गुप्तोत्तर काल MCQ प्रश्न | UPSC

भारतीय इतिहास प्राचीन भारत गुप्तोत्तर काल MCQ प्रश्न
1. नर्मदा नदी पर सम्राट हर्ष के दक्षिणवर्ती अग्रगमन को रोका-
(a) पुलकेशिन I I ने
(b) पुलकेशिन II ने
(c) विक्रमादित्य I ने
(d) विक्रमादित्य II ने
I.A.S. (Pre) 2003
उत्तर-(b)
हर्षवर्धन ने उत्तर भारत में अपना साम्राज्य स्थापित करने के बाद दक्षिण की ओर विस्तार का प्रयास किया। उसकी विजयों के फलस्वरूप उसके राज्य की दक्षिणी सीमा नर्मदा नदी तक पहुँच गई। उसी समय चालुक्य शासक पुलकेशिन II उत्तर दिशा में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता था। दोनों शक्तियों के टकराव की स्थिति बनी और नर्मदा के तट पर घमासान युद्ध हुआ, जिसमें पुलकेशिन II ने हर्ष को निर्णायक रूप से पराजित किया। इस युद्ध की पुष्टि पुलकेशिन II की प्रसिद्ध ‘ऐहोल प्रशस्ति’ तथा चीनी यात्री ह्वेनसांग के विवरण से होती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऐहोल प्रशस्ति की रचना पुलकेशिन II के दरबारी कवि रविकीर्ति ने की थी और इसे भारतीय इतिहास के प्रमुख अभिलेखीय साक्ष्यों में गिना जाता है। पुलकेशिन II ने इस जीत के उपलक्ष्य में ‘परमेश्वर’ की उपाधि धारण की थी। उल्लेखनीय है कि बाद में पुलकेशिन II को पल्लव शासक नरसिंहवर्मन प्रथम (जिन्हें ‘मामल्ल’ भी कहा जाता है) ने पराजित कर वातापी (बादामी) को नष्ट कर दिया था।
2. ‘हर्षचरित’ नामक पुस्तक किसने लिखी?
(a) आर्यभट्ट
(b) बाणभट्ट
(c) विष्णुगुप्त
(d) परिमलगुप्त
47th B.P.S.C. (Pre) 2005
उत्तर-(b)
‘हर्षचरित’ संस्कृत साहित्य का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक ग्रंथ है, जिसकी रचना हर्षवर्धन के राजकवि बाणभट्ट ने की थी। इस ग्रंथ में हर्षवर्धन के जीवन, उनके पूर्वजों के इतिहास, तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों और सामाजिक जीवन का विस्तृत चित्रण मिलता है। यह पुष्यभूति (वर्धन) वंश का प्रमुख साहित्यिक स्रोत है। बाणभट्ट की एक अन्य विख्यात रचना ‘कादम्बरी’ है जिसे संस्कृत का पहला उपन्यास भी माना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘हर्षचरित’ को संस्कृत गद्य साहित्य की ‘चम्पू’ शैली का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। हर्षवर्धन स्वयं भी एक कवि और नाटककार थे — उन्होंने ‘रत्नावली’, ‘प्रियदर्शिका’ और ‘नागानंद’ नामक तीन संस्कृत नाटकों की रचना की थी, जिनमें नागानंद सर्वाधिक प्रसिद्ध है और इसमें बौद्ध जातक कथाओं का प्रभाव देखा जा सकता है।
3. सम्राट हर्षवर्धन ने दो महान धार्मिक सम्मेलनों का आयोजन किया था-
(a) कन्नौज तथा प्रयाग में
(b) प्रयाग तथा थानेश्वर में
(c) थानेश्वर तथा वल्लभी में
(d) वल्लभी तथा प्रयाग में
U.P.U.D.A./L.D.A. (Pre) 2001
उत्तर-(a)
हर्षवर्धन ने अपने शासनकाल में दो ऐतिहासिक धार्मिक सम्मेलनों का आयोजन किया। पहला सम्मेलन कन्नौज में आयोजित किया गया जिसका उद्देश्य महायान बौद्ध धर्म की श्रेष्ठता को विभिन्न धर्मों के सामने प्रमाणित करना था। इसमें 20 देशों के राजाओं सहित बड़ी संख्या में विद्वान और धर्माचार्य सम्मिलित हुए। इस महासभा की अध्यक्षता चीनी यात्री ह्वेनसांग ने की। दूसरा प्रमुख सम्मेलन प्रयाग (इलाहाबाद) के संगम तट पर प्रति पाँच वर्ष के अंतराल पर ‘महामोक्ष परिषद’ के रूप में आयोजित होता था। ह्वेनसांग स्वयं छठी महामोक्ष परिषद में उपस्थित था जिसमें 18 देशों के राजाओं ने भाग लिया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: प्रयाग की ‘महामोक्ष परिषद’ में हर्ष अपना सारा खजाना दान कर देते थे और अंत में केवल एक पुराना वस्त्र धारण कर लेते थे — इस दानशीलता का उल्लेख ह्वेनसांग ने अत्यंत प्रशंसनीय शब्दों में किया है। हर्ष ने नालंदा विश्वविद्यालय को भी भारी दान और संरक्षण प्रदान किया था; ह्वेनसांग के अनुसार नालंदा में उस समय 10,000 से अधिक छात्र और 1,500 से अधिक शिक्षक थे।
4. मौखरि शासकों की राजधानी थी।
(a) थानेश्वर
(b) कन्नौज
(c) पुरुषपुर
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2011
उत्तर-(b)
मौखरि वंश के शासक मूलतः गुप्त साम्राज्य के सामंत थे और मगध (गया) क्षेत्र से उनका मूल सम्बन्ध था। गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद मौखरि वंश ने अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित की और कन्नौज (कान्यकुब्ज) को अपनी राजधानी बनाया। इस वंश के प्रमुख शासकों में हरिवर्मा, आदित्यवर्मा, ईशानवर्मा, सर्ववर्मा तथा ग्रहवर्मा उल्लेखनीय हैं। ग्रहवर्मा ने हर्षवर्धन की बहन राज्यश्री से विवाह किया था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कन्नौज उत्तर भारत की राजनीति में इतना महत्वपूर्ण हो गया था कि बाद के इतिहास में इसे ‘कन्नौज त्रिभुज संघर्ष’ (Tripartite Struggle) का केंद्र माना जाता है, जिसमें पाल, प्रतिहार और राष्ट्रकूट वंश सदियों तक कन्नौज पर अधिकार के लिए संघर्षरत रहे। ईशानवर्मा प्रथम स्वतंत्र मौखरि शासक थे जिन्होंने ‘महाराजाधिराज’ की उपाधि धारण की।
5. निम्नलिखित शासकों में से किसने हर्षवर्धन को पराजित किया था ?
(a) कीर्तिवर्मन द्वितीय
(b) विक्रमादित्य द्वितीय
(c) पुलकेशिन प्रथम
(d) पुलकेशिन द्वितीय
U.P.P.C.S(Mains) 2016
उत्तर-(d)
चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय ने नर्मदा नदी के तट पर हुए निर्णायक युद्ध में हर्षवर्धन को पराजित किया था। पुलकेशिन II वातापी (वर्तमान बादामी, कर्नाटक) के चालुक्य वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था और उसे दक्षिण का महानतम शासक माना जाता है। उसने इस विजय के फलस्वरूप ‘परमेश्वर’ की उपाधि ग्रहण की। इस युद्ध की ऐतिहासिकता की पुष्टि ‘ऐहोल प्रशस्ति’ और ह्वेनसांग के यात्रा-विवरण से होती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: पुलकेशिन II ने फारस के ससानी सम्राट खुसरो II के दरबार में अपना एक राजदूत भेजा था, और खुसरो ने भी अपना दूत वातापी भेजा — यह घटना भारतीय इतिहास में प्रारंभिक कूटनीतिक संबंधों का उत्कृष्ट उदाहरण है। अजंता की प्रसिद्ध गुफा संख्या 1 में बनी एक भित्ति-चित्र में ईरानी दूत को पुलकेशिन II के दरबार में आते हुए दर्शाया गया है।
