गुप्तकालीन प्रमुख नाटक
| नाटक | नाटककार | नाटक का विषय |
|---|---|---|
| लविकाग्निमित्रम् | कालिदास | अग्निमित्र व मालविका की प्रेम-कथा पर आधारित। |
| विक्रमोर्वशीयम् | कालिदास | सम्राट पुरूरवा व उर्वशी अप्सरा की प्रेम-कथा पर आधारित। |
| अभिज्ञानशाकुंतलम | कालिदास | दुश्यंत व शकुंतला की प्रेम कथा पर आधारित । |
| मुद्राराक्षसम | विशाखदत्त | इस ऐतिहासिक नाटक में चन्द्रगुप्त मौर्य के मगध के सिंहासन पर बैठने की कथा का वर्णन है। |
| देवीचन्द्रगुप्तम | विशाखदत्त | इस ऐतिहासिक नाटक में चन्द्रगुप्त द्वारा शकराज का वध कर ध्रुव-स्वामिनी से विवाह का वर्णन है। |
| मृच्छकटिकम् | शूद्रक | इस नाटक में नायक चारूदत्त, नायिका वसंतसेना के अतिरिक्त राजा, ब्राह्मण, जुआरी, व्यापारी, वेश्या, चोर, धूर्तदास का वर्णन है। |
| स्वप्रवासवदत्तम | भास | इसमें महाराज उदायिन व वासवदत्ता की प्रेमकथा का वर्णन किया गया है। |
| प्रतिज्ञायौगंधरायणम् | भास | इसमें महाराज उदायिन किस तरह यौगंधरायण की सहायता से वासवदत्ता को उज्जैयिनी से लेकर भागने का वर्णन है। |
| चारूदत्तम | भास | इस नाटक का नायक चारूदत्त मूलत: भास की कल्पना है। |
गुप्तकाल में विदेशी यात्री
| विदेशी यात्री | यात्रा वृत्तांत |
|---|---|
| फाह्यान | फो-क्यो-की |
| ह्वेनसांग | सी यू-की |
| इत्सिंग | काउ-फा-काओ-सांग-चुन |
| वांग-हेन-त्से | फा-चुआन चु-लिन |
| अलबरूनी | तहकीक-ए-हिंद |
गुप्त साम्राज्य के समकालीन राजवंश
| राजवंश | स्थापना | संस्थापक | राजधानी/शासित क्षेत्र |
|---|---|---|---|
| वाकाटक राजवंश | 255 ई. 330 ई. | विंध्यशक्ति सर्वसेन | पुरिका (प्रवरपुर, महाराष्ट्र) कोंकण व विदर्भ क्षेत्र वत्सगुल्म (आधुनिक बसीम, अकोला, महाराष्ट्र); विदर्भ क्षेत्र |
| नाग राजवंश | 305 ई. | भवनाग | पद्मावती (आधुनिक मदम पवाया, ग्वालियर, मध्य प्रदेश) |
| त्रैकूटक राजवंश | 415 ई. | इंद्रदत्त | अनिरूद्धपुर (नासिक, महाराष्ट्र) |
| हूण राजवंश | 500 ई. | तोरमाण | पंजाब क्षेत्र |
| शालकायन राजवंश | 300 ई. | देववर्मन | वेंगी (पेडुवेगी, गोदावरी जिला, महाराष्ट्र); निचली गोदावरी व कृष्णा के बीच का क्षेत्र |
| विष्णु कुंडिन राजवंश | 475 ई. | विक्रमेन्द्र-I | विष्णुकुंडीन (कृष्णा , आन्ध्र-प्रदेश) |
| माथुर राजवंश | 325 ई., 350 | अच्युत, शंकरवर्मन | पिष्टपुर (कलिंग, उड़ीसा), कलिंग क्षेत्र |
गुप्तकालीन शासक के अभिलेख
| समुद्रगुप्त | प्रयाग प्रशस्ति, एरण प्रशस्ति, नालंदा, गया ताम्र शासन लेख। |
| चन्द्रगुप्त द्वितीय | मथुरा स्तंभलेख, उदयगिरी का प्रथम और द्वितीय गुहा लेख, गढ़वा का प्रथम शिलालेख, सांची शिलालेख, महरौली प्रशस्ति। |
| कुमारगुप्त प्रथम | बिल्सड़ स्तंभलेख, गढ़वा का द्वितीय शिलालेख, गढ़वा का तृतीय शिलालेख, उदयगिरी का तृतीय गुहलेख, धनदैह अभिलेख, मथुरा का जैन मूर्ति लेख, तुमैन शिलालेख, मंदसौर शिलालेख, कर्मदंडा लिंगलेख, कुलाईकुरी ताम्रलेख, दामोदरपुर प्रथम एवं द्वितीय ताम्रलेख, बैग्राम ताम्रलेख, मानकुंवर बुद्धमूर्ति लेख। |
