ऋग्वेदिक काल (1500-1000 ई. पू.) : आर्यों का प्रारंभिक जीवन और जनजातीय व्यवस्था

भारतीय इतिहास प्राचीन भारत वैदिक काल ऋग्वेदिक काल (1500-1000 ई. पू.)
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वैदिक संस्कृति

सिंधु सभ्यता का पतन लगभग 1500 ई.पू. तक हो गया था इसके पश्चात् बाद एक नई सभ्यता प्रकाश में आयी जिसे वैदिक संस्कृति या वैदिक सभ्यता के नाम से जाना जाता है।

➣ चूँकि वैदिक सभ्यता के संस्थापक आर्य थे, इसलिए इसे आर्य सभ्यता भी कहा जाता है। यह सभ्यता मूलतः ग्रामीण थी।

सिंधु सभ्यता का स्वरूप नगरीय था जबकि वैदिक सभ्यता ग्रामीण थी

➣ इस संभ्यता की सम्पूर्ण जानकारी वेदों से मिलती है। इसलिए इस काल को वैदिक काल भी कहा गया है। यह काल 1500 ई.पू. से 600 ई.पू. तक अस्तित्व में रहा।

➣ वैदिक- काल के अध्ययन के लिए दो प्रकार के साक्ष्य उपलब्ध हैं-

पुरातात्विक स्रोत चित्रित धूसर मृदभांड, लोहा, निवास-स्थान।
साहित्यिक स्रोत वेद (ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद , अथर्ववेद ), आरण्यक, उपनिषद्

➣ ज्ञातव्य हो हड़प्पावासी लौह से परिचित नहीं थे (केवल ताम्र व कांस्य)। लौह युग की शुरुवात सिंधु सभ्यता के पतन के बाद 1200 ई.पू. के बाद हुआ है।

➣ चार पुरातात्विक स्थलों की खुदाई जखेड़ा, हस्तिनापुर, नोह तथा अतरंजीखेड़ा में सर्वाधिक लौहास्त्र मिले हैं।

➣ वैदिक काल दो हिस्सों में विभाजित है-

ऋग्वैदिक काल 1500-1000 ई.पू. आर्य संस्कृति व आगमन
उत्तर वैदिक काल 1000-600 ई.पू. वेद एंव अन्य ग्रंथो की रचना

➣ ऋग्वैदिक काल में आर्य के उदय जबकि उत्तर वैदिक काल में आर्यों के विस्तार की जानकारी मिलती है।

आर्य का शाब्दिक अर्थ श्रेष्ठ या कुलीन होता है। आर्यों के लिए द्विज शब्द का प्रयोग मिलता है जिसका अर्थ होता है दो बार जन्मा

स्रोत

➣ आर्यों के आरंभिक इतिहास की जानकारी का मुख्य स्रोत ऋग्वेद है। इस वेद में आर्य शब्द का उल्लेख 36 बार हुआ है।

➣ भारत में आर्य ईरान से होते हुए आये थे। ऋग्वेद की कई तथ्य ईरानी भाषा के प्राचीनतम ग्रंथ अवेस्ता से मिलती हैं।

➣ आरम्भिक आर्यों का निवास भारत के पंजाब और हरियाणा के अलावा पूर्वी अफगानिस्तान और पाकिस्तान भी था।

भारत में आर्यो का आगमन

भारत में आर्यो का आगमन

➣ आर्यो के आगमन के विषय में विद्धानों में मतभेद है। आर्यों का मूल निवास आल्प्स पर्वत के पूर्वी भाग में बताया जाता है। जो वर्तमान में यूरेशिया कहलाता है।

मैक्समूलर के अनुसार, आर्यों का निवास स्थान मध्य एशिया माना गया है जिसका उल्लेख लेक्चर्स ऑन द साइंस ऑफ़ लैंग्युएजेज में किया है।

अविनाश चन्द्र द्रास की पुस्तक ऋग्वैदिक इंडिया में आर्यो का मूल निवास भारत में सप्त सैंधव प्रदेश को बताया गया है।

स्वामी दयानन्द सरस्वती की पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश एवं इण्डियन हिस्टोरिकल ट्रेडिशन आर्यो के बारे में उल्लेख किया गया है जिसमे तिब्बत को आर्यो का मूल निवास स्थान माना गया है।

