गुप्त साम्राज्य (319–550 ई.): शासक, स्वर्ण युग, पतन और प्रारंभिक हूण आक्रमण

भारतीय इतिहास प्राचीन भारत गुप्त साम्राज्य (319–550 ई.)
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गुप्त सम्राज्य (275-550 ई. ) : भारत का पेराक्लीज युग

मौर्या साम्राज्य के पतन बाद , सातवाहन (दक्षिण-भारत) तथा कुषाण (उत्तर-भारत) दो शक्तिशाली समकालीन राज्य उभरे। जिसमे सातवाहन स्वदेशी जबकि कुषाण विदेशी थे।

तीसरी शताब्दी के मध्य तक इन दोनों साम्राज्यों का भी पतन हो गया। इनके पतन के बाद एक नया राज वंश उभरा जो गुप्त साम्राज्य कहलाया। संभवत: ये कुषाणों के सामंत थे।

➣ गुप्त साम्राज्य, मौर्य साम्राज्य जैसा विशाल नहीं था, लेकिन उत्तर भारत की राजनीतिक एकता को यह एक शताब्दी से अधिक समय तक (लगभग 335-555 ) बनाए रखने में सफल रहा।

➣ साम्राज्य का केंद्र मगध था एंव राजधानी पाटलिपुत्र थी। कालांतर में चन्द्रगुप्त द्वितीय, जिसे चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य भी कहा जाता है , ने द्वितीय राजधानी उज्जैन को बनाया।

➣ गुप्त काल कई दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा इसमें साहित्य , कला , विज्ञानं-तकनीक, चिकित्सा एंव आधुनिक हिन्दू धर्म का विकास हुआ। इतिहास में गुप्त काल को भारत का स्वर्णयुग की संज्ञा दी गई है।

➣ गुप्तकाल में वैष्णव धर्म अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचा गया। प्रारंभिक गुप्त शासक के अनुयायी थे जबकि स्कन्दगुप्त के उत्तराधिकारियों में से कई शासकों ने बौद्ध धर्म को अपना लिया।

➣ गुप्त के समकालीन दक्षिण में वाकाटक, चोल तथा पाण्ड्य शासकों का शासन था। हालाँकि गुप्त इनमे सबसे शक्तिशाली साम्राज्य था।

➣ गुप्तकाल भारत का पेराक्लीज युग (Pericles Era) था। पेरिक्लीज़ युग प्राचीन यूनान के इतिहास में एथेंस का एक स्वर्णकाल माना जाता है, जो लगभग 461–429 ईसा पूर्व के बीच एथेंस के प्रमुख नेता थे। गुप्त साम्राज्य

➣ गुप्त वंश का आरम्भिक राज्य उत्तर प्रदेश और बिहार में था।

➣ गुप्तों की उत्पत्ति से संबंधित प्रश्न बड़ा विवादास्पद है। गुप्तों की उत्पत्ति के बारे में विद्वानों के मत निम्नलिखित हैं-

वज्जिका द्वारा लिखित कीर्तिकौमुदी नाटक में लिच्छिवियों को मलेच्छ तथा चण्डसेन (चन्द्रगुप्त प्रथम) को कारस्कर कहा गया है।

चन्द्रगोमिन के व्याकरण नामक ग्रन्थ में गुप्तों को जर्ट अर्थात् जाट कहा गया है। इसके आधार पर ही जायसवाल गुप्तों को जाट मानते हैं।

 के. एम. मुंशी स्वर्ण युग
 पुराण मागध गुप्त
 मैक्समूलर पुनर्जागरण काल
 आर.डी. बनर्जी पुनर्जागरण कला

➣ गुप्तों की उत्पत्ति के विषय में जितने भी मत दिये गये हैं, उनमें उनको ब्राह्मण जाति से सम्बन्धित करने का मत कुछ तर्कसंगत प्रतीत होता है।

➣ गुप्त वंशीय लोग धारण गोत्र के थे। यह उल्लेख चन्द्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती गुप्ता ने अपने पूना ताम्रपत्र में किया है। यह गोत्र उसके पिता का ही था, क्योंकि उसका पति वाकाटक नरगेश रुद्रसेन द्वितीय विष्णुवृद्धि गोत्र का ब्राह्मण था।

➣ गुप्त वंशावली का परिचय देने के लिए हमारे पास अनेक अभिलेख हैं, जिनमें सबसे प्रमुख हैं- समुद्रगुप्त का प्रयाग प्रशस्ति अभिलेख, कुमार गुप्त का विलसड स्तम्भ लेख और स्कन्दगुप्त का भीतरी स्तम्भ लेख।

➣ गुप्त राजवंश की स्थापना के संबंध में अधिकांश इतिहासकारों में मतभेद है। दो मुहरें जिनमें से एक के ऊपर संस्कृत में श्रीगुप्तस्य अंकित है, से प्रतीत होता है कि श्रीगुप्त नामक व्यक्ति ने इस वंश की स्थापना की थी।

 प्रान्त क्षेत्र
 अवन्तिपश्चिमी मालवा
 पुण्ड्रवर्धनउत्तरी बंगाल
 एरणपूर्वी मालवा
 वर्द्धमानउत्तरी बंगाल
 तीरभुक्तिउत्तरी बिहार मगध
 मगधपश्चिमी बिहार

गुप्त साम्राज्य के शासकों(275–550 ई.) की सूची

क्रम शासक शासनकाल महत्वपूर्ण घटनाएँ / तथ्य
1श्रीगुप्त275–300 ई.गुप्त वंश की नींव; प्रारंभिक सत्ता का विकास
2घटोत्कच गुप्त300–319 ई.गुप्त शक्ति का विस्तार प्रारंभ
3चन्द्रगुप्त प्रथम319–330 ई.लिच्छवि राजकुमारी से विवाह; साम्राज्य की स्थापना
4समुद्रगुप्त330–380 ई.दिग्विजय अभियान; भारत का नेपोलियन कहा जाता है
5रामगुप्तकुछ महीनेसिक्कों और कथाओं में उल्लेख; विवादित शासक
6चन्द्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य)380–415 ई.स्वर्ण युग का उत्कर्ष; शकों पर विजय
7कुमारगुप्त प्रथम (महेन्द्रादित्य)415–455 ई.नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना; प्रशासनिक स्थिरता
8स्कन्दगुप्त (शंक्रादित्य)455–468 ई.हूण आक्रमण का सफल प्रतिरोध
9पुरूगुप्त467–476 ई.साम्राज्य में कमजोरी प्रारंभ
10कुमारगुप्त द्वितीय473–477 ई.आंतरिक अस्थिरता
11बुधगुप्त476–495 ई.गुप्त साम्राज्य का अंतिम मजबूत शासक
12नरसिंहगुप्त बालादित्य495–510 ई.बौद्ध धर्म का संरक्षण; हूणों से संघर्ष
13भानुगुप्त510 ई.गुप्त सत्ता का कमजोर चरण
14वैन्यगुप्त507 ई.क्षेत्रीय नियंत्रण में गिरावट
15कुमारगुप्त तृतीय530–543 ई.छोटे क्षेत्रीय शासन का अस्तित्व
16विष्णुगुप्त543–550 ई.गुप्त साम्राज्य का अंतिम चरण
🧠 याद रखें:
गुप्त साम्राज्य का उदय चंद्रगुप्त प्रथम (लगभग 320 ई.) के समय हुआ, जबकि उससे पहले ही श्रीगुप्त (लगभग 275–300 ई.) ने गुप्त वंश की नींव रख दी थी। वंश और साम्राज्य में अंतर होता है इसलिए गुप्त वंश (लगभग 275 ई. से प्रारंभ) और गुप्त साम्राज्य (लगभग 320 ई. से प्रारंभ)।, दोनों की समयरेखामें भी अंतर है।
गुप्त साम्राज्य के शासकों की सूची

श्रीगुप्त (275–300 ई.) : गुप्त वंश की नींव

➣ दो मुहरें जिनमें से एक के ऊपर संस्कृत में श्रीगुप्तस्य अंकित है, से प्रतीत होता है कि श्रीगुप्त नामक व्यक्ति ने इस वंश की स्थापना की थी।

➣ गुप्त वंश का संस्थापक श्रीगुप्त था। उसने महाराज की उपाधि धारण की थी।

➣ प्रभावती गुप्ता के पूना ताम्रपत्र अभिलेख में श्रीगुप्त को आदिराज कहा गया है।

➣ श्रीगुप्त का राज्य प्रयाग, साकेत एवं मगध के कुछ भागों पर था।

इत्सिंग के अनुसार श्रीगुप्त ने मगध में एक मंदिर का निर्माण करवाया था जिसके लिए 24 गांव दान दिए।

➣ इसके द्वारा धारण की गयी उपाधि महाराज सामंतों द्वारा धारण की जाती थी, जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि श्रीगुप्त किसी शासक के अधीन शासन करता था।

घटोत्कच गुप्त (280–319 ई.) : शक्ति का विस्तार प्रारंभ

➣ श्रीगुप्त के बाद गुप्त वंश का शासक उसका पुत्र घटोत्कच गुप्त बना। इसने भी महाराज की उपाधि धारण की थी।

