1. प्रयाग प्रशस्ति किसके सैन्य अभियान के बारे में जानकारी देती है?
U.P. Lower Sub. (Pre) 2004
उत्तर-(b)
प्रयाग प्रशस्ति समुद्रगुप्त के सैन्य अभियानों का विस्तृत वर्णन करती है। यह प्रशस्ति इलाहाबाद के अशोक स्तंभ पर उत्कीर्ण है और इसकी रचना समुद्रगुप्त के दरबारी कवि एवं संधिविग्रहिक हरिषेण ने संस्कृत में की थी। इसमें समुद्रगुप्त द्वारा उत्तर भारत के 9 राजाओं और दक्षिण भारत के 12 राजाओं को पराजित करने का उल्लेख है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: समुद्रगुप्त एक कुशल वीणावादक भी थे और उनके सिक्कों पर उन्हें वीणा बजाते हुए दर्शाया गया है, जो उनके बहुमुखी व्यक्तित्व का प्रमाण है। उन्होंने ‘कविराज’ की उपाधि भी धारण की थी।
2. ‘भारत का नेपोलियन’ किसे कहा जाता है ?
U.P.P.C.S. (Pre) 1990
Chhttisgarh P.C.S. (Pre) 2005
U.P. Lower Sub. (Pre) 2009
Chhttisgarh P.C.S. (Pre) 2005
U.P. Lower Sub. (Pre) 2009
उत्तर-(d)
प्रसिद्ध इतिहासकार विंसेंट स्मिथ ने अपनी पुस्तक ‘अर्ली हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ में समुद्रगुप्त को ‘भारत का नेपोलियन’ कहा है। यह उपाधि उन्हें उनकी अजेय सैन्य विजयों और विशाल साम्राज्य विस्तार के कारण दी गई। समुद्रगुप्त ने अपने पिता चंद्रगुप्त प्रथम से राजगद्दी प्राप्त की और लगभग समूचे भारतीय उपमहाद्वीप में अपना प्रभुत्व स्थापित किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: समुद्रगुप्त ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया था, जिसका प्रमाण उनके अश्वमेध प्रकार के सोने के सिक्कों से मिलता है। श्रीलंका के राजा मेघवर्ण ने समुद्रगुप्त से बोधगया में एक बौद्ध मठ बनाने की अनुमति मांगी थी, जो उनकी अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा को दर्शाता है।
3. इलाहाबाद स्तंभ अभिलेख निम्नलिखित में से किस एक से संबद्ध है?
I.A.S. (Pre) 2006
उत्तर-(c & d)
इलाहाबाद का अशोक स्तंभ मूलतः मौर्य सम्राट अशोक से संबंधित है, किंतु इसी स्तंभ पर समुद्रगुप्त के दरबारी कवि हरिषेण ने समुद्रगुप्त की विजयों का संस्कृत में प्रशंसात्मक वर्णन उत्कीर्ण कराया, जिसे ‘प्रयाग प्रशस्ति’ कहते हैं। यह गुप्त काल का सबसे महत्वपूर्ण अभिलेखीय साक्ष्य माना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इसी अशोक स्तंभ पर मुगल सम्राट जहाँगीर का एक फारसी अभिलेख भी उत्कीर्ण है, जिससे यह स्तंभ तीन अलग-अलग कालखंडों — मौर्य, गुप्त और मुगल — का साक्षी है। यह स्तंभ वर्तमान में प्रयागराज के किले में स्थित है।
4.’परम भागवत’ उपाधि धारण करने वाला प्रथम गुप्त शासक था-
U.P.P.C.S. (Pre) 2015
उत्तर-(b)
नालंदा एवं गया के ताम्रपत्र अभिलेखों के आधार पर समुद्रगुप्त को ‘परम भागवत’ उपाधि धारण करने वाला पहला गुप्त शासक माना जाता है। ‘परम भागवत’ का अर्थ है — विष्णु के परम भक्त। उल्लेखनीय है कि कुछ विद्वान और राज्य लोक सेवा आयोग इस उपाधि का श्रेय चंद्रगुप्त द्वितीय को देते हैं, जबकि UGC ने समुद्रगुप्त को इसका प्रथम धारक स्वीकार किया है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्त शासक मूलतः वैष्णव धर्म के अनुयायी थे, परंतु उन्होंने बौद्ध एवं जैन धर्म के प्रति भी सहिष्णुता का भाव रखा। समुद्रगुप्त ने बौद्ध विद्वान वसुबंधु को अपने दरबार में आश्रय दिया था।
5. निम्नलिखित में से किस गुप्त राजा का एक अन्य नाम देवगुप्त था?
U.P.P.C.S. (Mains) 2007
उत्तर-(b)
चंद्रगुप्त द्वितीय ‘विक्रमादित्य’ के अनेक नाम अभिलेखों में प्राप्त होते हैं — देवगुप्त, देवराज और देवश्री। उन्होंने शकों को पराजित कर ‘शकारि’ की उपाधि भी धारण की। चंद्रगुप्त द्वितीय का शासनकाल (375-415 ई.) गुप्त साम्राज्य का स्वर्णयुग माना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चंद्रगुप्त द्वितीय के दरबार में नवरत्न थे जिनमें महाकवि कालिदास, आयुर्वेदाचार्य धन्वंतरि और खगोलशास्त्री वराहमिहिर जैसे विद्वान शामिल थे। चीनी यात्री फाह्यान उन्हीं के शासनकाल में भारत आया था और उसने तत्कालीन भारत की सुख-समृद्धि का वर्णन किया है।
6. गुप्त वंश ने…..अवधि में शासन किया।
Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2003
उत्तर-(a)
गुप्त वंश का इतिहास लगभग 275 ई. से 550 ई. तक फैला हुआ है। वंश की स्थापना श्रीगुप्त ने की थी, परंतु वास्तविक राजनीतिक शक्ति चंद्रगुप्त प्रथम (319-335 ई.) के समय से प्रारंभ हुई, जिन्होंने ‘महाराजाधिराज’ की उपाधि सर्वप्रथम धारण की। विकल्प (a) इस दृष्टि से सर्वाधिक उपयुक्त है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्त संवत् की शुरुआत 319-320 ई. में चंद्रगुप्त प्रथम के राज्यारोहण के उपलक्ष्य में हुई मानी जाती है। गुप्त काल को भारतीय इतिहास का ‘स्वर्णयुग’ कहा जाता है क्योंकि इस युग में कला, साहित्य, विज्ञान और व्यापार का अभूतपूर्व विकास हुआ।
7. निम्नलिखित शासकों में से किस एक ने चार अश्वमेघों का संपादन किया था?
U.P.P.C.S. (Mains) 2003
U.P.P.C.S. (Mains) 2011
U.P.P.C.S. (Mains) 2011
उत्तर-(b)
वाकाटक वंश के शक्तिशाली शासक प्रवरसेन प्रथम ने चार अश्वमेध यज्ञों का सफलतापूर्वक आयोजन किया। इसके साथ ही उन्होंने अग्निष्टोम, आप्तोर्याम और वाजपेय जैसे अन्य वैदिक यज्ञ भी संपन्न किए। प्रवरसेन प्रथम ही एकमात्र वाकाटक शासक थे जिन्होंने ‘सम्राट’ की उपाधि धारण की।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वाकाटक वंश के एक अन्य शासक प्रवरसेन द्वितीय ने ‘सेतुबंध’ नामक प्राकृत काव्य की रचना की, जो रावण द्वारा सीता हरण की कथा पर आधारित है। वाकाटक वंश का गुप्त वंश से वैवाहिक संबंध भी था — चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती गुप्त का विवाह वाकाटक राजा रुद्रसेन द्वितीय से हुआ था।
8. इलाहाबाद का अशोक स्तंभ किसके शासन के बारे में सूचना प्रदान
करता है ?
U.P.P.C.S. (Spl) (Mains) 2004
उत्तर-(d)
इलाहाबाद का अशोक स्तंभ समुद्रगुप्त के शासनकाल की जानकारी का प्रमुख स्रोत है। इस स्तंभ पर उत्कीर्ण ‘प्रयाग प्रशस्ति’ में समुद्रगुप्त की सैन्य विजयों, राजनीतिक उपलब्धियों और व्यक्तिगत गुणों का वर्णन किया गया है। यह अभिलेख गुप्त काल के इतिहास का आधारभूत स्तंभ माना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इस स्तंभ पर अशोक के अभिलेखों के अतिरिक्त समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति और मुगल सम्राट जहाँगीर का लेख — कुल तीन कालों के अभिलेख एक साथ मिलते हैं। यह पॉलिश किया गया बलुआ पत्थर का स्तंभ लगभग 10.6 मीटर ऊँचा है।
9.’प्राचीन भारत का नेपोलियन’ किसे कहा जाता है ?
56th to 59th B.P.S.C. (Pre) 2015
उत्तर-(d)
विंसेंट स्मिथ द्वारा समुद्रगुप्त को ‘भारत का नेपोलियन’ एवं ‘प्राचीन भारत का नेपोलियन’ दोनों संज्ञाएं दी गई हैं। यह उपमा उनकी निरंतर विजय अभियानों और असाधारण सैन्य प्रतिभा के कारण दी गई। समुद्रगुप्त ने अपने जीवनकाल में कोई भी युद्ध नहीं हारा, इसीलिए उन्हें यह सम्मान मिला।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: समुद्रगुप्त ने अपनी दिग्विजय के दौरान पराजित राजाओं को मारने के स्थान पर उन्हें पुनः अपने राज्य सौंप दिया, जो उनकी ‘ग्रहण-मोक्षानुग्रह’ नीति कहलाती है। इस नीति के कारण ही दक्षिण भारत के राजाओं को उन्होंने केवल अधीनता स्वीकार करवाई, उनके राज्य नहीं छीने।
10. प्रथम गुप्त शासक जिसने ‘परम भागवत’ की उपाधि धारण की, वह था –
U.P.P.C.S. (Pre) 2009
उत्तर-(b)
नालंदा और गया से प्राप्त ताम्रपत्रों के साक्ष्य के आधार पर समुद्रगुप्त को ‘परम भागवत’ उपाधि धारण करने वाला पहला गुप्त शासक स्वीकार किया जाता है। यह उपाधि वैष्णव धर्म के प्रति उनकी गहरी आस्था की द्योतक है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने इसी मत को प्रामाणिक माना है, जबकि U.P. लोक सेवा आयोग ने चंद्रगुप्त द्वितीय को यह श्रेय दिया था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्त काल में वैष्णव धर्म राजधर्म के रूप में प्रतिष्ठित था। इसी काल में दशावतार की अवधारणा का विकास हुआ और विष्णु के दस अवतारों को दर्शाने वाली अनेक मूर्तियाँ तथा मंदिर निर्मित किए गए, जिनमें देवगढ़ का दशावतार मंदिर विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
11. गुप्त सम्राट, जिसने ‘हूणों’ को पराजित किया, थे-
53rd to 55th B.P.S.C. (Pre) 2011
उत्तर-(c)
स्कंदगुप्त (शासनकाल लगभग 455–467 ई.) गुप्त वंश का वह शासक था जिसने हूणों के प्रबल आक्रमण को सफलतापूर्वक विफल किया। हूणों को परास्त कर उसने साम्राज्य की रक्षा की, किंतु इस संघर्ष ने गुप्त राजकोष को भारी क्षति पहुँचाई।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: स्कंदगुप्त के जूनागढ़ (गिरनार) अभिलेख में हूणों पर उसकी विजय का गर्वपूर्ण उल्लेख है। इसके अतिरिक्त, स्कंदगुप्त ने ‘विक्रमादित्य’ और ‘क्रमादित्य’ की उपाधियाँ भी धारण की थीं, जो उसकी वीरता और विजय का प्रतीक मानी जाती हैं।
12. दिल्ली की कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद के प्रांगण में उन्नत प्रसिद्ध लौह-स्तंभ किसकी स्मृति में –
U.P.P.C.S. (Pre) 2002
उत्तर-(b)
मेहरौली (दिल्ली) स्थित यह विश्वप्रसिद्ध लौह स्तंभ ‘चंद्र’ नामक राजा की स्मृति में निर्मित है, जिसे अधिकांश इतिहासकार गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय से समीकृत करते हैं। यह स्तंभ भगवान विष्णु को समर्पित था और इसके शिखर पर गरुड़ की आकृति थी। चंद्रगुप्त द्वितीय विष्णु के परम भक्त थे, इसीलिए उन्होंने ‘परमभागवत’ की उपाधि ग्रहण की थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यह लौह स्तंभ धातुकर्म की दृष्टि से विश्व की अनूठी धरोहर है — लगभग 1,600 वर्षों से खुले वातावरण में रहने के बावजूद इसमें जंग (Rust) नहीं लगी। वैज्ञानिकों के अनुसार, इसमें प्रयुक्त लोहे में फॉस्फोरस की उच्च मात्रा और एक विशेष धातु-परत (Misawite) इसे संक्षारण से बचाती है।
13. निम्नलिखित कथन पढ़िए-
1. हरिषेण समुद्रगुप्त के दरबार का प्रसिद्ध कवि था।
2. उसने ‘देवीचंद्रगुप्तम’ महाकाव्य की रचना की।
3. वह ‘प्रयाग प्रशस्ति’ का भी रचयिता था। सही उत्तर चुनिए-
1. हरिषेण समुद्रगुप्त के दरबार का प्रसिद्ध कवि था।
2. उसने ‘देवीचंद्रगुप्तम’ महाकाव्य की रचना की।
3. वह ‘प्रयाग प्रशस्ति’ का भी रचयिता था। सही उत्तर चुनिए-
Chhattisgarh P.S.C. (Pre) 2017
उत्तर-(d)
हरिषेण समुद्रगुप्त के राजदरबार का विद्वान कवि एवं ‘संधिविग्रहिक’ (विदेश मंत्री के समकक्ष) था। उसने इलाहाबाद स्तंभ पर संस्कृत भाषा में समुद्रगुप्त की विजयों और गुणों का वर्णन उत्कीर्ण करवाया, जिसे ‘प्रयाग प्रशस्ति’ कहते हैं। ‘देवीचंद्रगुप्तम’ नाटक हरिषेण की नहीं, बल्कि विशाखदत्त की रचना है, जो रामगुप्त और चंद्रगुप्त द्वितीय से संबंधित है। अतः कथन 1 और 3 सत्य हैं, कथन 2 असत्य है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: प्रयाग प्रशस्ति गुप्तकालीन संस्कृत साहित्य की उत्कृष्ट रचनाओं में मानी जाती है। इसमें समुद्रगुप्त को ‘कविराज’ भी कहा गया है, जो यह दर्शाता है कि वे स्वयं भी उच्चकोटि के कवि थे। उनकी वीणावादन की प्रतिभा उनके सोने के सिक्कों (वीणाधर प्रकार) पर भी अंकित है।
14. हूणों ने भारत पर आक्रमण किया था-
U.P.P.C.S. (Mains) 2006
उत्तर-(c)
हूणों का पहला सुसंगठित आक्रमण स्कंदगुप्त के शासनकाल में हुआ। स्कंदगुप्त ने उन्हें बुरी तरह पराजित किया, परंतु इन युद्धों ने गुप्त साम्राज्य की आर्थिक नींव कमजोर कर दी। स्कंदगुप्त के पश्चात 5वीं–6वीं शताब्दी में हूणों ने उत्तर-पश्चिम भारत के बड़े भूभाग पर अधिकार जमा लिया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: हूण मूलतः मध्य एशिया की खानाबदोश जाति थी। भारत में इनके सबसे क्रूर आक्रमणकारी शासक तोरमाण और उसके पुत्र मिहिरकुल थे, जिन्होंने 6वीं शताब्दी में उत्तर भारत में भारी विनाश किया। अंततः यशोधर्मन (मालवा के शासक) ने मिहिरकुल को पराजित किया।
15. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए। नीचे दिए कूटों में सही उत्तर का चयन कीजिए।
सूची-I (दक्षिण भारत के समुद्रगुप्त के समकालीन नरेश) सूची-II (उनके राज्य)
A. धनंजय 1. अवमुक्त
B. नीलराज 2. कांची
C. उग्रसेन 3. कुस्तलपुर
D. विष्णुगोपा 4. पालक्का
कूट :
A B C D
सूची-I (दक्षिण भारत के समुद्रगुप्त के समकालीन नरेश) सूची-II (उनके राज्य)
A. धनंजय 1. अवमुक्त
B. नीलराज 2. कांची
C. उग्रसेन 3. कुस्तलपुर
D. विष्णुगोपा 4. पालक्का
कूट :
U.P.P.C.S. (Pre) 2018
उत्तर-(c)
प्रयाग प्रशस्ति में दक्षिणापथ के 12 राज्यों और उनके शासकों का उल्लेख है। सही सुमेलन इस प्रकार है — धनंजय : कुस्तलपुर, नीलराज : अवमुक्त, उग्रसेन : पालक्का, विष्णुगोपा : कांची। समुद्रगुप्त ने इन सभी को पराजित कर पुनः राज्य लौटा दिया, जिसे ‘ग्रहणमोक्षानुग्रह’ नीति कहा जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: समुद्रगुप्त की दक्षिण भारत नीति को इतिहासकार वी.ए. स्मिथ ने ‘धर्मविजय’ की संज्ञा दी है, जो ‘दिग्विजय’ से भिन्न है। इस नीति का उद्देश्य दक्षिण में प्रत्यक्ष प्रशासन स्थापित करना नहीं, बल्कि साम्राज्यिक प्रभुत्व और प्रतिष्ठा को सुदृढ़ करना था।
16. समुद्रगुप्त के ‘प्रयाग प्रशस्ति’ में कोसल के शासक का क्या नाम था?