बाल गंगाधर तिलक ने उत्तरी ध्रुव को आर्यो का मूल निवास माना है। जिसका वर्णन इनकी पुस्तक The Arctic Home of the Aryans में मिलता है। इसमें आर्यो का आगमन तिथि 6000 ई.पू. निर्धारित की गई है।

प्राचीन नाम आधुनिक नाम
क्रुमकुर्रम
कुभाकाबुल
वितस्ताझेलम
आस्किनीचिनाब
परुष्णीरावी
सद्रिसतलज
विपाशाव्यास
सदानीरागंडक
दृसद्वतीघग्घर
गोमतीगोमल
सुवस्तुस्वात्
सिन्धुइण्डस
डॉ.राजबली पाण्डेय भारत में मध्य देश
एल.डी. कल्ला कश्मीर अथवा हिमालय प्रदेश
श्री डी.एस. त्रिवेदी मुल्तान प्रदेश में देविका नदी
जे.जी.रोड बैक्ट्रिया (अफ़ग़ानिस्तान )
पी. गाइल्स न यूरोप डेन्यूब नदी की घाटी एवं हंगरी
पेन्का जर्मनी
एडवर्ड मेयर, ओल्डेनवर्ग, कीथ पामीर क्षेत्र, मध्य एशिया
नेहरिंग एवं गार्डन चाइल्स दक्षिणी रूस

➣ वर्तमान समय में मैक्सूमूलन का मत सर्वाधिक मान्य हैं। मैक्समूलर के अनुसार इनके आगमन की तिथि 1500 ई.पू. है।

भौगौलिक विस्तार

➣ प्राचीन आर्य लोग सप्त-सिंधु नाम के क्षेत्र में रहते थे, जिसका अर्थ 7 नदियों वाला क्षेत्र है। यह क्षेत्र मुख्यतय: दक्षिण एशिया के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र से लेकर यमुना नदी तक के क्षेत्र में फैला है।

➣ आर्यों के पांच कबीलों (अनु. द्रहु, पुरु, यदु, तुर्वस) को पंचजन अथवा पंचजन्य कहा जाता था। जिनका विस्तार भारतीय महाद्वीप के पश्चिमोत्तर तथा उत्तर-पूर्वी भागों में था।

पंचजन क्षेत्र

ऋग्वैदिक काल में पंचजन क्षेत्र

सैंधव प्रदेश – 1. सिंधु, वितस्ता (झेलम), 3. असिकनी (चिनाब), 4. परूष्णी (रावी), 5. विपाशा (व्यास), 6. शुतुद्री (सतलज), 7. सरस्वती (घग्घर)।

➣ आर्यों की सबसे प्रमुख नदी सिंधु थी। जबकि सरस्वती नदी को नदीतम अर्थात् सर्वश्रेष्ठ नदी या सबसे पवित्र नदी कहा गया है।

जनजातीय संघर्ष

➣ भारत आने पर आर्यों का दास और दस्यु नामक स्थानीय लोगों के साथ संघर्ष हुआ। ऋग्वेद में इनमें से बस्यु हत्या का उल्लेख बार-बार मिलता है।

भरत, क्रिव एवं त्रित्सु आर्यों के शासक वंश थे तथा इनके पुरोहित वशिष्ठ थे। भरत कुल के नाम से ही इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा।

➣ इस कुल कबीले का उल्लेख सबसे पहले ऋग्वेद में मिलता है।

➣ भरत वंश के राजा सुदास तथा अन्य दस जनों- पुरु, यदु, तुर्वश, अनु, द्रह्म अकिन, पक्थ, भलानस, विषणिन और शिव के मध्य दाशराज्ञ यु़द्ध परुष्णी (रावी) नदी के किनारे लड़ा गया जिसमें सुदास को विजय मिली।

➣ इस युद्ध का कारण भरत वंश के राजा सुदास द्वारा अपने पुरोहित विश्वामित्र को निष्कासित कर उनके स्थान पर वशिष्ठ को नियुक्त करना था।

➣ ऋग्वेद के 7वें मंडल में दशराज्ञ युद्ध का उल्लेख है। जिसका एक कारण राज्य-विस्तार भी माना जाता है।

