खिलजी : परिचय
| शासक (काल) | परिचय और महत्वपूर्ण घटनाएँ |
|---|---|
| जलालुद्दीन फिरोज खिलजी (1290-1296 ई.) | खिलजी वंश के संस्थापक। वास्तविक नाम मलिक फिरोज था। वे उदार और दयालु शासक के रूप में जाने जाते थे (कभी-कभी संत शासक कहा जाता है)। मुख्य घटनाएँ: मंगोल आक्रमण को रोका, कई मंगोलों को इस्लाम कबूल करने पर बसाया। रणथंबौर पर असफल अभियान। उनके भतीजे अलाउद्दीन ने 1296 में उनका हत्या कर सत्ता हथिया ली। |
| अलाउद्दीन खिलजी (1296-1316 ई.) | खिलजी वंश के सबसे शक्तिशाली और प्रसिद्ध सुल्तान। सत्ता हथियाने के लिए चाचा जलालुद्दीन की हत्या की। मुख्य उपलब्धियाँ: रणथंबौर (1301), चित्तौड़ (1303), मालवा (1305) आदि पर विजय। मलिक काफूर के नेतृत्व में दक्षिण भारत (देवगिरि, वारंगल, होयसल, मदुरै) तक अभियान। कई मंगोल आक्रमणों को रोका। प्रशासनिक सुधार (बाजार नियंत्रण, मूल्य नियंत्रण, जासूसी व्यवस्था, भूमि कर सुधार)। सुल्तानत को साम्राज्य में बदलने का श्रेय। |
| शहाबुद्दीन उमर (1316 ई.) | अलाउद्दीन खिलजी के छोटे पुत्र (लगभग 5-6 वर्ष की आयु)। मलिक काफूर के संरक्षण में नाममात्र के सुल्तान बने। अलाउद्दीन की मृत्यु के बाद बहुत कम समय (कुछ महीने) के लिए शासन किया। उनके बड़े भाई मुबारक शाह ने उन्हें अंधा कर कैद कर दिया और सत्ता हथिया ली। |
| क़ुतुबुद्दीन मुबारक शाह खिलजी (1316-1320 ई.) | अलाउद्दीन के पुत्र। भाई उमर को हटाकर सुल्तान बने। मुख्य घटनाएँ: गुजरात और देवगिरि पर पुनः नियंत्रण, वारंगल से कर वसूला। अलाउद्दीन की सख्त नीतियों को ढीला किया, कैदियों को रिहा किया। विलासप्रिय शासक। अंत में अपने प्रिय खुसरो खान द्वारा 1320 में हत्या कर दी गई, जिससे खिलजी वंश का अंत हुआ। |
| खुसरो (नासिरुद्दीन) खां (1320, 7-15 अप्रैल तक) | मूल रूप से गुजरात का हिंदू (बड़ौदा क्षेत्र), अलाउद्दीन के समय में कैद होकर इस्लाम स्वीकार किया। मुबारक शाह का प्रिय सेनापति। मुबारक शाह की हत्या कर सुल्तान बना (नासिरुद्दीन खुसरो शाह)। खिलजी वंश का अंतिम शासक। शासनकाल बहुत छोटा (कुछ सप्ताह)। हिंदू रीति-रिवाज अपनाने के आरोप लगे। ग़ाज़ी मलिक (ग़यासुद्दीन तुग़लक) ने हराया और हत्या कर दी, जिससे तुग़लक वंश शुरू हुआ। |
➣ खिलजी तुर्कों की 64 शाखाओं में से एक थे। चौथी शताब्दी में ही यह शाखा अफगानिस्तान की हेलमंद घाटी में बस चुकी थी। खिलजियों के निवास के कारण यह क्षेत्र खिलजी क्षेत्र के नाम से विख्यात हुआ।
➣ खिलजियों ने अफगानी तौर-तरीकों को अपना लिया। महमूद गजनवी व मुहम्मद गोरी के आक्रमणों के समय अनेक खिलजी भारत चले आए और उन्होंने दिल्ली के सुल्तानों के यहां सेना व अन्य प्रशासनिक विभागों में नौकरी ली।
➣ प्रो. मोहम्मद हबीब ने खिलजी वंश की स्थापना को एक क्रान्ति की संज्ञा दी है। इस काल की मुख्य विशेषता यह रही कि इस दौरान तत्कालीन भारतीय सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक संरचना में मूलभूत परिवर्तन हुए। यही इसका मुख्य कारण है।
➣ खिलजी क्रांति केवल इसलिए महत्वपूर्ण नहीं थी कि इसने गुलाम वंश को समाप्त कर नवीन खिलजी वंश की स्थापना की, बल्कि इस क्रांति के परिणामस्वरूप दिल्ली सल्तनत का सुदूर दक्षिण तक विस्तार हुआ।
➣ खिलजी वंश के मुस्लिम शासकों (अलाउद्दीन खिलजी) ने ही सर्वप्रथम दक्षिण भारत के अभियान की शुरुआत की थी।
➣ ख़िलजी क्रांति का सामान्य अर्थ है- जाति व नस्ल आधारित शासन व्यवस्था की समाप्ति, क्योंकि अब तक उच्च समझे जाने वाले इल्बारी तुर्कों के स्थान पर निम्न तुर्क ख़िलजियों ने सत्ता संभाल ली।
➣ सर्वप्रथम बलबनी वंश के कैकुबाद ने ग़ैर तुर्क सरदार जलालुद्दीन ख़िलजी को अपना सेनापति बनाया। कैकुबाद को लकवा मार गया। कुछ समय पश्चात जलालुद्दीन ने कैकुबाद की हत्या कर दी।
➣ कालांतर में जलालुद्दीन फ़िरोज ख़िलजी ने उचित अवसर देखकर उसके पुत्र शम्सुद्दीन का भी वध कर दिया और स्वयं सुल्तान बन बैठा। इस प्रकार इल्बारी तुर्कों का शासन समाप्त हुआ और खिलजी वंश की सत्ता स्थापित हुई।
➣ दिल्ली सल्तनत के वंशों में खिलजी वंश के शासकों ने सबसे कम समय (1290 ई.-1320 ई.) यानी लगभग 30 वर्षों तक शासन किया था।
जलालुद्दीन फिरोज खिलजी (1290-96 ई.) : उदार एवं क्षमाशील शासक
➣ जलालुद्दीन ख़िलजी अथवा जलालुद्दीन फ़िरोज ख़िलजी ख़िलजी वंश का संस्थापक था। उसने अपना जीवन एक सैनिक के रूप में शरू किया था।
➣ जलालुद्दीन का राजनीतिक उत्कर्ष कैकुबाद (1286 – 1290 ई.) के समय में प्रारंभ हुआ। कैकुबाद ने उसे आरिज-ए-मुमालिक का पद दिया और शाइस्ता ख़ाँ की उपाधि दी एवं बरन का राज्यपाल बनाया।
➣ कालांतर में अपनी योग्यता के बल पर उसने सर-ए-जहाँदार/शाही अंगरक्षक का पद प्राप्त किया तथा बाद में समाना का सूबेदार बना।
➣ जलालुद्दीन ने दिल्ली के बजाय कैकुबाद द्वारा निर्मित किलोखरी के महल में राज्याभिषेक करवाया। इसने किलोखरी को अपनी राजधानी बनाया। राज्याभिषेक के समय जलालुद्दीन की आयु 70 वर्ष थी।
➣ जलालुद्दीन ने अपने राज्याभिषेक के एक वर्ष बाद दिल्ली में प्रवेश किया। उसने अपने पुत्रों को ख़ानख़ाना, अर्कली ख़ाँ, एवं क़द्र ख़ाँ की उपाधि प्रदान की।
➣ दिल्ली का वह पहला सुल्तान था, जिसकी आन्तरिक नीति दूसरों को प्रसन्न करने के सिद्धान्त पर थी। उसने हिन्दू जनता के प्रति उदार दृष्टिकोण अपनाया।
➣ बलबन की रक्त और लौह की नीति त्यागकर इसने उदार नीति अपनाई और मध्यकाल का पहला शासक बना, जिसने जनता की इच्छा को शासन का आधार बनाया। वस्तुत: जलालुद्दीन ने अहस्तक्षेप की नीति को अपनाया।
➣ जलालुद्दीन फ़िरोज ख़िलजी ने अपने अल्प शासन काल में कुछ महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त कीं। दिल्ली के निकटवर्ती क्षेत्रों में उसने ठगों का दमन किया।
➣ अगस्त, 1290 में उसने कड़ामानिकपुर के सूबेदार मलिक छज्जू, जिसने सुल्तान मुगीसुद्दीन की उपाधि धारण कर अपने नाम के सिक्के चलवाये एवं खुतबा (प्रशंसात्मक रचना) पढ़ा, के विद्रोह को दबाया और कड़ामानिकपुर की सूबेदारी अपने भतीजे अलाउद्दीन ख़िलजी को दी।
➣ उसका 1291 ई. में रणथंभौर का अभियान असफल रहा। 1292 ई. में मंडौर एवं झाईन के क़िलों को जीतने में जलालुद्दीन को सफलता मिली।
➣ जलालुद्दीन ने रणथम्भौर की घेरेबन्दी 1291-92 ई. (प्रथम घेरा 1291 ई. तथा द्वितीय घेरा- 1292 ई.) में यह कहते हुये हटा ली कि वह मुसलमान के सिर के एक बाल की कीमत ऐसे 100 किलों से ज्यादा समझता है।
➣ रणथम्भौर अभियान के समय ही ताजुद्दीन कूची ने सुल्तान जलालुद्दीन को मारने की योजना बनाई, लेकिन बाद में उसको माफ कर दिया गया। इससे पता चलता है कि अपने विरोधियों के प्रति उसने दुर्बल नीति अपनाई।
➣ 1292 ई. में ही मंगोल आक्रमणकारी हलाकू का पौत्र अब्दुल्ला लगभग डेढ़ लाख सिपाहियों के साथ पंजाब पर आक्रमण कर सुनाम पतक पहुँच गया था, परन्तु भतीजे अलाउद्दीन खिलजी ने मंगोलों को परास्त करने में सफलता प्राप्त की और अन्त में दोनों के बीच सन्धि हुई।
➣ मंगोल वापस जाने के लिए तेयार हो गये। परन्तु चंगेज़ ख़ाँ के नाती उलगू ने अपने लगभग 400 मंगोल समर्थकों के साथ इस्लाम धर्म ग्रहण कर भारत में रहने का निर्णय लिया।
