पल्लव राजवंश का उदय : तीसरी शताब्दी ई.
➣ भारत के सुदूर दक्षिण में पल्लव राजवंश का उदय उस समय हुआ, जब सातवाहन साम्राज्य का पूर्णत: विघटन हो गया। आरंभ में पल्लव सातवाहनों के अधीनस्थ शासक थे।
➣ परंतु वाकाटक, आभीर, कदम्ब वंशों की भांति पल्लवों ने भी अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली तथा 6वीं सदी ई. तक दक्षिण भारतीय राजनीति में अपना विशेष स्थान बना लिया।
➣ पल्लवों का अधिकार दक्षिणी आन्ध्र और उत्तरी तमिलनाडु दोनों पर था। उन्होंने अपनी राजधानी कांची (आधुनिक कांचीपुरम) स्थानान्तरित की।
➣ पल्लव अभिलेखों में पल्लवों को ब्राह्मण, भारद्वाजगोत्रीय तथा अश्वात्थामा का वंशज कहा गया है। तालगुंडा अभिलेख से उनके क्षत्रिय होने की जानकारी मिलती है।
➣ अधिकांश पल्लव राजा वैष्णव थे। आचार्य अय्यर ने पल्लव राज्य में शैव मत का प्रचार-प्रसार किया था। जिनके प्रभाव से महेन्द्र वर्मन प्रथम ने शैव धर्म अपना लिया।
➣ यद्यपि पल्लवों के राजनीतिक तथा सांस्कृतिक उत्कर्ष का केन्द्र कांची थी, किन्तु उनका मूल निवास तोण्डमण्डलम् था।
➣ पल्लव राजाओं का शासन काल नयनार (शैव) तथा अलवार (वैष्णव) जैसे भक्ति आंदालनों के लिए प्रसिद्ध रहा।
➣ पल्लव शासक महेन्द्र वर्मन प्रथम के शासनकाल में पल्लवों और चालुक्यों के बीच लंबा संघर्ष शुरू होने का उल्लेख मिलता है।
सिंहविष्णु (575 – 600 ई.) : पल्लव शक्ति का पुनरुत्थान
➣ पल्लवों का प्रथम प्रमुख राजा सिंहविष्णु था। उसने अवनि सिंह की उपाधि धारण की थी। यह सिंहवर्मन का पुत्र व उत्तराधिकारी था।
➣ वह एक वीर व पराक्रमी राजा था। कशाक्कुडि लेख से पता चलता है कि उसने चेर, चोल, पांड्य, मलय, मालवा, कलभ्र व सिंहल (श्रीलंका) के राजा को युद्ध में पराजित कर अपनी शक्ति का विस्तार किया।
➣ उसकी सत्ता तमिल प्रदेश में पूरी तरह स्थापित हो गयी। उसने अपने राज्य की सीमा कावेरी नदी तक विस्तृत कर ली।
➣ उसने माम्मलपुरम का आदिवराह गुहा मंदिर का निर्माण कराया। इस मंदिर में सिंहविष्णु व उसकी दो रानियों की प्रतिमा स्थापित की गयी है।
महेन्द्रवर्मन प्रथम (600 – 630 ई.) : शैलकृत वास्तुकला का प्रारंभ
➣ सिंहविष्णु का उत्तराधिकारी महेन्द्रवर्मन प्रथम बहुमुखी प्रतिभा का धनी था। उसने विवित्रचित्त, मत्त-विलास, गुणभर, चैत्याकारी, शत्रुमल्ल, ललितांकुर, अवनिभाजन, संकीर्ण-जाति आदि उपाधि धारण की।
➣ इसका समकालीन चालुक्य (बादामी) सम्राट पुलकेशिन द्वितीय था। पुलकेशिन द्वितीय ने महेन्द्रवर्मन प्रथम पर आक्रमण कर पल्लवों व चालुक्यों के बीच लंबे समय तक चलने वाले राजनीतिक संघर्ष को शुरू किया।
➣ पुलकेशी द्वितीय अनेक युद्धों में विजयी हुआ, जिनमें पुलकेशी द्वितीय विजयी हुआ। कसक्कुडी ताम्रपत्रों से ज्ञात होता है कि, किसी युद्ध में महेन्द्र वर्मन प्रथम ने भी पुलकेशी को परास्त किया था।
➣ एहोल अभिलेख के उल्लेख के से पता चलता है कि, पुलकेशी द्वितीय ने पल्लवों से वेंगी को छीन लिया था। जिसमे से चालुक्य की नई शाखा (वेंगी के चालुक्य ) का उदय हुआ।
