मेवाड़ (सिसोदिया शासक) : शासक, कार्य एवं प्रमुख घटनाएं

भारतीय इतिहास मेवाड़ (सिसोदिया शासक)
📚 विषय सूची

मेवाड़ : गुहिल/गहलौत/सिसोदिया राजवंश

सन् 556 ई. में मेवाड़ पर जिस गुहिल वंश की स्थापना हुई, बाद में वही गहलौत वंश बना और इसके बाद यह सिसोदिया राजवंश के नाम से जाना गया।

गोहिल/गुहिल वंश के संस्थापक बप्पा रावल ने 8वीं शताब्दी में अरब आक्रमणकारियों का सफलतापूर्वक प्रतिरोध किया और चित्तौड़ पर अधिकार कर उदयपुर के निकट नागदा को राजधानी बनाया।

➣ गुहलौत वंश का ही एक शासक जयक्षेत्र सिंह था जिसने राजस्थान में तुर्की के प्रसार को रोका था। इसी के शासनकाल में इल्तुतमिश ने राजधानी नागदा पर आक्रमण कर उसे नष्ट कर दिया था।

➣ नगदा के नष्ट होने के बाद जयक्षेत्र सिंह ने चित्तौड़ को मेवाड़ राज्य की राजधानी बनाया।

1303 ई. में अलाउद्दीन ने जब चित्तौड़ पर आक्रमण किया। उस समय वहां का शासक रावल रतन सिंह था। रतन सिंह युद्ध में पराजित हुआ।

➣ फलस्वरूप चित्तौड़ पर अलाउद्दीन का अधिकार हो गया। अलाउद्दीन ने खिज्र खां को वहां का प्रशासक नियुक्त किया तथा चित्तौड़ का नाम खिज्राबाद रखा।

➣ कालांतर में अलाउद्दीन ने चित्तौड़ दुर्ग की ज़िम्मेदारी राजपूत सरदार मालदेव को सौंप दी। जिसके पुत्र रनवीर को हराकर राणा हम्मीर सिंह ने चितौड़ पर पुन: अधिकार कर लिया।

➣ राणा हमीर के पश्चात ही मेवाड़ का राजवंश सिसोदिया राजवंश के नाम से विख्यात हुआ। इसलिए राणा हमीर सिसोदिया को सिसोदिया साम्राज्य का संस्थापक भी कहते हैं।

➣ राणा हम्मीर से पहले चित्तौड़ के गुहिल वंश शासक रावल एवं गहलौत कहलाते थे। जबकि इसके बाद के शासक राणा एंव महाराणा कहलाये।

मेवाड़ में जौहर

➣ उत्तर-भारत पर विदेशी आक्रमणों के कारण राजपुताना में जौहर भी बढने लग गए थे। जिसमे से अकेले मेवाड़ में ही तीन जौहर हुए थे-

  घटना वर्ष  आक्रमण जिनके नेतृत्व में जौहर हुआ
सन् 1303 अलाउद्दीन खिलजी (दिल्ली शासक ) महारानी पद्मिनी
सन् 1534 सुल्तान बहादुर शाह जफ़र (मालवा शासक) महारानी कर्मवती/कर्णावती
फरवरी, 1568 अकबर (दिल्ली शासक) जयमल राठौड़ और पत्ता चूँडावत की पत्नियाँ

➣ अकबर के समय हुआ जौहर ऐसा पहला जौहर था। जो साका/शाका (राजपूत योद्धाओं का प्राणोत्सर्ग) से पहले हुआ।

भारत का पहला जौहर मुहम्मद बिन कासिम के सिंध पर आक्रमण के समय हुआ था जो सिंध के राजा दाहिर की पत्नी महारानी मैनाबाई एंव रानी लाडी/लादी के नेतृत्व में हुआ था।

राणा हम्मीर सिंह (1326–1364 ई,)

➣ हम्मीर देव का शासनकाल मेवाड़ के इतिहास में एक नवीन युग का अरुणोदय था। उसने पुनः मेवाड़ राज्य की स्थापना की और सिसोदिया वंश की नींव डाली।

➣ हम्मीर के पहले चित्तौड़ के गुहिल वंश के शासक रावल कहलाते थे। हम्मीर के समय से वे राणा व महाराणा कहलाये।

➣ राणा हमीर सिसोदिया को सिसोदिया साम्राज्य का संस्थापक भी कहते हैं। राणा हम्मीर सिसोदा जागीर के सरदार लक्ष्मण सिंह का पौत्र था।

➣ लक्ष्मण सिंह अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय चित्तौड़ दुर्ग की रक्षा करते हुए रावल रतन सिंह के शासनकाल में अपने सात पुत्रों के साथ वीरगति को प्राप्त हुए थे।

➣ लक्ष्मण सिंह का पुत्र अरिसिंह/अजय सिंह था। अरि सिंह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र राणा हमीर सिसोदा जागीर का सरदार बना। इससे ही मेवाड़ में राणा की वंशावली का आरम्भ हुआ।

➣ राणा हम्मीर 1326 ई. के आसपास दिल्ली सुल्तान मोहम्मद बिन तुगलक के समय चित्तौड़ पर आक्रमण कर मालदेव सौनगरा के पुत्र बनवीर को मारकर चित्तौड़ पर अपना अधिकार स्थापित किया और सिसोदिया वंश की नींव डाली।

➣ मोहम्मद बिन तुगलक ने चित्तौड़ पर अधिकार करने के लिए हम्मीर पर आक्रमण किया। दोनों के मध्य सिंगोली का युद्ध (1336) हुआ। जो राणा के पक्ष में रहा और अजमेर, रणथंभौर, नागोर और शिवपुरी को अधिकृत कर लिया ।

➣ राणा कुंभा के द्वारा गीत गोविंद पर लिखी गई रसिक प्रिया नामक टीका में राणा हम्मीर को वीर राजा की उपाधि दी गई है।

➣ राणा हम्मीर ने चित्तौड़ दुर्ग में अन्नपूर्णा माता का मंदिर बनवाया जिसकी जानकारी मोकल के शिलालेख से मिलती है।

➣ हम्मीर को कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति में विषमघाटी पंचानन (विकट आक्रमणों/परिस्थितियों में सिंह के समान) कहा गया है।

राणा क्षेत्रसिंह (1364-82 ई.)

राणा खेता/खेतो या राणा क्षेत्र सिंह पिता हम्मीर सिंह की मृत्यु के पश्चात सन 1364 ई. में मेवाड़ साम्राज्य का शासक हुआ।

➣ इन्होंने अजमेर और मांडलगढ़ को विजय कर उसे मेवाड़ में सम्मिलित किया था। इन्होने मंदसौर और छप्पन पर भी राज काज किया था।

➣ उनका निधन एक युद्ध के दौरान 1382 ई. में हो गया। इसके बाद इनके उत्तराधिकारी इनके पुत्र राणा लाखा हुए थे।

राणा लाखा/लक्ष सिंह (1382–1421 ई.)

महाराणा हम्मीर के पौत्र व खेता के पुत्र राणा लाखा/लक्ष सिंह मेवाड़ के शासक हुआ।

➣ लखा ने दिल्ली सुल्तान गयासुद्दीन द्वितीय को बदनोर के समीप हुए युद्ध में पराजित करके हिंदुओं से लिए जाने वाले तीर्थ कर को समाप्त करने का वचन लिया।

1396 ई में गुजरात के जफर खान ने मांडलगङ पर आक्रमण किया। लेकिन लाखा ने इस आक्रमण को विफल कर दिया।

मारवाड़ शासक रणमल ने अपनी बहन हँसा बाई का विवाह मेवाड़ के राणा लाखा से इस शर्त पर किया कि उसकी बहन का पुत्र ही अगला मेवाड़ शासक होगा।

➣ लाखा पुत्र युवराज चूंडा ने भरे दरबार में भीष्म प्रतिज्ञा की कि वह आजन्म मेवाड़ के महाराणा का सेवक बनकर रहेगा और उसके वंशज कभी भी मेवाड़ की राजगद्दी पर हक नहीं जतायेंगे।

इसी कारण चूंडा को मेवाड़ का भीष्म पितामह कहा गया है।

➣ विवाह के 13 महीने बाद हंसाबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया। जिसका नाम मोकल रखा गया। राणा लाखा ने मृत्यु से पहले अपने बड़े पुत्र चूंडा को मोकल का संरक्षक बना दिया।

पिछोला झील बेङच नदी पर स्थित है इसका निर्माण 14वीं शताब्दी में राणा लक्खा के शासनकाल में हुआ था।

➣ राणा मोकल ने हिंदू परंपरा को स्थापित करने के लिए तुलादान पद्धति को लागू किया। इस परंपरा के तहत मंदिरों के लिए सोना चांदी दान के रूप में दिया जाता था।

➣ मोकल ने चित्तौड़ दुर्ग में परमार वंश के द्वारा बनवाए गए त्रिभुवन मंदिर का जीर्णोद्धार करवाकर समद्वेश्वर मंदिर के नाम से प्रसिद्धि दिलाई ।

➣ लाखा के शासनकाल में भाग्यवश जावर, उदयपुर में चांदी की खान निकली। उस खान की आय से उसने कई किलो व मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाया।

राणा मोकल (1421-1433 ई.)

➣ मोकल मात्र 12 वर्ष की अवस्था में गद्दी पर बैठा और उसका ज्येष्ठ चुंडा, पिता कहे अनुसार उसका सरंक्षक नियुक्त हुआ।

➣ किन्तु हंसा बाई ने अपने भाई रणमल को मोकल के संरक्षक का कार्य सौंप जिसे। चूंडा मेवाड़ छोड़कर मालवा चले गए।

➣ इसके शासनकाल में उसका मामा रणमल प्रभावी रहा उसने शीघ्र ही मेवाड़ में ऊंचे पदों पर राठौड़ों की नियुक्ति कर दी। जिसके कारण सिसोदिया सरदार रणमल से नाराज हो गए।

➣ कालांतर में राणा क्षेत्र सिंह की अवैध सन्तान चाचा मेरा तथा महपा पंवार ने मोकल की हत्या कर दी।

➣ मोकल ने माना, फन्ना एवं विशाल नामक प्रसिद्ध शिल्पकारों तथा कविराज वाणीविलास तथा योगेश्वर नामक विद्वानों को राजकीय संरक्षण प्रदान किया।

➣ मोकल ने समिद्वेश्वर (त्रिभुवननारायण) मन्दिर का जीर्णोद्वार करवाया।

राणा कुम्भा (1433-1473 ई. )

➣ मध्यकालीन भारत के शासकों में राणा कुम्भा कि गिनती एक महान् शासक के रूप में होती है। उसके सिंहासनारूढ़ होने के साथ मध्यकालीन मेवाड़ के महान युग का सूत्रपात होता है।

➣ कुम्भा ने महाराजाधिराज, रावराय, राणेराय, राजगुरु, चापगुरु, दानगुरु, हालगुरु, परमगुरु, हिन्दू सुरताण, अभिनव भरताचार्य आदि उपाधियां धारण की।

➣ कुम्भा, मोकल की परमार रानी सौभाग्य देवी का पुत्र था। पिता मोकल की हत्या के पश्चात 10 वर्ष की अवस्था में मेवाड़ का शासक हुआ।

सैन्य अभियान

➣ कुम्भा ने राजस्थान के छोटे-छोटे राज्यों जैसे बूंदी, कोटा, डूंगरपुर, सारंगपुर, नागौर आदि के राजपूत शासकों को मेवाड़ की अधीनता स्वीकार करने के लिए बाध्य किया।

➣ राणा कुम्भा की सर्वाधिक गौरवपूर्ण सफलता मालवा के महमूद खलजी के विरुद्ध विजय थी, जिसने मेवाड़ के राजनीतिक अपराधियों को अपने राज्य में शरण प्रदान की थी।

➣ राणा कुम्भा ने अपने पिता मोकल के हत्यारे महपा पनवार को, जिसने भागकर मालवा में शरण ली थी, को महमूद से समर्पित करने की मांग की।

➣ महमूद द्वारा हत्यारे को समर्पित करने से इन्कार पर राणा कुम्भा ने युद्ध की घोषणा कर दी और महमूद खलजी को सारंगपुर के युद्ध (1437 ई.) में पराजित करके युद्ध बन्दी के रूप में चित्तौड़ ले आया।

➣ इस विजय (मालवा) की स्मृति में कुम्भा ने चित्तौड़ में (1448 ई.) कीर्ति स्तम्भ या विजय स्तम्भ का निर्माण करवाया।

➣ कीर्ति स्तम्भ 1440 ई. में बनना शुरू हुआ। इस स्तम्भ को हिन्दू देवशास्त्र का चित्रित कोश/भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोश कहा जाता है।

साहित्य एंव विद्वान संरक्षक

➣ राणा कुम्भा की शान्तिपूर्ण उपलब्धियाँ भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं थी। वह ज्ञान की विभिन्न विधाओं जैसे गणित, तर्कशास्त्र, धर्मशास्त्र, साहित्य संगीत में प्रवीण था। उसने जयदेव के गीत गोविन्द पर रसिक प्रिया नामक टीका लिखी।

➣ राणा कुम्भा ज्ञान की विभिन्न विधाओं, जैसे- कुशल वीणावादक, गणित, तर्कशास्त्र, धर्मशास्त्र, साहित्य, संगीत में प्रवीण था। उसने जयदेव के गीत गोविन्द पर रसिक प्रिया नामक टीका लिखी।

➣ वह एकलिंग महात्म्य के अंतिम अध्याय का भी रचयिता था। वह एक महान संगीतकार और कुशल वीणावादक था। उसने संगीतशास्त्र पर संगीतराज, संगीत मीमांसा, संगीत रत्नाकर, सुप्रपंध आदि ग्रंथों की रचना की।

अत्री और महेश को कुम्भा ने अपने दरबार में संरक्षण प्रदान किया, जिन्होंने प्रसिद्ध विजय स्तम्भ को लिपिबद्ध किया।

➣ मण्डन ने शिल्पशास्त्र पर देवमूर्ति प्रकरण, प्रासाद मण्डन, राजवल्लभ, रूप मण्डन, वास्तुशास्त्र आदि ग्रन्थों की रचना की।

➣ मण्डन के भाई नाथा ने वास्तुमंजरी और मण्डन के पुत्र गोविन्द ने उद्धार धोरणी, कलानिधि और द्वार दीपिका नामक ग्रन्थों की रचना की।