➣ उत्तर वैदिक काल में पराजित राजा पुरु और भरत के बीच मैत्री सम्बन्ध स्थापित होने से एक नवीन कुरु वंश की स्थापना की गयी।

➣ पराजित जनों में पुरूजन सबसे महान थे। उत्तर वैदिक काल में भरतों और पुरूओं के बीच मैत्री हो गई और दोनों ने मिलकर नया शासक कुल बनाया जो कुरू (भरत+पुरू) के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

➣ कुरू जनों ने पंचालों के साथ मिल कर उच्च गंगा मैदान में अपना संयुक्त राज्य स्थापित किया। यहां कुरू-पंचालों ने उत्तर वैदिक काल में बड़ा महत्व प्राप्त किया।

आर्थिक जीवन शैली

➣ आर्यो के आर्थिक जीवन के बारे में अधिंकाश जानकारी ऋग्वेद से प्राप्त होती है।

➣ आर्यो के जीवन में रथों एंव घोंड़ो का अधिक महत्व था। जो भारत में उनकी सफलता के कारण माने जाते है।

➣ आर्यो के मुख्य व्यवसाय के रूप में पशुपालन का उल्लेख मिलता है। घोड़ा उन का प्रिय पशु था

➣ उन्हें कृषि का भी ज्ञान था सम्भवत: इसका प्रयोग चरागाह के लिए होता था।

➣ ऋग्वेद में अवि (भेड़), अजा (बकरी) का अनेक बार उल्लेख हुआ है। सम्भवत: आर्य लोग हाथी, बाघ, बतख, गिद्ध से आर्य लोग परिचित नहीं थे।

➣ ऋग्वेद में गाय को अघन्या कहा गया है अर्थात कभी न मारने योग्य। गाय का प्रयोग मुद्रा के रूप मे भी ईस्तमाल होता था।

➣ गाय को सर्वोत्तम धन माना जाता था। ऋग्वैदिक काल में आर्यों के अधिकांश युद्ध गाय को लेकर हुए हैं। ऋग्वेद में युद्ध का पर्याय गविष्टि अर्थात गायों की खोज

➣ ऋग्वैदिक काल में भूमि, निजी संपत्ति नहीं होती थी। लोग गाय चराने, खेती करने और बसने के लिए भूमि पर अधिकार करते थे,

➣ ऋग्वैदिक सभ्यता ग्रामीण सभ्यता थी। इस वेद में गव्य एवं गव्यति शब्द चारागाह के लिए प्रयुक्त है।

➣ आर्यों द्वारा जिस विस्तृत क्षेत्र का निर्माण किया उसे सप्त सैंधव प्रदेश कहा गया है।

➣ पुरोहितों को दक्षिणा के रूप में भूमि न देकर गायें और दासियाँ दी जाती थी।

➣ धातुकर्म की जानकारी थी। आर्यों द्वारा खोजी गयी धातु लोहा थी, जिसे स्याम अयस कहा जाता था।

➣ तांबा खेतड़ी राजस्थान से लाया जाता था। जिसका अन्य नाम अयस मिलता है।

➣ निष्क, शतमान, रजत, कृप्या स्वर्ण और चांदी की इकाइयां थी, जिसका प्रयोग मुना रूप में होता था।

➣ धनी व्यक्ति अथवा राजा को गोपति कहा जाता था युद्ध के लिए गविष्ट, गेसू, गव्य ओर गम्य शब्द प्रचलित थे।

➣ समय की माप के लिए गोधुल शब्द का प्रयोग किया जाता था। दूरी का मान के लिए गवयतु

➣ ऋग्वैदिक काल में बढ़ई, रथकार, बुनकर, चर्मकार, कुम्हार आदि शिल्पियों के उल्लेख मिलते हैं। चर्मकार एवं कुम्हार का भी उल्लेख मिलता है।

➣ वैदिककाल में निष्कशतमान नामक सिक्कों का उल्लेख है।

अयस शब्द का उपयोग ऋग्वेद में करघा के लिए, ओत एवं तन्तु शब्द का प्रयोग ताने-बाने के लिए एवं शुध्यव शब्द का प्रयोग ऊन के लिए किया जाता था।