➣ कालान्तर में जलालुद्दीन ने उलगू के साथ ही अपनी पुत्री का विवाह किया और साथ ही रहने के लिए दिल्ली के समीप मुगरलपुर नाम की बस्ती बसाई गई। बाद में उन्हें ही नवीन मुसलमान के नाम से जाना गया।
➣ जलालुद्दीन ने ईरान के धार्मिक फ़क़ीर सीदी मौला (सूफी सन्त शेख फरीदुद्दीन गज-ए-शंकर का शिष्य) को हाथी के पैरों तले कुचलवा दिया। हालाँकि यह सुल्तान का एक मात्र कठोर कार्य था, अन्यथा उसकी नीति उदारता और सभी को सन्तुष्ठ करने की थी।
➣ जलालुद्दीन के शासन काल में ही उसकी भतीजे अलाउद्दीन ख़िलजी ने शासक बनने से पूर्व ही 1292 ई. में अपने चाचा की स्वीकृति के बाद भिलसा एवं देवगिरि का अभियान किया।
उल्लेखनीय है उस समय देवगिरि (यादव वंश) मुसलमानों का दक्षिण भारत पर प्रथम आक्रमण था। इस समय देवगिरी का शासक रामचन्द्र देव था ।
➣ इन दोनों अभियानों से अलाउद्दीन खिलजी को अपार सम्पत्ति प्राप्त हुई। अमीर ने मार्ग में ही अलाउद्दीन ख़िलजी से सम्पत्ति को छीनने की सलाह दी, परन्तु जलालुद्दीन ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया।
➣ जलालुद्दीन के भतीजे अलाउद्दीन ने 1296 ई. में उसका कड़ा में गंगा नदी के तट पर धोखे से वध कर दिया और सिंहासन पर अधिकार कर लिया।
➣ जलालुद्दीन ख़िलजी की हत्या के षड़यंत्र में अलाउद्दीन ख़िलजी ने अपने भाई अलमास वेग की सहायता ली थी, जिसे बाद में उलूग ख़ाँ की उपाधि से विभूषित किया गया।
➣ जलालुद्दीन खिलजी दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान था जो मानता था कि राज्य जनता की इच्छा पर आधारित होना चाहिये। वह उदार निरंकुशवादी था।
➣ जलालुद्दीन ने सर्वप्रथम घोषित किया कि दिल्ली सल्तनत सही अर्थों में कभी इस्लामिक राज्य नहीं हो सकता।
जलालुद्दीन खिलजी के शासनकाल की प्रमुख घटनाएँ
| घटना | विवरण |
|---|---|
| मलिक छज्जू का विद्रोह (1290) | कड़ा प्रांत के सूबेदार मलिक छज्जू ने सत्ता के विरुद्ध विद्रोह कर दिया था, जिसे सुल्तान ने सफलतापूर्वक शांत कर दिया। |
| रणथम्भौर अभियान (1291) | सुल्तान ने रणथम्भौर पर चढ़ाई की, परंतु किले की मजबूत सुरक्षा व्यवस्था को देखते हुए सेना वापस बुला ली। उस समय वहाँ राणा हम्मीर देव का शासन था। |
| मंगोल आक्रमण (1292) | अब्दुल्ला खाँ के नेतृत्व में मंगोल सेना ने आक्रमण किया, परंतु उन्हें हार का सामना करना पड़ा। हारे हुए कई मंगोल सैनिकों ने बाद में इस्लाम अपना लिया और वे नव मुस्लिम कहलाए। दिल्ली के जिस इलाके में वे जा बसे, वह आज मंगोलपुरी के नाम से जाना जाता है। |
| सिद्दीमौला को दंड | सूफी संत सिद्दीमौला पर सुल्तान के विरुद्ध साजिश रचने का संदेह किया गया, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें मृत्युदंड दिया गया। |
| देवगिरि अभियान (1296) | अलाउद्दीन खिलजी के नेतृत्व में देवगिरि पर आक्रमण हुआ। वहाँ के शासक रामचन्द्रदेव को परास्त करते हुए भारी मात्रा में धन-संपत्ति हस्तगत की गई। |
| सुल्तान की हत्या (1296) | अलाउद्दीन खिलजी ने कड़ा में सुल्तान की हत्या करवा दी, जिससे उसके शासनकाल का अंत हो गया। |
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➣ जलालुद्दीन खिलजी ने दीवाने वकूफ नामक विभाग की स्थापना की। ➣ जलालुद्दीन खिलजी ने निकट संबंधी मलिक अहमद चप को अमीर-ए-हाजिब के पद पर नियुक्त किया। अहमद चप जलालुद्दीन के परिवार का सबसे बड़ा व शक्तिशाली समर्थक था। ➣ जलालुद्दीन खिलजी ने दिल्ली-लखनौती के मध्य फैले जंगलों को साफ़ कराके डाकुओं, ठगों एवं लूटेरों से रक्षा की। ➣ नयन जैनी जलालुद्दीन का अधिकारी था एंव ख्वाजा खातिर उसका वजीर था। ➣ अमीर खुसरो जलालुद्दीन के समय शाही पुस्तकालयध्यक्ष था। |
अलाउद्दीन खिलजी (1296-1316 ई.) : दक्षिण विजय और बाजार सुधारों के लिए प्रसिद्ध सुल्तान
➣ अलाउद्दीन खिलजी का जन्म 1266-67 ई. में हुआ था, उसके बचपन का नाम अली गुरशास्प था। उसके पिता का नाम शिहाबुद्दीन खिलजी था, जो कि जलालुद्दीन फिरोज खिलजी का भाई था।
➣ पिता की अकाल मृत्यु हो जाने के उपरान्त उसके चाचा जलालुद्दीन फिरोज खिलजी ही उसके संरक्षक थे। वह जलालुद्दीन ख़िलजी का भतीजा और दामाद था।
➣ यद्यपि अलाउद्दीन निरक्षर था, फिर भी वह अत्यन्त प्रतिभावान था। उसकी प्रतिभा से प्रभावित होकर जलालुद्दीन ने अपनी पुत्री का विवाह उससे किया था।
➣ मलिक छज्जू के विद्रोह को दबाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने के कारण जलालुद्दीन ने उसे कड़ा-मनिकपुर की सूबेदारी सौंप दी।
➣ 1290 ई. में जलालुद्दीन ने उसे अमीर-ए-तुजक पद प्रदान किया। 1292 ई. में सुल्तान जलालुद्दीन की अनुमति से अलाउद्दीन ने भिलसा पर आक्रमण किया और अतुल धन सम्पदा को जीता।
➣ 1294 ई में अलाउद्दीन ने देवगिरि पर आक्रमण किया और सुल्तान जलालुद्दीन से छिपाकर अपार धन सम्पत्ति प्राप्त किया था। देवगिरि की विजय से अलाउद्दीन की सुल्तान बनने की इच्छा प्रबल हो उठी।
➣ अपने सफल अभियानों से प्राप्त अपार धन ने उसकी स्थिति और मज़बूत कर दी थी। उत्कर्ष पर पहुँचकर अलाउद्दीन ख़िलजी ने 19 जुलाई, 1296 ई. को धोखे से अपने चाचा जलालुद्दीन की हत्या कर दी और स्वयं को कड़ा में ही सुल्तान घोषित कर दिया।
सिंहासन अधिग्रहण
➣ जलालुद्दीन की हत्या के पश्चात् अलाउद्दीन को तुरंत गद्दी प्राप्त न हो सकी। जैसे ही मलिका-ए-जहाँ (जलालुद्दीन की पत्नी) को पति की हत्या का समाचार मिला, उसने तुरंत अपने छोटे पुत्र कद्र खाँ को रुक्नुद्दीन इब्राहिम के नाम से सिंहासन पर बैठा दिया और अपने बड़े पुत्र अर्कली खाँ को मुल्तान से बुलाया।
➣ अलाउद्दीन अभी कड़ा में ही था, जैसे ही उसे इस घटनाक्रम का पता चला, अलाउद्दीन कड़ा से दिल्ली की ओर बढ़ा और उसने मार्ग में लोगों को अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए सोने व चांदी के टुकड़े व सिक्के बाँटे।
➣ जब दिल्ली में बैठे इब्राहिम ने देखा कि विरोध असंभव है तो वह अपनी माता और मलिक अहमद के साथ दिल्ली छोड़कर मुल्तान की ओर भाग गया। सुल्तान बनने के बाद अलाउद्दीन ने जलालुद्दीन के पुत्र अर्कली खाँ समेत उसके परिवार के सभी सदस्यों का कत्ल कर दिया।
➣ अलाउद्दीन ने दिल्ली में प्रवेश किया और अक्तूबर 1296 ई. में विधिपूर्वक दिल्ली में स्थित बलबन के लाल महल में अपना राज्याभिषेक सम्पन्न करवाया।
➣ राज्याभिषेक के बाद उत्पन्न कठिनाईयों का सफलता पूर्वक सामना करते हुए अलाउद्दीन ने कठोर शासन व्यवस्था के अन्तर्गत अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार करना प्रारम्भ किया।
➣ अपनी प्रारम्भिक सफलताओं से प्रोत्साहित होकर अलाउद्दीन ने सिकन्दर द्वितीय (सानी) की उपाधि ग्रहण कर इसका उल्लेख अपने सिक्कों पर करवाया।
➣ अलाउद्दीन की प्रारम्भिक इच्छा एक नवीन धर्म चलाने की तथा विश्वविजेता बनने की थी किन्तु काजी अलाउल्मुल्क के परामर्श से उसने इन दोनों योजनाओं को त्याग दिया।
अलाउद्दीन का राजत्व सिद्धांत
