➣ भारत पर सर्वप्रथम विदेशी आक्रमण 5वीं ईसा शताब्दी पूर्व हुआ था। भारत में यह समय मगध के उत्कर्ष का काल था जहाँ हर्यक वंशीय शासक बिम्बसार (544-492ई.पू.) का शासन था।
➣ इस समय मगध सम्राटों का अधिकार क्षेत्र भारत के पश्चिमोत्तर प्रदेश तक विस्तृत नहीं हो पाया था। यह क्षेत्र अनेक छोटे-बड़े राज्यों में विभक्त था जिसमें कंबोज, गांधार एवं मद्र (पंजाब) प्रमुख थे।
➣ जिस समय मध्य भारत के राज्य, मगध साम्राज्य की विस्तारवादी नीति का शिकार हो रहे थे, पश्चिमोत्तर प्रांतों में अराजकता एवं अव्यवस्था का वातावरण व्याप्त था।
➣ इन क्षेत्रों में कोई ऐसी सार्वभौम शक्ति नहीं थी जो परस्पर संघर्षरत राज्यों को जीतकर एकछत्र शासन कर सके।
➣ ऐसी स्थिति में विदेशी आक्रांताओं का ध्यान भारत के इस भू-भाग की ओर आकर्षित होना स्वाभाविक था। परिणामस्वरूप यह प्रदेश दो विदेशी आक्रमणों का शिकार हुआ-
- हखामनी ईरानी आक्रमण (दारा प्रथम)
- यूनानी आक्रमण (सिकंदर)
➣ कालांतर में चंद्रगुप्त मौर्य नें मगध पर मौर्य राजवंश की स्थापना की और भारत को विदेशी आक्रमणों से मुक्त किया।
भारत को सर्वप्रथम राजनीतिक रूप से एकबद्ध करने का श्रेय चंद्रगुप्त मौर्य को ही है।
पारसी या ईरानी आक्रमण (518 ई.पू.)
➣ भारत पर प्रथम विदेशी आक्रमण ईरान के हखामनी वंश (ई.पू. 550-330) के शासकों ने किया था।
साइरस द्वितीय (558–529 ई.पू.) | हखामनी साम्राज्य का संस्थापक
➣ छठी शताब्दी ईसा पूर्व के मध्य कुरूष अथवा साइरस (द्वितीय) नामक ईरानी व्यक्ति ने हखामनी साम्राज्य की स्थापना की।
➣ साइरस द्वितीय एक महात्वाकांक्षी प्रवृति का शासक था। अत: थोड़े ही समय म वह पश्चिमी एशिया का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक बन गया।
➣ साइरस ने सिंध के पश्चिम भारत के सीमावर्ती क्षेत्र की विजय की। प्लिनी के विवरण से ज्ञात होता है कि साइरस ने कपिशा नगर को ध्वस्त किया।
इस प्रकार भारत पर पहला विदेशी आक्रमण करने का असफल प्रयास 550 ई.पू. में साइरस द्वितीय (कुरूष) ने किया था।
➣ साइरस की मृत्यु कैस्पियन क्षेत्र में डरबाइक नामक एक पूर्वी जनजाति के विरुद्ध लड़ते हुए हुई तथा उसका पुत्र केम्बिसीज द्वितीय (529 ई. पू. से 522 ई. पू.) उसके साम्राज्य का उत्तराधिकारी हुआ।
➣ केम्बिसीज द्वितीय गृह युद्धों में ही उलझा रहा इसलिए उसके समय में हखामनी साम्राज्य का भारत की ओर कोई विस्तार न हो सका।
दारा प्रथम (522–486 ई.पू.) | भारत पर पारसी आक्रमण (518 ई.पू.)
