Subject: भारतीय इतिहास

  • भारतीय इतिहास की प्रमुख ऐतिहासिक संधियाँ

    📚 विषय सूची

    पुरंदर की सन्धि : छत्रपति शिवाजी और राजा जय सिंह (22 जून 1665 ई.)

    22 जून 1665 ई. में पुरंदर के किले पर मुगलों की विजय और रायगढ़ की घेराबंदी के बाद मिर्जा राजा जयसिंहशिवाजी के मध्य हुई।

    ➣ शिवाजी ने सन 1664 ई. में मुग़लों का एक महत्त्वपूर्ण बंदरगाह सूरत को लूटा था। तत्पश्चात औरंगजेब ने शिवाजी को परास्त करने के लिए आमेर राजा जयसिंह को भेजा।

    ➣ जय सिंह ने बीजापुर के सुल्तान, यूरोपीय शक्तियाँ तथा छोटे सामन्तों का सहयोग लेकर पूणा में शिवाजी पर आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में शिवाजी को हानि होने लगी और हार की सम्भावना को देखते हुए शिवाजी ने सन्धि का प्रस्ताव भेजा।

    ➣ संधि के तहत शिवाजी को चार लाख हूण वार्षिक आमदनी वाले 23 क़िले मुग़लों को सौंपने पड़े और उन्होंने अपने लिए सामान्य आय वाले केवल 12 क़िले रखे।

    ➣ मुग़लों ने शिवाजी के पुत्र शम्भाजी को पंज हज़ारी मनसब एवं उचित जागीर देना स्वीकर किया।

    ➣ मुग़लों ने शिवाजी के विवेकरहित और बेवफ़ा व्यवहार को क्षमा करना स्वीकार कर लिया।

    ➣ साथ ही शिवाजी को कोंकण और बालाघाट में जागीरें दी जानी थीं, जिनके बदले उन्हें मुग़लों को 13 किस्तों में चालीस लाख हूण की रक़म अदा करनी थी। इसके अलावा उन्हें बीजापुर के ख़िलाफ़ मुग़लों की सहायता भी करनी थी।

    अलीनगर की सन्धि : बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला और अंग्रेज (9 फरवरी, 1757 ई.)

    ➣ अलीनगर की संधि, 9 फ़रवरी 1757 ई. को बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला और ईस्ट इंडिया कम्पनी के बीच हुई, जिसमें अंग्रेज़ों का प्रतिनिधित्व क्लाइव और वाटसन ने किया।

    ➣ अंग्रेज़ों द्वारा कलकत्ता पर दुबारा अधिकार कर लेने के बाद यह संधि की गई। इस संधि के द्वारा नवाब और ईस्ट इंडिया कम्पनी में निम्नलिखित शर्तों पर फिर से सुलह हो गई-

    ➣ ईस्ट इंडिया कम्पनी को मुग़ल बादशाह के फ़रमान के आधार पर व्यापार की समस्त सुविधाएँ फिर से दे दी गईं।

    कलकत्ता में क़िले की मरम्मत की इजाज़त भी दे दी गई।

    ➣ कलकत्ता में सिक्के ढालने का अधिकार भी उन्हें दे दिया गया तथा नवाब के द्वार कलकत्ते पर अधिकार करने से अंग्रेज़ों को जो क्षति हुई थी, उसका हर्जाना देना भी स्वीकार किया गया और दोनों पक्षों ने शान्ति बनाये रखने का एक-दूसरे से वायदा किया।

    ➣ हालाँकि इस संधि पर हस्ताक्षर करने के एक महीने बाद ही अंग्रेज़ों ने इसका उल्लघंन कर, कलकत्ता से कुछ मील दूर गंगा नदी के किनारे की फ़्राँसीसी बस्ती चन्द्रनगर पर आक्रमण करके उस पर अपना अधिकार कर लिया।

    ➣ उसके दूसरे महीने जून में अंग्रेज़ों ने मीर ज़ाफ़र और नवाब के अन्य विरोधी अफ़सरों से मिलकर सिराजुद्दौला के विरुद्ध षड़यंत्र रचा। इस षड़यंत्र के परिणाम स्वरूप 23 जून, 1757 ई. को प्लासी की लड़ाई हुई, जिसमें सिराजुद्दौला हार गया तथा मारा गया।

    प्लासी युद्ध के पश्चात ही भारत में अंग्रेजी साम्राज्य की नींव पड़ी।

    इलाहाबाद की सन्धि : रॉबर्ट क्लाइव और बादशाह शाहआलम द्वितीय (1765 ई.)

    ➣ इलाहाबाद की सन्धि 1765 ई. में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की ओर से रॉबर्ट क्लाइव और मुग़ल बादशाह शाहआलम द्वितीय के मध्य हुई थी।

    ➣ इस सन्धि के द्वारा ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने कोड़ा और इलाहाबाद के ज़िले शाहआलम द्वितीय को लौटाना स्वीकार कर लिया।

    ➣ साथ ही कम्पनी ने बादशाह को 26 लाख रुपये वार्षिक ख़िराज देना स्वीकार किया था।

    ➣ इस सन्धि के बदले में बादशाह ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी’ (राजस्व वसूलने का अधिकार) सौंप दी।

    मद्रास की सन्धि : हैदर अली और अंग्रेज (4 अप्रैल, 1769 ई.)

    ➣ मद्रास की संधि (1769) यह संधि प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध के बाद हैदर अली और अंग्रेज की बीच हुई थी।

    ➣ हैदर ने अंग्रज़ों (जनरल जोसेफ स्मिथ) से प्रतिशोध लेने के लिए फ़्राँसीसी सेना के साथ निज़ाममराठों से समझौता किया और एक संयुक्त सैनिक मोर्चा निकाला।

    ➣ निज़ाम की सहायता से उसने कर्नाटक पर अधिकार कर लिया, किन्तु शीघ्र ही 1768 ई. में निज़ाम युद्ध से पीछे हो गया और उसने अकेले हैदर अली को अंग्रेज़ों का सामना करने के लिए छोड़ दिया।

    1768 ई. में वह मद्रास के पाँच मील निकट तक पहुँच गया तथा 1769 ई. में हैदर ने मंगलोर पर आक्रमण कर उस पर पुन: अधिकार करके अंग्रेज़ों को अपने अनुकूल सन्धि करने पर बाध्य कर दिया। अंग्रेज़ों ने विविश होकर मद्रास में हैदर अली की शर्तों पर 4 अप्रैल, 1769 को मद्रास की संधि कर ली।

    ➣ दोनों पक्षों ने एक दूसरे के जीते हुए क्षेत्रों को वापस किया, परन्तु हैदर अली ने करुर के क्षेत्र को वापस नहीं किया।

    ➣ इस सन्धि के अनुसार अंग्रेज़ों ने हैदर अली के विजित प्रदेशों पर उसके आधिपत्य को स्वीकार कर लिया और यह वायदा किया कि जब कभी भी मैसूर पर हमला होगा, अंग्रेज़ हैदर अली की मदद करेंगे।

    ➣ हालांकि 1770 ई. में जब मराठों (पेशवा माधवराव) ने मैसूर राज्य पर हमला किया तब अंग्रेज़ों ने अपना संधि के तहत सहयोग नहीं दिया।

    बनारस की प्रथम सन्धि : अवध के नवाब शुजाउद्दौला तथा अंग्रेज (1773 ई.)

    ➣ यह सन्धि अवध के नवाब शुजाउद्दौला तथा ईस्ट इंडिया कम्पनी के बीच में हुई।

    1772 ई. में नवाब ने रुहलों से इस आशय की सन्धि की थी कि यदि मराठों ने उन पर आक्रमण किया, तो वह मराठों को इधर नहीं बढ़ने देंगे और इसके बदले में रुहल उसे 40 लाख रुपये की धनराशि देंगे।

    ➣ 1773 में मराठों ने रूहेलखण्ड पर आक्रमण किया, किन्तु वे बिना किसी युद्ध के ही वापस लौट गये। अब शुजाउद्दौला ने रुहलों से 40 लाख रुपयों की निर्धारित धनराशि की माँग की, और रुहेल उसे देने में आनाकानी करने लगे।

    ➣ अतएव शुजाउद्दौला ने ईस्ट इंडिया कम्पनी के साथ बनारस की प्रसिद्ध बनारस सन्धि कर ली,

    ➣ इस सन्धि के अनुसार कड़ा तथा इलाहाबाद ज़िले अवध के नवाब के अधीन कर दिये गए। अवध के नवाब शुजाउद्दौला ने इन ज़िलों की एवज में कम्पनी को पचास लाख रुपये तथा वार्षिक आर्थिक सहायता देना स्वीकार किया।

    ➣ इससे पहले यह ज़िले मुग़ल बादशाह शाहआलम द्वितीय को दिये गये थे।

    ➣ नवाब की शर्त के अनुसार कम्पनी ने नवाब के संरक्षण के लिए अवध में अपनी एक सैनिक टुकड़ी तैनात करना स्वीकार कर लिया और सेना का सम्पूर्ण व्यय-भार नवाब को वहन करना होगा।

    ➣ बनारस में ही उसे बंगाल के गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स द्वारा यह आश्वासन मिला, कि कम्पनी रुहलों से 40 लाख रुपये प्राप्त करने में शुजाउद्दौला की सहायता अंग्रेज़ पलटन के द्वारा करेगी क्योंकि शुजाउद्दौला की दृष्टि में रुहलों से वह धनराशि उसको मिलनी थी।

    बनारस की द्वितीय सन्धि : राजा चेतसिंह और अंग्रेज (1775 ई.)

    ➣ यह सन्धि राजा चेतसिंह और ईस्ट इंडिया कम्पनी के बीच में हुई थी। चेतसिंह बनारस का राजा था, जो ईस्ट इंडिया कम्पनी के प्रति निष्ठा रखता था। उसकी मैसूर और मराठों से कभी नहीं बनती थी।

    ➣ पहले चेतसिंह अवध के नवाब का सामन्त था, लेकिन बाद में उसने अपनी निष्ठा ईस्ट इंडिया कम्पनी के प्रति व्यक्त की और संधि कर ली।

    ➣ उसने यह प्रभुत्व इस शर्त पर स्वीकार किया कि, वह कम्पनी को 22.5 लाख रुपये का वार्षिक नज़राना दिया करेगा।

    ➣ सन्धि में इस बात का भी उल्लेख था कि, ईस्ट इण्डिया कम्पनी उससे अन्य किसी प्रकार की माँग नहीं करेगी।

    ➣ एक शर्त यह भी थी कि, कम्पनी का कोई भी व्यक्ति राजा के अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं करेगा, और न ही देश की शांति को भंग करेगा।

    ➣ इस निश्चित आश्वासन के बावजूद भी वारेन हेस्टिंग्स ने 1778 – 1780 के वर्षों में और भी कई अतिरिक्त धन की माँग की। जिस राजा पुरा ना कर सका।

    ➣ हेस्टिंग्स ने चेतसिंह का सारा राजपाट ज़ब्त करके उसके भतीजे को इस शर्त पर सौंप दिया। यह घटना भारतीय इतिहास में चेतसिंह के मामले के नाम से जानी जाती है।

    ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री पिट ने महसूस किया कि चेतसिंह के मामले में हेस्टिंग्स का व्यवहार क्रूर, अनुचित और दमनकारी था। हेस्टिंग्स पर महाभियोग लगाये जाने का एक कारण यह भी था।

    सूरत की सन्धि : राघोवा (रघुनाथराव) और अंग्रेज़ (1775 ई.)

    ➣ सूरत की सन्धि 1775 ई. में राघोवा (रघुनाथराव) और अंग्रेज़ों के बीच हुई।

    ➣ राघोवा पेशवा बाजीराव प्रथम का द्वितीय पुत्र था। वह अपने बड़े भाई बालाजी बाजीराव की मृत्यु के बाद उसके पुत्र और अपने भतीजे माधवराव प्रथम को पेशवा बनाये जाने के ख़िलाफ़ था।

    1772 ई. में जब माधवराव प्रथम की मृत्यु हो गई और उसका छोटा भाई नारायण राव अगला पेशवा बना। अपनी महत्त्वाकांक्षाओं पर पानी फिर जाने से उसने बम्बई जाकर अंग्रेज़ों से सहायता की याचना की तथा 1775 ई. में उनसे सन्धि कर ली, जो कि सूरत की सन्धि के नाम से प्रसिद्ध है।

    ➣ सन्धि के अंतर्गत अंग्रेज़ों ने रघुनाथराव की सहायता के लिए 2500 सैनिक देने का वचन दिया, परन्तु इनका समस्त व्यय भार रघुनाथराव को ही वहन करना था।

    ➣ इसके बाद में रघुनाथराव ने साष्टी और बसई तथा भड़ौच और सूरत ज़िलों की आय का कुछ भाग अंग्रेज़ों को देना स्वीकार कर लिया।

    ➣ साथ ही उसने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शत्रुओं से किसी प्रकार की सन्धि न करने तथा पूना सरकार से सन्धि या समझौता करते समय अंग्रेज़ों को भी भागी बनाने का वचन दिया।

    ➣ सन्धि के अनुसार बम्बई के अंग्रेज़ों ने रघुनाथराव का पक्ष लिया और प्रथम मराठा युद्ध आरम्भ हो गया। यह युद्ध 1775 ई. से 1783 ई. तक चलता रहा जिसकी समाप्ति सालबाई की सन्धि से हुई।

    पुरन्दर की सन्धि : मराठों तथा अंग्रेज (1776 ई.)

    ➣ पुरन्दर की संधि मार्च 1776 ई. में मराठों तथा ईस्ट इंडिया कम्पनी के बीच हुई थी।

    ➣ बम्बई सरकार और अपने को पेशवा मानने वाले राघोवा के बीच 1775 ई. की सूरत की संधि के फलस्वरूप कम्पनी और मराठों के बीच युद्ध छिड़ गया था।[1]

    ➣ इस युद्ध रोकने के लिए कम्पनी ने अपने प्रतिनिधि कर्नल अपटन को मराठों से संधि वार्ता के लिए भेजा था।

    ➣ पुरन्दर की संधि के द्वारा अंग्रेज़ों ने इस शर्त पर राघोबा का साथ छोड़ना स्वीकार कर लिया कि, उन्हें साष्टी को अपने अधिकार में रखने दिया जायेगा।

    कोर्ट ऑफ़ डाइरेक्टर्स ने इस संधि को नामंज़ूर कर दिया और जिसके फलस्वरूप मराठों से फिर युद्ध छिड़ गया।

    ➣ यह युद्ध 1782 ई. तक चलता रहा और सालबाई की सन्धि के द्वारा ही समाप्त हुआ।

    ➣ अंग्रेज़ों ने सालबाई में पुरन्दर की संधि की सभी शर्तें स्वीकार कर लीं और मराठों से एक प्रकार से सुलह कर ली।

    बड़गाँव की सन्धि : अंग्रेज (कर्नल करनाक) और मराठा (1779 ई.)

    ➣ यह संधि जनवरी, 1779 ई. में प्रथम मराठा युद्ध (1776-82 ई.) के दौरान भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी की सरकार की ओर से कर्नल करनाक और मराठों के मध्य हुआ।

    ➣ इस समझौते के अनुसार तय हुआ कि कम्पनी की बम्बई सरकार 1773 ई. के बाद जीते गये समस्त इलाके मराठों को लौटा देगी और अपने वचनों का पालन करने की गारंटी के रूप में कुछ अंग्रेज़ अफ़सरों को बंधक के रूप में मराठों के सुपुर्द कर देगी।

    राघोवा को, जिसको पेशवा की गद्दी पर बिठाने के उद्देश्य से अंग्रेज़ों ने लड़ाई छेड़ी थी, उसे मराठों को सौंप देगी। राघोबा ने महादजी शिन्दे की शरण लेकर अपनी प्राणरक्षा की।

    ➣ बंगाल से मदद के लिए आ रही ब्रिटिश सेना वापस लौटा दी जायेगी और भड़ौंच से प्राप्त राजस्व का एक हिस्सा महादजी शिन्दे को दिया जायेगा।

    ➣ सैनिक स्थिति अंग्रेज़ों के इतने अनुकूल नहीं थी कि वे इस प्रकार की शर्तें स्वीकार करते। गवर्नर-जनरल ने इस समझौते को अस्वीकृत कर दिया और समझौते करने वाले अंग्रेज़ अधिकारियों को नौकरी से बर्ख़ास्त कर दिया।

    सालबाई की सन्धि : अंग्रेज और महादजी शिन्दे (1782 ई.)

