Subject: भारतीय इतिहास

  • अशोक के अभिलेख: प्रकार, भाषा और महत्व

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    अशोक के अभिलेख

    ➣ अशोक शिलाओं पर सन्देश खुदवाने वाला प्रथम भारतीय शासक था। अशोक के अभिलेख राज्यादेश के रूप में जारी किये गए। जिसकी प्रेरणा उसने ईरानी शासक दारा प्रथम (डेरियस) से मिली थी।

    ➣ ज्ञातव्य हो दारा प्रथम हखमानी साम्राज्य से था। जिसने 500 ई..पू के लगभग सर्वप्रथम भारत पर सफल आक्रमण किया था।

    ➣ अशोक के अभिलेख पालि भाषा में लिखे गए हैं। इन अभिलेखों के माध्यम से अशोक ने अपने सन्देश जनता व सुदूर क्षेत्रों तक पहुंचाएं थे।

    अभिलेखों के प्रकार

    ➣ अशोक के अभिलेखों का विभाजन निम्नलिखित वर्गों में किया जा सकता है-

    अशोक के अभिलेख की भाषा

    ➣ 1. शिला लेख यह लेख पहाड़ों को काटकर शिलाखण्डों को समतल कर उस पर उत्कीर्ण किया जाता था।

    ➣ 2. स्तंभ लेख प्राकृतिक शिलाओं की प्रचुर अनुपलब्धता के कारण पत्थरों से तैयार कृत्रिम स्तंभों पर उत्कीर्ण लेख जिसको अन्य स्थलों पर आसानी से स्थान्तरित किया जा सकता है।

    ➣ 3. गुहा लेख यह लेख धार्मिक सहिष्णु सम्राटों द्वारा साधु-संतों तथा बौद्ध भिक्षुकों को निवास हेतु बनाये गये, पहाड़ी गुहाओं में दान देने व दान लेने वालों की जानकारी हेतु उत्कीर्ण लेख थे।

    • अशोक का सबसे लम्बा अभिलेख भाब्रू लघु शिलालेख है।
    • अशोक का सबसे छोटा अभिलेख रूम्मिनदेई स्तम्भ लेख है।
    • सबसे लम्बा स्तम्भ लेख संख्या-7 है।
    • अशोक के शिलालेखों से उसके शासन के 8वें वर्ष से 29वें वर्ष तक की घटनाओं की जानकारी मिलती है।
    • अशोक के वृहद् शिलालेखों की संख्या चौदह है, जो आठ स्थानों से प्राप्त हुए हैं (कुछ स्रोतों में सात स्थान)।

    अशोक के अभिलेखों के खोजकर्ता

    शिलालेख खोजकर्तावर्ष
    धौली अभिलेख किट्टो1837 ई.
    भाब्रू शिलालेखकैप्टन बर्ट1840 ई.
    बराबर व नागार्जुनी गुफा हैरिंग्टन1785 ई.
    दिल्ली-टोपराकैप्टन पोलियर1785 ई.
    दिल्ली-मेरठ स्तम्भ लेख पैड्रे टीपैन्थेलर1750 ई.
    मानसेहराकैप्टन ले1889 ई.
    कालसी शिलालेख जॉन फॉरेस्ट1860 ई.
    रुम्मिनदेईफिहरर1896 ई.
    जौगढ़ अभिलेखसर वाल्टर इलियट1850 ई.
    गिरनार शिलालेखलेफ्टिनेंट कर्नल टाड1822 ई.
    शहबाजगढी फ्रांसीसी अधिकारी 1836 ई.
    इलाहाबाद स्तंभ लेखटी.एस. बर्ट1834 ई.
    मास्की अभिलेखबीडेन1915 ई.
    निगालि सागरफिहरर1895 ई.
    रामपुरवाकार्लाइल1872 ई.
    सारनाथ स्तंभऑरेल स्टाइन1905 ई

    ➣ अशोक के शिलालेख ब्राह्मी, ग्रीक, अरमाइक तथा खरोष्ठी लिपि में उत्कीर्ण हैं, जबकि सभी स्तम्भ लेख प्राकृत भाषा में हैं। शाहबाजगढ़ी तथा मानसेहरा के शिलालेख की लिपि खरोष्ठी है।

    ➣ 1750 में टीफेन्थैलर ने सबसे पहले दिल्ली में अशोक के स्तम्भ का पता लगाया था, किंतु अशोक के अभिलेखों को सबसे पहले जेम्स प्रिंसेप ने 1837ई. में पढ़ने में सफलता प्राप्त की।

    ➣ 1837 में जेम्स प्रिंसेप ने ही ब्राह्मी लिपि में लिखी देवनामपिय प्रियदरसी (देवताओं का प्रिय) से अशोक का समीकरण स्थापित किया।

    भब्रू अभिलेख सिर्फ बौद्ध भिक्षुओं के लिए था, जनता के लिए नहीं। भन्नू अभिलेख में अशोक ने बौद्ध त्रिरत्न (बुद्ध, धम्म, संघ) को नमस्कार किया है और बौद्ध शास्त्रों से चुने हुए अंश उद्धृत किये हैं।

    धौली तथा जौगढ़ के शिलालेख पृथक् कलिंग लेख कहलाते हैं। इसमें सभी मनुष्यों को अपनी सन्तान बताया गया है।

    भब्रू अभिलेख एकमात्र स्तम्भ है, जिसमें अशोक ने स्वयं को मगध का सम्राट बताया। अशोक के भाब्रू शिलालेख में धम्म का उल्लेख मिलता है।

    ➣ अशोक के शिलालेख निम्नलिखित स्थानों से प्राप्त हुयें हैं –

    1. शाहबाजगढ़ीपेशावर
    2. मानसेहराहजारा
    3. कालसी देहरादून, उत्तराखण्ड
    4. गिरनारकाठियावाड़ में जूनागढ़ के समीप गिरनार की पहाड़ी
    5. धौली पुरी , उड़ीसा
    6. जौगढ़ उड़ीसा के गंजाम
    7. एरागुडि कुर्नूल , आन्ध्र प्रदेश
    8. सोपारा थाणे, महाराष्ट्र प्रान्त

    1.शिलालेख

    ➣ अशोक के शिलालेख को दो वर्गों में बांटा गया है – वृहत शिलालेखलघु शिलालेख

    ➣ वृहत शिलालेखों में सम्राट अशोक के 14 प्रमुख शिलालेख हैं –

    शिलालेख 1 व 2: पशुबलि की निंदा तथा मनुष्यों एवं पशुओं के चिकित्सा संबंधी प्रबंध का वर्णन।
    शिलालेख 3: व्यवहार के सनातन नियमों का वर्णन तथा राजकीय पदाधिकारियों को आदेश कि वे प्रत्येक 5 वर्ष के बाद दौरे पर जायें।
    शिलालेख 4: व्यवहार के सनातन नियमों की व्याख्या।
    शिलालेख 5: धम्ममहामात्रों की नियुक्ति एवं कार्यों का निर्देश।
    शिलालेख 6: आत्म नियंत्रण पर बल।
    शिलालेख 7 व 8: अशोक की तीर्थयात्रा का वर्णन।
    शिलालेख 9: वास्तविक उत्पादन और वास्तविक कार्यों का वर्णन।
    शिलालेख 10: राजा और उसके उच्च अधिकारियों को हमेशा जनहित के कार्यों में लगे रहने का अनुदेश।
    शिलालेख 11: धम्म विजय की विशेषताओं का वर्णन।
    शिलालेख 12: धार्मिक सहिष्णुता पर बल।
    शिलालेख 13: कलिंग युद्ध का वर्णन तथा अशोक के हृदय परिवर्तन का मार्मिक चित्रण।
    शिलालेख 14: जनता से धम्म का जीवन ग्रहण करने की अपील।

    लघु शिलालेख

    ➣ ये शिलालेख 14 वृहत शिलालेख में सम्मिलित नहीं किये गए हैं इसलिए इन्हे लघु शिलालेख कहा गया है।

    ➣ ये चौदह शिलालेखों के मुख्य वर्ग के अतिरिक्त हैं तथा लघु शिलालेखों को लघु शिलालेख संख्या 1 एवं लघु शिलालेख संख्या 2 में बाँटा गया है।

    ➣ ये निम्नलिखित स्थानों से प्राप्त हुए हैं-

    1. रूपनाथ जबलपुर, मध्य प्रदेश
    2. गुजर्रा दतिया, मध्य प्रदेश
    3. सहसराम बिहार
    4. भाब्रू बैराठ, जयपुर
    5.मास्की रायचूर, कर्नाटक
    6. ब्रह्मगिरी चित्तलदुर्ग, कर्नाटक
    7. सिद्धपुर चित्तलदुर्ग, कर्नाटक
    8. जटिंगरामेश्वर चित्तलदुर्ग, कर्नाटक
    9. एरंगुडि कर्नूल, आन्ध्र प्रदेश
    10. गोविमठ मैसूर, कर्नाटक
    11. पालकिगुण्डु मैसूर, कर्नाटक
    12. राजुल मंडगिरी कर्नूल, आन्ध्र प्रदेश
    13. अहरौरा मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश
    14. सारोमारो शहडोल, मध्य प्रदेश
    15. नेटूर मैसूर, कर्नाटक
    16. उदेगोलम् बेलारी, कर्नाटक
    17. सन्नाती गुलबर्गा, कर्नाटक
    18. पनगुडरिया बुधनी, मध्य प्रदेश

    पनगुडरिया लघु शिलालेख में अशोक को महाराज कुमार कहा गया है।

    ➣ 1986 ई. में सन्नाती से अशोक का नवीनतम् शिलालेख मिला है, जिसमें 12वें एवं 14वें वृहत्त् शिलालेख के कुछ अंश मिलते हैं।

    भाब्रू के दो शिलालेख जयपुर के बैराठ में बीजक की पहाड़ियों से 1837 ई. में कैप्टन बर्ट द्वारा खोजे गये। यह अशोक को बौद्ध प्रमाणित करने का सबसे बड़ा अभिलेखीय साक्ष्य है।

    ➣ भाब्रू अभिलेख वर्तमान में कलकत्ता संग्रहालय में है। इसमें बौद्ध धर्म के त्रिरत्नों- बुद्ध, धम्म एवं संघ में आस्था प्रकट करते हैं।

    अहरौरा लघु शिलालेख में अशोक 256 रातें स्तूप निर्माण हेतु भ्रमण में बिताने का उल्लेख करता है।

    ➣ अशोक का सबसे दक्षिणी अभिलेख एर्रगुडि लघु शिलालेख है। एर्रगुडि लघु शिलालेख एकमात्र अभिलेख है जो खरोष्ठी एंव ब्राही दोनों लिपि में है।

    ➣ अशोक के एर्रगुडि लघु शिलालेख में करगिक नामक अधिकारी का उल्लेख मिलता है, जो लेखाधिकारी का कार्य करता था।

    सबसे दक्षिणी स्तम्भ लेख अमरावती वृहत् शिलालेख है। अमरावती वृहत् शिलालेख जीर्ण-शीर्ण अवस्था में मिला है।

    ➣ अशोक का व्यक्तिगत नाम केवल मास्की, गुर्जरा. नेटटूर और उदेगोलम में मिलता है। सर्वप्रथम कर्नाटक के मास्की अभिलेख में अशोक नाम पढ़ा गया था। अन्य सभी में उसे देवप्रिय से सम्बोधित किया गया है।

    भब्रू अभिलेख सिर्फ बौद्ध भिक्षुओं के लिए था, जनता के लिए नहीं। भन्नू अभिलेख में अशोक ने बौद्ध त्रिरत्न (बुद्ध, धम्म, संघ) को नमस्कार किया है और बौद्ध शास्त्रों से चुने हुए अंश उद्धृत किये हैं।

    धौली तथा जौगढ़ के शिलालेख पृथक् कलिंग लेख कहलाते हैं। इसमें सभी मनुष्यों को अपनी सन्तान बताया गया है।

    भब्रू अभिलेख एकमात्र स्तम्भ है, जिसमें अशोक ने स्वयं को मगध का सम्राट बताया। अशोक के भाब्रू शिलालेख में धम्म का उल्लेख मिलता है।

    2.स्तम्भ लेख

    ➣ अशोक के कुछ पाषाण स्तम्भों पर भी उत्कीर्ण हैं। जिसके कारण ये स्तम्भ लेख कहलाये। इन्हे आसानी से एक जगह से दूसरी जगह स्थान्तरित किया जा सकता है।

    ➣ अशोक के स्तम्भ लेखों को वृहत स्तम्भ लेख तथा लघु स्तम्भ लेख में विभाजित किया गया है-

    वृहत स्तंभ लेख

    दिल्ली टोपरा स्तंभ लेख दिल्ली
    दिल्ली मेरठ स्तंभ लेख दिल्ली
    लौरिया अरराज स्तंभ लेख चम्पारण, बिहार
    लौरिया नन्दनगढ़चम्पारण, बिहार।
    रामपुरव स्तंभ लेख चम्पारण, बिहार।
    प्रयाग स्तंभ लेख इलाहाबाद

    मेरठ स्तम्भ लेख, प्रारम्भ में उत्तर प्रदेश सहारनपुर (खिज्राबाद) जिले में तथा टोपरा स्तम्भ लेख हरियाणा में स्थापित था। मध्य युग में तुगलक शासक फिरोजशाह तुगलक द्वारा इन्हे दिल्ली लाया गया। जिसमे मेरठ स्तम्भ लेख मुग़ल शासक फरुखसियर के शासनकाल में खंडित हो गया।

    ➣ प्रयाग- यह पहले कौशाम्बी में था, जो बाद में अकबर द्वारा इलाहाबाद के किले में लाया गया।

    लघु स्तम्भ लेख

    ➣ अशोक के कुछ स्तम्भों पर एक-एक लेख हैं , जिन्हे लघु स्तम्भ की श्रेणी में रखा गया है। लघु स्तम्भ लेख में अशोक की राजकीय घोषणाएँ उत्कीर्ण हैं –

    1. सांची स्तम्भ लेखरायसेन जिला, मध्यप्रदेश
    2, सारनाथ स्तम्भ लेखवाराणसी, उत्तर प्रदेश
    3. कौशाम्बी/इलाहबाद स्तम्भ लेखइलाहाबाद के समीप
    4. रुम्मिनदेई स्तम्भ लेखनेपाल की तराई में स्थित
    5. निग्लीवा स्तम्भ लेख निग्लीवा सागर

    सांची-सारनाथ-कौशाम्बी के लघु स्तम्भ लेख में अशोक अपने महापात्रों को संघ भेद रोकने का आदेश देता है।

    कौशाम्बी स्तम्भ लेख में अशोक की रानी कारूवाकी के दान का उल्लेख मिलता है। इसलिए इसे रानी का लेख भी कहते हैं। अभिलेखों में केवल इसी रानी का उल्लेख है।

    रुम्मिनदेई स्तम्भ में अशोक द्वारा धर्मयात्रा पर जाने का विवरण है। रुम्मिनदेई अभिलेख के अनुसार, अशोक ने लुबिनी ग्राम (बुद्ध का जन्म स्थल) से उत्पादन का राज्य कर 1 /6 भाग घटाकर मात्र 8वां भाग कर दिया था।

    ➣ निग्लीवा स्तम्भ के लेख में कनकमुनि के स्तूप के संवर्द्धन की चर्चा हुई है। 14वें वर्ष कनकमुनि बुद्ध के स्तूप का दूसरी बार संवर्द्धन कर आकार दो गुना किया।

    3.गुहा-लेख

    ➣ दक्षिणी बिहार के गया जिले में स्थित बराबर नामक पहाड़ी को काटकर गुफाओं की दीवारों पर अशोक के गुहा लेख उत्कीर्ण मिले हैं। इन्हें अशोक द्वारा आजीवक साधुओं को दान दिया था

    1. नयग्रोध/सुरामा गुहा, 2.. विश्व झोपड़ी गुफा, 3. कर्ण-चौपड़ गुफा।

    ➣ ये सभी अभिलेख प्राकृत भाषा में तथा ब्रह्मी लिपि में लिखे गये हैं। केवल 2 अभिलेखों (1.शाहबाजगढ़ी, 2.मानसेहरा) की लिपि खरोष्ठी है, किन्तु इन दोनों में प्राकृत भाषा है।

    ➣ अशोक ने आजीवकों के निवास हेतु तीन गुफाओं का निर्माण करवाया जिनके नाम हैं- कर्ण चौपार, सुदामा तथा विश्व झोपड़ी।

    नागार्जुनी गुहालेख अशोक के पौत्र दशरथ ने उत्कीर्ण कराये।

    मास्की एवं गुजर्रा लेख में अशोक का व्यक्तिगत नाम देवनांप्रिय मिलता है, जबकि नेटूर लेख में अशोक के अपने नाम का उल्लेख मिलता है।

    ➣ तक्षशिला से अरामेईक लिपि में लिखा गया एक भग्नल अभिलेख, कंदहार के पास शरे कुना नामक स्थल से यूनानी तथा अरामेईक लिपियों में लिखा गया द्विभाषीय अभिलेख, काबुल नदी के बायें किनारे पर जलालाबाद के ऊपर स्थित लघमान (काबुल) नामक स्थान से अरामेईक लिपि में लिखा गया अशोक का अभिलेख प्राप्त हुआ है।

  • मौर्यकालीन प्रशासन: व्यवस्था, अधिकारी और कर

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    मौर्यकालीन स्रोत

    ब्राह्मण साहित्य कौटिल्य रचित अर्थशास्त्र, अर्थशास्त्र पर भट्टस्वामी की प्रतिपदापंचिका टीका, सोमदेव कृत कथासरित्सागर, क्षेमेन्द्र की वृहत्कथामंजरी, पतंजलि का महाभाष्य, विष्णु पुराण, विष्णु पुराण पर श्रीधरस्वामी की टीका, विशाखदत्त का मुद्राराक्षस, दसवीं शताब्दी का मुद्राराक्षस का टीकाकार ढुंढ़िराज।
    बौद्ध साहित्य दीपवंश, महावंश, महावंश की टीका वंसत्थपकासिनी, दिव्यावदान, महाबोधिवंश, दीर्घनिकाय।
    जैन साहित्य भद्रबाहु का कल्प सूत्र, हेमचन्द्र का परिशिष्टपर्व।
    संगम साहित्य मामूलनार रूद्रशर्मन द्वारा लिखित अहनानूर एवं कपिलर द्वारा लिखित परणार।
    विदेशी विवरण स्ट्रेबो, कर्टिअस, डिओडोरस, प्लिनी, एरियन, जस्टिन, प्लूटार्क, नियार्कस, ओनेसिक्रिटस, एरिस्टोब्युलस आदि यूनानी लेखकों का वर्णन।
    पुरातत्व महास्थान अभिलेख (बोगरा, बांग्लादेश) एवं सौहगोरा ताम्रपत्र (गोरखपुर, उत्तर प्रदेश)। सौहगोरा सम्पूर्ण मौर्य काल का एकमात्र लेख है, जो ताम्र-पत्र पर अंकित है।
    अशोक के अभिलेख सर्वप्रथम खोज 1750 ई. में टीफेन्थेलर ने दिल्ली-मेरठ स्तम्भ लेख के रूप में की, जबकि 1837 ई. जेम्स प्रिंसेप ने पढ़ा।
    मौर्यकालीन प्रशासन

    ➣ मौयों ने प्रशासन की एक विस्तृत व्यवस्था और तंत्र स्थापित किया। जिसका उल्लेख मेगस्थनीज की इंडिका और कौटिल्य के अर्थशास्त्र में मिलता है। मेगस्थनीज की इंडिका तो अब उपलब्ध नहीं है, लेकिन इसके उद्धरण परवर्ती लेखकों की रचनाओं में उपलब्ध हैं।

    ➣ मेगस्थनीज एक यूनानी राजदूत था , जो सेल्यूकस द्वारा चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में भेजा गया था। यहाँ रहकर उसने पाटलिपुत्र नगर के प्रशासन के साथ-साथ पूरे मौर्य साम्राज्य के बारे में लिखा।

    मेगस्थनीज की इंडिका नामक पुस्तक ने मौर्य के प्रशासन, समाज और अर्थव्यवस्था पर महत्वपूर्ण प्रकाश डाला है।

    ➣ कौटिल्य के अर्थशास्त्र को मेगस्थनीज के लेखन का पूरक माना जाता है। इन दोनों स्रोतों से हमें चन्द्रगुप्त मौर्य की प्रशासनिक व्यवस्था की जानकारी मिलती है।

    प्रशासनिक व्यवस्था

    ➣ मौर्यकालीन प्रशासन लोक-कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पर आधारित था। सत्ता का केन्द्रीकरण राजा में होते हुए भी वह निरंकुश नहीं होता था।

    ➣ मौर्य प्रशासन पूर्णतः एक केन्द्रीयकृत नौकरशाही प्रशासन तंत्र था। जो एक सचिवालय द्वारा संचालित होता था। अशोक ने इस केन्द्रीकृत शासन व्यवस्था को पितृवत निरंकुश राजतंत्र शासन व्यवस्था में परिवर्तित कर दिया।

    प्राचीन भारत में सबसे विस्तृत नौकरशाही मौर्यकाल में थी।

    ➣ सम्राट सभी प्रकार की सत्ता का स्रोत एवं उसका केन्द्र बिन्दु होता था। राजतंत्रीय व्यवस्था सम्राट मौर्य प्रशासन का सर्वोच्च अधिकारी था। वह प्रशासन, विधि एवं न्याय का प्रमुख स्रोत तथा सर्वोच्च न्यायाधीश होता था।