➣ अलाउद्दीन ने हड़पे हुए राजत्व को जनता की दृष्टि में उचित सिद्ध करने के लिए राजत्व के सिद्धांत को पुनः निर्मित किया। अलाउद्दीन के राजत्व सिद्धांत का प्रतिपादन अमीर खुसरो ने किया।
➣ अलाउद्दीन देवी-शक्ति पर आधारित राजत्व में विश्वास नहीं करता था, बल्कि वह ऐसे राजत्व में विश्वास करता था जो स्वयं अपने अस्तित्व द्वारा अपना औचित्य सिद्ध कर सकें।
➣ अलाउद्दीन दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान था जिसने धर्म को राजनीति से पृथक किया। अलाउद्दीन ने ख़लीफ़ा को मान्यता प्रदान करते हुए यामिन-उल-ख़िलाफ़त-नासिरी-अमीर-उल-मोमिनीन की उपाधि ग्रहण की, किन्तु उसने ख़लीफ़ा से अपने पद की स्वीकृत लेनी आवश्यक नहीं समझी।
➣ उसने शासन में इस्लाम धर्म के सिद्धान्तों को प्रमुखता न देकर राज्यहित को सर्वोपरि माना।
➣ उलेमा वर्ग को भी अपने शासन कार्य में हस्तक्षेप नहीं करने दिया और न ही खलीफा से कभी अधिकार पत्र के लिये आवेदन किया।
सर्वप्रथम उलेमा वर्ग के प्रभाव तथा मार्ग प्रदर्शन से स्वतन्त्र होकर राज्य करने का श्रेय अलाउद्दीन खिलजी को ही प्राप्त है।
➣ अलाउद्दीन निरंकुश राजतन्त्र में विश्वास करता था। अलाउद्दीन सुल्तान को कानून से ऊपर मानता था। उसके अनुसार सुल्तान के शब्द ही कानून है।
➣ अलाउद्दीन ख़िलजी के समय निरंकुशता अपने चरम सीमा पर पहुँच गयी। अलाउद्दीन ख़िलजी ने शासन में न तो इस्लाम के सिद्धान्तों का सहारा लिया और न ही उलेमा वर्ग की सलाह ली।
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➣ अलाउद्दीन की तुलना जर्मन राज्य के संस्थापक बिस्मार्क से की जाती है। ➣ वेश्यावृत्ति पर प्रतिबन्ध लगाने वाला अलाउद्दीन मध्य काल का पहला शासक था। ➣ अलाउद्दीन को गुम्बद निर्माण का पिता कहा जाता है। ➣ ठाकुर पेरू अलाउद्दीन की टकसाल का प्रमुख था जिसने संस्कृत प्राकृत में द्रव्य परीक्षा लिखी। ➣ अलाउद्दीन ने योग्यता के आधार पर पदों का आवंटन किया। ➣ 1316 में जलोदर (इस्तिस्का) रोग से अलाउद्दीन की मृत्यु हो गई। ➣ जोधपुर के संस्कृत शिलालेख में कहा गया है कि अलाउद्दीन के देवतुल्य शौर्य से पृथ्वी अत्याचारों से मुक्त हो गई। |
अलाउद्दीन खिलजी के समय हुए विद्रोह
➣ पहला विद्रोह मंगोलों द्वारा हुआ, जो जलालुद्दीन फिरोज के समय से भारत में बस गए थे। 1299 ई. में गुजरात के सफल अभियान में प्राप्त धन के बंटवारे को लेकर हुआ।
➣ उन्होंने अलाउद्दीन के भतीजे और नुसरत खाँ के एक भाई का वध कर दिया था। यह विद्रोह अलाउद्दीन के एक सेनापति नुसरत खां द्वारा दबाया गया।
➣ दूसरा विद्रोह अलाउद्दीन के भतीजे अकत ख़ाँ द्वारा किया गया। अपने मंगोल मुसलमानों के सहयोग से उसने अलाउद्दीन पर प्राण घातक हमला किया, जिसके बदलें में उसे पकड़ कर मार दिया गया।
➣ तीसरा विद्रोह अलाउद्दीन की बहन के लड़के मलिक उमर एवं मंगू ख़ाँ ने किया, पर इन दोनों को हराकर उनकी हत्या कर दी गई।
➣ चौथा विद्रोह दिल्ली के हाजी मौला द्वारा किया गया, जिसका दमन सरकार हमीद्दीन ने किया। इस प्रकार इन सभी विद्रोहों को सफलता पूर्वक दबा दिया गया।
➣ अलाउद्दीन ने तुर्क अमीरों द्वारा किये जाने वाले विद्रोह के कारणों का अध्ययन कर उन कारणों को समाप्त करने के लिए चार अध्यादेश जारी किये।
जारी किए गए चार अध्यादेश
➣ प्रथम अध्यादेश के अन्तर्गत अलाउद्दीन ने दान, उपहार एवं पेंशन के रूप मे अमीरों को दी गयी भूमि को जब्त कर उस पर अधिकाधिक कर लगा दिया, जिससे उनके पास धन का अभाव हो गया।
➣ द्वितीय अध्याधेश के अन्तर्गत अलाउद्दीन ने गुप्तचर विभाग को संगठित कर बरीद (गुप्तचर अधिकारी) एवं मुनहिन (गुप्तचर) की नियुक्ति की।
➣ तृतीय अध्याधेश के अन्तर्गत अलाउद्दीन ख़िलजी ने मद्यनिषेद, भाँग खाने एवं जुआ खेलने पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया।
➣ चौथे अध्यादेश के अन्तर्गत अलाउद्दीन ने अमीरों के आपस में मेल-जोल, सार्वजनिक समारोहों एवं वैवाहिक सम्बन्धों पर प्रतिबन्ध लगा दिया।
➣ सुल्तान द्वारा लाये गये ये चारों अध्यादेश पूर्णतः सफल रहे। अलाउद्दीन ने खूतों, मुक़दमों आदि हिन्दू लगान अधिकारियों के विशेषाधिकार को समाप्त कर दिया।
उत्तर-भारत का अभियान
➣ अलाउद्दीन ख़िलजी साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का व्यक्ति था। उसने उत्तर-भारत के राज्यों को जीत कर उन पर प्रत्यक्ष शासन किया जबकि दक्षिण-भारत के राज्यों को अलाउद्दीन ने अपने अधीन कर उनसे वार्षिक कर वसूला।

| राज्य | शासक | नेतृत्व | वर्ष |
|---|---|---|---|
| गुजरात | रायकरन बघेला (कर्ण) | उलूग खाँ, नुसरत खाँ | 1298 ई. |
| रणथम्भौर | राणा हम्मीर देव (चौहान वंश) | उलूग खाँ, नुसरत खाँ | 1301ई. |
| चित्तौड़ | रतन सिंह | अलाउद्दीन खिलजी | 1303 ई. |
| मालवा | महलकदेव | आइनुलमुल्क मुल्तानी | 1305 ई. |
| सिवाना (मारवाड़) | शीतलदेव (परमार वंश) | कमालुद्दीन कुर्ग | 1308 ई. |
| जालौर | कान्हदेव (कृष्णदेव) | कमालुद्दीन कुर्ग | 1311 ई. |
गुजरात अभियान (1298-99 ई.)
➣ अलाउद्दीन के समय यहाँ का शासक रायकर्ण था। 1298 ई. में अलाउद्दीन ने उलूग ख़ाँ एवं नुसरत ख़ाँ को गुजरात विजय के लिए भेजा।
➣ अहमदाबाद के निकट बघेल राजा कर्ण द्वितीय (राजकरन) और अलाउद्दीन की सेना में संघर्ष हुआ। कर्ण युद्ध में पराजित हुआ और उसने अपनी पुत्री देवल देवी के साथ देवगिरि में शरण ली।
➣ अलाउद्दीन ने कर्ण की पत्नी कमला देवी से विवाह कर लिया एवं मल्लिका-ए-जहाँ की उपाधि दी। गुजरात अब दिल्ली सल्तनत का एक प्रान्त बन गया।
➣ गुजरात विजय के दौरान ही खिलजी ने मालिक काफूर को प्राप्त किया था। जिसे 1000 दीनार में खरीदा गया था जिस कारण इसे हजार दीनारी भी कहा जाता था।
➣ अलाउद्दीन ख़िलजी की सेना के कुछ घोड़े चुराने के कारण सुल्तान ख़िलजी ने जैसलमेर के शासक दूदा एवं उसके सहयोगी तिलक सिंह को 1299 ई. में पराजित किया और जेसलमेर की विजय की।
रणथम्भौर अभियान (1301 ई.)
➣ रणथंभौर राजपूताना का सबसे शक्तिशाली राज्य माना जाता था। यह इल्तुतमिश के समय पहले भी दिल्ली सल्तनत का हिस्सा रह चुका था।
➣ रणथम्भौर आक्रमण का मुख्य कारण रणथम्भौर के शास हम्मीरदेव द्वारा अलाउद्दीन से असन्तुष्ट मंगोल सेनापति मुहम्मद शाह एवं केहब्रू को शरण देना माना जाता है।
➣ अलाउद्दीन के रणथम्भौर आक्रमण का उल्लेख जोधराज के हम्मीररासो व नयनचन्द्र सूरी रचित हम्मीर महाकाव्य में मिलता है।
➣ सुल्तान ने रणथंभौर पर आक्रमण के लिये उलूग खाँ एवं नुसरत खाँ को भेजा। लगभग एक साल तक सुल्तान की सेना को कोई सफलता नहीं मिली।
➣ अंत में 1301 ई. में हम्मीरदेव का प्रधानमंत्री रणमल और रतिपाल सुल्तान से जा मिले। राणा हम्मीरदेव युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुआ। सुल्तान की तरफ से नुसरत खाँ भी इस युद्ध में मारा गया।
➣ हम्मीर रासो’ के अनुसार, हम्मीर की रानी रंग देवी के साथ अनेक राजपूत महिलाओं ने जौहर कर लिया। 1301 ई. में रणथम्भौर विजय के समय हुआ जौहर फारसी साहित्य में जौहर का पहला वर्णन है।
➣ अमीर खुसरो भी रणथम्भौर अभियान में उसके साथ था। उसने तारीख-ए-अलाई (खजाइन-उल-फुतुह) में इस जौहर का वर्णन किया है।
चित्तौड़ अभियान (1303 ई.)