➣ स्कंदगुप्त के सुपिया के लेख (रोया, मध्य प्रदेश) में भी गुप्तों की वंशावली घटोत्कच के समय से ही प्रारंभ मानी जाती है। अत: इससे ज्ञात होता है कि गुप्तों का राजनैतिक इतिहास घटोत्कच के समय से ही प्रारंभ हुआ।

➣ प्रभावती गुप्त के पूना एवं रिद्धपुर ताम्रपत्र अभिलेखों के अनुसार घटोत्कच का राज्य मगध के आस-पास तक ही सीमित था।

➣ इन प्राप्त अभिलेखों में घटोत्कच को ही गुप्त वंश का प्रथम शासक बताया गया है। इसने लगभग 319 ई. तक शासन किया।

चन्द्रगुप्त प्रथम (319–350 ई.) : गुप्त साम्राज्य की स्थापना

➣ गुप्त वंश का तीसरा एवं प्रथम महान शासक चन्द्रगुप्त प्रथम था। इसे गुप्त वंश का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।

➣ गुप्त वंशावली में चन्द्रगुप्त प्रथम पहला शासक था जिसने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की। श्रीगुप्त ने महाराज की उपाधि धारण की थी।

गुप्त वंश के पहले दो राजा केवल महाराज कहे गए हैं, जबकि चंद्रगुप्त को महाराजाधिराज कहा गया है। इससे प्रतीत होता है, कि उसके समय में गुप्त वंश की शक्ति बहुत बढ़ गई थी।

➣ यह गुप्त वंश का प्रथम वास्तविक संस्थापक शासक था। यह घटोत्कच पुत्र था। उसके राज्याभिषेक की तिथि 319ई. है, इसे गुप्त संवत् का आरंभ माना जाता है।

➣ चंद्रगुप्त प्रथम ने अपने शासन काल में एक नया संवत् चलाया, जिसे गुप्त संवत् कहा जाता है। यह संवत् गुप्त सम्राटों के काल तक ही प्रचलित रहा।

अलबरूनी के अनुसार गुप्त संवत का प्रारम्भ शक संवत के 241 वर्ष बाद (319 ई. में) हुआ।

मगध तथा उत्तर प्रदेश के बहुत से प्रदेशों को जीत लेने के कारण चंद्रगुप्त के समय में गुप्त साम्राज्य बहुत विस्तृत हो गया था। उसने पाटलिपुत्र को राजधानी बनाया।

वैवाहिक संबंध

➣ मगध के उत्तर में लिच्छवियों का जो शक्तिशाली साम्राज्य था, चंद्रगुप्त ने उसके साथ वैवाहिक संबंध स्थापित किया। कुषाण काल के पश्चात् इस प्रदेश में सबसे प्रबल भारतीय शक्ति लिच्छवियों की ही थी।

➣ उसने लिच्छवि-राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह किया, जिससे कालांतर में समुद्रगुप्त उत्पन्न हुआ। इस वैवाहिक संबंध का प्रमाण उसके स्वर्ण सिक्कों व अभिलेखों से भी मिलता है-

  1. स्वर्ण सिक्के, जिसमें चंद्रगुप्त कुमारदेवी प्रकार, लिच्छवी प्रकार, राजा-रानी प्रकार, विवाह प्रकार आदि हैं।
  2. दूसरा प्रमाण समुद्रगुप्त के प्रयाग अभिलेख हैं, जिसमें उसे लिच्छवी दौहित्र कहा गया है।

➣ लिच्छवी राजकुमारी कुमारदेवी के साथ विवाह कर चंद्रगुप्त प्रथम ने वैशाली राज्य प्राप्त किया। उसने अपने स्वर्ण सिक्के पर अपना और कुमारदेवी का नाम खुदवाया। इन सिक्कों के पृष्ठ भाग पर लिच्छवयः (लिच्छवी) उत्कीर्ण है।

गुप्त वंश में ही सर्वप्रथम चन्द्रगुप्त प्रथम ने ही रजत (चाँदी) मुद्राओं का प्रचलन करवाया था।

➣ उसके समय गुप्त-साम्राज्य का विस्तार दक्षिण-बिहार से लेकर अयोध्या तक था।

प्रयाग प्रशस्ति के अनुसार, चन्द्रगुप्त प्रथम ने अपने राज्यकाल में ही कनिष्ठ पुत्र समुद्रगुप्त को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया और स्वंय सन्न्यास ग्रहण कर लिया।

गुप्त संवत

❑ गुप्त संवत को गुप्त प्रकाल भी कहा गया है। गुप्त वंश के तीसरे शासक चन्द्रगुप्त प्रथम ने 319 ई. को गुप्त संवत चलाया था।

❑ इस संवत का सर्वप्रथम उल्लेख मथुरा अभिलेख में मिलता है। अल्बेरूनी के विवरण से स्पष्ट होता है कि गुप्त व शक संवत में 241 वर्षों का अन्तर था।

गुप्त संवत319 ई.
शक संवत78 ई.
अन्तर241 वर्ष

➣ उल्लेखनीय है विक्रम सवंत लगभग 78 ई.. में उज्जैन शासक राजा विक्रमादिया ने शकों के विजय के उपलक्ष में चलाया थे। यह संवत भारत सरकार का राष्ट्रीय पंचाग है।

समुद्रगुप्त (330–380 ई.) : भारत का नेपोलियन

➣ चंद्रगुप्त प्रथम के बाद समुद्रगुप्त राजगद्दी पर बैठा। उसका शासनकाल भारत के लिये स्वर्णयुग की शुरूआत कहा जाता है।

➣ प्रयाग प्रशस्ति अनुसार समुद्रगुप्त को भाईयों / तुल्यकुलज से उत्तराधिकार युद्ध लड़ना पड़ा। समुद्रगुप्त के समय गुप्त साम्राज्य का सर्वाधिक विस्तार हुआ।

ऋद्धपुर लेख में समुद्रगुप्त को तत्पादपरिगृहित कहा गया है। (चन्द्रगुप्त प्रथम द्वारा राज्य त्याग कर समुद्रगुप्त को राजा बनाना।)

उपाधियाँ

➣ प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त की उपाधि- कविराज, पृथिव्याम प्रतिरथ, धर्म प्राचीर बन्ध, सर्वराजोच्छेता, लिच्छवि दौहित्र। समुद्रगुप्त की एक उपाधि विक्रमांक मिलती है।

➣ गुप्त शासक समुद्रगुप्त ने धरणिबन्ध, सम्पूर्ण पृथ्वी को जीतने वाला और पृथिव्या प्रथम वीर की उपाधि भी ग्रहण की थी।

➣ इसके अलावा अन्य उपधिया जैसे – अश्वमेघकर्ता, पराक्रमांक, अप्रतिरथ,व्याघ्रपराक्रम भी धारण की। अभिलेखों में उसके लिए सर्वराजोच्छेता उपाधि प्रयुक्त हुआ है।

विजय नीतियाँ

राज्य प्रसभोद्धरण मगध के आसपास के राज्यों को पराजित कर उन्हें अपने राज्य में मिला लिया।
सर्वकरंदानाज्ञाकरण यह नीति सीमांत क्षेत्रों के लिये थी।
परिचारिकीकृत आटविक (जनजातीय) राज्यों को सेवक बनाने की नीति।
ग्रहणमोक्षानुग्रह दक्षिण भारत के 12 राजाओं के संघ को पराजित कर उन्हें पुनः उनके राज्य सौंप दिये।
कन्योपायन विदेशियों को पराजित कर उनके साथ वैवाहिक संबंधों की नीति।

दिग्विजय अभियान

➣ समुद्रगुप्त ने सम्राट अशोक की शान्ति एवं अनाक्रमण नीति के विपरीत हिंसा एवं विजय की नीति अपनाई एंव दिग्विजय की योजना बनाई थी।

➣ उसने आर्यावर्त तथा दक्षिणावर्त के 12-12 शासकों को पराजित किया। इन्हीं विजयों के कारण इतिहासकार विंसेट स्मिथ ने अपनी पुस्तक अर्ली हिस्ट्री ऑफ इंडिया में समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन (फ्रांस का शासक) कहा है।

प्रयाग प्रशस्ति में उसकी विजय का उल्लेख है। प्रयाग-प्रशस्ति के अनुसार इस योजना का ध्येय है –धरणि-बन्ध जिसका अर्थ है – भूमण्डल को बाँधना।

प्रयाग प्रशस्ति में सर्वप्रथम भारतवर्ष का उल्लेख मिलता है।

➣ प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त को एक महान विजेता तथा संपूर्ण पृथ्वी को विजय (धरणि बंध) करने वाला बताया गया है।

➣ प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त को पृथ्वी पर निवास करने वाला देवता कहा गया है।

➣ अशोक निर्मित यह स्तंभ मूलतः कौशांबी में स्थित था, जिसे अकबर ने इलाहाबाद में स्थापित करवाया था। इस स्तंभ पर अशोक, समुद्रगुप्त, अकबर, बीरबल, जहाँगीर का उल्लेख मिलता है।

➣ प्रयाग प्रशस्ति के अनुसार समुद्रगुप्त की दिग्विजयों का उद्देश्य धरणिबन्ध था। उसकी उत्तरी भारत में अपनाई गई नीति प्रसभोद्धरण (जड़ मूल से उखाड़ फेंकना) तथा दक्षिणापथ की नीति ग्रहणमोक्षानुग्रह कहलाती है।