    ➣ सालबाई की सन्धि, मई 1782 ई. में ईस्ट इण्डिया कम्पनी और महादजी शिन्दे के बीच हुई थी। फ़रवरी 1783 ई. में पेशवा की सरकार ने इसकी पुष्टि कर दी।

    ➣ इस संधि के फलस्वरूप 1775 ई. से चला आ रहा प्रथम मराठा युद्ध समाप्त हो गया।

    ➣ सन्धि की शर्तों के अनुसार साष्टी टापू अंग्रेज़ों के अधिकार में ही रहा और अंग्रेज़ों ने राघोवा का पक्ष लेना छोड़ दिया और मराठा सरकार ने इसे पेंशन देना स्वीकार कर लिया।

    ➣ अंग्रेज़ों ने माधवराव नारायण को पेशवा मान लिया और यमुना नदी के पश्चिम का समस्त भू-भाग महादजी शिन्दे को लौटा दिए।

    ➣ अंग्रेज़ों और मराठों में यह सन्धि 20 वर्षों तक शान्तिपूर्वक चलती रही।

    ➣ इस सन्धि से सर्वाधिक लाभ अंग्रेज़ों को ही प्राप्त हुआ क्योंकि अब उन्हें टीपू सुल्तान जैसे अन्य शत्रुओं से निश्चिन्तता पूर्वक निपटने तथा अपनी शक्ति और स्थिति को और भी मज़बूत करने का अवसर मिल गया।

    मंगलौर की सन्धि : अंग्रेज़ और टीपू सुल्तान (3 मार्च, 1784 ई.)

    ➣ मंगलौर की सन्धि मार्च, 1784 ई. में अंग्रेज़ों और टीपू सुल्तान के मध्य हुई थी।

    ➣ टीपू सुल्तान द्वारा कई युद्धों में हारने के बाद मराठों एवं निज़ाम ने अंग्रेज़ों से संधि कर ली थी। ऐसी स्थिति में टीपू ने भी अंग्रेज़ों से संधि का प्रस्ताव किया। इसी के फलस्वरूप मंगलौर की संधि सम्पन्न हुई।

    ➣ संधि की शर्तों के अनुसार दोनों पक्षों ने एक दूसरे के जीते हुए प्रदेशों को वापस कर दिया। टीपू ने अंग्रेज़ बंदियों को भी रिहा कर दिया।

    ➣ टीपू ने मैसूर राज्य में अंग्रेज़ों के व्यापारिक अधिकार को माना।

    ➣ अंग्रेज़ों ने टीपू को आश्वासन दिया कि वे मैसूर के साथ मित्रता बनाये रखेंगे तथा किसी भी संकटकालीन परिस्थिति में उसकी सहायता करेंगे।

    ➣ टीपू के लिए यह संधि उसकी उत्कृष्ट कूटनीतिक सफलता थी। उसने अंग्रेज़ों से अलग से एक संधि कर मराठों की सर्वोच्चता को अस्वीकार कर दिया।

    श्रीरंगपट्टनम की सन्धि : अंग्रेज़ और टीपू सुल्तान (5 फ़रवरी, 1792 ई.)

    लॉर्ड कॉर्नवालिस ने तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध के दौरान 5 फ़रवरी, 1792 ई. को श्रीरंगपट्टम के किले पर अधिकार कर लिया। विवश होकर टीपू सुल्तान को अंग्रेजों से मार्च 1792 ई. में श्रीरंगपट्टम की संधि करनी पड़ी।

    ➣ इस सन्धि के अनुसार टीपू सुल्तान ने अपने दो पुत्रों को बंधक के रूप में अंग्रेज़ों को सौंप दिया और तीन करोड़ रुपये युद्ध के हरजाने के रूप में दिये, जो तीन मित्रों (अंग्रेज़-निज़ाम-मराठा) में बराबर बाँट लिये गये।

    ➣ साथ ही टीपू सुल्तान ने अपने राज्य का आधा भाग भी सौंप दिया, जिसमें से अंग्रेज़ों ने डिंडीगल, बारा महाल, कुर्ग और मालाबार अपने अधिकार में रखकर टीपू के राज्य का समुद्र से संबंध काट दिया और उन पहाड़ी दर्रों को छीन लिया, जो दक्षिण भारत के पठारी भू-भाग के द्वार थे।

    ➣ मराठों को वर्धा (वरदा) और कृष्णा नदियोंनिज़ाम को कृष्णा-पनार नदियों के बीच के भू-खण्ड मिले।

    सहायक सन्धि : लॉर्ड वेलेजली द्वारा प्रारंभ (1798 ई.)

    ➣ वर्ष 1798 में लॉर्ड वेलेजली ने भारत में सहायक संधि प्रणाली की शुरुआत की, जिसके तहत सहयोगी भारतीय राज्य के शासक को अपने शत्रुओं के विरुद्ध अंग्रेज़ों से सुरक्षा प्राप्त करने के बदले में ब्रिटिश सेना के रखरखाव के लिये आर्थिक रूप से भुगतान करने को बाध्य किया गया था।

    ➣ इसने संबंधित शासक के दरबार में एक ब्रिटिश रेज़िडेंट की नियुक्ति का प्रावधान किया, जो शासक को अंग्रेज़ों की स्वीकृति के बिना किसी भी यूरोपीय को उसकी सेवा में नियुक्त करने से प्रतिबंधित करता था।

    ➣ कभी-कभी शासक वार्षिक रूप से आर्थिक भुगतान करने के बजाय अपने क्षेत्र का हिस्सा सौंप देते थे।

    ➣ सहायक संधि पर हस्ताक्षर करने वाला पहला भारतीय शासक हैदराबाद का निजाम था।

    ➣ सहायक संधि करने वाले देशी राजा अथवा शासक किसी अन्य राज्य के विरुद्ध युद्ध की घोषणा करने या अंग्रेज़ों की सहमति के बिना समझौते करने के लिये स्वतंत्र नहीं थे।

    बसई की सन्धि : मराठा पेशवा बाजीराव द्वितीय और अंग्रेज़ (31 दिसम्बर, 1802 ई.)

    बसई की सन्धि अथवा बसीन की सन्धि 31 दिसम्बर, 1802 में, भारत में पूना (पुणे) के मराठा पेशवा बाजीराव द्वितीय और अंग्रेज़ों के मध्य हुई थी।

    ➣ यह ‘मराठा महासंघ’ को तोड़ने की दिशा में एक निर्णायक क़दम था। इसके फलस्वरूप 1818 ई. में पेशवा के पश्चिमी भारत के क्षेत्रों का ईस्ट इण्डिया कम्पनी में विलय का मार्ग प्रशस्त हुआ।

    बाजीराव द्वितीय एक क़ायर और विश्वासघाती व्यक्ति था। उसका मंत्री नाना फड़नवीस थे। किन्तु 1800 ई. में नाना फड़नवीस की मृत्यु के बाद उसके रिक्त पद के लिए दौलतराव शिन्दे और जसवन्तराव होल्कर में प्रतिद्वन्द्विता शुरू हो गई थी।

    ➣ इस प्रतिद्वंद्विता के कारण जो युद्ध हुआ, उसमें बाजीराव द्वितीय ने शिन्दे का साथ दिया, लेकिन होल्कर की सेना ने उन दोनों की संयुक्त सेना को पराजित कर दिया।

    ➣ भयभीत पेशवा बाजीराव द्वितीय ने 1801 ई. में बसई भागकर अंग्रेज़ों की शरण ली और वहीं एक अंग्रेज़ी जहाज़ पर बसई की सन्धि पर हस्ताक्षर कर दिये।

    ➣ संधि के अनुसार अंग्रेज़ों ने बाजीराव द्वितीय को राजधानी पूना में पुन: सत्तासीन करने का वचन दिया और पेशवा की रक्षा के लिए उसने राज्य में पर्याप्त सेना रखने की ज़िम्मेदारी ली।

    ➣ सन्धि के तहत पेशवा अंग्रेज़ों की सेना की छह बटालियनों का ख़र्च वहन करने को राज़ी हुआ, जिसका ख़र्च उठाने के लिए एक इलाका प्रत्यर्पित किया गया।

    ➣ इसके साथ ही सभी यूरोपीय लोगों को सेवा से हटाने, सूरत व बड़ौदा पर दावा ख़त्म करने और अंग्रेज़ों की सलाह से ही अन्य देशों के साथ सम्बन्ध रखने की भी शर्तें मान ली गईं।

    ➣ बदले में आर्थर वेलेजली (जो बाद में वेलिंग्डन के पहले ड्यूक बने) ने मई, 1803 में पेशवा को पूना वापस दिला दिया। इस तरह से अग्रणी मराठा राज्य अंग्रेज़ों की मदद लेने लगा था।

    ➣ मराठा सरदारों ने बसई की सन्धि के प्रति अपना रोष प्रकट किया, क्योंकि उन्हें लगा कि पेशवा ने अपनी क़ायरता के कारण उन सभी की स्वतंत्रता बेच दी है।

    ➣ इस युद्ध सन्धि के परिणामस्वरूप अंग्रेज़ों और मराठों के बीच दूसरा मराठा युद्ध (1803-05 ई.) हुआ, जिसमें तीन अन्य प्रमुख मराठा शक्तियों की पराजय हुई।

    देवगाँव की सन्धि : रघुजी भोंसले और अंग्रेज (17 दिसम्बर, 1803 ई.)

    ➣ देवगाँव की संधि अथवा ‘देवगढ़ की संधि’ 17 दिसम्बर, 1803 ई. को रघुजी भोंसले और अंग्रेज़ों के बीच हुई थी।

    द्वितीय मराठा युद्ध के दौरान आरगाँव की लड़ाई , नवम्बर, 1803 में अंग्रेज़ों ने रघुजी भोंसले को पराजित किया था, उसी के फलस्वरूप यह संधि हुई।

    ➣ इस संधि के अनुसार बरार के भोंसला राजा ने अंग्रेज़ों को कटक का प्रान्त दे दिया, जिसमें बालासौर के अलावा वरदा नदी के पश्चिम का समस्त भाग शामिल था।

    ➣ भोंसला राजा को अपनी राजधानी नागपुर में ब्रिटिश रेजीडेण्ट रखने के लिए मजबूर होना पड़ा। उसने निज़ाम अथवा पेशवा के साथ होने वाले किसी भी झगड़े में अंग्रेज़ों को पंच बनाना स्वीकार कर लिया।

    ➣ अंग्रेज़ों ने उससे यह वायदा भी लिया कि, वह अपने यहाँ कम्पनी सरकार की अनुमति के बिना किसी भी यूरोपीय अथवा अमेरिकी को नौकरी नहीं देगा।

    ➣ व्यावहारिक दृष्टिकोण से इस संधि ने भोंसले को अंग्रेज़ों का आश्रित बना दिया।

    सुर्जी अर्जुनगाँव की सन्धि : अंग्रेज़ और दौलतराव शिन्दे (1803 ई.)

    ➣ अमृतसर की सन्धि 25 अप्रैल, 1809 ई. को रणजीत सिंह और ईस्ट इंडिया कम्पनी के बीच हुई। उस समय लॉर्ड मिण्टो प्रथम, भारत का गवर्नर-जनरल था, जिसमे अंग्रेजो का प्रतिनिधित्व किया।

    ➣ इसके अनुसार रणजीत सिंह ने लुधियाना पर से अधिकार हटा लिया और अपने राज्यक्षेत्र को सतलुज नदी के उत्तर और पश्चिम तक ही सीमित रखना स्वीकार किया। इस प्रकार सतलज के पश्चिम में पंजाब राज्य का शासक महाराजा रणजीत सिंह को मान लिया गया।

    ➣ साथ ही उन्होंने सतलुज को दक्षिणवर्ती रियासतों के झगड़ों में हस्तक्षेप न करने का वचन दिया। परिणामस्वरूप ये सभी रियासतें अंग्रेज़ों के संरक्षण में आ गईं।

    ➣ कश्मीर जो रणजीत सिंह के राज्य का हिस्सा था, उसे राजा दलीप सिंह से ले लिया गया और अंग्रेज़ों ने उसे गुलाब सिंह को दे दिया। गुलाब सिंह लाहौर दरबार का एक सरदार था। इसके बदले में उसने अंग्रेज़ों को दस लाख रुपये दिये।

    ➣ इसके बाद महाराजा रणजीत सिंह का विजय-अभियान पश्‍चिम और उत्‍तर की ओर ही रहा। इस समझौते ने एक पीढ़ी तक आंग्‍ल-सिक्‍ख संबंध को क़ायम रखा।

    ➣ इस संधि का तात्‍कालिक कारण नेपोलियन की रुसियों के साथ तिलसित संधि (1807) हो जाने के बाद पश्‍चिमोत्‍तर क्षेत्र में फ्रांसीसियों के हमले की आशंका एवं महाराजा रणजीत सिंह के सतलुज राज्‍यों को अपने नियंत्रण में लाने के संयुक्‍त प्रयास थे।

    रणजीत सिंह एकमात्र ऐसा शासक था जिसने न तो अंग्रेज़ों से कोई युद्ध किया और न ही अंग्रेजी सेना को अपने राज्य के अन्दर घुसने दिया।

    अमृतसर की सन्धि : रणजीत सिंह और अंग्रेज (25 अप्रैल, 1809 ई.)

    सुर्जी अर्जुनगाँव की सन्धि, 1803 ई. में अंग्रेज़ों और दौलतराव शिन्दे के बीच हुई थी। इस सन्धि के फलस्वरूप दोनों के बीच चलने वाला युद्ध समाप्त हो गया।

    ➣ सन्धि के अनुसार शिन्दे ने अपने दरबार में ब्रिटिश रेजीडेन्ट रखना स्वीकार कर लिया और बसई की सन्धि को स्वीकार किया।

    ➣ शिन्दे ने निज़ाम के ऊपर अपने सारे दावे त्याग दिए और अंग्रेज़ों की सहमति के बिना अपनी नौकरी में किसी भी विदेशी को न रखने का वचन दिया।

    ➣ इसके अलावा उसने गंगा और यमुना के बीच का सारा दोआब, जिसमें दिल्ली और आगरा भी सम्मिलित था, अंग्रेज़ों को सौंप दिए।

    ➣ इस प्रकार उत्तरी भारत, दक्षिण तथा गुजरात में दौलतराव शिन्दे के समस्त राज्य पर अंग्रेज़ों का प्रभुत्व स्थापित हो गया।

    ➣ शिन्दे ने राजपूताना के अधिकांश राज्यों की राजनीति में भी कोई हस्तक्षेप न करने का वचन दिया।

    ➣ अर्जुनगाँव की सन्धि के द्वारा शिन्दे की स्वतंत्रता समाप्त हो गई तथा उत्तरी भारत के अधिकांश भाग में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना साकार हुई।

    ग्वालियर की संधि : लॉर्ड हेस्टिंग्स एवं मराठा सरदार महादजी शिन्दे, 5 नवंबर 1817

    ➣ पिंडरियों के विरुद्ध अभियान के दौरान अंग्रेज़ अधिकारी लॉर्ड हेस्टिंग्स एवं मराठा सरदार महादजी शिन्दे के बीच 5 नवंबर 1817 को एक संधि हुई, जिसे ग्वालियर की संधि कहा जाता है।

    ➣ इस सिन्धु के अनुसार सिंधिया पिंडरियों की पुनः नियुक्ति नहीं करेगा और न कोई सहायता करेगा।

    ➣ सिंधिया पिंडरियों के विरुद्ध 5000 घुड़सवार नियुक्त करेगा। *सिंधिया अंग्रेजों की सहमति के बिना अपनी सेना की स्थिति परिवर्तन एवं उनकी बढ़ोतरी नहीं करेगा।

    ➣ इसके साथ ही अरजानगांव और सुरजी की संधियों के होने के बावजूद अंग्रेजों को उदयपुर, जोधपुर, कोटा, बूंदी और चंबल के किनारे के अन्य राज्यों के साथ संबंध बनाने में छूट होगी।

    पूना की संधि : ( बाजीराव द्वितीय और कंपनी, 3 जून, 1818)

    ➣ यह संधि तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध के अंत में हुई, जिसके बाद पेशवा ने अपना राज्य छोड़ दिया और मराठा शक्ति का अंत लगभग हो गया। इस समय अंग्रेजों का गवर्नर-जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स था।

    ➣ यह संधि 3 जून, 1818 ई. को पेशवा बाजीराव द्वितीय और अंग्रेज़ों के बीच हुई थी। इसमें मराठों की निर्णायक हार हुई।

    नवंबर 1817 में बाजीराव द्वितीय ने पूना की अंग्रेज़ी रेजीडेन्सी को लूटकर जला दिया तथा खड़की स्थित अंग्रेज़ी सेना पर आक्रमण किया, परंतु वह पराजित हो गया। इस संघर्ष में उसका योग्य सेनापति गोखले मारा गया।

    ➣ इसके बाद मराठों की हार जनवरी 1818 में कोरेगाँव और फरवरी 1818 में आष्टी की लड़ाई में हुई।

    ➣ अंततः 3 जून, 1818 ई. को बाजीराव द्वितीय ने अंग्रेज़ों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया और पूना की संधि स्वीकार की।

    ➣ इस संधि के बाद अंग्रेज़ों ने पेशवा पद समाप्त कर दिया तथा बाजीराव द्वितीय को बंदी बनाकर बिठूर (कानपुर के निकट) भेज दिया, जहाँ 1853 ई. में उसकी मृत्यु हुई।

    ➣इस घटना के साथ मराठा शक्ति का अंतिम अंत हो गया और भारत में अंग्रेज़ों का वर्चस्व और मजबूत हो गया।

    इस प्रकार मराठों की स्वतंत्रता नष्ट करने के लिए बाजीराव द्वितीय सबसे अधिक ज़िम्मेदार माना गया है।

    गंडमक की सन्धि : लॉर्ड लिटन और याक़ूब ख़ाँ (1879 ई.)

