गहलौत वंश चितौड़ (7वीं शताब्दी–1303 ई.) : बप्पा रावल

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गुहिल/गहलोत वंश/सिसोदिया वंश : मेवाड़ की प्रमुख राजपूत शक्ति

➣ सन् 556 ई. में जिस गुहिल वंश की स्थापना हुई, बाद में वही गहलौत वंश बना और इसके बाद यह सिसोदिया राजवंश के नाम से जाना गया। गहलौत वंश का इतिहास ही सिसोदिया वंश का इतिहास है।

➣ सन 712 ई. में अरबों ने सिंध पर आधिपत्य जमा कर भारत विजय का मार्ग प्रशस्त कर दिया था। इस काल में न तो कोई केन्द्रीय सत्ता थी और न कोई सबल शासक था। फ़लतः अरबों के और कई आक्रमण होने लगे।

➣ सन 725 ई. में अरबों जैसलमेर, मारवाड़, मांडलगढ और भडौच आदि इलाकों पर अपना आधिपत्य जमा लिया। ऐसे समय में दो शक्तियों का प्रादुर्भाव हुआ। एक गुर्जर-प्रतिहार एंव दूसरा गोहलोत।

➣ प्रतिहार शासक नागभाट ने जैसलमेर, मारवाड, मांडलगढ से अरबों को खदेड़कर जालौर में प्रतिहार राज्य की नींव डाली और बप्पा रायडे ने चित्तौड़ दुर्ग पर अधिकार कर सन 734 ई. में मेवाड़ में गहलौत वंश का वर्चश्व स्थापित किया।

➣ नागभट्ट प्रथम ने अरबों को पश्चिमी राजस्थान और मालवा से खदेड़ दिया। बापा ने यही कार्य मेवाड़ और उसके आसपास के प्रदेश के लिए किया।

➣ दोनों राजपूती वंशो ने अरबी आक्रमणों को सिंध क्षेत्र से आगे नहीं बढ़ने दिया। इस प्रकार आधुनिक भारत कुछ शताब्दियों तक मुस्लिम आक्रमण से सुरक्षित रहा।

शासकशासनकालपरिचय / प्रमुख तथ्य
राजा गूहिल / गुहादित्यलगभग 566 ई. गुहिल (गहलोत) वंश के संस्थापक माने जाते हैं। मेवाड़ क्षेत्र में प्रारंभिक राजपूत सत्ता स्थापित की और आगे चलकर यही वंश सिसोदिया राजवंश के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
बप्पा रावल734 – 753 ई. गुहिल वंश का महान और प्रसिद्ध शासक। मेवाड़ में शक्ति स्थापित की तथा अरब आक्रमणों के विरुद्ध संघर्ष के लिए प्रसिद्ध है। चित्तौड़ को अपनी राजधानी बनाया और मेवाड़ राज्य को मजबूत किया।
रतन सिंह1301 – 1303 ई. मेवाड़ का शासक, अलाउद्दीन खिलजी के चित्तौड़ आक्रमण (1303 ई.) के समय शासन किया। रानी पद्मिनी/पद्मावती की कथा तथा चित्तौड़ में पहला जौहर से जुड़ा महत्वपूर्ण नाम माना जाता है।

राजा गूहिल / गुहादित्य (लगभग 566 ई.) : गुहिल वंश की स्थापना

➣ राजा गूहिल / गुहादित्य को मेवाड़ का वास्तविक संस्थापक माना गया है । इनके पिता शिलादित्य वल्लभी के शासक थे।

➣ शिलादित्य की रानी पुष्पवती ने मल्हियाँ गुफा के भीतर गुहिल को जन्म दिया। गुहिल का जन्म गुफा के भीतर हुआ इसलिए माता पुष्पावती ने बालक का नाम गोह/गुहिल रखा।

➣ गुहिल को कमलावती ने ईडर के राजा मांडलिक के पास संरक्षण के लिए रख दिया। ईडर के राजा मांडलिक भील ने गुहिल का लालन-पालन किया।

➣ कालांतर में यह ईडर के शासक बने और फिर राजस्थान के कई इलाकों पर अपना अधिकार कर लिया। ईडर से मेवाड़ स्थापित होने पर रावल गहलौत हो गई।