➣ रणथंभौर के पश्चात् 1303 ई. में अलाउद्दीन ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया। चित्तौड़ को इससे पूर्व किसी सुल्तान ने नहीं जीता था।
➣ ऐसा माना जाता है कि चित्तौड़ की रानी पद्मिनी की सुंदरता से प्रभावित होकर अलाउद्दीन ने चित्तौड़ आक्रमण की योजना बनाई। मलिक मुहम्मद जायसी ने पद्मावत की रचना में रानी पद्मावती का जिक्र किया है।
➣ चित्तौड़ के राणा रतन सिंह ने घेरेबंदी के सात माह बाद आत्मसमर्पण कर दिया, संभवत: वह युद्ध में मारे गए। गोरा व बादल राणा रतन सिंह के दो प्रसिद्ध सेना नायक थे।
➣ अलाउद्दीन ने 1303 में चित्तौड़ को जीतकर इसका नाम अपने पुत्र खिज्र खाँ के नाम पर खिज्राबाद रखा और ख़िज़्र ख़ाँ को सौंप कर दिल्ली वापस आ गया।
➣ अमीर खुसरो ने भी चित्तौड़ अभियान में हिस्सा लिया था। खुसरो की रचना खजाइन-उल-फुतुह में चित्तौड़ आक्रमण का वर्णन मिलता है।
➣ उल्लेखनीय है इसी अभियान के दौरान मंगोल तारगी बंग ने दिल्ली में सुल्तान की अनुपस्थिति का लाभ उठाकर चढ़ाई कर दी, परंतु अलाउद्दीन ने चित्तौड़ की घेरेबंदी नहीं तोड़ी।
➣ अलाउद्दीन की मृत्यु के पश्चात् हम्मीरदेव (सिसोदिया वंश के संस्थापक, महाराणा प्रताप के पूर्वज) ने मालदेव पर आक्रमण कर 1321 ई. में चित्तौड़ सहित पूरे मेवाड़ को आज़ाद करवा लिया। इस प्रकार चित्तौड़ एक बार फिर पूर्ण स्वतन्त्र हो गया।
मालवा अभियान (1305 ई.)
➣ चित्तौड़ की विजय के बाद राजपूतों की रियासतों ने अलाउद्दीन की अधीनता स्वीकार करना प्रारंभ कर दिया। उसमें मालवा (माण्डू) के राजा महलकदेव ने अधीनता स्वीकार नहीं की।
➣ 1305 ई. में अलाउद्दीन ने मुल्तान के सूबेदार आइन-उल-मुल्क को मालवा पर आक्रमण के लिये भेजा, प्रारंभ में उसे कठिनाई झेलनी पड़ी, किंतु अंत में आइन-उल-मुल्क का किले पर अधिकार हो गया।
➣ तत्पश्चात् उज्जैन, मांडू, धार, चंदेरी तथा जालौर पर भी सुल्तान का अधिकार हो गया।
➣ मालवा का शासक महलकदेव एवं उसका सेनापति हरनन्दकोका था।
मारवाड़ अभियान (1308 ई.)
➣ मालवा के पश्चात सुल्तान ने सवाना को जीतने के लिए कमालुद्दीन कुर्ग (गुर्ग का अर्थ है ‘भेड़िया’) को भेजा इस समय वह का परमार शासक शितलदेव था।
➣ परमार राजपूत शासक शीतलदेव ने कड़ा संघर्ष किया, अंततः वह मारा गया।
➣ कमालुद्दीन गुर्ग को सेवान (मारवाड़) का शासक नियुक्त किया गया एवं सिवाना का नाम खैराबाद रखा।
जालौर अभियान (1311 ई.)
➣ जालौर (जाबालिपुर) के शासन कान्हड़देव के विरुद्ध अपनी दासी गुल बहिश्त से उत्पन्न पुत्र मलिक शाहीन के नेतृत्व में एक सेना भेजी। बाद में कमालुद्दीन गुर्ग के नेतृत्व में सेना भेजी।
➣ यहाँ का शासक कान्हणदेव परास्त हुआ। अलाउद्दीन ने जालौर जीतकर नाम जलालाबाद रखा।
➣ जालौर की विजय ने अलाउद्दीन ख़िलजी की राजस्थान (रणथम्भौर,चितोड़,मारवाड़ एंव जालौर ) की विजय को पूर्ण कर दिया।
➣ जालौर विजय का सेनापति कमालुद्दीन गुर्ग था। कुमालुद्दीन गुर्ग 1315 ई. में गुजरात में विद्रोह का दमन करते हुए मारा गया।
➣ 1311 ई. तक उत्तर भारत में सिर्फ़ नेपाल, कश्मीर एवं असम ही ऐसे भाग शेष थे, जिन पर अलाउद्दीन अधिकार नहीं कर सका। उत्तर भारत की विजय के बाद अलाउद्दीन ने दक्षिण भारत की ओर अपना रुख़ किया।
दक्षिण भारत के अभियान
➣ अलाउद्दीन ने दक्षिण के राज्यों को सीधे साम्राज्य में न मिलाकर उनसे अधीनता ही स्वीकार करवाई एवं राजस्व लिया। ऐसा इसलिए क्योंकि प्रत्यक्ष साम्राज्य विस्तार से साम्राज्य का स्थायित्व प्रभावित होता।
➣ कुछ इतिहासकारों के अनुसार उसका मुख्य उद्देश्य दक्षिण की अथाह संपदा को हासिल करना था।
➣ दक्षिण अभियान की विस्तृत जानकारी वरनी कृत तारीख-ए-फिरोजशाही तथा अमीर खुसरो की रचना खजायन-उल-फुतूह एवं इसामी की रचना फुतूह-उस-सलातीन से मिलती है।
➣ अलाउद्दीन खिलजी मध्य युग का प्रथम सुल्तान था, जिसने दक्षिण के राज्यों को जीतने के लिए सैन्य अभियान छेड़ा, उसके दक्षिण अभियान का सेनापति मलिक काफूर था।
➣ अलाउद्दीन ख़िलजी के समकालीन दक्षिण भारत में सिर्फ़ तीन महत्त्वपूर्ण शक्तियाँ थीं- देवगिरि के यादव, दक्षिण-पूर्व तेलंगाना के काकतीय और द्वारसमुद्र के होयसल।
| राज्य | शासक | वर्ष |
|---|---|---|
| देवगिरि | रामचंद्र देव | 1307 ई. |
| वारंगल | प्रताप रुद्र देव (काकतीय वंश) | 1309 ई. |
| द्वारसमुद्र | वीर बल्लाल-III(होयसल वंश) | 1310ई. |
| पाण्ड्य | वीर पाण्ड्य | 1311 ई. |
| देवगिरि | शंकरदेव (सिंघण-III) | 1313 ई. |
देवगिरी दक्षिण भारत का पहला राज्य था जो फिरोज जलालुद्दीन के शासनकाल में 1294ई. में मुस्लिम आक्रमण का शिकार हुआ। इस समय वहां का शासक रामचंद्र देव था।
➣ उत्तर-भारत में मुस्लिम आक्रमण का शिकार होने वाला पहला राज्य सिंध था (712ई. में मुहम्मद बिन कासिम द्वारा)। इस समय वहां का शासक दाहिर था।
देवगिरी का अभियान (1307-08 ई.)
➣ सुल्तान बनने से पहले भी फिरोज के शासनकाल में 1296 ई. में अलाउद्दीन ने देवगिरी के राजा रामचंद्र देव को पराजित किया था, कालांतर में रामचंद्र ने सुल्तान को कर देना बंद कर दिया। साथ ही उसने गुजरात के शासक रायकर्ण को शरण दी थी।
➣ प्रतिक्रिया स्वरूप अलाउद्दीन ने 1307-08 ई. में मलिक काफूर को देवगिरी पर आक्रमण के लिये भेजा। मेलिक काफूर ने रामचंद्र देव को पराजित कर दिल्ली भेज दिया गया।
➣ रामचन्द्र देव ने अलाउद्दीन को एलिचपुर की आय भेजने का वचन दिया और सुल्तान ने उसके साथ उदारता का व्यवहार करते हुए राय रायान की उपाधि प्रदान की।
➣ इसके अतिरिक्त सुल्तान ने उसे गुजरात की नवसारी जागीर एवं एक लाख स्वर्ण टके देकर वापस भेज दिया। कालान्तर में राजा रामचन्द्र देव ने द्वारसमुद्र विजय में अलाउद्दीन की सहायता की ।
वारगल का अभियान (1309-10 ई.)
➣ अलाउद्दीन ने 1303 ई. में दक्षिण का पहला आक्रमण वारंगल पर मलिक छज्जु के नेतृत्व में किया, किन्तु तेलंगाना के शासक प्रताप रूद्र देव द्वितीय ने छज्जू को परास्त किया।
➣ प्रताप रूद्र देव द्वितीय को मुस्लिम इतिहासकारों ने लहर देव कहा है।
➣ 1303 ई. में वारंगल के असफल अभियान के कलंक को धोने के लिये अलाउद्दीन ने पुन: 1309-10 ई. के बीच मलिक काफूर के नेतृत्व में एक सेना भेजी। रास्ते में देवगिरी के राजा रामचन्द्र देव ने काफ़ूर की सहायता की।
➣ युद्ध में जल्द ही प्रताप रुद्रदेव ने समर्पण कर दिया। सुल्तान की अधीनता स्वीकार कर उसने भी वार्षिक कर देना स्वीकार किया।
➣ तेलंगाना के काकतीय वंश के शासक प्रताप रुद्रदेव ने अपनी सोने की मूर्ति बनवाकर और उसके गले में सोने की जंजीर डालकर आत्मसमर्पण हेतु मलिक काफूर के पास भेजा।
इसी अवसर पर प्रताप रुद्रदेव ने मलिक काफूर को प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा दिया था।
होयसल का अभियान (1310 ई.)
➣ 1310 ई. में मलिक काफूर ने होयसल राज्य पर आक्रमण किया और पाण्ड्य की राजधानी वीरधूलव पर अधिकार कर लिया। वीर बल्लाल तृतीय ने आत्मसर्मपण कर दिया और उसे दिल्ली भेज दिया गया।
➣ बल्लालदेव ने अधीनता स्वीकार की एंव अलाउद्दीन को एक विशेष खिलवत, एक मुकुट और छत्र दिया तथा दस लाख टंकों की थैली भेंट स्वरूप प्रदान की।
➣ कालांतर में बल्लाल तृतीय ने मदुरा विजय के समय अलाउद्दीन की सहायता की। वीर बल्लाल तृतीय ने ही अलाउद्दीन को माबर प्रदेश (पाण्ड्य) के मार्ग की जानकारी दी थी।
दक्षिण भारत के देवगिरि नरेश रामचन्द्र और होयसल नरेश बल्लाल देव अलाउद्दीन के दिल्ली दरबार में आये थे जबकि वारगल शासक प्रताप रुद्रदेव ने अपनी सोने की मूर्ति भेजी थी।
पांड्य राज्य का अभियान (1311 ई.)