    ➣ गंडमक की संधि द्वितीय अफ़ग़ान युद्ध (1878-1880 ई.) के दौरान मई 1879 ई. में भारतीय ब्रिटिश सरकार के तत्कालीन वाइसराय लॉर्ड लिटन और अफ़ग़ानिस्तान के अपदस्थ अमीर शेरअली के पुत्र याक़ूब ख़ाँ के बीच हुई थी।

    ➣ इस संधि के अंतर्गत याक़ूब ख़ाँ, जिसे अमीर के रूप में मान्यता दी गई थी, अपने विदेशी सम्बन्ध ब्रिटिश निर्देशन से संचालित करने, राजधानी काबुल में ब्रिटिश रेजीडेंट रखने और कुर्रम दर्रे व पिशीन और सीबी ज़िलों को ब्रिटिश नियंत्रण में कर देने के लिए राज़ी हो गया।

    ➣ गंडमक की संधि लॉर्ड लिटन की अफ़ग़ान नीति की सबसे बड़ी उपलब्धि थी, किन्तु अंग्रेज़ों की यह विजय अल्पकालीन थी।

    ➣ गंडमक संधि के केवल चार महीने बाद ही 2 सितम्बर, 1879 ई. को अफ़ग़ानों ने फिर सिर उठाया और उन्होंने ब्रिटिश रेजीडेण्ट की हत्या कर गंडमक संधि को रद्द कर दिया।

    ➣ अफ़ग़ानिस्तान में युद्ध फिर से भड़क उठा और वह फिर तभी समाप्त हुआ, जब अंग्रेज़ों ने अपने आश्रित याक़ूब ख़ाँ को अफ़ग़ानों के हाथ समर्पित कर दिया और क़ाबुल में अपना रेजीडेण्ट रखने का विचार तथा संधि के अंतर्गत मिला समग्र अफ़ग़ान क्षेत्र त्याग दिया।

    सुगौली सन्धि : ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी और नेपाल (04 मार्च, 1816 ई.)

    ➣ सुगौली सन्धि 19वीं सदी के शुरुआती दौर में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी और नेपाल के मध्य हुई थी। यह सन्धि 4 मार्च, 1816 ई. को सम्पन्न हुई।

    ➣ इस सन्धि के साथ ही अंग्रेज़ोंनेपालियों के बीच वर्ष 1814 ई. से चली आ रही जंग का अंत हो गया।

    ➣ सन्धि के तहत नेपाल को अपना एक-तिहाई इलाका ब्रिटिश भारत के अधीन कर देना पड़ा। इसमें पूर्वी छोर पर स्थित दार्जिलिंग व तिस्ता, दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र में बसे नैनीताल, पश्चिमी छोर पर बसे कुमाऊँ, गढ़वाल के अलावा कुछ तराई इलाके भी शामिल थे।

    ➣ सन्धि के अनुसार काठमांडू में एक ब्रिटिश प्रतिनिधि की नियुक्ति तथा ब्रिटेन की सैन्य सेवाओं में गोरखाओं की नियुक्ति का मार्ग भी प्रशस्त हो गया।

    वर्ष 1923 ई. में सुगौली सन्धि के स्थान पर सतत शांति व मैत्री संधि के नाम से एक नई संधि की गई।

    लाहौर की सन्धि : अंग्रेज़ों और सिक्खों के बीच (09 मार्च, 1846 ई.)

    ➣ लाहौर की सन्धि अंग्रेज़ों और सिक्खों के मध्य 9 मार्च, 1846 ई. को हुई थी। इस सन्धि से लॉर्ड हार्डिंग ने लाहौर के आर्थिक साधनों को नष्ट कर दिया।

    ➣ सन्धि की शर्तों के अनुसार अंग्रेज़ों को दलीप सिंह ने सतलुज नदी के पार के प्रदेश तथा सतलुज नदी एवं व्यास नदी के मध्य स्थित सभी दुर्गों को देना भी स्वीकार कर लिया।

    ➣ इसके अलावा महाराजा ने डेढ़ करोड़ रुपये युद्ध हर्जाना के रूप में देना तथा अपनी सेना को 12,000 घुड़सवार एवं 20,000 पैदल सैनिकों तक सीमित रखना स्वीकार कर लिया। अंग्रेज़ों ने अल्पायु दलीप सिंह को महाराजा, रानी ज़िन्दा कौर (बीबी साहिबा) को संरक्षिका एवं लाल सिंह, जो ज़िन्दा रानी का प्रेमी था, को वज़ीर के रूप में मान्यता दी तथा सर हेनरी लॉरेन्स को लाहौर का रेजीडेन्ट नियुक्त किया।

    ➣ इसके अलावा 11 मार्च को सम्पन्न हुई एक पूरक सन्धि के द्वारा अंग्रेज़ी सेना को दिसम्बर, 1846 ई. तक लाहौर में रख दिया गया। जिसमे हार्डिंग ने यह तर्क दिया कि महाराजा दलीप सिंह के वयस्क होने तक सेना का वहाँ रहना अनिवार्य है।

    वर्साय की सन्धि : जर्मनी और गठबन्धन देश (28 जून 1919 ई.)

    ➣ वर्साय की संधि 28 जून, 1919 ई. को हुई थी। यह संधि प्रथम विश्व युद्ध के अन्त में जर्मनी और गठबन्धन देशों- ब्रिटेन, फ़्राँस, अमरीका तथा रूस आदि के बीच में हुई।

    प्रथम विश्व युद्ध में जर्मनी की पराजय हुई और उसने 28 जून, 1919 के दिन वर्साय की सन्धि पर हस्ताक्षर किये।

    ➣ इस संधि के परिणामस्वरूप जर्मनी को अपनी भूमि के एक बड़े हिस्से से हाथ धोना पड़ा। दूसरे राज्यों पर उसके द्वारा अधिकार करने पर पाबन्दी लगा दी गयी। उनकी सेना का आकार सीमित कर दिया गया और भारी क्षतिपूर्ति थोप दी गयी।

    ➣ वर्साय की सन्धि को जर्मनी पर जबरदस्ती थोपा गया था। इस कारण एडोल्फ हिटलर और अन्य जर्मन लोग इसे अपमानजनक मानते थे। यही कारण था कि यह सन्धि द्वितीय विश्व युद्ध के कारणों में से एक थी।

  • मौर्य साम्राज्य (322 -185 ई. पू.) : प्रमुख शासक और उनका योगदान

    📚 विषय सूची

    मौर्य साम्राज्य : प्रथम भारतीय साम्राज्य

    मौर्य वंश के प्रमुख शासकों की सूची

    ➣ चौथी शताब्दी ई. पू. मगध में नंद वंश के शासक धनानंद का शासन था। साक्ष्यों से पता चलता है कि धनानंद एक क्रूर और अत्याचारी शासक था।

    ➣ चंद्रगुप्त मौर्य ने अपने राजनीतिक गुरु चाणक्य के साथ मिलकर इसी नंद वंशीय शासक धनानंद को पराजित कर मगध में मौर्य वंश की आपना की। इसकी राजधानी पाटलिपुत्र थी।

    ➣ चन्द्रगुप्त मौर्य को प्रथम भारतीय साम्राज्य का संस्थापक, भारत का प्रथम ऐतिहासिक सम्राट, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रथम नायक, भारत का मुक्तिदाता कहा जाता है। उसने ही भारत को सर्वप्रथम राजनीतिक रूप से एकबद्ध किया।

    ➣ चंद्रगुप्त मौर्य ने ने वृहत्तर भारत पर अपना शासन स्थापित किया। जिसका विस्तार ब्रिटिश साम्राज्य से भी बड़ा था। उसके साम्राज्य की सीमा ईरान से मिलती थी।

    मौर्य साम्राज्य का मानचित्र

    चंद्रगुप्त मौर्य (322-298 ई.पू.)

     जन्म 345 ई.पू.
     राज्यरोहण 322 ई.पू.
     गुरु व प्रधानमत्रीं चाणक्य या विष्णुगुप्त
     धर्म जैनधर्म
     भाषा पाली
     राजकीय चिन्ह मयूर

    ➣ मौर्य वंश के शासक किस वर्ण के थे, इसको लेकर इतिहासकारों में मतभेद है। लेकिन बौद्ध एवं जैन ग्रंथों में उसे (चंद्रगुप्त) मोरिय क्षत्रिय कहा गया है।

    ➣ ऐसा इसलिये भी प्रामाणिक लगता है क्योंकि चंद्रगुप्त का गुरु चाणक्य वर्णाश्रम धर्म का प्रबल पोषक था जिसके अनुसार क्षत्रिय वर्ण का व्यक्ति ही राजत्व का अधिकारी हो सकता था।

    प्रारंभिक जीवन

    ➣ चंद्रगुप्त मौर्य के वंश और जाति के संबंध में विद्वान एकमत नहीं हैं। कुछ विद्वानों ने ब्राह्मण साहित्य, मुद्राराक्षस, विष्णुपुराण आदि के आधार पर इसे शूद्र माना है। अधिकांश विद्वान क्षत्रिय होने पर सहमत हैं।

    ब्राह्मण साहित्य में चन्द्रगुप्त मौर्य को शूद्र, जैन एवं बौद्ध साहित्य में क्षत्रिय तथा ग्रीक साहित्य में उसे निम्न-कुल का नहीं, बल्कि निम्न परिस्थिति में जन्मा हुआ बताते हैं।

    विशाखदत्त के मुद्राराक्षस में उसे वृषल (निम्न कुल का) कहा गया स्पूनर ने चन्द्रगुप्त मौर्य को पारसिक/ईरानी बताया या है।

    ➣ क्षेमेंद्र कृत बृहत्कथामंजरी तथा सोमदेव कृत कथासरित्सागर में चंद्रगुप्त के शूद्र उत्पत्ति के विषय में विवरण मिलता है।

    ➣ बौद्ध ग्रंथ महाबोधिवंश के अनुसार, मौर्यनेपाली तराई के पास गोरखपुर क्षेत्र के पीपहलिवन के छोटे गणराज्य के क्षत्रिय वंश या शासक वंश के थे।

    ➣ हेमचंद्र के परिशिष्टपर्वन में चंद्रगुप्त को मयूर पोषकों के ग्राम के मुखिया के पुत्री का पुत्र बताया गया है।

    ➣ विलियम जोंस पहले विद्वान थे, जिन्होंने सैंड्रोकोट्स की पहचान मौर्य शासक चंद्रगुप्त मौर्य से की।

    एरियन तथा प्लूटार्क ने चंद्रगुप्त मौर्य को एंड्रोकोट्स के रूप में वर्णित किया है।

    जस्टिन ने सैंड्रोकोट्स (चंद्रगुप्त मौर्य) और सिकंदर महान की भेंट का उल्लेख किया है।

    ढुण्डिराज एवं श्रीधरस्वामी ने चन्द्रगुप्त मौर्य को मुरा नामक महिला से उत्पन्न बताया है।

    ➣ बौद्ध ग्रन्थ महापरिनिब्बनसुत्त में मौर्यों को पिप्पलीवन के क्षत्रिय बताया गया है।

    चन्द्रगुप्त की मगध विजय

    ➣ इनका प्रथम आक्रमण मगध पर था, जो असफल हुआ, जिसकी जानकारी महाबोधिवंश में वर्णित है।

    पंजाब विजय एवं मगध पर आक्रमण कर नन्द वंश का अन्त किया, जिसकी जानकारी महावंश की टीका वशंथप्रकाशिनी से मिलती है।

    ➣ नन्द वंश के विरूद्ध रक्तपात से भरे युद्ध का वर्णन मिलिन्द पन्हो में है। इस युद्ध में धनानन्द के अमात्य शकटार ने चन्द्रगुप्त मौर्य की सहायता की थी।

    साम्राज्य विस्तार

    मुद्राराक्षस में वर्णित है कि ‘चन्द्रगुप्त का साम्राज्य चतुः समुदुपर्यन्त था। चतुः समुद्रपर्यन्त का अर्थ है- चारों समुद्रों तक” या “चारों समुद्रों की सीमा तक फैली हुई”।

    प्लूटार्क एवं जस्टिन के अनुसार ‘चन्द्रगुप्त ने सम्पूर्ण भारत पर अधिकार कर लिया था। चन्द्रगुप्त ने प्रारम्भिक साम्राज्य विस्तार में हिमालय क्षेत्र के पर्वतक नामक शासक से सहायता प्राप्त की।

    अहनानूर में वर्णन है कि मौर्यों ने एक विशाल सेना लेकर दक्षिण क्षेत्र में राजा मोहर पर आक्रमण किया। इस अभियान में कौशर एवं वाडुगर नामक जातियों ने मौयों की मदद की थी।

    ➣ यूनानी लेखक प्लूटार्क के अनुसार “चन्द्रगुप्त ने छः लाख की सेना लेकर सम्पूर्ण भारत को रौंद डाला और उस पर अधिकार कर लिया।” जस्टिन ने भी इसी प्रकार के विचार प्रकट किये हैं।

    ➣ चन्द्रगुप्त मौर्य की दक्षिण भारत की विजय के विषय में जानकारी तमिल ग्रन्थ अहनानूर एवं मुरनानूर तथा अशोक के अभिलेखों से मिलती है।

    ➣ बंगाल पर चन्द्रगुप्त की विजय महास्थान अभिलेख से प्रकट होती है। महास्थान अभिलेख में काकिणी (काकिनी) नामक मुद्रा का उल्लेख भी मिलता है।

    ➣ चन्द्रगुप्त मौर्य ने उत्तर-पश्चिम में हिन्दुकुश पर्वत तक अपनी सीमा का विस्तार कर सर्वप्रथम भारत की वैज्ञानिक सीमा को प्राप्त किया, जिसके लिए 18वीं-19वीं शताब्दी में अंग्रेज भी संघर्षरत रहे।” यह कथन विन्सेन्ट स्मिथ का है।

    305 ई.पू. में चन्द्रगुप्त ने तत्कालीन यूनानी शासक सेल्यूकस निकेटर को पराजित किया। फलस्वरुप चन्द्रगुप्त तथा सेल्युकस के बीच सन्धि हुई।

    ➣ सन्धिस्वरूप सेल्यूकस ने अपनी पुत्री हेलेना का विवाह चन्द्रगुप्त से किया, चार प्रान्त – एरिया (हेरात), अराकोसिया (कन्धार), जेड्रोसिया (बलुचिस्तान/मकरानतट) तथा पेरोपनिसडाई (काबुल) दहेज में दिये। बदले में चन्द्रगुप्त मौर्य ने सेल्यूकस को 500 हाथी दिये।

    ➣ सेल्यूकस के साथ हुए चन्द्रगुप्त के इस युद्ध एवं सन्धि का वर्णन एप्पियानस, स्ट्रेबो एवं प्लुटार्क ने किया है एंव एप्पियानस एवं स्ट्रेबो ने इस वैवाहिक संबंध का वर्णन किया है।

    ➣ इस विवाह के लिए चाणक्य ने दो शर्त रखी थी –

    • पहली, हेलेना से उत्पन्न संतान उनके राज्य का उत्तराधिकारी नहीं होगी, क्योंकि हेलेना एक विदेशी महिला हैं।
    • दूसरी – हेलेना कभी भी चंद्रगुप्त के राज्य कार्य में हस्तक्षेप नहीं करेंगी, लेकिन गृहस्थ जीवन में उनका पूर्ण अधिकार होगा।

    विशाखदत्त के नाटक मुद्राराक्षस में भी इस युद्ध एवं हेलन से चन्द्रगुप्त के विवाह का वर्णन है।

    ➣ चन्द्रगुप्त मौर्य के बारे में कहा जाता है कि उसने समुद्रों के मध्य की भूमि को जीता था। उसका साम्राज्य उत्तर-पश्चिम में ईरान (फारस) से लेकर पूर्व में बंगाल तक, उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में उत्तरी कर्नाटक (मैसूर) तक फैला हुआ था।