➣ ऋग्वेद में कपास का उल्लेख नहीं मिलता है। ऋग्वेद में हिरण्य एवं सुवर्ण शब्द का प्रयोग सोने के लिए जबकि तक्षनतष्ट शब्द का प्रयोग बढ़ई के के लिए किया गया है। निष्क सोने की मुद्रा थी।

राजनीतिक संगठन

➣ ऋग्वैदिक काल का राजनीतिक ढाँचा आरोही क्रम में –

सामाजिक संगठन की संरचना (वैदिक काल)

कुल > ग्राम > विश > जन > राष्ट्र

जनपति / राजा
इकाई: जन
(विशों का समूह)
विशपति
विश / वंश
(ग्रामों का समूह)
ग्रामणी
ग्राम
(परिवारों का समूह)
कुलप
कुल या परिवार
(एक ही रक्त के लोगों का समूह)

वृहतम इकाई जन व जबकि लघुतम इकाई कुल या परिवार

➣ ऋग्वैदिक काल में समाज कबीले के रूप में संगठित था जिसे जन भी कहा जाता था।

➣ जन का प्रशासन कबीले का मुखिया या प्रधान करता था, जिसे राजन अर्थात राजा कहा जाता था। उत्तर वैदिक काल तक राजा वंशानुगत हो जाता है।

➣ राजा कबीलों से सलाह से लेता था। राजा की सहायता हेतु पुरोहित, सेनानी, एवं ग्रामणी नामक प्रमुख अधिकारी थे।

➣ ऋग्वेद में सभा, समिति, विदाधा और गण जैसे कई कबीलाई आधारित जनसमूहों का उल्लेख है। जो विचार-विमर्श व सामरिक और धार्मिक आयोजन भी करते थे।

➣ राजा का मुख्य कर्तव्य मवेशियों की रक्षा करना, कबीले की रक्षा के लिए युद्ध करना तथा धन-धान्य के लिए कबीले की ओर से प्रार्थना करना था। इसके बदले में प्रजा राजा को स्वैच्छिक कर के रूप में बलि देती थी। उत्तर वैदिक काल में अनिवार्य हो गया था .

ऋग्वेद के 10 वें मण्डल में राजा से राष्ट्र की रक्षा करने का कहा गया है।

➣ ऋग्वैदिक काल में राजा का चुनाव करने की वजह से अथर्ववेद में सभा और समिति को प्रजापति की दो पुत्रियाँ कहा गया है।

सभा

➣ सभा की उत्पत्ति ऋग्वेद के उत्तरकाल में हुई थी। ऋग्वेद में 8 बार सभा की चर्चा की गई है।

➣ यह वुद्ध (श्रेष्ठ) एवं अभिजात (संभ्रान्त) लोगों की संस्था थीं। यह समिति की अपेक्षा छोटी थी।

➣ सभा में पुरुष सदस्यों के लिए सभेय शब्द तथा स्त्री सदस्यों के लिए सभावती शब्द प्रयुक्त हुआ है।

➣ इसका अध्यक्ष सभापति होता था। सभा का प्रमुख कार्य न्याय प्रदान करना था।

समिति

➣ ऋग्वेद में समिति का उल्लेख 9 बार हुआ है। यह एक आम जनप्रतिनिधि सभा (केन्द्रीय राजनीतिक) थी।

➣ इस समिति के अध्यक्ष कोपति या ईशान कहा जाता था।

➣ समिति में राजकीय विषयों पर चर्चा होती थी तथा आपसी सहमति से निर्णय होता था।

➣ समिति का मुख्य कार्य राजा का निर्वाचन करना तथा उस पर नियन्त्रण रखना था।

विदथ

➣ यह आर्यो की सबसे प्राचीन संस्था थी। इसे जनसभा भी कहा जाता था।

➣ ऋग्वेद में विद्थ शब्द का उल्लेख 122 बार हुआ है।

➣ रॉथ के अनुसार विदथ संस्था सैनिक असैनिक तथा धार्मिक कार्यो से संम्बद्ध थी।

➣ ऋग्वैदिक काल की सभा और विद्थ में स्त्रियाँ भी भाग लेती थीं। इस प्रकार, सभा, समिति, विद्थ वैदिक राजतंत्र में सहायक के रूप में काम करती थी।

