उत्तर वैदिक काल (1000-600 ई. पू.) : समाज, वर्ण व्यवस्था और सांस्कृतिक परिवर्तन

भारतीय इतिहास प्राचीन भारत वैदिक काल उत्तर वैदिक काल (1000-600 ई. पू.)
📚 विषय सूची

उत्तर-वैदिक संस्कृति

➣ वैदिक सभ्यता के अंत का काल उत्तर-वैदिक काल के नाम से जाना जाता है जिसमे आर्यों के क्षेत्र-विस्तार , सामाजिक, राजनीतिक एंव धार्मिक रीतियों के बदलाव आदि की जानकारी प्राप्त होती है।

ऋग्वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था का आधार कर्म था। उत्तर वैदिक काल में जो जाति पर आधारित हो गया। इस काल में केवल वैश्य वर्ण को कर चुकाना पड़ता था।

➣ उत्तर वैदिक काल का इतिहास मुख्यतः वैदिक ग्रंथों पर आधारित है, जिनकी रचना ऋग्वैदिक काल के बाद, उत्तर वैदिक काल में हुई।

➣ उत्तर वैदिक काल में सामवेद, यजुर्वेद एवं अथर्ववेद तथा ब्राह्मण ग्रंथों, आरण्यकों एवं उपनिषदों की रचना हुई। उल्लेखनीय है ऋग्वेद की रचना ऋग्वेदीक काल में हुई थी।

भौगोलिक विस्तार क्षेत्र

➣ उत्तर-वैदिक ग्रन्थों से पता चलता है कि आर्य लोगों ने पंजाब से लेकर गंगा-यमुना दोआब के साथ पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक अपना विस्तार कर लिया था।

➣ उत्तर वैदिक काल में भू-भाग आधारित बड़े राज्यों की स्थापना हुई, जिनमें कौशल, विदेह, अंग,कुरु और पांचाल शामिल थे। पुरु एवं भरत मिलकर कुरु बना और तुर्वशक्रिवि मिलकर पांचाल राज्य बने।

➣ आरंभ में वे लोग दोआब के ठीक छोर पर सरस्वती और दृष्टावती नदियों के प्रदेश में बसे । शीघ्र ही कुरूओं ने दिल्ली क्षेत्र और दोआब के ऊपरी भाग पर अधिकार कर लिया, जो कुरूक्षेत्र नाम से प्रसिद्ध हुआ।

➣ धीरे-धीरे वे पंचालों से भी मिल गए जो दोआब के मध्य भाग पर अधिकार प्राप्त किये और इस प्रकार कुरू-पंचालों की सत्ता दिल्ली क्षेत्र पर और दोआब के ऊपरी भाग और मध्य भागों पर फैल गई।

➣ उन्होंने हस्तिनापुर को अपनी राजधानी बनाया जो मेरठ जिले में पड़ता है। कुरू कुल का इतिहास भारत-युद्ध से प्रसिद्ध है जिस पर महाभारत नाम का विख्यात महाकाव्य है।

➣ यह माना जाता है कि भारत युद्ध 950 ई.पू. के आस-पास कौरवों और पांडवों के बीच हुआ था, हालांकि ये दोनों कुरू कुल के ही थे। इस युद्ध के फलस्वरूप वस्तुतः कौरवों का नाश हो गया।

उत्तर-वैदिक का भौगोलिक विस्तार क्षेत्र

➣ उत्तर वैदिक कालीन क्षेत्र (गंगा यमुना दोआब क्षेत्र, गांधार क्षेत्र ) के खनन से चित्रित मिट्टी के बर्तन प्राप्त हुए हैं, जो भूरे रंग के थे। इन्हे धूसर मृदभांड (पी. जी. डब्ल्यू.) कहा गया है।

➣ उत्खनन में केवल अतरंजीखेड़ा स्थल से कृषि से सम्बन्धित लौह उपकरण प्राप्त हुए हैं। जो लोहे के प्रयोग के साक्ष्य को दर्शाते हैं।

