पाल वंश (750-1150 ई.) : धर्मपाल

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पाल वंश (8वीं – 12वीं शताब्दी) : पूर्वी भारत की बौद्ध शक्ति

उत्तर भारत के शक्तिशाली राज्यों में पाल वंश भी एक हुआ। जिसका उद्भव बंगाल में लगभग 750 ई. में गोपाल से आरम्भ हुआ। जो एक स्थानीय प्रमुख था।

➣ सन 619ई. के लगभग गौड़ नरेश शशांक की मृत्यु के पश्चात् बंगाल हर्षवर्धन के अधीन हो गया किन्तु हर्ष की मृत्यु के पश्चात लगभग एक शताब्दी तक बंगाल में अराजकता व अव्यवस्था का वातावरण व्याप्त था।

➣ बंगाल में फैली अराजकता को दूर करने के लिए वहां की जनता ने लोकतांत्रिक ढंग से गोपाल को अपना राजा चुना। यह इतिहास में प्रथम निर्वाचित राजा था।

➣ पाल शासकों के साम्राज्य का विस्तार संपूर्ण बंगाल, बिहार तथा कन्नौज तक था। उनका शासन खाड़ी से लेकर दिल्ली तक तथा जालंधर से लेकर विंध्य पर्वत तक फैला हुआ था।

➣ उसके उत्तराधिकारी में धर्मपाल (770-810 ई.) ने अपने शासनकाल में साम्राज्य का काफ़ी विस्तार किया और कुछ समय तक कन्नौज, उत्तर प्रदेश तथा उत्तर भारत पर भी पाल वंश का नियंत्रण रहा।

➣ धर्मपाल के समय ही कन्नौज पर अधिपत्य के लिए त्रि-पक्षीय संघर्ष की शुरुवात हुई जिसका परिणाम अंतिम रूप से प्रतिहार शासकों के पक्ष में रहा।

➣ अधिकांश पाल नरेश बौद्ध मतानुयायी थे। उन्होंने ऐसे समय बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया, जब भारत में उसका पतन हो रहा था। विक्रमशिला विश्वविद्यालय धर्मपाल द्वारा ही स्थापित है।

➣ इस वंश ने बिहार और बंगाल पर लगभग 12वीं शताब्दी तक शासन किया।

शासक शासनकाल परिचय / प्रमुख तथ्य
गोपाल प्रथम 750 – 770 ई. पाल वंश का संस्थापक, बंगाल में सत्ता स्थापित की। बौद्ध धर्म (महायान) का संरक्षक, अराजकता के बाद स्थिरता लाई।
धर्मपाल 770 – 810 ई. पाल वंश का स्वर्णकालीन शासक, त्रिपक्षीय संघर्ष में सक्रिय। कन्नौज पर अधिकार का प्रयास, विक्रमशिला विश्वविद्यालय का संरक्षण।
देवपाल 810 – 850 ई. सबसे शक्तिशाली पाल शासकों में से एक, असम, उड़ीसा और उत्तर भारत तक विस्तार। बौद्ध धर्म को व्यापक संरक्षण।
विग्रहपाल 850 – 860 ई. कमजोर शासन, आंतरिक अस्थिरता प्रारंभ, साम्राज्यिक विस्तार रुक गया।
नारायणपाल 860 – 915 ई. लंबा शासनकाल, लेकिन राजनीतिक शक्ति कमजोर हुई। पाल साम्राज्य धीरे-धीरे पतन की ओर।
राज्यपाल कमजोर शासक, प्रतिहार आक्रमणों के कारण बंगाल में प्रभाव घटा।
गोपाल द्वितीय 940 – 957 ई. पुनर्जीवन का प्रयास, लेकिन पाल शक्ति सीमित क्षेत्रों तक रह गई।
महिपाल प्रथम 978 – 1030 ई. पाल वंश का पुनर्जागरण काल, बंगाल और बिहार में पुनः शक्ति स्थापित। शिक्षा और बौद्ध संस्कृति का संरक्षण।
नयपाल 1030 – 1055 ई. साम्राज्यिक स्थिरता बनाए रखने का प्रयास, लेकिन शक्ति कमजोर होती गई।
महिपाल द्वितीय 1070 – 1075 ई. आंतरिक विद्रोह और सामंती शक्तियों का प्रभाव बढ़ा।
रामपाल 1075 – 1120 ई. पाल वंश का अंतिम मजबूत शासक, कुछ क्षेत्रों में पुनः नियंत्रण स्थापित किया।
कुमारपाल सीमित शक्ति, केंद्रीय नियंत्रण लगभग समाप्त।
गोपाल तृतीय नाममात्र का शासक, वास्तविक सत्ता स्थानीय सामंतों के पास थी।
मदनपाल 1144 – 1162 ई. पाल वंश का अंतिम महत्वपूर्ण शासक, पतन पूरी तरह तेज हुआ।
गोविन्द पाल 1162 – 1174 ई. पाल वंश का अंतिम शासक, इसके बाद बंगाल में सेन वंश का उदय हुआ।

