हूण : मध्य एशिया की बर्बर जाति
| शासक | महत्वपूर्ण तथ्य |
|---|---|
| तोरमाण | हूणों का प्रमुख शासक; उत्तर-पश्चिम भारत पर आक्रमण; गुप्त साम्राज्य के पतन को तेज किया |
| मिहिरकुल | सबसे शक्तिशाली हूण शासक; विनाशकारी आक्रमण; नरसिंहगुप्त बालादित्य और यशोधर्मन द्वारा पराजित |
➣ हूण मध्य एशिया की एक बर्बर जाति थी जो मूलतः मंगोलियन थे। हूण, शक और कुषाण जातियों की ही भाँति मध्य एशिया के निवासी थे ।
➣ वे जीविका की खोज में पश्चिम, दक्षिण-पश्चिम और फिर दक्षिण दिशाओं में दूर-दूर तक छा गये थे। हूणों की दो शाखाएं थी- पश्चिमी शाखा एवं पूर्वी शाखा।
➣ पश्चिमी शाखा ने यूरोप में पहुँच कर शक्तिशाली रोम साम्राज्य का अंत कर दिया जबकि दूसरी शाखा ने पांचवीं शताब्दी ई. में भारत पर आक्रमण किया।
➣ हूण जाति में तोरमाण तथा उसका पुत्र मिहिरकुल दो प्रसिद्ध नेता हुए। जिसमे मिहिरकुल की मृत्यु के पश्चात् भारत से हूणों का अंत हुआ।
➣ दोनों का उल्लेख कल्हण की राजतरंगिणी में मिलता है।
भारत में हूणों का आक्रमण
➣ प्रथम हुण आक्रमण खुशनवाज के नेतृत्व में लगभग 455 ई. में गुप्त शासक स्कंदगुप्त के समय हुआ।
➣ हूणों की पूर्वी शाखा अफ़ग़ानिस्तान से होकर भारत के पश्चिमोत्तर सीमा से बढ़ते हुए तक्षशिला तक आ गए और तक्षशिला के सांस्कृतिक वैभव को और उसके विश्वविद्यालय को पूर्णतया नष्ट कर दिया।
➣ किन्तु तत्कालीन गुप्त शासक स्कन्दगुप्त ने इन्हें पीछे धकेल दिया। स्कन्दगुप्त के समय में हूण गान्धार से आगे नहीं बढ़ सके। इस प्रकार गुप्त साम्राज्य का वैभव उसके शासन काल में प्रायः अक्षुण्ण रहा।
➣ कास्मोस इन्दिकप्लेस्तेस नामक एक यूनानी ने मिहिरकुल के समय भारत की यात्रा की थी। उसने क्रिस्टचिँन टोपोग्राफ़ी नामक ग्रन्थ में लिखा हैं, की हूण भारत के उत्तरी पहाड़ी में निवास करते थे।
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(गांधार का प्रथम हूण शासक) ↓ ख़ुशनेबाज (स्कंदगुप्त के शासनकाल में असफल आक्रमण) ↓ तोरमाण (स्कंदगुप्त के पश्चात सफल आक्रमण) प्रथम राजधानी स्यालकोट ↓उत्तराधिकारी मिहिरकुल (मालवा के यशोधर्मन द्वारा खदेड़ा गया) ↓ मिहिरकुल का कश्मीर पर कब्ज़ा द्वितीय राजधानी गांधार पुन: आक्रमण, यशोधर्मन द्वारा मारा गया |
तोरमाण
➣ स्कंदगुप्त के शासनकाल के पश्चात हूणों का आक्रमण तोरमाण के नेतृत्व में फिर हुआ परन्तु उत्तराधिकारी आक्रमण को रोकने में असफल साबित हुए।
➣ इस प्रकार तोरमाण भारत विजय करने वाला वह प्रथम विदेशी शासक था, जिसने मध्य भारत तक अपना साम्राज्य स्थापित किया।
➣ सन् 485 तक, हूणों ने पूर्वी मालवा और मध्य भारत के बड़े हिस्सों पर कब्जा कर लिया, जहाँ उनके अभिलेख पाए गए हैं।
➣ पंजाब और राजस्थान जैसे मध्यवर्ती क्षेत्रपर भी उनका अधिकार हो गया। छठी शताब्दी की शुरुआत में गुप्त साम्राज्य की सीमा बहुत सीमित हो गई।