➣ पांड्य (माबर) राज्य दक्षिण भारत के अंतिम छोर पर था। वहाँ सुंदर पांड्य और वीर पांड्य, दोनों भाइयों के बीच सिंहासन को लेकर गृहयुद्ध चल रहा था।
➣ सुदर पाड्य ने अपने भाई के विरुद्ध सुल्तान अलाउद्दीन से सहायता माँगी। सुल्तान ने अवसर का लाभ उठाकर 1311 ई. में मलिक काफूर को आक्रमण के लिये भेजा।
➣ काफूर ने जल्द ही पांड्य राज्य की राजधानी मदुरै पर अधिकार कर लिया, वीर पांड्य वहाँ से भाग खड़ा हुआ।
➣ अमीर ख़ुसरो के अनुसार काफ़ूर ने रामेश्वरम तक आक्रमण किया, वहाँ के प्रसिद्ध हिन्दू मंदिर रामेश्वरम को तोड़कर एक मस्जिद बनवाई।
➣ धन की दृष्टि से पाण्ड्य राज्य पर किया गया आक्रमण सर्वाधिक सफल रहा। इस अभियान में उसे इतना धन प्राप्त हुआ था, जो कि इससे पूर्व किसी और अभियानों से प्राप्त नही हुआ।
➣ हालाँकि पाण्ड्य राजाओं ने न तो अलाउद्दीन की अधीनता स्वीकार की और नहीं कर देना स्वीकार किया। इस प्रकार मदुरा (मदुरै) के खिलाफ सैनिक अभियान राजनैतिक दृष्टि से असफल रहा।
देवगिरी पर पुनः आक्रमण (.1313 ई.)
➣ राजा रामचंद्र देव की मृत्यु के बाद उसका पुत्र शंकरदेव या सिंहनदेव गद्दी पर बैठा। उसने अपने को दिल्ली शासन से स्वतंत्र कर लिया। और कर देना बंद कर दिया।
➣ प्रतिक्रिया स्वरूप 1313 ई. में सुल्तान ने मलिक काफूर को पुनः देवगिरी पर आक्रमण के लिये भेजा, इस युद्ध में शंकरदेव मारा गया और काफूर ने विभिन्न नगरों को लूटा।
अलाउद्दीन के समय हुए मंगोल आक्रमण
➣ अलाउद्दीन खिलजी शासनकाल में सर्वाधिक मंगोल आक्रमण (7) हुए जिनसे निपटने के लिए उसने बलबन की लौह एवं रक्त की नीति अपनायी। इसके समय मंगोल शासक दवा खां था।
| 1.1296 ई. | कादर खान |
| 2.1297-98 ई. | साल्दी |
| 3.1299 ई. | कुतलुग ख्वाजा |
| 4.1303 ई. | तार्गी |
| 5.1305 ई. | अली बेग एवं तरकत |
| 6.1306 ई. | कबक खाँ |
| 7.1307-08ई. | इकबालमन्द |
➣ 1297-98 ई. में मंगोल सेना ने अपने नेता कादर के नेतृत्व में पंजाब एवं लाहौर पर आक्रमण किया। जालंधर के निकट इन आक्रमणकारियों को सुल्तान की सेना ने परास्त कर दिया। इस सेना का नेतृत्व जफ़र ख़ाँ एवं उलूग ख़ाँ ने किया था।
➣ मंगोलों का दूसरा आक्रमण सलदी के नेतृत्व में 1298 ई. में सेहबान पर हुआ। जफ़र ख़ाँ ने इस आक्रमण को सफलता पूर्वक असफल कर दिया।
➣ 1299 ई. में कुतलुग ख्वाजा के नेतृत्व में मंगोल सेना के आक्रमण को जफ़र ख़ाँ ने असफल कर दिया। किन्तु युद्ध के दौरान जफ़र ख़ाँ मारा गया।
➣ जफर खाँ को युग का हीरो/रूस्तम कहा जाता है, जफर खाँ की मृत्यु पर अलाउद्दीन ने कहा कि बिना अपमानित हुए ही उससे छुटकारा मिल गया।
➣ 1303 ई. में मंगोल सेना का चौथा आक्रमण तार्गी के नेतृत्व में हुआ। 1303 ई. में तारंगी मंगोल 2 माह तक दिल्ली का घेरा डाले रहा और अलाउद्दीन को संधि करके उसे वापस भेजना पड़ा। यह एक प्रकार से अलाउद्दीन की मंगोलों से पराजय थी।
➣ कालांतर में अलाउद्दीन ने मंगोल आक्रमण से सुरक्षा के लिये 1304 ई. में सीरी को अपनी राजधानी बनाई व किलेबंदी की।
➣ 1305 ई. में अलीबेग, तार्ताक एवं तार्गी के नेतृत्व में मंगोलों ने अमरोहा पर आक्रमण किया। परंतु मलिक काफ़ूर एवं गाजी मलिक ने मंगोलों को बुरी तरह पराजित किया।
➣ 1306 ई. में मंगोल सेना का नेतृत्व करने वाला इक़बालमन्द, गाजी मलिक (ग़यासुद्दीन तुगलक) द्वारा रावी नदी के किनारे परास्त किया गया।
उल्लेखनीय है 1306 ई. के बाद अलाउद्दीन खिलजी के समय में दिल्ली सल्तनत एवं मंगोलों के बीच सीमा रावी नदी थी।
➣ गाजी मलिक तुगलक को अलाउद्दीन ने अपना सीमा रक्षक नियुक्त किया। इस प्रकार इस प्रकार अलाउद्दीन ने अपने शासन काल में मंगोलों के सबसे अधिक एवं सबसे भयानक आक्रमण का सामना करते हुए सफलता प्राप्त की।
➣ मलिक नायक नामक हिन्दू अलाउद्दीन की सेना में था, जिसने मंगोलों को हराया।
शिहाबुद्दीन उमर ( 1316-1316 ई.) : नाममात्र का बाल सुल्तान
➣ अलाउद्दीन ख़िलजी की मृत्यु के बाद उसके सेनानायक मलिक काफ़ूर ने दुरभिसंधि कर अलाउद्दीन के 5-6 वर्षीय पुत्र मुबारक ख़िलजी को सिंहासन पर बैठाया और स्वयं उसका संरक्षक बन गया।
➣ मुबारक खिलजी जिसे काफूर ने हजार सितुन महल में कैद कर रखा था, उसने काफूर की हत्या कर दी और स्वयं सुल्तान का संरक्षक बन गया।
➣ मुबारक खां लगभग 2 महीनों तक उमर का संरक्षक बना रहा। इस अवधि में उसने खिलजी-अमीरों का विश्वास प्राप्त किया एवं अपनी स्थिति सुदृढ़ की।
➣ अब वह स्वयं सुल्तान बनने की योजना बनाने लगा। कालान्तर में उसने शिहाबुद्दीन को अंधा करवा करवा दिया और 1316 ई. में स्वयं कुतुबुद्दीन मुबारक शाह के नाम से दिल्ली सल्तनत का मालिक बन बैठा।
क़ुतुबुद्दीन मुबारक ख़िलजी (1316-1320 ई.) : उदार लेकिन विलासी शासक
➣ यह अलाउद्दीन ख़िलजी का तृतीय पुत्र था। उसने अल इमाम’. उल इमाम एवं ख़िलाफ़त-उल्लाह की उपाधियाँ धारण की थीं।
➣ उसने ख़िलाफ़त के प्रति भक्ति को हटाकर अपने को इस्लाम धर्म का सर्वोच्च प्रधान और स्वर्ण तथा पृथ्वी के अधिपति का ख़लीफ़ा घोषित किया।
मुबारक खिलजी स्वयं को खलीफा घोषित करने वाला पहला मुस्लिम शासक था।
➣ मुबारक ख़िलजी ने लगभग चार वर्ष तक शासन किया। उसके शासनकाल में गुजरात के सूबेदार जफ़र ख़ाँ एंव देवगिरी के हरगोपाल देव ने विद्रोह किया। जिसका उसने उसका बलपूर्वक दमन किया।
➣ मुबारक शाह खिलजी ने देवगिरि को जीतकर दिल्ली सल्तनत में मिला लिया और देवगिरि का नाम कुतबाबाद/खुत्बाबाद रखा। मलिक यकलखी खाँ को देवगिरि का प्रथम मुस्लिम प्रान्तपति बनाया गया। वारंगल के कुछ हिस्सों को भी दिल्ली सल्तनत में मिला लिया।
इस प्रकार दक्षिण को सर्वप्रथम दिल्ली सल्तनत में मिलाने की शुरुआत मुबारक शाह ने की। जबकि इसे पुरा गयासुद्दीन तुगलक ने किया।
➣ क़ुतुबुद्दीन मुबारक ख़िलजी को नग्न स्त्री-पुरुषों की संगत पसन्द थी। अपनी इसी संगत के कारण कभी-कभी वह राज्य दरबार में स्त्री का वस्त्र पहनकर आ जाया करता था।
➣ जियाउद्दीन बरनी के अनुसार मुबारक ख़िलजी कभी-कभी नग्न होकर दरबारियों के बीच दौड़ा करता था।
➣ शासन के प्रारंभिक काल में क़ुतुबुद्दीन मुबारक ख़िलजी ने कुछ लोकप्रिय कार्य भी किए। इसने अपने सैनिकों को छह माह का अग्रिम वेतन देना प्रारम्भ किया।
➣ जागीर व्यवस्था पुनः शुरू की गई एवं अलाउद्दीन की बाज़ार नियंत्रण प्रणाली को समाप्त कर दिया गया और जो कठोर क़ानून बनाये गए थे, उन्हें भी समाप्त करवा दिया।
➣ मुबारकशाह ने नासिरूद्दीन खुसरव शाह नामक धर्म परिवर्तित मुसलमान को अपना वजीर व मलिक नाईब नियुक्त किया।
➣ मुबारक बरादुओं पर अत्यधिक कृपा दृष्टि रखता था। बरादु उन हिन्दुओं का समूह था, जिन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया। खुसरो मलिक इनका नेता था।
➣ मुबारक खिलजी विलासी प्रवृति का था इसलिए उसने अपना सारा राजकार्य ख़ुसरो ख़ाँ के ऊपर छोड़ दिया।
➣ खुसरो ने सुल्तान को अपने पूरे प्रभाव में ले लिया। राज्य की वास्तविक सत्ता उसी के हाथों में केंद्रित हो गई। अप्रैल 1320 ई. को उसने सुल्तान को छुरा भोंककर हत्या कर दी।
➣ मुबारक शाह सूफी संत शेख निजामुद्दीन औलिया से द्वेष रखता था। मुबारक ने घोषणा की “शेख ओलिया को दरबार में खुद आना होगा वरना उसको जबरन लाया जायेगा।”
नासिरुद्दीन खुसरवशाह (15 अप्रैल से 7 सितंबर, 1320): खिलजी वंश का अंतिम शासक
➣ नासिरुद्दीन खुसरवशाह हिंदू से परिवर्तित मुसलमान था। वह मूलतः गुजरात का हिन्दू था जिसने इस्लाम स्वीकार किया।