➣ कुम्भा के समय सोमसुन्दर, जयचन्द सूरीसोमदेव नामक जैन विद्वान भी हुये।

स्थापत्य कला

➣ उसके शासन काल में अनेक मन्दिरों, तालाबों, मठों, सरायों आदि का भी निर्माण कराया गया। उसने बसन्तपुर नामक स्थान को पुनः आबाद किया।

➣ राणा कुम्भा स्थापत्य का बहुत शौकीन था। मेवाड़ में निर्मित 84 क़िलों में से 32 क़िलों का निर्माण उसने करवाया था। इनमें 1458 ई. में निर्मित कुम्भलगढ़ का दुर्ग (राजसमंद जिले में) सर्वाधिक प्रसिद्ध है।

➣ कुम्भलगढ़ की दीवार 36 किमी. लम्बी है जो कि चीन की दीवार के बाद विश्व की दूसरी सबसे लम्बी दीवार है।

➣ कालांतर में कुम्भलगढ़ में महाराणा प्रताप का जन्म हुआ तथा महाराणा उदयसिंह का राज्याभिषेक हुआ।

➣ कुम्भा के समय में रणकपुर का जैन मंदिर, चित्तौड़ में कुम्भस्वामी का मंदिर (मीरा मंदिर) व शृंगार चंवरी मंदिर प्रमुख है।

➣ कुम्भा ने बदनौर (भीलवाड़ा) का कुशाल माता का मन्दिर एवं कैलाश पुरी का विष्णु मन्दिर बनवाया।

रणकपुर (पाली) जैन मन्दिर का निर्माण कुम्भा के समय में 1439 ई. में एक जैन व्यापारी धरणक शाह द्वारा कराया गया।

मृत्यु

➣ 1468 ई. में उसकी हत्या उसके पुत्र उदा सिंह (1468 – 1473 ई.) ने कर दी और गद्दी पर अधिकार का लिया। किन्तु राजपूत सरदारों के विरोध के कारण उदा सिंह पदच्युत हो गया।

➣ उसके बाद उसका छोटा भाई राजमल (1473 – 1509 ई.) गद्दी पर बैठा। वह राणा साँगा के पिता थे।

➣ रायमल ने माडु के सुल्तान गयासुद्दीन को पराजित किया और पानगढ़, चित्तौड़गढ़ और कुम्भलगढ़ क़िलों पर पुनः अधिकार कर लिया पूरे मेवाड़ को पुनर्स्थापित कर लिया।

➣ लगभग 36 वर्ष के सफल शासन काल के बाद 1509 ई. में उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र राणा संग्राम सिंह या राणा साँगा मेवाड़ की गद्दी पर बैठा।

राणा साँगा (1509 से 1528 ई.)

➣ मध्यकालीन भारत के शासकों में राणा कुम्भा कि गिनती एक महान् शासक के रूप में होती है। राणा साँगा को संग्राम सिंह के नाम से भी जाना जाता है।

➣ सांगा राणा रायमल (1473 से 1509 ई.) के तीन पुत्रों में सबसे छोटे थे। उनकी माता का नाम रानी रतनकँवर था।

➣ रानी रतनकँवर का पहला पुत्र पृथ्वीराज था। जो संग्राम सिंह का ज्येष्ठ था और पारपरिक रूप से सिंहासन का भी उत्तराधिकारी था। किन्तु ,

➣ एक ज्योतिषी माता ने भबिष्यवाणी कि संग्राम सिंह के भाग्य में ही राजयोग है। इस पर दोनों बड़े भाइयों ने संग्राम सिंह पर आक्रमण कर दिया।

➣ कालांतर में अनुज जयमल काका सूरजमल के षड़यंत्र शिकार हुआ और मारा गया। कुछ समय पश्चात राव जगमल पृथ्वीराज को धोखे से जहर देकर मरवा दिया।

श्रीनगर में कुंवर साँगा का अज्ञात वास

➣ भाइयों से बचकर वह मारवाड़ के एक गाँव में जा पहुँचे। दोनों भाइयों के षड़यंत्र के दौरान ही सांगा की एक आँख की रौशनी चली गयी थी।

➣ वहीँ जीवनयापन के लिए एक ग्वाले के यहाँ सेवक की नौकरी कर ली। किन्तु कुछ समय पश्चात नौकरी छोड़ दी।

➣ एक दिन साँगा अपने घोड़े पर सवार होकर अजमेर के बाहरी क्षेत्र में भ्रमण कर रहे थे कि कुछ सैनिकों ने उन्हें घेर लिया।

➣ सैनिक उन्हें बंदी बनाकर अजमेर के समीप स्थित छोटी सी रियासत श्रीनगर (अजमेर) लेकर आए। इस समय वहाँ राव कर्मचंद का शासन था।

➣ साँगा को सैनिक में भर्ती कर लिया गया। कालांतर में सांगा ने कई सैन्य अभियानों में जीत हासिल की और उन्हें श्रीनगर सेना का मुख्य प्रशिक्षक नियुक्त किया गया।

राव कर्मचंद ने सत्य जानने के पश्चात अपनी पुत्री का विवाह भी संग्राम सिंह से कर दिया।

सांगा की चितोड़ वापसी एंव राज्याभिषेक

सन् 1508 ई. का अंत चल रहा था। पृथ्वीराज की मृत्यु का समाचार चारों ओर फैल गया था। सुचना प्राप्त होते ही सांगा भी चितौड़ पहुच गए।

➣ दोनों भाइयों की मृत्यु के पश्चात 4 मई, 1509 ई. को साँगा (संग्राम सिंह) का राज्याभिषेक किया गया चित्तौड़ की राजगद्दी पर बैठते समय राणा संग्राम सिंह की आयु 27 वर्ष थी।

➣ उन्होंने अपने भाई पृथ्वीराज द्वारा किए गए कार्यों का विस्तार किया। जो परगने अभी मेवाड़ को मिल नहीं पाए थे, वे राणा साँगा के पराक्रम से उनके अधीन हुए।

➣ राणा साँगा महान् योद्धा था और तत्कालीन भारत के समस्त राज्यों में से ऐसा कोई भी उल्लेखनीय शासक नहीं था, जो उससे लोहा ले सके। उसने अपने शासन काल में दिल्ली, मालवा और गुजरात के विरुद्ध अभियान किया।

➣ मेवाड़ की सीमा से मालवा का खिलजी सुलतान, गुजरात का तुर्क सरदार और दिल्ली के अफगान लोदी आदि का शासन था। एक प्रकार से विदेशी सम्राटों से घिरा मेवाड़ दाँतों के बीच जीभ की तरह था।

➣ दिल्ली का अफगानी पठान शासक सिकंदर लोदी तो मेवाड़ को बढ़ते खतरे के रूप में जानकर सुरक्षा की दृष्टि से आगरा को अपनी राजधानी बना चुका था।

शासन नीति

सन् 1520ई. तक महाराणा साँगा की कीर्ति दूर-दूर तक फैल गई थी और इसमें उनकी दूरदर्शिता और कूटनीति का बड़ा योगदान रहा। उन्होंने राजपूतों की शक्ति को संगठित करने के लिए वैवाहिक संबंधों को वरीयता दी।

➣ स्वयं उन्होंने लगभग 28 विवाह (कोई पुष्टि नहीं) किए और कई राजपूतों (राजाओं) की न केवल मित्रता पाई, बल्कि उनकी सैन्य शक्ति का भी प्रयोग मेवाड़ के हित में किया।

मेड़ता के राव वीरमदेव के छोटे भाई राव रत्नसिंह की पुत्री मीराबाई (कृष्ण भक्त) का विवाह राणा साँगा के ज्येष्ठ पुत्र भोजराज से हुआ था।

➣ इस प्रकार महाराणा साँगा ने व्यक्तिगत संबंधों को भी मेवाड़ की प्रगति के लिए स्थान दिया।

सन् 1514 ई. में ममेरे भाई रायमल को बहुत बड़ी सैन्य-सहायता देकर राणा ने ईडर पर आक्रमण करके भारमल को वहाँ से भागने पर विवश कर दिया और रायमल को उसका अधिकार दिलाया।

खतोली का युद्ध (1517)

सिकंदर लोदी की मृत्यु हो गई थी और दिल्ली के सिंहासन पर उसका महत्त्वाकांक्षी पुत्र इब्राहिम लोदी आसीन हुआ था।

➣ साँगा का विचार था कि इब्राहिम लोदी अभी अनुभवहीन शासक है, जिसे आसानी से परास्त करके दिल्ली को विजित किया जा सकता है।

➣ इसी बीच गुप्तचरों से तुरंत सुचना मिलने पर लोदी ने विशाल पठानी फौज लेकर मेवाड़ पर आक्रमण की घोषणा कर दी।

➣ घड़ौती सीमा पर खातौली गाँव के समीप पठानी सेना का सामना राजपूती सेना से हो गया। दोनों के मध्य भीषण युद्ध हुआ। शाम ढलते-ढलते दिल्ली सेना के होश उड़ गए। राजपूत सेना विजयी हुई।

➣ अकस्मात् एक विष बुझे तुर्क तीर ने राणा साँगा की भुजा के कवच को भेद दिया। तीर विष बुझा होने के कारण वैद्य ने उस हाथ को दिया।

धौलपुर का युद्ध (1518)

➣ जब इब्राहिम लोदी के सरदारों ने उसे यह बताया कि अब महाराणा साँगा शारीरिक रूप से अक्षम हो चुके हैं तो उसके अंदर का प्रतिशोध जाग उठा और पुन: सेना के साथ मेवाड़ की ओर निकल पड़ा।

➣ इस बार उसने अपनी सेना का प्रधान सेनापति मियाँ मक्खन को बनाया। इसके अतिरिक्त सेना में मियाँ हुसैन खाँ जरबख्श, मियाँ खानखाना फरमुली और मियाँ माहरुफ भी शामिल थे, जो अपने समय के प्रसिद्ध तुर्क योद्धा थे।

सन् 1518 में एक बार फिर धौलपुर के निकट दोनों सेनाओं का टकराव हुआ। आशा के विपरीत राजपूत सेना का नेतृत्व आज भी राणा साँगा ही कर रहे थे।

➣ सुल्तान लोदी ने राणा साँगा को देखना चाहा, परंतु जब उसने देखा तो वह हतप्रभ रह गया। राणा के कौशल में कहीं कोई कमी नहीं थी। राजपूती सेना ने पठानी सेना का बयाना तक पीछा किया।

➣ इस युद्ध में लोदी की शर्मनाक हार के साथ ही राजपूत सेना ने उसके कई परगने भी मेवाड़ के अधीन कर दिए।

➣ महाराणा साँगा ने इस विजय का श्रेय मेदिनीराय को दिया और इब्राहिम लोदी से छीनी चंदेरी रियासत भी उसे पुरस्कार में दे दी।

गागरोन/गगरोण का युद्ध ( 1519)

➣ मेदनी राय आरंभ में मालवा का प्रधानमंत्री था। किन्तु मृत्यु के भय से वह चित्तौड़ आ गया और राणा साँगा द्वारा प्राप्त गगरोण/गागरोन सहित कई परगनों पर शासन करने लग गया।

➣ सन् 1519 ई. में मालवा सुल्तान महमूद खिलजी द्वितीय ने मुजफ्फरशाह की सेना के साथ अपनी सेना इकट्ठी की और गागरोन पर चढ़ाई कर दी।

➣ मेदिनीराय क पुत्र भीमराज ने आक्रमण का डटकर सामना किया और पीछे से मेदिनीराय भी आ गए।

➣ इस युद्ध की सूचना राणा साँगा को मिली तो उन्होंने तत्काल अपनी सेना के साथ युद्धस्थल में मेदिनीराय की सहायता के लिए उपस्थित हो गए।

➣ शीघ्र ही सुल्तान महमूद को पता चल गया कि उसने क्रोध में गलत निर्णय ले लिया था। उसका सेनापति आसफ खाँ बुरी तरह घायल हो गया था और स्वयं उसकी दशा भी चिंताजनक थी।

➣ इस तरह तत्काल ही बची-खुची सेना बच निकलने के रास्ते खोजने लगी और सुल्तान महमूद भी इसी चक्कर में था, लेकिन राणा साँगा के हाथों पकड़ा गया।

➣ युद्ध में सुल्तान महमूद बुरी तरह जख्मी हो गया था। सुल्तान को बंदी बना लिया गया। मालवा भी मेवाड़ के अधीन हो गया।

➣ एक दिन राणा ने सुल्तान के समक्ष मित्रता का प्रस्ताव रखा तो सुल्तान ने सहमती जताई और विश्वासपात्र बने रहने और मालवा का आधा राज्य देने की बात कही।

➣ सुल्तान ने राणा की अधीनता स्वीकार करते हुए मालवा का सुल्तानी चिह्न रत्नजडि़त मुकुट और कमरपेटी महाराणा को सौंप दी।

➣ फिर राणा ने उसे आधा राज्य देने की घोषणा करके राजधानी मांडू (मालवा की राजधानी) उसे सौंप दी। सुल्तान महमूद ने भी शर्त निभाते हुए अपने एक पुत्र को चित्तौड़ में छोड़ दिया।

➣ कहा जाता है इसके बाद सुल्तान महमूद एक गंभीर और प्रजा के हित में सोचनेवाला शासक बन गया था। हालाँकि इस बात से गुजरात का शासक मुजफ्फरशाह महमूद पर रुष्ट भी हुआ।

गुजरात विजय (1520 ई)

➣ गुजरात का शासक मुजफ्फरशाह था। उसके दरबार में एक भाट ने साँगा की वीरता और दयालुता की प्रशंसा में रचा एक काव्य सुना दिया। जिसे सुल्तान को क्रोध आ गया।

➣ उसी दरबार में सुल्तान का हाकिम मलिक हुसैन बहमनी भी बैठा था, जो गुजरात भर में अपनी वीरता के लिए प्रसिद्ध था। उसने भाट को फटकारते हुए सांगा को अपशब्द कहकर युद्ध की चुनौती दे दी।

➣ जब यह सुचना राणा तक पंहुची तो उन्होंने बहमनी की भुजाओं का बल मापने की इच्छा से राजपूत सेना गुजरात की ओर मोड़ दी।

➣ राणा सांगा के आक्रमण की सुचना प्राप्त होते ही मुजफ्फरशाह ने भी मलिक हुसैन बहमनी की सहयता के लिए अपनी सेना भेज दी।