Chhattisgarh P.S.C. (Pre) 2017
उत्तर-(c)
प्रयाग प्रशस्ति की 19वीं-20वीं पंक्तियों में दक्षिणापथ के 12 राज्यों का वर्णन है, जिनमें कोशल (वर्तमान छत्तीसगढ़ क्षेत्र) के शासक का नाम महेंद्र मिलता है। समुद्रगुप्त ने इन राजाओं को जीतने के बाद ‘ग्रहणमोक्षानुग्रह’ नीति के अंतर्गत उन्हें पुनः स्वतंत्र कर दिया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: उस काल में ‘कोशल’ राज्य की राजधानी श्रीपुर (वर्तमान सिरपुर, छत्तीसगढ़) थी, जो आगे चलकर शरभपुरीय और सोमवंशी राजाओं के अधीन एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक केंद्र बना। सिरपुर से प्राप्त बौद्ध एवं हिंदू स्मारक इस क्षेत्र की ऐतिहासिक समृद्धि को दर्शाते हैं।
17. कौन-सा राजवंश हूणों आक्रमण से अत्यंत विचलित हुआ?
U.P.P.C.S. (Pre) 1993
उत्तर-(c)
गुप्त राजवंश को हूणों के आक्रमणों से सर्वाधिक आघात पहुँचा। भले ही स्कंदगुप्त ने प्रारंभिक आक्रमण को विफल किया, किंतु लगातार युद्धों से गुप्त साम्राज्य की सैन्य और आर्थिक शक्ति क्षीण होती गई। इससे गुप्त साम्राज्य के पतन की प्रक्रिया तीव्र हो गई।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: हूणों के आक्रमण के प्रभाव से गुप्तकालीन नालंदा जैसे शिक्षण केंद्रों और नगरीय जीवन को भारी क्षति पहुँची। चीनी यात्री सोंगयुन (518 ई.) ने मिहिरकुल के अत्याचारों का आँखों देखा विवरण अपने यात्रा-वृत्तांत में दर्ज किया है।
18. ‘पृथिव्या प्रथम वीर’ उपाधि थी-
U.P.P.C.S(Pre) 2016
उत्तर-(a)
समुद्रगुप्त ने अश्वमेध यज्ञ की सफल समाप्ति के पश्चात ‘पृथिव्यामप्रतिरथ’ (पृथ्वी पर जिसका कोई प्रतिद्वंद्वी न हो) की उपाधि धारण की, जिसे सरल भाषा में ‘पृथिव्या प्रथम वीर’ कहा जाता है। इतिहासकार वी.ए. स्मिथ ने उनकी विजयों और बहुमुखी प्रतिभा के कारण उन्हें ‘भारत का नेपोलियन’ की संज्ञा दी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: समुद्रगुप्त को ‘कविराज’ भी कहा जाता था, क्योंकि वे संगीत और काव्य में भी निपुण थे। उनके स्वर्ण सिक्कों में ‘वीणाधर’ प्रकार के सिक्के इस बात के साक्ष्य हैं कि वे वीणावादन में भी दक्ष थे — एक सम्राट का यह असाधारण गुण इतिहास में विरल है।
19. समुद्रगुप्त के प्रयाग प्रशस्ति वाले स्तंभ पर निम्नलिखित में से किसका लेख मिलता है ?
U.P.R.O/A.R.O. (Pre) 2016
उत्तर-(a)
इलाहाबाद स्तंभ पर समुद्रगुप्त की ‘प्रयाग प्रशस्ति’ के साथ-साथ मुगल सम्राट जहांगीर का एक अभिलेख भी उत्कीर्ण है। इस स्तंभ पर अशोक का लेख, रानी का अभिलेख और जहांगीर का लेख — तीन अलग-अलग कालखंडों के अभिलेख एक साथ उपलब्ध हैं। इसे मूलतः अकबर ने कौशाम्बी से मंगवाकर इलाहाबाद किले में स्थापित कराया था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यह स्तंभ अशोककालीन स्तंभों में से एक है और इस पर उत्कीर्ण ‘रानी का अभिलेख’ अशोक की पत्नी से संबंधित माना जाता है जिसमें उनके दान-पुण्य का वर्णन है। इस एकल स्तंभ पर तीन अलग-अलग युगों के अभिलेखों का होना इसे भारतीय पुरालेख विज्ञान की दृष्टि से अत्यंत दुर्लभ और बहुमूल्य बनाता है।
20. निम्नलिखित में से किस गुप्त शासक ने हूणों पर विजय प्राप्त की ?
U.P.P.C.S. (Spl) (Mains) 2004
उत्तर-(c)
गुप्त शासकों में स्कंदगुप्त एकमात्र सम्राट था जिसने हूणों को सफलतापूर्वक पराजित किया। उसने सिंधु नदी के तट पर हूणों को निर्णायक युद्ध में हराया। हालाँकि इस विजय के पश्चात भी हूणों के आक्रमण जारी रहे और अंततः गुप्त साम्राज्य के विघटन में सहायक सिद्ध हुए।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: स्कंदगुप्त के भितरी स्तंभ अभिलेख में उसकी हूण विजय का उल्लेख काव्यात्मक शैली में किया गया है। इसमें कहा गया है कि हूणों की आँधी को रोकने के लिए स्कंदगुप्त ने धरती को अपनी भुजाओं का सहारा दिया — यह प्रशस्ति गुप्तकालीन संस्कृत साहित्य का उत्कृष्ट उदाहरण है।
21. गुप्तकाल में उत्तर भारतीय व्यापार निम्नलिखित में से किस एक पत्तन से संचालित होता था ?
U.P.P.S.C. (R.I.) 2014
I.A.S. (Pre) 1999
I.A.S. (Pre) 1999
उत्तर-(a)
गुप्तकाल में ताम्रलिप्ति (वर्तमान पश्चिम बंगाल का तामलुक) बंगाल की खाड़ी तट पर स्थित एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण बंदरगाह था। यहीं से उत्तर भारत का व्यापार दक्षिण-पूर्व एशिया, श्रीलंका, जावा, सुमात्रा और चीन जैसे देशों के साथ होता था। पश्चिमी भारत का प्रमुख बंदरगाह भृगुकच्छ (भड़ौच) था, जो पश्चिमी देशों से व्यापार का केंद्र था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: प्रसिद्ध चीनी यात्री फाह्यान ने अपनी भारत यात्रा (399-414 ई.) के दौरान ताम्रलिप्ति से ही समुद्री मार्ग द्वारा श्रीलंका की यात्रा की थी। इससे इस बंदरगाह के अंतरराष्ट्रीय महत्त्व का पता चलता है। गुप्तकाल में ताम्रलिप्ति से निर्यात होने वाली मुख्य वस्तुओं में मलमल, मसाले और हाथीदाँत प्रमुख थे।
22. किस अभिलेख से ज्ञात होता है कि स्कंदगुप्त ने हूणों को पराजित किया था?
U.P.R.O./A.R.O. (Pre) 2014
उत्तर-(a)
उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले की सैदपुर तहसील में स्थित भितरी नामक स्थान से प्राप्त भितरी स्तंभ-लेख में स्कंदगुप्त के पुष्यमित्रों और हूणों के विरुद्ध किए गए युद्धों का विस्तृत वर्णन मिलता है। हूणों का भारत पर पहला आक्रमण स्कंदगुप्त के शासनकाल (455-467 ई.) में हुआ, जिसमें वे स्कंदगुप्त से बुरी तरह परास्त हुए।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: भितरी स्तंभ-लेख में स्कंदगुप्त की तुलना देवराज इंद्र से की गई है और यह प्रशस्ति शैली में लिखा गया है। इसके अतिरिक्त, जूनागढ़ शिलालेख भी स्कंदगुप्त से संबंधित एक महत्त्वपूर्ण अभिलेख है, जिसमें सुदर्शन झील की मरम्मत का उल्लेख है — यह झील गुजरात में स्थित थी।
23. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर का चयन कीजिए :
सूची-I(शासक) सूची-II (रानियां)
A. चंद्रगुप्त 1. दत्तादेवी
B. समुद्रगुप्त 2. कुबेरनागा
C. चंद्रगुप्त द्वितीय 3. कुमारदेवी
D. कुमारगुप्त प्रथम 4. अनन्तदेवी
कूट :<
A B C D
सूची-I(शासक) सूची-II (रानियां)
A. चंद्रगुप्त 1. दत्तादेवी
B. समुद्रगुप्त 2. कुबेरनागा
C. चंद्रगुप्त द्वितीय 3. कुमारदेवी
D. कुमारगुप्त प्रथम 4. अनन्तदेवी
कूट :<
U.P.B.E.O. (Pre) 2019
उत्तर-(a)
गुप्त शासकों और उनकी रानियों का सही सुमेलन निम्नानुसार है — चंद्रगुप्त प्रथम की रानी कुमारदेवी थीं जो लिच्छवि वंश से थीं; समुद्रगुप्त की रानी दत्तादेवी थीं; चंद्रगुप्त द्वितीय की रानी कुबेरनागा थीं जो नागवंश की राजकुमारी थीं; तथा कुमारगुप्त प्रथम की रानी अनन्तदेवी थीं। अतः विकल्प (a) सही उत्तर है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चंद्रगुप्त प्रथम और लिच्छवि राजकुमारी कुमारदेवी के विवाह को गुप्त वंश के लिए एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक गठबंधन माना जाता है। इस विवाह की स्मृति में चंद्रगुप्त प्रथम ने विशेष “कुमारदेवी-चंद्रगुप्त” स्वर्ण सिक्के चलाए, जो गुप्त इतिहास में किसी रानी के नाम पर जारी पहले सिक्के थे।
24. ‘शक-विजेता’ किसे जाना जाता है?
U.P.U.D.A./ L.D.A. (Pre) 2010
उत्तर-(c)
गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय ‘विक्रमादित्य’ को ‘शक-विजेता’ कहा जाता है। उन्होंने पाँचवीं सदी के प्रथम दशक में पश्चिम भारत के अंतिम शक शासक रुद्रसिंह तृतीय को परास्त कर शक सत्ता का उन्मूलन किया। इस उपलब्धि के कारण उन्हें ‘शकारि’ (शकों का शत्रु) की उपाधि भी मिली।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शकों पर विजय के बाद चंद्रगुप्त द्वितीय ने गुजरात और काठियावाड़ के सम्पूर्ण क्षेत्र पर अधिकार कर लिया, जिससे गुप्त साम्राज्य का विस्तार पश्चिमी समुद्र तट तक हो गया और अरब सागर के बंदरगाहों से व्यापार पर नियंत्रण स्थापित हुआ। उन्होंने अपनी राजधानी पाटलिपुत्र से उज्जयिनी भी स्थानांतरित की।
25. ईसा की तीसरी शताब्दी से, जबकि हूण आक्रमण से रोमन साम्राज्य समाप्त हो गया, भारतीय व्यापारी अधिकाधिक निर्मर हो गए-
I.A.S. (Pre) 1999
उत्तर-(c)
ईसा की तीसरी शताब्दी में हूणों के आक्रमण से रोमन साम्राज्य के पतन के बाद भारत का पश्चिमी व्यापार बुरी तरह प्रभावित हुआ। इसके परिणामस्वरूप भारतीय व्यापारी दक्षिण-पूर्व एशिया — जिसमें वर्तमान इंडोनेशिया, मलेशिया, वियतनाम, कम्बोडिया आदि क्षेत्र शामिल हैं — के साथ व्यापार पर अधिकाधिक निर्भर होते गए।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इसी काल में भारतीय संस्कृति, धर्म और भाषा का दक्षिण-पूर्व एशिया में व्यापक प्रसार हुआ, जिसे इतिहासकार ‘भारतीयकरण’ (Indianization) की प्रक्रिया कहते हैं। कम्बोडिया का ‘फूनान राज्य’ और इंडोनेशिया के प्रारंभिक हिंदू-बौद्ध राज्य इसी भारतीय सांस्कृतिक प्रसार के उदाहरण हैं।
26. निम्नलिखित में से कौन सही सुमेलित नहीं है?
U.P.P.C.S. (Mains) 2017
उत्तर-(c)
प्रश्न में दिए गए विकल्पों में ‘प्रभावती गुप्ता – उदयगिरि गुहा अभिलेख’ सुमेल सही नहीं है, क्योंकि उदयगिरि गुहा अभिलेख चंद्रगुप्त द्वितीय से संबंधित है। प्रभावती गुप्ता का उदयगिरि से कोई अभिलेख प्राप्त नहीं हुआ है। शेष सुमेलन सही हैं — कुमारगुप्त I का मंदसौर अभिलेख, पतिक का तक्षशिला अभिलेख और समुद्रगुप्त का एरण अभिलेख।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: प्रभावती गुप्ता चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री थीं जिनका विवाह वाकाटक राजा रुद्रसेन द्वितीय से हुआ था। उनके पति की अल्पायु में मृत्यु के बाद प्रभावती गुप्ता ने वाकाटक साम्राज्य की प्रभावशाली शासक के रूप में राज्य संचालन किया और उनके अनेक स्वतंत्र ताम्रपत्र अभिलेख महाराष्ट्र क्षेत्र से प्राप्त हुए हैं।
27. रजत सिक्के जारी करने वाला प्रथम गुप्त शासक था-
U.P. U.D.A./L.D.A. (Spl) (Mains) 2010
उत्तर-(c)
गुप्त वंश में रजत (चांदी) के सिक्के जारी करने वाले पहले शासक चंद्रगुप्त द्वितीय ‘विक्रमादित्य’ थे। गुप्त काल में इन रजत सिक्कों को ‘रुप्यक’ या ‘रुपक’ कहा जाता था। चंद्रगुप्त द्वितीय ने शक मुद्राओं के अनुकरण पर ये रजत मुद्राएं चलाईं, क्योंकि शकों पर विजय के बाद पश्चिमी भारत के व्यापारिक क्षेत्रों में रजत मुद्राओं की परंपरा प्रचलित थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्त काल में सोने के सिक्कों को ‘दीनार’ कहा जाता था और ये अत्यंत उच्च कोटि के थे। समुद्रगुप्त के स्वर्ण सिक्कों पर उन्हें वीणा वादन करते हुए दर्शाया गया है, जो उनकी संगीत प्रियता का प्रमाण है। गुप्त काल को उनके उत्कृष्ट मुद्राशास्त्रीय योगदान के लिए भी जाना जाता है।
28. इनमें से किस गुप्त शासक ने हूणों को पराजित किया था?
U.P. Lower (Pre) 2015
उत्तर-(d)
स्कंदगुप्त (शासनकाल लगभग 455-467 ई.) वह गुप्त सम्राट थे जिन्होंने हूणों को भारत में प्रवेश करने से रोका और उन्हें बुरी तरह पराजित किया। यह जानकारी भितरी स्तंभ-लेख से प्राप्त होती है। स्कंदगुप्त की इस जीत ने कुछ समय के लिए हूणों के भारत आक्रमण को थाम दिया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: हूण मध्य एशिया की एक खानाबदोश जाति थी जिन्होंने 4थी-5वीं शताब्दी में रोमन साम्राज्य और गुप्त साम्राज्य दोनों को चुनौती दी। स्कंदगुप्त की मृत्यु के पश्चात् गुप्त साम्राज्य कमजोर पड़ता गया और तोरमाण तथा मिहिरकुल जैसे हूण शासकों ने उत्तर भारत में अपना शासन स्थापित कर लिया, जिसने गुप्त साम्राज्य के पतन को त्वरित किया।
29. प्रसिद्ध चीनी यात्री फाह्यान ने किसके शासनकाल में भारत की यात्रा की ?