➣ भारत पर 516 ई.पू. में सर्वप्रथम सफल आक्रमण दारा प्रथम/डेरियस/डायरवहु ने किया जिससे गांधार (वर्तमान पाकिस्तान -अफगानिस्तान ) फारसी साम्राज्य में मिल गया।
➣ दारा के यूनानी सेनापति स्काईलैक्स था जिसने सिंधु से भारतीय समुद्र में उतरकर अरब और मकरान तटों का पता लगाया।
➣ हेरोडोटस के अनुसार अधिकृत भारतीय भू-भाग ईरानी साम्राज्य का बीसवाँ प्रांत बना तथा भारत से 360 टेलेन्ट स्वर्ण राजस्व के रूप में ईरान को मिलता था।
➣ दारा प्रथम के तीन अभिलेखों बेहिस्तून,पर्सिपोलिस और नक्शेरूस्तम से सिद्ध होता है कि उसी ने सर्वप्रथम सिन्धु नदी के तटवती भारतीय भू-भागों को अधिकृत किया।
क्षयार्ष / ज़रक्सीज (486–465 ई.पू.) | ग्रीस युद्ध और साम्राज्य विस्तार
➣ यह दारा का पुत्र था तथा इसने अपने पिता के साम्राज्य को सुरक्षित रखा, किंतु यह यूनानियों द्वारा परास्त किया गया था।
➣ जेरेक्सस (क्षयार्ष) ने भारतीयों को अपनी सेना में भर्ती कर यूनानियों के विरुद्ध काम लिया। ये सैनिक गांधार एवं सिन्धु प्रदेश से गए थे।
➣ हेरोडोटस के अनुसार भारतीय सैनिकों के वस्त्र सूती थे।
➣ जरक्सीज की मृत्यु के पश्चात् उसके तात्कालिक उत्तराधिकारी क्रमशः अर्तजरक्सीज प्रथम एवं अर्तजरक्सीज द्वितीय हुए। साक्ष्यों से पता चलता है इन उत्तराधिकारियों द्वारा दारा प्रथम द्वारा निर्मित साम्राज्य को सुरक्षित रखा गया।
दारा तृतीय (360–330 ई.पू.) | सिकंदर से युद्ध और साम्राज्य पतन
➣ दारा तृतीय अन्तिम ईरानी सम्राट था, जिसे सिकन्दर ने 331 ई.पू. में आरबेला के युद्ध में पराजित किया। इस युद्ध को एरियन ने गोगामेला का युद्ध कहा था।
➣ दारा तृतीय को सिकन्दर द्वारा पराजित किये जाने से भारत से ईरानी आधिपत्य समाप्त हो गया। इस प्रकार राजनीतिक दृष्टिकोण से भारत-ईरान संबंध का भारत पर कोई स्थाई प्रभाव नहीं हुआ।
- समुद्री मार्ग की खोज से विदेशी व्यापार को प्रोत्साहन मिला।
- पश्चिमोत्तर भारत में दायीं से बायीं ओर लिखी जाने वाली खरोष्ठी लिपि का प्रचार हुआ।
- ईरानियों की आरमेइक लिपि का प्रचार-प्रसार हुआ।
- अभिलेख उत्कीर्ण करने की प्रथा प्रारम्भ हुई।
- ईरानियों की क्षत्रप शासन प्रणाली का शक-कुषाण युग में पर्याप्त विकास हुआ।
- ईरानी चाँदी के सिक्के (सिग्लोई/शैकल्स) एवं सोने के डेरिक भारत में प्रचलित हुए।
- मौर्य सम्राट के केश प्रक्षालन (बाल धोने की प्रथा) की प्रथा ईरान से ग्रहण हुई।
- सत्प्रांत (Satraliy) प्रणाली के कारण भारत में प्रांतीय शासन व्यवस्था का विकास हुआ।
- कर वसूली और प्रशासन में केंद्रीकृत व्यवस्था की अवधारणा मजबूत हुई।
- उत्तर-पश्चिम भारत में ईरानी स्थापत्य कला का प्रभाव देखने को मिला।
- प्रशासनिक शब्दावली में कुछ ईरानी शब्दों का प्रवेश हुआ।
- व्यापारिक मार्गों के विकास से भारत का मध्य एशिया और पश्चिम एशिया से संपर्क बढ़ा।
- ईरानी प्रभाव से शाही दरबार की आडंबरपूर्ण (शाही) संस्कृति का विकास हुआ।
- सुरक्षा और सीमावर्ती क्षेत्रों में संगठित सैन्य व्यवस्था को बढ़ावा मिला।
| क्षेत्र | प्रभाव |
|---|---|
| प्रशासनिक प्रभाव |
