कन्नौज संघर्ष: त्रिपक्षीय संघर्ष और साम्राज्य की होड़

भारतीय इतिहास प्राचीन भारत कन्नौज संघर्ष
📚 विषय सूची

कन्नौज : एक नजर में

कन्नौज
मौखरी वंश का उदय (5वीं सदी)
ईशानवर्मन (550-574 ई.)

पुष्य भूति वंश/वर्धन
हर्षवर्धन (606-647ई.) की राजधानी

यशोवर्मन
(725 -752 ई.)

त्रि-पक्षीय संघर्ष (गुर्जर-प्रतिहार, राष्ट्रकूट व पाल के मध्य)
कालांतर में गुर्जर-प्रतिहार शासक नागभट्ट द्वितीय (800 – 833 ई.) की राजधानी

गहड़वाल/राठौर वंश (1080-1194ई.)
जयचंद्र (पृथ्वीराज चौहान की पत्नी संयोगिता के पिता)

दिल्ली सल्तनत का हिस्सा
1194 में मुहम्मद गौरी के अधीन

दिल्ली सल्तनत की राजधानी
शम्सुद्दीन इल्तुतमिश (1210-1236 ई.) द्वारा राजधानी स्थान्तरित

गुप्त साम्राज्य के पतन के पश्चात शक्ति केंद्र का स्थानान्तरण

➣ दक्षिण में दूसरी शताब्दी में चोल , पाण्ड्य का उल्लेख मिलता है जबकि उत्तर-भारत में गुप्त साम्राज्य। हालाँकि गुप्त साम्राज्य शक्तिशाली था। जिसे भारत का स्वर्ण युग कहा जाता है।

➣ गुप्त साम्राज्य के समकालीन वाकाटक वंश का भी उल्लेख मिलता है। वाकाटक छठी शताब्दी के मध्य तक चालुक्य वंश के उदय होने तक दक्कन में सबसे महत्त्वपूर्ण शक्तिशाली साम्राज्य था। किन्तु गुप्तों के सम्मुख वाकाटकों की शक्ति कमजोर पड़ गयी थी।

➣ गुप्तोत्तर काल में दक्षिण-भारत में चालुक्य व पल्लव का सघर्ष मिलता है जबकि उत्तर-भारत में हर्षवर्धन (कन्नौज) का विशाल साम्राज्य (कश्मीर को छोड़कर)।

➣ गुप्त साम्राज्य के पतन के पश्चात् 5 -6वीं में भारत दो शक्ति केन्द्रो में विभक्त होने लगा। पहला दक्षिण भारत , दूसरा उत्तर-भारत।

➣ उत्तर-भारत में हर्षवर्धन का विशाल साम्राज्य था जबकि दक्षिण में बादामी ,वेंगी के चालुक्यों का शासन था।

🧠 याद रखें: हर्षवर्धन को अंतिम हिन्दू सम्राट कहा गया है। जिसका इतने बड़े भू-भाग पर शासन था। ध्यान रहे पृथ्वी राज चौहान को भी अंतिम हिन्दू सम्राट का जाता है, क्योंकि उनकी पराजय के पश्चात ही भारत में मुस्लिम शासन स्थापित हुआ।

➣ हर्षवर्धन ने दक्षिण जीतने के लिए दक्षिण-अभियान किया जिसे वातापी के चालुक्य पुलिकेशन द्वितीय ने रोका था। जिसके पश्चात पुलिकेशन ने दक्षिणीपथेवर अर्थात दक्षिण का स्वामी उपाधि धारण की थी।

6वीं शताब्दी ई. में गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद ही राजनीतिक शक्ति के केंद्र के रूप में पाटलिपुत्र का महत्व समाप्त हो गया। फलस्वरूप इसका स्थान उत्तर भारत में स्थित कन्नौज ने ले लिया।

➣ प्रारंभ में यह मौखरी वंश की राजधानी रही किन्तु हर्षवर्धन के बहनोई गृहवर्मा(600-605ई.) की हत्या होने के पश्चात हर्षवर्धन ने कन्नौज पर अप्रत्यक्ष शासन किया और उसे अपनी दूसरी राजधानी बनाई।