63rd B.P.S.C. (Pre) 2017
उत्तर-(b)
प्रसिद्ध चीनी बौद्ध यात्री फाह्यान ने लगभग 399 ई. से 414 ई. के बीच भारत की यात्रा की, जो चंद्रगुप्त द्वितीय ‘विक्रमादित्य’ के शासनकाल में थी। फाह्यान बौद्ध ग्रंथों की प्रतिलिपि और बौद्ध तीर्थ स्थलों के दर्शन हेतु आया था। उसने अपनी यात्रा का विवरण ‘फो-क्वो-की’ नामक ग्रंथ में लिखा।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: फाह्यान के विवरण से पता चलता है कि गुप्तकाल में जनता सुखी और समृद्ध थी, राज्य में दंड व्यवस्था अत्यंत उदार थी, और मृत्युदंड का प्रचलन लगभग नहीं था। उसने मध्यदेश की जनता को विशेष रूप से सभ्य और धार्मिक बताया है। यह यात्रा विवरण गुप्तकालीन सामाजिक-धार्मिक जीवन का एक अमूल्य स्रोत है।
30. गुप्त साम्राज्य के पतन के विभिन्न कारण थे। निम्नलिखित कथनों में कौन-सा कारण नहीं था ?
उत्तर वर्ती गुप्तों का बौद्ध धर्म स्वीकार करना
Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2012
उत्तर-(d)
प्रश्न में दिए गए कारणों में ‘अरब आक्रमण’ गुप्त साम्राज्य के पतन का कारण नहीं था। भारत पर अरबों का आक्रमण 712 ई. में मुहम्मद बिन कासिम के नेतृत्व में हुआ, जो गुप्त साम्राज्य के पतन (6ठी शताब्दी) के बहुत बाद की घटना है। गुप्त साम्राज्य के पतन के वास्तविक कारणों में हूण आक्रमण, सामंतीय प्रशासनिक ढाँचा और उत्तरवर्ती गुप्त शासकों की दुर्बलता शामिल थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्त साम्राज्य के पतन में आंतरिक उत्तराधिकार संघर्ष भी एक प्रमुख कारण था। स्कंदगुप्त के बाद पुरुगुप्त, कुमारगुप्त द्वितीय, बुधगुप्त, नरसिंहगुप्त आदि कमजोर शासक हुए। 550 ई. के आसपास यशोधर्मन (मालवा के राजा) ने हूण शासक मिहिरकुल को पराजित किया, पर तब तक गुप्त साम्राज्य की केंद्रीय शक्ति पूरी तरह क्षीण हो चुकी थी।
31. प्राचीन कालीन भारत में हुई वैज्ञानिक प्रगति के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
1. प्रथम शती ईस्वी में विभिन्न प्रकार के विशिष्ट शल्य औजारों का उपयोग आम था।
2. तीसरी शती ईस्वी के आरंभ में मानव शरीर के आंतरिक अंगों का प्रत्यारोपण शुरू हो चुका था।
3. पांचवीं शती ईस्वी में कोण के ज्या का सिद्धांत ज्ञात था।
4. सातवीं शती ईस्वी में चक्रीय चतुर्भुज का सिद्धांत ज्ञात था।
निम्नलिखित कूटों के आधार पर सही उत्तर चुनिए :
1. प्रथम शती ईस्वी में विभिन्न प्रकार के विशिष्ट शल्य औजारों का उपयोग आम था।
2. तीसरी शती ईस्वी के आरंभ में मानव शरीर के आंतरिक अंगों का प्रत्यारोपण शुरू हो चुका था।
3. पांचवीं शती ईस्वी में कोण के ज्या का सिद्धांत ज्ञात था।
4. सातवीं शती ईस्वी में चक्रीय चतुर्भुज का सिद्धांत ज्ञात था।
निम्नलिखित कूटों के आधार पर सही उत्तर चुनिए :
I.A.S. (Pre) 2012
उत्तर-(c)
प्राचीन भारत में शल्य चिकित्सा का विकास प्रथम शताब्दी ईस्वी तक पर्याप्त उन्नत हो चुका था और विभिन्न विशिष्ट शल्य उपकरण प्रचलन में थे, किंतु अंग प्रत्यारोपण की अवधारणा उस युग में अस्तित्व में नहीं थी, अतः कथन 2 असत्य है। गुप्तकाल में गणित की अभूतपूर्व प्रगति हुई — 5वीं शताब्दी ईस्वी में आर्यभट्ट ने ‘आर्यभट्टीय’ तथा ‘सूर्य सिद्धांत’ जैसे ग्रंथों में त्रिकोणमिति के ज्या (Sine) और कोज्या (Cosine) के सिद्धांत प्रतिपादित किए। 7वीं शताब्दी में गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त ने अपने ग्रंथ ‘ब्रह्मस्फुटसिद्धांत’ में चक्रीय चतुर्भुज का सुप्रसिद्ध सूत्र दिया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: आर्यभट्ट ने शून्य की अवधारणा के विकास में भी योगदान दिया तथा पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने का सिद्धांत प्रस्तुत किया, जो उस युग के लिए अत्यंत क्रांतिकारी था। ब्रह्मगुप्त पहले गणितज्ञ थे जिन्होंने ऋणात्मक संख्याओं (Negative Numbers) के नियमों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया।
32. गुप्तकाल में गुजरात, बंगाल, दक्कन एवं तमिल राष्ट्र में स्थित केंद्र किससे संबंधित थे?
R.A.S./R.T.S. (Pre) 2010
उत्तर-(a)
गुप्तकाल में वस्त्रोद्योग सर्वाधिक विकसित उद्योगों में से एक था। गुजरात, बंगाल, दक्कन और तमिलनाडु के क्षेत्र अपनी उत्कृष्ट वस्त्र निर्माण परंपरा के लिए विख्यात थे। इन क्षेत्रों से निर्मित कपड़ों का व्यापार रोमन साम्राज्य सहित दक्षिण-पूर्व एशिया तक होता था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्तकाल में ‘दुकूल’ (बारीक मलमल), ‘क्षौम’ (रेशम) और ‘कार्पास’ (सूती वस्त्र) विशेष रूप से प्रसिद्ध थे। चीनी यात्री फाह्यान ने अपने विवरण में भारतीय वस्त्रों की उत्कृष्टता की चर्चा की है। बंगाल का ‘वंग’ क्षेत्र महीन मलमल के उत्पादन के लिए विशेष रूप से जाना जाता था।
33. निम्नलिखित में से कौन गुप्तकाल में अपनी आयुर्विज्ञान विषयक रचना के लिए जाना जाता है?
I.A.S. (Pre) 1996
U.P. Lower Sub. (Spl.) (Pre) 2002
U.P. Lower Sub. (Spl.) (Pre) 2002
उत्तर-(*)
इस प्रश्न में दिए गए चारों विकल्पों में से कोई भी गुप्तकाल में आयुर्विज्ञान के क्षेत्र में कार्य के लिए सुस्थापित नहीं है। सुश्रुत शल्यचिकित्सा के जनक माने जाते हैं, किंतु उनका काल लगभग 600 ई.पू. माना जाता है, जबकि गुप्त साम्राज्य का प्रारंभ तीसरी शताब्दी ईस्वी (श्रीगुप्त, लगभग 275 AD) से होता है — यह अंतर लगभग 800-1000 वर्षों का है। शूद्रक और सौमिल्ल गुप्तकालीन नाटककार थे, जबकि शौनक ऋग्वैदिक काल के ऋषि थे। बिहार लोक सेवा आयोग ने प्रारंभिक उत्तर-पत्रक में (a) माना था, किंतु यह कालक्रम की दृष्टि से सटीक नहीं है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्तकाल में धन्वंतरि चंद्रगुप्त II के नवरत्नों में सम्मिलित थे और वे आयुर्वेद के प्रमुख विद्वान थे। सुश्रुत की रचना ‘सुश्रुतसंहिता’ में 300 से अधिक शल्य क्रियाओं और 120 से अधिक शल्य उपकरणों का विस्तृत वर्णन मिलता है, जो प्राचीन चिकित्सा विज्ञान का अद्भुत उदाहरण है।
34. इनमें से कौन गुप्तकाल में औषधि के क्षेत्र में अपने कार्य के लिए जाने जाते हैं?
65th B.P.S.C. (Pre) 2019
उत्तर-(e)
उपर्युक्त विकल्पों में से कोई भी गुप्तकाल में औषधि क्षेत्र के लिए निर्विवाद रूप से उपयुक्त नहीं है। सुश्रुत (600 ई.पू.) गुप्तकाल से बहुत पूर्व के हैं, सौमिल्ल और शूद्रक साहित्यकार थे, तथा शौनक वैदिककालीन ऋषि थे। BPSC ने अंतिम उत्तर-पत्रक में (e) को सही माना है, जो ऐतिहासिक तथ्यों की दृष्टि से अधिक तर्कसंगत है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्तकाल में वाग्भट्ट ने ‘अष्टांगहृदयम्’ की रचना की जो आयुर्वेद का महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसके अलावा ‘नवनीतकम्’ नामक ग्रंथ भी इसी काल में रचा गया जिसमें औषधीय योगों का संकलन है। ये दोनों ग्रंथ प्राचीन भारतीय चिकित्सा परंपरा की समृद्धि को दर्शाते हैं।
35. लीलावती के लेखक थे-
U.P. G.I.C. प्रवक्ता, 2017
उत्तर-(c)
‘लीलावती’ की रचना 12वीं शताब्दी के महान भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री भास्कराचार्य (द्वितीय) ने की थी। यह संस्कृत में काव्यात्मक शैली में रचित गणित का उत्कृष्ट ग्रंथ है और वास्तव में उनके वृहद ग्रंथ ‘सिद्धांतशिरोमणि’ का प्रथम भाग है। इसमें अंकगणित, बीजगणित, क्षेत्रमिति आदि विषयों का सुंदर विवेचन है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: किंवदंती के अनुसार भास्कराचार्य ने यह ग्रंथ अपनी पुत्री ‘लीलावती’ को गणित पढ़ाने के लिए लिखा था। ‘सिद्धांतशिरोमणि’ के चार भाग हैं — लीलावती, बीजगणित, गोलाध्याय और ग्रहगणित। भास्कराचार्य ने ‘चक्रवाल विधि’ (Cyclic Method) का उपयोग करके द्विघात समीकरणों के हल भी प्रस्तुत किए, जो यूरोप में 600 वर्ष बाद खोजी गई।
36. निम्नलिखित में से किसका प्राचीन भारत के आयुर्वेद शास्त्र से संबंध नहीं है ?
I.A.S. (Pre) 1993
उत्तर-(b)
धन्वंतरि, चरक और सुश्रुत — तीनों आयुर्वेद के महान विद्वान थे। धन्वंतरि चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के नवरत्नों में थे और औषधिशास्त्र के प्रकांड पंडित माने जाते हैं। चरक कनिष्क के राजवैद्य थे जिन्होंने ‘चरकसंहिता’ की रचना की। सुश्रुत ने ‘सुश्रुतसंहिता’ में शल्यचिकित्सा का विस्तृत वर्णन किया। इसके विपरीत, भास्कराचार्य गणितज्ञ और खगोलशास्त्री थे — उनका आयुर्वेद से कोई संबंध नहीं था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘चरकसंहिता’ में 341 वनस्पतियों और 177 पशुज औषधियों का उल्लेख मिलता है। धन्वंतरि को हिंदू परंपरा में चिकित्सा के देवता के रूप में पूजा जाता है और उनकी जयंती ‘धनतेरस’ पर ‘राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस’ मनाया जाता है।
37. विशाखदत्त के प्राचीन भारतीय नाटक मुद्राराक्षस की विषय-वस्तु है-
I.A.S. (Pre) 2002
उत्तर-(d)
विशाखदत्त रचित ‘मुद्राराक्षस’ संस्कृत साहित्य का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक नाटक है। इसकी केंद्रीय विषय-वस्तु चंद्रगुप्त मौर्य के काल की राजनीतिक चालों, कूटनीतिक षड्यंत्रों और राजदरबारी दांव-पेचों पर आधारित है। इस नाटक में चाणक्य द्वारा मगध के मंत्री राक्षस को चंद्रगुप्त की सेवा में लाने की कुशल कूटनीति का वर्णन है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘मुद्राराक्षस’ नाम ‘मुद्रा’ (अंगूठी/मुहर) और ‘राक्षस’ (मंत्री का नाम) से मिलकर बना है — अर्थात् राक्षस की मुहर, जो नाटक की कथा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह नाटक इतिहासिक दृष्टि से मौर्यकालीन राजनीति को समझने का एक महत्वपूर्ण साहित्यिक स्रोत माना जाता है और इसमें नंद वंश के पतन का भी उल्लेख मिलता है।
38. प्राचीन भारत में देश की अर्थव्यवस्था में अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली ‘श्रेणी’ संगठन के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. प्रत्येक ‘श्रेणी’ राज्य की एक केंद्रीय प्राधिकरण के साथ पंजीकृत होती थी और प्रशासनिक स्तर पर राजा उनका प्रमुख होता था।
2.’श्रेणी’ ही वेतन, काम करने के नियमों, मानकों और कीमतों को सुनिश्चित करती थीं।
3. ‘श्रेणी’ का अपने सदस्यों पर न्यायिक अधिकार होता था।
निम्नलिखित कूटों के आधार पर सही उत्तर चुनिए :
1. प्रत्येक ‘श्रेणी’ राज्य की एक केंद्रीय प्राधिकरण के साथ पंजीकृत होती थी और प्रशासनिक स्तर पर राजा उनका प्रमुख होता था।
2.’श्रेणी’ ही वेतन, काम करने के नियमों, मानकों और कीमतों को सुनिश्चित करती थीं।
3. ‘श्रेणी’ का अपने सदस्यों पर न्यायिक अधिकार होता था।
निम्नलिखित कूटों के आधार पर सही उत्तर चुनिए :
I.A.S. (Pre) 2012
उत्तर-(c)
प्राचीन भारत में ‘श्रेणी’ व्यापारियों और शिल्पकारों के स्वायत्त संगठन थे जो आधुनिक व्यापार-संघों (Trade Guilds) जैसे कार्य करते थे। श्रेणियां अपने सदस्यों के वेतन, कार्य-नियम, मानक और मूल्य-निर्धारण स्वयं करती थीं तथा उनके आंतरिक विवादों में न्यायिक निर्णय भी देती थीं। कथन 1 असत्य है क्योंकि श्रेणियां राज्य के अधीन नहीं थीं — राजा उनके संचालन में हस्तक्षेप नहीं करता था और उनका अपना स्वतंत्र प्रमुख (श्रेष्ठी/सेट्ठि) होता था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मौर्यकालीन ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ में कौटिल्य ने श्रेणियों के विस्तृत नियमों का उल्लेख किया है। श्रेणियां बैंकिंग कार्य भी करती थीं — वे जनता से धन जमा लेती थीं और ब्याज पर ऋण देती थीं। संचालन के लिए श्रेणियों के पास अपनी मुहरें (Seals) होती थीं, जिनके पुरातात्विक साक्ष्य मिले हैं।
39. भारत ने दक्षिण-पूर्वी एशिया के साथ अपने आरंभिक सांस्कृतिक संपर्क तथा व्यापारिक संबंध बंगाल की खाड़ी के पार बना रखे थे। निम्नलिखित में से कौन-सी बंगाल की खाड़ी के इस उत्कृष्ट आरंभिक समुद्री इतिहास की सबसे विश्वसनीय व्याख्या / व्याख्याएं हो सकती है हैं ?
I.A.S. (Pre) 2011
उत्तर-(c)
भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच समुद्री संपर्क का सर्वाधिक विश्वसनीय कारण बंगाल की खाड़ी में ग्रीष्म और शीत ऋतु में दिशा बदलने वाली मानसूनी हवाएं थीं। इन हवाओं के कारण नाविक बिना अतिरिक्त प्रयास के अनुकूल समय पर आना-जाना कर सकते थे। पोत-निर्माण की श्रेष्ठता और राजकीय संरक्षण के दावे ऐतिहासिक साक्ष्यों द्वारा उतने पुष्ट नहीं हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ग्रीक नाविक हिपालस (लगभग 1 शताब्दी ई.पू.) ने मानसूनी हवाओं के इस नियमित पैटर्न की खोज का श्रेय प्राप्त किया, जिससे भारत-रोम व्यापार भी त्वरित हुआ। इस समुद्री मार्ग से भारतीय संस्कृति, हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म का प्रसार कंबोडिया, इंडोनेशिया और थाईलैंड जैसे देशों में हुआ, जिसके प्रमाण अंगकोरवाट जैसे स्मारकों में आज भी दृष्टिगोचर होते हैं।
40. निम्नलिखित में से कौन-सा बंदरगाह गुप्तकाल में उत्तर भारतीय व्यापार के लिए उपयोग किया जाता था?
