पुष्यभूति वंश (550–650 ई.) : हर्षवर्धन और कन्नौज का उत्कर्ष

भारतीय इतिहास प्राचीन भारत पुष्यभूति वंश (550–650 ई.)
📚 विषय सूची

थानेश्वर का पुष्यभूति (वर्धन वंश)

पुष्यभूति वंश राजाओ की सूची

➣ पुष्यभूति वंश की स्थापना छठी शताब्दी ई. में गुप्त वंश के पतन के बाद हरियाणा के अम्बाला ज़िले के थानेश्वर नामक स्थान पर हुई थी।

➣ बाणभट्ट की हर्षचरित में इस वंश का संस्थापक पुष्यभूति को बताया है, लेकिन इस वंश के अभिलेख एवं मुहरों में प्रथम शासक नरवर्धन को बताया गया है।

➣ इस वंश में तीन राजा हुए- प्रभाकरवर्धन और उसके दो पुत्र राज्यवर्धन तथा हर्षवर्धन। इन्होंने गुप्तों के बाद उत्तर भारत में सबसे विशाल राजवंश की स्थापना की। पुष्यभूति वंश

➣ पुष्यभूतियों को वैश्य अथवा क्षत्रिय जाति का माना गया है।

ह्वेनसांग तथा आर्यमंजूश्रीमूलकल्प के अनुसार वर्धन वंश (पुष्यभूति वंश) वैश्य (फीशे) जाति का था।

➣ पुष्यभूति वंश की उत्पत्ति के विषय में स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है। बाणभट्ट के हर्षचरित में इस वंश का वर्णन मिलता है।

➣ इस वंश का संस्थापक पुष्यभूति था। उसी के नाम पर यह वंश पुष्यभूति वंश के नाम से विख्यात हुआ।

➣ वह संभवतः गुप्तों का अधीनस्थ सामंत या अधिकारी था। गुप्त राजाओं की दुर्बलता का लाभ उठाकर उसने पूर्वी पंजाब (हरियाणा) में अपनी सत्ता स्थापित कर ली तथा थानेश्वर को अपनी राजधानी बनायी।

➣ वह शिव का भक्त माना जाता है। उस पर भैरवाचार्य नामक शैव का प्रभाव था। पुष्यभूति वंश प्रथम एतिहासिक राजा नरवर्द्धन था।

प्रभाकरवर्धन (580-605 ई.)

➣ वर्धन वंश की शक्ति व प्रतिष्ठा का संस्थापक प्रभाकरवर्धन था। उसका अनुमानित समय 6वीं शताब्दी का अंति चरण माना गया है।

➣ उसकी उपाधियों- परमभट्टारक और महाराजाधिराज से स्पष्ट होता है कि वह एक सार्वभौम और शक्तिशाली राजा था।

बाणभट्ट इस राजा की अलंकारपूर्ण शब्दों में, हर्षचरित में प्रशंसा करता है।

➣ उसे हूणहरिणकेसरी (हूणरूपी हरिणो के लिए सिंह समान), सिंधुराजज्वर (सिंधु राज्य के लिए ज्वर के समान), गुर्जर प्रजागर (गुर्जरों की नींद हराम करने वाला),

गांधाराधिपगंधद्विपकूटहस्तिज्वरो (गांधार के राजारूपी) सुगन्धिगज के लिए महान हस्तिज्वर या घातक महामारी के समान, लाटपाटवपाटच्चरो (चंचलता को नष्ट करने वाला) तथा मालवलक्ष्मीतलापरशु (मालवा की राज्यलक्ष्मी रूपी लता के लिए कुल्हाड़ी के समान) बताया है।

➣ हर्षवर्धन के मधुबन और बांसखेड़ा अभिलेखों के अनुसार उसका यश चारों समुद्रो के पार तक फैला हुआ था। अपने पराक्रम के कारण वह प्रतापशील के नाम से भी जाना जाता था।

मालवा पर उसके प्रभाव की पुष्टि हर्षचरित से होती है जिसमें कहा गया है कि मालवा के शासक महासेनगुप्त के दो पुत्र माधवगुप्त और कुमारगुप्त उसके दरबार में रहते थे।

➣ अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के लिए प्रभाकरवर्धन ने मौखरियों (कन्नौज) से वैवाहिक संबंध स्थापित किया।

➣ उसके अपनी पुत्री राज्यश्री का विवाह कन्नौज के मौखरी शासक ग्रहवर्मा (ग्रहवर्मन) के साथ किया। इस विवाह से वर्धनों व मौखरियों का संबंध प्रगाढ़ हुआ।