➣ साँगा अपने चालीस हजार राजपूत सैनिकों के साथ बागड़ आ पहुँचे थे, जहाँ उनका साथ देने के लिए डूँगरपुर के रावल सिंह, जोधपुर के राव गंगा और मेड़ता के राव वीरमदेव भी अपनी-अपनी सेना के साथ आ पहुँचे।

➣ भयंकर युद्ध आरंभ हो गया और बहमनी युद्ध के मैदान से भाग गया। वह अहमदनगर के किले में जाकर छुप गया। साँगा ने पहले तो ईडर को पूर्णतया सुरक्षित किया और इसके बाद उन्होंने बहमनी का पीछा किया।

➣ राणा साँगा ने किले की मजबूती को परखा तो मानना पड़ा कि वह अभेद्य और सुरक्षित किला था। फाटक की अतिरिक्त सुरक्षा से उसे तोड़ना बहुत ही कठिन कार्य था।

➣ अचानक ही एक घटना घटी। एक राजपूत युवक कान्हा उस फाटक की कीलों से सटकर खड़ा हो गया और हाथी ने आगे बढ़कर टक्कर मारी। कान्हा का शरीर कीलों में जा धँसा और हाथी टक्कर मारता रहा। आखिकार फाटक टूट गया।

राजपूती सेना किले में घुस गई और भीषण युद्ध छिड़ गया। बहमनी ने वीरता से राजपूत सैनिकों का सामना किया और मारा गया। अहमदनगर राजपूतों के अधीन हो गया।

राणा साँगा ने गुजरात के बहुत से किलों को इसी अभियान में अपने अधीन कर लिया था और इन विजयों से उन्हें बहुत सारी धन-दौलत की प्राप्ति हुई थी।

सुल्तान मुजफ्फरशाह का प्रतिशोध

➣ सुल्तान मुजफ्फरशाह को राणा साँगा और राजपूत सेना द्वारा गुजरात में चलाए गए विजय-अभियान की सूचना मिली और उसने चितोड़ से बदला लेने की ठानी।

➣ उसने अपनी सेना को संगठित किया और सभी सैनिकों को एक साल का अग्रिम वेतन दे दिया।

➣ उसकी इस विशाल सेना में एक लाख घुड़सवार, सौ हाथी और बड़ा तोपखाना भी था। इस विशाल सेना का नेतृत्व उसने अपने जाँबाज सेनापति अयाज मलिक को सौंपा।

दिसंबर 1520 ई. में यह सेना चित्तौड़ की ओर बढ़ चली। इस तुर्क सेना ने डूँगरपुर को उजाड़ दिया। बाँसवाड़ा भी इनके निर्दयी प्रहार से न बच सका।

➣ तुर्क सेना प्रबल वेग से मालवा के मंदसौर किले की ओर बढ़ चली थी, परंतु अब तक राणा साँगा भी अपनी सेना लेकर चित्तौड़ से निकल चुके थे।

➣ उनकी विशाल राजपूती सेना नांदसा के मैदान में आकर तुर्क सेना से भिड़ गई और भीषण युद्ध आरंभ हो गया। पीछे से मेदनीराय आ पहुँचा और राजपूत सेना भारी पड़ने लगी।

➣ यह युद्ध कई दिनों तक चलता रहा और तुर्क सेना निरंतर कम होती रही, जबकि राजपूती सेना में प्रतिदिन कोई-न-कोई फौज आकर जुड़ती जा रही थी।

➣ इसी युद्ध के दौरान मलिक अयाज ने मालवा के सुल्तान महमूद से जाकर मदद माँगी। किन्तु महमूद राणा के खिलाफ युद्ध न करने को वचनबद्ध थे। मालवा पहले से ही मेवाड़ के अधीन था।

➣ अयाज को अब संधि के अलावा कोई विकल्प नजर न आया। उसने राणा के पास सुलह का संदेश भेज दिया, जिसे महाराणा ने स्वीकार भी कर लिया।

बाबर का भारत आगमन

➣ इस समय बाबर के कदम पश्चिमोत्तर भारत में पड़ने लग गए थे। सन् 1504 में उसने काबुल जीता और यहीं से उसके मन में भारत में अपना साम्राज्य स्थापित करने की ललक जागी।

➣ बाबर ने 1519 में भारत में अपना पहला अभियान आरंभ किया, जिसमें उसका सामना युसुफजई लोगों से हुआ। बाबर ने पहली सफलता के तौर पर बाजोए और भेरा पर अधिकार कर लिया।

दौलत खाँ ने जब बाबर की शक्ति और महत्त्वाकांक्षाओं को जाना तो उसने इब्राहिम लोदी के खिलाफ बाबर से ही सहायता माँग ली।

➣ उसने अपने हजार मंगोल सैनिकों के साथ दिल्ली पर आक्रमण कर दिया, लेकिन इब्राहिम लोदी की सेना ने उसे बुरी तरह खदेड़ा।

➣ यहाँ तक कि उसे पंजाब से भी बाहर कर दिया। अब बाबर ने पंजाब को ही अपने कब्जे में करना चाहा।

➣ उसने 1524 में भेरानगर भेज दिया, फिर उसने आलम खाँ को भी पकड़ लिया और पंजाब पर अपना अधिकार कर लिया। यहाँ बाबर ने दिल्ली-विजय की योजना बनाई।

➣ यह सेना 12 अप्रैल, 1526 को पानीपत के मैदान में पहुँच गई। इब्राहिम लोदी भी अपनी सेना लेकर मैदान में आ डटा। बाबर को बड़ी सफलता मिली। लोदी मारा गया।

➣ इस प्रथम भारत-विजय पर झूमते बाबर ने अपने देश काबुल के प्रत्येक नागरिक को चाँदी का एक-एक सिक्का दिया। उसे लोगों ने कलंदर की उपाधि से नवाजा।

➣ बाबर मानता था कि उसके भारत-विजय अभियान की सबसे बड़ी बाधा चित्तौड़ ही बनेगा। वह राणा साँगा की कूटनीति से तब परिचित हो गया था, जब लाहौर-विजय के पश्चात् उसे महाराणा के दूत द्वारा दिल्ली आक्रमण के समय सहायता का आश्वासन तो दिया, लेकिन सहायता नहीं दी गई।

➣ बाबर जान गया कि राणा साँगा अफगान शक्ति को क्षीण करके दिल्ली पर शासन करने का इच्छुक था।

राजपूत-अफगान गठबंधन

➣ जिस समय बाबर ने इब्रहिम लोदी को पराजित करके दिल्ली पर अधिकार किया था, उसी समय भारत के विभिन्न प्रांतों और रियासतों के तुर्क अफगान सरदार सजग हो गए।

➣ सभी अफगान सरदार एकजुट हो गए। इस संगठन का नेतृत्व अफगान सरदार बाबर खाँ लोहानी थे, जो सुल्तान मुहम्मद शाह के नाम के नवाब हसन खाँ मेवाती के नेतृत्व में एकजुट हुए थे।

नवाब हसन खाँ मेवाती ने अपने सभी अफगान सरदारों से इस विषय में विचार-विमर्श किया और राजपूती सेना के साथ गठबंधन कर राणा सांगा के नेतृत्व में युद्ध करने का निर्णय लिया गया।

➣ शीघ्र ही राणा साँगा के नेतृत्व में एक लाख बीस हजार घुड़सवार सैनिकों की विशाल सेना तैयार हो गई और बयाना पर आक्रमण की तैयारी होने लगी। इस सेना में अफगान सरदारों की संख्या भी थी।

➣ बाबर ने जब यह सुना कि अफगान सरदारों ने महाराणा साँगा को अपना राजा मानकर उसके नेतृत्व को स्वीकार कर लिया है। उसे इस प्रकार के गठजोड़ की आशा नहीं थी।

➣ बाबर ने राणा द्वारा बयाना पर आक्रमण के बारे में सुना तो उसने पूर्वी अफगानों का दमन करने गए अपने शहजादे हुमायूँ को तत्काल आगरा वापस बुला लिया।

➣ जब उसे ज्ञात हुआ कि महाराणा के पास एक लाख बीस हजार घुड़सवार सेना है तो वह चिंतित हो उठा। यह उसकी सेना से दोगुनी से भी अधिक थी।

➣ बाबर ने अपने मंगोल सरदार तईबेग को सुलह का प्रस्ताव लेकर राणा के पास भेजा, परंतु राणा ने केवल एक ही शर्त पर सुलह की बात मानी कि बाबर काबुल लौट जाए। बाबर की महत्त्वाकांक्षा पर यह करारी चोट थी।

खानवा का युद्ध (1527)

➣ खानवा का युद्ध मार्च, 1527 ई. में आगरा से 40 किमी दूर खानवा (भरतपुर के पास रूपवास में) नामक स्थान पर बाबर और राणा सांगा के बीच लड़ा गया।

➣ आरंभ मे सांगा की प्रसिद्धि और बयाना जैसी बाहरी मुगल छावनियों पर उसकी प्रारम्भिक सफलताओं से बाबर के सिपाहियों का मनोबल गिर गया। उनमें फिर से साहस भरने के लिए बाबर ने राणा सांगा के खिलाफ़ जिहाद का नारा दिया।

➣ लड़ाई से पहले की शाम उसने अपने आप को सच्चा मुसलमान सिद्ध करने के लिए पाराव के घड़े उलट दिए और सुराहियाँ फोड़ दीं।

➣ उसने अपने राज्य में शराब की खरीदो फ़रोत पर रोक लगा दी। उसने मुसलमानों से तमगा कर(एक प्रकार का व्यापारिक कर) न लेने की घोषणा की।

➣ युद्ध स्थल में रायसेना प्रदेश का तँवर राजा सिलहदी अपने 35 हजार सवारों के साथ बाबर की सेना में जा मिला और अब सांख्य संतुलन हो गया। अब बाबर की सैन्य-शक्ति भी बराबर की हो गई थी।

➣ एक उचित अवसर देखकर बाबर ने एक तीर सांगा की ओर छोड़ दिया, जो सीधे महाराणा के माथे पर जा टकराया। तुरंत हसन खाँ मेवाती और अन्य राजपूत सरदार उन्हें शिविर में ले आए।

राणा अज्जाजी ने महाराणा साँगा की आँख ढकनेवाला कपड़ा उतारकर अपनी आँख ढक ली और उनका मुकुट उतारकार सिर पर लगा दिया।

➣ यह बात अधिक देर तक छिपी न रह सकी कि राणा युद्ध भूमि से चले गए हैं। इससे राजपूत सेना हतोत्सहित हो उठी और बाबर ने खानवा का युद्ध जीत लिया।

➣ युद्ध निर्णायक साबित नहीं हुआ। साँगा की सेना एक बार फिर नए उत्साह से परिपूर्ण होकर रणभूमि में उतरने के लिए तैयार थी। महाराणा भी अब पूर्ण स्वस्थ थे।

➣ इसी बीच समाचार मिला कि बाबर की सेना जनवरी, 1528 को चँदेरी पहुँच गई। राणा ने भी तुरंत चंदेरी की ओर प्रस्थान किया।

➣ राणा की सेना ने पहला पड़ाव इरिच में डाला और रात्रि-विश्राम किया। यहीं रात्रि भोज के दौरान किसी अविश्वासी (करमचंद पंवार) ने सांगा को विष दे दिया और मात्र 46 वर्ष की आयु में 30 जनवरी 1528 ई. में उनका देहावसान हो गया।

➣ सांगा की मृत्यु के साथ ही अफगान-राजपूत गठबंधन बिखर गया। खानवा की लड़ाई से दिल्ली-आगरा में बाबर की स्थिति सुदृढ़ हो गई।

खानवा युद्ध में बाबर की विजय का मुख्य कारण तुलुगमा पद्धति एवं तोपखाना और सांगा के सेनानायक सलहदी तंवर का विश्वासघात करना था।

राणा सांगा के उत्तराधिकारी

➣ संग्रामसिंह (साँगा) के सात पुत्रों में भोजराज (भक्त शिरोमणि मीराबाई के पति), कर्णसिंह, पर्वतसिंह और कृष्णसिंह की मृत्यु तो उनके सामने ही हो चुकी थी। केवल रतनसिंह, विक्रमादित्य और उदयसिंह ही जीवित रह पाए।

1528 को सिंहासन पर आसीन रतनसिंह में महाराणा बनने जैसी योग्यता का अभाव था।

➣ रानी कर्मवती अपने दोनों पुत्रों विक्रमादित्य और उदयसिंह की सुरक्षा के लिए, चित्तौड़ से दूर किले सहित रणथंभौर परगना रहती थी।

➣ राजपूताना का सुरक्षा दायित्व सँभालने की जगह अपनी क्षुद्र मनोवृत्ति का परिचय देते हुए वह रणथंभौर पर अधिकार करने का षड़यंत्र करने में ही प्रयत्नशील रहा।

➣ असफलता से खिन्न रतनसिंह ने राणा साँगा द्वारा मांडू सुल्तान से विजय के रूप में प्राप्त जड़ाऊ ताज और कमरपट्टा देने की माँग कर डाली, जिसे कर्मवती ने ठुकरा दिया।

➣ कालांतर में वह रानी कर्मवती के भाई सूरजमल हाड़ा के हाथों मारा गया।

विक्रमादित्य सिंह (1531–1536)

सन् 1531 में महाराणा बना विक्रमादित्य अपने अग्रज रतनसिंह से भी अधिक अयोग्य निकला।

➣ इसी के शासनकाल में उसकी ज्येष्ठ भाई भोजराज की विधवा मीराबाई चित्तौड़ का त्याग कर अपने पीहर मेड़ता और वहाँ से वृंदावन चली गई।

सन 1532 में गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने अपने सरदार मुहम्मदशाह आसेरी को चित्तौड़ विजय के लिए रवाना किया। राणा ने मांडू के कुछ इलाके देकर समझौता करना चाहा। लेकिन वह सेना सहित नीमच आ पहुँचा।

➣ विक्रमादित्य ने मांडू के कुछ इलाके देकर समझौता करना चाहा। लेकिन वह बढ़ता हुआ सेना सहित नीमच तक आ पहुँचा। 11 फरवरी, 1533 को किले घेर लिया।

➣ इसी दौरान रानी कर्मवती ने राखी भेजकर दिल्ली बादशाह हुमायूँ से सहायता मांगी थी। वह दिल्ली से रवाना होकर ग्वालियर तक आ तो गया।