65th B.P.S.C. (Pre) 2019
उत्तर-(e)
गुप्तकाल में उत्तर भारतीय व्यापार के लिए एक से अधिक बंदरगाहों का उपयोग होता था, इसलिए उत्तर (e) सही है। ताम्रलिप्ति (वर्तमान तामलुक, पश्चिम बंगाल) पूर्वी समुद्री व्यापार का प्रमुख केंद्र था जहाँ से दक्षिण-पूर्व एशिया और श्रीलंका के लिए जहाज जाते थे। भड़ौच (भृगुकच्छ) पश्चिमी तट का महत्वपूर्ण बंदरगाह था जो रोम व अरब से व्यापार के लिए प्रसिद्ध था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चीनी यात्री फाह्यान ने 5वीं शताब्दी में ताम्रलिप्ति बंदरगाह का उल्लेख किया है और यहाँ से श्रीलंका की यात्रा की थी। भड़ौच का उल्लेख यूनानी भूगोलवेत्ता टॉलेमी और ‘पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी’ जैसे रोमन ग्रंथों में ‘बैरीगाजा’ नाम से हुआ है, जो इसके अंतरराष्ट्रीय महत्व को दर्शाता है।
41. गुप्तकालीन रजत मुद्राओं को नाम दिया गया था-
I.A.S. (Pre) 1996
U.P. Lower Sub. (Spl.) (Pre) 2002
U.P. Lower Sub. (Spl.) (Pre) 2002
उत्तर-(c)
गुप्त साम्राज्य में मुद्रा व्यवस्था अत्यंत विकसित थी। चांदी के सिक्कों को ‘रूपक’ तथा सोने के सिक्कों को ‘दीनार’ कहा जाता था। गुप्त शासकों के सिक्के उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, मध्य प्रदेश, राजस्थान और ओडिशा में बड़ी संख्या में मिले हैं। सिक्कों की सबसे प्रसिद्ध प्राप्ति स्थल राजस्थान का बयाना (भरतपुर) है जहाँ से लगभग 1821 सोने के सिक्के एक साथ मिले थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: समुद्रगुप्त के सिक्कों पर वीणा वादन का दृश्य अंकित है, जो उनकी संगीत प्रेमी छवि को दर्शाता है। गुप्त सिक्कों पर लक्ष्मी की आकृति का अंकन गुप्तकालीन वैष्णव धर्म की प्रधानता को प्रमाणित करता है।
42. सती प्रथा का प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य प्राप्त हुआ है-
U.P.P.C.S. (Mains) 2010
उत्तर-(a)
सती प्रथा के सबसे पुराने अभिलेखीय प्रमाण के रूप में मध्य प्रदेश के एरण (सागर जिला) से प्राप्त 510 ई. का अभिलेख अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इस अभिलेख में भानुगुप्त के सेनापति गोपराज की पत्नी के स्वेच्छा से पति की चिता में सती होने का उल्लेख मिलता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: एरण अभिलेख गुप्तकाल का है और इसी स्थल से हूण आक्रांता तोरमाण के शासनकाल का भी एक महत्त्वपूर्ण अभिलेख प्राप्त हुआ है। सती प्रथा को कानूनी रूप से 1829 ई. में लॉर्ड विलियम बेंटिंक ने राजा राममोहन राय के प्रयासों से प्रतिबंधित करवाया था।
43. भारतीय यात्रा में ‘फाह्यान’ ने एक अस्पताल का उल्लेख किया है, यह स्थित था-
Chhattisgarh P.C.S. (Pre), 2019
उत्तर-(d)
चीनी यात्री फाह्यान लगभग 399-414 ई. के बीच चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में भारत आया था। उसने अपने यात्रा विवरण में पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना) के धनी नागरिकों द्वारा स्थापित एक धर्मार्थ अस्पताल का उल्लेख किया है, जहाँ निर्धन और असहाय रोगियों को निःशुल्क चिकित्सा, भोजन और औषधि प्रदान की जाती थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: फाह्यान का मुख्य उद्देश्य बौद्ध धर्म के पवित्र ग्रंथों की खोज करना था और वह लंका होते हुए समुद्री मार्ग से वापस चीन लौटा था। फाह्यान ने गुप्तकालीन समाज को अत्यंत सुखी, शांतिप्रिय और सुशासित बताया है तथा यह भी उल्लेख किया कि उस काल में मृत्युदंड का प्रावधान नहीं था।
44. निम्नलिखित में से किस गुप्त शासक ने सर्वप्रथम सिक्के जारी किए?
U.P.P.C.S. (Mains) 2010
U.P.P.C.S. (Pre) 2011
U.P.P.C.S. (Pre) 2011
उत्तर-(a)
गुप्त वंश के शासकों में चंद्रगुप्त प्रथम (319-335 ई.) वह पहले शासक थे जिन्होंने राजकीय सिक्के जारी किए। इनके पूर्ववर्ती शासक श्रीगुप्त और घटोत्कच के सिक्के जारी करने का कोई ठोस पुरातात्विक प्रमाण अब तक नहीं मिला है। चंद्रगुप्त प्रथम ने अपनी पत्नी कुमारदेवी (लिच्छवि राजकुमारी) के साथ संयुक्त रूप से ‘राजा-रानी प्रकार’ के स्वर्ण सिक्के जारी किए।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इन सिक्कों के एक तरफ चंद्रगुप्त और कुमारदेवी की आकृति और दूसरी तरफ सिंह पर आरूढ़ लक्ष्मी की आकृति अंकित है, जो लिच्छवि गणराज्य के साथ वैवाहिक गठबंधन के राजनीतिक महत्त्व को दर्शाती है।
45. कालिदास किसके शासनकाल में थे?
M.P.P.C.S. (Pre) 1990
उत्तर-(d)
महाकवि कालिदास चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य (375-415 ई.) के दरबार के नवरत्नों में सर्वश्रेष्ठ माने जाते थे। इनकी प्रमुख रचनाओं में अभिज्ञानशाकुंतलम्, मेघदूत, रघुवंश, कुमारसंभव, मालविकाग्निमित्र और ऋतुसंहार शामिल हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जर्मन कवि गेटे ने अभिज्ञानशाकुंतलम् पढ़कर इसे विश्व साहित्य की अमूल्य कृति बताया था। कालिदास की रचना ‘मेघदूत’ को विरह-काव्य की सर्वोत्तम रचना माना जाता है जिसमें यक्ष अपनी प्रियतमा के लिए मेघ को दूत बनाकर संदेश भेजता है।
46. चंद्रगुप्त के नौ रत्नों में से निम्न में से कौन फलित-ज्योतिष से संबंधित था?
U.P. Lower Sub. (Spl) (Pre) 2008
उत्तर-(c)
चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य के दरबार में नौ विद्वान थे जिन्हें ‘नवरत्न’ कहा जाता था। इनमें क्षपणक फलित ज्योतिष (Astrology) के विशेषज्ञ थे। नवरत्नों में कालिदास (कवि), वराहमिहिर (खगोलशास्त्री), धन्वंतरि (वैद्य), वेतालभट्ट, घटकर्पर, अमरसिंह, शंकु और वररुची भी शामिल थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अमरसिंह ने संस्कृत के प्रसिद्ध कोश ग्रंथ ‘अमरकोश’ की रचना की थी। वराहमिहिर ने ‘बृहत्संहिता’ और ‘पञ्चसिद्धान्तिका’ जैसे महत्त्वपूर्ण ज्योतिष ग्रंथों की रचना की जो आज भी भारतीय खगोलशास्त्र में संदर्भ ग्रंथ माने जाते हैं।
47. इनमें से किसने पहली बार यह व्याख्या की थी कि पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने के कारण प्रतिदिन सूर्योदय एवं सूर्यास्त होता है?
64th B.P.S.C. (Pre) 2018
उत्तर-(a)
गुप्तकाल के महान गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री आर्यभट्ट (476-550 ई.) ने सर्वप्रथम वैज्ञानिक आधार पर यह सिद्ध किया कि पृथ्वी गोल है और अपनी धुरी पर घूमती है, जिससे दिन और रात होते हैं। उनकी प्रसिद्ध कृति ‘आर्यभट्टीय’ में यह सिद्धांत प्रतिपादित किया गया है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: आर्यभट्ट ने ‘शून्य’ की अवधारणा और दशमलव प्रणाली को विकसित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने ‘π’ (पाई) का मान 3.1416 निकाला जो आधुनिक गणना के अत्यंत निकट है। भारत का पहला कृत्रिम उपग्रह ‘आर्यभट्ट’ (1975) उन्हीं के नाम पर रखा गया।
48.अधोलिखित में कौन गुप्तकालीन स्वर्ण मुद्रा है?
U.P.P.C.S. (Pre) 1992
उत्तर-(b)
गुप्तकाल में स्वर्ण मुद्रा को ‘दीनार’ कहा जाता था। यह शब्द रोमन ‘Denarius’ से व्युत्पन्न माना जाता है जो भारत के पश्चिमी व्यापारिक संपर्कों को दर्शाता है। फाह्यान के विवरण के अनुसार सामान्य जनता दैनिक लेन-देन में कौड़ियों का उपयोग करती थी जबकि बड़े व्यापारिक लेन-देन में दीनार प्रचलित था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्त शासकों ने सर्वाधिक शुद्ध और कलात्मक सोने के सिक्के जारी किए जो मौर्यकाल के सिक्कों की तुलना में बहुत अधिक परिष्कृत थे। समुद्रगुप्त के ‘अश्वमेध प्रकार’ के दीनार विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं जो उनकी साम्राज्यवादी विजयों का स्मरण कराते हैं।
49. गुप्त स्वर्ण मुद्रा को कहा जाता था-
U.P. R.O/A.R.O. (Mains) 2017
उत्तर-(b)
गुप्त साम्राज्य की स्वर्ण मुद्रा ‘दीनार’ कहलाती थी। गुप्त सम्राटों ने विभिन्न प्रकार के दीनार जारी किए जिनमें धनुर्धर प्रकार, अश्वारोही प्रकार, सिंहनिहंता प्रकार और वीणावादक प्रकार प्रमुख हैं। ये सिक्के गुप्त शासकों की विभिन्न उपलब्धियों और व्यक्तित्व को दर्शाते हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्तकालीन स्वर्ण मुद्राओं की शुद्धता लगभग 90% से अधिक थी। ‘कार्षापण’ मुख्यतः मौर्यकालीन चांदी की मुद्रा थी, जबकि ‘निष्क’ वैदिक काल की स्वर्ण मुद्रा या आभूषण था — इन्हें गुप्तकालीन मुद्रा से भ्रमित नहीं करना चाहिए।
50. गुप्तकाल में लिखित संस्कृत नाटकों में स्त्री और शूद्र बोलते थे-
I.A.S. (Pre) 1995
उत्तर-(b)
गुप्तकालीन संस्कृत नाटकों में भाषा का प्रयोग सामाजिक वर्ण-व्यवस्था के अनुसार होता था। ब्राह्मण, क्षत्रिय और उच्च वर्ण के पात्र संस्कृत में संवाद करते थे, जबकि स्त्री पात्र और शूद्र प्राकृत भाषा बोलते थे। यह व्यवस्था नाट्यशास्त्र के नियमों के अनुरूप थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: प्राकृत भाषाएँ सामान्य जनभाषाएँ थीं और इनकी अनेक बोलियाँ जैसे शौरसेनी, मागधी, महाराष्ट्री आदि प्रचलित थीं — नाटकों में पात्र की क्षेत्रीय पृष्ठभूमि के अनुसार इनका प्रयोग होता था। कालिदास के नाटक ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’ में शकुंतला और उसकी सखियाँ प्राकृत में तथा राजा दुष्यंत संस्कृत में बात करते हैं, जो इसी परंपरा का उत्कृष्ट उदाहरण है।
51. प्राचीन भारत में किस वंश का शासनकाल ‘स्वर्ण युग’ कहा जाता है?
U.P.P.C.S. (Spl) (Pre) 2004
उत्तर-(c)
गुप्तकाल (लगभग 320–550 ई.) को इतिहासकारों ने भारत का ‘स्वर्ण युग’ कहा है। इस काल में साहित्य, कला, विज्ञान, दर्शन और धर्म का अभूतपूर्व विकास हुआ। कालिदास जैसे महान कवि, आर्यभट्ट जैसे गणितज्ञ और वराहमिहिर जैसे खगोलशास्त्री इसी युग में हुए। इस काल को ‘क्लासिक युग’ (Classical Age) तथा ‘भारत का पेरीक्लीन युग’ भी कहा जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: आर्यभट्ट ने इसी काल में ‘आर्यभटीय’ नामक ग्रंथ की रचना की, जिसमें शून्य और दशमलव पद्धति का प्रयोग किया गया। इसी काल में अजंता की गुफाओं में श्रेष्ठतम चित्रकारी भी हुई।
52. किस प्रकार की भूमि को ‘अप्रहत’ कहा जाता था?
60th to 62nd B.P.S.C. (Pre) 2016
उत्तर-(a)
गुप्तकालीन राजस्व व्यवस्था में भूमि को उसकी उपजाऊ स्थिति के आधार पर विभिन्न वर्गों में विभाजित किया गया था। ‘अप्रहत’ उस भूमि को कहते थे जो जंगली और बिना जोती हुई हो। इसके अतिरिक्त ‘क्षेत्र’ जुती हुई कृषि भूमि, ‘खिल’ परती भूमि और ‘वास्तु’ आवासीय भूमि को कहा जाता था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्तकालीन भूमि-अनुदान ताम्रपत्रों में इन श्रेणियों का विस्तृत उल्लेख मिलता है। गुप्तकाल में भूमि के हस्तांतरण के लिए राजकीय अनुमति आवश्यक होती थी, जो उस समय की सुव्यवस्थित राजस्व प्रणाली को दर्शाती है।
53. गुप्त संवत की स्थापना किसने की?
M.P.P.C.S. (Pre) 1991
उत्तर-(a)
गुप्त संवत का प्रवर्तक चंद्रगुप्त प्रथम था। इस संवत की प्रारंभ तिथि 319-320 ई. मानी जाती है। चंद्रगुप्त प्रथम ने लिच्छवि राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह कर अपनी शक्ति को सुदृढ़ किया और ‘महाराजाधिराज’ की उपाधि धारण की।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चंद्रगुप्त प्रथम ने ‘चंद्रगुप्त-कुमारदेवी’ प्रकार के सिक्के चलाए, जो उस काल के एकमात्र ऐसे सिक्के हैं जिन पर पति और पत्नी दोनों के नाम अंकित हैं। गुप्त संवत, शक संवत (78 ई.) से लगभग 241 वर्ष बाद प्रारंभ हुआ।
54. हिंदू विधि द्वारा मान्य कर कितना था?
U.P.P.C.S. (Pre) 1992
उत्तर-(b)
हिंदू धर्मशास्त्रों और स्मृतियों के अनुसार राजा को उपज का छठा भाग (1/6) कर के रूप में लेने का अधिकार था। मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति दोनों में इस दर का उल्लेख है। यह दर न्यायसंगत मानी जाती थी क्योंकि राजा प्रजा की रक्षा के बदले यह कर लेता था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भूमि की उर्वरता और सिंचाई के आधार पर कर की दर 1/4 से 1/6 तक निर्धारित करने का उल्लेख है। आपातकाल में राजा 1/4 तक कर वसूल सकता था।
55. सूची-I का सूची-II से मिलान कीजिए तथा नीचे दिए गए कूटों का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए-
U.P. P.C.S. (Pre) (Re-Exam) 2015
उत्तर-(c)
सम्राटों और उनके विरुदों (उपाधियों) का सही सुमेलन इस प्रकार है — अशोक: प्रियदर्शिन (अभिलेखों में उल्लिखित); समुद्रगुप्त: परक्रमांक (अत्यंत पराक्रमी); चंद्रगुप्त-II: विक्रमादित्य (विक्रम और सूर्य का प्रतीक); स्कंदगुप्त: क्रमादित्य। ‘विरुद’ किसी शासक की विशेष उपलब्धि या गुण के आधार पर प्रदान की गई आधिकारिक उपाधि होती थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: समुद्रगुप्त को ‘भारत का नेपोलियन’ कहा जाता है — यह उपाधि इतिहासकार वी. ए. स्मिथ ने दी थी। प्रयाग प्रशस्ति (इलाहाबाद स्तंभ) में हरिषेण ने समुद्रगुप्त की विजयों का विस्तृत वर्णन किया है।
56. धर्मशास्त्रों में भू-राजस्व की दर क्या है?