• क्षत्रप (Satrapy) प्रणाली का विकास • केंद्रीकृत प्रशासन की अवधारणा मजबूत हुई • सीमावर्ती क्षेत्रों में संगठित प्रशासनिक नियंत्रण • राजदरबार में शाही एवं भव्य परंपरा |
| सांस्कृतिक प्रभाव |
• केश प्रक्षालन (बाल धोने की प्रथा) ईरान से आई • शाही जीवन में आडंबरपूर्ण संस्कृति का विकास • राजदरबारी परंपराओं पर विदेशी प्रभाव |
| लिपि एवं लेखन |
• खरोष्ठी लिपि का प्रचार (दाएँ से बाएँ) • आरमेइक लिपि का प्रभाव • अभिलेख उत्कीर्ण करने की प्रथा प्रारम्भ |
| आर्थिक प्रभाव |
• विदेशी व्यापार को प्रोत्साहन • स्थल एवं समुद्री मार्गों का विकास • मध्य एवं पश्चिम एशिया से व्यापार संबंध • सिक्के: सिग्लोई/शैकल्स (चाँदी), डेरिक (सोना) |
| भाषाई एवं प्रशासनिक प्रभाव |
• ईरानी शब्दों का प्रशासन में प्रवेश • कर वसूली की संगठित व्यवस्था का विकास |
| कला एवं स्थापत्य |
• उत्तर-पश्चिम भारत में ईरानी स्थापत्य का प्रभाव • भवन निर्माण में विदेशी शैली का मिश्रण |
यूनानी या मकदूनियाई आक्रमण (326 ई.पू.)
➣ ईरानी आक्रमण के पश्चात् भारत को यूनानी आक्रमण अतत् मकदूनियाई शासक सिकन्दर के आक्रमण का सामना करना पड़ा।
सिकन्दर (356–323 ई.पू.) | भारत पर आक्रमण (326 ई.पू.
➣ एलेक्जेंडर तृतीय या एलेक्जेंडर द ग्रेट के नाम से विख्यात सिकन्दर (356-323 ई.पू.)यूनानी साम्राज्य मैसीडोन (मकदूनिया/मैसीडोनिया) के फिलिप द्वितीय का पुत्र था।
➣ फिलिप द्वितीय की हत्या 329 ई.पू. में कर दी गई। पिता की मृत्यु के पश्चात् सिंकदर लगभग 20 वर्ष की अल्पायु में ही सिंहासनारूढ़ हुआ। वह अरस्तू का शिष्य था।
➣ सिकंदर के आक्रमण के समय पश्चिमोत्तर भारत अनेक छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त था, जिनमें कुछ गणतंत्रात्मक एवं कुछ राजतंत्रात्मक थे और जिनको अलग-अलग जीतना सिकंदर के लिए आसान था।
➣ डॉ. हेमचन्द्रराय चौधरी के अनुसार सिकन्दर के आक्रमण के समय उत्तरी पश्चिमी भारत में 28 राज्य (11 राजतंत्र एवं 17 गणराज्य थे।)
➣ भारत विजय अभियान के अंतर्गत सिकन्दर ने 326 ई. पू. में बल्ख (बैक्ट्यिा) को जीतने के बाद काबुल होता हुआ हिन्दुकुश पर्वत (खैबर दरा) को पार किया।
➣ सिंधु कूच में सिकंदर ने सर्वप्रथम अस्टक तथा अश्वकों राज्यों को परास्त किया, अश्वक राज्य की राजधानी मसग थी। यहाँ का शासक अस्सेकेनाय युद्ध में मारा गया।
➣ राजा के मरने के बाद उसकी रानी किलऑफिस (कृपी) ने युद्ध का नेतृत्व किया। देखते ही देखते राज्य की सारी स्त्रियाँ स्वतन्त्रता युद्ध में कूद पड़ी, अन्ततः पराजित हुई।
➣ सिकन्दर के आक्रमण के दौरान पश्चिमोत्तर की एक अन्य लड़ाकू जाति अर्जुनायनो (आगालास्सोई जाति) सभी 20 हजार नागरिकों के साथ वीरतापूर्वक प्रतिशोध के पश्चात् अपनी स्त्रियों व बच्चों के साथ आग में जल मरे, जो जौहर की पहली लिखित घटना है।
➣ तक्षशिला शासक आम्भी ने आत्मसमर्पण के साथ उसका स्वागत करते हुए उसे सहयोग का वचन दिया। आम्भि को भारत का पहला देशद्रोही भी कहा गया है।
➣ आम्भि के अलावा हिन्दुकुश के शशिगुप्त, पुष्करावती एवं संजय नामक राजाओं ने भी सिकन्दर का साथ दिया।
हाईडेस्पीज का युद्ध (326 ई.पू.)