➣ उसका वास्तविक नाम मुबारक हसन था। सुल्तान ने उससे प्रभावित होकर उसे खुसरो खां की उपाधि प्रदान की थी।
➣ खुसरव शाह (खुसरो मलिक) ने 15 अप्रैल, 1320 को खिलजी का वध कर नासिरूद्दीन खुसरव शाह नाम से सुल्तान बना और अलाउद्दीन खिलजी के परिवार के सभी सदस्यों की हत्या करवा दी।
नासिरूद्दीन खुसरव शाह दिल्ली सल्तनत के काल में सुल्तान बनने वाले एक मात्र भारतीय मुसलमान था।
➣ इसने अपने नाम का खुतबा पढ़वाया तथा पैगम्बर का सेनापति की उपाधि ग्रहण की।
➣ इसके विरोधियों ने इसे इस्लाम का शत्रु और इस्लाम खतरे में है का नारा दिया।
➣ उसी वर्ष गाजी मालिक (गयासुद्दीन तुगलक) ने खुसरो शाह की हत्या कर तुगलक वंश की शुरुआत की।
➣ निजामुद्दीन औलिया ने खुसरव शाह द्वारा दी हुई 5 लाख टंका की भेंट स्वीकार की। बाद में गयासुद्दीन तुगलक ने उसे वापिस लेना चाहा तो निजामुद्दीन औलिया ने मना कर दिया। इससे गयासुद्दीन तुगलक व निजामुद्दीन औलिया के रिश्ते तनाव पूर्ण हो गये।
मलिक काफूर : दक्षिण विजय का नायक
➣ मलिक काफूर (जिसे ताजुद्दीन इज्जुद्दीन के नाम से भी जाना जाता था) दिल्ली सल्तनत के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी का प्रमुख सेनापति, नायब-ए-सल्तनत (वायसराय) और सबसे भरोसेमंद सहयोगी था।
➣ काफूर मूल रूप से एक हिंदू परिवार में जन्मा था और जातीय रूप से वह संभवतः एक अफ्रीकी/हब्शी (कुछ इतिहासकारों के अनुसार) या भारतीय मूल का गुलाम माना जाता है। गुजरात अभियान (1299 ई.) के दौरान नुसरत खान उसे खंभात से बंदी बनाकर लाया था। उसे हजार दीनारी कहा जाता था, क्योंकि अलाउद्दीन ने उसे एक हजार दीनार देकर खरीदा था।
➣ ऐतिहासिक स्रोतों, विशेष रूप से समकालीन इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी और इसामी के लेखन में, मलिक काफूर को “खोजा” (हिजड़ा/नपुंसक/Eunuch) बताया गया है।
➣ मध्यकालीन भारत में सुल्तानों के दरबार में खोजों को विशेष विश्वासपात्र पदों पर नियुक्त करने की प्रथा प्रचलित थी, क्योंकि उन्हें सिंहासन के लिए सीधा खतरा नहीं माना जाता था और वे राजपरिवार के अंतःपुर (हरम) में भी सेवा दे सकते थे।
➣ यह ध्यान देने योग्य है कि “खोजा” होने के बावजूद काफूर एक कुशल सैन्य रणनीतिकार और प्रशासक साबित हुआ, जिससे उसकी बुद्धिमत्ता और क्षमता पर कोई प्रश्न नहीं उठता।
➣ काफूर ने 1306 ई. में मंगोल आक्रमणकारियों को हराया और 1308-1311 ई. के बीच दक्षिण भारत के प्रसिद्ध सैन्य अभियानों की कमान संभाली। इन अभियानों में देवगिरि (यादव वंश), वारंगल (काकतीय वंश), द्वारसमुद्र (होयसल वंश) और मदुरै (पांड्य वंश) जैसे राज्य शामिल थे।
➣ इन अभियानों से दिल्ली सल्तनत को भारी मात्रा में धन, रत्न, हाथी और घोड़े प्राप्त हुए, जिसमें प्रसिद्ध कोहिनूर हीरे का भी उल्लेख कुछ स्रोतों में मिलता है। इससे न केवल अलाउद्दीन का खजाना समृद्ध हुआ, बल्कि सल्तनत का प्रभाव दक्षिण भारत तक फैल गया।
➣ जब अलाउद्दीन बीमार पड़ा, तो काफूर को नायब (वायसराय) नियुक्त किया गया। सुल्तान की मृत्यु (1316 ई.) के बाद उसने अलाउद्दीन के नाबालिग पुत्र शिहाबुद्दीन उमर को गद्दी पर बैठाकर खुद वास्तविक सत्ता अपने हाथों में ले ली।
➣ उसने सत्ता मजबूत करने के लिए अलाउद्दीन के बड़े पुत्र खिज्र खान और अन्य संभावित दावेदारों को अंधा करवा दिया या कैद कर लिया। हालांकि उसका यह शासन ज्यादा दिन नहीं चला, 35-40 दिनों में ही अलाउद्दीन के पुराने अंगरक्षकों (जिनमें मुख्य रूप से गुजराती सैनिक शामिल थे) ने उसकी हत्या कर दी।
➣ मलिक काफूर दिल्ली सल्तनत के इतिहास में महत्वाकांक्षा, क्षमता और विवाद से भरे एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में याद किया जाता है, जिसने सैन्य विस्तार में बड़ी भूमिका निभाई, लेकिन सत्ता की राजनीति में आखिरकार नाकाम रहा।
अलाउद्दीन ख़िलजी के सुधार एंव प्रशासन
➣ एक प्रशासक के तौर पर अलाउद्दीन खिलजी मध्यकालीन भारतीय इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। डॉ. के. एस. लाल के अनुसार, अलाउद्दीन एक प्रशासकीय प्रयोगकर्ता था, उसने नवीन विचारों को जन्म दिया और नवीन भूमि पर उन्हें रोपा।
प्रशासन व्यवस्था
➣ अलाउद्दीन के समय में पांच महत्त्वपूर्ण मंत्री थे, जो प्रशासन के कार्यों में अपना बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान रखते थे। ये मंत्री एवं उनके संबंधित विभाग निम्न प्रकार थे-
दीवान-ए-वजारत
➣ मुख्यमंत्री को वज़ीर कहा जाता था। यह सर्वाधिक शक्तिशाली मंत्री होता था। अलाउद्दीन के समय में वज़ीर का महत्त्वपूर्ण विभाग होता था।
➣ वित्त के अतिरिक्त उसे सैनिक अभियान के समय शाही सेनाओं का नेतृत्व भी करना पड़ता था। अलाउद्दीन ने वज़ीर पद अपने सैनिक अधिकारियों को सौंपा।
➣ अलाउद्दीन के शासन काल में ख्वाजा ख़ातिर, ताजुद्दीन काफ़ूर, नुसरत ख़ाँ आदि वज़ीर के पद पर कार्य कर चुके थे।
दीवान-ए-आरिज या अर्ज
➣ आरिज-ए-मुमालिक युद्धमंत्री व सैन्य मंत्री होता था। यह वज़ीर के बाद दूसरा महत्त्वपूर्ण मंत्री होता था।
➣ इसके मुख्य कार्य सैनिकों की भर्ती करना, उन्हें वेतन बाँटना, सेना की दक्षता एवं साज-सज्जा की देखभाल करना, युद्ध के समय सेनापति के साथ युद्ध क्षेत्र में जाना आदि था।
➣ अलाउद्दीन के शासन में मलिक नासिरुद्दीन मुल्क सिराजुद्दीन आरिज-ए-मुमालिक के पद पर था। उसका उपाधिकारी ख्वाजा हाजी नायब आरिज था।
दीवान-ए-इंशा
➣ यह राज्य का तीसरा महत्त्वपूर्ण मंत्रालय होता था, जिसका प्रधान दबीर-ए-ख़ास था।
➣ उसका महत्त्वपूर्ण कार्य शाही उदघोंषणाओं एवं पत्रों का प्रारूप तैयार करना तथा प्रांतपतियों एवं स्थानीय अधिकारियों से पत्र व्यवहार करना होता था।
➣ इसके सहायक सचिव को दबीर कहा जाता था। दबीर के प्रमुख को दबीर-ए-मुमलिकात या दबीर-ए-ख़ास कहा जाता था।
दीवान-ए-रसालत
➣ यह राज्य का चौथा मंत्री होता था। इसका सम्बन्ध मुख्यतः विदेश विभाग एवं कूटनीति पत्र व्यवहार से होता था।
➣ यह पड़ोसी राज्यों को भेजे जाने वाले पत्रों का प्रारूप तैयार करता था और साथ ही विदेशों से आये राजदूतों से नज़दीक का सम्पर्क बनाये रखता था।
➣ कुछ इतिहासकारों के अनुसार यह धर्म से सम्बन्धित विभाग था।
दीवान-ए-रिसायत
➣ आर्थिक मामलों से सम्बन्धित इस नये विभाग की स्थापना अलाउद्दीन ख़िलजी ने की थी। दीवान-ए-रियासत व्यापारी वर्ग पर नियंत्रण रखता था।
पुलिस एवं गुप्तचर विभाग
➣ अलाउद्दीन ने अपने शासन काल में पुलिस एवं गुप्तचर विभाग को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। कोतवाल पुलिस विभाग का प्रमुख अधिकारी होता था।
➣ पुलिस विभाग को और अधिक सुधारने के लिए अलाउद्दीन ने एक नये पद दीवान-ए-रिसायत का गठन किया, जो व्यापारी वर्ग पर नियंत्रण स्थापित करता था। शहना व दंडाधिकारी भी पुलिस विभाग से सम्बन्धित अधिकारी थे।
➣ मुहतसिब सेंसर अधिकारी होता था, जो जन सामान्य के आचार की रक्षा एवं देखभाल करता था।
➣ अलाउद्दीन द्वारा स्थापित गुप्तचर विभाग का प्रमुख अधिकारी बरीद-ए-मुमालिक होता था। उसके नियंत्रण में उनके बरीद (संदेह वाहक) कार्य करते थे।
➣ बरीद के अतिरिक्त अन्य सूचनादाता को मुन्ही कहा जाता था। मुन्ही लोगों के घरों में प्रवेश करके गौंण अपराधों को रोकते थे। मुख्यतः इन्हीं अधिकारियों को अलाउद्दीन के बाज़ार नियंत्रण की सफलता का श्रेय जाता है।
➣ राज महल के कार्यों की देख-रेख करने वाला मुख्य अधिकारी वकील-ए-दर होता था। सुल्तान के अंगरक्षकों के मुखिया को सरजानदार कहा जाता था।