    ➣ सम्राट अपने शासन कार्यों में अमात्यों, मंत्रियों तथा अधिकारियों से सहायता प्राप्त करता था। अर्थशास्त्र के अनुसार, अमात्य का स्थान सम्राट के बाद दूसरा था।

    ➣ अर्थशास्त्र के अनुसार, शासन की सुविधा के लिए अनेक प्रशासनिक विभाग बनाये गये थे, जिनकी संख्या 18 थी। जिन्हे तीर्थ या महामात्र अथवा महामात्य कहा गया है। ये निम्नलिखित हैं

    1. मंत्री एवं पुरोहित प्रधानमंत्री
    2. समाहर्ता राजस्व की वसूली करनेवाला
    3. सन्निधाता कोषाध्यक्ष
    4. सेनापति युद्ध विभाग का अधिकारी
    5. युवराज उत्तराधिकारी
    6. प्रदेष्टा फौजदारी न्यायालय का न्यायाधीश
    7. नायक सेना का संचालक
    8. कान्तिक उद्योग-धंधों का प्रधान निरीक्षक
    9. व्यावहारिक दीवानी न्यायालय का न्यायाधीश
    10. मंत्रिपरिषदाध्यक्ष मंत्रिपरिषद का प्रमुख (सचिव)
    11. दंडपाल सैन्य सामग्री का प्रबंधकर्ता
    12. अंतपाल सीमावर्ती दुर्गों का रक्षक
    13. दुर्गपाल किलों का प्रबंधक
    14. प्रशस्ता राजकीय कागजातों को सुरक्षित रखने वाला तथा राजकीय आजाओं को लिपिबद्ध करने वाला
    15. नागरक नगर का प्रमुख अधिकारी
    16. दौवारिक राजमहल की देख-रेख करने वाला प्रधान अधिकारी
    17. आन्तर्वशिक राजा की अंगरक्षक सेना का प्रधान
    18. आटविक वन विभाग का प्रधान।

    ➣ ये मौर्य-नौकरशाही अथवा प्रशासनिक विभाग एक पिरामिड के समान होती थी। जिसमे सबसे शीर्ष पर मंत्री और उनके नीचे अन्य कर्मचारी थे।

    ➣ मंत्रियों की नियुक्ति हेतु इनके चरित्र को जाँचा-परखा जाता था, जिसे उपधा परीक्षण कहते थे।

    ➣ कौटिल्य ने राज्य के सप्तांग सिद्धान्त के सात अंग निर्दिष्ट किये हैं-

    1. सम्राट सिर
    2. अमात्य आँख
    3. जनपद(क्षेत्र तथा जनसंख्या) जंघा
    4. दुर्ग बांह
    5. कोष/धन मुख
    6. बल (सेना) मस्तिष्क
    7. मित्रकान

    ➣ राजा को इन सभी सात अंगों की आत्मा बताया गया है।

    ➣ अर्थशास्त्र पहली पुस्तक है, जिसमें कर्मचारियों के नकद वेतन का सुझाव दिया गया है। युवराज, प्रधानमंत्री एवं सेनापति का वेतन 48000 पण वार्षिक था।

    ➣ मंत्रिपरिषद् के सदस्यों को 12,000 पण वार्षिक मिलते थे, जबकि मन्त्रिणः के सदस्यों को 48,000 पण वार्षिक वेतन मिला था। सेवकों एवं अंगरक्षकों को केवल 60 पण वेतन मिलता था। न्यूनतम वेतन 60 पण वार्षिक था।

    ➣ राज्यशास्त्र के सिद्धांतों के अनुसार राजा सिर्फ धर्म (कानून) का पालन ने वाला (धर्मप्रवर्तक) होता था, कानून का निर्माता नहीं। परंतु कौटिल्य राजा को कानून निर्माण-संबंधी अधिकार भी देता है।

    साम्राज्य संरचना

    ➣ चंद्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य उत्तर पश्चिम में ईरान (फारस) से लेकर पूर्व में बंगाल तक तथा उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में उत्तरी कर्नाटक (मैसूर) तक फैल हुआ था।

    प्रांतीय शासन

    ➣ सम्पूर्ण मौर्य साम्राज्य कई प्रान्तों में विभाजित किया गया था और इनमें से प्रत्येक प्रान्त एक राजकुमार के अधीन रखा गया था, जो शाही राजवंश के वंशज थे।

    ➣ मौर्यशासन की स्तरीय खण्ड निम्नलिखित रूप में था-

    प्रान्त
    प्रमुख अधिकारी कुमार या आर्यपुत्र

    मण्डल (कमिश्नरी)
    प्रमुख अधिकारी प्रदेष्टा या प्रादेशिक

    आहार या विषय (जिला)
    प्रमुख अधिकारी विषयपति या स्थानिक

    स्थानीय
    (800 ग्रामों का समूह)

    द्रोणमुख
    (400 ग्रामों का समूह)

    खार्वटिक
    (200 ग्रामों का समूह)

    संग्रहण
    (10 ग्रामों का समूह)
    प्रमुख अधिकारी गोप

    ग्राम
    प्रमुख अधिकारी ग्रामणी

    ➣ चन्द्रगुप्त मौर्य ने शासन की सुविधा हेतु अपने विशाल साम्राज्य को चार प्रान्तों में विभाजित किया। इन प्रान्तों को चक्र कहा जाता था।

    ➣ इन प्रान्तों का शासन सीधे सम्राट द्वारा नियंत्रित न होकर उसके प्रतिनिधि द्वारा संचालित होता था।

    ➣ आशोक के समय में प्रान्तों की संख्या चार से बढ़कर पाँच हो गई। पाँचवा प्रांत कलिंग था। जिसकी राजधानी तोसली थी। इन प्रान्तों का विवरण निम्नलिखित है-

    1. उत्तरी प्रांत (उत्तरापथाउदीच्य)उत्तरापथ ( तक्षशिला )
    2. पश्चिमी प्रांत (अतिपथ) अवंति (उज्जयिनी)
    3. पूर्वी प्रांत (प्राच्यपथ) कलिंग (तोसली)
    4. दक्षिणी प्रांत (दक्षिणापथ)दक्षिणापथ ( सुवर्णगिरि
    5. केन्द्रीय प्रांत (मगध)प्राची (पाटलिपुत्र)

    ➣ प्रान्तों का शासन राजवंशीय कुमार या आर्यपुत्र नामक पदाधिकारियों द्वारा होता था। अशोक सिंहासनारूढ़ होने से पूर्व उत्तरापथ एवं अवन्ति का कुमार रह चुका था।

    ➣ कुमारमात्या की सहायता हेतु प्रत्येक प्रान्त में महामाया नामक अधिकारी होते थे। इनके अन्तर्गत विभिन्न विषयक पदों पर सामन्त अथवा विषयपति होते थे।

    ➣ प्रान्तों का विभाजन मण्डल में हुआ था। मण्डल का प्रमुख प्रादेशिक था, जिसे अर्थशास्त्र का प्रदेष्टा कहा गया है।

    ➣ प्रादेशिक समाहर्ता के अधीन कार्य करता था एवं स्थानिक एवं गोप के कार्यों की जाँच करता था।

    जिला प्रशासन

    ➣ जिले को विषय/आहार कहा जाता था। इसका प्रमुख विषयपति होता था, जिसे मेगस्थनीज ने एग्रोनोमोई कहा है। जिले में ही युक्त, राजुक एवं प्रादेशिक अधिकारी होते थे।

    ➣ अशोक ने युक्त नामक अधिकारियों की नियुक्ति की। ये केन्द्र तथा स्थानीय शासन के बीच की संपर्क कड़ी थे। युक्त धन का अपहरण करते थे।

    नगर प्रशासन

    ➣ मौर्य काल के नगरों की काफी बड़ी संख्या थी। पाटलिपुत्र, कौशाम्बी, उज्जैन और तक्षशिला उनमे सबसे महत्त्वपूर्ण नगर थे। इसमें पाटलिपुत्र प्रमुख राजधानी थी।

    ➣ नगर के प्रशासन के लिए छह समितियाँ थीं, जिनमें से प्रत्येक में 5-5 सदस्य होते थे।

    ➣ समितियों को स्वच्छता, विदेशियों की देखभाल, जन्म और मृत्यु के पंजीकरण, वजन और मापन के विनियमन और इसी तरह के अन्य कार्य दिए गए थे।

    शिल्पकला समिति उद्योगों व कारीगरों पर नियंत्रण
    वैदेशिक समिति विदेशियों पर नियंत्रण
    जनसंख्या समिति जन्म-मरण का पंजीकरण
    वाणिज्य समिति व्यापार व वाणिज्य पर नियंत्रण
    वस्तुनिरिक्षक समिति वजन और मापन के विनियमन पर नियंत्रण
    कर समिति बिक्री कर व चुंगी वसूल करना

    ➣ मेगस्थनीज नगर अधिकारी को ऐस्टोनोमोई कहता है। एग्रोनोमोई नामक अधिकारी जिले में सड़क एवं भवन निर्माण का काम देखता था।

    सैन्य व्यवस्था

    ➣ चंद्रगुप्त ने सैन्य संग्रह के सभी साधनों का उपयोग किया और एक मिली-जुली सेना तैयार की जिसमें मुद्रारक्षस नाटक के अनुसार शक, यवन, किरात, कंबोज, पारसीक, वाह्निक आदि विविध जातियों के सैनिक सम्मिलित थे।

    ➣ कौटिल्य ने चारों वर्गों के लोगों को सेना में भर्ती होने का उल्लेख है। कौटिल्य के अनुसार सेना चतुरंगिणी (पैदल , घोडा , हाथी और रथ ) थी।

    ➣ मेगस्थनीज की इण्डिका के अनुसार, चंद्रगुप्त मौर्य के पास 6 लाख पैदल, 50 हज़ार अश्वारोही, 9 हज़ार हाथी तथा 800 रथों से सुसज्जित विराट सेना थी।

    जस्टिन चंद्रगुप्त की सेना को डाकुओं का गिरोह कहता है।

    ➣ कौटिल्य ने सेना को तीन श्रेणियों में विभाजित किया-

    • पुश्तैनी सेना
    • भाटक सेना
    • नगरपालिका सेना

    ➣ राजा की स्थायी सेना मौलबल कहलाती थी। सैनिक छावनियों को गुल्म एवं सैनिकों के वेतन को गुल्मदेय कहा जाता था।

    ➣ चंद्रगुप्त मौर्य के प्रशासन की सबसे बड़ी विशेषता उसकी विशाल सेना का रख-रखाव था। प्रशासन की तरफ से सेना का उचित प्रबंधन किया गया था।

    ➣ मेगस्थनीज के अनुसार सशस्त्र बलों का प्रशासन 30 अधिकारियों के एक बोर्ड, जो 6 समितियों में विभाजित था-

    प्रथम नौसेना निरीक्षक,
    दूसरा युद्ध सामग्री (सेना रसद) निरीक्षक,
    तीसरा अश्वारोही निरीक्षक,
    चौथा पैदल सैनिक,
    पांचवां रथ तथा
    छठा हाथी सेना

    अन्तपाल नामक अधिकारी सेना का प्रशासन देखता था। इसके अतिरिक्त वह सीमान्त क्षेत्रों में स्थित दुर्गों की देखभाल भी करता था।

    नायक युद्धक्षेत्र में सेना का नेतृत्व करता था। इसे 12000 पण वार्षिक वेतन मिलता था।

    ➣ कौटिल्य के अर्थशास्त्र में नवाध्यक्ष के उल्लेख से मौर्यों के पास नौसेना प्रकार की सेना होने का प्रमाण भी मिलता है।

    ➣ सर्वप्रथम ग्रुनवेडेल ने यह बताया कि मौर्यों का वंश चिह्न मोर था ।

    गुप्तचर विभाग

    ➣ मौर्य शासन में सपूर्ण प्रशासन एवं अधिकारियों पर नजर रखने के लिए एक गुप्तचर विभाग स्थापित किया गया था।

    ➣ अर्थशास्त्र में गुप्तचर व्यवस्था पर विस्तृत एवं महत्वपूर्ण सूचना मिलती है। इसका संचालन गूढ़पूरुष (जासूस) करते थे। ये गूढपूरुष महामात्यपसर्प के नियंत्रण में कार्य करते थे।

    ➣ अर्थशास्त्र में गुप्तचरों को गूढ़ पुरुष कहा गया है। दो प्रकार के गुप्तचर होते थे-

    ➣ गुप्तचर दो प्रकार के होते थे- प्रथम संस्था जो एक ही स्थान पर रहते थे तथा द्वितीय संचरा जो भ्रमण करते रहते थे।

    संस्था गुप्तचर-
    1. कापटिक दूसरे के रहस्यों को जानने वाला, विद्यार्थी के वेश में रहने वाला गुप्तचर ।
    2. उदास्थित संन्यायी वेशधारी गुप्तचर ।
    3. गृहपतिक गरीब किसान के वेश में रहने वाला गुप्तचर ।
    4. वैदेहक गरीब व्यापारी के वेश में रहने वाला गुप्तचर
    5. तापस सिर मुंडाये या जटा धारण किये तपस्वी के वेश में गुप्तचर ।
    सत्री समुद्री विद्या, ज्योतिष, व्याकरण, इन्द्रजाल, वशीकरण तथा नाचने- गाने की कला में निपुण गुप्तचर ।
    तीक्ष्ण धन के लिये प्राणों की भी परवाह न कर हर तरह के खतरे में कार्य करने वाला गुप्तचर
    सरद अपने बन्धुओं से भी स्नेह न रखने वाला, क्रूर तथा प्रकृति से आलसी गुप्तचर।
    परिव्राजिका (वृषली, भिक्षुकी) संन्यासिनी के वेश में गुप्तचर कार्य करने वाली स्त्री

    ➣ नर गुप्तचरों को सन्ती, तिष्णा तथा सरद कहा जाता था, जबकि स्त्री गुप्तचरों को वृषली, भिक्षुकी तथा परिव्राजक के नाम से जाना जाता था।

    मेगस्थनीज एवं डियोडोरस ने गुप्तचरों को ओवरसियर्स (एपिस्कोपई) तथा स्ट्रेबो एवं एरियन ने इंसपेक्टर (एफोरोई) कहा है। विदेशों में नियुक्त होने गुप्तचरों को उभयवेतन कहते थे।

    ➣ गुप्तचर विभाग में संन्यासी, विद्यार्थी, गृहस्थ एवं विषकन्याओं की नियुक्ति की जाती थी। नियुक्ति उपधा परीक्षण नामक परीक्षा के माध्यम से होती थी।

    न्याय व्यवस्था

    ➣ मौर्य न्याय व्यवस्था कठोर थी। मौर्य सम्राट सर्वोच्च तथा अन्तिम न्यायालय एवं न्यायाधीश था। न्याय का उद्देश्य सुधारवादी न होकर आदर्शवादी था।

    ➣ चाणक्य के अनुसार मौर्य न्याय व्यवस्था के चार प्रमुख अंग थे-

    • धर्म
    • व्यवहार (समकालीन विधि संहिताएँ)
    • चरित्र (रीति-रिवाज)
    • राजशासन / राजाज्ञा

    ➣ न्याय व्यवस्था के ये चार प्रमुख स्त्रोत थे, जिन्हें चतुष्पाद कानून कहा गया। इन चारों में कौटिल्य ने राजशासन को सर्वश्रेष्ठ एवं सर्वोच्च माना है।

    ग्राम सभा सबसे छोटी न्यायालय थी, जहाँ ग्रामणी तथा ग्रामवृद्ध अपना निर्णय देते थे। इसके ऊपर क्रमशः संग्रहण, द्रोणमुक, स्थानीय एवं जनपद के न्यायालय थे।

    ➣ अर्थशास्त्र में दो प्रकार के न्यायालय का वर्णन है-

    • धर्मस्थीय न्यायालय (दीवानी न्यायालय)
    • कंटकशोधन न्यायालय (फौजदारी न्यायालय)

    धर्मस्थीय न्यायालय

    ➣ इस वर्ग के न्यायालय नागरिकों के पारस्परिक विवादों को निपटारा करते थे। इन्हें दीवानी अदालत (न्यायालय) कहा जाता था ।

    चोरी, डाकेलूट के मामले, जिन्हें साहस कहा जाता था, धर्मस्थीय न्यायालय में पेश होते थे।

    कुबचन, मान-हानि, मार-पीट सम्बन्धी मामले भी धर्मस्थीय न्यायालय में लाये जाते थे, जिन्हें वाक पारुष्य या दण्डपारुष्य कहा जाता था।

    कंटकशोधन न्यायालय

    राज्य तथा नागरिकों के मध्य होने वाले विवाद का निर्णय करने वाले न्यायालय को कंटकशोधन न्यायालय कहा जाता था। ये फौजदारी अदालतें थीं।

    ➣ मौर्य शासन के दौरान शांति व्यवस्था स्थापित करने के लिए पुलिस होती थी। इन्हें रक्षिन कहा जाता था।

    ➣ नगर न्यायाधीश को व्यावहारिक महामात्र तथा जनपद न्यायाधीश को राज्जुक कहते थे।

    मौर्य काल में ब्राहम्णो को जल में डुबोकर मृत्यु दंड दिया जाता था।

    मौर्यकालीन समाज

    ➣ कौटिल्य के अनुसार वर्णव्यवस्था ही सामाजिक संगठन का आधार है। अतः प्रत्येक वर्ण की स्थिति व उनके कर्तव्यों का विवरण अर्थशास्त्र में दिया गया है। वर्णव्यवस्था की रक्षा करना राजा का प्रमुख कर्तव्य बताया गया है।

    ➣ अर्थशास्त्र में शूद्रों को मलेच्छों से पृथक माना है तथा उन्हें आर्य शूद्र कहा है। अर्थशास्त्र में शूद्रों को कृषक कहा गया है।

    ➣ अर्थशास्त्र के मुताबिक वर्णाश्रम व्यवस्था के तहत सभी चार वर्णो के लोगों को सेना में भर्ती करने का उल्लेख मिलता है।

    ➣ मेगस्थनीज के अनुसार अपराध करने वाले ब्राह्मण को यातना नहीं दी जाती थी। ब्राह्मणों को छोड़कर कोई भी न तो अन्तर्जातीय विवाह और नहीं दूसरों का पेशा (व्यवसाय) ही अपना सकता था।

    ➣ मेगस्थनीज ने भारतीय समाज को सात वर्गों– दार्शनिक (ब्राह्मण), कृषक (किसान, शूद्र एवं वैश्य), सैनिक (क्षत्रिय), पशुपालक (चरवाहा), शिल्पकार (दस्तकार), मजिस्ट्रेट (न्यायाधीश) और मंत्री/सलाहकार/पार्षद में विभाजित किया।

    ब्राह्मण समाज की शिक्षा एवं संस्कृति के संरक्षक थे, जिन्हें कर से मुक्त रखा जाता था। अपराध करने पर उन्हें यातना के बजाय माथे पर एक चिह्न दागा जबकि मृत्यु दंड में जल में डुबोकर मृत्यु दी जाती थी।

    ➣ मेगस्थनीज के अनुसार दार्शनिक दो प्रकार के होते थे- 1. ब्रोकामेन (गृहस्थ) 2. सारामेन (संन्यासी)

    ➣ मेगस्थनीज ने दार्शनिक मण्डलिक एवं सिकन्दर के बीच वार्तालाप का विवरण दिया है।

    ➣ मेगस्थनीज के अनुसार भारतीय यूनानी देवता डायोनिसियस (शिव) तथा हेराक्लीज (कृष्ण) की पूजा करते थे।

    ➣ अर्थशास्त्र में कृषि, पशुपालन तथा वाणिज्य को शूद्रों का धर्म बताया है। शूद्रों को सेना में भर्ती होने का अधिकार भी था।

    ➣ मौर्य काल में कृषकों की संख्या सर्वाधिक थी। दूसरे स्थान क्षत्रिय या योद्धा वर्ण था।

    संयुक्त परिवार की प्रथा ज्यादातर प्रचलित थी। अधिकांश विवाह एकात्मक का ही होते थे, यद्यपि बहु-विवाह के भी उदाहरण मिलते हैं।

    ➣ मेगस्थनीज ने अपनी पुस्तकों में बहुपत्नी प्रथा, विधवा पुनर्विवाह एवं विवाह विच्छेद (तलाक) का उल्लेख किया है।

    ➣ अर्थशास्त्र में 8 प्रकार के विवाहों (1.ब्रह्म, 2.दैव, 3.आर्य, 4.प्रजापत्य, 5.असुर, 6.गांधर्व, 7.राक्षस, 8.पैशाच) का उल्लेख किया गया है।

    अनुलोमप्रतिलोम विवाह भी विशेष परिस्थितियों में उचित थे। नियोग का भी प्रचलन था।

    ➣ अर्थशास्त्र में सती प्रथा का उल्लेख नहीं मिलता है। हालाँकि यूनानी लेखक भारत के उत्तर-पश्चिम में योद्धाओं की पत्नियों के सती होने का में उल्लेख करते हैं।

    सती प्रथा का पहला अभिलेखीय प्रमाण 510 ई. में गुप्त काल के ऐरण अभिलेख में मिलता है।

    स्त्रियों की दशा

    ➣ मौर्यकालीन समाज में स्त्रियों की स्थिति स्मृति काल की अपेक्षा अधिक सुरक्षित थी। उन्हें विवाह विच्छेद की अनुमति थी, जिसे अर्थशास्त्र में मोक्ष कहा गया है। उन्हें पुनर्विवाह एवं नियोग की अनुमति भी थी।