➣ हर्षवर्धन का कोई पुत्र नहीं (पुत्री थी) था। उसकी मृत्यु के पश्चात कन्नौज पर यशोवर्मा का अधिकार हुआ। यशोवर्मन की मृत्यु के बाद कन्नौज पर आधिपत्य को लेकर तीन महाशक्तियों में संघर्ष हुआ है। ये शक्तियाँ थी :- पाल (पूर्व ) , गुर्जर-प्रतिहार (प्रश्चिम) तथा राष्ट्रकूट (दक्षिण)।

➣ कालांतर में 7वीं के मध्य भारत में शक्ति के तीन प्रमुख केंद्र उभरे,

📌

इसी मध्य भारत की पश्चिमोत्तर सीमा में 7वीं शताब्दी में विदेशी आक्रमण होने लग गए थे जिसमे 712 ई0 का मुहम्मद बिन कासिम का आक्रमण प्रमुख है इस आक्रमण के फलस्वरूप भारत का पश्चिमोत्तर क्षेत्र सिंध (पाकिस्तान-अफगानिस्तान ) भारतीय साम्राज्य से पृथक हो जाता है। लेकिन या अल्पकालिक रहा।

अभी तक विदेशी आक्रमण आधुनिक भारत की सीमा (पंजाब तथा राजस्थान ) तक नहीं पहुंचे थे।

➣ उत्तर भारत में शक्ति केंद्र कन्नौज था एंव अब हर्षवर्धन की भी मृत्यु हो चुकी थी। सामरिक दृष्टि से यह महत्वपूर्ण था। अत: कन्नौज पर अधिपत्य स्थापित करने के लिए इन तीनों शक्तियों मे आपसी संघर्ष होने लगा।

➣ इतिहास में कन्नौज के लिए हुए इन तीनों शक्तियों के मध्य हुए संघर्ष को त्रि – पक्षीय संघर्ष के नाम से भी जाना जाता है। इस संघर्ष में अंतिम सफलता गुर्जर-प्रतिहारों (नाग्भट्ट द्वितीय ) को मिली। कन्नौज संघर्ष त्रिपक्षीय संघर्ष

➣ त्रि – पक्षीय संघर्ष का आरम्भ प्रतिहार शासक वत्सराज (775 -800 ई0) ने की थी जिसने कन्नौज पर आक्रमण कर इंद्रायुध को पराजित किया और उत्तर भारत में अपनी सत्ता का विस्तार किया।

➣ इसके पश्चात् दक्षिण की शक्ति राष्ट्रकूट नरेश ध्रुव प्रथम (780 -93 ई0) ने इस संघर्ष में हस्तक्षेप किया जिसने प्रतिहार राजा वत्सराज तथा पाल नरेश धर्मपाल को पराजित किया।

➣ ध्रुव नरेश के वापस दक्षिण लौटते ही पाल नरेश धर्मपाल (770 -810 ई0) ने कन्नौज पर आक्रमण कर इंद्रायुध को सिंहासन से निष्कासित कर चक्रायुध को सिंहासन आरूढ़ किया।

➣ धर्मपाल के खलीमपुर ताम्रपत्र से धर्मपाल द्वारा इन्द्रायुध को पराजित करने तथा चक्रायुध को कन्नौज की गद्दी पर बैठाने का उल्लेख मिलता है।

➣ पाल शासक की यह सफलता प्रतिहार शासकों के लिए असहनीय थी अतः वत्सराज के पुत्र नागभट्ट द्वितीय (800 – 833 ई.) ने धर्मपाल को परास्त कर कन्नौज पर अधिकार कर लिया।

➣ कालांतर में नागभट्ट को राष्ट्रकूट शासक गोविन्द तृतीय से परास्त होना पड़ा। इस पराजय से गुर्जर-प्रतिहारों की शक्ति काफी क्षीण हो गयी।

➣ कालांतर में धर्मपाल की मृत्यु के उपरांत एक बार फिर नागभट्ट द्वितीय ने कन्नौज पर अधिकार का प्रयास किया, वह सफल भी हुआ और उसने कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया।

➣ इस प्रकार लगभग 200 वर्षों तक चले। इस संघर्ष में प्रतिहार शासक विजयी रहे। छोटे संघर्ष 9वीं शताब्दी तक चलते रहे।