40th B.P.S.C. (Pre) 1995
उत्तर-(c)
प्रायः सभी प्रमुख हिंदू धर्मशास्त्रों — मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, पराशर स्मृति आदि — में भू-राजस्व की दर उपज का 1/6 (षष्ठांश) निर्धारित की गई है। इसे राजा का ‘भाग’ कहा जाता था। यह दर किसानों पर अत्यधिक आर्थिक बोझ न पड़े, इसे ध्यान में रखकर निर्धारित की गई थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मनुस्मृति के अनुसार राजा अकाल या विपदा के समय कर में छूट दे सकता था। शुक्रनीतिसार में कर-वसूली के लिए नियुक्त अधिकारियों की ईमानदारी पर विशेष बल दिया गया है।
57. किस शासक वंश ने मंदिरों एवं ब्राह्मणों को सबसे अधिक ग्राम अनुदान में दिया था?
39th B.P.S.C. (Pre) 1994
उत्तर-(a)
गुप्त वंश के शासकों ने मंदिरों एवं ब्राह्मणों को सर्वाधिक ग्राम अनुदान (अग्रहार) दिए। इन भूमिदानों का विवरण गुप्तकालीन ताम्रपत्रों में मिलता है। भूमिदान के साथ-साथ उस गांव की समस्त राजस्व-आय और प्रशासनिक अधिकार भी अनुदान प्राप्तकर्ता को सौंप दिए जाते थे। इससे ब्राह्मणों की राजनीतिक और आर्थिक शक्ति में वृद्धि हुई।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्तकाल में भूमिदान की यह प्रथा सामंतवाद के उदय का एक प्रमुख कारण बनी। दामोदरपुर ताम्रपत्र (5वीं शताब्दी ई.) में भूमि क्रय-विक्रय और अनुदान की प्रक्रिया का विस्तृत विवरण मिलता है।
58. नगरों का क्रमिक पतन किस काल की एक महत्वपूर्ण विशेषता थी?
40th B.P.S.C. (Pre) 1995
उत्तर-(a)
गुप्तकाल में गंगा घाटी के अनेक समृद्ध नगरों का क्रमिक पतन हुआ। पाटलिपुत्र जैसा भव्य नगर ह्वेनसांग के आगमन तक एक छोटे गांव में सिमट गया था। इसका प्रमुख कारण व्यापार का ह्रास, भूमिदान प्रथा और विदेशी व्यापारिक मार्गों का बदलना था। मथुरा, सोनपुर, कुम्रहार जैसे नगर भी इस ह्रास से प्रभावित हुए।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इस नगर-पतन के कारण आर्थिक गतिविधियाँ नगरों से ग्रामों की ओर स्थानांतरित हो गईं, जिसे इतिहासकार R. S. Sharma ने ‘सामंतवाद के उदय’ से जोड़कर देखा है। रोमन साम्राज्य के पतन के बाद भारत के पश्चिमी बंदरगाहों से व्यापार में भी गिरावट आई।
59. गुप्त युग में भूमि राजस्व की दर क्या थी?
42nd B.P.S.C. (Pre) 1997
उत्तर-(b)
गुप्तकाल में राजकीय भूमि पर कृषि करने वाले किसानों को अपनी उपज का 1/6 (षष्ठांश) भाग कर के रूप में राजा को देना होता था। गुप्त अभिलेखों में इस भूमिकर को ‘उद्रंग’ तथा ‘भागकर’ कहा गया है। यह दर धर्मशास्त्र सम्मत भी थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्तकालीन अभिलेखों में ‘हिरण्य’ (नकद) और ‘मेय’ (अनाज) दो प्रकार के करों का उल्लेख मिलता है। इसके अतिरिक्त किसानों को ‘बलि’, ‘भोग’ और ‘कर’ जैसे विविध उपकर भी देने पड़ते थे, जो कुल मिलाकर उनके आर्थिक दायित्व को बढ़ा देते थे।
60. निम्न में से किस काल में स्त्रियों की पुरुषों से बराबरी थी?
U.P.P.C.S. (Pre) 1994
उत्तर-(d)
ऋग्वैदिक काल को छोड़कर प्राचीन भारतीय इतिहास के किसी भी काल में स्त्रियों की स्थिति पुरुषों के समकक्ष नहीं रही। गुप्तकाल में बाल-विवाह और सती प्रथा के प्रमाण मिलते हैं; मौर्यकाल में भी महिलाओं की सामाजिक गतिशीलता सीमित थी, यद्यपि वे राज्य के लिए गुप्तचर का कार्य कर सकती थीं। चोलकाल में भी स्त्री-अधिकार सीमित थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्तकाल में स्त्रियों की संपत्ति के अधिकार को ‘स्त्रीधन’ के रूप में मान्यता थी, परंतु यह केवल आभूषण और विशेष उपहारों तक सीमित था। ऋग्वैदिक काल में गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषी स्त्रियां दार्शनिक वाद-विवाद में पुरुषों के समकक्ष भाग लेती थीं।
61. तोरमाण किस जातीय दल का था?
I.A.S. (Pre) 1995
उत्तर-(b)
तोरमाण हूण जाति का शक्तिशाली आक्रमणकारी था, जिसने भारत पर दूसरे हूण आक्रमण का नेतृत्व किया। मध्य भारत के एरण (सागर जिला, मध्य प्रदेश) नामक स्थान पर स्थापित वाराह प्रतिमा के अभिलेख में उसका उल्लेख मिलता है, जिससे ज्ञात होता है कि धन्यविष्णु उसके शासन के प्रथम वर्ष में उसका सामंत था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तोरमाण का पुत्र मिहिरकुल अत्यंत क्रूर शासक था, जिसे ‘हूणों का नीरो’ कहा जाता है। तोरमाण ने गुप्त साम्राज्य के पतन का लाभ उठाकर पंजाब, राजपूताना और मध्य भारत के बड़े भू-भाग पर अधिकार कर लिया था।
62. घंटाशाला, कतूरा तथा चौल किसलिए विख्यात थे?
I.A.S. (Pre) 2020
उत्तर-(a)
घंटाशाला, कदूरा (कतूरा) और चौल गुप्त काल के प्रमुख बंदरगाह नगर थे। घंटाशाला आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले में स्थित पूर्वी तटीय बंदरगाह था, जबकि कदूरा भी पूर्वी तट पर स्थित था। चौल (Chaul) महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में पश्चिमी तट का महत्वपूर्ण बंदरगाह था। इन बंदरगाहों से दक्षिण-पूर्व एशिया, रोम और अरब देशों के साथ सक्रिय समुद्री व्यापार होता था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्तकाल में भारत से मुख्यतः मसाले, वस्त्र, हाथी दाँत और रत्न निर्यात किए जाते थे। पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी (Periplus of the Erythraean Sea) नामक ग्रीक ग्रंथ में इस काल के अनेक भारतीय बंदरगाहों का विस्तृत विवरण मिलता है।
63. निम्नलिखित कथनों को ध्यानपूर्वक पढ़िए-
1. गुप्त सम्राट स्वयं के लिए दैवीय अधिकारों का दावा करते थे।
2. उनका प्रशासन नितांत केंद्रीकृत था।
3. उन्होंने भूमिदान की परंपरा को विस्तारित किया। उत्तर निम्न कूटों के आधार पर दीजिए-
1. गुप्त सम्राट स्वयं के लिए दैवीय अधिकारों का दावा करते थे।
2. उनका प्रशासन नितांत केंद्रीकृत था।
3. उन्होंने भूमिदान की परंपरा को विस्तारित किया। उत्तर निम्न कूटों के आधार पर दीजिए-
Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2008
उत्तर-(c)
गुप्त शासक मौर्यों से भिन्न थे — उन्होंने स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि घोषित किया और ‘परमभट्टारक’, ‘महाराजाधिराज’ जैसी दैवीय उपाधियाँ धारण कीं (कथन 1 सही)। भूमिदान की परंपरा, विशेषकर ब्राह्मणों और मंदिरों को अग्रहार के रूप में दी गई भूमि, गुप्तकाल में और अधिक व्यापक हुई (कथन 3 सही)। परंतु गुप्त प्रशासन केंद्रीकृत न होकर संघात्मक प्रकृति का था — सामंत और प्रांतीय शासक काफी स्वायत्त थे (कथन 2 गलत)।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्त राजाओं ने ‘विक्रमादित्य’ उपाधि को अत्यंत लोकप्रिय बनाया। चंद्रगुप्त II को ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि सर्वप्रथम मिली थी। गुप्तकालीन भूमि अनुदान ताम्रपत्रों (Copper-plate grants) पर अंकित किए जाते थे, जो उस काल के प्रशासनिक विकेंद्रीकरण के प्रमाण हैं।
64. चीनी यात्री ‘सुंग युन’ ने भारत की यात्रा की थी-
60th to 62nd B.P.S.C. (Pre) 2016
उत्तर-(a)
चीनी यात्री सुंग युन (Song Yun) ने 518 ई. से 521 ई. तक भारत की यात्रा की। उसने अपनी तीन वर्षीय यात्रा के दौरान गांधार और उत्तर-पश्चिम भारत के अनेक क्षेत्रों का भ्रमण किया और बौद्ध धर्म के ग्रंथों की प्रतियाँ एकत्रित कीं। दिए गए विकल्पों में 515-520 ई. वाला विकल्प सर्वाधिक निकट है, अतः (a) सही उत्तर माना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सुंग युन की यात्रा का वृत्तांत ‘लुओयांग कियालान जी’ (Luoyang Qielan Ji) नामक ग्रंथ में संकलित है। उसने अपनी यात्रा में हूण शासक मिहिरकुल का भी उल्लेख किया है, जो उस समय गांधार का शासक था — यह भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण समकालीन साक्षी है।
65. भारत के इतिहास के संदर्भ में, “कुल्यावाप” तथा “द्रोणवाप” शब्द क्या निर्दिष्ट करते हैं?
I.A.S. (Pre) 2020
उत्तर-(a)
गुप्तकाल में कृषि भूमि की माप के लिए विशेष इकाइयाँ प्रचलित थीं। ‘कुल्यावाप’ और ‘द्रोणवाप’ ऐसी ही भू-माप इकाइयाँ थीं, जिनका उल्लेख गुप्तकालीन अभिलेखों में मिलता है। ‘अधवाप’ भी इसी श्रेणी की एक अन्य भू-माप इकाई थी। ‘वाप’ शब्द बीज बोने की मात्रा से भूमि क्षेत्रफल नापने की परंपरा को दर्शाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्तकालीन अभिलेखों, विशेषकर दामोदरपुर ताम्रपत्र अभिलेखों में इन भू-माप इकाइयों का विस्तृत उल्लेख है। तुलनात्मक रूप से मौर्यकाल में भूमि माप के लिए ‘निवर्तन’ और ‘अमन’ जैसी इकाइयाँ प्रयोग में थीं।
66. निम्नलिखित में से किसने हूण शासक मिहिरकुल को पराजित किया था?
U.P.P.C.S(Mains) 2016
उत्तर-(b)
हूण शासक मिहिरकुल को दो चरणों में पराजित किया गया। पहले गुप्त नरेश नरसिंहगुप्त ‘बालादित्य’ ने उसे युद्ध में हराया, और तत्पश्चात मालव (मंदसौर) के स्वतंत्र शासक यशोधर्मन ने उसे निर्णायक रूप से परास्त किया। इसका प्रमाण मंदसौर लेख और चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा-वृत्तांत से मिलता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यशोधर्मन ने विजय के उपलक्ष्य में मंदसौर (मध्य प्रदेश) में दो विजय स्तंभ स्थापित किए, जिन पर उसकी उपलब्धियाँ अंकित हैं। मिहिरकुल ने पराजय के बाद कश्मीर में शरण ली और वहाँ शासन किया; उसे बौद्ध धर्म का कट्टर विरोधी माना जाता है।
67. तीसरी शताब्दी में वारंगल प्रसिद्ध था-
U.P. U.D.A./L.D.A. (Pre) 2001
उत्तर-(c)
तीसरी शताब्दी ईस्वी में वारंगल (वर्तमान तेलंगाना) लोहे के औज़ारों और उपकरणों के निर्माण के लिए प्रसिद्ध था। यह क्षेत्र दक्षिण भारत में धातुकर्म की उन्नत परंपरा का केंद्र था। वारंगल उस काल में इक्ष्वाकु वंश के शासन में था, जो सातवाहनों के पतन के बाद उभरा था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: प्राचीन भारत में लोहे का उपयोग कृषि उपकरणों और शस्त्र-निर्माण दोनों में होता था; इससे कृषि उत्पादन में व्यापक वृद्धि हुई। वारंगल बाद में काकतीय वंश (12वीं-14वीं शताब्दी) की राजधानी भी बना, जो अपनी स्थापत्य कला, विशेषकर हजार स्तंभ मंदिर के लिए प्रसिद्ध है।
68. प्राचीन भारत में सिंचाई कर को कहते थे-
U.P.P.C.S. (Mains) 2009
उत्तर-(a)
प्राचीन भारत में सिंचाई कर को ‘बिदकभागम’ अथवा ‘उदकभाग’ कहा जाता था। ‘हिरण्य’ मौर्यकाल में नकद रूप में लिए जाने वाले कर का नाम था। गुप्त अभिलेखों में भूमि कर को ‘उद्रंग’ या ‘उदरंग’ कहा गया है। ‘उपरनिका’ राजपूत युग में स्थायी एवं अस्थायी रूप से भूमि पर रहने वाले कृषकों से लिया जाने वाला कर था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मौर्यकाल में कौटिल्य के अर्थशास्त्र में सिंचाई के स्रोत के अनुसार कर की दर भिन्न-भिन्न निर्धारित की गई थी — कुएँ, तालाब और नहर से सिंचित भूमि पर अलग-अलग दरें लागू होती थीं। गुप्तकाल में ‘भाग’ (उपज का हिस्सा) और ‘भोग’ (नियमित आपूर्ति) भी प्रमुख करों में शामिल थे।
69. गुप्त साम्राज्य द्वारा निम्न में से किन्हें कर-रहित कृषि भूमि प्रदान की जाती थी?
M.P.P.C.S. (Pre) 2014
उत्तर-(c)
गुप्तकाल में मंदिरों और ब्राह्मणों को दान में दी जाने वाली भूमि को ‘अग्रहार’ कहा जाता था। यह भूमि समस्त करों से मुक्त होती थी और धारकों को उस पर पूर्ण स्वामित्व प्राप्त था। इस भूमिदान का प्राथमिक उद्देश्य धार्मिक और शैक्षणिक कार्यों को प्रोत्साहित करना था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्तकालीन भूमिदान के प्रमाण ताम्रपत्र अभिलेखों पर मिलते हैं, जिनमें दानपत्र लिखकर भूमि का हस्तांतरण किया जाता था। इस प्रथा ने सामंतवाद के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, क्योंकि बड़े भू-स्वामियों का उदय हुआ और केंद्रीय सत्ता कमज़ोर होती गई।
70. चीनी तीर्थयात्री जिसने छठी शताब्दी में भारत दर्शन किया-
Jharkhand P.C.S. (Pre) 2016
उत्तर-(c)
चीनी यात्री सुंग युन (Song Yun) 518 ई. में भारत आया, जो छठी शताब्दी की शुरुआत में आता है। उसने तीन वर्षों में गांधार और उत्तर-पश्चिम भारत का भ्रमण कर बौद्ध ग्रंथों की प्रतियाँ एकत्रित कीं। फाहियान (399-414 ई.) चंद्रगुप्त II के काल में, ह्वेनसांग (629-645 ई.) हर्षवर्धन के काल में, और इत्सिंग (671-695 ई.) बाद में भारत आए।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: फाहियान प्रथम प्रमुख चीनी यात्री था जिसने गुप्तकालीन भारत का जीवंत वर्णन किया; उसके अनुसार उस समय भारत में शांति और समृद्धि थी तथा मृत्युदंड का प्रचलन नहीं था। इत्सिंग ने नालंदा विश्वविद्यालय में अध्ययन किया और वहाँ के शैक्षणिक वातावरण का विस्तृत विवरण दिया।
71. योग दर्शन के प्रतिपादक हैं-
U.P.P.C.S. (Pre) 1997
U.P. Lower Sub. (Spl) (Pre) 2002
U.P. Lower Sub. (Spl) (Pre) 2003
U.P.P.C.S. (Pre) 2007
U.P. Lower Sub. (Spl) (Pre) 2002
U.P. Lower Sub. (Spl) (Pre) 2003
U.P.P.C.S. (Pre) 2007
उत्तर-(a)
महर्षि पतंजलि को योग दर्शन का संस्थापक आचार्य माना जाता है। उन्होंने लगभग 200 ईसा पूर्व ‘योगसूत्र’ नामक ग्रंथ की रचना की, जिसमें योग के 195 सूत्र संकलित हैं। यह ग्रंथ चार पादों — समाधिपाद, साधनपाद, विभूतिपाद और कैवल्यपाद — में विभाजित है। योग दर्शन मूलतः सांख्य दर्शन पर आधारित है, अंतर केवल यह है कि सांख्य निरीश्वरवादी है जबकि योग ईश्वर को स्वीकार करता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: पतंजलि ने ‘अष्टांग योग’ का प्रतिपादन किया, जिसके आठ अंग हैं — यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। इसके अतिरिक्त, पतंजलि को ‘महाभाष्य’ नामक संस्कृत व्याकरण ग्रंथ का रचयिता भी माना जाता है, जो पाणिनि की अष्टाध्यायी पर एक महत्वपूर्ण टीका है।
72. कपिल मुनि द्वारा प्रतिपादित दार्शनिक प्रणाली है-
उत्तर मीमांसा
U.P.P.C.S. (Pre) 1998
उत्तर-(b)
महर्षि कपिल द्वारा प्रतिपादित सांख्य दर्शन भारत के षड्दर्शनों में सबसे प्राचीन माना जाता है। इस दर्शन का मूल आधार ‘पुरुष’ (चेतना) और ‘प्रकृति’ (जड़ तत्व) के बीच के भेद को समझना है। सांख्य दर्शन के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति प्रकृति के तीन गुणों — सत्व, रज और तम — के असंतुलन से होती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सांख्य दर्शन को ‘निरीश्वर दर्शन’ भी कहा जाता है क्योंकि यह ईश्वर की सत्ता को स्वीकार नहीं करता। इस दर्शन में 25 तत्वों का विवेचन किया गया है, जिनमें एक पुरुष, एक प्रकृति और शेष 23 प्रकृति के विकार हैं। महाभारत के शांतिपर्व में भी सांख्य दर्शन के सिद्धांतों का विस्तृत वर्णन मिलता है।
73. गुप्त काल के दौरान भारत में बलात् श्रम (विष्टि) के संदर्भ में, निम्नलि में से कौन-सा कथन सही है?
