Subject: भारतीय इतिहास

  • बौद्ध धर्म MCQ प्रश्न | UPSC

    1. गौतम बुद्ध का महापरिनिब्बान जिस राज्य में हुआ था, वह है-
    (a) अंग
    (b) मगध
    (c) मल्ल
    (d) वत्स
    U.P.P.C.S. (Pre) 2011
    उत्तर-(c)
    महात्मा बुद्ध का महापरिनिर्वाण मल्ल गणराज्य की राजधानी कुशीनारा (वर्तमान कुशीनगर, उत्तर प्रदेश) में हुआ था। 483 ई.पू. में 80 वर्ष की आयु में उन्होंने यहीं शरीर त्याग किया। इससे पहले वे पावा (जो भी मल्ल गणराज्य का ही एक नगर था) में चुंद लुहार के घर भोजन करने गए थे, जहाँ ‘सूकरमद्दव’ खाने से उन्हें रक्तातिसार हो गया था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बुद्ध के अंतिम शिष्य का नाम सुभद्र था, जिन्हें उन्होंने कुशीनारा में ही दीक्षा दी थी। बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनके अस्थि-अवशेषों (धातु) को आठ भागों में बाँटा गया और उन पर स्तूप बनाए गए।
    2. निम्नलिखित में से किस राजवंश के अभिलेख से इस परंपरा का समर्थन होता है कि लुम्बिनी शाक्यमुनि बुद्ध का जन्म स्थान था?
    (a) मौर्य
    (b) शुंग
    (c) सातवाहन
    (d) कुषाण
    U.P. U.D.A. L.D.A. (Pre) 2006
    उत्तर-(a)
    मौर्य सम्राट अशोक के रुम्मिनदेई स्तंभ अभिलेख (लुम्बिनी, नेपाल में स्थित) से यह प्रमाण मिलता है कि शाक्यमुनि बुद्ध का जन्म लुम्बिनी में हुआ था। अशोक ने अपने राज्याभिषेक के 20वें वर्ष इस स्थान की तीर्थयात्रा की और यहाँ एक स्तंभ स्थापित किया। अभिलेख में लुम्बिनी गाँव को धार्मिक कर (बलि) से मुक्त करने और भू-कर को घटाकर 1/8 करने का उल्लेख भी मिलता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यह अभिलेख ब्राह्मी लिपि में प्राकृत भाषा में लिखा गया है। लुम्बिनी वर्तमान में नेपाल के रूपन्देही जिले में स्थित है और इसे यूनेस्को ने 1997 में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया है।
    3. गौतम बुद्ध का जन्म कब हुआ था?
    (a) 563 ई. पू.
    (b) 558 ई. पू.
    (c) 561 ई. पू.
    (d) 544 ई. पू.
    M.P.P.C.S. (Spl.) (Pre) 2004
    उत्तर-(a)
    गौतम बुद्ध का जन्म 563 ई.पू. में नेपाल के लुम्बिनी वन में हुआ था। उनका बचपन का नाम सिद्धार्थ था। उनके पिता शुद्धोधन शाक्य गणराज्य के प्रधान (राजा) थे और माता महामाया (माया देवी) कोलिय वंश की राजकुमारी थीं। माता की मृत्यु जन्म के सातवें दिन हो गई थी, जिसके बाद उनका पालन-पोषण उनकी मौसी (विमाता) महाप्रजापति गौतमी ने किया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सिद्धार्थ के जन्म पर ज्योतिषी आसित (कालदेवल) ने भविष्यवाणी की थी कि यह बालक या तो महान चक्रवर्ती सम्राट बनेगा या महान संन्यासी। उन्होंने 16 वर्ष की आयु में यशोधरा से विवाह किया और उनके पुत्र का नाम राहुल था।
    4. निम्नलिखित में से कौन एक अशोक का अभिलेख इस परंपरा की पुष्टि करता है कि गौतम बुद्ध का जन्म लुम्बिनी में हुआ था?
    (a) बसाढ़ स्तंभ अभिलेख
    (b) निगाली सागर स्तंभ अभिलेख
    (c) रामपुरवा स्तंभ अभिलेख
    (d) रुम्मिनदेई स्तंभ अभिलेख
    U.P.U.D.A/L.D.A. (Mains) 2010
    उत्तर-(d)
    अशोक का रुम्मिनदेई स्तंभ अभिलेख (वर्तमान नेपाल में स्थित) स्पष्ट रूप से पुष्टि करता है कि गौतम बुद्ध का जन्म लुम्बिनी में हुआ था। इसमें उल्लेख है कि अशोक ने स्वयं आकर उस जन्म-स्थल की पूजा की और एक प्रस्तर स्तंभ खड़ा करवाया। निगाली सागर स्तंभ अभिलेख में बुद्ध कनकमुनि के स्तूप को दोगुना करने का उल्लेख है, जबकि रामपुरवा स्तंभ पर कोई धार्मिक अभिलेख नहीं है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: रुम्मिनदेई अभिलेख की खोज 1896 ई. में जर्मन पुरातत्त्वविद् डॉ. एंटोन फ्युरर ने की थी। यह अभिलेख अशोक के तीर्थयात्रा (धम्मयात्रा) का भी प्रमाण है, जो बौद्ध तीर्थ-स्थलों की यात्रा से संबंधित थी।
    5. बुद्ध के जीवन की किस घटना को ‘महाभिनिष्क्रमण’ के रूप में जाना जाता है?
    (a) उनका महापरिनिर्वाण
    (b) उनका जन्म
    (c) उनका गृहत्याग
    (d) उनका प्रबोधन
    M.P.P.C.S. (Spl.) (Pre) 2004
    उत्तर-(c)
    29 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ ने सांसारिक जीवन त्याग दिया, जिसे बौद्ध साहित्य में ‘महाभिनिष्क्रमण’ (महान गृह-त्याग) कहा गया है। इसके पीछे चार दृश्यों (वृद्ध व्यक्ति, रोगी, शव और एक प्रसन्नचित्त संन्यासी) का बहुत बड़ा योगदान था। गृहत्याग की रात उन्होंने अपनी पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल को सोता हुआ छोड़कर अपने सारथी चन्ना के साथ कंथक नामक घोड़े पर सवार होकर कपिलवस्तु छोड़ा।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गृहत्याग के बाद सिद्धार्थ ने सर्वप्रथम वैशाली में आलार कालाम के आश्रम में और फिर राजगृह में उद्दक रामपुत्त के पास शिक्षा ग्रहण की। बोधगया में बोधि वृक्ष (पीपल) के नीचे 6 वर्षों की कठोर तपस्या के बाद 35 वर्ष की आयु में उन्हें ज्ञान (सम्बोधि) की प्राप्ति हुई।
    6. बुद्ध का जन्म हुआ था-
    (a) वैशाली
    (b) लुम्बिनी
    (c) कपिलवस्तु
    (d) पाटलिपुत्र
    U.P.P.C.S. (Pre) 2002
    M.P.P.C.S. (Pre) 1992
    उत्तर-(b)
    गौतम बुद्ध का जन्म लुम्बिनी में हुआ था, जो कपिलवस्तु के निकट स्थित एक वन-उद्यान था। उनकी माता माया देवी अपने मायके देवदह जाते समय लुम्बिनी में रुकी थीं, जहाँ उन्होंने एक शाल वृक्ष की डाल पकड़ते हुए सिद्धार्थ को जन्म दिया। लुम्बिनी वर्तमान नेपाल के रूपन्देही जिले में स्थित है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बौद्ध परंपरा के अनुसार बुद्ध का जन्म, ज्ञान-प्राप्ति (सम्बोधि) और महापरिनिर्वाण — तीनों घटनाएँ वैशाख पूर्णिमा के दिन हुई थीं, इसीलिए वैशाख पूर्णिमा को ‘बुद्ध पूर्णिमा’ के रूप में मनाया जाता है।
    7. गौतम बुद्ध की मां किस वंश से सम्बंधित थी?
    (a) शाक्य वंश
    (b) माया वंश
    (c) लिच्छवि वंश
    (d) कोलिय वंश
    U.P.P.C.S. (Pre) 2008
    उत्तर-(d)
    गौतम बुद्ध की माता माया देवी कोलिय गणराज्य के शासक अंजन की पुत्री थीं, अतः वे कोलिय वंश से संबंधित थीं। कोलिय गणराज्य की राजधानी देवदह थी, जो शाक्य गणराज्य के निकट स्थित थी। उल्लेखनीय है कि शाक्य और कोलिय दोनों गणराज्य रोहिणी नदी के किनारे बसे थे और इन दोनों में वैवाहिक संबंध प्रचलित थे।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बुद्ध की मौसी एवं विमाता महाप्रजापति गौतमी भी कोलिय वंश की ही थीं। उन्होंने बाद में बौद्ध धर्म की दीक्षा ली और वे बौद्ध संघ में प्रवेश पाने वाली प्रथम महिला (भिक्षुणी) बनीं।
    8. निम्न में से कौन-सा नाम बुद्ध का दूसरा नाम है?
    (a) पार्थ
    (b) प्रच्छन्न
    (c) मिहिर
    (d) गुडाकेश
    Chhattisgarh U.P.C.S. (Pre) 2014
    उत्तर-(c)
    छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग ने इस प्रश्न का उत्तर (c) मिहिर जारी किया है, हालाँकि यह विवादास्पद है। वस्तुतः गौतम बुद्ध के प्रसिद्ध नाम हैं — सिद्धार्थ (जन्म नाम), गौतम (गोत्र नाम), शाक्यमुनि (शाक्य कुल के मुनि), तथागत (जो सत्य को प्राप्त कर चुके हैं), और बुद्ध (ज्ञान प्राप्त करने वाले)। ‘प्रच्छन्न बौद्ध’ (छिपा हुआ बौद्ध) आदि शंकराचार्य की उपाधि थी, और पार्थ तथा गुडाकेश अर्जुन के नाम हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘तथागत’ शब्द का अर्थ है — ‘जो इसी मार्ग से आया और इसी मार्ग से गया’। बुद्ध ने स्वयं अपने लिए ‘तथागत’ संबोधन का सर्वाधिक प्रयोग किया है। ‘सम्मासम्बुद्ध’ भी उनका एक विशेष नाम है, जिसका अर्थ है — स्वयं के प्रयास से सम्यक् ज्ञान प्राप्त करने वाले।
    9. निम्नलिखित में से किस राजा के एक अभिलेख से सूचना मिलती है कि शाक्यमुनि बुद्ध का जन्म लुम्बिनी में हुआ था?
    (a) अशोक
    (b) कनिष्क
    (c) हर्ष
    (d) धर्मपाल
    U.P.P.C.S. (Mains) 2011
    U.P.P.C.S. (Mains) 2007
    U.P.P.C.S. (Mains) 2004
    उत्तर-(a)
    मौर्य सम्राट अशोक के रुम्मिनदेई स्तंभ अभिलेख से यह महत्वपूर्ण सूचना मिलती है कि शाक्यमुनि बुद्ध का जन्म लुम्बिनी में हुआ था। अशोक ने यहाँ एक अश्वशीर्ष (घोड़े के मस्तक वाला) स्तंभ स्थापित करवाया तथा लुम्बिनी को ‘लुम्बिनीग्राम’ नाम देते हुए इसे करमुक्त किया। कनिष्क, हर्ष और धर्मपाल के अभिलेखों में बुद्ध के जन्मस्थान लुम्बिनी का उल्लेख नहीं मिलता।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अशोक की इस धम्मयात्रा का विवरण उनके 8वें शिला अभिलेख में भी मिलता है, जिसमें बताया गया है कि उन्होंने बोधगया (जहाँ बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ) की भी यात्रा की थी। चीनी यात्री फाह्यान और ह्वेनसांग ने भी अपनी यात्रा-विवरणियों में लुम्बिनी और अशोक स्तंभ का उल्लेख किया है।
    10. महात्मा बुद्ध का ‘महापरिनिर्वाण’ कहां हुआ?
    (a) लुम्बिनी में
    (b) बोधगया में
    (c) कुशीनगर में
    (d) कपिलवस्तु में
    47th B.P.S.C. (Pre) 2005
    U.P.P.C.S. (Pre) 2011
    53t to 55th B.P.S.C. (Pre) 2011
    उत्तर-(c)
    महात्मा बुद्ध का महापरिनिर्वाण 483 ई.पू. में कुशीनारा (वर्तमान कुशीनगर, उत्तर प्रदेश) में हुआ था, जो मल्ल गणराज्य की राजधानी थी। अंतिम समय में वे दो शाल वृक्षों के बीच उत्तर की ओर सिर करके लेट गए थे। उनके अंतिम शब्द थे — “वय धम्मा संखारा, अप्पमादेन सम्पादेथ” अर्थात् “सभी संयोगज वस्तुएं क्षणभंगुर हैं, अप्रमाद से साधना करो।”
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बौद्ध धर्म में चार पवित्र तीर्थ स्थल हैं — लुम्बिनी (जन्म), बोधगया (ज्ञान प्राप्ति), सारनाथ (प्रथम उपदेश/धम्मचक्कपवत्तन) और कुशीनगर (महापरिनिर्वाण)। कुशीनगर में 1876 ई. में ए. कार्लाइल ने पुरातात्विक उत्खनन द्वारा महापरिनिर्वाण मंदिर की खोज की थी।
    11. महात्मा बुद्ध ने अपना पहला ‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ किस स्थान पर दिया था ?
    (a) लुम्बिनी में
    (b) सारनाथ
    (c) पाटलिपुत्र में
    (d) वैशाली में
    U.P.P.C.S. (Mains) 2004
    47th B.P.S.C. (Pre) 2005
    M.P.P.C.S. (Pre) 1991 1999
    53rd to 55th B.P.S.C. (Pre) 2011
    उत्तर-(b)
    बोधगया में ज्ञान प्राप्ति के बाद गौतम बुद्ध वाराणसी के निकट ऋषिपत्तन (आधुनिक सारनाथ) पहुँचे, जहाँ उन्होंने अपने पाँच पूर्व-साथी ब्राह्मण तपस्वियों को पहला उपदेश दिया। इस ऐतिहासिक प्रथम उपदेश को बौद्ध परंपरा में ‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ कहा जाता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इस उपदेश में बुद्ध ने ‘मध्यम मार्ग’ और ‘अष्टांगिक मार्ग’ की शिक्षा दी, जो बौद्ध दर्शन का आधार है। सारनाथ में अशोक ने एक विशाल स्तूप और स्तंभ का निर्माण कराया था, जिसके शीर्ष पर बना ‘सिंह-चतुर्मुख’ आज भारत का राष्ट्रीय चिह्न है।
    12. निम्नलिखित में से कौन-सा एक बौद्ध मत में निर्माण की अवधारणा की सर्वश्रेष्ठ व्याख्या करता है?
    (a) तृष्णारूपी अग्नि का शमन
    (b) स्वयं की पूर्णतः अस्तित्वहीनता
    (c) परमानंद एवं विश्राम की स्थिति
    (d) धारणातीत मानसिक अवस्था
    I.A.S. (Pre) 2013
    उत्तर-(a)
    बौद्ध दर्शन में ‘निर्वाण’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है — ‘बुझ जाना’ अथवा ‘शांत हो जाना’। बुद्ध के अनुसार समस्त दुःखों का मूल कारण तृष्णा (इच्छा) है। जब तृष्णा, द्वेष और अज्ञान रूपी तीन विकार पूरी तरह शांत हो जाते हैं, तब निर्वाण की प्राप्ति होती है — ठीक उसी प्रकार जैसे ईंधन न मिलने पर अग्नि स्वयं बुझ जाती है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बौद्ध ग्रंथों में दो प्रकार के निर्वाण का उल्लेख है — ‘सोपादिशेष निर्वाण’ (जीवनकाल में प्राप्त) और ‘परिनिर्वाण’ (मृत्यु के उपरांत पूर्ण मुक्ति)। बुद्ध को 35 वर्ष की आयु में बोधगया में ज्ञान प्राप्ति के समय सोपादिशेष निर्वाण और 80 वर्ष की आयु में कुशीनगर में परिनिर्वाण प्राप्त हुआ।
    13. आलार कालाम कौन थे?
    (a) बुद्ध के एक शिष्य
    (b) एक प्रतिष्ठित बौद्ध भिक्षु
    (c) बुद्धकालीन एक शासक
    (d) बुद्ध के एक गुरु
    U.P.P.S.C. (GIC) 2010
    उत्तर-(d)
    गृह-त्याग (महाभिनिष्क्रमण) के पश्चात सिद्धार्थ (गौतम बुद्ध) ज्ञान की खोज में भटकते हुए आलार कालाम के आश्रम पहुँचे और उनसे शिक्षा ग्रहण की। आलार कालाम सांख्य दर्शन के प्रसिद्ध आचार्य थे। उनसे शिक्षा प्राप्त कर सिद्धार्थ ने ‘आकिञ्चन्यायतन समाधि’ की अवस्था प्राप्त कर ली, परंतु उन्हें इससे पूर्ण संतोष नहीं मिला।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: आलार कालाम के बाद सिद्धार्थ ने एक अन्य गुरु ‘उद्दक रामपुत्त’ से भी शिक्षा ली, किंतु वहाँ भी उन्हें अपेक्षित ज्ञान नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने स्वतंत्र साधना का मार्ग चुना और अंततः बोधगया में पीपल वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त किया।
    14. गौतम बुद्ध ने किस स्थान पर निर्वाण प्राप्त किया ?
    (a) कुशीनारा
    (b) श्रावस्ती
    (c) लुम्बिनी
    (d) सारनाथ
    Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2011
    M.P.P.C.S. (Pre) 1997
    उत्तर-(*)
    बौद्ध धर्म में ‘निर्वाण’ का अर्थ है — समस्त सांसारिक दुःखों और तृष्णाओं से पूर्ण मुक्ति। गौतम बुद्ध को यह निर्वाण (ज्ञान-प्राप्ति) बिहार के बोधगया में वर्तमान महाबोधि वृक्ष के नीचे प्राप्त हुई थी, न कि किसी अन्य स्थान पर — इसीलिए इस प्रश्न का उत्तर (*) अर्थात् ‘कोई विकल्प नहीं’ है। प्रश्न में दिया गया विकल्प (a) ‘कुशीनारा’ बुद्ध के महापरिनिर्वाण (मृत्यु) का स्थान है, निर्वाण (ज्ञान-प्राप्ति) का नहीं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बोधगया का महाबोधि मंदिर परिसर यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है (2002 से)। बुद्ध को यहाँ लगभग 528 ई.पू. में वैशाख पूर्णिमा की रात ज्ञान प्राप्त हुआ था।
    15. महापरिनिर्वाण मंदिर अवस्थित है-
    (a) कुशीनगर में
    (b) सारनाथ में
    (c) बोधगया में
    (d) श्रावस्ती में
    U.P. Lower Sub. (Mains) 2015
    उत्तर-(a)
    महापरिनिर्वाण मंदिर उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले में स्थित है। यहीं पर 483 ई.पू. में 80 वर्ष की आयु में गौतम बुद्ध को महापरिनिर्वाण (मृत्यु) प्राप्त हुआ था। मंदिर में लेटी हुई बुद्ध की विशाल मूर्ति 1876 ई. में ब्रिटिश पुरातत्वविद् ए. कनिंघम के निर्देशन में हुए उत्खनन में प्राप्त हुई थी।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मूर्ति चुनार के बलुआ पत्थर से निर्मित है और इसकी लंबाई लगभग 6.1 मीटर है। कुशीनगर बौद्ध धर्म के चार प्रमुख तीर्थ स्थलों — लुम्बिनी, बोधगया, सारनाथ और कुशीनगर — में से एक है।
    16. महात्मा बुद्ध का महापरिनिर्वाण किसके गणतंत्र में हुआ था ?
    (a) नल्लों के
    (b) लिच्छवियों के
    (c) शाक्यों के
    (d) पालों के
    U.P.P.C.S. (Mains) 2005
    उत्तर-(a)
    महात्मा बुद्ध का महापरिनिर्वाण कुशीनगर (प्राचीन कुशीनारा) में हुआ था, जो उस समय ‘मल्ल गणराज्य’ (नल्लों के गणतंत्र) का भाग था। बुद्ध की मृत्यु के पश्चात मल्लों ने उनके पार्थिव शरीर का राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बुद्ध के परिनिर्वाण के बाद उनकी अस्थि-अवशेषों (रेलिक्स) को आठ भागों में विभाजित किया गया और विभिन्न राज्यों में उनके ऊपर स्तूपों का निर्माण कराया गया, जिन्हें ‘धातु-स्तूप’ कहा जाता है। मल्ल गणराज्य के दो प्रमुख केंद्र कुशीनारा और पावा थे।
    17. गौतम बुद्ध द्वारा अपने धर्म में दीक्षित किया जाने वाला अंतिम व्यक्ति निम्नलिखित में से कौन था ?
    (a) आनंद
    (b) सारिपुत
    (c) मोग्गलान
    (d) सुभद्द
    U.P.P.C.S. (Pre) 2013
    उत्तर-(d)
    अपने जीवन के अंतिम दिनों में बुद्ध पावा नगर में अपने शिष्य चुंद के घर रुके, जहाँ उन्होंने ‘सूकरमाद्दव’ नामक भोजन ग्रहण किया। इससे वे गंभीर रूप से अस्वस्थ हो गए। तत्पश्चात वे कुशीनगर पहुँचे और यहाँ सुभद्द नामक परिव्राजक को अपना अंतिम उपदेश देकर उसे बौद्ध धर्म में दीक्षित किया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सुभद्द एक वृद्ध ब्राह्मण परिव्राजक थे, जो बुद्ध से मिलना चाहते थे। प्रारंभ में आनंद ने उन्हें रोका, किंतु बुद्ध ने स्वयं उन्हें बुलाया। सुभद्द को ‘बुद्ध का अंतिम शिष्य’ (पच्छिमसावक) कहा जाता है।
    19. बुद्ध ने अपने जीवन की अंतिम वर्षा ऋतु कहां विताई थी ?
    (a) श्रावस्ती में
    (b) वैशाली में
    (c) कुशीनगर में
    (d) सारनाथ में
    U.P.R.O/A.R.O. (Pre) 2016
    U.P.P.C.S. (Mains) 2015
    उत्तर-(c)
    पालि ग्रंथ ‘महापरिनिब्बान सुत्त’ के अनुसार बुद्ध ने अपने जीवन की अंतिम वर्षा ऋतु (वर्षावास) वैशाली में बिताई थी। वैशाली उस समय लिच्छवि गणराज्य की राजधानी थी। वहाँ उन्होंने अपने प्रिय शिष्य आनंद को अपने शीघ्र परिनिर्वाण का संकेत दिया था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वैशाली का ऐतिहासिक महत्त्व इस दृष्टि से भी है कि यहाँ बुद्ध की मृत्यु के लगभग 100 वर्ष पश्चात द्वितीय बौद्ध संगीति (सभा) का आयोजन हुआ था। इसके अतिरिक्त, वैशाली में बुद्ध ने महिलाओं को पहली बार बौद्ध संघ में प्रवेश की अनुमति दी और अपनी मौसी महाप्रजापति गौतमी को भिक्षुणी के रूप में दीक्षित किया।
    20. निम्नलिखित राज्यों में से किनका संबंध बुद्ध के जीवन से था?
    1. अवंति
    2. गांधार
    3. कोसल
    4.मगध
    नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
    (a) 1, 2 और 3
    (b) 2 और 4
    (c) केवल 3 और 4
    (d) 1, 3 और 4
    I.A.S. (Pre) 2014
    I.A.S. (Pre) 2015
    उत्तर-(c)
    दिए गए महाजनपदों में से केवल कोसल और मगध का सीधा संबंध गौतम बुद्ध के जीवन से था। बुद्ध ने मगध में राजगृह और नालंदा क्षेत्रों में तथा कोसल में श्रावस्ती और साकेत में धर्म-प्रचार किया था। कोसल-नरेश प्रसेनजित और मगध-नरेश बिम्बिसार दोनों बुद्ध के प्रमुख अनुयायी थे।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मगध-नरेश बिम्बिसार ने बुद्ध को राजगृह के निकट ‘वेणुवन’ (बाँस का उपवन) दान में दिया था, जो बौद्ध संघ का पहला स्थायी विहार बना। अवंति और गांधार में बौद्ध धर्म का प्रसार बुद्ध के परिनिर्वाण के बाद उनके शिष्यों द्वारा हुआ।
    21. ‘सप्तपर्णी गुफा’ स्थित है-
    (a) सांची में
    (b) नालंदा में
    (c) राजगृह में
    (d) पावापुरी में
    U.P.R.O./A.R.O. (Pre) 2014
    उत्तर-(c)
    सप्तपर्णी गुफा बिहार के राजगृह (वर्तमान राजगीर) में स्थित है। यहीं बुद्ध की मृत्यु (483 ई.पू.) के तुरंत बाद प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन हुआ था, जिसमें बुद्ध की शिक्षाओं को सुत्तपिटक और विनयपिटक में संकलित किया गया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: राजगृह मगध साम्राज्य की प्रारंभिक राजधानी थी और पाँच पहाड़ियों से घिरी होने के कारण इसे ‘पंचपहाड़ी नगर’ भी कहा जाता था। सप्तपर्णी गुफा का नाम ‘सप्तपर्ण’ (सात पत्तों वाले) वृक्षों की अधिकता के कारण पड़ा।
    22. बुद्ध कौशाम्बी किसके राज्य काल में आए थे?
    (a) शतानीक
    (b) उदयन
    (c) बोधि
    (d) निचक्षु
    U.P.U.D.A./L.D.A. (Pre) 2010
    उत्तर-(b)
    महात्मा बुद्ध वत्स महाजनपद के राजा उदयन के शासनकाल में कौशाम्बी आए थे। उदयन ने बौद्ध धर्म अपनाने के बाद घोषिताराम विहार संघ को दान में दिया था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कौशाम्बी (वर्तमान उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद जिले के निकट) वत्स महाजनपद की राजधानी थी और यमुना नदी के तट पर बसी थी। यह नगर व्यापार का प्रमुख केंद्र था तथा बुद्धकाल में 16 महाजनपदों में से एक वत्स की राजधानी के रूप में विशेष महत्त्व रखता था।
    23. बुद्ध ने सर्वाधिक उपदेश दिए थे-
    (a) वैशाली में
    (b) श्रावस्ती में
    (c) कौशाम्बी में
    (d) राजगृह में
    U.P.P.C.S. (Pre) 2011
    उत्तर-(b)
    गौतम बुद्ध ने सर्वाधिक उपदेश कोसल राज्य की राजधानी श्रावस्ती में दिए। यहाँ उनके सबसे अधिक शिष्य बने और वे जेतवन विहार में दीर्घकाल तक रहे।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जेतवन विहार की स्थापना कोसल के धनी व्यापारी अनाथपिंडक (सुदत्त) ने राजकुमार जेत से भूमि खरीदकर की थी। कहा जाता है कि उन्होंने उस भूमि को स्वर्णमुद्राओं से ढककर खरीदा था। बुद्ध ने अपने जीवन के 25 वर्षावास (वर्षाकालीन प्रवास) में से अधिकांश श्रावस्ती में ही बिताए।
    24. बुद्ध ने अपना पहला उपदेश कहां दिया था ?
    (a) काशी
    (b) सारनाथ
    (d) बोधगया
    (c) कुशीनगर
    Jharkhand P.C.S. (Pre) 2013
    उत्तर-(b)
    गौतम बुद्ध ने बोधगया में ज्ञान प्राप्ति के पश्चात अपना प्रथम उपदेश सारनाथ (वाराणसी के निकट) के मृगदाव (हिरण उद्यान) में अपने पाँच पूर्व साथी साधकों को दिया था। इस घटना को ‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ कहा जाता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जिन पाँच शिष्यों को यह प्रथम उपदेश मिला, वे थे — कौण्डिन्य, वप्प, भद्दिय, महानाम और अस्सजि। इन्हें ‘पंचवर्गीय भिक्षु’ कहते हैं। इन्हीं पाँचों के साथ बौद्ध संघ की स्थापना हुई, जो बौद्ध धर्म के ‘त्रिरत्न’ (बुद्ध, धम्म, संघ) का आधार बना।
    25. सारनाथ में अपना प्रथम वचन किसने दिया?
    (a) महावीर
    (b) शंकराचार्य
    (c) महात्मा बुद्ध
    (d) गुरु नानक
    U.P.P.C.S. (Pre) 1993
    उत्तर-(c)
    सारनाथ में प्रथम उपदेश महात्मा बुद्ध ने दिया था, जिसे ‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ कहते हैं। यह स्थान वाराणसी से लगभग 10 किलोमीटर दूर है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सारनाथ को ‘ऋषिपत्तन’ और ‘मृगदाव’ के नाम से भी जाना जाता था। यहाँ सम्राट अशोक ने बाद में एक स्तूप और प्रसिद्ध अशोक स्तंभ का निर्माण करवाया, जिसके शीर्ष पर चार सिंहों की आकृति है — यही ‘सिंह-चतुर्मुख’ आज भारत का राष्ट्रीय प्रतीक है।
    26. गौतम बुद्ध अपना प्रथम उपदेश कहां दिए थे?
    (a) वैशाली
    (b) कौशाम्च
    (c) सारनाथ
    (d) पावापुरी
    56th to 59th B.P.S.C. (Pre) 2015
    उत्तर-(c)
    गौतम बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ में दिया था। बौद्ध साहित्य में इस उपदेश को ‘धम्मचक्कपवत्तन सुत्त’ के नाम से जाना जाता है, जिसमें बुद्ध ने चार आर्य सत्यों और अष्टांगिक मार्ग का विस्तार से वर्णन किया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बुद्ध के चार आर्य सत्य हैं — (1) दुख, (2) दुख का कारण (तृष्णा), (3) दुख का निरोध (निर्वाण), और (4) दुख निरोध का मार्ग (अष्टांगिक मार्ग)। अष्टांगिक मार्ग को ‘मध्यम प्रतिपदा’ भी कहते हैं क्योंकि यह अति-भोग और अति-कठोर तपस्या दोनों के बीच का मार्ग है।
    27. ग्रंथों में उल्लिखित ‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ है-
    (a) उनका (बुद्ध का) दर्शन
    (b) सारनाथ में दिया गया उनका प्रथम उपदेश
    (c) उनके धार्मिक आदर्श
    (d) बौद्ध अनुष्ठान
    U.P. Lower Sub. (Pre) 2004
    उत्तर-(b)
    ‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ का शाब्दिक अर्थ है — ‘धर्म के चक्र को गतिमान करना’। यह सारनाथ में बुद्ध द्वारा पाँच शिष्यों को दिए गए प्रथम उपदेश को संदर्भित करता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ की तिथि को बौद्ध धर्म में ‘आषाढ़ पूर्णिमा’ (गुरु पूर्णिमा) के रूप में मनाया जाता है। भारत के राष्ट्रीय ध्वज में अंकित ‘अशोक चक्र’ वास्तव में धर्मचक्र का ही प्रतीक है, जो इसी धर्मचक्रप्रवर्तन की स्मृति में सारनाथ के अशोक स्तंभ से लिया गया है।
    28. ‘धर्मचक्रप्रवर्तन किया गया था-
    (a) सांची में
    (b) श्रावस्ती में
    (c) सारनाथ में
    (d) वैशाली में
    U.P. Lower Sub. (Pre) 2015
    उत्तर-(c)
    धर्मचक्रप्रवर्तन सारनाथ में हुआ था। यह स्थल बुद्ध के जीवन की चार प्रमुख घटनाओं में से एक का साक्षी है — जन्म (लुंबिनी), ज्ञान प्राप्ति (बोधगया), प्रथम उपदेश (सारनाथ) और महापरिनिर्वाण (कुशीनगर)।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इन चार पवित्र स्थलों को बौद्ध धर्म में ‘चतुर्महास्थान’ कहा जाता है। सारनाथ में स्थित ‘धमेख स्तूप’ उसी स्थान पर बना है जहाँ बुद्ध ने पहला उपदेश दिया था; इस स्तूप का निर्माण मूलतः सम्राट अशोक ने करवाया था।
    29. बुद्ध की मृत्यु के पश्चात प्रथम बौद्ध संगीति की अध्यक्षता की गई-
    (a) महाकस्सप द्वारा
    (b) धर्मसेन द्वारा
    (c) अजातशत्रु द्वारा
    (d) नागसेन द्वारा
    U.P.P.C.S. (Pre) 2000
    उत्तर-(a)
    प्रथम बौद्ध संगीति लगभग 483 ई.पू. में राजगृह की सप्तपर्णी गुफा में आयोजित हुई। इसकी अध्यक्षता महाकस्सप ने की। इसमें बुद्ध के प्रमुख शिष्य आनंद (धम्म/सुत्त के प्रमाण) और उपालि (विनय के प्रमाण) उपस्थित थे। तत्कालीन मगध सम्राट अजातशत्रु ने इसे संरक्षण प्रदान किया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कुल चार प्रमुख बौद्ध संगीतियाँ हुईं — प्रथम (राजगृह, अजातशत्रु के काल में), द्वितीय (वैशाली, कालाशोक के काल में), तृतीय (पाटलिपुत्र, अशोक के काल में), और चतुर्थ (कुंडलवन, कश्मीर, कनिष्क के काल में)। तृतीय संगीति में मोग्गलिपुत्त तिस्स की अध्यक्षता में अभिधम्मपिटक को भी संकलित किया गया।
    30. प्रथम बौद्ध परिषद का संचालन निम्नलिखित में से किस एक ने किया ?
    (a) आनंद
    (b) महाकस्सप
    (d) मोग्गलिपुत्त
    (d) उपालि
    U.P.U.D.A./L.D.A. (Mains) 2010
    उत्तर-(b)
    प्रथम बौद्ध परिषद (संगीति) का संचालन महाकस्सप ने किया था। महाकस्सप बुद्ध के सबसे वरिष्ठ और प्रमुख शिष्यों में से एक थे और बुद्ध के महापरिनिर्वाण के पश्चात बौद्ध संघ के प्रमुख नेता बने।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: महाकस्सप को बौद्ध परंपरा में ‘धुतगुण’ (कठोर तपस्या) के प्रतीक के रूप में जाना जाता है। ज़ेन बौद्ध परंपरा में महाकस्सप को ‘पुष्पगाथा’ (Flower Sermon) की कथा के माध्यम से विशेष महत्त्व दिया जाता है — कहा जाता है कि बुद्ध ने एक बार बिना कुछ बोले केवल एक फूल उठाया और महाकस्सप ही एकमात्र शिष्य थे जो मुस्कुराए, जिससे बुद्ध ने उन्हें मौन ज्ञान (अव्यक्त धर्म) का उत्तराधिकारी घोषित किया।
    31. द्वितीय बौद्ध समिति का आयोजन कहां हुआ था ?
    (a) राजगृह में
    (b) वैशाली में
    (c) पाटलिपुत्र में
    (d) काशी (वाराणसी) में
    U.P.R.O/A.R.O. (Mains) 2014
    उत्तर-(b)
    द्वितीय बौद्ध संगीति का आयोजन बुद्ध की मृत्यु के लगभग 100 वर्ष पश्चात् कालाशोक के शासनकाल में वैशाली में हुआ था। इस संगीति का मुख्य कारण बौद्ध भिक्षुओं के बीच अनुशासन (विनय) संबंधी 10 विवादास्पद बिंदुओं पर उत्पन्न मतभेद था। इस संगीति की अध्यक्षता सब्बकामी ने की थी।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इसी द्वितीय संगीति के परिणामस्वरूप बौद्ध धर्म पहली बार दो शाखाओं — स्थविरवाद (Theravada) और महासांघिक — में विभाजित हुआ, जो आगे चलकर हीनयान और महायान संप्रदायों के विकास का आधार बनीं। वैशाली उस काल में लिच्छवी गणराज्य की राजधानी थी और बौद्ध धर्म का एक प्रमुख केंद्र था।
    32. चतुर्थ बौद्ध संगीति (परिषद) हुई
    (a) कनिष्क के शासनकाल
    (b) अशोक के शासनकाल में
    (c) हर्षवर्धन के शासनकाल में
    (d) मेनाण्डर के शासनकाल में
    U.P.R.O./ A.R.O. (Mains) 2013
    उत्तर-(a)
    चतुर्थ बौद्ध संगीति कुषाण वंश के महान सम्राट कनिष्क के शासनकाल में कश्मीर के कुंडलवन में आयोजित हुई थी। इसकी अध्यक्षता वसुमित्र ने की और उपाध्यक्ष के रूप में प्रसिद्ध कवि एवं दार्शनिक अश्वघोष ने भूमिका निभाई। इस संगीति में बौद्ध ग्रंथों के जटिल अंशों पर विचार-विमर्श कर उन्हें ‘विभाषाशास्त्र’ नामक टीकाओं में संकलित किया गया। इसी संगीति के बाद बौद्ध धर्म औपचारिक रूप से हीनयान और महायान — दो स्पष्ट संप्रदायों में बँट गया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यह एकमात्र बौद्ध संगीति थी जो संस्कृत भाषा में संपन्न हुई, जबकि पूर्ववर्ती तीनों संगीतियाँ पालि भाषा में आयोजित की गई थीं। कनिष्क ने बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए मध्य एशिया तक स्तूपों और विहारों का निर्माण कराया था।
    33. निम्नलिखित चार स्थानों में हुई बौद्ध संगीतियों का सही कालक्रम नीचे दिए हुए कूट से ज्ञात करें-
    1. वैशाली
    2. राजगृह
    3. कुंडलवन
    4. पाटलिपुत्र
    कूट :
    (a) 1, 2, 3, 4
    (b) 4, 3, 2, 1
    (c) 2, 1, 3, 4
    (c) 2, 1, 4, 3
    U.P. Lower Sub. (Pre) 2002
    उत्तर-(d)
    चारों बौद्ध संगीतियों का सही कालक्रम इस प्रकार है — प्रथम संगीति: राजगृह (अजातशत्रु के काल में, बुद्ध की मृत्यु के तत्काल बाद); द्वितीय संगीति: वैशाली (कालाशोक के काल में, लगभग 100 वर्ष बाद); तृतीय संगीति: पाटलिपुत्र (अशोक के काल में, मोग्गलिपुत्त तिस्स की अध्यक्षता में); चतुर्थ संगीति: कुंडलवन/कश्मीर (कनिष्क के काल में, वसुमित्र की अध्यक्षता में)। अतः सही क्रम है — 2, 1, 4, 3।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तृतीय बौद्ध संगीति (पाटलिपुत्र) में मोग्गलिपुत्त तिस्स ने ‘कथावत्थु’ नामक ग्रंथ की रचना की, जो अभिधम्म पिटक का महत्त्वपूर्ण भाग है। इसी संगीति में अशोक ने विभिन्न देशों में धर्म प्रचार के लिए दूत मंडल भेजने का निर्णय लिया, जिसके तहत उनके पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा श्रीलंका गए।
    34. इनमें से किस शासक ने चतुर्थ बौद्ध संगीति कश्मीर में आयोजित की ?
    (a) अशोक
    (b) अजातशत्रु
    (c) कनिष्क
    (d) कालाशोक
    66th B.P.S.C. (Pre) 2020
    उत्तर-(c)
    कश्मीर में आयोजित चतुर्थ बौद्ध संगीति कुषाण सम्राट कनिष्क के संरक्षण में हुई थी। कनिष्क ने इस संगीति के लिए कुंडलवन (कश्मीर) में एक विशेष विहार का निर्माण कराया था। वसुमित्र इसके अध्यक्ष तथा अश्वघोष उपाध्यक्ष थे। इस संगीति में महासांघिकों का प्रभाव प्रमुख था और बौद्ध धर्म का विभाजन हीनयान व महायान में हुआ।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कनिष्क को ‘बौद्ध धर्म का द्वितीय अशोक’ भी कहा जाता है। उन्होंने अफगानिस्तान के पेशावर (पुरुषपुर) में एक विशाल स्तूप का निर्माण करवाया था, जो उस काल की सबसे ऊँची संरचनाओं में से एक था।
    35. भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद पहली बौद्ध संगीति हुई थी-
    (a) राजगृह (राजगीर) में
    (b) गया में
    (c) पाटलिपुत्र में
    (d) वैशाली में
    B.P.S.C. (Pre) 2018
    उत्तर-(a)
    भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण (483 ई.पू., कुशीनगर में) के तत्काल बाद प्रथम बौद्ध संगीति मगध नरेश अजातशत्रु के शासनकाल में राजगृह (वर्तमान राजगीर, बिहार) की सप्तपर्णि गुफा में आयोजित हुई। इसकी अध्यक्षता महाकस्सप (महाकाश्यप) ने की। इसमें बुद्ध के उपदेशों को दो भागों — धम्म (सुत्तपिटक) और विनय (विनयपिटक) — में संकलित किया गया। आनंद ने धम्म और उपालि ने विनय का वाचन किया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: प्रथम बौद्ध संगीति में लगभग 500 अरहतों (बौद्ध भिक्षुओं) ने भाग लिया था। इस संगीति में अभिधम्म पिटक को शामिल नहीं किया गया था; इसे बाद की संगीतियों में जोड़ा गया। यह संगीति वर्षाकाल के दौरान तीन महीनों तक चली थी।
    36. निम्नलिखित पर विचार कीजिए-
    1. बुद्ध में देवत्वारोपण
    2. बोधिसत्व के पथ पर चलना
    3. मूर्ति उपासना तथा अनुष्ठान
    उपर्युक्त में से कौन-सी विशेषता / विशेषताएं महायान बौद्ध मत की है / हैं ?
    I.A.S. (Pre) 2019
    उत्तर-(d)
    महायान बौद्ध मत की तीनों उल्लिखित विशेषताएँ सत्य हैं। महायान में बुद्ध को एक दैवीय और लोकोत्तर सत्ता माना गया है, जो अनेक रूपों और अवतारों में प्रकट होते हैं — यह हिंदू धर्म के प्रभाव का परिणाम था। ‘बोधिसत्व’ की अवधारणा महायान की केंद्रीय विशेषता है — वे वे प्राणी हैं जो स्वयं निर्वाण की कगार पर होते हुए भी समस्त जीवों की मुक्ति के लिए संसार में बने रहते हैं। मूर्तिपूजा और अनुष्ठान भी महायान की प्रमुख पद्धति बन गई।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: हीनयान (थेरवाद) में बुद्ध को मात्र एक महापुरुष (मनुष्य) माना जाता है, जबकि महायान में वे ईश्वर तुल्य हो जाते हैं। महायान बौद्ध धर्म तिब्बत, चीन, जापान, कोरिया और वियतनाम में प्रचलित है, जबकि हीनयान (थेरवाद) श्रीलंका, म्यांमार और थाईलैंड में प्रमुख है।
    37. किस शासक के काल में चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन कश्मीर में हुआ था?
    (a) अशोक
    (b) कालाशोक
    (c) कनिष्क
    (d) अजातशत्रु
    R.A.S. / R.T.S. (Pre) 2010
    LA.S. (Pre) 2001
    उत्तर-(c)
    चतुर्थ बौद्ध संगीति कनिष्क के शासनकाल में कश्मीर के कुंडलवन में आयोजित हुई थी। कनिष्क कुषाण वंश के सबसे शक्तिशाली सम्राट थे जिनका साम्राज्य मध्य एशिया से उत्तर भारत तक विस्तृत था। वसुमित्र इसके अध्यक्ष थे और अश्वघोष उपाध्यक्ष। इस संगीति में बौद्ध धर्म हीनयान और महायान संप्रदायों में विभक्त हुआ तथा ‘विभाषाशास्त्र’ नामक टीकाएँ संकलित की गईं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अश्वघोष — जो इस संगीति के उपाध्यक्ष थे — संस्कृत साहित्य के महान कवि भी थे। उन्होंने ‘बुद्धचरित’ (बुद्ध की जीवनी) और ‘सौंदरानंद’ जैसे महाकाव्यों की रचना की। उन्हें अक्सर ‘भारत का प्रथम संस्कृत नाटककार’ भी कहा जाता है।
    38. बौद्ध धर्म की महायान शाखा औपचारिक रूप से किसके शासनकाल में प्रकट हुई ?
    (a) अजातशत्रु
    (b) अशोक
    (c) धर्मपाल
    (d) कनिष्क
    I.A.S. (Pre) 1993
    उत्तर-(c)
    यद्यपि प्रश्न का उत्तर विकल्प (c) अर्थात् ‘धर्मपाल’ दिया गया है, तथापि ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार महायान बौद्ध मत कनिष्क (विकल्प d) के शासनकाल में चतुर्थ बौद्ध संगीति (कुंडलवन, कश्मीर) के दौरान औपचारिक रूप से एक पृथक संप्रदाय के रूप में उभरा। इस संगीति में महासांघिकों के प्रभाव और बुद्ध की दैवीय व्याख्या ने महायान को स्पष्ट स्वरूप दिया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: महायान का सबसे प्रभावशाली दार्शनिक नागार्जुन था, जिन्होंने ‘शून्यवाद’ (Madhyamaka) का प्रतिपादन किया और ‘प्रज्ञापारमिता’ ग्रंथों की रचना की। नागार्जुन को ‘महायान का पिता’ भी कहा जाता है। नागार्जुन के विचार बाद में तिब्बती और चीनी बौद्ध धर्म की आधारशिला बने।
    39. कश्मीर में कनिष्क के शासनकाल में जो बौद्ध संगीति आयोजित हुई थी, उसकी अध्यक्षता निम्नलिखित में से किसने की थी ?
    (a) पार्श्व
    (b) नागार्जुन
    (c) शूद्रक
    (d) वसुमित्र
    I.A.S. (Pre) 2001
    उत्तर-(d)
    कनिष्क के शासनकाल में कश्मीर के कुंडलवन में आयोजित चतुर्थ बौद्ध संगीति की अध्यक्षता वसुमित्र ने की थी। वसुमित्र एक प्रख्यात बौद्ध विद्वान थे और सर्वास्तिवाद संप्रदाय के प्रमुख आचार्य थे। इस संगीति में बौद्ध ग्रंथों की व्याख्या ‘विभाषाशास्त्र’ में की गई। प्रसिद्ध दार्शनिक कवि अश्वघोष इसके उपाध्यक्ष थे।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वसुमित्र ने ‘प्रकरणपाद’ नामक महत्त्वपूर्ण अभिधर्म ग्रंथ की रचना भी की थी। कनिष्क द्वारा आयोजित यह संगीति इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि इसमें विभिन्न बौद्ध संप्रदायों के 500 से अधिक विद्वान भिक्षुओं ने भाग लिया था और इसके निष्कर्षों को ताम्रपत्रों पर उत्कीर्ण करके पाषाण संदूक में सुरक्षित किया गया था।
    40. कनिष्क के शासनकाल में बौद्ध सभा किस नगर में आयोजित की गई थी ?
    (a) मगध
    (b) पाटलिपुत्र
    (c) कश्मीर
    (d) राजगृह
    47th B.P.S.C. (Pre) 2005
    उत्तर-(c)
    कनिष्क के शासनकाल में बौद्ध सभा (चतुर्थ बौद्ध संगीति) कश्मीर के कुंडलवन नामक स्थान पर आयोजित की गई थी। कनिष्क का शासनकाल लगभग 78 ई. से प्रारंभ माना जाता है और उनके नाम पर शक संवत् की शुरुआत हुई। इस संगीति के बाद बौद्ध धर्म हीनयान और महायान में विभाजित हो गया, जिसमें महायान का प्रचार-प्रसार उत्तर और मध्य एशिया की ओर हुआ।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कश्मीर प्राचीन काल से बौद्ध धर्म का महत्त्वपूर्ण केंद्र रहा है। चीनी यात्री ह्वेनसांग (7वीं सदी ई.) ने कश्मीर की अपनी यात्रा के दौरान वहाँ सैकड़ों बौद्ध विहारों और मठों का उल्लेख किया है। कनिष्क ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए मध्य एशिया, चीन और तिब्बत तक धर्म दूत भेजे थे।
    41. बुद्ध के जीवन की चार महत्वपूर्ण घटनाओं और उनसे संबद्ध चार स्थानों का नीचे उल्लेख है, यह दो स्तंभों (I) एवं (II) में अंकित हैं, आपको इनका सुमेल करना है-
    स्तम्भ-I   स्तंभ-II
    (1) जन्म – (i) सारनाथ
    (2) ज्ञान प्राप्ति – (ii) बोधगया
    (3) प्रथम प्रवचन – (iii) लुम्बिनी
    (4) निघन – (iv) कुशीनगर
    सही मेल है-
    (a) 1-i, 2-ii, 3-iv, 4-iii
    (b) 1-i, 2-iii, 3-i, 4-iv
    (c) 1-iii, 2-ii, 3-i, 4-iv
    (d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
    41st B.P.S.C. (Pre) 1996
    उत्तर-(c)
    महात्मा बुद्ध का जन्म 563 ई.पू. में नेपाल की तराई में स्थित लुम्बिनी (कपिलवस्तु के समीप) में हुआ था। बोधगया में निरंजना नदी के किनारे एक पीपल (अश्वत्थ) वृक्ष के नीचे वैशाख पूर्णिमा की रात उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ, इसीलिए वह वृक्ष ‘बोधिवृक्ष’ कहलाया। सारनाथ (ऋषिपत्तन/मृगदाव) में उन्होंने अपने पाँच साथियों को प्रथम उपदेश दिया, जिसे ‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ कहते हैं। कुशीनारा (वर्तमान कुशीनगर, उत्तर प्रदेश) में 483 ई.पू. में उनका निधन हुआ, जिसे बौद्ध परंपरा में ‘महापरिनिर्वाण’ कहा गया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बुद्ध के जीवन की इन चार प्रमुख घटनाओं से जुड़े स्थल सामूहिक रूप से ‘चतुर्महास्थान’ कहलाते हैं और ये प्रमुख बौद्ध तीर्थस्थल हैं। लुम्बिनी में सम्राट अशोक ने एक स्तंभ स्थापित किया था जो आज भी विद्यमान है और बुद्ध के जन्मस्थान का ऐतिहासिक प्रमाण देता है।
    42. बोधगया में महाबोधि मंदिर बनाया गया, जहां-
    (a) गौतम बुद्ध पैदा हुए थे।
    (b) गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ।
    (c) गौतम बुद्ध ने अपना प्रथम प्रवचन दिया।
    (d) गौतम की मृत्यु हुई।
    45th B.P.S.C. (Pre) 2001
    उत्तर-(b)
    बोधगया (बिहार) में गौतम बुद्ध को 35 वर्ष की आयु में, 6 वर्षों की कठोर साधना के बाद, वैशाख पूर्णिमा की रात एक पीपल के वृक्ष के नीचे ज्ञान (बोधि) प्राप्त हुआ था। इसी स्थान पर महाबोधि मंदिर का निर्माण हुआ।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: महाबोधि मंदिर परिसर को यूनेस्को ने 2002 में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया। मूल मंदिर का निर्माण सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दी ई.पू. में करवाया था, और वर्तमान मंदिर का निर्माण गुप्तकाल (5वीं-6वीं शताब्दी ई.) में हुआ माना जाता है।
    43. प्रथम बौद्ध समिति का आयोजन हुआ था-
    (a) अनिरुद्ध के शासनकाल में
    (b) अजातशत्रु के शासनकाल में
    (c) बिंबिसार के शासनकाल में
    (d) उदयभद्र के शासनकाल में
    U.P.P.C.S. (Mains) 2010
    उत्तर-(b)
    प्रथम बौद्ध संगीति (सभा) का आयोजन 483 ई.पू. में मगध नरेश अजातशत्रु के शासनकाल में राजगृह (राजगीर) की सप्तपर्णि गुफा में हुई थी। इस सभा की अध्यक्षता महाकश्यप ने की थी। इसमें बुद्ध के उपदेशों को ‘विनयपिटक’ और ‘सुत्तपिटक’ के रूप में संकलित किया गया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इस संगीति में आनंद ने बुद्ध के उपदेशों (सुत्त) और उपालि ने विनय नियमों का वाचन किया था। यह संगीति बुद्ध के महापरिनिर्वाण के ठीक तीन महीने बाद आयोजित हुई थी।
    44. तृतीय बौद्ध सभा किस स्थान पर बुलाई गई थी ?
    (a) तक्षशिला
    (b) सारनाथ
    (c) बोधगया
    (d) पाटलिपुत्र
    53rd to 55th B.P.S.C. (Pre) 2011
    उत्तर-(d)
    तृतीय बौद्ध संगीति (सभा) का आयोजन लगभग 250 ई.पू. में सम्राट अशोक के शासनकाल में पाटलिपुत्र में हुई थी। इसकी अध्यक्षता मोग्गलिपुत्त तिस्स ने की। इस सभा में ‘अभिधम्मपिटक’ को त्रिपिटक में जोड़ा गया, जिससे बौद्ध धर्मग्रंथों का पूर्ण संकलन त्रिपिटक के रूप में तैयार हुआ।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तृतीय बौद्ध संगीति के बाद ही सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका भेजा। यह बौद्ध धर्म के अंतर्राष्ट्रीय प्रसार में एक ऐतिहासिक मोड़ था।
    45. निम्नलिखित में से किस नगर में प्रथम बौद्ध समा आयोजित की गई थी?
    (a) नालंदा
    (b) गया
    (c) राजगीर
    (d) बोधगया
    U.P.P.C.S. (Pre) 2000
    M.P.P.C.S. (Pre) 1990
    उत्तर-(c)
    प्रथम बौद्ध संगीति राजगृह (राजगीर, बिहार) में हुई थी। राजगीर मगध साम्राज्य की प्राचीन राजधानी था और बुद्ध के जीवनकाल में धार्मिक-राजनीतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था। यहाँ सप्तपर्णि गुफा में महाकश्यप की अध्यक्षता में यह सभा आयोजित की गई।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: राजगीर में ही बुद्ध ने अपने जीवनकाल में कई वर्षावास (वर्षाकालीन प्रवास) बिताए थे। बौद्ध और जैन दोनों धर्मों के लिए राजगीर एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है क्योंकि जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर ने भी यहाँ उपदेश दिए थे।
    46. निम्न में से किस शासक ने द्वितीय बौद्ध सभा का आयोजन किया था?
    (a) अजातशत्रु
    (b) कालाशोक
    (c) आनंद
    (d) अशोक
    R.A.S. / R.T.S. (Pre) 1994
    उत्तर-(b)
    द्वितीय बौद्ध संगीति का आयोजन लगभग 383 ई.पू. में शिशुनाग वंश के राजा कालाशोक (काकवर्ण) के शासनकाल में वैशाली में हुई थी। इसकी अध्यक्षता सब्बकामी ने की। इस सभा का मुख्य कारण वज्जिपुत्तक भिक्षुओं द्वारा विनय के दस नियमों में शिथिलता लाने का विवाद था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इस संगीति के परिणामस्वरूप बौद्ध संघ दो भागों में विभाजित हो गया — ‘स्थविरवाद’ (रूढ़िवादी) और ‘महासांघिक’ (उदारवादी)। यही विभाजन आगे चलकर हीनयान और महायान संप्रदायों के उद्भव की नींव बना।
    47. भारतीय कला में बुद्ध के जीवन की किस घटना का चित्रण मृग सहित चक्र’ द्वारा हुआ है ?
    (a) महाभिनिष्क्रमण
    (b) सम्बोधि
    (c) प्रथम उपदेश
    (d) निर्वाण
    U.P.P.C.S. (Mains) 2002
    उत्तर-(c)
    भारतीय कला में ‘मृग सहित चक्र’ (धर्मचक्र के साथ हिरण) का प्रतीक बुद्ध के प्रथम उपदेश को दर्शाता है। बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ के मृगदाव (हरिण वन) में पाँच भिक्षुओं को दिया था, इसलिए मृग इस घटना का प्रतीक बन गया। इस घटना को ‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ कहते हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: प्रारंभिक बौद्ध कला में बुद्ध की मानवीय मूर्ति नहीं बनाई जाती थी; उनका प्रतिनिधित्व विभिन्न प्रतीकों द्वारा होता था — जैसे जन्म के लिए कमल, ज्ञान के लिए बोधिवृक्ष, प्रथम उपदेश के लिए धर्मचक्र-मृग, और महापरिनिर्वाण के लिए स्तूप। बुद्ध की प्रथम मानवीय मूर्तियाँ कुषाण काल (गांधार और मथुरा कला) में बनाई गईं।
    48. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए :
    सूची-1 (चिह्न) सूची-II (अर्थ)
    A. जन्म – 1. वोधि वृक्ष
    B. प्रथम प्रवचन – 2. धर्मचक्रप्रवर्तन
    C. महाबोधि- 3. घोड़ा
    D. त्याग – 4. कमल
    कूट :
    A B C D
    (a) 1 2 3 4
    (b) 4 3 2 1
    (c) 3 4 1 2
    (d) 4 2 1 3
    U.P.P.C.S. (Mains) 2005
    उत्तर-(d)
    सही सुमेलन इस प्रकार है — जन्म का प्रतीक कमल है (क्योंकि बुद्ध के जन्म के समय कमल खिलने की किंवदंती है); प्रथम प्रवचन का प्रतीक धर्मचक्रप्रवर्तन है; महाबोधि (ज्ञान प्राप्ति) का प्रतीक बोधिवृक्ष है; और गृह त्याग (महाभिनिष्क्रमण) का प्रतीक घोड़ा है, क्योंकि बुद्ध ने अपने प्रिय घोड़े ‘कंथक’ पर सवार होकर गृहत्याग किया था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बुद्ध के गृहत्याग के समय उनके सारथी का नाम ‘छन्दक’ था। कंथक (घोड़ा) ने राजमहल से बाहर निकलते समय आवाज़ न करे, इसके लिए देवताओं ने उसके खुरों को थाम लिया था — यह बौद्ध साहित्य में वर्णित है।
    49. करमापा लामा तिब्बत के बुद्ध संप्रदाय के किस वर्ग का है?
    (a) गेलूगपा
    (b) कंग्यूपा
    (c) साक्यपा
    (d) लिंगमापा
    U.P.P.C.S. (Pre) 2000
    उत्तर-(b)
    करमापा लामा तिब्बती बौद्ध धर्म के ‘कंग्यूपा’ (Kagyu) संप्रदाय के प्रमुख हैं। कंग्यूपा तिब्बती बौद्ध धर्म के चार प्रमुख संप्रदायों में से एक है। करमापा की वंशपरंपरा विश्व में सबसे प्राचीन पुनर्जन्म आधारित उत्तराधिकार परंपरा (तुल्कु परंपरा) मानी जाती है, जो 12वीं शताब्दी से चली आ रही है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तिब्बती बौद्ध धर्म के चार प्रमुख संप्रदाय हैं — गेलूगपा (जिसके प्रमुख दलाई लामा हैं), कंग्यूपा (करमापा), साक्यपा और न्यिंगमापा। गेलूगपा संप्रदाय की स्थापना 14वीं-15वीं शताब्दी में जे त्सोंगखापा ने की थी और यह राजनीतिक दृष्टि से सर्वाधिक प्रभावशाली रहा है।
    50. महात्मा बुद्ध के संबंध में निम्नलिखित कथनों में कौन सही है?
    1. उनका जन्म कपिलवस्तु में हुआ था।
    2. उन्होंने बोधगया में ज्ञान प्राप्त किया था।
    3. उन्होंने वैदिक धर्म को अस्वीकार किया था।
    4. उन्होंने आर्य सत्य का प्रचार किया था।
    नीचे दिए गए कूट से सही
    कूट :
    उत्तर चुनिए :
    (a) 1 तथा 2
    (b) 1 तथा 3
    (c) 1, 2, तथा
    (d) 1, 2, 3 तथा 4
    U.P.P.S.C. (GIC) 2010
    उत्तर-(d)
    उपर्युक्त सभी चारों कथन सही हैं। बुद्ध का जन्म लुम्बिनी (कपिलवस्तु के निकट) में हुआ, ज्ञान बोधगया में मिला, उन्होंने वेदों की प्रामाणिकता और यज्ञ-बलि व्यवस्था को अस्वीकार किया, तथा चार आर्य सत्यों (दुख, दुख का कारण, दुख का निरोध, निरोध का मार्ग) का प्रचार किया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बुद्ध के चार आर्य सत्यों के साथ-साथ उन्होंने ‘अष्टांगिक मार्ग’ भी प्रतिपादित किया, जिसे ‘मध्यम मार्ग’ भी कहते हैं। यह अत्यंत भोग और अत्यंत तप दोनों के बीच का मार्ग है। बुद्ध ने ईश्वर के अस्तित्व पर मौन रहकर व्यावहारिक नैतिकता पर बल दिया, इसलिए बौद्ध धर्म को ‘अनात्मवादी’ और ‘अनीश्वरवादी’ दर्शन माना जाता है।
    51. गौतम बुद्ध ने अपनी मृत्यु के उपरांत बौद्ध संघ के नेतृत्व के लिए निम्न में से किसे नामित किया था ?
    (a) आनंद
    (b) महाकस्सप
    (c) उपालि
    (d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
    Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2002
    उत्तर-(d)
    कुशीनारा में महापरिनिर्वाण से पूर्व बुद्ध ने आनंद से कहा — “मैंने जो धर्म और विनय उपदेश दिए हैं, वही तुम्हारे शास्ता होंगे।” इस प्रकार उन्होंने किसी व्यक्ति को नहीं, बल्कि अपने धर्म एवं विनय को ही संघ का मार्गदर्शक घोषित किया। यह घटना लगभग 483 ई.पू. की मानी जाती है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बुद्ध के महापरिनिर्वाण के तुरंत बाद महाकस्सप की अध्यक्षता में राजगृह (राजगीर) में प्रथम बौद्ध संगीति आयोजित की गई, जिसमें उपालि ने विनयपिटक और आनंद ने सुत्तपिटक का वाचन किया। यह भी उल्लेखनीय है कि आनंद बुद्ध के सबसे निकट शिष्य और निजी परिचारक थे, जिन्होंने 25 वर्षों तक उनकी सेवा की।
    52. निम्नलिखित में से कौन बुद्ध के जीवनकाल में ही संघ प्रमुख होना चाहता था?
    (a) देवदत्त
    (b) महाकस्सप
    (c) उपालि
    (d) आनंद
    U.P.P.C.S. (Pre) 1999
    उत्तर-(a)
    देवदत्त बुद्ध का चचेरा भाई था और शाक्यकुल से ही संबंधित था। भिक्षु बनते ही उसके मन में संघ का नेतृत्व पाने की महत्वाकांक्षा जाग उठी। उसने बुद्ध को संघ से हटाने के लिए कई षड्यंत्र रचे, यहाँ तक कि उन पर हत्या के प्रयास भी किए — जैसे पहाड़ से शिला लुढ़कवाना और नालागिरि हाथी को उन पर छोड़ना — किंतु सभी प्रयास विफल रहे।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: देवदत्त ने मगध नरेश अजातशत्रु को अपना समर्थक बना लिया था, जो उसकी महत्वाकांक्षाओं में सहायक था। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार देवदत्त ने संघ में फूट डालने हेतु पाँच कठोर नियमों (पंचवस्तु) का प्रस्ताव भी रखा था, जिसे बुद्ध ने अस्वीकार कर दिया।
    53. बुद्ध के उपदेश किससे संबंधित हैं?
    (a) आत्मा संबंधी विवाद
    (b) ब्रह्मचर्य
    (c) धार्मिक कर्मकांड
    (d) आचरण की शुद्धता व पवित्रता
    U.P.P.C.S. (Pre) 1991
    उत्तर-(d)
    बुद्ध के उपदेशों का केंद्र था — नैतिक आचरण, मन की पवित्रता और दुःख से मुक्ति का व्यावहारिक मार्ग। उन्होंने आत्मा-परमात्मा जैसे तात्त्विक प्रश्नों को “अव्याकृत” (अनुत्तरित) छोड़ा और वैदिक यज्ञ-कर्मकांडों की कड़ी आलोचना की। उनका अष्टांगिक मार्ग — सम्यक दृष्टि से लेकर सम्यक समाधि तक — पूर्णतः आचरण पर आधारित है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बुद्ध ने अपने उपदेश संस्कृत की बजाय तत्कालीन लोकभाषा पाली में दिए, ताकि साधारण जनता उन्हें सहज रूप से समझ सके। उनका प्रसिद्ध “मज्झिम पटिपदा” (मध्यम मार्ग) का सिद्धांत — न अति-भोग, न अति-तप — नैतिक जीवन का आधार था।
    54. निम्नलिखित में से कौन-सा बौद्ध पवित्र स्थल निरंजना नदी पर स्थित था?
    (a) बोधगया
    (b) कुशीनगर
    (c) लुम्बिनी
    (d) ऋषिपत्तन
    U.P.P.C.S. (Pre) 2012
    उत्तर-(a)
    बोधगया, जहाँ गौतम बुद्ध को बोधिवृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था, निरंजना नदी (आधुनिक फल्गु नदी) के तट पर स्थित है। यह नदी निरंजना और मोहना नामक दो छोटी धाराओं के संगम से बनती है। बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति से पूर्व इसी नदी में स्नान किया था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बोधगया स्थित महाबोधि मंदिर को यूनेस्को ने 2002 में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया। यह मंदिर मूलतः सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दी ई.पू. में बनवाया था, और वर्तमान संरचना गुप्तकाल (5वीं-6वीं शताब्दी ई.) की मानी जाती है।
    55. बोधगया में ‘बोधि वृक्ष’ अपने वंश की इस पीढ़ी का है-
    (a) तृतीय
    (b) चतुर्थ
    (c) पंचम
    (d) षष्ठम
    48th to 52nd B.P.S.C. (Pre) 2008
    उत्तर-(c)
    बोधगया का वर्तमान बोधि वृक्ष उस मूल पीपल वृक्ष की पाँचवीं पीढ़ी है, जिसके नीचे बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था। चीनी यात्री ह्वेनसांग के विवरण के अनुसार मूल वृक्ष को 7वीं शताब्दी में बंगाल के शासक शशांक ने नष्ट करवाया था। पुरातत्ववेत्ता अलेक्जेंडर कनिंघम ने 19वीं शताब्दी में वर्तमान (पाँचवीं पीढ़ी के) वृक्ष को लगवाया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इस वृक्ष की एक शाखा तीसरी शताब्दी ई.पू. में सम्राट अशोक की पुत्री संघमित्रा श्रीलंका ले गई थीं, जहाँ अनुराधापुरा में लगाया गया वह वृक्ष आज भी जीवित है और विश्व का सबसे पुराना ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित वृक्ष माना जाता है। बोधि वृक्ष का वैज्ञानिक नाम Ficus religiosa है।
    56. ‘त्रिपिटक’ क्या है?
    (a) गांधीजी के तीन बंदर
    (b) ब्रह्मा, विष्णु, महेश
    (c) महावीर के तीन नगीने
    (d) बुद्ध के उपदेशों का संग्रह
    U.P. Lower Sub. (Pre) 2003
    U.P. Lower Sub. (Pre) 2004
    उत्तर-(d)
    त्रिपिटक बौद्ध धर्म का सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं प्राचीनतम धर्मग्रंथ है। बुद्ध के महापरिनिर्वाण के पश्चात उनकी शिक्षाओं को तीन भागों में संकलित किया गया — विनय पिटक (संघ के आचार-नियम), सुत्त पिटक (धार्मिक सिद्धांत एवं उपदेश) और अभिधम्म पिटक (दार्शनिक विवेचन)।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: त्रिपिटक की रचना पाली भाषा में हुई, जो उस काल में आम जनता की भाषा थी। यह ग्रंथ बौद्ध धर्म के थेरवाद (हीनयान) सम्प्रदाय का मूल आधार माना जाता है।
    57. निम्नलिखित में से किस बौद्ध ग्रंथ में संघ जीवन के नियम प्राप्त होते हैं?
    (a) दीघ निकाय
    (b) विनय पिटक
    (c) अभिधम्म पिटक
    (d) विभाषा शास्त्र
    U.P.P.C.S. (Pre) 1996
    उत्तर-(b)
    विनय पिटक त्रिपिटक का पहला और अत्यंत महत्वपूर्ण भाग है, जिसमें बौद्ध संघ के भिक्षुओं और भिक्षुणियों के लिए आचार-व्यवहार, दैनिक जीवन के नियम एवं अनुशासन संबंधी विधि-निषेध संकलित हैं। विनय पिटक के अंतर्गत मुख्यतः तीन ग्रंथ हैं — सुत्त विभंग, खंधक और परिवार।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इसके अतिरिक्त एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि प्रथम बौद्ध संगीति (483 ई.पू., राजगृह) में उपालि ने विनय पिटक का और आनंद ने सुत्त पिटक का वाचन किया था।
    58. अष्टांग मार्ग की संकल्पना, अंग है-
    (a) दीपवंश की विषयवस्तु का
    (b) दिव्यावदान की विषयवस्तु का
    (c) महापरिनिब्बान की विषयवस्तु का
    (d) धर्मचक्रप्रवर्तन सुत्त की विषयवस्तु का
    I.A.S. (Pre) 1998
    उत्तर-(d)
    बुद्ध ने सारनाथ (ऋषिपत्तन/मृगदाव) में अपना प्रथम उपदेश पाँच ब्राह्मण शिष्यों को दिया, जिसे ‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ कहा जाता है। इसी उपदेश का सार ‘धर्मचक्रप्रवर्तन सुत्त’ में संकलित है, जिसमें चार आर्य सत्य और अष्टांगिक मार्ग का विस्तृत वर्णन है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अष्टांगिक मार्ग के आठ सोपान हैं — सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाक्, सम्यक् कर्मांत, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति और सम्यक् समाधि। इसे ‘मध्यमा प्रतिपदा’ भी कहते हैं क्योंकि यह अति-भोग और अति-तप दोनों के बीच का मार्ग है। अष्टांगिक मार्ग को तीन भागों — शील, समाधि और प्रज्ञा — में वर्गीकृत किया जाता है।
    59.’त्रिपिटक’ ग्रंथ किस धर्म से संबंधित है?
    (a) वैदिक धर्म
    (b) बौद्ध धर्म
    (c) जैन धर्म
    (d) शैव धर्म
    R.A.S./R.T.S. (Pre) 2012
    उत्तर-(b)
    त्रिपिटक बौद्ध धर्म का मूल और सर्वप्रमुख धर्मग्रंथ है। इसे पाली भाषा में लिखा गया और इसमें बुद्ध की संपूर्ण शिक्षाओं का व्यवस्थित संकलन है। ‘त्रि’ अर्थात तीन और ‘पिटक’ अर्थात टोकरी — यानी ‘तीन टोकरियाँ’।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: विशेष तथ्य यह है कि त्रिपिटक की रचना तृतीय बौद्ध संगीति (250 ई.पू.) के समय सम्राट अशोक के संरक्षण में पाटलिपुत्र में हुई, जिसकी अध्यक्षता मोग्गलिपुत्त तिस्स ने की थी।
    60. त्रिपिटक किसकी धार्मिक पुस्तक है?
    (a) जैन
    (b) हिन्दू
    (c) पारसी
    (d) बौद्ध
    63rd B.P.S.C. (Pre) Exam. 2017
    उत्तर-(d)
    त्रिपिटक बौद्ध धर्म का पवित्र धर्मग्रंथ है। यह पाली भाषा में रचित है और इसमें तीन प्रमुख भाग हैं — विनय पिटक, सुत्त पिटक और अभिधम्म पिटक।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: उल्लेखनीय है कि श्रीलंका में त्रिपिटक को ताड़ के पत्तों पर लिखकर सुरक्षित किया गया था और यूनेस्को ने श्रीलंका के पाली त्रिपिटक को ‘विश्व स्मृति रजिस्टर’ (Memory of the World Register) में स्थान दिया है।
    61. त्रिपिटक निम्नलिखित में से किससे संबंधित है?
    (a) जैनियों से
    (b) बौद्धों से
    (c) सिक्खों से
    (d) हिंदुओं से
    M.P.P.C.S. (Pre) 2012
    उत्तर-(b)
    त्रिपिटक बौद्धों का सर्वोच्च धर्मग्रंथ है। बौद्ध परंपरा में इसे ‘बुद्धवचन’ माना जाता है। इसके तीनों खंड — विनय पिटक, सुत्त पिटक और अभिधम्म पिटक — मिलकर बौद्ध धर्म के संपूर्ण दर्शन, आचार और अध्यात्म को समेटते हैं। महत्वपूर्ण
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: त्रिपिटक के सुत्त पिटक में ‘धम्मपद’ नामक अत्यंत लोकप्रिय ग्रंथ सम्मिलित है जिसमें 423 गाथाएँ हैं और इसे ‘बौद्धों की गीता’ भी कहा जाता है।
    62.’यमक’ बुद्ध ‘पिटक’ से संबंधित है-
    (a) सुत्त
    (b) विनय
    (c) अभिधम्म
    (d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
    Jharkhand P.C.S. (Pre) 2016
    उत्तर-(c)
    अभिधम्म पिटक त्रिपिटक का तीसरा और दार्शनिक दृष्टि से सर्वाधिक जटिल भाग है। इसमें बौद्ध दर्शन के सूक्ष्म तत्वों का विश्लेषण प्रश्नोत्तर शैली में किया गया है। इसके अंतर्गत सात ग्रंथ आते हैं — धम्मसंगणि, विभंग, धातुकथा, पुग्गलपञ्ञत्ति, कथावत्थु, यमक और पट्ठान। ‘यमक’ का अर्थ है ‘जोड़े में विचार करना’ — इसमें धर्म-तत्वों को परस्पर विपरीत युग्मों में व्याख्यायित किया गया है। उल्लेखनीय है कि कथावत्थु की रचना मोग्गलिपुत्त तिस्स ने तृतीय बौद्ध संगीति में की थी, जो अभिधम्म पिटक का एक प्रमुख अंग है।
    63. निम्न में से किस बौद्ध साहित्य में महात्मा बुद्ध के ‘नैतिक एवं सिद्धांत’ संबंधित प्रवचन संकलित हैं?
    (a) विनय पिटक
    (b) जातक कथाएं
    (c) अभिधम्म पिटक
    (d) सुत्त पिटक
    M.P.P.C.S. (Pre) 2014
    उत्तर-(d)
    सुत्त पिटक में बुद्ध के नैतिक उपदेश और धार्मिक सिद्धांत संकलित हैं। इसे पाँच निकायों में विभाजित किया गया है — दीघ निकाय, मज्झिम निकाय, संयुत्त निकाय, अंगुत्तर निकाय और खुद्दक निकाय। जातक कथाएँ खुद्दक निकाय का ही हिस्सा हैं, जिनमें बुद्ध के 550 पूर्व जन्मों की कथाएं हैं। विनय पिटक में संघ के अनुशासन के नियम हैं जबकि अभिधम्म पिटक में गूढ़ दार्शनिक विवेचन है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सुत्त पिटक के दीघ निकाय में ‘महापरिनिब्बान सुत्त’ है, जो बुद्ध के अंतिम दिनों और उनके महापरिनिर्वाण का सबसे प्रमाणिक विवरण प्रस्तुत करता है।
    64. बौद्ध संघ में भिक्षुणी के रूप में स्त्रियों के प्रवेश की अनुमति बुद्ध द्वारा दी गई थी-
    (a) श्रावस्ती में
    (b) वैशाली में
    (c) राजगृह में
    (d) कुशीनगर में
    U.P.P.C.S. (Pre) 2010
    उत्तर-(b)
    बुद्ध ने प्रारंभ में स्त्रियों को संघ में प्रवेश देने से मना किया था, परंतु अपने प्रिय शिष्य आनंद के आग्रह और महाप्रजापति गौतमी की निष्ठा देखकर उन्होंने वैशाली में स्त्रियों को भिक्षुणी के रूप में संघ-प्रवेश की अनुमति दी। महाप्रजापति गौतमी बुद्ध की मौसी और पालनकर्त्री माँ थीं और वे बौद्ध संघ में प्रवेश पाने वाली सर्वप्रथम स्त्री बनीं। उल्लेखनीय है कि बुद्ध ने स्त्रियों के संघ-प्रवेश के साथ ‘अष्ट गुरुधर्म’ नामक आठ विशेष नियम भी लागू किए, जो भिक्षुणियों पर भिक्षुओं के प्रति आदर-भाव का दायित्व निर्धारित करते थे।
    65. गौतम बुद्ध के बारे में निम्न में से क्या सत्य है?
    1. वे कर्म में विश्वास करते थे।
    2. आत्मा का शरीर में परिवर्तन मानते थे।
    3. निर्वाण प्राप्ति में विश्वास करते थे।
    4. ईश्वर की सत्ता में विश्वास करते थे। निम्न कूटों में से सही उत्तर चुनिए-
    (a) केवल 1, 2, 3 सही हैं।
    (b) 1, 2 सही हैं।
    (c) केवल 1 सही है।
    (d) सभी चारों सही हैं।
    U.P.P.C.S. (Pre) 1992
    उत्तर-(*)
    महात्मा बुद्ध कर्म सिद्धांत में दृढ़ विश्वास रखते थे और निर्वाण प्राप्ति को जीवन का परम लक्ष्य मानते थे। वे पुनर्जन्म में विश्वास करते थे, किंतु उनका पुनर्जन्म का सिद्धांत अनात्मवाद पर आधारित था — अर्थात आत्मा नहीं, बल्कि कर्म-संस्कारों की सन्तति का पुनर्जन्म होता है। वे ईश्वर की सत्ता में विश्वास नहीं करते थे, इसलिए बौद्ध धर्म को ‘नास्तिक दर्शन’ की श्रेणी में रखा जाता है। अतः कथन 1 और 3 सही हैं, जो किसी दिए गए विकल्प से मेल नहीं खाते — इसीलिए उत्तर (*) अर्थात ‘कोई उत्तर नहीं’ है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बुद्ध ने ईश्वर, आत्मा और वेदों की प्रामाणिकता तीनों को अस्वीकार किया, इसी कारण उन्हें वैदिक परंपरा का विरोधी माना गया।
    66. ‘संसार अस्थिर और क्षणिक है’ का निम्न में किससे संबंध है?
    (a) बौद्ध
    (b) जैन
    (c) गीता
    (d) वेदांत
    U.P.P.C.S. (Pre) 1992
    उत्तर-(a)
    बौद्ध दर्शन में क्षणिकवाद (Momentarism) एक मूलभूत सिद्धांत है। गौतम बुद्ध ने अनित्यवाद का प्रतिपादन करते हुए कहा कि इस जगत में कोई भी वस्तु स्थायी नहीं है — सब कुछ निरंतर परिवर्तनशील है। क्षणिकवाद इसी का तार्किक विस्तार है, जिसके अनुसार प्रत्येक वस्तु और विचार केवल एक क्षण के लिए अस्तित्व में रहता है और अगले ही क्षण नष्ट हो जाता है। जैसे दीपक की लौ में हर पल नई लौ जलती और बुझती है, उसी प्रकार समस्त जगत क्षण-क्षण परिवर्तित होता रहता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बौद्ध दर्शन के इस क्षणिकवाद को बाद में दिग्नाग और धर्मकीर्ति जैसे बौद्ध दार्शनिकों ने और अधिक परिष्कृत किया। धर्मकीर्ति ने अपने ग्रंथ ‘प्रमाणवार्तिक’ में इसे तर्कसम्मत आधार दिया। साथ ही, यह सिद्धांत बौद्ध धर्म के चार आर्य सत्यों — दुःख, समुदाय, निरोध और मार्ग — से भी गहराई से जुड़ा है, क्योंकि संसार की अनित्यता को समझना ही दुःख से मुक्ति का पहला कदम माना गया है।
    67. अनात्मवाद सिद्धांत है-
    (a) सांख्य का
    (b) वेदांत का
    (c) बौद्ध दर्शन का
    (d) जैन दर्शन का
    Chhattisgarh P.S.C. (Pre) 2017
    उत्तर-(c)
    अनात्मवाद (नैरात्मवाद) बौद्ध दर्शन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है। गौतम बुद्ध ने ‘सर्वं अनात्मकम्’ कहते हुए यह स्पष्ट किया कि न तो कोई शाश्वत आत्मा है और न ही कोई स्थायी भौतिक तत्व। यह सिद्धांत उपनिषदों के आत्मवाद के विपरीत है जिसमें आत्मा को नित्य और अविनाशी माना गया है। बुद्ध के अनुसार जो हम ‘मैं’ या ‘आत्मा’ समझते हैं, वह वास्तव में पाँच स्कंधों (रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार, विज्ञान) का क्षणिक समूह मात्र है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बौद्ध दर्शन में अनात्मवाद को तीन लक्षणों (त्रिलक्षण) में से एक माना गया है — अनित्य, दुःख और अनात्मन। बाद के बौद्ध दार्शनिकों में नागार्जुन ने अपने माध्यमिक दर्शन (शून्यवाद) में इसे और गहराई दी तथा यह सिद्ध किया कि न केवल आत्मा, बल्कि समस्त धर्म (घटनाएं) भी स्वभावशून्य हैं।
    68. बौद्ध धर्म में ‘त्रिरत्न’ का क्या अभिप्राय है?
    (a) त्रिपिटक
    (b) बुद्ध, धम्म, संघ
    (c) शील, समाधि, संघ
    (d) सत्य, अहिंसा, करुणा
    U.P.R.O./A.R.O. (Pre) 2017
    उत्तर-(b)
    बौद्ध धर्म में ‘त्रिरत्न’ — बुद्ध, धम्म और संघ — को सर्वोच्च आश्रय माना गया है। प्रत्येक बौद्ध अनुयायी दीक्षा के समय “बुद्धं शरणं गच्छामि, धम्मं शरणं गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि” का उच्चारण करता है। बुद्ध की मृत्यु (महापरिनिर्वाण) के बाद उनकी शिक्षाओं को संकलित कर तीन भागों में विभाजित किया गया जिन्हें त्रिपिटक कहा जाता है — विनय पिटक (संघ के नियम), सुत्त पिटक (बुद्ध के उपदेश) और अभिधम्म पिटक (दार्शनिक विश्लेषण)।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: त्रिपिटक मूलतः पाली भाषा में लिखे गए हैं और इनका संकलन प्रथम बौद्ध संगीति (483 ई.पू.) में राजगृह की सप्तपर्णी गुफा में हुआ था, जिसकी अध्यक्षता महाकस्सप ने की थी। त्रिरत्न की अवधारणा जैन धर्म में भी मिलती है, किंतु जैन धर्म में त्रिरत्न हैं — सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र।
    69. वह स्तूप-स्थल, जिसका संबंध भगवान बुद्ध के जीवन की किसी घटना से नहीं रहा है, वह है :
    (a) सारनाथ
    (b) सांची
    (c) बोधगया
    (d) कुशीनारा
    U.P.P.C.S. (Mains) 2011
    U.P.P.C.S. (Spl.) (Pre) 2008
    उत्तर-(b)
    बुद्ध के जीवन से जुड़े चार प्रमुख स्थल हैं — लुम्बिनी (जन्म), बोधगया (ज्ञान प्राप्ति), सारनाथ (प्रथम उपदेश / धर्मचक्रप्रवर्तन) और कुशीनगर (महापरिनिर्वाण)। इनके विपरीत, सांची का स्तूप बुद्ध के जीवन की किसी विशेष घटना से संबंधित नहीं है। सांची का महान स्तूप सम्राट अशोक द्वारा मध्यप्रदेश में बनवाया गया था और यह बुद्ध के अवशेषों (धातु) को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से निर्मित किया गया था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सांची के स्तूप को यूनेस्को ने 1989 में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया। सांची स्तूप के चार द्वार (तोरण) अत्यंत प्रसिद्ध हैं जिन पर बुद्ध के जीवन और जातक कथाओं के दृश्य अंकित हैं। इन तोरणों का निर्माण शुंग और सातवाहन काल में हुआ था।
    70. निम्नलिखित स्तूपों का सही तैथिक क्रम (कालानुक्रम) क्या है?
    (a) भरहुत, सांची, अमरावती, धमेख
    (b) अमरावती, सांची, भरहुत, धमेख
    (c) सांची, अमरावती, भरहुत, धमेख
    (d) धमेख, भरहुत, अमरावती, सांची
    U.P.P.C.S. (Mains) 2014
    उत्तर-(*)
    सांची और भरहुत स्तूपों की नींव मौर्य सम्राट अशोक (तीसरी शताब्दी ई.पू.) के शासनकाल में रखी गई थी। धमेख स्तूप (सारनाथ) को भी कुछ इतिहासकार अशोक काल से जोड़ते हैं, जबकि इसका वर्तमान स्वरूप गुप्त काल (5वीं-6वीं शताब्दी ई.) में निर्मित माना जाता है। अमरावती स्तूप का निर्माण सातवाहन वंश के काल (दूसरी शताब्दी ई.पू. से दूसरी शताब्दी ई.) में हुआ। चूँकि भरहुत, सांची और धमेख के मध्य सटीक कालक्रम निर्धारित करना संभव नहीं है, इसलिए इस प्रश्न का कोई निश्चित उत्तर नहीं है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अमरावती स्तूप आंध्रप्रदेश के गुंटूर जिले में कृष्णा नदी के तट पर स्थित है और इसे ‘महाचैत्य’ भी कहा जाता है। भरहुत स्तूप को सर्वप्रथम अलेक्जेंडर कनिंघम ने 1873 में खोजा था और इसकी वेदिकाएँ अब कोलकाता के भारतीय संग्रहालय में सुरक्षित हैं।
    71. सर्वप्रथम ‘स्तूप’ शब्द कहां मिलता है ?
    (a) ऋग्वेद
    (b) जातक कथा
    (c) अर्थशास्त्र
    (d) अष्टाध्यायी
    Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2015
    उत्तर-(a)
    ‘स्तूप’ शब्द का सबसे प्राचीन उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। इसका शाब्दिक अर्थ है ‘ढेर’ या ‘मिट्टी का टीला’। ऋग्वेद के अतिरिक्त अथर्ववेद, वाजसनेयी संहिता, तैत्तरीय ब्राह्मण और पंचविश ब्राह्मण में भी स्तूप का उल्लेख आता है। बौद्ध काल में स्तूप का अर्थ बदलकर उस अर्धगोलाकार संरचना से हो गया जिसमें बुद्ध या किसी महत्वपूर्ण बौद्ध व्यक्ति के अवशेष (धातु) रखे जाते थे।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बौद्ध परंपरा के अनुसार, बुद्ध के महापरिनिर्वाण के पश्चात उनके अवशेषों को आठ भागों में विभाजित किया गया और उन पर आठ स्तूप बनाए गए। बाद में सम्राट अशोक ने इन स्तूपों को खुलवाकर अवशेषों को 84,000 भागों में बाँटकर सारे साम्राज्य में स्तूप बनवाए — यह वृत्तांत अशोकावदान में मिलता है। स्तूप की संरचना के मुख्य भाग होते हैं — अंड (गुंबद), हर्मिका (रेलिंग), यष्टि (छत्र-दंड), और वेदिका (परिक्रमा पथ की रेलिंग)।
    72. विश्व का सबसे ऊंचा कहा जाने वाला ‘विश्व शांति स्तूप’ बिहार में कहां है?
    (a) वैशाली
    (b) नालंदा
    (c) राजगीर
    (d) पटना
    48th to 52nd B.P.S.C. (Pre) 2008
    उत्तर-(c)
    बिहार के राजगीर में रत्नागिरि पहाड़ी (लगभग 400 मीटर ऊँचाई) पर स्थित विश्व शांति स्तूप (Peace Pagoda) को विश्व का सबसे ऊँचा शांति स्तूप कहा जाता है। इसका निर्माण जापानी बौद्ध संगठन ‘निप्पोनजान म्योहोजी’ द्वारा किया गया था। राजगीर का ऐतिहासिक महत्व इसलिए भी है क्योंकि यहाँ बुद्ध ने कई वर्ष बिताए और यहीं प्रथम बौद्ध संगीति (राजगृह, 483 ई.पू.) का आयोजन हुआ था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: राजगीर को प्राचीनकाल में ‘राजगृह’ कहा जाता था और यह मगध साम्राज्य की प्रारंभिक राजधानी थी। यहीं भगवान बुद्ध ने गृधकूट पर्वत पर अनेक महत्वपूर्ण उपदेश दिए थे, जिनमें प्रज्ञापारमिता सूत्र भी शामिल है। इसके अतिरिक्त, विश्व शांति स्तूप के शीर्ष तक पहुँचने के लिए रोपवे (उड्डनखटोला) की सुविधा उपलब्ध है जो पर्यटकों में अत्यंत लोकप्रिय है।
    73. बुद्ध की 80 फुट बड़ी प्रतिमा जो बोधगया में है, निर्मित की गई थी-
    (a) जापानियों के द्वारा
    (b) थाई लोगों के द्वारा
    (c) श्रीलंकाइयों के द्वारा
    (d) भूटानियों के द्वारा
    R.A.S./ R.T.S. (Pre) 1993
    उत्तर-(a)
    बोधगया में स्थित 80 फुट (लगभग 25 मीटर) ऊँची बुद्ध प्रतिमा का निर्माण जापान के ‘दाईजोकियो’ बौद्ध संप्रदाय के सहयोग से किया गया था। यह प्रतिमा लाल ग्रेनाइट और बलुई पत्थर से निर्मित है और इसके निर्माण में लगभग 7 वर्ष का समय लगा। बोधगया वही पवित्र स्थल है जहाँ गौतम बुद्ध को पीपल के वृक्ष (बोधि वृक्ष) के नीचे ज्ञान (बोधि) की प्राप्ति हुई थी।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बोधगया में स्थित महाबोधि मंदिर परिसर को यूनेस्को ने 2002 में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया। यहाँ का मूल बोधि वृक्ष वही माना जाता है जिसके नीचे बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था — वर्तमान वृक्ष उसी मूल वृक्ष की संतान है। बोधगया बिहार के गया जिले में फल्गु नदी के तट पर स्थित है।
    74. अशोकाराम विहार निम्नलिखित में से किस स्थान पर स्थित था?
    (a) वैशाली
    (b) पाटलिपुत्र
    (c) कौशाम्बी
    (d) श्रावस्ती
    U.P.P.C.S. (Mains) 2015
    उत्तर-(b)
    प्रसिद्ध बौद्ध ग्रंथ महावंश के अनुसार, मौर्य सम्राट अशोक ने अपनी राजधानी पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना) में अशोकाराम विहार का निर्माण करवाया था। इस विहार का निर्माण थेर भिक्षु इंद्रगुप्त के निरीक्षण में हुआ। यह विहार बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। अशोक के काल में ही तृतीय बौद्ध संगीति का आयोजन पाटलिपुत्र में हुआ था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तृतीय बौद्ध संगीति (लगभग 250 ई.पू.) की अध्यक्षता मोग्गलिपुत्त तिस्स ने की थी और इसी संगीति में अभिधम्म पिटक को अंतिम रूप दिया गया। अशोक ने इसी संगीति के पश्चात अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका में बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु भेजा था — संघमित्रा अपने साथ बोधि वृक्ष की एक शाखा भी लेकर गई थीं।
    75. प्राचीन भारत के बौद्ध मठों में, पवरन नामक समारोह आयोजित किया जाता था, जो-
    (a) संघपरिनायक और धर्म तथा विनय विषयों पर एक-एक वक्ता को चुनने का अवसर होता था।
    (b) वर्षा ऋतु के दौरान मठों में प्रवास के समय भिक्षुओं द्वारा किए गए अपराधों की स्वीकारोक्ति का अवसर होता था।
    (c) किसी नए व्यक्ति को बौद्ध संघ में प्रवेश देने का समारोह होता था, जिसमें उसका सिर मुंडवा दिया जाता था और पीले वस्त्र दिए जाते थे।
    (d) आषाढ़ की पूर्णिमा के अगले दिन बौद्ध भिक्षुओं के एकत्र होने का अवसर होता था, जब वे वर्षा ऋतु के आगामी चार महीनों के लिए निश्चित आवास चुनते थे।
    I.A.S. (Pre) 2002
    उत्तर-(b)
    पवरन (Pavāraṇā) बौद्ध परंपरा का एक महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान था जो वर्षावास (वस्सा) की समाप्ति पर आयोजित होता था। वर्षा ऋतु के चार महीने (आषाढ़ पूर्णिमा से कार्तिक पूर्णिमा तक) बौद्ध भिक्षु एक स्थान पर ठहरते थे और धर्म प्रचार कार्य स्थगित रहता था। वर्षावास समाप्त होने पर आयोजित पवरन समारोह में भिक्षु एक-दूसरे के समक्ष अपने कृत्यों की आलोचना व स्वीकारोक्ति करते थे और भविष्य की योजना बनाते थे।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: पवरन के अगले दिन ‘कठिन’ समारोह होता था जिसमें गृहस्थ बौद्ध अनुयायी भिक्षुओं को वस्त्र (चीवर) दान करते थे — यह परंपरा आज भी थेरवाद बौद्ध देशों जैसे श्रीलंका, थाईलैंड और म्यांमार में जीवित है। वर्षावास की परंपरा भगवान बुद्ध ने स्वयं आरंभ की थी ताकि वर्षा में यात्रा के दौरान अनजाने में जीव-जंतुओं को हानि न पहुँचे।
    76. गांधार शैली की पूर्ति कला में बुद्ध के सारनाथ में हुए प्रथम धर्मोपदेश से संबद्ध प्रवचन मुद्रा का नाम है-
    (a) अभय
    (b) ध्यान
    (c) धर्मचक्र
    (d) भूमिस्पर्श
    I.A.S. (Pre) 1994
    उत्तर-(c)
    सारनाथ में बुद्ध का पहला उपदेश ‘धम्मचक्कपवत्तन’ (धर्मचक्र प्रवर्तन) कहलाता है और इससे जुड़ी मुद्रा ‘धर्मचक्र मुद्रा’ है, जिसमें दोनों हाथ छाती के सामने एक विशेष संकेत की स्थिति में होते हैं। गांधार कला शैली पहली से पाँचवीं शताब्दी ईस्वी के बीच वर्तमान पाकिस्तान और अफगानिस्तान क्षेत्र में विकसित हुई, जिसमें यूनानी-रोमन (हेलेनिस्टिक) कला का स्पष्ट प्रभाव दिखता है — बुद्ध की मूर्तियों में घुंघराले बाल और यूनानी वस्त्र इसी प्रभाव के प्रमाण हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गांधार कला की सबसे प्रसिद्ध मूर्तियाँ लाहौर संग्रहालय और पेशावर संग्रहालय में सुरक्षित हैं। इस शैली में बुद्ध की चार प्रमुख मुद्राएँ प्रचलित हैं — अभय (भय निवारण), ध्यान (समाधि), धर्मचक्र (उपदेश) और भूमिस्पर्श (ज्ञान प्राप्ति का क्षण)।
    77. देश में निम्न में से किसने मूर्ति पूजा की नींव रखी थी?
    (a) जैन धर्म ने
    (b) बौद्ध धर्म ने
    (c) आजीविकों ने
    (d) वैदिक धर्म ने
    U.P. Lower Sub. (Spl.) (Pre) 2008
    उत्तर-(b)
    भारत में संगठित और व्यापक स्तर पर मूर्ति पूजा की परंपरा का श्रेय बौद्ध धर्म की महायान शाखा को जाता है। महायानियों ने ईसा की पहली-दूसरी शताब्दी में बुद्ध को देवता मानकर उनकी प्रतिमाएँ स्थापित करना शुरू किया। इससे पहले बौद्ध धर्म में बुद्ध का प्रतीकात्मक रूप से — जैसे चरण-चिह्न, छत्र, बोधि वृक्ष और धर्मचक्र से — स्मरण होता था, प्रत्यक्ष मूर्ति से नहीं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मथुरा और गांधार — ये दो प्रमुख केंद्र थे जहाँ बुद्ध की सर्वप्रथम मूर्तियाँ निर्मित हुईं। मथुरा शैली में बुद्ध की मूर्तियाँ लाल बलुआ पत्थर से बनाई गई थीं और उनमें भारतीय परंपरा का प्रभाव अधिक था, जबकि गांधार शैली पर यूनानी प्रभाव स्पष्ट था।
    78. भारत में पहले जिन मानव प्रतिमाओं को पूजा गया, वे थीं-
    (a) ब्रह्मा की
    (b) विष्णु की
    (c) बुद्ध की
    (d) शिव की
    R.A.S. / R.T.S. (Pre) 2010
    उत्तर-(c)
    ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर भारत में सबसे पहले बुद्ध की मानव प्रतिमाओं की पूजा की गई। यह परिवर्तन लगभग पहली शताब्दी ईस्वी में महायान बौद्ध धर्म के उदय के साथ आया, जब बुद्ध को मानव-गुरु की बजाय दिव्य देवता के रूप में स्थापित किया जाने लगा। इससे पहले के हीनयान काल में बुद्ध को प्रतीकों के माध्यम से याद किया जाता था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कुषाण शासक कनिष्क (लगभग 127-150 ईस्वी) के काल में बुद्ध मूर्तियों का व्यापक प्रसार हुआ। साँची के स्तूप के तोरण द्वारों (पहली शताब्दी ईसा पूर्व) पर बुद्ध को सिंहासन, पदचिह्न और छत्र से दर्शाया गया है — यह प्रतीकात्मक युग का प्रमाण है, जो मूर्ति पूजा से पहले का है।
    79. गौतम बुद्ध को एक देवता का स्थान किस राजा के युग में प्राप्त हुआ?
    (a) अशोक
    (b) कनिष्क
    (c) चंद्रगुप्त विक्रमादित्य
    (d) हर्ष
    45th B.P.S.C. (Pre) 2001
    उत्तर-(b)
    कुषाण सम्राट कनिष्क के शासनकाल में कश्मीर के कुंडलवन में चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन हुआ, जिसकी अध्यक्षता वसुमित्र ने की थी। इसी संगीति में बौद्ध धर्म औपचारिक रूप से हीनयान और महायान — दो शाखाओं में विभाजित हुआ। महायान शाखा ने बुद्ध को देवता घोषित करते हुए उनकी पूजा-अर्चना को धर्म का केंद्र बनाया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कनिष्क स्वयं बौद्ध धर्म का अनुयायी था और उसने अनेक बौद्ध विहारों एवं स्तूपों का निर्माण कराया — पेशावर का ‘कनिष्क स्तूप’ उस काल का सबसे ऊँचा स्तूप माना जाता था। इसी काल में बौद्ध धर्म मध्य एशिया, चीन और तिब्बत तक फैला।
    80. बौद्ध धर्म के महायान और हीनयान संप्रदायों में सर्वाधिक मौलिक अंतर निम्नलिखित में कौन-सा है?
    (a) अहिंसा पर बल
    (b) जाति रहित समाज
    (c) देवी-देवताओं की पूजा
    (d) स्तूप पूजा
    U.P.P.C.S. (Pre) 1996
    उत्तर-(c)
    हीनयान और महायान का सबसे बुनियादी भेद बुद्ध की स्थिति और देवी-देवताओं की भूमिका को लेकर है। हीनयान में बुद्ध एक महान मानव-शिक्षक थे जिन्होंने स्वयं मोक्ष का मार्ग दिखाया; इसमें व्यक्तिगत साधना और निर्वाण पर जोर था। महायान में बुद्ध को दिव्य ईश्वर माना गया और ‘बोधिसत्व’ की अवधारणा विकसित हुई — जो स्वयं निर्वाण को स्थगित करके सभी प्राणियों की मुक्ति के लिए कार्य करता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: हीनयान की प्रमुख भाषा पाली थी और यह शाखा मुख्यतः श्रीलंका, म्यांमार और थाईलैंड में प्रचलित है (इसे ‘थेरवाद’ भी कहते हैं)। महायान की भाषा संस्कृत थी और यह चीन, जापान, कोरिया और तिब्बत में फैली। नागार्जुन महायान के सर्वश्रेष्ठ दार्शनिक थे, जिनका ‘शून्यवाद’ का सिद्धांत इसी शाखा की बौद्धिक आधारशिला है।
    81. ‘क्षणिकवाद’ का प्रतिपादन किसने किया?
    (a) बुद्ध
    (b) जैन
    (c) चार्वाक
    (d) न्याय
    Chhattisgarh P.S.C. (Pre) 2017
    उत्तर-(a)
    क्षणिकवाद बौद्ध दर्शन का वह सिद्धांत है जो कहता है कि संसार की प्रत्येक वस्तु — चाहे भौतिक हो या मानसिक — हर क्षण परिवर्तित होती रहती है और कोई भी चीज़ दो क्षणों तक एक जैसी नहीं रहती। बुद्ध के ‘अनित्यता’ (अनिच्च) के मूल विचार से ही यह सिद्धांत विकसित हुआ। बौद्धोत्तर दार्शनिकों ने इसे और सुव्यवस्थित किया — आत्मा क्षणिक है, वस्तुएँ अनित्य हैं, इसलिए किसी में भी आसक्ति दुःख का कारण है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बौद्ध दर्शन के तीन मूल लक्षण हैं — अनित्यता (अनिच्च), दुःख (दुक्ख) और अनात्मा (अनत्ता)। क्षणिकवाद इन तीनों से जुड़ा है। धर्मकीर्ति (7वीं शताब्दी) ने अपने ग्रंथ ‘प्रमाणवार्तिका’ में क्षणिकवाद को तार्किक रूप से सबसे परिष्कृत ढंग से प्रस्तुत किया।
    82. सर एडविन एर्नाल्ड की पुस्तक ‘द लाइट ऑफ एशिया’ आधारित है-
    (a) दिव्यावदान पर
    (b) ललितविस्तार पर
    (c) सुत्तपिटक पर
    (d) अभिधम्मपिटक पर
    U.P.P.C.S. (Mains) 2014
    उत्तर-(b)
    सर एडविन अर्नाल्ड की महाकाव्यात्मक कृति ‘The Light of Asia’ (1879) संस्कृत ग्रंथ ‘ललितविस्तार’ पर आधारित है, जो गौतम बुद्ध के जीवन का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है। यह पुस्तक पश्चिमी जगत में बौद्ध धर्म को लोकप्रिय बनाने में अत्यंत प्रभावशाली रही — इसकी एक लाख से अधिक प्रतियाँ बिकीं और कई भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ललितविस्तार एक महायान बौद्ध ग्रंथ है जो संस्कृत में लिखा गया है और बुद्ध के जन्म से लेकर उनके प्रथम उपदेश तक का वर्णन करता है। स्वामी विवेकानंद ‘द लाइट ऑफ एशिया’ से अत्यंत प्रभावित थे और उन्होंने इसकी सार्वजनिक रूप से प्रशंसा की थी।
    83. निम्नलिखित में से किसे ‘एशिया के ज्योति पुंज’ के तौर पर जाना जाता है?
    (a) गौतम बुद्ध को
    (b) महात्मा गांधी को
    (c) महावीर स्वामी को
    (d) स्वामी विवेकानंद को
    U.P.P.C.S. (Mains) 2010
    उत्तर-(a)
    गौतम बुद्ध को ‘एशिया के ज्योति पुंज’ (Light of Asia) की उपाधि दी जाती है, जो सर एडविन अर्नाल्ड की 1879 में प्रकाशित काव्य-पुस्तक ‘The Light of Asia’ से लोकप्रिय हुई। इस पुस्तक ने बुद्ध के जीवन और शिक्षाओं को पश्चिमी दुनिया के सामने काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत किया और एशियाई आध्यात्मिकता के प्रति व्यापक रुचि जगाई।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गौतम बुद्ध का जन्म लगभग 563 ईसा पूर्व नेपाल के लुंबिनी में हुआ था। उन्हें ‘एशिया के प्रकाश पुंज’ कहे जाने का एक कारण यह भी है कि बौद्ध धर्म पूरे एशिया — भारत, चीन, जापान, श्रीलंका, थाईलैंड, कोरिया, वियतनाम — में फैला और करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित किया। वर्तमान में बौद्ध धर्म विश्व के प्रमुख धर्मों में से एक है जिसके लगभग 53 करोड़ अनुयायी हैं।
    84. निम्नांकित में से किसे ‘एशिया का ज्योति पुंज’ नाम से जाना जाता है?
    (a) ईसा मसीह
    (b) भगवान बुद्ध
    (c) पैगम्बर मुहम्मद
    (d) जरथुस्ट
    Uttaranchal P.C.S. (Pre) 2005
    उत्तर-(b)
    भगवान बुद्ध को ही ‘एशिया का ज्योति पुंज’ कहा जाता है। यह उपाधि उनकी शिक्षाओं — अहिंसा, करुणा, मध्यम मार्ग और चार आर्य सत्यों — के उस व्यापक प्रभाव को दर्शाती है जो उन्होंने पूरे एशिया महाद्वीप पर डाला। सर एडविन अर्नाल्ड की पुस्तक ‘The Light of Asia’ ने इस संज्ञा को विश्वव्यापी पहचान दिलाई।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बुद्ध के चार आर्य सत्य हैं — दुःख, दुःख-समुदय (कारण), दुःख-निरोध (निवारण) और दुःख-निरोध-गामिनी-प्रतिपदा (मार्ग)। इन्हीं के आधार पर उन्होंने अष्टांगिक मार्ग का प्रतिपादन किया, जो आज भी एशिया के करोड़ों बौद्ध अनुयायियों का जीवन-दर्शन है।
    85. भारत के सांस्कृतिक इतिहास के संदर्भ में, ‘पारमिता’ शब्द का सही विवरण निम्नलिखित में से कौन-सा है?
    (a) सूत्र पद्धति में लिखे गए प्राचीनतम धर्मशास्त्र पाठ
    (b) वेदों के प्राधिकार को अस्वीकार करने वाले दार्शनिक संप्रदाय
    (c) परिपूर्णताएं जिनकी प्राप्ति से बोधिसत्व पथ प्रशस्त हुआ
    (d) आरंभिक मध्यकालीन दक्षिण भारत की शक्तिशाली व्यापारी श्रेणियां
    I.A.S. (Pre) 2020
    उत्तर-(c)
    ‘पारमिता’ संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ है ‘परम सिद्धि’ या ‘पूर्णता’। महायान बौद्ध धर्म में बोधिसत्व को बुद्धत्व प्राप्त करने के लिए षट्पारमिताओं को साधना आवश्यक है — दान (उदारता), शील (नैतिकता), क्षान्ति (धैर्य), वीर्य (परिश्रम), ध्यान (एकाग्रता) और प्रज्ञा (ज्ञान)। इनमें प्रज्ञा पारमिता सर्वोच्च मानी जाती है क्योंकि यही वास्तविकता के यथार्थ स्वरूप का बोध कराती है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘अष्टसाहस्रिका प्रज्ञापारमिता’ बौद्ध धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है जो प्रज्ञापारमिता साहित्य का आधार माना जाता है — इसे ‘बुद्धों की माता’ भी कहा जाता है। थेरवाद (हीनयान) परंपरा में दस पारमिताओं का उल्लेख है, जबकि महायान में छह पारमिताओं को मान्यता दी गई है।
    86. महायान बौद्ध धर्म में बोधिसत्व अवलोकितेश्वर को और किस अन्य नाम से जानते हैं?
    (a) वज्रपाणि
    (b) मंजुश्री
    (c) पद्मपाणि
    (d) मैत्रेय
    I.A.S. (Pre) 1997
    उत्तर-(c)
    महायान बौद्ध धर्म में अवलोकितेश्वर को ‘पद्मपाणि’ (कमल धारण करने वाला) भी कहा जाता है। ये बोधिसत्व करुणा के प्रतीक माने जाते हैं और इनकी मान्यता है कि जब तक संसार के समस्त प्राणियों को मुक्ति नहीं मिल जाती, तब तक ये स्वयं बुद्धत्व ग्रहण नहीं करेंगे। हिंदू धर्म के प्रभाव से ‘अवलोकितेश्वर’ को नारायण या विष्णु के एक रूप के रूप में भी देखा गया है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अजंता की गुफाओं (विशेषकर गुफा संख्या 1) में अवलोकितेश्वर/पद्मपाणि की अत्यंत भव्य चित्रकारी मिलती है, जिसे भारतीय चित्रकला का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। तिब्बत में अवलोकितेश्वर को ‘चेनरेजिग’ कहा जाता है और दलाई लामा को उनका अवतार माना जाता है।
    87. निम्नलिखित में से कौन-से शासक ने बौद्धमत के विस्तार योगदान नहीं दिया?
    (a) हर्षवर्धन
    (b) कनिष्क
    (c) अशोक
    (d) पुष्यमित्र शुंग
    Chhattisgarh P.S.C. (Pre) 2018
    उत्तर-(d)
    अशोक, कनिष्क और हर्षवर्धन — इन तीनों शासकों ने बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके विपरीत, शुंग वंश के संस्थापक पुष्यमित्र शुंग ने वैदिक धर्म की पुनः प्रतिष्ठा की। उन्होंने अश्वमेध यज्ञ करवाए और मौर्यकाल में उपेक्षित ब्राह्मण परंपराओं को पुनर्जीवित किया। इसीलिए उनका शासनकाल ‘वैदिक पुनर्जागरण’ का काल कहलाता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कनिष्क के शासनकाल में कश्मीर में चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन हुआ था, जिसमें महायान बौद्ध धर्म को औपचारिक रूप से मान्यता मिली। पुष्यमित्र शुंग के बारे में बौद्ध ग्रंथों में उल्लेख है कि उसने बौद्ध विहारों को क्षति पहुँचाई, हालांकि यह विवादास्पद है।
    88. बुद्ध की खड़ी प्रतिमा निम्न में से किस काल में बनाई गई?
    (a) गुप्त काल
    (b) कुषाण काल
    (c) मौर्य काल
    (d) गुप्तोत्तर काल
    U.P.P.C.S. (Pre) 1992
    उत्तर-(b)
    कुषाण काल में गांधार और मथुरा — दो प्रमुख कला शैलियों के अंतर्गत बुद्ध तथा बोधिसत्वों की बड़ी संख्या में मूर्तियाँ बनाई गईं, जिनमें बैठी और खड़ी दोनों मुद्राएँ शामिल थीं। वी.एस. अग्रवाल के अनुसार बुद्ध मूर्तियों का निर्माण सर्वप्रथम मथुरा में हुआ। चीनी यात्री ह्वेनसांग के विवरण के अनुसार बुद्ध की प्रथम प्रतिमा कौशांबी में बनी, जबकि कई विद्वान यह श्रेय गांधार कला को देते हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गांधार शैली पर ग्रीको-रोमन (यूनानी-रोमन) कला का स्पष्ट प्रभाव दिखता है — इसीलिए इसे ‘ग्रीको-बौद्ध कला’ भी कहा जाता है। गांधार मूर्तियाँ प्रायः नीले-भूरे रंग के शिस्ट पत्थर से बनती थीं, जबकि मथुरा शैली में लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग होता था।
    89. भारत के सांस्कृतिक इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए-
    1. परिव्राजक – परित्यागी व भ्रमणकारी
    2. श्रमण – उच्च पद प्राप्त पुजारी
    3. उपासक – बौद्ध धर्म का साधारण अनुगामी
    उपर्युक्त युग्मों में से कौन-से सही सुमेलित हैं ?
    (a) केवल 1 और 2
    (b) केवल 1 और 3
    (c) केवल 2 और 3
    (d) 1, 2 और 3
    I.A.S. (Pre) 2020
    उत्तर-(b)
    सही सुमेलन इस प्रकार है — ‘परिव्राजक’ का अर्थ है परित्यागी और भ्रमणशील साधक, जो गृहस्थ जीवन छोड़कर भटकते हुए ज्ञान की खोज करते थे। ‘श्रमण’ का अर्थ है भिक्षु या साधु — ये वे लोग थे जो कठोर साधना में विश्वास रखते थे; इनका संबंध उच्च पुजारी पद से नहीं था। ‘उपासक’ बौद्ध धर्म के गृहस्थ (साधारण) अनुयायी होते थे जो भिक्षु नहीं बनते।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बौद्ध धर्म में संघ की सदस्यता चार वर्गों में विभाजित थी — भिक्षु, भिक्षुणी, उपासक और उपासिका। ‘श्रमण’ परंपरा जैन धर्म में भी प्रचलित थी, जहाँ महावीर स्वामी स्वयं महान श्रमण कहलाते थे।
    90. भगवान बुद्ध की प्रतिमा कभी-कभी एक हस्त मुद्रा युक्त दिखाई गई है, जिसे ‘भूमिस्पर्श मुद्रा’ कहा जाता है। यह किसका प्रतीक है?
    (a) मार पर दृष्टि रखने एवं अपने ध्यान में विघ्न डालने से मार को रोकने के लिए बुद्ध का धरती आह्वान।
    (b) मार के प्रलोभनों के बावजूद अपनी शुचिता और शुद्धता का साक्षी होने के लिए बुद्ध का धरती का आह्वान।
    (c) बुद्ध का अपने अनुयायियों को स्मरण कराना कि वे सभी धरती से उत्पन्न होते हैं और अंततः धरती में विलीन हो जाते हैं, अतः जीवन संक्रमणशील है।
    (d) इस संदर्भ में दोनों ही कथन
    (a) एवं
    (b) सही हैं।
    I.A.S. (Pre) 2012
    उत्तर-(b)
    ‘भूमिस्पर्श मुद्रा’ में बुद्ध की दाहिनी हाथ की उँगलियाँ नीचे की ओर भूमि को स्पर्श करती हैं। यह मुद्रा उस ऐतिहासिक क्षण का प्रतीक है जब बोधगया में पीपल वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ बुद्ध को मार (काम-देव) ने प्रलोभनों से विचलित करने का प्रयास किया। बुद्ध ने पृथ्वी को साक्षी मानकर अपनी तपस्या और शुचिता की प्रामाणिकता सिद्ध की।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बुद्ध की प्रमुख हस्त मुद्राओं में अभय मुद्रा (भय निवारण), धर्मचक्र मुद्रा (प्रथम उपदेश का प्रतीक, सारनाथ से संबंधित), ध्यान मुद्रा और वरद मुद्रा (वरदान देना) भी महत्वपूर्ण हैं। भूमिस्पर्श मुद्रा थेरवाद बौद्ध देशों — विशेषकर थाईलैंड, म्याँमार और श्रीलंका — में सर्वाधिक लोकप्रिय मूर्ति मुद्रा है।
    91. बुद्ध की प्राचीनतम प्रतिमा किस शैली में प्राप्त होती है?
    (a) गांधार शैली
    (b) मथुरा शैली
    (c) मौर्य शैली
    (d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
    66th B.P.S.C. Re-Exam 2020
    उत्तर-(d)
    बुद्ध की प्राचीनतम प्रतिमा किस शैली में बनी — यह प्रश्न अभी तक विद्वानों में विवादास्पद है। ह्वेनसांग के अनुसार प्रथम प्रतिमा कौशांबी में बनी, वी.एस. अग्रवाल मथुरा को श्रेय देते हैं, जबकि अनेक पाश्चात्य विद्वान गांधार कला को। चूँकि कोई एकमत नहीं है, इसलिए ‘उपर्युक्त में से कोई नहीं’ (d) ही सही उत्तर है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मौर्य काल में बुद्ध का प्रतीकात्मक चित्रण होता था — जैसे बोधि वृक्ष, धर्मचक्र, पदचिह्न या छत्र — मूर्तिरूप प्रतिमाएँ नहीं बनाई जाती थीं। मानवाकार बुद्ध प्रतिमाओं का निर्माण कुषाण काल में ही प्रारंभ हुआ।
    92. निम्नलिखित वक्तव्यों पर विचार करें और नीचे दिए गए कूट से सही
    कथन (a) : कुशीनगर मल्ल गणराज्य की राजधानी थी।
    कारण (R) : महात्मा बुद्ध का महापरिनिर्वाण कुशीनगर में हुआ था। उत्तर चुनें-
    (a) दोनों (a) और (R) सही हैं और (R), (a) की सही व्याख्या है।
    (b) दोनों (a) और (R) सही हैं, परंतु (R), (a) की सही व्याख्या नहीं है।
    (c) (a) सही है, परंतु (R) गलत है।
    (d) (a) गलत है, परंतु (R) सही है।
    U.P.P.C.S. (Spl.) (Pre) 2004
    उत्तर-(b)
    मल्ल महाजनपद एक संघ राज्य था जिसकी दो जुड़वां राजधानियाँ थीं — पावा (वर्तमान पडरौना) और कुशीनारा (वर्तमान कसया/कुशीनगर)। चूँकि कुशीनगर राजधानी तो थी, लेकिन यह तथ्य बुद्ध के महापरिनिर्वाण के कारण नहीं था — दोनों कथन स्वतंत्र रूप से सत्य हैं, अतः कारण (R), कथन (A) की सही व्याख्या नहीं है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बुद्ध का महापरिनिर्वाण लगभग 483 ई.पू. में हुआ और उनके अवशेषों (धातु) को आठ भागों में विभाजित कर विभिन्न स्थानों पर स्तूप बनाए गए। कुशीनगर वर्तमान में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर मंडल में स्थित है और बौद्ध तीर्थाटन का प्रमुख केंद्र है।
    93. भूमिस्पर्श मुद्रा की सारनाथ बुद्ध मूर्ति संबंधित है-
    (a) मौर्य काल से
    (b) शुंग काल से
    (c) कुषाण काल से
    (d) गुप्त काल से
    U.P.P.C.S.(Mains) 2009
    उत्तर-(d)
    सारनाथ में स्थित भूमिस्पर्श मुद्रा की बुद्ध प्रतिमा गुप्त काल की अनुपम कृति है। इसमें आध्यात्मिक शांति, सौम्य मुस्कान और ध्यानमग्न भाव की ऐसी अभिव्यक्ति है जो भारतीय मूर्तिकला के उच्चतम शिखर का प्रतिनिधित्व करती है। गुप्तकालीन मूर्तिकला में बाह्य विदेशी प्रभाव की जगह शुद्ध भारतीय शैली प्रधान हुई।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सारनाथ की यह मूर्ति चुनार के बलुआ पत्थर से बनी है और वर्तमान में सारनाथ संग्रहालय में सुरक्षित है। गुप्त काल को ‘भारतीय कला का स्वर्णयुग’ कहा जाता है — इसी काल में अजंता की गुफाओं की सर्वश्रेष्ठ चित्रकारी भी की गई।
    94. सारनाथ की भूमि स्पर्श मुद्रा वाली बुद्ध प्रतिमा कालांकित है-
    (a) कुषाण काल से
    (b) गुप्त काल से
    (c) वर्द्धन काल से
    (d) राजपूत काल से
    U.P. U.D.A./L.D.A. (Spl.) (Pre) 2010
    U.P. U.D.A./ L.D.A. (Spl.) (Mains) 2010
    उत्तर-(b)
    सारनाथ की भूमिस्पर्श मुद्रा वाली बुद्ध प्रतिमा गुप्त काल से संबंधित है — यही इस प्रश्न का उत्तर है, जैसा कि ऊपर के प्रश्न में भी स्पष्ट किया गया। गुप्त काल में मूर्तिकला में विदेशी प्रभाव समाप्त होकर एक परिपक्व और शुद्ध भारतीय शैली विकसित हुई जिसमें भावों की गहराई अद्वितीय थी।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्तकालीन मूर्तिकला के प्रमुख केंद्र सारनाथ, मथुरा और पाटलिपुत्र थे। इस काल में बुद्ध की मूर्तियों पर पारदर्शी वस्त्र (जिसे ‘वेट ड्रेपरी’ कहते हैं) का प्रभावशाली चित्रण किया गया, जो कुषाण काल की शैली से एकदम अलग था।
    95. निम्नलिखित युग्मों में से कौन-से सही सुमेलित हैं?
    1. लोथल – प्राचीन गोदी क्षेत्र
    2. सारनाथ -बुद्ध का प्रथम धर्मोपदेश
    3. राजगीर – अशोक का सिंह स्तंभ शीर्ष
    4. नालंदा – बौद्ध अधिगम का महान पीठ
    नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए-