➣ किंतु बहादुरशाह ने पत्र भेजकर कहा कि वह हिंदू काफिर के खिलाफ जिहाद पर है। इस पर हुमायूँ ग्वालियर में ही ठहर गया।

➣ किला बचाने के लिए कर्मवती ने मालवा का इलाका छोड़ने के अतिरिक्त, मांडू सुल्तान से जीता जड़ाऊ कमरबंध और ताज के साथ एक सौ घोडे़, दस हाथी और कुछ नकद देने का प्रस्ताव रखा। जिसे स्वीकार कर 23 मार्च, 1533 को बहादुरशाह ने घेराबंदी उठा ली।

➣ अगले ही वर्ष वह फिर आ धमका। इस दौरान रानी कर्मवती ने तेरह हजार स्त्रियों के साथ जौहर किया। 8 मार्च, 1535 को मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़गढ़ पर मुसलमानों का कब्जा हो गया।

➣ चित्तौड़ पतन का समाचार सुनकर अब हुमायूँ मंदसोर की ओर रवाना हुआ। वहाँ हुए मुकाबले में हारकर बहादुरशाह मांडू किले में जा छिपा।

➣ कुछ समय पश्चात ही राजपूतों छोटी सी सेना ने गुजराती मुसलमानों पर हमला कर चित्तौड़ पर पुनः कब्जा कर लिया और विक्रमादित्य को पुनः महाराणा पद पर प्रतिष्ठित कर दिया।

➣ किंतु विक्रमादित्य में कोई परिवर्तन नहीं आया। वह पूर्व की तरह प्रजा पर अत्याचारों के अतिरिक्त सामंतों के प्रति भी असंवेदनशील बना रहा।

➣ उसने बनवीर को अपना हितैषी समझा। बनवीर साँगा के अग्रज पृथ्वीराज की पासवान (दासी) से उत्पन्न पुत्र था। वह विक्रमादित्य की निकटता प्राप्त करता हुआ, उसका मुसाहिब बन गया।

सन् 1535 में ही एक दिन अवसर पाकर उसने अठारह वर्षीय विक्रमादित्य की हत्या कर दी। उसने उसके छोटे भाई चौदह वर्षीय उदयसिंह की हत्या करने की भी कोशिश की।

➣ किंतु समाचार पाकर उसकी धायमाता खींची राजपूत पन्ना ने अपूर्व राजभक्ति का परिचय देते हुए, उदयसिंह को छिपाकर उसके स्थान पर अपने पुत्र का बलिदान दिया।

पन्ना, पति नरसिंह के साथ कुंभलनेर (कुंभलगढ़) जा पहुंची। जहाँ का किलेदार आशा शाह देवपुरा था। इस प्रकार उदय सिंह का पालन पोषण कुंभलनेर में ही होने लगा।

➣ अपने प्रशासनिक सुधारों के बावजूद, बनबीर अपने अवैध जन्म के कारण मेवाड़ सरदारों का समर्थन पाने में असफल रहा।

राणा उदयसिंह (1537 – 1572 ई.)

➣ वह राणा साँगा का पुत्र और राणा प्रताप के पिता थे। इसकी माता कर्णवती द्वारा हुमायूँ को राखीबंद भाई बनाने की बात इतिहास प्रसिद्ध है।

➣ उदय सिंह का पालन पोषण कुम्भलगढ़ में ही किलेदार आशा शाह के नेतृत्व में हुआ था। जबकि इस समय चितोड़ पर बनवीर का शासन था।

आशा शाह ने उदय सिंह की शिक्षा-दीक्षा पर पूरा ध्यान दिया। आशा शाह ने उदय सिंह के जीवित होने की चर्चा प्रमुख सरदारों से भी कर दी।

1537 के अंत तक उन्होंने कुंभलमेर पहुँचकर, उदयसिंह को नजरें पेश करते हुए राणा का राज्यारोहण उत्सव भी मना डाला।

16 वर्षीय उदयसिंह कुंभलमेर में रहकर ही चित्तौड़ प्राप्ति के प्रयास कर रहा था। इसी दौरान मारवाड़ के सामंत पाली राव अखैराज सोनगरा (चौहान वंश) ने अपनी कन्या जयवंती बाई का विवाह राणा उदय सिंह से कर दिया।

➣ कालांतर में जयवंती बाई के गर्भ ही महाराणा प्रताप जैसा प्रतापी शासक हुआ।

चित्तौड़ प्राप्ति (मरावली का युद्ध, 1540 ई.)

कुंभलगढ़ में उदयसिंह ने चित्तौड़ प्राप्ति की योजना बनाई, जिसमे कई राजपूत सरदारों ने उसकी सहायता हेतु सैन्य-बल सहित एक-एक कर कुंभलगढ़ में उपस्थित हो गए।

➣ भारी सैन्य बल से उत्साहित उदयसिंह ने चित्तौड़ पर आक्रमण करने के लिए अग्रसर हो गया। बनबीर ने भी कुँवरसी के नेतृत्व में सेना भेजी। माहोली के समीप हुए युद्ध हुआ और कुँवरसी मारा गया।

➣ प्रथम विजय से उत्साहित उदयसिंह ने बनवीर के पक्षधर मल्ला सोलंकी के ताणा को घेर लिया। एक माह की घेराबंदी के बाद भी ताणा विजय न होते देख, अनुभवी सामंतों ने गुप्तचरों का सहारा लिया।

ताणा विजय के पश्चात् लगभग 1540 ई. में उदयसिंह ने चालीस हजार सेना के साथ चित्तौड़गढ़ घेर लिया और चित्तौड़ के किलेदार व् बनवीर के प्रधानमंत्री चील मेहता के साथ साँठ-गाँठ कर किले में प्रवेश की योजना तैयार कर ली।

➣ बनवीर के पास किले से पलायन कर जाने के अतिरिक्त कोई मार्ग शेष नहीं रहा। चित्तौड़ पर उदयसिंह का अधिकार हो गया। इसके साथ ही वह संपूर्ण मेवाड़ का शासक बन गया।

व्यक्तित्व

➣ महाराणा बन जाने पर भी उदयसिंह में अपने पूर्वज बापा रावल , हमीर , चूँडा , कुंभा और साँगा के समान वीरता का सर्वथा अभाव था।

➣ सामंतों ने अपनी पीढ़ीगत निष्ठा के कारण चित्तौड़ दिलवाकर मेवाड़ का शासक बनवा तो दिया था, किंतु उसमें भी अपने अग्रज विक्रमाजीत के अवगुण थे।

➣ दिल्ली के बादशाह शेरशाह सूरी के सरदार हाजी खाँ पठान किसी कारणवश नाराज होकर अपनी सेना, खजाने और अपनी प्रिय रंगराय पातर के साथ अजमेर आ गया।

जोधपुर राव मालदेव ने उसका खजाना छीनने के लिए पृथ्वीराज जैतावत को सेना सहित अजमेर की ओर रवाना कर दिया। इस पर हाजी खाँ ने राणा उदयसिंह को पत्र द्वारा सहायता की गुहार लगाई।

उदय सिंह ने शरणागत की सहायता तो की परन्तु उसके बदले चालीस मन सोना, कुछ हाथी और अपनी रंगराय पातर भेंट करने को कहा। प्रिय रंगराय के अलावा सारी मांगे मान ली गई।

➣ इस अविवेकी आचरण के कारण उदयसिंह को भारी अपयश का सामना करना पड़ा था।

शेरशाह सूरी से समझौता

मई, 1540 को किए अचानक आक्रमण से हुमायूँ के बिना लड़े ही लाहौर की ओर भाग जाने के बाद शेरशाह सूरी दिल्ली का बादशाह बनकर उभरा था।

1544 में शेरशाह सूरी ने मारवाड़ (राव मालदेव) पर आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में अखैराज सोनगरा (प्रताप के नाना) भी वीरगति को प्राप्त हुए।

➣ शेरशाह राजपूतो के युद्ध कौशल से इतना प्रभावित हुआ कि युद्ध जीतने के बाद उसने कहा कि में मुट्ठी भर बाजरे के लिए हिंदुस्तान के साम्राज्य को प्राय: खो चूका था।

मालदेव को परास्त कर शेरशाह चित्तौड़ की ओर अग्रसर हुआ। समाचार पाकर उदयसिंह को अपनी जर्जर सैन्य शक्ति की रक्षा के लिए समर्पण समझौता अधिक उपयुक्त प्रतीत हुआ।

किले की चाबियाँ समर्पित कर देने से शेरशाह किले में थोड़े से आदमी ही छोड़कर पूर्ण अधिकार किए बगैर वापस चला गया। समर्पण कर देने के कारण चित्तौड़ पर उदयसिंह का अधिकार पूर्ववत् बना रहा।

चितौड़गढ़ का युद्ध (1567-68 ई.)

सन 1555-56ई. में हुमायूं ने दिल्ली को पुन: प्राप्त कर लिया था। किन्तु उसकी शीघ्र ही मृत्यु हो गई। अत: इसका समकालीन मुग़ल बादशाह अकबर हुआ।

➣ अकबर ने चितोड़ की पहली बार सन 1566 ई. में चढ़ाई की थी, जिसमें वह असफल रहा। सन 1567 ई. में चित्तौड़गढ़ को लेकर स्वंय अकबर ने इस किले का दूसरी बार घेराव किया।

राणा उदय सिंह ने युद्ध की स्थिति देख कर चित्तौड़ को जयमल और पत्ता आदि राजपूतों के हाथ में छोड़कर स्वंय अरावली के घने जंगलों में चले गए।

➣ कालांतर में वहाँ अरावली के जंगलों नदी की बाढ़ रोक उदयसागर नामक सरोवर का निर्माण किया था और वहीं उदयसिंह ने अपनी नई राजधानी उदयपुर बसाई।

युद्ध की कमजोर स्थिति को देखते हुए अंतत: रानियों ने जौहर किया और राजपूतो ने साका किया। मेवाड़ में यह तीसरा साका था। अंतत: फरवरी 1678 में चितोड़ पर अकबर का अधिपत्य हो गया।

➣ किन्तु अकबर के हाथ सिर्फ खाली महल ही लगे। इससे खिन्न होकर अकबर ने चितौड़ की निर्दोष लगभग 40,000 निर्दोष जनता का नरसंहार का आदेश दिया जिसे अकबर पर एक काला धब्बा माना गया है।

➣ अनेक मंदिरों और भवनों को नष्ट करने के बाद ख्वाजा अब्दुल मजीद आसिफ खाँ को किले का शासन सौंपकर अकबर आगरा वापस आ गया।

जयमल और पत्ता की वीरता से प्रभावित होकर उसने आगरा के किले में इनकी पत्थर की मूर्तियाँ लगवाकर इनके शौर्य का सम्मान किया जबकि इतिहासकारों ने इसे राजनीतिक कारण बताया है। कालांतर में इन मूर्तियों को औरंगजेब ने हटवाया दिया था।

रणथंभौर दुर्ग

शेरशाह की मृत्यु के बाद उसके दोनों पुत्रों की आपसी लड़ाई का लाभ उठाकर भारमल ने किला स्वतंत्र करवा लिया।

➣ उदयसिंह ने भारमल के स्थान पर अपने ननिहाल बूँदी के राव सुर्जन को किलेदार बना दिया।

मेवाड़ के एक और महत्त्वपूर्ण दुर्ग रणथंभौर पर विजय का निर्णय कर आगरा से रवाना हुआ। 8 फरवरी , 1569 को इस दुर्गम किले की घेराबंदी कर दी।

➣ सुर्जन तोपों की गोलाबारी का मुकाबला करने में असमर्थ हुआ। अत: आंबेर राजा भगवंतदास और कुँवर मानसिंह के समझाने पर समर्पण के लिए तैयार हो गया।

21 मार्च , 1569 को राव सुर्जन के अकबर की सेवा में उपस्थित होने के साथ ही रणथंभौर किला भी उदयसिंह के हाथ से निकल गया।

अंतिम समय

➣ रणथंभौर पर आक्रमण का सुचना मिलते ही उदयसिंह अपनी सुरक्षा के लिए उदयपुर के महलों से रवाना होकर कुंभलगढ़ आ गया।

➣ किन्तु अकबर के कुंभलगढ़ की ओर आने का समाचार पाकर उदयसिंह ने वहाँ से भी निकलने का निर्णय कर लिया और अरावली की दुर्गम पर्वत शृंखलाओं के मध्य गोगुंदा पहुंचा।

➣ अंतत: मुगल सेना से बचकर भागते रहने के कारण शारीरिक और मानसिक आघातों ने उसे अंदर से तोड़ दिया। गोगुंदा पहुँचकर वह बीमार रहने लगा।

➣ राजवैद्य के भरपूर उपचार के बाद भी उदयसिंह की बीमारी नहीं गई। अंततः 28 फरवरी, 1572 की उसकी मृत्यु हो गई।

➣ मृत्यु से पूर्व उदय सिंह रानी धीर कुंवर के दाबाव में आकर एक दिन राणा ने समाचार पूछने आए कुछ सरदारों के समक्ष कुंवर जगमाल को अपना युवराज घोषित कर दिया था।

➣ किन्तु उदय सिंह की मृत्यू के पश्चात् राज्य दरबारियों ने राणा जगमल को राजगद्दी से उतारकर महाराणा प्रताप को गद्दी पर बैठा दिया।

महाराणा प्रताप (1572 – 97 ई.)