➣ भारत की भूमि पर सिकंदर का प्रबल प्रतिरोध पौरव राजा पोरस ने किया। पोरस का राज्य झेलम एवं चिनाब नदियों के बीच में था। 327 ई.पू. में सिकंदर ने काबुल घाटी होते हुए भारत में प्रवेश किया और आगे बढ़ते हुए 326 ई.पू. (वसंत ऋतु) में उसकी सेना झेलम (Hydaspes) नदी के किनारे पहुँची। इसी समय पोरस ने दूसरी तरफ अपनी मजबूत रक्षा व्यवस्था स्थापित कर ली, जिससे दोनों सेनाओं के बीच निर्णायक संघर्ष की स्थिति बन गई।
➣ 326 ई.पू. में सिकन्दर ने झेलम नदी के तट पर राजा पोरस को पराजित किया। इस युद्ध को झेलम का युद्ध , वितस्ता का युद्ध , कर्री का युद्ध तथा ग्रीक इतिहासकार हाईडेस्पीज का युद्ध कहते हैं।
➣ एरियन के अनुसार पोरस की सेना में 4000 अश्वारोही, 300 रथ, 200 हाथी एवं 30000 पैदल सैनिक थे। किन्तु युद्ध में पोरस की हार हुई, पोरस को बन्दी बना लिया गया। परन्तु सिकंदर ने पोरस की बहादुरी से प्रभावित होकर उसके राज्य को वापस कर उससे मित्रता कर ली।
➣ नीसा के गणतांत्रिक राज्य ने बिना युद्ध के ही सिकन्दर की अधीनता स्वीकार कर ली एवं अपने को यूनानियों का वंशज बताया।
➣ सिकन्दर की सेना ने व्यास नदी से आगे बढ़ने से इन्कार कर दिया। इसके बाद सिकन्दर झेलम के किनारे बढ़ते हुए सौभूति, शिवि, मालव, क्षुद्रक, सौद्राम, अलोर एवं पाटल को जीतते हुए सिंधु नदी के मुहाने पर पहुँचा, जहाँ से उसने सेना का एक भाग नियार्कस के नेतृत्व में समुद्री मार्ग से तथा दूसरा भाग स्थल मार्ग से स्वदेश भेजा।
➣ मालव एवं क्षुद्रकों ने संगठित होकर सिकन्दर का प्रतिरोध किया। ऐसा कहा जाता है कि इस राज्य के ब्राह्मणों ने लेखनी के बदले तलवार उठा ली थी।
➣ पंजाब का कठ (कथाई) गणराज्य, जिसकी राजधानी संगल थी, जिन्होंने युद्ध के समय राजधानी के चारों ओर रथों का घेरा बनाया, लेकिन अन्त में सिकन्दर ने इन्हें पोरस की सहायता से परास्त किया।
➣ कठों ने ही यूनानियों को जहाजी रसोईघर एवं परिवहन नौकाएँ प्रदान की।
➣ सिन्धु नदी तट पर स्थित पाटल में द्वैराज्य प्रथा थी तथा पाटल की विजय सिकन्दर की अंतिम विजय थी। यहाँ पर पाइथन नामक ग्रीक को अपना क्षत्रप नियुक्त किया, जो भारत में अंतिम यवन क्षत्रप था।
➣ भारत में 19 माह व्यतीत करने के पश्चात कोनोस नामक सेनापति के सुझाव पर सिकन्दर ने वापस लौटने का निर्णय लिया और विजित भारतीय क्षेत्रों का क्षत्रप सेनापति फिलिप को बनाया।
➣ वापस लौटने से पूर्व यूनानी देवताओं की स्मृति में व्यास नदी के तट पर विजय सीमा अंकित करने के लिए 12 विशाल वेदियाँ स्थापित की तथा उनकी विधिवत पूजा की।
➣ सिकन्दर भारतीय दार्शनिक कालानास को अपने साथ ले गया। मेगस्थनीज के अनुसार मंडनिस नामक दार्शनिक ने सिकन्दर को अपने ज्ञान से प्रभावित किया।
➣ सिकन्दर ने दो नगरों की स्थापना की थी। पहला नगर निकैया (विजय नगर) अपनी जीत के उपलक्ष्य में तथा झेलम नदी के तट पर दूसरा नगर अपने प्रिय घोड़े बुकाफेला के नाम पर बसाया।