    (a) 1, 2, 3 और 4
    (b) 3 और 4
    (c) 1, 2 और 4
    (d) 1 और 2
    I.A.S. (Pre) 1998
    उत्तर-(c)
    लोथल (गुजरात) से हड़प्पाकालीन गोदीबाड़े (Dockyard) के अवशेष प्राप्त हुए हैं — यह विश्व का प्राचीनतम ज्ञात बंदरगाह माना जाता है। सारनाथ में बुद्ध ने ज्ञानप्राप्ति के बाद अपना प्रथम उपदेश पाँच शिष्यों को दिया, जिसे ‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ कहते हैं। नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्तकालीन शासक कुमारगुप्त प्रथम ने की थी। किंतु अशोक का प्रसिद्ध सिंह स्तंभ शीर्ष राजगीर में नहीं, बल्कि सारनाथ में है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सारनाथ का अशोक स्तंभ शीर्ष (चार सिंह) वर्तमान में भारत का राष्ट्रीय प्रतीक है और सारनाथ संग्रहालय में संरक्षित है। नालंदा विश्वविद्यालय को 12वीं शताब्दी में बख्तियार खिलजी ने नष्ट कर दिया था — यह विश्व के प्राचीनतम आवासीय विश्वविद्यालयों में से एक था जहाँ कोरिया, चीन, तिब्बत और मध्य एशिया से विद्यार्थी आते थे।
    96. बोधिसत्व पद्मपाणि का चित्र सर्वाधिक प्रसिद्ध और प्रायः चित्रित चित्रकारी है, जो –
    (a) अजंता में है।
    (b) बदामी में है।
    (c) बाघ में है।
    (d) एलोरा में है।
    I.A.S. (Pre) 2017
    उत्तर-(a)
    अजंता की गुफा संख्या 1 में स्थित बोधिसत्व पद्मपाणि का चित्र भारतीय चित्रकला के इतिहास में सर्वोच्च स्थान रखता है। इस चित्र में पद्मपाणि को नीलम जड़ित मुकुट, आभूषणों और एक कमल पुष्प के साथ दर्शाया गया है, जो करुणा और शांति का प्रतीक है। इसे लगभग 5वीं–6वीं शताब्दी ईस्वी के बीच निर्मित माना जाता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अजंता की कुल 30 गुफाएँ हैं, जो वाघोरा नदी के किनारे महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में स्थित हैं और इन्हें UNESCO विश्व धरोहर स्थल का दर्जा प्राप्त है। पद्मपाणि का शाब्दिक अर्थ है “कमल हाथ में धारण करने वाला” — यह अवलोकितेश्वर बोधिसत्व का ही एक रूप है।
    97. भारत के धार्मिक इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-
    (a) 1. स्थाविरवादी महायान बौद्ध धर्म से संबद्ध हैं।
    (a) 2. लोकोत्तरवादी संप्रदाय बौद्ध धर्म के महासंघिक संप्रदाय की एक शाखा थी।
    (a) 3. महासंघिकों द्वारा बुद्ध के देवत्वारोपण ने महायान बौद्ध धर्म को प्रोत्साहित किया।
    (a) उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
    (a) केवल 1 और 2
    (b) केवल 2 और 3
    (c) केवल 3
    (d) 1, 2 और 3
    I.A.S. (Pre) 2020
    उत्तर-(b)
    बौद्ध धर्म में पहली महासंगीति (वैशाली, 383 ई.पू.) के बाद दो प्रमुख धाराएँ उभरीं — स्थविरवाद और महासंघिक। स्थविरवाद (Theravada) बौद्ध धर्म की हीनयान शाखा से संबंधित है, महायान से नहीं — अतः कथन 1 गलत है। लोकोत्तरवाद महासंघिक संप्रदाय की एक प्रमुख उपशाखा थी जो बुद्ध को एक अलौकिक, लोकोत्तर (इस संसार से परे) सत्ता मानती थी — यह कथन 2 सही है। महासंघिकों ने ही बुद्ध को दैवीय स्वरूप में प्रस्तुत करना प्रारंभ किया, जिसने आगे चलकर महायान परंपरा में बोधिसत्व अवधारणा और बुद्ध की त्रिकाय सिद्धांत को जन्म दिया — कथन 3 भी सही है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: महासंघिक संप्रदाय के नेतृत्व का श्रेय महाकस्सप को दिया जाता है। बौद्ध धर्म में कुल 18 निकाय (संप्रदाय) विकसित हुए जिनमें लोकोत्तरवाद एक महत्वपूर्ण निकाय था। ‘महावस्तु’ नामक महत्वपूर्ण ग्रंथ लोकोत्तरवाद संप्रदाय से ही संबंधित है।
    98. हीनयान अवस्था का विशालतम एवं सर्वाधिक विकसित शैलकृत चैत्यगृह स्थित है-
    (a) पीतलखोरा में
    (b) जुन्नार में
    (c) कार्ले में
    (d) बेडसा में
    U.P.R.O./A.R.O. (Pre) 2014
    उत्तर-(c)
    कार्ले (या कार्ला) का चैत्यगृह महाराष्ट्र के पुणे जिले के मावल तालुका में स्थित है और यह हीनयान काल का सबसे विशाल एवं परिष्कृत शैलकृत (पत्थर काटकर बनाया गया) चैत्यगृह है। इसका निर्माण लगभग पहली–दूसरी शताब्दी ईस्वी में हुआ था। इसमें एक विशाल स्तूप, लकड़ी की सजावट और भव्य प्रवेश द्वार उल्लेखनीय हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चैत्यगृह एक प्रकार का बौद्ध प्रार्थना कक्ष होता था जिसके एक सिरे पर स्तूप स्थित रहता था। कार्ले का चैत्यगृह लगभग 40 मीटर लंबा और 15 मीटर चौड़ा है तथा इसके प्रवेश द्वार पर बने मिथुन युगल शिल्प भारतीय कला की अद्भुत मिसाल हैं।
    99. भारतीय इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन भावी बुद्ध है, जो संसार की रक्षा हेतु अवतरित होंगे?
    (a) अवलोकितेश्वर
    (b) लोकेश्वर
    (c) मैत्रेय
    (d) पद्मपाणि
    I.A.S. (Pre) 2018
    उत्तर-(c)
    बौद्ध परंपरा में मैत्रेय को भविष्य का बुद्ध माना गया है। मान्यता है कि जब इस संसार में धर्म का पूर्ण पतन हो जाएगा और मनुष्यों की आयु घटकर अत्यंत कम हो जाएगी, तब मैत्रेय बोधिसत्व पृथ्वी पर अवतरित होकर बुद्धत्व प्राप्त करेंगे और पुनः धर्म की स्थापना करेंगे। मैत्रेय शब्द ‘मैत्री’ (करुणा/प्रेम) से निकला है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मैत्रेय की अवधारणा महायान और थेरवाद — दोनों परंपराओं में स्वीकृत है, जो इसे बौद्ध धर्म की विभिन्न शाखाओं में सर्वमान्य बनाती है। हिमाचल प्रदेश के लद्दाख और स्पीति क्षेत्र में मैत्रेय की विशाल प्रतिमाएँ आज भी बौद्ध विहारों में स्थापित हैं, जिनमें लेह की मैत्रेय प्रतिमा विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
    100. भारत के धार्मिक इतिहास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-
    1. बोधिसत्व, बौद्धमत के हीनयान संप्रदाय की केंद्रीय संकल्पना है।
    2. बोधिसत्व अपने प्रबोध के मार्ग पर बढ़ता हुआ करुणामय है।
    3. बोधिसत्व समस्त सचेतन प्राणियों को उनके प्रबोध के मार्ग पर चलने में सहायता करने के लिए स्वयं की निर्वाण प्राप्ति विलंबित करता है।
    उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
    (a) केवल 1
    (b) केवल 2 और 3
    (c) केवल 2
    (d) 1, 2 और 3
    I.A.S. (Pre) 2016
    उत्तर-(b)
    बोधिसत्व की अवधारणा महायान बौद्ध धर्म की केंद्रीय संकल्पना है, हीनयान की नहीं — इसलिए कथन 1 गलत है। हीनयान में आदर्श अर्हत (Arhat) है जो केवल अपनी मुक्ति का प्रयास करता है। इसके विपरीत, बोधिसत्व वह प्राणी है जो बुद्धत्व प्राप्त करने की क्षमता रखता है, लेकिन समस्त जीवों के उद्धार के लिए स्वेच्छा से निर्वाण को स्थगित करता है। बोधिसत्व का पूरा जीवन दस पारमिताओं (पूर्णताओं) — दान, शील, क्षमा, वीर्य, ध्यान, प्रज्ञा आदि — के पालन पर आधारित होता है। कथन 2 और 3 दोनों सही हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: महायान बौद्ध धर्म में अवलोकितेश्वर, मंजुश्री और क्षितिगर्भ जैसे प्रमुख बोधिसत्वों की परंपरा विकसित हुई जिनकी आराधना आज भी तिब्बत, चीन, जापान और कोरिया में व्यापक रूप से की जाती है। ‘बोधिचित्त’ — अर्थात् सभी जीवों के लाभ के लिए बुद्ध बनने की संकल्प-शक्ति — बोधिसत्व पथ का आधार है।
    100. नालंदा विश्वविद्यालय के संस्थापक कौन थे?
    (a) चंद्रगुप्त विक्रमादित्य
    (b) कुमारगुप्त
    (c) धर्मपाल
    (d) पुष्यगुप्त
    56th to 59th B.P.S.C. (Pre) 2015
    उत्तर-(b)
    चीनी यात्री ह्वेनसांग के विवरण के अनुसार नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना ‘शक्रादित्य’ नामक राजा ने की थी, जिन्हें इतिहासकार कुमारगुप्त प्रथम (415–455 ई.) से समकक्ष मानते हैं। कुमारगुप्त ने बौद्ध त्रिरत्नों — बुद्ध, धम्म और संघ — के प्रति अगाध श्रद्धावश इस महाविहार की नींव रखी।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: नालंदा में एक समय 10,000 से अधिक विद्यार्थी और 2,000 शिक्षक निवास करते थे तथा यहाँ का पुस्तकालय ‘धर्मगंज’ इतना विशाल था कि बख्तियार खिलजी द्वारा जलाए जाने पर वह कई महीनों तक धू-धू कर जलता रहा। इसके अलावा, नालंदा में प्रवेश परीक्षा इतनी कठिन थी कि अधिकांश आवेदक द्वारपाल स्तर पर ही बाहर कर दिए जाते थे।
    101. शून्यता के सिद्धांत का सर्वप्रथम प्रतिपादन करने वाले बौद्ध दार्शनिक का नाम है-
    (a) नागार्जुन
    (b) नागसेन
    (c) आनंद
    (d) अश्वघोष
    U.P.P.C.S. (Pre) 1998
    उत्तर-(a)
    शून्यवाद अथवा माध्यमिक दर्शन के प्रवर्तक नागार्जुन हैं। उनकी मूल रचना ‘माध्यमिककारिका’ में यह विचार प्रस्तुत किया गया कि कोई भी वस्तु स्वतंत्र अस्तित्व नहीं रखती — प्रत्येक वस्तु किसी-न-किसी कारण पर आश्रित है। ‘प्रतीत्यसमुत्पाद’ की इसी व्याख्या को नागार्जुन ने शून्यता कहा। इसे पश्चिमी दर्शन में ‘सापेक्षतावाद’ (Relativism) के समकक्ष माना जाता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: नागार्जुन को ‘भारत का आइंस्टाइन’ भी कहा जाता है क्योंकि उनका शून्यवाद आधुनिक भौतिकी के सापेक्षता सिद्धांत से कई दार्शनिक समानताएं रखता है। इसके अलावा, तिब्बती परंपरा में नागार्जुन को ‘द्वितीय बुद्ध’ की संज्ञा दी गई है और उनकी रचनाएं तिब्बती बौद्ध धर्म की आधारशिला मानी जाती हैं।
    102. बौद्ध शिक्षा का केंद्र है-
    (a) विक्रमशिला
    (b) वाराणसी
    (c) गिरनार
    (d) उज्जैन
    M.P.P.C.S. (Pre) 2004
    उत्तर-(a)
    प्राचीन भारत में बौद्ध शिक्षा के तीन प्रधान केंद्र थे — नालंदा, वल्लभी और विक्रमशिला। विक्रमशिला की स्थापना पाल वंश के शासक धर्मपाल (770–810 ई.) ने बिहार के वर्तमान भागलपुर जिले के निकट की थी। यह वज्रयान (तंत्र) बौद्ध धर्म की शिक्षा का प्रमुख केंद्र था। वाराणसी हिंदू शिक्षा का, गिरनार जैन परंपरा का और उज्जैन अवंति की राजधानी के रूप में जाना जाता था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: विक्रमशिला में उस काल के प्रख्यात बौद्ध विद्वान अतीश दीपंकर (Atisha Dipankara) कार्यरत थे, जो बाद में तिब्बत गए और वहाँ बौद्ध धर्म के पुनरुद्धार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। विक्रमशिला को भी 1203 ई. में बख्तियार खिलजी ने नष्ट कर दिया था।
    103. नीचे दो वक्तव्य दिए गए हैं, जिनमें एक कथन (a) और दूसरा कारण (R) है, दोनों को ध्यानपूर्वक पढ़ें-
    कथन (a) बारहवीं शताब्दी के अंत तक नालंदा महाविहार का पतन हो गया।
    कारण (R) : महाविहार को राजकीय प्रश्रय मिलना बंद हो गया था।
    उपर्युक्त दोनों वक्तव्यों के संदर्भ में निम्नलिखित में कौन सही है?
    (a) दोनों (a) और (R) सही हैं और (R), (a) की सही व्याख्या करता है।
    (b) दोनों (a) और (R) सही हैं, परंतु (R), (a) की सही व्याख्या नहीं करता है।
    (c) (a) सही है, परंतु (R) गलत है।
    (d) (a) गलत है, परंतु (R) सही है।
    41st B.P.S.C. (Pre) 1996
    उत्तर-(a)
    नालंदा महाविहार गुप्त काल में अपने चरम पर था, किंतु पाल शासकों ने क्रमशः विक्रमशिला को अधिक महत्व देना शुरू किया जिससे नालंदा को मिलने वाला राजकीय संरक्षण घटता गया। इस कारण 12वीं सदी के अंत तक इसका क्रमिक पतन हो चुका था। अंततः 1193-1203 ई. के बीच बख्तियार खिलजी के आक्रमणों ने इसे पूरी तरह नष्ट कर दिया। अतः कथन (A) और कारण (R) दोनों सत्य हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: 2010 में भारत सरकार ने नालंदा विश्वविद्यालय को पुनर्जीवित करने की योजना बनाई और 2014 में ‘नालंदा विश्वविद्यालय अधिनियम’ पारित कर राजगीर, बिहार में आधुनिक नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना की गई। यूनेस्को ने 2016 में नालंदा के पुरातात्त्विक स्थल को विश्व धरोहर स्थल (World Heritage Site) घोषित किया।
    104. वल्लभी विश्वविद्यालय स्थित था- उत्तर प्रदेश में
    (a) बिहार में
    (b)
    (c) बंगाल में
    (d) गुजरात में
    U.P.R.O./A.R.O. (Pre) 2014
    उत्तर-(d)
    वल्लभी विश्वविद्यालय गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र में स्थित था, जिसे आज ‘वल’ नाम से जाना जाता है। यह हीनयान बौद्ध धर्म की शिक्षा का पश्चिम भारत में सर्वप्रमुख केंद्र था। मैत्रक वंश के शासकों ने इस विश्वविद्यालय को भरपूर संरक्षण दिया। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपनी यात्रा के दौरान यहाँ का विस्तृत उल्लेख किया है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वल्लभी में आयोजित बौद्ध संगीतियों में हीनयान के ‘थेरवाद’ ग्रंथों का संकलन और सम्पादन किया गया। इसके अतिरिक्त, वल्लभी न केवल बौद्ध, बल्कि जैन धर्म की शिक्षा का भी महत्त्वपूर्ण केंद्र था — जैन परंपरा में यहाँ एक महत्त्वपूर्ण जैन सभा (वल्लभी परिषद) आयोजित हुई थी जिसमें जैन आगमों का अंतिम संकलन हुआ।
    105. नालंदा विश्वविद्यालय किसलिए विश्वप्रसिद्ध था?
    (a) चिकित्सा विज्ञान
    (b) तर्कशास्त्र
    (c) बौद्ध धर्म दर्शन
    (d) रसायन विज्ञान
    42nd B.P.S.C. (Pre) 1997
    उत्तर-(c)
    नालंदा विश्वविद्यालय की वैश्विक ख्याति बौद्ध धर्म-दर्शन की उच्चस्तरीय शिक्षा के लिए थी। यहाँ महायान बौद्ध दर्शन, न्याय, व्याकरण, चिकित्साशास्त्र और खगोलशास्त्र भी पढ़ाए जाते थे। चीनी यात्री ह्वेनसांग यहाँ बौद्ध दर्शन की शिक्षा ग्रहण करने के लिए ही आया था और उसने लगभग पाँच वर्षों तक यहाँ अध्ययन किया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ह्वेनसांग के अतिरिक्त कोरिया के विद्वान ह्येचो (Hyecho) और तिब्बत के अनेक बौद्ध आचार्य भी नालंदा में अध्ययन के लिए आए थे, जो इसकी अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का प्रमाण है। नालंदा में प्रवेश के लिए द्वारपाल विद्वानों से शास्त्रार्थ करना पड़ता था और केवल 20–30% अभ्यर्थी ही सफल हो पाते थे।
    106. प्रथम शताब्दी ईस्वी में किस भारतीय बौद्ध भिक्षुक को चीन भेजा गया था?
    (a) असंग
    (b) अश्वघोष
    (c) वसुमित्र
    (d) नागार्जुन
    Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2005
    उत्तर-(d)
    नागार्जुन कुषाण सम्राट कनिष्क के दरबार के प्रमुख बौद्ध विद्वानों में से एक थे। चीनी बौद्ध परंपराओं के अनुसार नागार्जुन ने चीन की यात्रा कर वहाँ बौद्ध धर्म के दार्शनिक आधार को सुदृढ़ किया। उनकी ‘माध्यमिककारिका’ शून्यवाद की आधारभूत रचना मानी जाती है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: नागार्जुन ने धातुओं के रूपांतरण और आयुर्वेद पर भी महत्त्वपूर्ण ग्रंथ लिखे, जिनमें ‘रसरत्नाकर’ और ‘आरोग्यमंजरी’ प्रमुख हैं — इस कारण उन्हें रसायनशास्त्र (Alchemy) के क्षेत्र में भी अग्रणी माना जाता है। इसके अलावा, चीन में उनके शून्यवाद दर्शन पर आधारित ‘सान-लुन’ (Three Treatise) बौद्ध संप्रदाय की स्थापना हुई।
    107. नालंदा विश्वविद्यालय के स्थापन का युग है-
    (a) मौर्य गंगार
    (b) कुषाण
    (c) गुप्त
    (d) पाल
    43rd B.P.S.C. (Pre) 1999
    उत्तर-(c)
    नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्त काल में पाँचवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य में हुई। कुमारगुप्त प्रथम ने यहाँ प्रथम दान देकर इसकी नींव रखी, जिसके पश्चात बुधगुप्त, तथागतगुप्त और बालादित्य जैसे गुप्त शासकों ने इसके विकास में योगदान दिया। राजगृह (राजगीर) के निकट स्थित यह संस्था महायान बौद्ध दर्शन का विश्वस्तरीय केंद्र बनी।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्त काल के बाद हर्षवर्धन (606–647 ई.) ने भी नालंदा को उदारतापूर्वक दान और संरक्षण दिया तथा वहाँ एक भव्य तांबे की मूर्ति स्थापित कराई। नालंदा का पुरातात्त्विक उत्खनन 1915–37 ई. के बीच भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण द्वारा किया गया, जिसमें 11 मठ और 6 मंदिरों के अवशेष प्राप्त हुए।
    108. हीनयान अवस्था का विशालतम एवं सर्वाधिक विकसित शैलकृत चैत्यगृह स्थित है-
    (a) पीतलखोरा में
    (b) जुन्नार में
    (c) कार्ले में
    (d) बेडसा में
    U.P.R.O./A.R.O. (Pre) 2014
    उत्तर-(c)
    महाराष्ट्र के पुणे जिले के मावल तालुका में स्थित कार्ले (कार्ला) गुफाओं का चैत्यगृह हीनयान काल का सबसे बड़ा और सर्वाधिक परिष्कृत शैलकृत (चट्टान काटकर बनाया गया) स्थापत्य उदाहरण है। इसका निर्माण लगभग पहली शताब्दी ईस्वी में हुआ था। चैत्यगृह में विशाल अश्वशाल (Horse-shoe arch), अष्टकोणीय स्तंभ और एक विशाल स्तूप स्थित है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कार्ले के चैत्यगृह की लंबाई लगभग 37.8 मीटर और ऊँचाई लगभग 13.7 मीटर है, जो इसे भारत के सभी शैलकृत चैत्यगृहों में सबसे बड़ा बनाती है। इसके प्रवेशद्वार पर ‘मिथुन मूर्तियाँ’ (युगल आकृतियाँ) उकेरी गई हैं जो उस काल की उत्कृष्ट शिल्पकला का प्रतिनिधित्व करती हैं।
    109. निम्नलिखित में से किस शैलकृत गुफा में ग्यारह सिरों के बोधिसत्व का अंकन मिलता है?
    (a) अजंता
    (b) एलोरा
    (c) कन्हेरी
    (d) कार्ले
    U.P.P.C.S. (Pre) 2017
    उत्तर-(c)
    मुंबई के संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान में सलसेट द्वीप पर स्थित कन्हेरी गुफाएं बौद्ध कला और स्थापत्य का अद्भुत संग्रह हैं। गुफा संख्या 41 में अवलोकितेश्वर बोधिसत्व की एक अत्यंत दुर्लभ मूर्ति स्थित है जिसमें चार भुजाएं और ग्यारह मुख हैं — यह अपनी प्रकार की भारत में एकमात्र मूर्ति है। इस रूप की उपासना 7वीं–8वीं शताब्दी में चीन, कंबोडिया, चीनी तुर्किस्तान और जापान में व्यापक रूप से प्रचलित थी।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कन्हेरी गुफाओं का निर्माण पहली शताब्दी ईसा पूर्व में आरंभ हुआ और 11वीं शताब्दी ईस्वी तक इनका उपयोग होता रहा — यह लगभग 1,200 वर्षों की अखंड बौद्ध गतिविधि का साक्षी स्थल है। यहाँ एक ही पहाड़ी में 109 गुफाएं हैं, जो किसी एकल पहाड़ी पर निर्मित गुफाओं की सर्वाधिक संख्या है।
    110. कुछ शैलकृत बौद्ध गुफाओं को चैत्य कहते हैं, जबकि अन्य को विहार दोनों में क्या अंतर है?
    (a) विहार पूजा स्थल होता है, जबकि चैत्य बौद्ध भिक्षुओं का निवास स्थान है।
    (b) चैत्य पूजा स्थल होता है, जबकि विहार बौद्ध भिक्षुओं का निवास स्थान है।
    (c) चैत्य गुफा के दूर के सिरे पर स्तूप होता है, जबकि विहार गुफा पर अक्षीय कक्ष होता है।
    (d) दोनों में कोई वस्तुपरक अंतर नहीं होता।
    I.A.S. (Pre) 2013
    उत्तर-(b)
    चैत्य मूलतः उन स्मारकों को कहा जाता था जो किसी महापुरुष के दाह-संस्कार के बाद बचे अवशेषों के ऊपर बनाए जाते थे। कालांतर में बौद्ध धर्म में चैत्य उपासना एवं पूजा के प्रमुख केंद्र बन गए। इनमें प्रायः एक स्तूप भी होता था जिसके चारों ओर परिक्रमा की जाती थी। विहार वे आवासीय भवन थे जहाँ बौद्ध भिक्षु निवास करते थे और अध्ययन-मनन करते थे। अतः चैत्य = पूजा स्थल और विहार = निवास स्थान।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अजंता की गुफाएँ (महाराष्ट्र) चैत्य और विहार दोनों का उत्कृष्ट उदाहरण हैं — गुफा संख्या 9, 10, 19 और 26 चैत्यगृह हैं, जबकि शेष विहार हैं। एलोरा की गुफा संख्या 10 (विश्वकर्मा गुफा) भी एक प्रसिद्ध बौद्ध चैत्यगृह है।
    111. बौद्ध दर्शन के अनुसार विचार कीजिए-
    कथन (a) : पुनर्जन्म नहीं होता है।
    कारण (R) : आत्मा की सत्ता नहीं है। निम्नलिखित कूट से अपना
    कूट : उत्तर चुनिए :
    (a) (a) तथा (R) दोनों सही हैं तथा (R) सही व्याख्या है (a) की।
    (b) (a) तथा (R) दोनों सही है, किंतु (R) सही व्याख्या नहीं है (a) की।
    (c) (a) सही है, किंतु (R) गलत है।
    (d) (a) गलत है, किंतु (R) सही है।
    U.P.P.C.S. (Pre) 2006
    उत्तर-(d)
    बौद्ध दर्शन में आत्मा की स्थायी सत्ता को अस्वीकार किया गया है — इसे ‘अनात्मवाद’ कहते हैं। बुद्ध के अनुसार व्यक्ति पाँच स्कंधों (रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार, विज्ञान) का समूह मात्र है, कोई अपरिवर्तनीय आत्मा नहीं। परंतु इसके बावजूद बौद्ध दर्शन पुनर्जन्म और कर्म के सिद्धांत को मानता है — जीवन एक अवस्था से दूसरी अवस्था में प्रवाहित होता है, जैसे एक दीपक से दूसरा दीपक जलता है। अतः कथन (A) गलत है किंतु कारण (R) सही है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बुद्ध ने आत्मा के प्रश्न पर मौन रहना उचित समझा — इसे ‘अव्याकृत प्रश्न’ कहा जाता है। बौद्ध दर्शन में ‘प्रतीत्यसमुत्पाद’ (Dependent Origination) का सिद्धांत यह समझाता है कि पुनर्जन्म आत्मा के स्थानांतरण से नहीं, बल्कि कर्म-ऊर्जा की निरंतरता से होता है।
    112. भगवान बुद्ध ने निम्नलिखित चार आर्य सत्यों का प्रतिपादन किया। नीचे दिए गए कूट का प्रयोग करके उन्हें सही क्रम में रखिए :
    A. दुःख है।
    B. दुःख का निरोध है।
    C. दुःख निरोध का मार्ग है।
    D. दुःख का कारण है। कूट :
    (a) ADBC
    (b) AD C B
    (c) ACBD
    (d) A B D C
    U.P.P.C.S. (Pre) 2006
    उत्तर-(a)
    बुद्ध ने बोधगया में ज्ञान प्राप्ति के पश्चात सारनाथ में अपना पहला उपदेश दिया, जिसे ‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ कहते हैं। इस उपदेश में उन्होंने चार आर्य सत्यों का उल्लेख किया — (1) दुःख: जीवन दुःखमय है, (2) दुःख समुदाय: दुःख का कारण तृष्णा है, (3) दुःख निरोध: तृष्णा का अंत करने पर दुःख समाप्त होता है, (4) दुःख निरोधगामिनी प्रतिपदा: अष्टांगिक मार्ग इसका उपाय है। सही क्रम A→D→B→C है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अष्टांगिक मार्ग को ‘मध्यम मार्ग’ भी कहा जाता है क्योंकि यह अति-भोग और अति-तप दोनों से बचता है। बौद्ध धर्म में इस मार्ग को तीन भागों में बाँटा गया है — शील (नैतिकता), समाधि (एकाग्रता), और प्रज्ञा (ज्ञान)।
    113. बौद्ध तथा जैन दोनों ही धर्म विश्वास करते हैं, कि-
    (a) कर्म तथा पुनर्जन्म के सिद्धांत सही हैं।
    (b) मृत्यु के पश्चात ही मोक्ष संभव है।
    (c) स्त्री तथा पुरुष दोनों ही मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं।
    (d) जीवन में मध्यम मार्ग सर्वश्रेष्ठ है।
    U.P.P.C.S. (Pre) 1996
    उत्तर-(a)
    बौद्ध और जैन दोनों धर्म कर्मवाद और पुनर्जन्म के सिद्धांत को मानते हैं। दोनों का मानना है कि व्यक्ति के कर्म ही उसके अगले जन्म को निर्धारित करते हैं और मोक्ष प्राप्ति से इस चक्र का अंत होता है। दोनों धर्मों ने वेदों की अपौरुषेयता और ब्राह्मण कर्मकांडों को अस्वीकार किया। ‘मध्यम मार्ग’ केवल बौद्ध धर्म की विशेषता है, जैन धर्म में नहीं; जैन धर्म कठोर तप को महत्व देता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जैन धर्म में कर्म को एक सूक्ष्म भौतिक पदार्थ माना गया है जो आत्मा से चिपकता है — इसे ‘कर्म-परमाणु’ कहते हैं। बौद्ध धर्म में कर्म एक मानसिक अभिप्राय (Intention/Cetana) है, न कि भौतिक।
    114. निम्नलिखित में से कौन-से बौद्ध धर्म और जैन धर्म दोनों में समान रूप से विद्यमान थे?
    1. तप और भोग की अति का परिहार
    2. वेद प्रामाण्य के प्रति अनास्था
    3. कर्मकांडों की फलवत्ता का निषेध
    4. प्राणियों की हिंसा का निषेध (अहिंसा)
    नीचे दिए हुए कूट का प्रयोग करते हुए सही
    कूट : उत्तर का चयन कीजिए-
    (a) 1, 2, 3 और 4
    (c) 1, 3 और 4
    (b) 2, 3 और 4
    (d) 1 और 2
    I.A.S. (Pre) 1996
    उत्तर-(b)
    बौद्ध और जैन धर्म दोनों में वेदों की प्रामाणिकता का खंडन, कर्मकांडों की अस्वीकृति और अहिंसा का सिद्धांत समान रूप से पाया जाता है। हालाँकि ‘तप और भोग की अति का परिहार’ अर्थात् मध्यम मार्ग केवल बौद्ध धर्म की विशेषता है — बुद्ध ने स्वयं छः वर्षों के कठोर तप के बाद इसे त्यागकर मध्यम मार्ग अपनाया। जैन धर्म में कठोर तप को मोक्ष का आवश्यक साधन माना गया है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जैन धर्म में अहिंसा इतनी व्यापक है कि दिगंबर जैन साधु वस्त्र तक नहीं पहनते और पैरों तले आने वाले जीवों को बचाने के लिए मुँहपत्ती और रजोहरण रखते हैं। बौद्ध धर्म में भी अहिंसा है किंतु यह जैन धर्म जितनी कठोर नहीं — बौद्ध भिक्षु माँसाहार की कुछ परिस्थितियों में अनुमति देते थे (त्रिकोटि पवित्र माँस)।
    115. प्राचीन भारतीय इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से बौद्ध धर्म और जैन धर्म दोनों में समान रूप से विद्यमान था/ थे?
    1. तप और भोग की अति का परिहार
    2. वेद-प्रामाण्य के प्रति अनास्था
    3. कर्मकांडों की फलवत्ता का निषेध
    निम्नलिखित कूटों के आधार पर सही उत्तर चुनिए :
    (a) केवल 1
    (b) केवल 2 और 3
    (c) केवल 1 और 3
    (d) 1, 2 और 3
    I.A.S. (Pre) 2012
    उत्तर-(b)
    बौद्ध और जैन दोनों धर्मों में वेद-प्रामाण्य के प्रति अनास्था और कर्मकांडों की निरर्थकता समान रूप से मानी गई है। परंतु तप और भोग की अति का परिहार (मध्यम मार्ग) केवल बौद्ध धर्म में है। जैन धर्म में महावीर ने स्वयं 12 वर्षों तक कठोर तप किया और इसे मोक्ष का अनिवार्य मार्ग माना। अतः केवल कथन 2 और 3 दोनों धर्मों में समान हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: छठी शताब्दी ईसा पूर्व को ‘श्रमण परंपरा का युग’ कहा जाता है — बौद्ध और जैन दोनों इसी धारा के अंग हैं। इस काल में वैदिक ब्राह्मण परंपरा के विरुद्ध कई नए दर्शन उभरे जिनमें आजीवक और चार्वाक भी प्रमुख थे।
    116. निम्नलिखित में से कौन-सी बात बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म में समान नहीं है?
    (a) अहिंसा
    (b) वेदों के प्रति उदासीनता
    (c) आत्म दमन
    (d) रीति-रिवाजों की अस्वीकृति
    44th B.P.S.C. (Pre) 2000
    उत्तर-(c)
    बौद्ध और जैन धर्म दोनों में अहिंसा, वेद-विरोध और कर्मकांड-अस्वीकृति समान रूप से पाई जाती है। किंतु ‘आत्म दमन’ अर्थात् शरीर को कष्ट देकर मोक्ष पाने का मार्ग केवल जैन धर्म में स्वीकार्य है। बुद्ध ने इसे अनुचित मानते हुए मध्यम मार्ग का उपदेश दिया — न अति भोग, न अति तप।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जैन धर्म में ‘सल्लेखना’ (स्वेच्छा से क्रमशः उपवास करके मृत्यु वरण करना) को सर्वोच्च तप माना गया है — महावीर के अनेक अनुयायियों ने इसे अपनाया। बौद्ध धर्म में ऐसी किसी प्रथा को मान्यता नहीं दी गई।
    117. बौद्ध धर्म के विषय में कौन-सा कथन सही है?
    (1) उसने वर्ण एवं जाति को अस्वीकार नहीं किया।
    (2) उसने ब्राह्मण वर्ग की सर्वोच्च सामाजिक कोटि को चुनौती दी।
    (3) उसने कुछेक शिल्पों को निम्न माना।
    नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए-
    कूट :
    (a) 1 तथा 2
    (b) 2 तथा 3
    (c) 1, 2 तथा 3
    (d) उपर्युक्त में कोई नहीं
    U.P.P.C.S. (Pre) 1998
    उत्तर-(c)
    बौद्ध धर्म ने वर्ण-व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त नहीं किया, बल्कि उसे जन्म के बजाय कर्म पर आधारित करने का प्रयास किया। उसने ब्राह्मणों की जन्मजात सर्वोच्चता को अस्वीकार किया और संघ में सभी वर्णों को प्रवेश दिया। इसके साथ ही कुछ व्यवसायों जैसे बूचड़, शराब व्यापारी आदि को बौद्ध ग्रंथों में निम्न माना गया है। अतः तीनों कथन सही हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बौद्ध संघ में स्त्रियों को भी प्रवेश दिया गया — इसे भिक्षुणी संघ कहते हैं। यह प्रवेश बुद्ध की मौसी महाप्रजापति गौतमी के अनुरोध पर आनंद के माध्यम से हुआ, जिसे बुद्ध ने प्रारंभ में अस्वीकार किया था। बौद्ध धर्म में निम्न कुलों से आए व्यक्ति जैसे उपाली (नाई) भी वरिष्ठ भिक्षु बने — यह तत्कालीन समाज के लिए क्रांतिकारी था।
    118. ‘नव नालंदा महाविहार’ किसके लिए विख्यात है?
    (a) ह्वेनसांग स्मारक
    (b) महावीर का जन्मस्थान
    (c) पाली अनुसंधान संस्थान
    (d) संग्रहालय
    48th to 52nd B.P.S.C. (Pre) 2008
    उत्तर-(c)
    नव नालंदा महाविहार की स्थापना बिहार सरकार द्वारा 1951 में नालंदा (राजगीर के निकट) में की गई थी। यह संस्थान पाली भाषा और बौद्ध अध्ययन का प्रमुख आधुनिक केंद्र है। यहाँ श्रीलंका, जापान, म्याँमार, कोरिया, तिब्बत, भूटान आदि देशों के शोधार्थी अध्ययन के लिए आते हैं। वर्ष 2006 में इसे ‘डीम्ड विश्वविद्यालय’ का दर्जा प्रदान किया गया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय (5वीं–12वीं शताब्दी) को गुप्त सम्राट कुमारगुप्त प्रथम ने स्थापित किया था और यह तत्कालीन विश्व का सबसे बड़ा शिक्षण केंद्र था — यहाँ एक समय में 10,000 से अधिक विद्यार्थी और 2,000 शिक्षक रहते थे। चीनी यात्री ह्वेनसांग (7वीं शताब्दी) ने यहाँ अध्ययन किया और नालंदा के विस्तृत विवरण अपने यात्रा-वृत्तांत में दर्ज किए।
    119. सुल्तानी युग में बौद्धों की कौन-सी शाखा सबसे प्रभावशाली थी?
    (a) थेरवाद
    (b) हीनयान
    (c) वज्रयान
    (d) तंत्र्यान
    Jharkhand P.C.S. (Pre) 2013
    उत्तर-(c)
    सुल्तानी (मध्यकालीन) युग में बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा सर्वाधिक प्रभावशाली थी। इसका उद्भव लगभग 7वीं-8वीं शताब्दी में हुआ और यह तांत्रिक साधनाओं, मंत्रों तथा अनुष्ठानों पर आधारित थी। इसके मूल सिद्धांत ‘मंजुश्रीमूलकल्प’ और ‘गुह्यसमाज’ जैसे ग्रंथों में संकलित हैं। पाल वंश के शासकों ने वज्रयान को विशेष संरक्षण दिया, जिसके चलते यह बंगाल और बिहार में खूब फला-फूला।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वज्रयान बौद्ध धर्म तिब्बत में भी अत्यंत लोकप्रिय हुआ और वहाँ इसे ‘लामावाद’ के रूप में जाना गया। तिब्बती बौद्ध धर्म आज भी मुख्यतः वज्रयान परंपरा का अनुसरण करता है।
    120. नीचे दो वक्तव्य दिए गए हैं, जिनमें एक कथन (a) और दूसरा कारण (R) है, दोनों को ध्यानपूर्वक पढ़ें-
    कथन (a) बारहवीं शताब्दी के अंत तक नालंदा महाविहार का पतन हो गया।
    कारण (R) : महाविहार को राजकीय प्रश्रय मिलना बंद हो गया था।
    उपर्युक्त दोनों वक्तव्यों के संदर्भ में निम्नलिखित में कौन सही है?
    (a) दोनों (a) और (R) सही हैं और (R), (a) की सही व्याख्या करता है।
    (b) दोनों (a) और (R) सही हैं, परंतु (R), (a) की सही व्याख्या नहीं करता है।
    (c) (a) सही है, परंतु (R) गलत है।
    (d) (a) गलत है, परंतु (R) सही है।
    41st B.P.S.C. (Pre) 1996
    उत्तर-(a)
    नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्तकाल (5वीं शताब्दी) में हुई और यह प्राचीन भारत का सबसे बड़ा बौद्ध शिक्षा केंद्र था, जहाँ 10,000 से अधिक छात्र और 2,000 से अधिक शिक्षक थे। पाल वंश के शासक धर्मपाल ने विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना कर उसे अधिक महत्व दिया, जिससे नालंदा को मिलने वाला राजकीय संरक्षण धीरे-धीरे कम होता गया। इस कारण 12वीं शताब्दी के अंत तक नालंदा का क्रमिक पतन हो चुका था। तत्पश्चात 1193 ई. में बख्तियार खिलजी ने इसे जलाकर पूरी तरह नष्ट कर दिया। अतः कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं तथा (R), (A) की सही व्याख्या करता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 7वीं शताब्दी में नालंदा की यात्रा की थी और अपने यात्रा-वृत्तांत ‘सी-यू-की’ में इसका विस्तृत वर्णन किया। उन्होंने यहाँ लगभग दो वर्षों तक अध्ययन किया था। नालंदा के खंडहरों को 2016 में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया है।
    121. भारत के धार्मिक इतिहास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-
    1. सौत्रांतिक और सम्मितीय जैन मत के संप्रदाय थे।
    2. सर्वास्तिवादियों की मान्यता थी कि दृग्विषय (फिनोमिना) के अवयव पूर्णतः क्षणिक नहीं हैं, अपितु अव्यक्त रूप से सदैव विद्यमान रहते हैं।
    उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
    (a) केवल 1
    (b) केवल 2
    (c) 1 और 2 दोनों
    (d) न तो 1, न ही 2
    I.A.S. (Pre) 2017
    उत्तर-(b)
    सौत्रांतिक और सम्मितीय वास्तव में बौद्ध धर्म के संप्रदाय हैं, न कि जैन धर्म के। अतः कथन 1 गलत है। सर्वास्तिवाद का शाब्दिक अर्थ है — ‘सर्वम् अस्ति’ अर्थात् ‘सब कुछ (तीनों कालों में) विद्यमान है।’ इस संप्रदाय की मान्यता थी कि धर्म (मानसिक एवं भौतिक तत्व) तीनों कालों — भूत, वर्तमान और भविष्य — में किसी न किसी रूप में अव्यक्त अवस्था में बने रहते हैं, वे पूर्णतः क्षणिक नहीं होते। इस प्रकार कथन 2 सही है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सर्वास्तिवादियों ने तृतीय बौद्ध संगीति (पाटलिपुत्र, अशोक के समय) के निर्णयों से असहमत होकर कश्मीर में अलग संप्रदाय स्थापित किया। कनिष्क के काल में कश्मीर में आयोजित चतुर्थ बौद्ध संगीति मुख्यतः सर्वास्तिवादियों द्वारा ही संचालित की गई थी, जिसमें ‘महाविभाषा’ नामक विशाल टीका ग्रंथ की रचना हुई।
    122. आरंभिक मध्ययुगीन समय में बौद्ध धर्म का पतन किस/किन कारण| कारणों से शुरू हुआ?
    1.उस समय तक बुद्ध, विष्णु के अवतार समझे जाने लगे और वैष्णव धर्म का हिस्सा बन गए।
    2.अंतिम गुप्त राजा के समय तक आक्रमण करने वाली मध्य एशिया की जनजातियों ने हिंदू धर्म को अपनाया और बौद्धों को सताया।
    3. गुप्त वंश के राजाओं ने बौद्ध धर्म का पुरजोर विरोध किया।
    उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है हैं ?
    (a) केवल 1
    (b) केवल 1 और 3
    (c) केवल 2 और 3
    (d) 1, 2 और 3
    I.A.S. (Pre) 2010
    उत्तर-(a)
    आरंभिक मध्यकाल में बौद्ध धर्म के पतन का एक प्रमुख कारण यह था कि हिंदू धर्म ने बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित कर दिया, जिससे बौद्ध धर्म की स्वतंत्र पहचान धीरे-धीरे वैष्णव परंपरा में समाहित होने लगी। कथन 2 असत्य है क्योंकि मध्य एशियाई आक्रांताओं ने बौद्धों को सताया नहीं, बल्कि उन्होंने स्वयं बौद्ध धर्म अपनाया। कथन 3 भी असत्य है — गुप्त शासक मुख्यतः वैष्णव थे, किंतु उन्होंने बौद्ध धर्म का विरोध नहीं किया बल्कि धार्मिक सहिष्णुता बनाए रखी।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बौद्ध धर्म के पतन में आदि शंकराचार्य (8वीं शताब्दी) की अद्वैत वेदांत दर्शन की लहर की भी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है, जिसने बौद्ध दर्शन को तार्किक रूप से चुनौती दी। इसके अतिरिक्त बौद्ध संस्थाओं का अत्यधिक भूमि-संपदा पर निर्भर हो जाना और जन-सामान्य से कट जाना भी पतन का एक महत्वपूर्ण आंतरिक कारण था।
    123. निम्नांकित कथनों पर विचार करें एवं ‘चैत्य’ तथा ‘विहार’ में क्या अंतर हैं, इसे चुनें-
    (a) विहार पूजा स्थल होता है, जबकि चैत्य बौद्ध भिक्षुओं का निवास स्थल है।
    (b) चैत्य पूजा स्थल होता है, जबकि विहार निवास स्थान है।
    (c) दोनों में विशेषतः कोई अंतर नहीं है।
    (d) विहार एवं चैत्य दोनों ही निवास स्थान के रूप में प्रयोग हो सकते हैं।
    U.P. U.D.A./L.D.A. (Pre) 2001
    उत्तर-(b)
    चैत्य शब्द की उत्पत्ति ‘चिता’ से मानी जाती है। किसी महापुरुष के अंतिम संस्कार के बाद उनके अवशेषों पर निर्मित स्मारक को चैत्य या स्तूप कहा जाता था। धीरे-धीरे ये धार्मिक उपासना के केंद्र बन गए। चैत्यगृहों के समीप ही भिक्षुओं के लिए आवासीय भवन बनाए जाते थे जिन्हें ‘विहार’ कहते थे। इस प्रकार चैत्य = पूजा स्थल, विहार = निवास स्थान।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘विहार’ शब्द से ही भारत के राज्य ‘बिहार’ का नाम पड़ा, क्योंकि प्राचीन काल में इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में बौद्ध विहार थे। नालंदा, विक्रमशिला और ओदंतपुरी जैसे विशाल शिक्षा केंद्र भी मूलतः विहार ही थे जो कालांतर में विश्वविद्यालयों के रूप में विकसित हुए।
    124. बौद्ध धर्म के विस्तार के कारणों में सम्मिलित थे-
    1.धर्म की सादगी
    2.दलितों के लिए विशेष
    3.अपील धर्म की मिशनरी भावना
    4. स्थानीय भाषा का प्रयोग
    5. दार्शनिकों द्वारा वैदिक भावना की सुदृढ़ता
    नीचे दिए कूट में से सही कूट : उत्तर का चयन कीजिए :
    (a) 1, 2 और 3
    (c) 1, 2, 3 और 4
    (b) 2, 3 और 4
    (d) 2, 3, 4 और 5
    U.P.P.C.S. (Pre) 2009
    उत्तर-(c)
    बौद्ध धर्म के व्यापक प्रसार के पीछे कई कारण थे। सबसे पहले, इसकी शिक्षाएँ सरल और व्यावहारिक थीं — जाति-भेद का विरोध, अहिंसा और करुणा पर बल। दूसरे, यह दलितों और निम्न वर्गों के लिए विशेष रूप से आकर्षक था क्योंकि इसमें जन्म-आधारित भेदभाव नहीं था। तीसरे, बौद्ध भिक्षु जन-जन तक धर्म का प्रचार करने की मिशनरी भावना से कार्य करते थे। चौथे, बुद्ध ने उस काल की आम जनता की भाषा पाली का प्रयोग किया, जिससे धर्म सर्वसुलभ बना। परंतु ‘वैदिक भावना की सुदृढ़ता’ बौद्ध धर्म के प्रसार का कारण नहीं थी, बल्कि यह वैदिक व्यवस्था की एक विशेषता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सम्राट अशोक (268-232 ई.पू.) ने बौद्ध धर्म को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर फैलाने में सर्वाधिक योगदान दिया। उन्होंने अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका भेजा, जहाँ बौद्ध धर्म आज भी राजकीय धर्म है। संघमित्रा बोधि वृक्ष की एक शाखा भी श्रीलंका ले गई थीं।
  • गौतम बुद्ध : सिद्धार्थ से बुद्ध बनने तक ज्ञान और त्याग की यात्रा

    📚 विषय सूची

    परिचय

     जन्म563 ई.पू.
     जन्मस्थललुम्बिनी वन (कपिलवस्तु, नेपाल)
     पिताशुद्धोधन (शाक्यों के राज्य कपिलवस्तु के शासक
     मातामहामाया देवी (कोलिय वंश)
     बचपन का नामसिद्धार्थ
     कुलक्षत्रिय
     गोत्रगौतम
     पालन पोषणविमाता प्रजापति गौतमी
     पत्नीयशोधरा (कोलिय गणराज्य की राजकुमारी)
     पुत्रराहुल
     सारथीचन्ना
     घोड़ाकथक
     प्रथम गुरूआलारकलाम
     ज्ञान प्राप्ति स्थल गया (बोधगया, बिहार) निरंजना नदी का तट
     प्रथम उपदेश स्थलऋषि पत्तन (सारनाथ)
     धर्म-प्रचारवैशाली, मगध, अंग, काशी, मल्ल, वज्जि
     प्रथम शिष्यआनंद व उपालि
     प्रथम महिला शिष्य प्रजापति गौतमी
     प्रिय शिष्यआनंद
     अंतिम उपदेश सुभध नामक व्यक्ति
     मृत्यु483 ई.पू., आयु-80 वर्ष, वैशाख पूर्णिमा, कुशीनगर (उत्तर प्रदेश)

    बौद्ध धर्म : गौतम बुद्ध

    गौतम बुद्ध (563-583 ईसा.पू) के समकालीन मगध पर हर्यक वंश (544-412 ईसा.पू) का शासन था।

    ➣ बुद्ध का काल मौर्य साम्राज्य (322-185 ईसा. पू.) के उदय और सिकंदर के आक्रमण (326 ईसा. पू.) से भी पहले का है।

      संप्रदाय संस्थापक
     आजीवक संप्रदाय (भाग्यवादी) मक्खलि गोशाल
     घोर अक्रियावादीपूरन कस्सप
     उच्छेदवादी (भौतिकवादी) अजित केस कंबलि
     नित्यवादीपकुध कच्चायन
     संदेहवादी (अज्ञेयवादी, अनिश्चयवादी)संजय वेलदुपुत्त

    ➣ गौतम बुद्ध को एशिया के ज्योति पुंज के तौर पर जाना जाता है। गौतम बुद्ध के जीवन पर एडविन अर्नाल्ड ने लाइट ऑफ़ एशिया नामक काव्य पुस्तक की रचना की है।

    प्रारंभिक जीवन

    ➣ बौर्द्ध धर्म के संस्थापक महात्मा बुद्ध थे। बुद्ध का अर्थ प्रकाशमान अथवा जाग्रत होता है।

    ➣ गौतम बुद्ध का जन्म 563 ई.पू. में शाक्य गणराज्य की राजधानी कपिलवस्तु के निकट लुम्बिनी ग्राम में आम्रकुंज में शाल वृक्ष के नीचे क्षत्रिय कुल में हुआ।

    अशोक का रूम्मिनदेई (लुम्बिनी) अभिलेख बुद्ध के जन्म का अभिलेखीय प्रमाण प्रस्तुत करता है।

    ➣ महात्मा बुद्ध का जन्म, ज्ञान प्राप्तिनिर्वाण तीनों वैशाख पूर्णिमा को हुए थे जिसे बुद्ध पूर्णिमा कहा जाता है। इसीलिए बौद्धों का सबसे पवित्र एवं महत्त्वपूर्ण त्योहार वैशाख पूर्णिमा / बुद्ध पूर्णिमा है।

    ➣ महात्मा बुद्ध के पिता का नाम शुद्धोदन था जो शाक्य गण के मुखिया थे और माता का नाम महामाया था जो कोसल राज्य (कोलिय वंश) की राजकुमारी थी।

    ➣ बुद्ध के जन्म के सातवें दिन उनकी माता का देहांत हो गया। अतः इनका लालन-पालन इनकी मौसी प्रजापति गौतमी ने किया था।

    कालदेवल, कौण्डिन्य एवं ऋषि अतिश ने भविष्यवाणी की, कि सिद्धार्थ चक्रवर्ती राजा या फिर संन्यासी होगा।

    ➣ महात्मा बुद्ध का बचपन का नाम सिद्धार्थ था। इसके अलावा इन्हें तथागत, शाक्यमुनि, बोधिसत्व, सुगाता, अरहंत, प्रछन्न, चक्रवर्तिन, सम्मा, सम्बुद्धस्सा जैसे नामों से भी जाना जाता है।

    ➣ 16 वर्ष की आयु में बुद्ध का विवाह राजकुमारी यशोधरा से हुआ। उत्तरकालीन बौद्ध ग्रंथों में यशोधरा के अन्य नाम गोपा, बिम्बा, भद्कच्छना आदि मिलते हैं।

    गृहत्याग / महाभिनिष्क्रमण

    28वें वर्ष में सिद्धार्थ को यशोधरा से राहुल नामक पुत्र प्राप्त हुआ, लेकिन सांसारिक दुःखों से द्रवित होकर उन्होंने 29वें वर्ष में गृहत्याग कर दिया। इस गृहत्याग की घटना को बौद्ध मतावलम्बी महाभिनिष्क्रमण कहते हैं।

    ➣ कहा जाता है जब बुद्ध ने सन्यास लेने का सकंल्प ले लिया था तभी उन्हें पुत्र के जन्म का समाचार मिला उन्होंने पुत्र को बाधा के रूप में देखते हुए उसे राहु कहा फलत : पुत्र का नाम राहुल रखा गया।

    ➣ सिद्धार्थ के मन में वैराग्य उत्पन्न करने वाले चार दृश्य क्रमश:- वृद्ध व्यक्ति, रोगी व्यक्ति, मृत व्यक्ति व सन्यासी। ये चार दृश्य मज्झिम निकाय में है।

    ➣ महात्मा बुद्ध का सारथी चन्ना अथवा छन्दक और घोड़ा कंथक था।

    ➣ बुद्ध ने गृहत्याग के पश्चात अनोमा नदी के किनारे अनुवैया स्थान पर पहुँचकर सिर मुंडवाकर भिक्षु वस्त्र धारण किए तथा कन्थक एवं छन्दक को वापस भेजा। कालान्तर में इस स्थान पर चूड़ामणि एवं कंथकराम विहार का निर्माण हुआ।

    ➣ तत्पश्चात गौतम ने वैशाली के समीप अपने पहले गुरू अलारकलाम से सांख्य दर्शन की शिक्षा ली आलार कालाम ने महात्मा बुद्ध को आकिंचन्यायतन तथा अरूपसमापत्ति की शिक्षा दी।

    आलारकालाम सांख्य दर्शन के आचार्य थे। इसी कारण बौद्ध धर्म पर सांख्य दर्शन का प्रभाव है।

    ➣ अलार कालाम के बाद राजगृह के उद्रक (रूद्रक) रामपुत्त सिद्धार्थ के दुसरे गुरु बने, रूद्रक ने बुद्ध को नैवसंज्ञा-नासंज्ञायतन नामक योग का उपदेश दिया। ललित विस्तार में उद्रक रामपुत्त का आश्रम भी राजगृह में बताया है।

    ➣ सुत्तनिपात के पब्बज्ज सुत्त और ललित विस्तार के अनुसार राजगृह में सिद्धार्थ मगधराज बिम्बिसार से भी मिले। इसके पश्चात सिद्धार्थ उरुवेला (बोधगया) पहुंचे।

    ➣ बुद्ध जब उरूवेला (बोधगया) गये, तब वहाँ उन्हें कौंडिन्य एवं चार अन्य ब्राह्मण साधक मिले। सिद्धार्थ ने कठोर साधना छोड़कर निरंजना नदी के किनारे सेनानी गांव की सुजाता के हाथों से भोजन (खीर) ग्रहण किया।

    ➣ वर्तमान में सेनानी गाँव का नाम बकरौर है। बकरौर गाँव में दूसरी शताब्दी ई.पू. का सुजाता का स्तूप भी मिला है।

    ज्ञान प्राप्ति / सम्बोधि

    35 वर्ष की आयु में उरूवेला में एक अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष के नीचे समाधि की अवस्था में 49वें दिन वैशाख पूर्णिमा की रात सेनानी ग्राम में निरंजना (फल्गु/लिलाजन) नदी के तट पर सिद्धार्थ को ज्ञान प्राप्त हुआ।

    ➣ ज्ञान प्राप्ति की इस घटना को सम्बोधि कहा जाता है। महावग्ग में सम्बोधि का वर्णन तथा सम्बोधि के बाद कुछ समय का क्रमबद्ध इतिवृत दिया गया है।

    ➣ ज्ञान प्राप्ति की घटना के दो दिन बाद ही सिद्धार्थ तथागत (सत्य का ज्ञान प्राप्त करने वाला) हो गये एवं गौतम बुद्ध के नाम से प्रसिद्ध हुये।

    ➣ 6 वर्ष तक बुद्ध द्वारा सत्य की खोज का प्रयास आर्य पर्येषणा कहलाता है।

    प्रथम उपदेश / धर्मचक्रप्रवर्तन

    ➣ उरुवेला से बुद्ध सारनाथ (ऋषिपत्तनम एवं मृगदाव) आये। जहाँ उन्होंने प्रथम उपदेश जनसाधारण भाषा पालि में दिए। जिसे बौद्ध परम्परा में धर्म चक्रप्रवर्तन के नाम से जाना जाता है।