➣ उसने ब्रह्मा, विष्णु और शिव के बहुत से मन्दिर अपने राज्य में बनवाये, और चैत्यकारी की उपाधि धारण किया।
➣ उसने मत्तविलास प्रहसन तथा भगवदज्जुकीयम जैसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की। जिसमे मत्तविलास प्रहसन एक हास्य ग्रंथ है। इसमें कपालियों तथा भिक्षुओं पर व्यंग्य कसा गया है।
➣ महेन्द्र वर्मन प्रथम ने सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ रुद्राचार्य के निर्देशन में संगीत का अध्ययन किया था।
➣ उसके संरक्षण में ही संगीतशास्त्र पर आधारित ग्रंथ कुडमिमालय की रचना हुई, जो वीणाशास्त्र पर आधारित है।
➣ उसने शैव सन्त अप्पर या नय्यर के प्रभाव से जैन धर्म का परित्याग कर शैवमत ग्रहण कर लिया था।
➣ महेन्द्र वर्मन प्रथम ने सर्वप्रथम दक्षिण भारत में आडम्बरयुक्त मंदिरों के स्थान पर आकर्षक शैल मण्डप वास्तु शैली (महेन्द्रवर्मन शैली) प्रोत्साहित की।
➣ कहा जाता है कि, इसने पारलिपुरम के जैन मंदिर को तुड़वाकर उनके अवशेषों से तिवाड़ि (दक्षिण अर्काट) में एक जैन मंदिर बनवाया था।
नरसिंहवर्मन प्रथम (630 – 668 ई.) : वातापी विजय एवं मामल्लपुरम् का विकास
➣ महेन्द्रवर्मन प्रथम के बाद उसका पुत्र नरसिंहवर्मन प्रथम कांची की राजगद्दी पर बैठा। नरसिंहवर्मन प्रथम पल्लव वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था। उसने अपने पिता की पराजय के अपमान का बदला लिया।
➣ उसने पल्लवों की सैन्य शक्ति को पुनः संगठित कर उत्तर दिशा में विजय यात्रा आरंभ की और चालुक्य सम्राट पुलकेशिन द्वितीय को तीन युद्धों (परियाल, शूरमार, मणिमंगलम) में परास्त किया। उसे हराने के पश्चात उसने दक्षिणापथेश्वर (दक्षिण का स्वामी) की उपाधि धारण की थी।
➣ इस विजय का उल्लेख बादामी में मल्लिकार्जुन मंदिर के पीछे एक पाषाण पर उत्कीर्ण है, जिसे उसके सेनापति शिरुतोण्ड ने उत्कीर्ण करवाया था।
➣ नरसिंह वर्मन प्रथम से हुए युद्ध में पुलकेशी द्वितीय ने वीरगति प्राप्त की थी। उसने पुलकेशी द्वितीय की पीठ पर विजय शब्द अंकित करवाया था।
उल्लेखनीय है पुलकेशी द्वितीय ने उत्तर-भारत सम्राट हर्षवर्धन (606-647 ई.) को उसके दक्षिण अभियान में रोका था।
➣ वातापी जीतने के उपलक्ष्य में बातापीकोण्ड (वातापी का विजेता) एवं महामल्ल/माम्मल की उपाधि अपने नाम के साथ जोड़ ली।
➣ उसके काशाक्कुटि ताम्रपत्र अभिलेख एवं महावंश के उल्लेख से उसकी लंका विजय प्रमाणित होती है। इसी कारण इस लेख में नरसिंह वर्मा प्रथम की तुलना लंका विजय राम से की गई।
➣ महावंश के 47वें अध्याय के अनुसार लंका का राजकुमार मारवर्मन भारतीय राजा नरसिंह वर्मन के दरबार में रहता था।
➣ कांची के निकट एक बन्दरगाह वाला नगर महामल्लपुरम (महाबलीपुरम) बसाने का श्रेय नरसिंह वर्मन प्रथम को दिया गया है। इस नगर में उसने अनेक विशाल मंदिरों का निर्माण कराया, जिनमें से धर्मराज मंदिर अब तक विद्यमान है।
➣ नरसिंहवर्मन प्रथम ने शिव की उपासना में कई मन्दिर बनवाये थे। परमेश्वर वर्णन प्रथम शिव का अनन्य उपासक था, जिसकी उपाधि परममाहेश्वर की थी।