➣ प्रभाकरवर्धन सूर्य का उपासक था। उसकी प्रधान रानी यशोवती (यशोमती) थी।

हर्षचरित के अनुसार प्रभाकरवर्धन के जीवन के अंतिम चरण में हूणों ने उसके राज्य की सीमा पर आक्रमण किया। पिता बीमार थे इसलिए पुत्र राज्यवर्धन को हूणों को दबाने का उत्तरदायित्व सौंपा गया।

➣ हर्ष की माता यशोमति ने अपने पति की बीमारी से न बचने की आशा में पति के जीवित रहते हुये ही चिता मे जलकर आत्मदाह कर लिया।

➣ कालांतर में जिस समय राज्यवर्धन हूणों के विरूद्ध अभियान कर रहा था। उसे अपने पिता की कमजोर स्वास्थ की सूचना मिली। सूचना प्राप्त करते ही वह वापस थानेश्वर लौटा, परंतु उस समय तक प्रभाकरवर्धन की मृत्यु हो चुकी थी।

राज्यवर्धन (605-606 ई.)

➣ प्रभाकरवर्धन के तीन संताने (पुत्री राज्यश्री, राज्यवर्धन व हर्षवर्धन) थी। पिता की मृत्यु के पश्चात राज्यवर्धन थानेश्वर की गद्दी पर बैठा।

➣ उसी समय उसे सूचना मिला कि बंगाल के शासक शशांक (गौड़ वंश) और मालवा के राजा देवगुप्त ने मिलकर कन्नौज पर आक्रमण किया है तथा ग्रहवर्मन की हत्या कर, राज्यश्री को कैद कर लिया है।

➣ इस दुर्घटना की सूचना सुनकर राजयवर्धन कन्नौज की सुरक्षा के लिए आगे बढ़ा। उसने देवगुप्त की सेना को पराजित कर दिया।

➣ अभियान की सफलता के उपरान्त लौटते हुए मार्ग में बंगाल नरेश शशांक ने धोखे से राज्यवर्धन की हत्या कर दी।

➣ राज्यवर्धन की मृत्यु के पश्चात 606 ई. में उसका छोटा भाई हर्षवर्धन थानेश्वर का राजा बना।

➣ वर्धन वंश में सर्वप्रथम हर्ष के भाई राज्यवर्धन ने बौद्ध धर्म ग्रहण किया। वंसखेड़ा और मधुवन अभिलेखों में राज्यवर्धन को परम सौगत (बौद्ध) कहा गया है।

हर्षवर्धन (606-647 ई.)

सेनापति सिंहनाद के कहने पर हर्ष ने सिंहासन ग्रहण किया। हर्षवर्धन ने 606 ई. में राज्यारोहण के साथ ही हर्ष संवत् चलाया।

➣ राजा बनते ही उसने शशांक और देवगुप्त से बदला लेने की प्रतिज्ञा की तथा अपनी बहन की सुरक्षा के लिए वह कन्नौज की तरफ बढ़ा।

➣ मार्ग में उसे कामरूप (असम) के राजा भास्करवर्मन का दूत हंसबेग मिला, जिसने हर्षवर्धन के समक्ष अपने राजा की तरफ से मित्रता का प्रस्ताव रखा, जिसे हर्ष ने सहर्ष स्वीकार कर लिया।

➣ हर्ष ने कामरूप, (असम) के राजा भास्कर वर्मा से संधि कर गौड़ के राजा शशांक के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही की।

➣ हर्ष ने गौड़ शासक शशांक को हराया। आर्यमंजूश्रीमूलकल्प में शंशाक की पराजय की जानकारी है।

➣ मार्ग में उसे मित्र भण्डी से सूचना मिली की राज्यश्री कैद से मुक्त होकर विंध्याचल चली गई है। अतः, वह कन्नौज का मार्ग छोड़कर विंध्याचल गया।

आचार्य दिवाकर मित्र की सहायता से उसने राज्यश्री को उस समय खोज निकाला, जब वह सती होने जा रही थी। हर्ष उसे वापस कन्नौज ले आया।

➣ ग्रहवर्मन की हत्या के पश्चात उसका कोई उत्तराधिकारी नहीं होने से, कन्नौज के मंत्रियों व राज्यश्री की सहमति से, हर्ष कन्नौज का भी शासक बन गया।

➣ उसकी राजधानी अब थानेश्वर से कन्नौज हस्तांतरित हो गयी। इसके साथ ही कन्नौज अब उत्तरी भारत की राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बन गया।

➣ चीनी ग्रन्थ फैंगचिन्ह के अन्सुअर हर्ष एंव राज्य श्री कन्नौज के सिहांसन पर साथ-साथ बैठते थे।

➣ कन्नौज ऊँचे स्थान में दोआब के ठीक मथ्य में स्थित था। जिसकी व्यवस्थित किलाबंदी की गयी। सन 619 में शशांक की मृत्यु हो जाने पर शत्रुता भी समाप्त हो गयी।