➣ इनके अतिरिक्त राजमहल के कुछ अन्य अधिकारी अमीर-ए-आखूर, शहना-ए-पील, अमीर-ए-शिकार, शराबदार, मुहरदार आदि होते थे।
आर्थिक व्यवस्था
➣ अलाउद्दीन के आर्थिक सुधारों में सेना की भूमिका महत्त्वपूर्ण थी। अलाउद्दीन ख़िलजी की आर्थिक नीति के विषय में हमें व्यापक जानकारी जियाउद्दीन बरनी की कृति तारीख़े-फ़िरोजशाही से मिलती है।
➣ अलाउद्दीन ख़िलजी के आर्थिक सुधारों के अंतर्गत मूल्य नियंत्रण के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी अमीर खुसरों की पुस्तक खजाइनुल-फुतूह, इब्न बतूता की पुस्तक रेहला एवं इसामी की पुस्तक फुतूह-उस-सलातीन से भी मिलती है।
➣ फ़रिश्ता के अनुसार सुल्तान के पास लगभग 50,000 दास थे, जिन पर अत्यधिक ख़र्च होता था। इन तमाम ख़र्चों को दृष्टि में रखते हुए अलाउद्दीन ने एक नई आर्थिक नीति का निर्माण किया।
बाजार नियंत्रण व्यवस्था
➣ वित्तीय एवं राजस्व सुधारों में रूचि लेने वाला अलाउद्दीन पहला सुल्तान था। दक्षिण विजय से प्राप्त धन के कारण मुद्रा का प्रसार बढ़ गया और मुद्रा का मूल्य घटने से कीमतें बढ़ी।
➣ मूल्यों की स्थिरता अलाउद्दीन की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी। अलाउद्दीन ने जीवन निर्वाह की आवश्यक वस्तुओं के मूल्य को मांग तथा पूर्ति के नियमानुसार घटने तथा बढ़ने नहीं दिया बल्कि उनका मूल्य स्थायी कर दिया।
➣ बरनी के अनुसार बाजार नियंत्रण का उद्देश्य कम खर्चे पर अधिक सेना रखना एंव हिन्दुओं को दण्ड देना भी था, क्योंकि अधिकांश व्यापारी हिन्दू थे।
➣ चिश्ती संत नासिरुद्दीन महमूद चिराग-ए-दिल्ली और अमीर खुसरो के अनुसार बाजार नियंत्रण का उद्देश्य प्रजा हित था।
➣ वास्तव में मंगोल आक्रमण से सुरक्षा हेतु आवश्यक एक विशाल सेना के रख-रखाव हेतु बाजार नियंत्रण प्रणाली को अपनाया गया।
➣ सुल्तान ने आवश्यक वस्तुओं का मूल्य इतना कम कर दिया था कि एक सैनिक कम वेतन में भी अपना गुजारा-भना कर सके। उसने तय कर दिया कि मूल्य वही होगा, जो सरकार द्वारा निर्धारित मूल्य सूची में दिया हुआ है।
➣ बरनी ने लिखा है कि अनाज मंडी में कीमतों का स्थायित्व इस युग का एक आश्चर्य था।
➣ अलाउद्दीन ने दिल्ली में बदायूँ द्वार के पास तीन तरह के बाजार बनवायें-
| बाजार | वस्तुएँ / विवरण |
|---|---|
| सराय-ए-अदल | कपड़ा (विशेषकर मूल्यवान/रेशमी), चीनी, घी, तेल, सूखे मेवे आदि |
| मंडी (देखरेख अधिकारी: शहना-ए-मंडी) |
खाद्यान्न/अनाज — गेहूँ, जौ, चावल, दाल आदि |
| घोड़ा-गुलाम बाजार |
घोड़े, मवेशी और दास |
➣ अलाउद्दीन ने कपड़े का व्यापार करने वाले व्यापारियों को खाद्यान्न व्यापारियों की तुलना में अधिक से अधिक प्रोत्साहन दिया।
➣ शेख मुबारक के अनुसार अलाउद्दीन की मृत्यु के साथ ही बाजार नियंत्रण व्यवस्था समाप्त हो गई।
➣ जियाउद्दीन बरनी इस व्यवस्था को अलाउद्दीन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनते हैं, लेकिन स्वीकार करते हैं कि यह अलाउद्दीन की मृत्यु के साथ ही समाप्त हो गई
➣ बाजार नियंत्रण व्यवस्था उसके शक्तिशाली व्यक्तित्व, केंद्रीकृत प्रशासन, जासूसी नेटवर्क और कठोर दंड व्यवस्था पर टिकी हुई थी। यह व्यवस्था अत्यधिक निरंकुश और व्यक्तिगत नेतृत्व पर आधारित थी।
➣ कुतुबुद्दीन मुबारक शाह/ के सिंहासन सँभालते ही कुछ महीनों के अंदर ही इस पूरी व्यवस्था को रद्द कर दिया गया। फलस्वरूप कीमतों में तेज वृद्धि हुई। बरनी के अनुसार कीमतें बहुत बढ़ गईं और मजदूरी भी चार गुना तक बढ़ गई।
बाजार अधिकारी
➣ अलाउद्दीन के बाज़ार नियन्त्रण की पूरी व्यवस्था का संचालन सदर-ए-रियासत नाम का अधिकारी करता था, जिसकी नियुक्ति सुल्तान करता था।
➣ सदर-ए-रियासत के अधीन तीन अधिकारी 1. शहना (निरीक्षक), 2. बरीद (गुप्तचर अधिकारी), 3. मुन्हीयाँ (गुप्तचर) नियुक्त किये गए। ये अधिकारी वस्तुओं के क्रय-विक्रय एवं व्यवस्था का निरीक्षण करते थे।
➣ प्रत्येक बाज़ार का अधीक्षक जिसे शहना-ए-मंडी कहा जाता था, बाज़ार का उच्च अधिकारी होता था। उसके अधीन बरीद होते थे, जो बाज़ार के अन्दर घूम कर बाज़ार का निरीक्षण करते थे।
➣ बरीद के नीचे मुनहियान या गुप्तचर कार्य करते थे।
➣ अधिकारियों का क्रम इस प्रकार था – दीवान-ए-रिसायत, शहना-ए-मंडी, बरीद और मुनहियान। अलाउद्दीन ने मलिक याकूब को दीवान-ए-रियासत नियुक्त किया था।
➣ अलाउद्दीन का मूल्य नियंत्रण केवल दिल्ली भू-भाग में लागू था या फिर पूरी सल्तनत में, यह प्रश्न काफ़ी विवादास्पद है। मोरलैण्ड एवं के.एस. लाल ने मूल्य नियंत्रण केवल दिल्ली में लागू होने की बात कही है, परन्तु प्रो. बनारसी प्रसाद सक्सेना ने इस मत का खण्डन किया है।
वितरण व्यवस्था
➣ सुल्तान ने खाद्यान्नों की बिक्री हेतु शहना-ए-मंडी नामक बाज़ार की स्थापना की और मलिक-कबूल को खाद्यान्न या अन्न बाज़ार का शहना-ए-मंडी (बाज़ार का दरोगा) नियुक्त किया।
➣ सराय-ए-अदल विशेष रूप से सरकारी धन से सहायता प्राप्त बाज़ार था। जहाँ वस्त्र एवं अन्य वस्तुओं का व्यापार होता था।
➣ दिल्ली आकर व्यापार करने के लिये व्यापारियों को दीवान-ए-रियासत में अपना नाम लिखवाना पड़ता था। जिसकी पूरी व्यवस्था सदर-ए-रियासत नाम का अधिकारी करता था।
➣ मुस्लिम व्यापारियों को माल खरीदने तथा व्यापार के लिये मंडियों में विशेष लाइसेंस मिले हुए थे। इन व्यापारियों के अलावा शहरी क्षेत्रों में अन्य कोई भी किसानों से अनाज खरीदने की पेशकश नहीं कर सकते थे।
➣ अनाज मंडी नगर के प्रत्येक मुहल्ले में स्थापित की गई। यहाँ अनाज की खरीद-बिक्री होती थी। उपभोक्ताओं को आज्ञा पत्र के आधार पर ही वस्तुएँ मिलती थी।
➣ सराय-ए-अदल का निर्माण बदायूँ के समीप एक बड़े मैदान में किया गया था। बाजार में वस्त्र, शक्कर, जड़ी-बूटी, मेवा, दीपक जलाने का तेल एवं अन्य निर्मित वस्तुएँ बिकने के लिए आती थी।
शासकीय भंडारण व्यवस्था
➣ अलाउद्दीन ख़िलजी को सार्वजनिक वितरण प्रणाली (राशनिंग व्यवस्था) का जनक कहा जाता है।
➣ चूँकि मूल्य नियंत्रण से ही वस्तुएँ कम कीमत में नहीं बिक सकती, वरन् उनका भंडारण भी आवश्यक हो गया। अतः उसने अनाज के भंडारण के लिये बड़े-बड़े गोदाम बनवाए। गोदामों का अनाज केवल आपातकालीन परिस्थितियों में ही निकाला जाता था।
➣ इसके अलावा राशनिंग व्यवस्था अलाउद्दीन की नवीन सोच थी। जिसमे अकाल या बाढ़ के समय अलाउद्दीन प्रत्येक घर को प्रति आधा मन अनाज देता था।
➣ अपनी राशन व्यवस्था के अन्तर्गत अनाज को पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कराने के लिए सुल्तान ने दोआब क्षेत्र से लगान अनाज के रूप में वसूल किया पर पूर्वी राजस्थान के झाइनक्षेत्र से आधी मालगुज़ारी अनाज में और आधी नकद रूप में वसूल की जाती थी।
➣ बरनी के अनुसार वर्षा की अनियमितता होने पर भी अलाउद्दीन के काल में कभी दिल्ली में अकाल नहीं पड़ा।’
न्याय व्यवस्था
➣ न्याय का उच्च स्रोत एवं उच्चतम अदालत सुल्तान स्वयं होता था। सुल्तान के बाद सद्र-ए-जहाँ या क़ाज़ी-उल-कुजात होता था, जिसके नीचे नायब क़ाज़ी या अदल कार्य करता था, जिनकी सहायता मुफ़्ती करते थे।
➣ अमीर-ए-दाद नाम का अधिकारी दरबार में ऐसे प्रभावशाली व्यक्तित्व को प्रस्तुत करता था, जिस पर क़ाज़ियों का नियंत्रण नहीं होता था।
➣ सुल्तान की न्याय व्यवस्था का उल्लेख करते हुए ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है कि वह भाईचारे अथवा पारिवारिक संबंधों की भी चिंता नहीं करता था और बिना किसी भेदभाव के दंड दिया करता था।
सैन्य सुधार.