| स्कंदगुप्त | जूनागढ़ प्रशस्ति, कहांव स्तंभलेख, सुपिया स्तंभलेख, इंदौर ताम्रलेख, भितरी स्तंभलेख। |
| कुमारगुप्त द्वितीय | सारनाथ बुद्धमूर्ति लेख। |
| पुरुगुप्त एवं उसका पुत्र | बिहार स्तंभलेख। |
| बुद्धगुप्त | सारनाथ बुद्धमूर्ति लेख, पहाड़पुर ताम्रलेख, राजघाट (वाराणसी) स्तंभलेख, नंदपुर ताम्रलेख। |
| वैन्यगुप्त | गुनईधर (टिपरा) ताम्रलेख। |
| भानुगुप्त | एरण स्तंभलेख। |
| विष्णुगुप्त | पंचम दामोदरगुप्त ताम्रलेख। |
➣ गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम के सबसे ज्यादा अभिलेख 18 प्राप्त हुए हैं।
प्रमुख अभिलेख/लेख
| जूनागढ़ अभिलेख | इस अभिलेख से पता चलता है कि स्कन्दगुप्त ने हूणों को परास्त कर सौराष्ट्र प्रांत में पर्णदत्त को अपना राज्यपाल नियुक्त किया था। |
| गिरनार अभिलेख | शक शासक रुद्रदामन (130-150 ई.) रूद्रदामन का यह अभिलेख संस्कृत गद्य में लिखा देश का प्राचीनतम अभिलेख है। अशोक के स्तंभ (इलाहाबाद) पर लिखी समुद्रगुप्त की प्रशस्ति उसके दरबारी कवि हरिषेण द्वारा लिखी गयी है। |
| मंदसौर शिलालेख | यह कुमारगुप्त द्वितीय तथा बंधुवर्धन (मालवा सम्वत् 529) के समय का शिलालेख है। |
| पिपरहवा अभिलेख | भगवान बुद्ध से संबंधित। |
| सौहगौड़ ताम्न पत्र लेख | यह तीसरी सदी ई.पू. का शुद्ध रूप से प्रशासनिक अभिलेख है। कुशीनगर के महानिर्वाण स्तूप से एक ताम्र पत्र मिला है, जिसमें 13 पंक्तियां अंकित हैं। इसमें बुद्ध के उदान सुत्त का उल्लेख किया गया है। |
| एरण स्तंभलेख | भानुगुप्त के इस अभिलेख में सर्वप्रथम सती होने का प्रमाण मिलता है। |
गुप्तकालीन प्रमुख मंदिर
| मंदिर | स्थिति | विवरण |
|---|---|---|
| सांची का मंदिर | सांची, रायसेन जिला, मध्य प्रदेश | गुप्त काल का प्रारंभिक मंदिर, छोटे आकार का तथा सपाट छत वाला। |
| तिगवा का विष्णु मंदिर | तिगवा, जबलपुर जिला, मध्य प्रदेश | गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर मकरवाहिनी गंगा एवं कूर्मवाहिनी यमुना की आकृतियाँ उत्कीर्ण हैं। |
| तिगवा का कंकाली देवी मंदिर | तिगवा, जबलपुर जिला, मध्य प्रदेश | समुद्रगुप्तकालीन मंदिर। |
| एरण का विष्णु मंदिर | एरण, सागर जिला, मध्य प्रदेश | गर्भगृह के सामने स्थापित स्तंभों पर सिंह, गज तथा नारीमुख का अलंकरण। |
| नचना-कुठार का पार्वती मंदिर | नचना-कुठार, पन्ना जिला, मध्य प्रदेश | वर्तमान में उपलब्ध मंदिरों में सर्वाधिक सुरक्षित मंदिरों में से एक। |
| भूमरा का शिव मंदिर | भूमरा, सतना जिला, मध्य प्रदेश | गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर गंगा-यमुना की आकृतियाँ उत्कीर्ण हैं। |
| पिपरिया का विष्णु मंदिर | पिपरिया, सतना जिला, मध्य प्रदेश | द्वार स्तंभ पर वराह अवतार, नवग्रह, व्याघ्रमुख, पूर्णघट तथा पन्नावली का अंकन। |