साम्राज्य विस्तार

➣ हर्ष ने लगभग 41 वर्ष शासन किया। इन वर्षों में हर्ष ने अपने साम्राज्य का विस्तार कश्मीर को छोड़कर जालंधर, पंजाब, नेपाल एवं बल्लभीपुर तक कर लिया। इसने आर्यावर्त को भी अपने अधीन किया।

पंचभारत (पंजाब, बंगाल, कन्नौज (उत्तरप्रदेश), मिथिला (बिहार) एवं उड़ीसा) विजय के पश्चात् कन्नौज पर अपनी बहन के आग्रह पर अधिकार करके अपनी राजधानी थानेश्वर से कन्नौज स्थानान्तरित की।

➣ हर्ष वर्धन अपने दक्षिणी अभियान में सफल नहीं हो सका। उसे नर्मदा नदी के तट पर बादामी के चालुक्यवंशी शासक पुलकेशिन द्वितीय से पराजित होना पड़ा। ऐहोल प्रशस्ति (634 ई.) में इसका उल्लेख मिलता है।

➣ पुलकेशिन द्वितीय से युद्ध का उल्लेख ऐहोल लेख, सी यू की एवं येक्केरी अभिलेख में है। ऐहोल अभिलेख में हर्ष की गजसेना (गज का नाम दर्पशात) का भी उल्लेख है।

➣ हर्ष ने वल्लभी के शासक ध्रुवसेन द्वितीय को पराजित किया। जयभट्ट तृतीय के नौसारी ताम्रपत्र के अनुसार ध्रुवसेन ने भड़ौंच के गुर्जर शासक दद्द द्वितीय के दरबार में शरण ली। ध्रुवसेन को ही ध्रुवभट्ट अथवा दुर्लभ भट्ट कहते हैं।

➣ मगध के शासक पूर्णवर्मन ने जिसने मगध पर अधिकार कर लिया था (वह शायद मौखरी वंश का प्रतीत था।) जिसने हर्ष की अधीनता स्वीकार कर ली।

➣ हर्ष ने उसे मगध का शासक बना रहने दिया। बाद में माधवगुप्त, हर्ष का अधीनस्थ राजा बना। इस प्रकार मगध पर हर्ष का आधिपत्य स्थापित हो गया।

चीनी स्रोतों में हर्ष को मगधराज भी कहा गया है।

➣ मगध के साथ नालंदा पर भी हर्ष का आधिपत्य स्थापित हुआ। वहां से उसकी एक मुहर मिली है।

नेपाल में हर्ष-संवत् (606 ई.) के प्रचलन (अंशुवर्मन और उसके उत्तराधिकारियों द्वारा) के आधार पर कुछ विद्वान मानते हैं कि नेपाल पर भी हर्ष का आधिपत्य था ।

➣ हर्ष ने ओडू (उत्तरी उड़ीसा) तथा तत्पश्चात कोगोंडा (दक्षिणी उड़ीसा, गंजाम जिला)कलिंग पर भी विजय प्राप्त की। इन विजयों के पश्चात हर्ष उत्तरी भारत का स्वामी बन गया। उसने सकलोत्तरापथनाथ की उपाधि धारण की थी।

➣ हर्प द्वारा अंतिम युद्ध 643 ई. में गंजाम या कांगोद (उड़ीसा) में लड़ने का उल्लेख है।

➣ मात्वालिन के अनुसार हर्ष ने 641 ई. में चीनी नरेश ताई-सुंग (ती-आंग) के दरबार में अपना दूत भेजा जिसके जवाब में तीन चीनी दूतमण्डल भी हर्ष के दरबार में आये।

➣ 641 ई. में पहला चीनी दूत मण्डल लियांग-होई-किंग के नेतृत्व में, 643 ई. में लि-यि-पियओ के नेतृत्व में तथा 647 ई. में वैन-ह्वान-शे (वांगश्वासे) के नेतृत्व में कूल तीन चीनी दूत मण्डल हर्ष के दरबार में आये, लेकिन 647 ई. में तीसरा दूत मण्डल हर्ष की मृत्यु के बाद दरबार पहुंचा।

➣ हर्ष सूर्यशिव के साथ बुद्ध की भी उपासना करता था। कालांतर में उसका झुकाव महायान बौद्ध धर्म की ओर अधिक हो गया।

राजतरंगिणी के अनुसार बौद्ध धर्म अपनाने से पूर्व हर्ष शैव मतावलम्बी था। उसे अभिलेखों में परममाहेश्वर कहा गया है।

प्रयाग महामोक्षपरिषद्

➣ हर्ष प्रत्येक पाँचवें वर्ष प्रयाग में महोत्सव (धर्म महासम्मेलन) करके दान करता था। चीनी यात्री ह्वेनसांग 643 ई. में इस प्रकार के छठे महोत्सव में शामिल हुआ था।