गोपाल प्रथम (750 – 770 ई.) : पाल वंश की स्थापना

➣ पाल वंश की स्थापना लगभग 750 ई. के लगभग हुई। जिसका संस्थापक गोपाल था। उसके पिता का नाम वप्यट था। वह बौद्ध धर्म काअनुयायी था।

हर्षवर्धन के पश्चात् बंगाल की राजनीतिक स्थिति काफ़ी अस्त-व्यस्त हो गयी थी। इस स्थिति को अभिलेखों में मत्स्य न्याय की संज्ञा दी गयी है।

खालिमपुर अभिलेख में कहा गया है कि मत्स्य न्याय से छुटकारा पाने के लिए सरदारों व जनता ने गोपाल प्रथम को अपना शासक नियुक्त किया।

तिब्बती लामा एवं इतिहासकार तारानाथ के अनुसार गोपाल प्रथम ने ओदान्तपुर में एक बौद्ध मठ का निर्माण करवाया था।

धर्मपाल (770 – 810 ई.) : पाल साम्राज्य का विस्तार एवं नालंदा संरक्षण

➣ धर्मपाल पाल वंश के गोपाल प्रथम का पुत्र एवं उत्तराधिकारी व एक योग्यतम शासक था। उसकी महत्त्वपूर्ण सफलता , कन्नौज के शासक इंद्रायुध को परास्त कर चक्रायुध को अपने संरक्षण में कन्नौज की गद्दी पर बैठाना, था।

➣ कालांतर में प्रतिहार राजा वतसराज (775 -800 ई.) ने कन्नौज पर आक्रमण कर इंद्रायुध को पराजित किया और उत्तर भारत में अपनी सत्ता का विस्तार किया। इस आक्रमण ने त्रि-पक्षीय युद्ध का आगाज कर दिया।

➣ इस समय दक्षिण राज्य राष्ट्रकूट शासक ध्रुव ने भी कन्नौज पर अधिकार कर लिया किन्तु उसके वापस जाते ही धर्मपाल ने कन्नौज पर आक्रमण पर इन्द्रायुध को अपदस्थ कर अपने संरक्षण में चक्रायुध को कन्नौज की राजगद्दी पर बैठाया।

➣ प्रतिहार शासकों वत्सराज के पुत्र नागभट्ट द्वितीय ने धर्मपाल को परास्त कर दिया और कन्नौज पर अधिकार कर लिया। जो उसके अधिकार में अल्प समय तक ही रहा।

➣ धर्मपाल ने पश्चिम में पंजाब से लेकर पूर्व में बंगाल तक तथा उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में बरार तक अपनी शक्ति स्थापित की थी।

➣ उसने महाराजाधिराज, परमेश्वर और परभट्टारक जैसी उपाधियाँ धारण की थीं।

➣ 11वीं शताब्दी के कवि सोड्ढल (गुजराती) ने उदयसुन्दरी कथा में धर्मपाल को उत्तरापथस्वामिन कहा है।

➣ धर्मपाल प्रतिहार वंशी शासक नागभट्ट द्वितीय से पराजित हुआ था। उसे राष्ट्रकूट नरेश ध्रुव ने भी पराजित किया था।

➣ धर्मपाल बौद्ध धर्म का अनुयायी था। धर्मपाल के लेखों में उसे ‘परमसौगत’ कहा जाता है।