उत्तर वैदिक काल में यह संस्था लुप्त हो गयी थी।

➣ प्रशासन का सबसे महत्वपूर्ण अंग पुरोहित था। ऋग्वैदिक काल में जिन दो पुरोहितों ने प्रमुख भूमिका निभाई, वे- वशिष्ठ और विश्वामित्र थे। वशिष्ठ रूढ़िवादी और विश्वामित्र उदारवादी थे।

विश्वामित्र ने आर्यों की समृद्धि के लिए गायत्री मन्त्र की रचना की।

➣ पुरोहित के पश्चात्, सेनानी या सेना प्रमुख का पद होता था। जो भाला, कुल्हाड़ी, तलवार आदि जैसे शस्त्र चलाना जानता था।

➣ राजा, किसी स्थायी सैन्य-बल का निर्माण नहीं करते थे। युद्ध के समय विभिन्न कबीलाई समूहों द्वारा सेना संगठित होती थीं, जिन्हें व्रत, गण, ग्राम, सरधा कहा जाता था।

➣ ऋग्वेद में युद्ध प्रायः धनुष-वाणों से होता था। ऋग्वेद में पुरपथरिष्णु का उल्लेख हुआ है,जो प्रायः दुर्गो को गिराने के लिए एक यन्त्र था।

➣ बड़े पैमाने पर भूमि या कृषि योग्य भूमि के प्रधान को व्रजपति कहा जाता था।

➣ परिवारों के प्रधान को कुलप, छोटे कबीलाई समुदाय को ग्राम कहा जाता था तथा ग्राम के मुखिया को ग्रामणी कहा जाता था।

स्पश जनता की गतिविधियों को देखने वाली एक गुप्तचर संस्था होती थी।

दूत समय समय पर सन्धि-विग्रह के प्रस्तावों को लेकर राजा के पास जाता था।

कबीला एंव परिवार

➣ ऋग्वैदिक समाज की सबसे छोटी इकाई परिवार या कुल होती थी। समाज पितृसत्तात्मक था।

➣ ऋग्वेद में परिवार (कुल) शब्द का उल्लेख नाममात्र का उल्लेख मिलता है। आरम्भिक वैदिक काल में परिवार को गृह शब्द से बार-बार उल्लेखित किया गया है।

➣ कई परिवार मिलकर ग्राम या गोत्र तथा कई ग्राम मिलकर कबिले का निर्माण का निर्माण करते थे। जिसे जन कहा जाता था।

➣ व्यक्ति की पहचान उसके कुल या गोत्र से होती थी। लोगों की मूल आस्था अपनी जनजाति या कबीले के प्रति होती थी।

➣ ऋग्वेद में जन शब्द का उल्लेख लगभग 275 बार हुआ परन्तु जनपद या क्षेत्र शब्द का प्रयोग एक बार भी नहीं हुआ है।

➣ लोग जनजाति से जुड़े थे क्योंकि अभी तक न तो जमीन पर नियन्त्रण था और न ही साम्राज्य की स्थापना हुई थी।

➣ ऋग्वेद में कबीले के लिए प्रयुक्त एक अन्य महत्वपूर्ण शब्द विस है, जिसका उल्लेख वेद में 170 बार हुआ है । बहुसंख्यक वैश्य वर्ग का उदय विस या जनजातीय लोगों से ही हुआ है।

परिवार संयुक्त होता था। परिवार का मुखिया पिता होता था। कई पीढ़ियाँ एक ही छत के नीचे रहती थी।

➣ परिवार में पिता, माता, गुरु, बड़ों और अतिथि का सत्कार करना पांच धार्मिक कर्तव्य माने जाते थे। जिसे पंच महायज्ञ कहा जाता था।

➣ पिता को पुत्र को दान अथवा बेचने का अधिकार प्राप्त था। परन्तु इसका यह तात्पर्य कदापि नहीं है कि पिता पुत्र का सबंध कट्टरवादी था।

➣ लोगों ने युद्ध लड़ने के लिए वीर पुत्रों की प्राप्ति के लिए देवताओं से प्रार्थना करते थे।

➣ ऋग्वेद में बच्चों और मवेशियों की वृद्धि की इच्छा बार बार उल्लेख मिलता है परन्तु पुत्रियों के लिए ऐसा कोई उल्लेख नहीं मिलता।