➣ इसमें 18 देशों के राजाओं ने भाग लिया। 75 दिनों तक चले इस समारोह के प्रथम दिन बुद्ध, दूसरे दिन आदित्य (सूर्य) एवं तीसरे दिन ईश्वरदेव (शिव) की पूजा की गई।

➣ हर्ष ने नालन्दा महाविहार को 100 गाँवों की आय दान में दी थी। दानशीलता के लिए हर्ष को भारतीय हातिम भी कहा गया है। हर्ष के बंसखेड़ा, मधुवन एवं नालन्दा लेखों में भूमिदान का उल्लेख है।

साहित्यिक उपलब्धियाँ

➣ हर्ष एक प्रतिष्ठित नाटककार एवं कवि था। इसने नागानन्द, रत्नावली एवं प्रियदर्शिका नामक नाटकों की रचना की। अतः हर्ष को साहित्यकार सम्राट भी कहा जाता है।

हर्षचरित,चंडीशतक, पूर्वपीठिका, कादम्बरी और पार्वती परिणय के रचयिता बाणभट्ट हर्षवर्धन के दरबारी कवि थे।

बाणभट्ट के पुत्र भूषणभट्ट (पुलिन्दभट्ट) ने अपने पिता के अपूर्ण ग्रन्थ कादम्बरी को पूर्ण किया।

❑ कुछ विद्वानों ने चण्डीशतक, पार्वतीपरिणय एवं मुकुटताड़ितक का रचयिता भी बाणभट्ट को माना है।

➣ इसके अतिरिक्त हरिदत्त एवं जयसेन जैसे प्रसिद्ध कवि एवं लेखक इसके दरबार की शोभा बढ़ाते थे।

➣ हर्ष ने जयसेन नामक बौद्ध विद्वान को उड़ीसा के 80 ग्राम दान देने चाहे परन्तु जयसेन ने विनीत भाव से दान लेना अस्वीकार कर दिया।

➣ हर्षवर्द्धन के दरबार में मयूर शर्मा नामक विद्वान ने मयूरशतक व सूर्यशतक पुस्तक की रचना की थी।

व्यक्तित्व

हर्षचरित नामक ग्रंथ में हर्षवर्धन को सभी देवताओं का सम्मिलित अवतार कहा गया है।

➣ एक यूरोपीय लेखक ने हर्ष को हिन्दूकाल का अकबर कहा है। हर्ष का दूसरा नाम शिलादित्य था। ह्वेनसांग हर्ष का शिलादित्य नाम से ही वर्णन करता है।

➣ 11वीं शताब्दी के गुजराती लेखक सोढ़ल ने अपनी उदयसुन्दरी कथा में हर्ष को कवीन्द्र एवं वाणी का हर्ष कहा है।

गीतगोविंद के लेखक जयदेव ने प्रसन्नराघव में उसे कविताकामिनी का साक्षात हर्ष/ काव्य का हर्ष तथा भास एवं कालिदास के समतुल्य बताया है।

➣ चालुक्य अभिलेखों (ऐहोल अभिलेख) में हर्ष को सकलोत्तरापथनाथ (संपूर्ण उत्तरी भारत का सम्राट) कहा गया है।

➣ बाण ने उसे चतुः समुद्राधिपति”, सकलराजचक्रचूड़ामणि तथा सर्वचक्रवर्तिनांधौरेय कहा है।

➣ हर्षवर्धन अंतिम हिन्दू सम्राट भी कहा गया है। लेकिन वह ना ता कट्टर हिन्दू था ना ही पुरे देश का शासक। वह सम्पूर्ण उत्तर-भारत (कश्मीर छोड़कर) का शासक था।

बंसखेड़ा अभिलेख में हर्ष के हस्ताक्षर है एवं सोनपत मुहर पर हर्ष का पूरा नाम हर्षवर्धन (हर्ष नाम अंकित मुहर) मिलता है।

➣ हर्षवर्द्धन को शिलादित्यपरमभट्टारक जैसी उपाधि प्राप्त हैं।

➣ हर्षवर्द्धन के समय नालन्दा विश्वविद्यालय का कुलपति शीलभद्र था।

➣ हर्षवर्द्धन के समय बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए कुमारजीव, परमार्थ, शुमाक तथा धर्मदेव चीन गए।

➣ ह्वेनसांग के अनुसार हर्ष ने कश्मीर से गौतम बुद्ध का दांत लाकर कन्नौज के निकट एक संघाराम में स्थापित किया।

➣ हर्ष बौद्ध धर्म की महायान शाखा का समर्थक होने के साथ-साथ विष्णु एवं शिव की भी स्तुति करता था।