| देवगढ़ का दशावतार मंदिर | देवगढ़, ललितपुर जिला, उत्तर प्रदेश | वर्तमान में उपलब्ध मंदिरों में सर्वाधिक सुंदर। पंचायतन शैली एवं शिखर शैली का प्रारंभिक उदाहरण। मंदिर की दीवारों पर शेषशायी विष्णु, नर-नारायण, गजेन्द्रमोक्ष, रामायण एवं महाभारत के दृश्य अंकित हैं। |
| भीतरगांव का कृष्ण मंदिर | भीतरगांव, कानपुर जिला, उत्तर प्रदेश | ईंटों से निर्मित शिखरयुक्त मंदिर। दीवारें रामायण, महाभारत एवं पुराणों के आख्यानों से सज्जित हैं। |
| सिरपुर का लक्ष्मण मंदिर | सिरपुर, रायपुर जिला, छत्तीसगढ़ | ईंटों से निर्मित मंदिर। निकट में राम मंदिर एवं जानकी मंदिर के अवशेष प्राप्त हुए हैं। |
| मुकुंद दर्रा का मंदिर | मुकुंद दर्रा, कोटा जिला, राजस्थान | प्रारंभिक गुप्तकालीन मंदिर का उदाहरण। |
| नागोद का शिव मंदिर | नागोद, सतना जिला, मध्य प्रदेश | वर्तमान में उपलब्ध मंदिरों में अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित। |
| खोह का शिव मंदिर | खोह, सतना जिला, मध्य प्रदेश | — |
| मढ़ी का मंदिर | मढ़ी, जबलपुर जिला, मध्य प्रदेश | — |
| मणि नाग का मंदिर | राजगीर, नालंदा जिला, बिहार | ईंटों से निर्मित बेलनाकार संरचना वाला मंदिर। |
गुप्तकाल की महत्वपूर्ण रचनाएं
| रचना | रचनाकार |
|---|---|
| 1. ऋतुसहारम् | कालिदास |
| 2. मेघदूतम् | कालिदास |
| 3. कुमारसम्भवम् | कालिदास |
| 4. रघवशम | कालिदास |
| 5. मालविकग्निमित्रम् | कालिदास |
| 6. अभिज्ञानशाकुंतलम् | कालिदास |
| 7. विक्रमोर्वशीयम् | कालिदास |
| 8. मुद्राराक्षस | विशाखदत्त |
| 9. देवी चन्द्रगुप्तम् | विशाखदत्त |
| 10. काव्यदर्शन | दण्डिन |
| 11. दशकुमार चरित | दण्डिन |
| 12. स्वप्नवासवदत्ता | भास |
| 13. चारूदत्ता | भास |
| 14. उरुभंग | भास |
| 15. किरातार्जुनीयम | भारवि |
| 16. योगाचार | असंग |
| 17. रावण वध | वत्सभट्टि |
| 18. अमरकोष | अमर सिंह |
| 19. चन्द्रव्याकरण | चन्द्रगोमिन |
| 20. विशुद्धिमग्ग | बुद्धघोष |
| 21. वृहत्संहिता | वराहमिहिर |
| 22. पंचसिद्धांतिका | वराहमिहिर |
| 23. ब्रह्म सिद्धांत | आर्यभट्ट |
| 24. आर्य भट्टियम | आर्यभट्ट |
| 24. सूर्य सिद्धांत | आर्यभट्ट |
| 25. न्यायावतार | सिद्धसेन |
| 26. पंचतंत्र | विष्णु शर्मा |
| 27. नीतिशास्त्र | कामदक |
| 28. कामसूत्र | वात्स्यायन |
| 29. चरक संहिता | चरक |
| 30. मृच्छकटिकम् | शूद्रक |
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विद्वान
वराहमिहिर : बृहत्संहिता के रचयिता
➣ गणितज्ञ, खगोलविद व नक्षत्रविद् जिन्होंने पंचसिद्धान्तिकी, वृहत-संहिता, वृहतजातक जैसे ग्रन्थों की रचना की।
➣ ट्रिग्नोमेट्री में संकेत टेबलों को सही बनाने के बाद इसका अब भी प्रयोग होता है, पास्कल त्रिभुज के बाइनोमियल नंबरों में एक नया आयाम जोड़ा। ब्रह्माण्ड की रचना व पृथ्वी की अक्षीय भ्रमण का ज्ञात किया।
ब्रह्मगुप्त : शून्य के सिद्धांत के लिए प्रसिद्ध