6. हर्ष के समय की सूचनाएं किसकी पुस्तकों में निहित हैं?
(a) हरिषेण
(b) कल्हण
(c) कालिदास
(d) इनमें से किसी में नहीं
U.P.P.C.S. (Pre) 1995
उत्तर-(b)
हर्षवर्धन के शासनकाल की विस्तृत जानकारी मुख्यतः उनके राजकवि बाणभट्ट की कृति ‘हर्षचरित’ से प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त कश्मीरी कवि कल्हण द्वारा रचित ‘राजतरंगिणी’ (12वीं शताब्दी) में भी हर्ष से संबंधित कुछ उपयोगी सूचनाएँ उपलब्ध हैं। हरिषेण और कालिदास दोनों हर्ष से पूर्व के काल के हैं — हरिषेण समुद्रगुप्त के दरबारी कवि थे और उन्होंने प्रयाग प्रशस्ति की रचना की, जबकि कालिदास गुप्त काल से संबद्ध हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ (1148–1150 ई.) कश्मीर के इतिहास का सर्वप्रथम व्यवस्थित इतिहास-ग्रंथ है और इसे भारत की पहली ऐतिहासिक काव्य-रचना भी माना जाता है। हर्षवर्धन के शासन की जानकारी के लिए ह्वेनसांग का यात्रा-वृत्तांत ‘सी-यू-की’ (Si-Yu-Ki) भी अत्यंत महत्वपूर्ण विदेशी साक्ष्य है — ह्वेनसांग लगभग 8 वर्षों तक हर्ष के साम्राज्य में रहा था।
7. हर्ष के साम्राज्य की राजधानी थी-
(a) कन्नौज
(b) पाटलिपुत्र
(c) प्रयाग
(d) थानेश्वर
U.P.P.C.S. (Pre) 1993
उत्तर-(a)
हर्षवर्धन ने आरंभ में थानेश्वर (हरियाणा) से शासन किया, किंतु अपनी बहन राज्यश्री को सहायता देने तथा विशाल साम्राज्य के सुचारु प्रशासन हेतु उन्होंने अपनी राजधानी कन्नौज (उत्तर प्रदेश) स्थानांतरित की। चीनी स्रोत यह भी उल्लेख करते हैं कि हर्ष और राज्यश्री दोनों ने मिलकर कन्नौज के राजसिंहासन को संभाला। भौगोलिक दृष्टि से कन्नौज उत्तर भारत के केंद्र में स्थित है, जो प्रशासनिक दृष्टि से बेहद उपयुक्त था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: हर्ष ने अपने शासन में गंगा घाटी के मार्गों पर यात्रियों की सुविधा के लिए धर्मशालाएं और अस्पताल बनवाए, जिनका उल्लेख ह्वेनसांग ने किया है। हर्षवर्धन का साम्राज्य उनकी मृत्यु (647 ई.) के बाद विघटित हो गया; उनके कोई उत्तराधिकारी नहीं था और उनके मंत्री अर्जुन ने सत्ता हथियाने का प्रयास किया, जिसे बाद में चीनी दूत वांग ह्वेन-त्से ने नेपाल और तिब्बती सेनाओं की सहायता से पराजित किया।
8. उत्तर प्रदेश में स्थित वह स्थल जहां हर्षवर्धन ने बौद्ध महासम्मेलन का आयोजन किया था –
(a) काशी
(b) प्रयाग
(c) अयोध्या
(d) सारनाथ
U.P. Lower (Sub.) (Pre) 2004
उत्तर-(b)
हर्षवर्धन ने उत्तर प्रदेश के प्रयाग (आधुनिक प्रयागराज) में गंगा-यमुना-सरस्वती के संगम पर बौद्ध महासम्मेलन का आयोजन किया था। यह सम्मेलन ‘महामोक्ष परिषद’ के नाम से जाना जाता था और प्रत्येक पाँचवें वर्ष आयोजित किया जाता था। इस अवसर पर हर्ष विशाल दान का आयोजन करते थे जिसमें देश-विदेश के राजा, विद्वान और धर्माचार्य भाग लेते थे। चीनी तीर्थयात्री ह्वेनसांग इस परिषद के प्रत्यक्षदर्शी थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: प्रयाग का ‘कुम्भ मेला’ जो आज भी विश्व के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में से एक है, उसकी ऐतिहासिक परम्परा को हर्ष की ‘महामोक्ष परिषद’ से भी जोड़ा जाता है। हर्षवर्धन का धार्मिक दृष्टिकोण व्यापक था — वे शैव, बौद्ध और वैष्णव तीनों धर्मों का सम्मान करते थे; ह्वेनसांग के प्रभाव में आकर उन्होंने महायान बौद्ध धर्म को विशेष संरक्षण दिया।
9. सम्राट हर्ष ने अपनी राजधानी थानेश्वर से कहां स्थानांतरित की थी?
(a) प्रयाग
(b) दिल्ली
(c) कन्नौज
(d) राजगृह
U.P.P.C.S. (Pre) 1992
उत्तर-(c)
हर्षवर्धन के पिता प्रभाकरवर्धन की मृत्यु के बाद उनके बड़े भाई राज्यवर्धन को मालव नरेश देवगुप्त ने छल से मार डाला। इस विकट परिस्थिति में हर्ष ने शासन संभाला और अपनी बहन राज्यश्री को (जिन्हें मौखरि राजा ग्रहवर्मा की मृत्यु के बाद कैद किया गया था) मुक्त कराया। प्रशासनिक सुविधा और मौखरि राज्यश्री को सहयोग देने हेतु हर्ष ने अपनी राजधानी थानेश्वर से कन्नौज स्थानांतरित की। कन्नौज भौगोलिक दृष्टि से उत्तर भारत का केंद्र था और व्यापार मार्गों की दृष्टि से भी सामरिक महत्त्व का नगर था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: थानेश्वर (आधुनिक हरियाणा का कुरुक्षेत्र जिला) वैदिक काल से ही एक महत्त्वपूर्ण धार्मिक स्थल था, क्योंकि कुरुक्षेत्र का युद्ध यहीं हुआ था। हर्षवर्धन पुष्यभूति वंश के थे और उनके राज्याभिषेक के समय उनकी आयु मात्र 16 वर्ष बताई जाती है; उन्होंने लगभग 41 वर्षों तक (606–647 ई.) शासन किया।
10. गुप्त वंश के पतन से लेकर आरंभिक सातवीं शताब्दी में हर्षवर्धन के उत्थान तक
1. मगध के गुप्त 2. मालवा के परमार
3.थानेसर के पुष्यभूति 4. कन्नौज के मौखरि
5. देवगिरि के यादव 6. वल्लभी के मैत्रक
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए। उत्तर भारत में निम्नलिखित में से किन राज्यों का शासन था ?
(a) 1, 2 और 5
(b) 1, 3, 4 और 6
(c) 2, 3 और 4
(d) 5 और 6
I.A.S. (Pre) 2021
उत्तर-(b)