➣ हर्षवर्द्धन निःसंतान था इसलिए उसकी मृत्यु के साथ ही पुष्यभूति वंश का सदा के लिए अंत हो गया।

मृत्यु

➣ हर्ष का कोई पुत्र नहीं उसकी एक पुत्री थी जिसक विवाह वल्लभी के शासक ध्रुवसेन द्वितीय से हुआ था। अतः उसकी मृत्यु के साथ ही 647 ई. में पुष्यभूति वंश का अंत हो गया।

हर्ष के समकालीन शासक

  राजवंशप्रमुख शासकअवस्थिति
मैत्रकभट्टार्क, धर्मसेन चतुर्थ बल्लभी(गुजरात )
मौखरिहरिवर्मा, ईशानवर्मा, सर्ववर्मा, ग्रहवर्माकन्नौज (उत्तर प्रदेश)
परवर्ती गुप्तमहासेन गुप्तमगध (बिहार)
औलिकरप्रकाशधर्मान, यशोधर्मन, देवगुप्त मालवा (मध्यप्रदेश)
हूण जाति तोरमाण, मिहिरकुलपश्चिमी पंजाब
चन्द्र (गौड़)शशांकबंगाल, कर्ण सुवर्ण (मुर्शिदाबाद)
वर्मनभास्कर वर्माकामरूप (असम का केन्द्रीय भाग)
बादामी के चालुक्यपुलकेशिन-IIकर्नाटक के आधुनिक बीजापुर जिला

हर्षवर्धन के पश्चात पुष्यभूति वंश

➣ हर्ष की मृत्यु के पश्चात् अर्जुन (एक स्थानीय शासक) ने कन्नौज पर अधिकार कर लिया। उसने चीन के राजदूत वांग ह्यूगसे का विरोध किया, जो हर्ष की मृत्यु के उपरांत वहाँ पहुँचा था।

वांग ह्यूगसे पुनः असम, तिब्बतनेपाल की सैन्य सहायता लेकर लौटा। युद्ध में अर्जुन की हार हुई। अर्जुन को बंदी बनाकर चीन ले जाया गया तत्पश्चात् वहीं कारागार में उसकी मृत्यु हो गई।

➣ आठवीं शताब्दी के आरंभ में यशोवर्मन कन्नौज के सिंहासन पर बैठा। अपने पराक्रम से उसने पुनः कन्नौज को अपने अतीत का गौरव प्रदान किया। वह सिंध के राजा दाहिर एंव कश्मीर के शासक ललितादित्य का समकालीन था।

➣ यशोवर्मन ने 725 से 752 ई. तक शासन किया। वह कुशल शासक व विद्वान था। उसके दरबार में वाक्पति नामक कवि ने प्राकृत भाषा में गोड़वहो की रचना की।

➣ यशोवर्मन के दरबार में भवभूति नामक प्रसिद्ध नाटककार रहते थे। उन्होंने मालतीमाधव (10 अंकों का नाटक), उत्तररामचरित (सात अंकों का नाटक) तथा महावीरचरित (सात अंकों का नाटक) नामक तीन नाटक लिखे। महावीर चरित में भगवान राम का जीवन है।

➣ उसके चीन के साथ राजनैतिक संबंध थे। यशोवर्मन ने 731 ई. में बुद्धसेन (पुटासिन) नामक अपने मंत्री को चीनी शासक हेन-शुंग के दरबार में भेजा था।

➣ यशोवर्मन की मृत्यु के बाद कन्नौज पर आधिपत्य को लेकर महाशक्तियों में संघर्ष हुआ जो त्रिपक्षीय संघर्ष कहलाता है। ये शक्तियाँ थी :- गुर्जर-प्रतिहार, पालदक्षिण भारत के राष्ट्रकूट।

त्रिपक्षीय संघर्ष आठवीं शताब्दी के अन्त से शुरू होकर लगभग 150 वर्षों तक अनेक चरणों में चला। अंत में गुर्जर-प्रतिहारों की ही विजय रही।

हर्ष के समय बौद्ध धर्म

➣ हर्ष के पूर्वज भगवान शिव और सूर्य के अनन्य उपासक थे। शुरू में हर्ष भी अपने कुलदेवता शिव का परम भक्त था।

➣ कालांतर में चीनी यात्री ह्वेनसांग से मिलने के बाद उसने बौद्ध धर्म की महायान शाखा को राजाश्रय दिया तथा वह पूर्णतः वौद्ध बन गया।

➣ हर्ष के समय में नालंदा महाविहार महायान बौद्ध धर्म की शिक्षा का मुख्य केंद्र था।

➣ आगे चलकर कन्नौज तथा प्रयाग में दो विशाल धार्मिक सभाओं का आयोजन किया। कुंभ मेले को प्रारंभ करने का श्रेय हर्षवर्धन को ही दिया जाता है।

➣ हर्ष ने नालंदा में एक कांसे का विहार भी बनवाया तथा महाविहार को गांव दान में दिए।

कन्नौज धर्म सभा (643 ई.)