राजवंश : सिसोदिया वंश
पिता का नाम : महाराणा उदय सिंह।
माता का नाम : जयवंती देवी।
जन्म : 9 मई, 1540 कुंभलगढ़ में।
पत्नी का नाम : मामरख पँवार की पुत्री अजबांदे देवी।
16 मार्च, 1559 पुत्र अमर‌ सिंह का जन्म।
25 फरवरी, 1568 चित्तौड़ का तीसरा जौहर।
28 फरवरी, 1572 महाराणा उदय सिंह का निधन और प्रताप (होली के दिन) का राजतिलक।
नवंबर 1572 जलाल खाँ कोरची का प्रताप से संधि प्रयास।
जून 1573 मानसिंह का संधि प्रयास।
सितंबर 1573 भगवंतदास का संधि प्रयास।
दिसंबर 1571 टोडरमल का संधि प्रयास।
मार्च 1576 अकबर द्वारा प्रताप पर आक्रमण की योजना बनाना।
1 अप्रैल, 1576 अकबर के सेनापति मानसिंह का अजमेर से कूच।
18 जून, 1576 हल्दीघाटी युद्ध (प्रातः 10 बजे से दोपहर 1 बजे तक)।
सितंबर 1576 मुगल सेना का पलायन और मुगलों के कब्जेवाले भू-भाग पर प्रताप का पुनः आधिपत्य।
11 अक्तूबर, 1576 अकबर मेवाड़ अभियान पर आया।
दिसंबर 1576 अकबर का पलायन व प्रताप द्वारा सारे क्षेत्र पर पुनः आधिपत्य।
15 अक्तूबर, 1577 शाहबाज खाँ की पहली चढ़ाई।
अप्रैल 1578 कुंभलगढ़ पर शाहबाज खाँ का कब्जा।
17 जून, 1578 शाहबाज खाँ का पलायन।
सितंबर 1578 प्रताप का आमेरगढ़ में निवास, वहाँ भामाशाह द्वारा धन समर्पण।
15 दिसंबर, 1578 शाहबाज खाँ की दूसरी चढ़ाई।
15 नवंबर, 1579 शाहबाज खाँ की तीसरी चढ़ाई।
1580 अब्दुल रहीम खानखाना का सैनिक अभियान।
1581 प्रताप द्वारा खानखाना के परिवार को लौटाना और खानखाना का मेवाड़ से लौट जाना।
1582 विजयादशमी-दिवेर विजय, डूँगरपुर-बाँसवाड़ाछप्पन क्षेत्र के इलाकों पर भी विजय, संपूर्ण मेवाड़ स्वतंत्र।
5 दिसंबर, 1584 जगन्नाथ कच्छवाहा द्वारा आक्रमण और असफल होकर लौटना।
1585 नई राजधानी चावंड की स्थापना, प्रताप द्वारा अपनी स्थिति सुदृढ़ करना।
1585 से 1596 प्रताप द्वारा पुनः मेवाड़ को अधिकार में लेकर पुनर्निर्माण के प्रयत्न। राजधानी चावंड में साहित्य, कला, शिल्प का विकास।
19 जनवरी, 1597 चावंड में महाराणा प्रताप का देहावसान।

➣ राणा सांगा के पश्चात मेवाड़ वंशावली में एक सुयोग्यप्रतापी शासक हुआ। इस समय तक मेवाड़ के आधे हिस्से पर मुगलों का अधिकार था।

➣ राणा प्रताप का जन्म सिसोदिया राजवंश के महाराणा उदयसिंह एवं माता रानी जीवत कुंवर (जैवन्ताबाई) के गर्भ से 9 मई, 1540 ई. को हुआ।

➣ प्रताप का विवाह बीजोलिया राव मामरख पँवार की पुत्री अजबदे से हुआ। अजबदे के गर्भ से ही राणा अमर सिंह का जन्म हुआ।

➣ राणा प्रताप के जन्म के समय चितौड़ पर बनबीर का शासन था जबकि उदय सिंह कुम्भलगढ़ में चितौड़ प्राप्त करने की योजना बना रहे थे।

➣ विषम परिथितियों देखते हुए महारानी जयवंताबाई के पिता अखैराज सोनगरा अपनी पुत्री को पाली ले आये। पाली महल में ही नाना के घर प्रताप का जन्म हुआ।

सन 1543 ई. को शेरशाह सूरी द्वारा मारवाड़ पर हुए आक्रमण में राव मालदेव की ओर से युद्ध करते हुए अखैराज सोनगरा वीरगति को प्राप्त हो गए।

बचपन एवं शिक्षा (कुम्भलगढ़)

➣ कुंभलगढ़ में प्रताप बारह वर्ष की आयु तक रहे। शस्त्र संचालन तथा लक्ष्य भेदन उन्होंने इसी अवधि में सीख लिया था।

➣ उदयसिंह के आचरण से चिंतित रावत कृष्णदास चूँडावत ने कुमार प्रताप को पाली से बुलवाने का निश्चय किया।

➣ मेवाड़ की परिस्थितियों के देखते हुए कुमार प्रताप की शिक्षा कुम्भलगढ़ में करने का निश्चय हुआ और महारानी जयवंताबाई को पुत्र सहित कुंभलगढ़ सुरक्षित पहुँचा दिया गया।

➣ इसके पश्चात् कुम्भलगढ़ में कुमार प्रताप एंव छोटे भाई शक्ति सिंह को शस्त्र विद्या एवं राजकाज की शिक्षा भी विधिवत् दी जाने लगी।

चितौड़गढ़ (युवराज घोषित)

बारह वर्ष की अवस्था में राणा उदय सिंह का आदेश प्राप्त करके कुंवर प्रताप कुंभलगढ़ से चित्तौड़ पहुँच गए।

➣ इसी अवस्था में समस्त वीर सरदारों की उपस्थिति में एक सादा समारोह में उन्हें युवराज बना दिया गया।

भीलों से मुलाकात

➣ भील अरावली की दुर्गम उपत्यकाओं में निवास करनेवाले जाति थी। मेवाड़ में निवास करने पर भी भीलों का सिसोदिया राजवंश से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था।

➣ वे अपने क्षेत्रों में अपनी स्वतंत्र सत्ता के साथ निवास करते थे। राजवंश को भी उन असभ्य आदिवासियों से कोई सरोकार नहीं था। दोनों ही एक-दूसरे के क्षेत्रों में हस्तक्षेप नहीं करते थे।

➣ पिता के आदेश प्रताप चित्तौड़गढ़ की तलहटी के किसी गाँव में सामान्य जन की तरह उनके बीच निवास करते हुए उन्हें उनकी समस्याओं को जानने – समझने का प्रयास करने लगे।

➣ इसी दौरान सघन वन में साथियों के साथ शिकार पर निकले हुए प्रताप ने वन में एक भील स्त्री की मदद की गुहार सुनकर उसकी मदद के लिए पहुचे थे।

➣ भीलों के सरदार कुमार प्रताप से मिले और उन्हें धन्यवाद दिया। यहीं से दोनों में घनिष्ठा बढ़ी।

भील कुमार प्रताप को प्यार से कीका कहकर पुकारते थे जिसका अर्थ होता है- बेटा।

प्रारंभिक सैन्य अभियान

➣ प्रताप को सर्वप्रथम देवलिया (प्रतापगढ़) और डूँगरपुर के विरुद्ध मुहिम पर भेजा गया।

➣ प्रताप ने भीलों की सहायता ली और बिना किसी रक्तपात के रायसिंह को समर्पण करने के लिए विवश कर दिया।

देवलिया पतन का समाचार पाकर रावल आसकरण सतर्क हो गया किन्तु उसे भी कुंवर प्रताप के आगे झुकना पड़ा।

➣ प्रताप की इन साहसिक विजयों के बाद उसके चित्तौड़ बुला लिया गया। यह सन् सन 1554 ई. का समय था।

➣ इसक उदयपुर से 70 मील दूर छप्पन क्षेत्र पर सोनग राठौड़ों का आधिपत्य, भविष्य में उस दिशा से खतरा आने का कारण बन सकता था।

गुजरात की ओर से आनेवाले संभावित संकट से बचने के लिए छप्पन क्षेत्र पर सोनग राठौड़ों का अधिकार था। प्रताप ने इस मेवाड़ के अधीन कर दिया।

➣ महाराणा अरावली पर्वतमाला के पश्चिमी भाग गोड़वाड़ पर पहले मेवाड़ का अधिकार था। जिसे जोधपुर के शासक राव मालदेव ने इसे अपने राज्य में मिला लिया था।

सन् 1562 में हुसैन कुली खाँ द्वारा आक्रमण करके राव चंद्रसेन से जोधपुर छीन लेने के कारण उस दिशा से मुगल सेना के आगमन की प्रबल संभावना हो गई।

➣ इसकी रोकथाम के लिए इस भू – भाग पर अधिकार करना आवश्यक हो गया। सेना सहित पहुँचे प्रताप को वहाँ युद्ध करने की नौबत ही नहीं आई। बगैर युद्ध किये बिना ही इस क्षेत्र पर प्रताप का अधिकार हो गया।

गोड़वाड़ पर मेवाड़ का पुनः आधिपत्य स्थापित कर प्रताप उदयपुर लौट आया।

शक्तिसिंह का चित्तौड़ से निष्कासन

➣ शक्तिसिंह कुंवर प्रताप का अनुज था। अपने गुस्सैल स्वभाव में हुए कृत्य से उदय सिंह ने उसे चित्तौड़ से निकल जाने का आदेश दे दिया।

➣ चित्तौड़ से निकल कर वह अजमेर पहुंचा और अकबर जा मिला। अकबर ने उसे चितौड़ के विरुद्ध अभियान में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया।

➣ किन्तु अकबर की अनुमति के बगैर ही चितौड़ पर होने वाले आक्रमण की सुचना देने के लिए मेवाड़ की ओर प्रस्थान कर गया।

➣ लेकिन राणा ने उस पर संदेह करते हुए उसे चितौड़ गढ़ में प्रवेश की अनुमति नहीं दी। तत्पश्चात वह अपने साथियों के साथ डूँगरपुर की ओर रवाना हो गया।

➣ वहाँ से निकलकर वह मुगल प्रभाव क्षेत्र मंदसोर के निकट भींडर के पास वैणगढ़ इलाके में रहने लगा था। वह वहीं रहकर अपनी सैन्यशक्ति में वृद्धि करता रहा।

➣ चूँकि इस समय महाराणा पहाड़ों में थे इसलिए भींडरवासियों को शक्तिसिंह ने रक्षा का आश्वासन देते हुए भींडर पर आक्रमण कर मुगल सेनापति सैयद मिर्जा बहादुर पर आक्रमण कर दिया।

➣ कालांतर में प्रताप ने उसे भींडर सहित भैंसरोड़गढ़ (भद्रावती) और बेगू (बेगम) की जागीर देकर, अपने अनुज की सम्मानजनक वापसी की राह प्रशस्त कर दी।

➣ जागीर मिल जाने के बाद शक्तिसिंह ने अपनी माँ सज्जाबाई सोलंकिनी को भी बुलवाकर बाईजीराज (राजमाता) की प्रतिष्ठित पदवी प्रदान करते हुए अत्यधिक सम्मान के साथ अपने पास रखा था।

मुग़लों से संघर्ष (1567 ई.)

आगरा – दिल्ली से गुजरात पहुँचने का मार्ग अजमेर , मेड़ता , पाली , जालौर होते हुए निकलता था। वहीं अजमेर से मेड़ता , पाली होते हुए मध्य प्रदेश और सिंध तक पहुँचा जा सकता था।

➣ सेना के सुरक्षित आवागमन और रसद की निर्बाध आपूर्ति के लिए इन मार्गों को निरापद रखना आवश्यक था।

➣ शक्तिशाली मेवाड़ को अपना ताबेदार बनाए बगैर यह संभव नहीं था। मेवाड़ विजय के लिए उसकी राजधानी चित्तौड़ मुख्य अवरोध था।

➣ अंतत: सन 1567 ई. में अकबर ने चित्तौड़गढ़ की घेरबंदी कर दी। फरवरी 1568 ई. तक चितौड़ दुर्ग पर भी अधिकार हो गया।

➣ इसके पश्चात ही राणा उदय सिंह ने उदयपुर नई राजधानी बसाई थी।

राज्याभिषेक (1572 ई.)

➣ महाराणा प्रताप का प्रथम राज्याभिषेक 28 फरवरी 1572 में गोगुन्दा में हुआ

➣ जबकि विधिवत रूप से द्वितीय राज्याभिषेक मार्च 1572 ई. में ही कुम्भलगढ़ दुर्ग में हुआ, दुसरे राज्याभिषेक में जोधपुर का राठौड़ शासक राव चन्द्रसेन भी उपस्थित थे।

➣ मृत्यु से पूर्व उदय सिंह रानी धीर कुंवर के दाबाव में अनुज पुत्र जगमाल को अपना युवराज घोषित कर दिया था।

➣ किन्तु उदय सिंह की मृत्यू के पश्चात् सरदारों ने राणा जगमाल को राजगद्दी से उतारकर महाराणा प्रताप को गद्दी पर बैठा दिया।

➣ इसके नाराज होकर जगमाल अकबर के पास चला गया। अकबर ने भी उसे जहाजपुर परगना देते हुए अपनी सेवा में रख लिया।

➣ कालांतर में सिरोही के देवड़ा सुरताण ने सन 1583 ई. में दत्ताणी के युद्ध में जगमाल को पराजित किया और जगमाल इस युद्ध में मारा गया।

अकबर का संधि प्रस्ताव (1572-73 ई.)

➣ राजपूताना के आंबेर , जोधपुर , प्रतापगढ़ , बाँसवाड़ा , डूँगरपुर , सिवाना , सोजत , मेड़ता , बीकानेर , जैसलमेर , सिरोही आदि सभी राजपूत राज्य अकबर की अधीनता स्वीकार कर चुके थे।

गुजरात और मालवा जैसे विशाल सूबों में सुरक्षित आवागमन के लिए, मेवाड़ से मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करना आवश्यक था। इन दोनों ही क्षेत्रों में जाने के मार्ग मेवाड़ में होकर निकलते थे।

शाही खजाने, रसद आदि की सुरक्षा के लिए वह महाराणा प्रताप के साथ फिलहाल किसी भी शर्त पर संधि करने का इच्छुक था।

मुगल बादशाह अकबर बिना युद्ध के प्रताप को अपने अधीन लाना चाहता था। इसलिए अकबर ने प्रताप को संधि प्रस्ताव क्रमवार निम्न दूत भेजे-


1.जलाल खाँ (सितम्बर (1572 ई.)
2.मानसिंह (1573 ई. में )
3.भगवानदास ( सितम्बर, 1573 ई. में )
4.राजा टोडरमल ( दिसम्बर,1573 ई. )

➣ इन प्रस्ताव में अकबर ने कर वसूली से मुक्ति के अतिरिक्त, अन्य कोई भी उपयुक्त शर्त अथवा शर्तें स्वीकार करने की अनुमति तक दे डाली थी।

➣ लेकिन इन सब के बावजूद प्रताप ने सभी प्रस्ताव ठुकरा दिए। जिसके परिणामस्वरूप हल्दी घाटी का ऐतिहासिक युद्ध हुआ।

➣ किन्तु इसी मध्य गुजरात में विद्रोह हो गया जिसमे अकबर दो वर्ष (1574-75) तक उलझा रहा। अकबर चाहकर भी मेवाड़ की ओर ध्यान नहीं दे पाया।

➣ इस दौरान प्रताप ने छप्पन क्षेत्र पर पूर्ण आधिपत्य कर गोडवाडा और अरावली की घाटियों में भी सैन्य व्यवस्था सुदृढ़ कर ली।

सिरोही और गुजरात से लगती सीमाओं की भी सुरक्षा मजबूत कर लेने के पश्चात् वे अकबर से युद्ध करने के लिए तैयार हो गये।

हल्दीघाटी का युद्ध (1576 ई.)