➣ रणसिंह (1158–1165) के शासनकाल में गुहिल/गहलौत वंश दो शाखाओं में बट गया- राणा शाखा एंव रावल शाखा।

➣ राजवंश की एक शाखा सिसोदे की जागीर की स्थापना करके सिसोदिया हो गई। चूँकि यह केन्द्रीय रावल गहलौत शाखा कनिष्ठ थी। इसलिये इसे राणा की उपाधि मिली।

➣ रावण रण सिंह के बाद रावल गहलोत की एक शाखा और हुई। जो सिसोदिया के जागीर पर आसीन हुई इसके संस्थापक माहव एवं राहप दो भाई थे। सिसोदा में बसने के कारण ये लोग सिसोदिया गहलौत कहलाये।

➣ कुछ पीढियों बाद एक युद्ध में रावल शाखा का अन्त हो गया और मेवाड़ की केन्द्रीय सत्ता पर सिसोदिया राणा का आधिपत्य हो गया। केन्द्रीय सत्ता के राणा, महाराणा हो गये।

बप्पा रावल (734 – 753 ई.) : मेवाड़ शक्ति का विस्तार एवं अरब प्रतिरोध

➣ बप्पा रावल को कालभोज भी कहा जाता था। उनके पिता ईडर के शाषक महेंद्र द्वितीय (697–728) थे।

➣ जनता ने बप्पा रावल के प्रजासंरक्षण, देशरक्षण आदि कामों से प्रभावित होकर भीलों इसे बप्पा पदवी से विभूषित किया था।

➣ जब बप्पा रावल 3 वर्ष के थे तब भील समुदाय ने उनके प्राण बचाए थे। बप्पा रावल का बचपन भील जनजाति के बीच ही रहकर बिता। उनकी सेना में भीलों की प्रमुखता बतायी जाती है।

➣ बप्पा रावल के समय मेवाड़ की सामाजिक-आर्थिक संरचना कृषिप्रधान थी। उन्होंने क्षेत्रीय सामंतों व स्थानीय आदिवासी भीलों को अपनी वफादारी में लाने के लिए सहजीव नीति अपनाई।

➣ कर्नल टॉड के अनुसार सन् 734 ई. में बप्पा रावल ने चित्तौड़ दुर्ग (चित्रकूट) को राजपूताने पर राज्य करने वाले मौर्य वंश के अंतिम शासक मोन मौर्य से छीनकर गुहिल वंशीय राज्य की स्थापना की। रिचर्ड मैजलियार और आर. वी. सोमानी के अनुसंधान के अनुसार अरब आक्रमणों के बाद बप्पा रावल ने मोरियों के पतन के पश्चात चित्तौड़ पर विजय पाई

➣ बप्पा परम् शिव(एकलिंगनाथ) भक्त थे। उदयपुर के उत्तर में कैलाशपुरी में स्थित एकलिंगजी का मन्दिर का निर्माण 734 ई. में बप्पा रावल ने करवाया था। इसके अलावा उन्होंने सास – बहु का मंदिर(नागदा) आदिवराह मंदिर भी बनवाए।

➣ अपने सैन्य अभियानों में बप्पा ने ईरान के हज्जात , अरब के जुनैद , अफगान के सलीम को पराजित किया। पाकिस्तान के शहर रावलपिण्डी का नाम बप्पा के नाम से ही पड़ा जाना माना जाता है।

➣ बप्पा रावल प्रथम गुहिल शासक थे जिसने मेवाड़ में सोने के सिक्के चलाए।

➣ अजमेर में कुछ सोने के सिक्के मिले हैं जिन्हें बापा रावल का बताया गया है। इस सिक्के का तोल 115 ग्रेन (65 रत्ती) है।

➣ लगभग 753 ई. मे राजकार्य से सन्यास ले लिया। आम्र कवि द्वारा लिखित एकलिंग प्रशस्ति में बप्पा रावल के संन्यास लेने की घटना की पुष्टि होती है ।

➣ बप्पा रावल की मृत्यु राजधानी नागदा में हुई जहां उसकी समाधि बनी हुई है। जिसे वर्तमान में बप्पा रावल के नाम से जानते हैं।

➣ कुम्भलगढ़ प्रशस्ति में बप्पा रावल को विप्रवंशीय बताया गया है। इसके अलावा कीर्ति स्तम्भ शिलालेख, आबू के शिलालेख में भी बप्पा रावल का वर्णन मिलता है।