➣ अपनी दिग्विजय की प्रक्रिया में समुद्रगुप्त ने सर्वप्रथम उत्तर भारत में एक छोटा-सा युद्ध किया, जिसमें उसने तीन शक्तियों- अच्युत (नागवंशी राजा), नागसेन (नागवंशी राजा) और कोतकुलज को पराजित किया।

➣ प्रयाग प्रशस्ति के 7 वें श्लोक में समुद्रगुप्त की सामरिक विजय एवं नागो के विरूद्ध लड़े युद्ध का वर्णन है।

दक्षिणापथ से तात्पर्य उत्तर में विन्ध्य पर्वत से लेकर दक्षिण में कृष्णा तथा तुंगभद्रा नदियों के बीच के प्रदेश से है।

➣ सुदूर दक्षिण के तमिल राज्य इसकी परिधि से बाहर थे। महाभारत में विदर्भ तथा कोशल के दक्षिण में स्थित प्रदेश को दक्षिणापथ की संज्ञा प्रदान की गयी है।

➣ दक्षिणापथ के युद्ध में समुद्रगुप्त ने बारह राजाओं को पराजित किया। प्रयाग प्रशस्ति की 19वीं20वीं पंक्ति में दक्षिणापथ के 12 राजाओं व राज्यों का उल्लेख मिलता है, ये 12 राज्य थे-

 शासकराज्य
 1.मंत्रराज कौराल
 2. महेन्द्रगिरीपिष्टपुर
 3. हेन्द्रकोशल
 4. व्याघ्रराजमहाकान्तार
 5. स्वामीदत्तकोट्टर
 6. दमनएरण्ड पल्ल
 7. नीलराजअवमुक्त
 8. हस्तिवर्मावेंगी
 9. उग्रसेनपालक्क
 10. कुबेरदेवराष्ट्र
 11. धनन्जयकौस्थलपुर
 12. विष्णु गोपकांची

➣ अंतिम विजयी शासक दक्षिण के कांची का पल्लव वंश का विष्णुगोप था ।

➣ इन राज्यों के प्रति समुद्रगुप्त ने ग्रहण मोक्षानुग्रह की नीति अपनाई और उनसे भेंट-उपहार आदि प्राप्त कर उन्हें स्वतंत्र कर दिया।

➣ कालीदास ने रघुवंश नाटक में इस तरह की विजय को धर्म विजय कहा है एवं राय चौधरी ने भी दक्षिण विजय को धर्म विजय कहा है।

दक्षिणापथ के अभियान से निवृत्त होने के बाद समुद्रगुप्त ने उत्तर भारत में पुनः एक युद्ध किया जिसे ‘आर्यावर्त का द्वितीय युद्ध’ कहा गया है।

➣ प्रयाग प्रशस्ति की 21वीं पंक्ति में आर्यावर्त के नौ राजाओं का उल्लेख हुआ है। ये नौ राजा थे- रुद्रदेव, मत्तिल, नागदत्त, चन्द्रवर्मा, गणपतिनाग, नागसेन, अच्युत, नन्दि और बलवर्मा।

➣ इन राजाओं के प्रति समुद्रगुप्त ने प्रसभोद्धरण की नीति अपनाई। इस नीति का अर्थ है जड़ मूल से उखाड़ फेंकना।

➣ आर्यावर्त के दूसरे अभियान के बाद एरण विजय की, जो उत्तर भारत की अन्तिम विजय थी।

➣ प्रशस्ति की 21वीं पंक्ति में ही आटविक राज्यों की विजय का उल्लेख किया गया है।

उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले से लेकर मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले तक के वन प्रदेश में ये सभी 18 राज्य फैले हुए थे। इनके प्रति परिचारकीकृत नीति (दास बनाने की नीति अपनाई।

उत्तर तथा दक्षिण भारत के बीच के आवागमन को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें नियंत्रण में रखना आवश्यक था।

➣ लगता है कि जब समुद्रगुप्त दक्षिणी अभियान पर जा रहा था, इन राज्यों ने उसके मार्ग में अवरोध उत्पन्न किया। अतः उसने उन्हें जीतकर पूर्णतया अपने नियंत्रण में कर लिया।

➣ प्रयाग प्रशस्ति की 22वीं पंक्ति में प्रत्यतर राज्यों की एक लम्बी सूची मिलती है जो समुद्रगुप्त की पूर्वी, उत्तरी-पूर्वी तथा पश्चिमी सीमाओं पर स्थित थे।

 राज्यवर्तमान स्थिति
 समतटपूर्वी बंगाल (बांग्लादेश) का समुद्रतटवर्ती प्रदेश
 डवाकअसम स्थित डबोक स्थान या ढाका व चटगाँव
 कामरूपअसम
 कर्त्तृपुरकुमायूँ, गढ़वाल और रूहेलखण्ड के क्षेत्र
 नेपालआधुनिक नेपाल राज्य

➣ इनके विषय में यह कहा गया है कि वे समुद्रगुप्त को सभी प्रकार के कर देते थे (सर्वकरदान), उसकी आज्ञाओं का पालन करते थे (आज्ञाकरण) तथा उसे प्रणाम करने के लिए (राजधानी में) उपस्थित होते थे (प्रणामागमन )।

 1. मालव    2. आर्जुनायन
 3. यौधेय   4. मद्रक
 5. आभीर   6. प्रार्जुन
 7. सनकानीक   8. काक
 9. खारपरिक

➣ इन गणराज्यों ने स्वेच्छा से समुद्रगुप्त की अधीनता स्वीकार की तथा इसके प्रति भी प्रत्यन्त राज्यों वाली सर्वकरदान,आज्ञाकरण, प्रणामागमन नीति अपनाई।

➣ समुद्रगुप्त के समकालीन विदेशी शासक केदार कुषाण (पेशावर), शक शासक रूद्धसिंह तृतीय एवं पूर्वी भारत का शासक मुरूण्ड आदि थे।

➣ प्रयाग प्रशस्ति की 23वीं24वीं पंक्ति के अनुसार शक, कुषाण आदि विदेशी शक्तियों ने समुद्रगुप्त की अधीनता निम्न तीन विधियों से मानी-

1. आत्म निवेदन स्वयं दरबार में उपस्थित होकर।
2. कन्योपायन अपनी पुत्रियों का गुप्त राजवंश में विवाह कर।
3. गरुत्मंदक स्वविषयभुक्तिशासनयाचना अपने विषय या भुक्ति के लिये शासनादेश प्राप्त करना ।

➣ इलाहाबाद की प्रशस्ति (प्रशंसात्मक ) अभिलेख से पता चलता है कि, समुद्रगुप्त कोई भी युद्ध नहीं हरा था। इस बहादुरी एवं युद्ध कौशलता के कारण उसे भारत का नेपोलियन कहा जाता है।

➣ समुद्रगुप्त ने सैन्य विजय के बाद एक अश्वमेघ यज्ञ किया। पूना ताम्रपत्र में उसे चिरोत्सन्न अश्वमेधाहर्ता एंव अनेकाश्वमेधयाजी कहा गया है। हालाँकि, प्रयाग प्रशस्ति में अश्वमेध यज्ञ का वर्णन नहीं है।

➣ लिच्छवी कुमारी श्रीकुमारदेवी का पुत्र होने के कारण भी उसका विशेष महत्त्व था। वह स्वयं को लिच्छवी दौहित्र कहने पर गर्व का अनुभव करता था।

सम्राज्य विस्तार

➣ समुद्रगुप्त ने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की, जो उत्तर में हिमालय से दक्षिण में विंध्य पर्वत तक तथा पूर्व में बंगाल की खाड़ी से लेकर पश्चिम में पूर्वी मालवा तक विस्तृत था। कश्मीर, पश्चिमी पंजाब, पश्चिमी राजपूताना, सिंध तथा गुजरात को छोड़कर समस्त उत्तर भारत इसमें सम्मिलित था।

➣ समुद्रगुप्त द्वारा विजित प्रदेशो को पांच भागों में विभाजित किया गया है-

प्रथम गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र ,
द्वितीयपूर्वी हिमालय के राज्यों और कुछ सीमावर्ती राज्यों के क्षेत्र जैसे- नेपाल, असम, बंगाल।
तृतीयआटविक राज्य , जो विंध्य क्षेत्र में स्थित वन क्षेत्र।
चतुर्थपूर्वी दक्कन और दक्षिण भारत के 12 शासक थे, जिन्हें पराजित कर छोड़ दिया गया। समुद्रगुप्त तमिलनाडु में कांची तक पहुँचा, जहाँ पल्लवों ने गुप्त अधीनता स्वीकार की।
पाँचवेंशकों और कुषाणों, जिनमें से कुछ अफगानिस्तान में शासन करते थे।

व्यक्तित्व

➣ समुद्रगुप्त एक उदार शासक, कुशल सेनापति और कला का संरक्षक था। एरण अभिलेख में समुद्रगुप्त की दानवीरता की तुलना पृथु एवं राघव से की गई है।

➣ वामन के काव्यालंकारसूत्र में समुद्रगुप्त का नाम चन्द्रप्रकाश है। गरूड़ मुद्राओं में समुद्रगुप्त को सौ युद्धों का विजेता कहा गया है।