➣ गणितज्ञ व खगोलविद् जिन्होंने ब्रह्मस्फुटसिद्धान्त, खण्डखाद्य की रचना की।
➣ जीरो (0) के जनक और इसे जोड़ने-घटाने, गुणा-भाग करने के नियमों की जानकारी, जनरल लीनियर इक्वेशन का हल दिया।
➣ प्रामाणिकता-17वीं सदी से पेल्स इक्वेशन के नाम से प्रसिद्ध इक्वेशन ब्रह्मगुप्त के एक ग्रन्थ का ही फार्मूला था।
सुश्रुत : शल्य चिकित्सा के जनक
➣ सुश्रुत शल्य चिकित्सा पद्धति के प्रख्यात आयुर्वेदाचार्य थे। इन्होंने सुश्रुत संहिता नामक ग्रन्थ में शल्य क्रिया का वर्णन किया है।
➣ सुश्रुत ने ही त्वचारोपण (प्लास्टिक सर्जरी) और मोतियाबन्द की शल्य क्रिया का विकास किया था। पार्क डेविस ने सुश्रुत को विश्व का प्रथम शल्य चिकित्सक कहा था।
धन्वंतरि : आयुर्वेद के देवता
➣ इन्हें आयुर्वेद के प्रथम आचार्य व प्रवर्तक माना जाता है। इनके ग्रन्थ का नाम ध्वंतरि संहिता है।
➣ शल्य चिकित्साशास्त्र के आदि प्रवर्तक सुश्रुत और नागार्जुन इन्हीं की परम्परा में पैदा हुए थे।
चरक : चरक संहिता के रचयिता
➣ चरक एक महर्षि व आयुर्वेद विशेषज्ञ के रूप में विख्यात हैं। वे कुषाण राज्य के राजवैद्य थे।
➣ इनके द्वारा रचित चरक संहिता एक प्रसिद्ध आयुर्वेद ग्रन्थ है।
➣ इसमें रोगनाशक एवं रोगनिरोधक दवाओं का उल्लेख है तथा सोना, चाँदी, लोहा, पारा, आदि धातुओं के भस्म एवं उनके उपयोग का वर्णन मिलता है।
➣ आचार्य चरक ने आचार्य अग्निवेश के अग्निवेशतन्त्र में कुछ स्थान तथा अध्याय जोड़कर उसे नया रूप दिया जिसे आज चरक संहिता के नाम से जानते हैं।
आर्यभट्ट : महान गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री
➣ पाई का मान, ट्रिग्नोमेट्री, संख्या पद्धति आर्यभट्ट प्राचीन भारत के एक महान् गणितज्ञ खगोलविद् थे। आर्यभट्ट का जन्म 476-550 ईसा पूर्व पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) में हुआ था।
➣ उन्होंने केवल 23 वर्ष की आयु में आर्यभट्ट नामक पुस्तक की रचना की थी। उनकी दूसरी प्रसिद्ध पुस्तक आर्य सिद्धान्त है, जिसमें उन्होंने नक्षत्र विज्ञान से सम्बन्धित अनेक यन्त्रों के बारे में भी लिखा है।
➣ जीरो (0) का सही मान आर्यभट्ट ने ही निकाला था। पृथ्वी अपनी कक्षा पर घूमते हुए सूर्य का चक्कर लगाती है और चन्द्रमा पृथ्वी का चक्कर लगाता है। साथ ही चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण के कारणों का भी पता लगा लिया था।
➣ गणित का सम हल करते समय ‘पाई’ का प्रयोग किया जाता है। ‘पाई’ (22/7) का सही मान 3.1416 आर्यभट्ट ने दिया था।
(4 + 100) X 8 + 6200): 20000 = 3.1416 अब विश्व में यही π का सही प्रचलित मान है।
➣ इस महान् गणितज्ञ व खगोलविद् के नाम पर ही देश के प्रथम सेटेलाइट का नाम आर्यभट्ट रखा गया था। इस सेटेलाइट को 19 अप्रैल, 1975 को प्रक्षेपित किया गया था।
भास्कराचार्य प्रथम : आर्यभट्ट के सिद्धांतों के व्याख्याकार
➣ विश्व में सभ्यताओं के विकास के साथ ही गिनने, जोड़ने-घटाने के तरीकों के विकास में योगदान।