    ➣ सल्यूकस ने अपने राजदूत मेगस्थनीज को चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में भेजा। यूनानी लेखकों ने पाटलिपुत्र को पालिनोथा के नाम से संबोधित किया।

    ➣ मेगस्थनीज मौर्य दरबार में काफी समय तक रहा। भारत में रहकर उसने जो कुछ देखा-सुना उसे उसने इण्डिका नामक अपनी पुस्तक लिपिबद्ध किया।

    ➣ चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन के अन्तिम वर्षों में मगध में 12 वर्षों तक भीषण अकाल पड़ा, जिसकी पुष्टि जैन ग्रन्थों से होती है।

    ➣ चन्द्रगुप्त मौर्य के महास्थान एवं सौहगरा अभिलेख भी अकाल से निपटने के प्रबन्धों (राशनिंग प्रणाली) पर प्रकाश डालते हैं।

    ➣ चन्द्रगुप्त मौर्य के सौराष्ट्र के गवर्नर (राष्ट्रीय) पुष्यगुप्त वैश्य ने इतिहास प्रसिद्ध सुदर्शन झील का निर्माण कराया। इससे चन्द्रगुप्त मौर्य के पश्चिम भारत पर प्रभाव की जानकारी मिलती है।

    ➣ चन्द्रगुप्त मौर्य की चन्द्रगुप्त संज्ञा का प्राचीनतम् अभिलेखीय साक्ष्य रूद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख से मिलता है।

    मृत्यु

    ➣ अपने अन्तिम समय में चन्द्रगुप्त मौर्य ने जैन मुनि भद्रबाहु से दीक्षा लेकर श्रवणबेलगोला (मैसूर) में 298 ई.पू. सल्लेखण (उपवास) द्वारा देह का त्याग किया।

    ➣ परिशिष्ट पर्व के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य ने जैन धर्म स्वीकार किया था।

    ➣ सेल्यूकस सिकंदर का प्रमुख सेनापति था। सिकंदर की मृत्यु के बाद वह बेबीलोन का शासक बना था। साथ ही सिकंदर द्वारा जीते गये भारतीय और ईरानी क्षेत्रों का भी उत्तराधिकारी बन बैठा।

    ➣ उसने सेल्यूसिड नाम से अपना साम्राज्य भी खड़ा कर लिया और बैजीलियस नामक उपाधि धारण की, जिसका अर्थ होता है राजा।

    ➣ सिकंदर की ही तरह सेल्यूकस ने भी भारत पर 304 ई.पू. में आक्रमण किया। जिसमे उसे सम्राट चंद्रगुप्त का सामना करना पड़ा। इस युद्ध में उसकी हार हुई फलतः उसे संधि का प्रस्ताव करना पड़ा।

    ➣ चंद्रगुप्त मौर्य के शासन की दो मुख्य उपलब्धियां –

    • यूनानियों के विदेशी शासन से देश को मुक्त करना।
    • नंदों के घृणित एवं अत्याचारपूर्ण शासन की समाप्ति।

    व्यक्तित्व

    ➣ चंद्रगुप्त मौर्य को एक महान विजेता, साम्राज्य निर्माता तथा कुशल प्रशासक कहा गया है।

    ➣ चंद्रगुप्त की प्रशासनिक योग्यता अपने समय में उत्कृष्ट थी। मौर्यो की प्रशासनिक व्यवस्था कालांतर की सभी भारतीय प्रशासनिक व्यवस्थाओं का आधार कही जा सकती है।

    ➣ यह बहुत कुछ चंद्रगुप्त की रचनात्मक प्रतिभा तथा उसके गुरु एवं प्रधान कौटिल्य की राजनीतिक सूझबूझ का ही परिणाम थी।

    चन्द्रगुप्त मौर्य के विभिन्न नाम

    ➣ यूनानी ग्रन्थों में चन्द्रगुप्त मौर्य के 3 नामों का उल्लेख मिलता है-

    सैन्ड्रोकोट्सइस शब्द का प्रयोग स्ट्रैबो, मरियन एवं जस्टिन ने किया है।
    एन्ड्रोकोट्स इस नाम का प्रयोग एप्पियानस और प्लूटार्क ने किया है।
    सैन्ड्रोकोप्ट्स इसका प्रयोग नियार्कस ने किया है।

    ➣ चन्द्रगुप्त के प्रशासन की सबसे बड़ी विशेषता, विशाल सेना का रख-रखाव था।

    चंद्रगुप्त की मुक्ति सेना

    ➣ चंद्रगुप्त ने उन गणतंत्रों के वीर सैनिक व जनता को एकत्रित किया था जिन्होंने अपनी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए सिकंदर से अंतिम दम तक युद्ध किया था। इनको जस्टिन ने लुटेरा कहा है।

    ➣ भारतीय ग्रंथों में आरट्ट या अराष्ट्रक कहा गया है। किंतु चंद्रगुप्त केवल इन रंग रूटों पर ही निर्भर नहीं रहा।

    ➣ उसने सैन्य संग्रह के सभी साधनों का उपयोग किया और एक मिली-जुली सेना तैयार की जिसमें मुद्रारक्षस नाटक के अनुसार शक, यवन, किरात, कंबोज, पारसीक, वाह्निक आदि विविध जातियों के सैनिक सम्मिलित थे।

    कौटिल्य/चाणक्य

    ➣ चाणक्य चन्द्रगुप्त का प्रधानमंत्री एंव गुरु था जिसने उसे मगध की गद्दी प्राप्त करने में सहायता प्रदान की थी।

    महावंश टीका में उल्लेख मिलता है कि चाणक्य तक्षशिला निवासी एक ब्राह्मण था। पुराणों में उसे द्विजर्षम’ (श्रेष्ठ ब्राह्मण) कहा गया है।

    ➣ माना जाता है कि चाणक्य ने ईसा से 370 वर्ष पूर्व ऋषि चणक के पुत्र के रूप में जन्म लिया था। उसका पालन-पोषण और शिक्षा उसकी माता के संरक्षण में हुआ।

    बृहत्कथाकोश के अनुसार चाणक्य की पत्नी का नाम यशोमती था।

    ➣ चंद्रगुप्त एवं चाणक्य ने मिलकर नंद वंश का उन्मूलन कर मौर्य वंश की नींव डाली। महावंश के अनुसार कौटिल्य ने चन्द्रगुप्त मौर्य को जम्बू द्वीप (भारत) का शासक (सकल जम्बूद्वीप स्वामी) बनाया।

    मुद्राराक्षस में कहा गया है कि राजा नंद ने भरे दरबार में चाणक्य को उसके उस सम्मानित पद से हटा दिया जो उसे दरबार में दिया गया था। इस पर चाणक्य ने शपथ ली कि वह उसके परिवार तथा वंश को समूल नष्ट करके नंद से बदला लेगा।

    बिन्दुसार (298-273 ई.पू.)

    ➣ बिन्दुसार चन्द्रगुप्त मौर्य का पुत्र था। जो 298 ईसा पूर्व में 15 वर्ष की आयु में मगध की राजगद्दी पर बैठा।

    ➣ बिन्दुसार को वायु पुराण में मद्रसार तथा जैन ग्रन्थों में सिंहसेन कहा गया है। बिंदुसार, अमित्रघात नाम से भी जाना जाता जिसका अर्थ होता है- शत्रु विनाशक।

    ➣ जैन ग्रन्थों के अनुसार बिन्दुसार की माता का नाम दुर्धरा था। बिन्दुसार का सीजेरियन तकनीक (सर्जरी) से जन्म हुआ था।

    ➣ यूनानी लेखों में इसे अमित्रोकेडस एवं स्ट्रेबो ने अलित्रोकेडस कहा है, जबकि पंतजलि के महाभाष्य में अमित्रघात नाम है।

    बिन्दुसार के विभिन्न नाम
    स्रोत नाम
    अमित्रोचेट्स यूनानी लेखक
    अमित्रघात संस्कृत ग्रन्थ (पतंजलि)
    अमिट्रोकेड्स स्ट्रेबो
    वायु पुराण मद्रसार
    जैन ग्रन्थ सिंहसेन
    फा प्येन चुलीन (चीनी ग्रंथ) बिन्दुपाल

    यूनानी सम्बन्ध

    ➣ स्ट्रैबो के अनुसार, सीरिया का शासक एटियोकस प्रथम ने डायमेकस नामक एक राजदूत बिंदुसार के दरबार में भेजा, जो मेगस्थनीज का उत्तराधिकारी माना जाता था।

    ➣ प्लिनी के अनुसार मिस्र के शासक टालमी द्वितीय फिलाडेल्फस ने डायनोसिस (डायोनिसिस) नामक राजदूत बिन्दुसार के दरबार में भेजा था।

    ➣ टालमी द्वितीय फिलाडेल्फस’ ने सिकन्दरिया में भारतीय ग्रन्थों के अनुवाद को सुरक्षित रखने हेतु एक पुस्तकालय की स्थापना की।

    एथीनियस नामक एक अन्य यूनानी लेखक ने बिंदुसार तथा सीरिया के शासक एटियोकस प्रथम के बीच मैत्रीपूर्ण पत्र-व्यवहार का वर्णन किया है, जिसमें भारतीय शासक ने तीन चीजों की मांग की थी-

    • सूखी अंजीर
    • अंगूरी मदिरा
    • एक दार्शनिक

    ➣ सीरियाई सम्राट ने दो चीजें (अंगूरी मदिरा तथा सूखी अंजीर) भिजवा दीं, परंतु तीसरी मांग के संबंध में कहा कि यूनानी कानून के अनुसार दार्शनिकों का विक्रय नहीं किया जा सकता है।

    तक्षशिला विद्रोह

    ➣ बिंदुसार के शासनकाल में तक्षशिला में हुए दो विद्रोहों का वर्णन मिलता है। उस समय तक्षशिला का गवर्नर सुसीम था। इस विद्रोह को दबाने के लिये बिंदुसार ने पहले सुसीम को और बाद में अशोक को भेजा।

    तक्षशिला का प्रथम विद्रोह जनता का एवं दूसरा राजदरबार के षडयंत्र का परिणाम था। प्रथम विद्रोह के दमन के समय अशोक उज्जैन/अवन्ति के गवर्नर के रूप में गया था।

    तारानाथ के अनुसार बिन्दुसार ने 16 प्रदेशों पर विजय पाई एवं अपना साम्राज्य एक समुद्र से दूसरे समुद्र तक फैलाया।’

    महावंश के अनुसार बिन्दुसार ब्राह्मण धर्म का अनुयायी था। उसने 60 हजार ब्राह्मणों के प्रति उदारता दिखाई।

    ➣ बिन्दुसार आजीवक धर्म का अनुयायी था। दिव्यावदान से ज्ञात होता है कि उसकी राजसभा में आजीवक संप्रदाय का एक ज्योतिषी पिंगलवत्स निवास करता था।

    चाणक्य बिन्दुसार का भी प्रधानमंत्री था। चाणक्य के बाद राधागुप्त प्रधानमंत्री बना।

    दिव्यावदान के अनुसार बिन्दुसार की सभा में 500 सदस्यों वाली एक मंत्रिपरिषद् थी, जिसका प्रधान खल्लाटक था।

    सम्राट अशोक (273- 232 ई.पू.)

    ➣ अशोक बिन्दुसार का पुत्र था। जैन अनुश्रुति के अनुसार अशोक ने बिंदुसार की इच्छा के विरुद्ध मगध के शासन पर अधिकार कर लिया।

    ➣ बिन्दुसार ने अशोक के बड़े भाई सुसीम को उत्तराधिकारी नियुक्त किया, लेकिन अशोक प्रधानमंत्री राधागुप्त की सहायता से सम्राट बनने में सफल रहा। उसने राधागुप्त को अपना प्रधानमंत्री बनाया।

    ➣ अशोक शुरुआत में ब्राह्मण धर्म का अनुयायी था परंतु बाद में कलिंग युद्ध के पश्चात बौद्ध अनुयायी बन गया। राजतरंगिणी के अनुसार अशोक शैव धर्म का अनुयायी था।

    राज्याभिषेक

    ➣ राज्याभिषेक से पूर्व अशोक उज्जैन का गर्वनर था।

    महाबोधिवंश तथा तारानाथ के अनुसार सत्ता प्राप्ति के लिये गृहयुद्ध में अपने 99 भाइयों का वध करके अशोक ने साम्राज्य प्राप्त किया।

    ➣ चार वर्ष तक चले इस उत्तराधिकार युद्ध के पश्चात् अशोक ने 269 ई.पू. विधिवत राज्याभिषेक करवाया।

    ➣ अशोक ने चक्रवती सम्राट की उपाधि धारण की थी। चक्रवर्ती सम्राट की परिभाषा चाणक्य के अर्थशास्त्र में मिलती है।

    चाणक्य के अनुसार, हिमालय से लेकर समुद्र तक हजार योजन विस्तार वाला भू-भाग चक्रवर्ती राजा का शासन होता है। भरत, भारत के पहले ‘चक्रवर्ती सम्राट’ थे।

    ➣ आजीवक मुनि पिंगलवत्सजीव (बिन्दुसार के दरबार में) ने भविष्यवाणी की थी कि अशोक राजसिंहासन पर बैठेगा।

    स्रोत

    ➣ अशोक के जीवन की प्रारम्भिक जानकारी बौद्ध ग्रन्थों दिव्यावदान एवं सिंहली अनुश्रुति से मिलती है।

    ➣ बौद्ध ग्रन्थों में अशोक की माता का नाम सुभद्रांगी मिलता है। इसके अन्य नाम धर्मा एवं जनपद, कल्याणी थे। वह चम्पा के ब्राह्मण की बेटी थी।

    ➣ अशोक की माता सुभद्रांगी आजीवक धर्म की अनुयायी थी। आजीवक जनसान उसके कुलगुरु थे।

    ➣ अशोक नाम का उल्लेख मास्की, गुर्जरा, नेट्टूर तथा उदेगोलम अभिलेख में ही मिलता है। पुराणों में उसे अशोकवर्धन तथा दीपवंश में करमोली कहा गया है। कनगनहल्ली लेख में राज्यो/राजा अशोक कहा है।

    ➣ अशोक ने गुजर्रा अभिलेख में स्वयं को राजा अशोक कहा है। अशोक को धर्मराज भी कहा गया है।

    ➣ अभिलेखों में अशोक को ईरानी शैली में देवनांप्रिय तथा देवनांपियदस्सि (देवों का प्यारा) जैसी उपाधियों से विभूषित किया गया है।

    ➣ अशोक के अलावा उसके पौत्र दशरथ तथा श्रीलंका के शासक तिस्स ने भी देवनांप्रिय की उपाधि धारण की।

    ➣ राज्याभिषेक से संबंधित मास्की के लघु शिलालेख में अशोक ने स्वयं को बुद्ध शाक्य कहा है।

    बुद्धघोष द्वारा रचित सामन्तपासादिका एवं सुमंगल विलासिनी से एवं आर्यमंजूश्रीमूलकल्प से अशोक के जीवन की घटनाएँ मिलती अशोकावदानमाला में उपगुप्त द्वारा अशोक को दिये गये धर्मोपदेश की जानकारी मिलती है।

    ➣ कल्हण अशोक को कश्मीर का प्रथम मौर्य शासक बताता है। राजतरंगिणी के अनुसार अशोक ने वितस्ता (झेलम) नदी के किनारे श्रीनगर की स्थापना की।

    सारनाथ लेख के अनुसार नेपाल अशोक के साम्राज्य में था। अशोक की पुत्री चारूमती ने नेपाल में देवपतन एवं अशोक ने ललितपतन नगर बसाया।

    साम्राज्य विस्तार

    ➣ कई अभिलेखों से स्पष्ट हो जाता है कि उसका साम्राज्य उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत (अफगानिस्तान) से लेकर दक्षिण में कर्नाटक तथा पश्चिम में काठियावाड़ (गुजरात) से लेकर पूर्व में बंगाल की खाड़ी तक विस्तृत था।

    ➣ कल्हण की राजतरंगिणी से पता चलता है कि उसका अधिकार कश्मीर पर भी था।

    ➣ इसके अनुसार उसने वहाँ धर्मारिणी विहार में अशोकेश्वर नामक मंदिर की स्थापना करवाई थी। कश्मीर में श्रीनगर तथा नेपाल में देवपत्तन नामक नगर बसाया।

    असम में अशोक कालीन साक्ष्यों के न मिलने से स्पष्ट होता है कि वह मौर्य साम्राज्य के बाहर था।

    कलिंग युद्ध (261 ई. पू. )

    ➣ सिंहासन पर विराजमान होने के बाद, अशोक ने केवल एक युद्ध किया, जिसे कलिंग युद्ध कहा जाता है। अशोक के तेरहवें अभिलेख से कलिंग युद्ध के बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है।