➣ उत्तर-वैदिक ग्रन्थों में पांचाल राज्य अपने दार्शनिक राजाओं और ब्राह्मण धर्मशास्त्रियों के लिए प्रसिद्ध था।

➣ कुरु कबीले में कौरवों और पाण्डवों का इतिहास प्रसिद्ध है, जिस पर महाभारत नामक महाकाव्य आधारित है।

➣ अथर्ववेद में कुरू देश के राजा परीक्षित को मृत्युलोक का देवता कहा गया है।

➣ माना जाता है कि महाभारत युद्ध ई.पू. 950 में कौरवों और पाण्डवों के बीच लड़ा गया। परिणामस्वरूप पूरे कौरव परिवार का अंत हो गया।

➣ महाभारत नामक महाकाव्य महाकाव्य का रचना काल लगभग चौथी शताब्दी के आस-पास माना गया है।

➣ उत्तर-वैदिक काल के अन्त तक, ई.पू. 500 के आस-पास वैदिक लोग बड़ी संख्या में दोआब से पूरब की ओर, पूर्वी उत्तर-प्रदेश के कोसल और उत्तर बिहार के विदेह तक फैल गए।

जनजातीय संघर्ष

➣ वैदिक लोगों का पूर्वी उत्तर प्रदेश और उत्तर बिहार में, ताम्र के औजारों और काली एवं लाल मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल करने वाले लोगों से संघर्ष हुआ।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उन्हें ऐसे लोगों का सामना करना पड़ा जो ताम्बे के औजारों के साथ गेरू या लाल रंग के बर्तन का इस्तेमाल करते थे।

➣ उन्हें उत्तर-हड़प्पाई संस्कृति के लोगों का भी सामना करना पड़ा। ग्रन्थों के संकलन के आधार से पता चलता है कि उत्तर-वैदिक लोगों ने इस क्षेत्र में मुण्डा भाषियों का भी सामना किया।

उत्तर वैदिक अर्थव्यवस्था

➣ प्रारम्भिक वैदिक काल में मुख्य व्यवसाय पशुपालन था। उत्तर वैदिक काल में कृषि, लोगों का मुख्य व्यवसाय बन गया।

कृषि

➣ कृषि का स्थान गौण था। लोगों को जौ , गेहूँचावल जैसी फसलों का ज्ञान था। जिसमे गेहूँचावल मुख्य फसल हुई।

➣ ऋग्वेद के चतुर्थ मण्डल में खेती की प्रक्रिया का वर्णन मिलता है। जिसमे कृषि का उल्लेख मात्र 24 बार हुआ है।

➣ यजुर्वेद के शतपथ ब्राह्मण में जुताई के अनुष्ठान पर विस्तृत चर्चा की गई है।

➣ ऋग्वेद में हांसिया , कोठार, चलनी (तिउत), सूप (शूर्प), अनाज का ओसने वाला (धान्यकृत) आदि शब्दों का उल्लेख मिलता है।

➣ वैदिक ग्रन्थों के अनुसार वैदिक लोग व्रीहि अर्थात चावल से परिचय सबसे पहले दोआब में हुआ।

➣ यजुर्वेद में 5 प्रकार के चावल का उल्लेख है – महाब्राहि, कृष्णव्रीहि, शुक्लव्रीही, आशुधान्य और हायन

➣ अथर्ववेद में उल्लेख मिलता है कि सर्वप्रथम पृथुवेन्य ने ही कृषि कार्य किया था।

➣ अथर्ववेद में 6,8 ,1224 बैलों को हल में जोते जाने का वर्णन मिलता है। लोहे के कृषि औजार कम पाए गए हैं। जुताई एक लकड़ी के बने हल से की जाती थी।

➣ अथर्ववेद में सिंचाई के लिए नहर खोदने तथा टिड्डियों द्वारा फसल नष्ट होने की जानकारी मिलती है।