➣ अन्य धर्मों से महायान की उत्कृष्टता सिद्ध करने के लिए हर्षवर्धन ने 643 ई. में कन्नौज में विशाल धार्मिक सभाओं का आयोजन किया गया। इसमें बौद्ध की महायान शाखा की श्रेठता सिद्ध हुई।

➣ चीनी साक्ष्यों के अनुसार इस सभा में बीस देशों के राजा अपने देशों के प्रसिद्ध ब्राह्मणों, श्रमणों, सैनिकों, राजपुरुषों आदि के साथ उपस्थित हुए थे। इस सभा की अध्यक्षता ह्वेनसांग ने की थी।

➣ इसी सभा में ह्वेनसांग को महायानदेव एवं मोक्षदेव की उपाधियाँ प्रदान की गई। आर. के. मुखर्जी ने इस धर्म सभा को धर्मोका महासम्मेलन कहा है।

चीनी यात्री : ह्वेनसांग

➣ हर्षवर्द्धन के समय चीनी यात्री हवेनसांग 629 ई0 में भारत आया और वह लगभग644ई. तक भारत मे रहा।

15 वर्ष की इस अवधि में उसने भारत के प्रमुख नगरों, बौद्ध केन्द्रों, स्तूपोंमहाविहारों का भ्रमण किया।

➣ हवेनसांग नालंदा विश्वविद्यालय में अध्ययन करने और बौद्ध ग्रंथों को संग्रह करने के उद्देश्य से आया था।

➣ हवेनसांग के समय नांलदा विश्वविद्यालय का प्राचार्य शीलभद्र था।

➣ हवेनसांग ने सियूकी नामक पुस्तक लिखी जिसमें उसका विभिन्न देशों का यात्रावृतांत था इसमें हर्षवर्द्धन को शिलादित्य कहा गया है।

➣ इसे यात्रियों का राजकुमार, नीति का पंडित‘ एवं वर्तमान शाक्यमुनि कहा गया है।

➣ ह्वेनसांग के अनुसार-

  • हर्षवर्धन ने कन्नौज सभा में पूजा के लिए बुद्ध की विशाल सोने की मूर्ति बनवायी थी।
  • भारतीयों को गर्म स्वभाव का परंतु ईमानदार कहा है।
  • सूती कपड़ों के उत्पादन के लिए सबसे प्रसिद्ध नगर मथुरा था।
  • इस समय सिंचाई घटी यन्त्र (रहट) द्वारा होती थी।
  • हर्ष की सेना को चतुरंगिनी कहा।
  • भारत के घोड़े अरब, ईरान एवं कम्बोज से आते थे।
  • ह्वेनसांग ने कन्नौज की धर्मशालाप्रयाग की महामोक्षपरिषद् का भी वर्णन किया है।

➣ चीन लौटकर उसने पाश्चात्य संसार के लेख (शी-यू-की) नामक पुस्तक में तत्कालीन भारतीय राजनीति, समाज, धर्म, आर्थिक व्यवस्था, शिक्षा एवं साहित्य की प्रगति पर विस्तृत ढंग से लिखा।

➣ इतिहास में अंतिम हिन्दू सम्राट से तीन शासक का नाम मिलता है- हर्षवर्धन , पृथ्वी राज-चौहान तथा हेमू।

➣ हर्षवर्धन के समय तक भारत में मुस्लिम का आगमन नहीं हुआ था। यह अंतिम ऐसा शासक था जिसका साम्राज्य सम्पूर्ण उत्तर भारत पर था। जिसने उत्तर-भारत को एक सूत्र में बंधा था।

पृथ्वी राज चौहान के शासन काल में मुस्लिम आक्रमणकारियों ने भारत के पश्चिमोत्तर पर कब्ज़ा कर लिया था। इसी शासक के पराजय के बाद भारत में मुस्लिमों का आगमन हुआ।

➣ हेमू एक वजीर था जो हुमायूँ की मृत्यु के पश्चात् दिल्ली की गद्दी पर बैठा। वह मध्यकालीन भारत का पहला ऐसा हिन्दू सम्राट था जो दिल्ली की गद्दी पर बैठा परन्तु कुछ समय पश्चात् पानीपत के द्वितीय युद्ध में मारा गया।

प्रशासन व्यवस्था

➣ हर्ष के शासनकाल तथा समाज की जानकारी बाणभट्ट द्वारा रचित हर्षचरित और चीनी यात्री ह्वेनसांग के संस्मरण द्वारा मिलती है।