➣ उसने विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना की तथा सोमपुरी (पहाड़पुरी, बंगाल) में मठों का निर्माण करवाया। उसकी सभा में हरिभद्र नामक बौद्ध विद्वान रहते थे।

➣ धर्मपाल की सभा में हरिभद्र ने अष्टसहस्त्रिका प्रज्ञापारमिता नामक बौद्ध ग्रन्थ की रचना की थी।

नारायणपाल अभिलेख में उसे उचित कर लगाने वाला अर्थात् सबसे साथ समान व्यवहार करने वाला कहा गया है।

➣ धर्मपाल ने राजत्रयचाधिपति (तीन राजाओं का स्वामी/अश्वपति, गजपति, नरपति) की उपाधि धारण की।

➣ धर्मपाल ने बोधगया में चतुर्भुज महादेव मंदिर की स्थापना की थी, उसका मंत्री गर्ग एक ब्राह्मण था।

➣ उसके शासन काल में प्रसिद्ध यात्री सुलेमान आया था, जिसने धर्मपाल को रूहमा या धर्म कहा था।

➣ धर्मपाल द्वारा बहुत से बिहार एवं मठों का निर्माण करवाया गया था। उसने बिहार में प्रसिद्ध विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना की और नालन्दा विश्वविद्यालय का पुनरुद्धार किया।

➣ धर्मपाल ने नालंदा विश्वविद्यालय के ख़र्च के लिए 200 गाँवों के राजस्व को दान में दिया था।

देवपाल (810 – 850 ई.) : पाल वंश का स्वर्णकाल

➣ धर्मपाल का पुत्र देवपाल पिता की मुत्यु के उपरांत 810 ई. में राजा बना। देवपाल बौद्ध धर्म का पुनः प्रतिस्थापक माना जाता है।

➣ नारायणपाल के बादल अभिलेख के अनुसार देवपाल ने उत्कल, हूणों, द्रविड़ोंगुर्जरों को पराजित किया।

➣ अरब यात्री सुलेमान के 851 ई. के लेख के अनुसार पालों की सेना राष्ट्रकूटोंप्रतिहारों से अधिक शक्तिशाली थी। उसने प्राग-ज्योतिषपुर (असम) और उड़ीसा के कुछ भागों को अपने साम्राज्य में मिला लिया।

➣ इसके समकालीन प्रतिहार शासक मिहिर भोज था। जिसे उसने पराजित किया।

➣ देवपाल ने मुंगेर को अपनी राजधानी बनाया तथा परमसौगात की उपाधि धारण की।

➣ देवपाल की सभा में सुमात्रा के राजा बालपुत्र देव का दूत आया था।

➣ देवपाल ने नालन्दा ताम्रपत्र के अनुसार मलाया के शैलेन्द्रवंशी राजा बालपुत्र देव की प्रार्थना पर नालन्दा के वौद्ध विहार को पाँच गाँव दिए तथा वीरसेन नामक बौद्ध विद्वान को नालन्दा विहार में अध्यक्ष नियुक्त किया।

अन्य उत्तराधिकारी

विग्रहपाल (लगभग 850-860 ई.) पाल वंश के राजा देवपाल का उत्तराधिकारी था। इस समय के कमज़ोर एवं अयोग्य शासकों में विग्रहपाल की भी गणना की जाती है।

➣ तीन या चार वर्ष की अल्प शासन अवधि के बाद ही विग्रहपाल ने गद्दी त्याग दी। उसका उत्तराधिकारी उसका पुत्र नारायणपाल (860-915 ई.) हुआ।

नारायणपाल (860 – 915 ई.) : साम्राज्य का पुनर्गठन

➣ इसका शासन काल बाकी पाल शासकों से काफ़ी लम्बा था। इसे राष्ट्रकूट राजा अमोघवर्ष ने पाल शासक नारायणपाल को पराजित किया था।

➣ इसके काल में प्रतिहारों ने पूर्व की ओर अपनी शक्ति का विस्तार करना प्रारम्भ कर दिया था। फलत : मगध तथा उत्तरी बंगाल उसके हाथ से निकल गया। उसका शासन केवल बंगाल तक रह गया।

➣ हालाँकि अपने शासन के अंतिम चरणों में नारायणपाल ने प्रतिहारों से उत्तरी बंगाल और दक्षिणी बिहार को छीन लिया था, क्योंकि प्रतिहार राष्ट्रकूटों के आक्रमण के कारण काफ़ी कमज़ोर हो गये थे।