➣ ऋग्वेद में दो प्रकार के सिंचाई का उल्लेख है- खनित्रिमा (खोदकर प्राप्त किया गया जल), स्वयंजा (प्राकृतिक जल)

➣ कहा जाता है, विदेह के राजा और सीता के पिता, जनक ने अपने हाथों से जुताई की। कृष्ण के भाई बलराम को हलधर या हल को धारण करने वाला कहा जाता है।

बोधगया की एक मूर्तिकला में गौतम बुद्ध को बैलों के साथ हल चलाते हुए दर्शाया गया है।

➣ उत्तर वैदिक काल में व्यापार का विकास हुआ और व्यापारी श्रेणियों में संगठित हुए।

निष्क, शतमान, पाद, कृष्णल आदि माप की इकाइयां थीं। बाट की मूलभूत इकाई कृष्णल थी। बाट की सबसे छोटी इकाई रत्तिका थी।

➣ व्यापार के दौरान लेनदेन का माध्यम निष्क के अलावा गाय बनाया जाता था।

➣ श्रमिक वर्ग के अन्तर्गत भूसी साफ़ करने वाले को उपप्रक्षणी कहा जाता था। भूमि की माप ईकाई खिल्य थी।

➣ वैदिक काल में हल को सिरा, जूते हुए खेत को उर्वराहल रेखा को सीता कहा जाता था।

.धातुकर्म : लौह का उपयोग

➣ वैदिक लोग शुरुआती दौर से ही ताम्बे से परिचित थे। 1500 ई.पू. के तांबे के अत्यधिक मात्रा में औजार पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बिहार में मिले हैं।

➣ वैदिक लोग संभवत: राजस्थान के खेतड़ी की ताँबे की खानों का उपयोग करते थे।

➣ ताँबे की वस्तुएँ चित्रित धूसर मृदभांड स्थलों में पाई गई हैं। इनका उपयोग मुख्यत: युद्ध और शिकार के लिए होता था।

➣ गांधार क्षेत्र से मृतकों के साथ कब्रों में गाड़े गए लोहे के औजार अत्यधिक मात्रा में खुदाई से निकले हैं।

➣ इसी काल में पूर्वी पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश में लोहे का प्रयोग किया जाता था।

➣ लौह को श्याम या कृष्ण अयस (काला धातु) कहा जाता था।

मृदभांड एवं शिल्प-कला

उत्तर-वैदिक लोग चार प्रकार के मिट्टी के बर्तनों (मृदभांड) से परिचित थे:

  1. काला व लाल मृदभांड
  2. काली पॉलिशदार मृदभांड
  3. चित्रित धूसर मृदभांड
  4. लाल मृदभांड

लाल मिट्टी के बर्तन सबसे लोकप्रिय थे और ये लगभग पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पाए गए।

धूसर मृदभाण्ड संस्कृति के रचयिता मुख्यत: आर्यों को माना जाता है। सिंधु घाटी सभ्यता से लाल व गुलाबी मृदभाण्ड प्राप्त हुए हैं।

➣ सबसे विशिष्ट मृदभांड चित्रित भूरे प्रकार के होते थे जिनका उपयोग उच्च वर्ग के लोगों द्वारा किया जाता था।

➣ चित्रित भूरे बर्तन की परतों में मिले शीशे के ढेर और चूड़ियाँ सम्भवत: कुछ व्यक्तियों द्वारा प्रतिष्ठा की वस्तुओं के रूप में इस्तेमाल की गई होंगी।

➣ ग्रन्थों और उत्खनन, दोनों से शिल्प कला के बारे में पता चलता है। उत्तर-वैदिक ग्रन्थों में जौहरी या आभूषण निर्माताओं का भी उल्लेख किया गया है