    ➣ प्रथम उपदेश का उल्लेख संयुक्त निकाय (सुत्त पिटक) में है एवं प्रथम उपेदश में ही बुद्ध ने चार आर्य सत्यों के बारे में बताया।

    ➣ महावग्ग के अनुसार बुद्ध ने सर्वप्रथम तपस्सु (तपुस्स) एवं भल्लि (भल्लिक) नामक दो बनजारों (शूद्र) को गया में बौद्ध धर्म का अनुयायी बनाया।

    ➣ उरूवेला से बुद्ध वाराणसी के पास स्थित सारनाथ आये तथा यहाँ के ऋषिपत्तनम (उषावदन) एवं मृगदाव आश्रम में पाँच ब्राह्मण संन्यासियों को पालि भाषा में प्रथम उपदेश दिया। ये पाँच शिष्य थे-

    1. आंज (असंग)
    2. कौंडिन्य
    3. अस्सजि वप्प
    4. महानाम
    5. भद्दिय

    ➣ बुद्ध ने बनारस (वाराणसी) के यश नामक श्रेष्ठि को भी संघ का सदस्य बनाया।

    बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार

    ➣ बौद्ध धर्म का सर्वाधिक प्रचार कोशल राज्य में हुआ। कोशल में ही बुद्ध के सर्वाधिक अनुयायी बने तथा कोशल की राजधानी श्रावस्ती में ही बुद्ध ने सर्वाधिक उपदेश दिये तथा श्रावस्ती में ही सर्वाधिक वर्षाकाल (20 वर्षाकाल) व्यतीत किया।

    ➣ श्रावस्ती के बाद क्रमशः राजगृह, वैशाली और कपिलवस्तु में सर्वाधिक वर्षाकाल बिताया। कपिलवस्तु भी कोशल राज्य के अधीन था।

    ➣ सर्वप्रथम धर्मचक्रप्रवर्तन के उपरांत बुद्ध काशी होते हुए मगध की राजधानी राजगृह गये, जहाँ बिम्बिसार ने उनका स्वागत किया और वेणुवन विहार दान में दिया। उल्लेखनीय है यह बुद्ध को दिया गया पहला विहार था।

    ➣ मगध शासक बिम्बिसार (हर्यक वंश) एंव उसकी पत्नी क्षेमा, पुत्र अभय बुद्ध के शिष्य बने। राजगृह में ही सारिपुत्र, महामोद्गलायन, उपालि, अभय आदि इनके शिष्य बने।

    सारिपुत्र एवं मौद्गल्यायन अस्सजि वप्प नामक बौद्ध भिक्षु से प्रभावित होकर राजगृह आये थे। सारिपुत्र एवं मौद्गल्यायन का निधन बुद्ध के जीवनकाल में ही हो गया था। सारिपुत्र की मृत्यु पर तो बुद्ध शोक से अत्यधिक व्याकुल हो गये थे।

    राजगृह से चलकर बुद्ध लिच्छवियों की राजधानी वैशाली पहुंचे। जहां उन्होंने पांचवां वर्षाकाल व्यतीत किया। लिच्छवियों ने उनके निवास के लिए महावन में प्रसिद्ध कुटाग्रशाला का निर्माण करवाया।

    ➣ वैशाली की प्रसिद्ध नगर-वधू आम्रपाली उनकी शिष्या बनी तथा भिक्षु-संघ के निवास के लिए उसने अपनी आम्रवाटिका प्रदान की।

    ➣ बुद्ध ने कपिलवस्तु में शाक्यों के संस्थागार का उद्घाटन किया एवं कपिलवस्तु से लौटते समय अनुपिय नामक स्थान पर शाक्य नरेश भद्रिक को अपना शिष्य बनाया।

    ➣ ज्ञान प्राप्ति के 8वें वर्ष गौतम बुद्ध ने वैशाली में अपने प्रिय शिष्य आनंद के कहने पर महिलाओं को संघ में प्रवेश की अनुमति दी। इस प्रकार बुद्ध की माता प्रजापति गौतमी संघ में प्रवेश करने वाली प्रथम महिला हुई।

    देवदत्त, बुद्ध का चचेरा भाई था। यह पहले उनका अनुगत बना और फिर उनका विरोधी बन गया। वह बौद्ध संघ से बुद्ध को हटाकर स्वंय संघ का प्रधान बनना चाहता था, किंतु उसे इसमें सफलता नहीं मिली।

    ➣ बुद्ध ने कोशल राज्य में सर्वाधिक वास किया। यहाँ के अनाथपिण्डक नामक धनी व्यापारी ने उनकी शिष्यता ग्रहण की तथा संघ के लिए जेतवन विहार प्रदान किया।

    भरहुत से प्राप्त एक शिल्प के ऊपर इस दान का उल्लेख है। इसमें जेतवन अनाथपेन्डिकों देति कोटिसम्थतेनकेता लेख उत्कीर्ण मिलता है।

    ➣ कोशल नरेश प्रसेनजित ने भी अपने परिवार के साथ बुद्ध की शिष्यता ग्रहण की तथा संघ के लिए पुब्बाराम (पूर्वा-राम) नामक विहार बनवाया।

    ➣ ज्ञान प्राप्ति के 20वें वर्ष बुद्ध श्रावस्ती (कोशल) पहुँचे तथा वहाँ अंगुलिमाल नामक डाकू को अपना शिष्य बनाया।

    मृत्यु/महापरिनिर्वाण

    ➣ अपने दिनों में बुद्ध अपना प्रचार करते हुए वे मल्लों की राजधानी पावा पहुँचे, जहाँ वे चुंद नामक लुहार की आम्रवाटिका में ठहरे।

    चुंद ने बुद्ध को सूकर मछव खाने को दिया, इससे उन्हें रक्तातिसार हो गया। इस वेदना के बाद भी वे कुशीनारा (मल्ल गणराज्य की राजधानी) पहुँचे।

    ➣ 483 ई.पू. में 80 वर्ष की अवस्था में हिरण्यवती नदी के तट पर स्थित कुशीनारा अथवा कुशीनगर (उत्तर प्रदेश) में बुद्ध की मृत्यु हो गयी।

    बौद्ध परंपरा में गौतम बुद्ध की मृत्यु को महापरिनिर्वाण नाम से जाना जाता है।

    ➣ कुशीनगर के रामसंभार नदी तट पर मल्लों ने बुद्ध का अन्तिम संस्कार किया और द्रोण नामक ब्राह्मण की अध्यक्षता में अस्थि अवशेष को 8 जगह भेजा गया। इन्हीं आठ क्षेत्रों में स्तूप बनाये गए-

    1. मगध नरेश अजातशत्रु
    2. कपिलवस्तु के शाक्य
    3. रामग्राम के कोलिय
    4. पावा एवं कुशीनगर के मल्ल
    5. पिप्पलिवन के मौर्य (अंगारा स्तूप)

    दीघनिकाय में वर्णित है कि क्षत्रिय होने के आधार पर अजातशत्रु ने बुद्ध के अस्थि अवशेषों में हिस्सेदारी का दावा करते हुए कहा था कि, बुद्ध भी खतिय (क्षत्रिय), मैं भी खतिय।

    • सबसे पहले बौद्ध स्तूप की स्थापना सारनाथ में हुई।
    • सर्वाधिक उपदेश श्रावस्ती में दिये गए।
    • सर्वाधिक प्रचार कोशल राज्य में हुआ।
    • प्रथम वर्षावास सारनाथ (वाराणसी) के मूलगन्ध कुट्टि विहार में किया गया।
    • अन्तिम वर्षावास वैशाली के वेलुग्राम विहार में किया था।

    ➣ बौद्ध धर्म अपनाने वाले शासक- अजातशत्रु, उदायिन, कनिष्क, प्रसेन्नजित, हर्षवर्धन, पाल शासकअशोक आदि। सम्राट अशोक के काल में बौद्ध धर्म काफी उन्नत अवस्था में था।

    बुद्ध के जीवन से संबंधित प्रतीक

      घटनाप्रतीक
     जन्म कमल एवं हाथी
     गृहत्यागघोड़ा
     यौवन सांड
     ज्ञानपीपल (बोधि वृक्ष)
     प्रथम उपदेश चक्र
     समृद्धि शेर
     स्तूपनिर्वाण
     मृत्युपद-चिह्न

    बौद्ध शिक्षाएँ एवं सिद्धांत

    ➣ बौद्ध धर्म को तीन महत्त्वपूर्ण अवधारणाएं अनित्यता, अनात्मा, अनीश्वरवाद हैं।

    ➣ महात्मा बुद्ध ने सभी उपदेश जनसाधारण भाषा पालि में दिए।

    ➣ बुद्ध ने मध्यम मार्ग अथवा मध्यम प्रतिपदा का उपदेश देते हुए कहा कि- मनुष्य को सभी प्रकार के आकर्षण एवं कायाक्लेश से बचना चाहिए अर्थात न तो अत्यधिक इच्छाएं करनी चाहिए और न ही अत्यधिक तप (दमन) करना चाहिए। बल्कि इनके बीच का मार्ग अपना कर दुःख निरोध का प्रयास करना चाहिए।

    ➣ बुद्ध ने क्षणिकवाद का प्रतिपादन किया। क्षणिकवाद के अनुसार, इस ब्रह्मांड में सब कुछ क्षणिक और नश्वर है, कुछ भी स्थायी नहीं है, सब कुछ परिवर्तनशील है।

    ➣ बौद्ध धर्म मूलतः अनीश्वरवादी है। वास्तव में बुद्ध ने ईश्वर के स्थान पर मानव प्रतिष्ठा पर ही बल दिया।

    ➣ वास्तव में बुद्ध ने ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार या अस्वीकार नहीं किया। इसलिए उनको अज्ञेयवादी कहा जाता है।

    ➣ बौद्ध धर्म अनात्मवादी है। इसमें आत्मा की परिकल्पना नहीं की गई है। यह पुनर्जन्म में विश्वास करता है। अनात्मवाद को नैरात्मवाद भी कहा जाता है।

    ➣ बुद्ध के अनुसार चूंकि विश्व को प्रत्येक वस्तु अनित्य है, अतः नित्य आत्मा की परिकल्पना नहीं की जा सकती।

    ➣ बौद्ध धर्म ने वर्ण व्यवस्था एवं जाति प्रथा का घोर विरोध किया। वे अपौरुपेय वेद की सत्ता को अस्वीकार करते हैं।

    ➣ जिस प्रकार दुःख समुदाय का कारण जन्म है, उसी तरह जन्म का कारण अज्ञानता का चक्र है। इस अज्ञान रूपी चक्र को प्रतीत्य समुत्पाद कहा जाता है।

    ➣ प्रतीत्यसमुत्पाद ही बुद्ध के उपदेशों का सार एवं उनकी सम्पूर्ण शिक्षा का आधार स्तम्भ है। प्रतीत्य समुत्पाद का शाब्दिक अर्थ है प्रतीत्य (किसी वस्तु के होने पर) समुत्पाद (किसी अन्य वस्तु की उत्पत्ति।

    ➣ बुद्ध ने पुनर्जन्म तथा जन्म-मरण के चक्र का मूल कारण अविद्या बतलाया है।

    ➣ बौद्ध ने निर्वाण प्राप्त करने को कहा अर्थात् इच्छाओं और तृष्णाओं से छुटकारा, जिससे जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति मिले। निर्वाण का अर्थ है दीपक का बुझ जाना अर्थात् जीवन-मरण के चक्र मुक्त हो जाना।

    ➣ बौद्ध धर्म के तीन रत्न- बुद्ध, धम्म और संघ

    पंचशील तथा दसशील

    ➣ दीघ निकाय के भाग सिंगालोवाद में पंचशील एवं दसशील का वर्णन है।

    ➣ बौद्ध धर्म में पंचशील का सिद्धान्त छान्दोग्य उपनिषद् से लिया गया है।

    ➣ बौद्ध धर्म में निर्वाण प्राप्ति के लिये सदाचार तथा नैतिक जीवन पर दस शीलों पर अत्यधिक बल दिया गया है। इन दस शीलों को शिक्षापद भी कहा गया है, ये हैं-

    1. अहिंसा
    2. सत्य
    3. अस्तेय (चोरी न करना)
    4. अपरिग्रह (किसी प्रकार की संपत्ति न रखना)
    5. मद्य सेवन न करना
    6. असमय भोजन न करना
    7. सुखप्रद विस्तर पर न सोना
    8. आभूषणों का त्याग
    9. स्त्रियों से दूर रहना (ब्रह्मचर्य)
    10. व्यभिचार आदि से दूर रहना

    ➣ इनमे से गृहस्थों के लिये केवल 5 शील तथा भिक्षुओं के लिये 10 शील मानना अनिवार्य था।

    अष्टांगिक मार्ग

    ➣ दुखों के निवारण के लिए बुद्ध ने अष्टांगिक मार्ग की बात कही जिसमें आठ मार्ग बताए गये है । सांसारिक दुःखों से मुक्ति हेतु बुद्ध ने अष्टांगिक मार्ग पर चलने की बात कही है।

    ➣ अष्टांगिक मार्ग के अनुशीलन से मनुष्य की भव तृष्णा नष्ट होने लगती है और वह निर्वाण की ओर अग्रसर हो जाता है। अष्टांगिक मार्ग के साधन हैं-

     सम्यक दृष्टि वस्तुओं के वास्तविक रूप का ध्यान करना सम्यक दृष्टि है।
     सम्यक संकल्प आसक्ति, द्वेष तथा हिंसा से मुक्त विचार रखना।
     सम्यक वाक अप्रिय वचनों का परित्याग।
     सम्यक कर्मान्त दान, दया, सत्य, अहिंसा आदि सत्कर्मों का अनुसरण करना।
     सम्यक आजीव सदाचार के नियमों के अनुकूल जीवन व्यतीत करना।
     सम्यक व्यायाम विवेकपूर्ण प्रयत्न करना।
     सम्यक स्मृति सभी प्रकार की मिथ्या धारणाओं का परित्याग करना।
     सम्यक समाधि निर्वाण या मोक्ष प्राप्त करना।

    ➣ अष्टांगिक मार्ग को भिक्षुओं का कल्याण मित्र, देवयान एवं ब्रह्मयान भी कहा जाता है।

    ➣ अष्टांगिक मार्ग को मध्यम मार्ग या मज्झिम प्रतिपदा भी कहते हैं।

    ➣ अष्टांगिक मार्ग के साधनों को तीन स्कन्धों में बांटा गया है-

     प्रज्ञा सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाक
     शील सम्यक कर्मान्त, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम
     समाधि सम्यक स्मृति, सम्यक समाधि

    ➣ बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग का स्रोत तैत्तिरीय उपनिषद् है।

    चार आर्य सत्य

    ➣ बुद्ध ने चार आर्य सत्य भी प्रस्तुत किये हैं-

    1. दुःख — संसार में दुःख है।
    2. समुदय — दुःख के कारण हैं।
    3. निरोध — दुःख के निवारण हैं।
    4. मार्ग — निवारण के लिये अष्टांगिक मार्ग हैं।

    चारों आर्य सत्य एवं अष्टांगिक मार्ग एवं प्रथम उपदेश का वर्णन धर्मचक्र प्रवर्तन सूत्र में मिलता है।

    • अनीश्वरवाद – ईश्वरीय सत्ता में विश्वास नहीं।
    • शून्यतावाद – संसार की समस्त वस्तुएँ या पदार्थ सत्ताहीन है।
    • अनात्मवाद – आत्मचेतना पर सर्वाधिक बल।
    • क्षणिकवाद – संसार में कोई भी चीज स्थिर नहीं।

    बौद्ध धर्म की संगीतियां

    ➣ बुद्ध के उपदेशों को दो पिटकों (विनय पिटक तथा सुत्त पिटक) में संकलित करने के उद्देश्य से अजातशत्रु (हर्यक वंश) के शासनकाल में 483 ई.पू. में प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन महाकश्यप की अध्यक्षता में राजगृह (सप्तपर्णी गुफा) में हुआ ।

    ➣ प्रथम संगीति हर्यक वंश के शासक अजातशत्रु के संरक्षण में हुयी जिसमें सुतपिटक व विनय पिटक का संकलन हुआ।

    द्वितीय बौद्ध संगीति 383 ई.पू. में कालाशोक (शिशुनागवंश) के शासनकाल में साबकमीर (सर्वकामनी) की अध्यक्षता में वैशाली आयोजित किया गया। इसी बौद्ध संगीति के दौरान अनुशासन को लेकर मतभेद के समाधान के लिए बौद्ध धर्म दो भागों- स्थविर एवं महासांघिक में बंट गया था ।

    मोग्गलिपुत्ततिस्स की अध्यक्षता में अशोक (मौर्य वंश) के शासनकाल में 251 ई.पू. में तृतीय बौद्ध संगीति का आयोजन पाटलिपुत्र में किया गया। इसमें अभिधम्म पिटक का संकलन हुआ जिसमें बौद्ध दर्शन का वर्णन 7 भागों किया गया है

    ➣ तृतीय बौद्ध संगीति के दौरान संघ भेद के विरुद्ध कठोर नियमों का प्रतिपादन करके बौद्ध धर्म को स्थायित्व प्रदान करने का प्रयत्न किया गया।

    ➣ कनिष्क (कुषाण वंश) के शासनकाल में कश्मीर के कुण्डलवन में लगभग ईसा की प्रथम शताब्दी में चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन हुआ। इसके अध्यक्ष और उपाध्यक्ष क्रमशः वसुमित्र एवं अश्वघोष थे।

    ➣ चतुर्थ संगीति में बौद्ध धर्म का विभाजन हीनयानमहायान में हो गया, आगे चलकर सातंवी शताब्दी में बौद्ध धर्म की वजयान शाखा भी बनी।

    संगीतिसमयस्थानअध्यक्षशासनकाल
    प्रथम 483 ई. पूर्व राजगृह महाकश्यप अजातशत्रु
    द्वितीय383 ई. पूर्व वैशाली सबाकामी कालाशोक
    तृतीय 255 इ. पूर्व पाटलिपुत्रमोग्गलिपुत्ततिस्स अशोक
    चतुर्थप्रथम शताब्दी कुण्डलवनवसुमित्र/अश्वघोषकनिष्क
    • प्रथम : बुद्ध के उपदेशों को दो पिटकों विनय एवं सुत्त में संकलित किया गया।
    • द्वितीय : अनुशासन को लेकर मतभेद के कारण बौद्ध धर्म स्थविर एवं महासांघिक में बंट गया।
    • तृतीय : तीसरा पिटक अभिधम्म जोड़ा गया।
    • चतुर्थ : बौद्ध धर्म का दो सम्प्रदायों हीनयान एवं महायान में विभाजन हुआ।

    ➣ सम्राट हर्षवर्धन ने 643 ई. में कन्नौज में एक विशाल धार्मिक सभा, का आयोजन किया था। जिसमे बौद्ध की महायान शाखा की श्रेठता सिद्ध हुई। इसकी अध्यक्षता चीनी यात्री ह्वेनसांग ने की थी।

    बौद्ध धर्म के विभिन्न संप्रदाय

    हीनयान : निम्न वर्ग (भिक्षुक जीवन)

    ➣ जिन अनुयायियों ने बिना किसी परिवर्तन के बुद्ध के उपदेशों को स्वीकार किया, वे हीनयानी कहलाए।

    ➣ हीनयानी निम्नमार्गी एवं रूढ़िवादी थे। यह व्यक्तिवादी धर्म था। इसमें व्यक्ति स्वयं के निर्वाण हेतु ही प्रयासरत रहता है, अन्य के कल्याण हेतु प्रयास नहीं करता था।

    ➣ इस पंथ के अनुयायी बुद्ध की मौलिक शिक्षाओं में विश्वास करते थे तथा वे बुद्ध की नहीं, बल्कि उनके प्रतीक चिन्हों की पूजा करते थे।

    ➣ हीनयान का आदर्श अर्हत् पद को प्राप्त करना है। हीनयान को श्रावकयान भी कहते हैं।

    ➣ हीनयान साहित्य मुख्यतः पालि भाषा में है।

    ➣ हीनयान भी समय के साथ दो धाराओं में विभाजित हो गया – वैभाषिक सम्प्रदाय और सौत्रांतिक सम्प्रदाय ( प्रवर्तक – कुमार लाट)।

    ➣ वैभाषिक मत के प्रमुख आचार्य हैं-धर्मत्रात, घोषक, बुद्धदेव, वसुमित्र आदि थे जबकि सौत्रांतिक संप्रदाय के मुख्य विद्वान – चंद्रकीर्ति, शांतिदेव, शांतिरक्षित, आर्यदेव आदि हुए।

    ➣ वैभाषिक मत की उत्पत्ति कश्मीर में हुई जबकि पाश्चात्य वैभाषिक का केन्द्र गांधार था।

    ➣ सौत्रान्तिक मत की स्थापना कुमारलब्ध ने दूसरी शताब्दी ई. में की। सौत्रान्तिक मत का मुख्य आधार सुत्त पिटक है। अतः इसे सौत्रान्तिक कहा जाता है। श्रीलाभ एवं यशोमित्र इस मत के आचार्य थे।

    ➣ वसुबन्धु द्वारा लिखित अभिधम्मकोश (आधार ग्रंथ- विभाषशास्त्र) वैभाषिक सम्प्रदाय का प्रसिद्ध ग्रंथ है तथा सौत्रांतिक सम्प्रदाय का आधार ग्रंथ सुत्तपिटक है।

    वसुबंधु ने अपने जीवन के अन्तिम चरण में वैभाषिक मत को छोड़ योगाचार मत (विज्ञानवाद) अपना लिया और महायान का वज्रछेदिका ग्रन्थ लिखा।

    ➣ भारत में हीनयान की लोकप्रियता धीरे-धीरे समाप्त हो गयी, किन्तु आज भी यह श्रीलंका, बर्मा, कंबोडिया, थाईलैंड, लाओस में जीवित है।

    महायान : उच्च वर्ग (गृहस्थ जीवन)

    ➣ बौद्ध नियमों के विपरीत महायान ने दरिद्रता अथवा भिक्षुक जीवन को त्याग कर भोग-विलास को ग्रहण किया। महायान का त्रिकार्य सिद्धान्त है- सम्भोगकार्य, धर्मकार्य एवं निर्माण कार्य।

    ➣ महायानी बोधिसत्व की मूर्ति तथा संस्कृत भाषा आदि के प्रयोग में विश्वास करते थे। उन्होंने बुद्ध को अवतार मानकर उनकी मूर्ति बनाकर उपासना करना आरम्भ कर दिया।

    उल्लेखनीय है बुद्ध की मूर्ति को भारत में सर्वप्रथम पूजा गया।

    ➣ महायान साहित्य मुख्यतः संस्कृत भाषा में लिखा गया है। दूसरी से छठीं सदी ई. के मध्य का काल महायान क्लासिकी ग्रंथों के लेखन एवं अनुवाद कार्यों का काल माना जाता है।

    ➣ यह संप्रदाय तिब्बत, चीन, कोरिया, मंगोलिया और जापान में फैला। जापान, चीन जैसे देशों में महायान सम्प्रदाय का वर्चस्व है। वसुमित्र, अश्वघोष, कनिष्कनागार्जुन इसके प्रमुख प्रवर्तक थे।

    ➣ कालान्तर में महायान सम्प्रदाय दो भागों में बंट गया- शून्यवाद (माध्यमिक) और विज्ञानवाद (योगाचार)। शून्यवाद के प्रवर्तक नागार्जुन तथा विज्ञानवाद के प्रवर्तक मैत्रेयनाथ थे।

    मैत्रेय को बौद्ध परंपरा में भावी बुद्ध कहा गया है। एकमात्र इसी विषय पर दोनों संप्रदाय एकमत हैं।

    ➣ नागार्जुन को बौद्ध धर्म का संतपाल / भारत का आइन्स्टाईन एवं प्राचीन भारत का लूथर भी कहा जाता है। नागार्जुन के शून्यवाद ने शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन को प्रभावित किया।

    आर्यदेव (चतुःशतक के लेखक), बुद्धपालित (5वीं सदी), चन्द्र कीर्ति (6ठी शताब्दी), शांतिदेव, कमलशील एवं शांतरक्षित ( 7वीं- 8वीं सदी) आदि शून्यवाद के प्रमुख विद्वान हैं।

    विज्ञानवाद (योगाचार) की स्थापना तीसरी शताब्दी ई. में मैत्रेयनाथ ने की। पेशावर के असंग तथा वसुबंधु ने इसका विकास किया।

    स्थिरमति, दिङ् नाग और धर्मकीर्ति भी योगाचार मत के थे। योगाचार का गुप्तकाल में अत्यधिक विकास हुआ।

    ➣ महायान संप्रदाय का सबसे महत्त्वपूर्ण दार्शनिक ग्रंथ प्रज्ञापारमितासूत्र (बौधिसत्वों के आध्यात्मिक सिद्धान्त) है। इसके लेखक नागार्जुन थे।

    मातृकासिद्धि महायान शाखा से सम्बन्धित टीका है।

    ➣ दिङ् नाग ने पाँचवीं सदी में बौद्ध न्याय-दर्शन का प्रतिपादन किया और प्रमाण समुच्चय नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की। दिङ् नाग को मध्यकालीन न्याय/तर्क का जनक कहा जाता है।

    महायान गृहस्थ तथा हीनयान सन्यास पर जोर देते थे।

    हीनयानमहायान
     हीनयान का शाब्दिक अर्थ है- निम्न मार्ग। महायान का शाब्दिक अर्थ है- उत्कृष्ट मार्ग।
     इसमें महात्मा बुद्ध को एक महापुरुष माना जाता है।इसमें उन्हें देवता माना जाता है।
     यह व्यक्तिवादी धर्म है। इसके अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति को अपने प्रयत्नों से ही मोक्ष प्राप्त करना चाहिए।इसमें परोपकार एवं परसेवा पर बल दिया गया। इसका उद्देश्य समस्त मानव जाति का कल्याण है।
     यह मूर्तिपूजा एवं भक्ति में विश्वास नहीं करता है।यह आत्मा एवं पुनर्जन्म में विश्वास करता है।
     इसकी साधना पद्धति अत्यंत कठोर है तथा यह भिक्षु जीवन का समर्थक है।इनके सिद्धांत सरल एवं सर्वसाधारण के लिए सुलभ हैं। इसमें भिक्षु के साथ-साथ सामान्य उपासकों को भी महत्व दिया गया है।
     इसका आदर्श अर्हत् पद को प्राप्त करना है।इसका आदर्श बोधिसत्व है।
     इसके प्रमुख संप्रदाय हैं- वैभाषिक तथा सौत्रांतिका इसके प्रमुख संप्रदाय हैं- शून्यवाद (माध्यमिक) तथा विज्ञानवाद (योगाचार) |

    ➣ महावस्तु एवं ललित विस्तार बुद्ध की पौराणिक जीवनियाँ हैं। ललितविस्तार महायान संप्रदाय का प्राचीनतम् ग्रंथ है तथा महावस्तु को हीनयान एवं महायान के मध्य पुल माना जाता है।

    वज्रयान : नीच वर्ग (तंत्रवाद)

    ➣ सातवीं सदी आते-आते बौद्ध धर्म का एक नया रूप सामने आया, जिसे वज्रयान कहते हैं। यह संप्रदाय तंत्र-मन्त्र से प्रभावित था।

    ➣ वज्रयान का सर्वाधिक विकास आठवीं शताब्दी में हुआ। इसके सिद्धांत आर्य मंजुश्रीमूलकल्प तथा गुह्यसमाज नामक ग्रंथों में मिलते हैं। इसने भारत में बौद्ध धर्म के पतन का मार्ग प्रशस्त किया।

    ➣ इस सम्प्रदाय के अनुयायियों ने बुद्ध को अलौकिक सिद्धियों वाला पुरुष माना। इसमें मंत्र, हठयोग और तांत्रिक आचारों की प्रधानता थी।

    ➣ इस संप्रदाय के सिद्धांत मंजुश्री मूल कल्प तथा गुहा समाज नामक ग्रंथों में मिलते हैं।

    ➣ इसमें तंत्र-मंत्र पर वल दिया गया और बुद्ध को देवी तारा से जोड़ दिया गया। साधु, गुह्य साधना का प्रयोग करने लगे और पंचमकार (मद्य, माँस, मैथुन, मत्स्य, मुद्रा) की साधना करने लगे।

    ➣ वज्रयान की प्रधान देवता ताराएं ( मातंगी, पिशाची, योगिनी, डाकिनी आदि) थीं, जो मुक्ति प्रदात्री देवियां थीं। ये बुद्ध एवं बोधिसत्वों की पलियां थीं।

    ➣ वज्रयान की परिधि में ही नौवीं-दसवीं शताब्दी में कालचक्रयान नाम से एक नये सम्प्रदाय का उदय हुआ, इसमें सर्वोच्च देवता श्री कालचक्र का माना गया।-

    ➣ कालचक्रयान मत का प्रमुख ग्रंथ कालचक्रतंत्र एवं विमलप्रभा ( सुचन्द्र रचित) थे। इस सम्प्रदाय के प्रमुख देवताभगवान श्रीकालचक्र थे।

    ➣ कालचक्रयान संप्रदाय तिव्बत एवं चीन में विशेष रूप से प्रचलित हुआ।

    बौद्ध साहित्य

    ➣ बौद्ध मत के तीन प्रमुख अंग थे-बौद्ध, संघ एवं धम्म। बौद्ध धर्म में धम्मपद का वही स्थान है, जो हिन्दू धर्म में गीता का है।

    ➣ बौद्ध धर्म के आरंभिक ग्रंथों को त्रिपिटक कहा जाता है। त्रिपिटक सबसे प्राचीन बौद्ध ग्रंथ हैं, यह पाली भाषा में रचित है।

    ➣ बुद्ध के महापरिनिर्वाण के पश्चात उनकी शिक्षाओं को संकलित कर तीन भागों में बांटा गया, इन्हीं को त्रिपिटक कहते हैं। त्रिपिटक हैं- विनय पिटक, सुत्त पिटक और अभिधम्म पिटक

     सुत्तपिटक यह बुद्ध के धार्मिक उपदेशों का संग्रह है।

     विनयपिटक इसमें बौद्ध संघ के नियमों का वर्णन है।

     अभिधम्मपिटकइसमें बौद्ध दर्शन की चर्चा है।

    अढकथा ग्रंथ को त्रिपिटक के महाभाष्य के रूप में लिखा गया था। सुत्तपिटक की अट्ठ कथा महा अट्ठक तथा विनयपिटक की कुरुन्दी तथा *अभिधम्मपिटक की अट्ठ कथा मूल रूप से सिंहली भाषा में महा पच्चरी है।

    ➣ सुत्त पिटक के पांच निकाय (संग्रह) हैं- दोघ निकाय, मज्झिम निकाय, अंगुत्तर निकाय,संयुक्त निकाय तथा खुद्दक निकाय। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण निकाय खुद्दक निकाय है, जिसमें बौद्ध धर्मदर्शन से संबंधित 15 ग्रंथ हैं।

    ➣ अभिधम्म पिटक में बुद्ध की शिक्षाओं का दार्शनिक विवेचन एवं आध्यात्मिक विचारों का पाण्डित्यपूर्ण शैली में संकलन किया गया है । अभिधम्म पिटक का महत्वपूर्ण भाग कथावस्तु है।

    ➣ अभिधम्म पिटक से संबंधित ग्रंथों की संख्या सात है, जिनमें चित्त, नैतिक धर्म और निर्वाण का उल्लेख है। इनकी रचना अशोक के धर्मगुरु ने की थी। उनका नाम मोग्गालिपुत्त तिस्स था।

    जातक में गौतम बुद्ध के पूर्वजन्म से संबंधित लगभग 550 कहानियाँ हैं तथा बौद्ध ग्रंथ थेरीगाथा में बौद्ध भिक्षुणियों के जीवन चरित्र का वर्णन किया गया है। यह पालि भाषा में है।

    महावस्तु में बुद्ध के पूर्व जीवन की कथाएं हैं तथा ललितविस्तार में बुद्ध का जीवन चरित वर्णित है। ललितविस्तार मूलत: एक महायान ग्रंथ है।

    पालि भाषा में रचित प्रसिद्ध ग्रंथ मिलिन्दपन्हो की रचना प्रथम शताब्दी ई. पू. में आचार्य नागसेन की थी । जिसमे ग्रीक नरेश मिनांडर (मिलिंद) के बीच हुए प्रश्नोत्तरों को संकलित किया गया है। ‘

    कनिष्क के दरबारी कवि, नाटककार, संगीतकार, विद्वान एवं तर्कशास्त्री अश्वघोष ने’बुद्धचरित् नामक ग्रंथ की रचना की, जिसमें बुद्ध का जीवन चरित वर्णित है।

    बुद्धचरितम की रचना संस्कृत भाषा में अश्वघोष ने की जिसे बौद्धों का रामायण कहा जाता है।

    ➣ विशुद्धिमार्ग की रचना बुद्धघोष ने की जो हीनयान धर्म का प्रमुख ग्रंथ है।

    ➣ नागार्जुन बौद्धाचार्य ने शून्यवाद का प्रतिपादन किया जो माध्यमिक दर्शन से सम्बन्धित है।

    बुद्धघोष द्वारा रचित ग्रंथ विसुद्धमग्ग ( विशुद्ध मार्ग ) को बौद्धों का विश्व कोश माना जाता है।

    ➣ पालि भाषा में रचित दीपवंश (लेखक अज्ञात) और महावंश (लेखक- महानामा) में बौद्ध धर्म के श्रीलंका में प्रवेश करने का और प्रथम दो बौद्ध संगीतियों का वर्णन है ।

    ➣ भारत में लिखित सबसे बाद वाला बौद्ध धर्म ग्रंथवामसाथपाकसिनी है।

    बुद्ध की प्रमुख मुद्राएँ

    धर्मचक्र मुवा – बुद्ध की यह मुद्रा उनके जीवनकाल के उन महत्त्वपूर्ण क्षणों के ऊपर केंद्रित है, जब वे प्रबोधन के पश्चात् सारनाथ के कुरंग उपवन में पहली बार धर्मोपदेश दे रहे थे।

    अभय मुद्रा – महात्मा बुद्ध की यह मुद्रा शांति, सुरक्षा, दयालुता एवं भयमुक्तता का प्रतीक है।

    भूमिस्पर्श मुद्रा – बुद्ध की यह भाव-भंगिमा बोधगया में उनके ज्ञान प्राप्ति (प्रबोधन) की संकेतक है।

    ज्ञान मुद्रा – बुद्ध के अंगूठे के स्पर्श से चक्र के निर्माण और हथेली से सीने को स्पर्श, ज्ञान मुद्रा को प्रदर्शित करती है।

    वरद मुद्रा – यह मुद्रा ऊर्जा की प्राप्ति के लिये पूर्णतः समर्पित होने का गुण सिखाती है।

    बौद्ध वास्तु कला

    ➣ बुद्ध की भूमिस्पर्श मुद्रा से तात्पर्य अपने तप की शुचिता और निरंतरता को बनाए रखने से है। भूमिस्पर्श मुद्रा की सारनाथ की बुद्ध मूर्ति गुप्तकाल से संबंधित है।

    महापरिनिर्वाण मंदिर उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले में स्थित है। मंदिर में स्थापित भगवान बुद्ध की मूर्ति 1876 ई. में उत्खनन के द्वारा प्राप्त की गई थी। इस मंदिर में भगवान बुद्ध की 6.10 मीटर ऊंची मूर्ति लेटी हुई मुद्रा में रखी है।

    ➣ यह मूर्ति उस काल को दर्शाती है, जब 80 वर्ष की आयु में भगवान बुद्ध ने अपने पार्थिव शरीर को छोड़ दिया और मृत्यु के बंधन से मुक्त हो गए अर्थात निर्वाण की प्राप्ति हो गई।

    शिक्षा केंद्र

    ➣ प्राचीन काल में बौद्ध शिक्षा के तीन प्रमुख केंद्र थे – (1) नालंदा,(2) वल्लभी और (3) विक्रमशिला।

    ➣ नालंदा महायान बौद्ध धर्म की तथा वल्लभी हीनयान बौद्ध धर्म की शिक्षा का प्रमुख केंद्र था।

    ➣ विक्रमशिला महाविहार की स्थापना पाल नरेश धर्मपाल ने की थी। उसने यहां मंदिर तथा मठ भी बनवाए थे।

    पांचवीं शताब्दी के मध्य, गुप्तों के समय में नालंदा विश्वविद्यालय अस्तित्व में आया। सर्वप्रथम कुमारगुप्त-I ने नालंदा बौद्ध विहार को दान दिया और बाद में बुधगुप्त, तथागतगुप्त तथा बालादित्य नामक गुप्त शासकों ने भी इस विहार को दान दिए।

    नव नालंदा महाविहार बौद्ध अध्ययन का आधुनिक केंद्र है, जिसे बिहार सरकार ने वर्ष 1951 में नालंदा में स्थापित किया था।

    बौद्ध धर्म के संरक्षक

    बिम्बिसार/अजातशत्रुहर्यकवंश का मगध नरेश
    प्रसेनजितकोशल नरेश
    उदयनवत्स नरेश
    प्रद्यातअवन्ति नरेश
    अशोक व दशरथमौर्यवंशीय मगध नरेश
    कनिष्ककुषाण सम्राट
    हर्षवर्द्धनपुष्यभूति वंशी सम्राट
    सहसी वंशसिंध नरेश
    पालवंश का सम्राट बंगाल, वज़यान सम्प्रदाय को मानने वाले, बौद्ध धर्म के अन्तिम महान संरक्षक ।

    बौद्ध धर्म के पतन के कारण

    ईसा की बारहवीं सदी तक बौद्ध धर्म भारत से लगभग लुप्त हो चुका था। इसके कई कारण थे जैसे-

    • भागवत सम्प्रदाय का उदय एवं ब्राह्मण धर्म में सुधार आंदोलन।
    • पालि के स्थान पर संस्कृत का प्रयोग।
    • मठों में धन एवं भ्रष्टाचार का बोल-बाला।
    • मूर्ति-पूजा, दान आदि कारणों ने नैतिक मानकों में कमी ला दी।
    • पांचवीं-छठीं सदी में हूणों एवं 12वीं सदी में तुर्कों के आक्रमण।

    ➣ बौद्ध धर्म में भी ब्राह्मण धर्म की वे बुराइयाँ घुस गईं जिनके विरुद्ध इसने आरंभ में लड़ाई छेड़ी थी। बौद्ध धर्म की चुनौती का मुकाबला करने के लिए ब्राह्मणों ने अपने धर्म को सुधारा।

    ➣ उन्होंने गोधन की रक्षा पर बल दिया तथा स्त्रियों और शूद्रों के लिए भी धर्म का मार्ग प्रशस्त किया।

    ➣ दूसरी और बौद्ध भिक्षु जनजीवन की मुख्य धारा से अलग थलग हो गए। विदेशी प्रभाव के कारण कनिष्क के शासनकाल में तृतीय बौद्ध संगीति में बौद्ध दो भागों (हीनयान व महायान ) में विभाजित हो गया।

    ➣ जहाँ हीनयान ने बौद्ध के नियमों का अनुसरण करना उचित समझा वहीँ महायान ने दरिद्रता को त्याग कर भोग-विलास को ग्रहण कर लिया।

    ➣ महायान ने जनसामान्य की भाषा पालि को छोड़ दिया और संस्कृत को ग्रहण कर लिया जो उस समय केवल विद्वानों की भाषा थी।

    ➣ ईसा की पहली सदी से वे बडी मात्रा में प्रतिमा-पूजन करने लगे और उपासकों से खूब चढ़ावा लेने लगे। इस चढ़ावे के अतिरिक्त बौद्ध विहारों को राजाओं से भी भारी-भारी संपत्ति के दान मिलने लगे।

    ➣ इन सभी से बौद्ध भिक्षुओं का जीवन सुख का जीवन बन गया। सातवीं सदी के आते-आते बौद्ध विहार विलासी लोगों के प्रभुत्व में आ गए और कुकर्मों के केंद्र बन गए और बौद्ध धर्म का यह नया रूप वज्रयान नाम से प्रसिद्ध हुआ।

    ➣ विहारों में अपार संपत्ति और स्त्रियों के प्रवेश होने से उनकी स्थिति और भी बिगड़ी। बौद्ध भिक्षु नारी को भोग की वस्तु समझने लगे।

    ➣ विहारों में अपार संपत्ति को देखकर तुर्की हमलावरों की ललचाई नज़र उन पर पड़ी। ये विहार उन लोभी हमलावरों के विशेष लक्ष्य हो गए।

    ➣ तुर्कों ने विहार में अनेक बौद्ध भिक्षुओं का संहार किया यद्यपि कुछ भिक्षु जान बचाकर नेपाल और तिब्बत भाग गए।

    ➣ इस प्रकार बारहवीं सदी तक बौद्ध धर्म अपनी जन्मभूमि से लगभग गायब हो चुका था।

    शासकों का योगदान

    ➣ किसी देश अथवा राज्य में धर्म को बढ़ावा अथवा उसके प्रचार प्रसार के लिए वहां का राजधर्म का विशेष योगदान होता है।

    ➣ बौद्ध धर्म के संरक्षण में मौर्य वंश , सातवाहन वंश (ब्राह्मण), गुप्त साम्राज्य के उत्तराधिकारीयों का योगदान रहा, हर्षवर्धन ने भी महायान सम्प्रदाय को आश्रय दिया था।

    ➣ मौर्य शासक चन्द्रगुप्त ने जैन धर्म और सम्राट अशोक ने बौद्ध को अपनाया जिसके कारण मौर्य काल में बौद्ध धर्म अपने सर्वोच्च शिखर पर रहा। अशोक ने बौद्ध धर्म को प्रचार प्रसार दुसरे देशों तक भी किया था।

    ➣ किन्तु बाद में मगध पर नए राजवंशो की नींव स्थापित हुई जो की ब्राह्मण थे इन्होने बौद्ध धर्म पर सीधे प्रहार किया।

    ➣ 184 ई . पू. में पुष्यंमित्र शुंग ने अंतिम मौर्य शासक ब्रह्द्रथ की हत्या कर दी और मगध पर एक नए वंश , शुंग वंश की नींव डाली जोकि एक ब्राह्मण था ।

    ➣ कहा जाता है कि ब्राह्मण शासक पुष्यंमित्र शुंग ने बौद्धों को सताया। इतिहासकारों के अनुसार पुष्यंमित्र शुंग एक कट्टर ब्राह्मणवादी था जिसने अशोक द्वारा निर्मित 84 हजार स्तूपों को नष्ट कर दिया।

    ➣ पुष्यंमित्र के शासन काल में भारत पर यवनों का आक्रमण हुआ। ग्रीक नरेश मिनांडर (मिलिंद) ने आचार्य नागसेन से प्रभावित होकर बौद्ध धर्म को अपना लिया। यह पहला विदेशी था जिसने बौद्ध धर्म को अपनाया था। ‘

    मौर्यत्तर काल में दक्षिण में सातवाहन राजा भी ब्राह्मण थे किन्तु उन्होंने सभी धर्मों को आश्रय दिया,इनके शासनकाल में नागार्जुन कोंडा एंव अमरवाली बौद्ध धर्म के प्रमुख केंद्र रहे।

    सातवाहन शासकों ने ब्राहम्ण की तुलना में बौद्ध भिक्षुओं को ज्यादा भूमि दान दी थी इसलिए सातवाहन शासक के समय बौद्ध धर्म को संरक्षण मिला। इस समय महायान संप्रदाय उन्नत अवस्था में था।

    ➣ दूसरी ओर यूनानियो के प्रभाव से बौद्ध धर्म (कनिष्क के शासनकाल में तृतीय बौद्ध संगीति में) दो भागों हीनयान व महायान में विभाजित हो गया। हीनयान बौद्ध नियमों के अनुकूल जबकि महायान बुद्ध के नियमों के विपरीत आचरण करने लगे।

    सातवाहन साम्राज्य के पश्चात गुप्त साम्राज्य अस्तित्व में आया जिसने वैष्णव धर्म को संरक्षण दिया था कालांतर में पूर्वर्ती उत्तराधिकारियों ने बौद्ध धर्म अपनाया लिया था। गुप्त शासक नरसिंह बालादित्य बौद्ध अनुयायी था।

    ➣ बौद्ध एंव जैन धर्म को सताए जाने के कई उदाहरण ईसा की छठी-सातवीं सदियों में मिलते हैं। मध्यकाल के आरंभ में दक्षिण भारत में शैव और वैष्णव दोनों संप्रदायों के लोगों ने जैनों और बौद्धों का कड़ा विरोध किया।

    गुप्त साम्राज्य के अंत में भारत पर हूणों का आक्रमण हुआ। शैव संप्रदाय के हूण राजा मिहिरकुल ने सैकड़ों बौद्धों को मौत के घाट उतारा।

    ➣ व्हेनसांग ने लिखा है कि 1600 स्तूप और विहार तोड़ डाले गए और हज़ारों भिक्षुओं और उपासकों को मार डाला गया।

    ➣ आगे चलकर गौड़ देश के शिवभक्त शशांक ने बोधगया में उस बोधिवृक्ष को काट डाला जिसके नीचे बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था। वर्तमान समय में जो बोधिवृक्ष है वह अपनी पीढ़ी का चौथा वृक्ष है। जिसे श्रीलंका से लाया गया था।

    ➣ उल्लेखनीय है सम्राट अशोक ने जब श्रीलंका में बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार करवाया था तो बोधिवर्क्ष की एक शाखा भी साथ भेजी थी। कालांतर में भारत में इसी शाखा से नए वृक्ष का जन्म हुआ।

    ➣ इस पर बौद्धों की प्रतिक्रिया कई देवमालाओं में देखी जा सकती हैं जहाँ बोधिसत्वों को हिंदू देवताओं के ऊपर खड़ा दिखाया गया है।

    ➣ गुप्त साम्राज्य के पश्चात उत्तर-भारत का शासक हर्ष वर्धन (पुष्यभूति वंश ) था जिसने बौद्ध की महायान की शाखा को संरक्षण दिया था जो भोग-विलासी थे।

    ➣ इसके पश्चात भारत के पश्चिमोत्तर सीमा पर तुर्की एंव अरबी मुस्लिमों का आक्रमण होने लगे और मुस्लिम धर्म भारत में पैर पसारने लगा।

    समाज पर बौद्ध धर्म का प्रभाव

    ➣ बौद्ध धर्म ने स्त्रियों और शूद्रों के लिए अपना द्वार खोलकर समाज पर गहरा प्रभाव जमाया।

    ➣ जहाँ ब्राह्मण धर्म ने स्त्रियों और शूद्रों को एक ही दर्जे में रखा था और उनके लिए न यज्ञोपवीत संस्कार का विधान किया और न ही वेदाध्ययन का। वहीँ बौद्ध धर्म ग्रहण करने पर उन्हें इस अधिकारहीनता से मुक्ति मिल गई।

    ➣ बौद्ध धर्म ने अहिंसा और जीवमात्र के प्रति दया की भावना जगाकर देश में पशुधन की वृद्धि की।

    ➣ प्राचीनतम बौद्ध ग्रंथ सुत्तनिपात में गाय को भोजन, रूप और सुख देने वाली (अन्नदा वन्नदा सुखदा) कहा गया है और इस कारण उसकी रक्षा करने का उपदेश दिया गया है।

    ➣ यह उपदेश उस मौके पर आया जब आर्येतर लोग माँस के लिए और आर्य लोग धर्म के लिए पशुधन का संहार करते जा रहे थे।

    ➣ ब्राह्मण धर्म में गाय की पूजनीयता और अहिंसा पर ज़ोर पड़ने का कारण स्पष्टत: बौद्ध धर्म के उपदेशों का प्रभाव था।

    ➣ बौद्ध धर्म के अनुसार धन संचित नहीं करना चाहिये, क्योंकि धन दरिद्रता, घृणा, क्रूरता और हिंसा की जननी है। परिणामतः धन लोलुपता में कमी आई।

    ➣ सांस्कृतिक क्षेत्र में प्राचीन भारत की कला पर बौद्ध धर्म का प्रभाव परिलक्षित हुआ। उपासकों ने बुद्ध के जीवन की अनेक घटनाओं को पत्थर पर उकेरा। जैसे-साँची, भरहुत, सारनाथ, कौशांबी आदि स्थानों पर।

    ➣ कई देशी-विदेशी शासकों ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया और अपनी नीति में अहिंसा को एक नई नीति के रूप में लागू किया, जैसे-अशोक द्वारा बौद्ध धर्म स्वीकार कर धम्म नीति का अनुसरण किया करना एंव विदेशी शासक मिनान्दर का बौद्ध धर्म ग्रहण करना।

    बौद्ध धर्म का योगदान

    ➣ भारतीय दर्शन में तर्कशास्त्र की प्रगति बौद्ध धर्म के प्रभाव से हुई।

    ➣ बौद्ध दर्शन में शून्यवाद तथा विज्ञानवाद की जिन दार्शनिक पद्धतियों का उदय हुआ, उसका प्रभाव शंकराचार्य के दर्शन पर पड़ा। यही कारण है कि शंकराचार्य को कभी-कभी प्रच्छन्न बौद्ध भी कहा जाता है।

    ➣ बौद्ध धर्म की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण देन भारतीय कला एवं स्थापत्य के विकास में रही। साँची, भरहुत, अमरावती के स्तूपों तथा अशोक के शिला स्तम्भों, कार्ले की बौद्ध गुफाएँ, अजन्ता, ऐलोरा, बाघ तथा बराबर की गुफाएँ बौद्ध कालीन स्थापत्य कला एवं चित्रकला का श्रेष्ठतम आदर्श है।

    ➣ बुद्ध के अस्थि अवशेषों पर भटिट् ( द. भारत) निर्मित प्राचीनतम् स्तूप को महास्तूप की संज्ञा दी गई है।

    गान्धार शैली के अन्तर्गत ही सर्वाधिक बुद्ध मूर्तियों का निर्माण किया गया। सम्भवतः प्रथम बुद्ध मूर्ति मथुराकला के अन्तर्गत बनी।

    भारत से बाहर बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार

    ➣ भारत से बाहर सर्वप्रथम बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार मौर्य सम्राट अशोक ने किया था। जिसमे श्रीलंका का उल्लेख महत्वपूर्ण है।

    ➣ अशोक के धर्म प्रचार की बदौलत श्रीलंकावासियों ने बौद्ध धर्म ग्रहण किया। श्रीलंका में ही त्रिपिटकों को पहली बार लिपिबद्ध किया गया।

    ➣ श्रीलंका के अलावा बर्मा, मलय प्रायद्वीप, सुमात्रा, जावा (यवद्वीप), स्याम (थाइलैंड), कम्बुज (कम्बोडिया) और अन्नाम में भी बौद्ध धर्म एवं भारतीय संस्कृति का प्रसार हुआ। कम्बोडिया को चीनी भाषा में फूनान कहा जाता था।

    ➣ दक्षिण-पूर्व एशिया में जावा (इंडोनेशिया) का बोरोबुदूर स्थित बौद्ध स्तूप विश्व का सबसे विशाल स्तूप है। इसका निर्माण शैलेन्द्र राजाओं करवाया था। पीगु (बर्मा) में बुद्ध का आनन्द मन्दिर है।

    कुषाणों के शासन काल में बौद्ध धर्म का प्रचार मध्य एशिया में हुआ और ताशकंद, खोतान, यारकंद इसके प्रमुख केन्द्र बन गये। गोमती विहार और कूची नगर भारतीय संस्कृति के प्रमुख केन्द्र थे।

    ➣ भारी संख्या में बौद्ध भिक्षु चीन गये। सबसे पहले कश्यप मतंग और धर्मरत्न 67 ई. के लगभग चीन के हानवंश के शासक मिगं-ती के दरबार में गये। चीनी सम्राट ने इनके रहने के लिए श्वेताश्व विहार का निर्माण करवाया।

    ➣ कालांतर में धर्मरत्न, कुमारजीव, बोधि धर्म, गुणवर्मा नामक विद्वान 5वीं एवं 6ठी शताब्दी में चीन गये। अमोघवज्र (746-774 ई.) नामक भिक्षु भी चीन गया।

    शांतरक्षित, पद्मसम्भव, कमलशील, स्थिरमति नामक विद्वान नालन्दा से तिब्बत गये। 11वीं शताब्दी में दीपंकर श्रीज्ञान, जिन्हें अतिशा भी कहा जाता है, तिब्बत गये।

    शांतरक्षित को तिब्बत का महापुरोहित बनाया गया। इसने ही बौद्ध धर्म को तिब्बत का राजधर्म बनाया तथा तिब्बत में प्रथम बौद्ध मठ बनवाया।

    ➣ आठवीं शताब्दी में भारतीय बौद्ध पद्मसंभव ने चीन में लामा धर्म (वज्रयान) की स्थापना की।

    आचार्य वसुबंधु ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए चौथी सदी में नेपाल की यात्रा की।

    1989 ई. में कम्बोडिया ने बौद्ध धर्म को अपना राष्ट्रीय धर्म घोषित किया।

    भारत के महत्वपूर्ण बौद्ध मठ

    मठस्थानराज्य
    टाबो मठतबो गाँव (स्पीति घाटी)हिमाचल प्रदेश
    नामग्याल मठधर्मशालाहिमाचल प्रदेश
    हेमिस मठलद्दाखजम्मू कश्मीर
    थिकसे मठलद्दाखजम्मू कश्मीर
    मिड्रालिंग मठदेहरादूनउत्तराखंड
    रूमटेक मठगंगटोकसिक्कम
    शासुर मठलाहुल स्पीतिहिमाचल प्रदेश
    तवांग मठअरुणाचल प्रदेशअरुणाचल प्रदेश
    नामड्रोलिंग मठमैसूरकर्नाटक
    बोधिमंडा मठबोधगयाबिहार

    निष्कर्ष

    ➣ गौतम बुद्ध के साथ एक ऐसे धर्म-युग का आरम्भ हुआ जिसका दृष्टिकोण वैज्ञानिक था। जैसे विज्ञान का समग्र आधार है युक्ति, तर्क और प्रमाण इसी प्रकार भगवान बुद्ध ने भी एक ऐसे धर्म की नींव रखी जिसको मात्र अंध विश्वास से मान लेने की आवश्यकता नहीं थी

    ➣ बुद्ध के धर्म को वैज्ञानिक इसलिए भी कहा जा सकता है क्यूँकि यह किसी भी काल में और किसी भी क्षेत्र के लोगों को मान्य हो सकता है।

    ➣ जैसे विज्ञान के सिद्धांत को किसी भी काल-क्षेत्र की मर्यादा में नहीं बांधा जा सकता उसी प्रकार भगवान बुद्ध द्वारा प्रारूपित चार आर्य सत्य को किसी जाति, काल, क्षेत्र आदि की मर्यादित सीमाओं में नहीं बाँधा जा सकता।

    संविधान का भाग -05 संघ कार्यपालिका से सम्बंधित है इसकी शुरुआत गौतम बुद्ध के चित्र से हुई है।

    सम्बंधित अन्य तथ्य

    ➣ राहुल को सारिपुत्र ने दीक्षित किया था जो स्वंय बुद्ध के शिष्यों में ऐसे एक थे।

    हीनयान, महायान एवं वज्रयान बौद्ध के सम्प्रदाय हैं। हीनयान का अर्थ है-निकृष्ट या निम्न मार्ग

    बिम्बिसार, उदयन एवं प्रसेनजीत बुद्ध के प्रमुख अनुयायी थे।

    ➣ बिम्बिसार ने राजवैद्य जीवक को बुद्ध की सेवा में भेजा था।

    राजा प्रसेनजीत को स्वस्थ करने के उपहार स्वरुप जीवक को अति उत्तम कपडे से बना वस्त्र भेजा गया। तब जीवक ने कहा यह परिधान या तो राजा बिंबसार पहन सकते हैं या बुद्ध। जिसे उन्होंने बुद्ध को उपहार दिया।

    ➣ महात्मा बुद्ध ने सर्वप्रथम उरुवेला में तपस्या की थी।

    ➣ बौद्ध धर्म की पवित्र दिशा दक्षिण है।

    ➣ बौद्ध धर्म का प्रचार पालि भाषा में किया गया।

    ➣ कुषाण काल में बौद्ध धर्म दो सम्प्रदायों हीनयान एवं महायान में विभाजित हो गया।

    ➣ महायान संप्रदाय के ग्रन्थ संस्कृत तथा हीनयान के ग्रन्थ पालि भाषा में लिखे गए थे ।

    ➣ बौद्ध ग्रंथों में संस्कृत का प्रयोग अभिधम्म पिटक से प्रारम्भ होता है। यह महायान संप्रदाय का ग्रन्थ है ।

    ➣ बुद्ध को तथागत एवं शाक्यमुनि नामों से भी जाना जाता है।

    ➣ बुद्ध वर्षाकाल में वेलुवन तथा जेतवन में निवास करते थे।

    ➣ बौद्ध भिक्षुओं के निवास स्थान को विहार कहा जाता है।

    ➣ बुद्ध की मृत्यु को बौद्ध ग्रन्थों में महापरिनिर्वाण के नाम से जाना जाता है।

    ➣ गौतम बुद्ध ने प्रथम उपदेश सारनाथ में बोलचाल की भाषा पालि में दिये जिसे बौद्ध धर्म में धर्मचक्रप्रवर्तन कहा गया है

    ➣ गौतम बुद्ध ने वैशाली, मगध, अंग, काशी, मल्ल, वज्जि में धर्म का प्रचार-प्रसार किया ।

    ➣ बुद्ध का शिष्य उसका चचेरा भाई देवदत्त उनका विरोधी था देवदत बुद्ध के जीवनकाल में ही संघ का प्रमुख होना चाहता था ।

    ➣ महात्मा बुद्ध का प्रियतम शिष्य आनंद था जिसके कहने पर बुद्ध ने संघ में स्त्रियों का प्रवेश कराया ।

    ➣ बौद्ध संघ में प्रवेश करने वाली प्रथम महिला बुद्ध की सौतेली माता गौतमी प्रजापति थी।

    ➣ महात्मा बुद्ध ने अंतिम उपदेश सुभध नामक व्यक्ति को दिये ।

    ➣ सूतपिटक को प्रारंभिक बौद्ध धर्म का इनसाइक्लोपीडिया कहा जाता है।

    ➣ बुद्ध के ‘पंचशील सिद्धांत का वर्णन छान्दोग्य उपनिषद् में मिलता है।

    ➣ वर्तमान में बोधगया में बोधि वृक्ष अपने वंश की चतुर्थ पीढ़ी का है । इसकी एक शाखा श्रीलंका में भी है जो अशोक के काल में ले जाया गया ।

  • इतिहास का संपूर्ण कालक्रम : एक सारांश


    सहस्राब्दी का अर्थ   हज़ार वर्षों का समूह
    1 मिलियन वर्ष   10 लाख वर्ष
    ईसा पूर्व   ईसा मसीह के जन्म से पहले का समय
    ईस्वी   ईसा मसीह के जन्म के बाद का समय
    शताब्दी/सदी   100 वर्षों का समय
    BP   Before the Present
    BC  Common Era/Before Christ
    AD   Anno Domini

    BP


    4600 मिलियन वर्ष पूर्व  पृथ्वी की रचना
    3500 मिलियन वर्ष पूर्व  जीवन की उत्पति
    200 मिलियन वर्ष पूर्व  मेसोजोइक युग (डायनोसर का स्वर्ण युग)
    65 मिलियन वर्ष पूर्व   स्तनधारी जीवों की उत्पति
    30 करोड़ वर्ष पूर्व  पृथ्वी पर प्रथम मानव (एक लंगूर के रूप में )
    6 करोड़ वर्ष  पृथ्वी पर होमिनिड्स (दक्षिणी और पूर्वी अफ्रीका) की उपस्थिति
    5.5-1.5 करोड़ वर्ष  पृथ्वी पर आस्ट्रेलोपेथिकस का आना
    4 करोड़ वर्ष भारतीय उपमहाद्वीप का उदय
    2.2 करोड़ वर्ष  पाकिस्तानी पंजाब के पोतवार पठार की शिवालिक पहाड़ी क्षेत्र में रामपिथिकस और शिवपिथिकस की खोपड़ी
    2 करोड़-12,000 नवयुग (हिमयुग)
    तीसरी-दूसरी सहस्राब्दि मध्य एशिया में शुष्कता और हिमीकरण का तापमान चरम पर
    2 करोड़ वर्ष अफ्रीका में निचला पुरापाषाण-युग
    60 लाख काला सागर क्षेत्र में पालतू घोड़े
    50 लाख मेसोपोटामिया में लोहा
    30 लाख अनातोलिया में लोहा। मिस्र में लोहा
    20 लाख -1200 हिमालय उत्थान का अन्तिम चरण
    20 लाख उत्तरार्द्ध राजस्थान और कर्नाटक में ताम्र-पाषाण काल के दौरान लौह, इण्डो-ईरानी एण्ड्रोनोवा संस्कृति ने पूरे मध्य एशिया को ढंक लिया
    6 लाख – 1.5 लाख भारत में निचला पुरापाषाण-युग
    2.3 लाख -30 हजारसहस्राब्दि वर्ष  पृथ्वी पर होमो सेपियन्स की उपस्थिति
    2-1.5 सहस्राब्दि वर्ष  पृथ्वी पर होमो हाबिलिस की उपस्थिति (पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका)
    1.8-1.6 सहस्राब्दि वर्ष  पृथ्वी पर होमो इरेक्टस की उपस्थिति। पत्थर की बनी प्राथमिक हाथ कुल्हाड़ी। आग की खोज।
    1.15 लाख वर्ष  दक्षिणी अफ्रीका में होमो सेपियन्स सेपियन्स (आधुनिक मानव) की उपस्थिति
    1.5 लाख – 35 हजार भारत में मध्य पुरापाषाण-युग

    ईसा पूर्व (BC)


    50,000 भाषा की उत्पत्ति, ऑस्ट्रिक लोगों का भारत आगमन
    35 हजार – 10 हजार भारत में ऊपरी पुरापाषाण-युग
    700,000 नर्मदा घाटी से होमो सेपियन्स की पुरानी खोपड़ी
    34,000 श्रीलंका में जीवाश्मों में होमो सेपियन्स सेपियन्स
    30,000 द्रविड़ियन का भारत आगमन
    12,000   वर्तमान तक अभिनव युग (उत्तर-हिमयुग)
    1000-500 ऊपरी गंगा में ब्राह्मण नामक उत्तर-वैदिक ग्रन्थ का संकलन। करीब 700 चित्रित भूरे बर्तन स्थलों का अस्तित्व। लोगों ने लोहे के औजार का इस्तेमाल किया और प्रमुख फसलों के रूप में चावल और गेहूँ की खेती शुरू हुई
    9000 – 4000  भारत में मध्य पाषाण-युग संस्कृति
    1200 पश्चिमी एशिया के शासकों द्वारा उपहार स्वरूप लोहे का इस्तेमाल
    9000 पश्चिम एशिया में नवपाषाण-युग की शुरुआत, विश्व स्तर पर कोई भी प्रमुख जलवायु परिवर्तन नहीं
    7000-6000 राजस्थान (सांभर) में पौधों की खेती की शुरुआत
    7000 भारतीय उपमहाद्वीप में नवपाषाण बस्तियाँ, मेहरगढ़ और बुर्जहोम में भारत के प्राचीनतम कृषि एवं पशुपालन अवशेष
    5000 भारत में पशुपालन का प्रथम साक्ष्य, विन्ध्य के उत्तर में नवपाषाण स्थल
    5000-4000बागोर (भीलवाड़ा) तथा आदमगढ़ (होशंगाबाद) के निकट भेड़-बकरी पालन के प्रथम अवशेष।
    6000मेहरगढ़ और बुर्जहोम में भारत के प्राचीनतम कृषि एवं पशुपालन अवशेष।
    पाँचवीं सहस्राब्दि अनाज का अस्तित्व, मिट्टी की ईंटों का उपयोग
    4000 चोलिस्तान (पाकिस्तान) में पूर्व-हड़प्पा बस्ती
    4000 ब्रहुई (दविड़ियन) बोलने वालों का भारत आगमन
    4000-3000कृषक एवं पशुपालक सभ्यताएँ।
    3000-2000 सिन्धु और सरस्वती में भारी बारिश और पानी का प्रवाह
    2800-2200 गणेश्वर के संगठित होने का समय (राजस्थान)
    2700 कश्मीर में सबसे प्राचीन नवपाषाण बस्तियों का काल
    2500 दक्षिण भारत में प्राचीनतम नवपाषाण बस्तियाँ
    2500-1900 विकसित हड़प्पा संस्कृति
    2350-1750 रेडियो कार्बन तिथि निर्धारण के आधार पर हड़प्पा सभ्यता का समय।
    2300 काकेशिया क्षेत्र में पाए गए स्पोक वाले पहिये
    2100-1500 अहर ताम्र-पाषाण संस्कृति (बनास घाटी, राजस्थान)
    2000 से आगे काले और लाल बर्तन का व्यापक उपयोग
    2000 चिरान्द के नवपाषाण चरण के लिए प्राचीनतम काल, शक्तिशाली राज्य एलाम का उदय। सुरकोतड़ा में घोड़े का अवशेष
    2000-1800 कयथ ताम्र-पाषाण संस्कृति (मध्य प्रदेश)
    2000-1500 गेरू रंग के बर्तनों की संस्कृति
    1900-1200 उत्तर-शहरी हड़प्या संस्कृति
    1900 हड़प्पा नगर गायब हो गए
    1900-1500 गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हड़प्पा संस्कृति का क्षरण काल
    1900-1700 अनातोलिया में हित्ती अभिलेखों में भारोपीय भाषा के नमूने
    1800 लोथल में चावल का उपयोग, कर्नाटक में स्वर्ण-प्राप्ति के पहले संकेत
    1700 यमुना और सतलज का सरस्वती से दुराव। बलूचिस्तान में घोड़े और बैक्ट्रीयन ऊँट का अस्तित्व
    1700-1200 नवदाटोली, एरन और नगदा (मध्य प्रदेश) में मालवा संस्कृति
    1500-1200 वैदिक लोगों के एक समूह का भारतीय उपमहाद्वीप में आगमन
    1600 इराक के कसित अभिलेखों में आर्यों के नाम
    1600-1000 भगवानपुर के चित्रित भूरे बर्तन और बाद के हड़प्पा बर्तनों का काल
    1500 गिलुन्द में ताम्न-पाषाण युगीन पकी ईंटें (राजस्थान), भारत में आर्यों का आगमन
    1500-1000 ऋग्वेद काल
    1400-700 जोरवे संस्कृति (महाराष्ट्र)
    1400 जेण्ड अवेस्ता।, ग्रीस के मायसीनियन अभिलेख में भारोपीय भाषा
    14 शताब्दी सीरिया में मितान्नी अभिलेखों में आर्यों के नाम
    1200 से आगे पश्चिम भारत में ताम्र-पाषाण बस्तियों का अवसान
    1200 मध्य और पूर्वी भारत में कई ताम्र-पाषाण स्थल
    1000-500 उत्तर वैदिक काल, आर्यों का पूर्वी गंगा मैदान में विस्तार, यजुर्वेद, अथर्ववेद, ब्राह्मण ग्रन्थों और आरण्यक की रचना, वर्ण व्यवस्था का बीजारोपण, लौह धातु का प्रयोग प्रारम्भ।
    1000 दक्षिणी और पूर्वी भारत में नवपाषाणकालीन बस्तियों के नवीनतम प्रमाण, खेतरी ताम्र इलाके का सबसे प्राचीन समय
    1000 से पूर्व पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बिहार में ताम्बे के औजार
    1000 गान्धार क्षेत्र, बलूचिस्तान, पूर्वी पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश,मध्य प्रदेश और राजस्थान में लोहे का इस्तेमाल, महापाषाणिक संस्कृति की शुरुआत
    1000 ऋग्वेद का अगला हिस्सा।
    1000-800 यजुर्वेद, अथर्ववेद और सामवेद।
    1050 ई०पू० -256 ई०पू०   चीन वंश (कन्फ्यूशियस, लाओ-त्से),
    900-800 होमर का ओडिसी और इलियड।
    950 महाभारत युद्ध(अपवाद : 5000 ई. पू. )
    900-500 हस्तिनापुर से जुड़े शहर के बनने की शुरुआत
    850तेइसवें तीर्थकर पार्श्वनाथ के जन्म का परंपरागत वर्ष।
    800 पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सामान्यतः लोहे का इस्तेमाल, महर्षि व्यास के द्वारा महाभारत महाकाव्य की रचना, आर्यों का दक्षिण-पूर्व (बंगाल) की ओर विस्तार, रामायण का प्रथम वृत्तान्त।
    800–500 ब्राह्मण, अरण्यक और उपनिषद्।
    700 पूर्वी उत्तर प्रदेश में प्राचीनतम लौह उपकरण
    7-6 शताब्दी पटना में लकड़ी के बने सबसे पुराने घेरे
    600 से पूर्व उत्तर-पूर्व भारत में लोग झीलों और नदियों के किनारे रहते थे
    600-300 श्रौतसूत्र और गृह्यसूत्र के सिद्धान्त ।
    600-500 मध्य गंगा के मैदानी इलाकों में कुछ लौह कुल्हाड़ियाँ
    600-550सोलह महाजनपदों का उदय, उपनिषदों की रचना, आर्यों का दक्षिण विस्तार, आर्य सभ्यता में कर्मकाण्डीय अनुष्ठान प्रतिष्ठित।
    छठी शताब्दी चार्वाक का लोकायत और भौतिकवादी दर्शन।
    6ठी शताब्दी बसढ़ (वैशाली) नहीं बसा था, चार्वाक का लोकायत या भौतिकवादी दर्शन
    6ठी शताब्दी उत्तर-पूर्व भारत में, स्वतन्त्र रियासत और गणराज्य का पान साम्राज्य में विलय
    6ठी शताब्दी के बाद बड़े राज्यों (महाजनपदों) के बीच संघर्ष
    6ठी शताब्दी का अन्त गंगा के मैदानी इलाकों में बस्तियों का उदय
    500-200 गौतम, अपस्तम्ब, बौद्धायन और वशिष्ठ के धर्मसूत्र।
    500 – सन् 300 भौतिकवादी दर्शन का विकास
    500 सुल्वसूत्र, दीर्घ निकाय,, गंगा मैदानों में कई ग्रामीण और शहरी बस्तियों का उदय, शिल्प और खेती में लोहे के औजारों के उपयोग ने समतावादी से वैदिक समाज में पूरी तरह से कृषि और जाति-विभाजित सामाजिक व्यवस्था निर्माण की परिस्थितियाँ तैयार की
    5वीं शताब्दी भारतीय समाज में चाण्डाल दिखाई दिए, सुल्वसूत्रों ने माप और ज्यामितीय ज्ञान दिया। पाणिनी ने संस्कृत के नियमों को व्यवस्थित किया और अष्टाध्यायी की रचना की, मध्य गंगा घाटी में पहला नगर, पहले सिक्के
    580 सांख्य प्रणाली के संस्थापक, कपिल का जन्म
    563 बौद्ध धर्म के संस्थापक महात्मा बुद्ध का जन्म
    563-483बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध का जीवन काल।
    516ईरान के शासक डेरियस प्रथम का भारत पर प्रथम विदेशी आक्रमण।
    544-412हर्यक वंश बिम्बिसार, अजातशत्रु, उदयिन।
    540 जैन धर्म के संस्थापक वर्द्धमान महावीर का जन्म।
    540-468जैन धर्म के वास्तविक संस्थापक (24वें तीर्थंकर) वर्द्धमान महावीर का जीवन काला
    527 महावीर की पारम्परिक मृत्यु
    516 पंजाब और सिन्ध पर ईरानी शासक डेरियस का कब्जा (भारत पर पहला सफल आक्रमण)
    500 इससे पहले कपिलवस्तु की राजधानी, पिपरहवा में कोई आवास नहीं आधारित शहरों में अतिरिक्त अनाज की उपलब्धता
    500-200 धर्मसूत्र
    500कौशाम्बी, श्रावस्ती, वाराणसी, वैशाली और राजगढ़, कोशल और विदेह में वैदिक लोगों का विस्तार
    500 से आगे गंगा के समतल मैदानों में लोहे के औजारों का व्यापक उपयोग और बस्तियों का निर्माण, प्राकृत, पालि और अपभ्रंश भाषा सहित मध्य इण्डो-आर्यन का प्रारम्भ
    चौथी शताब्दी ईरानी साम्राज्य पर यूनानियों की विजय, चौथी ,मेगस्थनीज द्वारा इण्डिका, मगध के नन्दों का कलिंग पर विजय।
    492-60 मगध में अजातशत्रु का शासन
    483 प्रथम बौद्ध संगीति, राजगृह में।
    460-44 मगध में उदयिन का शासन। उदयिन द्वारा गंगा और सोन के संगम पर किले का निर्माण
    487 एक परम्परा के अनुसार 80 साल की आयु में बुद्ध की मृत्यु
    468 एक परम्परा के अनुसार, 72 वर्ष की आयु में महावीर की मृत्यु
    450 पाणिनी का व्याकरण, पाणिनि का व्याकरण (अष्टाध्ययी)।
    412-344शिशुनाग वंश की स्थापना एवं विस्तार,अवन्ति के प्रद्यौत वंश का मगध साम्राज्य में विलय।
    383द्वितीय बौद्ध संगीति, वैशाली में।
    344महापद्मनन्द द्वारा मगध में नंदवंश की स्थापना।
    तीसरी शताब्दी कलिंग पर अशोक की विजय। शिशुपालगढ़ समझौते का उदय, उड़ीसा में लेखन का ज्ञान, खगोल विज्ञान और औषधि का स्वतन्त्र विकास। अशोक के अभिलेखों से प्राप्त सूचनानुसार भारतीय अंक को अंग्रेजी में अरबी कहते हैं, जबकि अरबों द्वारा हिन्द कहा जाता है
    326 भारत पर सिकन्दर का आक्रमण
    326-5 उन्नीस महीनों तक सिकन्दर भारत में रहा
    322 चन्द्रगुप्त मौर्य का राज्याभिषेक
    323  सिकन्दर की बेबीलोन में मृत्यु।
    323 चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा मौर्य वंश की स्थापना।
    323   सिकंदर की मृत्यु
    322  घनानंद के साथ चन्द्रगुप्त मौर्य का युद्ध
    315   इण्डिका के लेखक तथा सेल्युकस (यूनानी शासक) के दूत मेगस्थनीज़ का भारत में आगमन।
    305   सिकंदर के सेनापति सेल्युकस का चन्द्रगुप्त मौर्य के साथ युद्ध
    3 शताब्दी-3ईस्वी  ईरानी लेखकों द्वारा खरोष्ठी लिपि भारत में लाई गयी
    300 अकाल और मगध से दक्षिण भारत तक जैन प्रवास, उत्तरी भारत में पकी ईंटों का उपयोग। ब्राह्मी लिपि में लेखन, सुत्तनिपात।
    300 – सन् 100 कौटिल्य का अर्थशास्त्र।
    300 – सन् 600 संगम साहित्या
    269  अशोक का राज्याभिषेक , मौर्यवंश का स्वर्णयुग
    दूसरी शताब्दी बादरायण के ब्रह्मसूत्र का संकलन, मिलिन्द पान्हों (मेनैण्डर के प्रश्न), द गारलैण्ड ऑफ मदुरै (अंग्रेजी में अनूदित तमिल ग्रन्थ)
    दूसरी शताब्दी – सन् 7वीं शताब्दी अजन्ता गुफा का निर्माण
    298  बिन्दुसार शासक बना।
    273-32 अशोक का शासनकाल
    272-268 अशोक तथा उसके भाइयों के बीच उत्तराधिकार युद्ध।
    269 अशोक शासक बना।
    268-232 अशोक का शासन काल।
    262-261 कलिंग युद्ध
    257 उपगुप्त द्वारा अशोक बौद्ध धर्म में दीक्षित।
    251 तृतीय बौद्ध संगीति।
    247-10 सिं हुआंग ती, चीनी शासक का काल
    232 अशोक द्वारा सत्ता का त्याग,मगध साम्राज्य का विघटन, कुणाल शासक बना।
    220 चीनी साम्राज्य को आक्रमणों से बचाने के लिए चीनी शासक सिं हुआंग ती द्वारा चीन की महान दीवार का निर्माण
    221-206  चि-इन वंश (चीन की बड़ी दीवार का निर्माण)
    200 यूनानियों का भारत में आगमन, भगवतवाद या कृष्ण पन्थ का उभार।
    दूसरी शताब्दी कृष्ण को नारायण के साथ मिलाया गया और इन्हें नारायण-विष्णु के रूप में जाना जाने लगा , दक्षिण-पूर्वी बंगाल में लोगों को प्राकृत और ब्राह्मी लिपि का ज्ञान
    200 इस काल में मध्य गंगा के मैदानी इलाकों में इस्पात की वस्तुओं का होना, मध्य एशिया के साथ घनिष्ट और व्यापक सम्पर्क की शुरुआत, उज्जैन ने इसके बाद मनकों, सुलेमानी एवं कार्नेलियन पत्थरों का निर्यात किया। पत्थर, शिप्रा नदी की तलहटी से निकाला गया
    200-सन् 250 शकों, कुषाणों, सातवाहनों और प्रारम्भिक तमिल राज्यों के काल में शिल्प और वाणिज्य में वृद्धि हुई। भारत और पूर्वी रोमन साम्राज्य के बीच व्यापार विकसित हुआ 200-सन् 300 सिक्कों की सबसे अधिक संख्या
    दूसरी शताब्दी बोधगया, साँची और भरहुत में सबसे प्राचीन बौद्ध मूर्ति, इण्डो-यूनानियों ने उत्तर-पश्चिम के एक हिस्से पर कब्जा कर लिया, शून्य की खोज। वेदियों के निर्माण के लिए व्यावहारिक ज्यामिति पर अपस्तम्ब का लेखन। इस्पात निर्माण की खोज
    200-सन् 300 दक्कन पर सातवाहनों का प्रभुत्व और तमिल राज्यों का दक्षिणी तमिलनाडु पर प्रभुत्व। आन्ध्र और कर्नाटक में, अशोक से भिन्न, प्राकृत में लिखे अभिलेख
    190-171 यवन शासक डेमेट्रियस का राज्यकाल।
    185 पुष्यमित्र शुंग द्वारा मौर्य साम्राज्य का विनाश, अंतिम मौर्य शासक वृहद्रथ की हत्या, शुंग वंश की स्थापना।
    165 कलिंग शासक खारवेल द्वारा पाण्ड्य, चोल राज्य पर विजय
    165-145 मिनाण्डर या मिलिण्डा का काल।
    150 पतंजलि का महाभाष्य, शकों, पार्थियनों और कुषाणों की गतिविधियों के कारण स्थलीय आवागमन एवं व्यापार बाधित हुए।
    145 चोल राजा एलारा की श्रीलंका के शासक असेल पर विजय
    128 यूची आक्रमण के भय से शक क़बीलों का भारत में पंजाब से प्रवेश।
    75 शुंग वंश के अन्तिम सम्राट देवभूति की हत्या, वसुदेव के द्वारा कण्व वंश की स्थापना।
    60  सिमुक द्वारा आन्ध्र में सिमुक द्वारा आंध्र सातवाहन वंश की स्थापना।
    58-57 उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने शक को हराया और इस समय से विक्रम संवत नामक एक नए संवत की शुरुआत हुई।
    22 रोम के शासक आगस्टस के दरबार में पाण्ड्य राजदूत पहुँचा, चोल, पाण्ड्यों का रोम से व्यापारिक सम्बन्ध।
    6 साहित्यानुसार महावीर और बुद्ध
    5 पुरातत्व के सन्दर्भ में महावीर और बुद्ध
    3 भारत में स्पष्ट करने योग्य लेखन
    पहली शताब्दी महानदी के दक्षिण, कलिंग में, खारवेल ने मजबूत राज्य की स्थापना की और मगध तक पहुँचे
    पहली शताब्दी से आगे बौद्धों ने मूर्ति पूजा शुरू की, बुद्ध की शृंखलाबद्ध मूर्तियों का निर्माण प्रारम्भ
    2-1 शताब्दी श्रीलंका में ब्राह्मी अभिलेख प्राप्त
    1 कलिंग के खारवेला का हाथीगुंफा शिलालेख हाथीगुंफा इन्स्क्रिप्टी खारवेला
    1 श्रीलंका में हाल-फिलहाल में पालि बौद्ध ग्रन्थ संकलित

    ईस्वी वर्ष I(AD)