अबुल फजल ने उस युद्ध में स्वयं भाग लेकर, अकबरनामा में हल्दीघाटी युद्ध का आँखों देखा वर्णन लिखा है। अबुल फजल नें इसे खमनौर का युद्ध कहा है।

➣ हल्दीघाटी स्थान गोगुन्दा एवं खमनौर की पहाड़ियों के बीच बनास नदी के किनारे राजसमन्द जिले में स्थित है। इस युद्ध के पीछे अकबर का मुख्य उद्देश्य राणा प्रताप को अधीन लाना था।

➣ सभी प्रस्ताव ठुकराने के पश्चात अकबर ने मेवाड़ को जीतने के लिए अप्रैल, 1576 ई. में आमेर के राजा मानसिंह एवं आसफ ख़ाँ के नेतृत्व में मुग़ल सेना को आक्रमण के लिए रवाना कर दिया।

➣ दूसरी ओर राजपूत सरदारों के अलावा राणा की सेना के अग्रभाग का नेतृत्व अफगानों की एक टुकड़ी के साथ हकीम खान सूर कर रहा था। राणा की सेना में भीलों की भी एक छोटी-सी टुकड़ी शामिल थी।

राजा रामशाह की योजना के अनुरूप मुग़ल सेना को सँकरी हल्दीघाटी में फँसाकर परास्त करने का निर्णय लिया गया। 18 जून को दोनों सेना आपस में टकराई।

➣ प्रारंभ में युद्ध राजपूती सेना के पक्ष में रहा, किन्तु उत्साही राजपूती सेना संकरी घाटी से निकलर मुगली सेना का पीछा करते हुए मैंदान की तरफ गूंज कर गई।

➣ मुग़ल सेना का पाँव उखड़ते देख मेहतर खाँ ने अफवाह उड़ा दी कि बादशाह अकबर स्वयं घुड़सवारों के साथ अजमेर से आ गए हैं। सेना ठहर गई।

मानसिंह की तलाश में मुग़ल सेना को चीरते हुए महाराणा अंदर तक घुसते चले गए और चेतक को फिरत के द्वारा मानसिंह के हाथी पर कुदाया ।

➣ चेतक ने उछलकर अपने अगले पैर मानसिंह के हाथी के मस्तक पर टिका दिए। इस दौरान हाथी की सूँड़ में पकड़े खाँड़े से चेतक का पिछला पैर घायल हो गया।

➣ चेतक का संतुलन बिगड़ जाने से भाला हाथी के हौदे से टकराकर रह गया। मानसिंह के हौदे में दुबक जाने की वजह से बच निकला।

➣ मुगल सेना से घिरे महाराणा और चेतक बुरी तरह घायल हो गए। यह देख हकीम खाँ सूर उनकी सहायता के लिए दौड़ा। युद्ध हाथ से निकलते हुए देख प्रताप युद्ध भूमि से निकल गए।

➣ उधर सादड़ी के झाला बीदा/झाला मन्ना ने महाराणा का राज्य चिह्न लेकर स्वयं लड़ना शुरू कर दिया किया और युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए।

➣ मेवाड़ी सेना के पलायन के साथ समाप्त हुए युद्ध का कोई सटीक परिणाम नहीं निकल सका।

चेतक का बलिदान

➣ चेतक को राणा उदय सिंह के शासनकाल में सुदूर ईरान से आया घोड़ों का व्यापारी इब्राहीम से ख़रीदा गया था। व्यापारी के बताए सुलेमान के स्थान पर अश्वा का नाम चेतक रखा गया।

➣ हल्दीघाटी में प्रताप के प्राणों पर संकट का आभास पाकर चेतक , वल्गा संकेत पर हल्दीघाटी से निकलकर पर्वत उपत्यकाओं में दौड़ लगा रहा था।

➣ युद्धस्थल से काफी दूर निकलकर , हल्दीघाटी से सुरक्षित स्थल पहुँचने तक , निरंतर रक्त प्रवाह से उसका बल काफी क्षीण हो गया।

➣ सामने सूखा बरसाती नाला देख चेतक की शारीरिक दशा से अनभिज्ञ प्रताप ने उसे पार करने के लिए संकेत किया। चेतक ने संपूर्ण शक्ति से छलाँग लगाई और प्रताप सहित नाला पार करने में सफल तो हो गया ,

➣ किंतु अत्यधिक रक्त प्रवाह से क्षीण हुई शक्ति के कारण तीन पैरों से संतुलन बनाए रखने में सफल नहीं हुआ और गिर गया। कहा जाता है इसी समय प्रताप को उसके पैर कट जाने का आभास हुआ था।

➣ चेतक ने अपने स्वामी को सुरक्षित स्थान पर पहुचाकर वहीँ दम तोड़ दिया। इसी स्थान पर चेतक स्मारक भी बना है।

गोगुन्दा पर अधिकार

➣ हल्दीघाटी युद्ध के पश्चात मान सिंह ने गोगुंदा पर अधिकार कर लिया। किन्तु गोगुन्दा सुरक्षित न होने की वजह से महाराणा पहले ही कोल्यारी की ओर निकल चुके थे।

➣ मैदानी क्षेत्र में प्रताप द्वारा खेती पर प्रतिबंध लगा देने के कारण मुग़ल सेनाओं को खाने के लिए कुछ भी नहीं मिल पाया। सारी रसद अजमेर से मँगवानी पड़ती थी।

➣ किन्तु मुग़ल सेना को मिलने वाली रसद मार्ग में ही राजपूतों और भीलों द्वारा लूट लिया जाता। गोगुंदा में स्थित मुग़ल सेना के अब भूखे मरने की नौबत आ गई।

➣ महाराणा की खोज में निकली सैन्य टुकड़ियाँ भी संध्या तक थक – हारकर लौट आती थीं। उनका कोई सुराग नहीं मिल रहा था।

वर्षाकाल के चार माह तक निष्फल भटकाव के बाद मानसिंह मुगल सेना को वहीं छोड़कर अपने कछवाहा सैनिकों के साथ अजमेर लौट गया।

छापामार युद्ध (पर्वतीय युद्ध नीति) एंव गोगुन्दा पर पुन: अधिकार

➣ आमने सामने का युद्ध ना लड़ते हुए, प्रताप ने अब छापामार युद्ध नीति का प्रयोग कर मुगलों का मात देने का सुझाव दिया।

➣ छापामार युद्ध का अर्थ होता है – हमला करो , लूटो , मारो और सुरक्षित लौट आओ

➣ अपनी छापामार युद्ध प्रणाली से उत्साहित राजपूतों ने एक दिन गोगुंदा पर धावा बोल दिया। मुगल सेना , राजपूतों के आक्रमण का सामना नहीं कर सके और गोगुंदा पर प्रताप का पुनः अधिकार हो गया।

➣ कुछ ही दिनों में वे एक – एक कर सभी मुगल थानों से उन्हें खदेड़कर , अपना अधिकार स्थापित करने में सफल हो गए ।

गोगुंदा को थाना बनाकर मांडण कूंपावत राठौड़ को नियुक्त कर प्रताप कुंभलगढ़ लौट गए। वहाँ भी किलेदार बदलकर नर्बद मेहता को नया किलेदार नियुक्त किया।

कालान्तर में दक्षिणी सेनापति मलिक अम्बर और शिवाजी ने भी छापामार युद्ध पद्धति को विकसित किया।
मलिक अम्बर अहमदनगर राज्य से सबंधित हैं जिसने छापामार युद्ध तकनीक का प्रयोग कर मुगलों (जहाँगीर के समय) से संघर्ष किया। जबकि शिवाजी औरंगजेब के शासनकाल के समय थे।

युद्ध नीति

➣ महाराणा प्रताप ने अपने अधिकारवाले संपूर्ण मैदानी भाग की प्रजा को पर्वतीय क्षेत्रों में प्रस्थान करने को कहा और मैदानी भाग में समस्त कुएँ, तालाब, बावड़ी आदि जलस‍्रोतों को मिट्टी से भरवाकर, वहाँ खेती पर प्रतिबंध लगा दिया।

कुंभलगढ़ से समस्त गतिविधियाँ संचालित करते हुए महाराणा ने सेना भेजकर गुजरात – मेवाड़ , मेवाड़ – मालवा और अजमेर – गुजरात मार्ग भी मुगलों के लिए बंद कर दिए। इन मार्गों से रसद आदि भेज पाना मुगलों के लिए असंभव हो गया।

➣ प्रताप की सफलताओं का जबरदस्त प्रभाव हुआ और ईडर में प्रताप के श्वसुर नारायणदास ने भी आक्रमण कर मुगल थाने उखाड़ फेंके और कुंभलगढ़ में आकर प्रताप से मिला।

जालोर का नवाब ताज खाँ और सिरोही का राव सुल्तान देवड़ा भी प्रताप के साथ आ गए।

अकबर का पुन: आक्रमण (1576)

मानसिंह की असफलता के बाद उसने स्वयं कमान हाथ में लेकर 11 अक्तूबर , 1576 को अजमेर से गोगुंदा की ओर गूंज किया।

ईडर राव नारायणदास द्वारा मुगल थाने लूट लेने का समाचार पाकर अकबर ने एक विशाल सेना ईडर के लिए रवाना की। सुचना प्राप्त होते हुए महाराणा स्वयं अपने श्वसुर की सहायता करने पहुँच गए।

➣ ईडर की सीमा पर युद्ध हुआ। अंतत: ईडर पर मुगल सेना का अधिकार हो गया। प्रताप और नारायणदास अपने सैनिकों के साथ पहाड़ों में चले गए।

➣ उधर अकबर ने गोगुंदा पर अधिकार कर सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम करके उदयपुर की ओर प्रस्थान किया। राजपूती सेना पहले ही उदयपुर खाली कर चुकी थी।

➣ सेनाविहीन उदयपुर पर अकबर ने आसानी से कब्ज़ा कर लिया और उसका नामकरण मोहम्मदाबाद करने के साथ अपनी विजय की स्मृति में सोने के सिक्के ढलवाए।

➣ उदयपुर की सुरक्षा का दायित्व राजा जगन्नाथ और फखरुद्दीन को सौंपकर,वहां से दक्षिणी मेवाड़ चला गया। इस लंबे-चौड़े अभियान के बावजूद प्रताप और उसकी सेना का कहीं अता-पता नहीं था।

गोगुन्दा व् उदयपुर पर प्रताप का पुन: अधिकार (1577)

➣ अकबर के जाने की सूचना मिलने पर प्रताप तत्काल पहाड़ों से निकलकर पुन: मुग़ल सैनिक थानों पर आक्रमण करना आरंभ कर दिया।

सन 1577ई. को आसिफ खान के नेतृत्व मिएँ आई मुग़ल सेना के साथ हुई मुठभेड़ में राजपूतों के जबरदस्त हमले में हरावल भाग के मिर्जा मुहम्मद मुकीम अपने साथी कुतुब खान के साथ मारा गया।

मार्च 1577 में अकबर के देपालपुर से फतहपुर की ओर रवाना होने की सूचना मिलने पर , प्रताप ने पहाड़ों से उतरकर पुन; मुग़ल थानों पर हमले करने आरंभ कर दिए ।

मई 1577 में उसने गोगुंदा पर हमला कर दिया। भयभीत मुगल मामूली मुकाबले के बाद भाग छूटे। महाराणा ने मुगलों के भय का लाभ उठाकर उदयपुर पर भी हमला कर दिया। वहाँ भी मुग़ल सेना विशेष प्रतिरोध न कर भाग निकली ।

➣ इस प्रकार गोगुंदा और उदयपुर, दोनों पर वापस प्रताप के अधिकार में आ गया।

मेवाड़ से मालवा की ओर गूंज करते समय अकबर ने मोही में थाना स्थापित कर , मुजाहिद खान को थानेदार नियुक्त किया।

➣ प्रताप ने उदयपुर विजय के बाद मोही पर भी हमला कर दिया। घमासान युद्ध में मुजाहिद खान मारा गया और मोही पर भी प्रताप का अधिकार हो गया ।

➣ महाराणा प्रताप के जबरदस्त हमलों के समाचार मिलने पर भयभीत व्यापारियों ने दिल्ली – मालवा मार्ग पर आवागमन बंद कर दिया। इससे इस मार्ग से होनेवाला आयात – निर्यात पूरी तरह ठप हो गया।

कुम्भलगढ़ का युद्ध (3 अप्रैल, 1578 ई.)