    ➣ उच्च वर्ग की स्त्रियाँ, जो घरों के अन्दर रहती थी, उन्हें कौटिल्य ने अनिष्कासिनी एवं सूर्य को न देखने वाली स्त्रियों को असूर्यपश्या कहा है

    ➣ मौर्यकालीन समाज में विधवा विवाह प्रचलित था। कुछ विधवाएँ स्वतंत्र रूप से जीवन यापन करती थीं, जिन्हें छंदवासिनी कहा जाता था।

    ➣ समाज में वेश्यावृति की प्रथा प्रचलित थी तथा उसे राजकीय संरक्षण भी प्राप्त था। स्वतंत्र रूप से वेश्यावृति करने वाली स्त्रियाँ रूपाजीवा कहलाती थीं। इनके कार्यों का निरीक्षण गणिकाध्यक्ष करता था।

    ➣ पुरुष गायक एवं नर्तक कलाकारों को रंगोपजीवी तथा ऐसी महिलाओं को रंगोपजीवनी कहा जाता था।

    ➣ मौर्य काल में महिलाओं को महल के रक्षकों, राजा के अंगरक्षकों तथा जासूसों के रूप में नियुक्त करने का उल्लेख मिलता है।

    ➣ इसके अलावा स्त्री दासों के रूप में धातृ, उपचारिकापरिचारिका का उल्लेख कौटिल्य ने किया है। स्त्री दासों की एक श्रेणी बंधकों भी थी।

    दास प्रथा

    मेगस्थनीज तथा स्ट्रैबो के अनुसार भारत में दास प्रथा नहीं थी, जबकि मौर्यकालीन अर्थव्यवस्था में दासों का महत्त्वपूर्ण योगदान था।

    ➣ मेगस्थनीज दास प्रथा को इसलिये नहीं देख पाया, क्योंकि दासों की स्थिति सन्तोषजनक थी। उनके साथ दयापूर्ण व्यवहार होता था तथा उन्हें संपत्ति रखने तथा बेचने का अधिकार भी था।

    ➣ इसके विपरीत यूरोप में दासों की स्थिति बेहद ही दयनीय थी। अशोक ने अपने अभिलेखों में दासों को उचित सम्मान व व्यवहार करने का निर्देश दिया था।

    ➣ त्रिपिटक में चार प्रकार तथा कौटिल्य ने नौ प्रकार के दासों का उल्लेख किया है। अशोक के शिलालेखों में दास और कर्मकार का उल्लेख मिलता है।

    ➣ कौटिल्य 9 प्रकार के दास हैं-

    1. ध्वजाहृतयुद्ध में जीता हुआ दास
    2. उदर दासपेट का दास
    3. गृहजातघर में दासी द्वारा उत्पन्न दास
    4. दायागतपैतृक सम्पत्ति के रूप में प्राप्त दास
    5. लब्धदान में प्राप्त हुआ दास
    6. क्रीतक्रय किया हुआ दास
    7. आत्मविक्रयीस्वयं को बेचने वाला दास
    8. अहितकऋण के बदले धरोहर के रूप में रखा गया दास
    9. दंडप्रणीतदण्ड के परिणाम स्वरूप बनाया गया दास

    ➣ कौटिल्य के अनुसार केवल अनार्य (म्लेच्छ, युद्धबन्दी ) को ही दास बनाया जा सकता है।

    ➣ कौटिल्य के अनुसार किसी भी परिस्थिति में आर्य (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्व एवं शूद्र) दास नहीं बनाया जा सकता।

    ➣ कौटिल्य के अर्थशास्त्र से बड़े पैमाने पर दासों को कृषि कार्यों में लगाए जाने वर्णन मिलता है। ये दास सम्भवत कैदी के रूप में कलिंग से लाये गए थे।

    राजस्व स्रोत

    ➣ राज्य में आय का प्रमुख स्रोत भूमिकर था। यह मुख्यतः उपज का 1/6 भाग होता था। भूमिकर दो प्रकार का होता था- 1. सेतु कर, 2. वन कर

    ➣ इसके अतिरिक्त सिंचाई की सुविधाओं से युक्त भूमि पर उपज का 1/5 से 1/3 भाग तक अतिरिक्त भूमि कर लिया जाता था।

    ➣ अशोक के रुम्मिनदेई अभिलेख के अनुसार, लुबिनी ग्राम से उत्पादन का मात्र 8वां भाग ही कर के रूप में लिया जाता था।

    ➣ बिक्री के लिए नगर में लाई गई वस्तुओं पर कर लगाए जाते थे और नगरों के प्रवेश द्वार पर भी वसूली की जाती थी। इसके अलावा, राज्य को खनन, शराब की बिक्री, हथियारों के निर्माण आदि में एकाधिकार प्राप्त था।

    ➣ विभिन्न कर निम्न प्रकार थे-

    सीता राजकीय एवं वन्य भूमि से आय पर कर
    सेतुबन्धराज्य की ओर से सिंचाई के प्रबन्ध हेतु कर।
    वर्तनीसड़क कर।
    तरदेयपुल पार करने पर।
    भाग किसानों की भूमि से लिया जाने वाला भूमिकर।
    बलि भाग के अतिरिक्त अन्य कर (धार्मिक कर)।
    प्रणय संकटकालीन अवस्था में राजा द्वारा वसूला जाने वाला कर।
    पिण्डकर राजा द्वारा पूरे गांव से वर्ष में एक बार वसूला जाने वाला कर।
    सेनाभक्तकर सेना के प्रयाण के समय प्रजा से तेल और चावल के रूप में लिया जाने वाला योगदान।
    औपायनिक विशेष अवसरों पर राजा को दी जाने वाली भेंट।
    पार्श्व अधिक लाभ होने पर व्यापारियों से लिया जाने वाला कर।
    कौष्ठेयक सरकारी जलाशयों के नीचे की भूमि पर लगाया जाने वाला कर।
    परिहीनक सरकारी भूमि पर पशुओं द्वारा की गयी हानि के बदले में लिया जाने वाला हर्जाना।
    रज्जु भूमि की नाप के समय लिया जाने वाला कर।
    बिवीत पशुओं की रक्षा के लिए लिया जाने वाला शुल्क।
    सेतु फल-फूल पर लिया जाने वाला कर।
    ध्रुवाधिकरण भूमिकर संग्रहकर्ता को ध्रुवाधिकरण कहा जाता था।

    ➣ ब्राह्मणों को राज्य से करमुक्त भूमि दान में मिलती थी। अर्थशास्त्र में ऐसी भूमि को ब्रह्मदेय कहा गया है।

    अर्थव्यवस्था

    ➣ राज्य की अर्थ-व्यवस्था कृषि, पशुपालन और वाणिज्य या व्यापार पर आधारित थी। जिन्हें सम्मिलित रूप से वार्ता कहा गया है।

      वार्ता = कृषि + पशुपालन + वाणिज्य या व्यापार

    ➣ कौटिल्य ने सर्वप्रथम वार्ता को शूद्र वर्ण की सामान्य वृत्ति माना।

    कृषि

    ➣ मौर्य काल मुख्यतः कृषि प्रधान था। भूमि पर राज्य तथा कृषक का अधिकार होता था।

    ➣ राजकीय भूमि की व्यवस्था करने वाला प्रधान अधिकारी सीताध्यक्ष कहलाता था। अर्थशास्त्र में हल से जोतकर उत्पन्न किये गये पदार्थ को सीता कहा गया है।

    ➣ अर्थशास्त्र के अनुसार दासों को कृषि कार्य में लगाया जाता था। यह एक महत्वपूर्ण सामाजिक परिवर्तन था।

    ➣ कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में दस प्रकार की भूमियों का वर्णन किया है। इनमें कुछ भूमि इस प्रकार हैं-

    1. अदेवमातृक वह भूमि, जिसमें बिना वर्षा के (कृत्रिम साधनों से) भी अच्छी खेती हो सके।
    2. देवमातृक सिर्फ वषां द्वारा खेती पर निर्भर भूमि।
    3. कृष्ट जुती हुई भूमि।
    4. अकृष्ट बिना जुती हुई भूमि।
    5.स्थल ऊँची भूमि।

    अदेवमातृक मुख्य कृषि भूमि होती थी जिसमे बिना वर्षा के भी अच्छी खेती होती थी। निजी खेती करने पर राजा को उपज का 1/6 भाग दिया जाता था।

    ➣ अर्थशास्त्र में धान को सर्वोत्तम जबकि गन्ने को निम्नतम फसल कहा गया है। अर्थशास्त्र से 1 ही वर्ष में 3 प्रकार के फसलों के बोये जाने का वर्णन मिलता है –

    हैमन रबी फसल
    गृष्मिक खरीफ फसल
    केदा जायफ फसल

    ➣ कौटिल्य ने ईंख (गन्ने) की खेती को अधम कहा है। वार्ता शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख गौतम ने किया।

    ➣ सिंचाई पर विशेष ध्यान दिया जाता था। प्राकृतिक स्रोतों से सिंचाई सहोदय सेतु एवं कृत्रिम उपायों से सिंचाई आहार्योदक सेतु कहलाती थी।

    ➣ अर्थशास्त्र में आय के सात साधनों (दुर्ग, राष्ट्र, खनिज, सेतु, वन, ब्रज, वणिक पथ) को राज्य का आय रूपी शरीर कहा है।

    ➣ कृषक उपज का 1 /6 से लेकर 1 /4 भाग तक भूमिकर राज्य को देते थे।

    ➣ कर मुक्त गाँवों को परिहारिका कहा जाता था। जो गाँव सैनिक आपूर्ति करते थे, उन्हें आयुधिका तथा जो गाँव कच्चे माल की आपूर्ति करते थे, उन्हें कुप्य कहा जाता था।

    ➣ अशोक के रूम्मिनदेई अभिलेख में केवल दो करों का उल्लेख मिलता है- बलि और भाग। अर्थशास्त्र में कुल 21 प्रकार के करों का उल्लेख है।

    ➣ निजी भूमि से प्राप्त आय भाग कहलाती थी एवं राजकीय भूमि से प्राप्त आय सीता कहलाती थी।

    ➣ अर्थशास्त्र में प्रणय कर (1/3 से 1/4) का उल्लेख है। यह एक आपातकालीन कर था।

    ➣ मेगस्थनीज के अनुसार भारत में अकाल नहीं पड़ता, जबकि अर्थशास्त्र के अनुसार भारत में अकाल पड़ते थे। अर्थशास्त्र में अकाल के समय राजा द्वारा जनता की भलाई के उपायों का वर्णन है।

    ➣ अर्थशास्त्र में वनों के प्रकारों का भी वर्णन मिलता है , जिसमे मृगवन पालतू पशुओं के लिए, द्रव्यवन उपयोगी खानो व लकड़ी के लिए जबकि हस्तिवन हाथियों के लिए होता था। कुप्याध्यक्ष वन सम्पदा की देखभाल करता था।

    वाणिज्य या व्यापार

    ➣ मौर्य काल में व्यापार (आंतरिक एवं बाह्य), जल एवं स्थल दोनों मार्गों से होता था। मौर्य काल में पूर्वी तट पर ताम्रलिप्ति और पश्चिमी तट पर भृगुकच्छ तथा सोपारा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बन्दरगाह थे।

    ➣ इस समय भारत का बाह्य व्यापार रोम, सीरिया, फारस, मिग्र तथा अन्य पश्चिमी देशों के साथ होता था। यह व्यापार पश्चिमी भारत में भृगुकच्छ बंदरगाह से तथा पूर्वी भारत में ताम्रलिप्ति के बंदरगाहों द्वारा किया जाता था।

    ➣ आंतरिक व्यापार के प्रमुख केंद्र थे। तक्षशिला, काशी, उज्जैन, कौशांबी तथा तोसली (कलिंग राज्य की राजधानी) आदि।

    ➣ भारत विदेश में हाथीदांत, मोती, कछुए, सीपिया, रंग, नील एवं वस्त्र निर्यात करता था, जबकि सोना, कीमती वस्त्र, मीठी शराब आयात करता था।

    चीनीपट्ट चीन से आने वाला रेशम
    पत्रोम पेड़ के पत्तों या रेशों से बनाये गये वस्त्र
    दुकुल श्वेत एवं चिकना वस्त्र (पेड़ की छाल से)
    क्षौम एक प्रकार का रेशमी वस्त्र
    कौसेय कौटिल्य द्वारा वर्णित एक प्रकार का वस्त्र

    ➣ व्यापारिक जहाजों का निर्माण इस काल का प्रमुख उद्योग था। स्टैबो ने लिखा है कि मौर्यकाल में जलयान निर्माण पर राज्य का एकाधिकार था।

    ➣ अन्तर्देशीय व्यापार गाड़ियों तथा सार्थवाहों के माध्यम से किया जाता था।

    ➣ अर्थशास्त्र के अनुसार काशी, बंग, पुण्डू, कलिंग, मालवा सूती वस्त्रों के लिए प्रसिद्ध थे। काशी और पुण्डू में रेशमी कपड़े भी बनते थे। प्राचीन काल में बंग का मलमल विश्वविख्यात था।

    ➣ कौटिल्य ने चीनी पट्ट का भी उल्लेख किया, जिससे पता चलात है कि रेशम चीन से आता था।

    ➣ अन्य वस्त्रों में दुकूल (स्वेत एवं चिकना वस्त्र) क्षौम (एक प्रकार का रेशमी वस्त्र) का भी उल्लेख मिलता है। बढ़ई गिरी भी एक प्रमुख उद्योग था।

    ➣ मिस्र से भारत आने वाली वस्तुओं का विनिमय अरब सागर के तटवर्ती बन्दरगाहों पर होता था। भारत से मित्र को हाथीदाँत, कछुए, सीपियाँ, मोती, रंग, नील और बहुमूल्य लकड़ी का निर्यात होता था।

    ➣ मित्र एवं भारत के बीच मौर्यकाल में होने वाले व्यापार को और अधिक बढ़ाने के लिए टालमी ने लाल सागर पर बरनिस नामक बन्दरगाह की स्थापना की थी।

    ➣ भारत के साथ बैक्ट्रियाई व्यापार को सुसाध्य बनाने के लिए एण्टियोकस प्रथम ने सेल्यूकस के साथ अपने संयुक्त शासन के समय एटिक मानक के स्थान पर भारतीय मानक के सिक्के प्रसारित किये।

    व्यापारिक मार्ग

    प्रथम मार्ग बंगाल के समुद्र-तट पर स्थित ताम्रलिप्ति नामक बन्दरगाह से पश्चिमोत्तर भारत में पुष्कलावती तक जाता था (उत्तरापथ)।
    दूसरा मार्ग पश्चिम में पाटल से पूर्व में कौशाम्बी के समीप उत्तरापथ मार्ग से मिलता था।
    तीसरा मार्ग दक्षिण में प्रतिष्ठान से उत्तर में श्रावस्ती तक जाता था।
    चौथा मार्ग यह मार्ग भृगुकच्छ से मथुरा तक जाता था। जिसके मार्ग में उज्जयिनी पड़ता था।

    ➣ कौटिल्य ने दक्षिण-मार्ग श्रावस्ती से प्रतिष्ठान (गोदावरी) को अधिक लाभदायक बताया है; क्योंकि दक्षिण से बहुमूल्य व्यापार की वस्तुएं जैसे मुक्ता, मणि, हीरे, सोना, शंख इत्यादि इन्हीं मार्गों से आते थे। (तीसरा मार्ग)

    ➣ व्यापारी श्रेणियों में संगठित थे। इनका मुखिया श्रेष्ठी कहलाता था। जातकों में 18 प्रकार की श्रेणियों का उल्लेख है।

    • व्यापार शुल्क तीन प्रकार के बताए गए हैं:
    • स्वदेश में उत्पन्न वस्तु पर लिया जाने वाला शुल्क बाह्य कहलाता था।
    • राजधानी में लिया जाने वाला शुल्क अभ्यांतर कहलाता था।
    • विदेशी माल पर वसूल किया जाने वाला शुल्क आघित्य कहलाता था।

    ➣ इसी प्रकार निर्यात पर निष्क्रामय तथा आयात पर प्रवेश्य लगाया जाता था।

    ➣ स्थानीय वस्तुओं (देशज) पर 4 प्रतिशत एवं विदेशों से आयातित वस्तुओं पर 10 प्रतिशत बिक्रीकर था।

    ➣ मेगस्थनीज के अनुसार एस्तिनोमाई नामक अधिकारी सडकों की देखभाल करता था तथा दूरी निर्देशित करने के लिए 10 स्टेडिया की दूरी पर पत्थर स्थापित करते थे।

    दूरी मापने की इकाई को 10 स्टेडिया कहा जाता था।

    ➣ कर्टियस के अनसार भारतीय सन के वस्त्र एवं वृक्षों की छाल का (भोजपत्र) प्रयोग लिखने के लिए करते थे।

    उद्योग

    ➣ उद्योग-धंधों की संस्थाओं को श्रेणी कहा जाता था। श्रेणियों के पृथक न्यायालय होते थे जो व्यापार-व्यवसाय से संबंधित विवादों का निपटारा करते थे। श्रेणी न्यायालय के प्रधान को महाश्रेष्ठि कहा जाता था।

    1. श्रेणी शिल्पियों का संगठन
    2. निगम व्यापारियों का संगठन
    3. संघ महाजनों व देनदारों का संगठन
    4. सार्थवाह अनाज से संबद्ध व्यापारियों का समूह
    5. समय संगठनों के कानून का समूह

    ➣ मौर्यकाल का प्रधान उद्योग सूत काटना एंव बुनना था।

    ➣ कारखानों में बनी वस्तुएं पण्याध्यक्ष के नियंत्रण में बाजारों में बेची जाती थी।

    ➣ यूनानी लेखक कर्टियस ने श्वेत लोहे की तलवार का उल्लेख किया है तथा यह भी कहा है कि मौर्यकाल में लौह उद्योग अत्यन्त विकसित अवस्था में था।

    मौर्यकालीन सिक्के

    ➣ मौर्यकाल तक मुद्रा का भी प्रचलन प्रारम्भ हो गया था। मुद्रा के निर्माण एवं संचालन पर राज्य का एकाधिकार था। मौर्यकाल में मुद्राओं की दो कोटियां, कोष प्रवेश्य और व्यावहारिक थीं-

    • कोष प्रवेश्य – सम्पूर्ण राजकीय कार्यों में किया जाता था।
    • व्यावहारिक – साधारण लेन-देन में किया जाता था।

    ➣ मौर्यकालीन सिक्के आहत सिक्के (पंचमार्क) थे। वेदिका से घिरा वृक्ष मौर्यकालीन आहत सिक्कों पर प्रतीक है।

    ➣ अर्थशास्त्र में चांदी के रूप्यरूप, सोने के स्वर्णरूप एवं तांबे के ताम्ररूप का उल्लेख है।

    ➣ अर्थशास्त्र से भी विस्तृत मुद्रा प्रणाली की चर्चा की गई है। विभिन्न प्रकार के सिक्कों का उल्लेख मिलता है-

    स्वर्ण के सिक्के निष्क एवं सुवर्ण
    चांदी के सिक्के पण, अर्द्धपण, रूप्य, धारण, शतमान, पाद, अष्टभाग
    तांबे के सिक्के माशक, अर्द्धमाशक, काकणी व अर्द्धकाकणी
    चांदी एवं तांबा मिश्रित काषार्पण

    ➣ मौर्यों की राजकीय मुद्रा पण थी। पण 3/4 तोले के बराबर चाँदी का सिक्का था। इसके ऊपर सूर्य, चन्द्र, पीपल, मयूर, बैल, सर्प आदि के चित्र खुदे होते थे।

    लक्षणाध्यक्ष मुद्रा जारी करता था। लोग जब स्वयं सिक्के बनाते थे तो उसे राज्य को व्याज रुपिका और परीक्षण के रूप में देना पड़ता था।

    ➣ मुद्राओं का परीक्षण करने वाले अधिकारी को रूपदर्शक कहा जाता था।

    ➣ राज्य के शीर्षस्थ अधिकारियों को 48000 पण जबकि सबसे निम्न अधिकारियों को 60 पण वेतन मिलता था। सेनापति का वार्षिक वेतन 48 हजार पण था।

    मयूर, पर्वत और अर्द्धचन्द्र की छाप वाली आहत रजत मुद्राएं मौर्य साम्राज्य की मान्य मुद्राएं थीं।

    मौर्यकालीन कला

    ➣ हड़प्पा सभ्यता के पश्चात पहली बार भारतीय कला के सम्बन्ध में स्पष्ट प्रमाण मौर्य काल के मिलते हैं। मौर्या काल में वास्तुकलामूर्तिकला की अनोखी प्रगति हुई।

    कुमारस्वामी ने मौर्य कला को राजकीय कला एवं लोक कला में विभाजित किया। राजकीय कला में राजरक्षकों द्वारा निर्मित स्मारकों को शामिल किया गया, जैसे-स्तंभ, गुहा, स्तूप आदि।

    पाटलिपुत्र/पटना के समीप बुलन्दीबाग से नगर के परकोटे एवं कुम्रहार से 80 स्तम्भ वाले राजप्रसाद के अवशेष मिले हैं। इन्हें प्रकाश में लाने का श्रेय स्पूनर महोदय को है।

    ➣ मौर्य काल के सर्वोत्कृष्ट नमूने अशोक के एकाश्म स्तंभ हैं जोकि उसने धम्म प्रचार के लिये देश के विभिन्न भागों में स्थापित किये थे।