छठी शताब्दी ई. के मध्य में गुप्त साम्राज्य के विघटन के बाद उत्तर भारत में राजनीतिक विकेंद्रीकरण की लहर आई। इस संक्रांतिकाल में निम्नलिखित राज्यों ने उत्तर भारत में प्रमुख भूमिका निभाई: (1) मगध के गुप्त — ये परवर्ती गुप्त शासक थे जो मगध क्षेत्र में सत्ता बनाए रखे; (2) थानेसर के पुष्यभूति — हर्षवर्धन के पूर्वज जो उत्तरी भारत में शक्तिशाली हुए; (3) कन्नौज के मौखरि — उत्तर प्रदेश क्षेत्र में प्रभावशाली शासक वंश; (4) वल्लभी के मैत्रक — सौराष्ट्र (गुजरात) क्षेत्र के शासक। मालवा के परमार बाद के काल (9वीं-10वीं सदी) से संबंधित हैं और देवगिरि के यादव दक्षिण के थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वल्लभी (सौराष्ट्र) का मैत्रक वंश अपने समय में शिक्षा और व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र था। वल्लभी में भी एक प्रसिद्ध बौद्ध विश्वविद्यालय था जिसे नालंदा के समकक्ष माना जाता था। परवर्ती गुप्त शासकों में माधवगुप्त उल्लेखनीय हैं जो हर्षवर्धन के मित्र एवं सहयोगी थे और मगध पर शासन करते थे।
11. चीनी यात्री ह्वेनसांग ने किस विश्वविद्यालय में अध्ययन किया था ?
(a) तक्षशिला
(b) विक्रमशिला
(c) मगध
(d) नालंदा
U.P.P.C.S. (Pre) 1995
46th B.P.S.C. (Pre) 2003
उत्तर-(d)
चीनी तीर्थयात्री ह्वेनसांग 637 ई. में नालंदा विश्वविद्यालय पहुँचा, जो उस समय एशिया का सर्वाधिक प्रतिष्ठित शिक्षा केंद्र था। उस समय विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य शीलभद्र थे। ह्वेनसांग ने लगभग डेढ़ वर्ष तक नालंदा में निवास कर योगशास्त्र और बौद्ध दर्शन का गहन अध्ययन किया। इसके पश्चात् वह बंगाल, उड़ीसा, धान्यकटक होते हुए कांची तक गया। अपनी दूसरी यात्रा में वह पुनः नालंदा लौटा और वहाँ व्याख्यान भी दिए।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम (5वीं सदी) के काल में हुई थी। ह्वेनसांग के अनुसार नालंदा में उस समय लगभग 10,000 छात्र और 1,500 से अधिक शिक्षक थे तथा यहाँ प्रवेश के लिए एक कठिन द्वारपंडित परीक्षा उत्तीर्ण करनी पड़ती थी — जिसमें केवल 20% आवेदक ही सफल होते थे।
12. भारत की यात्रा करने वाले चीनी यात्री युआन च्वांग (ह्वेनसांग) ने तत्कालीन भारत की सामान्य दशाओं और संस्कृति का वर्णन किया है। इस संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. सड़क और नदी-मार्ग लूटमार से पूरी तरह सुरक्षित थे।
2.जहां तक अपराधों के लिए दंड का प्रश्न है, अग्नि, जल व विष द्वारा सत्यपरीक्षा किया जाना ही किसी भी व्यक्ति की निर्दोषिता अथवा दोष के निर्णय के साधन थे।
3. व्यापारियों को नौघाटों और नौकाओं पर शुल्क देना पड़ता था। नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए ।
(a) केवल 1
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
I.A.S. (Pre) 2013
उत्तर-(b)
ह्वेनसांग के यात्रा-वृत्तांत ‘सी-यू-की’ के अनुसार कथन (1) असत्य है, क्योंकि उसने स्वयं यात्रा के दौरान कई बार लुटेरों और चोर-डाकुओं का सामना किया था; मार्ग पूर्णतः सुरक्षित नहीं थे। कथन (2) सत्य है — न्याय-निर्णय के लिए अग्नि, जल एवं विष द्वारा ‘दिव्य परीक्षा’ का प्रचलन था। कथन (3) भी सत्य है — व्यापारियों को नौघाटों, बाज़ारों और व्यापारिक मार्गों पर विभिन्न प्रकार के कर चुकाने पड़ते थे, जो राज्य की आय का प्रमुख स्रोत था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ह्वेनसांग के विवरण से पता चलता है कि हर्षकालीन भारत में भूमि कर उपज का 1/6 भाग होता था तथा राज्य की आय को चार भागों में बाँटा जाता था — राजकाज, विद्वानों का वेतन, धार्मिक कार्य और दान। ह्वेनसांग ने यह भी लिखा कि हर्ष के राज्य में मृत्युदंड नहीं दिया जाता था और अपराधियों को कारागार में बंद किया जाता था।
13. चालुक्य शासक पुलकेशिन की हर्ष पर विजय का वर्ष था-
(a) 612 ई.
(b) 618 ई.
(c) 622 ई.
(d) 634 ई.
Jharkhand P.C.S. (Pre) 2016
उत्तर-(b)
हर्ष और पुलकेशिन द्वितीय के बीच नर्मदा के तट पर हुए ऐतिहासिक युद्ध की तिथि विद्वानों में विवादास्पद रही है। इतिहासकार अल्टेकर के अनुसार यह युद्ध 630 से 634 ई. के बीच हुआ, क्योंकि 634 ई. की ‘ऐहोल प्रशस्ति’ में इस युद्ध का उल्लेख है, किंतु 630 ई. के लोहनारा अभिलेख में हर्ष का नाम पुलकेशिन के शत्रुओं में नहीं है। परंतु अप्रैल 2016 में भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट (BORI) के शोधकर्ताओं ने एक ताम्रपत्र के आधार पर यह निष्कर्ष दिया कि यह युद्ध 618 ई. में हुआ था। इंपीरियल गजेटियर ऑफ इंडिया इसे लगभग 620 ई. का मानता है। झारखंड लोक सेवा आयोग ने भी 618 ई. को सही उत्तर माना है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऐहोल प्रशस्ति को पुलकेशिन II के दरबारी कवि रविकीर्ति ने संस्कृत में लिखा था। इसमें पुलकेशिन की तुलना सीधे कालिदास से की गई है। यह प्रशस्ति न केवल हर्ष पर विजय का, बल्कि पल्लव, कदंब, गंग और अलुप जैसे अनेक राजवंशों पर पुलकेशिन की विजयों का भी उल्लेख करती है।
14. आज भी भारत में ह्वेनसांग को याद करने का मुख्य कारण है-
(a) हर्ष के प्रति सम्मान
(b) नालंदा में अध्ययन
(c) बौद्ध धर्म में आस्था
(d) सी-यू-की की रचना
R.A.S. / R.T.S. (Pre) 1992
उत्तर-(d)
ह्वेनसांग को भारत में आज भी मुख्यतः उनकी यात्रा पर आधारित ग्रंथ ‘सी-यू-की’ (Si-Yu-Ki अर्थात् ‘पश्चिमी देशों का वृत्तांत’) के कारण स्मरण किया जाता है। इस ग्रंथ में उन्होंने सातवीं शताब्दी के भारत की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक स्थिति का अत्यंत सजीव विवरण प्रस्तुत किया है। यह ग्रंथ हर्षकालीन भारत के इतिहास के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विदेशी साक्ष्यों में से एक है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘सी-यू-की’ के अतिरिक्त ह्वेनसांग की जीवनी ‘ह्वेनसांग की जीवनकथा’ उनके शिष्य ह्वेली ने लिखी थी, जो भी भारतीय इतिहास का उपयोगी स्रोत है। उल्लेखनीय है कि ह्वेनसांग से पूर्व फाह्यान (चंद्रगुप्त II के काल में, 399–414 ई.) और बाद में इत्सिंग (7वीं सदी के उत्तरार्ध में) भी भारत आए — तीनों के विवरण मिलकर गुप्तकाल से हर्षकाल तक के भारत की एक विस्तृत तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।
15. हर्ष के दरबार में ह्वेनसांग को एक दूत के रूप में किसने भेजा था ?