➣ चित्तौड़ के बाद कुंभलगढ़ मेवाड़ का सर्वाधिक प्रतिष्ठित और अजेय दुर्ग था। महाराणा प्रताप वहीं से शासन करते हुए छापामार युद्धों के लिए दिशा – निर्देश देते थे।

➣ मुग़ल सेना का लक्ष्य इस बार कुंभलगढ़ था, जो चित्तौड़ छिन जाने के बाद यह मेवाड़ की राजधानी बना हुआ था। 15 अक्तूबर, 1577 को यह सेना मेवाड़ की ओर रवाना हुई।

➣ अकबर ने अपने सेनापति शाहबाज खाँ के नेतृत्व में कुम्भलगढ पर आक्रमण के लिए मुगल सेना भेजी। दोनों पक्षों की सेनाओं के मध्य भीषण युद्ध हुआ।

➣ युद्ध में सफलता की कोई आशा ना दिखाई देने पर महाराणा प्रताप अपने ममेरे भाई भाण सोनगरा को दुर्ग सौंपकर सामंतपरिवार सहित सुरक्षित स्थान पर चले गए।

राव भाण सोनगरा के साथ सींधल सूजा और कूंपा, नरबद मेहता, जैता मांगलिया और जयमल आदि के साथ राजपूत चौफेरा युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।

➣ प्रताप के बाँसवाड़ा जाने का समाचार मिलने पर किला गाजी खाँ बदख्शी को सौंपकर वहां से रवाना हो गया।

कुंभलगढ़ से गूँज कर शाहबाज खाँ ने पहले गोगुंदा में थाना कायम करके उदयपुर पर आक्रमण करके उस पर भी अधिकार कर लिया।

तीन माह तक भटकते रहने पर भी उसे प्रताप की कोई जानकारी नहीं मिली। कुंभलगढ़ विजय , मेवाड़ पर पूरी तरह कब्ज़ा कर वह वापस लौट गया।

➣ मुग़ल सेना के लौटते ही उनके द्वारा स्थापित थानों पर हमला करके उन पर वापस कब्जा कर लिया गया। उसका जीता हुआ उदयपुर प्रताप ने फिर हासिल कर लिया। किन्तु कुंभलगढ़ पर मुग़ल अधिकार पूर्ववत् बना रहा।

➣ अकबर ने कुम्भलगढ़ दुर्ग पर तीन बार शहबाज खाँ को, चौथी बार अब्दुल रहीम खानेखाना को तथा अन्तिम एवं पाँचवी बार जगन्नाथ कच्छवाह को प्रताप के विरूद्ध आक्रमण हेतु भेजा था।

राजपरिवार

➣ प्रताप ने स्त्रियों – बच्चों को आवरनाथ कमलनाथ के दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में अपने भाई वीरमदेव और वफादार भीलों के संरक्षण में रखे थे।

➣ सबकी सुरक्षा और भोजन का प्रबंध उस संकटकाल में कर पाना आसान नहीं था। भरपेट भोजन मिलनेवाला दिन तो उनके लिए त्योहार जैसा होता था।

➣ वीरमदेव इस गुरुतर दायित्व का सतर्कतापूर्वक निर्वहन कर रहा था। पूरे दस वर्षों तक वीरमदेव ने इस दायित्व का सफलतापूर्वक निर्वहन किया था ।

➣ इसका ही सुपरिणाम था कि भीषण आक्रमणों के बावजूद मुगल सेना उनमें से किसी को भी पकड़ पाना एंव पता तक नहीं लगा सकी।

अकबर के मेवाड़ अभियान

शाहबाज खान का दूसरा आक्रमण (1578)

➣ शाहबाज की पिछली सफलता से उत्साहित अकबर ने उसे ही फिर मेवाड़ भेजने का निर्णय कर लिया।

12 दिसंबर , 1578 को शाहबाज के साथ गाजी खाँ , मुहम्मद हुसैन , शेख तीमूर बदख्शी और मीरजादा अली खाँ को भी भारी सेनाओं के साथ रवाना हुआ।

➣ शाहबाज द्वारा सैकड़ों सैनिकों को पहाड़ों में प्रताप को खोजने के लिए भेजने का कोई परिणाम नहीं निकल रहा था। पूरा पहाड़ खँगाल डालने के बावजूद उनका सुराग नहीं मिल पाया।

चार माह तक निष्फल भटकाव के बाद शाहबाज खाँ , मोही , मदारिया , चित्तौड़ , मांडल , मांडलगढ़ , जहाजपुर और मंदसोर में मजबूत थाने स्थापित कर बादशाह के पास लौट गया।

शाहबाज खाँ का तीसरा आक्रमण (1579)

➣ अपनी इस योजना के दूसरे चरण में अकबर 8 सितंबर , 1579 को अजमेर ख्वाजा की जियारत के लिए रवाना हुआ।

➣ अजमेर से ही अपनी राजधानी लौटते हुए उसने शाहबाज खाँ को मेवाड़ पर उसके तीसरे अभियान के लिए रवाना होने का आदेश दिया।

11 नवंबर, 1579 को शाहबाज भारी-भरकम सेना के साथ साँभर से रवाना हुआ। उसने प्रताप के कई पड़ावों पर अकस्मात् आक्रमण करके उन्हें भागने के लिए विवश कर दिया ।

➣ इस पर भी बार-बार आक्रमणों के बावजूद वह प्रताप को पकड़ने में सफल नहीं हो पाया। आक्रमणों से परेशान होकर प्रताप ने अंततः गोड़वाड़ की ओर प्रस्थान कर गए।

➣ शाहबाज ने कुंभलगढ़ के अलावा जावर, छप्पन और वागड़ पर भी अधिकार करके वहाँ अपने थाने स्थापित कर दिए। इस तरह इन छह माह में लगभग पूरा मेवाड़ एक बार फिर मुग़लों के अधिकार में आ गया।

➣ पूर्वी प्रदेशों बंगाल-बिहार में अफगानी उत्पातों के समाचार आने से मई के अंत में अकबर ने उसे वापस बुला लिया और शाहबाज को बंगाल की ओर भेज दिया।

➣ शाहबाज द्वारा जीते भू – भाग पर महाराणा का वापस अधिकार हो गया। शाहबाज की छह माह की मेहनत मिट्टी में मिल गई। डूँगरपुर और बाँसवाड़ा का भी शाही आधिपत्य से निकल जाना अकबर के लिए एक और भारी सदमा था।

चार बार मेवाड़ को रौंदते हुए लगभग पूरे मेवाड़ पर कब्जा कर लेने के बाद भी प्रताप उसके लौटते ही सभी थानों को उखाड़कर वहाँ वापस अपना अधिकार कर लेता था।

शाहजादा दानियाल का अभियान

➣ अकबर ने शाहजादा दानियाल को अजमेर में सूबेदार पद पर नियुक्त किया और शहजादे को मेवाड़ अभियान की कमान सौंप दी।

➣ इस अभियान में उसके साथ शेख फैजी, जमाल खाँ, मानसिंह के छोटे भाई माधवसिंह और जगमाल (प्रताप का भाई ) भी शामिल था।

➣ किन्तु वह बिना युद्ध किये वह अजमेर में दो माह व्यतीत कर सितंबर में बादशाह की अनुमति लिये बगैर ही आगरा वापस लौट आया।

➣ शाहजादे के इस कायराना आचरण पर अकबर को क्रोध तो बहुत आया, लेकिन पुत्र होने के कारण वह उसे दंडित करने में असमर्थ था।

दस्तम खाँ का मेवाड़ अभियान

➣ अकबर ने दस्तम खाँ को सूबेदार बनाकर मेवाड़ के लिए रवाना किया। उसे 3000 मनसब के साथ रणथंभौर की जागीर भी दी गई।

➣ लेकिन तभी महाराणा प्रताप से प्रेरित होकर आंबेर त्रिलोकसिंह और अचलदास ने बादशाह के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। उन्हें दबाने का आदेश मिलने पर दस्तम खाँ ने मेवाड़ की बजाय रणथंभौर के बोंली परगने की ओर कूच किया।

धतूरी के पास दोनों में युद्ध हुआ। घमासान युद्ध में त्रिलोकसिंह मारा गया। किन्तु घायल दस्तम खाँ ने भी अगले दिन शेरपुरा में दम तोड़ दिया। अत: यह अभियान भी शुरू होने से पहले ही समाप्त हो गया।

अब्दुर्रहीम खान का मेवाड़ अभियान (1581)

दस्तम खाँ के मारे जाने के बाद अकबर ने सन् 1581 की शुरुआत में अब्दुर्रहीम खान (बैरम खाँ के पुत्र) को खानखानाउपाधि प्रदान करते हुए अजमेर भेजा।

➣ इस अभियान में अपनी बेगम और बच्चों को शेरपुरा में सुरक्षित छोड़कर उसने महाराणा पर चढ़ाई कर दी। इसी बीच कुँवर अमरसिंह ने शेरपुरा पर आक्रमण कर उसके परिवार को बंदी बना लिया।

➣ इस पर प्रताप ने अमर सिंह को फटकार लगाते हुए परिवार को सम्मान सहित वापस शेरपुरा छोड़ने का आदेश दिया।

➣ महाराणा की उदारता से उपकृत अब्दुर्रहीम ने मेवाड़ के विरुद्ध अपना अभियान अघोषित रूप से बंद कर दिया।

➣ घटना की जानकारी मिलने पर अकबर भी आश्चर्यचकित रह गया। वह भी महाराणा की तारीफ किए बगैर नहीं रह सका। अकबर ने अब्दुर्रहीम को मेवाड़ के विरुद्ध काररवाई करने के बजाय उसे वापस बुलाना ही उचित समझा।

1581 में अब्दुर्रहीम खानखाना को वापस बुला लेने के बाद अकबर ने मेवाड़ अभियान को अघोषित विराम दे दिया।

➣ खानखाना के लौटने के बाद उन्होंने चित्तौड़ और मांडलगढ़ के आसपास के समतल भू – भाग पर भी हमले करने आरंभ कर दिए।

➣ उन्होंने अपने क्षत – विक्षत राज्य को पुनः सैन्य और प्रशासनिक रूप से संगठित करना आरंभ कर दिया। धीरे – धीरे मेवाड़ के दक्षिणी और पश्चिमी प्रदेशों पर उनका पुनः अधिकार हो गया।

दिवेर का युद्ध (अक्टूबर 1582)

दिवेर के युद्ध (1582 ई.) को महाराणा प्रताप की विजयों का श्री गणेश कहा जाता है। यह हल्दीघाटी के बाद प्रताप का घोषणापूर्वक किया पहला सम्मुख युद्ध था।

वर्षा ऋतु की समाप्ति के बाद अपनी सेना संगठित कर विजयदशमी के शुभ मुहूर्त में उन्होंने दिवेर की ओर प्रस्थान किया।

➣ उनके इस अभियान में कुँवर अमरसिंह और भामाशाह भी साथ थे। दिवेर थाने का थानेदार अकबर का चाचा सुलतान खान था।

➣ मेवाड़ी सेना के आगमन की सूचना मिलने पर सभी मुग़ल थानों की आसपास एक साथ आ पहुचे। युद्ध में सुल्तान खान के साथ दीर्घकाय बहलोल खाँ भी था।

➣ इस युद्ध में महाराणा प्रताप ने बहलोल खान को उसके घोड़े समेत दो हिस्सों में चीर दिया था। साथ ही अमर सिंह ने भी भाले से सुल्तान खां को उसके घोड़े समेत मार डाला।

➣ अपने सिपाहसालारों बहलोल की यह गत देखकर मुगल सेना में बुरी तरह भगदड़ मची और राजपूत सेना ने अजमेर तक मुगलों को खदेड़ा दिया।

शाहबाज खाँ द्वारा स्थापित सबसे सुरक्षित और महत्त्वपूर्ण मुगल दिवेर थाने पर महाराणा प्रताप का अधिकार हो गया। यह हल्दीघाटी से भी अधिक महत्त्वपूर्ण विजय थी।

➣ दिवेर विजय की खबर कुंभलगढ़ पहुँचने में देर नहीं लगी। किलेदार गाजी खाँ बदख्शाँ चितित हो उठा। उसने अपने सैनिकों को एकत्रित किया और किले को लावारिस हालत में छोड़कर भाग निकला।

➣ अगले दिन प्रताप कुंभलगढ़ की ओर रवाना होकर हमीरसर तालाब पहुँचे। वीरान गढ़ में सेना सहित प्रवेश कर उस पर अधिकार कर लिया। इसके अगले दिन जावर थाने पर भी कब्जा हो गया।

इतिहासकार कर्नल टॉड ने अपनी किताब में जहां हल्दीघाटी को थर्मोपल्ली ऑफ मेवाड़ की संज्ञा दी, वहीं दिवेर के युद्ध को मेवाड़ का मैराथन बताया है।

मेवाड़ के विरुद्ध अंतिम अभियान (1584)

दिसंबर, 1584 को अकबर के आदेश पर जगन्नाथ कछवाहा सेना के साथ राजधानी फतेहपुर सीकरी से उदयपुर के लिए रवाना हुआ।

➣ उसके साथ जाफर बेग, सैयद राजू, वजीर जमाल, शाह सैफउल्लाह, मुहम्मद खान, जान मुहम्मद, शेर बिहारी आदि सभी मनसबदार भी थे।

सितंबर, 1585 को स्थायी निवास नई राजधानी चावंड तक पहुँच गया, किंतु प्रताप अपने परिवार सहित वहाँ से निकल गए थे।

➣ जगन्नाथ भी प्रताप को पकड़े बिना गुजरात होते हुए खाली हाथ अजमेर लौट गया। अकबर को इस असफलता का समाचार सरहिंद में अक्तूबर, 1585 को मिला।

राजधानी चावंड (1885-1615)

चितौड़ पर अभी भी मुगलों का अधिकार था। कुम्भलगढ़ की सुरक्षा की दृष्टि से असुरक्षित देख नई राजधानी बसायी गई।

भामाशाह के सुझाव पर चावंड को सुरक्षा की दृष्टि से उपयुक्त देख प्रताप ने इसे राजधानी बनाने का निर्णय लिया।

चावंड मेवाड़ की राजधानी 1615 ई. तक रही। इसके पश्चात मेवाड़ और मुगलों के मध्य मेवाड़ की संधि (1615 ई.) हुई। जिसके बाद राजधानी पुन: उदयपुर हो गई।

मेवाड़ की स्वतंत्रता (1886 ई.)