➣ महिलाएं अपने पति के साथ सभाओं में भाग लेती थीं और बलि चढ़ाती थीं।

➣ ऋग्वेद में नियोग-प्रथा और विधवा-पुनर्विवाह का उल्लेख मिलता है। परन्तु बाल-विवाह के कोई उदाहरण नहीं मिलता हैं, ऋग्वेद में विवाह योग्य आयु 16 से 17 बताई गई है।

सामाजिक या वर्ण व्यवस्था

ब्राह्मण
(मुख से)
क्षत्रिय
(भुजा से)
वैश्य
(जंघा से)
शूद्र
(पैर से)

वर्ण व्यवस्था का आधार कर्म था। जो उत्तरवैदिक काल में जन्म हो गया।

➣ वर्ण शब्द का प्रयोग रंग के लिए किया गया है और ऐसा लगता है कि इण्डो-आर्यन भाषी श्वेत वर्ण के थे जबकि मूल निवासी श्याम वर्ण के।

➣ ऋग्वेद में आर्य वर्ण और दास वर्ण का उल्लेख है। आर्यो को गौर वर्ण तथा दासों को कृष्ण वर्ण कहा जाता था।

वर्ण शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद के 10वे मंडल के पुरुष सूक्त में हुआ जबकि जाति शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम महर्षि यास्क के निरुक्त में कृष्ण जाति के रूप में मिलता है।

➣ आर्यों द्वारा दास और दस्यु पर विजय प्राप्त करने के बाद गुलामों जैसा व्यवहार किया। जिससे जनजाति में सामाजिक असमानताएँ पनपी।

➣ जनजातीय प्रमुखों और पुजारियों ने लूट का बड़ा हिस्सा हासिल कर लिया और स्वाभाविक रूप से अपने रिश्तेदारों की तुलना में अधिक धनी हो गए,

➣ धीरे-धीरे कबीलाई समाज तीन तीन वर्गों में विभक्त हो गया – योद्धा, पुरोहित-वर्ग और आम -जनता। शूद्र -वर्ग ऋग्वैदिक काल के अन्त (उत्तर वैदिक काल) में सामने आया।

ऋग्वैदिक काल में जाति या समाज (तीन वर्गों ) का निर्धारण कर्म के आधार पर होता था जबकि उत्तर वैदिक काल में जाति के आधार पर हुआ।

➣ ऋग्वेद काल में, व्यवसायों पर आधारित भेदभाव शुरू हो गया था। दासों का इस्तेमाल कृषि या अन्य उत्पादक गतिविधियों में सीधे नहीं किया जाता था।

➣ ऋग्वेद में एक ऐसे परिवार का उल्लेख है जिसमें एक सदस्य कहता है-मैं एक कवि हूँ, पिता वैद्य हैं और माता चक्की चलानेवाली है। विभिन्न तरीकों से जीवन-यापन कर हम एक साथ रहते हैं…।

ऋग्वैदिक देवता

➣ 1400 ई.पू.योगाजकोई अभिलेखों में मितनी शासकों द्वारा वैदिक देवताओं इंद्र, वरुण, मित्र और नासत्व के आह्वान का उल्लेख मिलता है।

➣ ऋग्वेद में कई देवी-देवताओं का उल्लेख मिलता है। जिन्हें प्राकृतिक शक्तियों को आदर्श व प्रधान मानकर पूजा की जाती थी।

➣ ऋग्वेद में सबसे महत्वपूर्ण देव इन्द्र हैं, जिन्हें पुरन्दर या किले को तोड़ने वाला कहा गया है।

➣ इंद्र को 250 सूक्त (श्लोक) समर्पित हैं। उन्हें वृष्टि-देव माना जाता है, अर्थात् वर्षा कराने वाले देवता

➣ दूसरा स्थान अग्नि (अग्नि देव) का है, जिनके लिए 200 श्लोक समर्पित हैं। आग की भूमिका जंगल जलाने, खाना पकाने जैसे कार्यों में थी ।

➣ वैदिक काल में, अग्नि ने एक ओर देवताओं और दूसरी ओर लोगों के बीच मध्यस्थता का काम किया। अग्नि में होम की जाने वाली वस्तुएँ धुआँ के रूप में आकाश तक, अर्थात् देवताओं तक पहुँचती थी।