    अशोक के स्तम्भ

    ➣ अशोक के एकाश्मक स्तम्भ (एक ही पत्थर को तराश कर बनाये गये) मौर्य कला के सर्वश्रेष्ठ नमूने हैं। इन पर चमकदार पॉलिश है।

    ➣ अशोक के स्तम्भ उत्तर प्रदेश के चुनार (मिर्जापुर) के बलुआ पत्थर से बने हैं।

    सांची एवं भरहुत के मूल स्तूप के निर्माण का श्रेय भी अशोक को दिया जाता है।

    ➣ उल्लेखनीय है अशोक को स्तम्भ लगवाने एवं उन पर अभिलेख खुदवाने का विचार अखैमनी (ईरान) के शासक डेरियस या दारा प्रथम (522 ई.पू. से 486 ई.पू.) से मिला।

    ➣ अशोक का प्रथम स्तम्भ बसाढ़ बखिरा (वैशाली) का कोलुहा स्तम्भ है। इसके शीर्ष पर शेर की मूर्ति है, यह बुद्ध के अन्तिम उपदेश की स्मृति में निर्मित है।

    फाह्यान ने 6 एवं ह्वेनसांग ने अशोक के 15 स्तम्भों का उल्लेख किया, जबकि वर्तमान में 30 स्तम्भ प्राप्त हैं।

    रूम्मिनदेई स्तम्भ सबसे छोटा है एवं इसके शीर्ष पर घोड़े की आकृति है।

    सारनाथ स्तम्भ चौकी/फलक पर पशुओं का क्रम-गज (हाथी), वृषभ (बैल), घोड़ा, सिंह है। यह आज हमारा राष्ट्रीय चिह्न है। ज्ञातव्य हो अशोक स्तम्भ के फोटो में केवल बैल एवं घोड़ा ही दिखते हैं।

    लोककला

    ➣ मौर्य काल में मिट्टी की मूर्ति बड़े पैमाने पर तैयार की जाती थी। जो सामान्यत: जानवरों और महिलाओं के प्रतीक थे।

    ➣ मौर्य काल में मूर्तियों का निर्माण चिपकवा विधि (अंगुलियों या चुटकियों का इस्तेमाल करके) या साँचे में ढालकर किया जाता था।

    ➣ महिलाओं में देवियाँ और जानवरों में हाथी की मूर्तिया हुआ करती थी। इन मूर्तियों को हाथ से तैयार किया गया था।

    ➣ मौर्यकालीन मूर्तियों में विशेष उल्लेखनीय परखम (मथुरा) से प्राप्त यक्ष की मूर्ति,पटना से प्राप्त यक्ष की 2 मूर्तियां, दीदारगंज से प्राप्त चामरधारिणी यक्षी की मूर्ति, लोहानीपुर से प्राप्त नग्न तीर्थंकर की मूर्ति, बेसनगर में मिली यक्षी-मूर्तियां हैं।

    दीदारगंज की यक्षी मौर्यकालीन मूर्तिकला की सर्वोत्तम कृति मानी गयी हैं। पुरे विश्व में इसके समकक्ष अन्य कोई भी मूर्ति नहीं है।

    ➣ पटना के बुलन्दीबाग से नर्तकी की एक मृणमूर्ति है तथा रथ का एक पहिया मिला है, जिसमें 24 तीलियाँ हैं। लोहानीपुर (पटना) से दो जैन तीर्थंकरों की प्रतिमा प्राप्त हुई हैं।

    रोपड़ से मौर्यकालीन हाथीदांत की एक मुहर मिली है। इस पर शासक का नाम भदूपालकस लिखा है, जो यहाँ का स्थानीय शासक था।

    वास्तुकला

    ➣ मौर्यों ने वास्तुकला में उल्लेखनीय योगदान दिया और बड़े पैमाने पर पत्थरों के भवन निर्माण की भी शुरुआत की।

    ➣ मेगस्थनीज के अनुसार पाटलिपुत्र में मौर्य महल ईरान की राजधानी के महल की तरह शानदार था।

    पत्थर के खम्भों और उनके टुकड़ों के साक्ष्य आधुनिक पटना के सीमावर्ती क्षेत्र कुम्हरा में मिले हैं। जो एक 84-स्तम्भों वाले हॉल के अस्तित्व का संकेत देते हैं।

    गुहाकला

    ➣ मौर्य कारीगरों ने, बौद्ध भिक्षुओं के निवास के लिए चट्टानों को काट कर गुफा बनाने की भी शुरुआत की। सबसे पहला उदाहरण, गया से 30 किलोमीटर की दूरी पर बराबर की गुफा है।

    ➣ मौर्यकाल में कुल सात गुफाओं का निर्माण हुआ। बराबर (पूर्व में गया जिला, वर्तमान जेहानाबाद) की तीन गुफाओं का निर्माण अशोक ने करवाया। A passage to India में बराबर की गुफाओं का उल्लेख है।

    ➣ बराबर की पहाड़ियों में लोमश ऋषि की गुफा भी मौर्यकालीन है। इसका निर्माण दशरथ ने करवाया था।

    ➣ इनके नाम कर्ण चौपार, सुदामा तथा विश्वकर्मा (विश्व झोंपड़ी) हैं। सुदामा गुफा एवं विश्वकर्मा गुफा अशोक ने राज्याभिषेक के 12वें वर्ष एवं कर्ण चौपार राज्याभिषेक के 19वें वर्ष में आजीविकों को प्रदान की।

    ➣ अशोक के पौत्र दशरथ ने भी नागार्जुनी पहाड़ियों में आजीविकों को 3 गुफाएँ प्रदान की। इनमें गोपी गुफा प्रसिद्ध है। वापी गुफा तथा पदथिक गुफा अन्य गुफाएँ हैं।

    ➣ राजगृह के निकट सीतामढ़ी गुफा है। यह किसी पहाड़ी पर नहीं है, बल्कि स्वतंत्र रूप से ग्रेनाइट पत्थर को भीतर से खोदकर बनाया गया है। इसका निर्माण सम्भवतः दशरथ कराया था।

    धर्म

    ➣ मौर्य काल में वैदिक धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म तथा आजीवक धर्म प्रमुख थे। चंद्रगुप्त मौर्य जैन धर्म का अनुयायो, बिंदुसार आजीवक तथा अशोक बौद्ध धर्म का अनुयायी था।

    ➣ सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म को अपने शासनकाल में राजकीय संरक्षण दिया था।

    ➣ मौर्यकाल में वैदिक धर्म भी प्रचलित था, किन्तु कर्मकाण्ड प्रधान वैदिक धर्म अभिजात ब्राह्मण तथा क्षत्रियों तक ही सीमित था।

    ➣ पतंजलि के अनुसार मौर्यकाल में देवमूर्तियों को बेचा जाता था। देवमूर्तियों को बनाने वाले शिल्पियों को देवता कारू कहा जाता था।

    ➣ जनसाधारण में नागपूजा का प्रचलन था। मूर्तिपूजा भी की जाती थी।

    ➣ मेगस्थनीज ने धार्मिक व्यवस्था में डायोनिसस एवं हेराक्लीज से की है, जिसकी पहचान क्रमशः शिव एवं विष्णु से की गई है।

    भाषा व साहित्य

    ➣ मौर्य काल में तीन भाषाओं का प्रचलन था- संस्कृत, प्राकृत और पालि। इस युग में इन तीनों भाषाओं में श्रेष्ठ साहित्य की रचना हुई।

    ➣ अशोक ने इनमें से पालि को सम्पूर्ण साम्राज्य की राजभाषा बनाया और इसी भाषा में अपने अभिलेख भी उत्कीर्ण कराए।

    ब्राह्मण, जैनबौद्धधर्मों के विकास ने धार्मिक साहित्य की रचना को प्रभावित किया।

    वेदांगों, गृह्यसूत्रोंधर्मसूत्रों की रचना इसी काल में हुई। इसी प्रकार बौद्ध त्रिपिटकोंजैनसूत्रों की भी रचना हुई।

    ➣ कौटिल्य का अर्थशास्त्र प्रथम राजनीतिक पुस्तक ,भी इसी काल की रचना है।

    मौर्य प्रशासन के विभाग एवं उनके अध्यक्ष

    आकाराध्यक्ष खान एवं धातुकर्म का प्रमुख अधिकारी
    अक्षपटलाध्यक्ष लेखा नियंत्रक
    आयुधागाराध्यक्ष आयुध विभाग का अध्यक्ष
    गणिकाध्यक्ष मनोरंजनकर्ताओं का नियंत्रक या वेश्यालयों की देख-रेख करने वाला अधिकारी
    कुप्याध्यक्ष वन उत्पादों का अध्यक्ष
    लक्षणाध्यक्ष टकसाल का प्रमुख
    लवणाध्यक्ष नमक अधीक्षक
    मद्राध्यक्ष परिपत्र अधिकारी
    नागावनाध्यक्ष हाथी वनपाल
    नवाध्यक्ष जहाज वाहन नियंत्रक
    कोषाध्यक्ष कोष का अध्यक्ष
    ध्युताध्यक्ष द्यूतक्रीड़ा का अध्यक्ष
    बंधनागाराध्यक्ष कारागार का अध्यक्ष
    अश्वाध्यक्ष अश्वारोही सेना का सेनाध्यक्ष
    देवताध्यक्ष मंदिरों का अध्यक्ष
    गो-अध्यक्ष राजसी मवेशियों का अध्यक्ष
    मनाध्यक्ष सर्वेक्षक एवं समयपालक
    पण्याध्यक्ष राज्य व्यापार नियंत्रक
    पौतवाध्यक्ष माप-तौल का नियंत्रक
    पत्याध्यक्ष पैदल सेनाध्यक्ष
    पत्तनाध्यक्ष राज्य बंदरगाह नियंत्रक
    संस्थाध्यक्ष निजी व्यापार नियंत्रक
    सीताध्यक्ष राजसी भूमि का अध्यक्ष
    सूनाध्यक्ष पशुओं का रक्षक एवं बूचड़खाना नियंत्रक
    सुराध्यक्ष मदिरा नियंत्रक
    सुत्राध्यक्ष वस्त्र आयुक्त
    विविताध्यक्ष चारागाह नियंत्रक
    सुवर्णाध्यक्ष कीमती धातु एवं आभूषण अध्यक्ष
    शुल्काध्यक्ष सीमा शुल्क एवं चुंगी नियंत्रक
    कोष्टगाराध्यक्ष गोदाम का अध्यक्ष
    लोहाध्यक्ष धातुओं का अध्यक्ष
    रथाध्यक्ष रथ सेनाध्यक्ष

    मौर्य काल के विभिन्न पदाधिकारी

    युक्त ये जिले के अधिकारी होते थे जो राजस्व वसूल करते तथा उसका लेखा-जोखा रखते थे और सम्राट की सम्पत्ति का भी प्रबन्ध करते थे।
    राजुक इस प्रकार के पदाधिकारी भूमि की पैमाइश करने के लिए अपने पास रस्सी रखते थे। वे आजकल के बंदोबस्त अधिकारी की भांति होते थे।
    प्रादेशिक यह मंडल का प्रधान अधिकारी होता था। उसका कार्य आजकल के संभागीय आयुक्त जैसा था।
    धम्ममहामात्र इनका कार्य विभिन्न सम्प्रदायों के बीच सामंजस्य बनाये रखना, राजा तथा उसके परिवारों के सदस्यों से धम्म दान प्राप्त करना और उसकी समुचित व्यवस्था करना होता था।
    रूयाध्यक्ष यह महिलाओं के नैतिक आचरण की देख-रेख करने वाला अधिकारी होता था।
    ब्रजभूमिक यह गोचर भूमि में बसने वाले गोपों की देख-रेख करने वाला अधिकारी था।
    राजुक ग्रामीण जनपदों की देखभाल के लिए इसके पास कर संग्रह के साथ-साथ न्यायिक शक्तियां भी थी।
    प्रादेशिक जिला अधिकारी महामात्र-उच्च अधिकारी, नगर प्रशासन के सम्बन्धित
    प्रतिवेदक इनका कार्य सम्राट को विभिन्न सूचना देना था।
  • जैन धर्म | One-Liner Practice

    ❑ जैन परम्परा के अनुसार इस धर्म में 24 तीर्थंकर हुए हैं।

    ❑ जैन धर्म के पहले तीर्थंकर एवं संस्थापक ऋषभदेव थे। अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी के अनुयायी निर्ग्रन्थ कहलाते थे।

    ❑ महावीर जैन धर्म के वास्तविक संस्थापक थे।

    ❑ महावीर स्वामी का जन्म 540 ई.पू. में वैशाली के कुण्डग्राम में हुआ था, यह बिहार राज्य में है।

    ❑ उनकी माता त्रिशला वैशाली के लिच्छवी गणराज्य के प्रमुख चेटक की बहन थी।

    ❑ महावीर स्वामी को जम्भृक ग्राम के निकट, ऋजुपालिका नदी के तट पर ज्ञान प्राप्त हुआ था।

    ❑ महावीर की पत्नी का नाम यशोदा था।

    ❑ यशोदा से जन्म लेने वाली महावीर की पुत्री प्रियदर्शना का विवाह जमालि नामक क्षत्रिय से हुआ, वह महावीर का प्रथम शिष्य था।

    ❑ जैन धर्म में पूर्ण ज्ञान को कैवल्य ज्ञान कहा गया है।

    ❑ पिता सिद्धार्थ ज्ञातृक क्षत्रियों के संघ के प्रधान थे। उनके बड़े भाई नंदिवधन थे।

    ❑ महावीर स्वामी की मृत्यु पावापुरी में 468 ई. पू. में हुई थी। बुद्ध की मृत्यु कुशीनारा में हुई थी।

    ❑ बौद्ध साहित्य में महावीर को निगण्ठ-नाथंपुत्त कहा गया है।

    ❑ जैन भिक्षुओं को नग्न रहने की शिक्षा महावीर स्वामी ने दी थी।

    ❑ पार्श्वनाथ के चार व्रतों अहिंसा (हिंसा नहीं करना), अमृषा या झूठ न बोलना, अचौर्य या चोरी न करना, अपरिग्रह या संपत्ति अर्जित नहीं करना में महावीर ने पाँचवाँ व्रत ब्रह्मचर्य या इंद्रिय निग्रह करना जोड़ा।

    ❑ जैन धर्म का सबसे महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त अहिंसा था।

    ❑ जैन साहित्य को अंग कहते हैं।

    ❑ जैन धर्म के मौलिक ग्रन्थ चौदह पूर्व कहलाते हैं।

    ❑ जैन धर्म के अनुसार निर्वाण प्राप्ति के लिये त्रिरत्न का अनुशीलन आवश्यक जैन धर्म का सबसे बड़ा केन्द्र चम्पानगरी था।

    ❑ शुरू में जैनियों द्वारा प्राकृत भाषा को अपनाया गया।

    ❑ महावीर स्वामी ने अपना प्रथम उपदेश राजगीर में (पालि भाषा में) दिया था।

    ❑ कर्नाटक में जैन धर्म को चन्द्रगुप्त मौर्य ले गया।

    जैन सिद्धों की पांच श्रेणियाँ
    1. तीर्थंकर-जिसने मोक्ष प्राप्त किया हो।
    2. अर्हत-जो निर्वाण प्राप्ति की ओर अग्रसर हो ।
    3. आचार्य-जो जैन भिक्षु समूह का प्रमुख हो ।
    4. उपाध्याय-जैन शिक्षक।
    5. साधु-सभी जैन भिक्षु

    ❑ श्रवणबेलगोला में गोमतेश्वर की मूर्ति चामुण्डराय ने बनवाई।

    ❑ कलिंग राजा खारवेल तथा अजातशत्रु का पुत्र उदायिन जैन धर्म के अनुयायी थे।

    ❑ महावीर स्वामी ने प्राकृत भाषा को प्रचार का माध्यम बनाया।

    ❑ मथुरा मूर्तिकला के विकास में जैन मत का सर्वाधिक योगदान रहा।

    ❑ जैन धर्म दो सम्प्रदायों, श्वेताम्बर एवं दिगम्बर में बँट गया।

    ❑ जैन धर्म का प्रसिद्ध सिद्धान्त स्यावाद (सप्तभंगी ज्ञान) या अनेकान्तवाद है।

    ❑ जैनियों द्वारा शरीर को भूखा रखकर प्राण त्यागने को सल्लेखना विधि कहा जाता है।

    ❑ जैन मठों को बसदि कहा जाता था।

    ❑ महावीर की मृत्यु के बाद सुधर्मन, जो गंधर्व था, जैन धर्मगुरु बना।

    ❑ जैन धर्म में ईश्वर एवं आत्मा की मान्यता नहीं है।

    ❑ जैन तीर्थंकर ऋषभदेव तथा अरिष्टनेमि का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है।

    ❑ विष्णु पुराण तथा भागवत पुराण में ऋषभदेव का उल्लेख नारायण के अवतार के रूप में मिलता है।

    ❑ भद्रबाहु एवं उनके अनुयायियों को दिगम्बर कहा गया। ये दक्षिणी जैनी कहे जाते थे।

    ❑ स्थूलभद्र एवं उनके अनुयायियों को श्वेताम्बर कहा गया।

    ❑ जैन अनुश्रुतियों के अनुसार पार्श्वनाथ को 100 वर्ष की आयु में सम्मेद पर्वत पर निर्वाण प्राप्त हुआ।

    ❑ जैन धर्मानुसार ज्ञान के तीन स्रोत हैं- (1) प्रत्यक्ष (2) अनुमान (3) तीर्थंकरों के वचन।

    ❑ महावीर के जीवन काल में ही 10 गणधर की मृत्यु हो गयी, महावीर के बाद केवल सुधर्मण जीवित था।

    ❑ खारवेल के हाथी गुम्फा की गुफाओं में प्रारंभिक जैन के अवशेष मिलते हैं।

    ❑ जैन धर्म पुनर्जन्म एवं कर्मवाद में विश्वास करता है। उनके अनुसार कर्मफल ही जन्म तथा मृत्यु का कारण है।

    ❑ राजस्थान में माउण्ट आबु पर दिलवाड़ा मंदिर का निर्माण जैन धर्म के अनुयायियों द्वारा किया गया।

    ❑ जैन परम्परा के अनुसार अरिष्टनेमि कृष्ण के समकालीन थे।

    ❑ चम्पा के शासक दधिवाहन की पुत्री चन्दना महावीर की पहली महिला भिक्षुणी थी।

  • जैन धर्म: वर्धमान महावीर | Q&A Practice

    ➣ जैन परंपरा के अनुसार, इसके कुल 24 तीर्थंकर हुए हैं। इनमें से प्रथम तीर्थंकर कौन धे?
    उत्तर : ऋषभदेव

    ➣ महावीर कौन-से तीर्थंकर थे ?
    उत्तर : 24वें तीर्थंकर

    ➣ महावीर ने जैन धर्म में अतिरिक्त एक अन्य उपदेश कौन-सा जोड़ा था ?
    उत्तर : ब्रह्मचर्य

    ➣ जैन धर्म की वास्तविक स्थापना पार्श्वनाथ (23 वें) के आध्यात्मिक शिष्य किसने की?
    उत्तर : वर्धमान महावीर

    ➣ वर्धमान महावीर को ‘जिन’ भी कहा जाता था। ‘जिन’ का शाब्दिक अर्थ क्या है?
    उत्तर : विजेता

    ➣ ऋग्वेद में किन दो जैन तीर्थंकरों का उल्लेख मिलता है?
    उत्तर : ऋषभदेव और अरिष्टनेमि

    ➣ वर्धमान महावीर का जन्म कहाँ हुआ था ?
    उत्तर : वैशाली के निकट कुंडग्राम (वज्जि संघ का गणराज्य)

    ➣ नालंदा के समीप किस स्थान को भी भगवान महावीर का जन्म स्थान माना जाता है?
    उत्तर : कुण्डलपुर

    ➣ महावीर की माता किस गणराज्य की राजकुमारी थीं ?
    उत्तर : लिच्छवी गणराज्य

    ➣ महावीर की पत्नी का क्या नाम था?
    उत्तर : यशोदा

    ➣ महावीर ने किस आयु में गृहत्याग कर दिया था?
    उत्तर : 30 वर्ष

    ➣ 12 वर्ष की तपस्या बाद महावीर को जुम्भिकग्राम के समीप किस नदी के किनारे एक साल के वृक्ष के नीचे कैवल्य (सर्वोच्च ज्ञान) प्राप्त हुआ?
    उत्तर : ऋजुपालिका नदी

    ➣ जैन धर्म में सल्लेखना से क्या तात्पर्य है?
    उत्तर : उपवास द्वारा शरीर का त्याग

    ➣ जैन धर्म बाद में किन दो सम्प्रदायों में विभाजित हो गया था ?
    उत्तर : पहला, श्वेताम्बर ( तेरापन्थी) और दूसरा, दिगम्बर (समैया ) |

    ➣ स्थूलभद्र ने श्वेताम्बर सम्प्रदाय का नेतृत्व किया। दिगम्बर सम्प्रदाय का नेतृत्व किसने किया?
    उत्तर : भद्रबाहु

    ➣ भद्रबाहु एवं उनके अनुयायियों को अन्य किस नाम से जाना जाता था ?
    उत्तर : दक्षिणी जैनी

    ➣ महावीर ने अपने जीवन काल में ही एक संघ की स्थापना की, जिसमें 11 प्रमुख अनुयायी सम्मिलित थे। इनको क्या कहा जाता था?
    उत्तर : गणधर