➣ अलाउद्दीन खिलजी ने आन्तरिक विद्रोहों को दबाने, बाहरी आक्रमणों का सफलतापूर्वक सामना करने एवं साम्राज्य विस्तार हेतु एक विशाल सुदृढ़ एवं स्थायी सेना का गठन किया।
➣ अलाउद्दीन ने मंगोलों की भांति अपनी सेना को दशमलव प्रणाली पर संगठित करने की कोशिश की। फ़रिश्ता के अनुसार अलाउद्दीन के पास लगभग 4 लाख 75 हज़ार सुसज्जित एवं वर्दीधारी सैनिक थे।
➣ अलाउद्दीन पहला ऐसा सुल्तान था, जिसने स्थायी सेना की व्यवस्था की, जो हमेशा राजधानी में तैनात रहती थी।
➣ उसने सैनिकों के हुलिया लिखे जाने के विषय में नवीनतम नियम बनाये, ताकि किसी प्रकार की प्रतिनियुक्ति न हो सके। दीवान-ए-आरिज प्रत्येक सैनिक की नामावली एवं हुलिया रखता था।
➣ सुल्तान ने सर्वप्रथम घोड़ों को दागने की प्रथा प्रारंभ की। ऐसा इसलिये, क्योंकि सैनिक अच्छे घोड़ों के स्थान पर घटिया घोड़े थे, जो युद्ध के समय काम नहीं कर पाते थे।
➣ अलाउद्दीन की सेना में घुड़सवार, पैदल सैनिक एवं हाथी सैनिक थे। इनमें घुड़सवार सैनिक सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण थे। अमीर खुसरों के वर्णन के आधार पर तुमन दस हज़ार सैनिकों की टुकड़ी को कहा जाता था।
➣ सेना भर्ती के लिये एक सेना मंत्री आरिज-ए-मुमालिक नियुक्त था। सैनिक योग्यता के आधार पर भर्ती किये जाते थे, न कि वंश अथवा जाति के आधार पर।
➣ अलाउद्दीन से पूर्व सैनिकों को जागीर देने की प्रथा प्रचलित थी। अलाउद्दीन ने इस प्रबंध को समाप्त कर दिया और राजकोष से सैनिकों को नकद वेतन दिया जाने लगा।
➣ एक अस्पा (एक घोड़े वाले सैनिक) सैनिक को प्रति वर्ष 234 टका वेतन मिलता था तथा दो अस्पा (दो घोड़ा रखने वाले सैनिक) को प्रतिवर्ष 378 टका वेतन के रूप मिलता था। पैदल सैनिक का वेतन 78 टंका वार्षिक था।
भू-राजस्व एवं कर व्यवस्था
➣ राजस्व सुधारों के अन्तर्गत अलाउद्दीन ने सर्वप्रथम मिल्क, इनाम एवं वक्फ के अन्तर्गत दी गई भूमि को वापस लेकर उसे खालसा भूमि में बदल दिया, साथ ही उसने मुकद्दमों, खूतों एवं बलाहारों के विशेष अधिकारों को वापस ले लिया था।
➣ अलाउद्दीन की राजस्व नीति की सफलता, कर निर्धारण और कर वसूली का श्रेय उसके नायब वज़ीर शर्फ़ कायिनी को है।
➣ अलाउद्दीन के आर्थिक सुधारों में सबसे महत्त्वपूर्ण सुधार भूमि को माप करवाना था। भूमि मापन को मसाहत’कहा गया। अलाउद्दीन ने भूमि के एक विस्वा को एक ईकाई माना।
➣ भूमि माप का उद्देश्य यह पता लगाना था कि कितनी भूमि पर कृषि होती है और राज्य की वास्तविक उपज क्या है?
➣ दीवान-ए-मुस्तखराज को राजस्व एकत्रित करने वाले अधिकारियों के बकाया राशि की जाँच करने और वसूलने का कार्य सौंपा गया।
➣ अलाउद्दीन ने पैदावार का 50 प्रतिशत भूमिकर (खराज) के रूप में लेना निश्चित किया था। अलाउद्दीन प्रथम सुल्तान था, जिसने भूमि की पैमाइश कराकर (मसाहत) उसकी वास्तविक आय पर लगान लेना निश्चित किया था।
➣ अलाउद्दीन पहला सुल्तान था, जिसने राजस्व की नकद अदायगी अनिवार्य की, अपवादस्वरूप राजस्थान के झांई से अन्नागार हेतु भूराजस्व अनाज के रूप में लिया।
➣ अलाउद्दीन पहला सुल्तान था, जिसने ग्रामीण प्रशासन में सीधा हस्तक्षेप किया तथा कृषकों से भी सीधा सम्बन्ध स्थापित करने की कोशिश की और सबसे छोटे किसान से लेकर ग्रामीण बिचौलिए वर्ग तक सब पर एक समान भूमि कर की दर लागू की।
कर
➣ अलाउद्दीन ने करों में अत्यधिक वृद्धि कर दी। हिंदुओं से भूमि कर उपज का 50 प्रतिशत तथा मुसलमानों से एक चौथाई लिया जाता था।
➣ अलाउद्दीन ने सल्तनत में गैर-मुसलमानों पर चार प्रकार के कर लगा रखे थे, जिनमें जजिया कर, ख़राज या भूमिंकर, घरी कर या गृहकर और चरी कर या चारागाह कर (दुधारू पशुओं पर) आदि थे।
➣ इसमें अलाउद्दीन द्वारा लगाये गये दो नवीन कर थे-
(1) चराई कर जो दुधारू पशुओं पर लगाया जाता
(2) घरी कर जो घरों एवं झोपड़ी पर लगाया जाता
➣ जकात (सपन्ति का 40वाँ हिस्सा) मुसलमानों से लिया जाने वाला धार्मिक कर था एंव जज़िया कर ग़ैर मुस्लिमों से लिया जाता था।
➣ सुल्तान ने करों को वसूल करने के लिये कठोर नियम बनाए तथा वसूली का कार्य सेना को सौंपा। कर व्यवस्था के सुचारु संचालन के लिए दीवाने मुस्तखराज विभाग की स्थापना की थी।
विद्वान
➣ अलाउद्दीन के दरबार में अमीर खुसरों तथा हसन निजामी जैसे उच्च कोटि के विद्धानों को संरक्षण प्राप्त था।
➣ खुसरो ने अलाउद्दीन खिलजी को विश्व का सुल्तान, पृथ्वी के शासकों का सुल्तान. युद्ध का विजेता तथा जनता का चरवाहा जैसी उपाधियाँ प्रदान की थीं।
➣ अमीर खुसरो ने बलबन से लेकर गयासुद्दीन तुगलक तक आठ सुल्तानों का काल देखा। अमीर खुसरो ने कहा कि शाही मुकुट का प्रत्येक मोती निर्धन किसानों की आँखों से बहा जमा हुआ रक्त है
➣ बरनी की तारीख-ए-फिरोजशाही से हमे खिलजी वंश की जानकारी मिलती है। बरनी ने छः सुल्तानों का शासन काल देखा।
➣ जैन आचार्य महासेन ने अलाउद्दीन के दरबार में अपने विरोधियों से शास्त्रार्थ किया था और अलाउद्दीन ने जैन कवि रामचन्द्र सूरी को सम्मानित किया।
स्थापत्य कला
➣ स्थापत्य कला के क्षेत्र में अलाउद्दीन ख़िलजी ने वृत्ताकार अलाई दरवाज़ा अथवा कुश्क-ए-शिकार का निर्माण करवाया। उसके द्वारा बनाया गया अलाई दरवाज़ा प्रारम्भिक तुर्की कला का एक श्रेष्ठ नमूना माना जाता है।
➣ मार्शल के अनुसार अलाई दरवाजा इस्लामी स्थापत्य कला के खजाने का सबसे सुन्दर हीरा है।
➣ इसके अतिरिक्त अलाउद्दीन ने सीरी फोर्ट (दिल्ली) का निर्माण, जमात खाना मस्जिद व इसमें हजार खम्भा वाले महल (हजार सितुन) का निर्माण किया। हौजखास, सीरी फोर्ट, का निर्माण करवाया।
➣ अलाउद्दीन खिलजी ने 1311 ई. को कुतुबमीनार के निकट उससे दोगुने आकार की एक मीनार बनवाने का कार्य प्रारम्भ किया था परन्तु वह उसे पूरा नहीं कर सका।
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