➣ बुनाई व्यापक पैमाने पर होती थी लेकिन महिलाओं तक ही सीमित थी। चमड़े का काम, वर्तन और बढ़ईगीरी के काम में भी विकास हुआ।

राजनीतिक संगठन

➣ उत्तर-वैदिक काल में ऋग्वैदिक कबीलाई सभाओं का महत्त्व कम हो गया तथा शाही सत्ता विस्तार हुआ।

➣ इस काल में विदथ संस्था लुप्त हो गई। साथ ही सभा और समिति का ढांचा बदल गया।

➣ सभा में महिलाओं का प्रवेश निषिद्ध हो गया। सभा अब कुलीन और पुरोहित वर्गों द्वारा नियन्त्रित होते थे।

➣ राज्यों के क्षेत्रफल बढ़ने के कारण राजा की शक्ति बढ़ने लगी। कबीले के अधिकार को सीमित कर दिया गया।

➣ प्रारंभिक काल में प्रत्येक क्षेत्र का नाम उस कबीले के नाम पर रखा गया जो वहाँ पहले बसे थे। प्रमुख कबीलों ने अपने नाम पर इलाकों का गठन किया।

राष्ट्र शब्द, जिसका अर्थ क्षेत्र है, इसी समय आया। लोगों को नियन्त्रित करने की अवधारणा भी इसी वक्त दिखी।

➣ प्रारम्भिक काल में शारीरिक और अन्य विशेषताओं में सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति को राजा या कबीले का मुखिया चुना जाता था। जबकि उत्तर-वैदिक काल में राजा अब वंशानुगत हो गया।

➣ राजा के प्रभाव को अनुष्ठानों द्वारा सुदृढ़ किया जाता था। वे राजसूयअश्वमेध यज्ञ करते थे, जिससे उन्हें सर्वोच्च शक्ति प्राप्त होती थी।

➣ राजसूय का सर्वप्रथम उल्लेख ऐतरेय ब्राह्मण तथा अश्वमेध यज्ञ का शतपथ ब्राह्मण में मिलता है।

➣ राजसूय यज्ञ चक्रवर्ती राजा बनने के लिए किया जाता था। राज्यों को जीतने के पश्चात् राजसूय यज्ञ किया जाता था।

अश्वमेध यज्ञ में राजा का छोड़ा गया घोड़ा जिन-जिन क्षेत्रों से गुज़रता था, उन सारे क्षेत्रों पर उस राजा का अधिकार माना जाता था। जिसमे विरोध करने पर उसे राजा से युद्ध करना पड़ता था।

राजसूय यज्ञ , जो राजा के सिंहासनारोहण से, जबकि अश्वमेध यज्ञ राजनीतिक विस्तार से सम्बंधित यज्ञ था।

➣ राजसूय यज्ञ में 2,40,000 गायें दक्षिणा या उपहार के रूप दी जाती थीं।

➣ उत्तर वैदिक काल के लोग वाजपेय यज्ञ या रथ दौड़ भी करते थे, जिसमें घोड़े द्वारा खींचे गए शाही रथ का उपयोग रिश्तेदारों पर विजय हासिल करने के लिए किया जाता था। यह शौर्य प्रदर्शन एंव प्रजा के मनोजरन के लिए किये जाने वाला यज्ञ। था।

➣ यजुर्वेद में सर्वप्रथम राजसूय तथा वाजपेय यज्ञों का वर्णन मिलता है।

➣ इस काल में, कर और नजराने का संग्रह सामान्य हो गया था। जिसे संगृहित्री नामक अधिकारी के पास जमा किया जाता था। अर्थवेद के अनुसार राजा को 16वां भाग दिया जाता था।

➣ कर्तव्यों को पूरा करने के लिए राजा को पुजारी, सेनापति, महारानी और कुछ अन्य उच्च अधिकारी सहयोग प्राप्त था।

➣ निचले स्तर पर, प्रशासन सम्भवतः ग्रामीण सभाओं द्वारा संचालित होता था, जिसको समुदाय के प्रधान या नेता नियन्त्रित करते थे।