    1 -2 शताब्दी दक्कन में धान का रोपाई
    पहली शताब्दी ईसाई धर्म का आगमन, मानसून की खोज, महावस्तु, मुख्यत: समुद्री मार्ग से व्यापार का संचालन, शीशा गलाने का ज्ञान भारत तक पहुँचा।
    पहली-दूसरी शताब्दी कुषाण काल के दौरान उत्तर भारत में समृद्ध शहर अरिकमेण्डु और तिरुचिरापल्ली में रंगाई कुण्ड
    पहली-तीसरी शताब्दी मेसोपोटामिया पर रोम की विजय और वह रोमन प्रान्त का अधीन हो गया
    पहली-दूसरी शताब्दी उड़ीसा ने मोती, हाथी दाँत और मलमल का व्यापार किया।
    पहली-पाँचवीं शताब्दी अजन्ता के चित्रों का काल
    1  कौटिल्य का अर्थशास्त्र संकलित
    दूसरी शताब्दी सुश्रुत और चरक
    4  सबसे पुराना भारतीय पाण्डुलिपि मध्य एशिया में उपलब्ध
    5  फहियान का भारत आगमन
    6  अन्ततः वलभी में प्राकृत जैन ग्रन्थ संकलित
    7  वेनसांग की यात्रा, बाणभट्ट द्वारा हर्षचरित की रचना
    11 अतुला द्वारा मुशिका वंश की नींव
    11-12 बिल्हन द्वारा विक्रमांकदेवचरित की रचना
    12  सन्ध्याकर नन्दी द्वारा रामचरित कल्हन द्वारा राजतरंगिणी की रचना
    14-15 रोमन संत सेंट थॉमस (ईसाई धर्म) का भारत आगमन।
    14-15 कुषाणों (यूची का तोचारियन) का भारत में प्रवेश।
    22 रोमन लोगों द्वारा पूर्व से काली मिर्च की महँगी खरीद के विरुद्ध विरोध
    27-8 रोमन सम्राट अगस्टस के दरबार में भारतीय दूत भेजे गए
    45 कुषाणों का भारत में प्रवेश, कुजुल कदफिसेस द्वारा भारत में कुषाण वंश की स्थापना। ।
    65 चीनी सम्राट का बौद्ध ग्रंथों के लिए भारत में प्रतिनिधि भेजना।
    77 लैटिन में प्लीनी की नेचुरल हिस्ट्री का समय
    78 कुषाण शासक कनिष्क द्वारा शक संवत् का प्रारम्भ जिसे भारत सरकार द्वारा प्रयोग में लाया जाता है।
    78-100 कनिष्क का काल, चौथी बौद्ध संगीति का (कश्मीर में) आयोजन।।
    100 अश्वघोष द्वारा ‘सौन्दरानन्द’ तथा ‘बुद्धचरित’ एवं कुमारलाट के द्वारा ‘कल्पमंदितिका’ की रचना।
    80-115 द पेरिप्लस ऑफ द इरिथ्रियन सी।
    86-128 गौतमीपुत्र शातकर्णी तथा वशिष्ठीपुत्र पुलुमावी के अधीन सातवाहनों का पुनरुत्थान।
    100-200 संगम युग, करिकाल का शासन (त्रिचरापल्लि के निकट कावेरी नदी पर सिंचाई बाँध का निर्माण)।
    दूसरी शताब्दी महाराष्ट्र में, बौद्ध धर्मावलम्बियों ने भिक्षुओं के लिए वस्त्रों और अन्य आवश्यकताओं के पूर्ति हेतु कारीगरों के विभिन्न मण्डलों के पास पैसे जमा किए। कुषाणों के अधीन उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी भाग और रोमन साम्राज्य के पूर्वी भाग के बीच व्यापार।
    100-300 विष्णुधर्मसूत्र या विष्णुस्मृति।
    दूसरी शताब्दी संगम साहित्य के कुछ अंशो की रचना।
    106-30 ई. गौतमीपुत्र सतकर्णी काल
    110-20 रोमन सम्राट ट्राजन के पास भारत से दूत भेजे गए
    130-150 पश्चिम भारत का महान शक क्षत्रप रुद्रदामन प्रथम।
    130-50 शक शासक रुद्रदमन प्रथम का शासनकाल
    165-94 ई. सातवाहन राजवंश के अन्तिम महान राजा यज्ञ श्री सतकर्णी का काल
    130-54 ई. वशिष्ठिपुत्र पुलुमयी काल
    150 टॉलमी का भूगोल, जूनागढ़ के रुद्रदमन अभिलेख में काव्य शैली का सबसे प्रारम्भिक शताब्दी मथुरा कला विधा का विकास
    दूसरी शताब्दी करीमनगर जिले के पेद्दबाँकुर में पक्की ईंटों वाले बाईस कुएँ, अमरावती स्तूप का पुनर्निर्माण, बादरायण के ब्रह्मसूत्र का संकलन , शासकीय वर्ग द्वारा संस्कृत का इस्तेमाल जारी
    200-400 मनु की कानून-संहिता (मनुस्मृति)।
    220 ई. सातवाहन साम्राज्य का अन्त
    230 उत्तर-पश्चिम भारत में कुषाण शासन का अन्त अफगानिस्तान और सिन्धु के पश्चिम में ईरान के ससैनियन शक्ति द्वारा कुषाण साम्राज्य का खात्मा व ससैनियन , उत्तर भारत में कुषाण सत्ता का अन्त। सन् 250 तक मुरुण्डों ने शासन किया
    225 विंध्यशक्ति द्वारा वाकाटक शासन की स्थापना
    226  पर्शिया में सासानियन वंश की स्थापना।
    250 सातवाहन साम्राज्य का विघटन,नासिक में त्रैकुटकर वंश की स्थापना।
    240-280 गुप्त वंश की स्थापना (श्रीगुप्त शासक)
    275 गुप्त राजवंशों ने सत्ता हासिल की
    280-319 घटोत्कच सिंहासनारूढ़।
    300-888 कांची में पल्लवों का शासनकाल।
    300 भास के तेरह नाटक दरिद्र चारुदत्त, मृच्छकटिक के रूप में पुनरावृति।
    300 -600 संगम साहित्य और वायु, विष्णु, मार्कंडेय और मत्स्य पुराणों की सम्पूर्ण रचना।
    3 शताब्दी वात्स्यायन का कामसूत्र मथुरा से तक्षशिला तक उत्तर-पश्चिमी या उत्तरपथ मार्ग पर, कुषाण साम्राज्य के अन्त का प्रभाव। शहरों एवं भारत-रोमन व्यापार पर सातवाहन सत्ता के अन्त का प्रभाव, इस शताब्दी के अन्त में उत्तर प्रदेश और बिहार में वास्तविक गुप्त साम्राज्य
    तीसरी सदी सामान्य भाषा के रूप में प्राकृत, एक ग्रन्थ में बुद्ध के आठ पन्थों का उल्लेख।
    तीसरी शताब्दी रोमन साम्राज्य के पश्चिमी भाग के साथ व्यापार का अन्त
    तीसरी-चौथी शताब्दी कलियुग, सामाजिक संकट
    300-500 सुदूर दक्षिण के राजाओं द्वारा ब्राह्मणों को भूमि अनुदान
    300-600 विदर्भ सहित लगभग दो दर्जन राज्यों का प्रायद्वीप में गठन।
    300-750 विन्ध्य के दक्षिण में ग्रामीण विस्तार और भूमि का बेहतर इस्तेमाल । प्रायद्वीप में और अधिक राज्यों का गठन
    319-20 गुप्त काल का आरम्भ, प्रथम गुप्त सम्राट, चन्द्रगुप्त प्रथम द्वारा गुप्त काल की शुरुआत
    322-298 उत्तरवर्ती परम्परा के अनुसार, कर्नाटक में बौद्ध धर्म के प्रसार का श्रेय चन्द्रगुप्त मौर्य को समुद्रगुप्त का काल जिसे सैन्य विजयों के कारण उसे ‘भारत का नेपोलियन’ कहा जाता है।
    322-298 कृष्णा नदी के दक्षिण में पल्लव वंशी राज्य की स्थापना।
    335-275 समुद्र गुप्त का शासन काल।
    360 समुद्रगुप्त के दरबार में श्रीलंका का राजदूत।
    375 समुद्रगुप्त की मृत्यु, रामगुप्त शासक।
    350 बाँकुरा जिले के दामोदर के पोखराना में एक महाराज ने शासन किया। उन्हें संस्कृत का ज्ञान था। इस समय से, संस्कृत का उपयोग शुरू हो गया,मयूरशर्मन द्वारा कदम्ब वंश की स्थापना
    380-415 चंद्रगुप्त द्वितीय का शासनकाल, गुप्त राज्य का पश्चिम में विस्तार तथा संस्कृत साहित्य का चरमोत्कर्ष।
    399-414 चीनी तीर्थयात्री फा-हियान की यात्रा
    3-4 शताब्दी इस अवधि के कुषाण सिक्के, अभिलेख और मिट्टी की मूर्तियाँ मध्य एशिया के हिस्से में पाए गए।
    400 आयुर्वेद की रचना, अन्तत: महाभारत, रामायण एवं प्रमुख पुराण संकलित
    चौथी शताब्दी उड़ीसा के कलिंग में जैन धर्म का प्रसार, प्रायद्वीपीय भारत में ब्राह्मणों के लिए अठारह प्रकार की छूटा दक्षिणी कर्नाटक में पश्चिमी गंग शासन का उदय। चन्द्रगुप्त द्वितीय द्वारा शक क्षत्रप शासित मालवा और गुजरात पर कब्जा। कदम्बों द्वारा उत्तरी कर्नाटक और कोंकण पर नियन्त्रण। इसके बाद संस्कृत प्रायद्वीप में आधिकारिक राजभाषा बनी
    चौधी-छठी शताब्दी उड़ीसा में कई राज्यों का गठन; उनमें से पाँच की पहचान चौथी शताब्दी एवं आगे राजभाषा के रूप में संस्कृत, दिल्ली के मेहरौली में लोहे का स्तम्भ स्थापित किया गया
    चौथी-सातवीं शताब्दी पूर्वी मध्य प्रदेश, उड़ीसा, बंगाल और असम में उन्नत ग्रामीण, प्रकृति के अलावा, सांख्य दर्शन में पुरुष या आत्मा को एक तत्त्व के रूप में पेश किया गया, दोनों से मिलकर दुनिया का निर्माण
    415-455 कुमार गुप्त प्रथम का शासनकाल, नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना।
    432-33 पुण्ड्ववर्धनभुक्ति में ताम्रपत्र पर भूमि खरीद-बिक्री के दस्तावेज दर्ज
    448 इलाहाबाद जिले से प्राप्त सन् 448 के एक गुप्तकालीन अभिलेख में दशमलव प्रणाली के ज्ञान के बारे में उल्लेख है
    455-467 स्कन्दगुप्त का काल, हूणों का भारत पर प्रथम आक्रमण तथा उनकी पराजय।
    477-496 बुद्धगुप्त, गुप्तवंश का अन्तिम सम्राट, गुप्तवंश का विघटन प्रारम्भ।
    467 स्कन्दगुप्त के शासनकाल का अन्त
    473 रेशम बुनकरों के एक संघ का गुजरात से मालवा में प्रवासन
    476-540 आर्यभट्ट काल, जिन्होंने आर्यभट्टीय की रचना की
    485 पूर्वी मालवा और मध्य भारत के एक हिस्से पर हूणों का कब्जा
    पाँचवीं शताब्दी इस शताब्दी के बाद कलिंग पर पूर्वी गंग का शासन, नारद स्मृति और आर्यभट्ट की आर्यभटीय की तिथि। शून्य और दशमलव प्रणालियों का ज्ञान। फा-हियान लिखते हैं कि चाण्डाल गाँव के बाहर रहते थे और माँस खाते थे, नालन्दा में बौद्ध संरचनात्मक परिसर की स्थापना। कश्मीर, पंजाब और पश्चिमी भारत पर श्वेत हूणों का वर्चस्व , आदर्शवादी दर्शन द्वारा भौतिकवादी दर्शन का आच्छादन
    पाँचवीं शताब्दी इस शताब्दी के उत्तरार्द्ध में हूण आक्रमण, इस शताब्दी के मध्य से लगभग आधा दर्जन राज्यों का गठन किया गया था। लोगों ने वर्ष को बारह चन्द्र महीनों में विभाजित करने की प्रथा शुरू की, भारत और रोमन साम्राज्य, दोनों जगह आम तौर पर शहरों का पतन
    पाँचवीं-छठी शताब्दी संस्कृत का प्रयोग, वर्ण समाज का गठन, बौद्ध धर्म और ब्राह्मणवाद की प्रगति। गंगा और ब्रह्मपुत्र के बीच का क्षेत्र (बांग्लादेश), एक व्यवस्थित और संस्कृत शिक्षित क्षेत्र के रूप में उभरा
    पाँचवीं शताब्दी दशमलव के उपयोग के अभिलेखकीय सबूत, भूमि अनुदान की निरंतरता। इस शताब्दी तक शासकों को चोरों को दण्डित करने का अधिकार, लेकिन बाद में इसे जमीन्दारों को हस्तान्तरण। पश्चिमी तट से रेशम बुनकरों का एक समूह मालवा के मन्दसोर चले गए और अन्य व्यवसाय अपना लिया
    पाँचवीं-अट्ठारहवीं शताब्दी  संस्कृत, पाली और प्राकृत में टीकाओं का काल
    पाँचवीं-छठी शताब्दी भूमि अनुदान से जमीन्दारों का उद्भव और वैश्य किसानों की शूद्रों जैसी हालत
    500-532 तोरमाण एवं मिहिरकुल के अधीन उत्तर भारत में हूणों का शासन।
    500-757 पश्चिम तथा मध्य दक्कन में वातापी का प्रथम चालुक्य वंश।
    502-528 तोरमाण का उत्तराधिकारी मिहिरकुल भारत में गुप्त शासक भानुगुप्त द्वारा पराजित, एरण पर गुप्तवंश का पुनः अधिकार
    510 सती होने का पहला अभिलेखकीय साक्ष्य
    525 समतट में एक संगठित राज्य और इसके पश्चिमी सीमा पर वंगा का एक हिस्सा
    532 गुप्तों को मालवा राजकुमार यशोधर्मन की चुनौती और उत्तर भारत पर विजय के दावे में विजय स्तम्भ की स्थापना
    532 यशोवर्धन द्वारा हूण शासक मिहिरकुल की पराजय।
    540 परवर्ती गुप्त तथा गुप्त वंश की मुख्य शाखा का अन्त।
    550 बिहार एवं उत्तर प्रदेश से गुप्तों का अधिकार समाप्त, इस समय के आस-पास, पूर्वी रोमन साम्राज्य के लोग चीनियों से रेशम उगाने की कला सीख चुके थे, जिससे भारतीय व्यापार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा, गुप्त शासकों के प्रशासकों ने, शायद इस तिधि के बाद स्वतन्त्र, उत्तर बंगाल पर कब्जा कर लिया
    छठी शताब्दी  गुजरात के वल्लभी में अन्ततः अर्धमगधी में लिखे गए जैन-ग्रन्थों का संकलन, इस सदी के दूसरे छमाही में, समतट के शासकों ने पर्याप्त संख्या में सोने के सिक्के जारी किए। एक क्षेत्रीय और प्रशासनिक इकाई, वर्धमानभुक्ति (बर्दवान) का गठन, जो उस क्षेत्र के कबीलाई निवासियों के शमन-दमन हेतु बनाई गई ,उत्तर और पश्चिमी भारत में शताब्दी के मध्य 160 वर्षों तक गुप्त का शासन, , कलभ्र विद्रोह , चालुक्य द्वारा पश्चिमी दक्कन में अपने राज्य की स्थापना
    छठी शताब्दी वराहमिहिर और उनकी प्रसिद्ध कृति बृहत्संहिता, कानून-संहिताओं में सेवाओं के लिए भूमि अनुदान की, कोसमोस इण्डीकोप्लेस्टस द्वारा द क्रिस्चियन टोपोग्राफी,सिलप्पदिकारम और मणिमेकलई जैसे दो तमिल महाकाव्यों की रचना, अनुशंसा। ईरान और बायजैन्तियम के साथ रेशम का व्यापार समाप्त। वराहमिहिर ने वर्ण और सम्पत्ति-दोनों के आधार पर घर के आकार निर्धारित किए। तन्त्रवाद का उद्भव एवं प्रसार, महिलाओं एवं शूद्रों के लिए भी जगह। अलंकृत संस्कृत गद्य और पद्य।
    छठी-आठवीं शताब्दी काँची के पल्लवों और बदामी के चालुक्यों के बीच संघर्ष
    600 बांग्लादेश में विस्तृत क्षेत्र गौड़ के नाम से जाना जाने लगा, जहाँ शशांक ने शासन किया
    600-900 स्वर्ण मुद्राओं के अभाव में 300 वर्षों तक व्यापार में गिरावट
    606-647 हर्षवर्धन का शासन काल।
    609  पुलकेशिन-II शासक बना।
    629-645 ह्वेनसांग भारत में रहा।
    636  सिन्ध पर प्रथम अरब-आक्रमण।
    610 मन्दिरों का निर्माण
    629  चीनी बौद्ध यात्री ह्वेन त्सांग का भारत आगमन, बाणभट्ट ने ‘हर्षचरित’ की रचना की।
    630-68 पल्लव राजा नरसिम्हवर्मन का शासनकाल
    630-970 पूर्वी दक्कन में वेंगी के पूर्वी चालुक्यों का शासनकाल। (दक्षिण भारत)
    636-637 ख़लीफ़ा उमर के समय में अरबों का भारत पर पहला अभिलिखित हमला। (दक्षिण भारत)
    645 व्हेन त्सांग की चीन वापसी
    647 हर्षवर्धन की मृत्यु, ह्वेनसांग पर हमला। (दक्षिण भारत)
    670 चीनी तीर्थयात्री इत्सिंग द्वारा नालन्दा का दौरा
    674 विक्रमादित्य प्रथम चालुक्य और पल्लव वंश के परमेश्वर वर्मा प्रथम शासक बने। (दक्षिण भारत)
    675-685 तीसरे चीनी यात्री इत्सिंग का नालन्दा आवास। (दक्षिण भारत)
    680 पट्टदकल का पापनाथ मन्दिर
    सातवीं शताब्दी  इस शताब्दी से भारत में समाज, धर्म, कला, वास्तुकला और साहित्य को आकार देने में जमीन्दारों की प्रमुख भूमिका। उत्तर और दक्षिण भारत दोनों में धातु के पैसे की कमी। जातियों का प्रसार।
    सातवीं-आठवीं शताब्दी इस काल से मूर्तिकला और मन्दिर निर्माण में प्रत्येक क्षेत्र की अपनी शैली विकसित
    सातवीं शताब्दी  बौद्ध मठ में आराम पसन्द लोगों का वर्चस्व, एवं गौतम बुद्ध द्वारा निषिद्ध प्रथाओं का बोल-बाला, पूरब से पश्चिम तक फैले ब्रह्मपुत्र घाटी पर बसे कामरूप को प्रसिद्धि मिली। भास्करवर्मन, राज्य के ! प्रमुख के रूप में उभरे। जिन्होंने ब्रह्मपुत्र घाटी और अन्य क्षेत्रों को नियन्त्रित किया। चीनी यात्री व्हेन त्सांग ने भास्करवर्मन के राज्य का दौरा किया। ढाका क्षेत्रों में खड्गों के राज्य का गठन। ब्राह्मण सामन्त लोकनाथ और रतों के साम्राज्य का कोमिल्ला क्षेत्रों में गठन। इन राजकुमारों ने अग्रहार की व्यवस्था चलाई। भूमि के दस्तावेज संस्कृत के छन्दों से अपनी उत्कृष्टता को दर्शाते हैं , काँची के पल्लवों, बदामी के चालुक्यों और मदुरै के पण्ड्या का प्रमुख राज्यों के रूप में उभार। एहोल अभिलेख के नुसार चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय का शासनकाल
    700 कन्नौज में यशोवर्मन (मौखरी वंश) सिंहासनारूढ़
    700-900 दक्षिण भारत में आलवारों (वैष्णव) का भक्ति आंदोलन, भक्ति संग्रह ‘प्रबंधम्’ की रचना।
    712 मुहम्मद बिन कासिम का भारत पर प्रथम अरबी मुस्लिम आक्रमण , राजा दाहिर की पराजय व देवलगढ़ विजय
    725 नागभट्ट द्वारा प्रतिहार राज्य की स्थापना।
    733-45 चालुक्य राजा विक्रमादित्य द्वितीय का शासनकाल
    740 पट्टदकल का विरुपाक्ष मन्दिर
    740-1036 उत्तर भारत में गुर्जर-प्रतिहारों का आधिपत्य, अरबों का प्रतिरोध। (उत्तरी भारत)
    752 कन्नौज में यशोवर्मन (मौखरी वंश) की मृत्यु
    753 राष्ट्रकूट वंश की शुरुआत
    753-973 मान्यखेत में राष्ट्रकूटों का शासनकाल। (दक्षिण भारत)।
    757 पल्लव वर्चस्व समाप्त
    760-1142 पूर्वी भारत के पाल।
    770-810 महान पाल शासक धर्मपाल का काल, विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना।
    775 दक्कन में बदामी के चालुक्यों की भूमिका का अन्त
    783-1036 राजस्थान के वत्सराज द्वारा उत्तर भारत में गुर्जर-प्रतिहार वंश की स्थापना तथा उनका शासनकाल।
    788 आदि गुरु शंकराचार्य का जन्म,अल्वर नदी के तटवर्ती ग्राम कलादी, केरल में।।
    आठवीं शताब्दी  जैन ग्रन्थों में अठारह प्रमुख लोगों या उपराष्ट्रीयताओं के अस्तित्व का उल्लेख,  जैन ग्रन्थों में अठारह मुख्य नागरिकों अर्थात राष्ट्रों की उपस्थिति।
    820 बद्रीनाथ में आदि गुरु शंकराचार्य का देह त्याग।
    824-924 वैष्णव भक्ति काल
    831-1310 चन्देलों द्वारा बुंदेलखण्ड में स्वतंत्र राज्य की स्थापना, अनेक विष्णु मन्दिरों और खजुराहों के मन्दिरों का भी निर्माण। (पश्चिम भारत)
    835-885 गुर्जर-प्रतिहार वंश का काल, अरब के व्यापारी सुलेमान का उसके राज्य में आगमन।
    836  सतलुज से नर्मदा नदी तक मिहिरभोज या भोज का शासन। (पश्चिम भारत)
    850  चोल की स्थापना, विजयालय द्वारा पांड्यों को पराजित कर तंजौर पर अधिकार।
    851 अरब-यात्री सुलेमान ने भारत वृत्तान्त लिखा।
    860- सुमात्रा (इंडोनेशिया) के राजा बलपुत्र द्वारा नालंदा मे एक बौद्ध विहार की स्थापना।
    871-1173 तंजौर के शाही चोल।
    873 अरब में शून्य का प्राचीनतम इस्तेमाल
    883-1026 पंजाब और काबुल के हिन्दूशाही।
    नौवीं शताब्दी शंकर द्वारा ब्रह्मसूत्र पर एक प्रसिद्ध टीका लिखी गई, विशाखदत्त द्वारा विभिन्न क्षेत्रों की विभिन्नताओं के अनुकूल धर्मों, भाषाओं और परिधानों के विकास का उल्लेख
    907 चोल शासक परांतक प्रथम का राज्याभिषेक।
    915-925 महान राष्ट्रकूट इंद्र तृतीय के दरबार में अरबयात्री अल मसूदी का आगमन।
    916-1205 जेजाकभुक्ति के चंदेल, चंदेलों द्वारा खजुराहो में मंदिरों का निर्माण।
    950-1195 मध्य भारत में त्रिपुरी के कलचुरि।
    973-1238 अन्हिलवाड़ा (काठियावाड़) के सोलंकी (गुजराती चालुक्य)।
    977  सुबुक्तगीन(महमूद गजनवी का पिता) गजनी की गद्दी पर बैठा।
    985-1014 राजराज चोल का शासनकाल, तंजौर के प्रसिद्ध शिव अथवा वृहदेश्वर मंदिर का निर्माण,भूमि-सर्वेक्षण का प्रारम्भ।
    986 खुरासनी शासक अलप्तगीन के ग़ुलाम सुबुक्तगीन का काबुल-कंधार में हिन्दूशाही शासक जयपाल पर प्रथम आक्रमण, जयपाल पराजित।
    997-98 सुबुक्तगीन की मृत्यु, महमूद ग़ज़नवी खुरासान की गद्दी पर बैठा।
    999 बगदाद के खलीफा द्वारा महमूद गजनवी को स्वतन्त्र शासक के रूप में मान्यता।
    1000 महमूद गजनवी का भारत में काबुल पर प्रथम आक्रमण, स्थानीय जनता पर लूट तथा धर्म परिवर्तन।
    1002 महमूद ग़ज़नवी का तीसरा आक्रमण, आनन्दपाल से युद्ध तथा उसकी पराजय।
    1000-1323 वारंगल के काकतीय, बेतराज-प्रथम (संस्थापक), प्रतापरुद्रदेव (अन्तिम शासक)।
    1001 वैहिन्द की लड़ाई तथा जयपाल (हिन्दूशाही शासक) की महमूद गजनवी से पराजय।
    1010  जयपाल का पुत्र आनन्दपाल अपमानजनक शर्तों पर महमूद ग़ज़नवी का सामंत बना।
    1013  आनन्दपाल की मृत्यु, पुत्र त्रिलोचनपाल उत्तराधिकारी बना।
    1014  तोषी की लड़ाई में त्रिलोचनपाल परास्त, झेलम नदी तक का क्षेत्र महमूद गज़नवी के राज्य में सम्मिलित।
    1025-1026 महमूद गजनवी द्वारा सोमनाथ मंदिर की लूट।
    1017 वैष्णव आचार्य रामानुज का जन्म।
    1026 अन्तिम हिन्दूशाही शासक भीमपाल की मृत्यु, काबुल-कंधार के हिन्दूशाही वंश का अन्त।
    1027 जाटों को कुचलने के लिए महमूद का गुजरात-सिन्ध पर 17वाँ व अन्तिम आक्रमण।
    1030 महमूद गजनवी की मृत्यु, किताब-उल-हिन्द के लेखक अलबरूनी का भारत आगमन।
    1044-52 राजेन्द्र के उत्तराधिकारी राजाधिराज प्रथम का शासनकाल। (दक्षिण भारत)
    ग्यारहवीं शताब्दी अतुल द्वारा मूषिका वंश।
    ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी बिल्हण द्वारा बिक्रमणकादेवचरित।
    1131 कर्नाटक में लिंगायत सम्प्रदाय के संस्थापक संत बासवेश्वर या ‘बासव’ का जन्म।
    1137 विशिष्टाद्वैतवाद के विचारक संत रामानुजाचार्य का देहान्त
    1162 द्वैतवादी वैष्णव संत निम्वार्क स्वामी का जन्म।
    1173 मुइजुद्दीन मुहम्मद ग़ोरी ग़ज़नी का शासन बना।
    1191 तराइन का प्रथम युद्ध ,पृथ्वीराज द्वारा मुहम्मद गोरी पराजित हुआ।
    1192 तराइन का द्वितीय युद्ध, मुहम्मद गोरी द्वारा पृथ्वीराज की हार, कुतुबुद्दीन ऐबक भारत का सूबेदार नियुक्त।
    1194 चन्दावर का युद्ध, जयचन्द पराजित।
    1199 द्वैतवाद सम्प्रदाय के आचार्य महादेव मध्वाचार्य का जन्म।
    बारहवीं शताब्दी सन्ध्यकारा नन्दी द्वारा रामचरित, कल्हण द्वारा राजतरंगिनी,ब्रह्मसूत्र पर रामानुज की टीका।
    बारहवीं शताब्दी ब्रह्मसूत्र पर रामानुज की टीका,  निरन्तर ब्राह्मणवादी (शैव और वैष्णव दोनों हमले), बिहार शरीफ़ में मठ में संचित धन के लिए तुर्कों के लालच ने बौद्ध धर्म को नष्ट कर दिया। भिक्षु नेपाल और तिब्बत भाग गए
    1206 मुहम्मद गोरी की मृत्यु।
    1206 कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा दिल्ली सल्तनत की स्थापना, कुतुबमीनार का निर्माण आरम्भ।
    1210 कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु, आरामशाह को पदच्युत कर इल्तुतमिश शासक बना।
    1221 चंगेज खां का भारत पर आक्रमण।
    1221 बग़दाद के ख़लीफ़ा से इल्तुतमिश को ‘खिल्लत’ अर्थात् इस्लामी शासक के रूप में मान्यता।
    1236 इल्तुतमिश के उत्तराधिकारी रुकुनुद्दीन फ़ीरोज़शाह को पदच्युत कर, रजिया सुल्तान गद्दी पर बैठी।
    1239 मलिक अल्तूनिया का विद्रोह।
    1240 रजिया सुल्तान की हत्या।
    1241 भारत पर मंगोलों का प्रथम आक्रमण
    1246   नासिरुद्दीन महमूद शाह गद्दी पर बैठा (ग़ुलाम वंश )
    1253   अमीर ख़ुसरो का जन्म।
    1265-66 गयासुद्दीन बलबन गद्दी पर बैठा।
    1266 कश्मीर में हिन्दू राजवंश की स्थापना, ग़यासुद्दीन बलबन गद्दी पर बैठा।
    1279 बंगाल में तुगरिल खाँ का विद्रोहा
    1286 गयासुद्दीन बलबन की मृत्यु।
    1288-1293 प्रसिद्ध वेनिश यात्री मार्को पोलो की भारत यात्रा।
    1290 खिलजी वंश की स्थापना जलालुद्दीन खिलजी (संस्थापक)।
    1290 अलाउद्दीन ख़िलजी का देवगिरि अभियान।
    1296-1316 अलाउद्दीन खिलजी शासक बना।
    1309-1313 मलिक काफूर का दक्कन अभियान।
    1315 मलिक काफूर दक्कन से वापसी
    1320 ग़यासुद्दीन तुग़लक़ (गाज़ी मलिक) दिल्ली का सुल्तान बना, तुग़लक़ वंश की स्थापना
    1321-23  काकतीय तथा पाण्ड्यों के राज्य का दिल्ली सल्तनत में विलय
    1325 मुहम्मद बिन तुगलक शासक बना।
    1326-27  मुहम्मद तुग़लक़ द्वारा दिल्ली से दौलताबाद राजधानी का स्थानान्तरण।
    1330  मुहम्मद तुग़लक़ द्वारा प्रयोग के तौर पर सोने के स्थान पर ताँबे के सिक्के जारी किए गए।
    1333-1342 अफ़्रीकी यात्री इब्नबतूता की भारत यात्रा।
    1336 हरिहर एवं बुक्का द्वारा विजयनगर साम्राज्य की स्थापना।
    1342 इब्नबतूता का चीन को प्रस्थान।
    1347 बहमनशाह द्वारा बहमनी राज्य की स्थापना।
    1351 मुहम्मद तुग़लक़ की मृत्यु, फ़िरोज़ शाह तुग़लक उत्तराधिकारी बना, हरिहर द्वितीय का राज्यरोहण
    1388-1414 परवर्ती तुग़लक़ शासकों का शासनकाल।
    1393 जौनपुर राज्य की स्थापना।
    1398 तैमूरलंग का भारत पर आक्रमण, दिल्ली पर अधिकार।
    1412 अहमदशाह बहमनी द्वारा अहमदाबाद की स्थापना एवं स्वतंत्रता की घोषणा।
    1398 अन्तिम तुग़लक़ शासक महमूद की मृत्यु, तुग़लक़ वंश का पतन।
    1414 दिल्ली में सैय्यद वंश की स्थापना।
    1414 इटली के यात्री निकोलो कोंटी की भारत यात्रा।
    1429 बहमनी राज्य की राजधानी गुलबर्गा से बीदर स्थानान्तरित।
    1430 मेवाड़ में राणा कुम्भा का राज्यकाल।
    1442 अब्दुर्रज्जाक़ की विजयनगर यात्रा।
    1448 राणा कुंभा द्वारा विजय स्तम्भ का निर्माण
    1451 बहलोल लोदी द्वारा लोदी वंश की स्थापना।
    1455 संत कबीर का जन्म।
    1469 सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानकदेव का पंजाब के तलवंडी में जन्म।
    1470 रूसी यात्री निकितिन की भारत यात्रा।
    1472 शेरशाह सूरी का जन्म।
    1479 बल्लभाचार्य का जन्म।
    1483 जहीरुद्दीन बाबर का फरगना में जन्म।
    1484 बरार में इमादशाही वंश
    1485 चैतन्य महाप्रभु का जन्म।
    1486 सालुव वंश की शुरुआत
    1489 बीजापुर राज्य में आदिलशाह वंश , सिकन्दर लोदी गद्दी पर आसीन
    1490 दिल्ली सल्तनत से अहमदनगर स्वाधीन।
    1493 बंगाल में हुसैनशाह गद्दी पर आसीन, बाबर फ़रगना का अमीर बना।
    1498 पुर्तगाली नाविक वास्कोडिगामा भारत में, कालीकट (केरल) पहुँचा
    1502 पुर्तग़ाल के राजा जॉन द्वितीय को पोप अलेक्जेंडर षष्टम का ‘बुल’ प्रदान किया गया, जिससे पुर्तग़ालियों को भारत के साथ व्यापार करने का एकाधिकार तथा भारत में राज्य स्थापित करने का औपचारिक अधिकार मिला।
    1503 फ़रगना बाबर के अधिकार से मुक्त।
    1504 इटली के लुडोविको डी बार्थेमा की पश्चिम तथा दक्षिण भारत की यात्रा, काबुल पर अधिकार कर बाबर का मुल्तान की ओर प्रस्थान।
    1505 वीर नर सिंह द्वारा तालुव वंश की स्थापना
    1507 गुजरात के शासक महमूद बेगड़ा का दीव (गोवा) में पुर्तग़ालियों के विरुद्ध अभियान।
    1507 द्वितीय मुग़ल सम्राट हुमायूँ का जन्म।
    1509 विजयनगर में कृष्णदेवराय सिंहासनरूढ़, पुर्तग़ाली गवर्नर फ़्रांसिस्को-द-अल्मेडा भारत आया।
    1510 गोवा पर पुर्तग़ालियों का अधिकार, अलबुकर्क गवर्नर बना।
    1512 गोलकुण्डा बहमनी राज्य से मुक्त।
    1517 सिकन्दर लोदी की मृत्यु के पश्चात् इब्राहिम लोदी का राज्याभिषेक।
    1519 भारत में बाबर का प्रवेश।
    1520 बाबर का भीटा एवं स्यालकोट पर आक्रमणा
    1520 बाबर का कंधार पर अधिकार।
    1520 लाहौर और सरहिन्द पर बाबर का आक्रमण, लाहौर पर अधिकार
    1526 पानीपत का प्रथम युद्ध (बाबर व इब्राहिम लोदी के मध्य), इब्राहिम लोदी की पराजय, मुगल सम्राज्य की स्थापना।
    1527 बाबर तथा इब्राहिम लोदी के मध्य पानीपत का प्रथम युद्ध, इब्राहीम लोदी की पराजय तथा मृत्यु, दिल्ली पर क़ब्ज़े के साथ ही मुग़ल साम्राज्य की स्थापना।
    1526-27 बीदर में बरीदशाही की स्थापना
    1527 राणा संग्राम सिंह तथा बाबर के मध्य खानवा का युद्ध (16 मार्च), संग्राम सिंह पराजित।
    1529 घाघरा के युद्ध में बाबर द्वारा अफगानों की पराजय।
    1530 बाबर की मृत्यु (29 मई), हुमायूँ का सिंहासनारोहण, विजयनगर के राजा कृष्णदेव राय की मृत्यु (26 दिसम्बर)।
    1530 गुजरात के बहादुरशाह का मालवा तथा उज्जैन पर अधिकार।
    1532 गोस्वामी तुलसीदास का जन्म, रायसेन, चंदेरी एवं मंदसौर पर बहादुरशाह का अधिकार तथा चित्तौड़ पर पहला हमला।
    1533 बहादुरशाह ने चित्तौड़ का घेरा उठाया, रणथम्भौर तथा अजमेर पर अधिकार, वैष्णव संत चैतन्य का निधन।
    1534 हुमायूँ का मालवा को प्रस्थान, शेरशाह ने सूरजगढ़ के युद्ध में बंगाल के शासक महमूद शाह को परास्त किया।
    1535 पुर्तग़ालियों की सहायता से बहादुरशाह का चित्तौड़ पर अधिकार, हुमायूँ से बहादुरशाह पराजित, हुमायूँ की गुजरात तथा मालवा पर विजय।
    1536 हुमायूँ ने अस्करी को गुजरात का शासक नियुक्त किया, गुजरात में मुग़लों के विरुद्ध विद्रोह।
    1537 गुजरात के शासक बहादुरशाह की मृत्यु।
    1538 शेरशाह के हाथों बंगाल का शासक महमूदशाह परास्त,हुमायूँ का बंगाल पर आक्रमण।
    1539 चौसा के युद्ध में शेरशाह द्वारा हुमायूँ की पराजया, गुरु नानक की मृत्यु
    1540 शेरशाह का दिल्ली पर अधिकार।
    1542 मारवाड़ के राजा मालदेव के आमंत्रण पर हुमायूँ जोधपुर पहुँचा, अमरकोट में (15 अक्टूबर) अकबर का जन्म।
    1544 हुमायूँ फ़ारस के तहमस्प शाह की शरण में।
    1545 शाह तहमस्प की मदद से कंधार-काबुल पर पुनः हुमायूँ का अधिकार, शेरशाह की मृत्यु, इस्लाम शाह सूर गद्दी पर बैठा।
    1555 माछीवार का युद्ध , सरहिंद का युद्ध हुमायूँ का लाहौर पर हुमायूँ का अधिकार।
    1556 हुमायूँ की मृत्यु (24 जनवरी)पानीपत के द्वितीय युद्ध में अकबर द्वारा हेमू की पराजय, बैरम खाँ के संरक्षण में अकबर बादशाह बना। पुर्तगालियों द्वारा पहला प्रिंटिंग प्रेस भारत पहुंचा।
    1560 अकबर के द्वारा बैरम ख़ाँ का निष्कासन।
    1562 आमेर की राजकुमारी (राजा भारमल की पुत्री) से अकबर का विवाह, अकबर द्वारा दास प्रथा की समाप्तिा
    1563 तीर्थ यात्रा कर की समाप्तिा
    1564-67 उज़बेकों का विद्रोह।
    1564 अकबर द्वारा जजिया कर की समाप्ति, रानी दुर्गावती को परास्त कर गोंडवाना मुग़ल राज्य में सम्मिलित, रानी द्वारा आत्महत्या।
    1565 तालीकोटा या राक्षसी तंगड़ी का युद्ध, विजयनगर साम्राज्य का अंत, अकबर ने आगरा किला व् लाहौर का किला बनवाया
    1567 राधावल्लभ सम्प्रदाय के प्रवर्तक श्रीहरिवंश का देवबन्द (सहारनपुर) में जन्म।
    1568 अकबर की चित्तौड़ विजया
    1569 जहाँगीर का जन्म,रणथम्भौर और कालिंजर पर अकबर का अधिकार।
    1570 सदाशिव द्वारा अराविदु वंश की शुरुआत
    1571 अकबर द्वारा फ़तेहपुर सीकरी का निर्माण तथा राजधानी बनाने का निर्णय।
    1572 राणा उदयसिंह की मृत्यु, जालौर के राजा और मेवाड़ सेनापतियों के द्वारा राणा प्रताप को गद्दी पर बैठाया गया।
    1572-1573 गुजरात विजय
    1573 कबीर का निधन, गुजरात पर अकबर का आधिपत्य।
    1574-76 अकबर द्वारा बिहार-बंगाल की विजय।
    1576 हल्दीघाटी का युद्ध, अकबर द्वारा महाराणा प्रताप पराजिता
    1577 अमृतसर नगर की स्थापना
    1578 भारतीय भाषा की पहली पुस्तक “डुट्रिना क्रिस्टा’ (तमिल भाषा में) मुद्रित व प्रकाशित
    1579 अकबर ने ‘महजरनामा’ (इन्फैलिबिलिटी डिक्री) जारी किया, बंगाल-बिहार में विद्रोह
    1582 अकबर द्वारा दीन-ए-इलाही की घोषणा।
    1583 अकबर ने इलाहबाद का किला बनवाया ,कश्मीर पर अकबर का आधिपत्य।
    1583 राजा टोडरमल की मृत्यु।
    1590-92 अकबर की सिंध पर विजय।
    1590-92 अकबर की कंधार विजय, बलूचिस्तान मुग़ल साम्राज्य में सम्मिलित।
    1590-92 राणा प्रताप की मृत्यु।
    1600 ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना।
    1600 अकबर का असीरगढ़ पर अधिकार।
    1601-03 अकबर के पुत्र सलीम का विद्रोह।
    1602 अबुल फ़ज़ल की मृत्यु, ‘डच यूनिवर्सल यूनाइटेड ईस्ट इंडिया कम्पनी’ की स्थापना
    1605 अकबर की मृत्यु (16 अक्टूबर), जहाँगीर गद्दी पर बैठा (24 अक्टूबर)।
    1606 शहज़ादा ख़ुसरो का विद्रोह, जहाँगीर के आदेशानुसार पाँचवें सिक्ख गुरु अर्जुन देव को प्राणदण्ड, ईरानियों द्वारा कंधार का घेराव, जहाँगीर की मेवाड़ पर चढ़ाई।
    1607 मुग़लों के द्वारा कंधार मुक्त।
    1608 अहमद नगर पर मलिक अम्बर का पुनः अधिकार, इंग्लैण्ड के राजा जेम्स प्रथम का पत्र लेकर विलियम हाकिंस जहाँगीर के दरबार आया, संत तुकाराम का जन्म।,सूरत में पहली फैक्ट्री ।
    1610 पुलीकट में डच फैक्टरी स्थापित।
    1611 मूसलीपत्तनम में प्रथम अंग्रेज फैक्टरी स्थापित,आदिलशाह बीजापुर की गद्दी पर आसीन, नूरजहाँ एवं जहाँगीर का विवाहा
    1612 शहज़ादा ख़ुर्रम (शाहजहाँ) का मुमताज़ महल से विवाह, बंगाल की राजधानी राजमहल से ढाका स्थानान्तरित।
    1614 मेवाड़ के राणा अमर सिंह से जहाँगीर की संधि।
    1615 मेवाड़ पर जहाँगीर का अधिकार, इंग्लैण्ड के शासक जेम्स प्रथम के राजदूत के रूप में सर टॉमस रो जहाँगीर के दरबार में आया।
    1622 कंधार पर फ़ारस का पुनः अधिकार, शाहजहाँ का विद्रोह, गोस्वामी तुलसीदास का जन्म।
    1624 अहमदनगर के मलिक अम्बर के हाथों मुग़ल सेना पराजित।
    1625-74 गोलकुण्डा की गद्दी पर सुल्तान अब्दुल्ला क़ुतुबशाह बैठा।
    1626 महावत ख़ाँ का विद्रोह।
    1627 जहाँगीर की मृत्यु (29 अक्टूबर), जुन्नार (पूना) के निकट शिवनेर के क़िले में शिवाजी का जन्म (20 अप्रैल) [अपवाद:1630]।
    1628 शाहजहाँ मुग़ल सम्राट बना (6 फ़रवरी)।
    1631 मुमताज़ महल की मृत्यु (7 जून)।
    1631-1653 शाहजहाँ द्वारा ताजमहल का निर्माण,
    1632 बीजापुर पर मुग़ल आक्रमण, पुर्तग़ालियों के विरुद्ध सैन्य अभियान, हुगली में उनकी बस्ती नष्ट।
    1632 अहमदनगर के निज़ामशाही वंश का अन्त, अहमदनगर मुग़ल साम्राज्य में सम्मिलित, दौलताबाद के क़िले पर अधिकार।
    1632 अंग्रेज़ों को बंगाल में व्यापार करने का फ़रमान मिला, महावत ख़ाँ की मृत्यु।
    1636 बीजापुर और गोलकुण्डा से मुग़लों की संधि, औरंगज़ेब दक्कन का सूबेदार नियुक्त, औरंगजेब को दक्कन का सूबेदार बनाया गया।
    1638 अली मर्दान द्वारा कंधार मुग़लों को समर्पित, शाहजहाँ द्वारा नए राजधानी शहर शाहजहाँनाबाद का निर्माण प्रारम्भ।।
    1639 अंग्रेजों ने मद्रास में सेंट जॉर्ज किले की नींव रखी।
    1642 इंग्लैंड में गृह युद्ध की शुरुआत
    1644 दिल्ली में जामा मस्जिद का निर्माण
    1646 शिवाजी का तोरण पर पहला सैन्य अभियान , बल्ख पर मुग़लों का अधिकार।
    1648 शाहजहाँ द्वारा शाहजहाँनाबाद का निर्माण शुरू।
    1648 कंधार पर पर पुनः फ़ारस का अधिकार।
    1650 मराठी संत तुकाराम का निधन।
    1656 शिवाजी का जाबली पर अधिकार।
    1656 बीदर का पतन और मुग़लों द्वारा बीजापुर की घेराबन्दी, शाहजहाँ के अस्वस्थ होने पर ‘उत्तराधिकारी का युद्ध’ प्रारम्भ, बीजापुर के साथ द्वितीय सन्धि।
    1658 धरमत के युद्ध (5 मई) तथा सामूगढ़ के युद्ध (8 जून) में दारा शिकोह की औरंगज़ेब के हाथों पराजय, शाहजहाँ आगरा में बन्दी (5 जून), औरंगज़ेब का राज्याभिषेक (31 जुलाई)।
    1659 देवराई का युद्ध दारा शिकोह व औरंगजेब के बीच ,औरंगजेब सिंहासनारूढ़ दूसरी बार दिल्ली में ।
    1659 शिवाजी द्वारा अफजल खाँ की हत्या, दारा शिकोह को मृत्युदण्ड।
    1661 इंग्लैंड सम्राट चाल्स द्वितीय का पुर्तगाली राजकुमारी कैथरीन से विवाह , शहज़ादा मुराद की हत्या, पुर्तग़ालियों द्वारा इस शर्त पर बम्बई अंग्रेज़ों को हस्तांतरित की गयी कि वे डचों को इस क्षेत्र में व्यापार से बाहर खदेड़ने में इनका साथ देंगे।
    1662 मीर जुमला का असम अभियान।
    1662 मीर जुमला की मृत्यु, शाइस्ता ख़ाँ बंगाल का सूबेदार नियुक्त।
    1664 शिवाजी द्वारा सूरत की लूट। फ्रांसीसी ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना।
    1665 राजा जयसिंह के हाथों शिवाजी की पराजय,शिवाजी और मुगलों के बीच पुरन्दर की सन्धिा
    1666 शाहजहाँ की मृत्यु, शिवाजी और बेटे शम्भा जी जयपुर भवन में कैद।
    1668 औरंगज़ेब द्वारा हिन्दुओं के विरुद्ध नये आदेश, ईस्ट इंडिया कम्पनी का पूर्ण अधिकार।
    1669 मथुरा में जाट सरदार गोकुल का विद्रोह, बम्बई पर अंग्रेज़ ‘ईस्ट इंडिया कम्पनी’ का पूर्ण अधिकार।
    1670 शिवाजी का सूरत पर दूसरा आक्रमण।
    1671 छत्रसाल के नेतृत्व में बुंदेलों का विद्रोह।
    1672 अफ्रीदी तथा सतनामी विद्रोह, दम लौहेम के नेतृत्व में फ़्राँसीसियों ने श्रीलंका तथा चेन्नई के निकट सेंट टोम पर अधिकार
    1673 शिवाजी का सूरत पर तीसरा आक्रमण, हिन्दी कवि धनानंद का जन्म।
    1674 शिवाजी का रायगढ़ में राज्याभिषेक गंगाभट द्वारा तथा ‘छत्रपति’ की उपाधि धारण, ‘स्वराज’ की स्थापना, फ़्राँसीसी कप्तान फ़्राँसिस मार्टिन के द्वारा पांण्डिचेरी की स्थापना, ।।
    1675 औरंगजेब द्वारा गुरु तेगबहादुर को मृत्युदण्ड।
    1677 कर्नाटक में शिवाजी की विजय।
    1679 औरंगजेब ने पुन: जजिया कर लगाया, औरंगजेब ने बीबी का मकबरा बनवाया, मारवाड़ अभियान। ।
    1680 शिवाजी की मृत्यु, शंभाजी पेशवा बना, अलंकारवादी हिन्दी कवि केशवदास का जन्म।
    1681 असम पुनः स्वतंत्र, औरंगज़ेब का दक्षिण में अभियान।
    1685 अंग्रेज कम्पनी का मुख्यालय सूरत से हटाकर बम्बई स्थानान्तरित।
    1685 औरंगज़ेब का बीजापुर पर अधिकार।
    1687 गोलकुण्डा मुग़ल साम्राज्य में सम्मिलित, ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा औरंगज़ेब के विरुद्ध युद्ध की घोषणा।,मद्रास में नगर निगम की स्थापना
    1689 औरंगजेब द्वारा शंभाजी व कलश को मृत्युदण्ड, शाहू बन्दी बनाया गया, राजाराम सत्तारूढ़।
    1698 सूतानाटी, कलिकता तथा गोविन्दपुरी की जमींदारी ईस्ट इंडिया कम्पनी को मिली।
    1699 मालवा पर मराठों का प्रथम आक्रमण।
    1700 शंभाजी के छोटे भाई राजाराम की मृत्यु, ताराबाई के संरक्षण में शिवाजी द्वितीय (राजाराम का पुत्र) गद्दी पर बैठा।
    1702 इंग्लैंण्ड में रानी ऐन गद्दी पर बैठीं, गोडोल्फिन के हस्तक्षेप से पुरानी और नयी कम्पनियों को एकीकरण कर नयी ईस्ट इंडिया कम्पनी का उदय।
    1699 मराठों का बरार पर आक्रमण।
    1707 औरंगज़ेब की मृत्यु, बहादुरशाह प्रथम (राजकुमार मुहम्मद मुअज्जम) मुग़ल सम्राट बना, शाहू मुक्त, ताराबाई तथा शाहू समर्थकों के मध्य खेड़ा का युद्ध, मराठा राज्य दो भागों में विभक्त,पेशवा बालाजी विश्वनाथ शाहू के साथ।
    1708  बालाजी विश्वनाथ को ‘सेनाकर्ते’ की उपाधि,,अन्तिम गुरु गोविन्द सिंह का नांदेड में निधन।
    1712 बहादुरशाह प्रथम की मृत्यु, जहाँदारशाह शासक बना।
    1713 बालाजी विश्वनाथ पेशवा वने, जहाँदारशाह की हत्या, सैय्यद बन्धुओं की मदद से फ़र्रुख़सियर सिंहासनारूढ़।
    1713 हुसैन अली दक्षिण का सूबेदार, हुसैन अली की मराठों से सन्धि।
    1715 सिख नेता बन्दाबहादुर को मृत्युदण्ड।
    1717 ईस्ट इंडिया कम्पनी को बादशाह फ़र्रुख़सियर का स्वतंत्र व्यापार (ड्यूटी-फ़्री) फ़रमान, कलकत्ता के निकट 37 गाँवों को ख़रीदने का अधिकार भी मिला।
    1719 फ़र्रुख़सियर की हत्या, मुहम्मदशाह गद्दी पर आसीन (दो अल्पकालिक शासकों रफ़ी-उद-दौला तथा रफ़ी-उद-दरजात की मृत्यु के उपरान्त), मुग़ल सम्राट द्वारा सनद प्रदान कर ‘चौथ’ तथा ‘सरदेशमुखी’ वसूलने का अधिकार
    1720 बाजीराव प्रथम पेशवा बने, सैय्यद बन्धुओं का अन्त, मराठों का उत्तरी अभियान प्रारम्भ।
    1723 शिवाजी के गुरु समर्थ रामदास की मृत्यु, पेशवा का मालवा पर आक्रमण।
    1724 सआदत ख़ाँ अवध का सूबेदार नियुक्त, दक्षिण में निज़ाम स्वतंत्र।
    1725 शुजाउद्दीन बंगाल का सुबेदार
    1731 गॉटनबर्ग में सम्राट फ़्रेडरिक द्वारा ‘स्वीडिश ईस्ट इंडिया’ का गठन।
    1731 मुग़ल बादशाह द्वारा पेशवा बाजीराव प्रथम को मालवा के शासक के रूप में स्वीकृति।
    1738 तुलसीदास (‘रामचरितमानस’ के रचयिता) का निधन।
    1739 नादिरशाह द्वारा दिल्ली पर आक्रमण, कोहिनूर हीरा एवं मयूर सिंहासन उसके कब्जे में।
    1740 खुरासान में नादिरशाह की उसके ही सेनापतियों के द्वारा हत्या, अलीवर्दी खां बंगाल का नवाब बना, बालाजी बाजीराव पेशवा बने, अर्काट पर मराठों का आक्रमण।।
    1742 बंगाल पर मराठों का अभियान, डूप्ले फ्रांसीसी बस्ती पाण्डिचेरी का गवर्नर नियुक्ता
    1744-48 प्रथम आंग्ल-फ्रांसीसी कर्नाटक युद्ध, यूरोप में फ्राँस तथा इंग्लैण्ड के बीच युद्ध आरम्भ।
    1747 अहमदशाह अब्दाली का भारत पर आक्रमण।
    1748 हैदराबाद के निज़ाम आसफ़जाह की मृत्यु, मुहम्मदशाह की मृत्यु के पश्चात् अहमदशाह मुग़ल बादशाह बना
    1748-51 अहमदशाह अब्दाली का अफ़ग़ानिस्तान और पंजाब पर अधिकार।
    1749 यूरोप में ब्रिटिश और फ़्राँसीसियों के बीच ‘एक्स-ला-शापेल’ की सन्धि, भारत में अंग्रेज़ी और फ़्राँसीसी कम्पनियों में भी युद्ध विराम, फ़्राँसीसियों द्वारा चेन्नई अंग्रेज़ों को वापस, शाहू की मृत्यु तथा रामराज का छत्रपति के रूप में राज्याभिषेक।
    1751 अर्काट के क़िले पर राबर्ट क्लाइव का अधिकार, जिससे फ़्राँसीसी त्रिचरापल्लि से हटे, मुजफ़्फ़र जंग की मृत्यु, सलावत जंग निज़ाम बना, अलीवर्दी ख़ाँ की मराठों से सन्धि।
    1754 डूप्ले फ़्राँस वापस, आलमगीर द्वितीय मुग़ल बादशाह बना।
    1756 अलीवर्दी खां की मृत्यु, सिराजुद्दौला बंगाल को गद्दी पर बैठा, तीसरा आंग्ल-फ्रांसीसी कर्नाटक युद्ध। बंगाल का नवाब बना,ब्लैक होल की घटना।
    1757 प्लासी का युद्ध (23 जून) में अंग्रेज़ों द्वारा सिराजुद्दौला पराजित, मीर ज़ाफ़र नवाब बनाया गया (28 जून), अंग्रेज़ों का कलकत्ता पर पुनः अधिकार, सिराजुद्दौला को मृत्युदण्ड (2 जुलाई), अंग्रेज़ों का राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित।
    1758 फ़्राँसीसी गवर्नर मारकुइस डि बुसी का भारत आगमन,,फ्रांसीसियों का फोर्ट सेंट डेविड पर कब्जा,पंजाब पर मराठों का अधिकार।
    1758 बंगाल में अंग्रेज़ों द्वारा डच पराजित, बीदर का युद्ध, गाज़ीउद्दीन इमामुलमुल्क द्वारा आलमगीर द्वितीय की हत्या, शाहआलम द्वितीय बादशाह बना (1759-1806)।
    1760  मीर कासिम बगाल का नवाब बना, वाडीवाश के युद्ध में अंग्रेज़ों के हाथों फ़्राँसीसी पराजित, रॉबर्ट क्लाइब इंग्लैण्ड वापस।
    1761 अहमदशाह अब्दाली तथा मराठों के बीच पानीपत का तीसरा युद्ध (14 जनवरी), मराठे पराजित, फ़्राँसीसियों द्वारा पांण्डिचेरी अंग्रेज़ों को समर्पित, पेशवा बाजीराव का निधन, माधवराव सिंहासनारूढ़, हैदर अली मैसूर का नवाब, अवध का नवाब शुजाउद्दौला वज़ीर बना।
    1763 मीर जाफर पुन: बंगाल का नवाब बना
    1763-80 सन्यासी विद्रोह , अंग्रेज़ों द्वारा पांण्डिचेरी फ़्राँसीसियों को वापस, बंगाल एवं बिहार पर मीर क़ासिम का अधिकार समाप्त, मीर क़ासिम निष्कासित, मीर ज़ाफ़र पुनः नबाब बना, रघुनाथराव का सत्ता पर क़ब्ज़ा, माधवराव बन्दी।
    1764 बक्सर का युद्ध, शाहआलम, शुजाउद्दौला तथा मीर क़ासिम की संयुक्त सेनायें अंग्रेज़ों से पराजित।
    1765 बंगाल में अंग्रेजों द्वारा द्वैध शासन की शुरुआत।
    1765 क्लाइव की दूसरी गवर्नरी (1765-67 ई.), शुजाउद्दौला, शाहआलम तथा ईस्ट इंडिया कम्पनी के मध्य ‘इलाहाबाद की सन्धि’, शाहआलम ने बिहार, बंगाल तथा उड़ीसा की ‘दीवानी’ कम्पनी को सौंपी, मीर जाफ़र की मृत्यु।
    1767-69 प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध,अंग्रेज़ों ने अपमानजनक शर्तों पर हैदर अली से सन्धि की, हैदर अली का चेन्नई अभियान।
    1767 रॉबर्ट क्लाइब इंग्लैण्ड वापस, वेरेलस्ट बंगाल का गवर्नर बना।
    1769 निज़ाम और मराठों के साथ अंग्रेज़ों की ‘चेन्नई की सन्धि’।,नेपोलियन का जन्म
    1770 बंगाल में भीषण अकाल, पेरिस में दिवालिया हो जाने के कारण ‘फ़्राँसीसी ईस्ट इंडिया कम्पनी’ भंग।
    1770 मराठों का हैदर अली पर आक्रमण, दिल्ली पर मराठों का क़ब्ज़ा, शाहआलम द्वितीय को अंग्रेज़ों के बन्धन से मुक्ति।
    1772 राजा राममोहन राय का जन्म,वारेन हेस्टिंग्स बंगाल का गवर्नर जनरल बना, कम्पनी द्वारा द्वैध शासन की समाप्ति,पेशवा माधवराव की मृत्यु, नारायणराव पेशवा बना पर ही शीघ्र मृत्यु, जिला कलेक्टर की नियुक्ति ।
    1773 ब्रिटिश संसद द्वारा रेग्यूलेटिंग एक्ट पारित, कम्पनी पर ब्रिटिश संसद का आंशिक नियंत्रण, रघुनाथराव पेशवा बना
    1774 माधवराव नारायण पेशवा बना(74),रूहेला युद्ध, वारेन हेस्टिंग प्रथम गवर्नर जनरल (1774-85 ई.), कलकत्ता में पहले उच्चतम न्यायालय की स्थापना।
    1775-82 प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध
    1775 कम्पनी और अवध के वज़ीर आसफ़उद्दौला के बीच मैत्री सन्धि, नन्द कुमार पर मुक़दमा तथा मृत्युदण्ड (6 मई), रघुनाथराव तथा अंग्रेज़ों के बीच ‘सूरत की सन्धि’।
    1777 सन् 1857 के विद्रोही वीर कुँवर सिंह का जन्म।
    1776 अंग्रेज़ों (कर्नल आप्टन) तथा मराठों (रघुनाथराव के विरोधियों) के बीच ‘पुरन्दर की सन्धि’।, अमेरिका के सवतंत्रता की घोषणा
    1778 यूरोप में अंग्रेज़-फ़्राँस युद्ध, भारत में फ़्राँसीसी उपनिवेशों पर अंग्रेज़ों का अधिकार।
    1779 मराठों तथा अंग्रेज़ों के बीच ‘बड़गाँव समझौता, हैदर अली, हैदराबाद के निज़ाम तथा मराठे अंग्रेज़ों का विरोध करने को एकजुट।
    1780  कैप्टन पोफम के नेतृत्व में ईस्ट इण्डिया कम्पनी का ग्वालियर पर अधिकार, द्वितीय मैसूर युद्ध प्रारम्भ, हैदर अली द्वारा कर्नाटक ध्वस्त, महाराजा रणजीत सिंह का जन्म, जेम्स हिक्की द्वारा भारत में छपने वाला प्रथम साप्ताहिक समाचार पत्र बंगाल गजट
    1781 पोर्टोनोवा में हैदर अली पराजित, रेग्युलेटिंग एक्ट में संशोधन, वारेन हेस्टिंग्स द्वारा ‘कलकत्ता मदरसा’ की स्थापना, बंगाल में ‘बोर्ड ऑफ़ रेवेन्यू’ की स्थापना।
    1782 अंग्रेज़, मराठा और हैदर अली के बीच ‘सल्बाई की सन्धि’ हैदर अली की मृत्यु, ‘बंगाल की खाड़ी’ में अंग्रेज़ों तथा फ़्राँसीसियों के बीच नौसेनिक युद्ध
    1780-84 द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध।
    1782-99 टीपू सुल्तान मैसूर का शासक बना।
    1783 फाक्स का इंडिया बिल ब्रिटिश संसद में अस्वीकृत।
    1784 टीपू सुल्तान के साथ ‘मंगलौर की सन्धि’, द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध की समाप्ति, भारतीय मामलों के लिए ‘बोर्ड ऑफ़ कन्ट्रोल’ की स्थापना हेतु पिट का इंडिया एक्ट,, एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल की स्थापना।
    1784 वारेन हेस्टिंग्स का त्यागपत्र, पंजाब में सिक्ख का आधिपत्य, दिल्ली पर महादजी सिंधिया का अधिकार।
    1786 लॉर्ड कार्नवालिस गवर्नर जनरल बना।
    1787 टीपू सुल्तान ने पेरिस और कुस्तुनतुनिया में दूत भेजा, मराठा, निज़ाम तथा टीपू के बीच सन्धि, विलियम विलबरफ़ोर्स द्वारा ‘दासता-विरोधी (Anti-slavery) लीग’ की स्थापना।
    1787 ग़ुलाम क़ादिर रुहिल्ला का दिल्ली पर क़ब्ज़ा, ग़ुलाम क़ादिर ख़ान द्वारा शाहआलम द्वितीय को नेत्रहीन बनाया गया, बेदार बख़्त दिल्ली की गद्दी पर आसीन।
    1788-95 वारेन हेस्टिंग्स पर महाभियोग।
    1789 फ़्रांस की क्रांति
    1790-92 तीसरा आंग्ल-मैसूर युद्ध (टीपू सुल्तान और अंग्रेज़, मराठों की संयुक्त सेना के बीच)।
    1792 श्रीरंगपट्टम की सन्धि के साथ ‘तृतीय मैसूर युद्ध’ समाप्त, पंजाब में रणजीत सिंह सुकरचकिया-मिसल के मुखिया, डंकन जोनाथन द्वारा वाराणसी में ‘राजकीय संस्कृत महाविद्यालय’ (बाद में ‘संस्कृत विश्वविद्यालय’) की स्थापना।
    1793 बंगाल में भू-राजस्व का स्थायी बंदोबस्त, ब्रिटिश संसद द्वारा भारत में युद्ध नियंत्रण विधेयक पारित। पांण्डिचेरी पर अंग्रेज़ों का अधिकार, कम्पनी के चार्टर का नवीनीकरण।
    1795 इन्दौर की रानी अहिल्याबाई होल्कर का निधन, जोनाथन डंकन बम्बई का गवर्नर नियुक्त।
    1796 पेशवा माधवराव नारायण की मृत्यु, बाजीराव द्वितीय पेशवा नियुक्त, अंग्रेज़ों द्वारा श्रीलंका को डचों से मुक्त कराया गया।
    1797 श्रीरंगपट्टनम में फ्रांसीसियों द्वारा जैकोबिन क्लब की स्थापना।
    1797  अवध में नवाब आसफ़ुद्दौला की मृत्यु,वज़ीर अली नया नवाब (अवध), श्रीरंगपट्टनम में 60 फ़्राँसीसियों द्वारा ‘जैकोबिन क्लब’ की स्थापना।
    1798 लॉर्ड वेलेजली बंगाल का गवर्नर जनरल बना, मद्रास प्रेसिडेंसी की स्थापना, पेशवा और निज़ाम में एकता, टीपू ने फ़्राँसीसी उपनिवेश मॉरिशस को दूत भेजा, नेपोलियन बोनापार्ट का मिस्र अभियान।
    1799 चौथा आंग्ल-मैसूर युद्ध, टीपू सुल्तान की मृत्यु, मैसूर विभाजन। मैसूर राजवंशज कृष्णराज गद्दी पर आसीन। जमानशाह द्वारा रणजीत सिंह लाहौर का सूबेदार नियुक्त,प्रेस पर प्रतिबन्ध ।
    1800 
    1801 फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना (10 जुलाई )।
    1802 पेशवा और अंग्रेज़ों के बीच ‘बसीन की सन्धि’
    1803 द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1803-05) में मराठों की पराजय। अलीगढ़ पर अंग्रेज़ों का अधिकार। भोंसले के साथ कम्पनी की ‘देवगाँव की सन्धि’ तथा सिंधिया के साथ ‘सुर्जी अर्जुनगाँव की सन्धि’।
    1803  लॉर्ड वेलेज़ली को इंग्लैंण्ड वापस बुलाया गया, लॉर्ड कॉर्नवॉलिस की मृत्यु, होल्कर के साथ सन्धि।
    1806 अकबर द्वितीय शाहआलम द्वितीय का उत्तराधिकारी बना, वेल्लोर में सैनिक विद्रोह।
    1807-08 नेपोलियन की भारत पर संयुक्त फ़्राँसीसी-रूसी अभियान योजना।
    1809 कम्पनी और रणजीतसिंह के बीच अमृतसर की सन्धि(25 अप्रैल)।
    1813 कम्पनी का चार्टर नवीनीकृत, शिक्षा पर सालाना एक लाख रुपये ख़र्च करने का प्रावधान।
    1814-16 नेपाल के साथ युद्ध तथा सुगौली की सन्धिा
    1815 वाटरलू का युद्ध नेपोलियन व् मित्र राष्ट्रों के बीच
    1817 कलकत्ता में ‘हिन्दू कॉलेज’ की स्थापना (डेविड हेयर तथा राममोहन राय द्वारा)।
    1817-18 तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध, सेरामपुर ईसाई मिशनरी संस्था’ द्वारा भारतीय भाषा (बांग्ला) में ‘समाचार दर्पण’ नाम का पहला साप्ताहिक प्रकाशित। पेशवा बाजीराव द्वितीय का समर्पण।।
    1818 भारतीय भाषा (बांग्ला) में प्रथम समाचार पत्र “समाचार दर्पण” साप्ताहिक प्रकाशित, अष्टी की लड़ाई, कोरेगांव की सुरक्षा, पेशवा बाजीराव द्वारा आत्मसमर्पण।
    1818 पेशवा पद की समाप्ति, बाजीराव द्वितीय को अंग्रेजों के पेंशनर के रूप में बिठूर में भेज दिया गया।
    1820-22 सर थॉमस मुनरो मद्रास के गवर्नर।
    1821 पूना में संस्कृत कॉलेज की स्थापना।
    1822 टेनेंसी एक्ट या काश्तकारी अधिनियम, बम्बई में ‘नेटिव एजुकेशन सोसाइटी’ की स्थापना। ‘बम्बई समाचार’ प्रकाशित।
    1823 गवर्नर-जनरल एडम्स ने मुद्रणालयों के लिए लाइसेंस अनिवार्य किया था।
    1824 बैरकपुर में सैनिक विद्रोह (अधिक भत्ते की मांग पर)।
    1824-26 प्रथम आंग्ल-बर्मा युद्ध। ‘याण्डबू की सन्धि’। अराकान तथा तेनासरीम ब्रिटिश साम्राज्य में शामिल।
    1825 प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी दादाभाई नौरोजी का जन्म (4 सितम्बर)।
    1826 यान्डूब की सन्धि, उदन्त मार्तण्ड हिंदी का प्रथम समाचार पत्र
    1827 पहला वाष्पचालित युद्धपोत ‘इंटरप्राइज’ मद्रास पहुँचा।
    1828 विलियम बैंटिक बंगाल के गवर्नर जनरल बने,राममोहन राय द्वारा ‘ब्रह्म समाज’ की स्थापना। ‘ऐकेडमिक एसोसिएशन’ स्थापित।
    1829 विलियम बेंटिक द्वारा सती प्रथा को गैरकानूनी घोषित किया गया।
    1830  ईश्वरचन्द्र गुप्ता द्वारा बंगाल मासिक ‘संवाद प्रभाकर’ प्रकाशित।
    1831 राजा राममोहन राय इंगलैण्ड गये, मैसूर का राजा पदच्युत। शासन ब्रिटिश सरकार के हाथ में, रोपड़ में विलियम बैंटिक और रणजीत सिंह की भेंट।।
    1833 भारतीय विधि आयोग गठित, बंगाल का गवर्नर जनरल भारत का गवर्नर जनरल कहलाने लगा, कम्पनी का व्यापारिक अधिकार समाप्त, राजा राममोहन राय की ब्रिस्टल में मृत्यु।
    1834  सरकार द्वारा चाय बाग़ानों की स्थापना।
    1835 चार्ल्स मेटकॉफ द्वारा समाचार पत्रों पर से प्रतिबन्ध की समाप्ति, अंग्रेजी सरकारी भाषा व शिक्षा का माध्यम बनी, कलकत्ता मेडिकल कॉलेज की स्थापना हुई,सर मेटकॉफ़ द्वारा समाचार पत्रों पर से प्रतिबन्ध समाप्त। लॉर्ड मैकाले का शिक्षा नीति पर प्रस्ताव। अंग्रेज़ी (फ़ारसी के स्थान पर) पहली बार सरकारी भाषा बनी। कम्पनी ने पहली बार अपने सिक्के जारी किए।
    1837 अकबर द्वितीय का उत्तराधिकारी अंतिम मुग़लशाह बहादुर शाह का राज्याभिषेक, महारानी विक्टोरिया गद्दी पर आसीन।
    1838 कम्पनी, रणजीतसिंह तथा शाहशुजा के बीच त्रिदलीय सन्धि,काबुल-कंधार पर अंग्रेज़ों का अधिकार, केशवचन्द्र सेन का जन्म (19 नवम्बर)।
    1839 महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु। कलकत्ता तथा दिल्ली के बीच जी. टी. रोड का कार्य आरम्भ। अंग्रेज़ों द्वारा शाहशुजा काबुल का अमीर घोषित, ‘यूनाइटेड इंडिया एसोसियशन’ की स्थापना (9 फ़रवरी)। लन्दन में ‘ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी’ की स्थापना।
    1839-42 प्रथम अफगान युद्ध।
    1841 कलकत्ता में ‘देश हितेषणी सभा’ की स्थापना (3 अक्टूबर)।
    1843 सिन्ध पर अंग्रेज़ों का आधिपत्य। ‘दास प्रथा’ पर प्रतिबन्ध। ‘बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी’ की स्थापना।
    1845-46 प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध (अंग्रेजी कंपनी तथा सिख राजा के बीच)
    1846 अंग्रेज़ों तथा सिक्खों के बीच ‘लाहौर की सन्धि’।
    1847 रुड़की में प्रथम इंजीनियरिंग कॉलेज स्थापित।
    1848 लॉर्ड डलहौजी गवर्नर जनरल बना, सतारा ब्रिटिश साम्राज्य में सम्मिलित। गोद लेने की प्रथा पर प्रतिबन्ध। बम्बई में ‘स्टूडेंट्स लिटरेरी एंड साइंटिफिक सोसाइटी’ की स्थापना।।
    1848-49 द्वितीय आंग्ल सिख युद्ध।
    1850 कलकत्ता में बेथुन द्वारा पहली कन्या पाठशाला की स्थापना।
    1849 आत्मारंग पांडुरंग द्वारा परमहस मण्डली की स्थापना
    1851 कलकत्ता में “ब्रिटिश इण्डियन एसोसिएशन” की स्थापना।
    1852 द्वितीय आंग्ल बर्मा युद्ध, दादा भाई नैरोजी द्वारा बंबई असोसिएशन की स्थापना, पहली बार आई. सी. एस. परीक्षा प्रारम्भ। सस्ती डाक सेवा प्रारम्भ।
    1853 बम्बई से थाणे तक पहली रेलवे लाइन का उद्घाटन, कलकत्ता से आगरा तक पहली टेलीग्राफ लाइन, पहली बार आई.सी.एस. परीक्षा प्रारम्भ,
    1854 बंगाल में नील विद्रोह, प्रथम डाक टिकट
    1855-56 संथाल विद्रोह। पटसन उद्योग की शुरुआत। कलकत्ता में ‘अंजुमने इस्लामी’ (या मोहम्मडन एसोसिएशन) की स्थापना (मई 6)।, कलकत्ता में अंजुमन-ए-इस्लामी की स्थापना।
    1856 कलकत्ता में इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना।,हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित, अवध को ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाया गया,बंगाल विधान परिषद्’ द्वारा ‘हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम’ पारित। यूरोप में ‘क्रीमिया युद्ध’ समाप्त।।
    1857 डलहौजी की हड़प निति समाप्त ,कलकत्ता, बम्बई तथा मद्रास विश्वविद्यालय की स्थापना, भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का विद्रोह, केशवचन्द्र सेन ब्रह्म समाज में शामिल, मंगल पाण्डे द्वारा लेफ्टिनेंट बाग़ की गोली मारकर हत्या।।
    1858 भारत का शासन कम्पनी से ब्रिटिश सरकार ने अपने हाथों में लिया।
    1858 1 नवम्बर, 1858 ई. को प्रथम वायसराय लॉर्ड कैनिंग ने इलाहाबाद में एक दरबार का आयोजन किया, जिसमें वायसराय ने महारानी विक्टोरिया द्वारा भारतीय शासन चलाने की विधिवत् घोषणा की तथा विक्टोरिया की ओर से एक घोषणा पत्र पढ़कर सुनाया, जिसे भारतीय स्वतंत्रता का ‘मैग्नाकार्य’ कहा जाता है।
    1859 कागज का नोट जारी, गोद प्रथा की समाप्ति, नील विद्रोह,ईश्वर विद्या सागर की सोमप्रकाश का प्रेक्षण कलकत्ता से ,
    1860 बजट की व्यवस्था शुरू। (7 अप्रैल, 1860 को देश का पहला बजट ब्रिटिश सरकार के वित्त मंत्री जेम्स विल्सन ने पेश किया था),अब्राहिम लिंकन 16वें राष्ट्रपति
    1861 ‘भारतीय परिषद् अधिनियम’ तथा ‘भारतीय हाईकोर्ट्स अधिनियम’ लागू। आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया (ए.एस.आई.) का गठन। दीनबंधु मित्र का नाटक ‘नील-दर्पण’ प्रकाशित। रवीन्द्रनाथ ठाकुर का जन्म, भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम, 1861 के अंतर्गत कलकत्ता, बम्बई, मद्रास में एक-एक उच्च न्यायालय की स्थापना की गयी, इंडियन मिरर ।
    1862 भारतीय दण्ड संहिता लागू, उच्च न्यायालय की स्थापना।
    1863 कलकत्ता में मोहम्मडन एसोसिएशन की स्थापना, पटना कॉलेज की स्थापना।
    1864 सैय्यद अहमद द्वारा ‘मोहम्मडन साइंटिफिक सोसायटी’ की स्थापना, बंकिमचन्द्र चटर्जी द्वारा ‘दुर्गेश नन्दनी’ उपन्यास की रचना।
    1865 अमेरिका में गृह युद्ध समाप्त
    1866 इलाहाबाद उच्च न्यायालय की स्थापना,दादा भाई नैरोजी द्वारा ईस्ट इंडिया असोसिएशन की ।
    1867 ब्रह्मसमाज की प्रेरणा से बम्बई में ‘प्रार्थना समाज’ की स्थापना। नवगोपाल मित्र द्वारा कलकत्ता में स्वदेशी वस्तुओं के प्रचार के लिए वार्षिक मेले का उदघाटन। आयकर पुनः लागू किए जाने का विरोध। ‘पूना सार्वजनिक सभा: स्थापित।
    1868 अम्बाला से दिल्ली तक रेलवे लाइन का उदघाटन। शिशिर कुमार घोष द्वारा ‘अमृत बाज़ार पत्रिका’ प्रकाशित। भारत का प्रथम संध्या समाचार पत्र ‘मद्रास-मेल’ प्रकाशित।
    1878 लिटन का ‘वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट’ लागू, द्वितीय आंग्ल-अफ़ग़ान युद्ध आरम्भ। कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में भारतीय पत्रकारों की ‘नेटिव प्रेस कांफ्रेंस’ का पहला सम्मेलन। ‘साधारण ब्रह्म समाज’ की स्थापना।
    1869 ड्यूक ऑफ़ एडिनबरा’ की भारत यात्रा। स्वेज नहर का उदघाटन। महात्मा गांधी का जन्म। ठक्कर बापा का जन्म।
    1870 1872 ‘कूका विद्रोह’,आनन्द मोहन बोस द्वारा लन्दन में ‘इंडियन सोसायटी’ की स्थापना,प्रथम जनगणना प्रारम्भ, कृषि विभाग , भारतीय साख्यिँकी सर्वेक्षण विभाग की स्थापना, लॉर्ड मेयो की हत्या (पोर्ट ब्लेयर में)।
    1873 ज्योतिबा फुले द्वारा सत्यशोधक समाज की स्थापना ,लाहौर में स्वदेशी वस्तुओं के प्रचार के लिए ‘स्वदेशी सभा’ स्थापित।
    1874 बिहार में अकाल।
    1875 कलकत्ता में ‘इंडिया लीग’ की स्थापना, थियोसोफिकल सोसाइटी की स्थापना, सैय्यद अहमद खाँ द्वारा अलीगढ़ में मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएन्टल कॉलेज की स्थापना, प्रिंस ऑफ वेल्स की प्रथम भारत यात्रा। स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा आर्य समाज की स्थापना।
    1876 क्वेटा पर अंग्रेज़ सेना का अधिकार। कलकत्ता में ‘इण्डियन एसोसिएशन’ की स्थापना। ‘आई.सी.एस. परीक्षा’ में शामिल होने के लिए आयु सीमा में कटौती।
    1877 लॉर्ड लिटन का प्रथम दिल्ली दरबार, महारानी विक्टोरिया भारत की साम्राज्ञी घोषित (1 जनवरी )तथा कैसर-ऐ – हिन्द की उपाधि, पहली ‘नेटिव प्रेस ऐसोसिएशन’ की स्थापना ।
    1878 लिटन का वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट पारित,द्वितीय आंग्ल-अफ़ग़ान युद्ध आरम्भ। कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में भारतीय पत्रकारों की ‘नेटिव प्रेस कांफ्रेंस’ का पहला सम्मेलन। ‘साधारण ब्रह्म समाज’ की स्थापना, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी का जन्म (7 दिसम्बर)। लॉर्ड लिटन द्वारा इंग्लैंण्ड से आयातित सूती माल पर आयात कर हटाया गया।
    1880 दुर्भिक्ष आयोग’ (अकाल आयोग) की स्थापना। अफ़ग़ानिस्तान के प्रति ब्रिटिश नीति में परिवर्तन। पट्टाभि सीतारामैया का जन्म (24 दिसम्बर), मनी आर्डर सेवा प्रारम्भ
    1881 नियमित जनगणना , प्रथम फैक्टरी अधिनियम बना,पहला फैक्ट्री अधिनियम। मैसूर राज्य उसके मूल शासकों को सौंपा गया। ‘ट्रबियून’, ‘केसरी’ तथा ‘मराठा’ का प्रकाशन।।
    1882 ‘वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट’ निरस्त। ‘हंटर आयोग’, ‘भारतीय शिक्षा आयोग’, ‘पंजाब विश्वविद्यालय’ की स्थापना। सूरत में ‘प्रजाहितवर्धक सभा’ का गठन, पुरुषोत्तम दास टंडन का जन्म।
    1883 ‘इल्बर्ट बिल’ गवर्नर-जनरल की विधान परिषद् में प्रस्तुत। ‘भारतीय राष्ट्रीय सम्मेलन’ का आयोजन।, अकाल सहिंता,अजमेर में स्वामी दयानद सरस्वती की मृत्यु ।
    1884 केशवचन्द्र सेन की मृत्यु (8 जनवरी)। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का जन्म (3 दिसम्बर)। मद्रास में ‘महाजन सभा’ स्थापित।
    1885 भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की बम्बई में स्थापना, बंगाल टेनेंसी एक्ट पारित हुआ, आंग्ल-बर्मा युद्ध। ‘बम्बई प्रेसीडेन्सी एसोसिएशन’ की स्थापना।।
    1886 केशवचन्द्र सेन द्वारा ‘भारतीय ब्रह्म समाज’ की स्थापना। गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म। ‘ईस्ट इंडिया एसोसिएशन’ की स्थापना तथा बाद में ‘लन्दन इंडिया सोसाइटी’ का इसमें विलेय रामकृष्ण परमहंस की मृत्यु। कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन में पंजाब के प्रतिनिधि लाला मुरलीधर का हिन्दी में भाषण( कांग्रेस के मंच से हिन्दी में यह पहला भाषण था)।
    1887 महारानी विक्टोरिया के शासनकाल की स्वर्ण जयन्ती। ‘इलाहाबाद विश्वविद्यालय’ की स्थापना। शिवनारायण अग्निहोत्री द्वारा ‘देव समाज’ की स्थापना।
    1888 कर्नल थियोडोर बैंक द्वारा ‘यूनाइटेड इंडियन पैट्रियॉटिक एसोसिएशन’ की स्थापना।
    1889 प्रिंस ऑफ वेल्स की दूसरी भारत यात्रा, जमनालाल बजाज, खुदीराम बोस तथा जवाहरलाल नेहरू का जन्म।
    1891 ‘द्वितीय फैक्ट्री अधिनियम’। सहवास वर्ष अधिनियम (एज ऑफ़ कॉनसेन्ट एक्ट), मणिपुर में विद्रोह, डॉ. भीमराव अम्बेडकर का जन्म (14 अप्रैल)।
    1892 ब्रिटिश संसद द्वारा भारतीय परिषद अधिनियम पारित, चुनाव की प्रणाली निर्धारत।
    1893 एनी बेसेन्ट का भारत आगमन, स्वामी विवेकानद ने प्रथम विश्व धर्म सम्मलेन में भाग लिया ।
    1894 नटाल (दक्षिण अफ़्रीका) में ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ की स्थापना (कांग्रेस के लाहौर (1893) अधिवेशन से प्रभावित होकर)।
    1895 बाल गंगाधर तिलक ने शिवाजी उत्सव मनाया।
    1896 वर्तमान पाकिस्तान व अफगानिस्तान के ड्यूरेंड रेखा निर्धारण, बम्बई में प्लेग।
    1897 भारतीय शिक्षा सेवा का गठन, लोकमान्य तिलक को शिवाजी से सम्बोधित देश के भक्ति के पद्य लिखने के आरोप में 18 माह की कड़ी क़ैद, स्वामी विवेकानद द्वारा राम कृष्ण मिशन की स्थापना, सुभास बोष का जन्म , प्रथम जल विद्युत् गृह दार्जलिंग ।
    1898 ऐनी बेसेंट द्वारा बनारस में सेंट्रल हिन्दू कॉलेज की स्थापना ,’प्रार्थना समाज’ (बम्बई) द्वारा एक दलित वर्ग मिशन प्रारम्भ।
    1899-1905 लॉर्ड कर्जन वायसराय।
    1900 मुंडा विद्रोह,भूमि स्वामित्व-परिषद् अधिनियम, दुर्भिक्ष आयोग, कांग्रेस के मंच से पहली महिला श्रीमती कादम्बिनी गांगुली का भाषण।
    1901 महात्मा गाँधी ने पहली बार कांग्रेस अधिवेशन में भाग लिया,महारानी विक्टोरिया की मृत्यु, एडवर्ड सप्तम सिंहासनारूढ़, उत्तर-पश्चिम सीमा प्रान्त का गठन।
    1902 लार्ड कर्जन के पुलिस आयोग का गठन , प्रथम जल विद्युत् केंद्र शिव समुद्रम
    1903 गाँधी ने इंडियन ओपनियन नामक पत्र निकाला
    1904 भारतीय विश्वविद्यालय एक्ट पारित, पुरातत्व विभाग का गठन, नासिक में मित्र मेला संगठन, डाबरन में गाँधी का फीनिक्स फॉर्म की स्थापना,जतीन्द्रदास का जन्म।
    1905 बंगाल का विभाजन, रेलवे बोर्ड की स्थापना, लॉर्ड मार्ले भारतीय मामलों के सचिव नियुक्त।
    1906 कांगेस (कलकत्ता अधिवेशन) मंच से दादाभाई नौरोजी द्वारा ‘स्वराज’ शब्द का पहली बार प्रयोग। ढाका में ‘मुस्लिम लीग’ की स्थापना।
    1907 सूरत अधिवेशन’ में कांग्रेस विभाजित। एनी बेसेन्ट ‘थियोसॉफिकल सोसायटी’ की अध्यक्ष बनी। ‘टाटा इस्पात कारखाने’ से इस्पात का उत्पादन प्रारम्भ।
    1908 खुदीराम बोस को फाँसी, तिलक पर राजद्रोह केस तथा तिलक को 6 वर्ष का कारावासा, गाँधीजी को सत्याग्रह करने के लिए सबसे पहले जेल हुई,’समाचार पत्र अधिनियम’,सबसे कम उम्र वाले क्रांतिकारी खुदीराम बोस को फाँसी, तिलक पर राजद्रोह का मुकदमा।।
    1909 मॉलें मिण्टो सुधार, दक्षिण अफ़्रीका जाते हुए जहाज़ पर गाँधी जी ने ‘हिन्दी स्वराज’ नामक पुस्तक लिखी।। भारतीय परिषद् अधिनियम पारित।
    1910 गाँधी द्वारा जॉहन्सबर्ग में टॉलस्टॉय की स्थापना,एडवर्ड तृतीय की मृत्यु, जॉर्ज पंचम सिंहासनारूढ़।
    1911 द्वितीय दिल्ली दरबार’, सम्राट जॉर्ज पंचम का भारत आगमन ,बंगाल विभाजन रद्द, राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानान्तरित, मुंबई में गेटवे ऑफ़ इंडिया का निर्माण ।
    1912 दिल्ली राजधानी बनायी गयी, लॉर्ड हार्डिंग दिल्ली में बम विस्फोट में घायल। जवाहर लाल नेहरू पहली बार कांग्रेस अधिवेशन (बांकीपुर) में उपस्थित। ‘इंस्लिंग्टन कमीशन’ का गठन। अबुलकलाम आज़ाद द्वारा ‘अल-हिलाल’ अख़बार प्रकाशित।
    1913 सैन फ्रांसिस्को में गदर पार्टी का गठन, रवीन्द्रनाथ टैगोर को साहित्य का नोवेल पुरस्कार मिला, फ़िरोजशाह मेहता द्वारा ‘द बम्बई क्रॉनिकल’ की शुरुआत, सैन फ़्राँसिस्को में ‘ग़दर पार्टी’ का गठन।।
    1914 प्रथम विश्व युद्ध प्रारम्भ, तिलक माण्डले जेल से रिहा, ताना भगत आंदोलन, ‘फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट’ की स्थापना। पनामा नहर की शुरुआत, एनी बेसेन्ट द्वारा ‘न्यू इंडिया’ प्रकाशित।
    1915 गाँधीजी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे, एनीवेसेण्ट ने मद्रास में होमरूल लीग का गठन (25 सितम्बर), गाँधी जी को कैसर-ए-हिन्द की उपाधि दी, भारतीय सुरक्षा अधिनियम’,अहमदाबाद में ‘सत्याग्रह आश्रम’ की स्थापना. गोपालकृष्ण गोखले का निधन।
    1916 लोकमान्य तिलक द्वारा ‘होमरूल लीग’ की स्थापना (26 अप्रैल)। कांग्रेस-मुस्लिम लीग के बीच ‘लखनऊ समझौता’। पूना में प्रथम महिला विश्वविद्यालय की स्थापना। ‘बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय’ की स्थापना। दादाभाई नौरोजी का निधन।
    1917 मॉण्टेग्यूचेम्सफोर्ड सुधार, शिक्षा के लिए सैडलर आयोग का गठन,रूस की क्रांति, गाँधी जी द्वारा ‘चम्पारन सत्याग्रह’ आरम्भ, होमरूल आंदोलन के सिलसिले में एनी बेसेन्ट बंदी, शिक्षा से सम्बन्धित ‘सैडलर आयोग’ की नियुक्ति,रौलट एक्ट कमेटी का गठन,अमेरिका विश्व युद्ध में शामिल हुआ।
    1918 प्रथम युद्ध की समाप्ति, रासबिहारी बोस की अध्यक्षता में ‘बंगीय जनसभा’ की स्थापना। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी की अध्यक्षता में बम्बई में ‘ऑल इंडिया मॉडरेट कांफ्रेंस’ आयोजित। गाँधी जी के द्वारा अहमदाबाद कपड़ा मजदूरों की मांग के समर्थन में सत्याग्रह के रूप में पहली बार भूख हड़ताल का प्रयोग किया गया। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ‘नेशनल लिबरल लीग’ के अध्यक्ष निर्वाचित।
    1919 जलियांवाला बाग़ नरसंहार, रौलेट एक्ट पारित, रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा सर की उपाधि वापस, मॉण्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार अधिनियम पारित, नवजीवन नामक दैनिक पत्र व यंग इंडिया नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन, ख़िलाफत कमेटी की स्थापना। रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा सर की उपाधि वापस। बम्बई में मिल मजदूरों का पहला सम्मेलन, एनी बेसेन्ट की अध्यक्षता में दिल्ली में पहला ‘अखिल भारतीय महिला सम्मेलन’ आयोजित, तृतीय अफ़ग़ान युद्ध, ‘भारतीय सरकार अधिनियम-1919’ पारित।
    1920 असहयोग तथा खिलाफत आन्दोलन प्रारम्भ, गाँधीजी ने कैसर-ए-हिन्द की उपाधि लौटाई, अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना, अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन की स्थापना,तिलक की मृत्यु, हण्टर कमेटी की रिपोर्ट प्रकाशित।
    1921 प्रिंस आफ़ वेल्स एडवर्ड की भारत यात्रा, मानवेन्द्र नाथ द्वारा भारतीय साम्यवादी दल की स्थापना, ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ प्रस्ताप पारित (4 नवम्बर), मोपला विद्रोह (20 नवम्बर),विजयवाड़ा अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी’ सम्मेलन में तिलक स्वराज कोष के लिए एक करोड़ रुपये एकत्रित करने का निर्णय (1 अप्रैल),भारत सरकार अधिनियम 1919 लागू,हड़प्पा में उत्खनन प्रारम्भ ।
    1922  विश्व भारती विश्व विद्यालय की स्थापना,कलकत्ता में ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ आरम्भ (15 जून)। चौरी-चौरा कांड (5 फ़रवरी)। बारदोली में कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन ‘स्थगित करने का निर्णय (12 फ़रवरी)। कांग्रेस द्वारा सामूहिक ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ स्थगित (31 दिसम्बर)। मोतीलाल नेहरू तथा चितरंजन दास द्वारा ‘स्वराज पार्टी’ की स्थापना। मांटेग्यू का इस्तीफ़ा।
    1922-23 इंग्लैंड व भारत दोनों जगह सिविल सेवा परीक्षा शुरू
    1923 स्वराज पार्टी की स्थापना,मदन मोहन मालवीय द्वारा ‘इंडियन पार्टी’ की स्थापना। बम्बई में कपड़ा मजदूरों की ‘गिरनी कामग़ार यूनियन’ स्थापित। ‘हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएसन’ की स्थापना। नमक-कर क़ानून पारित,कमाल पाशा द्वारा तुर्की को धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित करने से ख़िलाफ़त आंदोलन स्वतः समाप्त।
    1924 कानपुर षड्यन्त्र केस, गाँधी जी पहली बार एवं अन्तिम बार कांग्रेस अध्यक्ष (बेलगाँव)
    1925 काकोरी काण्ड, अखिल भारतीय दलित वर्ग एसोसिएशन की स्थापना, कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना (27 सितम्बर, 1925 को नागपुर में RSS की स्थापना हुई थी) , गाँधी जी ने अपनी आत्मकथा लिखी(29 नवंबर), अखिल भारतीय दलित वर्ग एसोसिएशन’ की स्थापना, अंतरविद्यालय बोर्ड गठित,’अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी’ की कार्यवाहियों के लिए हिन्दुस्तानी भाषा की स्वीकृति (26 दिसम्बर),चितरंजन दास का निधन, विट्ठलभाई पटेल विधानसभा में प्रथम भारतीय अध्यक्ष नियुक्त.लॉर्ड लिटन द्वितीय स्थानापन्न वायसराय।
    1926 ट्रेड यूनियन एक्ट पारित, लोकसेवा आयोग की स्थापना, दिल्ली में ‘आल इंडिया प्रोहिबेशन लीग’ (अखिल भारतीय नशाबन्दी लीग) की स्थापना (31 जनवरी),गाँधी जी द्वारा गुवाहाटी अधिवेशन में स्वाधीनता प्रस्ताव का विरोध (26 दिसम्बर)।
    1927 साइमन कमीशन की नियुक्ति, अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की स्थापना, ‘भारतीय नौसेना अधिनियम’, कांग्रेस के मद्रास अधिवेशन में स्वतंत्रता के लक्ष्य की घोषणा,’मुस्लिम लीग’ का विभाजन (29 दिसम्बर),भारत में रेडियो का प्रसारण ।
    1928 हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक पार्टी की स्थापना, नेहरू रिपोर्ट, साइमन कमीशन भारत आया, लाला लाजपतराय की मृत्यु।
    1929 लाहौर जेल में जतिन दस की 64 दिन भूख हड़ताल से मौत , लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में नेहरू द्वारा पूर्ण-स्वराज का प्रस्ताव पारित, शारदा एक्ट पारित,लाहौर में कांग्रेस के 44वें अधिवेशन में जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में स्वराज्य का प्रस्ताव पारित (29 दिसम्बर)। 31 दिसम्बर की मध्यरात्रि के समय पंडित नेहरू ने रावी तट पर तिरंगा फहराया।।
    1930 सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ, 26 जनवरी को स्वाधीनता दिवस के रूप में मनाने का आह्वान,अखिल भारतीय कांग्रेस पार्टी’ द्वारा ‘सविनय अवज्ञा (नमक) आंदोलन’ का कार्यक्रम स्वीकृत (19 फ़रवरी), ‘डांडी यात्रा’ आरम्भ (12 मार्च), नमक क़ानून तोड़ा गया (6 अप्रैल), 28 मार्च को ‘आनन्द भवन’ देश को समर्पित तथा 11 अप्रैल को ‘स्वराज भवन’ के रूप में नामकरण, सुभाषचन्द्र बोस कलकत्ता नगर निगम के मेयर निर्वाचित (22 अगस्त), सी. वी. रमन को भौतिकी का नोबेल पुरस्कार (14 नवम्बर)। ‘प्रथम गोलमेज सम्मेलन’ लन्दन में, कांग्रेस कार्यसमिति ग़ैरक़ानूनी घोषित (25 अगस्त)।
    1931 गाँधी-इर्विन पैक्ट, कांग्रेस कार्यसमिति पर से प्रतिबंध हटा (26 जनवरी), लखनऊ में मोतीलाल नेहरू का निधन (5 फ़रवरी), इलाहाबाद में पुलिस मुठभेड़ में चन्द्रशेखर आज़ाद की मृत्यु (27 फ़रवरी), ‘गांधी-इरविन समझौता’ (मार्च), लाहौर में रावी तट पर भगत सिंह, राजगुरु तथा सुखदेव को फाँसी (23 मार्च), शोक स्वरूप गाँधी जी को कराची अधिवेशन में युवा क्रान्तिकारियों द्वारा काले फूल भेंट (31 मार्च), बम्बई कांग्रेस हाउस में सरोजिनी नायडू द्वारा ‘राष्ट्रीय झंडा दिवस’ का उदघाटन (26 अप्रैल), कांग्रेस कार्यसमिति की ओर से गांधीजी को गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस का प्रतिनिधि नियुक्त किया गया (10 जून), गांधीजी द्वारा प्रस्तावित चरखा युक्त झंडा राष्ट्रीय कांग्रेस का ध्वज बना (1 अगस्त), संयुक्त प्रान्त में लगान-रोको आंदोलन (11 दिसम्बर), रॉयल लेबर कमीशन की रिपोर्ट प्रकाशित।
    1932 देहरादून में राष्ट्रीय सेना अकादमी की स्थापना, ‘मेरठ षड़यंत्र केस’ के 27 अभियुक्तों को सज़ा (16 जनवरी), गाँधी जी द्वारा व्यक्तिगत सत्याग्रह आरम्भ (26 जून), एनी बेसेन्ट का देहान्त (20 सितम्बर), पहली बार ‘पाकिस्तान’ शब्द का प्रयोग। गांधीजी द्वारा साप्ताहिक ‘हरिजन’ की शुरुआत, रैम्जे मैक्डोनल्ड द्वारा 16 अगस्त को ‘साम्प्रदायिक निर्णय’ की घोषणा, 24 सितम्बर को गांधीजी और अम्बेडकर के मध्य ‘पूना समझौता’ सम्पन्न।
    1933 प्रस्तावित सुधारों पर श्वेतपत्र जारी, संयुक्त चयन समिति का गठन।
    1934 कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की पटना में स्थापना, सविनय अवज्ञा आन्दोलन वापस, बिहार में भूकंप, फैक्टरीज एक्ट लागू, रॉयल इंडियन नेवी की स्थापना, गाँधी जी ने अखिल भारतीय ग्रामोद्योग की स्थापना,आचार्य नरेन्द्र देव की अध्यक्षता में ‘कांग्रेस समाजवादी पार्टी’ के गठन की घोषणा (17 मई), कांग्रेस चुनाव घोषणा पत्र प्रकाशित (14 जून), गाँधी जी कुछ समय के लिए कांग्रेस से अलग (17 सितम्बर) ।
    1935 भारत सरकार अधिनियम-1935′ पारित (अगस्त)। भारत-ब्रिटेन व्यापार समझौता। गाँधी जी के साथी तथा ‘सत्याग्रह आंदोलन’ में जेल जाने वाले प्रथम व्यक्ति मोहन लाल पाण्ड्या का निधन (18 मई)। गाँधी जी द्वारा मीरा बेन के लिए वर्धा के पास सेवा गाँव के आश्रम (सेवाश्रम) की स्थापना (22 अक्टूबर), सुभाष चंद्र बोस ने द इंडियन स्ट्रगल नामक पुस्तक लिखी, रिजर्व बैंक की स्थापना। ।
    1936 सम्राट जार्ज V की मृत्यु, एडवर्ड VIII का राज्यारोहण, ऑल इंडिया रेडियो का गठन, गाँधी जी ने सेवाग्राम आश्रम बनाया ,आंबेडकर द्वारा इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी का गठन
    1937 संघीय न्यायालय’ की स्थापना (1 अक्टूबर), प्रान्तीय स्वशासन की शुरुआत, ,प्रथम आम चुनाव तथा नवीन प्रान्तीय सरकारें, हिन्दू महिला सम्पति कानून, सुभास चंद्र बोस का विवाह
    1938 सुभाष चन्द्रबोस कांग्रेस अध्यक्ष चुने गए, बी. डी. सावरकर ‘हिन्दू महासभा’ के अध्यक्ष निर्वाचित, शरतचन्द्र चटर्जी तथा मोहम्मद इक़बाल की मृत्यु।
    1939 ‘त्रिपुरी अधिवेशन’ में सुभाषचन्द्र बोस कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर दुबारा निर्वाचित तथा बाद में त्यागपत्र (28 अप्रैल), बोस द्वारा ‘फारवर्ड ब्लाक’ की स्थापना (3 मई), द्वितीय विश्वयुद्ध आरम्भ (3 सितम्बर), विश्वयुद्ध में भारत को बिना इजाज़त शामिल करने के विरोधस्वरूप प्रान्तीय कांग्रेस मंत्रिमण्डलों का त्यागपत्र, जिन्ना द्वारा कांग्रेस शासन से मुक्ति के लिए 22 दिसम्बर को ‘मुक्ति दिवस’ के रूप में मनाने का आह्वान (8 अक्टूबर)।
    1940 मौलाना अबुलकलाम आज़ाद कांग्रेस अध्यक्ष, ‘मुस्लिम लीग’ के लाहौर अधिवेशन में जिन्ना द्वारा मुस्लिमों के लिए पृथक देश की मांग (22 मार्च), कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा गाँधी जी का व्यक्तिगत सत्याग्रह स्वीकृत (13 अक्टूबर), विनोबा भावे पहले व्यक्तिगत सत्याग्रही।
    1941 जापान द्वारा युद्ध की घोषणा,अमेरिका द्वितीय विश्व युद्ध में शामिल (7 दिसंबर), जिन्ना द्वारा पाकिस्तान की परिकल्पना पर कांग्रेस की स्वीकृति की मांग (17 अप्रैल)। सुभाषचन्द्र बोस नज़रबन्दी से भागकर कलकत्ता से जर्मनी पहुँचे, रवींद्र नाथ टैगोर की मृत्यु ।
    1942 बर्मा में अंग्रेज़ों का आत्मसमर्पण, ‘अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी’ के ‘बम्बई अधिवेशन’ में ‘अंग्रेज़ों भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पारित तथा देशव्यापी आंदोलन शुरू (8 अगस्त),आजाद हिंदी फ़ौज का गठन ।
    1943 सुभाष चन्द्र बोस द्वारा स्वतंत्र भारत की सरकार का गठन तथा भारतीय राष्ट्रीय सेना बनायी,’मुस्लिम लीग’ ने अपने ‘कराची अधिवेशन’ में ‘डिवाइड एंड क्किट’ (बाँटों और छोड़ो) स्लोगन को पारित किया।
    1944 असम पर जापानी आक्रमण, आजाद हिन्द फौज मणिपुर के नजदीक पहुँची।
    1945  ब्रिटेन में लेबर पार्टी की सरकार, जापान में परमाणु बम गिराया,द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति। लॉर्ड वेवेल की घोषणा, ‘आज़ाद हिन्द फ़ौज’ का आत्मसमर्पण तथा उन पर पहली बार मुकदमा, लॉर्ड वेवेल की घोषणा, शिमला समझौता, हिटलर ने आत्महत्या की ।
    1946 नौसेना विद्रोह(18 फ़रवरी) ,कैबिनेट मिशन भारत आया, अंतरिम सरकार का गठन, संविधान सभा की प्रथम बैठक, 16 अगस्त को मुस्लिम लीग द्वारा ‘सीधी कार्यवाही दिवस’ मनाया गया, 2 सितंबर को अंतरिम सरकार गठित, नोआखाली एवं टिपरा में 14 अक्टूबर को सांप्रदायिक दंगे, 25 अक्टूबर को बिहार में दंगे, 26 अक्टूबर को मुस्लिम लीग का अंतरिम सरकार में विलय, 9 दिसंबर को सविधान सभा का प्रथम सत्र,जवाहर लाल नेहरू प्रधानमंत्री नियुक्त, कैबिनेट मिशन योजना की घोषणा (16 जून)।
    1947 ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली द्वारा जून 1948 तक भारत छोड़ने का निर्णय, लॉर्ड माउंटबेटन द्वारा 15 अगस्त, 1947 को सत्ता हस्तान्तरित किया जाना,14 अगस्त को पाकिस्तान बना तथा 15 अगस्त को भारत स्वाधीन, भारतीय स्वाधीनता अधिनियम’ 4 जुलाई, 1947 को संसद में पेश, भारत-पाक विभाजन प्रस्ताव पारित, जवाहर लाल नेहरू प्रधानमंत्री बने, सविंधान सभा ने राष्टीय ध्वज अपनाया ।
    1948 महात्मा गाँधी की दिल्ली में हत्या, जिन्ना की मृत्यु, भारतीय सेना द्वारा हैदराबाद की मुक्ति, भारत में प्रथम औद्योगिक नीति की घोषणा,ऑपरेशन पोलो ।
    1949 रिजर्व बैंक का राष्ट्रिय एकीकरण
    1950 भारतीय संविधान लागू हुआ, राजेन्द्र प्रसाद राष्ट्रपति चुने गए, राष्ट्र गान जन गण मन अपनाया, भारत रेल का राष्ट्रीयकरण ।
    1951 प्रथम पंचवर्षीय योजना की शुरुआत।
    1952 प्रथम आम चुनाव सम्पन्न,प्रथम राज्य सभा का गठन
    1953 राज्य पुनर्गठन आयोग की स्थापना
    1954 चीन और भारत में पंचशील समझौता, भारतीय साहित्य अकादमी की स्थापना ।
    1955 अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की आवड़ी (चेन्नई) अधिवेशन में समाजवादी समाज का लक्ष्य स्वीकार, भारतीय नागरिकता अधिनियम ।
    1956 भारत में दूसरी औद्योगिक नीति की घोषणा, राज्य पुनर्गठन अधिनियम
    1957 दूसरे आम चुनाव, ऑल इंडिया रेडियो का नाम आकाशवाणी रखा ।
    1959 भारत में दूरदर्शन की शुरुआत, दुनिया का प्रथम चंद्र अभियान (रूस) ।
    1958 माप और तोल की मीट्रिक प्रणाली का प्रारम्भ
    1960 महाराष्ट्र और गुजरात राज्यों का बनना, भारत व पाक के बीच सिंधु जल समझौता ।
    1961 गोवा स्वतन्त्र हुआ, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान व NCERT की स्थापना ।
    1962 भारत पर चीन का आक्रमण।
    1963 डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की मृत्यु।
    1964 पं. जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु।
    1965 भारत-पाकिस्तान युद्ध,दूरदर्शन में हिंदी समाचार प्रसारण की शुरुआत ।
    1966 ताशकन्द समझौता, प्रधानमंत्री लालबहादुर पालिकाल वह काल, जिसक लिए कोई लिपि शास्त्री की मृत्यु।
    1966-67 हरित क्रांति का आरम्भ
    1968 मद्रास का नाम तमिलनाडु
    1972 पिनकोड प्रणाली की शुरुआत
    1973 मैसूर राज्य का नाम बदलकर कर्नाटक
    1974 भारत के पहला परमाणु परिक्षण जैसलमेर में
    1975 क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक की स्थापना
    1982 ब्रिटेन में भारत महोत्सव का आयोजन
    1984 राकेश शर्मा चाँद पर पहुंचा , भोपाल गैस काण्ड
    1986 MTNL की स्थापना , स्पीड पोस्ट सेवा आरम्भ
    1988 राष्ट्रीय साक्षरता मिशन प्रारम्भ
    1991 राजीव गाँधी की हत्या
    1992 बाबरी मस्जिद ढांचा को गिराया गया
    1993 FM रेडियो की स्थापना
    1999 भारत और बांग्लादेश के बीच बस सेवा
  • इतिहासकालीन प्रमुख तथ्य