➣ इसके समय में सिंह शीर्षक स्तम्भ की नई शैली (द्रविड़ शैली ) का विकास हुआ, जिसे इसके नाम पर मामल्य शैली का नाम दिया गया।
➣ महाबलीपुरम के सप्तरथ इसी के शासनकाल में बनाए गए थे। इनका नामकरण पाण्डव, द्रौपदी तथा गणेश के नाम पर किया गया था। कांची का विश्वविद्यालय शिक्षा का महान् केन्द्र था। कदम्ब वंशीय राजकुमार मयूर शर्मन शिक्षा ग्रहण करने कांची आया था।
➣ कदम्ब वंश के शासक मयूरशर्मन ने पल्लवों की राजधानी काँची में शिक्षा प्राप्त की तथा वहाँ अपमानित होने पर बनवासी में कदम्ब राजवंश की स्थापना की थी।
➣ उसके शासन काल में 641 ई. में चीनी यात्री ह्वेनसांग कांची गया था। उसके अनुसार कांची में 100 संघाराम थे, जिनमें 1000 भिक्षु निवास करते थे। उल्लेखनीय है ह्वेनसांग 629 ई. में भारत आया था।
➣ महेन्द्र वर्मन द्वितीय नरसिंह वर्मन प्रथम का पुत्र एवं उत्तराधिकारी था। पल्लव राजा महेन्द्रवर्मन द्वितीय, वातापी के चालुक्य नरेश विक्रमादित्य प्रथम के द्वारा मारा गया था।
महेन्द्रवर्मन द्वितीय (668 – 670 ई.) : चालुक्यों से संघर्ष
➣ नरसिंहवर्मन प्रथम के पश्चात् महेन्द्रवर्मन द्वितीय शासक बना। वह दो वर्ष तक ही शासन कर सका। पल्लव-चालुक्य संघर्ष में उसे पुलकेशिन द्वितीय के पुत्र विक्रमादित्य प्रथम के हाथों हत्या कर दी गयी।
➣ कुछ लेखों में इसे मध्यम लोकपाल कहा गया है।
परमेश्वरवर्मन प्रथम (670 – 700 ई.) : चालुक्य आक्रमणों का प्रतिरोध
➣ महेन्द्रवर्मन द्वितीय की हत्या के बाद उसका पुत्र परमेश्वरवर्मन प्रथम पल्लव राज्य का शासक बना।
➣ परमेश्वरवर्मन प्रथम का समकालीन चालुक्य सम्राट विक्रमादित्य प्रथम था, उसका संघर्ष सबसे पहले चालुक्य नरेश विक्रमादित्य प्रथम से हुआ, जो पुलकेशी द्वितीय के समान ही वीर और विजेता था।
➣ पेरुडनंल्लुर के युद्ध में चालुक्य (वातापी ) राज विक्रमादित्य से अपनी पहली पराजय का बदला लिया।
➣ परमेश्वर वर्मन प्रथम ने विद्याविनीत उग्रदण्ड, लोकादित्य, चित्रमान, गुणाभाजन, श्रीभर एकमल्ल, रणंजय जैसे उपाधि धारण की थी। वह विद्या प्रेमी के कारण विद्याविनीत की उपाधि धारण किया।
➣ इसके समय में मामल्लपुर का प्रसिद्ध गणेश मंदिर निर्मित हुआ तथा कूरम के शिव मंदिर का निर्माण हुआ।
➣ कूरम के शिव मंदिर का नामकरण इसी के नाम पर विद्या विनीत पल्लव परमेश्वरगहम किया गया।
➣ यह परम शैव था। यह बात इसकी परमाहेश्वर की उपाधि से प्रमाणित होती है।
नरसिंहवर्मन द्वितीय ‘राजसिंह’ (700 – 728 ई.) : कैलाशनाथ मंदिर का निर्माण
➣ परमेश्वरवर्मन प्रथम के प्रताप और पराक्रम से पल्लवों की शक्ति इतनी बढ़ गयी थी कि जब उसके मरणोपरांत नरसिंहवर्मन द्वितीय कांची की राजगद्दी पर बैठा। उसे किसी बड़े युद्ध में जुझने की आवश्यकता नहीं पड़ी।
➣ नरसिंहवर्मन द्वितीय का शासनकाल शांति व व्यवस्था का काल था और इसीलिए वह अपनी शक्ति को निश्चिततापूर्वक मंदिरों के निर्माण में लगा सका।
➣ नरसिंहवर्मन द्वितीय ने कांची का कैलाशनाथ मंदिर (राजसिद्धेवश्र मंदिर/राजसिंहेश्वर मंदिर) व ऐरावतेश्वर के विशाल मंदिर तथा मामल्लपुरम् के अनेक प्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण करवाया।