    ➣ अपने राज्याभिषेक के 8वें वर्ष में लगभग 261 ईसा पूर्व में कलिंग पर आक्रमण किया और कलिंग की राजधानी तोसली पर अधिकार कर लिया। यह वर्तमान ओडिशा के दक्षिणी भाग स्थित है।

    ➣ कलिंग के हाथीगुम्फा अभिलेख से प्रकट होता है कि सम्भवतः उस समय कलिंग पर नन्दराज नाम का कोई राजा राज्य कर रहा था।

    ➣ उसके अनुसार, इस दौरान 1,00,000 लोग मारे गए, लाखों तबाह हो गए और 1,50,000 को कैदी बना लिया गया। नरसंहार से विचलित अशोक ने युद्ध की नीति त्याग कर, सांस्कृतिक विजय की नीति अपनाई। फलस्वरूप अशोक ने भेरिघोष का स्थान पर धम्मघोष अपना लिया।

    भब्रू अभिलेख से ज्ञात होता है कि कलिंग युद्ध के ढाई वर्ष बाद अशोक ने उपगुप्त के प्रभाव में आकर बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था।

    प्लिनी के अनुसार अशोक ने कलिंग को व्यापार-व्यवसाय की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण समझकर इस पर आक्रमण किया।

    ➣ कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार कलिंग हाथियों के लिए प्रसिद्ध था। इन्हीं हाथियों को प्राप्त करने के लिए अशोक ने कलिंग पर आक्रमण किया था।

    ➣ विजयोपरान्त कलिंग में दो अधीनस्थ प्रशासनिक केन्द्र स्थापित किये गये-(1) उत्तरी केन्द्र (राजधानी-तोसलि, धौली) (2) दक्षिणी केन्द्र (राजधानी- जौगढ़) समापा।

    अशोक और बौद्ध धर्म

    ➣ सिंहली अनुश्रुतियों दीपवंश एवं महावंश के अनुसार अशोक को उसके शासन के चौथे वर्ष निग्रोध नामक भिक्षु ने बौद्ध धर्म में दीक्षित किया। तत्पश्चात् मोग्गलिपुत्ततिस्स के प्रभाव से वह पूर्णरूपेण बौद्ध हो गया।

    ➣ अशोक ने मोग्गलिपुत्ततिस्स की अध्यक्षता में तीसरी बौद्ध संगीति बुलाई। जिसमे मौग्गलिपुत्ततिस्स ने अभिधम्म पिटक के कथावस्तु की रचना की।

    मोग्गलिपुत्ततिस्स ने अशोक के पुत्र महेन्द्र को भी बौद्ध धर्म में दीक्षित किया।

    ➣ बौद्ध धर्म ग्रहण करने के बाद अशोक ने आखेट तथा विहार यात्राएँ रोक दी तथा उनके स्थान पर धर्म याजाएँ प्रारंभ की।

    ➣ डॉ. स्मिथ के अनुसार अशोक द्वारा बौद्ध धर्म के स्थलों की तीर्थयात्रा का क्रम- लुम्बिनी, कपिलवस्तु, सारनाथ, श्रावस्ती, बौधगया एवं कुशीनगर था।

    दिव्यावदान के अनुसार बालपण्डित (समुद्र) नामक भिक्षु के प्रभाव के कारण अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाया एवं उपगुप्त ने अशोक को बौद्ध धर्म में दीक्षित किया।

    ➣ अशोक ने अपने शासन के दसवें वर्ष सर्वप्रथम बोध गया की यात्रा की। इसके बाद अपने अभिषेक के बीसवें वर्ष लुम्बिनी ग्राम गया।

    ➣ उसने लुम्बिनी ग्राम को कर मुक्त घोषित किया क्योंकि यह बुद्ध का जन्म स्थल था तथा केवल 1/8 भाग कर के रूप में लेने की घोषणा की।

    ➣ राज्याभिषेक के बीसवें वर्ष अशोक निगालीसागर भी गया तथा 14वें वर्ष कनकमुनि बुद्ध के स्तूप का दूसरी बार संवर्द्धन कर आकार दो गुना किया।

    भाब्रू शिलालेख में अशोक बुद्ध, धम्म तथा संघ के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त करता है। यह अशोक के बौद्ध होने का सबसे बड़ा प्रमाण है। इसमें 7 महत्वपूर्ण बौद्ध पुस्तकों की सूची दी गई है।

    ➣ अशोक को बौद्ध सिद्ध करने वाला दूसरा अभिलेख उसका शासनादेश है, जो सारनाथ, साँची तथा कौशाम्बी के लघु स्तम्भों पर उत्कीर्ण है।

    ➣ राज्याभिषेक से संबंधित लघु शिलालेख में अशोक ने अपने को बुद्धशाक्य (बुद्धोपासक) कहा है।

    तारानाथ ने अशोक का धर्म तान्त्रिक बौद्ध एवं उसे मातृदेवी का उपासक बताया है जबकि स्मिथ के अनुसार अशोक एक साथ भिक्षु एवं सम्राट दोनों था।

    बराबर की पहाड़ियों में अशोक ने आजीवकों के निवास हेतु चार गुफाओं का निर्माण कराया, जिनके नाम थे- कर्ण, चौपार, सुदामा तथा विश्व झोपड़ी।

    ➣ अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए लगभग 84,000 स्तूपों का निर्माण करवाया। जिसमे सबसे विख्यात साँची-स्तूप है। किन्तु कालांतर में पुष्यमित्र शुंग ने इन 84 हजार स्तूपों को नष्ट कर दिया।

    ➣ अशोक ने ना केवल दक्षिण भारत, बल्कि श्रीलंका, म्यांमार (बर्मा) और अन्य देशों में लोगों को बौद्ध धर्म में परिवर्तित करने के लिए अपने प्रचारक भेजे-

    धर्म प्रचारकदेश
    महेन्द्र और संघमित्राश्रीलंका
    महादेवमहिषमंडल (मैसूर)
    सोन और उत्तरासुवर्ण भूमि
    महाधर्मरक्षितमहाराष्ट्र
    मज्झन्तिककश्मीर व गांधार
    रक्षितवनवासी (कर्नाटक)
    धर्मरक्षितअपरातक
    महारक्षितयवन देश
    मज्झिमहिमालय देश

    अशोक का धम्म

    ➣ मौर्य काल में नास्तिक धर्मों की लोकप्रियता में वृद्धि हुई, जिसकी ब्राह्मण धर्म में कठोर प्रतिक्रिया हुई। परिणामस्वरूप सामाजिक वातावरण तनावपूर्ण हुआ। इस तनाव को अशोक ने धम्म से भरने की कोशिश की।

    ➣ अपनी प्रजा के नैतिक उत्थान के लिए अशोक ने जिन आचारों एवं नियमों की संहिता प्रस्तुत की है, उसे अभिलेखों में धम्म कहा गया है। अशोक ने धम्म की परिभाषा दीर्घ निकाय के राहुलोवाद सुत्त(सिंगालोवाद सुत) से ली है।

    ➣ अशोक का धम्म मूलतः उपासक बौद्ध धर्म था। जिसका चरम लक्ष्य स्वर्ग प्राप्ति था। रोमिला थापर के अनुसार अशोक के धम्म का उद्देश्य देश की राजनैतिक एकता की प्राप्ति था।

    ➣ अशोक का धम्म सभी धर्मों का मिश्रण है। धम्म की परिभाषा अशोक के 7वें स्तम्भ लेखों में मिलती है। उसने अपने धम्म की परिभाषा सामान्यत: राहुलोवाद सूत्त से ली थी।

    ➣ अपने सिंहासनारोहण के 12वें वर्ष अशोक ने निगाली सागर की धर्म यात्रा की। वहां उसने कनक मुनि के स्तूप का विस्तार किया।

    ➣ अशोक ने धम्म के प्रचार के लिए 13वें वर्ष में नये अधिकारी धम्म महामात्र की नियुक्ति की।

    प्रादेशिक, राजुक तथा युक्तों को प्रति पाँचवें वर्ष धर्म प्रचार हेतु यात्रा पर भेजा जाता था, जिसे अनुसंयान कहा गया है, जबकि उज्जैन एवं तक्षशिला में प्रति तीसरे वर्ष इन्हें यात्रा हेतु भेजा जाता था।

    ➣ उसके धम्म में अहिंसा, बड़ों का सम्मान, पशु वध पर रोक, सभी सम्प्रदायों में सहिष्णुता,खीले उत्सवों एवं कर्मकांडों पर रोक, ब्राह्मणों एवं श्रमणों के प्रति उदारता आदि शामिल थे।

    ➣ अशोक ने धम्म महामात्रों को महिला सहित विभिन्न सामाजिक समूहों में धर्म प्रचार के लिए नियुक्त किया और अपने साम्राज्य में न्याय लागू करने के लिए राजुका नियुक्त किए।

    ➣ अशोक ने धम्म के विचारों को प्रसारित करने के लिये सीरिया, मिस, ग्रीस तथा श्रीलंका आदि देशों में दूत भेजे। उल्लेखनीय है भारत से बाहर सर्वप्रथम बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार अशोक ने किया था।

    अशोक की उपाधियाँ

    उपाधिस्रोत
    1. अशोकमास्की लघु शिलालेख
    2. देवानांप्रियस अशोक राजागुर्जरा लघु शिलालेख
    3. अशोक मौर्यरूद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख
    4. पियदस्सि राजा बराबर गुहा लेख
    5. पियदस्सि राजा मगधभाब्रू बैराट लघु शिलालेख
    6. पियदस्सि राजाकंधार वृहत शिलालेख, दीपवंश, महावंश
    7. अशोकवर्द्धनपुराण
    8. राजा अशोकनेटूर लघु शिलालेख
    9. राजा अशोक देवानांप्रियउद्गोलम लघु शिलालेख

    अशोक के उत्तराधिकारी

    तीवर, कुणाल (धविवर्धन) एवं जालौक अशोक के पुत्र थे। संघमित्रा के अलावा उसकी चारुमति नामक पुत्री भी थी। चारुमति का विवाह नेपाल के क्षत्रिय देवपाल से हुआ था।

    1. कुणाल
    2. बन्धुपालित (कुणाल का पुत्र)
    3. इन्द्रपालित (बन्धुपालित का भाई)
    4. दशोन (बन्धुपालित का पौत्र)
    5. दशरथ (अशोक का पुत्र)
    6. सम्प्रति (दशरथ का पुत्र)
    7. शालिशूक
    8. देवधर्मन् (देववर्मा)
    9. शतधनुष (देवधर्मन् का पुत्र)
    10. बृहद्रथ (अन्तिम शासक)

    दिव्यावदान के अनुसार

    1. कुणाल
    2. सम्प्रति (कुणाल का पुत्र)
    3. बृहस्पति (सम्पति का पुत्र)
    4. वृषसेन (बृहस्पति का पुत्र)
    5. पुष्यधर्मन (वृषसेन का पुत्र)
    6. पुष्यमित्र (पुष्यधर्मन का पुत्र)
    कुणाल (232-224 ई.पू. )

    ➣ अशोक को मृत्यु के पश्चात उसके पुत्रों में कुणाल को गद्दी प्राप्त हुई। बौद्ध व् जैन ग्रंथों में कुणाल को विवर्धन’ (दिव्यावदान) तथा सुयशस (विष्ण व भागवतपुराण) भी कहा गया।

    ➣ कुणाल के अंधा होने के कारण मगध का प्रशासन उसके पुत्र सम्प्रति के नियंत्रण में था। इसीलिए बौद्ध व जैनगंथों में संपति को ही अशोक का उत्तराधिकारी माना गया है।

    जालौक : कश्मीर

    ➣ कल्हण की राजतरंगिणी के अनुसार कश्मीर का स्वतंत्र शासक अशोक का पुत्र जालौक था जिसने श्रीनगर बसाया।

    ➣ कुणाल के शासनकाल में पश्चिमोत्तर सीमा पर यवनो के आक्रमण होने लग गए। जिसे रोकने के लिए अशोक के द्वितीय पुत्र जालौक को भेजा गया।

    ➣ जालौक आक्रमणों को रोकने में सफल रहा। परन्तु उसने कश्मीर को साम्राज्य से अलग स्वंत्रत कर दिया और वहां शासन करने लगा।

    कुणाल के पश्चात मौर्य साम्राज्य पश्चिमी और पूर्वी दो भागों में विभाजित हो गया। पश्चिमी भाग पर सम्प्रति का शासन था, जिसकी राजधानी उज्जयिनी थी। जबकि पूर्वी भाग पर दशरथ (अशोक का पौत्र) का शासन था, जिसकी राजधानी पाटलिपुत्र थी।

    दशरथ (224-216 ई.पू.)

    वायुपुराण के अनुसार कुणाल के बाद उसका पुत्र बंधुपालित राजा बना, लेकिन मत्स्यपुराण के अनुसार दशरथ राजा बना।

    ➣ दशरथ के अभिलेख नागार्जुनी पहाड़ी (बराबर की पहाड़ी, गया, बिहार) से प्राप्त हुए हैं। उसने पितामह अशोक के समान ही देवानामप्रिय को उपाधि ग्रहण की थी।

    ➣ दशरथ ने नागार्जुनी पहाड़ी में लोमश ऋषि की गुफा एवं गोपिका गुफा दो गुफाएं आजीवकों को दान में दी थी।

    संप्रति (216-207 ई.पू.)

    ➣ अशोक के उत्तराधिकारियों में संप्रति सबसे योग्य शासक साबित हुआ।

    ➣ संप्रति अपने पिता कुणाल तथा दशरथ के शासनकाल में ही राजकाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चूका था।

    ➣ संपति जैन मतानुयायी था। सम्प्रति ने जैन तीर्थकरों के हजारों मंदिरों का निर्माण कराया। उसने सुहास्तिन मुनि के प्रभाव में आकर जैन धर्म स्वीकार कर लिया था।

    ➣ अपने अंत समय में सम्प्रति ने भी चंद्रगुप्त मौर्य की तरह एक जैन की भांति श्रवणबेलगोला में सल्लेखन करते हुए प्राण त्याग दिये।

    शालिशूक (207-206 ई.पू.)

    ➣ संप्रति के बाद शालिशक या शालिशूक राजा बना। उसका दूसरा नाम बृहस्पति भी मिलता है।

    ➣ वह संप्रति का पुत्र था। उसने सुभगसेन उपाधि धारण की थी।

    ➣ शालिशुक को गार्गी संहिता में अधार्मिक, धूर्त एवं झगड़ालू तथा यज्ञों का अनुष्ठान रोकने वाला कहा गया है।

    ➣ उसके शासनकाल में साम्राज्य में अव्यवस्था और अशांति व्याप्त हो गई। इस अव्यवस्था का लाभ उठा कर राजकुमार वृषसेन ने सामान्य के उत्तर-पश्चिमी भाग में स्वतंत्र राज्य की स्थापना कर लिया।

    ➣ इसी समय उत्तर-पश्चिमी सीमा पर यवनों ने एण्टियोकस के नेतृत्व में हमला कर दिया। गार्गीसहिता के अनुसार यवनों ने मथुरा, पांचाल व साकेत पर अधिकार कर लिया था।

    अन्य उत्तराधिकारी

    ➣ शालिशूक के पश्चात् देववर्मा, शतधनुष, बृहद्रव क्रमवार शासक हुए।

    ➣ देववर्मा के समय में ही बैक्ट्रिया के यवन शासक डिपेट्रियस ने 200 ई.पू. में भारत पर आक्रमण कर उत्तर के कुछ क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया।

    ➣ मौर्यवंश का अंतिम शासक बृहद्रथ (191-187 ई.पू.) था। वह एक अयोग्य शासक साबित हुआ। वह सारा समय वह भोग विलास में व्यतीत करता था।

    ➣ इसका लाभ कर बृहद्रथ के सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने उसकी हत्या कर सत्ता प्राप्त कर लिया और मौर्यवंश का अंत कर दिया।

    ➣ अब इसके पश्चात मगध पर मौयों के स्थान पर ब्राह्मणीय वंश शुंग का शासन प्रारम्भ हुआ।

    साम्राज्य के पतन के कारण

    ब्राह्मणों की प्रतिक्रिया

    ➣ अशोक पहले शैव धर्म का उपासक था। परन्तु कलिंग युद्ध के उपरांत उसने बौद्ध धर्म अपना लिया था। फलस्वरूप उसने पशु-पक्षियों की हत्या पर प्रतिबन्ध लगा दिया और महिलाओं द्वारा मनाए जाने वाले अनुष्ठानों की निन्दा की।