(a) ताई सुंग
(b) तुंग-कुआन
(c) कू येन-वू
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
U.P.P.C.S. (Pre) 2007
उत्तर-(d)
ह्वेनसांग को हर्ष के दरबार में किसी ने दूत के रूप में नहीं भेजा था — वे स्वयं की इच्छा और बौद्ध धर्म के प्रति श्रद्धावश भारत आए थे। वे चीन के तांग वंशी शासक ताई सुंग के काल के नागरिक थे, किंतु उस समय तुर्क आक्रमणों के भय से पश्चिम में विदेश यात्रा पर प्रतिबंध था। इसके बावजूद ह्वेनसांग ने 629 ई. में चंगन से स्वतंत्र रूप से यात्रा प्रारंभ की। भारत से लौटने पर सम्राट ताई सुंग ने उन्हें दंडित करने के बजाय सम्मानित किया और अपना आध्यात्मिक सलाहकार नियुक्त किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: हर्षवर्धन ने चीन के तांग शासक ताई सुंग के दरबार में अपना एक राजदूत भेजा था, और बदले में ताई सुंग ने भी वांग ह्वेन-त्से को भारत भेजा — यह भारत-चीन के बीच प्रारंभिक कूटनीतिक संपर्क का उल्लेखनीय उदाहरण है। हर्ष की मृत्यु के बाद वांग ह्वेन-त्से ने नेपाल और तिब्बती सेनाओं की मदद से हर्ष के विद्रोही मंत्री अर्जुन को पराजित भी किया।
16. ह्वेनसांग किसके शासनकाल में भारत आया था ?
(a) चंद्रगुप्त II
(b) सम्राट हर्ष
(c) चंद्रगुप्त मौर्य
(d) चंद्रगुप्त I
U.P.P.C.S. (Pre) 1990
U.P.P.C.S. (Mains) 2012
उत्तर-(b)
प्रसिद्ध चीनी बौद्ध यात्री ह्वेनसांग सम्राट हर्षवर्धन (शासनकाल: 606–647 ई.) के समय में भारत आया था। उनका मुख्य उद्देश्य महात्मा बुद्ध से जुड़े पवित्र स्थलों का दर्शन करना और मूल बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन करना था। उन्होंने 629 ई. में चीन की राजधानी चंगन से प्रस्थान किया और भारत प्रवास के दौरान अपने अनुभवों को ‘सी-यू-की’ नामक ग्रंथ में लिपिबद्ध किया, जो आज भी तत्कालीन भारत के इतिहास का अमूल्य विदेशी स्रोत है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ह्वेनसांग ने भारत में लगभग 14-15 वर्ष (629–645 ई. के आसपास) बिताए और इस दौरान उन्होंने 657 बौद्ध ग्रंथ एकत्र कर चीन लाए, जिनके अनुवाद में उन्होंने शेष जीवन लगाया। उनसे पहले फाह्यान चंद्रगुप्त II विक्रमादित्य (गुप्तकाल) के समय 399–414 ई. में भारत आया था और उन्होंने ‘फो-क्वो-की’ नामक यात्रा-ग्रंथ लिखा था।
17. निम्नलिखित शासकों में से किसने हर्षवर्धन को पराजित किया था ?
(a) कीर्तिवर्मन द्वितीय
(b) विक्रमादित्य द्वितीय
(c) पुलकेशिन प्रथम
(d) पुलकेशिन द्वितीय
U.P.P.C.S(Mains) 2016
उत्तर-(d)
वातापी (बादामी) के चालुक्य वंश के सर्वाधिक शक्तिशाली शासक पुलकेशिन द्वितीय ने नर्मदा के तट पर हुए युद्ध में हर्षवर्धन को पराजित किया था। यह पराजय हर्ष के लिए उनके पूरे शासनकाल की सबसे बड़ी सैन्य विफलता थी। पुलकेशिन II ने इस विजय के उपलक्ष्य में ‘परमेश्वर’ की उपाधि ग्रहण की। इस युद्ध की प्रामाणिकता 634 ई. की ‘ऐहोल प्रशस्ति’ और ह्वेनसांग के यात्रा-विवरण से सिद्ध होती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: पुलकेशिन II ने दक्षिण भारत में भी अपना प्रभाव स्थापित किया था और ‘दक्षिणापथेश्वर’ की उपाधि धारण की। किंतु उनके जीवन का अंत दुखद रहा — पल्लव नरेश नरसिंहवर्मन प्रथम ‘मामल्ल’ ने लगभग 642 ई. में पुलकेशिन II को पराजित कर उनकी राजधानी वातापी को नष्ट कर दिया, जिस कारण नरसिंहवर्मन को ‘वातापिकोण्ड’ की उपाधि मिली।
18. ‘कौशेय’ शब्द का प्रयोग किया गया है-
(a) कपास के लिए
(b) सन के लिए
(c) रेशम के लिए
(d) ऊन के लिए
U.P.P.C.S. (Spl) (Mains) 2008
उत्तर-(c)
गुप्त एवं गुप्तोत्तर काल में रेशम के लिए संस्कृत में ‘कौशेय‘ शब्द का प्रयोग किया जाता था। इसी प्रकार कपास को ‘कार्पासिक’, ऊन को ‘और्ण’ तथा सन को ‘क्षौम’ कहा जाता था। भारत में रेशम उद्योग अत्यंत प्राचीन है और रेशमी वस्त्रों का व्यापार ‘रेशम मार्ग’ (Silk Route) के माध्यम से मध्य एशिया और चीन तक होता था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ह्वेनसांग के अनुसार उस काल में वाराणसी रेशमी वस्त्रों के उत्पादन के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध था, जबकि मथुरा सूती वस्त्रों का प्रमुख केंद्र था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी विभिन्न प्रकार के वस्त्रों — पट्टवस्त्र (रेशम), दुकूल (बंगाल का रेशम), क्षौम (लिनेन) — का विस्तार से उल्लेख मिलता है।
19. कवि बाण, निवासी था-
(a) पाटलिपुत्र का
(b) थानेश्वर का
(c) भोजपुर का
(d) उपर्युक्त में कोई नहीं
41st B.P.S.C. (Pre) 1996
उत्तर-(d)
‘हर्षचरित’ और ‘कादम्बरी’ के रचयिता महाकवि बाणभट्ट का जन्म बिहार में सोन नदी के तट पर स्थित प्रीथिकूटा (प्रीतिकूट) नामक ग्राम में हुआ था — यह स्थान पाटलिपुत्र, थानेश्वर या भोजपुर में से किसी में नहीं आता, इसलिए सही उत्तर विकल्प (d) है। उनके पिता का नाम चित्रभानु और माता का नाम राजदेवी था। बाणभट्ट बचपन में ही अनाथ हो गए थे और उन्होंने अपने जीवन के प्रारंभिक वर्ष भटकते हुए बिताए।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बाणभट्ट की कृति ‘कादम्बरी’ को संस्कृत साहित्य का प्रथम गद्य उपन्यास माना जाता है। यह ग्रंथ बाणभट्ट पूर्ण नहीं कर पाए और उनके पुत्र भूषणभट्ट ने इसे पूरा किया। ‘हर्षचरित’ को संस्कृत की ‘चम्पू’ (गद्य-पद्य मिश्रित) शैली का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है, जो इतिहास और साहित्य दोनों दृष्टियों से अमूल्य है।
20. ह्वेनसांग की भारत में यात्रा के समय सूती कपड़ों के उत्पादन के लिए सबसे प्रसिद्ध नगर था-
(a) वाराणसी
(b) मथुरा
(c) पाटलिपुत्र
(d) कांची
41st B.P.S.C. (Pre) 1996
उत्तर-(b)