➣ उत्तर-वैदिक काल में भी राजा के पास स्थायी सेना नहीं थी। युद्ध के समय कबीले की इकाइयों को शामिल किया जाता था।

सामाजिक संगठन

➣ भारत में वर्ण व्यवस्था व्यावसायिक श्रम विभाजन के आधार पर बनायी गयी थी। जिसने सामाजिक असमानताओं के चलते समय के साथ जाति का स्वरूप ले लिया।

ऋग्वैदिक काल समाज कर्म के आधार पर तीन वर्गों में विभक्त था जो उत्तर वैदिक काल में जन्म के आधार पर चार वर्गों में विभक्त हो गया।

➣ उत्तर वैदिक काल का समाज चार वर्गों में विभक्त था- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। इस प्रकार, वैदिक आर्यों ने वर्ण व्यवस्था की शुरुआत की।

➣ शूद्र शब्द का उल्लेख ऋग्वेद के दसवें अध्याय में मिलता है। जिसे सबसे अन्त में जोड़ा गया है। ऋग्वेद के शेष भाग में कही भी वैश्य और शूद्र का वर्णन नहीं है।

➣ ऋग्वेद मे कहा गया कि ब्राह्मण परम-पुरुष के मुख से, क्षत्रिय उसकी भुजाओं से, वैश्य उसकी जाँघों से एवं शूद्र उसके पैरों से उत्पन्न हुआ है।

➣ ब्राह्मणों का उदय एक आश्चर्यजनक विकास है। बलि प्रथा ने ब्राह्मणों की शक्ति में काफी वृद्धि की।

➣ ब्राह्मण वर्ण अपने व अपने यजमानों के लिए धार्मिक अनुष्ठान व यज्ञ करते थे। वे युद्ध में अपने राजा की विजय के लिए प्रार्थना करते थे तथा राजा ने उनकी सुरक्षा का वचन दिया।

क्षत्रिय वर्ण का स्थान दूसरा था। वे युद्ध, शासन व् राष्ट्र की रक्षा करते थे। शतपथ ब्राह्मण में एक स्थान पर क्षत्रियों को ब्राह्मणों से श्रेष्ठ कहा गया है।

➣ वैश्य आम लोगों में आते थे और उन्हें कृषि, पशुपालन आदि जैसे कार्य सौंपे गए। वैदिक काल में सिर्फ वैश्य आर्थिक सहायता-कर चुकाते थे।

➣ शूद्र को अन्य वर्गों का सेवक बतलाया गया है। वह दूसरे की इच्छा अनुसार काम करने वाला है।

➣ तीन उच्च वर्गों की एक सामान्य विशेषता थी-वे उपनयन संस्कार के अधिकारी थे अर्थात् वे वैदिक शिक्षा के साथ पवित्र धागा (जनेऊ) धारण कर सकते थे।

स्थायी जीवन

➣ उत्तर-वैदिक काल में लोगों के भौतिक जीवन में काफी विकास हुआ। खानाबदोश और घुमन्तू जीवन का अन्त होने लगा।

कृषि और विभिन्न शिल्प की कारीगरी उत्तर-वैदिक लोगों के जीवन को स्थिर बना दिया।

➣ विविध कलाओं और शिल्प-कौशल से सम्पन्न, वैदिक लोग ऊपरी गंगा के मैदानी इलाकों में स्थायी रूप से बस गए।

➣ लोग मिट्टी के बने ईंटों के घरों में रहते व लकड़ी के खम्भों वाले झोपड़ीनुमा मकानों में रहते थे।

➣ स्थलों से प्राप्त चूल्हे और अनाज (चावल) से पता चलता है कि चित्रित भूरे मृदभाण्ड के लोग उत्तर-वैदिक लोगों के समतुल्य थे, वे किसान एंव स्थायी जीवन जीते थे।

