प्रतिहार: भारत की सीमाओं के प्रहरी
➣ प्रतिहार वंश को गुर्जर प्रतिहार वंश कहा गया, क्योंकि ये गुर्जरों की ही एक शाखा थे, जिनकी उत्पत्ति गुजरात व दक्षिण-पश्चिम राजस्थान में हुई थी।
➣ अग्नि कुंड से उत्पन्न चार राजपूत वंश यथा प्रतिहार, चालुक्य, चौहान और परमार में से सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रतिहार वंश था जिसे गुर्जर-प्रतिहार भी कहा जाता है।
➣ सन 712 ई. में अरबों ने सिंध पर आधिपत्य जमा कर भारत विजय का मार्ग प्रशस्त कर दिया था। सन 725 ई. में अरबों जैसलमेर, मारवाड़, मांडलगढ और भडौच आदि इलाकों पर अपना आधिपत्य जमा लिया।
➣ ऐसे समय में दो शक्तियों का प्रादुर्भाव हुआ। एक गुर्जर-प्रतिहार एंव दूसरा गोहलोत।
➣ प्रतिहार शासक नागभाट ने जैसलमेर, मारवाड, मांडलगढ से अरबों को खदेड़कर जालौर में प्रतिहार राज्य की नींव डाली और बप्पा रायडे ने चित्तौड़ दुर्ग पर अधिकार कर सन 734 ई. में मेवाड़ में गहलौत वंश का वर्चश्व स्थापित किया।
➣ नागभट्ट प्रथम ने अरबों को पश्चिमी राजस्थान और मालवा से खदेड़ दिया। बापा ने यही कार्य मेवाड़ और उसके आसपास के प्रदेश से किया।
➣ दोनों राजपूती वंशो ने अरबी आक्रमणों को सिंध क्षेत्र से आगे नहीं बढ़ने दिया।
➣ गुर्जर प्रतिहारों ने विदेशियों के आक्रमण के समय भारत के द्वारपाल की भूमिका निभाई थी। ह्वेनसांग ने गुर्जर राज्य को पश्चिमी भारत का दूसरा सबसे बड़ा राज्य कहा है।
➣ ग्वालियर प्रशस्ति में गुर्जर प्रतिहार शासकों को श्रीराम के अनुज लक्ष्मण का वंशज बताया गया है।
➣ गुर्जर जाति का सर्वप्रथम उल्लेख पुलकेशिन द्वितीय के एहोल अभिलेख में हुआ है उसने प्रतिहार साम्राज्य का पुनर्निर्माण किया तथा लगभग 838 ई. में कन्नौज पर फिर से अधिकार कर लिया। यह नगर लगभग एक सदी तक प्रतिहार साम्राज्य की राजधानी रहा।
➣ कक्कुक के घटियाले अभिलेख में प्रतिहारों को ब्राह्मण बताया गया है। बाण के हर्षचरित में भी गुर्जर जाति का उल्लेख मिलता है।
➣ इस वंश का आदिपुरूष हरिशचन्द्र (रोहिलद्धि) नामक व्यक्ति था।, किन्तु इस वंश का प्रथम वास्तविक शासक नागभट्ट प्रथम था।
➣ पाल वंश का वह पहला शासक वत्सराज था, जिसने सम्राट की उपाधि धारण की इसने ही त्रि – पक्षीय का आरम्भ किया था।
➣ प्रतिहार साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक और इस राजवंश का महानतम शासक भोज (836-885 ई.) था। जो मिहिरभोज से विख्यात हुआ।
| शासक | शासनकाल | राजधानी / क्षेत्र विस्तार | प्रमुख युद्ध / संघर्ष | परिचय / प्रमुख तथ्य |
|---|---|---|---|---|