    ➣ अशोक द्वारा बौद्ध धर्म के बलि-विरोध के अनुपालन ने ब्राह्मणों की आय को प्रभावित किया। ग्रामीण इलाकों को नियन्त्रित करने तथा वहाँ व्यवहारसमता और दण्डसमता लागू करने के लिए राजुकों को नियुक्त किया गया। इसका तात्पर्य था कि सभी वर्गों के लिए समान अपराध के लिए समान दण्ड।

    ➣ क्योंकि ब्राह्मणों द्वारा संकलित धर्मशास्त्रों में वर्ण के आधार पर इसमे काफी भेदभाव था। इसलिए अशोक की नीति ने ब्राह्मणों को नाराज किया।

    ➣ मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद कुछ अन्य साम्राज्य पर ब्राह्मणों ने शासन किया। शुंग और कण्व, जिन्होंने मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद मध्य प्रदेश और पूर्व की ओर शासन किया, ब्राह्मण थे।

    ➣ इसी तरह, सातवाहनों ने, जिसने पश्चिमी दक्कन और आन्ध्र में साम्राज्यों की स्थापना की, ब्राह्मण होने का दावा करते थे।

    ➣ इन ब्राह्मण राजवंशों ने वैदिक यज्ञ को पुनः प्रारम्भ किया जो अशोक द्वारा उपेक्षित कर दिया गया था।

    वित्तीय संकट

    ➣ मौर्य साम्राज्य अपने काल का सबसे विशालकाय साम्राज्य था। प्राचीन समय में मौर्य के पास सबसे बड़ी सेना और अधिकारियों का सबसे बड़ा संगठन था। फलत: इसके संचालन ने मौर्य साम्राज्य के लिए वित्तीय संकट पैदा कर दिया।

    ➣ अशोक ने बौद्ध भिक्षुओं को बहुत दान दिए, जिसका असर शाही खजाने पर पड़ा। अन्त में, इन खर्चों के निर्वहन के लिए, वे सोने की मूर्तियों को पिघलाने के लिए तक बाध्य हुए।

    चीन की महान दीवार तथा विदेशी आक्रमण

    ➣ अशोक मुख्यत: देश और विदेश में धर्म प्रचार में व्यस्त रहते थे, वे उत्तर-पश्चिमी सीमा की तरफ दर्रों की सुरक्षा पर ध्यान देने में असमर्थ थे।

    तीसरी शताब्दी ई.पू. में मध्य एशिया सिथियन निरन्तर बढ़ रहे थे। वे चीन और भारत में स्थापित साम्राज्य के लिए खतरे की घण्टी थे।

    ➣ चीनी शासक सिं हुआंग ती (247-10ई.पू.) ने 220 ई.पू. में सिथियन के आक्रमण से बचने के लिए चीन की महान दीवार का निर्माण किया जबकि अशोक ने ऐसा कुछ नहीं किया।

    ➣ फलस्वरूप सीथियन भारत की ओर बढ़ने लगे , उन्होंने पार्थियन, शक और यूनान को भारतीय उपमहाद्वीप की तरफ बढ़ने पर मजबूर कर दिया। यूनानियों ने उत्तर अफगानिस्तान में एक राज्य स्थापित किया । जिसे बैक्ट्रिया कहा जाता था।

    ➣ उन्होंने सबसे पहले 206 ई.पू. में भारत पर आक्रमण किया। इसके बाद भारत कई आक्रमण हुए जो इस्वी सन् तक चले।

    ➣ 185 ई.पू.में, पुष्यमित्र शुंग ने मौर्य साम्राज्य को पूरी तरह बर्बाद कर दिया। वह एक ब्राह्मण था। जो मौर्य साम्राज्य के अन्तिम शासक बृहद्रथ के सेनापति था। उसने ब्राह्मणों को बढ़ावा दिया तथा बौद्धों का कत्ले आम किया। उनके बाद कण्व आए, वे भी ब्राह्मण थे।

    ➣ इतिहासकारों ने मौर्य साम्राज्य के पतन के निम्नलिखित कारण बताए हैं –

    डी.एन, झा साम्राज्य के दुर्बल उत्तराधिकारी
    महामहोपाध्याय अशोक की धार्मिक नीति
    रोमिला थापर शासन में केंद्रीयकरण की प्रधानता
    कौसाम्बी उत्तरकालीन मौर्यों की संकटपूर्ण अर्थव्यवस्था
    हरप्रसाद शास्त्री व हेमचंद्र राय चौधरी अशोक की शांति प्रियता और अहिंसक नीति

    सम्बंधित प्रश्न

    ➣ अपने गुरू चाणक्य की सहायता से अंतिम नंद शासक घनानंद को पराजित कर 25 वर्ष की आयु में किसने मौर्य साम्राज्य की स्थापना की?- चंद्रगुप्त मौर्य

    ➣ अशोक के अभिलेखों के अतिरिक्त किस शक महाक्षत्रप का जूनागढ़ (गिरनार) लेख मौर्य इतिहास के विषय में सूचनाएं प्रदान करता है?- रूद्रदामन

    ➣ यूनानी लेखक चंद्रगुप्त मौर्य के लिए किस नाम का उल्लेख करते हैं?- एंड्रोकोटस या सैंड्रोकोटस

    ➣ सैंड्रोकोटस से चंद्रगुप्त की पहचान किसने की है?- विलियम जोन्स

    ➣ चंद्रगुप्त की सेना को ‘डाकुओं का गिरोह’ कौन कहता है?- जस्टिन

    ➣ किस शासक ने व्यापक विजयों द्वारा प्रथम अखिल भारतीय साम्राज्य की स्थापना की? चंद्रगुप्त मौर्य ने छः लाख की सेना लेकर सम्पूर्ण भारत को रौंद डाला यह कथन किस यूनानी लेखक का है – प्लूटाक

    ➣ सेल्युकस निकेटर ने अपनी किस पुत्री का विवाह चंद्रगुप्त से करके उपर्युक्त चारो प्रांत दहेज के रूप में दिये- लेडी हेलेना/कार्नेलिया

    ➣ सेल्युकस निकेटर ने किसको अपने राजदूत के रूप में चंद्रगुप्त के दरबार में भेजा?- मेगस्थनीज

    ➣ चंद्रगुप्त मौर्य के जीवन निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान किसका रहा- चाणक्य।

    ➣ चाणक्य इतिहास में अन्य किन दो नामों से जाना जाता है- विष्णुगुप्त तथा कौटिल्य

    ➣ चाणक्य ने किस कृति की रचना की, जिसमें 15 अधिकरण, 180 प्रकरण और करीब 6,000 श्लोक हैं जो तत्कालीन राजनीति, अर्थनीति, इतिहास, आचरणशास्त्र, धर्म आदि पर भली- भांति प्रकाश डालते हैं? – अर्थशास्त्र

    ➣ मेगस्थनीज ने अपनी पुस्तक इंडिका में किसके शासनकाल का वर्णन किया है- चंद्रगुप्त मौर्य

    ➣ किसने मेगस्थनीज के वृतान्त को पूर्णतया असत्य एवं अविश्वसनीय कहा है? – स्ट्रेम्बो

    ➣ चंद्रगुप्त मौर्य की दक्षिण भारत की विजय के विषय में जानकारी अशोक के अभिलेखों के अलावा किन तमिल ग्रंथों से मिलती है- ‘अहनानूर’ एवं ‘पुरनानूर’

    ➣ किस अभिलेख से बंगाल पर चंद्रगुप्त की विजय के बारे में पता चलता है? – महास्थान

    ➣ मेगस्थनीज ने कहा था कि भारत के लोग यूनानी देवता डायोनिसियस तथा हेराक्लीज की पूजा करते थे। इन दोनों यूनानी देवताओं की साम्यता किस हिन्दू देवों से पायी जाती है? – क्रमशः शिव तथा कृष्ण

    ➣ मौर्य शासनकाल के दौरान केन्द्रीय न्यायालय अथवा सर्वोच्च न्यायालय कहां स्थित था? – पाटलिपुत्र

    ➣ जैन लेखों के अनुसार, चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल के अंत में मगध को कितने वर्षों तक भीषण अकाल झेलना पड़ा? – 12 वर्षों तक

    ➣ जब मगध में 12 वर्ष का दुर्भिक्ष पड़ा तब सिंहासन छोड़ने के पश्चात चंद्रगुप्त मौर्य ने किस जैनमुनि से जैन धर्म की दीक्षा ली?- भद्रबाहु

    ➣ चंद्रगुप्त मौर्य ने 298 ई.पू. में उपवास द्वारा समाधिस्थ होकर किस स्थान पर शरीर का त्याग किया- श्रवणबेलगोला (मैसूर)

    ➣ चंद्रगुप्त मौर्य ने 24 वर्षों तक शासन करने के बाद अपने किस पुत्र को सिंहासन पर बैठाया?- बिंदुसार

    ➣ मौर्य काल में लिया जाने वाला कर ‘बलि’ किस प्रकार का कर था?- धार्मिक कर

    ➣ मौर्य काल में तीन भाषाओं का प्रचलन था- संस्कृत, प्राकृत और पालि।

    ➣ अशोक ने इनमें से किसको सम्पूर्ण साम्राज्य की राजभाषा बनाया और इसी भाषा में अपने अभिलेख उत्कीर्ण कराए? – पालि को

    ➣ मौर्य प्रशासन में सिक्कों की जांच करने वाले अधिकारी को क्या कहा जाता था?- रूपदर्शक

    ➣ मौर्य साम्राज्य की राजकीय मुद्रा चांदी से निर्मित थी, जिसका भार 3/4 तोले के बराबर था। इस राजकीय मुद्रा को क्या कहा जाता था? – पण

    ➣ मौर्य काल की अर्थव्यवस्था में किस शब्द का प्रयोग समुद्री मार्गों के लिए किया जाता था? – संयानपथ

    ➣ ब्राह्मणों को राज्य की ओर से कर मुक्त भूमि दान में दी जाती थी। इसे क्या कहा जाता था?- ब्रह्मदेय

    ➣ किस मौर्य शासक के समय में कश्मीर के श्रीनगर और नेपाल के ललितपाटन नामक नगरों का निर्माण हुआ?- अशोक

    ➣ पत्थर पर शीशे की तरह चमकीली पॉलिश लगाने की कला मौर्य कलाकारों ने किससे सीखी थी? – हखामनियों से

    ➣ मौर्य काल में किस जाति के विद्रोहियों को जल में डुबोकर मृत्युदंड दिया जाता था? – ब्राह्मण

    ➣ सांची का विशाल स्तूप किस के समय को निर्धारित करता है? – मौर्यों के समय को

    ➣ कुम्हरार का पुरातात्विक स्थल किसके राजप्रासाद से सम्बद्ध है?- मौर्यों के

    ➣ मैक्यावेली के ‘द प्रिंस’ की तुलना किस भारतीय ग्रंथ से की जा सकती है?- कौटिल्य के अर्थशास्त्र से

    ➣ मौर्यकाल के लोक सेवकों को आम तौर पर क्या कहा जाता था?- अमात्य

    ➣ अशोक के अधीन मौर्य राजतंत्र का शासन कैसा था? प्रबुद्ध स्वेच्छाचारी शासन अशोक के धर्मचक्र (या धम्मचक्र) में कितनी तीलियां (ओर) अंकित हैं? – 24

    ➣ विशाखदत्त ने अपने सुप्रसिद्ध नाटक ‘मुद्मराक्षस’ में किस मौर्य सम्राट का विशिष्ट रूप से वर्ण उपलब्ध है?- चंद्रगुप्त मौर्य

    ➣ अशोक का समकालीन तुरमय कहां का राजा था?- मिस्र

    ➣ पत्थर पर प्राचीनतम शिलालेख किस भाषा में थे?- प्राकृत

    अशोक की विश्व को सन्देश

    ➣ अशोक ने सर्वप्रथम विश्व की जीओ और जीने दो व राजनीतिक हिंसा धर्म विरुद्ध है का सन्देश दिया।

    ➣ इतिहास में अशोक को महान सम्राट , से संबोंधित किया जाता है क्योंकि यह पहला ऐसा सम्राट था जिसने शस्त्र त्याग कर अध्यात्मिक मार्ग अपना लिया

    ➣ संभवत अकबर को भी महान कहा गया है , बैरम खां जो की उसका संरक्षक रहा उसकी मृत्यु के बाद अकबर में काफी परिवर्तन आया उसने अपने समकालीन धार्मिक आन्दोलन को बढ़ावा दिया इसमें उसका सबसे महतवपूर्ण कार्य जजिया कर समाप्ति का उल्लेख मिलता है जिससे उसके आध्यात्मिकता में रूचि के बारे में पता चलता है हालाँकि उसने शस्त्रों का त्याग नहीं किया उसने अपने साम्राज्य विस्तार की नीति का अनुकरण किया