➣ हर्ष का प्रशासन निरंकुश तथा गणतंत्रीय तत्वों को मिश्रण था। प्रशासन प्रणाली सामन्त-प्रणाली की अग्रगामी थी।

➣ सम्राट को सहायता देने के लिये एक मंत्रिपरिषद् होती थी। मंत्री को सचिव या अमात्य कहा जाता था।

➣ हर्ष के प्रशासन में एक सुव्यवस्थित सचिवालय था, जिसके प्रमुख पदाधिकारी निम्न थे-

 अधिकारी  कार्य
 अवन्ती   युद्ध व शांति का अधिकारी, विदेश मंत्री/ सचिव
 सिंघनाद  सेनापति
 कुन्तल  अश्व सेना का प्रधान
 स्कन्दगुप्त  हस्ति सेना का प्रधान
 भण्डी  प्रधान सचिव/प्रधानमंत्री

➣ हर्ष के अधीनस्थ शासक महाराज अथवा महासामंत कहे जाते थे।

➣ विदेश सचिव को महासंधिविग्रहिक कहा जाता था। राजस्थानीय संभवतः वायसराय (प्रान्त प्रमुख) थे। चाट और भाट पुलिस अधिकारी थे।

➣ हर्ष के प्रशासन व पदाधिकारियों के नाम बंसखेड़ा अभिलेख में मिलते है।

बंसखेड़ा एवं मधुबन लेखों में हर्ष के महासामन्त स्कन्दगुप्त एवं ईश्वरगुप्त का उल्लेख है।

➣ हर्ष ने अपनी बहिन को प्रशासनिक कार्यों में सहयोग देने के लिए राजधानी थानेश्वर से कन्नौज स्थानान्तरित की थी।

➣ हर्षचरित के अनुसार हर्ष ने सर्वप्रथम पदाधिकारियों को वेतन के रूप में भूमि देने की जागीरदारी प्रथा शुरू की।

➣ ह्वेनसांग के अनुसार मंत्रियों एवं केन्द्रीय कर्मचारियों को नकद वेतन नहीं बल्कि भूखण्ड दिए जाते थे और सैनिक पदाधिकारियों को नकद वेतन दिया जाता था।

➣ ह्वेनसांग ने लिखा है कि राज-भूमि को चार भागों में बांटा गया था-

  1. एक भाग राज्य-कार्य चलाने के लिए
  2. दूसरा भाग मंत्रियों तथा अन्य राजकर्मचारियों को वेतन देने के लिए था
  3. तीसरा भाग सुयोग्य व्यक्तियों को पुरस्कृत करने के लिए था
  4. चौथा भाग धार्मिक सम्प्रदायों को दान देने के लिए था

न्याय व्यवस्था

➣ न्याय व्यवस्था का सर्वोच्च अधिकारी सम्राट था। ह्वेनसांग के अनुसार हर्ष के राज्य में कानून व्यवस्था अच्छी नहीं थी। राज्य में अपराध के लिये कठोर दंड का प्रावधान था।

साम्राज्य संरचना

➣ राज्य प्रशासनिक सुविधा के लिए ग्राम, विषय, भुक्ति, राष्ट्र में विभाजित था। मुक्ति का तात्पर्य प्रांत से था, विषय जिले के समान था। शासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी।

➣ हर्ष का साम्राज्य प्रांतों या भूक्ति में विभक्त था जिसके शासक को लोकपाल या उपरिक कहा जाता था।

➣ प्रांत के अन्तर्गत जिले या विषय और विषय के अधीन पाठक या तहसील होते थे।

➣ प्रशासन की सबसे छोटी ईकाई ग्राम थी जिसके मुख्य को ग्रामक्षपटलिक कहा जाता है।

आर्थिक व्यवस्था

➣ इस काल में राज्य को सर्वाधिक आय भूमि से होती थी। भौगिक कर वसूलने वाला तथा पुस्तपाल जमीन का हिसाब रखने वाला पदाधिकारी था।

राष्ट्रीय आय का एक चौथाई भाग उच्च कोटि के राज्य कर्मचारियों को वेतन या उपहार के रूप में, एक चौथाई भाग धार्मिक कार्यो के खर्च हेतु, एक चौथाई भाग शिक्षा के लिए एवं एक चौथाई भाग राजा स्वयं अपने खर्च के लिए प्रयोग करता था।

हर्षकालीन ताम्रपत्रों में राजस्व के स्रोत के रूप में तीन प्रकार के करों का विवरण मिलता है- भाग, हिरण्य एवं बलि। भाग या भूमिकर पदार्थ के रूप में लिया जाता था।

हिरण्य नगद में रूप में लिया जाने वाला कर था। जो सम्भवत: व्यापारियों से लिया जाता था।