रतन सिंह (1301 – 1303 ई.) : अलाउद्दीन खिलजी का चित्तौड़ आक्रमण

➣ रावल रतन सिंह (रतनसेन) गुहिलोत राजवंश की रावल शाखा के सदस्य थे। उनका वर्णन राजस्थानी लोक महाकाव्य पद्मावत में भी रतनसेन के नाम से मिलता है

➣ कुछ इतिहासकार इनका राज्याभिषेक 1301 ई. मानते हैं, पर सर्वाधिकतः 1302 में चित्तौड़ की बागडोली नामक किले से शासन प्रारंभ हुआ माना जाता है

➣ रतन सिंह को समकालीन दिल्ली का शासक अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण का सामना करना पड़ा था।

➣ रतन सिंह की पत्नी पद्मिनी या पद्मावती अद्वितीय सुन्दरी थी। ऐसा कहा जाता है कि उनके रूप का वर्णन सुनकर सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण किया था। लेकिन यह ऐतिहासिक स्रोतों में पुष्ट नहीं है।

➣ चित्तौड़ पर आक्रमण करने के लिए 28 जनवरी 1303 ई को अलाउद्दीन खिलजी सेना सहित दिल्ली से रवाना हुआ।

➣ इस आक्रमण में खिलजी के साथ प्रसिद्ध लेखक अमीर खुसरो भी था। खुसरो ने इस युद्ध का सजीव चित्रण करते हुए अपनी पुस्तक खजाइनुल फुतूह मैं किया है।

➣चित्तौड़ का छह माह तक भयंकर घेराबन्दी के बाद अंततः रावल रतन सिंह वीरगति को प्राप्त हुए। बाद में किले पर कब्जा होने पर रानी पद्मिनी सहित अन्य महिलाओं ने जौहर किया।

➣ युद्ध में रतन सिंह के दो सेनापति गोरा और बादल के नेतृत्व में राजपूतों ने केसरिया वस्त्र धारण कर किले के फाटक खोल कर शत्रुओं की सेना पर टूट पड़े और वीरगति को प्राप्त हुए।

यह चित्तौड़गढ़ का प्रथम जौहर था।

📌: मालिक मुहम्मद जयासी द्वारा रचित अवधी पद्य पद्मावत में इसे जीवंत रूप से वर्णित किया गया है। इसमें रानी पद्मिनी के जौहर का भव्य विवरण मिलता है।

➣युद्ध भूमि में रावल रतन सिंह के वीरगति को प्राप्त होने के साथ ही गुहिलोत राज की रावल शाखा का अंत हो गया।।

➣इनका शासनकाल अत्यन्त अल्प (लगभग 1 वर्ष) रहा और युद्ध की स्थिति में व्यतीत हुआ, कोई नया प्रशासनिक सुधार या नीति नहीं हुई। सम्भवतः पिछले शासनकाल की नीतियों का ही अनुसरण कर रहे थे।

➣ इस प्रकार 26 अगस्त 1303 ई को चित्तौड़गढ़ किला अलाउद्दीन खिलजी के अधीन हुआ। अल्लाउद्दीन खिलजी ने अपने पुत्र खिज्रखां को चित्तौड़गढ़ का शासन देकर दिल्ली लौट गया।

➣ अलाउद्दीन खिलजी ने अपने पुत्र खिज्र खां के नाम पर चित्तौड़ का नाम बदलकर खिजराबाद रख दिया।

➣ 22 दिसंबर 1316 में अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु हो गई जिस कारण खिज्र खां चित्तौड़ से वापस दिल्ली गया और मेवाड़ मालदेव सोनगरा को सौंप दिया।

➣ इसके पश्चात मेवाड़ में एक नई शाखा सिसोदिया शाखा का आरंभ हुआ जिसके सूत्रधार राणा हम्मीर सिसोदिया थे।

➣ राणा हम्मीर से पहले चित्तौड़ के गुहिल वंश शासक रावल एवं गहलौत कहलाते थे (जैसे बप्पा रावल, रावल रतन सिंह )। राणा हमीर के पश्चात मेवाड़ का राजवंश सिसोदिया राजवंश के नाम से विख्यात हुआ।

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