    ➣ इन 11 गणधरों में से 10 की मृत्यु महावीर स्वामी के समय में ही हो गयी थी। सिर्फ एक गणधर जीवित बचा था। उसका क्या नाम था?
    उत्तर : आर्य सुधर्मण

    ➣ महावीर स्वामी की मृत्यु 72 वर्ष की उम्र में 468 ई.पू. में कहां हुई?
    उत्तर : पावा

    ➣ महावीर ने जीवन का मुख्य उद्देश्य क्या बताया ?
    उत्तर : कैवल्य (निर्वाण) या ज्ञान प्राप्त करना

    ➣ महावीर ने जाति प्रथा को स्वीकार किया, मगर उसका आधार उन्होंने कर्म को बताया, या कि जन्म को?
    उत्तर : कर्म को

    ➣ जैन धर्म में देवताओं के अस्तित्व को स्वीकार किया गया है, किन्तु उनसे ऊपर का स्थान किसको प्रदान किया गया है?
    उत्तर : जिन

    ➣ जैन धर्म में सभी वस्तुओं में आत्मा की परिकल्पना की गयी है और अमर माना गया है। क्या वे आत्मा के पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं?
    उत्तर : हां

    ➣ जैन धर्म में पांच महाव्रत ( पांच प्रतिज्ञाएं या पंच अणुव्रत) हैं ‘अहिंसा’, ‘सत्य’,

    ➣ जैन धर्म के पहले चार पूर्ववर्ती व्रत किसकी देन थे?
    उत्तर : तीर्थंकर (पार्श्वनाथ)

    ➣ जैन धर्म में अन्तिम महाव्रत ‘ब्रह्मचर्य’ को किसने जोड़ा था?
    उत्तर : महावीर

    ➣ सम्यक् ज्ञान, सम्यक् कर्म और सम्यक् ध्यान जैन धर्म में क्या कहलाते थे?
    उत्तर : – त्रिरत्न

    ➣ महावीर की मृत्यु के पश्चात् जैन संघ का प्रमुख ‘थेर’ (धर्मगुरु) किसे बनाया गया?
    उत्तर : आर्य सुधर्मण को

    ➣ किसने ‘कल्पसूत्र’ की रचना कर उसमें जैन धर्म की उत्पत्ति से लेकर अपने समय तक के उत्थान और विकास का वर्णन किया?
    उत्तर : भद्रबाहु

    ➣ भद्रबाहु के स्थूलभद्र का नेतृत्व मानने से इन्कार करने के बाद जैन धर्म किन दो भागों में विभाजित हो गया?
    उत्तर : दिगम्बर एवं श्वेताम्बर

    ➣ जैन धर्म दर्शन का अन्तिम लक्ष्य निर्वाण या मोक्ष प्राप्त करना है। इसके लिए कौन-से तीन में विश्वास करना जरूरी है?
    उत्तर : – सम्यक् विश्वास, सम्यक् ज्ञान तथा सम्यक् आचार

    ➣ महावीर ने किस भाषा में अपने उपदेश दिये, ताकि जनसामान्य उनको समझ सकें?
    उत्तर : प्राकृत

    ➣ श्वेताम्बरों का पवित्र साहित्य किस भाषा में लिखा गया?
    उत्तर : अर्द्ध-मागधी

    ➣ जैन शिल्प प्रसिद्ध ग्रेनाइट पत्थर से बनी गोमतेश्वर की मूर्ति कहां स्थित है?
    उत्तर : श्रवणबेलगोला, मैसूर

    ➣ 6.5 फीट ऊंची गोमतेश्वर की मूर्ति को गंग नरेश रछमल के किस मंत्री ने बनवाया था?
    उत्तर : चामुंड राय

    ➣ एलोरा गुफाओं में से जैन गुफाएं कितनी हैं?
    उत्तर : पांच (30-34)

    ➣ दिलवाड़ा का जैन मंदिर मंदिर निर्माण का चरमोत्कर्ष है। यह कहां स्थित है?
    उत्तर : माउंट आबू, राजस्थान

    ➣ जैन साहित्य को क्या कहते हैं?
    उत्तर : आर्यसूत्र

    ➣ महावीर स्वामी का प्रथम शिष्य कौन था?
    उत्तर : जमाली

    ➣ वर्द्धमान महावीर अन्य किस नाम से विख्यात हैं?
    उत्तर : जेना (जिन)

    ➣ महावीर के पक्के अनुयायी किस नाम से जाने जाते थे?
    उत्तर : दिगंबर

    ➣ 12 अंग, 12 उपांग, 14 पूर्व और 14 उपपूर्व में से सबसे पूर्वकालिक जैन ग्रंथ कौन-सा है?
    उत्तर : 14 पूर्व

    ➣ कौन-सा स्थल पार्श्वनाथ से सम्बद्ध होने के कारण जैन सिद्ध क्षेत्र माना जाता है?
    उत्तर : सम्मेद शिखर

    ➣ प्रभास गिरी कस्बा उत्तर प्रदेश के कौशाम्बी जिले में स्थित किस धर्म या समुदाय का एक मुख्य तीर्थस्थल है?
    उत्तर : जैन धर्म

    ➣ यापनीय किस धर्म का एक सम्प्रदाय है?
    उत्तर : जैन धर्म

    ➣ बौद्ध धर्म और जैन धर्म का पर्याय क्या है?
    उत्तर : अहिंसा

    ➣ खण्डगिरी स्थल किसलिए प्रसिद्ध है?
    उत्तर : जैन गुफाओं के लिए,

    ➣ कर्नाटक के मड्या जिले में श्रवणबेलगोला के गोमतेश्वर स्थान पर प्राचीन जैन तीर्थस्थल पर किसकी विशालकाय प्रतिमा स्थापित है?
    उत्तर : भगवान बाहुबली की

    ➣ भगवान बाहुबली को गोमतेश्वर भी कहा जाता है। वे जैन धर्म के किस जैन तीर्थंकर पुत्र थे?
    उत्तर : प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ

  • जैन धर्म वर्धमान महावीर MCQ प्रश्न | UPSC

    1. जैन ‘तीर्थंकर’ पार्श्वनाथ निम्नलिखित स्थानों में से मुख्यतः किससे संबंधित थे?
    (a) वाराणसी
    (b) कौशाम्बी
    (c) गिरिब्रज
    (d) चम्पा
    U.P.P.C.S (Mains) 2016
    उत्तर-(a)
    पार्श्वनाथ जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर थे, जिनका जन्म वाराणसी (काशी) में हुआ था। उनके पिता वाराणसी के राजा अश्वसेन और माता वामादेवी थीं। उनका प्रतीक चिह्न सर्प है। पार्श्वनाथ महावीर स्वामी से लगभग 250 वर्ष पहले हुए थे।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: उल्लेखनीय है कि पार्श्वनाथ ने चातुर्याम (चार महाव्रत) की शिक्षा दी थी — अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह — जबकि महावीर ने इनमें ब्रह्मचर्य जोड़कर पंचमहाव्रत का प्रतिपादन किया। पार्श्वनाथ ने 30 वर्ष की आयु में गृहत्याग किया और सम्मेदशिखर (झारखंड) पर निर्वाण प्राप्त किया।
    2. निम्नलिखित में से कौन-सा एक युग्म सही सुमेलित नहीं है?
    (तीर्थंकर) (निर्वाण स्थल)
    (a) ऋषभनाथ – अष्टापद
    (b) वासुपूज्य – सम्मेदशिखर
    (c) नेमिनाथ – ऊर्जयंत
    (d) महावीर – पावापुरी
    U.P.P.C.S. (Pre) 2021
    उत्तर-(b)
    वासुपूज्य जैन धर्म के 12वें तीर्थंकर थे और उनका निर्वाण सम्मेदशिखर में नहीं, बल्कि चम्पापुरी (वर्तमान भागलपुर, बिहार) में हुआ था। शेष तीनों युग्म पूरी तरह सही हैं। ऋषभनाथ (आदिनाथ) ने अष्टापद पर्वत (कैलाश) पर निर्वाण पाया, नेमिनाथ ने गुजरात के गिरनार (ऊर्जयंत) पर्वत पर, और महावीर ने पावापुरी (नालंदा, बिहार) में।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:उल्लेखनीय है कि सम्मेदशिखर (झारखंड का पारसनाथ पहाड़) जैनियों का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तीर्थस्थल है, जहाँ 24 में से 20 तीर्थंकरों ने निर्वाण प्राप्त किया था।
    3. महावीर स्वामी का जन्म कहां हुआ था?
    (a) कुंडग्राम में
    (b) पाटलिपुत्र में
    (c) मगध में
    (d) वैशाली में
    42nd B.P.S.C. (Pre) 1997
    47th B.P.S.C. (Pre) 2005
    53rd to 55th B.P.S.C. (Pre) 2011
    उत्तर-(a)
    महावीर स्वामी का जन्म लगभग 599 ई.पू. में वैशाली गणराज्य के कुंडग्राम (कुंडलपुर) में हुआ था। उनके पिता सिद्धार्थ ज्ञातृक क्षत्रिय कुल के प्रमुख थे और माता त्रिशला वैशाली के लिच्छवी गणनायक चेटक की बहन थीं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बचपन में महावीर को ‘वर्धमान’ नाम से जाना जाता था। उन्होंने 30 वर्ष की आयु में गृहत्याग किया और 12 वर्षों की कठोर तपस्या के बाद 42 वर्ष की आयु में जृम्भिकग्राम के निकट ऋजुपालिका नदी के तट पर ‘कैवल्य ज्ञान’ प्राप्त किया। तभी से उन्हें ‘महावीर’, ‘जिन’ (विजेता) और ‘निग्रंथ’ की उपाधि मिली।
    4. जैन धर्म के संस्थापक हैं-
    (a) आर्य सुधर्मा
    (b) महावीर स्वामी
    (c) पार्श्वनाथ
    (d) ऋषभदेव
    U.P.P.C.S. (Mains) 2010
    उत्तर-(d)
    जैन धर्म के आदि संस्थापक और प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव (आदिनाथ) हैं। महावीर स्वामी जैन धर्म के 24वें और अंतिम तीर्थंकर थे, जिन्होंने छठी शताब्दी ई.पू. में इस धर्म का व्यापक प्रचार-प्रसार किया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋषभदेव का उल्लेख ऋग्वेद, विष्णु पुराण और भागवत पुराण में भी मिलता है, जो उनकी प्राचीनता को प्रमाणित करता है। जैन मान्यता के अनुसार ऋषभदेव ने ही मनुष्यों को कृषि, शिल्प और असि (शस्त्र विद्या) की शिक्षा दी थी। उनका प्रतीक चिह्न वृषभ (बैल) है।
    5. सूची-I को सूची -II से सुमेलित कीजिए तथा नीचे दिए गए कूट से सही
    सूची-1 ( तीर्थंकर) सूची-II (प्रतिमा लक्षण)
    A. आदिनाथ 1. वृषभ
    B. मल्लिनाथ 2. अश्व
    C. पार्श्वनाथ 3. सर्प
    D. संभवनाथ 4. जल कलश
    कूट : उत्तर चुनिए –
    A B C D
    (a) 1 4 3 2
    (b) 1 3 2 4
    (c) 2 4 3 1
    (d) 3 1 4 2
    U.P.P.C.S. (Pre) 2017
    उत्तर-(a)
    तीर्थंकरों और उनके प्रतीक चिह्नों का सही सुमेलन इस प्रकार है — आदिनाथ: वृषभ (बैल), मल्लिनाथ: जल-कलश, पार्श्वनाथ: सर्प, संभवनाथ: अश्व (घोड़ा)। जैन धर्म में प्रत्येक तीर्थंकर की पहचान उनके विशेष ‘लांछन’ (प्रतीक चिह्न) से होती है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:उल्लेखनीय है कि मल्लिनाथ जैन धर्म के 19वें तीर्थंकर थे और श्वेतांबर परंपरा के अनुसार वे एकमात्र महिला तीर्थंकर थीं, जबकि दिगंबर परंपरा उन्हें पुरुष मानती है। संभवनाथ जैन धर्म के तीसरे तीर्थंकर थे।
    6. निम्नलिखित तीर्थंकरों पर विचार कीजिए तथा उनको सही कालक्रमानुसार व्यवस्थित कीजिए :
    I. अभिनंदन
    II. विमल नाथ
    III. मुनिसुव्रत नाथ
    IV. पद्मप्रभु नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर का चयन कीजिए
    कूटः