  • मौर्य काल और मौर्योत्तर काल MCQ प्रश्न | SSC

    1. चन्द्रगुप्त मौर्य के बाद मौर्य सिंहासन पर निम्नलिखित में से कौन बैठा था ?
    (a) बिबिसार
    (b) अशोक
    (c) बिंदुसार
    (d) विष्णुगुप्त
    S.S.C. (लोअर डिवीजन क्लर्क) परीक्षा, 2005
    उत्तर-(c)
    चन्द्रगुप्त मौर्य के बाद मौर्य सिंहासन पर बिंदुसार बैठा था।
    2.यूनानियों को भारत से बाहर किसने निकाला था?
    (a) चंद्रगुप्त मौर्य
    (b) चंद्रगुप्त विक्रमादित्य
    (c) अशोक
    (d) बिंदुसार
    S.S.C. स्टेनोग्राफर परीक्षा, 2011
    उत्तर-(a)
    यूनानियों को भारत से बाहर निकालने का श्रेय चंद्रगुप्त मौर्य को जाता है। 305 ई. पू. में यूनानी शासक सेल्यूकस और चंद्रगुप्त मौर्य के मध्य हुए युद्ध के उपरान्त हुई संधि के फलस्वरूप सेल्यूकस ने चंद्रगुप्त मौर्य के साथ अपनी पुत्री के विवाह में दहेज के रूप में एरिया, अराकोसिया, जेड्रोसिया और पेरीपेमिसदाई के क्षेत्रों को दिया था।
    3. अशोक के अधीन मौर्य राजतंत्र का सबसे सही वर्णन निम्नलिखित में से कौन-सा होगा ?
    (a) प्रबुद्ध स्वेच्छाचारी शासन
    (b) केन्द्रीकृत एकाधिपत्य
    (c) प्राच्य स्वेच्छाचारी शासन
    (d) निर्देशित लोकतंत्र
    S.S.C. Tax Asst. परीक्षा, 2006
    उत्तर-(b)
    अशोक के अधीन मौर्य राजतंत्र केन्द्रीकृत शासन के आधिपत्य पर आधारित था।
    4. अशोक की प्रशासनिक नीति में भारी परिवर्तन किस घटना से आया ?
    (a) तीसरी बौद्ध परिषद्
    (b) कलिंग युद्ध
    (c) उसका बौद्ध धर्म को अपनाना
    (d) सीलोन को उसका मिशनरी भेजना
    S.S.C. Tax Asst. परीक्षा, 2009
    उत्तर-(b)
    अशोक की प्रशासनिक नीति में भारी परिवर्तन ‘कलिंग युद्ध की घटना के बाद आया| कलिंग युद्ध के बाद ही अशोक द्वारा ‘भेरी घोष’ की नीति का त्याग कर ‘धम्म घोष’ की नीति को अपनाया गया।
    5.निम्नोक्त में से कौन मौर्य वंश का अंग नहीं था ?
    (a) अजातशत्रु
    (b) बिंदुसार
    (c) चन्द्रगुप्त मौर्य
    (d) इनमें से कोई नहीं
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2000
    उत्तर-(a)
    अजातशत्रु मौर्य वंश का शासक नहीं था इसका संबंध हर्यक वंश से है। हर्यक वंश का संस्थापक बिंबिसार था और अजातशत्रु इसका पुत्र था।
    6.निम्नलिखित में से प्राचीनतम राजवंश कौन सा है?
    (a) मौर्य
    (b) गुप्त
    (c) कुषाण
    (d) कण्व
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 2001
    उत्तर-(a)
    दिए गए राजवंशों में प्राचीनतम मौर्य राजवंश (322-185 ई.पू.) है, जिसकी स्थापना चन्द्रगुप्त मौर्य ने 322 ई.पू. में कौटिल्य की सहायता से की थी। महान सम्राट अशोक इसी राजवंश का था। कण्व राजवंश 75 ई. पू. 30 ई. पू. तक कुषाण राजवंश 15 ई.- 230 ई. तक तथा गुप्त राजवंश 319 ई. से 550 ई. तक था।
    7.निम्नलिखित में से वह व्यक्ति कौन है जिसका नाम ‘देवानाम पियदर्शी’ था ?
    (a) मौर्य राजा अशोक
    (b) मौर्य राजा चन्द्रगुप्त मौर्य
    (c) गौतम बुद्ध
    (d) भगवान महावीर
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 2002, 2012
    उत्तर-(a)
    मौर्य सम्राट अशोक के अभिलेखों उसे ‘देवानांपिय देवानामपियदर्शी तथा राजा’ आदि की उपाधियों से सम्बोधित किया गया है। मास्की, गुर्जरा, निट्ठर तथा उदेगोलम लेखों में उसका नाम ‘अशोक’ मिलता है तथा पुराणों में उसे अशोक वर्धन’ कहा गया है।
    8.कलिंग युद्ध के बाद निम्न में से किसने महाराज अशोक के रूपांतरण को दर्ज किया ?
    (a) रॉक एडिक्ट II
    (b) रॉक एडिक्ट IV
    (c) रॉक एडिक्ट VI
    (d) रॉक एडिक्ट XIII
    S.S.C. संयुक्त हायर सेकण्डरी (10+2) स्तरीय परीक्षा, 2012
    उत्तर-(d)
    तेरहवें शिलालेख से कलिंग युद्ध के सन्दर्भ में स्पष्ट साक्ष्य मिलते हैं। यह घटना अशोक के शासनकाल के 8वें वर्ष अर्थात 261 ई.पू. में घटित हुई। इस शिलालेख में उसने कलिंग युद्ध से हुई पीड़ा पर दुःख और पश्चाताप व्यक्त किया है।
    9. निम्नलिखित में से किस विदेशी यात्री ने भारत का दौरा सबसे पहले किया था ?
    (a) ह्वेनसांग
    (b) मेगस्थनीज
    (c) इत्सिंग
    (d) फाह्यान
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2002
    उत्तर-(b)
    दिए गए विकल्पों में से मेगस्थनीज सर्वप्रथम भारत आया था। मेगस्थनीज यूनानी शासक सेल्यूकस निकेटर का राजदूत था, जो चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में आया था। इसने अपनी पुस्तक ‘इण्डिका’ में मौर्य युगीन समाज एवं प्रशासन के विषय में लिखा है।
    10. चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में भेजा गया यूनानी राजदूत था –
    (a) कौटिल्य
    (b) सेल्यूकस निकेटर
    (c) मेगस्थनीज
    (d) जस्टिन
    S.S.C. संयुक्त स्नातक स्तरीय परीक्षा, 2011
    उत्तर-(c)
    उपर्युक्त प्रश्न की व्याख्या देखें।
    11. ‘इंडिका’ किसने लिखी ?
    (a) आई-त्सिंग
    (b) मैगस्थनीज़
    (c) फाह्यान
    (d) ह्वेनसांग
    S.S.C. मल्टी टॉस्किंग (M.T.S.) परीक्षा, 2013
    उत्तर-(b)
    उपर्युक्त प्रश्न की व्याख्या देखें।
    12. निम्नलिखित में सम्राट अशोक की यह पत्नी कौन थी जिसने उसको प्रभावित किया था ?
    (a) चंदालिका
    (b) चारुलता
    (c) गौतमी
    (d) करुवाको
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2002
    उत्तर-(d)
    करुवाकी से अशोक बहुत प्रभावित था। अशोक की यही एक मात्र पत्नी है जिसका उल्लेख कौशाम्बी स्तम्भ लेख में मिलता है।
    13. अशोक ने किस बौद्ध साधु से प्रभावित होकर बौद्ध धर्म अपनाया ?
    (a) विष्णुगुप्त
    (b) उपगुप्त
    (c) ब्रह्मगुप्त
    (d) बृहद्रथ
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा 2010
    उत्तर-(b)
    सिंहली अनुश्रुतियों दीपवंश एवं महावंश के अनुसार अशोक को उसके शासन के चौथे वर्ष निग्रोध नामक भिक्षु ने बौद्ध धर्म में दीक्षित किया। दिव्यावदान अशोक को बौद्ध धर्म में दीक्षित करने का श्रेय उपगुप्त नामक बौद्ध भिक्षु को देता है।
    14.निम्नलिखित में से किस शासक के शासन काल में नेपाल में बौद्ध धर्म का आगमन हुआ था?
    (a) समुद्रगुप्त
    (b) अशोक
    (c) चन्द्रगुप्त
    (d) हर्षवर्धन
    .
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2002
    उत्तर-(b)
    अशोक के शासन काल में नेपाल में बौद्ध धर्म का आगमन हुआ था।निग्लीवा या निगालि सागर स्तम्भ लेख से पता चलता है कि अशोक अपने राज्याभिषेक के 12वें वर्ष निगालि सागर आया और यहां कनकमुनि ( एक पौराणिक बुद्ध) के स्तूप को सम्बर्द्धित एवं के द्विगुणित करवाया।
    15. चन्द्रगुप्त मौर्य का प्रसिद्ध गुरु चाणक्य निम्नलिखित में से किस विद्या केन्द्र से संबंधित था ?
    (a) तक्षशिला
    (b) नालन्दा
    (c) विक्रमशिला
    (d) वैशाली
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2008
    उत्तर-(a)
    चन्द्रगुप्त मौर्य का प्रसिद्ध गुरु चाणक्य तक्षशिला विद्या केन्द्र से संबंधित था।
    16. कलिंग युद्ध किस वर्ष में हुआ था ?
    (a) 261BC
    (b) 263 BC
    (c) 232 BC
    (d) 240 BC
    S.S.C. संयुक्त हायर सेकण्डरी (10+2) स्तरीय परीक्षा, 2011
    उत्तर-(a)
    अशोक ने अपने राज्याभिषेक (269 ई.पू.) के आठवें वर्ष अर्थात 261 ई.पू. में कलिंग पर आक्रमण किया था। इसका स्पष्ट साक्ष्य अशोक के तेरहवें शिलालेख में मिलता है।
    17. अशोक पर कलिंग युद्ध का प्रभाव कहां दिखाई देता है?
    (a) स्तंभों पर उत्कीर्ण राज्यादेश
    (b) शिलाओं पर उत्कीर्ण 13वें राज्यादेश
    (c) खुदाई
    (d) इनमें से कोई नहीं
    S.S.C. मल्टी टॉस्किंग (M.T.S.) परीक्षा, 2013
    उत्तर-(b)
    उपर्युक्त प्रश्न की व्याख्या देखें।
    18. मौर्य काल के दौरान शिक्षा का सबसे प्रसिद्ध केंद्र निम्न में से कौन-सा था ?
    (a) उज्जैन
    (b) वल्लभी
    (c) नालंदा
    (d) तक्षशिला
    S.S.C. संयुक्त हायर सेकण्डरी (10+2) स्तरीय परीक्षा, 2012
    उत्तर-(d)
    मौर्य काल में शिक्षा का सर्वाधिक प्रसिद्ध केंद्र तक्षशिला था। यहां विश्व भर से लोग पढ़ने आते थे। यह वर्तमान इस्लामाबाद ( पाकिस्तान की राजधानी) से कुछ ही दूरी पर पश्चिम में स्थित है। चन्द्रगुप्त मौर्य ने सैनिक शिक्षा तक्षशिला से प्राप्त किया था। चाणक्य यहां का प्रसिद्ध आचार्य भी था।
    19. अशोक ने अपने सभी अभिलेखों में एकरूपता से किस प्रकृत भाषा का प्रयोग किया है?
    (a) अर्ध मगधी
    (b) शूरसेनी
    (c) मगधी
    (d) अंगिका
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2000
    उत्तर-(a)
    अशोक के अभिलेखों को पढ़ने में सबसे पहली सफलता 1837 ई. में जेम्स प्रिंसेप को मिली थी। राजा अशोक ने सर्वप्रथम भारत में शिलालेख का प्रचलन आरंभ किया। इस शिलालेख में ब्राह्मी, खरोष्ठी, ग्रीक एवं अरमाइक लिपि का प्रयोग हुआ है। अशोक के स्तम्भ-लेखों की संख्या 7 है। अशोक ने अपने अधिकांश अभिलेखों में अर्थ- मगधी प्राकृत का प्रयोग किया था।
    20.अर्थशास्त्र की रचना किसने की थी ?
    (a) घनानंद
    (b) कौटिल्य
    (c) बिंबिसार
    (d) पुष्यमित्र
    S.S.C. CPO परीक्षा, 2011
    उत्तर-(b)
    प्रसिद्ध ग्रंथ अर्थशास्त्र की रचना कौटिल्य (चाणक्य) ने की थी। मूलतः राजनीति शास्त्र के इस ग्रंथ से मौर्यकालीन प्रशासन के साथ-साथ तत्कालीन सामाजिक आर्थिक स्थिति की भी जानकारी प्राप्त होती है।
    21. निम्न में किसने और कब, पहली बार अशोक के शिलालेखों का अर्थ स्पष्ट किया था ?
    (a) 1810 – हैरी स्मिथ
    (b) 1787 जान टावर
    (c) 1825- चार्ल्स मेटकाफ
    (d) 1837- जेम्स प्रिंसिप
    S.S.C. संयुक्त हायर सेकण्डरी (10+2) स्तरीय परीक्षा, 2012
    उत्तर-(d)
    सर्वप्रथम 1837 ई. में जेम्स प्रिंसिप नामक विद्वान ने अशोक के शिलालेखों को पढ़ा था जबकि सबसे पहले 1750 ई. में टीफेन थेलर महोदय द्वारा खोजा गया अभिलेख दिल्ली-मेरठ अभिलेख था। प्रसिद्ध इतिहासकार डी. आर. भण्डारकर महोदय ने तो मात्र अभिलेखों के आधार पर अशोक का इतिहास लिखने का प्रयास किया है।
    22. राजतंत्र के बारे में निम्न में से किस ग्रंथ में विवेचन उपलब्ध है?
    (a) धर्मशास्त्र
    (b) न्यायशास्त्र
    (c) अर्थशास्त्र
    (d) नीतिशास्त्र
    S.S.C. CPO परीक्षा, 2003
    उत्तर-(c)
    कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कुल 15 अधिकार व (भाग), 180 प्रकरण (उपभाग) तथा 6000 श्लोक हैं। राजतंत्र के बारे में अर्थशास्त्र नामक ग्रंथ में विवेचन उपलब्ध है।
    23. निम्नलिखित में से किसके द्वारा तृतीय बौद्ध परिषद् को संरक्षण प्रदान किया गया था ?
    (a) कनिष्क
    (b) अशोक
    (c) महाकश्यप उपालि
    (d) सवाकरनी
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2002
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 2005
    उत्तर-(b)
    महात्मा बुद्ध की मृत्यु के 236 वर्ष बाद 247 ई. पूर्व में पाटलिपुत्र के अशोकाराम विहार में अशोक के शासनकाल में तृतीय बौद्ध संगीति आयोजित हुई। इसमें अभिधम्म नामक तीसरा पिटक जोड़ दिया गया तथा इस पिटक का ग्रन्थ कथावस्तु का संकलन किया गया। इस संगीति में स्थविर सम्प्रदाय का ही बोलबाला था।
    24. बिंदुसार ने विद्रोहियों ( Rebellion) को कुचलने के लिए अशोक को कहां भेजा ?
    (a) स्वर्णगिरि
    (b) तक्षशिला
    (c) उज्जैन
    (d) तोशालि
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 1999
    उत्तर-(b)
    बिंदुसार 298 ई. में मगध का राजा बना था। इन्हें ‘अमित्रघात’ के नाम से जाना जाता था। वायुपुराण में इन्हें ‘भद्रसार’ कहा गया है। तथा जैन ग्रंथों में सिंहसेन’ कहा गया है। बिंदुसार ‘आजीवक’ सम्प्रदाय का अनुयायी था। बिंदुसार के शासनकाल के दौरान तक्षशिला में हुए विद्रोह को कुचलने के लिए अशोक को भेजा गया था।
    25. मौर्य वंश के तत्काल बाद किस वंश ने आकर मगध राज्य पर शासन किया?
    (a) सातवाहन
    >
    (b) शुंग
    (c) नंद
    (d) कण्व
    S.S.C. संयुक्त हायर सेकण्डरी (10+2) स्तरीय परीक्षा, 2013
    उत्तर-(b)
    अंतिम मौर्य सम्राट बृहद्रथ की हत्या करके पुष्यमित्र शुंग द्वारा 184 ई. पू. में शुंग वंश की स्थापना की गयी।
    2.मिलिंदपान्हो क्या है ?
    (a) बौद्ध स्थल
    (b) बुद्ध का एक नाम
    (c) कला का बौद्ध नाम
    (d) बौद्ध पाठ
    S.S.C. संयुक्त स्नातक स्तरीय (Tier-I) परीक्षा, 2013
    उत्तर-(d)
    मिलिंदपान्हो एक बौद्ध पाठ या ग्रंथ है जो इण्डोन्ग्रीक शासक मिनेण्डर एवं बौद्ध भिक्षु नागसेन के संवाद के रूप में रचित है।
    3.भारतीयों के लिए महान् ‘सिल्क मार्ग’ किसने आरम्भ कराया ?
    (a) कनिष्क
    (b) अशोक
    (c) हर्ष.
    (d) फाह्यान
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 1999
    उत्तर-(a)
    चूंकि पार्थियनों के रोम से संबंध अच्छे नहीं थे, इसलिए चीन से व्यापार करने के लिए रोम को कुषाणों से मधुर संबंध बनाने पड़े। यह व्यापार महान ‘सिल्क मार्ग’ या रेशम मार्ग से सम्पन्न होता था। इस मार्ग को आरंभ कराने का श्रेय कनिष्क को दिया जाता है।
    4.निम्नलिखित में से कनिष्क के समकालीन कौन थे?
    (a) कंबन, बाणभट्ट, अश्वघोष
    (b) नागार्जुन, अश्वघोष, वसुमित्र
    (c) अश्वघोष, कालिदास, बाणभट्ट
    (d) कालिदास, कंबन, वसुमित्र
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 2002
    उत्तर-(b)
    अश्वघोष, नागार्जुन तथा वसुमित्र को कुषाण शासक कनिष्क का संरक्षण प्राप्त था। अश्वघोष, कनिष्क के राजकवि थे। चतुर्थ बौद्ध संगीति की अध्यक्षता वसुमित्र ने की थी। शून्यवाद का प्रतिपादन नागार्जुन ने किया था।
    5. भारतीय रंगमंच में यवनिका (पर्दा) का शुभारंभ किसने किया?
    (a) शकों
    (b) पार्थियनों
    (c) यूनानियों
    (d) कुषाणों
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 2000
    उत्तर-(c)
    संस्कृत नाटकों में पर्दे के लिए ‘यवनिका’ शब्द आता है, जो यूनानी भाषा से लिया गया है। भारतीय रंगमंच में यवनिका का शुभारंभ यूनानियों ने किया था।
    6.किस व्यक्ति को द्वितीय अशोक’ कहा जाता है ?
    (a) समुद्रगुप्त
    (b) चन्द्रगुप्त मौर्य
    (c) कनिष्क
    (d) हर्षवर्धन
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 1999
    उत्तर-(c)
    कुषाण शासक कनिष्क को द्वितीय अशोक कहा जाता है।
    7.चरक किसके राज-चिकित्सक थे ?
    (a) हर्ष
    (b) चन्द्रगुप्त मौर्य
    (c) अशोक
    (d) कनिष्क
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2001
    S.S.C. (डाटा एंट्री आपरेटर) परीक्षा, 2009
    उत्तर-(d)
    चरक कनिष्क के राज चिकित्सक थे। इन्हें चिकित्सा का जनक’ कहा जाता है। इन्हें चिकित्सा की प्रत्येक विधा पर समान अधिकार था। इन्होंने चिकित्साशास्त्रीय ग्रंथ ‘चरक संहिता’ की रचना की।
    8.गांधार कला किस काल में विकसित हुई थी?
    (a) गुप्त काल में
    (b) मौर्य काल में
    (c) सातवाहनों के काल में
    (d) कुषाण काल में
    S.S.C. CPO परीक्षा, 2004
    उत्तर – (d)
    गांधार कला कुषाण काल में विकसित हुई थी। गांधार कला की विषय-वस्तु भारतीय थी, परंतु कला शैली यूनानी और रोमन थी। इसलिए गांधार कला को ग्रीको-रोगन, ग्रीको बुद्धिस्ट या हिन्दू- यूनानी कला भी कहा जाता है। सर्वप्रथम गांधार नामक स्थान परइसके प्रकट होने के कारण इसे गांधार कला कहा जाता है।
    9.कुषाण काल में भारतीय और ग्रीक शैली के मिश्रण से विकसित कला विद्यालय को किस नाम से जाना जाता है?
    (a) कुषाण कला
    (b) फारसी कला
    (c) गांधार कला
    (d) मुगल कला
    S.S.C. मल्टी टॉरिंकंग (M.T.S.) परीक्षा, 2013
    उत्तर-(c)
    उपर्युक्त प्रश्न की व्याख्या देखें।
    10. यूनानी- रोमन कला को निम्नलिखित में से कहां स्थान प्राप्त हुआ है ?
    (a) ऐलोरा
    (b) गांधार
    (c) कलिंग
    (d) बौद्ध कला
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2001
    उत्तर – (b)
    उपर्युक्त प्रश्न की व्याख्या देखें।
    11. कनिष्क किस वर्ष में राज्य सिंहासन पर आरूढ़ हुए ?
    (a) 108 ई.
    (b) 78 ई.
    (c) 58 ई.
    (d) 128 ई.
    S.S.C. संयुक्त हायर सेकण्डरी (10+2) स्तरीय परीक्षा, 2011
    उत्तर-(b)
    कुषाण शासक कनिष्क के राज्यारोहण की सर्वाधिक मान्य तिथि 78 ई. है। इसी से शक संवत का प्रारंभ माना जाता है।
    12. शक संवत् किसने और कब शुरू किया था ?
    (a) कादफिसिस ने 58 ई. पू. में
    (b) रूद्रदामन प्रथम ने 78 ईस्वी में
    (c) विक्रमादित्य ने 58 ई.पू. में
    (d) कनिष्क ने 78 ईस्वी में
    S.S.C. Tax Asst. परीक्षा, 2008
    S.S.C. CPO परीक्षा, 2003
    उत्तर-(d)
    शक संवत् का संस्थापक कनिष्क था, जिसके द्वारा इसे 78 ई. में प्रारंभ किया गया था।
    13. कुषाण काल में सबसे अधिक विकास किस क्षेत्र में हुआ था ?
    (a) धर्म
    (b) कला
    (c) साहित्य
    (d) वास्तुकला
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 2004
    उत्तर-(b)
    कुषाण काल में सर्वाधिक विकास कला के क्षेत्र में हुआ। इस समय कला की दो शैलियाँ यथा (i) मथुरा कला तथा (ii) गांधार कला का विकास हुआ।
    14. कनिष्क की राजधानी थी-
    (a) पुरुषपुर
    (b) बनारस
    (c) इलाहाबाद
    (d) सारनाथ
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2002
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 2004
    उत्तर-(a)
    पाकिस्तान के पेशावर जिला को ही प्राचीन काल में पुरुषपुर नाम से जाना जाता था। कुषाण शासक कनिष्क ने इस नगर की स्थापना की तथा यहीं अपनी राजधानी बसायी।
    15. लेखकों और पुस्तकों के निम्नलिखित जोड़ों में से कौन-सा सही नहीं है।
    पुस्तक : लेखक
    (a) विशाखदत्त मुद्राराक्षस
    (b) कौटिल्य अर्थशास्त्र
    (c) मेगस्थनीज इण्डिका
    (d) नागार्जुन ध्रुवस्वामिनी
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2001
    उत्तर-(d)
    माध्यमिक दर्शन के प्रसिद्ध आचार्य नागार्जुन कनिष्क की राजसभा में निवास करते थे। उन्होंने प्रज्ञापारमित्रा सूत्र की रचना की थी। जिसमें शून्यवाद (सापेक्षवाद ) का प्रतिपादन है। ध्रुवस्वामिनी के लेखक जयशंकर प्रसाद हैं नागार्जुन नहीं।
    16. निम्नलिखित साहित्यिक कृतियों का उनके लेखकों के साथ मिलान करिए :
    A. कविराजमार्ग – 1. महावीराचार्य
    B. आणि – 2. सकटायन
    C. गणितसारासगृह – 3. अमोघवर्ष
    D. अमोघप्रिथी – 4. जिनसेन
       A  B C D
    (a) 3  4  2  1
    (b) 4  3  1  2
    (c) 3  4  1  2
    (d) 2  1 3  4
    S.S.C. CPO परीक्षा, 2012
    उत्तर-(c)