➣ उसने राजसिंह, आगमप्रिय एवं शंकर भक्त की उपाधियाँ धारण की थीं। उसे राज-सिद्धेश्वर भी कहा जाता था।
➣ इसके अतिरिक्त प्रशस्तियों में इसे अन्यन्तकाम, रणंजय, श्रीभर, उग्रदण्ड, अपराजित, शिवचुड़मणि, यित्रकार्मुक, रणविक्रम, आमित्रमल, आहवकेशरी, परमचक्रमर्दन, पाथविक्रय, समरधनन्जय आदि उपाधियों से भी विभूषित किया गया है।
➣ मंदिर निर्माण की शैली में नरसिंह वर्मन द्वितीय ने एक नई शैली राजसिंह शैली का प्रयोग किया था।
➣ एक महान विजेता के साथ वह एक संगीत प्रेमी भी था। इसकी वाद्यविद्याधर, वीणानारद, अंतोदय-तुम्बुरु उपाधियाँ उसकी संगीत के प्रति रुझान की परिचायक हैं।
➣ उसकी राजसभा में प्रसिद्ध लेखक दण्डिन रहते थे जिन्होंने दशकुमारचरित, अवन्तिसुन्दरी कथा तथा काव्यादर्श की रचना की।
➣ दण्डि को वाल्मीकि तथा व्यास की कोटि का तीसरा कवि माना जाता है। दशकुमारचरित में पाटलिपुत्र के राजा राजहंस तथा उसके मंत्रियों के दस पुत्रों के जीवन की साहसिक घटनाओं का विवरण है।
➣ उसने अपना एक दूतमण्डल चीन भेजा व चीनी बौद्ध यात्रियों के लिये नागपट्टनम में एक विहार निर्मित करवाया।
➣ नरसिंह वर्मन द्वितीय ने कांची में घटिका (संस्कृत महाविद्यालय) की स्थापना की। उसे घटिकाओं का पुनर्स्थापक कहा जाता है।
➣ नरसिंहवर्मन द्वितीय ने कांची में घटिका (संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना की थी। लगभग 720 ई. में एक दूत मंडल चीन भेजा।
परमेश्वरवर्मन द्वितीय (728 – 731 ई.) : पल्लव शक्ति का कमजोर होना
➣ यह नरसिंह वर्मन द्वितीय का छोटा पुत्र और उसका उत्तराधिकारी था।
➣ कशाक्कुडि-अभिलेख में इसे बृहस्पति नीति का आदर्श, संरक्षक एवं कुशल प्रशासक कहा गया है।
➣ चालुक्यों के उलचल- अभिलेख से ज्ञात होता है कि, चालुक्य राजा विक्रमादित्य द्वितीय ने गंग शासक दुर्विनीत ऐरयप्प की सहायता से पल्लव नरेश परमेश्वर वर्मन द्वितीय पर आक्रमण कर उसे परास्त कर मार डाला था।
➣ परमेश्वरवर्मन द्वितीय की हत्या के बाद राजसत्ता के लिए गृहकलह छिड़ गया। गृहकलह का अंत करने के लिए प्रजा के प्रतिनिधियों ने नंदिवर्धन पल्लवमल को 12 वर्ष की अल्पायु में शासक बनाया गया।
नंदिवर्मन द्वितीय (731 – 800 ई.) : पल्लव सत्ता का पुनर्गठन
➣ नंदिवर्मन द्वितीय पल्लवों की दूसरी शाखा (सिंहविष्णु के भाई भीमवर्मन का वंशज) से संबद्ध था। यह हिरण्यवर्मन का पुत्र एंव परमेश्वरवर्मन द्वितीय का उत्तराधिकारी हुआ। इसने पल्लव राजाओं में सबसे अधिक समय तक शासन किया था।
➣ कशाक्कुण्डि लेख में इसके लिए पल्लवमल्ल, क्षत्रिय मल्ल, राजाधिराज, परमेश्वर एवं महाराज आदि उपाधियों का प्रयोग किया गया है।
➣ इसके शासन काल में पल्लवों का चालुक्यों, पाण्ड्यों तथा राष्ट्रकूटों से संघर्ष हुआ। उसने पल्लवों की सैन्य शक्ति को पुनः संगठित किया और कांची को चालुक्यों की अधीनता से मुक्त कराया।