चीनी यात्री ह्वेनसांग के विवरण के अनुसार, हर्षकाल (7वीं शताब्दी) में मथुरा सूती वस्त्रों के उत्पादन के लिए सबसे प्रसिद्ध नगर था। वहीं वाराणसी रेशमी वस्त्रों (कौशेय) के लिए जाना जाता था। ह्वेनसांग ने यह भी उल्लेख किया कि थानेश्वर नगर की समृद्धि का मूल कारण उसका व्यापार था। इस काल में कन्नौज और उज्जयिनी भी आर्थिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध नगर थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मथुरा केवल वस्त्र उद्योग ही नहीं, बल्कि कला के क्षेत्र में भी विश्वप्रसिद्ध था। मथुरा कला शैली (कुषाण काल में विकसित) ने बुद्ध और जैन तीर्थंकरों की मूर्तिकला को एक नई दिशा दी थी। बाणभट्ट ने अपनी रचनाओं में थानेश्वर को व्यापारियों की दृष्टि से ‘लाल भूमि’ और अतिथियों के लिए ‘चिंतामणि भूमि’ कहा है।
21. हर्षवर्धन के शासनकाल में किस चीनी यात्री ने भारत की यात्रा की थी ?
(a) फाह्यान
(b) ह्वेनसांग
(c) इत्सिंग
(d) तारानाथ
56th to 59th B.P.S.C. (Pre) 2015
उत्तर-(b)
हर्षवर्धन के शासनकाल (606–647 ई.) में चीनी यात्री ह्वेनसांग (युआन च्वांग) ने भारत की यात्रा की थी। फाह्यान गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त II के काल में भारत आया था (399–414 ई.), इत्सिंग 7वीं सदी के उत्तरार्ध में नालंदा आया था तथा तारानाथ एक तिब्बती इतिहासकार थे जो बौद्ध धर्म के इतिहास-लेखन के लिए जाने जाते हैं। ह्वेनसांग का यात्रा-ग्रंथ ‘सी-यू-की’ हर्षकालीन भारत का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विदेशी साक्ष्य है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तीनों प्रमुख चीनी यात्रियों की भारत यात्रा का स्मरण-सूत्र इस प्रकार है — फाह्यान → गुप्तकाल (चंद्रगुप्त II), ह्वेनसांग → हर्षकाल, इत्सिंग → हर्षोत्तर काल। इत्सिंग ने भी नालंदा में अध्ययन किया और अपनी यात्रा में उसने 56 भारतीय राज्यों का वर्णन किया है। तारानाथ की रचना ‘कंग्युर’ और ‘तंग्युर’ तिब्बती बौद्ध साहित्य के महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं।
20. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-
(1) चीनी तीर्थयात्री फाह्यान ने कनिष्क द्वारा आयोजित की गई चतुर्थ महान बौद्ध परिषद में भाग लिया।
(2) चीनी तीर्थयात्री ह्वेनसांग, हर्ष से मिला और उसे बौद्ध धर्म का प्रतिरोधी पाया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) दोनों 1 और 2
(d) न ही 1 और न ही 2
I.A.S. (Pre) 2004
उत्तर-(d)
दोनों कथन असत्य हैं। कथन (1) गलत है क्योंकि फाह्यान गुप्त शासक चंद्रगुप्त II के काल में (399–414 ई.) भारत आया था — वह कनिष्क के काल से लगभग तीन शताब्दी बाद का था, अतः चतुर्थ बौद्ध संगीति (जो लगभग प्रथम शताब्दी ई. में कश्मीर में हुई) में उसकी उपस्थिति असंभव है। कथन (2) भी गलत है क्योंकि हर्षवर्धन ह्वेनसांग से मिलने से पहले ही बौद्ध धर्म के प्रति झुकाव रखते थे। ह्वेनसांग से भेंट के बाद उन्होंने महायान बौद्ध धर्म को राज्याश्रय दिया और पूर्ण बौद्ध बन गए — वे बौद्ध धर्म के प्रतिरोधी नहीं, बल्कि उसके प्रबल संरक्षक थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बौद्ध धर्म की चार महासंगीतियाँ क्रमशः राजगृह (अजातशत्रु काल), वैशाली (कालाशोक काल), पाटलिपुत्र (अशोक काल) और कश्मीर (कनिष्क काल) में हुईं। हर्षवर्धन ने मांस-भक्षण और पशु-बलि पर प्रतिबंध लगाया था तथा अपने साम्राज्य में बौद्ध स्तूपों और विहारों के निर्माण को प्रोत्साहन दिया।
23. नालंदा विश्वविद्यालय के विनाश का कारण था-
(a) मुसलमान
(b) कुषाण
(c) सीथियन्स
(d) मुगल
43rd B.P.S.C. (Pre) 1999
उत्तर-(a)
नालंदा विश्वविद्यालय को 1193 ई. में बख्तियार खिलजी के नेतृत्व में तुर्क मुस्लिम आक्रमणकारियों ने नष्ट किया था। बख्तियार खिलजी दिल्ली सल्तनत के कुतुबुद्दीन ऐबक का सेनानायक था। आक्रमणकारियों ने नालंदा के विशाल पुस्तकालय — जिसे ‘धर्मगंज’ कहा जाता था और जिसमें लाखों बौद्ध पांडुलिपियाँ थीं — में आग लगा दी। यह विध्वंस भारत में बौद्ध धर्म के पतन का एक निर्णायक कारण बना। तिब्बती ग्रंथों के अनुसार पुस्तकालय की आग इतनी भीषण थी कि वह कई महीनों तक जलती रही।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: नालंदा के अतिरिक्त बख्तियार खिलजी ने विक्रमशिला और उदंतपुरी बौद्ध विश्वविद्यालयों को भी नष्ट किया। आधुनिक समय में नालंदा विश्वविद्यालय को 2010 में भारत सरकार द्वारा पुनः स्थापित किया गया और 2014 में यह कार्यात्मक हुआ; साथ ही नालंदा के पुरातात्विक अवशेषों को 2016 में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया।
24. चीनी यात्री जिसने भीनमाल की यात्रा की थी-
(a) फाह्यान
(b) सुंगयुन
(c) ह्वेनसांग
(d) इत्सिंग
R.A.S. / R.T.S. (Pre) 2007
उत्तर-(c)
चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपनी भारत यात्रा के दौरान भीनमाल (वर्तमान राजस्थान के जालोर जिले में स्थित) की यात्रा की थी। भीनमाल उस काल में गुर्जरदेश की राजधानी था। ह्वेनसांग को ‘यात्रियों का राजकुमार’ कहा जाता है और उनके यात्रा-विवरण को ‘सी-यू-की’ के नाम से जाना जाता है। ह्वेनसांग हर्षवर्धन के समय भारत आया और बौद्ध धर्म के प्रति उनकी गहरी आस्था थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: भीनमाल उस काल में न केवल राजनीतिक बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण था — प्रसिद्ध गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री ब्रह्मगुप्त (628 ई. में ‘ब्राह्मस्फुटसिद्धांत’ के रचयिता) का संबंध भीनमाल से ही था। ब्रह्मगुप्त ने शून्य और ऋणात्मक संख्याओं के नियमों को पहली बार व्यवस्थित रूप में प्रतिपादित किया था।
25. कथन (a) : सामंतवाद का विकास गुप्तोत्तर काल की कृषक-संरचना की प्रमुख विशेषता थी।
कारण (R) : इस काल में भू-स्वामी मध्यस्थ वर्ग एवं आश्रित कृषक वर्ग अस्तित्व में आया। नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए-