➣ संख्या 9 के बाद दहाई, सैकड़ा, आदि के लिए अलग से चिह्न बनाए गए थे।
➣ भारतीय गणतज्ञ भास्कर प्रथम ने 600 ईस्वी में एक छोटे से गोले को नम्बर सिस्टम जोड़ा और संख्याओं ने नया स्वरूप लेना प्रारम्भ किया।
अन्य विशेष तथ्य
गुप्तकालीन पुत्रों के प्रकार
| दत्तक | दूसरे परिवार से गोद लिया गया था। |
| औरस | पिता का वैध पुत्र। |
| उपागत | दूसरे के पुत्र को पुत्रवत समझना तथा लड़का पिता समझे। |
| कृतक | बिना किसी धार्मिक कांड के सम्पन्न किये हुए दूसरे पुत्र को अपना समझना। |
| गुधज | वह पुत्र जो अपने पिता से उत्पन्न हो कर दूसरे पिता का पुत्र हो। |
| क्षेत्रज | उस स्त्री का पुत्र जो दूसरे पुरूष से सहवास करती है। |
| करिन | कन्या से उत्पन्न पुत्र। |
| सहोध | शादी से पूर्व ही गर्भधारण जन्म दिया हो। |
| पुनर्भव | पुनर्विवाह स्त्री से उत्पन्न पुत्र को क्रय करके प्राप्त करना । |
सुदर्शन झील
➣ सुदर्शन झील का निर्माण मौर्य शासक चन्द्रगुप्त मौर्य के आदेश से सौराष्ट्र प्रात के राज्यपाल पुष्यगुप्त वैश्य ने पश्चिमी भारत में सिंचाई की सुविधा हेतु कराया था।
➣ मौर्य शासक सम्राट अशोक के समय यवनराज तुषाश्प ने झील का पुर्ननिर्माण कर उस पर बांध बनवाया था।
➣ शक महाक्षत्रप रूद्रदामन ने अपने राज्यपाल सुविशाख के नेतृत्व में इस पर निर्मित बांध का जीणोद्धार कराया था।
➣ 300 साल बाद मरम्मत आदि का काम पूरा होने पर 455-456 ई. में सुदर्शन झील भारी बरसात के कारण फिर क्षतिग्रस्त हो गई थी।
➣ कालांतर में गुप्त शासक स्कंदगुप्त के जूनागढ़ के एक शिलालेख से पता चलता है कि सौराष्ट्र के राज्यपाल (क्षत्रप) के पुत्र चक्रपालित (गिरनार का प्रशासक) ने इस बांध को पुनः जीर्णोद्धार कराया था।
नालन्दा विश्वविद्यालय
➣ यह भारत का सबसे विख्यात विश्वविद्यालय था। नालन्दा महाविहार आवासीय सहशिक्षण संस्थान का सबसे पुराना उदाहरण है। यह बिहार राजगृह के आधुनिक बड़गॉव नामक ग्राम के निकट स्थित था।
➣ नालंदा का अर्थ-कमल होता है जो ज्ञान प्रदाता का प्रतिनिधित्व करता है। ह्वेनसांग (चीनी यात्री) के अनुसार इसका संस्थापक शक्रादित्य था। अधिकांश इतिहासकारों ने शक्रादित्य की पहचान कुमारगुप्त प्रथम से की है।
➣ नालंदा विश्वविद्यालय में समय की माप के लिए जल घड़ा का प्रयोग किया जाता था तथा प्रत्येक छात्रों को विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए प्रतियोगी परीक्षा अनिवार्य थी।
➣ नरसिंह बालादित्य ने नालन्दा में 80 फीट ऊँची बुद्ध की प्रतिमा स्थापित करवाया था।
➣ सम्राट हर्ष ने नालन्दा को चारों तरफ से चहारदीवारी बनवाकर घेर दिया और यहां पर ताम्र बिहार बनवाया। हर्ष ने 100 गॉवों की आय नालन्दा के व्यय हेतु दान में दिया था।
➣ धर्मपाल ने नालन्दा का पुनरूद्धार किया और इसका व्यय पूरा करने के लिए 200 गॉव अलग कर दिया। देवपाल के समय जावा एवं सुमात्रा के शासक बालपुत्र देव ने नालन्दा मे एक मठ बनवाया।