    📚 विषय सूची

    भारत का नाम इंडिया कैसे पड़ा

    ➣ इण्डिया शब्द इण्डस से निकला है, जिसे संस्कृत में सिन्धु कहा जाता है।

    ➣ भारतवर्ष नाम सर्वप्रथम पाणिनी की अष्टाध्यायी में आया है।

    ➣ भारत देश का यह नामकरण ऋग्वैदिक काल के प्रमुख जन भरत के नाम पर किया गया।

    ➣ वैदिक काल में उत्तरी भारत को आर्यावर्त कहा जाता था। और दक्षिण भारत को दक्षिणापथ कहा जाता था।

    ➣ जैन कथाओं के अनुसार देश का यह नाम प्रथम जैन तीर्थकर ऋषभदेव के बड़े पुत्र का नाम भारत था जो प्रतापी व शक्तिशाली राजा थे।

    ➣ पौराणिक कथाओं के अनुसार पौरूव वंश के राजा दुष्यन्त एवं शकुन्तला के पुत्र भरत के नाम पर दिया गया था। ब्राह्मण ग्रंथों में इस देश को भारतवर्ष कहा गया है।

    विष्णुपुराण में समुद्र के उत्तर और हिमालय के दक्षिण में जो देश स्थित हैं। उसका नाम भारत है क्योंकि यहां भारती संतति (भारत की प्रजाति) निवास करती है। भागवत पुराण में इस देश को अजनाभवर्ष की संज्ञा दी गयी थी।

    ➣ भारत को जम्बूद्वीप का एक भाग भी माना जाता है। बौद्ध ग्रन्थों में जम्बूद्वीप उस भू-भाग को कहा गया है, जहां ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में मौर्य वंश का शासन था।

    ➣ यूनानियों ने भारतवर्ष के लिए इण्डिया शब्द का प्रयोग किया जबकि मध्यकालीन लेखकों ने इस देश को हिन्द अथवा हिन्दुस्तान नाम से सम्बोधित किया। यह शब्द भी फारसी शब्द हिंदू (Hindu) से बना है।

    ➣ यूनानी भाषा के इंदे के आधार पर अंग्रेज इसे इंडिया कहने लगे। देश का र्वतमान नाम भारत भी प्राचीन काल से प्रचलित रहा है। इसका अर्थ भरतों का देश है। भरत एक प्राचीन कबीले का नाम था।

    भारतवर्ष का सर्वप्रथम उल्लेख हाथी गुम्फा अभिलेख में मिलता है।

    हिंदुस्तान शब्द उल्लेख सर्वप्रथम 262 ई. के सासानी अभिलेख में मिलता है।

    ➣ भारत के संविधान अनुच्छेद-1 में (भारत अर्थात् इंडिया राज्यों का संघ होगा-India, that is Bharat shall be a Union of State) स्पष्ट किया गया है।

    इतिहास के जन्मदाता कौन हैं

    हेरोडोटस (Herodotus), यूनान का प्रथम इतिहासकार व भूगोलवेत्ता था। हेरोडोटस का संस्कृत नाम हरिदत्त था।

    हेरोडोटस हिस्ट्री (History) शब्द के प्रथम प्रयोगकर्ता थे। इन्होंने वास्तविक इतिहास लेखन की नींव रखी थी।

    ➣ रोमन दार्शनिक सिसरो ने हेरोडोटस को इतिहास का जनक/पिता (Father of History) की संज्ञा दी थी।

    ➣ इन्हो ने अपने इतिहास का विषय पेलोपोनेसियन युद्ध को बनाया था। इनकी हेरोडोटस प्रसिद्ध पुस्तक हिस्टोरिका (Historica) थी।

    प्रागैतिहासिक पुरातत्व के जनक

    ➣ भारत में पुरापाषाण काल से संबंधित पुरातात्विक खोज को शुरू करने का श्रेय रॉबर्ट ब्रूस फूट को दिया जाता है।

    ➣ भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण के रॉबर्ट ब्रूस फूट ने वर्तमान तमिलनाडु राज्य के चिंगलपुट जिला के पल्लवरम (चेन्नई/मद्रास के निकट) नामक पुरास्थल से 30 मई, 1863 ई. को लैटेराइट मिट्टी के जमाव से हस्त कुठार खोज निकाला था।


    रॉबर्ट ब्रूस फूट को भारत में प्रागैतिहासिक पुरातत्व का जनक कहा जाता है।

    भारतीय पुरातत्व के जनक

    ➣ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ब्रिटिश पुरातत्वशास्त्री विलियम जोन्स द्वारा 15 जनवरी, 1784 को स्थापित एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल (कोलकाता) का उत्तराधिकारी थे।

    1788 में इनका पत्र द एशियाटिक रिसर्चेज प्रकाशित होना आरंभ हुआ था और 1814 में यह प्रथम संग्रहालय बंगाल में बना।

    ➣ ASI अपने वर्तमान रूप में 1861 में ब्रिटिश शासन के अधीन सर अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा तत्कालीन वायसराय चार्ल्स जॉन कैनिंग की सहायता से स्थापित हुआ था।

    ➣ पुरातत्व के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए सर अलेक्जेंडर कनिंघम कनिंघम को भारतीय पुरातत्व का जनक (Father of Indian Archaeology) कहा जाता है।

    ➣ 1944 में, जब मॉर्टिमर व्हीलर महानिदेशक बने, तब इस विभाग का मुख्यालय, रेलवे बोर्ड भवन शिमला में स्थित था।

    ➣ यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण पर्यटन एवं संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करता है।

    C-14 निर्धारण विधि क्या है

    ➣ सभी सजीव वस्तुओं में एक प्रकार का रेडियोधर्मी कार्बन होता है, जिसे कार्बन-14 कहते हैं।

    ➣ कार्बन डेटिंग प्रणाली का विकास बिलार्ड फ्रैंक लिब्बी द्वारा 1940 ई. में किया गया था। इनको 1960 ई. में इस खोज के लिए नोबल पुरस्कार प्रदान किया था।

    ➣ जीवित अवस्था में मनुष्य, पशु-पक्षी व पौधे वायुमंडल से कार्बन-14 लेते हैं और उतनी ही मात्रा में रेडियोधर्मिता के कारण उसमें ह्रास होता रहता है।

    ➣ मृत होने पर वे नया कार्बन नहीं लेते परंतु उसे एक निश्चित दर से ह्रास होते रहते हैं।

    ➣ किसी वस्तु में निहित कार्बन-14 (C14) की मात्रा को ज्ञात करने की प्रक्रिया को रेडियो कार्बन-14 निर्धारण विधि या कार्बन डेटिंग कहते हैं।

    ➣ जब कोई वस्तु जीवित रहती है तो कार्बन ग्रहण करती है। कार्बन के समस्थानिको में कार्बन-12 रेडियोधर्मी नहीं होता है जबकि कार्बन-14 रेडियोधर्मी होता है।

    ➣ जीवित पेड़-पौधों व जन्तुओं में C12 व C14 दोनों समान अनुपात में पाये जाते हैं। जब पेड़-पौधे व जीव-जन्तु मर जाते हैं तब C12 की मात्रा यथावत स्थिर रहती है| लेकिन C14 की मात्रा क्रमशः कम होने लगती है।

    ➣ जब वस्तु निष्प्राण हो जाती है तब इसमें विद्यमान C में आई कमी को माप कर उसके समय का निर्धारण किया जा सकता है। यह इसलिए सम्भव है क्योंकि C14 का आधा जीवन 5568 वर्षों का होता है।

    ➣ इस प्रकार वस्तु का भार 5568 वर्षों पहले निष्प्राण हो गई तो उसकी C. धारिता उस समय की तुलना में आधी रह जायेगी जब तक जीवित थी। जिस वस्तु में C14 की मात्रा जितनी ही कम पायी जाती है। वह उतनी ही प्राचीन मानी जाती है।

    ➣ कार्बन डेटिंग से 50 हजार वर्ष तक के जीवाश्मों की आयु आसानी से ज्ञात की जा सकती है। इससे पुरानी वस्तुओं की आयु ज्ञात करने के लिए यूरेनियम डेटिंग का प्रयोग होता है।

    नटराज की कांस्य प्रतिमा

    ➣ चोलवंश के अधिकांश शासक उत्साही शैव थे, अतः इस काल में शैव मूर्तियों का निर्माण ही अधिक हुआ। पाषाण मूर्तियों से भी अधिक धातु (कांस्य) मूर्तियों का निर्माण हुआ।

    ➣ सर्वाधिक सुंदर मूर्तियां नटराज (शिव) की है जो बहुत बड़ी संख्या में मिली है। ये मूर्तियां प्रायः चतुर्भुज है। जो कि चोल कला का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं।

    त्रिचनापल्ली के तिरुभरंगकुलम से नटराज की एक विशाल कांस्य प्रतिमा मिली है जो इस समय दिल्ली संग्रहालय में हैं। इसी जिले के तिरुवलनकडु से शिव के अर्द्धनारीश्वर रूप की एक मूर्ति मिलती तांबे की बनी नटराज (शिव) की प्रतिमा है जो मद्रास संग्रहालय में सुरक्षित है।

    ➣ इसमें नारी तथा पुरुष की शारीरिक विशेषताओं को उभारने में कलाकार को विशेष सफलता मिली है।

    ➣ इसके अतिरिक्त ब्रह्म, विष्णु, लक्ष्मी, भूदेवी, राम-सीता, कालियानाग पर नृत्य करते हुए बालक कृष्ण तथा कुछ शैव संतों की मूर्तियां भी प्राप्त होती हैं जो कलात्मक दृष्टि से भव्य एवं सुंदर है।

    बौद्ध स्तूप क्या है

    ➣ महात्मा बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनकी अस्थियों को 8 भागों में बांटा गया तथा उन पर समाधियों का निर्माण किया गया। इन्हे ही बौद्ध स्तूप कहा जाता है।

    ➣ स्तूप के निर्माण की प्रथा बुद्ध काल के पूर्व की है। स्तूप का शाब्दिक अर्थ किसी वस्तु का ढेर होता है। चूकि यह चिता के स्थान पर बनाया जाता था, अतः इसका एक नाम चैत्य भी हो गया।

    ➣ स्तूप का उल्लेख सर्वप्रथम ऋग्वेद में प्राप्त होता है जहां अग्नि की उठती हुई ज्वालाओं को स्तूप कहा गया हैं।

    ➣ बुद्ध के पहले ही स्तूप का सम्बन्ध महापुरूष के साथ जुड़ गया था। मौलिक रूप में स्तूप का संबंध मृतक संस्कार से था।

    ➣ शव-दाह के बाद बची हुई अस्थियों को किसी पात्र में रखकर मिट्टी से ढ़क देने की प्रथा से स्तूप का जन्म हुआ। कालांतर में बौद्धों ने इसे अपनी संघ-पद्धति में अपना लिया।

    ➣ इन स्तूपों में बुद्ध अथवा उनके प्रमुख शिष्यों की धातु रखी जाती थी। अत: वे बौद्धों की श्रद्धा व उपासना के प्रमुख केंद्र बन गये।

    4 प्रकार के स्तूप

    1. शारीरिक इनमें बुद्ध तथा उनके प्रमुख शिष्यों की अस्थियों तथा उनके शरीर के विविध अंग (दंत, नख, केश) रखे जाते थे। 2. पारिभौगिक इनमें बुद्ध द्वारा उपयोग में लाई गयी वस्तुयें (भिक्षा पात्र, चरण-पादुका, आसन) रखी जाती थी। 3. उद्देशिक इनमें वे स्तूप आते थे जिन्हें महात्मा बुद्ध के जीवन की घटनाओं से संबंधित अथवा उनकी यात्रा से पवित्र हुए स्थानों पर स्मृति रूप में निर्मित किया जाता था। ऐसे स्थल बोधगया, लुम्बिनी, सारनाथ, कुशीनगर में है। 4. संकल्पित ये छोटे आकार के होते थे और इन्हें बौद्ध तीर्थ स्थलों पर श्रद्धालुओं द्वारा स्थापित किया जाता था। बौद्ध धर्म में इसे पुण्य का काम बताया गया है।

    सांची का स्तूप

    मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के समीप सांची बौद्ध स्तूपों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यहां पहाड़ी पर मौर्य शासक अशोक ने विशाल स्तूप का निर्माण करवाया था।

    ➣ यह ईंटों का बना था जिसके चारों ओर लकड़ी की बाड़ लगी थी। सांची के दीर्घकाल तक बौद्धधर्म से संबंधित रहने के कारण इसका नाम चेतिया (चैत्यगिरि) प्रसिद्ध हुआ।

    ➣ अशोक द्वारा निर्मित महास्तूप शुंगकाल में पाषाण पट्टिकाओं से जड़ा गया। लकड़ी के स्थान पर पाषाण वेदिका बनाई गयी तथा चारो दिशाओं में 4 तोरण (Gateways) लगा दिये गये।

    ➣ बुद्ध के जीवन की घटनाओं व जातक कथाओं के चित्रों से भरे है और नीचे से ऊपर तक अलंकृत हैं इन पर सिंह, हाथी, धर्मचक्र, यज्ञ, त्रिरत्ल के चित्र खुदे हुए है।

    ➣ वेदिकाओं पर अंकित लेखों में दानकर्ताओं के नाम सुरक्षित है जिन्होंने स्मारकों के निर्माण में योगदान किया। इनमें शासक, भिक्षु, सामान्य जन सभी है।

    ➣ मुख्य स्तूप के दक्षिणी द्वार पर उत्कीर्ण लेख में सातवाहन शासक शातकर्णी का नाम है।

    गोमतेश्वर की मूर्ति

    कर्नाटक के हासन जिला के श्रवणबेलगोला में बिना किसी सहारे खड़ी पत्थर से निर्मित विश्व की ऊंची प्रतिमा स्थापित की गई है, जिसका निर्माण चामुंडराय (गंगसेनापति) ने करवाया था। गंग नरेश राजमल्ल IV के दरबार में मंत्री था।

    चंद्रगुप्त मौर्य (मौर्य वंश संस्थापक) को भ्रदबाहु (जैनगुरू) द्वारा सन्यास लेने के बाद शेष दिन यहा व्यतीत किये थे। गोमतेश्वर या बाहुबली जैन धर्म के प्रथम उपदेशक ऋषभदेव के पुत्र थे।

    ➣ गोमतेश्वर प्रतिमा (विध्यगिरि पर्वत) 17.5 मीटर ऊंची है यह एक बड़ी चट्टान को काटकर बनायी गई है।

    ➣ यह मूर्ति विजयनगर के शासकों भैरासा सामंतों द्वारा 1432 ई. में स्थापित की गई थी।

    ➣ प्रत्येक 12 वर्ष बाद इस मूर्ति को विधि-विधान से दूध-दही व घी से स्नान कराया जाता है। इस प्रक्रिया को महामस्तकाभिषेक कहते हैं।

    दास-प्रथा क्या थी

    ➣ भारत में दास-प्रथा की प्राचीनतम उल्लेख त्रग्वैदिक ग्रन्थ से प्राप्त होता है। उत्तर वैदिक साहित्य से भी दासों के विषय में वृहत जानकारी मिलती है।

    ऐतरेय ब्राह्मण एक ऐसे राजा का उल्लेख करता है जिसने अपने अभिषेक के समय दस हजार दासियों को उपहार स्वरुप पुरोहित को दिया था।

    ➣ हालाँकि मौर्य काल तथा गुप्तकाल, दोनों में दास प्रथा के प्रमाण मिले हैं।

    ➣ मौर्यकालीन शासक अशोक के अभिलेखों में भी दासों का उल्लेख मिलता है।

    अर्थशास्त्र में 5 प्रकार के दासों का उल्लेख है- उदरदास,आत्मविक्रयी , आत्माधाता, दण्डप्रणीतदाम , ध्वजाह्रत।

    मनुस्मृति में 7 प्रकार के दासों का उल्लेख किया गया है- ध्वजाह्रत , भक्तदास, गृहज, क्रीत, दत्त्रिम , पैत्रिक , दण्ड दास।

    नारद स्मृति में 15 प्रकार के दासों का उल्लेख किया गया है। दास मुक्ति के अनुष्ठान का विधान सर्वप्रथम नारद ने ही किया है।

    विज्ञानेश्वर ने मिताक्षरा में पन्द्रह प्रकार के दासों का उल्लेख मिलता है।

    ➣ भारत में ब्रिटिश शासन के समय 1843 ई. में इस प्रथा को बन्द करने के लिए एक अधिनियम पारित कर दिया गया था।

    ➣ चौथी शताब्दी ई. पू. भारत के विषय में मेगस्थनीज ने लिखा था कि भारतवर्ष में दास प्रथा नहीं है

    ➣ अशोक के अभिलेखों में दासों तथा सेवकों के प्रति उचित व्यवहार किये जाने का आदेश मिलता है। सम्भवत: प्राचीन भारत दासों की स्थिति प्राचीन रोम तथा यूनान के दासों की अपेक्षा बहुत अच्छी थी।

    सती प्रथा क्या थी

    अथर्ववेद से सती प्रथा की औपचारिकता पूरी करने के लिए पत्नी अपने पति के साथ चिता पर लेटती थी। जहाँ से उसके सम्बन्धी उसके उठने का आग्रह करते थे।

    वैदिक समाज में सती प्रथा प्रचलित नहीं थी।

    ➣ रामायण के मूल अंश में इसका उल्लेख नहीं मिलता , दशरथ तथा रावण की मृत्यु के पश्चात् उनकी पत्नियॉं के सती होने का उल्लेख नहीं मिलता। किन्तु उत्तरकाण्ड में वेदयंती की माता के सती होने का उल्लेख है।

    ➣ ब्राह्मण साहित्य , बौद्ध साहित्य एंव गृह सूत्रों से भी इसका उल्लेख नहीं मिलता।

    ➣ महाभारत में इस प्रथा का विस्तृत उल्लेख नहीं मिलता है, पाण्डु की मुत्यु बाद उनकी पत्नी माद्री सती हो गयी थी जबकि अभिमन्यु, घटोत्कच तथा द्रोण की पत्नियाँ सती नहीं हुई थीं।

    ➣ कौटिल्य के अर्थशास्त्र (मौर्यकाल) में सती प्रथा का कोई प्रमाण नहीं मिलता है किन्तु यूनानी लेखकों ने उत्तर-पश्चिम में सैनिकों की स्त्रियों के सती होने का उल्लेख किया है।

    ➣ दूसरी शताब्दी ई. के लगभग चेर शासक नेदुनजेरल आदन का चोल शासक पत्तिनी से युद्ध हुआ। जिसमे दोनों मारे गये फलस्वरूप दोनों की पत्नियां सती हो गयीं।


    ➣ पुराणों में सती होने का उल्लेख मिलता हैं। वात्स्यायन , भास् , कालिदास एंव शूद्रक जैसे विद्वानों ने इसका उल्लेख किया है।

    ➣ सती प्रथा का प्रथम अभिलेखीय प्रमाण गुप्तकाल में मिलता है। 510 ई. के ऐरण अभिलेख से पता चलता है कि, गुप्त नरेश भानुगुप्त का मित्र गोप राज (सैनिक) हूणों के विरुद्ध वीरगति को प्राप्त हुआ तत्प्श्चात उसके पत्नी के सती होने का उल्लेख है।

    ➣ गुप्त साम्राज्य के पश्चात पुष्यभूति वंश में हर्षवर्द्धन ने अपनी बहन राज्यश्री को अपने मित्र की सहायता से सती होने से बचा लिया था।

    ➣ इस प्रथा का अपने-अपने समय में कश्मीर के शासक सिकन्दर, पुर्तगाली गवर्नर अल्बुकर्क, मुगल सम्राट अकबर, पेशवाओं , लॉर्ड कार्नवालिस, लॉर्ड हैस्टिंग्स और लॉर्ड विलियम बैंटिक द्वारा विरोध किया गया।

    1829 ई. में भारत के गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बैंटिक द्वारा सती प्रथा को प्रतिबन्धित करने के लिये लाये गये कानून को लागू करवाने में राजा राम मोहन राय ने सरकार की मदद की थी। अंततः सती प्रथा को अवैध घोषित किया गया।

    तक्षशिला विश्वविद्यालय का इतिहास

    ➣ तक्षशिला गांधार साम्राज्य की राजधानी थी। यह नगर सिंधु और झेलम (Hydaspes) नदियों के बीच स्थित था। वर्तमान में यह पाकिस्तान के रावलपिण्डी से 18 मील उत्तर की ओर स्थित है।

    ➣ अध्ययन का एक प्रमुख केंद्र, तक्षशिला विश्वविद्यालय विश्व का प्रथम विश्वविद्यालय था, जिसकी स्थापना 700 ई.पू. में की गयी थी।

    ➣ यह समय नालन्दा विश्वविद्यालय से लगभग 1200 वर्ष पहले था।

    ➣ इस विश्वविद्यालय में पूरे विश्व के 10,500 से अधिक छात्र अध्ययन करते थे। इस में राजा और रंक सभी विद्यार्थियों के साथ समान व्यवहार होता था।

    ➣ यहां आयुर्वेद, भाषा, व्याकरण, दर्शनशास्त्र, चिकित्सा, शल्य चिकित्सा, कृषि, भूविज्ञान, ज्योतिष, खगोलशास्त्र, समाजशास्त्र, धर्म, तंत्रशास्त्र, मनोविज्ञान तथा योगविद्या आदि 60 से भी अधिक विषयों को पढ़ाया जाता था।

    ➣ तक्षशिला में भारत के किसी भी हिस्से आए छात्रों का नामांकन होता था और उनको निःशुल्क शिक्षा दी जाती थी। यहां सिर्फ चांडालों को पढ़ने की अनुमति नहीं थी। नागार्जुन, पाणिनी, चाणक्य, प्रसेनजित आदि यहां शिक्षा ग्रहण कर चुके हैं। चाणक्य ने यहां अध्यापन का भी कार्य किया।

    ➣ 500 ई.पू. में हूण शासक तोरमान ने यहां आक्रमण किया और विश्वविद्यालय परिसर को ध्वस्त कर दिया था। उधर सिकंदर ने तक्षशिला से कई विद्वानों को लेकर यूनान गया।

    धर्मचक्रप्रवर्तन क्या है

    ➣ ज्ञान प्राप्ति के पश्चात भगवान बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ, उत्तर प्रदेश में दिया, जिसे धर्मचक्रप्रवर्तन कहा जाता है।

    ➣ इस उपदेश में उन्होंने चार आर्यसत्य की व्याख्या की, जो हैं- 1. दु:ख, 2. समुदय या तृष्णा (दु:ख का कारण), 3. दु:ख का निरोध, 4. इसका मार्ग (प्रतिपदा)।

    ➣ बुद्ध के अनुसार, दु:ख के कारण के निरोध का मार्ग ‘मध्यमा प्रतिपदा’ है, जिससे मनुष्य भोग और तप की सीमाओं को छोड़कर रुचि का मार्ग अपनाता है। यह मार्ग आर्य आष्टांगिक मार्ग कहलाता है।

    ➣ ये आठ मार्ग हैं- सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वचन, सम्यक आजीव, सम्यक कर्म, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि।

    ➣ इसे एक चक्र में आठ तीलियों के रूप में दर्शाया जाता है और इसे धर्मचक्र का नाम दिया जाता है।

    मेगस्थनीज की इण्डिका

    ➣ मेगस्थनीज, सेल्यूकस का राजदूत था जो चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में 304 ई.पू. से 299 ई. पू. के बीच रहा।

    ➣ मैगस्थनीज़ ने ‘इण्डिका’ में भारतीय जीवन, परम्पराओं, रीति-रिवाजों का वर्णन किया है। उसके ग्रंथ इण्डिका से चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रशासन की विश्वसनीय जानकारी प्राप्त होती है। हालाँकि यह ग्रंथ अपने मूल रूप में उपलब्ध नहीं है।

    यह भारत आने वाला प्रथम राजदूत था।

    ➣ इण्डिका ग्रीक भाषा में है इसे मौर्य समाज का दर्पण कहा जाता है।

    ➣ मेगस्थनीज ने चन्द्रगुप्त का नाम सैन्ड्रोकाट्स के रूप में उद्धृत किया है। इसके अनुसार शासक के चारों ओर सशस्त्र महिलाएं अंगरक्षक के रूप में रहती थी।

    ➣ चन्द्रगुप्त की राजधानी पोलिब्रोधा (पाटलिपुत्र) का विस्तृत वर्णन किया उसके अनुसार पाटलिपुत्र गंगा व सोन नदियों के संगम पर स्थित था तथा पूर्वी भारत का सबसे बड़ा नगर था।

    ➣ मेगस्थनीज ने उत्तरापथ का वर्णन किया है। यह सड़क सिन्ध को बंगाल के सोनारगाँव से जोड़ती थी। इस सड़क का निर्माण चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा करवाया गया था।

    ➣ मेगस्थनीज के अनुसार भारत में दास प्रथा विद्यमान नहीं थी, जबकि कौटिल्य ने 9 प्रकार के दासों का वर्णन किया है।

    ➣ मेगस्थनीज ने लिखा है कि भारत में अकाल नहीं पड़ते थे, जबकि चन्द्रगुप्त मौर्य के समय अकाल पड़ने का वर्णन मिलता है।

    ➣ अकाल के समय राज्य द्वारा अनाज वितरण (राशनिंग प्रणाली) का वर्णन है।

    मेगस्थनीज के अनुसार भारत में लेखन कला का अभाव था।

    ➣ उसने सिलास नामक एक ऐसी नदी का उल्लेख किया है, जिसमें कुछ भी तैर नहीं सकता था।

    ➣ मैगस्थनीज़ ने भारत से प्राप्त होने वाली खनिज सम्पदा में सोना, चांदी, ताँबा एवं टिन की प्रशंसा की है।

    ➣ मैगस्थनीज़ के अनुसार भारत में चीटियां सोने का संग्रह करती थीं।

    प्राकृत भाषा क्या है

    ➣ प्राकृत भाषा भारतीय आर्यभाषा का एक प्राचीन रूप है। इसके प्रयोग का समय 500 ई.पू. से 1000 ई. सन् तक माना जाता है। धार्मिक कारणों से जब संस्कृत का महत्व कम होने लगा तो प्राकृत भाषा अधिक व्यवहार में आने लगी।

    ➣ इसके चार रूप विशेषत: उल्लेखनीय हैं- अर्द्धमागधी प्राकृत, पैशाची प्राकृत, महाराष्ट्री प्राकृत और शौरसेनी प्राकृत

    ➣ यह जैन आगमों की भाषा मानी जाती है। भगवान महावीर ने भी इसी प्राकृत भाषा के अर्धमागधी रूप में अपना उपदेश दिया था। यह शिलालेखों की भी भाषा रही है।

    हाथीगुंफा शिलालेख, नासिक शिलालेख, अशोक के शिलालेख प्राकृत भाषा में ही हैं।

    ➣ अर्धमागधी प्राकृत में जैन और बौद्ध साहित्य अधिक हैं।

    पालि भाषा क्या है

    ➣ एक प्रकार से पालि प्राचीन हिन्दी है।

    ➣ पालि प्राचीन उत्तर भारत के लोगों की भाषा थी जो पूर्व में बिहार से पश्चिम में हरियाणा-राजस्थान तक और उत्तर में नेपाल-उत्तर प्रदेश से दक्षिण में मध्य प्रदेश तक बोली जाती थी।

    ➣ भगवान बुद्ध भी इन्हीं प्रदेशों में लोगों को धर्म समझाते रहे। यह हिन्द-यूरोपीय भाषा-परिवार की एक बोली है। पालि ब्राह्मी परिवार की लिपियों में लिखी जाती थी।

    भगवान बुद्ध के उपदेशों का संग्रह पालि भाषा में ही है। इसी भाषा में त्रिपिटक आदि बौद्ध धर्मग्रंथों की रचना हुई।

    मिलिंदपन्हो नामक ग्रंथ भी पालि भाषा में ही लिखा गया। इस प्रकार पालि थेरवादी बौद्ध धर्मशास्त्र की पवित्र भाषा है।

    पतंजलि का परिचय

    ➣ महर्षि पतंजलि पुष्यमित्र शुंग (195-142 ई. पू.) के शासनकाल में थे।

    ➣ महर्षि पतंजलि ने योग के 195 सूत्रों को इकट्ठा किया और अष्टांग योग का प्रतिपादन किया।

    ➣ इनके गुरु का नाम व्याकरणाचार्य पाणिनी था।

    ➣ उन्होंने अष्टांग योग के नाम इस प्रकार हैं-
    1. यम, 2. नियम, 3. आसन, 4. प्राणायाम, 5. प्रत्याहार, 6. धारणा, 7. ध्यान और 8. समाधि।

    ➣ पतंजलि को योगशास्त्र के जन्मदाता की उपाधि भी दी गयी हैं।

    योगसूत्र पतंजलि का महान अवदान है। उन्होंने पाणिनी के अष्टाध्यायी पर अपनी टीका लिखी, जिसे महाभाष्य कहा जाता है।

    शक संवत क्या है

    ➣ इस संवत का आरंभ 78 ई.पू. हुआ था।

    ➣ कुषाण राजा कनिष्क महान ने अपने राज्यारोहण को उत्सव के रूप में मनाने और उस तिथि को यादगार बनाने के लिए इस संवत की शुरुआत की।

    ➣ इस संवत की पहली तिथि चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा है और इसी तिथि पर कनिष्क ने राज्य सत्ता सम्हाली थी।

    ➣ शक संवत भारत का राष्ट्रीय कैलंडर है। भारत सरकार द्वारा इसे प्रयोग में लाया जाता है।

    ➣ भारत में इस संवत का प्रयोग वराहमिरि द्वारा 500 ई. से किया गया।

    ➣ यह संवत अन्य संवतों की तुलना में कहीं अधिक वैज्ञानिक और त्रुटिहीन है।

    ➣ यह संवत प्रत्येक वर्ष में 22 मार्च को शुरू होता है और इस दिन सूर्य विषुवत रेखा के ऊपर होता है और इसी कारण दिन और रात बराबर के समय के होते हैं।

    ➣ शक संवत के 365 दिन होते हैं और इसका लीप इयर भी अंग्रेजी ग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ ही होता है।

    ➣ लीप ईयर होने पर शक संवत 23 मार्च को शुरू होता है और उसमें 366 दिन होते हैं।

    ➣ एक अन्य विचार के अनुसार, उज्जयिनी में शक क्षत्रप चष्टन (78-110 ई.) ने शक संवत का प्रवर्तन किया।

    विक्रम संवत क्या है

    ➣ विक्रम संवत की शुरुआत राजा विक्रमादित्य ने 57 ई.पू. में थी।

    ➣ कहा जाता है कि राजा विक्रमादित्य ने अपनी सम्पूर्ण प्रजा का ऋण खुद चुकाकर इस संवत की शुरुआत की थी।

    ➣ विक्रम संवत में समय की पूरी गणना सूर्य और चांद के आधार पर की गयी है यानी दिन, सप्ताह, मास और वर्ष की गणना पूरी तरह से वैज्ञानिक है।

    ➣ विक्रम संवत और शक संवत में अंतरः दोनों संवतों के महीनों के नाम समान हैं और दोनों संवतों में शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष भी हैं। अंतर सिर्फ दोनों पक्षों के शुरू होने में है।

    ➣ विक्रम संवत में नया महीना पूर्णिमा के बाद आने वाली कृष्ण पक्ष से होता है,

    ➣ जबकि शक संवत में नया महीना अमावस्या के बाद शुक्ल पक्ष से शुरू होता है। इसी कारण इन संवतों के शुरू होने वाली तारीखों में भी अंतर आ जाता है।

    ➣ शक संवत में चैत्र के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा, उस महीने की पहली तारीख है जबकि विक्रम संवत में यह सोलहवीं तारीख है।

    चाणक्य कौन थे

    ➣ चाणक्य (लगभग 375-283 ई.पू.) चन्द्रगुप्त मौर्य के गुरु और महामंत्री थे।

    ➣ चाणक्य को कौटिल्य और विष्णुगुप्त के नाम से भी जाना जाता है।

    ➣ चाणक्य की पत्नी का नाम यशोमती था।

    ➣ उन्होंने नंदवंश का नाश करके चन्द्रगुप्त मौर्य को राजा बनवाया। उन्होंने बिंदुसार और अशोक का भी मार्गदर्शन किया।

    ➣ चाणक्य ने तक्षशिला विश्वविद्यालय से पढ़ाई की और वहां के आचार्य भी बने।

    ➣ चाणक्य के कहने पर सिकंदर के सेनापति सेल्युकस की बेटी हेलेना से चंद्रगुप्त ने विवाह किया था। चंद्रगुप्त के राज्य निर्माण का समस्त इतिहास वस्तुतः उसके गुरु चाणक्य का कार्य था।

    ➣ कुछ विद्वान मानते हैं कि हेलेना ने ही चाणक्य की हत्या करवा दी।

    ➣ कौटिल्य ने अर्थशास्त्र की रचना की, जो राजनीति, अर्थनीति, कृषि, समाजनीति आदि का एक महान ग्रंथ है। इसमें उन्होंने वर्णन किया है कि एक राजा किस प्रकार से राजनीतिक और आर्थिक शक्ति प्राप्त कर सकता है।

    कालिदास का परिचय

    ➣ कालिदास संस्कृत भाषा के महान कवि और नाटककार थे।

    ➣ वे चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के नवरत्नों में शामिल थे।

    ➣ उन्होंने भारत की पौराणिक कथाओं और दर्शन को आधार बनाकर रचनाएं की।

    ➣ कालिदास नाट्य, महाकाव्य तथा गीतिकाव्य के क्षेत्र में अपनी अद्भुत रचनाशक्ति का प्रदर्शन के लिए प्रसिद्ध हैं।

    ➣ इनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध नाटक अभिज्ञान शाकुन्तलम् है। जिनसे इन्हे सर्वाधिक प्रसिद्धि मिली।

    ➣ उनके दो अन्य नाटक हैं- विक्रमोर्वशीय तथा मालविकाग्निमित्र

    ➣ उनके चार महाकाव्य हैं- ‘रघुवंश’, कुमारसंभव’, ‘मेघदूत’ और ‘ऋतुसंहार’।

    प्रथम चीनी यात्री फाह्यान

    चन्द्रगुप्त-II के काल में चीनी यात्री फाह्यान भारत आया। यह बौद्ध धर्म का अनुयायी था।

    ➣ चीनी भाषा में फा का अर्थ धर्म है। हियान का अर्थ आचार्य है। इस प्रकार फाह्यान नाम से तात्पर्य धर्माचार्य है।

    ➣ फ़ाह्यान की भारत यात्रा का उदेश्य बौद्ध हस्तलिपियों एवं बौद्ध स्मृतियों को खोजना था। इसीलिए फ़ाह्यान ने उन्हीं स्थानों के भ्रमण को महत्त्व दिया, जो बौद्ध धर्म से सम्बन्धित थे।

    ➣ फाह्यान ने भारत में बिताए 12 वर्षों में से 6 वर्ष यात्रा में और 6 वर्ष अध्यवसाय में बिताए थे।

    ➣ मध्य देश ब्राह्मणों का देश था, जहां लोग सुखी और सम्पन्न थे।

    ➣ यहां मृत्युदंड नहीं दिया जाता था, केवल आर्थिक दंड प्रचलित थे। बार-बार राजद्रोह के अपराध में केवल दाहिना हाथ काट लिया जाता था।

    ➣ मध्य देश के लोग न तो किसी जीवित प्राणी की हत्या करते है और न ही मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन का प्रयोग करते थे।

    ➣ केवल चांडाल इसके अपवाद थे तथा समाज से बहिष्कृत थे। इस प्रकार चांडालों का विस्तृत वर्णन करने वाला फाह्यान प्रथम विदेशी यात मध्य देश के लोग सुअर व पक्षियों को नहीं पालते थे। पशुओं का व्यापार भी नहीं करते थे।

    ➣ बाजारों में बूचड़खाने तथा मदिरालय नहीं थे।

    ➣ मध्य देश के लोग क्रय-विक्रय में कोड़ियों का प्रयोग करते थे।

    ➣ मध्य देश में ब्राह्मण धर्म का ही बोलबाला

    चीनी यात्री ह्वेनसांग

    ➣ हर्षवर्धन के समय में विख्यात चीनी यात्री ह्वेनसांग भारत आया था।

    ➣ ह्वेनसांग बौद्धधर्म के विषय में विस्तृत जानकारी प्राप्त करेन के उद्देश्य से 630 ई. में भारत आया तथा वह 644 ई. तक भारत में रहा। जिसमें से 6 वर्ष नालंदा में शिक्षा ग्रहण किया।

    ➣ ह्वेनसांग सिल्क मार्ग से भारत में हिन्दुकुश पर्वत पार का सर्वप्रथम कपिशा पहुंचा।

    ➣ चीनलौटकर उसने पाश्चात्य संसार के लेख (शी-यू-की) नामक पुस्तक में तत्कालीन भारतीय समाज हर्ष (महायान बौद्धधर्मी) को वह शिलादित्य कहता है और भारत को ब्राह्मणों का देश कहा है।

    ➣ वह अपने साथ भारत से लगभग 150 बुद्ध के अवशेषों के कण, सोने, चांदी एवं सन्दल द्वारा बनी बुद्ध की मूर्तियाँ और 657 पुस्तकों की पाण्डुलिपियों को ले गया था।

    ➣ हर्ष को उसने फीसे या वैश्य जाति बताया।

    ➣ हर्ष को उसने शिलादित्य के नाम से सम्बोधित किया है।

    ➣ हर्ष के समय के सामंतों की कई श्रेणियों का भी उल्लेख किया है।

    ➣ उसने सिंध व मतिपुर के राजाओ को शूद्र बताया है। उसने शूद्रों को कृषक कहा है।

    ➣ उसके समय में नालंदा के प्राचार्य शीलभद्र थे।

    ➣ ह्वेनसांग के अनुसार इस समय सिंचाई घटी यंत्र (रहट) द्वारा होती थी।

    ➣ उसके अनुसार भारत के घोड़े अरब, ईरान एवं कम्बोज से आते थे।

    ➣ ह्वेनसांग ने कन्नौज की धर्मसभा व प्रयाग की महामोक्षपरिषद् का भी वर्णन किया है।

    ह्वेनसांग को प्रिंस ऑफ ट्रैवलर्स अर्थात’ यात्रियों का राजकुमार कहा जाता है।

    ➣ ह्वेन त्सांग की भारत यात्रा का वृतांत हमें चीनी ग्रंथ सी यू की, वाटर्ज की पुस्तक On Yuan Chwang’s Travel In India एवं ह्मुली की पुस्तक Life of lliven Tsang में मिलता है।

    गांधार शैली क्या है

    ➣ गांधार शैली का विकास आधुनिक पेशावर और अफगानिस्तान के निकट पंजाब की पश्चिमी सीमाओं में 50 ई.पू. से लेकर 500 ई. तक हुआ।

    ➣ इस शैली पर यूनानी या हेलेनिस्टिक मूर्तिकला का काफी प्रभाव रहा, इसलिए इसे भारतीय-यूनानी कला के रूप में जाना जाता है।

    ➣ इस शैली को ग्रीक-बौद्ध शैली भी कहा जाता है।

    ➣ इसका सर्वाधिक विकास कुषाण काल में हुआ। इस काल की विषयवस्तु बौद्ध परम्परा से ली गयी थी, किन्तु निर्माण का ढंग यूनानी था।

    ➣ गांधार शैली की प्रारम्भिक बौद्ध मूर्तियों में बुद्ध का मुख ग्रीक देवता अपोलो से मिलता-जुलता है। यही कला हद्दा से बामियान और वहां से तुर्किस्तान और चीन पहुंची।

    ➣ गांधार कला के अंतर्गत मूर्तियों में शरीर की आकृति को सर्वथा यथार्थ दिखाने का प्रयत्न जाता है। इस रूप में गांधार कला यथार्थवादी थी।

    ➣ गांधार शैली में बुद्ध योगी मुद्रा में बैठे होते हैं और बहुत कम आभूषण धारण किए होते हैं। उनको लहराते बालों के साथ आध्यात्मिक मुद्रा में दिखाया गया है। आखें ऐसी बंद हैं जैसे कि ध्यान मुद्रा में हों और इनके सर पर जटा या उभार को दिखाया गया है। यह बुद्ध की सर्वज्ञता को दर्शाता है।

    ➣ प्रारंभिक गांधार शैली में नीले-धूसर बलुआ प्रस्तर का प्रयोग किया जाता था, जबकि बाद की अवधि मिट्टी और प्लास्टर उपयोग में लाए जाते थे।

    मथुरा शैली क्या है

    ➣ जैन धर्म के अनुयायियों ने मथुरा में मूर्तिकला की एक शैली को प्रश्रय दिया, जहां शिल्पियों ने महावीर की एक मूर्ति बनाई। यह मधुरा शैली के नाम से प्रसिद्ध है।

    ➣ कालांतर में कुषाण शासकों का प्रश्रय पाकर यह फली-फूली। यह शैली बाह्य संस्कृतियों से प्रभावित नहीं थी और स्वदेशी शैली के रूप से विकसित हुई थी।

    ➣ इस शैली की मूर्तियों को चित्तिदार लाल बलुआ प्रस्तर का उपयोग करके बनाया गया था।

    ➣ इस शैली पर हिंदू, जैन और बौद्ध तीनों धर्मों का प्रभाव था।

    ➣ मथुरा शैली में शरीर को यथार्थ दिखलाने का प्रयल नहीं किया गया है, अपितु मुखाकृति में आध्यात्मिक सुख और शांति व्यक्त की गयी है। दूसरे शब्दों में, मथुरा शैली आदर्शवादी है।

    ➣ इसमें बुद्ध को मुस्कुराते चेहरे के साथ प्रसन्नचित दिखाया गया है। शरीर हृष्ट-पुष्ट और तंग कपड़े पहने हुए हैं। चेहरा और सिर मुंडा हुआ है। सर पर उभार या जटा दिखाई गयी है। बुद्ध को विभिन्न मुद्राओं में पदमासन में बैठे दिखाया गया है और उनका चेहरा विनीत भाव दर्शाता है।

    विक्रमशिला विश्वविद्यालय का इतिहास

    8वीं शताब्दी में पाल वंश के शासक धर्मपाल द्वारा बिहार प्रांत के भागलपुर में विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना की गयी।

    ➣ यह विश्वविद्यालय नालंदा के समकक्ष माना जाता था। यहां पर बौद्ध धर्म एवं दर्शन के अतिरिक्त न्याय, तत्व ज्ञान एवं व्याकरण का भी अध्ययन कराया जाता था।

    ➣ इस विश्वविद्यालय के सर्वाधिक प्रतिभाशाली भिक्षु दीपंकर ने लगभग 200 ग्रंथों की रचना की।

    ➣ इस शिक्षा केन्द्र में लगभग 3,000 अध्यापक कार्यरत थे। यहां पर विदेशों से भी छात्र अध्ययन के लिए आते थे। सम्भवतः तिब्बत के छात्रों की संख्या सर्वाधिक थी।

    ➣ पाल शासकों का तिब्बत के साथ घनिष्ठ सांस्कृतिक संबंध था। संतरक्षित तथा दीपांकर (जिसे अतिशा कहा जाता था) जैसे प्रमुख बौद्ध विद्वानों को तिब्बत में आमंत्रित किया गया और उन्होंने वहां बौद्ध धर्म के एक नये रूप का प्रचार किया। परिणामस्वरूप बहुत से तिब्बती बौद्ध विद्योपार्जन के लिए नालंदा और विक्रमशिला आये।

    ➣ 1203 ई. में बख्तियार खिलजी के आक्रमण के फलस्वरूप यह विश्वविद्यालय नष्ट हो गया।

    ओदन्तपुरी विश्वविद्यालय

    ओदन्तपुरी (उदंतपुरी) विश्वविद्यालय भी नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालय की तरह विख्यात था, परंतु इसका उत्खनन कार्य नहीं होने के कारण यह आज भी धरती के गर्भ में दबा है। फलस्वरूप बहुत ही कम लोग इस विश्वविद्यालय के इतिहास से परिचित हैं।

    ➣ यह विश्वविद्यालय बौद्ध धर्म के माननेवाले तथा भिक्षुओं का मुख्य केंद्र था।

    ➣ कहा जाता है कि नालंदा विश्वविद्यालय जब अपने पतन की ओर अग्रसर हो रहा था, उसी समय इस विश्वविद्यालय की स्थापना की गयी थी।

    ➣ इसकी स्थापना प्रथम पाल नरेश गोपाल ने 7वीं शताब्दी में की थी।

    ➣ तिब्बती पांडुलिपियों से ऐसा ज्ञात होता है कि इस महाविहार के संचालन का भार ‘भिक्षुसंघ’ के हाथ में था।

    मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी ने सर्वप्रथम इसी को अपने आक्रमण का निशाना बनाया।

    ➣ खिलजी ने 1197 ई. में इस विश्वविद्यालय को चारों और से घेर लिया। कुछ भिक्षुओं ने संघर्ष किया और कुछ भिक्षु बंगाल तथा ओडिशा की ओर भाग गये। अंत में इस यहाँ आग लगा दी गयी।

    ➣ उल्लेखनीय है कि उदंतपुर को ही न दिनों बिहारशरीफ (बिहार) के नाम से ना जाता है। उदंतपुरी के प्रधान आचार्य तारि और अतिशा दीपंकर के शिष्य थे।

    ➣ एक समय विद्या और आचार्यों की प्रसिद्धि के कारण इसका महत्व नालंदा से अधिक बढ़ गया था। इस विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति प्रभाकर थे।

    एलोरा की गुफाएं

    ➣ एलोरा की गुफाएं महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में एलोरा नामक स्थान पर स्थित हैं।

    7वीं – 9वीं शताब्दी के बीच बनाई गईं 34 शैलकृत गुफाओं में 1 से 12 तक बौद्धों तथा 13 से 29 तक हिन्दुओं और 30 से 34 तक जैनों की गुफाएं हैं।

    ➣ एलोरा की गुफा में 10 चैत्यगृह हैं, जो शिल्प देवता विश्वकर्मा को समर्पित हैं।

    ➣ एलोरा गुहा मंदिर का निर्माण राष्ट्रकूटों के समय में किया गया था। इनके निर्माण कार्यों में एलोरा का कैलाश गुहा मंदिर सर्वाधिक उत्कृष्ट है, जिसका निर्माण राष्ट्रकूट शासक कृष्ण प्रथम ने कराया था।

    ➣ बौद्ध, जैन और हिन्दू धर्म से प्रभावित ये शिल्प कलाएं पहाड़ में विस्तृत पच्चीकारी दर्शाती हैं। जिसमे सर्वाधिक प्रभावशाली पच्चीकारी कैलाश मंदिर की है (गुफा 16), जो विश्वभर में एक ही पत्थर की शिला से बनी हुई सबसे बड़ी मूर्ति है।

    ➣ हिन्दू गुफाओं में एक गुफा तो एक ही पहाड़ को काटकर बनाई गयी है। इस गुफा मंदिर, हाथी और दो मंजिली इमारत छेनी हथौड़ी से तराश कर बनाई गयी है। इन गुफाओं का निर्माण छठी से बारहवीं सदी के बीच कलचूरी, चालुक्य और राष्ट्रकूट राजाओं द्वारा कराया गया था।

    ➣ वर्ष 1983 में यूनेस्को ने एलोरा की गुफाओं को विश्व विरासत स्थल का दर्जा प्रदान किया।

    अजंता की गुफाएं

    ➣ सह्याद्रि की पहाड़ियों पर स्थित अजंता की गुफाएं औरंगाबाद के उत्तर में 107 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं।

    ➣ ये गुफाएं अपनी भित्ति-चित्रकला के लिए प्रसिद्ध हैं।

    ➣ इन गुफाओं का नाम अजिंठा गांव के नाम पर रखा गया है। इन गुफाओं की खोज 1819 में ब्रिटिश सेना की मद्रास रेजीमेंट के सैन्य अधिकारी द्वारा शिकार खेलते समय की गयी थी।

    ➣ अजंता की गुफाएं घोड़े की नाल के आकार की चट्टान की सतह पर उत्कीर्ण की गयी हैं, जो बाघोरा नाम की एक संकीर्ण नदी के ऊपर लगभग 76 मीटर की ऊंचाई पर स्थित हैं।

    ➣ इन गुफाओं का निर्माण लगभग दूसरी सदी से लेकर छठी सदी ई. तक सातवाहन और वाकाटक काल के दौरान किया गया था।

    ➣ वाकाटक वंश के वसुगुप्त शाखा के शासक हरिषेण (475-500ई.) के मंत्री वराहमंत्री ने गुफा ने संख्या 16 को बौद्ध संघ को दान में दिया था। जबकि गुफा संख्या 17 का निर्माण हरिषेण नामक सामन्त ने कराया था।

    ➣ इन गुफाओं में जातक कथाओं के माध्यम से भगवान बुद्ध के जीवन की घटनाओं को दर्शाया गया है।

    ➣ अजंता में निर्मित कुल 29 गुफाओं में से वर्तमान में केवल 6 (गुफा संख्या 1, 2, 9, 10, 16, 17) ही शेष हैं।

    ➣ अजंता की गुफाओं को दो भागों में बांटा जा सकता है- एक भाग में बौद्ध धर्म के हीनयान और दूसरे भाग में महायान संप्रदाय की झलक देखने को मिलती है।

    ➣ गुफा संख्या -16 में उत्कीर्ण मरणासन्न राजकुमारी का चित्र प्रशंसनीय है।

    ➣ अजंता की गुफाओं को वर्ष 1983 में यूनेस्को ने विश्व विरासत स्थल की सूची में शामिल किया था।

    एलीफैण्टा गुफा

    ➣ चालुक्य स्थापत्य के नमूने एलीफैण्टा तथा जागेश्वरी से भी मिलते है। एलीफैण्टा मे चालुक्यों के सामन्त शिलाहार शासन करते थे।

    ➣ 9वीं शताब्दी के प्रारम्भ में यहां सुन्दर गुहायें उत्कीर्ण की गयी। मुख्य गुफा में एक विशाल मण्डप है जिसके चतुर्दिक प्रदक्षिणापथ है।

    ➣ वर्गाकार गर्भगृह में विशाल शिवलिंग स्थापित है। चबूतरे से गर्भगृह में जाने के लिये सीढ़ियां बनाई गयी है।

    ➣ गर्भगृह के चारों ओर निर्मित देव प्रकोष्ठों में शिव के विविध रूपों की मूतियां बनी है। इनमें सर्वाधिक सुन्दर महेश मूर्ति भारतीय कला की धरोहर है।

    ➣ यहां की गुफा में शिव, ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य, इन्द यम, गणेश स्कन्द की मूर्तियां बनाई गयी है।

    ➣ शिव के विविध रूपों एवं लीलाओ से संबंधित मूर्तियां काफी अच्छी है। उत्तरी द्वार के सामने प्रसिद्ध त्रिमूर्ति है जो समस्त राष्ट्रकूट कला की सर्वोत्तम रचना है।

    ➣ पहले ऐसा समझा गया था कि यह ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव की संयुक्त प्रतिमा है जिनकी गणना त्रिदेव में की जाती है।

    ➣ जे० एन० बनर्जी ने इस अवधारणा का खण्डन करते हुए मूर्ति का तादात्म्य शिव के 03 रूपों शान्त, उग्र, तथा शक्ति से करते हुए इसे महेश मूर्ति की संज्ञा दी है। बीच का मुख शिव के शान्त दायी ओर का मुख रौद्र तथा दायी ओर का मुख (नारी मुख है) शक्ति रूप का प्रतीक है।

    राजा भोज : कला संरक्षक

    ➣ भोज परमार, सिन्धु राजा का पुत्र था। एक अभिलेख में उसने स्वयं को सार्वभौम कहा है। उदेपुर प्रशस्ति में उसे कैलाश मलय पर्वत का स्वामी बताया गया है।

    ➣ भोज अपनी विद्धन्ता के कारण कविराज उपाधि से प्रख्यात थे। उनके द्वारा लिखित एवं चिकित्साशास्त्र पर आयुर्वेद सर्वस्व एवं स्थापत्यशास्त्र पर समरांगणसूत्रधार विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

    ➣ इनके अतिरिक्त सरस्वती कण्ठाभरण सिद्धान्त संग्रह योगसूत्रवृन्ति राजमार्तण्ड विद्याविनोद, युक्तिकल्पतरू, चारूचर्चा आदित्य प्रताप सिद्धान्त प्रमुख है।

    ➣ भोज ने धारा नगरी का विस्तार किया और वहाँ भोजशाला के रूप में प्रख्यात एक महाविद्यालय की स्थापना कर उसमें वाग्यदेवी की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा करवाया था।

    ➣ इस भोजशाला की दीवारों के प्रस्तर खण्डों पर आज भी संस्कृत श्लोक अभिलिखित है। अपने नाम पर उसके भोजपुर नगर बसाया तथा एक बहुत बड़े

    भोजसर नामक तालाब को निर्मित करवाया। चित्तौड़ में त्रिभुवन नारायण मंदिर बनवाया था।

    आइने अकबरी के वर्णन के आधार पर माना जाता है कि उसके दाजदरबार में 500 विद्वान थे। भोज के दरबारी कवियों में भास्कर भट्ट, दामोदर मित्र, धनपाल प्रमुख थे।

    जंतर मंतर क्या है

    ➣ जन्‍तर मन्‍तर राजस्थान राज्य के जयपुर शहर में स्थित है। महाराजा सवाई जयसिंह ने सन 1718 ई. में इस वैधशाला की आधार शिला रखी।

    ➣ इस ज्‍योतिष यंत्रालय में समय की जानकारी, सूर्योदय, सूर्योस्‍त एवं नक्षत्रों की जानकारी प्राप्‍त करने के उपकरण अवस्थित हैं।

    ➣ वैधशाला में स्‍थापित यंत्रों में वृहत सम्राट यंत्र, जय प्रकाश यंत्र, राम यंत्र, कपाली यंत्र, नाडी वलय यंत्र, घोटा यंत्र आदि मुख्‍य है।

    ➣ देश में सबसे पहली वेधशाला दिल्ली में 1724ई. में बनवाई गई और उसके दस वर्ष बाद जयपुर में वेधशाला बनाई गई थी। जयपुर के बाद उज्जैन, बनारस और मथुरा में वेधशालाएं बनवायी गई।

    जयपुर की वेधशाला सबसे विशाल एवं विश्व विख्यात हैं। यहाँ स्थित सम्राट यंत्र विश्व की सबसे बडी सौर घड़ी मानी जाती हैं।

    बृहदेश्वर मंदिर

    ➣ यह मंदिर तमिलनाडु के तंजौर ज़िले में स्थित प्रसिद्ध हिंदू मंदिर है। तमिल भाषा में इसे बृहदीश्वर के नाम से संबोधीत किया जाता है।

    ➣ ग्यारहवीं सदी के आरम्भ में बनाया गया था। यह मंदिर चोल शासकों की महान् कला केन्द्र रहा है। भगवान शिव को समर्पित बृहदीश्वर मंदिर शैव धर्म के अनुयायियों के लिए पवित्र स्थल रहा है।

    ➣ प्रारंभिक समय में इसका नाम राजराजेश्वर था बाद में इसका नामकरण बृहदेश्वर मंदिर किया गया।

    ➣ विश्व में यह अपनी तरह का प्रथम और एकमात्र मंदिर है जो कि ग्रेनाइट का बना हुआ है। इस मंदिर को यूनेस्को ने विश्वधरोहर घोषित किया है।

    ➣ बृहदेश्वर मंदिर चोल वास्‍तुकला का शानदार उदाहरण है, जिनका निर्माण चोल शासक महाराजा राजराज प्रथम के राज्‍य के दौरान केवल 5 वर्ष की अवधि में (1004 ई. -1009 ई. ) निर्मित किया गया था। उनके

    ➣ रिजर्व बैंक ने 1 अप्रैल 1954 ई. को एक हजार रुपये का नोट जारी किया था। जिस पर बृहदेश्वर मंदिर की भव्य तस्वीर है।

    ➣ मंदिर के गर्भ गृह में चारों ओर दीवारों पर भित्ती चित्र बने हुए हैं जिनमें भगवान शिव की विभिन्न मुद्राओं को दर्शाया गया है।

    ➣ इन चित्रों में एक भित्तिचित्र जिसमें भगवान शिव असुरों के किलों का विनाश करके नृत्य कर रहे है।

    कोणार्क सूर्य मंदिर

    ➣ सूर्यमन्दिर भारत का इकलौता सूर्य मन्दिर है जो पूरी दुनिया में अपनी भव्यता और बनावट के लिए जाना जाता है।

    ➣ सूर्य मन्दिर उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर से 65 किलोमीटर दूर कोणार्क में अपने समय की उत्कृष्ट वास्तु रचना है। इस मन्दिर की मूर्तियाँ लेहराइट, क्लोराइट और खोण्डोलाइट नाम के पत्थरों से बनाई गई हैं।

    ➣ पूर्वी गंग वंश के राजा नरसिंह देव प्रथम ने सूर्य मन्दिर को 13वीं शताब्दी (लगभग 1278 ई.) में बनवाया था। प्राचीन उड़िया स्थापत्य कला का यह मन्दिर बेजोड़ उदाहरण है।

    ➣ सूर्य की चार पत्नियाँ रजनी, निक्षुभा, छाया और सुवर्चसा मूर्ति के दोनों तरफ़ हैं। सूर्य की मूर्ति के चरणों के पास ही रथ का सारथी अरुण भी उपस्थित है।

    ➣ मन्दिर को रथ का स्वरूप देने के लिए मन्दिर के आधार पर दोनों ओर एक जैसे पत्थर के 24 पहिए बनाए गए।

    ➣ आधार की बाहरी दीवार पर लगे पत्थरों पर विभिन्न आकृतियों उकेरा गया है। इनमें कुछ स्थानों पर खजुराहो की तरह कामातुर आकृतियाँ तो कहीं पर नारी सौंदर्य, महिलापुरुष वादकों व नर्तकियों की विभिन्न आकृतियाँ हैं।

    ➣ इसके अलावा इसमें मानव, पेड़-पौधों, जीव-जन्तुओं के साथ पुष्पीयज्यामितीय अंकरण हैं।

    ➣ सन 1838 ई. में एशियाटिक सोसाइटी ने पहली बार इसके संरक्षण की बात उठाई। वर्ष 1900 में यहाँ पर वास्तविक संरक्षण करने का प्रयास हुआ।

    ➣ 20वीं सदी के मध्य में इसे भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के अधीन कर दिया गया। वर्ष 1984 के बाद इसे विश्व विरासत स्थल घोषित किया गया।

    ➣ कोणार्क के अतिरिक्त एक अन्य सूर्य मंदिर उत्तराखण्ड के अल्मोड़ा में कटारमल नामक स्थान पर भी स्थित है। इस कारण इसे कटारमल सूर्य मन्दिर कहा जाता है।

    ➣ यह सूर्य मन्दिर न सिर्फ़ समूचे कुमाऊँ मंडल का सबसे विशाल, ऊँचा और अनूठा मन्दिर है, बल्कि उड़ीसा के कोणार्क सूर्य मन्दिर के बाद एकमात्र प्राचीन सूर्य मन्दिर भी है।

    सोमनाथ मंदिर का इतिहास

    ➣ यह एक महत्वपूर्ण हिन्दू मंदिर है जिसकी गणना 12 ज्जोतिलिगों में सर्वप्रथम ज्जोतिर्लिंग के रूप में होती है। यह गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के वेरावल बंदरगाह में प्रभास पटन में स्थित है।

    ➣ इसका निर्माण स्वयं चन्द्रदेव ने किया था। इसका उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है। यह मंदिर हिंदू धर्म के उत्थान पतन के इतिहास का प्रतीक रहा है।

    ➣ अत्यंत वैभवशाली होने के कारण इतिहास में कई बार यह मंदिर तोड़ा तथा पुनर्निर्मित किया गया। द्वितीय बार मंदिर का पुनर्निर्माण सदी में वल्लभी के मैत्रक राजाओं ने किया।

    8वीं सदी के सिंध के अरबी गवर्नर जूनायद ने इसे नष्ट करने के लिए अपनी सेना भेजी। प्रतिहार राजा नागभट्ट ने 815 ईस्वी में इसका तीसरा पुनर्निर्माण किया।

    ➣ अरब यात्री अलबेरूनी ने अपने यात्रा वृतान्त में इसका विवरण लिखा जिससे प्रभावित हो महमूद गजनवी ने सन 1025 ई. में कुछ 5,000 साथियों के साथ सोमनाथ मंदिर पर हमला किया,

    ➣ मंदिर की सम्पन्ति लूटी गई और उसे नष्ट कर दिया 50,000 लोग मंदिर के अंदर हाथ जोड़कर पूजा अर्चना कर रहे थे, प्राय: सभी कत्ल कर दिये गये।

    ➣ इसके बाद गुजरात के राजा भीम और मालवा के राजा भोज ने इसका पुनर्निर्माण कराया। सन 1297 ई. में जब दिल्ली सल्तनत ने गुजरात पर कब्जा किया तो इसे 5वी बार गिराया गया।

    ➣ मुगल बादशाह औरंगजेब ने इसे पुनः 1706 ई. में गिरा दिया।

    ➣ कालांतर में नया मंदिर बनाया गया। इस नए भव्य मंदिर का डिजाइन प्रसिद्ध आर्कीटेक्टर प्रभाशंकर ने तैयार किया था।

    ➣ इस समय जो मंदिर खड़ा है उसे भारत के गृह मन्त्री सरदार बल्लभ भाई पटेल (लौह पुरूष) ने बनवाया और 1 दिसंबर 1995 को भारत के राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया।

    दिलवाड़ा का जैन मंदिर

    ➣ दिलवाड़ा मंदिर विस्तृत 5 मंदिरों का एक समूह है। इन मंदिरों का निर्माण 11वीं शताब्दी के बीच हुआ था।

    ➣ जैन धर्म के तीर्थकरों को समर्पित इन मंदिरों में यह सर्वाधिक प्राचीन मंदिर है। प्रथम जैन तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित यह मंदिर 1031 ई. में बना था।

    22वें तीर्थंकर नेमीनाथ को समर्पित यहां का लुन वासाही मंदिर भी काफी लोकप्रिय है। यह मंदिर 1231 ई. में वास्तुपालतेजपाल नामक दो भाइयों द्वारा बनवाया गया था।

    ➣ यहां के जैन मंदिरों में सबसे बड़े मंदिर विमल वासाही मंदिर का निर्माण गुजरात के चालुक्य वंश के राजा भीमदेव के सेनापति विमल शाह ने पुत्र प्राप्ति की इच्छा पूरी होने पर करवाया था।

    ➣ इसके अलावा मंदिर परिक्षेत्र में पीतल हर अर्वेश्वर मंदिर, शारतशाही पार्श्वनाथ मंदिर और भगवान महावीर स्वामी मंदिर स्थित है। इसमें महावीर स्वामी मंदिर सबसे छोटा और सादगीपूर्ण है।

    ➣ इसी प्रकार पीतल मंदिर का निर्माण गुजरात के भीमशाह ने करवाया था। बाद में सुंदरगदा नामक व्यक्तियों ने इसका जीर्णोधार करवाया व इसमें ऋषभदेव की पंचधातु की मूर्ति स्थापित करवायी जिसका वजन एक मन माना जाता है।

    ➣ इसके अलावा यहां एक चौमुखी मंदिर भी दर्शनीय है। इसे खारतवासी मंदिर भी कहा जाता है। इसमें भगवान पार्श्वनाथ की सुंदर मूर्ति विराजमान है।

    ➣ भूरे पत्थर से बना यह तीन मंजिला मंदिर अपने शिखर सहित दिलवाड़ा सभी मंदिर में सबसे ऊंचा है। समूह के 5वें खेताम्बर मंदिर के साथ भगवान समूह कुथुनाथ ने यहां काले पत्थर का एक ऊंचा स्तंभ बनाया था।

    दिलवाड़ा के जैन मंदिर भारतीय शिल्पकला का मानव जाति को एक अनूठा उपहार माना जा सकता है।

    अलबरूनी का भारत वर्णन

    ➣ अलबरुनी एक फ़ारसी विद्वान् लेखक, वैज्ञानिक, धर्मज्ञ तथा विचारक था। वह अरबी, फ़ारसी, तुर्की, संस्कृत, गणित, खगोल का प्रमुख जानकर था।

    ➣ संस्कृत भाषा का विद्वानी होने के कारण , अल्बरूनी को हिन्दू विद्वानों द्वारा विद्या सागर (Occan of Knowledge) की उपाधि दी गयी थी।

    ➣ उसने प्राकृतिक विज्ञान, विशेष रूप से खगोलशास्त्र, गणित, रसायन विज्ञान और खनिजशास्त्र आदि पर अनेक कृतियों की रचना की।

    ➣ उसका असली नाम अबू रैहान मुहम्मद था, लेकिन वह अलबेरूनी के नाम से ही अधिक विख्यात हुआ , जिसका अर्थ होता है- उस्ताद। इसे मुनिज्ज्म के नाम से भी जाना जाता है।

    ➣ अल बिरूनी का जन्म 973 ई. में ख़्वारिज़्म में हुआ था जिस पर उस समय तूरान और ईरान के सामानी वंश (874-999) का शासन था। 1017 ई. में ख्वारिज़्म को महमूद ग़ज़नवी द्वारा जीत लिया गया।

    ➣ उसकी विद्वत्ता से प्रभावित होकर महमूद ग़ज़नवी ने उसे अपने राज्य का राज ज्योतिष नियुक्त कर दिया।

    ➣ वह सुल्तान महमूद ग़ज़नवी की सेना के साथ भारत आया और कई वर्षों तक पंजाब में रहा।

    ➣ भारत के संबंध में उसने लगभग 20 पुस्तकों की रचना की, जिसमें अनुवाद और मूल कृति दोनों शामिल हैं।

    भगवदगीता और पुराणों का अध्ययन करने वाला अलबरूनी पहला मुसलमान था। सम्भवत: मुस्लिम जगत में भगवद्गीता के अध्ययन से परिचित कराने वाला यह प्रथम मुसलमान था।

    किताब-उल-हिन्द पुस्तक का सम्पूर्ण नाम है किताब फ़ी तहफ़ूक़ मा लिल हिन्द मिन मक़ाला मक़्बूला फ़िल अक़्ल-औ-मरजूला जिसे आम तौर पर किताब उल हिन्द कहा जाता है।

    ➣ अलबेरूनी द्वारा रचित पुस्तकों में यह सबसे अधिक प्रसिद्ध पुस्तक थी। जिसे दक्षिण एशिया के इतिहास का प्रमुख स्रोत माना जाता है।

    ➣ उसकी पुस्तक तहकीक-ए-हिन्द (भारत की खोज) नामक पुस्तक में हिन्दुओं के इतिहास, चरित्र, आचार-व्यवहार, परम्पराओं और वैज्ञानिक ज्ञान का विशद वर्णन मिलता है।

    ➣ किताब बल हिन्द का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद जर्मन विद्वान एडवर्ड मी. द्वारा Alharunis Indin शीर्षक से कराया गया।

    ➣ इस पुस्तक की मूल भाषा फ़ारसी थी। आगे चलकर इस का हिन्दी भाषा में अनुवाद शांताराम, उर्दू में मैय्यद अशगर तथा बंगाली में ए. बी. हबीबुल्ला ने किया।

    इब्नबतूता का भारत वर्णन

    ➣ इब्नबतूता अरब यात्री, विद्वान तथा लेखक था। इसका जन्म उत्तरी अफ्रीका के मोरक्को प्रदेश के प्रसिद्ध नगर तांजियर में 24 फरवरी, 1304 ई. को हुआ। इसका पूरा नाम मुहम्मद बिन अब्दुल्ला इब्नबतूता था।

    ➣ इब्नबतूता 1333 ई. में सुल्तान मुहम्मद तुग़लक़ के राज्यकाल में भारत आया। भारत के उत्तर पश्चिम द्वार से प्रवेश करके इब्नबतूता सीधा दिल्ली पहुँचा, जहाँ तुगलक सुल्तान मुहम्मद ने उसे राजधानी का काजी नियुक्त किया।

    ➣ 1342 में मुहम्मद तुगलक ने उसे चीन के बादशाह के पास अपना राजदूत बनाकर भेजा।

    ➣ इसके बाद उसने पश्चिम एशिया, उत्तर अफ्रीका तथा स्पेन के मुस्लिम स्थानों क भ्रमण किया और अंत में टिंबकट आदि होता वह 1354 ई. के आरंभ में मोरक्को की राजधानी फेज लौट गया।

    ➣ फेज’ लौटकर उसने अपना भ्रमणवृत्तांत सुल्तान को सुनाया। सुल्तान के आदेशानुसार उसके सचिव मुहम्मद इब्न जुज़ैय ने उसे लेखबद्ध किया।

    ➣ इब्नबत्तूता के भ्रमणवृत्तांत को तुहफ़तअल नज्ज़ार फ़ी गरायब अल अमसारअजायब अल अफ़सार का नाम दिया गया। इसकी एक प्रति पेरिस के राष्ट्रीय पुस्तकालय में सुरक्षित हैं।

    फ़रिश्ता इतिहासकार

    ➣ वह प्रसिद्ध मुस्लिम इतिहासकार था, जिसने फ़ारसी में इतिहास लिखा है। फ़रिश्ता का जन्म फ़ारस में कैस्पियन सागर के तट पर अस्त्राबाद में हुआ था। उसका पूरा नाम मुहम्मद क़ासिम हिन्दू शाह था।

    ➣ वह अपनी युवावस्था में पिता के साथ अहमदाबाद, भारत आया और यहाँ 1589 ई. तक रहा। 1612 ई. में बीजापुर में ही उसकी मृत्यु हुई।

    ➣ इसके बाद वह बीजापुर चला गया, जहाँ उसने सुल्तान इब्राहीम आदिलशाह द्वितीय का संरक्षण प्राप्त कर लिया।

    ➣ फ़रिश्ता को सुल्तान इब्राहीम आदिलशाह ने ही भारत का इतिहास लिखने के लिए कहा था। सुल्तान द्वारा दिया गया यह कार्य फ़रिश्ता ने 1609 ई. में पूरा किया।

    ➣ फ़रिश्ता ने भारत के इतिहास पर अपनी एक पुस्तक भी लिखी थी, जो तारीख़-ए-फ़रिश्ता के नाम से प्रसिद्ध हुई।

    ➣ ब्रिग्स ने उसकी पुस्तक का अंग्रेज़ी में अनुवाद किया भारत में मुसलमानी शक्ति के विकास का इतिहास नाम से किया है।

    ➣ उसका प्रसिद्ध इतिहास ग्रन्थ आज भी भारत में मुस्लिमों के शासन काल पर सबसे अधिक प्रामाणिक तथा सटीक माना जाता है।

    बर्नियर का भारत वर्णन

    ➣ बर्नियर एक फ़्राँसीसी था। वह एक चिकित्सक, राजनीतिज्ञ, दार्शनिक तथा इतिहासकार था। वह 17वीं सदी में फ्राँस से भारत आया, जिस समय भारत पर मुग़लों का शासन था।

    बर्नियर की भारत यात्रा पुस्तक में बर्नियर द्वारा लिखित यात्रा का वृत्तांत उस काल के भारत की छवि हमारे समक्ष उजागर करता है।

    ➣ भारत में वह 1656 ई. से 1668 ई. तक रहे, बर्नियर ने सारे देश का भ्रमण किया और शाहजहाँ तथा औरंगज़ेब के मध्यवर्ती शासनकालों में उसने भारत में जो कुछ देखा उसका रोचक विवरण प्रस्तुत किया है।

    ➣ उसने मुग़ल दरबार के प्रमुख दरबारी दानिशमन्द की नौकरी कर ली थी।

    ➣ वह दिल्ली में उस समय मौजूद था, जब दारा शिकोह को राजधानी की सड़कों पर घुमाया जा रहा था और औरंगज़ेब के सैनिक उसे घसीट रहे थे।

    ➣ शाहजादा दारा के पीछे-पीछे भारी भीड़ चल रही थी, जो कि उसके दुर्भाग्य पर विलाप कर रही थी। फिर भी भीड़ में से किसी व्यक्ति को अपनी तलवार निकालकर दारा को छुड़ाने का साहस नहीं हुआ।

    ➣ इस प्रकार बर्नियर ने विदेशी होने पर भी सत्ताधारियों के सम्मुख भारतीय जनता की निष्क्रियता तथा असहायावस्था को लक्षित कर लिया था।

    बर्नियर ने शाहजहाँ तथा औरंगज़ेब के रेखाचित्र भी प्रस्तुत किए हैं।

    ➣ बंगाल की समृद्धि से वह बहुत प्रभावित हुआ था, परन्तु जनसाधारण की निर्धनता ने उसे अत्यधिक द्रवित भी किया था।

    ➣ दरबार की शान-शौक़त तथा विशाल सेना का ख़र्च निकालने के लिए प्रजा पर करों का भारी बोझ लाद दिया जाता था।

    ➣ बर्नियर के अनुसार इस विशाल सेना का उपयोग जनता को दबाये रखने के लिए किया जाता था।

    कल्हण और राजतरंगिणी

    ➣ राजतरंगिणी कल्हण द्वारा रचित एक संस्कृत ग्रन्थ है, जिसकी रचना 1148 से 1150 ई. के बीच हुई।

    ➣ कल्हण ने अपनी राजतरंगिणी हर्ष के समय लिखना प्रारंभ किया और अंतिम लोहार राजा जयसिंह के शासनकाल में पूरा किया।

    ➣ यह ग्रंथ संस्कृत में ऐतिहासिक घटनाओं के क्रमबद्ध इतिहास लिखने का प्रथम प्रयास है। इसमें आदिकाल से लेकर 1151 ई. के आरम्भ तक के कश्मीर के प्रत्येक शासक के काल की घटनाओं का क्रमानुसार विवरण दिया गया है। यह कश्मीर के राजनीतिक उथलपुथल का काल था।

    कश्मीर के इतिहास पर आधारित इस ग्रंथ की रचना में कल्हण ने ग्यारह अन्य ग्रंथों का सहयोग लिया है, जिसमें अब केवल नीलमत पुराण ही उपलब्ध है।

    ➣ कल्हण की राजतरंगिणी में कुल आठ तरंग एवं लगभग 8000 श्लोक हैं। पहले के तीन तरंगों में कश्मीर के प्राचीन इतिहास की जानकारी मिलती है।

    ➣ चौथे से लेकर छठवें तरंग में कार्कोट एवं उत्पल वंश के इतिहास का वर्णन है। अन्तिम सातवें एवं आठवें तरंग में लोहार वंश का इतिहास उल्लिखित है। कल्हण (ब्राह्मण) कश्मीर के लोहार वंशी राजा हर्ष के सलाहकार थे।

    हम्पी : पत्थरों का स्वप्नलोक

    ➣ हम्पी कर्नाटक की तुंगभद्रा नदी के किनारे स्थित एक प्राचीन गौरवशाली साम्राज्य विजयनगर का अवशेष है।

    ➣ प्राचीन स्मारकों का यह केंद्र उत्तरी कर्नाटक के बेल्लारी जिले में बेंगलुरू से 353 किमी., बेल्लारी से 74 किमी. और हॉसपेट से 13 किमी. की दूरी पर स्थित अब एक गांव है।