➣ वैदिक ग्रन्थों में समुद्र और समुद्री यात्राओं का भी उल्लेख मिलता है।

प्रमुख 16 संस्कार

1. गर्भाधान संस्कारसन्तान उत्पन्न करने हेतु पुरुष एवं स्त्री द्वारा की जाने वाली क्रिया।
2. पुंसवन संस्कार गर्भधारण के तीसरे, चौथे तथा आठवें महीने में, पुत्र-प्राप्ति हेतु।
3. सीमान्तोन्नयन संस्कारगर्भवती स्त्री के गर्भ की रक्षा हेतु।
4. जातकर्म संस्कारजन्म के पश्चात् पिता द्वारा शिशु को आशीर्वाद देने एंव घृत या शहद चटाने का क्रम।
5. नामकरण संस्कारशिशु का नाम रखा जाने का कार्यक्रम।
6. निष्क्रमण संस्कारजन्म के 12वें दिन से लेकर चौथे महीने में, घर से बाहर लाने का कर्म (शिशु के पिता या मामा द्वारा)।
7. अन्नप्राशन संस्कारइसमें शिशु को छठे मास में अन्न खिलाया जाता था।
8. चूडाकर्म संस्कारशिशु का तीसरे से आठवें वर्ष के बीच, मुंडन केश मुंडन का कर्म (केवल बालकों तक सीमित)।
9. कर्णवेध संस्काररोगों से बचने हेतु तथा आभूषण धारण करने हेतु , कान छेदने का कर्म।
10. विद्यारंभ संस्कारपाँचवें वर्ष में , बच्चे को अक्षर-ज्ञान कराने का कर्म।
11. उपनयन संस्कार यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण कर ब्रह्मचर्य आश्रम में प्रवेश। ज्ञान प्राप्ति हेतु।
12. वेदारम्भ संस्कारवेद अध्ययन करने के लिए किया जाने वाला संस्कार।
14. समावर्तन संस्कारविद्याध्ययन समाप्त कर घर लौटने पर किया जाता था। ब्रह्मचर्य आश्रम की समाप्ति का सूचक।
15. विवाह संस्कारवर-वधू के परिणय-सूत्र में बँधने के समय किया जाने वाला संस्कार । गृह आश्रम में प्रवेश।
16. अंत्येष्टि संस्कारनिधन के बाद होने वाला संस्कार, अंतिम संस्कार।

➣ चौथा वर्ण (शूद्र) को जनेऊ संस्कार और गायत्री मन्त्र के उच्चारण का अधिकार नहीं था। महिलाओं के लिए भी उपनयन और गायत्री मन्त्र वर्जित था।

➣ वैश्य सहायता-कर देने वाला कहलाता था, जिसे इच्छानुसार दंडित और प्रताड़ित भी किया जा सकता था।

➣ समाज में सबसे ख़राब स्थिति शूद्रों की थी। सामान्यतः उत्तर-वैदिक ग्रन्थों में, तीन उच्च वर्णों और शूद्रों के बीच विभाजन की रेखा खींच दी गई थी।

➣ यद्यपि राजा के राज्याभिषेक से जुड़े कई सार्वजनिक अनुष्ठानों में शूद्रहिस्सा लेते थे, सम्भवत: वे भी मूलतः आर्य समुदाय के वंशज माने जाते थे।

रथकार या रथ निर्माता जैसे कुछ कारीगर वर्गों को उच्चाधिकार और जनेऊ धारण का अधिकार प्राप्त था।

➣ प्रारंभिक काल से परिवार में पिता का वर्चस्व था पिता अपने बेटे को भी अधिकार से वंचित कर सकता था। परिवार संयुक्त होता था।

➣ उत्तर-वैदिक काल में गोत्र नामक संस्था का उदय हुआ। जिसका शाब्दिक अर्थ गोशाला या वह स्थान, जहाँ पूरे कबीले के पशु रखे जाते थे , लेकिन समय के साथ यह एक ही पूर्वज के वंश का सूचक हो गया।