➣ देवपाल ने नागरहार (जलालाबाद) के बौद्ध भिक्षु वीरदेव को नालन्दा अनेक विद्वानों को धार्मिक वाद विवाद में परास्त किया था।
➣ 12वीं शताब्दी में बख्तियार खिलजी ने इस विश्वविद्यालय को नष्ट कर दिया।
➣ नालन्दा में एक विशाल पुस्तकालय था जिसे धर्मगज्ज (धर्मयज्ञ) कहा जाता था। यह भारत का प्राचीनतम पुस्तकालय था। रत्नोदधि, रत्नसागर एवं रत्नरंजन इसी पुस्तकालय भाग थे।
➣ नालंदा महायान शिक्षा का केन्द्र था। शिक्षा पालि भाषा में दी जाती था। ह्वेनसांग ने यहाँ अध्यापन कार्य भी किया था।
➣ नालन्दा में चिकित्सा शास्त्र का अध्ययन सभी के लिए अनिवार्य था। हेनसांग के समय नालंदा कुलपति शीलभद्र सभी संग्रहो के ज्ञाता थे।
➣ इत्सिंग 671 ई. में नालन्दा आया। इसने नालंदा में रहकर 400 संस्कृत ग्रंथों की प्रतिलिपियाँ तैयार की। उस समय यहाँ के कुलपति राहुलमित्र थे।
सारनाथ की बुद्ध मूर्ति
➣ गुप्त काल में सारनाथ मूर्तिकला का एक बड़ा केंद्र था। इसका प्राचीन नाम ऋषिपतन (इसिपतन या मृगदाव अर्थात हिरनों का जंगल) था। आधुनिक नाम सारनाथ की उत्पत्ति सारंगनाथ (मृगों के नाथ) अर्थात् गौतम बुद्ध से हुई।
➣ इसमें बुद्ध को अपना पथ प्रवचन (धर्मचक्रप्रवर्तन) देते हुए दर्शाया गया है। इसका निर्माण काल 5वीं सदी ई. है। यह भूरे बलुआ पत्थर से बनी है।
➣ इसमें बुद्ध पद्मासन मुद्रा में बैठे हैं तथा उनके सिर के पीछे वृत्ताकार व अलंकृत प्रभामंडल है। इस प्रभामंडल के दोनों ओर उड़ते गंधर्वो की आकृतियां हैं।
➣ हाथ उपदेश देने की मुद्रा (धर्मचक्र मुद्रा) में दिखाया गया है। बुद्ध जिस सिंहासन पर बैठे हैं उसके निचले भाग में 7 मनुष्यों को दिखाया गया है। इनमें से 5 बुद्ध के प्रथम 5 अनुयायी (पंचभद्र) एवं दो दानी युगल हैं।
➣ सर्वप्रथम अशोक ने सारनाथ में धर्मराजिका स्तूप, धमेख स्तूप एवं सिंह स्तंभ का निर्माण करवाया था।
➣ कनिष्क के राज्यकाल के तीसरे वर्ष में भिक्षु बल ने यहाँ एक बोधिसत्व प्रतिमा की स्थापना की। कनिष्क ने अपने शासन-काल में न केवल सारनाथ में वरन् भारत के विभिन्न भागों में बहुत-से विहारों एवं स्तूपों का निर्माण करवाया।
➣ हर्ष के शासन-काल में ह्वेन त्सांग भारत आया था। उसने सारनाथ को अत्यंत खुशहाल बताया था। कालांतर में महमूद ग़ज़नवी (1017 ई.) के वाराणसी आक्रमण के समय सारनाथ को अत्यधिक क्षति पहुँची।
➣ पुन: 1026 ई. में सम्राट महीपाल के शासन काल में स्थिरपाल और बसन्तपाल नामक दो भाइयों ने सम्राट की प्रेरणा से काशी के देवालयों के उद्धार के साथ-साथ धर्मराजिका स्तूप एवं धर्मचक्र का भी उद्धार किया।
➣ गाहड़वाल वेश के शासन-काल में गोविंदचंद्र की रानी कुमार देवी ने सारनाथ में एक विहार बनवाया था। उत्खनन से प्राप्त एक अभिलेख से भी इसकी पुष्टि होती है।
➣ इस क्षेत्र का सर्वप्रथम विस्तृत एवं वैज्ञानिक उत्खनन एच.बी. ओरटल ने करवाया। यहाँ से मुख्य मंदिर तथा अशोक स्तंभ के अतिरिक्त बड़ी संख्या में मूर्तियाँ एवं शिलालेख मिले हैं।