➣ कालांतर में उसका प्रभुत्व सम्भवत: मध्य प्रदेश, नमक की पहाड़ियों तथा मध्य भारत तक व्याप्त हो गया। अपनी विजयों के बाद उसने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की थी।
➣ एरण का वराह प्रतिमा अभिलेख तोरमाण के प्रथम वर्ष का अभिलेख है। इससे ज्ञात होता है कि एरण के धन्य विष्णु ने गुप्तों के स्थान पर तोरमाण की अधीनता स्वीकार कर ली थी।
➣ धन्य विष्णु के एरण (मालवा) के वराह प्रतिमा अभिलेख में भी तोरमाण का उल्लेख मिलता है। इसके अलावा कुरा अभिलेख में भी तोरमाण का जिक्र मिलता है। कुरा अभिलेख व तोरमाण की रजत मुद्राओं पर षाहि-जउब्ल की उपाधि मिली है।
➣ जैन ग्रन्थ कुवलयमाला के अनुसार तोरमाण की राजधानी चन्द्रभागा (चिनाब) नदी के किनारे पवैया थी जबकि तोरमाण के सेनापति कराल ने साकल (स्यालकोट) को अपनी राजधानी बनाया।
➣ तोरमाण का सुप्रसिद्ध पुत्र मिहिरकुल अथवा मिहिरगुल लगभग 502 ई. में उसका उत्तराधिकारी बना।
मिहिरकुल
➣ तोरमाण के बाद उसका पुत्र मिहिरकुल शासक बना। उसका साम्राज्य भारत से बाहर अफ़ग़ानिस्तान तक विस्तृत था। व्हेनसांग के अनुसार उसकी प्रारंभिक राजधानी स्यालकोट (साकल) थी।
➣ ह्वेनसांग ने मिहिरकुल को पंचभारत का स्वामी कहा है एवं राजधानी साकल बताई है। पंचभारत में सम्मलित क्षेत्र हैं- पंजाब, बंगाल, कन्नौज (उत्तरप्रदेश), मिथिला (बिहार) एवं उड़ीसा।
➣ मिहिरकुल को बड़ा ही अत्याचारी शासक माना जाता है। ह्वेनसांग के अनुसार उसने बौद्धों पर बहुत अत्याचार किये और उनका कठोरतापूर्वक दमन किया। जैन लेखक ने मिहिरकल को दुष्टों में प्रथम कहा है।
➣ मिहिकुल एक कट्टर शैव था। उसने अपने शासन काल में हज़ारों शिव मंदिर बनवाये।
➣ मिहिरकुल ने ग्वालियर अभिलेख में अपने को शिव भक्त कहा हैं। मिहिरकुल के सिक्कों पर जयतु वृष लिखा हैं, जिसका अर्थ हैं- जय नंदी। ऐसा माना जाता है कि हूणों ने ही हर-हर महादेव का नारा दिया था।
➣ मंदसोर अभिलेख के अनुसार यशोधर्मन से युद्ध होने से पूर्व उसने भगवान स्थाणु (शिव) के अलावा किसी अन्य के सामने अपना सिर नहीं झुकाया था।
➣ मंदसौर अभिलेख से प्राप्त जानकारी के अनुसार 533ई॰ के लगभग मालवा का शासक यशोधर्मन्, हूण शासक मिहिरकुल को हरा कर उसे कश्मीर की ओर विस्थपित कर दिया था।
➣ इस युद्ध में कई राजाओं के साथ गुप्त शासक नरसिंह बालादित्य ने भी भाग लिया था।
प्रारम्भिक गुप्त शासक वैष्णव धर्म के उपासक थे जबकि स्कंदगुप्त के उत्तराधिकारियों ने बौद्ध धर्म अपना लिया था। नरसिंह बालादित्य स्वंय बौद्ध अनुयायी था। जिसने अहिंसा नीति के पालन करते हुए उसे मुक्त कर दिया।
➣ कश्मीर में विद्रोह कर मिहिरकुल वहां का शासक बना तथा गांधार पर अपना अधिकार स्थापित किया जिसे उसने अपनी राजधानी बनाई और अजमेर की और गूँज किया।
➣ यशोधर्मन् को सूचना मिलने पर राजा फिर से संगठित होने लगे। अजमेर में भीषण युद्ध में मिहिरकुल मारा गया। मिहिरकुल की मृत्यु के पश्चात् भारत में हूणों अधिपत्य समाप्त होने लगा।