➣ तीसरा महत्वपूर्ण स्थान वरुण का था, जो जल के देवता थे। वरुण पर प्राकृतिक सन्तुलन बनाए रखने की जिम्मेदारी थी।

सोम को पौधों का देवता माना जाता था, उनके नाम पर एक मादक पेय रखा गया था। इन्ही के नाम पर सोमरस पड़ा। ऋग्वेद का नवम् मण्डल सोम की स्तुति है।

➣ ऋग्वेद में पौधों से इस पेय को तैयार करने की विधि की व्याख्या की गई है,

मरुत पवन,आँधी के देवता, पूषन को पशुओं का देवता तथा आश्विन को विपतियों को हरने वाला देवता कहा गया।

पूषन ऋग्वैदिक काल में पशुओं के देवता थे जो उत्तर वैदिक काल में शूद्रों के देवता हो गये।

➣ ऋग्वेद में सरस्वती नदी को नदीतम अर्थात् सर्वश्रेष्ठ नदी या सबसे पवित्र नदी कहा गया है।

➣ ऋग्वेद में अदिति और उषा जैसी कुछ देवियों का उल्लेख है। जो सुबह की उपस्थिति में परिलक्षित मानी गई हैं, लेकिन वे ऋग्वेद काल में प्रमुख नहीं थीं।

➣ ऋग्वैदिक काल पितृसत्तात्मक प्रधान था , देवता की महत्ता देवियों से कहीं अधिक थी।

➣ प्रार्थना देवताओं की पूजा करने का प्रमुख तरीका होता था। देवताओं को सब्जी, जौ इत्यादि अर्पित किए जाते थे,

➣ हर जनजाति या कबीले का अपना अपना देवता होता था। ऐसा लगता है कि पूरी जनजाति के सदस्यों द्वारा समूह में देवताओं की प्रार्थना की जाती थी।

➣ ऋग्वैदिक काल में पूजा किसी भी अनुष्ठान या बलि के सूत्र के रूप में नहीं था। जितना कि बाद के उत्तर वैदिक काल में।

➣ ऋग्वैदिक काल लोगों ने देवताओं की पूजा अपने आध्यात्मिक उत्थान या जीवन के दुःख की समाप्ति के लिए नहीं, बल्कि भौतिक सुख जैसे-पुत्र, भोजन, धन, स्वास्थ्य, की कामना के लिए किया था।

ऋग्वैदिक देवी-देवता

देवीसम्बंधित क्षेत्र
सावित्रीसूर्य को प्रेरणा प्रदान करने वाली देवी
पृथ्वीजगत की माता
ऊषाअरूणोदय (प्रातः काल) की देवी
अदितिदेवों की महान माता; देवों की जननी; सृष्टि का मूल आधार
सिंधुनदी देवी
पुरापाधिउर्वरता की देवी
रात्रिरात की देवी
इलाआराधना की देवी
अरण्यानीवन देवी
दिशानवनस्पति की देवी
आप:जल देवी
सूर्यासूर्य देवता की पुत्री
इन्द्रऋग्वेद का प्रमुख , युद्ध का नेता एवं वर्षा का देवता।
अग्निदेवता एवं मनुष्य के बीच मध्यस्थ।
वरुणपृथ्वी एवं सूर्य के निर्माता, समुद्र का देवता, सत्य का प्रतीक, ऋतु-परिवर्तन एवं दिन-रात का कर्ता।
द्यौआकाश का देवता (सबसे प्राचीन)।
सोमवनस्पति देवता।
पर्जन्यवर्षा के देवता
सूर्यतेज का देवता, विश्व के रक्षक, आकाश के सर्वश्रेष्ठ देवता।
उषाप्रगति एवं उत्थान-देवता।
आश्विनविपत्तियों को हरने वाले देवता
पूषनआरम्भ में पशुओं का देवता जबकि उत्तर वैदिक काल में शूद्रों के देवता।
मित्र प्रकाश का देवता, उदित होते हुए सूर्य को मित्र देवता कहा गया है।
विष्णुविश्व के संरक्षक एवं पालनकर्ता।
मारुतआँधी-तूफान का देवता।

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