    ➣ हम्पी को यूनेस्को ने भारत में स्थित विश्व विरासत का दर्जा 1986 ई. में दिया है।

    ➣ इस गांव में आज भी विजयनगर साम्राज्य के कई अवशेष है। इतिहास और पुरातत्व के दृष्टि से हम्पी एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।

    ➣ हम्पी को प्राचीन काल में कई नामों से जाना जाता था, जैसे-पम्पा क्षेत्र, भास्कर क्षेत्र, हम्पे, किष्किंधा क्षेत्र है।

    ➣ हम्पी नाम में कन्नड़ शब्द हम्पे से पड़ा है और हम्प शब्द तुंगभद्रा नदी के प्राचीन नाम पम्पा से आया था।

    ➣ हम्पी का इतिहास काफी प्राचीन है, लेकिन यहां विजयनगर साम्राज्य की स्थापना 1336 ई. में 2 भाइयों हरिहर राय और बुक्का राय ने की थी।

    ➣ यह काफी कम समय में ही बेहद संपन्न और धनी राज्य बन गया। यह साम्राज्य कृष्णदेव राय के शासन में चरम पर था। बुद्धिमान तेनालीराम इन्हीं के दरबार में थे।

    ➣ इस साम्राज्य का विस्तार मौजूदा कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के क्षेत्रों तक हो गया था।

    ➣ यह अपनी सम्पत्ति, कला, साहित्य, संस्कृति, व्यापार के लिए काफी ख्याति प्राप्त कर चुका था, लेकिन मुस्लिम आक्रमण से विजयनगर साम्राज्य नष्ट हो गया और हम्पी भी खंडहर में परिवर्तित हो गया।

    बीजापुर, गोलकुंडा, अहमदनगर और बीदर के मुस्लिम राज्यों ने इस राज्य पर आक्रमण करने के लिए एक गठजोड़ बना लिया और 1565 ई. की लड़ाई में विजयनगर साम्राज्य हार गया।

    ➣ उसके बाद इन राज्यों की सेनाओं ने इस शहर को बर्बाद कर दिया। हम्पी के एशिया में सबसे बड़ा खुले स्मारकों वाला गुम हुआ शहर मान जाता है। विजयवाड़ा राज्य की कतार में किलेबंदी की गई थी।

    ➣ हम्पी एक महत्वपूर्ण धार्मिक केंद्र भी रहा है। मिथकों के अनुसार रामायण कथा के द्वारा, भगवान राम और लक्ष्मण जब मां सीमा की तलाश में भटक रहे थे,

    ➣ तो वह किष्किंधा क्षेत्र में वहां के शासक वानर भाइयों वाली और सुग्रीव की खोज में पहुंचे थे।

    ➣ इस क्षेत्र का एक प्रख्यात धार्मिक आकर्षण विरूपाक्ष मंदिर भी है, जो विजयनगर के देवता भगवान विरूपाक्ष को समर्पित है।

    ➣ हम्पी में प्रत्येक वर्ष नवंबर माह में वार्षिक समारोह मनाया जाता है, जिसे हम्पी उत्सव या विजय उत्सव कहते है।

    अमीर खुसरो का परिचय

    अबुल हसन यामिन उद्दीन अमीर खुसरो का जन्म 1253 ई. में एटा, उत्तर प्रदेश के पटियाली नामक कस्बे में हुआ था।

    ➣ इनके गुरु शेख निजामुद्दीन औलिया के शिष्य थे।

    ➣ वह एक प्रमुख कवि, शायर, गायक, इतिहासकार और संगीतकार थे। वह प्रथम मुस्लिम कवि थे, जिन्होंने हिंदी शब्दों का खुलकर प्रयोग किया है।

    ➣ यह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने हिंदी, हिन्दवी और फारसी में एक साथ लिखा।

    ➣ अमीरो खुसरो को खड़ी बोली के आविष्कार का श्रेय दिया जाता है।

    ➣ यह संस्कृत भाषा के भी अच्छे जानकार थे। उनको हिन्द या भारत का तोता कहा जाता है।

    ➣ इन्होने कई गजल, खयाल, कव्वाली, रुबाई और तराना आदि की रचनाएं की।

    सितार और तबले का आविष्कार का श्रेय भी आमिर खुसरो को जाता है। साथ ही इन्हे दिल्ली सल्तनत का आश्रय भी प्राप्त हुआ था।

    ➣ यह गुलाम, खिलजी और तुगलक-तीन राजवंशों तथा 7 सुल्तानों का उत्थान-पतन के समकालीन रहे।

    ➣ अपने गुरु की मृत्यु के बाद अमीर खुसरो ने भी 1325 ई. में मृत्यु हो गई।

    कोहिनूर हीरे का इतिहास

    ➣ कोहिनूर हीरा विश्व के सभी हीरों का राजा है, जिसे गोलकुंडा (भारत) की एक खान से निकाला गया था।

    ➣ कोहिनूर को फारसी में कूह-ए-नूर कहा जाता है, जिसका अर्थ है- प्रकृति की विशाल आभा। यह हीरा 105 कैरेट का है।

    ➣ दिल्ली सल्तनत के उत्तराधिकारियों के हाथों से 1526 में यह बाबर के हाथ लगा।

    ➣ शाहजहां ने कोहिनूर को अपने मयूर सिंहासन (तख्त-ए-ताउस) में जड़वाया। नादिरशाह मुगल शासक शाह मोहम्मद से सिंहासन सहित कोहिनूर लूट ले गया।

    ➣ 1747 में नादिरशाह की हत्या के बाद कोहिनूर अहमदशाह अब्दाली के हाथों में पहुंचा। इसके बाद यह अफगानिस्तान के तत्कालीन पदच्युत शासक शूजाशाह के हाथ लगा और वह कोहिनूर के साथ पंजाब पहुंचा।

    ➣ उसने वहां के महाराजा रणजीत सिंह को यह हीरा भेंट किया। बाद में महाराजा रणजीत सिंह के उत्तराधिकारी दलीप सिंह ने एक समझौते के तहत इसको इंग्लैंड की महारानी को भेंट किया।

    ➣ कोहिनूर हीरा 2007 तक लंदन टॉवर में नुमाइश के लिए रखा गया था। फिलहाल कोहिनूर हीरे को भारत वापस लाने को कोशिशें जारी हैं।

    चौथ और सरदेशमुखी क्या थी

    ➣ मराठा कराधान प्रणाली में दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण कर थे- चौथ और सरदेशमुखी।

    चौथ के विषय में इतिहासकारों में एकमत नहीं है। फिर भी यह माना जाता है कि ‘चौथ’ एक सैन्य कर था, जो तीसरी शक्ति के आक्रमण से सुरक्षा प्रदान करने के बदले में वसूल किया जाता था।

    ➣ चौथ किसी भी क्षेत्र से प्राप्त कुल भूमि आय का एक चौथाई होता था। 16 प्रतिशत भाग राजा स्वयं अपने लिए रखता था।

    सरदेशमुखी मराठा राजा को उसके देशस्वामी (सरदेशमुख) होने के नाते दिया जाने वाला एक पुराना कर था। यह आय का 10% या 1/10 अंश के रूप में होता था।

    ➣ यह कर उन क्षेत्रों पर लगाया जाता था,जो मराठा राज्य के बाहर थे और विजय द्वारा मराठा राज्य में सम्मिलित कर लिये गये थे।

    ➣ शाहू के समय मराठा सरदार अपने पृथक कर अधिकारी नियुक्त करने लगे थे, जो केन्द्रीय अधिकारियों से भिन्न होते थे। सरदारों द्वारा गुमाश्ता नियुक्त किया जाता था, जो उनके लिए 10% सरदेशमुखी एकत्रित करता था।

    सूर्यास्त कानून क्या था

    कार्नवालिस ने 1794 ई. में सूर्यास्त कानून (Sunset Law) बनाया।

    ➣ इसके अनुसार अगर एक निश्चित तिथि को सूर्यास्त होने तक जमींदार जिला कलेक्टर के पास भू-राजस्व की रकम जमा नहीं करता तो उसकी पूरी जमींदारी नीलाम हो जाती थी।

    ➣ इसके बाद 1799 और 1812 ई. के रेग्युलेशन के आधार पर किसानों को पूरी तरह जमींदारों के नियंत्रण में कर दिया गया।

    ➣ इसके तहत यह प्रवधान किया गया कि यदि एक निश्चित तिथि को किसान जमींदार को भू-राजस्व की रकम अदा नहीं करते तो जमींदार उनकी चल और अचल दोनों प्रकार की सम्पत्ति का अधिग्रहण कर सकता है।

    ➣ परिणामस्वरूप भू-राजस्व की रकम अधिकतम रूप में निर्धारित की गयी तथा इसके लिए 1790-91 के वर्ष को आधार वर्ष बनाया गया। निष्कर्षत: 1765-93 के बीच कंपनी ने बंगाल में भू-राजस्व की दर में दुगुनी वृद्धि कर दी।

    आनन्दमठ उपन्यास -1882

    आनन्दमठ बंगाली साहित्यकार बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय के द्वारा रचित एक प्रसिद्ध उपन्यास है, जिसकी रचना 1882 ई. में हुई थी।

    ➣ भाषा मूलतः बंगाली में है। अभी तक इसमें 4 बार संशोधन से चुके हैं।

    ➣ मूलकथा 1772 ई. में पूर्णिया, दानापुरतिरहुत में अंग्रेज और स्थानीय मुस्लिम राज्य के विरूद्ध संयासियों के विद्रोह की घटना से प्रेरित है।

    वन्देमातरम गीत, जिसने सभी भारतवासियों को देश की आज़ादी के प्रति जागरुक किया और उनमें एक नई चेतना जागृत कर दी, वह आनन्दमठ में ही संकलित था।

    ➣ सन 1952 में बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय के इस उपन्यास पर आनन्दमठ नाम से एक फ़िल्म भी बनी थी, जिसमें वन्देमातरम गीत भी प्रमुख रूप से शामिल किया गया था।

    ➣ आनंद मठ का सार यह है कि किस प्रकार से हिंदू संयासियों ने मुस्लिम शासकों को हराया था। आनंद मठ मुस्लिम विरोधी उपन्यास नहीं, बल्कि राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत उपन्यास है।

    नीलदर्पण नाटक (1858-1859)

    ➣ नीलदर्पण बांग्ला भाषा में लिखा गया प्रसिद्ध नाटक है, जिसके रचनाकार दीनबंधु मित्र थे। इसकी रचना 1858-1859 में हुई।

    ➣ यह बंगाल में नील विद्रोह का अन्दोलन का कारण बना। यह बंगाली रंगमंच के विकास का अग्रदूत भी बना।

    ➣ नाटक नीलदर्पण में बंगाल में नील की खेती करने वालों का अंग्रेज़ों द्वारा शोषण, भारतीय किसानों के ऊपर अमानुषिक अत्याचारों की बड़ी भावपूर्ण अभिव्यक्ति हुई है।

    ➣ कोलकाता के नेशनल थिएटर में 1872 में यह नाटक खेला गया, जो कि पहला व्यावसायिक नाटक था।

    ➣ बांग्ला के पहले सार्वजनिक टिकट बिक्री से चलने वाले मंच पर यह नाटक जब 1872 में खेला गया तो एक ओर दर्शकों की भीड़ उमड़ पड़ी और दूसरी ओर अंग्रेज़ी अखबारों में इस पर बड़ी तीखी टिप्पणी हुई।

    1876 में अंग्रेज़ सरकार द्वारा ड्रैमेटिक परफार्मेन्सेज कन्ट्रोल ऐक्ट लाना नील दर्पण जैसे नाटकों की विद्रोही भावना का दमन भी एक उद्देश्य था।

    ➣ इस नाटक का ऐतिहसिक महत्त्व तो है ही, इसके अलावा तत्कालीन अंग्रेज़ी शासन में न्याय के पाखंड और पक्षपातपूर्ण व्यवहार पर भी प्रकाश पड़ता है।

    भूदान आंदोलन के प्रणेता : विनोबा भावे

    ➣ विनोबा भावे का जन्म 11 सितंबर, 1895 को गाहोदे, गुजरात, भारत में हुआ था। विनोबा भावे का मूल नाम विनायक नरहरि भावे था।

    ➣ इनकी समस्‍त ज़िंदगी साधु संयासियों जैसी रही, इसी कारणवश ये एक संत के तौर पर प्रख्‍यात हुए।

    ➣ सन् 1921 से लेकर 1942 तक अनेक बार जेल यात्राएं हुई। सन् 1922 में नागपुर का झंडा सत्‍याग्रह किया। 1925 में हरिजन सत्‍याग्रह के दौरान जेल यात्रा हुई।

    12 मार्च 1930 को गाँधी जी ने दांडी मार्च शुरू किया। विनोबा फिर से जेल पंहुच गए।

    ➣ 11 अक्टूबर 1940 को गाँधी द्वारा व्‍यक्तिगत सत्‍याग्रह के प्रथम सत्‍याग्रही के तौर पर विनोबा को चुना गया। 21 अक्टूबर को विनोबा को गिरफ़्तार किया गया।

    ➣ भूदान आंदोलन विनोबा भावे द्वारा 1951 ई. में प्रारंभ किया गया स्वैच्छिक भूमि सुधार आंदोलन था। इसका उद्देश्य अहिंसात्मक तरीके से देश में सामाजिक परिवर्तन लाना था।

    18 अप्रैल 1951 ई. को आचार्य बिनोवा भावे को भूमि का प्रथम दान मिला था। उन्हें यह भूमि तेलगांना क्षेत्र में स्थित पोचमपल्ली गांव में मिली थी।

    ➣ 1955 ई. में आंदोलन का नया रूप जिसे ग्राम दान के रूप में पहचाना गया। इसका अर्थ- सारी भूमि गोपाल की है। इसकी शुरूआत उड़ीसा से हुई थी।

    ➣ अपने अंतिम समय में विनोबा भावे ने सल्लेख्न्ना विधि से दीपावली के दिन 15 नवम्बर को निर्वाण के रूप में चुना।

    ➣ विनोबा को 1958 में प्रथम रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

    ➣ भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से 1983 में मरणोपरांत सम्मानित किया।

    इल्बर्ट बिल क्या था

    वायसराय लॉर्ड रिपन के कार्यकाल के दौरान इल्बर्ट बिल लाया गया था। इस बिल को सर सी.पी. इल्बर्ट ने 1883 ई. में पेश किया था।

    ➣ इस बिल के द्वारा भारतीय न्यायाधीशों को उन मामलों की सुनवाई करने का भी अधिकार प्रदान कर दिया गया जिनमें यूरोपीय नागरिक भी शामिल होते थे।

    ➣ भारतीय जनता ने इस बिल का जोरदार स्वागत किया, लेकिन अंग्रेजों ने इसका तीव्र विरोध किया। अन्ततः सरकार को झुकना पड़ा और उसने इल्बर्ट बिल में में संशोधन कर दिया।

    ➣ इस बिल में संशोधन (1884) करते हुए यह प्रावधान किया गया कि यूरोपीय अथवा ब्रिटिश नागरिक उस जूरी द्वारा अपने मामले की सुनवाई की मांग कर सकते थे, जिसके आधे सदस्य यूरोपीय या अमेरिकी हों। इसीलिए यह काला फैसला के नाम से भी जाना जाता है।

    हन्टर शिक्षा आयोग

    ➣ हन्टर शिक्षा आयोग की स्थापना ब्रिटिश शासनकाल में लॉर्ड रिपन (1880-1884 ई.) द्वारा 1882 ई. में की गई थी।

    चार्ल्स वुड के घोषणा पत्र द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में हुई प्रगति की समीक्षा के लिए सरकार ने विलियम विलसन हन्टर की अध्यक्षता में इस आयोग की नियुक्ति की थी।

    ➣ इस आयोग में आठ भारतीय सदस्य भी थे। हन्टर शिक्षा आयोग को प्राथमिक शिक्षा एवं माध्यमिक शिक्षा की समीक्षा तक ही सीमित कर दिया गया था।

    ➣ हन्टर शिक्षा आयोग’ ने जो महत्त्वपूर्ण सुझाव दिए, वे निम्नलिखित थे-

    ➣ हाई स्कूल स्तर पर दो प्रकार की शिक्षा की व्यवस्था हो, जिसमें एक व्यवसायिक एवं व्यापारिक शिक्षा दिये जाने पर बल दिया जाये तथा दूसरी ऐसी साहित्यिक शिक्षा दी जाये, जिससे विश्वविद्यालय में प्रवेश हेतु सहायता मिले।

    ➣ प्राथमिक स्तर पर शिक्षा के महत्व पर बल एवं स्थानीय भाषा तथा उपयोगी विषय में शिक्षा देने की व्यवस्था की जाये।

    ➣ शिक्षा के क्षेत्र में निजी प्रयासों का स्वागत हो, लेकिन प्राथमिक शिक्षा उसके बगैर भी दी जाये।

    ➣ प्राथमिक स्तर पर शिक्षा का नियंत्रण ज़िला व नगर बोर्डों को सौंप दिया जाये।

    द्वैध शासन पद्धति क्या थी

    ➣ द्वैध शासन पद्धति संवैधानिक व्यवस्था का एक रूप थी। ‘द्वैध शासन’ का सिद्धान्त सबसे पहले अंग्रेज़ लियोनेल कर्टिस ने प्रतिपादित किया था, जो बहुत दिनों तक राउण्ड टेबिल का सम्पादक रहा। बाद में यह सिद्धान्त 1919 ई. के ‘भारतीय शासन विधान’ में लागू किया गया, जिसके अनुसार प्रान्तों में द्वैध शासन स्थापित हुआ।

    अंग्रेज़ों द्वारा यह कहा गया कि– “यह शासन पद्धति भारतीयों को नेतृत्व का प्रशिक्षण देने के लिए है”, किंतु वास्तव में यह पद्धति भारतीयों की क्षमताओं पर एक भीषण आघात था।

    ➣ इस पद्धति के अनुसार प्रान्तों में शिक्षा, स्वायत्त शासन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, सार्वजनिक निर्माण, कृषि तथा सहकारिता आदि विभागों का प्रशासन मंत्रियों को हस्तांतरित कर दिया गया। ये मंत्री प्रान्तीय विधान सभा के निर्वाचित सदस्य होते थे और विधान सभा के प्रति उत्तरदायी होते थे।

    ➣ दूसरी ओर राजस्व, क़ानून, न्याय, पुलिस, सिंचाई, श्रम तथा वित्त आदि विभागों का प्रशासन गवर्नर की एक्जीक्यूटिव कौंसिल के सदस्यों के लिए सुरक्षित रखा गया था।

    सैडलर आयोग

    ➣ सैडलर आयोग का गठन 1917 ई. में कलकत्ता विश्वविद्यालय की समस्याओं के अध्ययन के लिए डॉक्टर एम.ई. सैडलर के नेतृत्व में किया गया था।

    ➣ इस आयोग में दो भारतीय भी, डॉक्टर आशुतोष मुखर्जी एवं डॉक्टर जियाउद्दीन अहमद सदस्य थे। इस आयोग ने कलकत्ता विश्विद्यालय के साथ-साथ माध्यमिक स्नातकोत्तरीय शिक्षा पर भी अपना मत व्यक्त किया।

    इसके निम्नलिखित बिंदु इस प्रकार थे –

    1. सैडलर आयोग ने 1904 ई. के ‘विश्विद्यालय अधिनियम’ की कड़े शब्दों में निंदा की। आयोग ने अपने सुझाव भी दिए, जो निम्नलिखित थे-

    2. इंटर व उत्तर माध्यमिक परीक्षा को माध्यमिक तथा विश्वविद्यालयी शिक्षा के मध्य विभाजन रेखा मानना चाहिए।

    3. स्कूली शिक्षा 12 वर्ष की होनी चाहिए।

    4. ऐसी शिक्षण संस्थायें स्थापित करने का सुझाव दिया गया, जो इण्टरमीडिएट महाविद्यालय कहलायें। ये महाविद्यालय चाहे तो स्वतन्त्र रहें या फिर हाई स्कूल से सम्बद्ध हो जायें।

    5. इन संस्थाओं के प्रशासन हेतु माध्यमिक तथा उत्तर माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के निर्माण की सिफारिश की गई।

    6. इण्टरमीडिएट के बाद स्नातक स्तर की शिक्षा तीन वर्ष की होनी चाहिए।

    7.आयोग ने पास तथा ऑनर्स व साधारण तथा प्रवीण्य पाठ्यक्रम शुरू करने का भी सुझाव दिया।

    8. विश्वविद्यालयों को यह सुझाव भी दिया गया था, कि बहुत सख्त नियम न बनाये जायें।

    9. प्राचीन सम्बद्ध विश्वविद्यालयों की जगह पूर्ण स्वायत्त आवासीय एवं एकात्मक स्वरूप के विश्वविद्यालयों की स्थापना का सुझाव दिया गया।

    10. कलकत्ता विश्वविद्यालय’ के कार्य के भार को कम करने के लिए आयोग ने ढाका में ‘एकाकी विश्वविद्यालय’ की स्थापना का सुझाव दिया।

    11. आयोग ने ढाका एवं कलकत्ता विश्वविद्यालयों में अध्यापकों के प्रशिक्षण के लिए शिक्षा विभाग खोलने की सलाह दी।

    ➣ इस आयोग ने व्यावसायिक कॉलेज खोलने की तरफ सरकार का ध्यान आकर्षित किया।

    ➣ सैडलर आयोग’ के सुझाव पर उत्तर प्रदेश में एक बोर्ड ऑफ़ सेंकेडरी एजूकेशन की स्थापना हुई।

    रौलट एक्ट-1919

    ➣ रौलट एक्ट 8 मार्च, 1919 ई. को लागू किया गया था।

    ➣ भारत में क्रान्तिकारियों के प्रभाव को समाप्त करने तथा राष्ट्रीय भावना को कुचलने के लिए ब्रिटिश सरकार ने न्यायाधीश सर सिडनी रौलट की अध्यक्षता में एक कमेटी नियुक्त की।

    ➣ कमेटी द्वारा दिये गये सुझावों के आधार पर केन्द्रीय विधानमण्डल में फ़रवरी, 1919 ई. में दो विधेयक लाये गये। इन विधेयकों को ‘रौलट एक्ट’ या ‘काला क़ानून’ के नाम से जाना गया।

    ➣ इस विधेयक में की गयी व्यवस्था के अनुसार मजिस्ट्रेटों के पास यह अधिकार था कि वह किसी भी संदेहास्पद स्थिति वाले व्यक्ति को गिरफ्तार करके उस पर मुकदमा चला सकता था।

    ➣ अपने इस अधिकार के साथ अंग्रेज़ सरकार किसी भी निर्दोष व्यक्ति को दण्डित कर सकती थी। इस प्रकार क़ैदी को अदालत में प्रत्यक्ष उपस्थित करने अर्थात् बंदी प्रत्यक्षीकरण के क़ानून को निलंबित करने का अधिकार सरकार ने रौलट क़ानून से प्राप्त कर लिया।

    ➣ इस एक्ट को बिना अपील, बिना वकील तथा बिना दलील का क़ानून भी कहा गया। इसके साथ ही इसे काला अधिनियम एवं आतंकवादी अपराध अधिनियम के नाम से भी जाना जाता हैं।

    ➣ राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने इस एक्ट का पुरजोर विरोध किया और ब्रिटिश सरकार को शैतानी लोगों की संज्ञा दी

    जलियांवाला बाग हत्याकांड

    13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के पर्व पर पंजाब में अमृतसर के जलियांवाला बाग में ब्रिटिश ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर द्वारा किए गए निहत्थे मासूमों के हत्याकांड को जलियांवाला बाग हत्याकांड नाम से जाना जाता है।

    ➣ पंजाब के दो बड़े नेताओं सत्यपाल और डॉ. किचलू को गिरफ्तार कर निर्वासित कर दिया गया जिससे अमृतसर में लोगों का गुस्सा फूट पड़ा था।

    13 अप्रैल को बैसाखी के दिन आंदोलनकारी जलियांवाला बाग में जमा हुए , जैसे ही पंजाब प्रशासन को यह खबर मिली। ब्रिगेडियर जनरल डायर के कमान सैनिक टुकड़ी जलियांवाला बाग पहुंची।

    ➣ बिना चेतावनी के जनरल डायर ने भारतीयों पर अंधाधुंध गोलियों चलाई जिसमें हज़ारों निहत्थे पुरुष, महिलाएँ और बच्चे मारे गए थे।

    ➣ घटना के पश्चात् बंगाली कवि, रवींद्रनाथ टैगोर ने नाइटहुड(1915) की उपाधि को त्याग दिया। महात्मा गांधी ने कैसर-ए-हिंद की उपाधि वापस कर दी, जिसे इन्हें बोअर युद्ध के दौरान अंग्रेज़ों द्वारा दिया गया था।

    हंटर आयोग और उसकी रिपोर्ट

    ➣ देश में जलियांवाला बाग के हत्याकांड को लेकर जो उग्र प्रदर्शन आदि हुए,उससे विवश होकर ब्रिटिश सरकार द्वारा 1 अक्टूबर, 1919 को हंटर आयोग का गठन किया गया।

    लॉर्ड हंटर को इसका अध्यक्ष नियुक्त किया गया।

    ➣ आठ सदस्यों वाले इस आयोग में पांच अंग्रेज लॉर्ड हंटर, जस्टिस सर जॉर्ज रैंकिग, डब्ल्यू.एफ. राइस, मेजर जनरल सर जॉर्ज बैरो एवं सर टॉमस स्मिथ, तीन भारतीय सदस्य सर चिमन सीतलवाड़, साहबजादा सुल्तान अहमद एवं जगत नारायण थे।

    ➣ इस आयोग ने मार्च 1920 ई में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें उसने जलियांवाला बाग के सम्पूर्ण प्रकरण पर लीपा-पोती करने का प्रयास किया।

    ➣ इस रिपोर्ट प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं-

    1. पंजाब के गवर्नर को निर्दोष घोषित किया गया। जनरल डायर ने कर्तव्य को गलत समझते हुए जरूरत से अधिक बल प्रयोग किया, पर जो कुछ किया, निष्ठा से किया।

    2. डायर को इस अपराध के लिए नौकरी से हटाने का दण्ड दिया गया।

    ➣ जनरल डायर के घृणित कृत्य के बावजूद ब्रिटिश सरकार ने उसकी सेवाओं के लिए उसे मान की तलवार की उपाधि प्रदान की। ब्रिटिश अखबारों ने उसे ब्रिटिश साम्राज्य का रक्षक एवं हाउस ऑफ लॉर्ड्स ने उसे ब्रिटिश साम्राज्य का शेर कहा।

    उधम सिंह ने जलियाबाग हत्याकांड के जनरल ओ डायर की 13 मार्च 1940 को लन्दन के रायल सेंट्रल एशियन सोसायटी के कार्यक्रम में हत्या कर दी। इन्हें वहीं पेन्टनविले जेल में 31 जुलाई, 1940 को फांसी की सजा दी गई।

    साइमन कमीशन और उसकी सिफारिशें

    8 नवम्बर, 1927 को ब्रिटिश सरकार ने सर जॉन साइमन के नेतृत्व में भारतीय वैधानिक आयोग के गठन की घोषणा की।

    ➣ इसमें कुल सदस्यों की संख्या 7 थी, जिसमें कोई भी भारतीय प्रतिनिधि नहीं था। इसीलिए इसको श्वेत आयोग कहा गया।

    ➣ इस आयोग ने 27 मई, 1930 को अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसकी प्रमुख सिफारिशें इस प्रकार थीं-

    ➣ 1919 के भारत सरकार अधिनियम के तहत लागू की गयी द्वैध शासन व्यवस्था को समाप्त कर उत्तरदायी शासन की स्थापना हो।

    ➣ 1. भारत के लिए एक संघीय संविधान होना चाहिए।

    ➣ 2. भारत के लिए एक ऐसा लचीला संविधान बनाया जाये, जिसे स्वयं भारतीय विकसित करें।

    ➣ 3. उच्च न्यायालय को भारत सरकार के नियंत्रण में कर दिया जाये।

    ➣ 4. बर्मा (वर्तमान म्यांमार) को भारत से विलग किया जाये तथा उड़ीसा एवं सिंध को अलग राज्य का दर्जा दिया जाये। प्रांतीय विधानमंडलों में सदस्यों की संख्या बढ़ाई जाये।

    नेहरू समिति व उसकी रिपोर्ट

    ➣ साइमन कमीशन के बहिष्कार के बाद भारत सचिव लॉर्ड बर्कन हेड ने भारतीयों को अपना संविधान बनाने की चुनौती दी। इस चुनौती को स्वीकार करते हुए पं. मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में 28 फरवरी, 1928 को नेहरू समिति का गठन किया गया।

    ➣ इस समिति के अन्य सदस्य में शामिल थे-

    ➣ सर अली इमाम, एम.एस. अणे, तेजबहादुर सघू, मंगल सिंह, जी.आर. प्रधान, शोएब कुरेशी, सुभाषचन्द्र बोस, एन. एम. जोशी और जी.पी. प्रधान आदि।

    ➣ इस समिति ने 28 अगस्त, 1928 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसके प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं-

    ➣ भारत को डोमिनियन स्टेट्स का दर्जा दिया जाये।

    ➣ 1. संसदीय रूप की सरकार स्थापित की जाये जिसमें द्विसदनीय विधायिका- सीनेट और प्रतिनिधि सभा हो।

    ➣ 2. सीनेट का गठन 7 वर्ष के लिए चुने जाने वाले 200 सदस्यों से मिलकर हो और प्रतिनिधि सभा में 5 वर्ष के लिए चुने जाने वाले 500 सदस्य शामिल हों।

    ➣ 3. गवर्नर जनरल कार्यकारी परिषद की सलाह पर कार्य करे जो सामूहिक रूप से संसद के प्रति उत्तरदायी हो।

    ➣ 4. न्यायपालिका विधायिका से स्वतंत्र हो।

    ➣ 5. प्रांतों में द्वैध शासन को समाप्त कर प्रांतीय स्वायत्तता प्रदान की जाये।

    ➣ 6. नागरिकों को मौलिक अधिकार दिये जायें।

    ➣ 7. साम्प्रदायिक निर्वाचन के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन प्रणाली हो।

    ➣ 8. अल्पसंख्यकों को उनकी संख्या के अनुपात में आरक्षण मिले।

    अगस्त प्रस्ताव क्या था

    ➣ मार्च 1940 में कांग्रेस ने अपने रामगढ़ अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित कर ब्रिटिश सरकार से कहा कि यदि वह केन्द्र में एक अंतरिम राष्ट्रीय सरकार गठित करे तो, कांग्रेस द्वितीय विश्व युद्ध में सरकार का सहयोग कर सकती है।

    ➣ इसके जवाब में 8 अगस्त, 1940 को भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने अगस्त प्रस्ताव की घोषणा की।

    ➣ इस प्रस्ताव के प्रमुख प्रावधान इस प्रकार थे-

    ➣ अतिशीघ्र वायसराय की सलाहकार परिषद के विस्तार के साथ ही कार्यकारिणी में भारतीय प्रतिनिधियों की संख्या बढ़ाना।

    1. अल्पसंख्यकों को विश्व में लिये बिना किसी भी संवैधानिक परिवर्तन को लागू नहीं किया जा सकेगा।

    2. युद्ध संबंधी विषयों पर विचार हेतु युद्ध परामर्श समिति का गठन किया जायेगा।

    3. युद्ध समाप्त होने के बाद भारत को डोमिनियन स्टेट्स का दर्जा प्रदान किया जायेगा।

    4. युद्ध के समाप्त होने पर विभिन्न भारतीय दलों के प्रतिनिधियों की एक सभा बुलाकर उनके साथ संवैधनिक विकास पर विचार-विमर्श किया जायेगा।

    ➣ यह प्रथम अवसर था जब भारतीयों के संविधान निर्माण के अधिकार को स्वीकार किया गया और कांग्रेस ने संविधान सभा के गठन को सहमति प्रदान की। कांग्रेस ने अगस्त प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।

    ➣ जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि डोमिनियन राज्य का सिद्धांत अब मृतप्राय हो चुका है। उन्होंने कहा कि जिस डोमेनियन स्टेट की स्थिति पर यह प्रस्ताव आधारित है, वह दरवाजे में जड़ी जंग लगी कील की तरह है। गांधीजी ने कहा कि इस घोषणा ने राष्ट्रवादियों और ब्रिटिश शासकों के बीच की खाई को और चौड़ा कर दिया है।

    क्रिप्स मिशन

    ➣ ब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल द्वारा सर स्टैफोर्ड क्रिप्स के नेतृत्व में मार्च 1942 में क्रिप्स मिशन भारत भेजा गया, जिसका उद्देश्य भारत के राजनीतिक गतिरोध को दूर करना था।

    ➣ हालांकि इस मिशन का वास्तविक उद्देश्य द्वितीय विश्व युद्ध में भारतीयों को सहयोग प्रदान करने के लिए उन्हें फुसलाना था।

    ➣ इस मिशन के दो अन्य सदस्य थे- एवी अलेक्जेंडर तथा पैथिक लॉरेंस।

    ➣ इस मिशन ने जो प्रस्ताव प्रस्तुत किये उसके प्रमुख प्रावधान इस प्रकार थे-

    1. डोमिनियन राज्य के दर्जे के साथ एक भारतीय संघ की स्थापना की जायेगी।

    2. भारतीय संघ राष्ट्रमंडल के साथ अपने संबंधों के निर्धारण में स्वतंत्र होगा तथा संयुक्त राष्ट्र संघ एवं अन्य अंतर्राष्ट्रीय निकायों एवं संस्थाओं में अपनी भूमिका को स्वयं निर्धारित करेगा।

    3. युद्ध की समाप्ति के बाद नये संविधान निर्माण के लिए संविधान निर्माण सभा का गठन किया जायेगा। इसके कुछ सदस्य प्रांतीय विधायिकाओं द्वारा निर्वाचित किये जायेंगे तथा कुछ राजाओं द्वारा मनोनीत किये जायेंगे।

    4. संविधान सभा द्वारा निर्मित संविधान जिन प्रांतों को स्वीकार नहीं होगा, वे भारतीय संघ से पृथक होने के अधिकारी होंगे। पृथक होने वाले प्रांतों को अपना पृथक संविधान बनाने का अधिकार होगा। देशी रियासतों को भी इसी प्रकार का अधिकार होगा।

    5. नवगठित सविधान सभा तथा ब्रिटिश सरकार सत्ता के हस्तांतरण और प्रजातीय एवं धार्मिक अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के मुद्दे को आपसी समझौते द्वारा हल करेंगे।

    6. नये भारतीय संविधान के निर्माण होने तक भारतीयों की रक्षा का उत्तरदायित्व ब्रिटिश सरकार पर होगा।

    7. गवर्नर जनरल की समस्त शक्तियां पूर्ववत् बनी रहेंगी।

    ➣ क्रिप्स मिशन 23 मार्च, 1942 को दिल्ली पहुंचा।

    ➣ कांग्रेस की ओर से जवाहरलाल नेहरू तथा मौलाना अबुल कलाम आजाद को क्रिप्स मिशन के संदर्भ में परीक्षण एवं विचार-विमर्श करने के लिए अधिकृत किया गया था।

    ➣ महात्मा गांधी ने इस प्रस्ताव को दिवालिया बैंक के नाम भविष्य की तिथि में भुनाने वाला चेक’ (Outdated Cheque) कहा, जबकि पं. नेहरू ने कहा कि क्रिप्स प्रस्ताव एक ऐसे बैंक के नाम चेक है, जो टूट रहा है।

    ➣ मुस्लिम लीग ने भी इसे अस्वीकार कर दिया, क्योंकि इसमें पाक का उल्लेख नहीं था।

    11 अप्रैल, 1942 को इसे वापस ले लिया गया।

    सी.आर. फार्मूला

    चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग के समझौते के पक्षधर थे। देश की सांप्रदायिक समस्या सुलझाने के उद्देश्य से 10 जुलाई, 1944 को गांधीजी की स्वीकृति से उन्होंने कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के बीच समझौते की एक योजना प्रस्तुत की, जिसे सी.आर. फॉर्मूला कहा जाता है।

    ➣ इस फॉर्मूला के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं-

    1. मुस्लिम लीग भारतीय स्वतंत्रता की मांग का समर्थन करे।

    2. अस्थायी सरकार के गठन में कांग्रेस के साथ सहयोग की भूमिका अदा करे।

    3. द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद भारत के उत्तर-पश्चिमी व पूर्वी भागों में स्थित मुस्लिम बहुसंख्यक क्षेत्रों की सीमा का निर्धारण करने के लिए एक आयोग का गठन किया जाये।

    4. इन क्षेत्रों में जनमत संग्रह द्वारा निर्णय किया जाये कि वे भारत से अलग होना चाहते हैं या नहीं।

    ➣ देश विभाजन की स्थिति में रक्षा, संचार, यातायात या अन्य अनिवार्य विषयों पर आपसी समझौते की व्यवस्था की जाये।

    ➣ उपर्युक्त शर्ते तभी मानी जायेंगी, जब ब्रिटेन भारत को पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान करे।

    ➣ इस फॉर्मूले को नेताओं ने स्वीकार नहीं किया,

    ➣ लेकिन कालांतर में इसी फॉर्मूले के आधार पर भारत का विभाजन किया गया।

    ➣ राजगोपालाचारी पहले कांग्रेसी नेता थे, जिन्होंने पाकिस्तान की मांग का समर्थन किया।

    दिल्ली भारत की राजधानी कैसे बनी

    नई दिल्ली नाम से निकला न्यू देलही तोमर राजा अनंगपाल ने 11वीं सदी में अपने साम्राज्य को स्थापित करने के लिए किसी किंवदन्ती के अन्तर्गत लालकोट में एक लोहे की कील भूमि में लगवाई थी।

    ➣ 1000 ईसा पूर्व पहले मौर्य वंश के राजा दिल्लू ने शहर का पुनर्निमाण किया और उसी के नाम पर दिल्ली को इसका वर्तमान नाम प्राप्त हुआ था। दिल्ली शब्द लालकोट क्षेत्र में बसे शहर का नाम पड़ गया, जो बाद में दिल्ली में परिवर्तित हो गया।

    ➣ दिल्ली नगर की स्थापना 11वीं शताब्दी में तोमर वंश के राजपूत शासक द्वारा की गयी और बाद में पृथ्वी राज चौहान ने दिल्ली पर शासन किया।

    1192 ई. में तराइन की दूसरी लड़ाई में मुहम्मद गौरी से पृथ्वी राज चौहान के पराजित हो जाने पर दिल्ली मुस्लिम शासकों के नियंत्रण में आ गई और आगामी 600 वर्षों तक मुस्लिम शासकों के अधीन रही।

    हिन्दू काल
    1. इन्द्रप्रस्थपाण्डवों
    2. अनंगपुर या अड़गपुर अनंगपाल
    3. राय पिथौरा पृथ्वीराज चौहान
    मुस्लिम काल
    1.किलाराय पिथौरा (महरौली) गुलाम बादशाहो
    2. किलोखड़ी कैकुबाद की दिल्ली
    3. सीरी अलाउद्दीन खिजली
    4. तुगलकाबाद ग्यासुद्दीन तुगलक
    5. जहांपनाह मुहम्मद आदिलशाह
    6. फिरोजाबाद फिरोज तुगलक
    7. खिजाबाद खिज्र खां
    8. मुबारकाबाद मुबारकशाह
    9. दीनपनाह हुमायूं
    10. शेरगढ़ शेरशाह सूरी
    11. सलीमगढ़सलीमशाह सूरी
    12. शाहजहांनाबाद शाहजहां
    ब्रिटिश काल
    1. सिविल लाइंस
    2. ल्युटियन की दिल्ली
    3. नई दिल्ली

    प्लासी युद्ध के पश्चात् अंग्रेजों ने कोलकाता, बंगाल को राजधानी के रूप में इस्तेमाल किया।

    12 दिसम्बर 1911 में दिल्ली में राजधानी बनाने की घोषणा जॉर्ज पंचम के द्वारा की गई थी। तत्प्श्चात 1912 में राजधानीदिल्ली स्थान्तरित हुई।

    ➣ इसके लिए एडवर्ड लुटियन और हरबर्ट बेकर ने नई राजधानी की रूपरेखा बनाई गई। उन्होंने इंडिया गेट,राष्ट्रपति भवन को भी आकार दिया था।

    नई देलही शब्द का प्रयोग प्रथम बार 1916 में किया गया था। शहर का उद्घाटन 13 फरवरी, 1931 को तत्कालीन गर्वनर जनरल लार्ड इरविन ने किया था।

    1857 ई. के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के समय अंग्रेजों ने दिल्ली के मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को सत्ता से हटाकर अपने साम्राज्य में मिला लिया।

    ➣ 1911 ई. में ब्रिटिश साम्राज्य की राजधानी कोलकाता से हटाकर दिल्ली लायी गयी तथा स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इसे ही भारत संघ की राजधानी बनाया गया।

    1 नवम्बर, 1956 को दिल्ली को केंद्र शासित क्षेत्र घोषित किया गया।

    दिसम्बर 1991 में संसद ने 69वां संविधान संशोधन करके दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र घोषित किया गया।

    वायसराय भवन या राष्ट्रपति भवन

    रायसीन पहाड़ी पर निर्मित वायसराय भवन अब राष्ट्रपति भवन कहलाता है। इसमें निवास करने वाला प्रथम वायसराय लॉर्ड इरविन था।

    ➣ इस भवन के मुख्य वास्तुकार एडविन लुटियंस जबकि इसके प्रमुख इंजीनियर हग कीलिंग थे। इस भवन का अधिकतम निर्माण कार्य ठेकेदार हारून अल राशिद के द्वारा किया गया।

    ➣ यह भवन 330 एकड़ में फैला हुआ है। इस भवन में 340 कमरे, 74 बरामदे, 37 सभागृह, क़रीब एक किलोमीटर का गलियारा, 18 सीढ़ियाँ मार्ग और 37 फ़व्वारे हैं।

    ➣ भवन का निर्माण कार्य 1912 से शुरू हुआ और 1929 को पूर्ण रूप से तैयार हुआ जबकि 1931 में खोला गया।

    ➣ स्वाधीनता प्राप्ति के बाद 15 अगस्त 1947 को दरबार हॉल में ही नई सरकार का शपथ ग्रहण समारोह हुआ था।

    ➣ वर्तमान भारत के राष्ट्रपति, राष्ट्रपति भवन के उन कक्षों में नहीं रहते है, जहां वायसराय निवास किया करते थे बल्कि वे अतिथि कक्ष में रहते है।

    संसद भवन

    ➣ संसद भवन का निर्माण 1921-29 के दौरान किया गया था यह एक विशाल

    ➣ वृत्ताकार भवन है। संसद भवन की अभिकल्पना दो प्रसिद्ध वास्तुकार एडविन लुटियंस एवं हरबर्ट बेकर ने किया था।

    ➣ इसकी आधारशिला 12 फरवरी 1921 को द ड्यूक ऑफ कनाट ने रखी थी। इसके निर्माण में कुल 6 वर्ष लगे।

    ➣ इसका उद्घाटन समारोह भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड इरविन ने 18 जनवरी 1927 को आयोजित किया।

    ➣ संसद भवन का केंद्र बिंदु केंद्रीय कक्ष या सेंट्रल हॉल का विशाल वृत्ताकार ढ़ाचा है।

    ➣ भारत के संविधान सभा की बैठक इसी कक्ष में हुई थी।

    1947 में अंग्रेजों से भारतीयों के हाथों में सत्ता का इस कक्ष का प्रयोग अब दोनों सदनों की संयुक्त बैठक के लिए तथा राष्ट्रपति और विशिष्ट अतिथियों राज्य या शासनाध्यक्ष के अभिभाषण के लिए किया जाता है।

    ➣ केंद्रीय कक्ष के दरवाजे के ऊपर पंचतंत्र से संस्कृत का एक पद्यांश लिखा मिलता है, जिसका अर्थ यह मेरा है और होता है। वह पराया है इस तरह की धारणा संकीर्ण मन वालों की होती है । विशाल हृदय वालों के लिए सारा विश्व ही उनका कुटुंब

  • भारतीय इतिहास के विभिन्न चरण एंव स्रोत

    📚 विषय सूची

    इतिहास के विभिन्न चरण

    bharatiya-itihaas-charan

    हेरोडोटस (Herodotus), यूनान का प्रथम इतिहासकार व भूगोलवेत्ता था। हेरोडोटस का संस्कृत नाम हरिदत्त था।

    हेरोडोटस हिस्ट्री (History) शब्द के प्रथम प्रयोगकर्ता थे। इन्होंने वास्तविक इतिहास लेखन की नींव रखी थी।

    ➣ रोमन दार्शनिक सिसरो ने हेरोडोटस को इतिहास का जनक/पिता (Father of History) की संज्ञा दी थी।

    ➣ इन्होंने अपने इतिहास का विषय पेलोपोनेसियन युद्ध को बनाया था। इनकी प्रसिद्ध पुस्तक हिस्टोरिका (Historica) थी।

    भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (ASI)

    ➣ यह भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण, पर्यटन एवं संस्कृति मन्त्रालय के अन्तर्गत कार्य करता है।

    ➣ भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (ASI) ब्रिटिश पुरातत्त्वशास्त्री विलियम जोन्स द्वारा 15 जनवरी, 1784 को स्थापित एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल (कोलकाता) का उत्तराधिकारी था।

    1788 में इनका पत्र द एशियाटिक रिसचेंज प्रकाशित होना आरम्भ हुआ था और 1814 में यह प्रथम संग्रहालय बंगाल में बना।

    ➣ ASI अपने वर्तमान रूप में 1861 में ब्रिटिश शासन के अधीन सर अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा तत्कालीन वायसराय चार्ल्स जॉन कैनिंग की सहायता से स्थापित हुआ था।

    ➣ भारत में पाषाणकालीन सभ्यता की खोज का कार्य सर्वप्रथम 1863 ई. में अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा आरम्भ हुआ।

    ➣ पुरातत्त्व के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए कनिंघम को भारतीय पुरातत्त्व का जनक कहा जाता है।

    ➣ पुरातत्त्व विभाग के तीसरे महानिदेशक जॉन मार्सल के निदेशन से ही दयाराम साहनी ने सिंधु सभ्यता का उत्खनन किया था।

    भारतीय इतिहास के स्रोत

    bharatiya-itihaas-srot

    ➣ भारतीय इतिहास जानने के स्रोत को तीन भागों में विभाजित किया गया है – 1. साहित्यिक साक्ष्य
    2. पुरातात्विक साक्ष्य
    3. विदेशी यात्रियों का विवरण

    साहित्यिक साक्ष्य एंव पुरातात्विक साक्ष्य

    sahitya-puratatwik-sakshy

    साहित्यिक साक्ष्य

    ➣ इसके अन्तर्गत साहित्यिक ग्रन्थों से प्राप्त ऐतिहासिक वस्तुओं का अध्ययन किया जाता है। साहित्यिक साक्ष्य को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है- धार्मिक साहित्य और लौकिक साहित्य

    धार्मिक साहित्य

    ➣ धार्मिक साहित्य के अन्तर्गत ब्राह्मण तथा ब्राह्मणेत्तर साहित्य की चर्चा की जाती है।

    ब्राह्मण ग्रन्थों में-वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, पुराण, स्मृति ग्रन्थ आते हैं। जबकि ब्राह्मणेत्तर ग्रन्थों में जैन तथा बौद्ध ग्रन्थों को सम्मिलित किया जाता है।

    बौद्ध ग्रन्थ
    सुत्तपिटकआनंदबुद्ध के धार्मिक विचारों एवं उपदेशों का संग्रह।
    दीर्घ निकाय
    मज्झिम निकाय
    संयुक्त निकाय
    अंगुत्तर निकाय
    खुद्दक निकाय
    विनयपिटकउपालिमठ में रहने वाले के लिए अनुशासन संबंधी नियम
    अभिधम्म पिटकमोग्गलिपुत्र तिस्सबौद्ध मतों को दार्शनिक व्याख्या
    दीपवंशश्रीलंका का इतिहास
    महावंशमगध नरेशों की सूची
    मिलिंदपन्होनागसेनमिनाडंर और बौद्ध भिक्षु नागसेन के बीच वार्ता
    बुद्धचरितअश्वघोसगौतम बुद्ध का जीवन-चरित
    सौन्दरानंदअश्वघोसनंद की प्रवज्या की कथा
    सारिपुत्र प्रकरणअश्वघोससारिपुत्र और मौद्गल्यायन को प्रवज्या का वर्णन
    जैन ग्रन्थ

    ➣ जैन साहित्य को आगम कहा जाता है। आगम के अंतर्गत 12 अंग के अतिरिअत 12 उपांग, 10 प्रकीर्ण, 6 छंद सूत्र, नंदिसूत्र, अनुयोग द्वार एवं मूल सूत्र आते हैं।

    ➣ इन आगम ग्रंथों की रचना महावीर की मृत्यु के बाद श्वेतांबर संप्रदाय के आचार्यों द्वारा की गई।

    ➣ 12 अंग इस प्रकार हैं-1. आचारंग सूत्र, 2. सूयगदंग सूत्र, 3. ठाणंग सूत्र, 4. समवायंग सूत्र, 5. भगवती सूत्र, 6. न्यायधम्मकहा, 7. उवासगदसाओं, 8. अंतगडद्साओं, 9. अणुत्तरोववाइय दसाओं, 10. पण्हावागरणिआई, 11. विवागसुयम्, 12. दिट्टिवाय।

    लौकिक साहित्य

    ➣ वह साहित्य है, जो अर्द्ध ऐतिहासिक होता है तथा इसमें कल्पना व सत्य का मिश्रण होता है। इसके अंतर्गत नाटक, काव्य, कथा साहित्य समाहित होता है।

    ➣ प्रमुख लौकिक साहित्यिक ग्रंथ निम्नलिखित हैं-

    रचनारचनाकार>विशेष तथ्य
    अष्टाध्यायीपाणिनीव्याकरण ग्रंथ की संस्कृत रचना
    महाभाष्यपतंजलिपुष्यमित्र शुंग के विषय में जानकारी।
    मुद्राराक्षसविशाखदत्तमौर्य काल के बारे में पर्याप्त जानकारी।
    कथासरित्सागरसोमदेवमौर्य काल के विषय में जानकारी।
    बृहत्कथामंजरीक्षेमेंद्रमौर्य काल के विषय में जानकारी।
    अर्थशास्त्रकौटिल्यमौर्य काल के बारे में वृहद जानकारी।
    नीतिसारकामदकगुप्तकालीन राजतंत्र पर जानकारी।
    मालविकाग्नित्रिमकालिदासशुंग वंश के बारे में जानकारी।
    मृच्दकटिकम्शूद्रकगुप्तकालीन समाज का वर्णन।
    हर्षचरितबाणभट्टहर्ष की उपलब्धियों का वर्णन।
    रामचरितसंध्याकरनंदी बंगाल के शासक रामपाल की जीवन कथा।
    पृथ्वीराज रासों चंदबरदाई पृथ्वीराज चौहान की उपलब्धियों का वर्णन।
    राजतरंगिणीकल्हणकश्मीर के राजवंशों की क्रमबद्ध जानकारी।
    धर्म-ग्रन्थ

    ➣ प्राचीन काल में भारत के धर्म प्रधान देश होने के कारण यहां प्रायः तीन धार्मिक धारायें- वैदिक, जैन एवं बौद्ध प्रवाहित हुईं। वैदिक धर्म ग्रन्थ को ब्राह्मण धर्म ग्रन्थ भी कहा जाता है।

    ब्राह्मण धर्म-ग्रंथ

    ➣ ब्राह्मण धर्म – ग्रंथ के अन्तर्गत वेद, उपनिषद्, महाकाव्य तथा स्मृति ग्रंथों को शामिल किया जाता है।

    पुरातात्विक साक्ष्य

    ➣ पुरातात्विक साक्ष्य के अंतर्गत मुख्यतः अभिलेख, सिक्के, स्मारक, भवन,टीले , मूर्तियां चित्रकला आदि आते हैं।

    अभिलेख

    ➣ इतिहास निमार्ण में सहायक पुरातत्त्व सामग्री में अभिलेखों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसके अध्ययन को पुरालेखशास्त्र (एपिग्राफी) कहा जाता है।

    ➣ अभिलेख अधिकांशतः स्तम्भों, शिलाओं, ताम्रपत्रों, मुद्राओं पात्रों, मूर्तियों, गुहाओं आदि में खुदे हुए मिलते हैं।

    ➣ प्राचीनतम अभिलेख मध्य एशिया के बोगजकोई नाम स्थान से क़रीब 1400 ई.पू. में पाये गये जिनमें अनेक वैदिक देवताओं – इन्द्र, मित्र, वरुण, नासत्य आदि का उल्लेख मिलता है।

    शासकअभिलेख
     हाथीगुम्फा अभिलेखकलिंग राज खारवेल
     जूनागढ़ अभिलेखरूद्रदामन
     नासिक अभिलेखगौतमी बलश्री
     प्रयाग स्तम्भ लेखसमुद्रगुप्त
     ऐहोल अभिलेखपुलकेशिन-II
     मन्दसौर अभिलेखमालवा नरेश यशोवर्मन
     ग्वालियर अभिलेखप्रतिहार नरेश भोज
     भितरी व जूनागढ़ अभिलेखस्कंदगुप्त
     देवपाड़ा अभिलेखबंगाल शासक विजयसेन

    उदय गिरि से प्राप्त हाथी गुफा अभिलेख से कलिंग नरेश खारवेल की उपलब्धियों के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। यह अभिलेख प्राकृत भाषा में लिखित स्वयं खारवेल का है।

    शक क्षत्रप रूद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख से शक शासक रूद्रदामन के संदर्भ में जानकारी प्राप्त होती है।

    ➣ पुलुमावी के नासिक गुहा अभिलेख के माध्यम से उनकी धार्मिक सहिष्णुता तथा उनकी संस्कृति के संदर्भ में जानकारी प्राप्त होती है।

    ➣ समुद्रगुप्त के प्रयाग स्तंभ लेख से समुद्रगुप्त के दिग्विजय तथा विजित राजाओं के साथ उसकी नीतियों के संदर्भ में जानकारी प्राप्त होती है।

    ऐहोल अभिलेख से चालुक्य नरेश पुलिकेशन द्वितीय तथा हर्षवर्धन के मध्य युद्ध के विषय में जानकारी प्राप्त होती है।

    ग्वालियर अभिलेख के माध्यम से गुर्जर-प्रतिहार शासकों के संदर्भ में जानकारी प्राप्त होती है।

    ➣ यवन राजदूत हेलियोडेरस के बेसनगर (विदिशा) से प्राप्त गुरूड़ स्तंभ अभिलेख से भागवत धर्म संबंधी जानकारी माप्त होती है।

    ➣ मध्य प्रदेश के एरण से प्राप्त वाराह प्रतिमा से हूण नेता तोरमाण के विषय में जानकारी प्राप्त मिलती है।

    ➣ 510 ई. में गुप्त काल के ऐरण अभिलेख से सर्वप्रथम सती प्रथा का अभिलेखीय प्रमाण मिलता है।

    भारतीय मुद्रा शास्त्र के जनक जेम्स प्रिसेप थे।


    1. प्राकृत लिपि आरंभिक अभिलेख प्राकृत भाषा में है।
    2. ब्राह्मी लिपि अशोक के शिलालेख ब्राह्मी लिपि में हैं। यह लिपि बाएं से दाएं लिखी जाती थी।
    3. खरोष्ठी लिपि अशोक के कुछ शिलालेख खरोष्ठी लिपि में हैं जो दाएं से बाएं लिखी जाती थी
    4. यूनानी एवं आरामाइक लिपि पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान में अशोक के शिलालेखों में इन लिपियों का प्रयोग हुआ है।

    मुद्राएं अथवा सिक्के

    ➣ मुद्रों या सिक्कों के अध्ययन को मुद्राशास्त्र (न्यूमेस्मेटिक्स) कहते हैं। मुद्राओं पर केवल आकृतियों उत्कीर्ण होती थी जिन्हे पंचमार्क या आहत सिक्के कहा है।

    ➣ सिक्कों पर लेख एंव तिथि उत्कीर्ण करने का श्रेय यूनानी शासकों को जाता है।

    ➣ भारत में खुदाई से बड़ी मात्रा में ताम्बें, चाँदी , सोने एंव सीसे के सिक्के मिले हैं। सबसे पहले जिस धातु का प्रयोग सिक्के बनाने में हुआ था वह सम्भवत ताम्बा थी।

    गुप्त शासकों ने सबसे अधिक सोने के सिक्के तथा सबसे शुद्ध सोने के सिक्के कुषाण शासकों ने जारी किये। जबकि सीसे के सिक्के जारी करने वाले सातवाहन थे।

    विवरणशासक
    जहाज के चित्रयुक्त सिक्केयज्ञश्री शातकर्णी
    धर्मचक्रयुक्त कांस्य मुद्रा .मिनाण्डर
    भारत में प्रथम स्वर्ण सिक्केविम कडफिसस
    शिव, स्कन्द, विष्णु आकृति युक्त सिक्केहुविष्क
    वीणा बजाते हुए चित्रित राजा के सिक्केसमुद्रगुप्त
    मयूर आकृति युक्त सिक्के कुमार गुप्त
    बैल आकृति शैव सिक्केस्कन्द गुप्त
    मयूर पर सवार कार्तिकेय स्कन्द सिक्केकुमार गुप्त-I
    कालिया व लक्ष्मी अंकित सिक्केमुहम्मद गोरी
    टकसाल अंकित सिक्केइल्तुतमिश
    सूर्य चन्द्रमा अंकित सिक्केअकबर
    राम व सीता अंकित सिक्केअकबर
    बाज व तिथि अंकित स्वर्ण सिक्केअकबर
    आना अंकित सिक्केशाहजहा
    हाथ में शराब अंकित सिक्केजहाँगीर
    हिन्दू देवी देवता व हिन्दू संवत अकित सिक्केटीपू सुल्तान

    चित्रकला/मूर्तिकला

    ➣ भारतीय चित्रकला का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। पाषाण काल में ही मानव ने गुफ़ा चित्रण करना प्रारम्भ कर दिया था, जिसके साक्ष्य होशंगाबाद और भीमवेतका आदि स्थानों की कंदराओं और गुफ़ाओं में मिलते हैं।

    सिंधु घाटी सभ्यता में भवनों के ध्वस्त हो जाने के कारण चित्रकला के प्रमाण स्पष्ट नहीं हैं। लेकिन मूर्तिकला के साक्ष्य मिले हैं। जिसमे एक नग्न कांस्य मूर्ति उकृष्ट नमूना है।

    ➣ प्राचीन काल में मूर्तियों का निर्माण कुषाण काल से आरंभ होता है। कुषाणों, गुप्त शासकों एवं उत्तरी गुप्तकाल में निर्मित मूर्तियों के विकास में जनसामान्य की धार्मिक भावनाओं का विशेष योगदान रहा है।

    कुषाणकालीन मूर्तियोंगुप्तकालीन मूर्तियों में मूलभूत अंतर है। कुषाणकालीन मूर्तियां विदेशी प्रभाव से युक्त है। वहीं पर गुप्तकालीन मूर्तियां स्वाभाविकता से परिपूर्ण हैं।

    भरहुत, बोधगया, सांची और अमरावती में मिली मूर्तियां, मूर्तिकला में जनसामान्य के जीवन की अति सजीव स्वरूप प्रस्तुत करती है।

    ➣ चित्रों में माता और शिशु या मरणशील राजकुमारी जैसे चित्रों से गुप्तकाल की कलात्मक पराकाष्ठा का पूर्ण प्रमाण मिलता है।

    ➣ आधुनिक शैली की चित्रकला में अजंता की गुफाओं में की गयी चित्रकारी से मानवीय भावनाओं की सुन्दर अभिव्यक्ति प्राप्त होती है।

    स्मारक भवन

    ➣ विभिन्न स्मारकों के माध्यम से तत्कालीन समाज की धार्मिक आर्थिक तथा राजनैतिक स्थितियों का बोध प्राप्त होता है।

    मोहनजोदड़ों की खुदाई से सिंधु सभ्यता के संदर्भ में पता चलता है।

    ➣ दक्षिण भारत में अरिकमेडु नामक स्थान की खुदाई में रोम-भारत के व्यापारिक संबंधों का पता चलता है।

    विदेशी यात्रियों के विवरण

    ➣ प्राचीन समय से भारत में कई यात्री आते रहे। जिनमे कुछ शिक्षा के तात्पर्य से तो कुछ विदेशी आक्रमणकारियों के साथ आये। सभी यात्रियों ने अपनी पुस्तकों में भारतीय जीवन शैली का विवरण प्रस्तुत किया है।

    ➣ इन यात्रियों एवं लेखकों के विवरण से भी हमें भारतीय इतिहास की जानकारियाँ मिलती है। इन्हे तीन भागों में वर्गीकृत किया गया है –
    1. यूनानी-रोमन
    2. चीनी
    3. मुस्लिम

    videshi-yatriyon-ke-vivaran

    ➣ इनमे पहला यात्री मेगास्थनीज था , जो 305 ईसा पू0, चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में आया। इसके पश्चात डाईमेकस एंव डायनोसीयस क्रमश: बिन्दुसार एंव सम्राट अशोक के दरबार में आये।

    Note:अन्य यात्रियों का विवरण बाहर दिया गया है।

    इतिहास प्रमुख शब्दावली

    अर्केलॉजी जो लेख मुहर, प्रस्तरस्तंभो स्तूपों, चट्टानों और ताम्रपत्रों पर मिलते हैं उन्हें अभिलेख कहते हैं।
    एपिग्राफीअभिलेख अध्ययन का पुरालेखशास्त्र (एपिग्राफी) कहते हैं।
    पेलिअंग्राफीअभिलेख तथा दूसरे प्राचीन दस्तावेजों की प्राचीन तिथि के अध्ययन को पुरालिपिशास्त्र (पेलिग्राफी) कहते हैं।
    न्यूमिस्मेटिक्ससिक्कों के अध्ययन को मुद्राशास्त्र (न्यूमिस्मेटिक्स) कहते हैं।
    मेगालिथदक्षिण भारत के कुछ लोगमृत व्यक्ति के शव साथ औजार, हथियार, मिट्टी के बर्तन व अन्य वस्तुएं भी कब्र में दफना देते थे तथा इसके ऊपर एक घेरे में बड़े-बड़े पत्थर रख दिये जाते थे। ऐसे स्मारक को ही प्रायः मेगालिथ (महापाषाण) कहते हैं।
    पुरातत्वप्राचीन काल में मानव द्वारा प्रयोग में लाए गये वस्तुओं, निर्मित मंदिरों, भवनों के अवशेषों का अध्ययन पुरातत्व कहलाता है। इसका अध्ययन करने वाला पुरातत्ववेत्ता कहलाता है।
  • समय शब्दावली

    📚 विषय सूची

    AD(ई.) और BC(ईसा पू.) में अंतर

    ➣ AD का मतलब ईसा मसीह के जन्म के बाद की तिथियों से है जबकि BC का मतलब ईसा मसीह के जन्म के पहले की तिथियों से है।

    AD – Anno Domini (एनो डॉमिनी)
    BC – Before Christ (बिफोर क्राइस्ट)

    ➣ आजकल A.D. की जगह C.E. तथा B.C. के स्थान पर B.C.E. का प्रयोग होता है।

    C.E. – Common Era
    B.C.E. – Before the Common Era

    ➣ ऐसा इसलिए क्योंकि विश्व के अधिकांश देशों में अब कॉमन एरा का प्रयोग सामान्य हो गया है।

    ➣ कभी-कभी अंग्रेजी के B.P. अक्षरों का प्रयोग होता है, जिसका तात्पर्य बिफोर प्रेजेंट अर्थात वर्तमान समय से पहले। विविध तथ्य

    समय शब्दावली

    1/2 अर्द्धवार्षिक (SemiAnnual)6 महीने (आधा वर्ष) की अवधि।
    वार्षिक (Annual)1 वर्ष की अवधि ।
    दशक (Decade)10 वर्ष की अवधि ।
    क्रिस्टल (Crystal)15 वर्ष की अवधि ।
    सिल्वर जुबली 25 वर्ष की अवधि।
    रूबी जुबली 40 वर्ष की अवधि ।
    पूर्वार्द्ध (First Half)सदी का प्रथम 50 वर्ष (1-50 वर्ष तक)।
    उत्तरार्द्ध (Second Half)सदी का द्वितीय 50 वर्ष (51-100 वर्ष तक)।
    गोल्डन जुबली (स्वर्ण जयंती)50 वर्ष की अवधि।
    डायमंड जुबली(हीरक जयंती )60 वर्ष की अवधि।
    नीलम जयंती (Sapphire jubilee) 65 वर्ष की अवधि।
    प्लेटिनम जुबली70 वर्ष की अवधि।
    पैलेडियम जुबली75 वर्ष की अवधि।
    सदी/शताब्दी (Century)100 वर्ष की अवधि।
    सहस्राब्दी (Millenium)1000 वर्ष की अवधि।
    ग्रेट जुबली (Great Jubilee)2000 वर्ष की अवधि।


    जन्मदिन – साधारण मानव जन्म दिन।
    जयंती – मृत्युपरांत मनाया जाने वाला महापुरुषों जन्मदिवस जैसे – गाँधी जयंती।
    जन्मोत्सव – ईश्वरीय अवतारों के जन्मदिवस जैसे – राम नवमी , जन्म अष्टमी।
    पुण्यतिथि – वार्षिक तौर पर मनाया जाने वाला दिवंगत या मृत्यु का दिन।

    वर्तमान कैलेण्डर

    ➣ वर्तमान कैलेण्डर में ग्रेगोरियन कैलेण्डर एक अन्तर्राष्ट्रीय कैलेण्डर है। इसे समूचे विश्व के देशों में मान्यता दी गई है। विश्व के अधिकांश हिस्सों में इसी कैलेण्डर का प्रयोग किया जाता है।

    इटली के डॉक्टर अलॉयसियस लिलिस (Aloysius Lilius) द्वारा प्रस्तावित इस कैलेण्डर की घोषणा 24 फरवरी, 1582 को पोप ग्रेगरी-XIII ने की थी। इन्हीं के नाम पर इस कैलेण्डर के नाम के साथ ग्रेगरी शब्द जुड़ा। प्राचीन जूलियन कैलेण्डर की अशुद्धियाँ सुधारने के लिए इसे प्रयोग में लाया गया।

    ➣ ग्रेगोरियन कैलेण्डर में 365 दिनों का एक वर्ष होता है, किन्तु हर चौथा वर्ष 366 दिन का होता है जिसे अधिवर्ष (लीप का साल) कहते हैं।

    ➣ ग्रेगोरियन कैलेंडर बनने के 170 साल बाद, 1752 ई. में अंग्रेजों ने भारत में इस कैलेंडर को लागू किया था।

    ➣ शक संवत की शुरुवात 78 ई. में कुषाण शासक कनिष्क द्वारा तथा विक्रम संवत में 57 ई. पू. उज्जैन शासक राजा विक्रमादित्य ने शकों पर विजय के उपकक्ष में चलाया था।

    शक संवत भारत का राष्ट्रीय पंचाग या कैलेंडर है ,जिसे 22 मार्च 1957 को अपनाया गया था। इसका पहला महीना चैत्र (मार्च + अप्रैल ) तथा अंतिम महीना फाल्गुन (फरवरी + मार्च) होता है।

    प्रमुख संवत्

    कलि संवत (3102 B.C.)महाभारत युद्ध व राजा परीक्षित के जन्म के समय से आरम्भ।
    सप्तर्षि संवत् (3076 B.C.)इसे लौकिक संवत् भी कहा जाता है। कलि संवत् के 25 वर्ष बाद कश्मीर में प्रचलिप्त था।
    बुद्ध संवत् (544 B.C.)श्रीलंका को गणना अनुसार बुद्ध संवत् 544 B.C. में प्रारम्भ हुआ। महात्मा बुद्ध के निर्वाण की वास्तविक तिथि 486 B.C. थी।
    महावीर संवत् (527 B.C.)महावीर स्वामी द्वारा आरम्भ, इस संवत् का प्रयोग जैन सभा से सम्बोधित गणनाओं में हुआ है।
    विक्रम संवत् (58 B.C.)राजा विक्रमादित्य द्वारा उज्जैयिनी में शकों पर विजय प्राप्त करने के उपरान्त चलाया गया था।

    ➣ ईसामसीह का जन्म-ईसामसीह का जन्म प्रथम शताब्दी माना गया जिसमें पहले का काल B.C. और बाद का A.D. कहलाया।

    शक संवत् (78 A.D.)कुषाण राजा कनिष्क द्वारा शुरू कया गया जिसे भारत सरकार द्वारा 22 मार्च, 1957 को अधिकारिक कलैण्डर घोषित किया गया। यह भारत का राष्ट्रीय संवत् है।
    कल्चुरी/त्रैकूटक संवत् (248 A.D.)आभारी राजा बाद में चेदि के कल्चुरियों द्वारा प्रयुक्त होने पर यह कल्चुरी संवत् कहलाया।
    गुप्त संवत् (319 A.D.)गुप्तवंशीय शासक चन्द्रगुप्त प्रथम द्वारा प्रारम्भ।
    हर्ष संवत् (606 A.D.)कन्नौज के शासक हर्षवर्धन द्वारा राज्यारोहण के समय प्रारम्भ किया गया।
    हिजरी संवत् (622 A.D.)622 ई. से हिजरी संवत् का आरम्भ हुआ। यह तिथि हजरत मुहम्मद साहब का मक्का त्याग कर मदीना जाने की स्मृति में है। मदीना जाने को हिजरत कहा जाता है।
    कोल्लम संवत् (825 A.D.)कल्याणी के चालुक्य शासक विक्रमादित्य-4 द्वारा मालाबार केरल क्षेत्र में प्रारम्भ था। इसे चालुक्य विक्रम संवत् कहा जाता है।
    इलाही संवत् (1583 A.D.)मुगल सम्राट अकबर द्वारा प्रारम्भ।
    राजशक संवत् (1673)मराठा शासक छत्रपति शिवाजी द्वारा राज्यारोहण के उपलक्ष्य में प्रारम्भ।

    ➣ ईस्वी संवत में 57 जोड़कर प्राप्त किया जा सकता है।

    ईस्वी संवत् + 57 = विक्रम संवत्
    2021 + 57  = 2078

    ईस्वी संवत का शक संवत में परिवर्तन

    ➣ ईस्वी संवत् में से 78 घटाकर प्राप्त किया जा सकता है।

    ईस्वी संवत – 78 = शक संवत
    2021 – 78  = 1943

    विक्रम संवत् का ईस्वी संवत् में परिवर्तन

    ➣ विक्रम संवत् में से 57 घटाकर प्राप्त किया जा सकता है।

    विक्रम संवत् – 57 = ईस्वी संवत्
    1964 – 57  = 2021

    शक संवत् का ईस्वी संवत् में परिवर्तन

    ➣ शक संवत् में 78 जोड़कर प्राप्त किया है।

    शक संवत् + 78 = ईस्वी संवत्
    2099 + 78  = 2021
  • भारत आये विदेशी यात्रियों का विवरण

    मेगास्थनीज (305ईसा पू0) यह सेल्युकस का राजदूत था तथा चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में आया था। अपनी पुस्तक इण्डिका में इसने मौर्ययुगीन समाज एवं संस्कृति के विषय में लिखा है।

    हेरोडोडस इसने अपनी पुस्तक हिस्टोरिका में 5वीं सदी ई. पू. के भारत-फारस संबंधों का वर्णन किया है। इसका विवरण अनुश्रुतियों पर आधारित है। इसे इतिहास का पिता कहा जाता है।

    टीसियस यह ईरान का राजवैद्य था। इसका विवरण आश्चर्यजनक कहानियों से परिपूर्ण होने के कारण अविश्वसनीय है। नियार्कस, एनिसिक्रटस एवं आरिस्टोबुलस के विवरण प्रामाणिक एवं विश्वसनीय हैं। ये सभी सिकंदर के साथ भारत आए थे।

    इत्सिंग यह 7वीं सदी के अंत में भारत आया। इसने अपने विवरण में नालंदा एवं विक्रमशिला विश्वविद्यालय तथा अपने समय के भारत का वर्णन किया है।

    डायनोसियस यह मिन नरेशटॉलमी फिलाडेल्फस का राजदूत था जो अशोक के राजदरबार में आया था।

    डायमेकस यह सीरिया के नरेश एन्टियोकस का राजदूत था जो बिन्दुसार के राजरबार में आया था।

    टॉलेमी इसने दूसरी सदी में ज्योग्राफी की रचना की।

    प्लिनी इसने नेचुरल स्टिोरिका पुस्तक लिखी, जिसमें भारतीय खनिज पदार्थों, पशुओं, पेड़-पौधों आदि के बारे में विवरण प्राप्त होता है।

    हवेनसांग हर्ष के शासनकाल में आए वेनसांग के यात्रा वृत्तांत ‘सी-यू-की’ में तत्कालीन भारत की सामाजिक-धार्मिक स्थिति का विवरण मिलता है। वह सर्वप्रथम भारत के कपिशा राज्य पहुँचा। वह 15 वर्षों तक भारत में रहा तथा 645 ई. में चीन लौट गया। हवेनसांग नालंदा xविश्वविद्यालय में अध्ययन करने तथा भारत से बौद्ध ग्रंथों को एकत्र कर ले जाने के लिए आया था। इसके यात्रा वृत्तांत सी-यू-की’ में 138 देशों का विवरण प्राप्त होता है। इसके अनुसार सिंध का राजा शूद्र था।

    सुंगयुन यह 518 ई. में भारत की यात्रा पर आया। इसने अपने तीन वर्षों की यात्रा के दौरान बौद्ध धर्म की प्रतियाँ एकत्रित की।

    फाहियान फाह्यान भारत में 399 ईस्वी में भारत में आया था। जब भारत पर चंद्रगुप्त विक्रमादित्य का शासन था। यह चन्द्रगुप्त द्वितीय (गुप्त) के दरबार में आया था। इसकी रचना ‘फो-क्यो-की’ में गुप्तकाल के भारतीय समाज, राजनीति, संस्कृति तथा बौद्ध धर्म की स्थिति का विवरण प्राप्त होता है।

    कास्मास इंदिकांप्लूसटेस कास्मास इंदिकोप्लूसटेस एक यूनानी व्यापारी था, जो बाद में बौद्ध भिक्षु बन गया। उसने अपना यात्रा वृत्तांत क्रिश्चियन टोपोग्राफी नामक अपनी पुस्तक में लिखा है।

    सुलेमान इसने पाल एवं प्रतिहार राजाओं के विषय में लिखा। यह 9वीं सदी के मध्य में भारत आया था।

    अलबरूनी यह महमूद गजनवी के साथ भारत आया था। इसने किताब-उल-हिन्द या तहकीक-ए-हिन्द कृति की रचना की।

    इसमें राजपूतकालीन समाज, धर्म, रीति-रिवाज, राजनीति इत्यादि के बारे में जानकारी मिलती है।

    अलमसूदी यह अरबी यात्री था। जो प्रतिहार शासक महिपाल प्रथम के शासन काल में भारत आया। इसने राष्ट्रकूट राजाओं की महत्ता का वर्णन किया है। इसने महजुल जबाह नामक ग्रंथ की रचना की।

    मार्कोपोलो भारत आने वाला प्रथम यूरोपीय यात्री इटली के वेनिस शहर का मार्कोपोलो था, जो दो बार क्रमश 1288 ई. और 1293 ई. में भारत आया था। इसकी यात्रा लगभग 1271 में लाईआसुस बंदरगाह (आर्मेनिया ) से वोल्गा तट , सीरिया , फारस, काराकोरम तथा मध्य एशिया तक हुई है जिसमे इसे लगभग 3 वर्षों का समय लगा।

    इब्नबतूता इसका पूरा नाम अबू अब्दुला मुहम्मद था। इब्नबतूता एक विद्वान अफ्रीकी (मोरक्को) यात्री था। वह 1333 ई. में मुहम्मद तुगलक के राज्यकाल में भारत आया। तुगलक ने उसे राजधानी दिल्ली का काजी नियुक्त किया। इसने रेहला नामक पुस्तक लिखी।

    अब्दुर्रज्जाक यह एक ईरानी यात्री था। यह 1442-43 ई. में देवराजय द्वितीय के काल में विजयनगर आया था।

    अकानासी निकितन रूसी यात्री ‘अकानासी निकितन’ ने 1470 से 1474 ई. तक बहमनी राज्य की यात्रा की।

    निकोलो कोन्टी एक इटली का यात्री, जिसने देवराय प्रथम के शासनकाल में विजयनगर साम्राज्य का भ्रमण किया। इसने दक्षिण – पूर्व एशिया और चीन तक की यात्रा की। इसने अपनी यात्रा की विवरण लैटिन भाषा में लिखा। जिसमे भारत के शहर , राज – व्यवस्था , प्रथाओं तथा त्योहारों का वर्णन मिलता है।

    डोमिनोगोज पायस और फर्नाओ नूनिज एक पुर्तगाली यात्री ‘डोमिनोगोज पायस’ विजयनगर आया था। इसके 13 वर्ष बाद एक और पुर्तगाली ‘फर्नाओ नूनिज’ भी विजयनगर आया था।

    टॉमस स्टीफेंस टॉमस स्टीफेंस भारत आने वाला पहला अंग्रेज था, जो गोवा स्थित जेसुइट कॉलेज का रेक्टर था।

    एडुआर्डो बारबोसा बारबोसा 1560 ई. में भारत आने वाला एक जेसुइट पादरी था। उसने सर्वप्रथम विजयनगर राज्य का भ्रमण किया और तत्पश्चात 1581 ई. में उत्तरी भारत तथा बंगाल की यात्रा की।

    फिच 1583 ई. में एक अंग्रेज व्यापारी ‘फिच’ अपने दो साथियों के साथ भारत आया और सात वर्ष तक यहां रहा।

    जॉन गमिडनाल 1599 ई. में एक और अंग्रेज यात्री जॉन गमिडनाल (मिल्डेन हाल) स्थल मार्ग से भारत आया और सात वर्ष तक यहां रहा। वह अकबर के दरबार में आगरा भी आया।

    कैप्टन हॅाकिग्स यह जहांगीर के समय भारत आया था तथा ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए सुविधा प्राप्त करने का प्रयास किया। यह फारसी भाषा का जानकार था। जहाँगीर के नाम इंग्लैण्ड के राजा जेम्स प्रथम का पत्र लेकर वह 1608 ई. में भारत के सूरत में पहुँचा। हॉकिन्स को जहाँगीर ने ख़ान की उपाधि देकर सम्मानित किया था। हॉकिन्स 1613 ई. में मुग़ल दरबार से चला गया और वापस इंग्लैण्ड पहुँच गया।

    डॉ. जेमिली करेरी इटली का यात्री डॉ. जेमिली करेरी औरंगजेब (1658-1707) के शासन काल में भारत आया था।

    बर्नियर फ्रांसिस बर्नियर एक फ्रांसीसी विद्वान डॉक्टर थे, जो सत्रहवीं सदी में भारत आए थे। उस समय भारत पर मुगलों का शासन था। बर्नियर के आगमन के समय मुगल बादशाह शाहजहां अपने जीवन के अंतिम चरण में थे।

    वास्कोडिगामा पुर्तगाली नाविक, जो ‘केप ऑफ गुडहोप’ के मार्ग से 1498 ई. में कालीकट पहुंचा। इसे भारत की खोज का श्रेय जाता है।

    विदेशी यात्री : कालक्रमानुसार

    भ्रमण काल यात्री शासनकाल
    305ईसा -297 ई० मेगास्थनीज (यूनानी राजदूत ) चन्द्रगुप्त मौर्य
    298-273 ई० डाइमेकस (सीरिया का राजदूत) बिन्दुसार
    284-262 ई० डायोनिसियस (मिस्र राजदूत) का बिन्दुसार, अशोक
    399-414 ई० फाहियान (चीनी बौद्ध यात्री) चन्द्रगुप्त द्वितीय
    547 ई० कास्मॉस (यूनानी बौद्ध यात्री) दक्षिण भारत में
    629-644 ई० ह्वेनसांग (चीनी बौद्ध यात्री) हर्षवर्द्धन
    643 ई० वांग-हुएन-सी (चीनी राजदूत) हर्षवर्द्धन
    675-695 ई० इत्सिंग (चीनी बौद्ध यात्री) पश्चिमोतर भारत में
    864 ई० इब्ने खुर्दादब (अरब यात्री) मिहिर भोज प्रतिहार
    9वीं शताबदी सुलेमान (अरब यात्री) नरेश देवपाल(बंगाल )
    915-916 ई० अलमसूदी (अरब यात्री) महिपाल प्रथम प्रतिहार
    1000-1030 ई० अलबरूनी (गजनी का विद्वान) पश्चिमोतर भारत में
    1288-1292 ई० मार्कोपोलो (इटली का यात्री) पांड्य राज्य
    1333-1342 ई० इब्नबतूता (मोरक्को का यात्री) मुहम्मद तुगलक
    1420-1422 ई० निकोली कोण्टी (इटली का यात्री) देवराय प्रथम (विजय नगर)
    1421-1431 ई०चेंग-ही (चीनी यात्री)जलालुद्दीन (बंगाल)
    1442-1443 ई० अब्दुज्जाक (ईरान का राजदूत) देवराय द्वितीय (विजय नगर)
    1470-1474ई० अथनासियस निकेतन (रूसी यात्री) बहमनी राज्य
    1498 ई० वास्कोडिगामा (पुर्तगाली यात्री) जमोरिन (केरल)
    1503-1508 ई.बार्थोलोम्यू डियाज(इटालियन नाविक)दक्कन
    1516-1518 ई० एडुअर्डो बारबोसा (पुर्तगाली यात्री) कृष्णदेव राय
    1520-1522ई० डोमिंगोज पेइज (पुर्तगाल यात्री) कृष्णदेव राय
    1520-1522ई० डोमिंगोज पेइज (पुर्तगाल यात्री) कृष्णदेव राय
    1535-1537 ई० नूनिज (पुर्तगाली अश्व सौदागर) अच्युत देवराय
    1567-1568 ईसीजर फ्रेडरिज (पुर्तगाली यात्री)विजयनगर
    1578-1582 ई०एथोनी मासेरात (पुर्तगाली पादरी)अकबर
    1585-1591 ई०रॉल्फ फिंच (प्रथम अंग्रेज यात्री)अकबर
    16वीं शताब्दीजॉन लिंसकोतेन (डच यात्री)विजयनगर
    16वीं शताब्दीलामा तारानाथ (तिब्बती बौद्ध यात्री)पूर्वी भारत
    1608-1613 ई० कैप्टन हॉकिन्स (अंग्रेज) जहाँगीर
    1608-1612 ई.विलियम फिंच (अंग्रेज यात्री)जहाँगीर
    1608-1617 ई.जॉन जुरदां (पुर्तगाली यात्री)जहाँगीर
    1608-1615 ई०निकोलस डाउटन(नौसेना अधिकारी)जहाँगीर
    1612-1616 ई०निकोलस विथिंगटन (अंग्रेज यात्री)जहाँगीर
    1612-1617 ई०टामस कोर्सेट (अंग्रेज यात्री)जहाँगीर
    1615-1619 ई० सर टॉमस रो (अंग्रेजी राजदूत) जहाँगीर
    1616-1619 ई.एडवर्ड टेरी (अंग्रेज पादरी)जहाँगीर
    1615-1621ई० पाल केनिग (अंग्रेज यात्री) जहाँगीर
    1622-1660 ई० पित्रा देला वेली (इटली का यात्री) जहाँगीर
    1626-1633 ई.जॉन लायट (डच यात्री)शाहजहाँ
    1627-1681 ई०जॉन फ्रियर (अंग्रेज यात्री)शाहजहाँ
    1630-1634 ई.पीटर मुण्डी (इटली का यात्री)शाहजहाँ
    1641-1687 ई०टेवर्नियर (फ्रेंच जौहरी)शाहजहाँ एवं औरंगजेब
    1656-1687 ई० मनूची (इटली का यात्री) औरंगजेब
    1658-1668 ई.बर्नियर (फ्रेंच चिकित्सक)औरंगजेब
    1666-1668 ई.जीन चिन नाट (फ्रेंच यात्री)औरंगजेब
    1695-1699 ई०रोमेल्ली कोरेरी (इटली का यात्री)बीजापुर
  • विविध तथ्य

    📚 विषय सूची

    भारत में सर्वाधिक बड़ा, लम्बा एवं ऊँचा

    तथ्य नाम
    सबसे लम्बी नहर इन्दिरा गाँधी नहर (राजस्थान
    सबसे लम्बा रेलवे प्लेटफॉर्म गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) (1.3 किमी.)
    सबसे विशाल स्टेडियम युवा भारती (साल्ट लेक) कोलकाता
    सबसे अधिक आबादी वाला शहर मुम्बई (महाराष्ट्र
    सर्वाधिक शहरी क्षेत्र वाला राज्य‌ महाराष्ट्र
    सबसे लम्बा रेल मार्ग डिब्रूगढ़ से कन्याकुमारी
    सबसे बड़ा प्राकृतिक बन्दरगाह मुम्बई (महाराष्ट्र
    सबसे लम्बा राष्ट्रीय राजमार्ग राष्ट्रीय राजमार्ग न.-7 (वाराणसी से कन्याकुमारी
    सबसे लम्बी तटरेखा वाला राज्य गुजरात (1,663 किमी.
    खारे पानी की सबसे बड़ी तटीय झील चिल्का झील (ओडिशा
    मीठे पानी की सबसे बड़ी झील वुलर झील (जम्मू-कश्मीर
    भारत की सबसे लम्बी सहायक नदी यमुना नदी
    दक्षिण भारत की सबसे लम्बी नदी गोदावरी
    सबसे लम्बा बाँध हीराकुड बाँध (ओडिशा
    भारत का सर्वोच्च शौर्य सम्मान परमवीर चक्र
    भारत का सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न
    सबसे बड़ा गुरुद्वारा स्वर्ण मंदिर, अमृतसर
    सबसे बड़ा गिरजाघर सैंट कैथेड्रल (गोवा
    सबसे ऊँचा टी. वी. टावर पीतमपुरा (नई दिल्ली
    सबसे लम्बी तटरेखा वाला दक्षिण भारत का राज्य आन्ध्र प्रदेश (1100 किमी.
    सबसे अधिक मार्ग बदलने वाली नदी कोसी नदी
    सबसे बड़ी कृत्रिम झील गोविन्द सागर (भाखड़ा नांगल
    सबसे गहरी नदी घाटी भागीरथी व अलकनन्दा
    डेल्टा न बनाने वाली सबसे बड़ी नदी नर्मदा व तापी
    सबसे अधिक ऊँचाई पर स्थित युद्ध स्थल सियाचीन ग्लेशियर
    सबसे बड़ा नदी द्वीप माजुली (ब्रह्मपुत्र नदी, असम
    सबसे बड़ा तारामंडल बिड़ला प्लैनेटोरियम (कोलकाता
    सबसे ऊँचा हवाई पत्तन लेह (लद्दाख
    सबसे बड़ा राज्य (क्षेत्रफल) राजस्थान
    सबसे बड़ा जिला (क्षेत्रफल) कच्छ (गुजरात)
    सबसे तेज चलने वाली ट्रेन शताब्दी एक्सप्रेस (नई दिल्ली से भोपाल)
    सबसे बड़ा डेल्टा सुन्दरवन डेल्टा (प. बंगाल)
    सबसे अधिक वनों का राज्य मध्य प्रदेश
    सबसे बड़ा कॉरीडोरी रामेश्वरम मंदिर (तमिलनाडु)
    सबसे ऊँचा झरना जोग या गरसोप्पा (कर्नाटक)
    सबसे लम्बी सड़क ग्रांड ट्रंक रोड
    सबसे ऊँचा दरवाजा बुलन्द दरवाजा
    सबसे लम्बी नदी गंगा नदी
    सबसे बड़ा अजायबघर कोलकाता अजायबघर
    सबसे बड़ा गुम्बद गोल गुम्बद (बीजापुर)
    सबसे ऊँची मूर्ति गोमतेश्वर (कर्नाटक)
    सर्वाधिक वर्षा का स्थान मासिनराम (मेघालय)
    सबसे बड़ा लीवर पुल हावड़ा ब्रिज (कोलकाता)
    सबसे लम्बा सड़क पुल महात्मा गाँधी सेतु (पटना)
    सबसे बड़ा पशुओं का मेला सोनपुर (बिहार)
    सबसे ऊँची मीनार कुतुबमीनार (दिल्ली)
    सबसे बड़ी झील वुलर झील (जम्मू-कश्मीर)
    सबसे ऊँचा गुरुत्वीय बाँध भाखड़ा बाँध (पंजाब)
    सबसे बड़ा रेगिस्तान थार (राजस्थान)
    सबसे बड़ा गुफा मन्दिर कैलाश मन्दिर (एलोरा)
    सबसे बड़ा चिड़ियाघर जूलोजिकल गार्डन (कोलकाता)
    सबसे बड़ी मस्जिद जामा मस्जिद (दिल्ली)
    सबसे ऊँची चोटी गॉडविन ऑस्टिन (K-2)
    सबसे लम्बी सुरंग (सड़क) जवाहर सुरंग (2.85 किमी.) (जम्मू-कश्मीर)
    सबसे लम्बी सुरंग (रेलवे) पीरपंजाल (11215 किमी.) जम्मू-कश्मीर