    (a) I, IV, II और III
    (c) IV, III, I और II
    (b) III, I, II और IV
    (d) IV, I, III और II
    U.P.R.O./A.R.O. (Mains) 2016
    उत्तर-(a)
    जैन धर्म में 24 तीर्थंकरों का कालक्रम निश्चित है। इनमें अभिनंदन चौथे, पद्मप्रभु छठे, विमलनाथ तेरहवें और मुनिसुव्रतनाथ बीसवें तीर्थंकर हैं। अतः सही कालक्रम होगा: अभिनंदन (4) → पद्मप्रभु (6) → विमलनाथ (13) → मुनिसुव्रतनाथ (20), अर्थात् I, IV, II और III। जैन तीर्थंकरों को ‘जिन’ (विजेता) भी कहा जाता है क्योंकि उन्होंने इंद्रियों और कषायों (क्रोध, मान, माया, लोभ) पर विजय प्राप्त की। जैन परंपरा के अनुसार प्रत्येक तीर्थंकर अपने काल में ‘धर्मतीर्थ’ (धर्म की नदी) को पुनर्स्थापित करते हैं।
    7. जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर कौन थे?
    (a) पार्श्वनाथ
    (b) ऋषभदेव
    (c) महावीर
    (d) चेतक
    Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2013
    उत्तर-(b)
    जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव (आदिनाथ) हैं। जैन परंपरा में इन्हें इस अवसर्पिणी काल (वर्तमान चक्र) में धर्म का पुनः प्रवर्तन करने वाला प्रथम महापुरुष माना जाता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: हिंदू पौराणिक ग्रंथों में ऋषभदेव को ‘भागवत पुराण’ में विष्णु के 24 अवतारों में से एक बताया गया है। जैन ग्रंथों के अनुसार ऋषभदेव ने अपने पुत्र भरत को राज्य सौंपा था, जिनके नाम पर ही हमारे देश का नाम ‘भारत’ पड़ा — यह जैन परंपरा की एक महत्त्वपूर्ण मान्यता है।
    8. कुंडलपुर जन्म स्थान है –
    (a) सम्राट अशोक का
    (b) गौतम बुद्ध का
    (c) महावीर स्वामी का
    (d) चैतन्य महाप्रभु का
    U.P.P.C.S. (Spl.) (Pre) 2004
    उत्तर-(c)
    कुंडलपुर (कुंडग्राम) वैशाली के समीप स्थित वह स्थान है जहाँ महावीर स्वामी का जन्म हुआ था। यह स्थान वर्तमान बिहार में है और जैन धर्मावलम्बियों के लिए एक प्रमुख तीर्थस्थल है। महावीर स्वामी का बचपन का नाम वर्धमान था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: उल्लेखनीय है कि महावीर की माता त्रिशला ने उनके जन्म से पूर्व 16 शुभ स्वप्न देखे थे जिनकी व्याख्या ज्योतिषियों ने एक महान् पुरुष के जन्म के संकेत के रूप में की थी — यह विवरण जैन आगम ग्रंथों में विस्तार से मिलता है।
    9. जैन धर्म के प्रवर्तक महावीर जी का मोक्ष स्थान कहां स्थित है?
    (a) मनेर
    (b) राजगीर
    (c) पावापुरी
    (d) जालन फोर्ट
    63rd B.P.S.C. (Pre) 2017
    उत्तर-(c)
    महावीर स्वामी ने 527 ई.पू. में 72 वर्ष की आयु में बिहार के पावापुरी में कार्तिक कृष्ण अमावस्या को निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया। पावापुरी नालंदा जिले से लगभग 25 किमी. की दूरी पर स्थित है और यह जैनियों का अत्यंत पवित्र तीर्थस्थल है। यहाँ ‘जल मंदिर’ नामक प्रसिद्ध जैन मंदिर एक कमल-सरोवर के मध्य स्थित है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऐसा माना जाता है कि महावीर के दाह-संस्कार के समय इतनी अधिक मिट्टी ली गई कि वहाँ एक विशाल कुंड बन गया, जो आज जल मंदिर की झील के रूप में विद्यमान है।
    10.5.सूची-1 एवं सूची-II को सुमेलित कीजिए तथा नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए –
    सूची-1 (तीर्थंकर) सूची-II (उनके संज्ञान)
    (a) पार्श्वनाथ (i) वृषभ
    (b) आदिनाथ (ii) सिंह
    (c) महावीर (iii) सर्प
    (d) शांतिनाथ (iv) हिरण
    कूट :
    (a) A-(ii), B-(iii), C-(iv), D-(i)
    (b) A-(iv), B-(iii), C-(ii), D-(i)
    (c) A-(i), B-(ii), C-(iii), D- (iv)
    (d) A-(iii), B-(i), C-(ii), D-(iv)
    R.AS./R.T.S (Pre) 2021
    उत्तर-(d)
    तीर्थंकरों और उनके संज्ञान (लांछन/प्रतीक) का सही सुमेलन इस प्रकार है — पार्श्वनाथ: सर्प, आदिनाथ: वृषभ, महावीर: सिंह, शांतिनाथ: हिरण। महावीर स्वामी का प्रतीक ‘सिंह’ उनके निर्भय, पराक्रमी और जितेंद्रिय स्वभाव का प्रतीक है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शांतिनाथ जैन धर्म के 16वें तीर्थंकर थे और उन्हें ‘चक्रवर्ती’ भी माना जाता है, अर्थात् वे तीर्थंकर और चक्रवर्ती सम्राट — दोनों रूपों में पूजित हैं। जैन धर्म में ऐसे केवल तीन तीर्थंकर हैं जो चक्रवर्ती भी थे: शांतिनाथ, कुंथुनाथ और अरनाथ।
    11. कौन-सा दर्शन त्रिरत्न को मानता है?
    (a) बौद्ध दर्शन
    (b) न्याय दर्शन
    (c) योग दर्शन
    (d) जैन दर्शन
    Chhattisgarh P.S.C. (Pre) 2017
    उत्तर-(*)
    जैन दर्शन में मोक्ष-प्राप्ति के लिए तीन अनिवार्य साधन निर्धारित किए गए हैं — सम्यक् दर्शन (सही आस्था), सम्यक् ज्ञान (सही ज्ञान) और सम्यक् चरित्र (सही आचरण)। इन्हें सम्मिलित रूप से ‘त्रिरत्न’ कहा जाता है। उल्लेखनीय है कि बौद्ध दर्शन में भी ‘त्रिरत्न’ की अवधारणा है, किंतु वहाँ इसके अंतर्गत बुद्ध, धम्म और संघ आते हैं — जो जैन त्रिरत्न से भिन्न है। इसी अस्पष्टता के कारण छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग ने इस प्रश्न को मूल्यांकन से बाहर कर दिया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जैन धर्म के अनुसार ‘सम्यक् दर्शन’ का अर्थ है तीर्थंकरों द्वारा प्रतिपादित सत्य में अटूट श्रद्धा रखना। जैन आगमों के अनुसार त्रिरत्न का पालन किए बिना कर्म-बंधन से मुक्ति असंभव मानी जाती है।
    12. निम्नलिखित में से कौन एक जैन तीर्थंकर नहीं था?
    (a) चंद्रप्रभु
    (b) नाथमुनि
    (c) नेमि
    (d) संभव
    U.P.P.C.S. (Spl.) (Mains) 2004
    उत्तर-(b)
    नाथमुनि जैन तीर्थंकर नहीं थे — वे वैष्णव (तमिल) परंपरा के प्रसिद्ध आचार्य थे। शेष तीनों — चंद्रप्रभु (8वें तीर्थंकर), नेमिनाथ (22वें तीर्थंकर) और संभवनाथ (3रे तीर्थंकर) — जैन धर्म के मान्यताप्राप्त तीर्थंकर हैं। जैन मान्यता के अनुसार कुल 24 तीर्थंकर हुए हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: 22वें तीर्थंकर नेमिनाथ को भगवान कृष्ण का चचेरा भाई माना जाता है — यह तथ्य जैन और वैदिक परंपराओं के बीच एक दिलचस्प सांस्कृतिक संबंध को दर्शाता है। प्रत्येक तीर्थंकर का एक विशेष प्रतीक चिह्न (लांछन) होता है; जैसे ऋषभदेव का लांछन बैल और महावीर का सिंह है।
    13. जैन धर्म में ‘पूर्ण ज्ञान’ के लिए क्या शब्द है?
    (a) जिन
    (b) रत्न
    (c) कैवल्य
    (d) निर्वाण
    I.A.S. (Pre) 1993
    उत्तर-(c)
    जैन धर्म में आत्मा की सर्वोच्च ज्ञान-अवस्था को ‘कैवल्य’ कहा जाता है। महावीर स्वामी को 12 वर्षों की घोर तपस्या के उपरांत जृम्भिकाग्राम के निकट ऋजुपालिका नदी के तट पर साल वृक्ष के नीचे यह कैवल्य-ज्ञान प्राप्त हुआ, जिसके बाद वे ‘केवलिन’ कहलाए। ‘निर्वाण’ शब्द का प्रयोग जैन धर्म में देहत्याग (मृत्यु) के बाद की मुक्तावस्था के लिए होता है, जबकि बौद्ध धर्म में यह राग-द्वेष से मुक्ति को दर्शाता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जैन दर्शन के अनुसार ज्ञान के पाँच स्तर हैं — मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यव और केवल; जिनमें ‘केवल ज्ञान’ (कैवल्य) सर्वोच्च है। कैवल्य-प्राप्ति के बाद साधक को ‘जिन’ (विजेता) कहा जाता है, जिससे ‘जैन’ शब्द की उत्पत्ति हुई।
    14. त्रिरत्न सिद्धांत सम्यक् धारण, सम्यक् चरित्र एवं सम्यक् ज्ञान जिस धर्म की महिमा है, वह है-
    (a) बौद्ध धर्म
    (b) ईसाई धर्म
    (c) जैन धर्म
    (d) इनमें से कोई नहीं
    U.P.P.C.S. (Pre) 2004
    उत्तर-(c)
    जैन धर्म के त्रिरत्न — सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र — मोक्ष-मार्ग के तीन अनिवार्य स्तंभ हैं। इन तीनों के समन्वित पालन से ही कर्मों का क्षय होकर आत्मा मुक्त होती है। महावीर स्वामी ने इस त्रिरत्न को अपने उपदेशों का केंद्र बिंदु बनाया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जैन धर्म में ‘सम्यक् चरित्र’ के अंतर्गत पाँच महाव्रत आते हैं — अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (संग्रह न करना)। इन पाँच महाव्रतों में ‘अहिंसा’ को सर्वोच्च स्थान दिया गया है और यह जैन धर्म की पहचान का सबसे प्रमुख तत्व है।
    15. महावीर जैन की मृत्यु निम्नलिखित में से किस नगर में हुई?
    (a) राजगीर
    (b) सांची
    (c) पावापुरी
    (d) समस्तीपुर
    45th B.P.S.C. (Pre) 2001
    उत्तर-(c)
    महावीर स्वामी का निर्वाण (देहांत) बिहार के पावापुरी नगर में 468 ई.पू. (कुछ मतों के अनुसार 527 ई.पू.) में हुआ था। यह स्थान आज जैन धर्म के सर्वाधिक पवित्र तीर्थस्थलों में से एक है। पावापुरी में जलमंदिर नामक एक सुंदर जैन मंदिर है जो उसी स्थान पर बना है जहाँ महावीर का अंतिम संस्कार हुआ था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: महावीर स्वामी का जन्म वैशाली गणराज्य के कुण्डग्राम (वर्तमान बिहार) में चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को हुआ था। उनके पिता सिद्धार्थ क्षत्रिय कुल के थे और माता त्रिशला लिच्छवि राजकुमारी थीं, जिससे महावीर का सम्बन्ध तत्कालीन गणतंत्रीय राजनीति से भी था।
    16.त्रिरत्न या तीन रत्न, जैसे सटीक ज्ञान, सच्ची आस्था और सटीक क्रिया, निम्न में से किससे संबंधित हैं?
    (a) बौद्ध धर्म
    (b) हिंदू धर्म
    (c) जैन धर्म
    (d) ईसाई धर्म
    66th B.P.S.C. (Pre) 2020
    उत्तर-(c)
    सटीक ज्ञान (सम्यक् ज्ञान), सच्ची आस्था (सम्यक् दर्शन) और सटीक क्रिया (सम्यक् चरित्र) — ये तीनों जैन धर्म के ‘त्रिरत्न’ हैं। जैन धर्म में यह मान्यता है कि इन तीनों का एक साथ पालन ही आत्मा को कर्म-बंधन से मुक्त करता है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जैन दर्शन में ‘अनेकांतवाद’ का सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसके अनुसार सत्य बहुआयामी होता है और किसी एक दृष्टिकोण से उसे पूर्णतः नहीं जाना जा सकता। इस सिद्धांत को ‘स्याद्वाद’ भी कहा जाता है, जो जैन ज्ञान-मीमांसा की अनूठी देन है।
    17. प्रभासगिरि जिनका तीर्थ स्थल है, वे हैं-
    (a) बौद्ध
    (b) जैन
    (c) शैव
    (d) वैष्णव
    U.P.P.C.S. (Spl) (Pre) 2008
    उत्तर-(b)
    प्रभासगिरि उत्तर प्रदेश के कौशाम्बी जिले में स्थित एक महत्वपूर्ण जैन तीर्थस्थल है। यह स्थान जैन धर्म के छठे तीर्थंकर पद्मप्रभ से संबंधित है — मान्यता है कि उनका जन्म यहीं हुआ था। कौशाम्बी प्राचीन काल में वत्स महाजनपद की राजधानी थी।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जैन धर्म के अनुसार तीर्थंकर पद्मप्रभ का प्रतीक चिह्न (लांछन) ‘लाल कमल’ है। कौशाम्बी का उल्लेख बौद्ध और जैन दोनों साहित्यों में मिलता है — भगवान बुद्ध ने भी यहाँ कई वर्षावास किए थे, जो इस नगर की तत्कालीन धार्मिक महत्ता को दर्शाता है।
    18. जैन तीर्थंकरों के क्रम में अंतिम कौन था?
    (a) पार्श्वनाथ
    (b) ऋषभदेव
    (c) महावीर
    (d) मणिसुव्रत
    I.A.S. (Pre) 1993
    उत्तर-(c)
    जैन धर्म की परंपरा में 24 तीर्थंकर हुए हैं। इस क्रम में प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव (आदिनाथ) और 24वें तथा अंतिम तीर्थंकर वर्धमान महावीर थे। 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ महावीर से लगभग 250 वर्ष पूर्व हुए थे। ऋषभदेव का उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है, जो जैन धर्म की प्राचीनता का प्रमाण माना जाता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ ने महावीर से पहले ‘चतुर्याम’ (चार व्रत) का उपदेश दिया था — अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह। महावीर ने इसमें ‘ब्रह्मचर्य’ जोड़कर पाँच महाव्रत स्थापित किए, जो जैन आचार-संहिता की आधारशिला बने।
    19. महावीर स्वामी को किस नदी के तट पर ज्ञानोदय प्राप्त हुआ था?
    (a) स्वर्णसिक्ता
    (b) पलाशिनी
    (c) गंगा
    (d) ऋजुपालिका
    U.P.R.O/A.R.O. (Mains) 2017
    उत्तर-(d)
    महावीर स्वामी को 12 वर्षों की अखंड साधना और तपस्या के पश्चात जृम्भिकाग्राम के निकट ऋजुपालिका (ऋजुवालिका) नदी के तट पर एक साल वृक्ष के नीचे कैवल्य-ज्ञान की प्राप्ति हुई। यह घटना लगभग 468 ई.पू. मानी जाती है। ज्ञान-प्राप्ति के उपरांत उन्हें ‘महावीर’, ‘जिन’ और ‘निग्रंथ’ जैसी उपाधियाँ मिलीं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: महावीर स्वामी ने ज्ञान प्राप्ति के बाद लगभग 30 वर्षों तक पूरे भारत में भ्रमण करते हुए अपने उपदेश दिए। उनके प्रथम शिष्य (गणधर) इन्द्रभूति गौतम थे, जो उनसे मिलने आए एक विद्वान ब्राह्मण थे और महावीर की तर्कशक्ति से प्रभावित होकर उनके शिष्य बन गए।
    20. तीर्थंकर शब्द संबंधित है-
    (a) बौद्ध
    (b) ईसाई
    (c) हिंदू
    (d) जैन
    U.P.P.C.S. (Pre) 1993
    उत्तर-(d)
    ‘तीर्थंकर’ शब्द विशेष रूप से जैन धर्म से सम्बद्ध है। संस्कृत में ‘तीर्थंकर’ का शाब्दिक अर्थ है — ‘तीर्थ (मुक्ति-मार्ग) का निर्माण करने वाला।’ जैन परंपरा में कुल 24 तीर्थंकर हुए हैं जिन्होंने अपने-अपने युग में धर्म का पुनरुद्धार किया। प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव और अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी थे।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जैन धर्म में तीर्थंकरों को देव, मनुष्य और नारकी प्राणियों में सर्वोच्च माना जाता है। प्रत्येक तीर्थंकर के जन्म को ‘कल्याणक’ कहा जाता है और उनके जीवन में पाँच कल्याणक माने गए हैं — गर्भ, जन्म, दीक्षा, ज्ञान और मोक्ष। ये पाँचों कल्याणक जैन पर्वों के रूप में मनाए जाते हैं।
    21. भारत की धार्मिक प्रथाओं के संदर्भ में ‘स्थानकवासी’ संप्रदाय का संबंध किससे है ?
    (a) बौद्ध मत
    (b) जैन मत
    (c) वैष्णव मत
    (d) शैव मत
    I.A.S. (Pre) 2018
    उत्तर-(b)
    स्थानकवासी, श्वेतांबर जैनों की एक महत्वपूर्ण शाखा है जिसकी स्थापना सन् 1653 ई. में हुई। यह संप्रदाय ‘लोंका’ शाखा से विकसित हुआ, जिसे 15वीं शताब्दी में अहमदाबाद के व्यापारी लोंकाशाह ने प्रारंभ किया था। स्थानकवासी मूर्तिपूजा को अस्वीकार करते हैं और मंदिरों की बजाय ‘स्थानक’ (साधारण हॉल) में पूजा-अर्चना करते हैं। इनके साधु-साध्वी मुँह पर ‘मुहपत्ति’ (सफेद कपड़ा) बाँधते हैं, जो सूक्ष्म जीवों की हिंसा से बचने का प्रतीक है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जैन धर्म में श्वेतांबर और दिगंबर के अलावा तेरापंथी भी एक प्रमुख उपसंप्रदाय है, जिसकी स्थापना 1760 ई. में आचार्य भिक्षु ने की थी। स्थानकवासी संप्रदाय केवल 31 आगमों को प्रामाणिक मानता है, जबकि अन्य श्वेतांबर 45 आगमों को मान्यता देते हैं।
    22. अनेकांतवाद निम्नलिखित में से किसका क्रोड सिद्धांत एवं दर्शन है?
    (a) बौद्ध मत
    (b) जैन मत
    (c) सिख मत
    (d) वैष्णव मत
    I.A.S. (Pre) 2009
    Jharkhand P.C.S. (Pre) 2011
    उत्तर-(b)
    अनेकांतवाद जैन दर्शन की आत्मा है। इसके अनुसार किसी भी वस्तु या सत्य को एक ही दृष्टिकोण से नहीं समझा जा सकता; उसके अनेक पहलू होते हैं। इसे ‘सप्तभंगी नय’ भी कहते हैं क्योंकि इसमें किसी कथन के सात संभावित रूप माने जाते हैं — स्यात् अस्ति, स्यात् नास्ति, स्यात् अस्ति नास्ति, आदि। महावीर स्वामी ने इसे एकांतिक (absolutist) विचारों के विरुद्ध मध्यम मार्ग के रूप में प्रस्तुत किया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अनेकांतवाद का व्यावहारिक रूप ‘नयवाद’ है, जो यह बताता है कि प्रत्येक दृष्टिकोण सत्य का एक आंशिक पहलू है। आधुनिक दार्शनिक इसे बहुलवाद (pluralism) से जोड़ते हैं। जैन आचार्य हेमचंद्र (12वीं शताब्दी) ने इस सिद्धांत को व्यापक रूप से प्रतिपादित किया था।
    23. जैन धर्म का आधारभूत बिंदु है-
    (a) कर्म
    (b) निष्ठा
    (c) अहिंसा
    (d) विराग
    U.P.P.C.S. (Pre) 1993
    उत्तर-(c)
    अहिंसा जैन धर्म की सर्वोच्च नैतिक आज्ञा है। जैन धर्म में ‘अहिंसा परमो धर्मः’ की भावना इतनी गहरी है कि जैन मुनि जमीन पर चलते समय झाड़ू लगाते हैं ताकि सूक्ष्म जीवों की हत्या न हो। पंच महाव्रतों में अहिंसा प्रथम और सर्वप्रमुख है। गृहस्थों के लिए इसका लघु रूप ‘अहिंसाणुव्रत’ है जिसमें स्थूल हिंसा से बचने का नियम है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जैन धर्म में हिंसा के चार प्रकार बताए गए हैं — संकल्पी (जानबूझकर), आरंभी (जीविकोपार्जन में), उद्योगी (व्यवसाय में) और विरोधी (आत्मरक्षा में)। महात्मा गांधी ने स्वीकार किया है कि जैन विचारक श्रीमद् राजचंद्र से प्रेरणा लेकर उन्होंने अहिंसा को अपने आंदोलन का मूल आधार बनाया।
    24. निम्नलिखित में से कौन-सा धर्म ‘विश्व विनाशकारी प्रलय’ की अवधारणा में विश्वास नहीं करता ?
    (a) बौद्ध धर्म
    (b) जैन धर्म
    (c) हिंदू धर्म
    (d) इस्लाम
    U.P.P.C.S. (Mains) 2014
    उत्तर-(b)
    जैन धर्म ईश्वर की सत्ता में विश्वास नहीं रखता, अतः किसी सर्वशक्तिमान सृष्टिकर्ता या संहारकर्ता की कल्पना भी नहीं की गई है। जैन मान्यता के अनुसार यह संसार अनादि और अनंत है — इसकी न कोई शुरुआत है, न कोई अंत। इसलिए ‘प्रलय’ जैसी किसी विनाशकारी घटना को जैन दर्शन स्वीकार नहीं करता। ब्रह्मांड नित्य और शाश्वत है, केवल उसमें मौजूद जीव और पुद्गल परिवर्तनशील हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:जैन कालचक्र की अवधारणा के अनुसार समय ‘उत्सर्पिणी’ (आरोही) और ‘अवसर्पिणी’ (अवरोही) दो अर्ध-चक्रों में चलता रहता है — इसमें सभ्यता का उत्थान और पतन होता है, परंतु पूर्ण विनाश नहीं। वर्तमान काल को जैन दर्शन ‘पंचम आरा’ (पाँचवाँ चरण) मानता है जो नैतिक पतन का काल है।
    25. यापनीय किसका एक संप्रदाय था?
    (a) बौद्ध धर्म का
    (b) जैन धर्म का
    (c) शैव धर्म का
    (d) वैष्णव धर्म का
    U.P.P.C.S (Pre) 2010
    उत्तर-(b)
    यापनीय जैन धर्म की एक मध्यवर्ती शाखा थी जो मुख्यतः दक्षिण भारत (कर्नाटक क्षेत्र) में प्रचलित रही। यह संप्रदाय दिगंबर परंपरा से उत्पन्न हुआ, किंतु कुछ श्वेतांबर मान्यताओं को भी स्वीकार करता था — जैसे स्त्रियों की मुक्ति की संभावना और केवली (सिद्ध पुरुष) द्वारा आहार ग्रहण करना। इस संप्रदाय का उल्लेख 5वीं से 11वीं शताब्दी के शिलालेखों में मिलता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यापनीय संप्रदाय के अनुयायी ‘अर्धफालक’ भी कहलाते थे। इस संप्रदाय के ग्रंथ संस्कृत और प्राकृत दोनों भाषाओं में रचे गए। 12वीं शताब्दी के बाद यह संप्रदाय धीरे-धीरे दिगंबर संप्रदाय में विलीन हो गया।
    26. जैन दर्शन के अनुसार, सृष्टि की रचना एवं पालन-पोषण –
    (a) सार्वभौमिक विधान से हुआ है।
    (b) सार्वभौमिक सत्य से हुआ है।
    (c) सार्वभौमिक आस्था से हुआ है।
    (d) सार्वभौमिक आत्मा से हुआ है।
    I.A.S. (Pre) 2011
    उत्तर-(a)
    जैन दर्शन के अनुसार यह ब्रह्मांड जीव (चेतन) और अजीव (अचेतन) नामक दो नित्य तत्वों से मिलकर बना है। इसका कोई स्रष्टा या नियंत्रक नहीं है — सृष्टि एक स्वाभाविक और शाश्वत नियम (सार्वभौमिक विधान) के अनुसार चलती है। जैन दर्शन में ‘जीव’ का अर्थ उपनिषदों की सार्वभौमिक आत्मा से नहीं, बल्कि अनंत व्यक्तिगत आत्माओं से है। प्रत्येक जीव स्वतंत्र और अनादि है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जैन दर्शन में अजीव के पाँच भेद हैं — पुद्गल (भौतिक पदार्थ), धर्म (गति का माध्यम), अधर्म (स्थिति का माध्यम), आकाश और काल। जैन दर्शन नास्तिक दर्शन प्रणाली में आता है क्योंकि यह वेदों की प्रामाणिकता और ईश्वर की सत्ता दोनों को अस्वीकार करता है।
    27. ‘स्याद्वाद’ संबंधित है-
    (a) चार्वाक से
    (b) जैन से
    (c) बौद्ध से
    (d) सांख्य से
    Chhattisgarh P.S.C. (Pre) 2018
    उत्तर-(b)
    स्याद्वाद जैन दर्शन का ज्ञानमीमांसीय सिद्धांत है। ‘स्यात्’ शब्द का अर्थ है ‘किसी दृष्टिकोण से’ या ‘संभवतः’। यह सिद्धांत कहता है कि हर कथन सापेक्ष और आंशिक रूप से सत्य होता है। इसे ‘सप्तभंगी नय’ भी कहते हैं क्योंकि इसमें किसी भी विधान के सात संभावित रूप माने जाते हैं। महावीर स्वामी ने एकांतिक (one-sided) मतों का खंडन करते हुए इसे प्रतिपादित किया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: स्याद्वाद को आधुनिक तर्कशास्त्र में बहु-मूल्यीय तर्क (multi-valued logic) का प्राचीन भारतीय रूप माना जाता है। जैन दार्शनिक उमास्वाति (लगभग दूसरी शताब्दी ई.) ने अपने ग्रंथ ‘तत्त्वार्थसूत्र’ में स्याद्वाद को सुव्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया — यह ग्रंथ श्वेतांबर और दिगंबर दोनों संप्रदायों को मान्य है।
    28. स्याद्वाद सिद्धांत है-
    (a) लोकायत धर्म का
    (b) शैव धर्म का
    (c) जैन धर्म का
    (d) वैष्णव धर्म का
    Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2005
    उत्तर-(c)
    स्याद्वाद जैन धर्म का मूलभूत दार्शनिक सिद्धांत है जिसे महावीर स्वामी ने प्रस्तुत किया। महावीर जैन धर्म के 24वें और अंतिम तीर्थंकर थे जिन्होंने वेदों की अपौरुषेयता तथा ईश्वरवाद को अस्वीकार किया। उन्होंने आत्मवादी और नास्तिक दोनों के चरम मतों से बचते हुए ‘अनेकांतवाद’ का मार्ग चुना, जिसका व्यावहारिक रूप स्याद्वाद है। यह सिद्धांत किसी एक कोण से पूर्ण सत्य जानने की सीमा को स्वीकार करता है।
    29. निम्नलिखित में से कौन-कौन से सिद्धांत जैन धर्म से संबंधित हैं?
    (i) अनेकांतवाद
    (ii) सर्वस्तिवाद
    (iii) शून्यवाद
    (iv) स्यादवाद
    नीचे दिए गए कूट का उपयोग कर सही उत्तर चुनिए –
    (a) (i) एवं (iv)
    (b) (ii) एवं (iv)
    (c) (i), (ii) एवं (iii)
    (d) (ii) एवं (iii)
    R.AS. / R.T.S (Pre) 2021
    उत्तर-(a)
    जैन धर्म के दो प्रमुख दार्शनिक सिद्धांत हैं — अनेकांतवाद और स्याद्वाद। दोनों परस्पर संबंधित हैं: अनेकांतवाद यह कहता है कि सत्य बहुआयामी है, जबकि स्याद्वाद इसी को भाषायी अभिव्यक्ति में लागू करता है। शून्यवाद बौद्ध दर्शन की माध्यमिक शाखा का सिद्धांत है जिसे आचार्य नागार्जुन (लगभग दूसरी शताब्दी ई.) ने प्रतिपादित किया। सर्वस्तिवाद बौद्ध धर्म की सर्वास्तिवादिन शाखा का मत है जो मानती है कि भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों काल में धर्म (elements) का अस्तित्व रहता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जैन दर्शन में ‘नयवाद’ एक और महत्वपूर्ण सिद्धांत है जो स्याद्वाद का पूरक है — इसके अनुसार हर दृष्टिकोण (नय) वास्तविकता के एक पक्ष को ही उजागर करता है। जैन दर्शन में कुल सात नय (दृष्टिकोण) माने गए हैं: नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ़ और एवंभूत।
    30. अणुव्रत सिद्धांत का प्रतिपादन किया था-
    (a) महायान बौद्ध संप्रदाय ने
    (b) हीनयान बौद्ध संप्रदाय ने
    (c) जैन धर्म ने
    (d) लोकायत शाखा ने
    I.A.S. (Pre) 1995
    उत्तर-(c)
    जैन धर्म में गृहस्थों (श्रावक-श्राविकाओं) के लिए पाँच अणुव्रत निर्धारित किए गए हैं जो मुनियों के पंच महाव्रतों का लघु और व्यावहारिक रूप हैं। ये हैं — (1) अहिंसाणुव्रत (स्थूल हिंसा से बचना), (2) सत्याणुव्रत (बड़े असत्य से बचना), (3) अस्तेयाणुव्रत (चोरी न करना), (4) ब्रह्मचर्याणुव्रत (स्वपत्नी/पति से संतोष), (5) अपरिग्रहाणुव्रत (संग्रह की सीमा)। संसारी जीवन में महाव्रतों का पूर्ण पालन असंभव होने से यह व्यवस्था की गई।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जैन गृहस्थों के लिए अणुव्रतों के अतिरिक्त तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत भी बताए गए हैं — इस प्रकार कुल 12 व्रतों का पालन एक आदर्श जैन गृहस्थ से अपेक्षित है। आधुनिक काल में आचार्य तुलसी ने 1949 में ‘अणुव्रत आंदोलन’ प्रारंभ किया जो नैतिक जीवन के लिए एक सामाजिक अभियान बना।
    31. निम्न कथनों पर विचार कीजिए-
    1. वर्द्धमान महावीर की माता, लिच्छवी के मुख्य चेटक की पुत्री थी।
    2. गौतम बुद्ध की माता कोलिय राजवंश की राजकुमारी थीं।
    3. 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ बनारस से थे।
    इन कथनों में कौन-सा/से सही है/हैं?
    (a) केवल 1
    (b) केवल 2
    (c) 2 तथा 3
    (d) 1, 2 तथा 3
    I.A.S. (Pre) 2003
    उत्तर-(c)
    वर्द्धमान महावीर की माता त्रिशला वैशाली के लिच्छवी प्रमुख चेटक की बहन थीं, न कि पुत्री — इसलिए कथन 1 गलत है। गौतम बुद्ध की माता महामाया कोलिय वंश से थीं, जो सही है। 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ का जन्म वाराणसी (बनारस) में हुआ था, इसलिए कथन 3 भी सही है। अतः सही उत्तर (c) है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: महावीर की माता त्रिशला के संबंध के कारण मगध के हर्यंक वंश के राजा बिंबिसार और अजातशत्रु उनके दूर के संबंधी बनते थे, जिसकी वजह से इन राजाओं का जैन धर्म के प्रति सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण रहा। पार्श्वनाथ के चार महाव्रत (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह) थे; महावीर ने पाँचवाँ ब्रह्मचर्य व्रत जोड़कर पंचमहाव्रत का निर्माण किया।
    32. जैन संप्रदाय में प्रथम विभाजन के समय श्वेतांबर संप्रदाय के संस्थापक थे-
    (a) स्थूलभद्र
    (b) भद्रबाहु
    (c) कालकाचार्य
    (d) देवर्धि-क्षमा श्रमण
    R.A.S./ R.T.S. (Pre) 1999
    उत्तर-(a)
    मौर्यकाल में मगध में भारी अकाल पड़ने पर जैन संघ के भद्रबाहु अपने शिष्यों के साथ दक्षिण (मैसूर) चले गए। मगध में रहे स्थूलभद्र ने अपने अनुयायियों को श्वेत वस्त्र धारण करने की अनुमति दी, जिससे ‘श्वेतांबर’ संप्रदाय बना। दक्षिण से लौटने पर भद्रबाहु ने दिगंबर (निर्वस्त्र) परंपरा को जारी रखा। इस प्रकार जैन धर्म का प्रथम विभाजन हुआ।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यह विभाजन लगभग 300 ईसा पूर्व में हुआ था। दिगंबर जैन महिलाओं को मोक्ष प्राप्त करने में असमर्थ मानते हैं, जबकि श्वेतांबर इसका खंडन करते हैं।
    33. किस जैन सभा में अंतिम रूप से श्वेतांबर आगम का संपादन हुआ?
    (a) वैशाली में
    (b) वल्लभी में
    (c) पावा में
    (d) पाटलिपुत्र में
    U.P.P.C.S. (Mains) 2008
    उत्तर-(d)
    चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल (लगभग 310 ईसा पूर्व) में पाटलिपुत्र में प्रथम जैन संगीति आयोजित हुई, जिसमें श्वेतांबर आगम का संपादन किया गया। प्राचीन जैन शास्त्रों के नष्ट हो जाने के कारण यह सभा बुलाई गई थी। दिगंबर पंथ के अनुयायियों ने इसमें भाग नहीं लिया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: द्वितीय जैन सभा 512 ईसवी में वल्लभी (गुजरात) में देवर्धि क्षमाश्रमण की अध्यक्षता में हुई, जिसमें जैन ग्रंथों को अंतिम लिखित रूप दिया गया।
    34. निम्नलिखित में से कौन सबसे पूर्वकालिक जैन ग्रंथ कहलाता है?
    (a) बारह अंग
    (b) बारह उपांग
    (c) चौदह पूर्व
    (d) चौदह उपपूर्व
    41st B.P.S.C. (Pre) 1995
    उत्तर-(c)
    ‘चौदह पूर्व’ जैन परंपरा के सबसे प्राचीन ग्रंथ माने जाते हैं। अंतिम नंद राजा के काल में सम्भूतविजय और भद्रबाहु जैन संघ के प्रमुख थे और ये ही महावीर के उपदेशों पर आधारित चौदह पूर्वों के अंतिम ज्ञाता थे। कालांतर में इन ग्रंथों का ज्ञान लुप्त हो गया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चौदह पूर्वों को ‘पूर्वगत’ भी कहा जाता है और माना जाता है कि ये पार्श्वनाथ काल से भी पहले की मौखिक परंपरा को संरक्षित करते हैं। भद्रबाहु ही एकमात्र जैन आचार्य थे जिन्हें सभी 14 पूर्वों का संपूर्ण ज्ञान था।
    35. महावीर का प्रथम अनुयायी कौन था?
    (a) जमालि
    (b) यशोदा
    (c) आणोज्जा
    (d) त्रिशला
    47th B.P.S.C. (Pre) 2005
    उत्तर-(a)
    भगवान महावीर का प्रथम शिष्य जमालि था, जो उनकी पुत्री प्रियदर्शना का पति था। महावीर की पत्नी यशोदा थीं और जमालि क्षत्रिय कुल का था। दीक्षा लेने के बाद जमालि पहले महावीर का अनुयायी बना, इसीलिए उसे प्रथम शिष्य माना जाता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: हालांकि जमालि बाद में महावीर के मत से असहमत हो गया और उसने अपना अलग संप्रदाय स्थापित किया जिसे ‘बहुरत’ कहा जाता है — यह जैन धर्म का पहला विधर्मी (schismatic) आंदोलन था।
    36. जैन साहित्य से संबंधित निम्नलिखित कथनों को पढ़िए तथा सटीक विकल्प को चुनिए-
    कथन I : श्वेताम्बर धर्मसूत्र में 12 अंग शामिल हैं।
    कथन II : श्वेताम्बर परंपरा के अनुसार, इन अंगों का संकलन
    वल्लभी में आयोजित एक धर्मसभा में किया गया था।
    (a) कथन I एवं कथन II दोनों ही सही हैं।
    (b) कथन I गलत है, लेकिन कथन II सही है।
    (c) कथन I एवं कथन II दोनों ही गलत हैं।
    (d) कथन I सही है, लेकिन कथन II गलत है।
    Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2020
    उत्तर-(d)
    श्वेतांबर मान्यता के अनुसार 12 अंगों का संकलन 310 ईसा पूर्व में पाटलिपुत्र में हुई प्रथम जैन संगीति में किया गया था — वल्लभी में नहीं। अतः कथन I सत्य है किंतु कथन II असत्य है। दिगंबर पंथियों ने इस संगीति में भाग नहीं लिया क्योंकि उनका मानना था कि 12 अंगों का ज्ञान पहले ही नष्ट हो चुका है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: 12 अंगों में पहला ‘आचारांगसूत्र’ है जो महावीर के जीवन और आचार-विधि का सबसे प्राचीन वर्णन करता है। 12वाँ अंग ‘दृष्टिवाद’ है जो दिगंबरों के अनुसार पूरी तरह लुप्त हो चुका है।
    37. निम्नलिखित में से कौन-सा स्थल पार्श्वनाथ से संबद्ध होने के कारण जैन-सिद्ध क्षेत्र माना जाता है ?
    (a) चंपा
    (b) पावा
    (d) ऊर्जयंत
    (c) सम्मेद शिखर
    U.P.P.C.S. (Pre) 2002
    U.P. Lower Sub. (Pre) 2002
    उत्तर-(c)
    पार्श्वनाथ जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर थे जिनका जन्म वाराणसी में लगभग 850 ईसा पूर्व हुआ। उनके पिता काशी के राजा अश्वसेन और माता वामा थीं। 30 वर्ष की आयु में उन्होंने गृहत्याग किया और 84 दिनों की कठोर साधना के बाद आश्रमपद उद्यान में ‘केवलज्ञान’ प्राप्त किया। उनका परिनिर्वाण झारखंड स्थित सम्मेद शिखर (पारसनाथ पर्वत) पर हुआ, जिसके कारण यह जैनों का पवित्र सिद्ध क्षेत्र है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सम्मेद शिखर को ‘पारसनाथ हिल’ भी कहते हैं और यह झारखंड में 1,365 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। जैन मान्यता के अनुसार 24 तीर्थंकरों में से 20 को यहीं मोक्ष प्राप्त हुआ था।
    38. भगवान महावीर का प्रथम शिष्य था-
    (a) जमालि
    (b) योसुद
    (d) प्रभाष
    (c) विपिन
    U.P.P.C.S. (Pre) 2008
    उत्तर-(a)
    भगवान महावीर का जन्म 599 ईसा पूर्व में क्षत्रिय सामंत सिद्धार्थ के घर हुआ था। उनकी पत्नी यशोदा से एक पुत्री प्रियदर्शना हुई। प्रियदर्शना का विवाह जमालि नामक क्षत्रिय से हुआ, जो बाद में महावीर के उपदेशों से प्रभावित होकर उनका शिष्य बना। इस प्रकार जमालि महावीर का प्रथम शिष्य था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: महावीर ने 72 वर्ष की आयु में 527 ईसा पूर्व में पावापुरी (बिहार) में निर्वाण प्राप्त किया। इस दिन को जैन धर्म में ‘दीपावली’ के रूप में मनाया जाता है, जो प्रकाश पर्व की उत्पत्ति की एक महत्वपूर्ण परंपरा है।
    39. प्रारंभिक जैन साहित्य निम्नलिखित में से किस भाषा में लिखे गए ?
    (a) अर्धमागधी
    (b) पाली
    (c) प्राकृत
    (d) संस्कृत
    U.P.P.C.S. (Mains) 2006
    उत्तर-(a)
    प्रारंभिक जैन धार्मिक साहित्य की रचना प्राकृत भाषा की विशेष शाखा ‘अर्धमागधी’ में की गई। 12 अंग सहित अधिकांश प्रारंभिक ग्रंथ इसी भाषा में उपलब्ध हैं। ईसा की छठी शताब्दी में गुजरात के वल्लभी नगर में इन ग्रंथों को अंतिम रूप से संकलित किया गया। आज जैन साहित्य का अनुवाद लगभग सभी प्रमुख भाषाओं में हो चुका है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अर्धमागधी को ‘आर्यमागधी’ भी कहा जाता है। यह महावीर के समय मगध क्षेत्र की बोलचाल की भाषा थी। बाद में दिगंबर जैनों ने शौरसेनी प्राकृत और अपभ्रंश को अपनाया।
    40. निम्नलिखित में से कौन-सा आरंभिक जैन साहित्य नहीं है ?
    (a) थेरीगाथा
    (b) आचारांगसूत्र
    (c) सूत्रकृतांग
    (d) बृहत्कल्पसूत्र
    I.A.S. (Pre) 1996
    उत्तर-(a)
    ‘थेरीगाथा’ जैन नहीं बल्कि बौद्ध साहित्य का भाग है। यह पालि भाषा में लिखा गया ग्रंथ है जिसमें बौद्ध भिक्षुणियों (थेरियों) की गाथाएं संकलित हैं। आचारांगसूत्र, सूत्रकृतांग और बृहत्कल्पसूत्र — ये तीनों प्रारंभिक जैन साहित्य के महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: थेरीगाथा विश्व साहित्य की सबसे प्राचीन ज्ञात रचनाओं में से एक है जो महिलाओं द्वारा लिखी गई थी। वहीं आचारांगसूत्र जैन धर्म का सबसे प्राचीन अंग है जिसमें महावीर के तपश्चर्या के जीवन का वर्णन है।
  • जैन धर्म : महावीर स्वामी और अहिंसा का सिद्धांत