➣ यह चालुक्य (वातापी ) का अंतिम नरेश कीर्तिवर्मा द्वितीय के समकालीन था। यह समय चालुक्य की वातापी शाखा के अंत एंव राष्ट्रकूट के उदय का था।
➣ गोविन्द तृतीय के अभिलेख से प्रमाणित होता है कि, राष्ट्रकूट सत्ता का संस्थापक दतिदुर्ग ने 750 ई. आक्रमण कर कांची पर विजय प्राप्त थी।
➣ शांति समझौते के फलस्वरूप अपनी पुत्री रेवा का विवाह नंदिवर्मन द्वितीय के साथ करने के बाद वापस चला गया।
➣ कालांतर में नंदिवर्मन द्वितीय का उत्तराधिकारी पुत्र दंतिवर्मन का जन्म इसी राष्ट्रकूट राजकुमारी रेखा से हुआ। इस वैवाहिक संबंध के बावजूद आगे पल्लव-राष्ट्रकूट संघर्ष जारी रहा।
➣ नन्दि वर्मन द्वितीय वैष्णव धर्म का अनुयायी था। उसके समय में समकालीन वैष्णव सन्त तिरुमंगै अलवार ने वैष्णव धर्म का प्रचार-प्रसार किया।
➣ उसने कला और साहित्य को पर्याप्त प्रोत्साहन दिया। उसने कांची को मुक्तेश्वर मन्दिर तथा बैकुण्ठ पेरुमल मन्दिर का निर्माण करवाया था।
दन्तिवर्मन (800 – 846 ई.) : राष्ट्रकूट संघर्ष एवं पल्लव पतन की शुरुआत
➣ यह नन्दिवर्मन का पुत्र था जो उसकी पत्नी राजमहिषी रेवा (राष्ट्रकूट नरेश दन्तिदुर्ग की कन्या) से उत्पन्न हुआ था। दन्तिवर्मन को उसका महासामन्ताधिपति कहा गया है।
➣ दन्तिवर्मन को पाण्ड्यों के आक्रमण का भी सामना करना पड़ा। पाण्ड्य भैरश वरगुण प्रथम तथा उसके पुत्र श्रीमार ने दन्तिवर्मन पर आक्रमण किया तथा कावेरी क्षेत्र पर अपना अधिकार कर लिया।
➣ तमिल अभिलेख में दन्तिवर्मन को पल्लवकुलभूषण तथा भारद्वाजगोत्रीय कहा गया है।
➣ दन्तिवर्मन भी वैष्णव धर्म का अनुयायी था। वैलूरपाल्यम अभिलेख में उसे विष्णु का अवतार कहा गया है।
➣ गोविन्द तृतीय ने मनने अभिलेख में दंति वर्मन को समधिगतपंचमहाशब्द एवं महासामन्ताधिपति की उपाधि दी हैं।
नन्दिवर्मन तृतीय (846 – 869 ई.) : पल्लव सत्ता को पुनः सुदृढ़ करने का प्रयास
➣ दन्तिवर्मन की मृत्यु के बाद उसका पुत्र नन्दिवर्मन तृतीय शासक बना। वह एक पराक्रमी शासक था उसे कावेरी द्वारा सिंचित प्रदेश का स्वामी कहा गया है।
➣ उसने अपने पराक्रम से चोलों, पाण्ड्यों एवं चेरों को पराजित कर पुनः एक बार पल्लव साम्राज्य को शक्ति प्रदान की।
➣ इस प्रकार नन्दिवर्मन ने अपने वंश की पुरानी प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त कर लिया तथा उसने कावेरी क्षेत्र पर पुनः अपना अधिकार सुदृढ़ कर लिया।
➣ गंग शासको ने भी उसकी अधीनता स्वीकार की। राष्ट्रकूटों के साथ उसका मैत्री संबंध स्थापित हुआ तथा राष्ट्रकूट नरेश अमोघवर्षम ने अपनी कन्या शंखा का विवाह उससे कर दिया।
➣ नंदि वर्मन तृतीय की उपाधि अवनिनारायण थी, नंदिप्कलम्बकम् में इसे चारों समुद्रों का स्वामी कहा गया है।
➣ इसके संरक्षण में तमिल कवि पेरुन्देवनार ने भारत वेणवा नामक काव्य की रचना की थी।
➣ नन्दिवर्मन तृतीय शैव मतानुयायी था। तेल्लारेरिन्द की उपाधि नन्दिवर्मन तृतीय ने धारण की। वैलूर पाल्यम् अभिलेख में नंदि वर्मन तृतीय को विष्णु का अवतार कहा गया है।
नृपतुंग (869 – 880 ई.) : पांड्य संघर्ष एवं राजनीतिक अस्थिरता