➣ वह एक उच्च कोटि का कवि भी था। उसने कविराज नाम से कई कविताएँ भी लिखीं। एक सिक्के पर उसे वीणा बजाते दिखाया गया है।

➣ उसका राजकवि हरिसेण था जिसके द्वारा रचित इलाहाबाद स्तम्भ अभिलेख में समुद्रगुप्त की विजयों का वर्णन मिलता है। यह अभिलेख अशोक के अभिलेखीय स्तम्भ पर ही लिखा गया है।

इलाहाबाद के स्तम्भ लेख में समुद्रगुप्त की धर्म प्रचार बन्धु उपाधि का उल्लेख मिलता है।

➣ उसने प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु वसुबंधु को संरक्षण दिया था। वसुबन्धु ने अभिधर्मकोष लिखी। उसके दरबार में एक अन्य विद्वान असंग रहता था। जिसकी योगाचार है।

➣ उसके शासन काल में दो बौद्ध-भिक्षु बोधगया की तीर्थयात्रा के लिए आए थे। उनके अनुरोध पर सिहंल द्वीप (श्रीलंका) के राजा मेघवर्मन् ने गया में बुद्ध का मंदिर बनवाने की अनुमति प्राप्त करने के लिए समुद्रगुप्त के पास दूत भेजा था।

➣ समुद्रगुप्त के गया और नालन्दा ताम्रपत्र लेख में उसे परमभागवत कहा गया है, किन्तु फ्लीट एवं डी.सी. सरकार ने इन ताम्र पत्रों को प्रमाणित नहीं माना है।

➣ चीनी स्रोतों के अनुसार श्रीलंका के शासक मेघवर्मन ने समुद्रगुप्त के पास दूत भेज कर गया (बोधगया) में एक बौद्ध मंदिर के निर्माण की अनुमति प्राप्त की।

सिक्के

➣ समुद्रगुप्त ने विभिन प्रकार के सिक्कों चलाए। उसके सिक्कों का वर्गीकरण इस प्रकार किया गया है-

गरुड़ प्रकार इसके मुखभाग पर अलंकृत वेश-भूषा में राजा की आकृति, गरुड़ध्वज, उसका नाम और मुद्रा लेख (सैकड़ों युद्धों को जीतने और शत्रुओं का नाश करने वाला) अंकित है। पृष्ठभाग पर सिंहासनासीन देवी के साथ-साथ पराक्रमः शब्द अंकित है।
धुनर्धारी प्रकार इनके मुखभाग पर सम्राट धनुष-बाण लिए हुए खड़ा है तथा मुद्रा लेख अजेय राजा पृथ्वी को जीतकर उत्तम कर्मों द्वारा स्वर्ग को जीतता है लिखा हुआ है। पृष्ठभाग पर सिंहवाहिनी देवी के साथ उसकी उपाधि अप्रतिरथः अंकित है।
परशु प्रकारमुखभाग पर बाएं हाथ में परशु धारण किए हुए राजा का चित्र और मुद्रा लेख कृतांत परशु राजा, राजाओं का विजेता तथा अजेय है उत्कीर्ण है। पृष्ठभाग पर देवी की आकृति तथा उसकी उपाधि कृतांत परशु अंकित है।
अश्वमेध प्रकार इसके मुखभाग पर यज्ञ यूप में बंधे हुए घोड़े का चित्र तथा मुद्रा लेख राजाधिराज पृथ्वी को जीतकर तथा अवश्मेध यज्ञ का अनुष्ठान कर स्वर्ग लोक की विजय करता है’ लिखा है। पृष्ठभाग पर राजमहिषी की आकृति के साथ-साथ अश्वमेध पराक्रमः अंकित है।
व्याघ्र हनन प्रकार मुखभाग पर धनुष-बाण से व्याघ्र का आखेट करते हुए राजा की आकृति तथा उसकी उपाधि व्याघ्र पराक्रमः अंकित है। पृष्ठभाग पर मकर वाहिनी गंगा की आकृति के साथ-साथ राजा समुद्रगुप्त उत्कीर्ण है।
वीणावादन प्रकार मुखभाग पर वीणा बजाते हुए राजा की आकृति तथा मुद्रा लेख महाराजाधिराज श्रीसमुद्रगुप्त : उत्कीर्ण हैं। पृष्ठभाग पर हाथ में कार्नकोपिया लिए हुए लक्ष्मी की आकृति अंकित है।

➣ समुद्र गुप्त के दो पुत्र थे-रामगुप्त,चंद्रगुप्त। समुद्र गुप्त के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र रामगुप्त मगध का सम्राट हुआ।

रामगुप्त : अल्पकालीन विवादित शासक

➣ समुद्रगुप्त के बाद उसका बड़ा पुत्र रामगुप्त गुप्तवंश का अगला शासक बना, किंतु वह एक अयोग्य शासक साबित हुआ। गुप्त अभिलेखों की वंशावली में रामगुप्त का उल्लेख नहीं है।

रामचंद्र गुणचंद्र कृत नाटक दपर्ण से ज्ञात होता है कि रामगुप्त समुद्रगुप्त का उत्तराधिकारी था।

➣ रामगुप्त का विवाह ध्रुवदेवी के साथ हुआ था। ध्रुवस्वामिनी देवी को प्राप्त करने के लिए शको ने आक्रमण किया। हिमालय की उपत्यका में युद्ध हुआ, जिसमें रामगुप्त हार गया।

➣ दोनों के मध्य संधि हुई जिसमे एक शर्त यह भी थी कि महादेवी ध्रुवदेवी को शकराज के सुपुर्द कर दिया जाए। रामगुप्त इसके लिए भी तैयार हो गया। पर उसका छोटा भाई चंद्रगुप्त इसे सह न सका।

➣ चंद्रगुप्त ने स्वयं ध्रुवदेवी का रूप धारण किया और स्त्री वेश में शक राजा की हत्या कर दी।

➣ कालांतर में रामगुप्त का वधकर और उसकी पत्नी ध्रुवदेवी से विवाह कर चन्द्रगुप्त द्वितीय स्वयं सिंहासनारूढ़ हो गया।

विशाखदत्त कृत देवीचंद्रगुप्तम नामक नाटक में रामगुप्त नामक शासक का उल्लेख मिलता है।

➣ बाणभट्टकृत हर्षचरित, भोज की शृंगार प्रकाश, शंकराचार्य कृत हर्षचरित की टीका, राजशेखर की काव्यमीमांसा तथा अरबी लेखक अबुल हसन अली कृत मुजमल-उल-तवारीख में भी रामगुप्त का उल्लेख है।

चन्द्रगुप्त द्वितीय (380–415 ई.) : स्वर्ण युग, प्रसिद्ध विक्रमादित्य

➣ समुद्रगुप्त की प्रधान रानीदत्त देवी (अग्रमहिषी पट्टमहादेवी) से उत्पन्न चन्द्रगुप्त द्वितीय 375 ई. के लगभग शासक बना।

➣ चन्द्रगुप्त द्वितीय का दूसरा नाम देवराज या देवगुप्त था। हालाँकि धाव नाम से भी उसका उल्लेख कई स्थानों पर हुआ है।

➣ चन्द्रगुप्त द्वितीय का अन्य नाम देवश्री, देवगुप्त, देवराज आदि हैं। इसने विक्रमांक, विक्रमादित्य, नरेन्द्रचन्द्र, श्रीविक्रम सिंह, सिंह विक्रम, अजित विक्रम, परमभागवत आदि उपाधियां धारण की।

➣ चन्द्रगुप्त द्वितीय को लेखों में तत्परिगृहीत (समुद्रगुप्त द्वारा चुना हुआ) कहा गया है।

गढ़वा अभिलेख में चन्द्रगुप्त द्वितीय को परमभागवत कहा गया है। परमभागवत उपाधि धारण करने वाला वह प्रथम गुप्त सम्राट था। इसके पश्चात कुमारगुप्त प्रथम, स्कन्दगुप्त, नरसिंहगुप्त बालादित्य जैसे शासकों ने भी परमभागवत उपाधि धारण की।

चन्द्रगुप्त (विक्रमादित्य) द्वितीय परमभागवत उपाधि धारण करने वाला वह प्रथम गुप्त सम्राट था।

साम्राज्य विस्तार

➣ चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में गुप्त साम्राज्य अपने शिखर पर पहुँचा। मालवा, काठियावाड़, गुजरात और उज्जयिनी को अपने साम्राज्य में मिलाकर उसने राज्य का और भी विस्तार किया।

महरौली के लौह स्तम्भ के अनुसार उसने सिन्ध के सप्तमुखों को पार कर वाल्हीक (बल्ख) देश तक युद्ध में विजय प्राप्त की थी। पंजाब की सात नदियों यमुना, सतलुज, व्यास, रावी, चिनाब, जेलहम और सिन्धु का प्रदेश प्राचीन समय में सप्तसैन्धव कहलाता था।

विष्णु पुराण और वायु पुराण जैसे पुराणों से पता चलता है कि चन्द्रगुप्त द्वितीय ने कोसल, पुंडू (बंगाल) तथा ताम्रलिप्ति तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया।