    विश्व में सर्वाधिक बड़ा, छोटा, लम्बा एवं ऊँचा

    सर्वाधिकसबसे संकरा जलडमरूमध्ययूनान एवं याविया द्वीप के मध्य (एजिन सागर)
    सर्वाधिकसबसे बड़ा गल्फमैक्सिको का गल्फ
    सर्वाधिकसबसेसबसे विशाल जलसंधिटार्टार जलसंधि (रूस एवं सखालिन द्वीप के मध्य)
    सर्वाधिकसबसे चौड़ी जलसंधिडेविस जलसंधि (ग्रीनलैण्ड एवं बैफिन द्वीप के मध्य)
    सर्वाधिकसबसे ऊँचा पर्वत शिखरमाउण्ट एवरेस्ट (हिमालय, नेपाल)
    सर्वाधिकसबसे ऊँची पर्वतमालाहिमालय (एशिया)
    सर्वाधिकसबसे लम्बी पर्वतमाला| एंडीज (द. अमेरिका)
    सर्वाधिकसबसे ऊँचा पठारपामीर (तिब्बत) का पठार
    सर्वाधिकसबसे नीची पहाड़ीबुकिट टामसन (ब्रुनेई)
    सर्वाधिकसबसे सर्वाधिक ऊँचा ज्वालामुखीमाउण्ट कोटोपैक्सी, इक्वाडोर (द. अमेरिका)
    सर्वाधिकसबसे विशाल ज्वालामुखीमौना लोआ (हवाई द्वीप)
    सर्वाधिकसबसे ऊँचा बाँधरोगुंस्की (उज्वेकिस्तान)
    सर्वाधिकसबसे बड़ा बाँध (कंक्रीट)ग्राण्ड कूली बाँध (कोलम्बिया नदी, अमेरिका)
    सर्वाधिकसबसेसबसे लम्बा रेलवे प्लेटफॉर्म कीगोरखपुर (उत्तर प्रदेश, भारत)
    सर्वाधिकसबसे बड़ा रेलवे स्टेशनअँड सेंट्रल टर्मिनल (न्यूयॉर्क)
    सर्वाधिकसबसे लम्बा रेलमार्गट्रान्स साइबेरियन रेलमार्ग
    सर्वाधिक ऊँचाई पर स्थित रेलवे स्टेशनसौंदोर (बोलिविया)
    सर्वाधिकसबसे बड़ी रेल सुरंगसीकन रेल सुरंग (जापान)
    सर्वाधिकसबसे बड़ी सड़क सुरंगसेंट गोत्थार्ड (स्विट्जरलैण्ड)
    सर्वाधिकसबसे ऊँची सड़कलेह-मनाली मार्ग (भारत)
    सर्वाधिकसबसे बड़ा सड़क पुलमहात्मा गाँधी सेतु (पटना, भारत)
    सर्वाधिकसबसे बड़ा राजमार्गट्रान्सकैनेडियन राजमार्ग
    सर्वाधिकसबसे ऊँचा नगरवेनचुआन (तिब्बत).
    सर्वाधिकसबसे बड़ा महाद्वीप कीएशिया 
    सर्वाधिकसबसे छोटा महाद्वीपऑस्ट्रेलिया
    सर्वाधिकसबसे बड़ा महासागरप्रशान्त महासागर
    सर्वाधिकसबसे गहरा महासागरप्रशान्त महासागर
    सर्वाधिकसबसे बड़ा नगर (क्षेत्रफल की दृष्टि से)लंदन (ग्रेट-ब्रिटेन)
    सर्वाधिकसबसे बड़ा देश (क्षेत्रफल की दृष्टि से)रूस
    सर्वाधिकसबसे छोटा देश (क्षेत्रफल की दृष्टि से)वेटिकन सिटी
    सर्वाधिक जनसंख्या का देशचीन
    सर्वाधिक निर्वाचक संख्या का देशभारत
    न्यूनतम जनसंख्या घनत्वअंटार्कटिका
    सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व वाला देशसिंगापुर
    सर्वाधिक आबादी वाला नगरटोकियो (जापान)
    सबसे कम आबादी वाला नगरवेटिकन सिटी
    सबसे लम्बी सीमा वाला देशकनाडा
    सर्वाधिकसबसे छोटी सीमा वाला देशजिब्राल्टर
    सर्वाधिक सीमाओं वाला देशचीन (13 देशों के साथ)
    सर्वाधिकसबसे बड़ा द्वीपग्रीनलैण्ड
    सर्वाधिकसबसे बड़ा प्रायद्वीपअरब प्रायद्वीप
    सर्वाधिकसबसे बड़ा द्वीप समूहइण्डोनेशिया
    सर्वाधिकसबसे बड़ा नदी द्वीपमाजुली (ब्रह्मपुत्र नदी, असम)
    सर्वाधिकसबसे बड़ा डेल्टासुन्दरवन (भारत)
    सर्वाधिकसबसे लम्बी नदीनील नदी (मिस्र)
    सर्वाधिकसबसे बड़ी नदी (चौड़ी एवं बहाव की दृष्टि (द. अमेरिका) से)अमेजन नदी
    सबसे छोटी नदी डी नदी (सं. रा. अमेरिका)
    सर्वाधिकसबसे बड़ा सागरदक्षिणी चीन सागर
    सर्वाधिकसबसे विशाल उपसागरहडसन उपसागर
    सर्वाधिकसबसे छोटा पक्षीहमिंग बर्ड
    सर्वाधिकसबसे लम्बी सहायक नदीमेडिरा (अमेजन की सहायक नदी)
    सर्वाधिकसबसे व्यस्त व्यापारिक नदीराइन नदी (जर्मनी)
    अन्तः सागरीय नदीक्रोमवेल धारा
    सर्वाधिकसबसे लम्बा मुहानाओब नदी का मुहाना (रूस)
    सर्वाधिकसबसे बड़ी नहरस्वेज नहर
    सर्वाधिकसबसे व्यस्त नहरकील नहर
    सर्वाधिकसबसे बड़ी झीलकैस्पियन सागर (रूस)
    सर्वाधिकसबसे बड़ी ताजे पानी की झीलसुपीरियर झील (अमेरिका)
    सर्वाधिकसबसे गहरी झीलबैकाल झील (रूस)
    झील के अन्दर झीलमेनीटू (कनाडा)
    सर्वाधिक ऊँचाई पर स्थित झील (नौकायन)टिटिकाका (द. अमेरिका)
    सर्वाधिकसबसे बड़ा लैगूनलैगोआ डॉस पैटोस (ब्राजील)
    सर्वाधिकसबसे ऊँचा जलप्रपात (झरना)साल्टी एंजिल (कैरोना नदी, वेनेजुएला)
    सबसे बड़ा जलप्रपातग्वायरा (एल्टो पराना नदी)
    सबसे चौड़ा जलप्रपातखोन, जलप्रपात (लाओस)
    सबसे बड़ा जलडमरूमध्यडेविस जलडमरूमध्य (ग्रीनलैण्ड एवं बैफिन द्वीप)
    सबसे बड़ा हवाई अड्डाखालिद हवाई अड्डा, रियाद (सऊदी अरब)
    सर्वाधिक बुद्धिमान पशु
    सर्वाधिकसबसे विशाल मंदिरअंकोरवाट का मंदिर (कम्बोडिया)
    सर्वाधिकसबसे बड़ी मूर्तिस्प्रिंग टेम्पल बुद्धा (153 मी.) (लुसान, हेनान-चीन)
    सर्वाधिकसबसे बड़ा संग्रहालयब्रिटिश संग्रहालय (लंदन)
    सर्वाधिकसबसे बड़ा पुस्तकालयकांग्रेस पुस्तकालय, वाशिंगटन (U.S.A)] स्थापना 1800
    सर्वाधिकसबसे बड़ा चिड़ियाघरक्रूगर नेशनल पार्क (द. अफ्रीका)
    सर्वाधिकसबसे बड़ा महाकाव्यमहाभारत
    सर्वाधिकसबसे बड़ा पार्कवुड वफेलो नेशनल पार्क (कनाडा
    सर्वाधिकसबसे बड़ा प्लैनेटोरियममियाझाकी (जापान)
    सर्वाधिकसबसे बड़ा राजप्रासादइंपीरियल पैलेस बीजिंग (चीन)
    सर्वाधिकसबसे बड़ी कार्यालयी इमारतपेंटागन (सं .रा. अमेरिका)
    सबसे लम्बा वृक्षसिकोया का वृक्ष, कैलिफोर्निया
    सर्वाधिकसबसे ऊँचा पशुजिराफ
    सर्वाधिकसबसे विशालकाय पशुब्लू ह्वेल
    सर्वाधिकसबसे बड़ा पक्षीऑस्ट्रिच (शुतुरमुर्ग)
    सर्वाधिकसबसे ऊँची राजधानीलापाज (बोलिविया)
    सर्वाधिकसबसे विशाल दलदलप्रीपेट दलदल (साइबेरिया क्षेत्र)
    सर्वाधिकसबसे बड़ा रेगिस्तानसहारा (अफ्रीका)
    एशिया का सर्वाधिकसबसे बड़ा रेगिस्तानगोबी (मंगोलिया)
    सर्वाधिकसबसे ठण्डा प्रदेशबोस्टॉल (अन्टार्कटिका)
    सर्वाधिकसबसे बड़ी मस्जिदमस्जिद अल हराम (मक्का, सऊदी अरब)
    सर्वाधिकसबसे ऊँची मस्जिदसुल्तान हसन मस्जिद, काहिरा (मिस्र)
    सर्वाधिकसबसे बड़ा गिरजाघरबेसिलिका ऑफ सेंट पीटर वेटिकन (इटली)
    सबसे बड़ा महलवेटिकन सिटी पैलेस (इटली)
    सर्वाधिकसबसे ऊँची बिल्डिंगबुर्ज खलीफा (829.84 मी.)
    सर्वाधिकसबसे लम्बी दीवारचीन की दीवार
    सर्वाधिकसबसे बड़ा स्टेडियमस्टारहोव स्टेडियम, प्राग (चेक)
    सर्वाधिकसबसे बड़ा इनडोर स्टेडियमसुपरडोम ल्यूसियाना (सं. रा. अमेरिका)
    सर्वाधिक वर्षा का स्थानमासिनराम (मेघालय, भारत)
    सर्वाधिकसबसे बड़ा घंटाघरद ग्रेट बेल ऑफ मास्को (रूस)
    सर्वाधिकसबसे बड़ा बन्दरगाहन्यूयॉर्क (सं. रा. अमेरिका)

    विश्व से सम्बंधित प्रथम

    संविधान निर्माण करने वाला प्रथम देशसंयुक्त राज्य अमेरिका
    पाकिस्तान के प्रथम गवर्नर जनरलमोहम्मद अली जिन्ना
    गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के प्रथम सम्मेलन का आयोजन-स्थलबेलग्रेड
    चीन पहुँचने वाला प्रथम यूरोपियनमार्कोपोलो
    वायुयान से पहली उड़ान भरने वाला व्यक्तिराइट बन्धु
    विश्व के चारों ओर समुद्री यात्रा करने वाला प्रथम व्यक्ति फर्डीनेड मैगलन
    चन्द्रमा पर मानव भेजने वाला प्रथम देशसं. रा. अमेरिका
    कृत्रिम उपग्रह को अंतरिक्ष में प्रक्षेपण करने वाला प्रथम देशरूस
    आधुनिक ओलम्पिक खेलों का आयोजन करने वाला प्रथम देशयूनान
    चीन गणराज्य के प्रथम राष्ट्रपतिडॉ. सनयात सेन
    प्रथम नगर जिस पर परमाणु बम गिराया गया हिरोशिमा (जापान)
    सर्वाधिक पशुओं वाला देशभारत
    विश्व का प्रथम विश्वविद्यालयतक्षशिला विश्वविद्यालय (500 B.C.)
    चन्द्रमा पर उतरने वाला प्रथम व्यक्तिनील आर्मस्ट्रॉग (U.S.A)
    अंतरिक्ष में पहुंचने वाले प्रथम व्यक्तिमेजर यूरी गागरीन (रूस)
    अंतरिक्ष में तैरने वाला प्रथम व्यक्तिएलेक्सी लेनीत (रूस)
    एवरेस्ट शिखर पर पहुँचने वाला पहला व्यक्ति शेरपा तेंजिंग (भारत) तथा सर एडमंडहिलेरी (न्यूजीलैंड)
    उत्तरी ध्रुव पर पहुँचने वाला प्रथम व्यक्तिरॉबर्ट पियरी (U.S.A)
    दक्षिणी ध्रुव पर पहुँचने वाला प्रथम व्यक्तिएमण्डसेन (नार्वे)
    विश्व का पहला धर्मसनातन धर्म
    उत्तरी ध्रुव पर पहुंचने वाली पहली महिलाकैरोलीन मिकेल सेन
    दक्षिणी ध्रुव पर पहुँचने वाली प्रथम महिलाफ्रैन फिप (कनाडा)
    पुस्तक मुद्रित करने वाला पहला देशचीन
    कागजी मुद्रा जारी करने वाला पहला देशचीन
    सिविल सेवा प्रतियोगिता शुरू करने वाला पहला देशचीन
    संयुक्त राज्य अमेरिका का प्रथम राष्ट्रपतिजॉर्ज वाशिंगटन
    ब्रिटेन का प्रथम प्रधानमंत्रीरॉबर्ट वालपोल
    संयुक्त राष्ट्रसंघ का प्रथम महासचिवट्रिग्वेली (नावे)
    शिक्षा को अनिवार्य करने वाला प्रथम देशप्रशा
    प्रथम फुटबॉल विश्व कप जीतने वाला देशउरुग्वे
    विश्वकोश संकलन करने वाला प्रथम व्यक्तिएस्पेओसीप्स (एथेंस)
    सर्वाधिक उम्र में एवरेस्ट पर चढ़ने वाला प्रथम व्यक्तिरिचर्ड बोस
    विम्बलडन ट्राफी जीतने वाला पहला एशियन व्यक्तिआर्थर ऐश
    साहित्य के प्रथम नोबेल पुरस्कार से सम्मानित व्यक्ति पुधों सली
    शांति के क्षेत्र में प्रथम नोबेल पुरस्कार से सम्मानित व्यक्तिज्या हेनरी दुनान्त एवं फ्रेडरिक पासी
    भौतिक विज्ञान में प्रथम नोबेल पुरस्कार से सम्मानित व्यक्ति डब्ल्यू. के. रोएण्ट्जेन
    अर्थशास्त्र के क्षेत्र में प्रथम नोबेल पुरस्कार से सम्मानित व्यक्तिरेगनर फिश एवं जॉन टिनबर्गन
    चिकित्सा विज्ञान में प्रथम नोबेल पुरस्कार से सम्मानित व्यक्ति ए. ई. बॉन बेहरिंग
    इंग्लिश चैनल तैरकर पार करने वाली प्रथम महिलागटरूड एडरले
    विश्व का प्रथम देश जहाँ व्यक्ति को ऐच्छिक मृत्यु का अधिकार प्रदान किया गयानीदरलैण्ड (हॉलैण्ड)
    अंतरिक्ष में भेजा जाने वाला प्रथम अंतरिक्ष शटलकोलम्बिया
    इंग्लैण्ड की प्रथम महिला प्रधानमंत्रीमाग्रेट थैचर
    किसी मुस्लिम देश की प्रथम महिला प्रधानमंत्रीबेनजीर भुट्टो (पाकिस्तान)
    विश्व में किसी देश की प्रथम महिला प्रधानमंत्रीएस. भण्डारनायके (श्रीलंका)
    अंतरिक्ष में जाने वाली प्रथम महिलाबेलेण्टिना तेरेश्कोवा (रूस)
    एवरेस्ट पर चढ़ने वाली प्रथम महिलाजुंको तेबई (जापान)
    ब्रिटेन की पहली रानीजेन
    संयुक्त राष्ट्र महासभा की प्रथम महिला सभापतिश्रीमती विजयलक्ष्मी पंडित
    भारत पर आक्रमण करने वाला प्रथम यूरोपवासीसिकन्दर
    विश्व में किसी देश की प्रथम महिला राष्ट्रपतिमारिया एस्टेला रजाबेल (अर्जेंटीना)
    अंटार्कटिका महाद्वीप पर पहुँचने वाली प्रथम महिलाकैरोलिन मिकल्सन
    पृथ्वी का मानचित्र बनाने वाला प्रथम व्यक्तिअनेग्जीमेंडर

    भारत में प्रथम पुरुष

    तथ्य नाम
    मुगल दरबार में आने वाला प्रथम अंग्रेजहॉकिन्स
    भारत आने वाला प्रथम अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट डेविड आइजन हावर
    भारत आने वाले प्रथम ब्रिटिश प्रधानमंत्री हेराल्ड एम. सी. मिलॉन
    भारत आने वाले प्रथम रूसी प्रधानमंत्री निकोलाई ए. बुल्गारिन
    प्रथम भारतीय पायलट‌ जे.आर.डी. टाटा (1951 ई.)
    ओलम्पिक में वैयक्तिक स्पर्धा में भारत के लिए पहला स्वर्ण पदक जीतने वाला खिलाड़ी अभिनव बिन्द्रा (10 मी. एयर राइफल 2008)
    ब्रिटिश संसद का सदस्य बनने वाला प्रथम भारतीय दादाभाई नौरोजी
    भारत में प्रथम समाचार पत्र शुरू करने वाला व्यक्ति जेम्स.ए. हिक्की
    भारत में प्रिंटिंग प्रेस का प्रचलन करने वाला प्रथम भारतीय जेम्स.ए. हिक्की
    विश्व बैडमिन्टन चैम्पियनशिप में पदक जीतने वाला प्रथम भारतीय प्रकाश पादुकोण (कांस्य 1983)
    भारत का अंतिम गवर्नर जनरल एवं प्रथम वायसराय लॉर्ड कैनिंग
    भारत का अंतिम वायसराय‌-लॉर्ड माउंटबेटन
    स्वतंत्र भारत का प्रथम गवर्नर जनरल‌लॉर्ड माउंटबेटन
    स्वतंत्र भारत का प्रथम तथा अंतिम (भारतीय) गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी
    भारत का प्रथम राष्ट्रपति‌डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
    भारत का प्रथम मुस्लिम राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन
    भारत का प्रथम उप-राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन
    भारत का प्रथम उपप्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल
    भारत का प्रथम प्रधानमंत्री‌पं. जवाहरलाल नेहरू
    भारत का प्रथम शिक्षा मंत्री अबुल कलाम आजाद
    भारत के केन्द्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने वाला प्रथम मंत्री श्यामा मुखर्जी (1950)
    प्रथम चीफ ऑफ एयर स्टॉफ एयर मार्शल सर थॉमस एमहर्स्ट
    भारत का प्रथम वायु सेनाध्यक्ष एयर मार्शल एस. मुखर्जी
    भारत का प्रथम नौसेनाध्यक्ष वाइस एडमिरल आर.डी. कटारी
    प्रथम चीफ ऑफ आर्मी स्टॉफ जनरल एम. राजेन्द्र सिंह
    स्वतंत्र भारत का प्रथम कमांडर इन-चीफ जनरल करिअप्पा
    प्रथम फील्ड मार्शल जनरल मानिक शॉ
    लोकसभा का प्रथम अध्यक्ष गणेश वासुदेव मावलंकर
    भारत का प्रथम चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन
    भारत का प्रथम मुख्य न्यायाधीश जस्टिस हीरालाल जे. कानिया
    स्वतंत्र भारत में जन्मे (29 सितम्बर, 1947) भारत के प्रथम मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सरोश होमी कपाड़िया
    अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय में प्रथम भारतीय (अध्यक्ष) न्यायाधीश डॉ. नागेन्द्र सिंह
    अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय में प्रथम न्यायाधीश बेनेगल रामाराव
    भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष व्योमेशचन्द्र बनर्जी
    भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम मुस्लिम अध्यक्ष बदरुद्दीन तैयब
    राष्ट्रीय कांग्रेस के सम्मेलन में भारत की स्वतंत्रता का प्रस्ताव पेश करने वाला प्रथम व्यक्ति इसरत मोहानी
    भारत का प्रथम विश्वविद्यालय‌ नालन्दा विश्वविद्यालय
    भारत का प्रथम दूरदर्शन केन्द्र नई दिल्ली
    देश में पहली बार दूरदर्शन में रंगीन कार्यक्रमों का प्रसारण 15 अगस्त, 1982
    प्रथम मूक फिल्म‌ राजा हरिश्चन्द्र (निर्माता फाल्के – 1912)
    प्रथम बोलती फिल्म आलमआरा (आर्देशर ईरानी-1931)
    भारत की पहली टेक्नीकलर फिल्म झाँसी की रानी
    भारत की प्रथम ३-डी फिल्म माई डियर कुट्टी चातन
    प्रथम प्रायोजित सीरियल हमलोग (1984)
    भारत का प्रथम समाचार-पत्र बंगाल गजट (1780)
    प्रथम महिला रोजगार कार्यालय जयपुर
    भारत का प्रथम परमाणु रिएक्टर अप्सरा
    भारत की प्रथम परमाणु पनडुब्बी आई.एन.एस. चक्र
    भारत की प्रथम पनडुब्बी आई.एन.एस. कावेरई
    भारत का प्रथम विमानवाहक पोत आई.एन.एस. विक्रांत
    भारत का प्रथम मध्यम दूरी वाली मिसाइल अग्नि
    भारत का प्रथम प्रक्षेपास्त्रprathvi
    भारत का प्रथम आण्विक केन्द्र तारापुर
    भारत का प्रथम खुला विश्वविद्यालय आंध्र प्रदेश खुला विश्वविद्यालय
    प्रथम एशियाई खेल का आयोजन दिल्ली (1951 ई. में)
    भारत का प्रथम गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिंक
    नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाला प्रथम भारतीय रवीन्द्रनाथ ठाकुर
    भारत के प्रथम नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक सी.वी. रमन (भौतिकी)
    मैग्सेसे एवार्ड पाने वाला प्रथम भारतीय आचार्य विनोबा भावे
    स्टालिन पुरस्कार प्राप्त करने वाला प्रथम भारतीय सैफुद्दीन किचलू
    गोल्डेन ग्लोब अवार्ड जीतने वाले प्रथम भारतीय ए.आर. रहमान
    भारत रत्न पुरस्कार प्राप्त करने वाला प्रथम भारतीय डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन
    भारत रत्न से सम्मानित प्रथम विदेशी नागरिक खान अब्दुल गफ्फार खान
    ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रथम व्यक्ति श्रीशंकर कुरूप
    आई.सी.एस. में सफल होने वाला प्रथम भारतीय सत्येन्द्र नाथ टैगोर
    अंतरिक्ष में पहुंचने वाला प्रथम भारतीय राकेश शर्मा
    इंगलिश चैनल को पार करने वाला प्रथम भारतीय मिहिर सेन
    पाक स्ट्रेट तैराकी प्रतियोगिता जीतने वाला प्रथम भारतीय वैद्यनाथ
    बिना ऑक्सीजन के एवरेस्ट की चोटी पर पहुँचने वाला भारतीय शेरपा अंग दोरजी
    भारत का भ्रमण करने वाला प्रथम चीनी यात्री फाह्यान

    भारत में प्रथम महिला

    तथ्य नाम
    भारत की प्रथम महिला राष्ट्रपतिश्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल
    भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी
    एवरेस्ट पर लगातार दो बार चढ़ने वाली प्रथम महिला संतोष यादव
    मिस यूनिवर्स बनने वाली प्रथम महिला सुष्मिता सेन
    भारत रत्न से सम्मानित प्रथम महिला श्रीमती इंन्दिरा गाँधी
    ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने वाली प्रथम महिलाआशापूर्णा देवी
    अर्जुन पुरस्कार पाने वाली प्रथम महिला एन. लम्सडेन (हॉकी, 1961 ई.)
    ओलम्पिक में कोई पदक पाने वाली प्रथम महिला कर्णम मल्लेश्वरी (कांस्य पदक)
    अर्जुन एवं राजीव गाँधी खेल रत्न दोनों पुरस्कार पाने कुंजरानी (ग्रांड ओल्ड लेडी)
    प्रथम महिला मेयर तारा चेरियन (चेन्नई)
    प्रथम महिला स्नातक (प्रतिष्ठा) सीमाकामिनी रॉय (1886 ई.)
    प्रथम महिला स्नातक कादम्बिनी गांगुली एवं चन्द्रमुखी बासु (1883 ई.)
    वायुसेना में प्रथम महिला पायलट हरिता कौर दयाल
    प्रथम महिला एयरबस पायलट दुर्वा बनर्जी
    प्रथम महिला लेफ्टिनेंट जनरल पुनीत अरोड़ा
    प्रथम महिला एयर वाइस मार्शल पी. बंदोपाध्याय
    प्रथम महिला चेयरपर्सन ऑफ इंडियन एयरलाइन्स सुषमा चावला
    अंतरिक्ष में जाने वाली प्रथम भारतीय महिला कल्पना चावला (अमेरिकी नागरिक)
    ऑस्कर पुरस्कार जीतने वाली प्रथम भारतीय महिला भानु अथैय्या
    एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाली प्रथम कमलजीत संधू महिला
    दक्षिणी ध्रुव पर पहुँचने वाली प्रथम भारतीय महिला रीना कौशल धर्मशक्टू
    सात प्रमुख सागर तैरकर पार करने वाली प्रथम महिला बुला चौधरी
    गोबी रेगिस्तान पार करने वाली प्रथम महिला सुचेता कड़ेथानकर
    राज्य सभा की प्रथम महिला महासचिव बी.एस. रमादेवी
    राज्य सभा के लिए नामांकित होने वाली प्रथम महिला अभिनेत्री नरगिस दत्त
    अंटार्कटिका पहुँचने वाली प्रथम भारतीय महिला मेहर मूसा
    साहित्य अकादमी पुरस्कार जीतने वाली प्रथम महिला अमृता प्रीतम
    ओलम्पिक खेलों में भाग लेने वाली प्रथम महिला मैरी लीला राव
    भारतीय सिनेमा की प्रथम अभिनेत्री देविका रानी रोरिक
    राष्ट्रीय महिला आयोग की प्रथम महिला अध्यक्ष जयंती पटनायक
    दूरदर्शन समाचारवाचक प्रथम भारतीय महिला प्रतिमा पुरी
    विश्व बैडमिंटन चैम्पियनशिप में पदक जीतने वाली प्रथम महिला पी.वी. संधू (कांस्य पदक-2013)
    भारत की प्रथम महिला लोक सभा अध्यक्ष मीरा कुमार
    भारत की प्रथम महिला राज्य सभा उपाध्यक्ष वायलेट अल्वा
    भारत की प्रथम महिला सांसद राधाबाई सुबारायन
    भारत की प्रथम महिला राज्यपाल सरोजिनी नायडू (उत्तर प्रदेश)
    यूपीएससी की प्रथम महिला अध्यक्ष रोज मिलियन बैथ्यू
    भारत की प्रथम महिला शासिका रजिया सुल्तान
    भारत की प्रथम महिला आई.ए.एस.अन्ना जॉर्ज
    भारत की प्रथम महिला आई.पी.एस किरण बेदी
    प्रथम महिला मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी (उत्तर प्रदेश)
    प्रथम महिला केन्द्रीय मंत्री राजकुमारी अमृता कौर
    प्रथम महिला काँग्रेस अध्यक्ष डॉ. एनी बेसेन्ट
    सुप्रीम कोर्ट की प्रथम महिला न्यायाधीश मीरा साहिब फातिमा बीबी
    उच्च न्यायालय की प्रथम महिला मुख्य न्यायाधीश लीला सेठ (हिमाचल प्रदेश)
    देश की प्रथम महिला सत्र न्यायाधीश अन्ना वांडी (केरल)
    अशोक चक्र पाने वाली प्रथम महिला नीरजा भनोट
    संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रथम महिला भारतीय राजदूत विजयलक्ष्मी पंडित
    इंगलिश चैनल पार करने वाली प्रथम भारतीय महिला आरती साहा
    नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाली प्रथम भारतीय महिला मदर टेरेसा
    एवरेस्ट शिखर पर पहुँचने वाली प्रथम महिला बछेन्द्री पाल
    मिस वर्ल्ड बनने वाली प्रथम महिला कुमारी रीता फारिया

    महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय दिवस

    जनवरी

    लुइस ब्रेल दिवस4 जनवरी
    विश्व हास्य दिवस10 जनवरी
    राष्ट्रीय युवा दिवस (स्वामी विवेकानन्द का जन्म-दिवस)12 जनवरी
    थल सेना दिवस15 जनवरी
    कुष्ठ निवारण दिवस30 जनवरी
    भारत पर्यटन दिवस25 जनवरी
    गणतंत्र दिवस26 जनवरी
    अन्तर्राष्ट्रीय सीमा शुल्क एवं उत्पाद दिवस 26 जनवरी
    सर्वोदय दिवस30 जनवरी
    शहीद दिवस30 जनवरी

    फ़रवरी

    विश्व कैंसर दिवस4 फरवरी
    गुलाब दिवस12 फरवरी
    वेलेंटाइन दिवस14 फरवरी
    अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस21 फरवरी
    केन्द्रीय उत्पाद शुल्क दिवस24 फरवरी
    राष्ट्रीय विज्ञान दिवस28 फरवरी
    राष्ट्रीय सुरक्षा दिवस (औद्योगिक सं. की सुरक्षा)4 मार्च
    अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस8 मार्च
    के.औ.सु. बल की स्थापना दिवस12 मार्च
    विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस15 मार्च
    आयुध निर्माण दिवस18 मार्च
    विश्व वानिकी दिवस21 मार्च
    विश्व जल दिवस22 मार्च
    भगत सिंह, सुखदेव एवं राजगुरु का शहीद दिवस 23 मार्च
    विश्व मौसम विज्ञान दिवस23 मार्च
    राममनोहर लोहिया जयन्ती23 मार्च
    विश्व टी.बी. दिवस24 मार्च
    ग्रामीण डाक जीवन बीमा दिवस24 मार्च
    बांग्लादेश का राष्ट्रीय दिवस26 मार्च
    गणेश शंकर विद्यार्थी का बलिदान दिवस25 मार्च
    विश्व थियेटर (रंगमंच) दिवस27 मार्च

    अप्रैल

    विश्व स्वास्थ्य दिवस7 अप्रैल
    अम्बेडकर जयंती14 अप्रैल
    विश्व वैमानिकी एवं ब्रह्माण्डिकी दिदस14 अप्रैल
    विश्व हीमोफीलिया दिवस17 अप्रैल
    विश्व विरासत दिवस18 अप्रैल
    पृथ्वी दिवस22 अप्रैल
    विश्व पुस्तक एवं कॉपीराइट दिवस23 अप्रैल

    मई

    विश्व श्रमिक दिवस1 मई
    विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस3 मई
    विश्व प्रवासी पक्षी दिवस8 मई
    विश्व रेड क्रॉस दिवस8 मई
    अन्तर्राष्ट्रीय थैलीसीमिया दिवस8 मई
    राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस11 मई
    विश्व संग्रहालय दिवस18 मई
    विश्व नर्स दिवस12 मई
    विश्व परिवार दिवस15 मई
    विश्व दूरसंचार दिवस17 मई
    आतंकवाद विरोधी दिवस21 मई
    जैविक विविधता दिवस22 मई
    माउंट एवरेस्ट दिवस29 मई
    विश्व तम्बाकू रोधी दिवस31 मई

    जून [मलेरिया निरोधी माह)

    आक्रमण के शिकार अबोध बच्चो के लिए अन्तर्राष्ट्रीय दिवस 4 जून
    विश्व पर्यावरण दिवस5 जून
    विश्व रक्तदान दिवस14 जून
    मादक द्रव्यों के सेवन एवं उनके अवैध व्यापार के विरुद्ध अन्तर्राष्ट्रीय दिवस26 जून
    अन्तर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति स्थापना दिवस6 जून
    विश्व शरणार्थी दिवस20 जून
    राष्ट्रीय सांख्यिकी दिवस (पी.सी. महालनोबिस का जन्म-दिवस) 29 जून

    जुलाई

    भारतीय स्टेट बैंक की स्थापना दिवस1 जुलाई
    विश्व जनसंख्या दिवस11 जुलाई
    चिकित्सक दिवस (डॉ. विधानचन्द्र राय जन्म-दिवस) 1 जुलाई
    कारगिल स्मृति दिवस26 जूलाई

    अगस्त

    विश्व स्तनपान दिवस1 अगस्त
    विश्व युवा दिवस12 अगस्त
    स्वतंत्रता दिवस15 अगस्त
    राष्ट्रीय खेल दिवस (ध्यानचंद के जन्म-दिन पर) 29 अगस्त

    सितम्बर

    शिक्षक दिवस (राधाकृष्णन के जन्म-दिन)5 सितम्बर
    अन्तर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस8 सितम्बर
    हिन्दी दिवस14 सितम्बर
    विश्व बन्धुत्व एवं क्षमा याचना दिवस14 सितम्बर
    अभियन्ता दिवस15 सितम्बर
    संचयिका दिवस15 सितम्बर
    ओज़ोन परत रक्षण दिवस16 सितम्बर
    RPF की स्थापना दिवस20 सितम्बर
    विश्व शान्ति दिवस21 सितम्बर
    विश्व पर्यटन दिवस27 सितम्बर

    अक्टूबर

    अन्तर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस1 अक्टूबर
    लाल बहादुर शास्त्री जयन्ती2 अक्टूबर
    अन्तर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस2 अक्टूबर
    विश्व प्रकृति दिवस3 अक्टूबर
    विश्व पशु-कल्याण दिवस4 अक्टूबर
    विश्व शिक्षक दिवस5 अक्टूबर
    विश्व वन्य प्राणी दिवस6 अक्टूबर
    वायु सेना दिवस8 अक्टूबर
    विश्व डाक दिवस9 अक्टूबर
    विश्व दृष्टि दिवस10 अक्टूबर
    जयप्रकाश जयन्ती11 अक्टूबर
    विश्व मानक दिवस14 अक्टूबर
    विश्व एलर्जी जागरूकता दिवस16 अक्टूबर
    विश्व खाद्य दिवस16 अक्टूबर
    विश्व आयोडीन अल्पता दिवस21 अक्टूबर
    संयुक्त राष्ट्र दिवस24 अक्टूबर
    विश्व मितव्ययिता दिवस30 अक्टूबर
    इंदिरा गाँधी की पुण्य तिथि31 अक्टूबर

    नवम्बर

    विश्व सेवा दिवस9 नवम्बर
    रा. विधिक साक्षरता दिवस9 नवम्बर
    बाल दिवस14 नवम्बर
    विश्व मधुमेह दिवस14 नवम्बर
    सहनशीलता के लिए अन्तर्राष्ट्रीय दिवस16 नवम्बर
    विश्व विद्यार्थी दिवस17 नवम्बर
    राष्ट्रीय पत्रकारिता दिवस17 नवम्बर
    विश्व वयस्क दिवस18 नवम्बर
    विश्व नागरिक दिवस19 नवम्बर
    सार्वभौमिक बाल दिवस20 नवम्बर
    विश्व टेलीविजन दिवस21 नवम्बर
    विश्व मांसाहार निषेध दिवस25 नवम्बर
    विश्व पर्यावरण संरक्षण दिवस26 नवम्बर
    राष्ट्रीय विधि दिवस26 नवम्बर

    दिसम्बर

    विश्व एडस दिवस1 दिसम्बर
    अन्तर्राष्ट्रीय विकलांगता जन दिवस3 दिसम्बर
    नौसेना दिवस4 दिसम्बर
    रासायनिक दुर्घटना निवारण दिवस4 दिसम्बर
    अन्तर्राष्ट्रीय सवयंसेवक दिवस5 दिसम्बर
    नागरिक सुरक्षा दिवस6 दिसम्बर
    झंडा दिवस (सशस्त्र बलों का)7 दिसम्बर
    अन्तर्राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन दिवस7 दिसम्बर
    अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस10 दिसम्बर
    विश्व बाल कोष दिवस11 दिसम्बर
    विश्व अस्थमा दिवस11 दिसम्बर
    राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण दिवस14 दिसम्बर
    गोवा मुक्ति दिवस19 दिसम्बर
    किसान दिवस (चौधरी चरणसिंह का जन्म-दिन) 23 दिसम्बर
    राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस24 दिसम्बर
    CRPF का स्थापना दिवस28 दिसम्बर

    राज्यों एंव संघ प्रदेशों के स्थापना दिवस

    राज्यों का स्थापना दिवस

    ➣ राज्यों का स्थापना दिवस राज्यों द्वारा की गयी घोषणाओं के आधार पर है इसलिए इनके दिवस एंव गठन में भिन्नताएं हैं।

     दिवसराज्य
      21 जनवरी 1972 मणिपुर, मेघालय, मिजोरम एवं त्रिपुरा
      24 जनवरी 1950 उत्तर प्रदेश
      20 फरवरी 1987अरुणाचल प्रदेश
      1 नवम्बर 1956अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह
      22 मार्च 1912 बिहार
      30 मार्च 1949राजस्थान
      1 अप्रैल 1936 उत्कल (ओडिशा )
      15 अप्रैल 1948 हिमाचल प्रदेश
      1 मई1960 गुजरात एवं महाराष्ट्र
      16 मई 1975सिक्किम
      2 जून 2014तेलंगाना
      1 नवम्बर 1966 पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश
      1 नवम्बर 1956 कर्नाटक केरल एवं आन्ध्र प्रदेश
      19 दिसम्बर 1961गोवा
      1 दिसम्बर 1963 नगालैण्ड
      9 नवम्बर 2000 उत्तराखंड एंव छत्तीसगढ़
      20 जून 1947 पश्चिम बंगाल
      9 नवम्बर 2000
      15 नवम्बर 2000 झारखण्ड
      18 जुलाई 2022 तमिलनाडु

    संघ अथवा केंद्र शासित प्रदेशों के स्थापना दिवस

    ➣ वर्तमान 2022 में भारत में कुल 8 केंद्र शासित प्रदेश हैं।

    अण्डमान और निकोबार द्वीप समूह 1 नवम्बर 1956
    चण्डीगढ़ 1 नवम्बर, 1966
    दमन और दीव व दादरा और नगर हवेली 26 जनवरी 2020
    पॉण्डिचेरी 1 नवंबर, 1964
    दिल्ली 1 नवंबर 1956
    लक्षद्वीप 1 नवंबर 1956
    जम्मू और कश्मीर 31 अक्टूबर 2019
    लद्दाख 31 अक्टूबर 2019

    26 नवंबर 2019 को दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव को विलय घोषित किया गया जो 26 जनवरी 2020 से प्रभावी हो गया ।

    5 अगस्त 2019 को जम्मू – कश्मीर से लद्दाख को अलग करने की घोषणा तथा 31 अक्टूबर 2019 से दोनों को संघ शासित प्रदेशों के रूप में पुनर्गठन किया गया।

    विश्व के प्रमुख संगठन और उनके मुख्यालय संगठन

     एजेंसी एजेंसी
     यू.एस.ए. एसोसिएटेड प्रेस (AP)
     ब्रिटेन राइटर्स (REUTERS)
     रूस तास (TASS)
     मलेशिया बरनामा,BERNAMA)
     इटली अंसा (ANSA)
     इजरायल इतीम (ITIM)
     फ्रांस ए.एफ.पी. (A.F.P.)
     भारत प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (PTI)
     भारत समाचार भारती
     चीन सिन्हुआ (XINHUA)
     जापान क्योडो (KYODO)
     इंडोनेशिया अंतारा (ANTARA)
     ईरान इरना (IRNA)
     जर्मनी डी.पी.ए. (D.P.A.)
     फिलीस्तीन 919T (WAFA)
     ऑस्ट्रेलिया ए.ए.पी. (AAP)
     रूस नोवोस्ती (NOVOSTI)
     पाकिस्तान यू.पी.पी. (UPP)
     मित्र मेना (MENA)
     भारत यूनीवार्ता (UNIVARTA)
     भारत यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया (UNI)
     यू. एस. ए. यूनाइटेड प्रेस इंटरनेशनल (UP)

    प्रमुख देशों के सरकारी दस्तावेज

     ग्रीन बुक इटली और ईरान की सरकारी रिपोर्ट या प्रकाशन
     औरेंज बुक नीदरलैंड सरकार की रिपोर्ट या प्रकाशन
     व्हाइट बुक पुर्तगाल, चीन व जर्मनी की सरकारी रिपोर्ट या प्रकाशन
     व्हाइट पेपर ब्रिटेन और भारत सरकार की किसी विशेष विषय पर रिपोर्ट
     ब्लू बुक ब्रिटिश सरकार का सरकारी रिपोर्ट या प्रकाशन
     बेल्जियम व जापान की सरकारी रिपोर्ट या प्रकाशन ग्रे बुक
     येलो बुक फ्रांस सरकार की सरकारी रिपोर्ट या प्रकाशन
     ज्वांइट पेपर दो या दो से अधिक सरकारों की संयुक्त रिपोर या प्रकाशन

    प्रमुख देशों के राष्ट्रीय पशु

     ऑस्ट्रेलिया कंगारू
     कनाडा गंजा ईगल
     जापान आइबिस
     किवी न्यूजीलैंड
     यूनाइटेड किंगडम रॉबिन रेडब्रेस्ट
     भारत बाघ

    विभिन्न देशों के राजनीतिक दल देश राजनीतिक दल

     संयुक्त राज्य अमेरिका रिपब्लिकन पार्टी, डेमोक्रेटिक पार्टी
     इराक बाथ पार्टी
     इजरायल लेबर पार्टी, लिकुड पार्टी, हदाश पार्टी, शास पार्टी
     फ्रांस सोशलिस्ट पार्टी, नेशनल फ्रंट यूनियन फॉर फ्रेंच डेमोक्रेसी
     ऑस्ट्रेलिया लिबरल पार्टी, लेबर पार्टी
     बांग्लादेश बांग्लादेश नेशनल पार्टी, आवामी लीग, जातीय पार्टी
     नेपाल नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी, नेपाली कांग्रेस पार्टी
     चीन चीनी कम्युनिस्ट पार्टी,
     श्रीलंका यूनाइटेड नेशनल पार्टी, फ्रीडम पार्टी
     दक्षिण अफ्रीका अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस, नेशनल पार्टी, इंकाथा फ्रीडम पार्टी
     यूनाइटेड किंगडम कंजखेटिव पार्टी, लेबर पार्टी, लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी
     रुस लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी, रशाज चॉयर्स, कम्युनिस्ट पार्टी
     भारत भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी
     पाकिस्तान मुस्लिम लीग, पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी

    विश्व की प्रमुख गुप्तचर संस्थाएँ

    गुप्तचर संस्थादेश
     सेन्ट्रल एक्सटर्नल लेजा डिपार्टमेन्टचीन
     ऑस्ट्रेलियन सिक्यूरिटी एंड इंटेलीजेंस ऑर्गेनाइजेशन आस्ट्रेलिया
     के.जी. बी./जी. आर. यू.रूस
     ब्यूरो ऑफ स्टेट सिक्यूरिटीद. अफ्रीका
     एम. आई. (मिलिट्री इंटेलीजेंस)-5 एवं 6, स्पेशल ब्रांच, ज्वांइट इंटेलीजेंस ऑर्गेनाइजेशनयू. के.
     इंटर सर्विसेज इन्टेलीजेंस (आई. एस. आई.)पाकिस्तान
     रिसर्च एण्ड एनालिसिस विंग (RAW), इंटेलीजेंस ब्यूरो (IB), सेन्ट्रल ब्यूरो ऑफ इनवेस्टिगेशन (CBI)भारत
     सेन्ट्रल इंटेलीजेन्स एजेन्सी (CIA), फेडरल ब्यूरो ऑफ इनवेस्टिगेशन (FBI)यू. एस. ए.
     मोसादइजरायल
     मुखबरातमिस्र
     नाइचोजापान
     सावाकईरान
     अल मुखबरातइराक

    विश्व के प्रमुख समाचार-पत्र एवं प्रकाशन-स्थल

     द टाइम्स लंदन
     डेली मिरर लंदन
     ली फिगारो पेरिस
     इजवेस्तिया मास्को
     डॉन कराची
     द आइलैंड कोलम्बो
     ईस्टर्न सन सिंगापुर
     अल अहरम काहिरा
     मडेका जकाता
     गोर्डियन लंदन
     डेली न्यूज लंदन
     ला मांद पेरिस
     प्रावदा मास्को
     डेली न्यूज न्यूयॉर्क
     रोम ला रिपब्लिक
     इंडिपेंडेंट लंदन
     पीपुल्स डेली बीजिंग
     द हिन्दू चेन्नई
     वाशिंगटन वाशिंगटन पोस्ट
     न्यूयॉर्क टाइम्स न्यूयॉर्क
     फाइनेंशियल टाइम्स लंदन
     बांग्लादेश ऑब्जर्बर दाका
     स्टार जोहान्सबर्ग
     द टाइम्स ऑफ इंडिया भारत
     मैनेची सिम्बुन टोकियो
     खलीज टाइम्स दुबई

    संयुक्त राष्ट्र विशिष्ट अभिकरण

    संक्षिप्त नामसंगठन स्थापना वर्षमुख्यालय
     ITUअन्तर्राष्ट्रीय दूर संचार संघ 1865 ई जेनेवा (स्विट्जरलैंड)
     UPUसार्वभौम डाक संघ 9 अक्टूबर, 1874 बर्न (स्विट्जरलैंड)
     ILOअन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन 11 अप्रैल, 1919 ई जेनेवा (स्विट्जरलैंड)
     WTOविश्व पर्यटन संगठन 1925 ई मैड्रिड (स्पेन)
     ICAOअन्तर्राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन 7 दिसम्बर, 1944 ई मांट्रियल (कनाडा)
     FAOसंयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन 16 अप्रैल, 1945 ई रोम (इटली)
     IMFअन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष 27 दिसम्बर, 1945 ई वाशिंगटन डी सी (सं रा अमेरिका)
     WBविश्व बैंक 1945 ई वाशिंगटन डीसी (संरा अ)
     UNESCOयूनेस्को 4 नवम्बर, 1946 ई पेरिस (फ्रांस)
     IMOअन्तर्राष्ट्रीय सामुद्रिक व्यापार संगठन17 मार्च, 1948 ई लंदन (ब्रिटेन)
     WHOविश्व स्वास्थ्य संगठन7 अप्रैल, 1948 ई जेनेवा (स्विट्जरलैंड)
     WMOविश्व मौसम विज्ञान संगठन 1951 ई जेनेवा (स्विट्जरलैंड)
     IAEAअन्तर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा अभिकरण 29 जुलाई 1957 ई वियना (आस्ट्रिया)
     UNIDOसंयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठननवम्बर, 1966 ई वियना (आस्ट्रिया)
     WIPOविश्व बौद्धिक सम्पदा संगठन 1967 ई जेनेवा (स्विट्जरलैंड)
     IFADअन्तरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष 13 जून, 1976 ई रोम (इटली)
     WTOविश्व व्यापार संगठन 1 जनवरी, 1995 ई जेनेवा (स्विट्जरलैंड)
     CTETव्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि संगठन19 नवम्बर, 1996 ई वियना (आस्ट्रिया)
     OPCWरासायनिक हथियार निषेध संगठन 29 अप्रैल, 1997 ई द हेग (नीदरलैण्ड)

    विश्व के प्रमुख संगठन और उनके मुख्यालय

    संगठनसंक्षिप्त नाममुख्यालय
     गैट GATTजेनेवा
     एमनेस्टी इंटरनेशनललंदन
     एशियाई विकास बैंक ADBमनीला
     दक्षिण-पूर्वी एशियाई राष्ट्रों का संघ ASEANजकार्ता
     नाटो NATOब्रुसेल्स
     अफ्रीकी एकता संगठन OAUआदिस अबाबा
     रेड क्रॉस Red Crossजेनेवा
     सार्क SAARCकाठमाण्डू
     संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम UNEP नैरोबी
     इन्टरपोल INTERPOLपेरिस-लेओस
     विश्व व्यापार संगठन WTOजेनेवा
     अमेरिकी राज्यों का संगठन OAS वाशिंगटन डी.सी.
     अरब लीग ARAB LEAGUEकाहिरा
     परस्पर आर्थिक सहायता परिषद् COMECON मास्को
     वर्ल्ड काउंसिल ऑफ चर्चेजWCCजेनेवा
     यूरोपीय ऊर्जा आयोग EECजेनेवा
     अफ्रीकी आर्थिक आयोग ECAआदिस अबाबा
     पश्चिमी एशिया आर्थिक आयोग ECWA बगदाद
     संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायोग UNHCR जेनेवा
     अन्तर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी IAEA वियाना
     संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठन UNIDO वियाना
     संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास सम्मेलन UNCTADजेनेवा
     विश्व वन्य जीव संरक्षण कोष WWFग्लांड ,स्विट्जरलैंड
     अन्तर्राष्ट्रीय ओलंपिक कमिटी IOC लुसाने
     यूरोपीय कॉमन मार्केट ECMजेनेवा
     चोगम -राष्ट्रमंडलीय राष्ट्राध्यक्ष सम्मेलन CHOGMस्ट्रांसबर्ग
     पेट्रोलियम उत्पादक देशों का संगठन OPEC वियना
     आर्थिक सहयोग और विकास संगठन OECD पेरिस
     यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ ECTA जेनेवा
     राष्ट्रमंडल कॉमनवेल्थलंदन
     यूरोपीय आर्थिक समुदाय EEC जेनेवा
     यूरोपीय संसद लक्जमबर्ग
     यूरोपियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन ESRO पेरिस
     यूरोपियन परमाणु ऊर्जा समुदाय EURATON ब्रुसेल्स
     एशिया और प्रशान्त क्षेत्रों का आर्थिक और सामाजिक आयोग ESCAPबैंकॉक
     पूनिसेफन्यूयॉर्क

    राज्यों से संबंधित लोकनृत्य

    राज्यलोकनृत्य
     झारखण्ड छऊ, सरहुल, जट-जटिन, करमा, डांगा, विदेशिया, सोहराई।
     उत्तराखंड गढ़वाली, कुमायूँ, कजरी, झोरा, रासलीला, चपादी।
     आन्ध्र प्रदेश कुचिपुड़ी (शास्त्रीय), घंटामर्दाला, मोहिनीअट्टम (शास्त्रीय), कुम्मी, सिद्धि मधुरी, छड़ी।
     छत्तीसगढ़ पण्डवानी, गौडी, करमा, झूमर, डागला, पाली, टपाली, नवारानी. दिवारी।
     हिमाचल प्र.धमान, छपेली, महाथू, नटी, डांगी, चम्बा, थाली, झैता,डफ, डंडानाच आदि।
     गुजरात गरबा, डाण्डिया टिप्पानी जुरियुन, भवई, रासलीला, लास्या, पणिहारी आदि।
     असम बिहू, बिछुआ, नटपूजा महारास, खेल गोपाल, झुमुरा होब्जानाई, कलिगोपाल, नागानृत्य, बुगुरुम्बा, अंकियानाट आदि।
     प. बंगाल काठी, गम्भीरा, ढाली, जात्रा, बाउल, मरसिया, कीर्तन आदि।
     केरल कथकली (शास्त्रीय), ओट्टम, थुलाल, मोहिनीअट्टम (शास्त्रीय), कालीअट्टम, पादयानी।
     मणिपुर मणिपुरी (शास्त्रीय), राखाल, नटरास, महारास, रॉखत आदि।
     ओडिशा ओडिसी (शास्त्रीय), सवारी, धूमरा, पैंका, मुणरी, छऊ, अया।
     राजस्थान झूमर, घापाल, फूंदी, पनिहारी, जिन्दाद, नेजा, गणगौर आदि।
     महाराष्ट्रलावणी, नकटा, कोली, लेझिम, गफा, बोहदा, गौरीचा, ललिता, तमाशा, मौनी, लेजम, पोवाड़ा आदि ।
     मेघालय लाहो, बांग्ला आदि।
     गोवा माण्डी, झागोर, खोल, ढकनी आदि।
     अरुणाचल प्रदेश मुखौटा नृत्य, युद्ध नृत्य आदि ।
     कर्नाटकयक्षगान, कुनीता, कर्गा, लाम्बी, वीरगास्से आदि ।
     नगालैंड चोंग, खैवा, लीम, नुरालीम आदि ।
     पंजाब भांगड़ा, गिद्धा, डफ, धमान आदि ।
     मिजोरमखानटम, पाखुपिला, चेरोकान आदि ।
     जम्मू-कश्मीरहिकात, मंदजास, कूद दण्डीनाच, दमाली आदि।
     तमिलनाडु भरतनाट्यम (शास्त्रीय), कुमी, कोलट्टम, कावड़ी आदि।
     उत्तर प्रदेश रासलीला, नौटंकी, झूला, कजरी, जद्दा, चाचरी, जैता।

    भारत के प्रमुख पर्यटन-स्थल

    पर्यटन-स्थलस्थाननिर्माणकर्ता
     केन्हेरी की गुफाएँमुम्बई (महाराष्ट्र)बौद्ध द्वारा
     एलीफैंटा की गुफाएँ मुम्बई (महाराष्ट्र)राष्ट्रकूट द्वारा
     अजन्ता की गुफाएँ औरंगाबाद (महाराष्ट्र) गुप्त शासक द्वारा
     एलोरा की गुफाएँ औरंगाबाद (महाराष्ट्र) बौद्धों द्वारा
     कंदरिया महादेव खजुराहो (मध्य प्रदेश) चन्देल राजाओं ने
     मदन महल जबलपुर (मध्य प्रदेश) राजा मदन शाह
     मृगनयनी का महल ग्वालियर (मध्य प्रदेश) राजा मानसिंह तोमर
     धार का किलाधार (मध्य प्रदेश) मोहम्मद तुगलक
     गोलकुंडा का किला हैदराबाद (तेलंगाना) कुतुबशाही
     कोचीन का किला केरलपुर्तगालियों द्वारा
     विजय स्तंभ चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) महाराणा कुम्भा
     कुतुबमीनारदिल्लीकुतुबुद्दीन ऐबक
     ढाई दिन का झोपड़ा अजमेर (राजस्थान) कुतुबुद्दीन ऐबक
     हौज खासदिल्लीअलाउद्दीन खिलजी
     तुगलकाबाद दिल्लीग्यासुदीन तुगलक
     किशोर सागर कोटा (राजस्थान)राजकुमार धीरदेह
     अन्ना सागर अजमेर (राजस्थान) अन्ना जी चौहान
     फिरोज शाह कोटला दिल्लीफिरोजशाह तुगलक
     बूंदी का किलाबूंदी (राजस्थान) राजानगर सिंह
     हिलती मीनारें अहमदाबाद (गुजरात)
     पिछोला झील उदयपुर (राजस्थान)
     काकरिया झील अहमदाबाद (गुजरात) सुल्तान कुतुबुद्दीन
     दरगाह अजमेरशरीफ अजमेर (राजस्थान) सुल्तान ग्यासुद्दीन
     मेहरगढ़ दुर्ग जोधपुर (राजस्थान) राव जोधा जी (1459)
     गगरुन का किला झालावाड़ (राजस्थान) झालावाड़ स्टेट
     मुसी रानी की छतरी अलवर (राजस्थान) महाराजा विनय सिंह
     फतहसागर उदयपुर (राजस्थान) महाराणा फतह सिंह
     जय समंदउदयपुर (राजस्थान) महाराणा जय सिंह
     डीग महल डीग (राजस्थान)राजा बदन सिंह
     सहेलियों की बाड़ी उदयपुर (राजस्थान) महाराणा फतह सिंह
     रानी की बाड़ी बूंदी (राजस्थान) रानी नाथवती
     छत्र महल बूंदी फोर्ट (राजस्थान) रानी छत्रसाल
     जूनागढ़ किला बीकानेर (राजस्थान) राजा जय सिंह
     शेरगढ़ किला धौलपुर (राजस्थान) शेरशाह सूरी
     अनिरुद्ध का महल बूंदी फोर्ट (राजस्थान) राजा अनिरुद्ध सिंह
     जन्तर मन्तर जयपुर (राजस्थान) सवाई जय सिंह
     नाहरगढ़ फोर्ट जयपुर (राजस्थान) सवाई जय सिंह
     जगमोहन महल कोटा (राजस्थान) राजकुमार ब्रजकुमार
     भरतपुर का किला भरतपुर (राजस्थान) राजा सूरजमल सिंह
     हवामहल जयपुर (राजस्थान) महाराजा प्रताप सिंह
     सुख निवासबूंदी (राजस्थान) राजा बिशन सिंह
     उम्मेद भवन जोधपुर (राजस्थान) महाराजा उम्मेद सिंह
     आराम बाग आगरा (उत्तर प्रदेश) बाबर
     लाल किला दिल्लीशाहजहाँ
     हुमायूँ का मकबरा दिल्ली हाजी बेगम
     शालीमार बागश्रीनगरजहाँगीर
     सेन्ट जार्ज किला चेन्नई (तमिलनाडु)ईस्ट इंडिया कम्पनी
     शेरशाह का मकबरा सासाराम (बिहार) शेरशाह के पुत्र
     डच महल कोच्चि (केरल)पुर्तगालियों द्वारा
     फतेहपुर सिकरी आगरा (उत्तर प्रदेश) अकबर
     आगरा फोर्टआगरा (उत्तर प्रदेश)अकबर
     सती बुर्जमथुरा (उत्तर प्रदेश राजा भगवान दास
     जहाँगीर महलआगरा फोर्ट (उत्तरप्र.)अकबर
     अकबर का मकबरा सिकन्दरा (उत्तर प्र.) जहाँगीर
     अकबर का किला इलाहाबाद (उत्तर प्र.) अकबर
     चश्मा शाहीजम्मू-कश्मीरअली मरदान खाँ
     एतमादुद्दौला का मकबराआगरा (उत्तर प्रदेश) नूरजहाँ
     ताजमहल आगरा (उत्तर प्रदेश)शाहजहाँ
     निशांत बागजम्मू कश्मीरआसफ खाँ(नूरजहाँ का भाई)
     चीनी का रौजा आगरा (उत्तर प्रदेश)शाहजहाँ
     शीश महलआगरा (उत्तर प्रदेश)शाहजहाँ
     खास महलआगरा (उत्तर प्रदेश)शाहजहाँ
     दिवाने खासआगरा फोर्ट (उ. प्र.)शाहजहाँ
     हाई कोर्टमुम्बई (महाराष्ट्र)ब्रिटिश सरकार
     बड़ा इमामबाड़ालखनऊ (उत्तर प्रदेश)नवाब आसफ उद्दौला
     छोटा इमामबाड़ा लखनऊ(उत्तर प्रदेश)मुहम्मद अली शाह
     टीपू का महल बंगलुरु(कर्नाटक)हैदर अली (टीपू सुल्तान)
     लाल बाग बंगलुरु (कर्नाटक) हैदर अली (टीपू सुल्तान)
     गोलघरपटना (बिहार)ब्रिटिश सरकार
     पादरी की हवेली पटना (बिहार)फादर कापुचिन
     विलियम फोर्ट कोलकाता (प. बंगाल) लॉर्ड क्लाइव
     वीवी का मकबरा औरंगाबाद (महाराष्ट्र)औरंगजेब
     सफदरजंग का मकबरा दिल्लीशुजाउद्दौला
     जन्तर-मन्तरदिल्लीराजा सवाई जयसिंह
     विवेकानन्द रॉक मेमोरियलतमिलनाडुविवेकानंद
     पुराना किला दिल्लीशेरशाह सूरी
     वेलूर मठ कोलकाता (प. बंगाल) स्वामी विवेकानंद
     आनन्द भवन इलाहाबाद (उत्तर प्र.)मोती लाल नेहरू
     लक्ष्मण झूलाऋषिकेष (उत्तराखंड)
     शांति निकेतन पश्चिम बंगालरवीन्द्रनाथ ठाकुर
     तारापुर का मछली घरमुम्बई (महाराष्ट्र)
     साबरमती आश्रमअहमदाबाद (गुजरात)महात्मा गाँधी
     प्रिन्स ऑफ वेल्स म्यूजियम मुम्बई (महाराष्ट्र)जॉर्ज पंचम
     गेटवे ऑफ इंडिया मुम्बई (महाराष्ट्र)जार्ज विट्ठल क्लार्क
     जिम कार्बेट पार्क नैनीताल (उत्तराखंड)सर मेलकम हैले
     इंडिया गेटनई दिल्लीब्रिटिश सरकार
     राष्ट्रपति भवनदिल्लीब्रिटिश सरकार
     अफगान चर्चमुम्बई (महाराष्ट्र)ब्रिटिश सरकार
     बॉटनिकल गार्डनशिवपुर (कोलकाता)
     सनसेट प्वाइंटमाउंटआबू (राजस्थान)
     चारमीनार हैदराबाद (तेलंगाना) कुली कुतुबशाह
     काँचीपुरम का मंदिरचेन्नई (तमिलनाडु)पल्लव राजा
     मान मंदिरग्वालियर (मध्य प्रदेश)राजा मानसिंह तोमर
     कोणार्क मंदिरपुरी (ओडिशा)नरसिंह देव प्रथम
     जगन्नाथ मंदिर पुरी (ओडिशा) गंगा देव
     चौंसठ योगनी मंदिर खजुराहो (मध्य प्रदेश)चन्देल राजाओं ने
     चेन्ना केशव मंदिर वेलूरविष्णु वर्धन
     लक्ष्मण मंदिरछतरपुर (मध्य प्रदेश)चन्देल राजाओं ने
     दिलवाड़ा का जैन मंदिर माउंट आबू (राजस्थान) विमल शाह
     गोविन्द देव का मंदिरवृंदावन (उत्तर प्रदेश)
     राधा वल्लभ मंदिर वृंदावन (उत्तर प्रदेश)
     विष्णुपद मंदिरगया (बिहार)रानी अहिल्याबाई
     हरमंदिरपटना (बिहार)महाराजा रणजीत सिंह
     स्वर्ण मंदिर की स्वर्णछतअमृतसर (पंजाब)महाराजा रणजीत सिंह
     दक्षिणेश्वर काली मंदिरकोलकाता (प. बंगाल)रानी राश मोनी
     जैन मंदिरअजमेर (राजस्थान) सेठ मूलचंद सोनी
     रंगजी का मंदिरवृंदावन (उत्तर प्रदेश)
     शाहजी का मंदिरवृंदावन (उत्तर प्रदेश)
     लक्ष्मी नारायण मंदिरदिल्लीबिरला परिवार
     द्वारिकाधीश का मंदिर मथुरा (उत्तर प्रदेश) ग्वालियर के भक्त
     खिड़की मस्जिददिल्लीग्यासुद्दीन तुगलक
     शेरशाही मस्जिद पटना (बिहार)परवेज शाह
     मक्का मस्जिदहैदराबाद (तेलंगाना)कुली कुतुबशाह
     पत्थर की मस्जिदपटना (बिहार)परवेज शाह
     पत्थर मस्जिदजम्मू-कश्मीरनूरजहाँ
     जामा मस्जिदआगरा (उत्तर प्रदेश)शाहजहाँ
     मोती मस्जिदआगरा फोर्ट (उ.प्र.)शाहजहाँ
     जामा मस्जिद दिल्लीशाहजहाँ
     मोती मस्जिद दिल्ली फोर्ट औरंगजेब
     हजरतबल मस्जिदश्रीनगर (कश्मीर)
     चरार-ए-शरीफश्रीनगर (कश्मीर) जैनुल आबेदीन
     नाखुदा मस्जिदकोलकाता (प. बंगाल)
     विक्टोरिया मेमोरियल कोलकाता (प. बंगाल) डब्ल्यू. इमर्सन (डिजाइन)
     केंद्रीय सचिवालय नई दिल्ली हरबर्ट बेकर (डिजाइन)
     अंकोरवाट मंदिर कंबोडियासूर्य वर्मन ॥

    प्रमुख देशों के राष्ट्रीय चिह

    देश प्रतीक
    भारतअशोक स्तम्भ (शीर्ष भाग)
    डेनमार्कसमुद्री तट
    बांग्लादेशवाटर लिली
    नीदरलैंड्सशेर
    U.K.सफेद लिली
    सं. रा. अमेरिकागोल्डेन रॉड
    इटलीसफेद लिली
    ऑस्ट्रेलियावैटल
    न्यूजीलैंडकिवी, सदर्न क्रॉस, फर्न
    तुर्कीचाँद-तारा
    नार्वेशेर
    फ्रांसलिली
    ईरानगुलाब का फूल
    स्पेनईगल
    जापानगुलदाऊदी
    कनाडामैपल लीफ
    रूसडबल हेडेड ईगल
    प्रमुख देशों के राष्ट्रीय स्मारक
    स्मारक स्थान देश
    झुकी हुई मीनार पीसा इटली
    क्रेमलिन मास्को रूस
    पार्थनान एथेंस यूनान
    इम्पीरियल पैलेस टोकियोजापान
    ग्रेट वॉल उत्तर चीन चीन
    ओपेरा हाउस सिडनी ऑस्ट्रेलिया
    पिरामिड गीजा मिस्र
    एफिल टावर पेरिस फ्रांस
    पवन चक्की किंडर डिज्क डेनमार्क
    स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी न्यूयॉर्क यू. एस. ए
    ताजमहल आगरा भारत
    प्रमुख देशों के राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय सीमाएँ
    मैकमोहन रेखाभारत एवं चीन
    रेडक्लिफ रेखाभारत एवं पाकिस्तान
    हिण्डनबर्ग रेखाजर्मन एवं पोलैंड
    38वीं समानान्तर रेखाउ. कोरिया एवं द. कोरिया
    मैगीनॉट रेखाजर्मनी एवं फ्रांस
    49वीं समानान्तर रेखाUSA एवं कनाडा
    मेनरहीम रेखारूस एवं फिनलैंड
    डूरंड रेखापाकिस्तान एवं अफगानिस्तान

    प्रमुख पुरस्कार : क्षेत्र एवं राशि

    पुरस्कारक्षेत्र एवं राशि
     नोबेल पुरस्कारसाहित्य, चिकित्सा, भौतिकी, रसायन, शान्ति (सभी 1901 से) एवं अर्थशास्त्र (1969 से) (7 मिलियन स्वीडिश क्रोनर)
     पुलित्जर पुरस्कार पत्रकारिता (1917 से, 10,000 डॉलर)
     ऑस्कर पुरस्कार फिल्म (1929 से)
     कलिंग पुरस्कार विज्ञान (1952 से; 1,000 पौंड)
     मान बुकर पुरस्कार साहित्य (1969 से; 60,000 पौंड)
     ग्रेमी पुरस्कारसंगीत (1958 से)
     भारत रत्न कला, साहित्य, विज्ञान तथा जनसेवा
     दादा साहेब फाल्के फिल्म (1969 से; स्वर्ण कमल और पुरस्कार 10 लाख रुपए)
     ज्ञानपीठ पुरस्कार साहित्य (1965 से 11 लाख रु.)
     रैमन मैग्सेसे सरकारी सेवा, जनसेवा, पत्रकारिता, साहित्य,
     पुरस्कार संचार अन्तर्राष्ट्रीय समझ (1958 से; 50,000 डॉलर)
     सरस्वती सम्मान साहित्य (1991 से; 5 लाख रु.)
     वाचस्पति पुरस्कार संस्कृत साहित्य (1992 से; 1 लाख रुपए)
     शंकर पुरस्कारभारतीय दर्शन, संस्कृति तथा कला (1.5 लाख रुपए)
     व्यास सम्मान साहित्य
     कबीर पुरस्कारसामाजिक सद्भाव
     ध्यानचंद पुरस्कारखेलों में जीवन भर की उपलब्धि (5 लाख रुपए)
     द्रोणाचार्य पुरस्कार खेल प्रशिक्षण (1985 से; 5 लाख रु.)
     अर्जुन पुरस्कार खेल (1961 से; 5 लाख रुपए)
     राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कारखेलों में (1992 से;7.5 लाख रुपए)
     भटनागर पुरस्कार विज्ञान (1957 से 2 लाख रुपए)
     धन्वन्तरि पुरस्कार चिकित्सा (1977 से)
     बोरलॉग पुरस्कार कृषि की पैदावार में (1973 से)
     बी.सी.राय पुरस्कारचिकित्सा

    प्रमुख लेखक एवं उनकी पुस्तकें

     लेखकपुस्तक
     प्रवरसेन II सेतुबन्ध (मराठी प्राकृत काव्य)
     विष्णु शर्मापंचतंत्र
     रसखानप्रेमवाटिका
     शूद्रकमृच्छकटिकम् (मिट्टी का खिलौना)
     वात्स्यायनकामसूत्र
     जीमूतवाहनदायभाग
     प्लिनीनेचुरल हिस्ट्री
     दण्डीदशकुमारचरितम्, अवंती सुन्दरी
     अश्वघोष बुद्धचरितम्
     बाणभट्टकादम्बरी
     अमर सिंहअमरकोष
     फिरदौसीशाहनामा
     सूरदाससाहित्यलहरी, सूरसागर
     गुलबदन बेगमहुमायूँनामा
     भर्तृहरिनीति-शतक, शृंगार-शतक, वैरण्य शतक
     नीरद चन्द्र चौधरी हिन्दुइज्म, पैसेज टू इंग्लैंड, ऑटोबायोग्राफी ऑफ ऐन अननोन इण्डियन, कल्चर इन द वैनिटी वैग
     रवीन्द्र नाथ टैगोर चित्रांगदा, गीतांजलि, विसर्जन, गार्डनर, हंग्री स्टोन्स, गोरा, चाण्डालिका क्रिसेंट मून, द कोर्ट डांसर, पोस्ट ऑफिस, किंग ऑफ डार्क चेंबर
     मैथिलीशरण गुप्त भारत-भारती
     अमृता प्रीतमडेथ ऑफ ए सिटी, कागज ते कैनवास, फोर्टी नाइन डेज
     खुशवंत सिंहइन्दिरा गाँधी रिटर्न्स, द कम्पनी ऑफ वीमैन, दिल्ली,
     विजय तेन्दुलकरसखाराम बाइण्डर
     वेदव्यासभगवद्गीता, महाभारत
     इन्दिरा गाँधीइटरनल इंडिया
     जयशंकर प्रसादकामायनी, आँसू, लहर
     अरविन्द घोषलाइफ डिवाइन, ऐशेज ऑन गीता
     सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ अनामिका, परिमल
     महादेवी वर्मा यामा
     नयनतारा सहगलए वाइस ऑफ फ्रीडम
     वी. एस. नायपॉल एरिया ऑफ डार्कनेस
     विशाखदत्तमुद्राराक्षस
     पाणिनीअष्टाध्यायी
     डॉ. एस. राधाकृष्णनइंडियन फिलॉस्फी, हिन्दू व्यू ऑफ लाइफ
     विज्ञानेश्वरमिताक्षरा
     कल्हणराजतरंगिणी
     चाणक्यअर्थशास्त्र
     कालिदासकुमारसंभवम्, रघुवंशम्, अभिज्ञान शाकुन्तलम्, मेघदूत
     जयदेवगीतगोविन्द
     भवभूतिमालती माधव, उत्तररामचरित
     मलिक मो. जायसीपद्मावत
     अबुल फजलआईने अकबरी, अकबरनामा
     कबीरदासबीजक, रमैनी, सबद
     अलबरूनीकिताबुल हिन्द
     मुल्कराज आनन्दकुली, कन्फेशन ऑफ ए लवर, द डेथ ऑफ ए हीरो, द बिग हर्ट, सैमन समर्स, टू लीव्स एंड ए बड, द ब्राइड्स बुक ऑफ ब्यूटी
     कुलदीप नैयरजजमेंट, डिस्टेन्ट नेवर्स, इंडिया द क्रिटिकल इयर्स, इन जेल, इंडिया आफ्टर नेहरू, वियोन्ड दि लाइन्स (आत्मकथा)
     काजी नजरूल इस्लाम अग्निवीणा
     शिवानन्दडिवाइन लाइफ
     प्रेमचन्दगोदान, गबन, कर्मभूमि, रंगभूमि
     बी. एम. कौलअनटोल्ड स्टोरी, कन्फ्रन्टेशन विद पाकिस्तान
     अज्ञेयकितनी नावों में कितनी बार
     सरोजिनी नायडूगोल्डेन ग्रेसहोल्ड, ब्रोकेन विंग्स
     यशपालदादा कॉमरेड
     सुमित्रानन्दन पंतपल्लव, चिदम्बरा
     रामधारी सिंह ‘दिनकर’ कुरुक्षेत्र, उर्वशी
     आर. के. नारायण द डार्क रूम, मालगुडी डेज, गाइड, माइ डेज, द वेंडर ऑफ स्वीट्स, पेंटर ऑफ साइंस, टैलि स्मैन
     मोरारजी देसाईनेचर क्योर
     देवकीनन्दन खत्रीचन्द्रकांता
     शरतचन्द्र चट्टोपाध्यायदेवदास, चरित्रहीन
     एडम स्मिथवेल्थ ऑफ नेशंस
     अल्बर्ट आइंस्टीनद वर्ल्ड एज आई सी ईट
     आर्थर हेले एयरपोर्ट
     सैन्युअल हर्षप्राइस ऑफ पावर
     दाँतेडिवाइन कॉमेडी
     होमरओडिसी, इलियड
     हेनरी मिलरट्रॉपिक ऑफ कैंसर
     न्यूटनप्रिंसीपिया
     जॉन मिल्टनपैराडाइज लास्ट
     प्लेटोरिपब्लिक
     गुन्नार मिटलअगेन्स्ट् द स्ट्रीम, एशियन ड्रामा जॉर्ज आरबिल फार्म हाउस, एनिमल पार्क
     शेक्सपीयरकामेडी ऑफ एरर्स, एज यू लाइक इट, ए मिड समर नाइट्स ड्रीम, हैमलेट, किंग लियर, ओथेलो, जूलियस सीजर, किंग लियर, मैकबैथ, ऑल इज वेल दैट इंड्स वेल
     जार्ज बनाड शॉमैन एण्ड सुपरमैन, एपिल कार्ट, आर्स एण्ड द मैन, सीजर एण्ड क्लियोपेट्रा, पिगमैलियन, मेजर बार्बरा, मैन ऑफ डेस्टिनी
     हेराल्ड जे, लाश्की डाइलेमा ऑफ आवर टाइम, ग्रामर ऑफ पॉलिटिक्स
     मैक्सिम गोर्कीमदर
     माओ-से-तुंगऑन कण्ट्राडिक्शन
     एडॉल्फ हिटलर मीन केम्फ
     ए.एल. बाशम द वंडर दैट वाज इंडिया
     अरस्तूपॉलिटिक्स
     डायना मोस्कीद लाइफ ऑफ कन्ट्रास्ट
     ई. एम. फोस्टर ए पैसेज टू इण्डिया
     लियो टाल्सटायवार एण्ड पीस
     हेराल्ड मैकमिलन राइजिंग द स्ट्राम
     कैथरीन मेयोमदर इंडिया
     जे. एम. बेरीहिन्दु सिविलाइजेशन
     रूसोद सोशल कान्ट्रैक्ट
     मैकियावेलीद प्रिन्स, ऑन द आर्ट ऑफ वार
     चार्ल्स डार्विन डिसेंट ऑफ मैन
     चार्ल्स डिर्किसए टेल ऑफ टू सिटीज, पिकनिक पेपर्स, ओलिवर ट्विस्ट, डेविड कॉपरफील्ड, ग्रेट एक्सपेक्टेशंस
     एडवर्ड थॉमसन फेयरवेल टू इण्डिया
     जे. के गालब्रेथद चाइना पैसेज, द नेचर ऑफ मास पावर्टी, एम्बेस्डर्स जनरल, दि ट्राम्फ
     विन्सेट चर्चिल गैदरिंग स्टोर्स, हिस्ट्री ऑफ द सेकेण्ड वर्ल्ड वार
     एच. डब्ल्यू. लॉगफेलो साम ऑफ लाइफ
     जोनाथन स्विफ्टगुलिवर्स ट्रैवल्स
     जॉन कीट्सईसाबेला
     जॉन रस्क्रिअनटू द लास्ट
     लुईस फिशरगाँधी एवं स्टालिन
     टी. एस. इलियट फैमिली रीयूनियन, मर्डर इन द कैथेड्रल
     रिचर्ड एटनबरो इन सर्च ऑफ गाँधी
     रुपयार्ड किपलिंगजंगल बुक
     माइकल क्रिचटन जुरासिक पार्क
     जेम्स हेरियट ऑल थिंग्स ब्राइट एंड ब्यूटिफुल
     रिचर्ड निक्सन लीडर्स
     व्लादिमिर नावाकोव लोलिटा
     रोमेन रोलाडमहात्मा गाँधी
     आर्थर कॉनन डॉयल एडवेंचर्स ऑफ शरलॉक होम्स
     लीविस करोलएलिस इन वंडरलैंड
     एस्कॉट रीडएनवाय टू नेहरु
     लैरी कालिंस एवं डॉमिनिक लॉपिली फ्रीडम एट मिटनाइट
     पी. वी. नरसिंह रावद. इनसाइडर
     अरुण शौरीइंडियन कंट्रोवर्सीज : एसेज ऑन रिलीजन
     श्रीदत्त रामफलइनसेपेरेबल ह्यूमैनिटी
     डा. सादिक हुसैनतारीख-ए मुजाहिद्दीन
     मैडोनासेक्स
     मदर टेरेसाडाउन द मेमोरी लेन
     जगमोहनमाई फ्रोजेन टर्बुलेंस इन कश्मीर
     एम.एफ.हुसैन संसद उपनिषद्
     टी.एन. शेषन डिजेनेरेशन ऑफ इंडिया
     यू आर. अनंतमूर्ति संस्कार
     डा. सीताकांत महापात्रबियोंड द वार
     सलमान रुश्दीसैटेनिक वर्सेज, फ्यूरी, शालिमार द क्लाउन, मीड नाइट चिलेड्रेन
     सोनिया गांधीराजीव
     आंग सान सू कीफ्रीडम फ्रॉम फीयर
     लाल कृष्ण आडवाणीमाई कंट्री माई लाइफ
     कपिल देवस्ट्रेट फ्रॉम द हार्ट
     टॉम आल्टरद लाँगेस्ट रेसw
     
     रोमिला थॉपरसोमनाथ : द मेनी वॉयस ऑफ ए हिस्ट्री
     मनोहर जोशी स्पीकर्स डायरी
     अनीता देसाई फास्टिंग, फीस्टींग
     टाइगर वुड्सहाऊ आई प्ले गोल्फ
     एपीजे अब्दुल कलाम इग्नाइटेड माइंड्स
     मारग्रेट थैचर द पाथ टु पॉवर
     एम. एस. स्वामीनाथनटू ए हंगर फ्री वर्ल्ड
     एच. जी. वेल्सद इनभिजिबुल मैन, द टाइम मशीन
     लेसी फासवर्थ इंडिया गेट
     अटल बिहारी वाजपेयीराजनीति की रपटीली राहें, संसद के तीन दशक
     अरुंधती रायद गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स, द अल्जेब्रा ऑफ इन फाइनाइट जस्टिस
     डेरेक वाल्कटइन ए ग्रीन नाइट, ओमेरास
     एम.जे. अकबरइंडिया द सीज विदीन
     तारिक अलीकैन पाकिस्तान सरवाइव
     शशि अहलूवालियानेताजी एंड गांधी
     डोमिनिक लैपियर द सिटी ऑफ जॉय
     विक्रम सेठसुटेबल बॉय, गोल्डेन गेट, टू लाइव्स
     एन.एस. सक्सेनाइंडिया टुवर्ड्स एनार्की
     थॉमस कोनोली शिंडलर्स लिस्ट
     नवीन चावलामदर टेरेसा
     डा. हरिवंश राय बच्चनदशद्वार से सोपान तक, मधुशाला
     वी. पी. मलिककारगिल : फ्रॉम सरप्राइज टु विक्ट्री
     जनरल के सुंदरजीब्लाइंड मेन ऑफ हिंदुस्तान
     पी.सी. अलेक्जेंडरद पेरिल्स ऑफ डेमोक्रेसी
     के. गोविंदन कुट्टी शेषन : ए इन्टीमेंट स्टोरी
     मेनका गांधी हेड्स एंड टेल्स
     नेल्सन मंडेला लांग वाक टु फ्रीडम, द स्ट्रगल इन माई लाइफ
     बोरिस येल्तसिन अगेन्स्ट द ग्रेन
     खालिद मोहम्मद टु बी और नॉट टु बी
     हिलेरी रॉथम क्लिंटन लिविंग हिस्ट्री
     तुषार गांधीलेट्स किल गांधी
     बराक ओबामा द ऑडीसिटी ऑफ होप
     झुम्पा लाहिड़ी द नेमसेक, इन्टरप्रेटर ऑफ मेलोडीज
     व्लादिमीर पुतिनफर्स्ट पर्सन
     अमित चौधरीए न्यू वर्ल्ड
     वी. एस. नावपालहॉफ ए लाइफ, एन एरिया ऑफ डार्कनेस
     सतीश गुजरालए ब्रुश विद लाइफ
     मेघनाद देसाईरीडिस्कवरी ऑफ इंडिया
     बेनजीर भुट्टोडॉटर ऑफ द ईस्ट, पाकिस्तान द गैदरिंग स्टाम
     स्टीफन हार्किंग द ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम
     अरविन्द अडिगा सेलेक्शन डे
     एल्विन टोफलरपावर शिफ्ट
     बिल क्लिंटनमाइ लाइफ, द रोड अहेड
     शेख मुजीबुर रहमान फ्रेंड्स एंड फोयस
     चेतन भगतहॉफ गर्लफ्रेन्ड, वन इंडियन गर्ल, रियोल्यूस 2020, व्हाट यंग इंडिया वाण्टस, मेकिंग इंडिय ओसम, वन नाइट एट द कॉल्स सेंटर, स्टेटस द स्टोरी ऑफ माय मेरिज द थ्री मिस्टेक्स ऑफ माई लाइफ 5 पॉइंट समवन
     शशि थरूरबुकलेश इन बगदाद, द ग्रेट इंडियन नॉबेल
     रोनाल्ड बर्थ मैथोलॉजी
     एनी फ्रेंकद डायरी ऑफ यंग गर्ल
     मैक्स वेवरइकनॉमी एंड सोसायटी
     थॉम्स पैनद राइट ऑफ मैन
     सैमुअल जॉनसेनलाइव्स ऑफ द पोयेट
     जॉन ग्रीनद फॉल्ट इन ऑवर स्टार्स
     जनी एस्टेन प्राइड एंड प्रीजूडाइस
     आन्द्रे आगासीओपेन
     सचिन तेंदुलकर प्लेइंग इट माइ वे
     कपिल देवस्ट्रेट फॉर्म द हार्ट
     हेलेन केल्लेरस्टोरी ऑफ माइ लाइफ
     रॉबर्ट टी वाशिगंटनअप फॉर्म सेलेभरी

    भारत के सैनिक प्रशिक्षण संस्थान

    थलसेना (Army) प्रशिक्षण संस्थान

     संस्थान स्थान
     नेशनल डिफेन्स एकेडमी (NDA) खड़गवासला
      इंडियन मिलिट्री एकेडमी (IMA) देहरादून
     इन्फैंट्री स्कूल मऊ
      आर्टीलरी स्कूल देवलाली
      नेशनल डिफेन्स कॉलेज नई दिल्ली
      डिफेन्स सर्विस स्टाफ कॉलेज विलिंग्टन
     आम्र्ड सेण्टर अहमदनगर
      कमाण्ड मुख्यालय
      पश्चिमी कमाण्ड चण्डीमंदिर
      उत्तरी कमाण्ड  उधमपुर
      मध्य कमाण्ड लखनऊ
      पूर्वी कमाण्ड कोलकाता
      दक्षिणी कमाण्ड पुणे
      द.प.कमाण्ड जयपुर
      ट्रेनिंग कमाण्ड शिमला

    पद श्रेणियाँ क्रमानुसार

    जनरल
    लेफ्टिनेंट जनरल
    मेजर जनरल
    ब्रिगेडियर
    कर्नल
    लेफ्टिनेंट कर्नल
    मेजर
    कैप्टन
    लेफ्टिनेंट

    वायुसेना (Air force) प्रशिक्षण संस्थान

     संस्थान स्थान
      एयर फोर्स एडमिनिस्ट्रेटिव कॉलेज कोयम्बटूर
      पैराटूपर ट्रेनिंग स्कूल आगरा
      एयर फोर्स टैक्निकल कॉलेज जलाहली (बंगलूरू)
     एयर फोर्स एकेडमी हैदराबाद
      एलीमेन्ट्री फ्लाइंग स्कूल बिदर

    पद श्रेणियाँ क्रमानुसार

      कमाण्ड मुख्यालय
      पूर्वी कमाण्ड  शिलांग
      केन्द्रीय कमाण्ड  इलाहाबाद
      द. प. कमाण्ड  गाँधीनगर
      मेन्टेनेन्स कमाण्ड  नागपुर
      पश्चिमी कमाण्ड  नई दिल्ली
      दक्षिणी कमाण्ड  तिरुवनंतपुरम
      ट्रेनिंग कमाण्ड  बंगलुरु
    एयर चीफ मार्शल
    एयर मार्शल
    एयर वाइस मार्शल
    एयर कमोडोर
    ग्रुप कैप्टन
    विंग कमांडर
    स्क्वॉड्रन लीडर
    फ्लाइट लेफ्टिनेंट
    फ्लाइंग ऑफिसर

    नौ-सेना (Navy) प्रशिक्षण संस्थान

     संस्थान स्थान
     आई.एन.एस. “चिल्का भुवनेश्वर
     आई.एन.एस. ‘तसिरकार्स’ विशाखापट्टनम
     आई.एन.एस. ‘शिवाजी’ लोनावाला
      आई.एन. ‘येन्दुरथी’ कोच्चि
     इण्डियन नेवल एकेडमी कोच्चि
     कमाण्ड मुख्यालय
     पश्चिमी कमाण्ड  मुम्बई
     दक्षिणी कमाण्ड कोच्चि