➣ सिकन्दर ने काबुल के पास अलेक्जेन्ड्रिया तथा सिंध में भी अलेक्जेन्ड्रिया नामक नगर बसाया।
➣ कर्टियस के अनुसार मालव जन ने श्वेत लौह मुद्रा सिकन्दर को भेंट में दी थी। यह प्राचीन भारत में विकसित लौह-प्रौद्योगिकी का साक्ष्य है।
➣ 323 ई.पू. में बेबीलोन में सिकन्दर का मस्तिष्क ज्वर के कारण 33 वर्ष की आयु में निधन हो गया।
➣ मृत्यु के बाद उसके साम्राज्य का पूर्वी भाग सेल्यूकस निकेटर अधीन चला गया।
➣ सिकंदर के साथ आने वाले लेखकों में नियार्कस, ऑनसिक्रिटस तथा अरिस्टोव्यूलस के विवरण अधिक प्रामाणिक एवं विश्वसनीय हैं।
➣ सिकन्दर की मृत्यु के बाद 321 ई. पू. उसके सेनापतियों में साम्राज्य विभाजन के लिए त्रिपैरेदिसस की सन्धि हुई। विजित क्षेत्रों को 4 प्रशासनिक इकाइयों में बांटा गया।
| 1. सिंधु का उत्तरी व पश्चिमी भाग | फिलिप |
| 2. सिंधु व झेलम का भाग | तक्षशिला का शासक आम्भी |
| 3. झेलम व व्यास नदी का भाग | पोरस राजा |
| 4. सिंधु का निचला भाग | पिथोन |
➣ कालांतर में मगध शासक चन्द्रगुप्त मौर्य ने इन सभी प्रदेशो को जीतकर भारत में मिला लिया और एक अखण्ड भारत का निर्माण किया।
भारत में सिकंदर की सफलता का कारण
- सिकंदर की सफलता का प्रमुख कारण भारत में किसी एक केंद्रीय सत्ता का अभाव था।
- दूसरा महत्त्वपूर्ण कारण उसकी सेना का शक्तिशाली होना था।
- उसकी सेना में तेज-तर्रार घोड़ों की बहुलता थी।
- आम्भी जैसे देशद्रोहियों का सहयोग भी उसकी सफलता का एक बड़ा कारण था।
- एरियन के अनुसार युद्ध कला में भारतवासी अन्य तत्कालीन जन से श्रेष्ठ थे।
- प्लूटार्क के अनुसार यदि सिकन्दर का आक्रमण न होता तो बड़े-बड़े नगर न बनते।
सिकंदर के आक्रमण का भारत पर प्रभाव
- प्राचीन यूरोप को प्राचीन भारत के संपर्क में आने का अवसर मिला।
- भारत और यूनान के बीच विभिन्न क्षेत्रों में प्रत्यक्ष संपर्क की स्थापना हुई।
- पश्चिमोत्तर भारत के अनेक छोटे-छोटे राज्यों का एकीकरण हुआ।
- सिकंदर के आक्रमण से भारत के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में राजनीतिक एकता की प्रवृत्ति बढ़ी।
- ग्रीक (यूनानी) और भारतीय संस्कृतियों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान प्रारम्भ हुआ।
- गांधार शैली की मूर्तिकला का विकास हुआ, जिसमें यूनानी और भारतीय कला का मिश्रण दिखाई देता है।
- सिकंदर के अभियान से अनेक स्थल और जलमार्ग खुले, जो आगे चलकर भारत के व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने में सहायक बने।
- भारतीयों ने यूनानियों से क्षत्रप प्रणाली और मुद्रा निर्माण की कला को ग्रहण किया, जिससे प्रशासन और सिक्कों का विकास हुआ।
- यूनानी प्रभाव से भारत में नए प्रकार के सिक्कों का प्रचलन हुआ (उलूक शैली आदि)।
- भारतीय सैन्य व्यवस्था में परिवर्तन आया और हाथी सेना के साथ-साथ अश्वारोही सेना का महत्व बढ़ा।
- भारतीय ज्योतिष यूनानी ज्योतिष से प्रभावित हुआ। यूनानी शब्द Horoscope का संस्कृत रूप होराशास्त्र बना।