IAS (Pre) 2019
उत्तर-(a)
गुप्त काल में ‘विष्टि’ (बेगार अथवा बलात् श्रम) को करों की श्रेणी में रखा जाता था। चंद्रगुप्त द्वितीय के उदयगिरि गुहालेख तथा प्रभावती गुप्ता के रिद्धपुर अभिलेख में इसका स्पष्ट उल्लेख है। इस प्रथा के अंतर्गत श्रमिकों, शिल्पियों एवं कृषकों को बिना किसी पारिश्रमिक के राजकीय कार्यों में श्रम करना अनिवार्य था। यह प्रथा मध्य प्रदेश और काठियावाड़ में सर्वाधिक प्रचलित थी, न कि अनुपस्थित।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: विष्टि प्रथा का प्रमाण मौर्य काल से ही मिलता है — कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी इसका उल्लेख है। मध्यकाल में यही प्रथा ‘बेगार’ के नाम से जानी जाती रही और ब्रिटिश काल तक प्रचलित रही, जब तक इसे विधिक रूप से प्रतिबंधित नहीं किया गया।
74. ‘सांख्य’ दर्शन प्रतिपादित किया गया है-
U.P.P.C.S. (Mains) 2010
उत्तर-(c)
सांख्य दर्शन के मूल प्रणेता महर्षि कपिल हैं। उन्होंने ‘सांख्यसूत्र’ की रचना की जो इस दर्शन का मूलभूत ग्रंथ है। सांख्य शब्द की उत्पत्ति ‘संख्या’ से मानी जाती है, क्योंकि इसमें तत्वों की गणना (25 तत्व) पर विशेष बल दिया गया है। यह दर्शन द्वैतवादी है — पुरुष और प्रकृति दोनों को स्वतंत्र एवं शाश्वत सत्ताएँ मानता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सांख्य दर्शन का सबसे प्राचीन उपलब्ध ग्रंथ ‘सांख्यकारिका’ है, जिसकी रचना ईश्वरकृष्ण ने लगभग 4थी-5वीं शताब्दी ई. में की थी। इसमें 72 कारिकाओं (श्लोकों) में सांख्य के समस्त सिद्धांतों का सुव्यवस्थित वर्णन किया गया है।
75. शूद्रक द्वारा लिखी हुई प्राचीन भारतीय पुस्तक ‘मृच्छकटिकम्’ का विषय था-
I.A.S. (Pre) 2003
उत्तर-(a)
‘मृच्छकटिकम्’ (मिट्टी की छोटी गाड़ी) शूद्रक द्वारा रचित संस्कृत नाटक है, जिसमें दरिद्र ब्राह्मण व्यापारी चारुदत्त और गणिका की पुत्री वसंतसेना की प्रेम-कथा का हृदयग्राही वर्णन किया गया है। यह नाटक गुप्तकालीन नगर जीवन, न्याय व्यवस्था और सामाजिक संरचना पर महत्वपूर्ण प्रकाश डालता है। इसमें उज्जयिनी नगर के विभिन्न वर्गों — व्यापारी, गणिका, चोर और न्यायाधीश — का यथार्थ चित्रण है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मृच्छकटिकम् में 10 अंक हैं और यह संस्कृत साहित्य के उन विरल नाटकों में से एक है जिसमें नायिका एक गणिका है। इस नाटक में एक उपकथा भी है जिसमें आर्यक नामक व्यक्ति राजा पालक के विरुद्ध विद्रोह करता है — यह तत्कालीन राजनीतिक उथल-पुथल का परिचायक है।
76. योग के आविष्कारक थे-
Uttarakhand U.D.A./L.D.A. (pre) 2007
उत्तर-(c)
महर्षि पतंजलि को योग दर्शन का आविष्कारक एवं व्यवस्थित प्रणेता माना जाता है। उन्होंने बिखरी हुई योग-साधनाओं को एकत्र कर ‘योगसूत्र’ के रूप में एक सुसंबद्ध दार्शनिक प्रणाली का रूप दिया। योग का उद्देश्य ‘चित्तवृत्तिनिरोध’ अर्थात मन की वृत्तियों को नियंत्रित करना है, जिससे पुरुष अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान सके।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यद्यपि योग साधना सिंधु-सरस्वती सभ्यता (लगभग 3000 ईसा पूर्व) से प्रचलित मानी जाती है — मोहनजोदड़ो से प्राप्त ‘पशुपति मुद्रा’ में ध्यानस्थ आकृति इसका प्रमाण है। संयुक्त राष्ट्र ने भारत के प्रस्ताव पर 21 जून को ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ घोषित किया है, जिसे पहली बार 2015 में मनाया गया था।
77. प्राचीन सांख्य दर्शन में किसका महत्वपूर्ण योगदान है?
M.P.P.C.S. (Pre) 1997
उत्तर-(a)
भारतीय दर्शन के छह प्रमुख संप्रदायों (षड्दर्शन) में सांख्य सबसे प्राचीन है और इसके प्रवर्तक महर्षि कपिल हैं। सांख्य दर्शन में ज्ञान को तीन प्रमाणों — प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम — पर आधारित माना गया है। यह भारतीय चिंतन परंपरा का पहला व्यवस्थित प्रयास है जिसमें सृष्टि की उत्पत्ति को ईश्वर की इच्छा से नहीं, बल्कि प्रकृति के गुणों के असंतुलन से समझाया गया है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गौतम न्याय दर्शन के, जैमिनी पूर्व मीमांसा के, नागार्जुन माध्यमिक बौद्ध दर्शन के, और चार्वाक लोकायत (भौतिकवादी) दर्शन के प्रणेता हैं। इस प्रकार प्रत्येक दार्शनिक संप्रदाय का अपना विशिष्ट आचार्य है।
78. कहा जाता है कि शतरंज का खेल उद्भूत (originate) हुआ था-
U.P. Lower Sub. (Spl) (Pre) 2004
उत्तर-(d)
शतरंज का उद्गम भारत में हुआ था, जहाँ इसे प्रारंभ में ‘चतुरंग’ कहा जाता था। यह नाम सेना के चार अंगों — पैदल, घुड़सवार, रथ और हाथी — पर आधारित था जो आज के प्यादे, घोड़े, रुख और हाथी के रूप में प्रचलित हैं। गुप्त काल (लगभग 6ठी शताब्दी ई.) में इस खेल का प्रमाण मिलता है। भारत से यह खेल सर्वप्रथम ईरान (फारस) पहुँचा, जहाँ इसे ‘शतरंज’ कहा गया और बाद में अरब व्यापारियों के माध्यम से यूरोप तक फैला।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ईरान में लिखित 6ठी शताब्दी का ग्रंथ ‘विज़िश्न-नामक’ (Wizishn-namak) शतरंज के भारतीय उद्गम का वर्णन करता है। हर्षचरित में भी ‘चतुरंग’ का उल्लेख मिलता है। यूनेस्को ने 2023 में भारत के ‘चतुरंग/शतरंज’ को अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता देने हेतु विचार किया।
79. भारत में दार्शनिक विचार के इतिहास के संबंध में, सांख्य संप्रदाय से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-
1. सांख्य पुनर्जन्म या आत्मा के आवागमन के सिद्धांत को स्वीकार नहीं करता है।
2. सांख्य की मान्यता है कि आत्म-ज्ञान ही मोक्ष की ओर ले जाता है न कि कोई बाह्य प्रभाव अथवा कारक
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
1. सांख्य पुनर्जन्म या आत्मा के आवागमन के सिद्धांत को स्वीकार नहीं करता है।
2. सांख्य की मान्यता है कि आत्म-ज्ञान ही मोक्ष की ओर ले जाता है न कि कोई बाह्य प्रभाव अथवा कारक
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
I.A.S. (Pre) 2013
उत्तर-(b)
कथन 1 असत्य है क्योंकि सांख्य दर्शन पुनर्जन्म और आत्मा के आवागमन के सिद्धांत को स्वीकार करता है। सांख्य के अनुसार जब तक अविवेक (प्रकृति और पुरुष में भेद न जान पाना) बना रहता है, तब तक जीव जन्म-मृत्यु के चक्र में बंधा रहता है। कथन 2 सत्य है — सांख्य में ‘विवेकख्याति’ अर्थात पुरुष और प्रकृति के भेद का बोध ही मोक्ष का एकमात्र साधन है, कोई बाह्य अनुष्ठान या दैवीय कृपा नहीं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सांख्य दर्शन में तीन प्रकार के दुःखों का वर्णन है — आध्यात्मिक (अपने कारण उत्पन्न), आधिभौतिक (अन्य प्राणियों से उत्पन्न) और आधिदैविक (प्राकृतिक आपदाओं से उत्पन्न)। मोक्ष इन तीनों से सर्वदा मुक्ति की अवस्था है।
80. निम्नलिखित कथनों को पढ़िए तथा सही विकल्प को चुनिए-
कथन I : कपिल सांख्य पद्धति के सबसे पुराने प्रणेता हैं।
कथन II : कपिल यह बताते हैं कि किसी व्यक्ति का जीवन प्रकृति की शक्तियों द्वारा गढ़ा जाता है, किसी दैवी सत्ता द्वारा नहीं।
कथन I : कपिल सांख्य पद्धति के सबसे पुराने प्रणेता हैं।
कथन II : कपिल यह बताते हैं कि किसी व्यक्ति का जीवन प्रकृति की शक्तियों द्वारा गढ़ा जाता है, किसी दैवी सत्ता द्वारा नहीं।
Chhattisgarh P.C..S. (Pre) 2020
उत्तर-(a)
दोनों कथन सत्य हैं। महर्षि कपिल सांख्य दर्शन के आदि प्रवर्तक हैं और इस परंपरा में सर्वाधिक प्राचीन आचार्य के रूप में सम्मानित हैं। सांख्य के अनुसार सृष्टि और जीव-जगत का संचालन प्रकृति के तीन गुणों (सत्व, रज, तम) के द्वारा होता है — इसमें किसी ईश्वर या दैवीय शक्ति की भूमिका नहीं है। इसीलिए सांख्य को ‘निरीश्वरवादी’ दर्शन कहा जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सांख्य दर्शन के अनुसार प्रकृति तीन अवस्थाओं में रहती है — सृष्टि, स्थिति और प्रलय। भगवद्गीता के 13वें अध्याय में भी सांख्य के क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विवेचन का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है, जो इस दर्शन के व्यापक प्रभाव को दर्शाता है।
81. महाभाष्य के लेखक ‘पतंजलि’ समसामयिक थे-
U.P.P.C.S. (Pre) 2011
उत्तर-(c)
पतंजलि एक बहुआयामी विद्वान थे जिन्होंने महाभाष्य की रचना की, जो पाणिनि के अष्टाध्यायी पर एक महत्त्वपूर्ण व्याख्या ग्रंथ है। ये शुंग वंश के प्रवर्तक पुष्यमित्र शुंग (184–148 ई.पू.) के समकालीन थे। उल्लेखनीय है कि पतंजलि को ‘शेषनाग का अवतार’ भी माना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: पुष्यमित्र शुंग ने अंतिम मौर्य सम्राट बृहद्रथ की हत्या कर शुंग वंश की स्थापना की थी। पतंजलि का महाभाष्य संस्कृत व्याकरण का एक मूल आधार-ग्रंथ माना जाता है और इसमें तत्कालीन सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन की भी झलक मिलती है।
82. न्याय दर्शन को प्रचारित किया था-
U.P.P.C.S. (Pre) 2005
U.P.P.C.S. (Mains) 2005
U.P.P.C.S. (Mains) 2005
उत्तर-(b)
न्याय दर्शन की नींव महर्षि गौतम ने रखी, जिन्हें ‘अक्षपाद गौतम’ के नाम से भी जाना जाता है। न्याय शब्द का अर्थ है — तर्कसम्मत विश्लेषण। इस दर्शन में 16 पदार्थों की चर्चा की गई है, जिनमें प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन आदि प्रमुख हैं। न्याय दर्शन का मूल ग्रंथ ‘न्यायसूत्र’ है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: न्याय दर्शन चार प्रमाणों — प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द — को ज्ञान के वैध स्रोत मानता है। वाचस्पति मिश्र ने न्यायसूत्र पर ‘न्यायवार्तिक तात्पर्यटीका’ नामक प्रसिद्ध टीका लिखी, जो इस दर्शन की समझ को और विस्तृत करती है।
83. चार्वाक दार्शनिक प्रणाली-
Jharkhand P.C.S. (Pre) 2021
उत्तर-(a)
चार्वाक दर्शन भारतीय दर्शन परंपरा की एकमात्र पूर्णतः भौतिकवादी विचारधारा है। इसे ‘लोकायत’ दर्शन भी कहते हैं, क्योंकि यह लोक अर्थात् सांसारिक सुख को ही जीवन का लक्ष्य मानता है। यह नास्तिक दर्शन है जो वेदों की प्रामाणिकता, परलोक, और मोक्ष को नकारता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चार्वाक दर्शन के मूल प्रवर्तक बृहस्पति को माना जाता है, न कि स्वयं चार्वाक को — ‘चार्वाक’ संभवतः इस विचारधारा के एक प्रमुख प्रचारक थे। यह दर्शन केवल ‘प्रत्यक्ष’ को प्रमाण मानता है और अनुमान व शब्द (आगम) को प्रमाण के रूप में अस्वीकार करता है।
84. निम्नलिखित में से कौन एक ‘आष्टांग योग’ का अंश नहीं है?
Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2015
उत्तर-(a)
महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र में योग के आठ अंग बताए हैं — यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। इन्हें सम्मिलित रूप से ‘अष्टांग योग’ या ‘राजयोग’ कहा जाता है। ‘अनुस्मृति’ इस सूची में नहीं आती, अतः यह आष्टांग योग का अंश नहीं है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: पतंजलि ने योग को ‘योगः चित्तवृत्तिनिरोधः’ के रूप में परिभाषित किया, अर्थात् चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है। संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2014 में 21 जून को ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ घोषित किया, जिसका प्रस्ताव भारत ने रखा था।
85. केवल प्रत्यक्ष प्रमाण को कौन स्वीकार करता है?