| नागभट्ट प्रथम (730-756 ई.) | 730 – 756 ई. | राजस्थान, मालवा और गुजरात क्षेत्र | अरब सेनाओं के विरुद्ध रक्षा | अरब आक्रमणों को रोका और प्रतिहार वंश की नींव रखी। इन्हें “अरब आक्रमणों का रक्षक” माना जाता है। |
| वत्सराज | 783 – 795 ई. | कन्नौज और उत्तर भारत हेतु संघर्ष | त्रिपक्षीय संघर्ष की शुरुआत | पाल और राष्ट्रकूट वंश के साथ कन्नौज पर अधिकार हेतु संघर्ष शुरू किया। |
| नागभट्ट द्वितीय | 795 – 833 ई. | कन्नौज और उत्तर भारत | पाल वंश के विरुद्ध संघर्ष | कन्नौज पर विजय प्राप्त कर प्रतिहार शक्ति को मजबूत किया। |
| रामभद्र | 833 – 836 ई. | सीमित क्षेत्र | आंतरिक संघर्ष | कमजोर शासन और आंतरिक अस्थिरता का दौर। |
| मिहिरभोज (भोज प्रथम) | 836 – 889 ई. | कन्नौज केंद्र, विशाल उत्तर भारत | अरब आक्रमणों और पाल वंश से संघर्ष | प्रतिहार वंश का स्वर्णकाल, विशाल साम्राज्य विस्तार और मजबूत रक्षा नीति। |
| महेन्द्र पाल | 890 – 910 ई. | कन्नौज, बिहार और उत्तर भारत | पाल वंश से संघर्ष | साम्राज्य को स्थिर रखा और शक्ति बनाए रखी। |
| महिपाल | 914 – 944 ई. | कन्नौज और सीमित क्षेत्र | राष्ट्रकूट आक्रमण | साम्राज्य बचाने का प्रयास किया लेकिन पतन शुरू हुआ। |
| भोज द्वितीय | – | सीमित क्षेत्र | आंतरिक विद्रोह | कमजोर शासन और आंतरिक संघर्ष। |
| विनायकपाल | – | उत्तर भारत का छोटा भाग | क्षेत्रीय विद्रोह | साम्राज्य तेजी से कमजोर हुआ। |
| महेन्द्रपाल द्वितीय | – | बहुत सीमित क्षेत्र | आंतरिक विघटन | केंद्रीय सत्ता लगभग समाप्त। |
| देवपाल | 940 – 955 ई. | कन्नौज का कमजोर नियंत्रण | पाल वंश से दबाव | पतनकालीन शासक। |
| महिपाल द्वितीय | – | नाममात्र का क्षेत्र | आक्रमण और विद्रोह | साम्राज्य लगभग समाप्त अवस्था में। |
| विजयपाल | – | बहुत सीमित क्षेत्र | केंद्रीय नियंत्रण का अभाव | नाममात्र का शासन। |
| राज्यपाल | – | खंडित साम्राज्य | लगातार आक्रमण | सत्ता कमजोर होती गई। |
| यशपाल | – 1036 ई. | कन्नौज और आसपास का अंतिम क्षेत्र | गज़नवी आक्रमण का प्रभाव | प्रतिहार वंश के अंतिम शासक, इनके बाद वंश समाप्त हो गया। |
नागभट्ट प्रथम (730 – 756 ई.) : अरब आक्रमणों का प्रतिरोध
➣ नागभट्ट प्रथम गुर्जर प्रतिहार वंश का प्रथम महत्त्वपूर्ण शासक था। नागभट्ट प्रथम प्रतिहारों की भीनमाल (जालौर) एवं उज्जैन शाखा का संस्थापक था।
➣ नागभट्ट प्रथम ने राजधानी मण्डौर से मेड़ता स्थानान्तरित की। मण्डौर को दूसरी राजधानी तथा भीनमाल को तीसरी राजधानी बनाया। इसके बाद उज्जैन को प्रतिहारों का केन्द्र बनाया।
➣ उसके विषय में ग्वालियर अभिलेख से जानकारी मिलती है, जिसके अनुसार उसने अरबों को सिंध से आगे नहीं बढ़ने दिया। अरबों का नेतृत्व जुनैद कर रहा था।