➣ नारायणपाल का उत्तराधिकारी उसका पुत्र राज्यपाल था।

➣ सन 908-888 ई. तक के 80 वर्षो में तीन राजाओ (राज्यपाल, गोपाल द्वितीय व विग्रहपाल द्वितीय) ने शासन किया।

➣ गोपाल द्वितीय बंगाल के पाल वंश का एक परवर्ती राजा था। यह अपने पिता राज्यपाल के बाद राजगद्दी पर बैठा। गोपाल द्वितीय के द्वारा किये गए कार्यों के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त नहीं है।

महिपाल प्रथम (980 – 1030 ई.) : पाल शक्ति का पुनरुत्थान

➣ महिपाल प्रथम ने पाल वंश की शक्ति पुनः स्थापित की। इसे पाल वंश का दूसरा संस्थापक भी कहा जाता है। उसे दीपंकर श्रीज्ञान, जिसे अतिसा नाम से भी जाना जाता था।

➣ महिपाल प्रथम का राज्य मगध तक विस्तृत था। उसे राजेन्द्र चोल एवं कलपुरी वंश के मांगेयदेव से युद्ध में परास्त होना पड़ा।

➣ महिपाल नें बौद्ध भिक्षु अतिस के नेतृत्व में तिब्बत में एक धर्म प्रचारक मण्डल में भेजा था।

नयपाल (1038 – 1053 ई.) : सेन वंश से संघर्ष

नयपाल (1038-1053 ई.) पाल वंश के शासक महीपाल का पुत्र और उत्तराधिकारी था। उसने लगभग 1038-55ई. तक राज्य किया था।

➣ उसके राज्य काल में दीर्घकाल तक कलचुरियों से संघर्ष चलता रहा। नयपाल के जीवन का अधिकांश भाग कलचुरी नरेश कर्ण के साथ संघर्ष में ही बीता।

➣ पाल शासन का विघटन नयपाल के राज्य काल से ही प्रारम्भ हो गया था। उसके शासन काल में पूर्वी, पश्चिमी तथा दक्षिणी बंगाल उसके हाथ से निकल गया था।

➣ इसके पश्चात बाद क्रमशः नयपाल (1038-1055 ई.), विग्रहपाल तृतीय (1055-1070 ई.), महिपाल द्वितीय (1070- 1075 ई.) तथा सुरपाल द्वितीय (1075-1077 ई.) ने शासन किया।

विग्रहपाल तृतीय (1055 – 1070 ई.) : पतन की शुरुआत

➣ विग्रहपाल के समय में साम्राज्य के पतन की प्रतिक्रिया तीव्र हो उठी। उसके समय में कलचुरियों ने बंगाल पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया।

➣ कलचुरी कर्ण चालुक्य नरेश विक्रमादित्य चतुर्थ एवं कोशल नरेश महाशिव गुप्त के आक्रमण का सामना करते हुए पाल साम्राज्य के अनेक भागों को हार गये। वह केवल मगध, बंगाल एवं गौड को ही अपने अधीन रख सका।

अंग में राष्ट्रकूट वंश के एक शासक मथनदेव ने अपना अधिकार कर लिया। गया क्षेत्र में चिकोरवंश के देवरक्षित ने अपना प्रभाव कायम किया।

➣ गुजरात के चालुक्यों और उड़ीसा के सोमवंशी शासकों ने भी पालों को परेशान किया। अब विग्रहपाल का अधिकार उत्तरी बिहार तक ही सीमित रहा।

➣ विग्रहपाल के पश्चात पालों में उत्तराधिकार का संघर्ष आरंभ हो गया, जिसने उनकी शक्ति और कमजोर कर दी।

➣ उत्तराधिकारी महीपाल द्वितीय (1072-1075 ई) को कैवर्तो के विद्रोह का सामना करना पड़ा। कैवर्त नेता दिव्य ने महीपाल की हत्या कर वरेंद्री में स्वतंत्र राज्य की स्थापना कर ली।

➣ महीपाल की हत्या के बाद भी गद्दी के दो अन्य उत्तराधिकारियों शूरपाल द्वितीय और रामपाल में संघर्ष जारी रहा। इसमें अंततः रामपाल विजयी हुआ।