➣ दिल्ली में महरौली के कुतुबमीनार के पास स्थित लौह स्तम्भ पर चन्द्र नाम उत्कीर्ण है, जिसे चन्द्रगुप्त द्वितीय माना जाता है, जिसके मुताबिक पश्चिमी भारत एवं बंगाल के अधिकांश भागों पर उनका आधिपत्य था।

➣ इस प्रकार साम्राज्य पश्चिम में गुजरात से लेकर, और हिन्दूकुश के पार वंक्षु नदी तक, पूर्व में बंगाल तक तथा उत्तर में हिमालय की तलहटी से दक्षिण में नर्मदा नदी तक विस्तृत था।

वैवाहिक सम्बन्ध

चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने वैवाहिक संबंधों और विजयों के द्वारा अपने साम्राज्य की सीमा बढ़ायी। उसने वाकाटक, नागवंश एवं कदम्ब राजवंश राजवंशों से वैवाहिक संबंध स्थापित किये।

नागवंश (मथुरा, अहिच्छन्न,पद्मावती क्षेत्रों में स्थित) :- विक्रमादित्य ने नाग राजकुमारी कुबेरनागा से विवाह किया। उससे एक कन्या प्रभावती गुप्त उत्पन्न हुई।

वाकाटक वंश (आधुनिक महाराष्ट्र प्रांत) :- वाकाटकों का सहयोग प्राप्त करने के लिए चन्द्रगुप्त अपनी पुत्री प्रभावती गुप्त का विवाह वाकाटक नरेश रूदसेन-द्वितीय के साथ कर दिया।

कदम्ब राजवंश [कुंतल (कर्नाटक)] :- तालगुंड अभिलेख से पता चलता है कि इस वंश के एक शासक काकुत्सवर्मन ने अपनी एक पुत्री का विवाह चन्द्रगुप्त द्वितीय के पुत्र कुमारगुप्त प्रथम से कर दिया था।

भोज एवं श्वेमेन्द्र के अनुसार कालिदास को यहाँ दूत बनाकर भेजा था। कालिदास ने कुन्तलेश्वरदोत्य की रचना यहाँ की थी।

➣ कालांतर में रुद्रसेन की मृत्यु के बाद चन्द्रगुप्त ने अप्रत्यक्ष रूप से वाकाटक राज्य को अपने राज्य में मिला लिया।

शकों पर विजय

➣ पुत्री प्रभावती गुप्त अपने पिता चन्द्रगुप्त के हितों को बढ़ावा दिया। फलत: चन्द्रगुप्त द्वितीय ने कुषाणों से मथुरा को जीत लिया।

➣ लगभग चार शताब्दियों तक शक क्षत्रपों के अधीन रहे, पश्चिमी मालवा और गुजरात पर भी उसने कब्जा कर लिया।

➣ उसने शक शासक रुद्रसिंह तृतीय को पराजित कर शकारि एवं विक्रमादित्य की उपाधि धारण की।

➣ शक विजय के फलस्वरूप उसने चांदी के व्याघ्र (सिंह निहन्ता) शैली के सिक्के चलवाए। इन चाँदी के सिक्कों का भार 32 से 36 ग्रेन तक है।

➣ उसने उज्जयिनी के अंतिम शक शासक रुद्रसिंह तृतीय को पराजित कर शकारि (शकों का विजेता) एवं विक्रमादित्य की उपाधि धारण की।

उल्लेखनीय है सदी पहले शकों का इसी प्रकार से उच्छेद कर सातवाहन सम्राट गौतमी पुत्र सातकर्णि ने भी शकारि और विक्रमादित्य की उपाधियाँ ग्रहण की थीं।

➣ भारतीय इतिहास में 14 शासकों ने विक्रमादित्य धारण की थी जिसमे चन्द्रगुप्त द्वितीय सबसे प्रसिद्ध विक्रमादित्य हैं। अंतिम विक्रमादित्य मध्यकालीन शासक हेमू(भारत का एकमात्र हिन्दू शासक जिसने दिल्ली की गद्दी पर अधिकार किया) था।

➣ शकों से छीनकर उज्जैन को साम्राज्य की दूसरी राजधानी बनायी। इसी कारण चन्द्रगुप्त द्वितीय को उज्जैनपुरवराधीश्वर भी कहा जाता है।

➣ उल्लेखनीय है प्रारम्भिक राजधानी पाटलिपुत्र थी। इसलिए चन्द्रगुप्त द्वितीय को पाटलिपुत्र पुरावधीश्वर भी कहा गया है।

➣ शकों पर विजय के परिणामस्वरूप पश्चिमी समुद्र तट के प्रसिद्ध बन्दरगाह भृगुकच्छ पर चन्द्रगुप्त द्वितीय का नियंत्रण स्थापित हो गया। जिससे अरब सागर एवं भूमध्य सागर के व्यापार पर गुप्तों को प्रवेश मिला।

सिक्के अथवा मुद्राए

➣ गुप्त शासकों में सर्वप्रथम चाँदी के सिक्के चलाने का श्रेय चन्द्रगुप्त द्वितीय को है। यद्यपि हाल ही में चन्द्रगुप्त प्रथम का भी एक चाँदी का सिक्का मिला है।

➣ चन्द्रगुप्त ने 8 प्रकार की मुद्रा चलाई- धनुर्धारी सिंह निहन्ता, अश्वारोही, छत्रधारी, पर्यंक स्थित राजा-रानी, ध्वजधारी, चक्र विक्रम, पर्यंक प्रकार की।

➣ चक्र विक्रम मुद्रा पर भगवान विष्णु को राजा को 3 गोल वस्तुएं देते हुए दिखाया गया है।

चक्राधारी विष्णु की आकृति चन्द्रगुप्त द्वितीय के सिक्कों पर है।

➣ चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के मुख्य अभिलेख उदयगिरि गुहा लेख, गढ़वा अभिलेख, सांची अभिलेखमथुरा शिलालेख हैं।

➣ चन्द्रगुप्त उदार और न्याय-परायण सम्राट था। उसके समय में भारतीय संस्कृति का चतुर्दिक विकास हुआ। वह स्वयं वैष्णव था, पर अन्य धर्मों के प्रति भी उदार-भावना रखता था।

➣ चन्द्रगुप्त द्वितीय का प्रधान सचिव एवं संधिविग्रहिक वीर सेन शैव धर्मावलम्बी था। जबकि उसका सेनापति आम्रकार्दव बौद्ध धर्म को मानता था।

➣ गुप्त राजाओं के काल को भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग कहा जाता है। इसका बहुत कुछ श्रेय चंद्रगुप्त विक्रमादित्य की शासन-व्यवस्था को है।

➣ उसके दरबार में नौ विद्वानों की एक मंडली निवास करती थी, जिसे नवरत्न कहा गया है। चन्द्रगुप्त द्वितीय के दरबार में 9 रत्न थे-

रत्नसबंधित क्षेत्र रचना /कृति
1. कालिदासनाटक एवं काव्यअभिज्ञानशाकुंतलम , मेघदूत
2. धन्वन्तरिचिकित्सा औषधि, आयुर्वेद
3. क्षपणकज्योतिष विद्या ज्योतिष शास्त्र
4. अमर सिंहशब्दकोषसंहिता, अमरकोश
5. शंकुशिल्पशास्त्रवास्तुकला
6. वेतल भट्टजादूमंत्रशास्त्र
7. हरिषेण कवि कविता
8. वराहमिहिरखगोल विज्ञानज्योतिष, वृहदसंहिता
9. वररुचिव्याकरणव्याकरण (संस्कृत)

चन्द्रगुप्त II का काल साहित्य और कला का स्वर्ण युग कहा जाता है।

➣ चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय में पाटलिपुत्र एवं उज्जैयिनी विद्या के प्रमुख केन्द्र थे।

➣ इसके शासक के समय में चीनी बौद्ध यात्री फाह्यान 399 ई. में भारत आया और 414 ई. तक रहा।

चीनी यात्री : फाहियान (399-414 ई.)

➣ चन्द्रगुप्त II के शासनकाल में चीनी यात्री फाहियान भारत आया ।

➣ फाहियान चीन, मध्य एशिया पेशावर के स्थल मार्ग से 399 ई. में भारत आया व ताम्रलिप्ति से श्रीलंका तथा पूर्वी द्वीपों से होते हुए।

➣ समुद्री मार्ग से 414 ई. में स्वदेश लौटा। उसके वर्णन इस प्रकार हैं-

❑ मध्य देश ब्राह्मणों का देश था। यहाँ के लोग सुखी एवं संपन्न थे। लोगों को मृत्युदंड नहीं दिया जाता था, केवल आर्थिक दंड का प्रचलन था।

❑ मध्य देश के लोग किसी जीवित प्राणी की हत्या नहीं करते थे तथा मांस, मदिरा, प्याज तथा लहसुन आदि का प्रयोग नहीं करते। थे (चंडाल-अपवाद )।

❑ उसने नालंदा, राजगृह, बोधगया, वैशाली, श्रावस्ती तथा कपिलवस्तु की भी यात्राएँ की।

❑ मध्य देश के लोग क्रय-विक्रय में कौड़ियों का प्रयोग करते थे।

➣ फाहियान ने पवित्र बौद्ध स्थानों की यात्राएँ की। सकिसा तथा श्रावस्ती में उसने अनेक स्मारक तथा भिक्षु देखे।