➣ इसी अभिलेख में बताया गया है कि, वह नारायण रूप में लोगों की रक्षा के लिए उपस्थित हुआ था तथा उसे मलेच्छों का नाशक बताया गया है।
➣ राष्ट्रकूट नरेश अमोघवर्ष के संजन ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि दन्तिदुर्ग ने एक महादान (हिरण्य गर्भदान यज्ञ) किया जिसमें उसने गुर्जर प्रतिहार नरेश नागभट्ट प्रथम को अवन्ति/उज्जैन में प्रतिहार (द्वारपाल) बनाया।
➣ नागभट्ट प्रथम के दो भतीजे कक्कुक एवं देवराज के शासन के बाद देवराज का पुत्र वत्सराज गद्दी पर बैठा।
वत्सराज (783 – 795 ई.) : कन्नौज पर अधिकार हेतु त्रिकोण संघर्ष
➣ वत्सराज को प्रतिहार साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक कहा जाता है। वह सम्राट की उपाधी धारण करने वाला गुर्जर प्रतिहार वंश का पहला शासक था।
➣ उसने राजस्थान के मध्य भाग एवं उत्तर भारत के पूर्वी भाग को जीतकर वत्सराज ने अपने राज्य में मिला लिया।
➣ वत्सराज के समय से कन्नौज के लिए त्रिपक्षीय संघर्ष शुरू हुआ। उसने पाल शासक धर्मपाल को मुंगेर (मुद्गगिरी) के युद्ध में पराजित किया। किन्तु राष्ट्रकूट शासक ध्रुव से पराजित हुआ।
➣ वानोडिन्डोरी तथा राधानपुर लेखों से ज्ञात होता है कि ध्रुव ने वत्सराज को पराजित करके राजपूताना में शरण लेने को विवश किया और वे दो राजछत्र भी छीन लिए जिसे उन्होंने गौडराज से छीना था।
नागभट्ट द्वितीय (795 – 833 ई.) : प्रतिहार सत्ता का विस्तार
➣ यह वत्सराज का पुत्र एवं उसका उत्तराधिकारी था। उसने गुर्जर प्रतिहार वंश की प्रतिष्ठा को बहुत आगे बढाई।
➣ वत्सराज के पुत्र नागभट्ट द्वितीय ने भी त्रि-पक्षीय संघर्ष में भाग लिया और पाल शासक धर्मपाल को पराजित कर कन्नौज को अपनी राजधानी बनायी, परन्तु उसे राष्ट्रकूट नरेश गोविन्द तृतीय से परास्त होना पड़ा।
➣ ग्वालियर अभिलेख के अनुसार उसने कन्नौज से चक्रायुध को भगाकर उसे अपनी राजधानी बनाया।
➣ नागभट्ट द्वितीय ने सम्राट की हैसियत से परभट्टारक, महाराजाधिराज तथा परमेश्वर आदि की उपाधियाँ धारण की थीं।
➣ ग्वालियर अभिलेखों में नागभट्ट द्वितीय को तुरुष्क (मुसलमान) , किरात, मत्स्य, वत्स का विजेता कहा गया है।
➣ चन्द्रप्रभास कृत प्रभावकचरित से जानकारी मिलती है कि, नागभट्ट द्वितीय ने 833 ई. में गंगा नदी में जल समाधि के द्वारा अपना प्राण त्याग किया।
➣ नागभट्ट द्वितीय के बाद कुछ समय (833 से 836 ई.) के लिए उसका पुत्र रामभद्र गद्दी पर बैठा। जिसे पाल वंश से परास्त होना पड़ा।
मिहिर भोज (836 – 885 ई.) : प्रतिहार वंश का स्वर्णकाल
