयताकार, वर्गाकार एवं वृत्ताकार मकान के साक्ष्य मिले हैं। नैवासा से टोटीदार एवं नौतली बर्तन के साक्ष्य मिले हैं।
➣ दैमाबाद से ताम्र निर्मित रथ चलाते हुए मनुष्य, सांड़, गैंडा एवं हाथी की आकृतियाँ प्राप्त हुई हैं।
➣ कृष्णा एवं तुंगभद्रा के बीच इस संस्कृति का विस्तार पाया जाता है।
➣ ब्रह्मागिरि, पिकलिहल, उतनूर, मास्की, संगनकल्लू एवं नागार्जुनकोंडा आदि इस संस्कृति के प्रमुख स्थल हैं।
➣ इस क्षेत्र की बस्तियों में वर्धमान, वीरभूम, मिदनापुर, बांकुरा आदि प्रमुख स्थल हैं।
➣ यहां से चावल पर आधारित विस्तृत ताम्रपाषाणिक संस्कृति मिली है।
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