रामपाल (1077 – 1130 ई.) : अंतिम शक्तिशाली शासक

➣ रामपाल अन्तिम महत्वपूर्ण शासक था। रामपाल विग्रहपाल तृतीय का पुत्र था। संध्याकरनन्दी द्वारा रचित रामपाल चरित में इसका वर्णन है। यह श्लेष शैली में लिखा गया है इसमें राम की कथा के साथ पाल शासक रामपाल की कथा है।

संध्याकरनंदी के अनुसार रामपाल (रामचरित के नायक) ने बिहार और बंगाल के 13 सामंतों की सहायता से कैवर्त शासक भी को पराजित कर उसकी हत्या कर दी थी।

➣ बंगाल पर अधिकार कर उसने कामरूप (असम) और उड़ीसा पर भी विजय प्राप्त की और कन्नौज के गहड़वाल शासक को बिहार की ओर साम्राज्य विस्तार करने से सफलतापूर्वक रोका।

जगदल्ल विश्वविद्यालय की स्थापना रामपाल ने की। जो बौद्ध की तंत्रयान शिक्षा का प्रसिद्ध केन्द्र था।

संध्याकर नंदी ने अपने विलक्षण काव्य ग्रंथ रामपालचरित में रामपाल की उपलब्धियों का वर्णन किया है। संध्याकार नन्दी ने स्वयं को कलिकाल वाल्मीकि (कलियुग का वाल्मीकि) कहा है एवं रामपाल को राम कहा है।

➣ उसने रामावती नरामक एक नई राजधानी बनवा कर इसे सुंदर भवनों एवं मूर्तियों से सुसज्जित किया। अपने मित्र मथनदेव की मृत्यु से दुखी होकर रामपाल ने मुंगेर में गंगा में अपने प्राण विसर्जित कर दिए।

अन्य उत्तराधिकारी

➣ रामपाल के बाद कुमारपाल, गोपाल तृतीय, मदनपाल (1144-1162 ई.) क्रमश: शासक हुए। मदनपाल इस वंश का अंतिम प्रभावशाली शासक था।

➣ उसके बाद कुमार पाल व मदनपाल के अधीन पालों की शक्ति और कमजोर हो गई। कामरूप स्वतंत्र हो गया, बंगाल में विजयसेन का प्रभाव बढ़ने लगा तथा मगध में गहड़वालों का प्रभाव बढ़ने लगा। मदनपाल को विजयसेन ने बंगाल छोड़ने पर बाध्य कर दिया।

➣ गोपाल तृतीय, रामपाल का प्रपौत्र, बंगाल के पाल वंश का परवर्ती राजा था। जो अपने पिता कुमारपाल के बाद पाल साम्राज्य की राजगद्दी पर आसीन हुआ। गोपाल तृतीय के चाचा मदनपाल ने 1145 ई. में इसे गद्दी से उतार दिया था।

➣ गोविन्द पाल, पाल राजवंश के अंतिम राजा थे। उन्होंने 1162-74 तक बंगाल पर शासन किया। उसे 1155-1159 ई. के लगभग गहड़वालों ने मगध से पदच्युत कर पाल राजवंश का अंत कर दिया।

➣ संध्याकर नन्दी द्वारा रचित रामपाल चरित में इस वंश का अंतिम शासक रामपाल माना गया है।

➣ 1199 में बख्तियार खिलजी के पुत्र इख्तियारुद्दीन मुहम्मद खिलजी के नेतृत्व में मुसलमानों ने बिहार से भी पाल वंश का अस्तित्व मिटा दिया।

1203 ई. में बख्तियार खिलजी के आक्रमण के परिणामस्वरूप धर्मपाल द्वारा स्थापित विक्रमशिला विश्वविद्यालय नष्ट हो गया।

➣ 12वीं सदी के मध्य तक सेनवंश के राजाओं ने पालों से बंगाल छीन लिया और पाल वंश पूर्णत: समाप्त हो गया।

➣ पालवंश के बाद सेन वंश की स्थापना बंगाल में हुई सेन दक्षिण के कर्णाट देश के थे और अपनी उत्पत्ति ब्रह्मक्षत्र परम्परा से मानते थे।