त्रि-पक्षीय संघर्ष में भाग लेने वाले शासक

गुर्जर-प्रतिहार (पश्चिमी भारत) राष्ट्रकूट (दक्षिण-भारत) पाल वंश (पूर्वी भारत)
वत्सराज (783-800 ई.) ध्रुव प्रथम (780-793 ई.) धर्मपाल (770-810 ई.)
नागभट्ट द्वितीय (800-833 ई.) गोविंद तृतीय (793-814 ई.) देवपाल (810-850 ई.)
मिहिरभोज (836-885 ई.) अमोघवर्ष प्रथम (814-878 ई.) विग्रहपाल (850-854 ई.)
महेन्द्रपाल प्रथम (885-910 ई.) कृष्ण द्वितीय (854-915 ई.) नारायण पाल (878-915 ई.)
महीपाल प्रथम (912-943 ई.) इन्द्र तृतीय (915-922 ई.)
गूर्जर प्रतिहारराष्ट्रकूटपाल
1. वत्सराज (783-795 ई.)1. ध्रुव (779-793 ई.)1. धर्मपाल (770-819 ई.)
2. नाग भट्ट-II (795-833)2. गोविन्द तृतीय (793-814 ई.)2. देवपाल (819-855 ई.)
3. राम भट्ट (833-836 ई.)3. अमोघवर्ष (814-878 ई.)3. विग्रहपाल (855-860 ई.)
4. मिहिर भोज (836-885 ई.)4. कृष्ण (878-914 ई.)4. नारायणपाल (860-915 ई.)
5. महेन्द्रपाल (885-910 ई.)

भारत में नए शक्ति केंद्रों का उदय

➣ सन 712 ई. में अरबों ने सिंध पर आधिपत्य जमा कर भारत विजय का मार्ग प्रशस्त कर दिया। अरबों का यह सफल आक्रमण मुहम्मद बिन कासिम के नेतृत्व में हुआ था।

➣ उस समय भारत में कोई केन्द्रीय शक्ति नहीं थी जो इनका समना कर सके। फलत: सन 725 ई. अरबों ने जैसलमेर, मारवाड़, मांडलगढ और भडौच आदि इलाकों पर अपना आधिपत्य जमा लिया।

➣ ऐसे समय में दो शक्तियों का प्रादुर्भाव हुआ। एक ओर जहां नागभाट ने जैसलमेर, मारवाड, मांडलगढ से अरबों को खदेड़कर जालौर में प्रतिहार राज्य की नींव डाली,

➣ वहीँ दूसरी ओर बप्पा रायले ने चित्तौड़ के प्रसिद्ध दुर्ग पर अधिकार कर सन 734 ई. में मेवाड़ में गुहिल वंश अथवा गहलौत वंश (सिसोदिया वंश) का वर्चश्व स्थापित किया।

➣ इस प्रकार लगभग ढाई सौ वर्षों तक राजपूतों राजाओं ने अरबों को सिंध से आगे नहीं बढ़ने दिया।

➣ कालांतर में सिसोदिया वंश से ही राणा कुम्भा, रांणा सांगा एंव महाराणा प्रताप जैसे प्रतापी राजपूतों का उदय हुआ।


➣ पूर्व में पाल व दक्षिण में राष्ट्रकूट इन विदेशी आक्रमणकारियों से अभी सुरक्षित थे। समकालीन, पूर्व में पाल नरेश महिपाल प्रथम (988 – 1038 ई.) का शासन था। इसका पडोसी राज्य (कन्नौज) गहडवाल वंश का शासन था।

➣ दक्षिण में राष्ट्रकूट का अंत कर चालुक्य (कल्याणी के चालुक्य नाम से ) फिर से सत्ता प्राप्त करते हैं जिनका शासनकाल 9-12शताब्दी तक मिलता है।

➣ 9वीं शताब्दी के मध्य लगभग 850 ई. में विजयालय (850-875 ई.) के नेतृत्व में चोल शक्ति का भी पुनरुत्थान हुआ। सामान्यत: इसे 9वीं शताब्दी का चौल वंश नाम से भी जाना जाता है।

सन 1000 ई. में विदेशी आक्रमणकारी आधुनिक भारत की सीमा तक पहुँच गए। इसमें सर्वप्रथम आक्रमण महमूद गजनवी का था जिसने भारत पर 17 बार चढाई की।