(a) (a) तथा (R) दोनों सही हैं तथा (R), (a) की सही व्याख्या है।

(b) (a) तथा (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (a) की सही व्याख्या नहीं है।

(c) (a) सही है, परंतु (R) गलत है।

(d) (a) गलत है, परंतु (R) सही है।
U.P.P.C.S. (Spl) (Mains) 2004
उत्तर-(a)
कथन (A) और कारण (R) दोनों सत्य हैं और कारण (R), कथन (A) की सटीक व्याख्या करता है। गुप्तोत्तर काल में केंद्रीय सत्ता के कमजोर पड़ने से सामंतवाद का उदय हुआ। राजाओं ने अपने सेवकों, सैनिकों और ब्राह्मणों को नकद वेतन के स्थान पर भूमि-अनुदान देना प्रारंभ किया। इससे एक शक्तिशाली भू-स्वामी मध्यस्थ वर्ग का उदय हुआ जो सीधे खेती न करके कृषकों से राजस्व वसूलता था। इन पर निर्भर आश्रित कृषक वर्ग की स्वतंत्रता सीमित होती गई, जो भारतीय सामंतवाद की मूल संरचना बनी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: भारतीय सामंतवाद पर इतिहासकारों में मतभेद है — D.D. कोसाम्बी और R.S. शर्मा ने इसे यूरोपीय सामंतवाद के समकक्ष माना, जबकि B.D. चट्टोपाध्याय ने इसे भिन्न बताया। गुप्तोत्तर काल में भूमि-अनुदान के साक्ष्य ताम्रपत्र अभिलेखों की अत्यधिक वृद्धि से भी मिलते हैं।
26. ‘सी-यू-की’ नामक यात्रा विवरण निम्नलिखित में से किससे जुड़ा है ?
(a) फाह्यान
(b) अलबरुनी
(c) मेगस्थनीज
(d) ह्वेनसांग
U.P.P.C.S(Mains) 2016
उत्तर-(d)
‘सी-यू-की’ (Si-Yu-Ki) अर्थात् ‘पश्चिमी देशों का वृत्तांत’ चीनी यात्री ह्वेनसांग द्वारा रचित यात्रा-विवरण है। इसमें 7वीं शताब्दी के भारत की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक स्थिति का विस्तृत एवं प्रामाणिक वर्णन मिलता है। फाह्यान का यात्रा-ग्रंथ ‘फो-क्वो-की’, मेगस्थनीज का ‘इंडिका’ तथा अलबरुनी का ‘किताब-उल-हिंद’ हैं — ये तीनों अलग-अलग ग्रंथ हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: प्रमुख विदेशी यात्रियों और उनके ग्रंथों का स्मरण-सूत्र: मेगस्थनीज → इंडिका (मौर्यकाल), फाह्यान → फो-क्वो-की (गुप्तकाल), ह्वेनसांग → सी-यू-की (हर्षकाल), अलबरुनी → किताब-उल-हिंद (महमूद गजनवी काल)। इनमें से अलबरुनी ने संस्कृत सीखकर भारतीय ग्रंथों का अध्ययन किया और उन्हें भारत का पहला तुलनात्मक अध्येता माना जाता है।
27. गुप्तोत्तर युग में प्रमुख व्यापारिक केंद्र था-
(a) कन्नौज
(b) उज्जैन
(c) धार
(d) देवगिरी
R.A.S./R.T.S. (Pre) 1993
उत्तर-(a)
गुप्तकाल में उज्जैन व्यापार का प्रमुख केंद्र था और चंद्रगुप्त II ने इसे अपनी द्वितीय राजधानी भी बनाया था। परंतु गुप्तोत्तर काल में व्यापार का केंद्र उज्जैन से हटकर कन्नौज हो गया। इसके दो प्रमुख कारण थे — पहला, हर्षवर्धन ने कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया, जिससे यह राजनीतिक और व्यापारिक केंद्र बन गया; दूसरा, कन्नौज की गंगा-यमुना दोआब में रणनीतिक स्थिति ने इसे उत्तर भारत के सबसे महत्त्वपूर्ण व्यापारिक मार्गों का केंद्र बना दिया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कन्नौज की सामरिक और आर्थिक महत्ता इतनी अधिक थी कि 8वीं से 10वीं शताब्दी के बीच पाल, प्रतिहार और राष्ट्रकूट वंश — तीनों इस पर अधिकार के लिए लगातार संघर्षरत रहे, जिसे इतिहास में ‘त्रिपक्षीय संघर्ष’ (Tripartite Struggle) कहा जाता है। इस संघर्ष में अंततः प्रतिहार वंश कन्नौज पर अधिकार करने में सफल हुआ।
28. निम्नलिखित में से कौन-सा उपवाक्य, उत्तर हर्ष-कालीन स्रोतों में प्रायः उल्लिखित ‘हुंडी’ के स्वरूप की परिभाषा बताता है?