➣ लोगों ने गोत्र के अनुसार विजातीय विवाह प्रारम्भ कर दिया। एक ही गोत्र या वंश से सम्बन्धित व्यक्तियों के बीच कोई विवाह नहीं हो सकता था अर्थात सगोत्रीय विवाह प्रतिबंधित था।

➣ मनुस्मृति में विवाह के 8 प्रकारों का उल्लेख किया गया जिनमें प्रथम 4 विवाह प्रशंसनीय तथा शेष 4 निंदनीय माने जाते थे।

विवाह के प्रकार

ब्रह्म विवाह दहेज सहित उसी वर्ग के पुरुष के साथ। इसे सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
दैव विवाहयज्ञकर्ता पुरोहित के साथ।
आर्ष विवाह वर पक्ष को एक जोड़ी गाय और बैल देना होता था।
प्रजापत्य विवाह बिना दहेज के वाला विवाह
गन्धर्व विवाह माता-पिता की इच्छा के बिना होता था। प्रेम विवाह
असुर विवाह वर या वधू का शुल्क दिया जाता था। यह ग्राम विवाह है।
राक्षस विवाह कन्या का अपहरण कर बलपूर्वक विवाह।
पैशाच विवाहमूर्छित अवस्था व मानसिक विक्षिप्तता में कन्या के शरीर पर अधिकार करने के पश्चात् होने वाला विवाह।
  1. ब्राह्मणों के लिए केवल प्रथम चार विवाह ही विहित थे।
  2. असुर विवाह केवल वैश्य एवं शूद्र वर्णों में प्रचलित था।
  3. गंधर्व विवाह मुख्य रूप से क्षत्रियों में प्रचलित था।
  4. राक्षस विवाह क्षत्रियों के लिए विहित माना गया था।
  5. राक्षस और पैशाच विवाह निंदनीय (अस्वीकृत) माने जाते थे।

अनुलोम तथा प्रतिलोम विवाह

➣ अनुलोम उच्च वर्ग या जाति का व्यक्ति अपने से निचले वर्ग की कन्या के साथ विवाह करता था। जबकि प्रतिलोम उच्च वर्ग की कन्या का विवाह निचले वर्ग के व्यक्ति के साथ होता था। दोनों विवाह , अंतर्जातीय विवाह के उदहारण हैं।

नियोग प्रथा

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➣ प्राचीन समाज में नियोग प्रथा का प्रचलन था, जिसमें किसी नि:संतान स्त्री अथवा विधवा को संतान प्राप्त करने के पवित्र उद्देश्य से अपने पति अथवा विधवा होने पर परिवार के अन्य सदस्य की सहमति से, पति के भाई अथवा किसी अन्य योग्य व्यक्ति से सम्बंध स्थापित करने की अनुमति थी।

➣ इसका उदाहरण महाभारत में मिलता है।

आश्रम व्यवस्था

➣ प्रारंभिक वैदिक काल में आश्रमों या जीवन के चार चरण स्थापित नहीं हुए थे।

➣ उत्तर वैदिक काल में चार आश्रम व्यवस्था स्थापित हुई। ये हैं – ब्रह्मचारी या विद्यार्थी, गृहस्थ, वानप्रस्थ या सन्यास

➣ गृहस्थ आश्रम को सभी आश्रमों में श्रेष्ठ बताया गया है। इस आश्रम में पंच महायज्ञ , त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ ,काम ) तथा त्रि – ऋण से निवृत होना आवश्यक था।