➣ नन्दिवर्मन तृतीय का पुत्र का पुत्र नृपतुंग राजा बना। उसने अरचित नदी के तट पर पाण्ड्यों को पराजित किया था। वाण राजवंश ने भी उसकी अधीनता स्वीकार कर ली।
➣ उसके शासन काल के अंतिम दिनों में सौतेले भाई अपराजित ने विद्रोह कर दिया। इस विद्रोह में पाण्ड्यों ने नृपत्तुंग का जबकि चोलों व पश्चिमी गंग ने अपराजित का साथ दिया।
➣ दोनों के बीच श्रीपुरम्बियम मैदान में घमासान संघर्ष हुआ, इस संघर्ष में नृपतुंग वर्मन पराजित हुआ।
➣ बाहूर दानपत्र के अनुसार उसके राज्यकाल के 8वें वर्ष उसके मंत्री ने एक विद्यास्थान को तीन ग्राम दान में दिये थे।
➣ वह उदार तथा विद्या प्रेमी शासक था। उसके समय वेद वदाङ्ग, मीमांसा, न्याय, पुराण तथा धर्मशास्त्रों के अध्ययन की समुचित व्यवस्था थी।
अपराजित (880 – 903 ई.) : चोलों द्वारा पल्लव सत्ता का अंत
➣ कांची के पल्लववंश का यह अंतिम महत्वपूर्ण शासक था। उसने नृपत्तुंग वर्मन को राजसिंहासन से हटाकर पल्लव वंश का राज्याधिकार प्राप्त किया था।
➣ उसके समकालीन चोल शासक आदित्य प्रथम ने तोंडमंडलम् पर अधिकार कर लिया।
➣ 885 ई. के लगभग उसने गंग नरेश पृथ्वीपति तथा चोलनरेश आदित्य प्रथम की सहायता प्राप्त कर पाण्डयवंशी शासक वरगुण द्वितीय को श्रीपुरम्बियम के युद्ध में पराजित किया।
➣ किन्तु 903 ई. के लगभग उसके मित्र चोल नरेश आदित्य प्रथम ने उसकी हत्या कर दी तथा तोण्डमण्डलम का स्वामी बन बैठा। फलत: दक्षिण भारत में एक नवीन शक्ति के रूप में चोलों का उदय हुआ।
➣ अपराजित के बाद तीन राजाओं (नंदिवर्मा प्रथमV-904-926 ई.), कम्प वर्मा 948-926 ई.) का नाम ज्ञात है। ये अपने राज्य को चोल राजाओं से बचाने में असफल रहे।
➣ कालांतर में चोल राजाओं द्वारा पल्लव राज्य को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया। इस प्रकार दक्षिण भारत में चोलों की स्थिति मजबूत हो गई।
राजधर्म
➣ पल्लव शासक ब्राह्मण धर्म के अनुयायी थे। पल्लव काल में नयनार (शैव) तथा अलवार (वैष्णव) सन्तों ने भक्ति आन्दोलन प्रारम्भ किया।
➣ दक्षिण में वैष्णव आन्दोलन का प्रारम्भ सर्वप्रथम पल्लवों के राज्य से ही हुआ तथा उसके बाद दक्षिण के अन्य भागों में पहुँचा।
कला तथा स्थापत्य
➣ पल्लव नरेशों का शासन काल कला एवं स्थापत्य की उन्नति के लिए प्रसिद्ध है। वस्तुतः उनकी वस्तु एवं तक्षण कला दक्षिण भारतीय कला के इतिहास में सर्वाधिक गौरवशाली अध्याय है।
➣ पल्लव वास्तुकला ही दक्षिण की द्रविड़ कला शैली का आधार बनी। इसे प्रारम्भ करने का श्रेय महेन्द्रवर्मन प्रथम को है।
➣ दक्षिण भारत की मंदिर स्थापत्य के तीन प्रमुख अंग थे।
1. मण्डप
2. रथ
3. विशाल मन्दिर
➣ पल्लव वास्तुकला को पर्सी ब्राउन ने चार भागों में बांटा हैं।
1. महेंद्रवर्मन शैली
2. मामल्ल शैली
3. राजसिंह शैली
4. अपराजित शैली
पल्लवकालीन पदाधिकारी
| राष्ट्रिक | जिले का प्रधान अधिकारी |
| देशाधिकृत | स्थानीय संरक्षक |
| ग्रामभोजक | गांव का मुखिया |
| अमात्य, आरक्षाधिकृत, गौल्मिक | सैनिक चौकियों के प्रधान |
| तैर्थिक | तीर्थों अथवा घाटों का सर्वेक्षक |
| संवरन्तक | गुप्तचर |