    📚 विषय सूची
     जन्म540 ई.पू.
     जन्मस्थलवैशाली के कुण्डग्राम के निकट बिहार
     पितासिद्धार्थ
     कुलक्षत्रिय
     मातात्रिशला (लिच्छवी शासक चेटक की बहन)
     बचपन का नामवर्द्धमान
     पत्नीयशोदा (कुण्डिय गोत्र के राजा समरवती की कन्या)
     पुत्रीप्रियदर्शना (अणोज्जा)
     गृह त्याग30 वर्ष की आयु में
     प्रथम शिष्यजमालि/जामालि (दामाद)
     प्रथम शिष्याचंदना
     प्रमुख शिष्यमक्खलि पुत्र गोशाल (आजीवक संप्रदाय के संस्थापक)
     प्रथम विरोधीजमालि
     द्वितीय विरोधीतीसगुप्त (ज्ञान प्राप्ति के 16वें वर्ष)
     ज्ञान प्राप्त स्थलजृम्भिक ग्राम में ऋजुपालिका नदी के तट पर
     ज्ञान प्राप्तिवृक्ष साल वृक्ष
     पहला उपदेशराजगृह में वितुलाचल पहाड़ी पर स्थित वाराकर नदी के तट पर।
     प्रमुख उपाधिकेवलिन (सर्वोच्च ज्ञान प्राप्त व्यक्ति),जिन (विजेता), निर्ग्रन्थ (बंधनरहित), अर्हत्(पूज्य)।
     निर्वाण468 ई. में पावापुरी (राजगृह) बिहार में 72 वर्ष की आयु में

    जैन धर्म

    ➣ जैन शब्द संस्कृत के जिन शब्द से बना है, जिसका अर्थ विजेता होता है अर्थात् जिन्होंने अपने मन, वाणी एवं काया को जीत लिया हो।

    ➣ जैन अनुश्श्रुतियों और परंपराओं के अनुसार जैन धर्म में 24 तीर्थंकर हुए, परंतु इनमें से पहले 22 तीर्थंकरों की ऐतिहासिकता संदिग्ध है।

    ऋषभदेव

    ➣ जैन धर्म की स्थापना का श्रेय जैनियों के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव या आदिनाथ को जाता है, जिन्होंने छठी शताब्दी ई.पू. जैन आंदोलन का प्रवर्तन किया।

    ➣ ऋषभदेव (प्रथम तीर्थंकर) व अरिष्टनेमि (22वें तीर्थकर) का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। अरिष्टनेमि वासुदेव श्री कृष्ण के समकालीन थे।

    ➣ ऋषभदेव का जन्म अयोध्या में माना जाता है। ऋषभदेव अयोध्या के राजा थे। ऋषभदेव को आदिनाथ एवं केसरियानाथ भी कहा जाता है। इन्होंने कैलाश पर्वत पर शरीर त्यागा था।

    ➣ विष्णु पुराण तथा भागवत पुराण में ऋषभदेव का उल्लेख नारायण के अवतार के रूप में मिलता है एवं भागवत पुराण में इन्हें विष्णु का अवतार कहा गया है।

    पार्श्वनाथ

    ➣ जैनधर्म के 23वें तीर्थकर पार्श्वनाथ थे, जो काशी के इक्ष्वाकु वंशीय राजा अश्वसेन के पुत्र थे। इनका जन्म वाराणसी (काशी) में 850 ई.पू. के आस-पास हुआ।

    ➣ इनका काल महावीर से 250 ई.पू. माना जाता है। इनके अनुयायियों को निग्रंथ कहा जाता था।

    ➣ जैन अनुश्रुतियों के अनुसार पार्श्वनाथ को 84 दिन की तपस्या के बाद 100 वर्ष की आयु में सम्मेद पर्वत (झारखंड के गिरिडीह जिले में) पर कैवल्य प्राप्त हुआ।

    ➣ पार्श्वनाथ ने नारियों को भी अपने धर्म में प्रवेश दिया। पार्श्वनाथ के प्रथम अनुयायी इनकी माता वामा एवं पत्नी प्रभावती थी।

    ➣ पार्श्वनाथ के अनुयायियों को निर्ग्रन्थ कहा जाता था। पार्श्वनाथ वैदिक कर्मकाण्ड एवं देववाद के कटु आलोचक थे।

    ➣ उन्होंने प्रत्येक व्यक्ति को मोक्ष का अधिकारी बताया तथा नारियों को भी अपने संप्रदाय में प्रवेश दिया।

    आर्यदत्त पार्श्वनाथ के भिक्षु संघ के अध्यक्ष एवं पुष्पचुला भिक्षुणी संघ की अध्यक्षा थी।

    ➣ पार्श्वनाथ द्वारा प्रतिपादित चार महाव्रतों (चातुर्याम)- सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह एवं अस्तेय में महावीर स्वामी ने ब्रह्मचर्य नामक महाव्रत जोड़ा।

    महावीर स्वामी

    ➣ जैनधर्म के 24वें व अंतिम तीर्थकर महावीर स्वामी थे। इन्हें ही जैन धर्म का वास्तविक संस्थापक माना गया है।

    ➣ महावीर का जन्म 540 ई.पू. में वैशाली के निकट कुण्डग्राम (वज्जिसंघ का गणराज्य) के ज्ञात कुल के प्रधान सिद्धार्थ के यहाँ हुआ था। इनके बचपन का नाम वर्धमान था।

    ➣ इनके पिता सिद्धार्थ ज्ञातृक क्षत्रियों के संघ के प्रधान थे एंव माता त्रिशला अथवा विदेहदत्ता वैशाली के लिच्छवी गणराज्य के प्रमुख चेटक की बहन थीं।

    ➣ इनकी पत्नी का नाम यशोदा (कुंडिन्य गोत्र की कन्या) था। इससे उन्हें अणोज्जा (प्रियदर्शना) नामक पुत्री उत्पन्न हुई। इसका विवाह जमालि के साथ हुआ था।

    ➣ महावीर ने 30 वर्ष की आयु में भाई नन्दिवर्धन की अनुमति से गृहत्याग कर संन्यास (यती) ले लिया और वस्त्रों का त्याग कर उन्हें सुवर्ण-बलुआ/स्वर्ण-बालूका नदी में बहा दिया।

    12 वर्ष तक लगातार कठोर तपस्या एवं साधना के बाद 42 वर्ष की अवस्था में महावीर को जृम्भिकग्राम के समीप उज्जुवालिया (ऋजुपालिका) नदी के किनारे साल के वृक्ष के नीचे कैवल्य (सर्वोच्च ज्ञान) प्राप्त हुआ।

    ➣ ज्ञान प्राप्ति के कारण महावीर स्वामी को केवलिन कहा गया है तथा योग्यतम (पूज्य) होने के कारण अर्हत् (योग्य) कहलाये।

    ➣ इन्द्रियों के जीतने के कारण जिन (विजेता) एवं महावीर कहलाये। बंधनों से मुक्त होने के कारण वे निर्ग्रन्थ (बन्धन रहित) कहलाये।

    ➣ महावीर ने प्रथम वर्षावास अस्तिकाग्राम एवं अन्तिम वर्षावास पावापुरी में व्यतित किया। सर्वाधिक वर्षावास वैशाली में व्यतीत किए, इसलिए वैशाली को महावीर की जननी कहा जाता है।

    ➣ कैवल्य प्राप्ति के पश्चात महावीर स्वामी ने अपने सिद्धांतों का प्रचार प्रारंभ किया। वैशाली के लिच्छवी सरदार चेटक, जो उनके मामा थे, जैन धर्म के प्रचार में मुख्य योगदान दिया।

    ➣ महावीर स्वामी ने अपना प्रथम उपदेश राजगृह में दिया। उनके अनुयायी उनके दामाद जामिल बने।

    ➣ कालांतर में महावीर स्वामी का उनके शिष्य जमालि से मतभेद हो गया, मतभेद का कारण क्रियमाणकृत सिद्धांत (कार्य करते ही पूर्ण हो जाना) था। मतभेद के कारण जमालि ने संघ छोड़ दिया और एक नए सिद्धांत बहुरतवाद (कार्य पूर्ण होने पर ही पूर्ण माना जाएगा) का प्रतिपादन किया। ।

    ➣ महावीर का निर्वाण 468 ई पू में बहत्तर साल की उम्र में आज के राजगीर के समीप पावापुरी में राज हस्तिपाल के राजा प्रासाद में हुआ। दूसरी परंपरा के अनुसार उनका देहांत 527 ई पू में हुआ।

    ➣ चेटक ने अपनी एक बहन का विवाह मगधराज बिम्बिसार से किया। अतः बिम्बिसार महावीर स्वामी का संबंधी था।

    • प्रथम जैन भिक्षुणी चम्पा नरेश दधिवाहन की बेटी चन्दना थी, जो भिक्षुणी संघ की अध्यक्ष भी थी।
    • महावीर स्वामी ने अपने शिष्यों को 11 गणधरों में बाँटा था।
    • महावीर की मृत्यु के पश्चात् जैन संघ का प्रमुख थेर (धर्मगुरु) आर्य सुधर्मण को बनाया गया।
    • 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ वस्त्र धारण करने के समर्थक थे, जबकि महावीर स्वामी ने पूर्णत: नग्न रहने का समर्थन किया।
    • जैन संघ से अलग होने वाले प्रथम व्यक्ति जामिल था।
    • महावीर ने प्राकृत भाषा में अपने उपदेश दिये, ताकि जनसामान्य उन्हें समझ सकें।