रामभद्र के तीन वर्ष के निर्बल शासन के पश्चात् मिहिरभोज प्रथम शासक बना। यह इस वंश का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण शासक था। कल्हण एवं अरब यात्री सुलेमान भी हमें उसके समय की जानकारी देते हैं।➣ भोज प्रथम अथवा मिहिरभोज गुर्जर प्रतिहार वंश का सर्वाधिक प्रतापी एवं महान् शासक था। उसका मूल नाम मिहिर था और भोज कुल नाम अथवा उपनाम था।
➣ उसका साम्राज्य काठियावाड़, पंजाब, मालवा तथा मध्य देश तक फैला था। राज्य उत्तर में हिमालय, दक्षिण में नर्मदा, पूर्व में बंगाल और पश्चिम में सतलुज तक विस्तृत था।
➣ भोज प्रथम विशेष रूप से भगवान विष्णु के वराह अवतार का उपासक था। उसके सिक्कों पर आदि-वराह को उत्कीर्ण प्राप्त होता है।
➣ भोज प्रथम ने 836 ई. के लगभग कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया, जो आगामी सौ वर्षो तक प्रतिहारों की राजधानी बनी रही।
➣ उसे बंगाल के पाल शासक धर्मपाल से पराजित होना पड़ा। 842 -60 ई. के बीच उसे राष्ट्रकूट शासक ध्रुव ने भी पराजित किया।
➣ राष्ट्रकूट वंश के अमोधवर्ष एवं कृष्ण द्वितीय मिहिरभोज के समकालीन थे। कृष्ण द्वितीय को मिहिरभोज ने नर्मदा तट पर पराजित किया।
➣ पाल वंश के शासक देवपाल की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारी नारायण को भोज प्रथम ने परास्त कर पाल राज्य के एक बड़े भू-भाग पर अधिकार कर लिया।
➣ उसके शासन काल का विवरण अरब यात्री सुलेमान से मिलता है। अरब यात्री सुलेमान उसे बरुआ कहता है।
➣ भोज प्रथम के बारे में सुलेमान कहता है कि इस राजा के पास बहुत बड़ी सेना है और अन्य किसी दूसरे राजा के पास उसकी जैसी सेना नहीं है। भारत में भोज के राज्य के अतिरिक्त कोई दूसरा राज्य नहीं है, जो डाकुओं से इतना सुरक्षित हो।”
➣ अरब यात्री सुलेमान के अनुसार वह अरबों का स्वाभाविक शत्रु था। उसने पश्चिम में अरबों का प्रसार रोक दिया था।
➣ भोज वैष्णव धर्म का अनुयायी था। भोज प्रथम ने आदिवराह एवं प्रभास की उपाधियाँ धारण की थीं– ‘मिहिरभोज’ (ग्वालियर अभिलेख में), ‘प्रभास’ (दौलतपुर अभिलेख में), ‘आदिवराह’ (ग्वालियर चतुर्भुज अभिलेखों) ।
➣ शून्य का प्रथम अभिलेखीय प्रमाण मिहिरभोज (भोज प्रतिहार) के ग्वालियर अभिलेख से मिलता है।
महेंद्रपाल प्रथम (885 – 910 ई.) : साम्राज्य विस्तार एवं स्थिरता
➣ मिहिरभोज के पश्चात उसका पुत्र महेन्द्रपाल प्रथम शासक बना। उसने गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य का विस्तार मगध एवं उत्तरी बंगाल तक किया।
➣ लेखों के अनुसार उसे परमभट्टारक, महाराजाधिराज तथा परमेश्वर कहा गया है।
➣ उसने राष्ट्रकूट शासक इन्द्र तृतीय को पराजित किया, किन्तु उसे कश्मीरी शासक शंकर वर्मन से युद्ध में पराजित होना पड़ा।