➣ पाटलिपुत्र में अशोक का राजमहल देखा तथा उससे इतना प्रभावित हुआ कि उसे देवताओं द्वारा निर्मित बताया।

➣ चीनी ग्रंथों में भारत को यिन-तू कहा गया है।

कुमारगुप्त प्रथम (महेन्द्रादित्य) (415–455 ई.) : नालंदा विश्वविद्यालय स्थापना

चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के पश्चात् उसका पुत्र कुमारगुप्त प्रथम, गुप्त साम्राज्य का अगला शासक बना। वह प्रधान रानी ध्रुवदेवी का पुत्र था। इसने सर्वाधिक समय तक शासन (40 वर्ष) किया।

➣ कुमारगुप्त प्रथम ने महेन्द्रादित्य, श्रीमहेन्द्र, अश्वमहेन्द आदि उपाधियाँ धारण की। गढ़वा लेख (इलाहाबाद) में कुमारगुप्त-I को परमभागवत कहा गया है।

➣ कुमारगुप्त के बिलसड़ अभिलेख, मंदसौर अभिलेख, करमदंडा अभिलेख आदि से उसके शासनकाल की जानकारी मिलती है।

➣ गुप्त शासकों में सर्वाधिक 18 अभिलेख एवं सर्वाधिक 14 प्रकार के सिक्के कुमारगुप्त प्रथम के मिले हैं।

➣ उसके सुव्यवस्थित शासन का वर्णन उसके मंदसौर अभिलेख से मिलता है। यह अभिलेख एक प्रशस्ति के रूप में है जिसकी रचना वत्सभट्टि ने की थी।

➣ चन्द्रगुप्त द्वितीय ने अपने पुत्र कुमारगुप्त प्रथम का विवाह कदम्ब वंश के शासक काकुत्सवर्मन की पुत्री के साथ किया था।

मुद्राएं

➣ गुप्त शासकों में सर्वाधिक स्वर्ण मुद्राएं कुमारगुप्त ने जारी की।

मध्य भारत (गंगाघाटी) में चांदी के सिक्कों का प्रचलन कुमारगुप्त प्रथम ने किया। पश्चिमी भारत में चन्द्रगुप्त द्वितीय को यह श्रेय जाता है।

➣ कुमारगुप्त ने मुद्राओं पर गरुड़ के स्थान पर मयूर की आकृति उत्कीर्ण कराई। इस प्रकार की मुद्रा के मुख भाग पर मयूर को खिलाते हुए राजा की आकृति तथा पृष्ठ भाग पर आसीन कार्तिकेय की आकृति उत्कीर्ण है।

➣ कुमारगुप्त प्रथम ने अप्रतिघ प्रकार, गजारूढ़ प्रकार, खड़ग निहन्ता प्रकार और खड़ग प्रकार की मुद्राएं चलवाई। खड़ग निहन्ता प्रकार में कुमारगुप्त को गैंडा मारते हुए दिखाया है।

➣ उसके स्वर्ण सिक्कों पर उसे गुप्तकुलामल चन्द्र एवं गुप्तकुल व्योमशशि कहा गया है।

➣ इनमें मयूर शैली की मुद्राएँ में चाँदी की कुछ मुद्राएँ सबसे पहले मध्यप्रदेश में प्राप्त हुईं।

➣ इसके समय की गुप्तकालीन स्वर्ण मुद्राओं का सबसे बड़ा ढेर बयाना मुद्राभंडार (राजस्थान के भरतपुर जिले में) से प्राप्त हुआ है, जिसमें 623 मुद्राएँ मिली हैं।

➣ कुमारगुप्त प्रथम के स्वर्ण सिक्कों से पता चलता है कि उसने अश्वमेध यज्ञ किया, किन्तु उसके अभिलेखों में अश्वमेध यज्ञों का उल्लेख नहीं है।

धार्मिक नीति

➣ कुमारगुप्त स्वयं वैष्णव धर्मानुयायी था, किन्तु उसने धर्म-सहिष्णुता की नीति का पालन कर सभी धर्मो को आश्रय दिया। उसके उदयगिरि के अभिलेख में पार्श्वनाथ के मूर्ति निर्मांण का भी वर्णन है।

➣ ह्वेनत्सांग का शक्रादित्य की पहचान कुमारगुप्त महेन्द्रादित्य से की गयी है इसलिए उसे नालन्दा विश्वविद्यालय (ऑक्सफोर्ड ऑफ महायान) का संस्थापक भी कहा गया है।

➣ कुमारगुप्त के अंतिम दिनों में साम्राज्य पर दो आक्रमण हुए थे। पहला आक्रमण नर्मदा नदी और विध्यांचल पर्वतवर्ती(मध्य प्रदेशीय क्षेत्रों) में बसने वाली पुष्यमित्र नाम की किसी जाति का था।

➣ दूसरा आक्रमण हूणों का था, जो संभवत उसके जीवन के अंतिम वर्ष में हुआ था। हूणों ने गंधार (पाकिस्तान व अफगानिस्तान क्षेत्र) पर क़ब्ज़ा कर गंगा की ओर बढ़ना प्रारंभ कर दिया था।

➣ स्कंदगुप्त आक्रमणकारियों को मार गिराने में सफल हुआ। दोनों आक्रमणों को राजकुमार स्कंदगुप्त ने सफलतापूर्वक रोका। इसका उल्लेख स्कन्दगुप्त के भीतरी अभिलेख में मिलता है।

➣ गुप्त वंश की शक्ति उसके शासन काल में अपनी चरम सीमा पर पहुँच गई थी। मंदसौर अभिलेख में कुमारगुप्त के लिए लिखा है कि चारों ओर समुद्र से घिरे पृथ्वी के भाग पर उसका शासन था।

प्रमुख अभिलेख

➣ उसने गुप्त शासकों में सर्वाधिक 18 अभिलेख जारी किये। कुमार गुप्त प्रथम पहला गुप्त शासक है, जिसके अभिलेख बंगाल से मिले हैं।

➣ अभिलेखों में उसे परमदैवत, परमभट्टारक, महाराजाधिराज, अश्वमेघमहेंद्र, महेंद्रादित्य, श्रीमहेंद्र, महेंद्रसिंह कहा गया है।

वत्सभट्टि द्वारा लिखित मन्दसौर प्रशस्ति से (473 ई.) कुमारगुप्त प्रथम के शासन की जानकारी मिलती है। यह अभिलेख कुमारगुप्त द्वितीय के समय का है।

करमदण्डा लेख (फैजाबाद) के अनुसार इसके सन्धिविग्रह पृथ्वीसेन ने शिव प्रतिमा स्थापित कराके पृथ्वीश्वर शिवलिंग स्थापित करवाया।

मानकुंवर लेख (इलाहाबाद) में बुद्धमित्र द्वारा बुद्ध प्रतिमा स्थापित करवाये जाने का उल्लेख है।

उदयगिरि लेख (मध्यप्रदेश) में शंकर नामक व्यक्ति द्वारा पार्श्वनाथ की मूर्ति स्थापित किए जाने का उल्लेख है।

भितरी अभिलेख के अनुसार स्कन्दगुप्त ने हूणों को पराजित करके क्रमादित्य व विक्रमादित्य की उपाधियां धारण की।

मदंसौर प्रशस्ति/दशपुर प्रशस्ति मालव नरेश यशोवर्मन की भी है, जिसका लेखक वासुल था। मन्दसौर अभिलेख में सुमेरू पर्वत एवं कैलाश पर्वत का भी उल्लेख है।

मन्दसौर प्रशस्ति के अनुसार मन्दसौर (मालवा) का राज्यपाल बन्धुवर्मा था। इसमें बधुवर्मा द्वारा सूर्य मन्दिर के निर्माण का भी उल्लेख है।

तुमैन अभिलेख (ग्वालियर- म.प्र.) जो 435 ई. का है, इसमें कुमार गुप्त प्रथम को शरद्कालीन सूर्य की भांति बताया गया है।

स्कन्दगुप्त(455–468 ई.) : हूणों का विजेता, शक्रादित्य

➣ स्कन्दगुप्त गुप्त वंश का अन्तिम प्रतापी शासक था। उसने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया।

➣ स्कन्दगुप्त ने किसी नए प्रदेश को जीतकर गुप्त साम्राज्य का विस्तार नहीं किया। सम्भवतः इसकी आवश्यकता भी नहीं थी।

भीतरी स्तंभलेख के अनुसार स्कन्दगुप्त को गद्दी पर बैठते ही हूणों के आक्रमण का सामना करना पड़ा। जूनागढ़ अभिलेख के अनुसार स्कंदगुप्त ने हूणों के आक्रमण को विफल कर दिया था।

➣ स्कंदगुप्त को कहोम स्तम्भ लेख में शक्रादित्य, भितरी अभिलेख में विक्रमादित्य तथा स्वर्ण सिक्कों पर क्रमादित्य कहा गया है।

➣ स्कन्दगुप्त के शासन काल की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना हूणों की पराजय है। स्कन्दगुप्त के समय में हूण गान्धार से आगे नहीं बढ़ सके। गुप्त साम्राज्य का वैभव उसके शासन काल में प्रायः अक्षुण्ण रहा।