➣ हर्षवर्द्धन के समय सिंचाई के लिये रहट या तुलायंत्र का प्रयोग तथा मथुरा सूती वस्त्र को केंद्र था।

➣ भूमि राजस्व अनाज के रूप में लिया जाता था और यह उत्पादन का 1/6 भाग होता था।

➣ हर्षवर्धन के काल में उच्च अधिकारियों को वेतन के रूप में जागीरें (भूमि अनुदान) दी जाती थीं। भूमि देने की सामंती प्रथा हर्षवर्धन ने ही शुरू की।

➣ भूदान द्वारा राज्य के अधिकारियों के भुगतान की पुष्टि सर्वप्रथम मनुस्मृति ग्रंथ में मिलता है।

➣ साधारण लेनदेन और व्यापार कौड़ियों के माध्यम से होता था। इन कौड़ियों को प्रतिहार अभिलेखों में कपर्दक कहा गया है।

➣ हर्षवर्द्धन समय पूर्वी भारत में ताम्रलिप्ति व पश्चिमी भारत में भड़ौच नामक बन्दरगाह थे।

➣ हर्ष के समय में मथुरा सूती वस्त्रों के निर्माण के लिये प्रसिद्ध था।

सैन्य व्यवस्था

➣ ह्वेनसांग के अनुसार हर्ष की सेना में लगभग 5,000 हाथी, 2,000 घुड़सवार एवं 5,000 पैदल सैनिक थे।

➣ कालान्तर में हाथियों की संख्या बढ़कर लगभग 60,000 एवं घुड़सवारों की संख्या एक लाख पहुंच गई। यह संख्या मौर्यों से भी अधिक थी।

कुंतल अश्वारोही सेना का सर्वोच्च अधिकारी था तथा स्कंदगुप्त गज़ सेना का प्रधान था।

➣ साधारण सैनिकों को चाट एवं भाट, अश्वसेना के अधिकारियों को हदेश्वर, पैदल सेना के अधिकारियों को बलाधिकृत एवं महाबलाधिकृत कहा जाता था।

बाणभट्ट के अनुसार अवन्ति युद्ध और शान्ति का सर्वोच्च मंत्री था। सिंहनाद हर्ष का महासेनापति था।

प्रशासन पदाधिकारी

बाणभट्ट ने हर्षचरित में इन पदों की व्याख्या इस प्रकार की है-

 महाबलाधिकृतसर्वोच्च सेनापति/सेनाध्यक्ष
 बलाधिकृतसेनापति
 महासन्धि विग्रहाधिकृतसंधिरु/युद्ध करने संबंधी अधिकारी
 कटुकहस्ति सेनाध्यक्ष
 वृहदेश्वरअश्व सेनाध्यक्ष
 अध्यक्षविभिन्न विभागों के सर्वोच्च अधिकारी
 आयुक्तकसाधारण अधिकारी
 मीमांसकन्यायधीश
 महाप्रतिहारराजाप्रासाद का रक्षक
 चाट-भाटवैतनिक/अवैतनिक सैनिक
 उपरिक महाराजप्रांतीय शासक
 अक्षपटलिकलेखा-जोखा लिपिक
 पूर्णिकसाधारण लिपिक

गुतोत्तर काल से सम्बंधित विशिष्ट शब्दावली

महत्तर (ग्राममहत्तर) उत्तर भारतीय ग्रामीण क्षेत्रों में ग्राम प्रमुख व मुखिया लोगों का वर्ग।
सार्थवाह व्यापारिक कारवां के नेता।
विष्टि बाध्य श्रम या बेगार।
कायस्थ सर्वप्रथम ‘याज्ञवल्क्य स्मृति’ में उल्लिखित दरबार से सम्बद्ध एक जाति।
भुक्ति गुप्तकाल में प्रांत का नाम।
विषय गुप्तकालीन जिला।
पेठ गुप्तकालीन ग्राम समूह।
क्षेत्र खेती के योग्य भूमि।
वास्तु वास करने योग्य भूमि।
सिल जो भूमि जोती नहीं जाती थी।
अप्रहत बिना जोती गयी जंगल भूमि।
कुटुम्बी भू-स्वामी स्वतंत्र किसान।
सीरिन बटाई पर खेती करने वाले किसान।
आर्थीक पाराशर स्मृति के अनुसार फसल बटाई करने वाली एक पृथक् जाति।
अग्रहार ब्राह्मण बस्तियों को दान में दी जाने वाली भूमि।
मेलबार गांवों की वह आय, जो मंदिरों को दी जाती थी।
ब्रह्मदेय ब्राह्मणों को दी जाने वाली कर मुक्त भूमि।
देवदान ब्राह्मणों को भूमि दान में देना।
परिहार परिहार का अर्थ है-देवदान,राज्य करों से मुक्ति भूमि।

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