➣ मिहिरकुल ने कश्मीर में मिहिरपुर नामक नगर बसाया था। कल्हण के अनुसार मिहिरकुल ने कश्मीर में श्रीनगर के पास मिहिरेशवर नामक भव्य शिव मंदिर बनवाया था।
- मिहिरकुल का ग्वालियर अभिलेख है। इसमें विदित है कि उसने सूर्य मन्दिर बनवाया था।
- हरिगुप्त ने तोरमाण को जैन धर्म में दीक्षित किया था।
- तोरमाण के छोटे ताँबे के सिक्के पंजाब व उत्तरप्रदेश से प्राप्त होते हैं।
- हूणों ने केवल ताँबे व चाँदी के सिक्के चलाए।
- हूणों ने संस्कृत को राजभाषा बनायी।
➣ इस समय वर्धन या पुष्यभूति वंश (550–650 ई.) के द्वारा थानेश्वर और उसके आस-पास के इलाके पर अपना नया राज्य स्थापित किया गया।
➣ धीरे-धीरे बंगाल भी गुप्तों के अधिकार से बाहर हो गया और वहाँ गौड़ के एक नये राजवंश का उदय हुआ, जिसमें शशांक एक शक्तिशाली शासक हुआ। इस प्रकार भारत के एक महान साम्राज्य का अंत हो गया।
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❑ उल्लेखनीय है पुष्यभूति वंश से हर्षवर्धन(बौद्ध की महायान शाखा का संरक्षक) होता है, जिसे अंतिम हिन्दू सम्राट भी कहा गया है। ❑ बंगाल शासक शशांक (शैव सम्प्रदाय) का अनुयायी था। यह कट्टर बौद्ध विरोधी था जिसने गया में बौधि वृक्ष को कटवा दिया था (वर्तमान में गया में, जो बौधिवृक्ष है वो चौथी पीढ़ी का है)। ❑ शशांक ने ही धोखे से हर्षवर्धन के बड़े भाई राज्य वर्धन की हत्या की थी, इसे कालांतर में हर्षवर्धन से परास्त होना पड़ा। |
हूण आक्रमणों का राजनीतिक प्रभाव
➣ हूण आक्रमणों ने भारतीय राजनीति पर गहरा और स्थायी प्रभाव डाला। इनके परिणामस्वरूप गुप्त साम्राज्य की केंद्रीय शक्ति लगभग समाप्त हो गई और लगभग 550 ईस्वी तक उसका पूर्ण पतन हो गया।
➣ हूण आक्रमण गुप्तोत्तर काल की राजनीतिक संरचना के निर्माण में महत्वपूर्ण सिद्ध हुए। इनके कारण राजनीतिक विखंडन बढ़ा और अनेक छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्यों के उदय का मार्ग प्रशस्त हुआ।
➣ गुप्त साम्राज्य के कमजोर होने के बाद कोई भी शक्ति पूरे उत्तर भारत पर स्थायी नियंत्रण स्थापित नहीं कर सकी, जिससे क्षेत्रीय राज्यों का महत्व बढ़ गया।
➣ गुप्त शासकों को हूणों से संघर्ष के दौरान स्थानीय शासकों और सेनापतियों की सहायता लेनी पड़ी। बदले में उन्हें भूमि अनुदान दिए गए, जिससे सामंत वर्ग का उदय हुआ और सामंतवाद को बढ़ावा मिला।
➣ पश्चिमोत्तर भारत (विशेषकर पंजाब और राजस्थान) हूण आक्रमणों से अधिक प्रभावित हुआ। इस अस्थिरता ने नए क्षेत्रीय राजवंशों और बाद में उभरने वाले राजपूत वंशों के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ पैदा कीं।
➣ यद्यपि पुष्यभूति वंश के हर्षवर्धन ने कुछ समय के लिए उत्तर भारत को पुनः एकीकृत किया, लेकिन उनका साम्राज्य स्थायी और पूर्णतः केंद्रीकृत नहीं था।
➣ हूण मुख्य रूप से घुड़सवार योद्धा थे। उनके आक्रमणों के बाद भारतीय सेनाओं में घुड़सवार सेना और भारी अश्वारोही सैनिकों का महत्व पहले की तुलना में काफी बढ़ गया।