स्कन्दगुप्त यूरोप व एशिया का पहला शासक था जिसने हूणों को परास्त किया।

जूनागढ़ लेख में समय गणना (काल गणना) सम्बन्धी साक्ष्य व सुदर्शन झील (गिरनार) का स्कन्दगुप्त द्वारा पुनर्निर्माण का उल्लेख है।

➣ सुदर्शन झील का पुनर्निर्माण सौराष्ट्र के गवर्नर पर्णदत्त के पुत्र चक्रपालित की देखरेख में हुआ। उसने झील के किनारे एक विष्णु मन्दिर का निर्माण भी करवाया।

➣ इस झील का निर्माण मूलतः चन्द्रगुप्त मौर्य के गवर्नर पुष्यगुप्त वैश्य ने किया था, बाद में अशोक के गवर्नर यवनराज तुषास्प तथा रूद्रदामन के गवर्नर सुविशाख ने इसकी मरम्मत करवायी।

ह्वेनसांग ने नालंदा संघाराम को बनवाने वाले शासकों में शंक्रादित्य के नाम का उल्लेख किया है, जिससे स्कंदगुप्त द्वारा नालंदा संघाराम को सहायता देने का प्रमाण मिलता है।

➣ स्कन्दगुप्त ने चीन से राज नैतिक सम्बन्ध बनाने के लिए एक राजदूत 466 ई. में चीनी सम्राट सांग के दरबार में राजदूत भेजा था।

➣ स्कन्दगुप्त के बाद गुप्त साम्राज्य का ह्रास प्रारम्भ हो गया। इसके बाद क्रमशः पुरुगुप्त, कुमारगुप्त द्वितीय, बुद्धगुप्त, नृसिंहगुप्त बालादित्य, भानुगुप्त, कुमारगुप्त तृतीय और विष्णुगुप्त राजा हुए।

प्रमुख अभिलेख

भितरी अभिलेख गाजीपुर जिले की सैदपुर तहसील में है। इसमें पुष्यमित्रों और हूणों के साथ स्कन्दगुप्त के युद्ध का स्पष्ट वर्णन है।

जूनागढ़ अभिलेख में सुदर्शन झील (गिरनार) का स्कन्दगुप्त द्वारा पुनर्निर्माण का भी उल्लेख है।

➣ स्कन्दगुप्त को कहौम स्तम्भ लेख में शक्रोपम तथा जूनागढ़ अभिलेख में श्रीपरिक्षिप्तवक्षा कहा गया है।

कहौम अभिलेख में वर्णित है, कि भद्र नामक व्यक्ति ने 5 जैन तीर्थकरों की प्रतिमा बनवाई।

इन्दौर ताम्रपत्र में तैली श्रेणी द्वारा सूर्य पूजा एवं सूर्य मन्दिर को दान का उल्लेख है।

गढ़वा अभिलेख स्कन्दगुप्त का अन्तिम लेख है।

सिक्के

➣ स्कन्दगुप्त के काल में स्वर्ण सिक्कों का वजन बढ़कर 144 से 146 ग्रेन तक हो गया, जो गुप्तकाल में सबसे भारी सिक्के थे। इससे पूर्व गुप्त सम्राटों के समय यह 118 से 123 ग्रेन होता था।

➣ स्कन्दगुप्त के समय के सिक्कों में मिलावट भी ज्यादा थी। सबसे ज्यादा मिलावट अन्तिम गुप्त शासक विष्णुगुप्त के समय थी।

➣ स्कन्दगुप्त पश्चिमी भारत में चाँदी के सिक्कों को जारी रखने वाला गुप्त वंश का अन्तिम शासक था।

➣ स्कन्दगुप्त ने नन्दी (बैल) प्रकार की मुद्राएं चलाई।

उत्तरकालीन गुप्त शासक : पतन काल और कमजोर केंद्रीय सत्ता

➣ स्कन्दगुप्त का मृत्यु के पश्चात् गुप्त साम्राज्य का पतन प्रारम्भ हो गया। इसके पश्चात उत्तरकालीन गुप्त शासक इस प्रकार से हैं-

पुरुगुप्त
(468-473 ई.)

कुमारगुप्त द्वितीय
(473-477 ई.)

बुधगुप्त
(477-495 ई.)

नरसिंहगुप्त बालादित्य
(495-530ई.)

भानुगुप्त
(510- ई.)

वैन्यगुप्त
(507- ई.)

कुमारगुप्त तृतीय
(530-543 ई.)

विष्णुगुप्त (अंतिम शासक)
(543-550 ई.)

➣ बौद्ध धर्म अपनाने वाला प्रथम गुप्त शासक पुरूगुप्त था, जो सर्वाधिक आयु में (वृद्धावस्था) शासक बना।

पुरुगुप्त (467–476 ई.) : कमजोर शासन प्रारंभ

➣ यह कुमारगुप्त प्रथम का ही पुत्र तथा स्कंदगुप्त का सोतेला भाई था। संभवत: स्कंदगुप्त सन्तानहीन था, और उसके बाद सत्ता पुरूगुप्त के हाथों में आयी।

भीतरी मुद्रालेख में उसकी माता का नाम महादेवी अनन्ततदेवी तथा पत्नी का नाम चन्द्रदेवी मिलता है।

➣ चूंकि वह वृद्धावस्था में राजा हुआ, अतः उसका शासन अल्पकालीन रहा। उसके समय में गुप्त साम्राज्य की अव्यवस्था प्रारंभ हो गयी थी।

परमार्थकृत वसबन्धुजीवनवृत्त के अनुसार पुरूगुप्त बौद्ध मतानुयायी था। बुद्ध गुप्त को परमदैवत कहा गया है।

हूणों के आक्रमणों के समय इन्होंने फिर से अपनी शक्ति को बढ़ाना शुरू किया, स्कन्दगुप्त के मरते ही वाकाटक राजा नरेन्द्रसेन ने भी स्वंय को स्वतंत्र उदघोषित कर दिया।

कुमारगुप्त द्वितीय (473–477 ई.) : केंद्रीय सत्ता कमजोर

पुरूगुप्त का उत्तराधिकारी कुमारगुप्त द्वितीय हुआ। सारनाथ से गुप्त संवत् 154 अर्थात् 473 ई. का उसका लेख मिलता है जो बौद्ध प्रतिमा पर खुदा हुआ है।

➣ यह निश्चित रूप से पता नहीं कि वह स्कन्दगुप्त का पुत्र अथवा पुरूगुपत का था।

➣ कुमारगुप्त द्वितीय ने वाकाटक राजा से कई युद्ध किए और मालवा के प्रदेश को जीतकर फिर से अपने साम्राज्य में मिला लिया। वाकाटकों की शक्ति अब फिर से क्षीण होने लगी।

➣ अन्य गुप्त सम्राटों के समान ही कुमारगुप्त द्वितीय वैष्णव धर्म का अनुयायी था और उसे भी परम भागवत् लिखा गया है।

➣ सारनाथ लेख में भूमि रक्षति कुमारगुप्ते उत्कीर्ण मिलता है। उल्लेखनीय है कि यहां कुमारगुप्त को महाराज भी नहीं कहा गया है।

➣ ऐसा लगता है कि वह स्वतंत्र शासक न होकर पुरूगुप्त का गोप्ता था जो सारनाथ में उसके प्रतिनिधि के रूप में शासन करता था।

➣ कुमारगुप्त द्वितीय के कुछ सिक्के भी प्राप्त हुए हैं। उनमें यह अवश्य ज्ञात होता है कि उसने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की थी।

➣ लगभग 474 ई. में उसकी मृत्यु हो गई। उसका उत्तराधिकारी बुधगुप्त हुआ,

बुधगुप्त (476–495 ई.) : अंतिम मजबूत गुप्त शासक

➣ कुमारगुप्त द्वितीय के बाद बुधगुप्त शासक हुआ। प्रारंभ में विद्वानों का विचार था कि वह कुमारगुप्त का पुत्र था क्योंकि ह्वेनसांग उसके पिता का नाम शक्रादित्य बताता है।

➣ किंतु नालंदा से उसकी मुहर प्राप्त हो जाने के पश्चात् यह सिद्ध हो गया है कि वह पुरूगुप्त का पुत्र था।

➣ उसकी माता का नाम चन्द्रदेवी था। गुप्त संवत् 157 अर्थात् 477 ई. का उसका सारनाथ से लेख मिला हैं। यह उसके शासन काल की प्रथम ज्ञात तिथि है। इससे अनुमान किया जाता है कि उसने 477 ई. में अपना शासन प्रारंभ किया।

➣ सारनाथ के अतिरिक्त मध्य प्रदेश के सागर जिले में स्थित एरण से भी उसका स्तंभ लेख मिला है।

उत्तरी बंगाल के दामोदरपुर तथा पहाड़पुर से उसके ताम्रपत्र मिल हैं। इसमें गुप्त संवत् की तिथियां दी गयी हैं।

दामोदरपुर ताम्रपत्र में उसे परमभट्टारक महाराजाधिराज कहा गया है। इसके अतिरिक्त उसकी कुछ रजत मुद्रायें भी प्राप्त हुई हैं। जिन पर उसके शासन काल की अंतिम तिथि गुप्त संवत् 175 अर्थात् 495 ई. उत्कीर्ण मिलती है।