पंच महायज्ञ

यज्ञ विवरण
ब्रह्मयज्ञ वेदों और धार्मिक ग्रंथों का स्व-ध्ययन
देवयज्ञ देवताओं का पूजन
पितृयज्ञ तर्पण, पिण्डदान और श्राद्ध
भूतयज्ञ अपने अन्न का कुछ भाग दूसरे जीव के लिए अर्पित करना
अतिथियज्ञ अतिथि आदर से सत्कार करना एंव सेवा करना।
ऋण विवरण
ऋषि ऋण वैदिक ग्रंथो का ज्ञान फैलाना (शिव )
पुत्र ऋण सन्तानोपत्ति करना (ब्रम्हा )
देव ऋण धार्मिक अनुष्ठान व यज्ञ करना (विष्णु )

➣ सर्वप्रथम जाबालो उपनिषद में चार आश्रम बताये गए हैं जबकि छान्दोग्य उपनिषद में केवल तीन आश्रमों का उल्लेख मिलता है।

➣ मानव जीवन को 100 वर्ष मानते हुए प्रत्येक आश्रम की संभावित अवधि 25 वर्ष मानी गई।

आश्रम आयुकार्यपुरुषार्थ
ब्रह्मचर्य 0-25वेदों का अध्ययन , ज्ञान प्राप्ति धर्म व ज्ञान
गृहस्थ25-50भौतिक सुखों का भोग करना अर्थ व काम
वानप्रस्थ50-75विरक्त जीवन , ईश्वर का ध्यांन करना अध्यात्म ज्ञान
सन्यास75-100गृहत्याग कर, तपस्यामोक्ष

देवता, रीति-रिवाज और दर्शन

ऋग्वैदिक काल में जिन भौतिक कारणों से देवताओं की पूजा की जाती थी अभी भी वह चलन में था हालाँकि, पूजा रीति-रिवाजों और अनुष्ठान में काफी बदलाव हुए।

➣ प्रार्थनाएँ पहले की तरह गाई जाती रहीं, परन्तु अब वे देवताओं को प्रसन्न करने के लिए मुख्य रीति नहीं थी। बलि रीति अधिक महत्त्वपूर्ण हो गए।

➣ ब्राह्मण द्वारा बलि-दान की रीतियां आविष्कृत, अधिगृहीत और विस्तारित होती थीं। ब्राह्मण ज्ञान एवं विशेषज्ञता के एकाधिकार का दावा करते थे।

➣ यज्ञ में बड़े पैमाने पर बलि दी जाती थी। जिसमें पशु धन नष्ट होते थे। इसमें अतिथि को गोघना या गोहन्ता कहा जाता था जिन्हें इन पशुओं का मांस खिलाया जाता था।

➣ बलि देने वाला बलि की रीति को बड़े ध्यान से सम्पन्न करता था। इस बलिकर्ता को यजमान कहा जाता था अर्थात यज्ञ करने वाला

स्वामी विवेकानन्द ने वैदिक काल के रूढ़िवादी और गोमांस खाने वाले ब्राह्मणों का वर्णन किया है।

➣ ब्राह्मणों का आश्चर्यजनक विकास हुआ। बलि के उपहार स्वरूप दिए गए दान में, गायों के अलावा, सोने, कपड़े और घोड़े भी होते थे। कभी-कभी पुरोहित दक्षिणा के रूप में क्षेत्र के कुछ हिस्सों की माँग करते थे।

➣ वैदिक काल के अन्त में पुरोहित के वर्चस्व, और अनुष्ठानों के प्रभाव का कड़ा विरोध हुआ। ई.पू. 600 के आस-पास उपनिषदों का संकलन हुआ। इन दार्शनिक ग्रन्थों ने अनुष्ठानों की आलोचना की तथा सही मत एवं ज्ञान के मूल्यों पर जोर दिया।

➣ उपनिषदों ने बताया कि आत्मा या स्व का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए, आत्मा और ब्रह्म के सम्बन्ध को ठीक से समझा जाना चाहिए।

पांचाल और विदेह के कुछ क्षत्रिय शासकों ने इस विचार को सराहा और पौरोहित्य-वर्चस्व वाले धर्म के सुधार के लिए वातावरण का निर्माण किया।

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