➣ महेन्द्रपाल के गुरु संस्कृत के प्रसिद्ध विद्वान् राजशेखर थे। राजशेखर ने कर्पूर मंजरी, बालरामायण, बालभारत (प्रचंड पांडव), विद्धसाल भंजिका (ये सभी नाटक हैं), काव्यमीमांसा, हरविलास और भुवनकोष (ये तीनों काव्य ग्रन्थ हैं) आदि ग्रन्थों की रचना की।
➣ राजशेखर ने अपनी रचनाओं में महेन्द्र पाल का वर्णन निर्भयराज और निर्भय नरेन्द्र के रूप में किया है।
➣ राजशेखर ने कर्पूरमन्जरी की रचना अपनी पत्नी अवन्तिसुन्दरी के आग्रह पर की थी।
➣ राजशेखर ने प्रतिहार नरेश महेन्द्रपाल को निर्भयराज, रघुकुल तिलक व रघुकुल चूड़ा मणि तथा महिपाल प्रथम को रघुवंश मुकुट मणि तथा रघुकुल मुक्ता मणि कहा है।
महिपाल प्रथम (910 – 940 ई.) : प्रतिहार शक्ति का पतन प्रारंभ
➣ महिपाल के शासन काल में लगभग 915-918 ई में राष्ट्रकूट नरेश इन्द्र तृतीय ने कन्नौज पर आक्रमण कर नगर को उजाड़ दिया।
➣ उसके शासन काल के दौरान (915-916 ई.) में ही बग़दाद निवासी अलमसूदी गुजरात आया था। उसने गुर्जर प्रतिहारों को अलगुर्जर एवं राजा को बौरा कहा,जो सम्भवतः आदि वराह का विशुद्ध उच्चारण है।
➣ राजशेखर महीपाल का भी राजगुरु था। राजशेखर ने महीपाल को आर्यावर्त का महाराजाधिराज तथा रघुकुल मुक्तामणि कहा है।
➣ महिपाल के समय में ही गुर्जर-प्रतिहार राज्य का पतन होने लगा। उसके बाद के उत्तराधिकारियों भोज द्वितीय, विनायक पाल, महेंद्रपाल द्वितीय, देवपाल, महिपाल द्वितीय, विजयपाल एवं राज्यपाल ने जैसे-तैसे 1013 ई. तक अपने राज्य को कायम रखा।
अन्य उत्तराधिकारी
➣ लगभग 963 ई. में कृष्ण तृतीय ने गुर्जर प्रतिहार वंश के अधिकार से मध्य भारत के क्षेत्र को छीन लिया, इससे कन्नौज का केन्द्रीय शक्ति के रूप में ह्मस हो गया।
➣ महमूद गजनवी के हमले के समय कन्नौज का शासक राज्यपाल था। महमूद गजनवी से पराजित होकर राज्यपाल ने कन्नौज छोड़कर बारी को राजधानी बनाया।
➣ महमूद गजनवी के सामने 1018 ई. में आत्मसमर्पण करने से राजपूत राजा काफी नाराज हुए और गजनवी के लौटने के बाद कालिंजर के चंदेल राजा गंड देव के नेतृत्व में राजपूतों ने राज्यपाल को मार डाला।
➣ राज्यपाल की मृत्यु के बाद उसके स्थान पर राजपूतों ने त्रिलोचनपाल को कन्नौज की गद्दी पर बिठाया।
➣ यशपाल इस वंश का अंतिम शासक था। 1036 राष्ट्रकूटों ने कन्नौज पर अधिकार कर लिया
➣ प्रतिहारों के सामन्त गुजरात के चालुक्य, जेजाकभुक्ति के चन्देल, ग्वालियर के कच्छपघात, मध्यभारत के कलचुरी, मालवा के परमार, दक्षिण भारत के गुहिल तथा शॉकम्भरी के चौहान (चाहमान) आदि स्वतन्त्र हो गये।
➣ कन्नौज में 11वीं शताब्दी के द्वितीय चतुर्थांश में गहड़वाल अथवा राठौर वंश ने गुर्जर-प्रतिहार वंश को सदा के लिए समाप्त कर दिया।
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