(a) राजा द्वारा अपने अधीनस्थों को दिया गया परामर्श

(b) प्रतिदिन का लेखा-जोखा अंकित करने वाली बही

(c) विनिमय-पत्र

(d) सामन्त द्वारा अपने अधीनस्थों को दिया गया आदेश
I.A.S. (Pre) 2020
उत्तर-(c)
‘हुंडी’ भारत की प्राचीन साख-पत्र प्रणाली का एक महत्त्वपूर्ण उपकरण था, जिसे आधुनिक शब्दावली में ‘विनिमय-पत्र’ (Bill of Exchange) कहते हैं। जब कोई व्यापारी नकद भुगतान के स्थान पर भविष्य में एक निश्चित तिथि पर भुगतान का आश्वासन देता था, तो यह हुंडी के रूप में लिखित दस्तावेज प्रस्तुत किया जाता था। यह प्रणाली दूरस्थ व्यापार को सुरक्षित और सुविधाजनक बनाती थी क्योंकि व्यापारियों को लंबी यात्राओं में नकद धन साथ नहीं ले जाना पड़ता था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: हुंडी प्रणाली भारत में अत्यंत प्राचीन है और कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी ऐसी साख-पत्र व्यवस्था का उल्लेख मिलता है। मध्यकाल में राजस्थान के मारवाड़ी व्यापारियों ने इस हुंडी प्रणाली को पूरे भारत और विदेशों तक फैलाया। आधुनिक भारत में हुंडी का स्थान Negotiable Instruments Act, 1881 के अंतर्गत विनियमित विनिमय-पत्रों ने लिया।
29. भारत में सबसे प्राचीन विहार है-
(a) नालंदा
(b) उदंतपुरी
(c) विक्रमशिला
(d) भाजा
R.A.S./R.T.S. (Pre) 1992
उत्तर-(a)
दिए गए विकल्पों में नालंदा भारत का सबसे प्राचीन विहार है। इसकी स्थापना 5वीं शताब्दी के मध्य गुप्त काल में हुई। सर्वप्रथम कुमारगुप्त प्रथम ने नालंदा बौद्ध विहार को भूमि-दान दिया। तत्पश्चात् बुधगुप्त, तथागतगुप्त एवं बालादित्य सहित कई गुप्त शासकों ने इसे संरक्षण और दान प्रदान किया। उदंतपुरी और विक्रमशिला की स्थापना पालकाल में हुई, जो नालंदा से काफी बाद का है। भाजा एक बौद्ध गुफा स्थल है, विहार नहीं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: नालंदा में शिक्षा पूर्णतः निःशुल्क थी और छात्रों के भोजन-आवास की व्यवस्था दान से होती थी। इसके पुस्तकालय में तीन भवन थे जिन्हें रत्नसागर, रत्नोदधि और रत्नरंजक कहा जाता था। विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना पाल शासक धर्मपाल ने 8वीं शताब्दी में की थी और यह तंत्रयान बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र था।
30. चीनी यात्री इत्सिंग ने बिहार का भ्रमण किया, लगभग-
(a) 405 ई. में
(b) 635 ई. में
(c) 637 ई. में
(d) उपर्युक्त में कोई नहीं
40th B.P.S.C. (Pre) 1995
उत्तर-(d)
चीनी यात्री इत्सिंग ने 671 से 695 ई. के बीच भारत की यात्रा की, जो दिए गए किसी भी विकल्प से मेल नहीं खाती — इसीलिए सही उत्तर (d) है। इत्सिंग ने 37 बौद्ध सहयोगियों के साथ यात्रा का संकल्प लिया था, किंतु अंततः वे अकेले ही कैंटन से जहाज द्वारा रवाना हुए। वे दक्षिण के समुद्री मार्ग से भारत आए और सुमात्रा होते हुए वापस चीन लौटे। उन्होंने नालंदा में अध्ययन किया और अपनी यात्रा में 56 भारतीय राज्यों का विवरण प्रस्तुत किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इत्सिंग ने अपनी यात्रा में श्रीविजय साम्राज्य (सुमात्रा) का उल्लेख किया है, जो 7वीं शताब्दी में दक्षिण-पूर्व एशिया का शक्तिशाली बौद्ध राज्य था। इत्सिंग के विवरण से पता चलता है कि उस काल में भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच समुद्री व्यापार और बौद्ध धर्म का प्रसार दोनों एक साथ होते थे।
31. नालंदा कहां पर स्थित है? उत्तर प्रदेश
(a) मध्य प्रदेश
(b) आंध्र प्रदेश
(c)
(d) बिहार
M.P.P.C.S. (Spl.) (Pre) 2003
उत्तर-(d)
नालंदा बिहार राज्य में राजगीर के निकट स्थित है। यह पटना से लगभग 95 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में स्थित है। प्राचीन काल में यह मगध साम्राज्य का भाग था। गुप्त काल में यहाँ भव्य बौद्ध विश्वविद्यालय की स्थापना हुई, जो कई शताब्दियों तक एशिया का सर्वोच्च शिक्षा केंद्र बना रहा। इसके पुरातात्विक अवशेष आज भी बिहार में देखे जा सकते हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: नालंदा के पास स्थित राजगीर (राजगृह) मगध की प्रारंभिक राजधानी तथा प्रथम बौद्ध संगीति का स्थल भी है। नालंदा जिले में ही पावापुरी स्थित है, जहाँ भगवान महावीर को निर्वाण प्राप्त हुआ था — अतः यह जैन धर्म का भी अत्यंत पवित्र स्थल है। नालंदा के पुरातात्विक अवशेषों की खुदाई सर्वप्रथम अलेक्जेंडर कनिंघम और बाद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने की थी।
32. सही जोड़े बनाइए तथा नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए :

(a) भोज (1) उज्जैन

(b) दुर्गावती (2) विदिशा

(c) समुद्रगुप्त (3) धार

(d) अशोक (4) गोंडवाना
कूट :

(A) (B) (C) (D)

(a) (4) (3) (2) (1)

(b) (3) (4) (1) (2)

(c) (4) (3) (1) (2)

(d) (3) (4) (2) (1)
M.P.P.C.S. (Pre) 2008
उत्तर-(d)
सही सुमेलन इस प्रकार है: राजा भोज परमार वंश के महान शासक थे जिनकी राजधानी धार (मध्य प्रदेश) थी — वे स्वयं विद्वान थे और उन्होंने ‘सरस्वती कंठाभरण’ जैसे ग्रंथ लिखे। रानी दुर्गावती गोंड राजवंश की वीर शासिका थीं जो गोंडवाना क्षेत्र पर शासन करती थीं। समुद्रगुप्त का संबंध विदिशा (प्राचीन भीलसा) से है जो गुप्त साम्राज्य का महत्त्वपूर्ण केंद्र था। अशोक का संबंध उज्जैन से है — मौर्य सम्राट बनने से पहले वे उज्जैन के राज्यपाल थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:राजा भोज ने धार में एक विशाल संस्कृत पाठशाला की स्थापना की थी जो ‘भोजशाला’ के नाम से आज भी प्रसिद्ध है। रानी दुर्गावती ने 1564 ई. में अकबर के सेनापति आसफ खाँ से युद्ध करते हुए वीरगति प्राप्त की — उनकी स्मृति में जबलपुर में एक विश्वविद्यालय को उनका नाम दिया गया है।
33. निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा आठवीं शताब्दी के संत शंकराचार्य के बारे में सही नहीं है ?