➣ प्रमुख मूर्तियों में बोधिसत्व की विशाल अभिलिखित मूर्ति, आसनस्थ बुद्ध की मूर्ति, अवलोकितेश्वर, बोधिसत्व, मंजुश्री, नीलकंठ की मूर्तियाँ तथा तारा, वसुंधरा आदि की प्रतिमाएँ भी हैं।
सुल्तानगंज की बुद्ध मूर्ति
➣ बिहार के भागलपुर जिले में स्थित सुल्तानगंज से प्राप्त बुद्ध की खड़ी मुद्रा में प्राप्त मूर्ति गुप्तकालीन मूर्तियों में विशेष रूप से उल्लेखनीय है ।
➣ यह ताम्र (तांबे) से बनी है और लगभग 229 सेमी. ऊंची तथा 1 मीटर चौड़ी है। इसका भार दो टन से भी अधिक है। वर्तमान में यह मूर्ति बर्मिघम इंग्लैण्ड के संग्रहालय में सुरक्षित है।
➣ बुद्ध के बायें हाथ में संघटि (वस्त्र) है तथा उनका दायां हाथ अभयमुद्रा में है। संघटि का घेरा पैरों तक लटक रहा है। यह मूर्ति अत्यंत सजीव एवं प्रभावशाली हैं।
➣ सुल्तानगंज में स्थित यह ताम्र प्रतिमा नालंदा शैली की प्रतीत होती है। जबकि राखाल दास बनर्जी ने इसे पाटलिपुत्र शैली में निर्मित्त माना है।
बाघ गुफा की चित्रकला
➣ बाघ गुफा मध्य प्रदेश राज्य के धार जिले से 97 किमी. दूर बाघ कस्बा के निकट स्थित है। 9 बाघ कस्बा के निकट स्थित होने के कारण ये गुफाएं बाघ की गुफाएं नाम से जानी जाती हैं।
➣ ये गुफाएं बाधनी नामक बरसाती नदी, जो नर्मदा नदी की सहायक नदी है, के तट पर स्थित एक पहाड़ी को काटकर बनाई गयी हैं।
➣ वर्ष 1818 ई. में लेफ्टिनेंट डेंजरफील्ड ने इन गुफाओं की खोज की गयी थी। इन गुफाओं को बौद्ध भिक्षुओं ने चनाई थी।
➣ इसमें कुल 9 गुफ़ाएँ हैं, जिनमें से 1,7,8 और 9वीं गुफा नष्टप्राय है तथा गुफा संख्या 2 पाण्डव गुफ़ा के नाम से प्रचलित है जबकि तीसरी गुफा‘हाथीखाना और चौथी रंगमहल के नाम से जानी जाती है। इन गुफा का निर्माण सम्भवतः 5वी-6वीं शताब्दी ई. में हुआ होगा।
➣ गुफ़ा संख्या 2 का सर्व प्रसिद्ध चित्र पद्मपाणि बुद्ध का है। इस चित्र में मुखाकृति सौम्य है तथा आभूषण व पुष्पों से शरीर के भाग संसज्जित है।
➣ गुफ़ा संख्या 4 अन्य चित्रों की अनुकृतियों में आकाश में संगीत, दृश्य, हाथी एवं घोड़ों के चित्र, संगीत दृश्य तथा लता वल्लरी व रेखाचित्रों को प्रदर्शित किया गया है।
अजन्ता गुफा की चित्रकला
➣ अजन्ता गुफा महाराष्ट्र राज्य के औरंगाबाद जिले में जलगांव रेलवे स्टेशन से 52 किमी की दूरी पर अजन्ता नामक गांव के पास स्थित है। अजन्ता के नाम पर ये गुफाएँ अजन्ता की गुफाएँ कहलाती हैं।
➣ बाघोर नदी की घाटी में अवस्थित एक ऊँची पहाड़ी के ढाल को काटकर ये गुफाएँ बनाई गई हैं। ये गुफाएँ घोड़े के नाल के आकार की हैं।
➣ वर्ष 1819 ई. में मद्रास सेना के कुछ यूरोपीय सैनिकों ने इन गुफाओं की अकस्मात् खोज की थी। वर्ष 1824 ई. में जनरल जेम्स अलेक्जेण्डर ने रायल एशियाटिक सोसाइटी की पत्रिका में पहली बार इनका विवरण प्रकाशित किया था।
➣ अजन्ता के गुफाचित्र बौद्ध धर्म से सम्बन्धित हैं। इनमें प्रकृति, बुद्ध व बोधिसत्व एवं जातक कथाओं के वर्णनात्मक दृश्य मिलते हैं।