Chhattisgarh P.S.C. (Pre) 2018
उत्तर-(b)
भारतीय दर्शन में विभिन्न संप्रदाय अलग-अलग संख्या में प्रमाणों को स्वीकार करते हैं। चार्वाक दर्शन सबसे कट्टर भौतिकवादी स्थिति लेते हुए केवल ‘प्रत्यक्ष’ को ही ज्ञान का एकमात्र वैध साधन मानता है। बौद्ध और वैशेषिक दो प्रमाण (प्रत्यक्ष व अनुमान) स्वीकार करते हैं, जबकि न्याय दर्शन चार प्रमाण मानता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मीमांसा दर्शन सर्वाधिक छह प्रमाणों को स्वीकार करता है — प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, उपमान, अर्थापत्ति और अनुपलब्धि। चार्वाक के अनुसार अनुमान विश्वसनीय नहीं है क्योंकि यह व्याप्ति पर आधारित है, और व्याप्ति को प्रत्यक्ष से सिद्ध नहीं किया जा सकता।
86. नव्य-न्याय संप्रदाय (स्कूल) के संस्थापक कौन थे?
U.P.P.C.S. (Pre) 1995
उत्तर-(b&d)
नव्य-न्याय दर्शन की स्थापना को लेकर विद्वानों में मतभेद है। मिथिला के तार्किक दार्शनिक उदयनाचार्य को कुछ विद्वान इसका वास्तविक संस्थापक मानते हैं, क्योंकि उनकी रचना ‘न्यायकुसुमांजलि’ को नव्य-न्याय का मूल स्रोत माना जाता है। दूसरी ओर, गंगेश उपाध्याय ने अपनी कृति ‘तत्त्वचिंतामणि’ के माध्यम से नव्य-न्याय को व्यवस्थित रूप दिया, इसीलिए उन्हें भी संस्थापक माना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: रघुनाथ शिरोमणि ने अपनी कृति ‘दीधिति’ से नव्य-न्याय को और परिष्कृत किया। यह संप्रदाय मिथिला (बिहार) और नवद्वीप (बंगाल) में विशेष रूप से फला-फूला।
87. अधोलिखित में से कौन एक चार्वाक के अनुसार सर्वोच्च मूल्य है?
Chhattisgarh P.S.C. (Pre) 2017
उत्तर-(c)
चार्वाक दर्शन भारतीय परंपरा में स्वीकृत चार पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में ‘काम’ अर्थात् इन्द्रियजन्य सुख को परम लक्ष्य मानता है। इस दर्शन में मोक्ष और परलोक की अवधारणा को पूरी तरह नकारा गया है। ‘अर्थ’ को चार्वाक केवल सुख-प्राप्ति का साधन मानते हैं, साध्य नहीं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चार्वाक दर्शन के अनुसार शरीर ही आत्मा है और चेतना चार भौतिक तत्त्वों — पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु — के संयोग से उत्पन्न होती है। इस दर्शन में ‘दुःखपरिहार’ के साथ ‘सुखप्राप्ति’ को जीवन का द्विआयामी लक्ष्य माना गया है।
88. ‘जब तक जीवित रहो, सुख से जीवित रहो, चाहे इसके लिए ऋण ही लेना पड़े, क्योंकि शरीर के भस्मीभूत हो जाने पर पुनरागमन नहीं हो सकता।’ पुनर्जन्म का निषेध करने वाली यह उक्ति किसकी है?
I.A.S. (Pre) 1994
उत्तर-(d)
यह प्रसिद्ध उक्ति — ‘यावज्जीवेत् सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्। भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः।’ — चार्वाक दर्शन के मूल सिद्धांत को प्रकट करती है। यह दर्शन पुनर्जन्म, आत्मा की अमरता और मोक्ष को अस्वीकार करता है तथा वर्तमान जीवन में इन्द्रिय सुख को ही परम पुरुषार्थ मानता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चार्वाक दर्शन वेद-विरोधी होने के कारण इसे ‘नास्तिक दर्शन’ की श्रेणी में रखा गया है। इसे ‘बार्हस्पत्य दर्शन’ भी कहते हैं, क्योंकि इसके मूल सूत्र देवगुरु बृहस्पति को आरोपित किए जाते हैं।
89. न्याय दर्शन के संस्थापक थे-
Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2016
उत्तर-(c)
न्याय दर्शन के संस्थापक महर्षि गौतम हैं, जिन्हें ‘अक्षपाद’ भी कहा जाता है। उन्होंने ‘न्यायसूत्र’ की रचना की जो इस दर्शन का आधारभूत ग्रंथ है। न्याय दर्शन का प्रमुख उद्देश्य तर्क और प्रमाणों के माध्यम से सत्य तक पहुँचना है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कपिल ‘सांख्य दर्शन’ के, कणाद ‘वैशेषिक दर्शन’ के और जैमिनि ‘पूर्व मीमांसा’ के संस्थापक हैं — इस प्रकार इन चारों दार्शनिक परंपराओं के संस्थापक अलग-अलग हैं। न्याय और वैशेषिक दोनों दर्शनों को परस्पर पूरक माना जाता है, इसीलिए इन्हें कभी-कभी ‘न्याय-वैशेषिक’ एकीकृत परंपरा के रूप में भी देखा जाता है।
90. न्याय दर्शन का प्रवर्तक कौन है?
Chhattisgarh P.S.C. (Pre) 2018
उत्तर-(a)
न्याय दर्शन के प्रवर्तक गौतम ऋषि हैं। ‘न्याय’ शब्द का अर्थ होता है — वह अनुमान जिसके द्वारा किसी विषय का निश्चयात्मक ज्ञान प्राप्त हो। गौतम के न्यायसूत्र पर वात्स्यायन, उद्योतकर, वाचस्पति मिश्र और उदयन जैसे विद्वानों ने भाष्य और टीकाएँ लिखीं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शंकराचार्य ‘अद्वैत वेदांत’ के और वल्लभाचार्य ‘शुद्धाद्वैत वेदांत’ के प्रवर्तक हैं। कपिल ‘सांख्य दर्शन’ के जनक माने जाते हैं, जो भारत की सबसे प्राचीन व्यवस्थित दार्शनिक परंपराओं में से एक है।
91. कर्म का सिद्धांत संबंधित है-
U.P.P.C.S. (Pre) 1997
उत्तर-(b)
कर्म का सिद्धांत मीमांसा दर्शन से संबंधित है। मीमांसा दर्शन को तीन नामों से जाना जाता है — पूर्व मीमांसा, कर्म मीमांसा और धर्म मीमांसा। इस दर्शन के अनुसार वैदिक कर्मकांडों का नियमित अनुष्ठान ही मोक्ष का मार्ग है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:
1. मीमांसा दर्शन के प्रमुख आचार्य कुमारिल भट्ट ने तर्कपूर्ण खंडन द्वारा बौद्ध दर्शन का विरोध कर वैदिक धर्म की पुनः प्रतिष्ठा की। उन्हें पूर्व मीमांसा और वेदांत दर्शन के बीच की कड़ी माना जाता है।
2. मीमांसा दर्शन का एक और प्रमुख आचार्य प्रभाकर मिश्र था, जिसकी विचारधारा को ‘प्रभाकर मत’ या ‘गुरुमत’ कहा जाता है। कुमारिल और प्रभाकर के मतों में अपूर्व (कर्मफल की शक्ति) की व्याख्या को लेकर मतभेद था।
1. मीमांसा दर्शन के प्रमुख आचार्य कुमारिल भट्ट ने तर्कपूर्ण खंडन द्वारा बौद्ध दर्शन का विरोध कर वैदिक धर्म की पुनः प्रतिष्ठा की। उन्हें पूर्व मीमांसा और वेदांत दर्शन के बीच की कड़ी माना जाता है।
2. मीमांसा दर्शन का एक और प्रमुख आचार्य प्रभाकर मिश्र था, जिसकी विचारधारा को ‘प्रभाकर मत’ या ‘गुरुमत’ कहा जाता है। कुमारिल और प्रभाकर के मतों में अपूर्व (कर्मफल की शक्ति) की व्याख्या को लेकर मतभेद था।
92. न्याय दर्शन के प्रवर्तक थे-
U.P.P.C.S. (Mains) 2005
उत्तर-(a)
भारत के छह प्रमुख आस्तिक दर्शनों (षड्दर्शन) और उनके प्रवर्तकों का सही सुमेलन इस प्रकार है — न्याय दर्शन के प्रणेता महर्षि गौतम, सांख्य दर्शन के कपिल मुनि, वैशेषिक दर्शन के उलूक कणाद, मीमांसा दर्शन के जैमिनी, वेदांत दर्शन के बादरायण और योग दर्शन के पतंजलि हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:
1. न्याय दर्शन का मूल ग्रंथ ‘न्याय सूत्र’ है, जिसकी रचना महर्षि गौतम ने की। इस दर्शन में सोलह पदार्थों (categories) का विवेचन किया गया है, जिनमें प्रमाण (ज्ञान के साधन) को सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है।
2. न्याय दर्शन चार प्रमाणों को मान्यता देता है — प्रत्यक्ष (प्रत्यक्ष अनुभव), अनुमान (तर्क), उपमान (तुलना) और शब्द (वेद वचन)। यह दर्शन तर्कशास्त्र और ज्ञानमीमांसा की दृष्टि से भारतीय दर्शन में विशेष महत्त्व रखता है।
1. न्याय दर्शन का मूल ग्रंथ ‘न्याय सूत्र’ है, जिसकी रचना महर्षि गौतम ने की। इस दर्शन में सोलह पदार्थों (categories) का विवेचन किया गया है, जिनमें प्रमाण (ज्ञान के साधन) को सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है।
2. न्याय दर्शन चार प्रमाणों को मान्यता देता है — प्रत्यक्ष (प्रत्यक्ष अनुभव), अनुमान (तर्क), उपमान (तुलना) और शब्द (वेद वचन)। यह दर्शन तर्कशास्त्र और ज्ञानमीमांसा की दृष्टि से भारतीय दर्शन में विशेष महत्त्व रखता है।
93. निम्न में से किस दर्शन का मत है कि वेद शाश्वत सत्य हैं?
Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2013
उत्तर-(c)
मीमांसा दर्शन वेदों को नित्य, अपौरुषेय और शाश्वत सत्य मानता है अर्थात् वेद किसी मनुष्य या ईश्वर द्वारा रचित नहीं हैं, वे स्वतः सिद्ध हैं। इस दर्शन में वेद के दो भागों पर अलग-अलग विचार किया गया है — पूर्व मीमांसा में कर्मकांड भाग पर और उत्तर मीमांसा (वेदांत) में ज्ञानकांड भाग पर।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:
1. मीमांसा दर्शन ईश्वर के अस्तित्व को आवश्यक नहीं मानता — इस दृष्टि से यह भारतीय आस्तिक दर्शनों में अपवाद है। इसके अनुसार वेद स्वयंसिद्ध प्रमाण हैं और उन्हें किसी ईश्वरीय सत्ता की आवश्यकता नहीं।
2. मीमांसा दर्शन ‘शब्द’ को सबसे महत्त्वपूर्ण प्रमाण मानता है और यह सिद्ध करता है कि वैदिक शब्द नित्य हैं — इसे ‘स्फोट सिद्धांत’ के विरोध में ‘शब्द नित्यता’ का सिद्धांत कहा जाता है।
1. मीमांसा दर्शन ईश्वर के अस्तित्व को आवश्यक नहीं मानता — इस दृष्टि से यह भारतीय आस्तिक दर्शनों में अपवाद है। इसके अनुसार वेद स्वयंसिद्ध प्रमाण हैं और उन्हें किसी ईश्वरीय सत्ता की आवश्यकता नहीं।
2. मीमांसा दर्शन ‘शब्द’ को सबसे महत्त्वपूर्ण प्रमाण मानता है और यह सिद्ध करता है कि वैदिक शब्द नित्य हैं — इसे ‘स्फोट सिद्धांत’ के विरोध में ‘शब्द नित्यता’ का सिद्धांत कहा जाता है।
94. मीमांसा के प्रणेता थे-
Uttarakhand U.D.A./L.D.A. (Pre) 2007
उत्तर-(d)
मीमांसा दर्शन के प्रणेता महर्षि जैमिनी हैं। उनके द्वारा रचित ‘मीमांसा सूत्र’ (जिसे ‘जैमिनीय सूत्र’ भी कहते हैं) इस दर्शन का मूल ग्रंथ है। इस ग्रंथ में लगभग 2700 सूत्र हैं जो इसे भारतीय दर्शन के सबसे विस्तृत सूत्र-ग्रंथों में से एक बनाते हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:
1. जैमिनी महाभारत काल के ऋषि माने जाते हैं और वे महर्षि व्यास के शिष्य थे। उन्होंने सामवेद की एक शाखा का भी प्रवर्तन किया जिसे ‘जैमिनीय शाखा’ कहा जाता है।
2. मीमांसा सूत्र पर सबसे प्राचीन उपलब्ध भाष्य शबर स्वामी द्वारा रचित ‘शाबरभाष्य’ है, जो लगभग 5वीं शताब्दी ई. का माना जाता है। इसी भाष्य पर आगे चलकर कुमारिल भट्ट और प्रभाकर ने अपनी टीकाएं लिखीं।
1. जैमिनी महाभारत काल के ऋषि माने जाते हैं और वे महर्षि व्यास के शिष्य थे। उन्होंने सामवेद की एक शाखा का भी प्रवर्तन किया जिसे ‘जैमिनीय शाखा’ कहा जाता है।
2. मीमांसा सूत्र पर सबसे प्राचीन उपलब्ध भाष्य शबर स्वामी द्वारा रचित ‘शाबरभाष्य’ है, जो लगभग 5वीं शताब्दी ई. का माना जाता है। इसी भाष्य पर आगे चलकर कुमारिल भट्ट और प्रभाकर ने अपनी टीकाएं लिखीं।
95. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूची के नीचे दिए
गए कूट से सही
सूची-I (दर्शन) सूची-II (मोक्ष प्राप्त करने के तरीके)
A. न्याय दर्शन – 1. वास्तविक ज्ञान का अभिग्रहण
B. मीमांसा दर्शन – 2. आत्मज्ञान
C. सांख्य दर्शन – 3. वैदिक अनुष्ठान करना
D. वेदांत दर्शन – 4. तार्किक चिंतन
कूट :
A B C D उत्तर का चयन कीजिए-
सूची-I (दर्शन) सूची-II (मोक्ष प्राप्त करने के तरीके)
A. न्याय दर्शन – 1. वास्तविक ज्ञान का अभिग्रहण
B. मीमांसा दर्शन – 2. आत्मज्ञान
C. सांख्य दर्शन – 3. वैदिक अनुष्ठान करना
D. वेदांत दर्शन – 4. तार्किक चिंतन
कूट :
A B C D उत्तर का चयन कीजिए-
U.P.B.E.O. (Pre) 2019
उत्तर-(b)
षड्दर्शन में मोक्ष प्राप्ति के मार्ग अलग-अलग बताए गए हैं। न्याय दर्शन तार्किक चिंतन को, मीमांसा दर्शन वैदिक अनुष्ठानों को, सांख्य दर्शन पुरुष और प्रकृति के भेद के वास्तविक ज्ञान (विवेकख्याति) को, तथा वेदांत दर्शन आत्मज्ञान (ब्रह्मज्ञान) को मोक्ष का साधन मानता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:
1. सांख्य दर्शन भारत का सबसे प्राचीन व्यवस्थित दर्शन माना जाता है। इसमें 25 तत्त्वों (24 प्रकृति के विकार + 1 पुरुष) का विवेचन है। सांख्य दर्शन द्वैतवादी है — यह पुरुष (चेतना) और प्रकृति (जड़) को अलग-अलग और नित्य मानता है।
2. वेदांत दर्शन (उत्तर मीमांसा) के प्रवर्तक बादरायण हैं और इसका मूल ग्रंथ ‘ब्रह्मसूत्र’ है। इसी दर्शन पर आदि शंकराचार्य ने अद्वैतवाद, रामानुजाचार्य ने विशिष्टाद्वैतवाद और मध्वाचार्य ने द्वैतवाद की स्थापना की — तीनों की व्याख्याएं ब्रह्मसूत्र पर आधारित हैं।
1. सांख्य दर्शन भारत का सबसे प्राचीन व्यवस्थित दर्शन माना जाता है। इसमें 25 तत्त्वों (24 प्रकृति के विकार + 1 पुरुष) का विवेचन है। सांख्य दर्शन द्वैतवादी है — यह पुरुष (चेतना) और प्रकृति (जड़) को अलग-अलग और नित्य मानता है।
2. वेदांत दर्शन (उत्तर मीमांसा) के प्रवर्तक बादरायण हैं और इसका मूल ग्रंथ ‘ब्रह्मसूत्र’ है। इसी दर्शन पर आदि शंकराचार्य ने अद्वैतवाद, रामानुजाचार्य ने विशिष्टाद्वैतवाद और मध्वाचार्य ने द्वैतवाद की स्थापना की — तीनों की व्याख्याएं ब्रह्मसूत्र पर आधारित हैं।
96. पुराणों के अनुसार, चंद्रवंशीय शासकों का मूल स्थान था –
U.P.P.C.S. (Pre) 2009
उत्तर-(c)
पुराणों के अनुसार क्षत्रिय वर्ण के तीन मूल वंश थे — सूर्यवंश, चंद्रवंश (सोमवंश) और अग्निवंश। चंद्रवंश की उत्पत्ति ब्रह्मा → अत्रि → चंद्रमा की परंपरा से मानी जाती है। त्रेतायुग में इनका केंद्र प्रयाग था, किंतु द्वापर युग में चंद्रवंशीय राजा संवारन ने प्रतिष्ठानपुर (वर्तमान झुंसी, प्रयागराज) को अपनी राजधानी बनाया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: महाभारत के पाण्डव और कौरव दोनों इसी चंद्रवंश की शाखाएँ थीं — पाण्डव पाण्डु के वंशज और कौरव धृतराष्ट्र के। इसके अलावा, यदुवंश — जिसमें श्रीकृष्ण का जन्म हुआ — भी चंद्रवंश की एक प्रमुख शाखा थी।
97. एक चालुक्य अभिलेख के तिथि अंकन में शक संवत् का वर्ष 556 दिया हुआ है। इसका तुल्य वर्ष है-
U.P.P.C.S. (Mains) 2002
उत्तर-(d)
शक संवत् 78 ईस्वी से प्रारंभ होता है, अतः किसी भी शक वर्ष को ईस्वी में बदलने के लिए उसमें 78 जोड़ा जाता है। इस प्रकार शक संवत् 556 = 556 + 78 = 634 ईस्वी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शक संवत् भारत का राष्ट्रीय पंचांग (National Calendar) है जिसे भारत सरकार ने 22 मार्च 1957 को आधिकारिक रूप से अपनाया। इसके अतिरिक्त, इस संवत् का प्रवर्तक कुषाण सम्राट कनिष्क को माना जाता है, जिनका साम्राज्य मध्य एशिया से उत्तर भारत तक फैला हुआ था।
98. अपूर्व का सिद्धांत संबंधित है-
Chhattisgarh P.S.C. (Pre) 2018
उत्तर-(d)
मीमांसा दर्शन में ‘अपूर्व’ की अवधारणा एक अदृश्य, अतिलौकिक शक्ति को इंगित करती है जो कर्म और उसके फल के बीच की कड़ी का काम करती है। ‘अपूर्व’ का शाब्दिक अर्थ है — “जो पहले नहीं था” या “कोई नई वस्तु जो पहले नहीं जानी गई।” यह शक्ति कर्म समाप्त होने के बाद भी बनी रहती है और भविष्य में फल देती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मीमांसा दर्शन के प्रवर्तक महर्षि जैमिनी हैं और इसका प्रमुख ग्रंथ ‘मीमांसासूत्र’ है। यह दर्शन वेदों में निहित कर्मकाण्ड (यज्ञ-याग आदि) की व्याख्या पर केंद्रित है और वेद की अपौरुषेयता (किसी मनुष्य द्वारा न रचे जाने) को दृढ़ता से स्वीकार करता है।
99. विशिष्ट अद्वैत सिद्धांत के संस्थापक कौन थे?