➣ पल्लव वास्तुकला दक्षिण की द्रविड़ शैली का आधार बनी। चट्टान काटकर बनाये गये मंदिर पल्लव काल में विकसित हुए।
➣ पल्लव वास्तुकला के चार प्रमुख स्थलों में से तीन हैं- महाबलीपुरम, पुडुकोटई, तंजौर तथा कांचीपुरम हैं।
पल्लव कला एवं वास्तुकला
| विमान | चोल द्रविड़ शैली की मुख्य विशेषता |
| गोपुरम | पाण्ड्य द्रविड़ शैली की मुख्य विशेषता |
| मण्डपम | पल्लव द्रविड़ कला शैली की मुख्य विशेषता |
➣ द्रविड़ शैली पल्लवों के नेतृत्व में द्रविड, शैली का विकास चार चरणों में हुआ।
महेंद्रवर्मन शैली (मण्डप शैली)
➣ महेंद्रवर्मन शैली (610-640 ई.) के तहत कठोर पाषाण को काटकर गुहा-मंदिरों का निर्माण हुआ, जिन्हें मंडप कहा जाता है।
➣ इस शैली के प्रारम्भिक मंडप सादे तथा अलंकार रहित हैं, किंतु बाद के मंडपों को अलंकृत करने की प्रवृत्ति दिखायी देती है।
➣ पंच पांडव मंडप में छह अलंकृत स्तम्भ लगाये गये हैं। महेंद्र शैली के मंडपों में उल्लेखनीय हैं- पल्लवरम् का पंच पांडव मंडप, महेंद्रवाड़ी का महेंद्रविष्णु गृह मंडप, त्रिचनापल्ली का ललितांकुर पल्लेश्वर गृह मंडप, मंडगपटु का त्रिमूर्ति मंडप, मामंडूर का विष्णु मंडप।
मामल्ल शैली (नरसिंह शैली)
➣ मामल्ल शैली (640-674 ई.) का विकास नरसिंह वर्मन प्रथम के काल में हुआ।
➣ इसके तहत दो प्रकार के स्मारक बने- मण्डल तथा एकाश्मक मंदिर, जिन्हें रथ कहा गया।
➣ इस शैली में निर्मित सभी स्मारक मामल्लपुरम (महाबलीपुरम) में ही स्थित हैं।
➣ मामल्ल शैली के रथ अपनी मूर्तिकला के लिए भी प्रसिद्ध हैं।
➣ मामल्ल शैली के अन्तर्गत दो प्रकार के स्मारक बने-
1. मण्डप
2. रथ या एकाश्मक मन्दिर
➣ मामल्ल शैली के एकाश्मक मन्दिर में द्रोपदी रथ सबसे छोटा है तथा धर्मराज रथ सबसे बड़ा है। इस रथ पर नरसिंह वर्मन की मूर्ति अंकित है।
➣ महाबलीपुरम के ये रथ मन्दिर ग्रेनाइट पत्थरों के हैं। इन रथ मन्दिरों को सप्तपगोड़ा भी कहा जाता है। ये आठ रथ मन्दिर निम्न लिखित हैं:- द्रोपदी रथ, भीम रथ, पिडारी रथ, नकुल-सहदेव रथ, धर्मराज रथ, वलैयंकट्टैथ रथ, अर्जुन रथ, गणेश रथ
➣ ये रथ मन्दिर संभवतः शिव मन्दिर थे। शिव की दक्षिणामूर्ति स्वरूप में उन्हें शिक्षक के रूप में प्रदर्शित किया गया है।
➣ रथ मंदिर में धर्मराज रथ सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं। इसे द्रविड़ मंदिर शैली का अग्रदूत भी कहा जा सकता है। इसी मंदिर पर नरसिंह वर्मन की मूर्ति अंकित है।
➣ रथ मंदिर में द्रौपदी रथ सबसे छोटा है। इसमें किसी प्रकार का अलंकरण नहीं मिलता है।
➣ नकुल सहदेव रथ पर विशाल गजमूर्ति उत्कीर्ण है। अर्जुन रथ में वृषभ पर विराजमान शिव एवं नंदी की मूर्ति उत्कीर्ण हैं |
➣ पिडारी रथ का नाम पिडारी देवी पर तथा वलैयंकट्टैथ रथ का नाम इस नाम के ही एक पोखर (तालाब) पर पड़ा है।
➣ महाबलीपुरम/मामल्लपुरम में स्वतंत्र रूप से खड़े शिलाखण्डों पर भागीरथ की तपस्या, अर्जुन की तपस्या, गंगावतरण का दृश्य, महिषासुर वध करती दुर्गा की मूर्तियां उत्कीर्ण है।
राजसिंह शैली (680 से 800 ई.)