➣ अंततः हूण भारतीय शासकों द्वारा पराजित कर दिए गए और धीरे-धीरे भारतीय संस्कृति में विलीन हो गए। बाद के समय में कुछ हूण समूहों और शासकों ने हिंदू धर्म अपनाया तथा स्थानीय राजवंशों और समाज का हिस्सा बन गए।
| प्रभाव का प्रकार | विस्तार |
|---|---|
| बौद्ध धर्म पर विनाशकारी प्रभाव | मिहिरकुल ने बौद्ध विहारों, स्तूपों और मठों को बड़े पैमाने पर नष्ट किया (तक्षशिला, पेशावर, कश्मीर आदि)। इससे बौद्ध धर्म भारत में तेजी से कमजोर पड़ा। |
| हिंदू धर्म का पुनरुत्थान | हूण शासक बाद में हिंदू धर्म की ओर मुड़े। शिव और सूर्य पूजा को बढ़ावा मिला, जिससे पुराणिक हिंदू धर्म को नया बल मिला। |
| राजपूत वंशों पर प्रभाव | कई राजपूत वंशों (प्रतिहार, चौहान आदि) में हूण रक्त और योद्धा परंपरा का मिश्रण माना जाता है। |
| कला और स्थापत्य पर प्रभाव | गंधार कला का अंतिम पतन। बौद्ध मूर्तिकला और स्थापत्य को भारी नुकसान पहुंचा। |
| सैन्य एवं घुड़सवारी संस्कृति | हूणों ने भारत में उन्नत घुड़सवारी और घोड़े की तकनीक लाई, जो बाद में राजपूत संस्कृति में शामिल हुई। |
| सामाजिक प्रभाव | हूणों के कुछ समूह भारतीय समाज में घुल-मिल गए और क्षत्रिय वर्ण में शामिल हुए। |
| धार्मिक सहिष्णुता का परिवर्तन | आरंभिक क्रूरता के बाद हूण शासकों ने हिंदू मंदिरों का निर्माण भी करवाया (जैसे शिव मंदिर)। |
निष्कर्ष
➣ हूण आक्रमण मुख्य रूप से गुप्त साम्राज्य के पतन के सबसे बड़े कारणों में से एक थे। इन्होंने केंद्रीकृत शक्ति को समाप्त करके विखंडन, सामंतवाद और क्षेत्रीय राज्यों के युग (गुप्तोत्तर काल) की शुरुआत की।
मालवा : यशोधर्मन (528 -543 ई. )
➣ यशोधर्मन अथवा यशोधर्मा को विष्णुधर्मन नाम से भी जाना जाता है इसके पिता का नाम प्रकाश वर्धन था।
➣ मालवा नरेश यशोधर्मा की मन्दसौर प्रशस्ति की रचना वासुल ने की। इसमें यशोधर्मन् (यशोधर्मा) द्वारा हूण शासक मिहिरकुल को परास्त करने का वर्णन है।
➣ इसका उत्थान एवं पतन 528 ई. से 543 ई. के बीच हुआ। सम्भवतः शासनकाल 535 ई. तक समाप्त हो गया। मंदसोर प्रशस्ति में उसे जनेन्द्र कहा गया था।
➣ वह औलिकर वंश से संबंधित था। उसके पूर्वजों के विषय में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।
➣ हूणों के ऊपर विजय पाने के उपरांत यशोधर्मन् ने भानुगुप्त के पुत्र वज्र को पराजित कर उसे मार डाला। जिससे उसके पश्चिमी तथा दक्षिणी भागों से प्रधान गुप्तवंश का शासन समाप्त हो गया।
➣ हालाँकि परवर्ती गुप्तों का शासन मगध तथा उत्तरी बंगाल में कुछ समय बाद तक बना रहा।
➣ सन् 532 में लगभग पूरे उत्तर भारत में अपनी विजय की याद में यशोधर्मन ने मंदसौर में दो कीर्ति स्तम्भ स्थापित किया।
➣ कीर्ति स्तम्भों पर अंकित अभिलेखों के अनुसार वह ब्रह्मपुत्र से पश्चिमी समुद्र और हिमालय से त्रावनकोर प्रदेश के पश्चिमी घाट में स्थित महेन्द्रगिरि तक सम्पूर्ण भारत पर शासन करता था।
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