I.A.S. (Pre) 2021
उत्तर-(a)
रामानुजाचार्य (1017–1137 ई.) ने विशिष्टाद्वैत दर्शन का प्रतिपादन किया। उनके अनुसार ब्रह्म (ईश्वर), जीव और जगत — तीनों सत्य हैं, किंतु जीव और जगत ब्रह्म के विशेष अंग (विशेषण) हैं। इसके विपरीत शंकराचार्य ने जगत को मिथ्या (माया) माना था। रामानुज के दर्शन में मोक्ष का मार्ग भक्ति है। वल्लभाचार्य का मत ‘शुद्धाद्वैत’ तथा मध्वाचार्य का मत ‘द्वैतवाद’ कहलाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: रामानुजाचार्य श्री वैष्णव संप्रदाय के प्रमुख आचार्य थे और उन्होंने ‘श्रीभाष्य’ नामक ग्रंथ में ब्रह्मसूत्र की विशिष्टाद्वैत दृष्टि से व्याख्या की। उनका दर्शन बाद के भक्ति आंदोलन — विशेषकर दक्षिण भारत में अलवार संतों की परंपरा — का आधार बना।
100. पुलकेशिन-I का बादामी शिलालेख शक वर्ष 465 का दिनांकित है। यदि इसे विक्रम संवत् में दिनांकित करना हो, तो वर्ष होगा-
I.A.S. (Pre) 1997
उत्तर-(a)
शक संवत् 78 ई. से और विक्रम संवत् 58 ई.पू. से प्रारंभ होता है। किसी शक वर्ष को विक्रम संवत् में बदलने के लिए सूत्र है: विक्रम संवत् = शक संवत् + 78 + 58 = शक संवत् + 135। अतः 465 + 135 = 600, किंतु चूँकि 78 + 58 = 136 भी उपयोग होता है, सटीक परिणाम 465 + 78 + 58 = 601 होगा।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: पुलकेशिन-I चालुक्य वंश का संस्थापक था जिसने बादामी (वातापी, कर्नाटक) को अपनी राजधानी बनाया था। बादामी के प्रसिद्ध गुफा मंदिर इसी चालुक्य काल की वास्तुकला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं जो 6वीं-7वीं शताब्दी ईस्वी में निर्मित हुए।
101. निम्न में से किस भारतीय दर्शन ने परमाणु सिद्धांत का प्रतिपादन किया ?
66th B.P.S.C. (Pre) 2020
उत्तर-(d)
वैशेषिक दर्शन के प्रवर्तक महर्षि कणाद हैं, जिन्होंने सर्वप्रथम यह सिद्धांत प्रस्तुत किया कि सम्पूर्ण सृष्टि का निर्माण अणुओं (परमाणुओं) से हुआ है। उनके अनुसार परमाणु नित्य, अविभाज्य और अदृश्य हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वैशेषिक दर्शन सात पदार्थों (द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय और अभाव) की व्याख्या करता है। महर्षि कणाद का मूल नाम ‘उलूक’ था और उनके दर्शन को ‘औलूक्य दर्शन’ भी कहा जाता है; ‘कणाद’ नाम उन्हें इसलिए मिला क्योंकि वे कण-कण (अणु) के चिंतन में लीन रहते थे।
102. निम्नलिखित में से अद्वैत वेदांत के अनुसार, किसके द्वारा मुक्ति प्राप्त की जा सकती है ?
Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2015
उत्तर-(a)
अद्वैत वेदांत में मोक्ष का एकमात्र साधन ज्ञान है — “ज्ञानादेव मुक्तिः।” शंकराचार्य के अनुसार अज्ञान (अविद्या) ही बंधन का कारण है और ब्रह्म-ज्ञान प्राप्त होते ही जीव मुक्त हो जाता है। ज्ञानमार्ग के अधिकारी के लिए ‘साधनचतुष्टय’ — विवेक, वैराग्य, षट्सम्पत्ति और मुमुक्षुत्व — अनिवार्य हैं। इसके विपरीत, रामानुज के विशिष्टाद्वैत में भक्ति और मध्वाचार्य के द्वैतवाद में भी भक्ति को ही मोक्ष का साधन माना गया है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शंकराचार्य ने जगत को ‘मिथ्या’ (व्यावहारिक सत्य, पारमार्थिक दृष्टि से असत्य) और ब्रह्म को एकमात्र सत्य बताया। उनका प्रसिद्ध वाक्य है — “ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः।”
103. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए एवं नीचे दिए गए कूट की सहायता से सही
सूची-I (संवत्सर) सूची-II (किस समय से गणना)
A. विक्रम संवत्सर 1.3102 ई.पू.
B. शक संवत्सर 2.320 ईस्वी
C. गुप्त संवत्सर 3.78 ईस्वी
D. कलि संवत्सर 5.85 ईस्वी कूट :
A B C D उत्तर चुनिए-
सूची-I (संवत्सर) सूची-II (किस समय से गणना)
A. विक्रम संवत्सर 1.3102 ई.पू.
B. शक संवत्सर 2.320 ईस्वी
C. गुप्त संवत्सर 3.78 ईस्वी
D. कलि संवत्सर 5.85 ईस्वी कूट :
A B C D उत्तर चुनिए-
I.A.S. (Pre) 1995
उत्तर-(d)
विक्रम संवत् 57-58 ई.पू. से प्रारंभ होता है और इसे ‘मालव संवत्’ या ‘कृत संवत्’ भी कहा जाता है। शक संवत् 78 ई. से, गुप्त संवत् 319-320 ई. से (चंद्रगुप्त प्रथम द्वारा स्थापित) और कलि संवत् 3102 ई.पू. से माना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कलि संवत् की शुरुआत महाभारत युद्ध की समाप्ति और श्रीकृष्ण के निर्वाण से जोड़ी जाती है। विक्रम संवत् आज भी राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तर भारत के अनेक राज्यों में धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यों के लिए प्रचलित है।
104. ‘प्रच्छन्न-बौद्ध’ किसे कहा जाता है?
Chhattisgarh P.C.S. (Pre), 2019
उत्तर-(a)
शंकराचार्य को ‘प्रच्छन्न-बौद्ध’ (छुपा हुआ बौद्ध) इसलिए कहा गया क्योंकि उनके अद्वैत दर्शन में बौद्ध दर्शन — विशेषकर माध्यमिक बौद्ध (शून्यवाद) और योगाचार (विज्ञानवाद) — के कई तत्व समाविष्ट दिखते हैं। यह संज्ञा उनके आलोचकों द्वारा, विशेषकर रामानुज द्वारा, दी गई थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शंकराचार्य का जन्म केरल के कालड़ी ग्राम में लगभग 788 ई. में हुआ था। उन्होंने मात्र 32 वर्ष की अल्पायु में चार मठों की स्थापना की — श्रृंगेरी (दक्षिण), द्वारका (पश्चिम), पुरी (पूर्व) और बद्रीनाथ (उत्तर) — जो आज भी ‘शंकराचार्य पीठ’ के रूप में विद्यमान हैं।
105. लोकायत दर्शन किसको कहा जाता है ?
Chhattisgarh P.C.S. (Pre), 2019
उत्तर-(c)
चार्वाक दर्शन को ही ‘लोकायत दर्शन’ कहा जाता है। यह भारत का प्रमुख भौतिकवादी दर्शन है जो वेद, ईश्वर, आत्मा और परलोक को नकारता है। इसके अनुसार प्रत्यक्ष ही एकमात्र प्रमाण है और इस जीवन में सुख प्राप्त करना ही जीवन का उद्देश्य है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चार्वाक दर्शन के प्रवर्तक बृहस्पति को माना जाता है। इस दर्शन का मूल ग्रंथ ‘बार्हस्पत्य सूत्र’ था, जो अब उपलब्ध नहीं है। इनका प्रसिद्ध सूत्र वाक्य है — “यावज्जीवेत् सुखं जीवेत्, ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्” अर्थात् जब तक जीयो, सुख से जियो; ऋण लेकर भी घी पियो।
106. शंकर के दर्शन को कहा जाता है-
Chhattisgarh P.C.S. (Pre), 2019
उत्तर-(d)
शंकराचार्य के दर्शन को ‘अद्वैतवाद’ कहा जाता है। इसके अनुसार ब्रह्म ही एकमात्र परम सत्य है, जीव और ब्रह्म में भेद केवल अज्ञान (अविद्या) के कारण प्रतीत होता है। ब्रह्म निर्गुण, निराकार और सच्चिदानंद स्वरूप है। जगत की प्रतीति ‘माया’ के कारण होती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शंकराचार्य ने अपने दर्शन की स्थापना के लिए तत्कालीन प्रमुख दार्शनिकों से शास्त्रार्थ (वाद-विवाद) किया, जिनमें मंडन मिश्र से हुई प्रसिद्ध शास्त्रार्थ उल्लेखनीय है। मंडन मिश्र की पत्नी उभय भारती ने निर्णायक की भूमिका निभाई थी।
107. निम्नलिखित युग्मों में से कौन-सा एक भारतीय षड्दर्शन का भाग नहीं है?
I.A.S. (Pre) 2014
उत्तर-(c)
भारतीय षड्दर्शन में छः आस्तिक दर्शन सम्मिलित हैं — सांख्य (कपिल), योग (पतंजलि), न्याय (गौतम), वैशेषिक (कणाद), मीमांसा (जैमिनी) और वेदांत (बादरायण)। ये सभी वेद-प्रामाण्य को स्वीकार करते हैं, इसीलिए ‘आस्तिक’ कहलाते हैं। लोकायत (चार्वाक) और कापालिक वेद-विरोधी या वेद-बाह्य होने के कारण षड्दर्शन के अंग नहीं हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वेद को न मानने वाले दर्शनों को ‘नास्तिक दर्शन’ कहा जाता है, जिनमें बौद्ध, जैन और चार्वाक — तीन प्रमुख हैं। कापालिक एक तांत्रिक शैव संप्रदाय था जो मुख्यतः 8वीं–12वीं शताब्दी में दक्षिण भारत में सक्रिय था।
108. अद्वैत दर्शन के संस्थापक हैं-
Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2014
उत्तर-(a)
अद्वैत वेदांत के संस्थापक आदि शंकराचार्य हैं। उन्होंने उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और भगवद्गीता — इन तीनों को ‘प्रस्थानत्रयी’ कहा और इन पर भाष्य लिखकर अद्वैत दर्शन को सुदृढ़ आधार दिया। ब्रह्मसूत्र पर उनका भाष्य ‘शारीरकभाष्य’ या ‘ब्रह्मसूत्रभाष्य’ के नाम से प्रसिद्ध है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शंकराचार्य ने भारत में बौद्ध धर्म के प्रभाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने ‘दशनामी संप्रदाय’ की भी स्थापना की, जिसमें गिरि, पुरी, भारती, सरस्वती, वन, अरण्य, पर्वत, सागर, तीर्थ और आश्रम — ये दस उपाधियाँ हैं।
109. निम्न में से किसका संबंध ‘वेदांत दर्शन’ के साथ नहीं
M.P.P.C.S. (Mains) 2014
उत्तर-(b)
वेदांत दर्शन की प्रमुख शाखाओं के आचार्य हैं — शंकराचार्य (अद्वैतवाद), रामानुजाचार्य (विशिष्टाद्वैत) और मध्वाचार्य (द्वैतवाद)। अभिनव गुप्त (लगभग 950–1020 ई.) का संबंध वेदांत दर्शन से नहीं, बल्कि कश्मीर शैव दर्शन (त्रिक दर्शन) और भारतीय काव्यशास्त्र से है। उन्होंने ‘अभिनवभारती’ (नाट्यशास्त्र की टीका) और ‘तंत्रालोक’ जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अभिनव गुप्त ने ‘रस सिद्धांत’ में ‘अभिव्यक्तिवाद’ का प्रतिपादन किया। काव्यशास्त्र में उनका योगदान इतना महत्वपूर्ण है कि उन्हें भारतीय सौंदर्यशास्त्र (Aesthetics) का सर्वोच्च आचार्य माना जाता है।
110. निम्न कथनों पर विचार कीजिए तथा नीचे दिए गए कूट से सही
1. विक्रम संवत् 58 ई.पू. से आरंभ हुआ।
2. शक संवत् सन् 78 से आरंभ हुआ।
3. गुप्तकाल सन् 319 से आरंभ हुआ।
4. भारत में मुसलमान शासन का युग सन् 1192 से शुरू हुआ। कूट :
उत्तर चुनिए :
1. विक्रम संवत् 58 ई.पू. से आरंभ हुआ।
2. शक संवत् सन् 78 से आरंभ हुआ।
3. गुप्तकाल सन् 319 से आरंभ हुआ।
4. भारत में मुसलमान शासन का युग सन् 1192 से शुरू हुआ। कूट :
उत्तर चुनिए :
U.P.P.C.S. (Pre) 2011
उत्तर-(d)
सभी चारों कथन आयोग की दृष्टि से सही हैं। विक्रम संवत् 58 ई.पू. (कुछ मत से 57 ई.पू.) से, शक संवत् 78 ई. से, गुप्तकाल चंद्रगुप्त प्रथम के राज्यारोहण (319 ई.) से और भारत में मुस्लिम शासन का युग तराइन के द्वितीय युद्ध (1192 ई.) में मुहम्मद गोरी की विजय से माना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तराइन के द्वितीय युद्ध (1192 ई.) में मुहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान को पराजित किया था। इसके पश्चात् 1206 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली सल्तनत की स्थापना की, जिसे भारत में इस्लामी शासन के संस्थागत आरंभ का प्रतीक माना जाता है।
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