पुष्यभूति वंश (हर्षवर्धन) | One-Liner Practice

भारतीय इतिहास प्राचीन भारत पुष्यभूति वंश (हर्षवर्धन)

❑ पुष्यभूति वंश की स्थापना पुष्यभूति हरियाणा के अम्बाला जिले के थानेश्वर नामक स्थान पर की थी।

❑ पुष्यभूति वंश हूणों से हुए संघर्ष के कारण प्रसिद्ध हुआ।

❑ प्रभाकरवर्धन इस वंश का चौथा शासक था। उसके दो पुत्र-राज्यवर्धन एवं हर्षवर्धन थे।

❑ प्रभाकरवर्धन की पुत्री का नाम राज्यश्री था। राज्यश्री का विवाह मौखरी वंश के गृहवर्मन से हुआ था।

❑ प्रभाकरवर्धन की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी यशोमती उसकी चिता में कूदकर आत्मदाह कर ली।

❑ प्रभाकरवर्धन के बाद राज्यवर्धन राजा हुआ। मालवा के राजा देवगुप्त को राज्य वर्धन ने पराजित किया था।

❑ मालवा अभियान से लौटते समय मार्ग में धोखे से गौड़ शासक शशांक ने राज्यवर्धन की हत्या कर दी।

❑ राज्यवर्धन का प्रधानमंत्री उसका ममेरा भाई भण्डि था।

❑ हर्षवर्धन 606 ई. में राजगद्दी पर बैठा। उस समय उसकी 16 वर्ष थी।

❑ हर्ष के विषय में हमें व्यापक जानकारी बाणभट्ट द्वारा लिखित हर्षचरित से मिलती है। हर्षचरित में हर्षवर्द्धन को सभी देवताओं का सम्मिलित अवतार कहा गया है।

❑ हर्ष का दरबारी कवि बाणभट्ट था।

❑ ह्वेनसांग ने शूद्रों को कृषक कहा है।

❑ हर्षवर्धन सूर्य, शिव एवं बुद्ध का उपासक (महायान शाखा) था।

❑ 641 ई. में हर्षवर्द्धन ने मगधराज की उपाधि धारण की।

❑ हर्ष ने कुल 41 वर्ष तक शासन किया। चीनी यात्री ह्वेनसांग 629 से 645 ई. के बीच भारत में रहा था।

❑ ह्वेनसांग को यात्रियों में राजकुमार, नीति का पण्डित तथा वर्तमान शाक्यमुनि नाम से जाना जाता है।

❑ हर्ष की प्राचीन राजधानी थानेश्वर थी। कालांतर में हर्ष ने अपनी राजधानी कन्नौज (उत्तर प्रदेश) में बनाई।

❑ हर्ष को शिलादित्य नाम से भी जाना जाता है।

❑ हर्ष ने परमभट्टारक तथा उत्तरापथस्वामी की उपाधि धारण की थी।

❑ हर्ष एक प्रतिष्ठित कवि एवं नाटककार था। उसने नागानन्द’, ‘प्रियदर्शिका एवं रत्नावली नामक नाटकों की रचना की।

❑ बाणभट्ट की रचनायें हैं- हर्षचरित, कादम्बरी एवं पार्वती परिणय।

❑ हर्ष बौद्ध धर्म की महायान शाखा का समर्थक होने के अलावा विष्णु एवं शिव को भी मानता था।

❑ हर्ष ने विशाल धार्मिक सभाओं का आयोजन कन्नौज तथा प्रयाग में किया।

❑ हर्ष द्वारा आयोजित कन्नौज सभा ह्वेनसांग के सम्मान में की गई थी। इस सभा में विभिन्न धर्मों एवं सम्प्रदायों के आचार्यों को बुलाया गया था। इस सभा की अध्यक्षता ह्वेनसांग ने की थी।

❑ हर्ष के दिन का प्रथम भाग सरकारी कार्य, दूसरा एवं तीसरा भाग धार्मिक कार्य हेतु था।

❑ हर्ष के दरबार में चीनी दूतमण्डल 643 ई. एवं 646 ई. में आया था। हर्ष ने 641 ई. में अपने दूत चीन भेजे।

❑ हर्ष द्वारा प्रयाग में प्रतिवर्ष आयोजित सभा को मोक्ष परिषद् कहा जाता था।

❑ हर्ष का युद्ध एवं शान्ति का मंत्री अवन्ति था और महासेनापति सिंहनाद था।

❑ ह्वेनसांग के अनुसार अधिकारियों को वेतन भूमि अनुदान के रूप में दिया जाता था।

❑ हर्ष के समय भूमिकर, कृषि उत्पादन का छठा भाग वसूला जाता था।

❑ हर्षकालीन ताम्रपात्रों में केवल तीन करों का उल्लेख मिलता है- भाग (भूमिकर), हिरण्य और बलि।

❑ हर्षचरित के अनुसार थानेश्वर के प्रत्येक घर में शिव की पूजा होती थी।

❑ ह्वेनसांग मगध के महायान सम्प्रदाय के 10 हजार भिक्षुओं का उल्लेख करता है।

❑ ह्वेनसांग 637 ई. में नालंदा विश्वविद्यालय गया। यहाँ के कुलपति आचार्य शीलभद्र थे।

❑ ह्वेनसांग ने अपनी यात्रा वृतांत लिखा जिसका नाम सि-यू- की है।

❑ हर्ष के दक्षिण अभियान को चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय ने आगे बढ़ने से रोक दिया था।

❑ हर्षवर्धन को अंतिम हिन्दू सम्राट भी कहा जाता है जिसका शासन कश्मीर छोड़कर सम्पूर्ण भारत पर था।

📚 Chapters

    प्रातिक्रिया दे

    आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

    Swipe left/right to change content

    Share This Page

    WhatsApp Telegram