जानकारी के स्रोत

➣ इस काल के प्रमुख विद्वानों में सन्ध्याकर नन्दी का नाम मिलता है, जिन्होंने रामचरित नामक ऐतिहासिक काव्यग्रन्थ की रचना की। जिस में पाल शासक रामपाल के बारे में ज्ञात होता है।

➣ अन्य विद्वानों में हरिभद्र यक्रपाणिदत्त, ब्रजदत्त आदि उल्लेखनीय है। चक्रपाणिदत्त ने चिकित्सासंग्रह तथा आयुर्वेदीपिका की रचना की।

जीमूतवाहन भी पाल युग में ही हुआ। उसने दायभाग, व्यवहार मालवा तथा काल विवेक की रचना की।

➣ वज्रदत्त ने लोपेश्वरशतक की रचना की। कला के क्षेत्र में भी पाल शासकों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। स्मिथ ने पाल युग के दो महान् शिल्पकार धीनमान तथा बीतपाल का उल्लेख किया है।

➣ पाल वंश के शासकों ने बंगाल पर 750 से 1155 ई. तक तथा बिहार पर मुसलमानो के आक्रमण (1199 ई.) तक शासन किया।

➣ इस प्रकार पाल राजाओं का शासन काल उन राजवंशों में से एक है, जिसमें प्राचीन भारतीय इतिहास में सबसे लम्बे समय तक शासन किया।

अन्य सम्बन्धित महत्वपूर्ण तथ्य

➣ पाल शासकों ने दीपंकर, अभयंकर, ज्ञानपाद, रत्नवज्र, संतरक्षित आदि बौद्ध विद्वानों को विक्रमशिला विश्वविद्यालय, जो धर्मपाल द्वारा स्थापित किया गया, में संरक्षण प्रदान किया।

➣ पाल कलाकारों को कांस्य मूर्तियाँ बनाने में महारत हासिल थी। बौद्ध धर्म के महायान और वज्रयान संप्रदायों के प्रभावों से पाल शासनकाल में मूर्तिकला का विकास हुआ। इस कला के प्रमुख केंद्र थे-नालंदा, बोधगया एवं कुर्किहार।

➣ 1203 ई. में बख्तियार खिलजी के आक्रमण से नष्ट होने से पूर्व विक्रमशिला शिक्षा का प्रमुख केन्द्र था।

➣ अभिलेख में पाल शासकों को परमसौगत (बौद्ध) कहा गया है। उन्होंने ऐसे समय में बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया जब भारत उसका पतन हो रहा था।

➣ संस्कृत के अतिरिक्त बांग्ला लिपि एवं भाषा तथा जनभाषा की प्रगति पालों के अधीन हुई। हिंदू काव्य दायभाग के जन्मदाता जीमूतवाहन को पाल शासकों का संरक्षण प्राप्त था।

➣ संभवतः पालों की राजधानी मुंगेर थी। सर्वप्रथम देवपाल ने मुगेर राजधानी बनाई।

➣ अरवयात्री सुलेमान ने पाल साम्राज्य को रूहमा (धर्मा) कहा है।

➣ पाल राजाओं के राज्य काल में वज्रयान में मन्त्रपाठ के विरोध में पृथक तांत्रिक संप्रदाय बना जो सहजयान के नाम से विख्यात हुआ।

➣ दायभाग का लेखक जीमूतवाहन (12वीं शती) भी पाल शासकों के दरबार में था।

➣ चक्रपाणि दत्त 11वीं शताब्दी का बंगाल का प्रसिद्ध चिकित्साशास्त्री था। इन्होंने चरक संहिता पर आयुर्वेद दीपिका (चरक तत्व प्रदीपिका) तथा सुश्रुत संहिता पर भानुमति नामक टीकाएँ लिखी।

चक्रपाणिदत्त ने चिकित्सा संग्रह (चक्रदत्ता) नामक प्रसिद्ध ग्रन्थ लिखा, जिसमें विभिन्न रोगों के लक्षण तथा भस्म तैयार करने के नवीन तथ्यों की जानकारी मिलती है।

धीमान एवं वीतपाल 9वीं सदी के पालशैली के चित्रकार थे। पाल चित्रकला को मगध शैली भी कहा जाता है।

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