- भारतीय रंगमंच पर यवनिका शब्द का प्रयोग यूनानी प्रभाव को दर्शाता है।
- चिकित्सा और विज्ञान के क्षेत्र में भी यूनानी ज्ञान का सीमित प्रभाव भारत में देखा गया।
- भारत में शहरीकरण और व्यापारिक नगरों के विकास को भी आंशिक गति मिली।
| नदी का नाम | यूनानी नाम |
|---|---|
| झेलम | हाइडेस्पीज |
| रावी | हाइड्रोटीस |
| चिनाब | अकेसिनीज |
| व्यास | हाईफेसिस |
| सतलज | जरड्रोस/हेसिड्रोस |
सिकंदर के समय भारत के 28 स्वतंत्र राज्य
| अस्सकेनोस | गुरेअन्स |
| तक्षशिला | प्यूकेलाओटिस |
| आस्पेशियन | अभिसार |
| नीसा | गांदारिस |
| अरसेक्स | सोफाइटस |
| ग्लोगनिकाय | अगलसोई |
| कैथियंस | आब स्टनोई |
| सिबोर्ड | सोद्राई |
| मलोई | आक्सीकनोस |
| ओसेडिओई | पुरू |
| मोसिकनोस | अद्रेस्ताई |
| पटलेन (पाटल) | फेगेला |
| सूद्रक | जाथ्रोयी |
| मसनोई | सम्बोस |
सिकंदर के समकालीन यूनानी लेखक
| नियकिस | 327-326 ई. पू. | स्ट्रेबो व एरियन विवरण | सिकंदर के जहाजी बेड़े का एडमिरल। |
| अरिस्टोबयुलस | 327-326 ई. पू. | युद्ध का इतिहास | एरियन व प्लूटार्क ने अपनी रचनाओं का आधार बताया। |
| ओनो सेक्रिटस | 327-326 ई. पू. | सिकंदर की जीवनी | जहाजी बेड़े का चालक। |
- सिकन्दर का गुरु अरस्तु था।
- सिकंदर के घोड़े का नाम बुकाफेला था।
- सिकन्दर 19 माह भारत में रहा।
- नियार्कस सिकन्दर की जल सेना का सेनापति था।
- अरिस्टोब्युलस ने सिकन्दर के युद्धों का इतिहास लिखा।
- ओनेसिक्रिटस सिकन्दर का जीवनी लेखक था।
ईरानी आक्रमण और सिकंदर के आक्रमण की तुलना
सिकंदर प्रभाव = कला + संस्कृति + ज्योतिष + राजनीतिक एकता + व्यापार विस्तार
| आधार | ईरानी आक्रमण का प्रभाव | सिकंदर का आक्रमण का प्रभाव |
|---|---|---|
| राजनीतिक प्रभाव | क्षत्रप (Satrap) प्रणाली का विकास | छोटे राज्यों का एकीकरण, राजनीतिक एकता की प्रवृत्ति |
| प्रशासन | प्रांतीय शासन व केंद्रीकरण का विकास | विदेशी संपर्क से प्रशासनिक सुधार |
| मुद्रा प्रणाली | सिग्लोई, डेरिक जैसे ईरानी सिक्कों का प्रचलन | यूनानी प्रभाव, उलूक शैली के सिक्के |
| लिपि / भाषा | खरोष्ठी और आरमेइक लिपि का प्रसार | यूनानी शब्दों का प्रभाव (होराशास्त्र आदि) |
| कला | सीमित प्रभाव, प्रशासनिक शैली पर असर | गांधार कला का विकास (ग्रीक + भारतीय मिश्रण) |
| व्यापार | पश्चिमी एशिया से व्यापार विस्तार | नए स्थल व जलमार्ग खुले |
| सेना | क्षत्रप व्यवस्था से संगठित शासन | अश्वारोही सेना का विकास |
| विज्ञान / ज्ञान | प्रशासनिक तकनीक में सुधार | यूनानी ज्योतिष का प्रभाव (होराशास्त्र) |
| संस्कृति | दरबारी शाही संस्कृति का विकास | यवनिका शब्द व यूनानी सांस्कृतिक प्रभाव |
| विदेशी संपर्क | ईरान व पश्चिमी एशिया से संपर्क | यूनान व यूरोप से प्रत्यक्ष संपर्क |
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