➣ अंत: ऐसा निष्कर्ष निकलता है कि बुधगुप्त ने 477 ई. से 495 ई. तक शासन किया था।

स्कंदगुप्त के उत्तराधिकारियों में बुधगुप्त सबसे अधिक शक्तिशाली राजा था जिसने एक विस्तृत प्रदेश पर शासन किया।

➣ स्वर्ण मुद्राओं पर उसकी उपाधि श्रीविक्रम मिलती है। उसके अभिलेखों से उसके कुछ प्रांतीय पदाधिकारियों की सूचना मिलती है।

➣ एरण अभिलेख से पता चलता है कि पूर्वी मालवा में मातृविष्णु उसका सामंत था।

चीनी यात्री ह्वेनसांग के विवरण से पता चलता है कि बुधगुप्त बौद्धमतानुयायी था। उसने नालंदा महाविहार को धन दान दिये थे।

➣ वह अंतिम गुप्त सम्राट था जिसने हिमालय से लेकर नर्मदा नदी तक तथा मालवा से लेकर बंगाल तक के विस्तृत भू-भाग पर शासन किया।

नरसिंहगुप्त बालादित्य (495–510 ई.) : हूणों से संघर्ष एवं बौद्ध धर्म का संरक्षक

➣ यह बुधगुप्त का छोटा भाई था जो उसकी मृत्यु के बाद शासक बना। भितरी मुद्रालेख में नरसिंहगुप्त की माता का नाम महादेवी चन्द्रदेवी मिलता है।

➣ ऐसा प्रतीत होता है कि इस समय गुप्त साम्राज्य तीन राज्यों में बंट गया था।

मगध वाले क्षेत्र में नरसिंहगुप्त राज्य करता था, मालवा क्षेत्र में भानुगुप्त जबकि बंगाल में वैन्यगुप्त ने अपना स्वतंत्र शासन स्थापित कर लिया था।

नरसिंहगुप्त इन दोनो से अधिक शक्तिशाली था। अतः मगध साम्राज्य के केन्द्रीय भाग में उसने अपना अधिकारी सुदृढ़ कर लिया। उसकी सबसे बड़ी सफलता हूणों को पराजित करना है।

हूण नरेश मिहिरकुल बड़ा क्रूर व आतातायी था। ह्वेनसांग के विवरण से पता चलता है कि उसने के राजा बालादित्य पर आक्रमण किया किन्तु पराजित हुआ और बंदी बना लिया गया।

➣ बालादित्य ने अपनी माता के कहने पर उसे मुक्त कर दिया। कालांतर में उसकी यह भारी भूल साबित हुई।

➣ नरसिंहगुप्त बौद्धमतानुयायी था। उसने बौद्ध विद्वान बसुबन्धु की शिष्यता ग्रहण की थी। उसने अपने राज्य को स्तूपों तथा विहारों से सुसज्जित करवाया था।

ह्वेनसांग, परमार्थ तथा आर्यमंजुश्रीमूलकल्प के लेखक ने उसके बौद्ध प्रेम का उल्लेख किया है। उसी के काल में वसुबन्धु का निधन हुआ था।

नालंदा मुद्रालेख में नरसिंहगुप्त को परमभागवत कहा गया है। लगता है कि बौद्ध धर्म अंगीकार कर लेने पर भी उसने अपने पूर्वजों के समान परमभागवत की उपाधि ग्रहण की थी।

➣ उल्लेखनीय है ह्वेनसांग ने जिस बालादित्य का उल्लेख किया है उसके समीकरण के विषय से मतभेद है। संभवत: वह नरसिंहगुप्त बालादित्य ही है।

भानुगुप्त (510 ई.) : पतनकालीन शासक

➣ भानुगुप्त का शासन मालवा क्षेत्र में था। सम्भवतः भानु गुप्त हूणों के विरुद्ध संघर्षरत था।

➣ भानुगुप्त का एरण से एक प्रस्तर स्तंभ-लेख प्राप्त हुआ है। यह 510 ई. का है। इसमें उसे विश्व में सर्वश्रेष्ठ वीर (जगति प्रवीरों) तथा महान् राजा कहा गया है।

➣ यह लेख उसके मित्र गोपराज का भी उल्लेख करता था। वह हूणों के विरूद्ध भानुगुप्त की ओर लड़ता हुआ मार डाला गया तथा उसकी पत्नी अग्नि में जल कर सती हो गई।

यह सती प्रथा का प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य है।

➣ बुधगुप्त के बाद पूर्वी मालवा में जो हूणसत्ता स्थापित हुई, उसी का अंत करने के लिये भानुगुप्त यह युद्ध किया और इसमें उसे सफलता प्राप्त हुई ।

➣ इतिहासकार हेमचन्द्र राय चौधरी ने इस युद्ध को स्वतंत्रता संग्राम की संज्ञा दी गयी है।

वैन्यगुप्त (507 ई.) : विघटन काल

➣ इसके विषय में जानकारी का मुख्य स्रोत गुणैधर (बांग्लादेश के कोमिल्ला में स्थित) का ताम्रपत्र है जो गुप्त संवत् 188 अर्थात् 507 ई. का है।

नालंदा से उसकी एक मुहर मिली है जिस पर महाराजाधिराज का विरूद्ध अंकित है।

गुणैधर ताम्रपत्र में उसके दो प्रांतीय शासकों (1.विजयसेन, 2.रूद्रदत्त) के नाम मिलते हैं तथा बौद्ध विहार के लिये कुछ भूमिदान दिये जाने का वर्णन है।

➣ उसके कुछ स्वर्ण सिक्के भी मिलते हैं। उसके सिक्कों पर एक ओर उसका चित्र है, जिसमें वह बाएँ हाथ में धनुष और दाएँ हाथ में बाण लिए हुए है।

➣ सिक्कों के दूसरी ओर कमलासन पर विराजमान लक्ष्मी की मूर्ति है। साथ वैण्य की उपाधि द्वादशादित्य उत्कीर्ण है।

➣ इसके शासनकाल में सोने के सिक्कों में सोने की मात्रा का फिर से बढ़ जाना यह सूचित करता है, कि उसका काल समृद्धि का काल था।

कुमारगुप्त तृतीय (530–543 ई.) : नाममात्र शासन

नरसिंहगुप्त के बाद उसका पुत्र कुमारगुप्त तृतीय मगध के सिंहासन पर बैठा।

भितरी अभिलेख तथा नालंदा मुद्रालेखों में उसकी माता का नाम महादेवी मित्रदेवी मिलता है।

दामोदरपुर के 5वे ताम्रपत्र में किसी शक्तिशाली गुप्त राजा का उल्लेख मिलता है जिसकी उपाधियां परमदैवत परमभट्टारक महाराजाधिराज मिलती है।

➣ कुमारगुप्त तृतीय ने अपने पिता नरसिंह गुप्त के समान ही सोने के सिक्के चलवाये उसके सिक्कों पर क्रमादित्य उपाधि मिलती है।

➣ इस समय सिक्कों की शुद्धता में गिरावट आने लग गयी थी। जो इस समय के गुप्त शासकों के तेज़ी से पतन की ओर जाने का संकेत करता है।

विष्णुगुप्त (543–550 ई.) : अंतिम शासक, साम्राज्य का अंत

➣ कुमारगुप्त तृतीय गुप्तवंश का अंतिम शासक था।

नालंदा से प्राप्त एक मुद्रालेख से विष्णुगुप्त का लेख मिलता है जो संभवत: उसका पुत्र था और 550 ई. तक राज्य करता रहा। इसके बाद गुप्त साम्राज्य पूर्णतया समाप्त हो गया।

➣ जिसके के बाद कई राज्यों का उदय हुआ जिनमें प्रमुख थे- उत्तर भारत में हर्षवर्धन (पुष्यभूति वंश) का राज्य और दक्षिण भारत में वातापी के चालुक्य और कांचीपुरम के पल्लवों का राज्य।

गुप्त शासकों की उपाधियाँ

श्रीगुप्तश्री , आदिराज, महाराज
घटोत्कचमहाराज
चन्द्रगुप्त-Iमहाराजाधिराज
समुद्रगुप्तविक्रमांक, कविराज, पृथिव्याम प्रतिरथ, धर्म प्राचीर बन्ध, सर्वराजोच्छेता, लिच्छवि दौहित्र, सर्वराजोच्छेता, तत्पादपरिगृहित,अश्वमेघकर्ता, पराक्रमांक, अप्रतिरथ,व्याघ्रपराक्रम
चन्द्रगुप्त-IIविक्रमादित्य, साहसांक, विक्रमांक, देवराज, शकारि,विक्रमांक, नरेन्द्रचन्द्र, श्रीविक्रम सिंह, सिंह विक्रम, अजित विक्रम, परमभागवत, तत्परिगृहीत
कुमारगुप्त-Iमहेन्द्रादित्य, महेन्द्रादित्य, श्रीमहेन्द्र, अश्वमहेन्द,परमभागवत
स्कन्दगुप्तक्रमादित्य, विक्रमादित्य, शक्रादित्य
कुमारगुप्त-IIपरम भागवत्,विक्रमादित्य
बुधगुप्तपरमभट्टारक, महाराजाधिराज, श्रीविक्रम
नरसिंहगुप्त परमभागवत
कुमारगुप्त-IIIपरमदैवत, परमभट्टारक, महाराजाधिराज, क्रमादित्य

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