(a) उन्होंने भारत के विभिन्न क्षेत्रों में चार धाम स्थापित किए

(b) उन्होंने बौद्ध तथा जैन धर्मों के विस्तार पर रोक लगाई

(c) उन्होंने प्रयाग को तीर्थराज नाम दिया

(d) उन्होंने वेदांत का प्रसार किया
U.P.P.C.S. (Pre) 2005
उत्तर-(c)
विकल्प (c) असत्य है। ‘तीर्थराज’ की उपाधि प्रयाग को प्राचीन काल से ही दी जाती रही है और इसका संबंध शंकराचार्य से नहीं है। शंकराचार्य का जन्म 788 ई. में केरल के कलाडी ग्राम में हुआ था। उन्होंने ‘अद्वैत वेदांत’ दर्शन का प्रचार किया — जिसका मूल सिद्धांत है ‘ब्रह्म सत्यम् जगत मिथ्या’। उन्होंने हिंदू धर्म की पुनर्स्थापना के लिए चार दिशाओं में चार मठ स्थापित किए: उत्तर में ज्योतिर्मठ (जोशीमठ, उत्तराखंड), दक्षिण में शृंगेरी (कर्नाटक), पूर्व में गोवर्धन मठ (पुरी, ओडिशा), और पश्चिम में शारदा मठ (द्वारका, गुजरात)।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:शंकराचार्य ने केवल 32 वर्ष की अल्पायु में देह त्याग किया, किन्तु इस छोटी सी आयु में उन्होंने उपनिषदों, ब्रह्मसूत्रों और भगवद्गीता पर भाष्य लिखे। उनके प्रमुख शिष्यों में पद्मपाद, हस्तामलक, तोटकाचार्य और सुरेश्वर शामिल थे जिन्होंने चारों मठों की बागडोर संभाली।
34. आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार मठ कहाँ स्थित हैं?

(a) शृंगेरी, द्वारका, जोशीमठ, प्रयाग

(b) द्वारका, जोशीमठ, प्रयाग, कांची

(c) जोशीमठ, द्वारका, पुरी, शृंगेरी

(d) पुरी, शृंगेरी, द्वारका, वाराणसी
U.P.P.C.S. (Pre) 2006
उत्तर-(c)
आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार मठ इस प्रकार हैं: (1) ज्योतिर्मठ — उत्तर दिशा में, जोशीमठ (उत्तराखंड); (2) शारदा मठ — पश्चिम दिशा में, द्वारका (गुजरात); (3) गोवर्धन मठ — पूर्व दिशा में, पुरी (ओडिशा); (4) श्रृंगेरी मठ — दक्षिण दिशा में, शृंगेरी (कर्नाटक)। इन मठों की स्थापना का उद्देश्य हिंदू धर्म और वेदांत दर्शन का देश के चारों कोनों में प्रचार-प्रसार करना था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:कुछ परंपराओं में एक पाँचवाँ मठ — कांची मठ (तमिलनाडु) — भी शंकराचार्य से जोड़ा जाता है, हालाँकि यह विद्वानों के बीच विवादास्पद है। शृंगेरी मठ भारत का सबसे प्राचीन और सक्रिय हिंदू मठ माना जाता है और इसके शंकराचार्य की परंपरा आज भी अविच्छिन्न रूप से चली आ रही है।
35. निम्नलिखित में से कौन-सा ‘चारधाम’ में सम्मिलित नहीं है?
(a) पुरी
(b) द्वारका
(c) मानसरोवर
(d) रामेश्वरम्
M.P.P.C.S. (Pre) 2013
उत्तर-(c)
मानसरोवर चारधाम में सम्मिलित नहीं है। चारधाम में बद्रीनाथ (उत्तराखंड), द्वारका (गुजरात), पुरी (ओडिशा) और रामेश्वरम् (तमिलनाडु) आते हैं। इन्हें आदि शंकराचार्य ने हिंदू तीर्थाटन की मुख्य धुरी के रूप में प्रतिष्ठित किया। ‘छोटा चारधाम’ उत्तराखंड में स्थित है जिसमें गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ आते हैं। मानसरोवर तिब्बत (चीन) में स्थित एक पवित्र झील है जो कैलाश पर्वत के निकट है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:मानसरोवर झील को हिंदू, बौद्ध और जैन — तीनों धर्मों में पवित्र माना जाता है। हिंदू मान्यता के अनुसार यह ब्रह्मा जी के मन से उत्पन्न हुई थी। रामेश्वरम् में स्थापित ज्योतिर्लिंग को भगवान राम ने लंका विजय के बाद स्थापित किया था — यह दक्षिण भारत का प्रमुख शैव तीर्थ है।
36. भारतीय इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से सामंती व्यवस्था का / के अनिवार्य तत्व है/हैं?
1. अत्यंत सशक्त केंद्रीय राजनीतिक सत्ता और अत्यंत दुर्बल प्रांतीय अथवा स्थानीय राजनीतिक सत्ता
2. भूमि के नियंत्रण तथा स्वामित्व पर आधारित प्रशासनिक संरचना का उदय
3. सामंत तथा उसके अधिपति के बीच स्वामी-दास संबंध का बनना नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए ।
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 3
(d) 1, 2 और 3
I.A.S. (Pre) 2015
उत्तर-(b)
सामंती व्यवस्था के अनिवार्य तत्व केवल कथन 2 और 3 हैं। कथन 1 गलत है क्योंकि सामंतवाद में केंद्रीय सत्ता निर्बल होती थी, सशक्त नहीं — सामंत अपने क्षेत्र में स्वायत्त शासन करते थे। ‘सामंत’ शब्द का प्राचीनतम उल्लेख कौटिल्य के अर्थशास्त्र में ‘स्वतंत्र पड़ोसी राजा’ के अर्थ में मिलता है। भारत में सामंती व्यवस्था का अंकुरण शक-कुषाण काल में हुआ और राजपूत काल तक यह पूरी तरह परिपक्व हो गई। भूमि-दान (अग्रहार और देवग्राम) की प्रथा ने सामंती व्यवस्था को और सुदृढ़ किया। भारतीय सामंतवाद यूरोपीय सामंतवाद से इस अर्थ में भिन्न था कि भारत में भूमि का सर्वोच्च स्वामित्व राजा में निहित था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:इतिहासकार डी.डी. कोसांबी और आर.एस. शर्मा ने भारतीय सामंतवाद की विस्तृत व्याख्या की है। आर.एस. शर्मा के अनुसार गुप्तोत्तर काल (छठी से बारहवीं शताब्दी) भारतीय सामंतवाद का चरमोत्कर्ष काल था, जिसमें भूमि-दान प्रथा ने ब्राह्मणों और मंदिरों को शक्तिशाली भू-स्वामी वर्ग के रूप में स्थापित किया।

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