➣ उसके इन आक्रमणों का उद्देश्य केवल भारत को लूटना था। उसने भारत में कोई मुस्लिम सत्ता स्थापित नहीं की। उसके इन आक्रमणों में मुख्य आक्रमण 1025 ई. गुजरात स्थित शिव का सोमनाथ मंदिर लूटना था।

12वीं शताब्दी के अंत तक विदेशी आक्रमणकारी उत्तर भारत तक पहुँच गए जिसमे मुहम्मद गौरी व पृथ्वी राज चौहान का तराईन युद्ध (1191-92 ई ) का उल्लेख मिलता है।

➣ जहाँ उत्तर-भारत में धीरे धीरे मुस्लिम सत्ता स्थापित होने लगी थी वहीँ दक्षिण-भारत अभी इन मुस्लिम आक्रान्ताओं से सुरक्षित था।

मुहम्मद गौरीपृथ्वी राज चौहान के मध्य हुए तराईन के द्वितीय युद्ध (1192 ई) में पृथ्वी राज चौहान की पराजय के साथ ही भारत में मुस्लिम सत्ता स्थापित हुई। भारत में गौरी को ही मुस्लिम सत्ता स्थापित करने का श्रेय जाता है।

➣ 13वीं शताब्दी तक दक्षिण -भारत विदेशी आक्रमणों से सुरक्षित रहा हालाँकि 6वीं शताब्दी के मध्य मुंबई में अरबी आक्रमण का उल्लेख प्राप्त होता है जिसका उद्देशय केवल लूटपाट बताया गया है।

➣ 13वीं शताब्दी एक मध्य पहली बार एक मुस्लिम शासक अल्लाउदीन खिलजी ने दक्षिण-अभियान किया और दक्षिण के कई राज्यों को दिल्ली सल्तनत के अधीन किया। किन्तु उन्हें दिल्ली सल्तनत का हिस्सा नहीं बनाया गया अपितु उनसे कर वसूला गया।

➣ कालांतर में सर्वप्रथम फिरोजशाह तुगलक ने अल्लाउदीन खिलजी की नीति के विपरीत दक्षिणी राज्यों को दिल्ली सल्तनत में मिलाया। अब शक्ति का केंद्र दिल्ली की तरफ स्थान्तरित होने लगा था।

मुहम्मद बिन तुगलक के समय दक्षिण-भारत में विजयनगर और बहमनी राज्य अस्तित्व में आते हैं। इसमें विजयनगर एक हिन्दु साम्राज्य था।

➣ मध्यकाल भारत के इतिहास में विजयनगर एकमात्र हिन्दू साम्राज्य था। जिसने हिन्दू धर्म को अक्षुण रखा। तत्कालीन भारत का सर्वाधिक शक्तिशाली राजा कृष्ण देवराय विजयनगर साम्राज्य (तुलुव वंश) से सम्बंधित था।

➣ 15वीं सदी में मुग़ल बादशाह अकबर दोनों दक्षिण व उत्तर को एक कर (क्षेत्रफल की दृष्टि से नहीं, अपितु शक्ति) भारत पर एक मात्र मुस्लिम शासक के रूप में किया। हालाँकि इसमें आधुनिक दक्षिणी क्षेत्र शामिल नहीं था।

➣ उल्लेखनीय है अकबर के साम्राज्य में उत्तर में कश्मीर सम्मलित था किन्तु पूर्व में गोलकुंडा (पूर्वी उत्तर-प्रदेश और बिहार क्षेत्र) राज्य इसमें शामिल नहीं था।

➣ भारतीय इतिहास में मौर्य शासक (चन्द्रगुप्त एंव अशोक) ही ऐसे शासक थे। जिन्होंने सम्पूर्ण भारत पर एक छत्र शासक के रूप में शासन किया था। जिसका क्षेत्रफल आधुनिक भारत से अधिक था।

➣ हालाँकि इसमें वर्तमान भारत के क्षेत्र शामिल नहीं थे अपितु आधुनिक नाम फारस-सीमा ( ईरान), अफगानिस्तान , पाकिस्तान सम्मिलित थे जबकि अधिकांश केरल तथा पूर्वी भारत जैसे अरुणांचल , मणिपुर , मिजोरम जैसे क्षेत्र मौर्य वंश में शामिल नहीं थे।

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