    सही सुमेलित हैं-
    साहित्य     लेखक
    कविराजमार्ग –  अमोघवर्ष
    आदिपुराण -  जिनसेन
    गणितसारास्मगृह –  महावीराचार्य
    अमोघब्रिथी –  सकटायन
    17. किस संग्रहालय में कुषाण की मूर्तियों का संग्रह अधिक मात्रा है?
    (a) मथुरा संग्रहालय
    (b) बम्बई संग्रहालय
    (c) मद्रारा संग्रहालय
    (d) दिल्ली संग्रहालय
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2000
    उत्तर-(a)
    मथुरा संग्रहालय में कुषाण की मूर्तियों का संग्रह अधिक मात्रा में है। मथुरा कला का जन्म कनिष्क के समय हुआ था। इसमें लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग किया गया था।
    18. ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार वर्ष के कितने महीनों के नाम रोम के सम्राटों के नामों पर रखे गए हैं?
    (a) 0
    (b) 1
    (c) 2
    (d) 3
    S.S.C. CPO परीक्षा, 2003
    उत्तर-(c)
    ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार वर्ष के दो महीनों के नाम रोम के सम्राटों के नामों पर रखे गए हैं।
    जुलाई -  जूलियस सीजर के नाम पर
    अगस्त –  आगस्टस के नाम पर
    19. निम्न के जोड़े बनाइए
    (a) विक्रम संवत –   1.248 A.D.
    (b) शक संवत –   2. 320A.D.
    (c) कलचुरी संवत –   3. 58B.C.
    (d) गुप्त संवत –   4. 78A.D.
    (a) A1, B2, C3, D4
    (b) A3, B4C1, D2
    (c) A4, B3, C2, D1
    (d) A2, B1, C4, D3
    S.S.C. संयुक्त स्नातक स्तरीय परीक्षा 2012
    उत्तर-(b)
    सही सुमेलित हैं-
    विक्रम संवत-   58 B. C. (वास्तव में यह 57 ई.पू. है)
    शक संवत –   78A.D.
    कलचुरी संवत - 248A.D.
    गुप्त संवत –  320A.D. (319 ई.)
    20. निम्नलिखित में से यह महानतम् कुषाण नेता कौन था, जो बौद्ध बन गया था?
    (a) कुजाला
    (b) वीमा
    (c) कनिष्क
    (d) कदफिसेस
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2002
    उत्तर-(c)
    महानतम कुषाण शासक कनिष्क था। प्रारंभ में वह शैव था परंतु बाद में बौद्ध बन गया था।
    21. ईसा पूर्व द्वितीय शती में कागज बनाने की कला को किसने खोजा?
    (a) चीनियों ने
    (b) रोमनों ने
    (c) ग्रीकों ने
    (d) मंगोलों ने
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2000
    उत्तर-(a)
    ईसा पूर्व द्वितीय शती में कागज बनाने की कला को चीनियों ने खोजा था।
    22. ‘पुरुषपुर’ निम्नलिखित में से किसका दूसरा नाम है?
    (a) पटना
    (b) पाटलिपुत्र
    (c) पेशावर
    (d) पंजाब
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2002
    उत्तर-(c)
    पाकिस्तान का पेशावर जिला ही प्राचीन समय में ‘पुरुषपुर’ नाम से प्रसिद्ध था। कुषाण शासक कनिष्क ने इस नगर की स्थापना की तथा यहीं अपनी राजधानी बसायी थी।
    23. कुषाण काल के दौरान मूर्तिकला की गांधार शैली निम्नलिखित में से किसका मिश्रण है ?
    (a) भारत-इस्लाम शैली
    (b) भारत-फारस शैली
    (c) भारत-चीन शैली
    (d) भारत-नीक (यूनान) शैली
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2002
    उत्तर-(d)
    कुषाण काल (मुख्यत: कनिष्क के समय) के दौरान मूर्तिकला की गांधार शैली भारत- ग्रीक (यूनानी) शैली का मिश्रण है। इसका केन्द्रबिन्दु गांधार था, अतः इसे गांधार कला शैली भी कहा जाता है। इसमें बुद्ध एवं बोधिसत्वों की मूर्तियां काले स्लेटी पाषाण से बनाई गई हैं।
    24. कला की गांधार शैली किसके शासन काल में पनपी थी?
    (a) हर्ष
    (b) अशोक
    (c) कनिष्क
    (d) चन्द्रगुप्त द्वितीय
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2006
    उत्तर-(c)
    उपर्युक्त प्रश्न की व्याख्या देखें।
    25. भारतीय और यूनानी कला के अभिलक्षणों को समन्वित करने वाली कला शैली का क्या नाम है?
    (a) शिखर
    (b) वर्ण
    (c) नगन
    (d) गांधार
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2001
    उत्तर-(d)
    उपर्युक्त प्रश्न की व्याख्या देखें।
    26. भारत का राष्ट्रीय पंचांग किस काल पर आधारित है?
    (a) विक्रम काल
    (b) कली काल
    (c) शक काल
    (d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 1999
    उत्तर-(c)
    राष्ट्रीय पंचांग शक काल पर आधारित है। इस संवत् का प्रवर्तक कुषाण शासक कनिष्क था। इसका समय 78 ई. माना जाता है।
    27. कनिष्क के शासन काल में रहने वाले साहित्यकार थे-
    (a) नागार्जुन और अश्वघोष
    (b) वसुमिन्न और अश्वघोष
    (c) चरक और सुश्रुत
    (d) अश्वघोष और कालिदास
    S.S.C. (स्टेनोग्राफर) ग्रेड ‘डी’ परीक्षा, 2005
    उत्तर-(a)
    कनिष्क के शासन काल में रहने वाले नागार्जुन और अश्वघोष दो प्रमुख साहित्यकार थे। वसुमित्र भी कनिष्क के दरबार में रहता था परन्तु वह साहित्यकार नहीं था।
    28. सातवाहनों ने पहले स्थानीय अधिकारियों के रूप में काम किया था –
    (a) नंदों के अधीन
    (b) मौर्यों के अधीन
    (c) चोलों के अधीन
    (d) चेरों के अधीन
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2002
    उत्तर-(b)
    सातवाहनों ने मौयों के अधीन स्थानीय अधिकारियों के रूप में काम किया था।
    29. सातवाहन वंश का महानतम शासक किसे माना जाता है?
    (a) श्री शातकर्णि
    (b) गौतमीपुत्र शातकर्णि
    (c) वशिष्ठपुत्र पुलुमावि
    (d) यज्ञश्री शातकर्णि
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 2004
    उत्तर-(b)
    सातवाहन वंश की स्थापना सिमुक ने किया था। इस वंश का महानतम शासक गौतमी पुत्र शातकर्णि था, जिन्हें पश्चिग का स्वामी कहा जाता है। नासिक प्रशस्ति में उल्लेख मिलता है कि उसके वाहनों (अश्वों) ने तीनों समुद्रों का जल पिया था (तिसमुद्र-तोय-पीतवाहन ) |
    30. प्राचीन काल में निम्नलिखित में से कौन कलिंग का एक महान शासक था ?
    (a) अजातशत्रु
    (b) बिंदुसार
    (c) खारवेल
    (d) मयूरसर्मन
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2006
    उत्तर-(c)
    प्राचीन काल में खारवेल कलिंग का एक महान शासक था। खारवेल कलिंग का वीर एवं प्रतापी शासक था। इसके बारे में हमारी जानकारी का मुख्य स्रोत हाथीगुम्फा अभिलेख है। यह द्वितीय सदी ई.पू. में शासक हुआ था तथा इसका संबंध खारवेल के चेदि वंश से था। इसने अनेक विजयें प्राप्त की जिनमें मगध के शासक बृहस्पति मित्र पर तथा दक्षिण के सातवाहन शासक शातकर्णी पर विजयें प्रमुख हैं। यह जैन तीर्थंकर की मूर्ति को मगध से कलिंग ले जाने में सफल रहा। इसने कृषि हेतु नहरों का निर्माण करवाया तथा प्राची नदी के दोनों तटों पर महाविजय प्रसाद नामक महल बनवाया। यह जैन धर्म का अनुयायी था। इसने ऐरा, महाराज, मेघवाहन, कलिंगाधिपति आदि उपाधियां भी धारण की।
    31. राजा खारवेल किसके चेदी वंश के महानतम शासक थे ?
    (a) चोलमंडलम
    (b) कलिंग
    (c) कन्नौज
    (d) पुरुषपुर
    S.S.C. संयुक्त हायर सेकण्डरी (10+2) स्तरीय परीक्षा, 2013
    उत्तर-(b)
    उपर्युक्त प्रश्न की व्याख्या देखें।
    32. निम्नलिखित में से विद्या की सबसे पुरानी पीठ कौन-सी है?
    (a) तक्षशिला
    (b) नालंदा
    (c) उज्जैन
    (d) विक्रमशिला
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2006
    उत्तर-(a)
    तक्षशिला विद्या की सबसे पुरानी पीठ है। यह मौर्य युग के पूर्व ही स्थापित था। नालंदा एवं उज्जैन गुप्तकालीन जबकि विक्रमशिला पाल युगीन विद्या केन्द्र थे। नगरी अत्यन्त प्राचीन काल में गान्धार जनपद की राजधानी थी। यह आधुनिक रावलपिंडी से 20 मील पश्चिम की ओर सिन्ध तथा झेलम नदियों के बीच स्थित है। रामायण की परम्परा के अनुसार भरत के पुत्र तक्ष ने इसे बसाया था। जनमेजय का नाग यज्ञ यहीं पर हुआ था। इसकी सबसे अधिक ख्याति शैक्षणिक क्षेत्र में मानी जाती है। यह उच्च शिक्षा का प्रमुख केन्द्र था। व्याकरण के विश्वविख्यात विद्वान पाणिनी, राजनीति तथा अर्थशास्त्र के विश्व-विश्रुत विद्वान चाणक्य तथा आयुर्वेद चिकित्सा के प्रसिद्ध विद्वान आचार्य जीवक ने तक्षशिला में शिक्षा पाई थी। इसके अतिरिक्त कौशल नरेश प्रसेनजित, बौद्ध विद्वान वसुबन्धु आदि ने यहीं शिक्षा प्राप्त की थी। चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपनी सैनिक शिक्षा यहीं पर ग्रहण की थी। चाणक्य यहां का प्रमुख आचार्य भी बन गया।
    33. किस वंश के शासकों ने ब्राहाणों तथा बौद्ध भिक्षुओं को करमुक्त ग्राम देने की प्रथा प्रारम्भ की थी ?
    (a) सातवाहन
    (b) गौर्य
    (c) गुप्त
    (d) चोल
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 2000
    उत्तर-(a)
    सातवाहन शासकों ने ब्राह्मणों तथा बौद्ध भिक्षुओं को भूमि दान में देने की प्रथा प्रारम्भ की। यह भूमि सभी प्रकार के करों से मुक्त होती थी। कालान्तर में इन्हीं अनुदानों ने सामन्तवाद के विकास में योगदान दिया जिससे केन्द्रीय नियन्त्रण शिथिल हो गया।
    34. भारत में प्रथम स्वर्ण मुद्राएं किसने चलाई ?
    (a) कुषाण
    (b) यूनानी
    (c) शक
    (d) पार्थियन
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2001
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 2001
    उत्तर-(a)
    उत्तर-पश्चिम भारत में स्वर्ण सिक्कों का प्रचलन इण्डो-ग्रीक (हिन्द-यवन) राजाओं ने करवाया था जबकि इन्हें नियमित एवं पूर्णरूप से प्रचलित कराने का श्रेय कुषाण शासकों को जाता है। कुषाण शासकों ने स्वर्ण एवं तात्र दोनों ही प्रकार के सिक्कों को प्रचलित किया था।
    35. भारत में सर्वप्रथम सोने के सिक्के जारी करने वाले निम्नलिखित में से कौन थे?
    (a) कुषाण
    (b) तातार
    (c) मुगल
    (d) आर्य
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2002
    उत्तर-(a)
    उपर्युक्त प्रश्न की व्याख्या देखें।
    36. तक्षशिला के प्रसिद्ध स्थल के रूप में होने का कारण था-
    (a) प्राचीन वैदिक कला
    (b) मौर्यकालीन कला
    (c) गांधार कला
    (d) गुप्त कला
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2001
    उत्तर-(c)
    प्राचीन काल में तक्षशिला शिक्षा के साथ-साथ गांधार कला का प्रसिद्ध स्थान था।
    37. भारत में वर्ण व्यवस्था किस लिए बनाई गई थी?
    (a) श्रमिक गतिहीनता
    (b) श्रम की गरिमा को मान्यता देने
    (c) आर्थिक उत्थान
    (d) व्यावसायिक श्रम विभाजन
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 2000
    उत्तर-(d)
    भारत में वर्ण व्यवस्था व्यावसायिक श्रम विभाजन हेतु बनाई गई थी।

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