➣ चावंड में राजधानी निर्माण का काम भामाशाह को सौंपकर उन्होंने मुगल अधिकारवाले मेवाड़ी भाग पर पुनः आक्रमण करने आरंभ कर दिए।

➣ अकबर पश्चिमोत्तर सीमा पर उलझे रहने के कारण मेवाड़ की ओर से ध्यान हटाने के लिए विवश हो गया।

➣ महाराणा प्रताप को तो इस अनुकूल अवसर का सदैव की तरह लाभ उठाया और जगन्नाथ द्वारा कब्जा किए मेवाड़ी इलाकों को पुनः खाली करवाकर, उन पर अधिकार कर लिया।

कुँवर अमरसिंह ने मेवाड़ के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में स्थापित सभी मुगल थाने एक-एक कर उखाड़ फेंके एंव पिता के आदेश पर मुगल अधिकृत मालपुरा को दो दिनों तक लूटा।

➣ लूट में मिला सारा धन उसने राजधानी चावंड में महाराणा प्रताप को भेंट कर अपने सुयोग्य उत्तराधिकारी होने का प्रमाण दिया।

➣ मालपुरा लूटने के बाद मुगल अधिकृत क्षेत्रों पर आक्रमण करके दंड वसूलना बंद कर दिया। अब अपने सभी हमले मेवाड़ प्रदेश को मुक्त करवाने तक ही सीमित कर दिए।

सन् 1587 में कुँवर अमरसिंह ने अपनी सेना पूर्व की ओर रवाना की। जिसने उदयपुर, देबारी, मोही, मदारिया, दिवेर, मांडल, जहाजपुर आदि स्थानों से मुगल थाने उठाकर सर्वत्र प्रताप की सत्ता स्थापित कर दी।

➣ इसके साथ ही उसने मेवाड़ का संपूर्ण पश्चिमी मैदानी भाग भी स्वतंत्र करवा लिया। इसी प्रकार प्रताप ने लगभग 36 मुगल थानों पर भी अधिकार कर हो गया।

सन् 1586-88 के दो वर्षों में प्रताप ने मेवाड़ के चित्तौड़ और मांडलगढ़ को छोड़कर संपूर्ण पश्चिमी क्षेत्र को मुगलों से मुक्त करवा लिया।

सन् 1589 में अकबर लाहौर में महाराणा प्रताप की इन विजयों के समाचार मिलने पर उसने प्रत्याक्रमण का कोई आदेश नहीं दिया।

मेवाड़ का स्थिरीकरण एंव पुनर्निर्माण

➣ प्रताप ने अपनी नवीन व्यवस्था में एक ओर कुंभलगढ़ से लेकर सराड़ा और छप्पन तक तथा दूसरी ओर गोड़वाड़ से लेकर आसींद और भैंसरोड़गढ़ तक सभी पर्वतीय नाकों पर अपनी सुदृढ़ सैन्य चौकियाँ कायम कर दीं।

➣ प्रताप ने मैदानी भागों को छोड़कर गए कृषकों, उद्यमियों और व्यापारियों को वापस बुला लिया। इससे मेवाड़ के गाँव और कस्बे पुनः आबाद होने लगे थे।

➣ कृषकों ने अपनी-अपनी जमीनों पर खेती शुरू कर दी। उद्योग-धंधे शुरू हो गए। गाँवों में पंचायतें पुनः काम करने लगी। मेवाड़ के मैदानी इलाकों में जागीर व्यवस्था भी पहले की तरह पुनः जीवित हो गई।

➣ सभी बड़ी जागीरें चूँडावतों, झालाओं, राठौड़ों, चौहानों, पँवारों आदि को वापस बहाल कर दी गईं।

➣ चित्तौड़ शाके में शहीद हुए प्रसिद्ध पत्ता के पुत्र सिसोदिया रावत कर्णसिंह को आमेट, अनुज शक्तिसिंह के पुत्र रावत भाणसिंह को भींडर की जागीरें फिर प्रदान की गईं।

राज्य के प्रति मूल्यवान सेवाएँ देनेवाले व्यक्तियों को भी अनेक छोटे-बड़े पट्टे देने के साथ बाहर से आनेवाले किसानों को भी यत्र-तत्र बसाने के लिए पट्टे दिए गए।

मेवाड़ी सेना का भी पुनर्गठन किया गया। जागीरदारों को पूर्ववत् अपनी जागीरों में आय के साथ अपनी-अपनी सेना रखने का दायित्व दिया गया।

➣ प्रताप ने ताराचंद को गोड़वाड़ का हाकिम बनाते हुए उसे ठाकुर उपाधि से सम्मानित किया। यह 1591 में मृत्यु होने तक आयुपर्यंत गोड़वाड़ का प्रशासक रहा।

➣ ताराचंद के आग्रह पर सन् 1588 में विद्वान् जैन साधु हेमरतन सूरि ने गोरा बादल पद्मिनी चउपई की रचना की थी। इसमें अलाउद्दीन खिलजी द्वारा चित्तौड़ आक्रमण के समय गोरा-बादल द्वारा प्रदर्शित वीरता का वर्णन किया गया है।

➣ साहित्य प्रेमी महाराणा प्रताप ने मथुरा के संस्कृत विद्वान् चक्रधर शास्त्री को बुलवाकर ससम्मान अपने पास रखा। उसने राज्याभिषेक पद्धति, मुहूर्तमाला (ज्योतिष शास्त्र ) और विश्ववल्लभ (उद्यान-वानिकी) संस्कृत ग्रंथों की रचना की।

सन् 1586 के बाद से स्थापत्य कला, चित्रकला, साहित्य सृजन आदि प्रवृत्तियों को मिले प्रोत्साहन से चावंड में नवीन युग का सूत्रपात हुआ। चावंड चित्रशैली को चावंड कलम और रागमाला के नाम से जाना जाता है।

➣ महाराणा के समय चित्रकला का इतना विकास हुआ था कि उस विशेष चित्रशैली को ‘चावंड चित्रशैली’ के नाम से जाना जाता था। उनके चित्र आज भी संग्रहालय में मौजूद हैं।

मृत्यु (19 जनवरी, 1597 ई.)

➣ एक दिन प्रातःकाल प्रताप ने कुछ सामंतों और सैनिकों के साथ शिकार के लिए वन की ओर प्रस्थान किया।

➣ हिरण जैसे निरीह शाकाहारी पशुओं के शिकार में रुचि न होने के कारण, वे किसी विशालकाय शूकर अथवा सिंह की खोज कर रहे थे।

➣ एक सामंत ने उन्हें कहीं निकट ही सिंह होने की चेतावनी दी। महाराणा ने भी अपना धनुष उस पर बाण रखकर शरसंधान करने लगे।

➣ उन्होंने पूरी ताकत के साथ धनुष की प्रत्यंचा खींची। बलपूर्वक खींची जाने के कारण प्रत्यंचा विकट शब्द करते हुए टूट गई।

➣ उसके टूटने से पलक झपकते धनुष का एक सिरा पूरे वेग से उछलकर महाराणा के पेट पर लगा। उस भीषण आघात से महाराणा घोड़े से गिर गए।

➣ उन्होंने चावंड लाया गया। महाराणा के पहुँचने पर तत्काल चिकित्सा आरंभ हो गई। किन्तु किसी भी उपचार में सफलता नहीं मिली।

➣ अंतत: राजधानी चावंड में 19 जनवरी, 1597 को 51 वर्ष की आयु में महाराणा प्रताप की मृत्यु हो गई। इस समय अकबर लाहौर में था।

राणा अमर सिंह (1596-1620 ई.)

➣ वह महाराणा प्रताप का पुत्र और उनका उत्तराधिकारी था। अपनी स्वतंत्रता के लिए अमर सिंह ने बादशाह अकबर से साथ युद्ध किया, लेकिन 1599 ई. में वह पराजित हो गया।

➣ कालांतर में अकबर का भी देहांत हो जाने के बाद शाहजादा सलीम जहाँगीर नाम से तख्त पर बैठा। सन् 1605 में उसने अपने दूसरे पुत्र शाहजादा परवेज को 20 हजार अश्वारोही सेना के साथ मेवाड़ के अभियान पर भेजा और अमर के चाचा सगर को भी मुग़ल अधिकृत मेवाड़ का महाराणा घोषित कर दिया।

➣ जहाँगीर द्वारा नियुक्त नाममात्र का महाराणा चित्तौड़ में रहकर मुगल अधिकृत क्षेत्र पर शासन करने लगा, जबकि अमरसिंह चावंड से शेष मेवाड़ पर शासन संचालन कर रहा था।

शाहजादा परवेज, महावत खाँ और अब्दुल्ला खाँ की असफलताओं के बाद 1613 को शाहजादा खुर्रम (शाहजहाँ) को मेवाड़ अभियान के लिए रवाना किया।

➣ मेवाड़ में जबरदस्त राजपूत-मुगल संघर्ष चल रहा था, लेकिन दिन-प्रतिदिन राजपूतों का बल कम होता गया। लेकिन अमरसिंह किसी भी तरह सुलह के लिए तैयार नहीं हुए।

हरदास झाला और शुभकरण पँवार के सुझाव् पर एकमत होकर महाराणा की अनुमति के बगैर ही अपनी ओर से संधि शर्तों के साथ शाहजादा खुर्रम के पास भेज दिया।

➣ संधि की सुचना मिलते ही बादशाह जहाँगीर ने तत्काल सारी शर्तें मानते हुए। संधि के अनुरूप कुँवर कर्णसिंह को दरबार में लाने के लिए सन्देश भेजा।

➣ कहा जाता है कि राणा अमरसिंह इस संधि से अनभिज्ञ थे। किन्तु अपने सामंतो व् सरदारों के दबाव के कारण उन्हें झुकना पड़ा।

मेवाड़ की संधि (1605)

राणा अमरसिंह एंव दिल्ली बादशाह जहाँगीर के मध्य निम्न शर्तों पर संधि हुई-

➣ 1. महाराणा ने जहाँगीर की बादशाहत स्वीकार की।

➣ 2. बादशाह ने महाराणा को अकबर के समय से मुगल आधिपत्य में चले आ रहे चित्तौड़ सहित सारे प्रदेश लौटा दिए।

➣ 3. बादशाह की अनुमति के बगैर चित्तौड़ के दुर्ग की मरम्मत नहीं की जा सकेगी।

➣ 4. महाराणा को बादशाह के दरबार में उपस्थित होने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा। महाराणा का युवराज ही अपनी सेना के साथ बादशाह की सेवा में उपस्थित रहेगा।

➣ 5. राजपूताना के अन्य राजपूत राजाओं की तरह महाराणा को मुगल खानदान के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित करने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा। (इस शर्त के कारण ही मेवाड़ राजघराने की किसी कन्या का बादशाही घराने में विवाह नहीं हुआ।)।

➣ कालान्तर में औरगंजेब की धर्मांध नीतियों के कारण यह संधि टूट गयी।

मुग़ल दरबार में युवराज कर्ण सिंह

➣ अजमेर में बादशाह जहाँगीर बेसब्री से महाराणा के पाटवी कुँवर कर्ण सिंह के आने का इंतजार कर रहा था।

18 फरवरी, 1615 को कुंवर कर्ण सिंह अजमेर पहुंचा। दूसरे दिन शाहजादा खुर्रम कर्णसिंह के साथ मुग़ल दरबार में उपस्थित हुआ।

➣ उस समय इंग्लैंड के सम्राट् जेम्स (प्रथम) का एलची (प्रतिनिधि) सर थॉमस रो भी शाही दरबार में उपस्थित थे । उसने लिखा, बादशाह ने कुँवर कर्ण को कटहरे (सुरक्षा घेरा) के भीतर बुलाया और उसका सिर चूमा।

➣ कर्ण को दुर्लभ 5000 जात और सवार का मनसब दिया गया। कुँवर कर्णसिंह को इतना बड़ा मनसब आरंभ में ही मिल गया था।

21 मई, 1615 को लिखवाए फरमान में कर्णसिंह को इस पाँच हजारी जात और सवार के साथ 5 करोड़, 30 लाख, 6 हजार, 832 दाम की जागीर भी बख्शी।

अंतिम समय

75 वर्ष का मेवाड़-मुगल संघर्ष इस संधि से समाप्त हो गया था। मेवाड़ अब खुशहाली की ओर बढ़ रहा था।

➣ लेकिन शाही खिलअत पहनने और शाहजादे को सलाम करने से राणा अमरसिंह अंदर से बुरी तरह टूट गए। कहा जाता है उन्होंने स्वयं को अमर महल में जैसे कैद कर लिया था।

➣ कुँवर कर्ण के उदयपुर लौटने पर, उसने राज्य का सारा काम-काज उसे सौंपकर संन्यास ले लिया।

➣ संधि के पाँचवें वर्ष, 30 अक्तूबर, 1620, को राणा अमरसिंह की 60 वर्ष की आयु में उदयपुर में मृत्यु हो गई।

➣ अमरसिंह ने बादशाही फौज से कुल 17 लड़ाइयाँ लड़ीं।

महाराणा राजसिंह (1652 – 1680 ई.)

➣ यह मेवाड़ के उत्थान का काल था। राणा राजसिंह ने औरंगजेब से कई बार लोहा लेकर युद्ध में मात दी थी।

➣ उसने अन्य मारवाड़ और आमेर से वैवाहिक संबंध स्थापित किया। महाराणा के प्रयास से आमेर, मारवाड़ और मेवाड़ में गठबंधन बन गया।

वर्ष 1681 ई. में औरंगजेब ने हसनअली ख़ाँ के नेतृत्व मे राणा जयसिंह पर आक्रमण किया। इस युद्ध में दुर्गादास तथा राठौर के सैनिक भी राणा के साथ थे, किन्तु राणा पराजित हो गया।

➣ मेवाड़ मुग़लों के अधिकार में आ गया। शाहज़ादा अकबर को का शासन सौंपा गया। किन्तु कुछ समय बाद ही राणा राजसिंह ने मेवाड़ को स्वतंत्र करा लिया।

➣ कालान्तर में उसके (औरंगज़ेब) तीन पुत्रों अकबर द्वितीय, आजम एवं मुअज्जम ने तीन ओर से मेवाड़ पर आक्रमण किया, परन्तु वे आशिंक सफलता ही प्राप्त कर सके।

राणा जयसिंह (1680 – 1698 ई.)

➣ राणा राजसिंह की मृत्यु के बाद राणा जयसिंह मेवाड़ का शासक हुआ।

➣ 24 जून, 1681 ई. को राणा जयसिंह एवं औरंगज़ेब के मध्य एक संधि हुई। संधि की शर्तों के अनुसार, औरंगज़ेब ने पूरा मेवाड़ जयसिंह को वापस कर दिया गया।

➣ जयसिंह ने राजपूतों पर जज़िया कर हटाने के बदले में औरंगज़ेब को मादलपुर एवं बेदनूर का क्षेत्र दे दिया। जयसिंह को मुग़ल दरबार में 5000 का मनसबदार बनाया गया।

➣ कालान्तर में औरंगज़ेब ने दक्षिण अभियान में जयसिंह के सहयोग देने के काराण उसे बेदनूर और मादलपुर के क्षेत्र वापस कर दिए।

छत्रपति शिवाजी के राज्यभिषेक के समय जब उनके क्षत्रिय होने का प्रमाण माँगा गया था तो उनके सचिव बालाजी आव जी ने शिवाजी का सम्बन्ध मेवाड़ के सिसोदिया वंश से सम्बंध होने के प्रमाण प्रस्तुत किये थे।

📚 Chapters

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    Swipe left/right to change content

    Share This Page

    WhatsApp Telegram