➣ राजसिंह शैली (674-800 ई.) का प्रारम्भ पल्लव नरेश नरसिंह वर्मन द्वितीय राजसिंह ने किया।
➣ इस शैली के तहत गुहा-मंदिरों के स्थान पर पाषाण, ईंट आदि की सहायता से इमारती मंदिरों का निर्माण करवाया गया।
➣ इस शैली के मंदिरों में से तीन महाबलीपुरम से प्राप्त होते हैं- शोर मंदिर (तटीय शिव मंदिर), ईश्वर मंदिर और मुकुंद मंदिर। शोर मंदिर इस शैली का प्रथम उदाहरण है।
➣ इनके अतिरिक्त उल्लेखनीय मंदिर हैं- पनमलाई (उत्तरी अकोट) मंदिर, कांची के कैलाशनाथ (शिव मंदिर) और बैकुंठपेरूमाल मंदिर (वैष्णव मंदिर)।
➣ कांची के कैलाशनाथ मंदिर का निर्माण नरसिंह वर्मन द्वितीय के काल से शुरू हुआ एवं परमेश्वर वर्मन द्वितीय के समय इसकी रचना पूर्ण हुई।
➣ कैलाशनाथ मन्दिर का विमान तटीय मन्दिर की तुलना में अधिक विकसित है।
➣ कांची का बैकुण्ठ पेरूमल मन्दिर का निर्माण परमेश्वरवर्मन द्वितीय ने प्रारम्भ कराया एवं नन्दिवर्मन द्वितीय ने पूर्ण करवाया।
➣ ईश्वर मंदिर तथा मुकुन्दपुर मंदिर एंव अर्काट का पनमलाई मंदिर भी राजसिंह शैली में ही है।
नन्दि वर्मन या अपराजित शैली (800 से 900 ई.)
➣ अपराजित शैली के अंतर्गत अपेक्षाकृत छोटे मंदिरों का निर्माण हुआ।
➣ इसके उदाहरण हैं- कांची के मुक्तेश्वर एवं मातंगेश्वर मंदिर, ओरगडम् का बड़मल्लिश्वर मंदिर, तिरूतैन का वीरट्टानेश्वर मंदिर और गुडिडमल्लम् का परशुरामेश्वर मंदिर।
➣ कांची के मंदिर इस शैली के प्राचीनतम नमूने हैं। इनमें प्रवेश द्वार पर स्तम्भयुक्त मंडप बने हैं। इसके बाद के मंदिर चोल शैली से प्रभावित एवं उसके निकट हैं।
विभिन्न शैलियों में निर्मित मंदिर
| रथ मंदिर | मामल्लपुरम |
| कैलाशनाथ मंदिर | कांचीपुरम, तमिलनाडु |
| बैकुंठ पेरुमल मंदिर | कांचीपुरम, तमिलनाडु |
| बृहदेश्वर मंदिर | तंजावूर, तमिलनाडु |
| गंगैकोण्डचोलपुरम मंदिर | अरियलूर, तमिलनाडु |
| तिरुमलाई मंदिर | तमिलनाडु |
| नटराज मंदिर | चिदंबरम, तमिलनाडु |
| लिंगराज मंदिर | भुवनेश्वर, ओडिशा |
| जगन्नाथ मंदिर | भुवनेश्वर, ओडिशा सूर्य मंदिर, पुरी, ओडिशा |
| खजुराहो मंदिर | छत्तरपुर, मध्य प्रदेश |
| महादेव मंदिर | छत्तरपुर, मध्य प्रदेश |
| दिलवाड़ा जैन मंदिर | माउंट आबू, राजस्थान |
| कैलाश मंदिर | एलोरा, महाराष्ट्र |
| दशावतार मंदिर | देवगढ़, मध्य प्रदेश |
| एलिफेंटा गुहा मंदिर | महाराष्ट्र |
| दुर्गा मंदिर | ऐहोल, महाराष्ट्र |
प्रसिद्ध लेखक और उनकी पुस्तकें
| वादिराज | पार्श्वनाथ चरित और यशोधरचरित्र |
| विल्हण | विक्रमांकदेवचरित |
| विज्ञानेश्वर | मिताक्षरा |
| शिष्य नारायण | व्यवहारशिरोमणि |
| सोमेश्वर तृतीय | मानसोल्लास अथवा अभिलषितार्थीचिंतामणि |
| विद्यामाधव | पार्वतीरुक्तिमणीय |
| जगदेकमल्ल द्वितीय | सगीतचूड़ामणि |
| शांतिनाथ | सुकुमारचरित्र |
| नागवर्माचार्य | चंद्रचूडामणिशतक |
| चामुंडराय | चामुंडारायपुराण |
| नागवर्मा प्रथम | छंदोंबुधि, कर्णाटककादंबरी |
| नागवर्मा द्वितीय | काव्यालोकन, कर्णाटकभाषाभूषण, वास्तुकोश |
| कर्णपार्य | मेलीमाधव, नेमिनाथपुराण |
| चंद्रराज | मदनतिलक |
| श्रीधराचार्य | चंद्रप्रभचरिते, जातकतिलक (कन्नड में ज्योतिष का प्रथम ग्रंथ) |
| नागचंद्र | मल्लिनाथपुराण, रामचंद्रचरितपुराण |
| वादि कुमुदचंद्र | रामायण |
| नयसेन | धर्मामृत |
| जगद्दल सोमनाथ | कर्णाटक कल्याणकारक |
| सारंगधर | संगीतरत्नाकर |
| भास्कराचार्य | सिद्धांतशिरोमणि |
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