➣ अजन्ता गुफा को यूनेस्को ने विश्व विरासत स्थल की सूची में 1983 ई. में शामिल किया।
गुप्त काल : भारत का स्वर्णयुग
➣ सांस्कृतिक उपलब्धियों के आधार पर अनेक विद्वानों ने गुप्तकाल को भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग, हिंदू-पुनर्जागरण का काल एवं राष्ट्रीयता के पुनरूत्थान का युग माना है।
➣ जब गुप्त राजाओं ने भारत में पुनः राजनीतिक एकता स्थापित की, विदेशियों को पराजित किया, प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित की, धर्म, कला और साहित्य तथा ज्ञान-विज्ञान को प्रोत्साहन दिया।
| साहित्य विकास | कालिदास (भारत का शेक्सपीयर) द्वारा अभिज्ञान शाकुतलम में दुष्यत व शकुतला की प्रेम कहानी वर्णित है। इसके अलावा पंचतंत्र(विष्णु शर्मा) , कामसूत्र (वात्स्यायन) , अमरकोश (अमरसिंह) साहित्यों की रचना इसी समय हुई। |
| सती प्रथा | गुप्तकाल के एरण अभिलेख में सती प्रथा का प्रथम अभिलेखीय प्रमाण मिलता है। |
| गणित का विकास | दशमलव की खोज व शून्य का विकास, पाई का मान, त्रिकोणमिति, संख्या पद्धति आदि की खोज इसी समय हुई। आर्यभट तथा भास्कराचार्य प्रसिद्ध गणित के महान ज्ञाता थे। |
| धातु विज्ञान व् रसायन विज्ञान | नागार्जुन रसायन एंव धातु विज्ञानं के ज्ञाता थे। उन्होंने रस चिकित्सा का अविष्कार किया। पारे का अविष्कार भी इसी समय हुआ। |
| ज्योतिष विज्ञान | वराहमिहिर ने ज्योतिष क्षेत्र में पंचसिद्धांतिका, बृहत्संहिता, बृहज्जातक व लघुजातक की रचना की |
| चिकित्सा विज्ञान | 6वीं शताब्दी में वाग्भट्ट ने आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रंथ अष्टांगहृदय की रचना। चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के दरबार में आयुर्वेद का विद्वान और चिकित्सक धन्वन्तरित थे। हस्तयायुर्वेद व अश्व्शास्त पशु चिकित्सा सम्बन्धी पुस्तकें इसी काल में ही लिखी गयी। |
| शल्य चिकित्सा | शल्य चिकित्सा के प्रख्यात आयुर्वेदाचार्य सुक्ष्रुत ने सुक्ष्रुत सहिंता में शल्य चिकित्सा का वर्णन किया है सुक्ष्रुत ने ही त्वचारोपण (प्लास्टिक सर्जरी) तथा मोतियाबिंद की शल्य चिकित्सा का विकास किया। |
| शतरंज की खोज | 64 खानों और 32 मोहरों वाले शतरंज खेल की शुरुआत गुप्त साम्राज्य (320-550 ई.) के दौरान भारत में हुई थी। |
| हिन्दू धर्म का विकास | वर्तमान में प्रचलित हिन्दू धर्म का विकास इसी समय हुआ, पंचाग निर्माण (ब्रहागुप्त द्वारा) एंव व स्तूप का निर्माण भी हुआ। हिन्दू ग्रन्थ महाभारत , रामायण एंव भगवदगीता का अंतिम संकलन भी इसी समय हुआ। |
| खगोल विद्या | आर्यभट्ट ने आयभट्टीय तथा सूर्य सिद्धांत पुस्तक में पृथ्वी सूर्य के चारो ओर चक्कर लगाती है, सिद्ध किया जो यह आज भी मान्य है।, ब्रहागुप्त का प्रसिद्ध खोगोलशास्त्र सम्बन्धी पुस्तक ब्रहा सिद्धात इसी काल में लिखा गया। |
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