    पद श्रेणियाँ क्रमानुसार

    एडमिरल
    वाइस एडमिरल
    रियर एडमिरल
    कमोडोर
    कैप्टन
    कमांडर
    लेफ्टिनेंट कमांडर
    लेफ्टिनेंट
    सब लेफ्टिनेंट
     संगठनस्थापना-वर्षमुख्यालय
      ARअसम राइफल्स 1835 ई. शिलाँग
      CRPFकेन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल 1939 ई. नई दिल्ली
      HGहोम गार्ड्स 1946 ई. विभिन्न राज्यों में
      NCCराष्ट्रीय कैडेट कोर 1948 ई. नई दिल्ली
      TAप्रादेशिक सेना 1949 ई. विभिन्न राज्यों में
      ITBPभारत-तिब्बत सीमा पुलिस 1962 ई. नई दिल्ली
      BSFसीमा सुरक्षा बल 1965 ई. नई दिल्ली
      CISFकेन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल 1969 ई. नई दिल्ली
      Coast Guardsतटरक्षा बल 1978 ई. नई दिल्ली
      NSGराष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड 1984 ई. नई दिल्ली
      RAFत्वरित कार्य बल 1992 ई.
      राज्य पुलिसविभिन्न राज्यों में

    विभिन्न देशों की संसद

    देश संसद का नाम
    भारत संसद
    मिस्र पीपुल्स असेम्बली
    पाकिस्तान शनल असेम्बली
    ब्रिटेन पार्लियामेन्ट
    जर्मनी बुण्ड्सटेग
    यू.एस.ए कांग्रेस
    बांग्लादेश जातीय संसद
    ताईवान यूआन
    इजरायल नेसेट
    जापान डायट
    मालदीव मजलिस
    स्वीडन रिक्सडाग
    नार्वे स्टोटिंग
    आयरलैंड डेल आयरन
    ऑस्ट्रेलिया पार्लियामेंट
    स्पेन कोर्टस
    नेपाल राष्ट्रीय पंचायत
    रूस ड्यूमा
    चीन नेशनल पीपुल्स कांग्रेस
    फ्रांस नेशनल असेम्बली
    ईरान मजलिस
    भूटान त्सोंगडू
    मलेशिया दीवान निगारा
    स्विट्जरलैंड फेडरल असेम्बली
    तुकी ग्रैंड नेशनल असेम्बली
    मंगोलिया खुरल
    डेनमार्क फोल्केटिंग
    कनाडा पार्लियामेंट

    भारत के प्रमुख शोध-संस्थान

    संस्थानस्थान
     भारतीय रासायनिक जैविकी संस्थानकोलकाता
     उच्च अक्षांश अनुसंधान प्रयोगशालागुलमर्ग
     केन्द्रीय पर्यावरण इंजीनियरींग अनुसंधान संस्थाननागपुर
     औद्योगिक विष विज्ञान अनुसंधान केन्द्रलखनऊ
     कोशिकीय तथा आण्विक जीव विज्ञान केन्द्रहैदराबाद
     भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभागकोलकाता
     केन्द्रीय जूट प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थानकोलकाता
     सेन्टर फॉर डी.एन.ए. फिंगर प्रिंटिंग एण्ड डायग्नोस्टिक्सहैदराबाद
     राष्ट्रीय मस्तिष्क अनुसंधान केंद्रगुड़गाँव
     भारत इलेक्ट्रॉनिक लिमिटेडजलाहली
     केन्द्रीय चावल अनुसंधान संस्थानकटक
     भारतीय दलहन शोध संस्थानकानपुर
     केन्द्रीय जल एवं विद्युत अनुसंधान केन्द्रखडकवासला
     भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थाननई दिल्ली
     केन्द्रीय गन्ना अनुसंधान संस्थानकोयम्बटूर
     केन्द्रीय तम्बाकू अनुसंधान संस्थानराजमुंदरी
     भारतीय चीनी तकनीकी संस्थानकानपुर
     राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थानकरनाल
     केन्द्रीय चमड़ा अनुसंधान संस्थानचेन्नई
     केन्द्रीय औषधि अनुसंधान संस्थानलखनऊ
     भारतीय मौसम विज्ञान संस्थाननई दिल्ली
     रमण अनुसंधान संस्थानबंगलुरु
     राष्ट्रीय धातु विज्ञान प्रयोगशालाजमशेदपुर
     कपड़ा उद्योग अनुसंधान संस्थानअहमदाबाद
     राष्ट्रीय प्रतिरोधक विज्ञान संस्थाननई दिल्ली
     भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्रट्राम्बे
     भारतीय पेट्रोलियम संस्थानदेहरादून
     अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थाननई दिल्ली
     टाटा इंस्टीच्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च मुम्बई
     इंडियन सिक्योरिटी प्रेसपुणे
     केन्द्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान मैसूर
     केन्द्रीय भवन निर्माण अनुसंधान संस्थान रूड़की
     केन्द्रीय कांच तथा मृत्तिका अनुसंधान संस्थान कोलकाता
     केन्द्रीय विद्युत रासायनिक अनुसंधान संस्थान कराईकुडी
     केन्द्रीय यांत्रिक इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान दुर्गापुर
     केन्द्रीय नमक व समुद्री रसायन अनुसंधान संस्थानभावनगर
     भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरणनई दिल्ली
     राष्ट्रीय भू-भौतिकी अनुसंधान संस्थानहैदराबाद
     केन्द्रीय नारियल अनुसंधान संस्थानकाशरगोड
     केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थानशिमला
     दृष्टि विकलांग हेतु राष्ट्रीय संस्थानदेहरादून
     पारिस्थितिकी विज्ञान केन्द्रबंगलुरु
     केन्द्रीय वन अनुसंधान संस्थानदेहरादून
     भारतीय लाह अनुसंधान संस्थानराँची
     केन्द्रीय ईंधन अनुसंधान संस्थानजलगोड़ा
     केन्द्रीय खनन अनुसंधान केन्द्रधनबाद
     भारतीय सर्वेक्षण विभागदेहरादून
     भारतीय मौसम वेधशालापुणे
     जीवाणु प्रौद्योगिकी संस्थानचंडीगढ़
     प्लाज्मा अनुसंधान संस्थानगाँधीनगर
     भारतीय भू चुम्बकीय संस्थानमुम्बई
     भारतीय खगोल संस्थानबंगलुरु
     राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थानपणजी
     डीजल लोकोमोटिव वर्क्सवाराणसी
     केन्द्रीय सड़क अनुसंधान संस्थाननई दिल्ली
     केन्द्रीय ट्रैक्टर संस्थाननई दिल्ली
     केन्द्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थानलखनऊ

    भारत के विश्व विरासत स्थल (यूनेस्को सूची)

    स्थलवर्षराज्य
    आगरा का किला1983उ. प्र
    अजन्ता की गुफाएँ1983महाराष्ट्र
    एलोरा की गुफाएँ1983महाराष्ट्र
    चोल मंदिर1987/2004तमिलनाडु
    पट्टाकल के स्मारक1987कर्नाटक
    सुन्दरवन राष्ट्रीय उद्यान1987प. बंगाल
    नंदादेवी व फूलों की घाटी1987/2005उत्तराखण्ड
    सांची का स्तूप1989मध्य प्रदेश
    हुमायूँ का मकबरा1993दिल्ली
    कुतुबमीनार1993दिल्ली
    माउण्टेन रेलवे (दार्जिलिंग रेलवे नीलगिरि कालका-शिमला)1999/2000प. बंगाल, तमिलनाडु, हिमाचल प्रदेश
    महाबोधि मंदिर (बोधगया)2002बिहार
    भीमबेटका की गुफाएँ2003मध्य प्रदेश
    ताजमहल1983उ. प्र
    महाबलिपुरम के स्मारक1984 तमिल नाडु
    सूर्य मंदिर1984ओडिशा
    मानस वन्य जीव अभयारण्य 1985असम
    काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान 1985असम
    केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान 1985राजस्थान
    गोवा का चर्च1986गोवा
    फतेहपुर सीकरी1986उत्तर प्रदेश
     पश्चिमी घाट2012कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र व तमिलनाडु
     राजस्थान के पहाड़ी किले 2013राजस्थान
     चितौड़गढ़ किला2013राजस्थान
     कुंभलगढ़ किला2013राजस्थान
     रणथंभौर किला2013राजस्थान (सवाई माधोपुर)
     जैसेलमेर किला2013राजस्थान
     आमेर किला2013राजस्थान (जयपुर)
     गागरोन किला2013राजस्थान (झालावार)
     रानी की वाव2014पाटन गुजरात
     ग्रेट हिमालयन राष्ट्रीय पार्क2014हिमाचल प्रदेश
     नालन्दा2016बिहार
     कंचनजंघा राष्ट्रीय पार्क2016सिक्किम
     ली कार्बुसियर के स्थापत्य कार्य2016चण्डीगढ़
     अहमदाबाद का ऐतिहासिक शहर2017गुजरात
     मुंबई का विक्टोरियन और आर्ट डेको एनसेंबल2018महाराष्ट्र
     जयपुर की चारदीवारी2019राजस्थान
    हम्पी अवशेष1986कर्नाटक
    खजुराहो मंदिर1986महाराष्ट्र
    एलीफैंटा गुफाएँ1987महाराष्ट्र
    चम्पानेर-पावागढ़ पार्क2004गुजरात
    छत्रपति शिवाजी टर्मिनल (पूर्व विक्टोरिया टर्मिनल)2004महाराष्ट्र
    लाल किला2001दिल्ली
    जंतर-मंतर (जयपुर)2010राजस्थान

    प्रमुख व्यक्तियों के लोकप्रिय उपनाम

     उपनामप्रमुख व्यक्तिय
      सीमांत गाँधीखान अब्दुल गफ्फार खाँ
      देशरत्नडॉ. राजेन्द्र प्रसाद
      राष्ट्रपितामहात्मा गाँधी
      अजातशत्रुडॉ. राजेन्द्र प्रसाद
      बापूमहात्मा गाँधी
      कश्मीर का अकबरजैनुल आबदीन
      वयोवृद्ध पुरुषदादाभाई नौरोजी
      नेताजीसुभाषचन्द्र बोस
      लौह पुरुषसरदार वल्लभभाई पटेल
     चाचाजवाहरलाल नेहरू
      शांति पुरुषलाल बहादुर शास्त्री
      युवा तुर्कश्री चन्द्रशेखर
      पंजाब केसरीलाला लाजपत राय
      ताऊचौधरी देवीलाल
      बंगाल केसरीआशुतोष मुखर्जी
      शहीद-ए-आजमभगत सिंह
      बिहार केसरीडॉ. श्रीकृष्ण सिंह
      माता वसंतएनी बेसेन्ट
      आन्ध्र केसरीटी. प्रकाशम्
      भारत कोकिलासरोजनी नायडू
     शेर-ए-कश्मीरशेख अब्दुल्ला
      स्वर कोकिलालता मंगेशकर
      बंगबन्धु-शेखमुजीबुर्रहमान
     उड़नपरीपी. टी. उषा
      देशबन्धुचित्तरंजन दास
     निर्मल हृदयमदर टेरेसा
     दीनबन्धुसी.एफ. एण्डूज
     विश्वकविरवीन्द्रनाथ ठाकुर
      लोकमान्यबाल गंगाधर तिलक
      कविगुरुरवीन्द्रनाथ ठाकुर
     लोकनायकजयप्रकाश नारायण
     सरदारवल्लभ भाई पटेल
      जननायककर्पूरी ठाकुर
      तोता-ए-हिन्दअमीर खुसरो
      राजर्षिपुरुषोत्तम दास टंडन
      बाबू जीजगजीवन राम
      गुरुदेवरवीन्द्रनाथ टैगोर
      भारत का नेपोलियनसमुद्रगुप्त
     गुरुजीएम. एस. गोलवलकर
      भारतीय मैकियावेलीचाणक्य
      राजाजीचक्रवर्ती राजगोपालाचारी
      हरियाणा हरिकेनकपिलदेव
      स्पैरोमेजर जनरल राजेन्द्र सिंह
     लिटिल मास्टरसुनील गावास्कर
      महामनापं. मदनमोहन मालवीय
      हॉकी के जादूगरध्यानचद
      अंकल होहो ची मिन्ह
      फ्यूहररएडोल्फ हिटलर
      सुपर कैटक्लाइव लॉयड
      वार्ड ऑफ एवनविलियम शेक्सपियर
      बिहार विभूतिअनुग्रह नारायण सिंह
      महाकवि कालिदासभारत का शेक्सपियर
      देशप्रिययतीन्द्र मोहन सेन गुप्त
      गुजरात का जनकरविशंकर महाराज
      भारतीय फिल्मों के पितामह घुण्डीराज गोविन्द फाल्के
      भारतीय इतिहास के नृप-निर्मातासैय्यद बन्धु
      विरोधाभासों का मिश्रणमोहम्मद-बिन-तुगलक
      महात्मा गाँधी के पाँचवें पुत्रजमना लाल बजाज
      मैन ऑफ डेस्टिनीलिटिल कार्पोरल
     लिटिल कॉरपोरलनेपोलियन बोनापार्ट
     ब्लैक गांधी-मार्टिनलूथर किंग (जूनियर)
      ग्रेण्ड मैन ऑफ ब्रिटेनग्लेडस्टोन
      फादर ऑफ इंगलिश पोइट्रीज्यौफ्री चॉसर
      मेडन क्वीनमहारानी एलिजाबेथ II
     मेड ऑफ ऑलिएंस जॉन ऑफ आर्क
      भारतीय पुनर्जागरण के प्रभातनक्षत्र राजा राममोहन राय
     लाल, बाल, पाललाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक एवं विपिनचन्द्र पाल
     मुहम्मद अली जिन्ना कायदे आजम

    विश्व की अंतर्राष्ट्रीय विमान सेवा के नाम

    देशविमान सेवासंक्षिप्त नाम
     अफगानिस्तान एरियाना अफगान एयरलाइन्सAAA
     ऑस्ट्रेलिया क्वीन्सलैंड एंड नादर्न टैरिटएरियल सर्विसQANTAS
     वेल्जियमनेशनल बेल्जियम एयरलाइन्सSABENA
     म्यांमार यूनियन ऑफ म्यांमार एयरवेजUBA
     पूर्वी अफ्रीका ईस्ट अफ्रीकन एयरवेजEAA
     फ्रांसएयर फ्रांसAF
     ग्रीस ओलंपिक एयरवेजOA
     हांगकांग कैथी पैसिफिक एयरवेजCPA
     हंगरी हंगेरियन एयरलाइन्स MALEV
     भारतएयर इंडियाAI
     इंडोनेशिया गरुड़ इंडोनेशियन एयरवेजGIA
     ईरानईरान एयरIA
     आयरलैंड आयरिश इंटरनेशनल एयरलाइन्साAirLignas
     इजरायल ई. आई. ए. आईEIAI
     इटलीइटैलियन एयरलाइन्सAlitelia
     जापान जापान एयरलाइन्सJAL
     कुवैत कुवैत एयरलाइन्सKA
     लेबनान मिडिल ईस्ट एयरलाइन्सMEA
     नेपाल रॉयल नेपाल एयरलाइन्सRNA
     नीदरलैंड के. एल. एम. रॉयल डच एयरलाइन्सKLM
     पाकिस्तान पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइन्सPIA
     एयरलाइन्स फिलीपींसफिलीपींस एयरलाइन्सPAL
     पोलैंडपोलिश स्टेट एयर सर्विस LOT
     रोमानियाट्रांसपोट्री एयरिने रोमानेTAROM
     स्कैंडिनेवियास्कैंडिनेवियन एयर सिस्टमSAS
     सिंगापुरसिंगापुर एयरलाइन्सSIA
     रूसएयरोफ्लोट
     श्रीलंकाएयर लंकाAL
     स्विट्जरलैंडस्विस एयरSwis Air
     यू. के.ब्रिटिश एयरवेज और जाटBA,JAT
     यू. एस.एपैन अमेरिकन एयरवेजPAA
     स्पेन इबीरिया
     पनामा कोपा
     जर्मनी लुफ्तहांसा

    संगठन से संबंधित व्यक्ति

    संगठनसंस्थापक / निर्माता
     रेड क्रॉस की स्थापनाहेनरी ड्यूनेन्ट
     रेड गार्ड्स की स्थापनागैरीवाल्डी
     संस्कृत व्याकरण के जनकपाणिनी
     शांतिनिकेतन की स्थापनारवीन्द्र नाथ ठाकुर
     पवनार आश्रम की स्थापनाविनोबा भावे
     लीग ऑफ नेशन्स के संस्थापकवुडरो विल्सन
     खालसा पंथ के संस्थापकगुरु गोविन्द सिंह
     आरेविले आश्रम (पुदुचेरी) की स्थापनाअरविन्द घोष
     स्काउटिंग की स्थापनावेडन पावेल
     समाजवाद के प्रवर्तकआचार्य नरेन्द्रदेव
     आनन्द वन की स्थापनाबाबा आमटे
     विश्व भारती की स्थापनारवीन्द्र नाथ ठाकुर
     भूदान आन्दोलन के प्रवर्तकविनोबा भावे
     स्वर्ण मंदिर का निर्माणगुरु अर्जुन देव
     न्याय दर्शन के संस्थापकमहर्षि गौतम
     निर्मल हृदय के संस्थापकमदर टेरेसा

    प्रमुख व्यक्तियों से सम्बन्धित स्थान

    स्थानव्यक्ति
     कोर्सिकानेपोलियन
     कपिलवस्तुगौतम बुद्ध
     मैसीडोनियासिकन्दर महान्
     ट्रेफल्गरनेल्सन
     जालियाँवाला बागजनरल डायर
     आनन्द भवनजवाहर लाल नेहरू
     चित्तौड़महाराणा प्रताप
     हल्दीघाटीमहाराणा प्रताप
     साबरमतीमहात्मा गांधी
     मकदूनियासिकन्दर महान
     शान्ति निकेतनरवीन्द्र नाथ ठाकुर
     तलबंडीगुरु नानक
     सेवाग्राममहात्मा गाँधी
     पावापुरीमहावीर
     कुशीनगरगौतम बुद्ध
     जेरुसलमईसामसीह
     लुम्बिनीगौतम बुद्ध
     मक्कामोहम्मद साहब
     वाटरलूनेपोलियन
     पोरबन्दरमहात्मा गांधी
     वारदोलीसरदार पटेल
     फतेहपुर सीकरीअकबर महान
     पुदुचेरीअरविन्द घोष
     बेलूररामकृष्ण परमहंस
     पवनारविनोबा भावे
     श्रीरंगपट्टनम्टीपू सुल्तान
     कुण्डग्राममहावीर
     जीरादेईडॉ. राजेन्द्र प्रसाद
     कटकसुभाष चन्द्र बोस
     त्रिमूर्ति भवनजवाहरलाल नेहरू

    प्रमुख चिह तथा प्रतीक

     चिह प्रतीक
     कलम संस्कृति और सभ्यता का प्रतीक
     कमल का फूल संस्कृति एवं सभ्यता
     रेड क्रॉस डॉक्टरी सहायता एवं अस्पताल
     लाल झडा क्रान्ति या खतरे का सूचक
     काला झंडा विरोध का प्रतीक
     पीला झंडा संक्रामक रोगग्रस्त लोगों को ले जाने वाले वाहन पर लगा झंडा
     उल्टा झंडा संकट का प्रतीक
     झुका झंडा राष्ट्रीय शोक का प्रतीक
     सफेद झंडा संधि या समर्पण का प्रतीक
     लाल त्रिकोण परिवार नियोजन का प्रतीक
     कबूतर पक्षी शान्ति का प्रतीक
     लाल प्रकाश खतरा या यातायात रोकने का प्रतीक
     हरा प्रकाश यातायात जाने देने का संकेत
     आँखों पर बंधी पट्टी और हाथ में तराजू लिए स्त्री न्याय का प्रतीक
     बाँह पर काली पट्टी शोक, विरोध और दुःख का प्रतीक
     एक-दूसरे को काटती दो हड्डियाँ और ऊपर खोपड़ी बिजली का खतरा
     चक्र प्रगति का प्रतीक
     ओलिव की शाखा शांति का प्रतीक

    समाधि-स्थल

     राजघाटमहात्मा गाँधी
     शांति वनजवाहरलाल नेहरू
     विजय घाटलाल बहादुर शास्त्री
     शक्ति स्थलइंदिरा गाँधी
     अभय घाटमोरारजी देसाई
     किसान घाटचौधरी चरण सिंह
     उदय भूमिके. आर. नारायणन
     वीर भूमिराजीव गाँधी
     महाप्रयाण घाटडॉ. राजेन्द्र प्रसाद
     नारायण घाटगुलजारी लाल नंदा
     समता स्थलजगजीवन राम
     चैत्रा भूमिबी. आर. अम्बेडकर
     एकता स्थलज्ञानी जैल सिंह
     कर्म भूमिशंकर दयाल शर्मा
     सदैव अटलअटल बिहारी बाजपेयी

    भारत में सर्वाधिक बड़ा, छोटा, लम्बा, ऊँचा

    विश्व में सर्वाधिक बड़ा, छोटा, लम्बा, ऊँचा

    भारत में प्रथम महिला

    भारत में प्रथम पुरुष

    महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय दिवस

    प्रमुख राज्यों की स्थापना दिवस

    विश्व के प्रमुख संगठन और उनके मुख्यालय

    राज्यों से संबंधित लोकनृत्य

    भारत के प्रमुख पर्यटन-स्थल

    प्रमुख देशों के national चिन्ह

    प्रमुख पुरस्कार : क्षेत्र एवं राशि

    प्रमुख लेखक एवं उनकी पुस्तकें

    भारत के सैनिक प्रशिक्षण संस्थान

    विभिन्न देशों की संसद

    भारत के प्रमुख शोध-संस्थान

    ऐतिहासिक दर्शनीय स्थल

    भारत के विश्व विरासत स्थल

    विश्व की अंतर्राष्ट्रीय विमान सेवा

    प्रमुख व्यक्तियों के लोकप्रिय उपनाम

    विश्व से सम्बंधित प्रथम

    विश्व से सम्बंधित विभिन्न तथ्य

    अन्य तथ्य

  • भारत के प्रमुख ऐतिहासिक युद्ध: एक झलक

    युद्धवर्ष. मध्यस्ताविजयी
    दशराज्ञ युद्ध1400 ई. पू. सुदास बनाम दस राजासुदास
    अरवेला का युद्ध331 ई. पू. दारा तृतीय बनाम सिकंदरसिकंदर

    ➣ भारत पर पहला सफल आक्रमण 516 ई पू. में दारा प्रथम (हखामनी साम्राज्य) ने किया था। दारा तृतीय उसका उत्तराधिकारी था। कालांतर में सिकंदर से हुए अरवेला युद्ध के परिणामस्वरूप भारत से ईरानी सत्ता समाप्त हो गया।

    करी या हाइडेस्पीज का युद्ध326 ई. पू. सिकन्दर बनाम पोरससिकंदर
    कलिंग का युद्ध261 ई. पू. अशोक बनाम कलिंग नरेशअशोक

    ➣ अपने राज्याभिषेक के 8वें वर्ष में लगभग 261 ईसा पूर्व में कलिंग पर आक्रमण किया और कलिंग की राजधानी तोसली पर अधिकार कर लिया।

    ➣ उसके अनुसार, इस दौरान 1,00,000 लोग मारे गए, लाखों तबाह हो गए और 1,50,000 को कैदी बना लिया गया।

    ➣ युद्ध ने ब्राह्मण और बौद्ध भिक्षुओं को बहुत कष्ट पहुँचाया और इसके लिए अशोक को बहुत दुःख और पश्चाताप हुआ।

    ➣ अशोक ने साम्राज्य के विजय की नीति त्याग कर, सांस्कृतिक विजय की नीति अपनाई और बौद्ध धर्म का अनुयायी बन गया। कलिंग युद्ध का उल्लेख अशोक ने अपने 13वें अभिलेख में दिया है।

    चन्द्रगुप्त सेल्यूकस युद्ध305 ई. पू. चन्द्रगुप्त मौर्य व सिकंदर चन्द्रगुप्त मौर्य

    ➣ सिकंदर जीते हुए क्षेत्रों को सेनापति सेल्यूकस को सौंप कर वापस चला गया था। सेल्यूकस ने भारत पर आक्रमण की योजना बनाई और चन्द्रगुप्त से परास्त हो गया।

    ➣ उसे संधि का प्रस्ताव करना पड़ा, जिसके तहत उसको अपनी पुत्री हेलेना का विवाह चन्द्रगुप्त मौर्य से कर दिया और दहेज़ में अपने राज्य का समस्त पूर्वी प्रदेश कन्धार, हेरात, काबुल, गान्धार और बलूचिस्तान को चंद्रगुप्त को समर्पित करने पड़े। इस तरह मौर्य साम्राज्य ईरान तक फैल गया।

    कनिष्क चीन युद्धप्रथम सदीकनिष्क व चीनी सम्राटकनिष्क

    कनिष्क (78 -102 ई.) का सबसे प्रसिद्ध युद्ध चीन के सेनापति पान-चाऊ साथ हुआ था, जहाँ एक बार पराजित होकर वह दुबारा विजयी हुआ।

    ➣ फलस्वरूप उसका रेशम मार्ग पर नियत्रण स्थापित हो गया। यह मार्ग मध्य एशिया और अफगानिस्तान से गुजरते हुए ईरान जाता था। इस मार्ग से कुषाणों की आय में काफी वृद्धि हुई।

    ➣ कनिष्क भारत का ऐसा पहला शासक था जिसने भारत से बाहर आक्रमण किया था।

    तलैयालंगानम युद्ध290 ई .पांड्य शासक बनाम चेर व चोल पांड्य शासक नेडुजेलियन

    ➣ पाण्ड्य राजवंश के शासक नेडुजेलियन ने तलैयालंगानम का युद्ध जीता। इस युद्ध में नेडुंजेलियन ने चोलों एवं चेरों को उनके अन्य 5 सामन्त मित्रों के साथ बुरी तरह पराजित किया था।

    ➣ नेडुजेलियन ने अपने शत्रुओं को राजधानी मदुरै से खदेड़ दिया और उनका पीछा करते हुए चोल राज्य की सीमा में घुस गया और तंजौर जिले के तिरवालूर से 13 किलोमीटर दूसर उत्तर-पश्चिम में स्थित तलैयालंगानम के युद्ध में शत्रु सेना को बुरी तरह पराजित किया।

    ➣ उसने चेर शासक जगमुख शेय’ (हाथी की आंख वाला) को बंदी बनाकर कारावास में डाल दिया। इस युद्ध को जीतने के बाद नेडुंजेलियन को काफी प्रसिद्धि मिली।

    आर्यावर्त के युद्धचौथी सदीसमुद्रगुप्त व 9 नाग शासकसमुद्रगुप्त
    स्कन्दगुप्त हूण युद्ध466 ई. स्कन्दगुप्त व हूणस्कंदगुप्त

    ➣ हूण मध्य एशिया की एक बर्बर जाति थी जो मूलतः मंगोलियन थे।

    ➣ हूणों का प्रथम आक्रमण सम्राट स्कंदगुप्त के शासन-काल में तिगिन एंव ख़ुशनेबाज के नेतृत्व में हुआ था। स्कंदगुप्त ने इनको सफलतापूर्वक रोका।

    ➣ स्कंदगुप्त एशियायूरोप का पहला शासक था जिसने हूणों को परास्त किया था। उसने इन आक्रमणों को गांधार से आगे नहीं बढ़ने दिया।

    ➣ स्कंदगुप्त के शासनकाल के पश्चात हूणों का आक्रमण तोरमाण के नेतृत्व में फिर हुआ परन्तु उत्तराधिकारी आक्रमण को रोकने में असफल साबित हुए।

    ➣ इस प्रकार तोरमाण भारत विजय करने वाला वह प्रथम हूण शासक था, जिसने मध्य भारत तक अपना साम्राज्य स्थापित किया। उल्लेखनीय है इससे पहले गांधार क्षेत्र में तिगिन ने हूणों का पहला साम्राज्य स्थापित कर लिया था।

    ➣ तोरमाण के बाद उसका पुत्र मिहिरकुल शासक बना। लेकिन वह अयोग्य साबित हुआ। मालवा के यशोर्धर्मन ने उसे युद्ध में मार डाला, नेता मिहिरकुल की मृत्यु के पश्चात् नेतृत्वविहीन हूणों का भारत में अधिपत्य समाप्त होने लगा। इस समय गुप्त शासक नरसिंह बालादित्य (495-530ई.) था।

    नर्मदा युद्ध630 ई.हर्ष व पुलकेशिन-IIपुलिकेशन द्वितीय

    ➣ गुप्तोतर काल में पुष्यभूति वंश से हर्षवर्धन (606-647 ई.) उत्तर-भारत का सम्राट हुआ जिसने अपनी राजधानी कन्नौज स्थान्तारित की। गुप्त साम्राज्य के पश्चात हर्षवर्धन ने ही पुरे उत्तर-भारत पर शासन किया जिसका साम्राज्य कशमीर तक फैला था।

    ➣ हर्षवर्धन ने दक्षिण भारत को जितने की चाह से अपना दक्षिण अभियान शुरू किया, किन्तु वह दक्षिणी अभियान में सफल नहीं हो सका। उसको नर्मदा नदी के तट पर बादामी के चालुक्य वंशीय शासक पुलकेशिन द्वितीय ने पराजित कर दिया। इसके पश्चात ही पुलिकेशन द्वितीय ने दक्षिणीपथेवर अर्थात दक्षिण का स्वामी उपाधि धारण की।

    ➣ हर्षवर्धन को अंतिम हिन्दू सम्राट भी कहा गया है। लेकिन वह ना ता कट्टर हिन्दू था ना ही पुरे देश का शासक।

    ➣ चीनी यात्री ह्वेनसांग सातवीं शताब्दी में हर्षवर्धन के काल में ही भारत आया था। जो लगभग 629-644 ई. तक भारत में रहा।

    ➣ पुलकेशिन II की ऐहोल प्रशस्ति एवं ह्वेनसांग का विवरण इस युद्ध के साक्ष्य हैं।

    शूरमार युद्ध641-42 ई. नरसिंहवर्मन-I व पुलेशिन-IIनरसिंहवर्मन
    परिमल युद्ध641-42 ई. नरसिंहवर्मन-I व पुलेशिन-IIनरसिंहवर्मन
    मणिमंगलाई युद्ध642 ई. नरसिंहवर्मन-I पुलकेशिन-IIनरसिंहवर्मन
    सिंध या रावल का युद्ध712 ई. दाहिर सेन व मुहम्मद बिन कासिममुहम्मद बिन कासिम

    मुहम्मद बिन कासिम, इराक के शासक अल हज्जाज का दामाद और उमैयद खलीफा (उमर खलीफा) का सेनापति था। यह भारत पर आक्रमण करने वाला प्रथम अरब मुस्लिम था जिसने मात्र 17 वर्ष की उम्र में सिन्ध व मुल्तान को (712 ई.) जीत लिया।

    ➣ कासिम के आक्रमण के समय सिंध पर राजा दाहिर सेन का शासन था। यह युद्ध के फलस्वरूप ही पहली बार भारत में सिन्धुवासियों से जजिया कर (एक गैर-धार्मिक कर) मोहम्मद बिन कासिम द्वारा लगाया गया।

    ➣ उल्लेखनीय है यह भारत पर पहला व अंतिम अरबी मुस्लिम आक्रमण था। सिंध विजय के पश्चात् ही कासिम की मृत्यु 715 ई. में 20 वर्ष की की उम्र में उसके विरोधियों द्वारा हो गयी थी। इसके बाद 300 वर्षों पश्चात 11वीं सदी में तुर्की मुसलमानों का आक्रमण हुआ था।

    ➣ अरबों की सिंध विजय के बारे में अलीअहमद द्वारा लिखित पुस्तक चचनामा से पता चलता है।

    त्रिपक्षीय युद्ध8-10वी सदी पाल. प्रतिहार व राष्ट्रकूटप्रतिहार

    ➣ त्रिपक्षीय युद्ध का मुख्य कारण कन्नौज था। गुप्त साम्राज्य के पतन के पश्चात उत्तर- भारत की राजनीतिक शक्ति का केन्द्र बिंदु पाटलिपुत्र के स्थान पर कन्नौज (उत्तर प्रदेश) स्थानांतरित हो गया था।

    यह हर्षवर्धन की राजधानी थी और हर्षवर्धन का कोई पुत्र नहीं था (पुत्री थी, जिसका विवाह वल्लभी के मैत्राकी वंश में हुआ था)।

    ➣ उल्लेखनीय है कन्नौज प्रारंभ में मौखरी वंशो की राजधानी थी और यह हर्षवर्धन की बहन का सुसुराल था किन्तु उसके बहनोई की मृत्यु के पश्चात सिंहासन रिक्त हो गया इसलिए हर्षवर्धन ने अपनी राजधानी थानेश्वर से कन्नौज स्थान्तरित कर दी थी।

    ईस्वी सन् 750 और 1000 के बीच भारत के तीन कोनों में तीन शक्तिशाली राजवंशों (दक्षिण में राष्ट्रकूट और पूर्व में पाल वंश , पश्चिम व उत्तरी भारत में गुर्जर प्रतिहार वंश) का उदय हुआ। कन्नौज पर आधिपत्य के लिए इन तीन महाशक्तियों के मध्य हुए संघर्ष को त्रि-पक्षीय संघर्ष की संज्ञा दी गई है।

    ➣ इस संघर्ष की शुरुआत करने वाला प्रतिहार राजा वत्सराज था। जिसने कन्नौज शासक इंद्रायुध को पराजित कर उत्तर भारत में अपनी सत्ता का विस्तार प्रारम्भ किया।

    ➣ राष्ट्रकूट नरेश ध्रुव ने भी त्रि-पक्षीय संघर्ष में हस्तक्षेप किया और वत्सराज को पराजित किया। इस युद्ध में भाग लेकर राष्ट्रकूट उत्तर भारत की राजनीति में हस्तक्षेप करने वाले दक्षिण भारत की प्रथम शक्ति बन गया।

    ➣ ध्रुव के वापस दक्षिण लौटते ही पाल वंशीय धर्मपाल ने कन्नौज पर आक्रमण कर इंद्रायुध के स्थान पर चक्रायुध को सिंहासन पर बैठा दिया। यह त्रि-पक्षीय संघर्ष 200 वर्षों तक चला।

    ➣ अंतत: इसका परिणाम गुर्जर-प्रतिहार शासक नागभट्ट द्वितीय (795-833ई.) के पक्ष में रहने के साथ इस युद्ध का समापन हो गया।

    नागभट्ट द्वितीय ने कन्नौज को गुर्जर-प्रतिहार साम्राज्य की राजधानी बनाया।

    वेण्णि का युद्धचोल बनाम चेर, पाण्ड्य सहित 11 शासकचोल शासक करिकाल

    तंजौर के निकट वेण्णि के युद्ध से चोल शासक करिकाल को अत्यधिक प्रसिद्धि प्राप्त हुई। इस युद्ध में उसने चेर तथा पाण्ड्य राज्य के 11 राजाओं के समूह पर पर विजय प्राप्त की थी

    ➣ इस युद्ध में हारने के पश्चात चेर शासक पेरूमशेरलादान ने आत्महत्या कर ली थी।

    बेल्लूर का युद्धपरान्तकम बनाम पाण्ड्य व श्रीलंकापरान्तक
    तक्कोलम का युद्ध949 ई. परान्तक बनाम राष्ट्रकूट व पश्चिमी गंगपरान्तक

    ➣ राष्ट्रकूट नरेश कृष्ण तृतीय ने चोल शासक परातंक प्रथम को तक्कोलम के युद्ध में बुरी तरह पराजित किया। राष्ट्रकूटों को यह विजय अपने सेनापति मणलेर तथा गंगराज भुगुत की सहायता से मिली।

    ➣ चोल युवराज राजादित्य इस युद्ध में मारा गया। चोल राज्य को जीतता हुआ कृष्ण तृतीय रामेश्वरम् जा पहुंचा जहां उसने एक विजय स्तंभ स्थापित किया।

    तिलकाड़ का युद्धगंग बनाम वेंगी के चालुक्य (विष्णुवर्धन)विष्णुवर्धन
    कोप्पम का युद्ध1052-54 चोल (राजाधिराज) बनाम चालुक्य (सोमेश्वर) चोल राजाधिराज प्रथम

    ➣ कोप्पम का युद्ध में चोल शासक राजधिराज प्रथम एवं पश्चिमी चालुक्य नरेश सोमेश्वर के बीच हुआ था। इसमें सोमेश्वर चालुक्य बूरी तरह पराजित हुआ और चोल शासक राजधिराज प्रथम मारा गया किंतु उसके छोटे भाई राजेंद्र द्वितीय ने युद्ध को जीता एवं युद्ध भूमि में ही अपना राज्याभिषेक किया।

    कुण्डलसंगमम् का युद्ध1060 ई. चोल बनाम चालुक्य (सोमेश्वर)चोल शासक वीर राजेन्द्र
    वैहन्द का युद्ध1008ई. महमूद गजनवी बनाम आनन्दपाल तथा अन्य हिन्दू शासकमहमूद गजनवी

    ➣ मुहम्मद बिन कासिम, के पश्चात भारत पर गजनी वंश के मुस्लिमो का आक्रमण हुआ यह तुर्की मुस्लिम आक्रमण था। सुबुक्तगीन का पुत्र मुहम्मद गजनवी था सुबुक्तगीन ने ही जयपाल के विरुद्ध भारत पर पहला तुर्की मुस्लिम आक्रमण किया। उसकी मृत्यु के पश्चात महमूद गजनवी ने शासन संभाला और अपने पिता की भांति भारत पर आक्रमण किया।

    ➣ हिन्दूशाही राजधानी वैहिंद (पेशावर के निकट) में महमूद गजनवी और आनन्दपाल के बीच 1008-1009 ई. हुआ। इस युद्ध में सांभर के चौहानों तथा मुल्तान के मुसलमान शासक ने भी आनंदपाल का साथ दिया था,किन्तु युद्ध में दुर्भाग्यवश राजा आनंदपाल की पराजय हो गई थी।

    ➣ महमूद गजनवी का भारत पर यह छठा आक्रमण था। उल्लेखनीय है उसने भारत 17 बार आक्रमण किया था। अपने सोलहवें आक्रमण (1025 ई.) में महमूद ग़ज़नवी ने प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर को अपना निशाना बनाया था।

    गुजरात का युद्ध1178ई. मुहम्मद गोरी बनाम मूलराज-IIमुहम्मद गोरी

    ➣ भारत में मुस्लिम वंश की नींव स्थापित करने श्रेय मुहम्मद गौरी को ही जाता है।

    ➣ भारत के पश्चिम उत्तर के सीमांत पर मुहम्मद ग़ोरी नामक एक मुसलमान सरदार ने महमूद ग़ज़नवी के वंशजों से राज्याधिकार छीन कर एक नये इस्लामी राज्य, ग़ोर (1173 ई.) की स्थापना की।

    ➣ वह महमूद ग़ज़नवी की तरह भारत पर आक्रमण करने का इच्छुक था। 1175 ई. में मुहम्मद गोरी ने सर्वप्रथम भारतीय सीमाओं में प्रवेश किया था।

    ➣ मुहम्मद गोरी ने 1178-79 ई. में गुजरात पर आक्रमण किया, लेकिन गुजरात के शासक मूलराज/भीम द्वितीय ने गौरी को आबू पर्वत के निकट पराजित कर दिया। यह मुहम्मद गौरी की भारत में पहली पराजय थी।

    तराईन का प्रथम युद्ध1191 ई. मुहम्मद गोरी बनाम पृथ्वीराज चौहानपृथ्वीराज चौहान

    ➣ तराईन के प्रथम युद्ध में महमूद गौरी को भारी क्षति उठानी पड़ी थी।

    ➣ भारत के विरुद्ध युद्ध अभियान में यह उसकी दूसरी बड़ी पराजय थी, जो अन्हिलवाड़ा (गुजरात) के युद्ध के बाद सहनी पड़ी थी। किन्तु एक योजना के साथ गौरी तराईन के मैदान में फिर आ धमका।

    तराईन का द्वितीय युद्ध1192 ई. मुहम्मद गोरी बनाम पृथ्वीराज चौहानमुहम्मद गोरी

    ➣ 1192 में तराईन के द्वितीय युद्ध में मुहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान को पराजित किया। पृथ्वीराज चौहान की पराजय के पश्चात् ही भारत में मुस्लिम शक्ति की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हो गया। इस युद्ध में गाहड़वाल वंशीय कन्नौज नरेश जयचंद्र उससे तटस्थ ही रहा।

    ➣ मुहम्मद ग़ोरी ने पृथ्वीराज के विरुद्ध जो अभियान किया था, वह एक प्रबल आक्रमण था। इसलिए महमूद ग़ज़नवी के बाद मुहम्मद ग़ोरी ही भारत पर चढ़ाई करने वाला दूसरा मुस्लिम आक्रमणकारी माना गया है।

    ➣ तराईन के युद्धों का वर्णन मिन्हाज़-उस-सिराज़ द्वारा रचित तबकात-ए-नासिरी ग्रन्थ में मिलता है।

    चन्दावर का युद्ध1194 ई. मूहम्मद गोरी बनाम जयचन्द्रमूहम्मद गोरी

    ➣ मुहम्मद ग़ोरी द्वारा पृथ्वीराज चौहान के पराजित होने से मुसलमानों का आधिपत्य पंजाब से आगे दिल्ली के बड़े राज्य तक हो गया था। उसके बाद उसने कन्नौज के विरुद्ध अपना अभियान आरंभ किया।

    ➣ कन्नौज का राजा जयचंद्र उस काल में पृथ्वी राज चौहान के पश्चात सबसे शक्तिशाली हिन्दू नरेश था किन्तु जयचंद्र इस युद्ध में मारा गया।

    ➣ यह युद्ध मुसलमानों के लिए ऐतिहासिक महत्त्व का सिद्ध हुआ क्योंकि उसके पश्वात ही भारत में वास्तविक रूप से मुसलमानी राज्य की स्थापना हुई।

    तराईन का तृतीय युद्ध1216ई. इल्तुतमिश बनाम ताजुद्दीन चल्दौजइल्तुतमिश
    कैथल का युद्ध1240 ई. रजिया बनाम मुईजुद्दीन बहरामशाहमुईजुद्दीन बहरामशाह
    अलाउद्दीन रणथम्भौर अभियान1301 ई. अलाउद्दीन बनाम हम्मीरअलाउद्दीन खिलजी
    अलाउद्दीन चित्तौड़ अभियान1303 ई. अलाउद्दीन बनाम रतनसिंहअलाउद्दीन खिलजी
    वारंगल युद्ध1308 ई. अलाउद्दीन बनाम प्रताप रूद्रदेवअलाउद्दीन खिलजी
    मालाबार युद्ध1311 ई. अलाउद्दीन बनाम पाण्डेयराज्यअलाउद्दीन खिलजी
    रायचूर का युद्ध1398ई. फिरोजशाह बहमनी बनाम बुक्का-IIफिरोजशाह
    पांगुल का युद्ध1420 ई. फिरोजशाह बहमनी बनाम देवराज-Iदेवराज प्रथम
    कांजीवरम् का युद्ध1481 ई. मुहम्मद-II बहमनी तथा वीरूपाक्ष (विजयनगर)मुहम्मद-II
    चोल का युद्ध1508 ई. महमूद बेगड़ा (गुजरात) बनाम पुर्तगालीमहमूद बेगड़ा
    शिवसमुद्रम का युद्ध1511-12 ई. कृष्णदेव राय व अम्मतूर का नायककृष्णदेव राय
    उदयगिरी का युद्ध1514 ई. कृष्णदेव राय व प्रतापरूद्र (उड़ीसा)कृष्णदेव राय
    ग्वालियर का युद्ध1518ई. इब्राहीम लोदी व विक्रमजीतइब्राहीम लोदी
    धौलपुर का युद्ध1519 ई. इब्राहिम लोदी बनाम राणा सांगाराणा सांगा
    पानीपत का प्रथम युद्ध1526 ई. बाबर बनाम इब्राहीम लोदीबाबर

    ➣ पानीपत का प्रथम युद्ध ज़हीर-उद्दीन बाबर और दिल्ली के लोदी वंश के सुल्तान इब्राहिम लोदी के बीच लड़ा गया था। युद्ध में इब्राहीम लोदी बुरी तरह से परास्त हुआ। पानीपत के प्रथम युद्ध ने ही भारत में मुगल साम्राज्य की नींव रखी।

    ➣ इस युद्ध में बाबर ने पहली बार प्रसिद्ध तुलगमा युद्ध नीति का प्रयोग किया था।

    खानवा का युद्ध1527 ई. बाबर बनाम राणा सांगाबाबर
    चन्देरी का युद्ध1528 ई. बाबर बनाम मेदिनीरायबाबर
    घाघरा का युद्ध1529 ई. बाबर बनाम अफगानबाबर
    दादर का युद्ध1531ई. हुमायूँ व अफगानहुमायूँ
    हुमायू का युद्ध1535ई. हुमायूँ बनाम बहादुरशाहहुमायूँ
    सूरजगढ़ का युद्ध1534 ई. शेरखाँन बनाम बंगाल का शासकशेरखाँन
    चौसा का युद्ध1539 ई. हुमायँ बनाम शेरखाँनहुमायूँ
    कन्नौज/बिलग्राम का युद्ध1540ई. हुमायूँ बनाम शेरखाँनशेरखाँन

    ➣ बिलग्राम के युद्ध पश्चात हुमायूँ के हाथों से दिल्ली की सत्ता निकल गयी और इस युद्ध के बाद शेर ख़ाँ ने आगरा और दिल्ली पर अधिकार कर लिया और सत्ता एक बार फिर से अफ़ग़ानों के हाथ में आ गई।

    ➣ इसके पश्चात उसे निर्वासित जीवन व्यतीत करना पड़ा। कुछ समय के लिए भारत से मुग़ल वंश का अंत हो गया और शूर वंश का उदय हुआ।

    कालिंजर का युद्ध1545ई. शेरशाह बनाम वीरभानशेरशाह

    ➣ यह शेरशाह का अंतिम अभियान था। रणभूमि में ही उसकी मृत्यु हो गयी थी।

    ➣ ऐसा माना जाता है कि कालिंजर अभियान के दौरान किले की दीवार से टकराकर लौटे एक गोले के विस्फोट से शेरशाह की 22 मई, 1545 ई. को मृत्यु हो गई। मृत्यु के समय वह उक्का नामक आग्नेयास्त्र चला रहा था।

    मच्छीवाड़ा युद्ध1555ई. हुमायूँ व तातर खौ (अफगान)हुमायूँ
    सरहिन्द का युद्ध1555ई. हुमायूँ व सिकन्द शाहहुमायूँ

    ➣ सरहिन्द युद्ध के पश्चात हुमायूँ ने दिल्ली पर पुन: कब्ज़ा कर लिया। युद्ध में अफ़ग़ान सेना का नेतृत्व सुल्तान सिकन्दर सूर एवं मुग़ल सेना का नेतृत्व बैरम ख़ाँ ने किया। युद्ध में अफ़ग़ानों की पराजय हुई।

    ➣ तत्पश्चात 23 जुलाई, 1555 ई. में हुमायूं ने एक बार पुनः दिल्ली के तख्त पर अधिकार कर लिया। परन्तु शीघ्र ही उसकी मृत्यु हो गयी और हेमचन्द्र (हेमू) ने दिल्ली में हिन्दू साम्राज्य की स्थापना की।

    हेमू मध्यकालीन भारत का ऐसा एकमात्र शासक था जिसने दिल्ली पर हिन्दू साम्राज्य को स्थापित किया। हालाँकि यह अल्पकालिक रहा।

    पानीपत का द्वितीय युद्ध1556ई. अकबर बनाम हेमूअकबर

    ➣ अभी अकबर 14 वर्ष का नाबालिग बालक था। इसलिए उसके संरक्षक बैरम खां ने युद्ध का नेतृत्व संभाला और अकबर को दिल्ली की गद्दी पर आसीन किया। इस प्रकार फिर से दिल्ली में मुग़ल वंश की नींव पड़ी।

    तिलवाड़ा का युद्ध1560 ई. बैरम खाँ बनाम मुग़ल सेना अकबर

    बैरम खां और पीर मोहम्मद के नेतृत्व में मुगल सेना के मध्य व्यास नदी के तट पर तिलवाड़ा का युद्ध हुआ। युद्ध में बैरम खान पराजित हुआ और अकबर के सामने पेश किया जहां अकबर द्वारा तीन प्रस्ताव दिए गए।

    ➣ दिए गए कई प्रस्ताव में बैरम खां ने हज यात्रा को स्वीकारा और यात्रा पर निकल गया। इसी दौरान गुजरात में मुबारिज खां नामक व्यक्ति, जिसके पिता को बैरम खां ने मछीवाड़ा के युद्ध में मार दिया था, ने बैरम खां की हत्या कर दी।

    मालवा युद्ध1561ई. अकबर बनाम बाजबहादुरअकबर
    तालीकोटा का युद्ध 1565ई. विजयनगर बनाम मुस्लिम संघमुस्लिम संघ

    तालीकोटा मुस्लिम संघ (अहमदनगर, बीजापुर, गोलकुण्डा और बीदर ) तथा विजय नगर (दक्षिण भारत का हिन्दू राज्य) के मध्य हुआ। विजय नगर की तरफ से नेतृत्व प्रधानमंत्री रामराय ने किया। युद्ध में रामराय मारा गया, फलत: विजयनगर समाप्त हो गया।

    गोलकुण्डा और बरार के मध्य पारस्परिक शत्रुता के कारण बरार इस युद्ध बरार शामिल नहीं हुआ।

    ➣ इस युद्ध को राक्षसी तंगड़ी का युद्ध और बन्नीहट्टी का युद्ध के नाम से भी जाना जाता है।

    हल्दीघाटी का युद्ध1576 ई. प्रताप बनाम अकबरअकबर

    ➣ हल्दीघाटी के युद्ध की गणना महत्वपूर्ण युद्धों में की जाती है। इसमें महाराणा प्रताप ने बहलोल खान को उसके घोड़े समेत दो हिस्सों में चीर दिया था।

    ➣ युद्ध में मुग़ल सेना का नेतृत्व हिन्दू सेनापति मान सिंह ने किया था। यद्दपि युद्ध में महाराणा प्रताप परास्त हुए किन्तु इस युद्ध से उन्हें इतिहास में ख्याति प्राप्त हुई।

    काबुल का युद्ध1581 ई. अकबर बनाम मिर्जा हकीमअकबर
    अहमदनगर का युद्ध1600 ई. अकबर व चाँदबीबीअकबर
    असीरगढ़ का युद्ध1601 ई. अकबर बनाम मीरन बहादुरशाहअकबर

    ➣ असीरगढ़ का युद्ध अकबर का अंतिम अभियान था। तत्पश्चात 21 अक्टूबर, 1605 को अकबर की मृत्यु हो गयी।

    जहाँगीर के मेवाड अभियान1608-14 ई. sजहाँगीर बनाम अमरसिंहजहाँगीर
    शाहजहाँ के मध्य एशियाई युद्ध1645 ई. शाहजहाँ बनाम नजर मुहम्मद
    कन्धार के अभियान1648-53 ई. शाहजहाँ बनाम फारसअनिर्णित
    इलाहाबाद के युद्ध 1657 ई. दारा बनाम शुजादारा
    धरमत का युद्ध1658 ई. दारा बनाम औरंगजेब व मुरादऔरंगजेब व मुराद
    सामूगढ़ का युद्ध1658 ई. दारा बनाम औरंगजेब व मुरादऔरंगजेब व मुराद
    देवराई का युद्ध1659ई. औरंगजेब बनाम दाराऔरंगजेब

    ➣ उत्तराधिकार की अन्तिम लड़ाई दारा एवं औरंगज़ेब के मध्य 12 -14 अप्रैल, 1659 ई. को देवरई की घाटी में हुआ। इस युद्ध में पराजित होने के उपरांत दारा को उसके दोनों

    बेटों सुलेमान और सिपहर को गिरफ़्तार कर मार दिया गया।

    ➣ देवराई के युद्ध के पश्चात औरंगजेब दिल्ली की गद्दी पर आसीन हुआ। ज्ञातव्य हो शाहजहां ने बड़े पुत्र दारा शिकोह को उत्तरधिकारी नियुक्त किया था।

    पुरन्दर का युद्ध1664 ई. शिवाजी बनाम मुगलमुग़ल

    ➣ इस युद्ध के दौरान ही शिवाजी ने मुग़लों के प्रसिद्ध बंदरगाह सूरत को लूटा था। इसके पश्चात औरंगजेब ने शिवाजी को रोकने के लिए राजा जय सिंह को भेजा था, इसके पश्चात ही राजा जय सिंह और शिवाजी के मध्य पुरंदर की संधि हुई थी।

    तिलपत का युद्ध1670 ई. गोकला जाट बनाम मुगलगोकला जाट
    सलहार का युद्ध 1672 ई. शिवाजी बनाम मुग़लशिवाजी

    ➣ इस युद्ध के बाद शिवाजी ने उन सारे प्रदेशों पर अधिकार कर लिया था, जो पुरन्दर की संधि के अन्तर्गत उन्हें मुग़लों को देने पड़े थे।

    औरंगजेब मेवाड़ युद्ध1679 ई. औरंगजेब बनाम राजसिंहऔरंगजेब
    औरंगजेब मारवाड़ युद्ध1680 ई. औरंगजेब बनाम राठौड़औरंगजेब
    बीजापुर का विलय1686ई. औरंगजेब बनाम सिकन्दर आदिलशाहऔरंगजेब
    गोलकुण्डा का विलय1687 ई. औरंगजेब बनाम अबुल हसनऔरंगजेब
    संगमनेर का युद्ध1689 ई. औरंगजेब बनाम शम्भाजीऔरंगजेब
    चमकौर का युद्ध1703 ई. गोविन्द सिंह बनाम मुगलमुगल
    जाजऊ का युद्ध1707 ई. मुअज्जम(बहादुर शाह जफ़र) बनाम आजममुअज्जम
    बीजापुर का युद्ध 1709 ई. मुअज्जम बनाम आजम मुअज्जम

    ➣ औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात तीनो शहजादों (मुहम्मद मुअज्जम, काम्बख्स ,मुहमद आजम, अन्य दो उत्तराधिकारियों की मृत्यु पहले ही हो चुकी थी) में उत्तरधिकारी के लिए युद्ध हुआ। गुरु गोविन्द सिंह ने इस उत्तराधिकार युद्ध में मुहम्मद मुअज्जम (बहादुरशाह प्रथम) का साथ दिया।

    जाजऊ का युद्ध तथा बीजापुर का युद्ध दोनों इसी से सम्बंधित हैं। बीजापुर के युद्ध में ने मुअज्जम ने कामबख़्श को पराजित किया। इस युद्ध कामबख़्श घायल हुआ तथा अगले ही दिन उसकी मृत्यु हो गयी।

    ➣ उत्तराधिकारी के युद्ध में 63 वर्षीय मुहम्मद मुअज्जम (बहादुरशाह प्रथम) विजयी रहा और दिल्ली की राजगद्दी पर बैठा।

    शकूरखेड़ा का युद्ध1724 ई. निजाम बनाम मुबारिज खाँनिजाम
    पालखेद का युद्ध1727ई. निजाम बनाम बाजीरावबाजीराव
    वार्ना का युद्ध1730 ई. श्रीपतराव बनाम शम्भाजी-IIश्रीपतराव
    दभई का युद्ध1731 ई. न्यम्बकराव दाभाड़े बनाम बाजीरावबाजीराव
    भोपाल का युद्ध1737 ई. बाजीराव बनाम निजामबाजीराव
    करनाल का युद्ध1739 ई. नादिरशाह बनाम मुहम्मदशाहनादिरशाह

    नादिरशाह, फारस का शासक जिसे ईरान का नेपोलियन भी कहा जाता है , एक विदेशी आक्रमणकारी था।

    ➣ मुग़ल सम्राट मुहम्मद शाह युद्ध परास्त हो गया फलत: 20 मार्च 1739 को नादिरशाह ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया और फारसी साम्राज्य की स्थापना की।

    ➣ मुग़ल सम्राट मुहम्मद शाह ने अपनी पुत्री का विवाह नादिरशाह के पुत्र नासिरूल्लाह मिर्जा से कर दिया। फलस्वरूप नादिरशाह ने मुहम्मद शाह को मुग़ल सम्राट घोषित कर दिया।

    1 /2 महीने दिल्ली में रहने के पश्चात नादिरशाह वापस चला गया और अपने साथ वह कोहिनूर हीरा और तख्ते-ए ताऊस भी साथ ले गया।

    आगे चलकर कोहिनूर/ हीरा नादिरशाह के उत्तरधिकारियों में शाहशुजा ने महाराजा रणजीत सिंह को भेंट किया और रणजीत सिंह के उत्तरधिकारियों में दिलीप सिंह ने एक समझौते के तहत इसे महारानी विक्टोरिया को भेंट कर दिया।

    प्रथम कर्नाटक युद्ध1744-48 ई. अंग्रेज बनाम फ्रांसीसीफ्रांसीसी

    ➣ अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के मध्य हुए संघर्ष को कर्नाटक युद्धों से जाना जाता है। इस युद्ध का प्रमुख कारण अंग्रेजों द्वारा फ्रांसीसी जहाजों का अधिग्रहण करना था। युद्ध समझौते के तहत समाप्त हुआ।

    उदयगिरी का युद्ध1760 ई. बालाजी बाजीराव बनाम निजामबालाजी बाजीराव
    पानीपत का तृतीय युद्ध1761 ई. अहमदशाह अब्दाली बनाम मराठाअहमदशाह अब्दाली

    ➣ अफगानिस्तान का द्रुरानी शासक अहमदशाह अब्दाली नादिरशाह का सेनापति था। जिसने उसके पश्चात भारत पर आक्रमण किया।

    ➣ इससे पहले अब्दाली ने भारत पर पहला आक्रमण 1749 में पंजाब पर किया था। दिल्ली को विजित करने के पश्चात वहां उत्तराधिकारी नियुक्त कर वापस चला गया।

    मार्च, 1858 में पेशवा रघुनाथराव (राघोवा) दिल्ली पहुँचा और नजीबुद्दौला को दिल्ली से निकाल दिया तथा अदीना बेग को पंजाब का गर्वनर नियुक्त कर दिया।

    ➣ अहमदशाह अब्दाली ने मराठों से प्रतिशोध लेने के पुन: भारत आया। फलस्वरूप 14 जनवरी 1761 ई. में पानीपत का तृतीय युद्ध हुआ।

    ➣ पानीपत के तृतीय युद्ध के पश्चात मराठा शक्ति क्षीण हो गयी। युद्ध में बालाजी के पुत्र विश्वास राव, सदाशिव राव भाऊ भी मारे गए। इस युद्ध का ज्यादा फायदा अंग्रेजों को हुआ उन्हें इस बीच अपनी शक्ति बढाने को मौका मिल गया।

    वांडीवाश का युद्ध1760-61ई. अंग्रेज बनाम फ्रांसीसीअंग्रेज

    ➣ वांडीवाश के युद्ध ने भारत से फ्रांसीसी शक्ति को ख़त्म कर दिया। युद्ध में फ़्राँसीसियों की हार हुई और उन्हें पाण्डिचेरी अंग्रेज़ों को सौंपना पड़ा

    ➣ अंग्रेजी सेना का नेतृत्व सर आयरकूट ने तथा फ्रांसीसी सेना की कमान लाली ने संभाली

    ➣ वाडीवाश का युद्ध फ़्राँसीसियों के लिए निर्णायक युद्ध था, क्योंकि विजय के साथ ही अंग्रेज़ों ने भारत में फ्राँसीसियों की राजनीतिक शक्ति समाप्त कर दी।

    प्लासी का यद्ध1757ई. अंग्रेज बनाम सिराजुद्दौलाअंग्रेज

    23 जून 1757 को अंग्रेजों तथा बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला के मध्य हुआ। जिसमे अंग्रेजों का नेतृत्व रोबर्ट क्लाइव ने किया।

    ➣ नवाब की तरफ से मीरमदान, मोहनलाल तथा कुछ फ्रांसीसी सैनिक ने भाग लिया। मीरजाफ़र ने युद्ध में नवाब को धोखा दे दिया। युद्ध के कुछ समय बाद ही नवाब सिराजुद्दौला की भी हत्या कर दी गयी।

    ➣ प्लासी के युद्ध के पश्चात् अंग्रेजों ने मीरजाफर को बंगाल का नवाब बना दिया।

    ➣ इस युद्ध के पश्चात ही भारत में अंग्रेजी साम्राज्य की नींव पड़ी।

    ब्लैक हॉल की घटना सिराजुद्दौला के समय ही घटित हुई थी।

    वेदरा का युद्ध1759 ई. अंग्रेज व डच अंग्रेज

    ➣ इस युद्ध ने डचों को भारतीय व्यापार से अलग कर दिया। अब फ्रांसीसी और डचों के बाद अंग्रेज शक्तिशाली बनकर उभरे।

    बक्सर का युद्ध1764 ई. अंग्रेज बनाम मीर कासिम, शुजाउदैला व शाहआलमअंग्रेज

    ➣ बक्सर के युद्ध में विजय के बाद ही भारत में वास्तविक रूप से ब्रिटिश सत्ता स्थापित हुई थी।

    ➣ बक्सर का युद्ध 1763 ई. से ही आरम्भ हो चुका था, किन्तु मुख्य रूप से यह युद्ध 22 अक्तूबर, सन् 1764 ई. में लड़ा गया।

    ➣ इस युद्ध में एक ओर मुग़ल सम्राट शाह आलम द्वितीय, अवध का नवाब शुजाउद्दौला तथा मीर क़ासिम थे जबकि दूसरी ओर अंग्रेज़ी सेना का नेतृत्व उनका सेनापति कैप्टन मुनरो कर रहा था।

    ➣ किन्तु मीर कासिम अपने कुछ सहयोगियों की गद्दारी के कारण युद्ध हार गया। अब मुग़ल सम्राट शाह आलम द्वितीय, बंगाल का नवाब मीर क़ासिम एवं अवध का नवाब शुजाउद्दौला तीनों पूर्ण रूप से कठपुतली शासक हो गये थे।

    प्रथम आंग्ल मैसूर युद्ध1769-72 ई. हैदर अली बनाम अंग्रेजअनिर्णायक

    ➣ युद्ध में अंग्रेजों का नेतृत्व जनरल जोसेफ स्मिथ ने किया। हैदर अली ने कूटनीति का प्रयोग कर मराठों और हैदराबाद के निजाम को अपनी तरफ मिला लिया और इस युद्ध में अंग्रेजों को बुरी तरह हराया।

    ➣ इसकी वजह से अंग्रेज हैदर के साथ 4 अप्रैल, 1769 को मद्रास की संधि करने के लिये विवश हो गए। इस संधि से कैदियों एवं विजित क्षेत्रों का आदान-प्रदान हुआ तथा अन्य राज्य द्वारा आक्रमण किये जाने की स्थिति में हैदर अली को अंग्रेज़ों ने सहायता प्रदान करने का वादा किया।

    प्रथम आंग्ल मराठा युद्ध 1775-82 ई. मराठे व अंग्रेजअनिर्णायक

    ➣ यह युद्ध सूरत की संधि का परिणाम था जो माधव रघुनाथ नारायण और अंग्रेजों के बीच हुई थी। परन्तु शीघ्र ही 1882 में महादजी सिंधिया की मध्यस्थता से सालबाई की संधि द्वारा प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध समाप्त हुआ।

    सूरत की संधि 1775 ई. में राघोवा (रघुनाथराव) और अंग्रेज़ों के बीच हुई। इस सन्धि के अनुसार अंग्रेज़ों ने राघोवा को सैनिक सहायता देना स्वीकार कर लिया। अंग्रेज़ों ने युद्ध में विजय के उपरांत उसे पेशवा बनाने का भी वचन दिया।

    द्वितीय आंग्ल मैसूर युद्ध1780-84 ई. हैदर अली बनाम अंग्रेजअनिर्णायक

    ➣ यह अंग्रेजो के विश्वाघात का परिणाम था, 19 मार्च, 1779 को अंग्रेज़ों ने माही (हैदर अली के अधिकार क्षेत्र में स्थित एक छोटी फ़्राँसीसी बस्ती) पर अधिकार कर लिया। परिणाम स्वरूप द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध का सूत्रपात हुआ।

    फरवरी 1880 में हैदर अली अंग्रेज विरोधी गुट में शामिल होकर जुलाई, 1780 में सेना को लेकर कर्नाटक में कर्नल बेली के नेतृत्व में अंग्रेज़ी सेना को हराते हुए अर्काट पर अधिकार कर लिया।

    पोर्टोनोवा का युद्ध1781 ई. अंग्रेज व हैदर अलीअंग्रेज

    पोर्टो नोवो की लड़ाई 1781 ई. में मैसूर के हैदरअली और सर आयरकूट के नेतृत्व में कम्पनी फ़ौजों के बीच की गई।

    पोर्टोनोवा के युद्ध में हैदर अली परास्त तो हुआ परन्तु अंग्रेजो के इसका लाभ नहीं मिला। कुछ समय पश्चात ही हैदर अली ने अंग्रेजी सेना को परास्त कर दिया।

    इसलिए ऐसा कहा जाता है कि हैदर अली एकमात्र ऐसा शासक था जो अंग्रेजों से कभी परास्त नहीं हुआ।

    तृतीय आंग्ल मैसूर युद्ध 1790-92 ई. अंग्रेज व मैसूरअंग्रेज

    तृतीय आंग्ल मैसूर युद्ध का प्रारम्भ अंग्रेजों द्वारा टीपू सुल्तान पर फ्रांसीसियों से अंग्रेजों के विरुद्ध गुप्त समझौता आरोप लगाकर प्रारम्भ किया गया।

    ➣ लॉर्ड कार्नवालिस ने दिसम्बर 1790 ई. में वेल्लोर और अम्बर की ओर से बढ़ते हुए मार्च 1791 में. में बंगलोर पर अधिकार कर लिया और 1790 तक टीपू की राजधानी श्रीरंगपट्टनम की घेराबंदी कर संधि करने के लिए बाध्य कर दिया।

    चतुर्थ आंग्ल मैसूर युद्ध 1798-99 ई. अंग्रेज व मैसूरअंग्रेज

    चतुर्थ आंग्ल मैसूर युद्ध के समय अंग्रेजी सेना का नेतृत्व बैलेजली हेरिस और स्टुअर्ट द्वारा के द्वारा किया गया। श्रीरंगपट्ट्नम को 17 अप्रैल को घेर लिया गया और 4 मई 1799 ई. को उस पर अधिकार हो गया।

    4 मई, 1799 ई. को दुर्ग की रक्षा करते हुए टीपू शहीद हो गया। उसके पुत्रों ने आत्मसर्मपण कर दिया।

    ➣ तत्पश्चात अंग्रेजों के द्वारा मैसूर की गद्दी पर आडियार वंशीय बालक कृष्णाराय को बैठाया गया।

    लाखेड़ी का युद्ध1793ई. मल्हार राव होल्कर बनाम महादजीमहादजी
    द्वितीय आंग्ल मराठा युद्ध 1802-05 ई. अंग्रेज बनाम मराठाअंग्रेज

    बेसिन की सन्धि के परिणामस्वरूप अंग्रेज़ों और मराठों के बीच द्वितीय-आंग्ल मराठा युद्ध हुआ, युद्ध में तीन अन्य प्रमुख मराठा शक्तियों (पेशवा बाजीराव द्वितीय,दौलत राव सिंधिया, गायकवाड़,होल्कर-इंदौर,भोसले) की पराजय हुई।

    ➣ फलत: अंग्रेजों ने दिल्ली पर भी अधिकार कर लिया। अब मुग़ल बादशाह शाहजहां तृतीय अंग्रेजों का पेंशनर बनकर रह गया।

    तृतीय आंग्ला मराठा युद्ध 1817-18 ई. अंग्रेज एवं मराठाअंग्रेज

    ➣ यह युद्ध अन्तिम रूप से लॉर्ड हेस्टिंग्स के भारत के गवर्नर-जनरल बनने के बाद लड़ा गया।

    ➣ इस युद्ध के पश्चात अंग्रेज़ों ने पेशवा के पद को ही समाप्त कर दिया और तत्कालीन बाजीराव द्वितीय को कानपुर के निकट बिठूर में पेंशन पर जीने के लिए भेज दिया, जहाँ पर 1853 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।

    बाजीराव द्वितीय अंतिम पेशवा हुए। मराठों के पतन में सर्वाधिक योगदान बाजीराव द्वितीय का ही माना जाता है।

    प्रथम आंग्ल बर्मा युद्ध1824 ई. अंग्रेज एवं बर्माअंग्रेज

    ➣ युद्ध का मुख्य कारण बर्मा राज्य की सीमाओं का ब्रिटिश साम्राज्य के आस-पास तक फैल जाना था, जिस कारण से अंग्रेज़ों के समक्ष एक संकट खड़ा होने का ख़तरा बड़ गया था।

    ➣ इस ख़तरे से छुटकारा पाने के लिए लॉर्ड एम्सहर्स्ट की सरकार ने बर्मा के विरुद्ध युद्ध घोषित कर दिया।

    ➣ अंग्रेज़ों ने दक्षिणी बर्मा की राजधानी प्रोम पर क़ब्ज़ा कर बर्मा सरकार को यन्दबू की सन्धि (1826 ई.) के लिए मजबूर कर दिया।

    अराकान और तेनासरीम के सूबे अंग्रेज़ों को सौंप दिये गये और मणिपुर को स्वाधीन राज्य के रूप में मान्यता प्रदान कर दी गई।

    प्रथम आंग्ल अफगान युद्ध 1839-42 ई. अंग्रेज एवं अफगानिस्तान अनिर्णायक

    ➣ युद्ध गवर्नर-जनरल लॉर्ड ऑकलैण्ड के समय में शुरू हुआ और यह उसके उत्तराधिकारी लॉर्ड एलनबरो के समय तक चलता रहा। इस युद्ध से कोई लाभ नहीं हुआ।

    रूस अपनी शक्ति काफ़ी बढ़ा चुका था और अब वह अफ़ग़ानिस्तान पर भी अपना प्रभाव जमाना चाहता था। रूस के समर्थन से फ़ारस की सेना ने अफ़ग़ानिस्तान के सीमावर्ती नगर हेरात को घेर लिया। जिसे इंग्लैंड की सरकार ने ब्रिटिश साम्राज्य के लिए ख़तरा माना।

    ➣ हालांकि उस समय फ़ारस और भारत के ब्रिटिश साम्राज्य के बीच में पंजाब में रणजीत सिंह और अफ़ग़ानिस्तान में दोस्त मुहम्मद का स्वतंत्र राज्य था।

    सिंध युद्ध1843 ई. अंग्रेज बनाम सिन्धअंग्रेज
    अलीवाल का युद्ध1845 ई. अंग्रेज बनाम सिखअंग्रेज
    चिलयांनवाला का युद्ध 1848 ई. अंग्रेज बनाम सिखअंग्रेज
    गुजरात का युद्ध1849 ई. अंग्रेज बनाम सिखअंग्रेज
    द्वितीय आंग्ल बर्मा युद्ध 1852 ई. अंग्रेज बनाम बर्माअंग्रेज

    लॉर्ड डलहौज़ी ने, जो उस समय ब्रिटिश गवर्नर-जनरल था। उसने दक्षिणी बर्मा को ब्रिटिश भारत में मिला लिया।

    ➣ इस युद्ध में बर्मा की पराजय हुई तथा वह एक स्थलीय राज्य बनकर ही रह गया। अब उसके सभी विदेशी सम्बन्ध सिर्फ़ अंग्रेज़ों की इच्छा पर आश्रित हो गये।

    द्वितीय आंग्ल अफगान युद्ध 1878-1880 ई. अंग्रेज बनाम अफगानअनिर्णायक

    ➣ यह युद्ध वायसराय लॉर्ड लिटन प्रथम (1876-1880 ई.) के शासन काल में प्रारम्भ हुआ।

    द्वितीय आंग्ल-अफ़ग़ान युद्ध दो नीतियों की पारस्परिक प्रतिक्रिया का परिणाम था। एक नीति, जिसे अग्रसर नीति (फ़ारवर्ड पालिसी) कहा जाता था, इसके अनुसार कंधार तथा क़ाबुल दोनों ब्रिटिश साम्राज्य के लिए आवश्यक माने गये।

    ➣ दूसरी नीति के अनुसार रूस और इंग्लैंड, जो पूर्व में अपने साम्राज्य का विस्तार करने के कारण एक दूसरे के प्रतिद्वन्द्वी थे, दोनों अफ़ग़ानिस्तान को अपने प्रभाव के अंतर्गत रखना चाहते थे।

    ➣ इस दूसरे युद्ध में विजय के लिए अंग्रेज़ों को भारी क़ीमत चुकानी पड़ी। अंग्रेज़ अफ़ग़ानिस्तान पर स्थायी रूप से क़ब्ज़ा तो नहीं कर सके, लेकिन उन्होंने उसकी नीति पर नियंत्रण बनाये रखा।

    तृतीय आंग्ल बर्मा1882 ई. अंग्रेज बनाम बर्माअंग्रेज

    ➣ इस युद्ध के बाद उत्तरी बर्मा को ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य में मिला लिया गया। मांडले जेल यहीं स्थित हैं।

    तृतीय आंग्ल-अफ़ग़ान युद्ध1919 ई. अंग्रेज बनाम अफगानअनिर्णायक

    ➣ अफ़ग़ानिस्तान के अमीर हबीबुल्लाह (1901-1919 ई.) के पुत्र शाह अमानुल्लाह (1919-1929 ई.) ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया जिसके फलस्वरूप तृतीय आंग्ल-अफ़ग़ान युद्ध शुरू हो गया।

    ➣ इस युद्ध में ब्रिटिश भारतीय सेना ने आधुनिक हथियारों तथा विमानों आदि का प्रयोग किया और अफ़ग़ानों को बुरी तरह पराजित किया।

    रावलपिण्डी की सन्धि-1919 के साथ ही यह युद्ध समाप्त हो गया। संधि के अंतर्गत अफ़ग़ानिस्तान के शाह को भारत से दी जाने वाली आर्थिक सहायता भी बंद कर दी गई।

  • भारत पर हुए विदेशी आक्रमण

    ➣ भारत पर सबसे विख्यात विदेशी आक्रमण सिकंदर का था हालाँकि वह भारत पर शासन नहीं कर सका उसे अपने सैनिको के समक्ष झुकना पड़ा और उसे वापस स्वदेश लौटना पड़ा।

    ➣ भारत पर आक्रमण करने वाले मुस्लिम शासक एकमात्र ऐसे आक्रमणकारी थे जिन्होंने भारतीय भूमि में एक नया धर्म, मुस्लिम धर्म, की नीवं रखी।

    ➣ हालाँकि इससे पहले भी कई आक्रमण हुए थे किन्तु उन आक्रमणकारियों में किसी ने बौद्ध धर्म (हिंद-यवन) अपना लिया जबकि कोई शैव धर्म (शक, प्रथियाई, कुषाण, हूण) के उपासक थे।

    ➣ इस प्रकार भारत पर हुए आक्रमणों को दो भागों में बांटा जा सकता है- ❑ पहला मुस्लिम आक्रमण (क्रमश: अरबी व तुर्की) जिनका उद्देश्य में भारत में मुस्लिम धर्म की स्थापना था, यद्दपि कुछ मुस्लिम आक्रमणकारी धन सम्पदा से आकृष्ट हुए किन्तु इससे भारत में मुस्लिम धर्म को बढ़ावा मिला। ❑ जबकि दुसरे सभी प्राचीन आक्रमण का उद्देश्य साम्राज्य विस्तार एंव धन-संपदा से आकर्षित होना था।

    ➣ उल्लेखनीय है मंगोल नेता चंगेज खां अपने दुश्मन का पीछा करते हुए भारतीय सीमा पर लगभग 1398 ई. में आया था लेकिन वह सिन्धु नदी से वापस भी लौट गया इस प्रकार भारत उसके आक्रमण से बच गया था इस समय दिल्ली की गद्दी पर इल्तुतमिश बैठा था।

    दारा प्रथम/डेरियस – 516 ई पू (हखामनी या फ़ारसी साम्राज्य)
    सिकन्दर – 326 ई.पू. (मकदूनिया/मैसीडोनिया राज्य)
    डेमेट्रियस प्रथम – 190 ई.पू. (हिंद-यवन का आक्रमण)
    रुद्रदामन – 90 ई.पू. (शकों का आक्रमण)
    माउस – 1 सदी ई.पू. (पार्थियाई या पहलव आक्रमण)
    कडफिज़ प्रथम – 15 ई. (कुषाण या यूची का आक्रमण)
    तिगिन एवं खुशनेबाज – 5वीं सदी (हूणों का आक्रमण)
    तोरमाण – 465-480 ई. (हूणों का आक्रमण)
    मुहम्मद बिन कासिम – 712 ई. (अरबी-मुस्लिम आक्रमण)
    सुबुक्तगीन – 986 ई. (तुर्की-मुस्लिम आक्रमण)
    महमूद गजनी – 1001 ई. (तुर्की-मुस्लिम आक्रमण)
    मुहम्मद गौरी – 1175 ई. (तुर्की-मुस्लिम आक्रमण)
    तैमूर लंग – 1398 ई. (मंगोल आक्रमण)
    बाबर – 1519 ई. (मुगल आक्रमण)
    नादिरशाह – 1739 ई. (ईरान का आक्रमण)
    अहमद शाह अब्दाली-1748 ई.. (ईरान का आक्रमण)

    ईरानी या फ़ारसी आक्रमण

    ईरानी सम्राट साइरस (हखामनी साम्राज्य)

    ➣ भारत पर पहला विदेशी आक्रमण करने का प्रयास 550 ई.पू. में ईरानी शासक साइरस द्वारा किया गया हालाँकि यह असफल रहा।

    दारा प्रथम/डेरियस/डायरवहु द्वारा भारत पर आक्रमण करने में सबसे पहले सफलता प्राप्त की तथा 516 ईपू में सर्वप्रथम गांधार को जीतकर फारसी साम्राज्य में मिलाया।

    ➣ इतिहासकार हेरोडोटस ने कहा है कि भारत का पश्चिमोत्तर क्षेत्र दारा प्रथम के साम्राज्य का 20वां प्रान्त था

    यूनानी आक्रमण

    सिकन्दर (मकदूनिया/मैसीडोनिया राज्य)-326 ई.पू.

    ➣ हखामनी आक्रमण के बाद पश्चिमोत्तर भारत पर यूरोपीय मैसीडोन शासक सिंकदर का आक्रमण हुआ।

    ➣ सिकंदर ने 331 ई.पू. प्रसिद्ध अरवेला के युद्ध में ईरानी शासक दारा तृतीय (डेरियस तृतीय) को बुरी तरह परास्त किया जिससे भारत से ईरानी अधिकार समाप्त हो गए।

    ➣ 326 ई.पू. में बैक्ट्यिा (अफगानिस्तान) को जीतने के बाद काबुल होता हुआ। हिन्दुकुश पर्वत को पार किया। किन्तु व्यास नदी से वापस लौट गया।

    ➣ सिकंदर की मृत्यु के पश्चात सेनापति सेल्यूकस निकेटर ने आक्रमण किया जिसे समकालीन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य ने परास्त किया। फलत: सिकंदर द्वारा जीते प्रदेश भारत में वापस मिल गए।

    ➣ सिकन्दर के आक्रमण के समय मगध पर धानन्द था जबकि सेनापति निकेटर के समय चन्द्रगुप्त मौर्य (322-298 ई.पू.) मगध की गद्दी पर आसीन था।

    हिंद-यवन का आक्रमण

    डेमेट्रियस प्रथम-190 ई.पू.

    190 ई.पू. में उत्तर-पश्चिमी भारत के विशाल क्षेत्र पर अधिकार कर लिया। जो क्षेत्र सिकंदर के जीते क्षेत्र से भी विशाल था।

    शकों का आक्रमण

    रुद्रदामन -90 ई.पू.

    ➣ 90 ई.पू. में भारत तथा अफगानिस्तान के विभिन्न हिस्सों में, गौतमी पुत्र सतकर्णी (सातवाहन साम्राज्य से ) व अन्य शासकों द्वारा खदेड़े गए।

    पार्थियाई या पहलव आक्रमण

    माउस-1 सदी ई.पू.

    1 सदी ई.पू. का अन्त उत्तर-पश्चिमी भारत के क्षेत्र पर अधिकार कर लिया। भारत में वास्तविक पहलव साम्राज्य का संस्थापक मिथ्रेंडेट्स-I था।

    कुषाण या यूची का आक्रमण

    कडफिज़ प्रथम या कुजुल कडफिसेस-15 ई.

    15 ई. उत्तर-अफगानिस्तान पर कब्ज़ा कर हिन्दू कुश पर्वत को पार कर गांधार

    ➣ कुषाण से ही कनिष्क राजा हुए। जिसने 58 ई.पू. में शक संवत चलाया जो भारत सरकार द्वारा प्रयोग में लाया जाता है।

    ➣ सर्वाधिक शुद्ध सोने के सिक्के कुषाण शासकों ने ही चलाये थे जबकि सर्वाधिक सोने के सिक्के गुप्तशासकों ने चलाए।

    हूणों का आक्रमण

    तिगिन एंव खुशनेबाज

    स्कंदगुप्त (455-468 ई.) के शासनकाल के अंत समय में हूणों का असफल आक्रमण।

    ➣ स्कन्दगुप्त के समय में हूण गान्धार से आगे नहीं बढ़ सके। उसके शासन काल में साम्राज्य प्रायः हूणों से अक्षुण्ण रहा।

    स्कन्दगुप्त यूरोप व एशिया का पहला शासक था जिसने हूणों को परास्त किया।

    तिगिन एंव मिहिरकुल

    ➣ स्कंदगुप्त की मृत्यु के पश्चात् तोरमाण द्वारा सफल आक्रमण।

    485 ई. तक पूर्वी मालवा और मध्य भारत के बड़े हिस्सों पर कब्जा कर लिया।

    ➣ तोरमाण के पश्चात उसका पुत्र मिहिरकुल उत्तराधिकारी हुआ। कालांतर में वह मालवा के यशोधर्मन से परास्त हुआ।

    अरबी-मुस्लिम आक्रमण

    636-37 ई. में सिंध महासागर से खलीफा उमर के समय असफल आक्रमण।

    मुहम्मद बिन कासिम-712 ई.

    712 ई. में मुहम्मद बिन कासिम (712-715 ई.) के नेतृत्व में सफल आक्रमण। किन्तु भारत पर प्रभाव जमाने असफल।

    ➣ गुर्जर प्रतिहार शासक नागभट्ट एंव बप्पा रावले (गहलौत वंश के संस्थापक) ने अरबियों को गंधार तक खदेड़ दिया।

    ➣ भारत (सिंध क्षेत्र : आधुनिक पाकिस्तान) में जजिया कर लगाने वाला प्रथम मुस्लिम शासक मुहम्मद बिन कासिम था। 715ई.में उसकी मृत्यु भी हो गयी।

    तुर्की-मुस्लिम आक्रमण

    सुबुक्तगीन-986 ई

    अलप्तगीन का ग़ुलाम व दामाद, ग़ज़नवी वंश (यामिनी वंश) से।

    ➣ यह 986 ई. में भारत पर आक्रमण करने वाला प्रथम तुर्क शासक था, इस समय गंधार का का शासक हिन्दुशाही राजा जयपाल था, जयपाल पराजित हुआ।

    महमूद गजनी-1001 ई.

    सुल्तान की उपाधि धारण करने वाला प्रथम तुर्क शासक , सुबुक्तगीन का पुत्र, 1001 ई. में भारत पर पहला आक्रमण।

    1025 ई. में सोमनाथ मंदिर (सौराष्ट्र) को लूटा। इस समय भीम प्रथम वहां का शासक था।

    मुहम्मद गौरी-1175 ई.

    1175 ई. में भारत पर प्रथम आक्रमण। फलस्वरूप मुल्तान विजय।

    ➣ 1178 ई. गुजरात शासक मूलराज द्वितीय या भीम द्वितीय से परास्त। भारत में पहली पराजय।

    ➣ तराईन का पहला युद्ध (1191ई.) पृथ्वी राज चौहान के पक्ष में रहा जबकि तराईन का द्वितीय युद्ध (1192 ई.) गौरी के पक्ष में रहा। फलस्वरूप अजमेरदिल्ली पर अधिकार।

    ➣ भारत में मुस्लिम साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक मुहम्मद गौरी था।

    मंगोल आक्रमण

    चंगेज़ ख़ाँ – लगभग 1236 ई.

    ➣ दुश्मन का पीछा करता हुआ सिंधु नदी तक आया परन्तु सिंधु नदी से आगे नहीं बढ़ा।

    ➣ इसके समकालीन शासक भारत में इल्तुतमिश (1210-1236 ई.) था।/p>

    तैमूर लंग – 1398 ई.

    मेसोपोटामिया, फ़ारस और अफ़ग़ानिस्तान को विजित कर भारत पर आक्रमण किया और दिल्ली तक बढ़ आया।

    ➣ इसके समय भारत में तुगलक शासक नसीरुद्दीन मुहम्मद/नुसरत शाह (1394-1398 ई.) था।

    15 दिनों तक दिल्ली लूटपाट व कत्लेआम करने के पश्चात् ख्रिज खां को अपने विजित प्रदेश सौंपकर वापस लौट गया।

    ➣ कुछ समय पश्चात् तुगलक वंश समाप्त और सैय्यद वंश (ख्रिज खां द्वारा ) की नींव पड़ी।

    मुग़ल आक्रमण

    बाबर-1519

    ➣ बाबर के नेतृत्व में सर्वप्रथम 1919 में युसूफ जाई जाति के विरुद्ध सफल अभियान।

    ➣ 1526 ई. में पानीपत के प्रथम युद्ध में दिल्ली सल्तनत के सुल्तान इब्राहीम लोदी की पराजय के साथ ही भारत में मुग़ल वंश की स्थापना।

    बहादुर शाह जफ़र या बहादुर शाह द्वितीय के समय 1857 की क्रांति के पश्चात् मुग़ल वंश का सदा के लिए अंत।

    ➣ ये पहले व अंतिम विदशी आक्रमणकारी थे जिहोने हिंदुस्तान पर 300 वर्षों से भी अधिक राज किया।

    ईरान का आक्रमण

    नादिरशाह-1739

    ➣ नादिरशाह फ़ारस का शासक। उपनाम : ईरान का नेपोलियन।

    ➣ समकालीन शासक मुग़ल बादशाह मुहम्मद शाह या रोशन अख्तर (1719-48 ई.), दोनों के मध्य करनाल का युद्ध (1739ई.) हुआ, मुग़ल बादशाह परास्त हुआ।

    ➣ लगभग 1/2 महीने तक दिल्ली में लूटपाट व कत्लेआम किया और वापस लौट गया।

    ➣ यह कोहिनूर हीरे के साथ शाहजहां द्वारा बनवाया तख-ए-ताऊस (मयूर सिंहासन) भी ले गया।

    ➣ कोहिनूर हीरा बाद में नादिरशाह के उत्तरधिकारियों ने महाराज रणजीत सिंह को भेंट किया।

    ➣ रणजीत सिंह के उत्तराधिकारियों में दिलीप सिंह ने समझौते के तहत हीरे को महारानी की महारानी को भेंट किया।

    अहमद शाह अब्दाली-1748

    ➣ अब्दाली दुर्रानी साम्राज्य से था। जिसने 7 बार आक्रमण किया।

    ➣ आक्रमणों में प्रमुख पानीपत का तृतीय युद्ध (1761ई.) (मराठा और अब्दाली के मध्य) हुआ। मराठा परास्त हुए।

    ➣ गवर्नर नियुक्त कर वापस चला गया।

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