    शिक्षाएँ एंव सिद्धांत

    ➣ महावीर स्वामी ने पंच महाव्रत की शिक्षा दी जो हैं-अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह एवं ब्रह्मचर्य। भिक्षुओं के लिए पंच महाव्रत तथा गृहस्थों के लिए पंच अणुव्रतों की व्यवस्था है।

    ➣ जैन धर्म अनीश्वरवादी है। उनके अनुसार सृष्टि में निर्माण सार्वभौमिक विधान से हुआ है, इसलिए जैन धर्म प्रलय की अवधारणा में विश्वास नहीं करता।

    ➣ उन्होंने आत्मवादियों तथा नास्तिकों के एकांतिक मतों को छोड़कर बीच का मार्ग अपनाया, जिसेअनेकांतवाद अथवा स्यादवाद कहा गया। स्यादवाद को सप्तभंगीनय के नाम से भी जाना जाता है। यह ज्ञान की सापेक्षता का सिद्धांत है।

    ➣ महावीर स्वामी पुनर्जन्म एवं कर्मवाद में विश्वास करते थे, किंतु ईश्वर के अस्तित्व उनका विश्वास नहीं था। उन्होंने ईश्वर को सृष्टिकर्ता के रूप में नहीं स्वीकारा।

    ➣ महावीर ने वस्त्र का सर्वथा त्याग करने का आदेश दिया था। इसका आशय यह था कि वे अपने अनुयायियों के जीवन में और भी अधिक संयम लाना चाहते थे। इसके चलते, बाद में जैन धर्म दो संप्रदायों में विभक्त हो गया- श्वेतांबर अर्थात् सफेद वस्त्र धारण करने वाले, और दिगंबर अर्थात् नग्न रहने वाले।

    ➣ महावीर ने वेदों एवं वैदिक कर्मकाण्डों को नकार दिया एवं शुद्ध सरल तथा संयमित जीवन जीने का उपदेश दिया। उन्होंने जीवन का मुख्य उद्देश्य कैवल्य (निर्वाण) या ज्ञान प्राप्त करना बताया।

    ➣ बौद्ध धर्म में वर्णव्यवस्था की जो निंदा है वह इस धर्म में नहीं है। मगर उसका आधार उन्होंने कर्म को बताया जन्म को नहीं।

    ➣ महावीर के अनुसार, पूर्वजन्म में अर्जित पुण्य या पाप के अनुसार ही किसी का जन्म उच्च या निम्न कुल में होता है।

    ➣ महावीर ने चांडालों में भी मानवीय गुणों का होना संभव बताया है। उनके मत में शुद्ध और अच्छे आचरण वाले निम्न जाति के लोग भी मोक्ष पा सकते हैं।

    ➣ जैन धर्म में देवताओं का अस्तित्व स्वीकार किया गया है, पर उनका स्थान जिन से नीचे रखा गया है।

    ➣ जैन धर्म में सभी वस्तुओं में आत्मा की परिकल्पना की गयी है और अमर माना गया है। वे आत्मा के पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं।

    ➣ जैन धर्म में युद्ध और कृषि दोनों वर्जित हैं, क्योंकि दोनों में जीवों की हिंसा होती है। फलत: जैन धर्मावलंबियों में व्यापार और वाणिज्य करने वाले की संख्या अधिक हो गई।

    ➣ जैन धर्मानुसार ज्ञान के तीन स्रोत हैं- (1) प्रत्यक्ष (2) अनुमान तथा (3) तीर्थंकरों के वचन।

    ज्ञान के प्रकार

    • मति (इन्द्रिय-जनित ज्ञान)
    • श्रुति (श्रवण ज्ञान)
    • अवधि (दिव्य ज्ञान)
    • मनः पर्याय (दूसरों के मन का ज्ञान)
    • कैवल्य (पूर्ण ज्ञान / सर्वोच्च ज्ञान)

    ➣ जैन धर्म के अनुसार, यह संसार 6 द्रव्यों से मिलकर बना है ये हैं- 1. जीव, 2. पुद्गल (भौतिक तत्व), 3. धर्म, 4. अधर्म, 5. आकाश, 6. काल।

    काल अनस्तिकाय द्रव्य है, जबकि अन्य पाँच अस्तिकाय द्रव्य हैं।

    ➣ जैन धर्म में आठ कर्म18 पापों का विवरण है।

    ➣ जैन धर्म के अनुसार ज्ञान के पांच साधन हैं –

    1. मतिजन्य (मन व इन्द्रियों द्वारा प्राप्त होने वाला प्रत्यक्ष ज्ञान)
    2. श्रुतिजन्य (धार्मिक पुस्तकों से प्राप्त होने वाला ज्ञान)
    3. मनःप्रज्ञ ज्ञान (दूसंवेदी ज्ञान)
    4. अवधि जन्य ज्ञान (सूक्ष्मदर्शी, प्रत्यक्ष ज्ञान)
    5. कैवल्य-जन्य ज्ञान (सांसारिक ज्ञान)

    त्रिरत्न

    ➣ जैन धर्म दर्शन का अन्तिम लक्ष्य निर्वाण या मोक्ष प्राप्त करना है। इसके लिए जैन धर्म ने तीन साधन आवश्यक बताए गए हैं। इन तीनों को जैन धर्म में ‘त्रिरत्न’ की संज्ञा दी गई है।

    ➣ इसके लिए निम्न त्रिरत्न बताएं गए हैं –

    सम्यक् ज्ञानवास्तविक ज्ञान।
    सम्यक् दर्शनसत्य में विश्वास।
    सम्यक् चरित्र इन्द्रियों व कर्मों पर पूर्ण नियन्त्रण।

    ➣ त्रिरत्नों में सर्वाधिक बल सम्यक् आचरण पर दिया गया है। पंच महाव्रत इसी का अंग है।

    ➣ त्रिरत्नों का अनुसरण करने से कर्मों का जीव की ओर प्रवाह रुक जाता है, जिसे संवर कहते हैं। इसके बाद जीव में पहले से व्याप्त कर्म समाप्त होने लगते हैं, इसे निर्जरा कहा गया है।

    ➣ जब जीव में कर्म का अवशेष पूर्ण समाप्त हो जाता है, तब वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है और वह अनन्त चतुष्ट्य को प्राप्त कर लेता है। अनंत चतुष्ट्य है-अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत वीर्य तथा अनंत सुख।

    पंच महाव्रत

    ➣ इसमें से पहले चार पूर्ववर्ती तीर्थंकर (पार्श्वनाथ) की देन थे। अन्तिम महाव्रत ब्रह्मचर्य को महावीर ने जोड़ा था। जैन धर्म के पांच व्रत हैं-

    अहिंसा (अहिंसाणुव्रत)जीव की हिंसा न करना।
    सत्य (सत्याणुव्रत)सदा सत्य का मधुर बोलना।
    अपरिग्रह (अपरिग्रहाणुव्रत)सम्पत्ति ग्रहण न करना।
    अस्तेय (अस्तेयाणुव्रत)चोरी न करना।
    ब्रह्मचर्य (ब्रह्मचर्याणुव्रत)इन्द्रिय निग्रह करना।

    ➣ उपर्युक्त पाँच महाव्रत/अणुव्रतों के अतिरिक्त तीन गुणव्रत भी बताए हैं-

    1. दिग्नतदिशाओं में भ्रमण की मर्यादा बांधना;
    2. अनर्थ दण्डवत्प्रयोजन हीन, पाप उत्पादक वस्तुओं का परित्याग करना;
    3. भोगोपभोग परिमाण अर्थात् भोग्य पदार्थों का परिमाण-निर्धारण।

    ➣ जैन धर्म में सात शील व्रतों का उल्लेख है-

    1. दिग्व्रत अपनी क्रियाओं को विशेष परिस्थिति में नियंत्रित रखना;
    2. दशव्रत अपने कार्य कुछ विशिष्ट प्रदेशों तक सीमित रखना:
    3. अनर्थदण्ड व्रत बिना कारण अपराध न करना;
    4. सामयिक चिंतन के लिये कुछ समय निश्चित करना;
    5. प्रोषधोपवास मानसिक एवं कायिक शुद्धि के लिये उपवास करना;
    6. उपभोगप्रतिभोग परिणाम जीवन में प्रतिदिन काम आने वाली वस्तुओं व पदार्थों को नियंत्रित करना;
    7. अतिथि संविभाग अतिथि को भोजन कराने के उपरांत भोजन करना।

    ➣ जैन धर्म में धर्म के दस लक्षण बताए गए हैं, ‘ये इस प्रकार हैं-

    1. उत्तम क्रमा क्रोधहीनता
    2. उत्तम मार्दव अहंकार का अभाव
    3. उत्तम मार्जव सरलता एवं कुटिलता का अभाव
    4. उत्तम सोच सांसारिक बंधनों से आत्मा को परे रखने की सोच
    5. उत्तम सत्य सत्य गंभीर अनुरक्ति
    6. उत्तम संयम सदा संयमित, जीवन-यापन
    7. उत्तम तप जीव को आजीव से मुक्त करने के लिये कठोर तपस्या
    8. उत्तम अकिंचन आत्मा के स्वाभाविक गुणों में आस्था
    9. उत्तम ब्रह्मचर्य ब्रह्मचर्य व्रत का कड़ाई से अनुपालन
    10. उत्तम त्याग त्याग की भावना को सर्वोपरि रखना

    दर्शन

    अनकातवाद बहुरूपता का सिद्धांत
    सप्तभगीनय/स्यादवाद सापेक्षता का सिद्धांत
    नवावद आशिक दृष्टिकोण के सिद्धांत
    ➣ जैन धर्म से निम्नलिखित शब्दावलियां सम्बन्धित हैं-
    नय आशिक ज्ञान को नय कहा जाता है।
    आस्रव कर्म का जीव की ओर प्रवाह आस्रव कहलाता है।
    संवरजब जीव की ओर कर्मों का प्रवाह रूक जाए, तो इसे संवर कहते हैं।
    निर्जरा संचित कर्मों का नष्ट होना निर्जरा कहलाता है।
    मोक्ष आस्रव के कारण जीव बंधन में पड़ता है। संवर एवं निर्जरा के कारण जीव को मुक्ति मिलती है, जिसे मोक्ष कहते हैं।
    कसाय वे तत्व हैं, जिन पर कर्म पुद्गल चिपकते हैं। चार कसाय हैं- लोभ, क्रोध, मोह एवं मान।
    थेरा जैन धर्म में मुख्य उपदेशक को थेरा कहा जाता है।

    जैन धर्म के सिद्धांत

    दार्शनिक सिद्धांत अनीश्वरवाद कर्मवाद, आत्मवाद निर्वाण, पुनर्जन्म
    व्यावहारिक सिद्धांत पंच महाव्रत, अणुव्रत
    सामाजिक सिद्धांत नारी स्वातंत्र्य, आचार नग्नता, पाप

    ➣ बौद्ध साहित्य में महावीर स्वामी को निगण्ठ नाटपुत्त कहा गया है।

    ➣ जैन धर्म में अहिंसा या किसी प्राणी को न सताने के व्रत को सबसे अधिक महत्त्व दिया गया है। महावीर के पूर्व तीर्थंकर राजा, पशु की हत्या करने वालों को फाँसी पर चढ़ा देते थे।

    जैन संगीतियाँ

    प्रथम जैन संगीति

    ➣ चन्द्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में 300 ई.पू. में पाटलिपुत्र में जैन धर्म उपदेशों के संकलन हेतु एक महासभा का आयोजन किया गया। यह सभा स्थूलभद्र एवं सम्भूति विजय नामक स्थविरों के निरीक्षण में हुई।

    ➣ इसमें जैन धर्म के प्रधान भाग 14 पूर्वी (पर्वों) का स्थूलभद्र ने 12 अंगों में सम्पादन किया। श्वेताम्बरों ने 12 अंगों को स्वीकार किया।

    ➣ इस महासभा का दक्षिण के दिगम्बर जैनों यथा- भद्रबाहु आदि ने बहिष्कार किया। इसमें, जैन धर्म श्वेताम्बर एवं दिगम्बर संप्रदायों में बँट गया-

    • दिगम्बर – नग्न रहने वाले (भद्रबाहु के नेतृत्व में)
    • श्वेताम्बर – श्वेत वस्त्र धारण करने वाले (स्थूलभद्र के नेतृत्व में)
    • दिगम्बर साधु को क्षुल्लक, एल्लक एवं निर्ग्रन्थ कहा जाता था।
    • श्वेताम्बर साधु को यति, साधु एवं आचार्य कहा जाता था।

    द्वितीय जैन संगीति

    ➣ 512-513 ई. में देवर्धिगणि (क्षमाश्रमण) के नेतृत्व में एवं मैत्रेक वंश के शासक श्रवसेन-प्रथम के संरक्षण में गुजरात में वल्लभी में द्वितीय जैन महासभा का आयोजन हुआ।

    द्वितीय जैन संगीति का मूल उद्देश्य जैन धर्म के मूल पाठों को एकत्र कर उन्हें आगमों का रूप देना था।

    ➣ इसमें धर्म-ग्रन्थों को अंतिम रूप से अर्धमागधी भाषा में संकलित कर लिपिबद्ध किया गया तथा 12 उपांग जोड़े गये। प्रथम सभा में संकलित 12वाँ अंग समय खो गया था।

    संगीति वर्ष स्थलअध्यक्ष
    प्रथम 300 ईसा पूर्वस्थूलभद्र(पाटलिपुत्र में)स्थूलभद्र
    द्वितीयद्वितीय शताब्दीसम्भूति विजय (कलिंग में)क्षमाश्रवण

    ➣ प्रथम संगीति के पश्चात् जैन धर्म का दो भागों में विभाजन हो गया-

    • तेरापन्थी (श्वेताम्बर)
    • समैया (दिगम्बर)

    उपवास द्वारा शरीर त्यागना श्वेताम्बरों में संथारा एवं दिगम्बरों में सल्लेखना कहलाता है।

    श्वेताम्बर (तेरापंथी)

    300 ई.पू. में मगध में अकाल पड़ने पर स्थलबाहु के नेतृत्व में मगध में ही निवास करने वाले एवं श्वेत वस्त्र धारण करने वाले जैन भिक्षु श्वेताम्बर कहलाये।

    • इनके अनुसार मोक्ष प्राप्ति हेतु वस्त्र त्याग आवश्यक नहीं था।
    • श्वेताम्बर स्त्रियों को भी निर्वाण के योग्य माना गया है।
    • ये महावीर को विवाहित मानते और उनकी सन्तानें थीं।
    • इनके अनुसार भोजन ग्रहण करना आवश्यक है।
    • तीर्थंकरों का जीवन-चरित लिखते समय चरित्र शब्द का प्रयोग करते हैं।
    • इन्होंने जैन आगम ग्रन्थ को स्वीकार किया।
    • पुजेरा/डेरावासी, दुढिया/स्थानकवासी एवं थैरापंथी इसके उप सम्प्रदाय हैं।
    • श्वेताम्बर सम्प्रदाय के लोगों ने ही सर्वप्रथम महावीर एवं अन्य तीर्थंकरों (पार्श्वनाथ) की पूजा आरम्भ की।

    दिगम्बर (समैया)

    ❑ अकाल के समय छठे जैन आचार्य या अन्तिम थेरा (थेर) भद्रबाहु के नेतृत्व में मगध छोड़कर श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) जाने वाले जैन दिगम्बर कहलाये। इन्हें दक्षिणी जैन भी कहा जाता है।

    • दिगम्बर अपने को शुद्ध बताते थे एवं नग्न रहते थे। इनके अनुसार मोक्ष प्राप्ति हेतु वस्त्र त्याग आवश्यक था।
    • यह संप्रदाय स्त्रियों के निर्वाण को आवश्यक नहीं मानता।
    • ये महावीर को अविवाहित मानते थे।
    • भोजन आवश्यक नहीं है। तीर्थंकरों का जीवन-चरित लिखते समय पुराण शब्द का प्रयोग करते हैं।
    • इन्होंने जैन आगम ग्रन्थ को अस्वीकार किया।
    • तेरापंथी, तारणपंथी/समैया, तोतापंथी, बीसपंथी एवं गुमानपंथी इसके उप-सम्प्रदाय हैं।
    • प्रथम शताब्दी ई. में यापानीय नामक जैन सम्प्रदाय की स्थापना कल्याणगढ़ में श्वेताम्बर साधु कलस ने की। यापानीय सम्प्रदाय श्वेताम्बर एवं दिगम्बर का मिश्रण है।

    जैन संघ

    ➣ जैन धर्म के उपदेशों के प्रचार-प्रसार के लिए महावीर ने अपने अनुयायियों का संघ बनाया जिसमें स्त्री और पुरुष दोनों को स्थान मिला।

    ➣ महावीर ने अपने जीवन काल में केवल एक संघ की ही स्थापना की, जिसमें 11 प्रमुख अनुयायी सम्मिलित थे। इनको गणधर (गन्धर्व) कहा जाता था। इनके नामों की जानकारी कल्पसूत्र, आवश्यकनियुक्ति एवं आवश्यकचूर्णि में मिलती है।

    ➣ इनके नाम हैं-इंद्रभूति, अग्निभूति, वायुभूति (तीनों भाई), आर्य व्यक्त, सुधर्मन, मंडित, मौर्यपुत्र, अकंपित, अचलभ्राता, मेतार्य तथा प्रभास। ये गणधर ब्राह्मण थे, जिनको पावा में दीक्षा दी गयी।

    ➣ इन 11 गणधरों में से 10 की मृत्यु महावीर स्वामी के समय में ही हो गयी थी। सिर्फ एक गणधर आर्य सुधर्मण जीवित बचा था।

    ➣ जबकि जयशंकर मिश्र के अनुसार महावीर स्वामी की मृत्यु के बाद सुधर्मन एवं इन्द्रभूति नामक दो गणधर जीवित रहे तथा सुधर्मन महावीर स्वामी की मृत्यु के बाद जैन धर्म/संघ के प्रथम अध्यक्ष बने, जो प्रथम थेरा भी थे।

    ➣ सुधर्मन की मृत्यु के पश्चात जम्बू 44 वर्षों तक संघ का अध्यक्ष रहा। अंतिम नंद राजा के समय सम्भूतविजय तथा भद्रबाहु संघ के अध्यक्ष थे। अन्तिम थेरा (थेर) भद्रबाहु थे।

    सम्भूतविजय तथा भद्रबाहु महावीर द्वारा प्रदत्त 14 पूव्वो (पूर्वो) (प्राचीनतम जैन ग्रंथों) के विषय में जानने वाले ये दोनों अंतिम व्यक्ति थे।

    ➣ जैन धर्म में भिक्षु व भिक्षुणी सन्यासी जीवन व्यतीत करते है, जबकि श्रावक व श्राविका गृहस्थ जीवन व्यतीत करते थे।

    ➣ जैन धर्म में सिर्फ संघ के सदस्यों के लिये कैवल्य का नियम है, सामान्य जन के लिये नहीं। सामान्य जन या गृहस्थों को भिक्षु जीवन में प्रवेश करने से पूर्व II कोटियों से होकर गुजरना पड़ता है।

    जैन धर्म का प्रचार-प्रसार

    ➣ जैनों ने मुख्यतः ब्राह्मणों द्वारा संपोषित संस्कृत भाषा का परित्याग किया और अपने धर्मोपदेश के लिए आम लोगों की बोलचाल की प्राकृत भाषा को अपनाया।

    ➣ महावीर स्वामी के समय जैन धर्म का सर्वाधिक प्रसार हुआ। महावीर के समकालीन शासक बिम्बिसार, चंडप्रद्योत, अजातशत्रु, उदायिन, दधिवाहन एवं चेटक थे। ये सभी जैन धर्म के अनुयायी थे।

    ➣ उत्तर भारत में जैन धर्म के दो प्रमुख केन्द्र उज्जैन एवं मथुरा थे। पश्चिम में गिरनार प्रमुख केन्द्र था । पूर्वी भारत में पुण्ड्रवर्धन एवं दक्षिण भारत में कर्नाटक दिगम्बर संप्रदाय का प्रमुख केन्द्र था।

    गंग वंश के राजा राजमल चतुर्थ का मंत्री एवं सेनापति चामुंड राय में 974 ई. में एक बाहुबली जिन की मूर्ति (गोमतेश्वर) का निर्माण श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) में करवाया। यहाँ पर प्रत्येक 12 वर्ष में महामस्तकाभिषेक किया जाता है।

    ➣ मौर्य वंश का शासक चंद्रगुप्त मौर्य भी जैन धर्म का अनुयायी था। अशोक का पौत्र संप्रति जैन धर्म का संरक्षक था। उसने जैन आचार्य सुहास्ति से शिक्षा ली थी। वह उज्जैन में शासन करता था, जिसके कारण उज्जैन जैन धर्म का एक प्रमुख केंद्र बन गया।

    ➣ जैनियों का दूसरा प्रमुख केंद्र मथुरा था। यहां से अनेक मंदिर, प्रतिमाएं, अभिलेख आदि प्राप्त हुए हैं।

    ➣ कलिंग का चेदि शासक खारवेल जैन धर्म का महान संरक्षक था। इसने भुवनेश्वर के नजदीक उदयगिरि तथा खंडगिरि की पहाड़ियों को कटवा कर जैन भिक्षुओं के निवास के लिए गुहा विहार बनवाए थे।

    स्कन्दगुप्त के कहौम अभिलेख से जैन तीर्थंकरों की पाँच प्रतिमाओं की स्थापना का उल्लेख मिलता है।

    उदयगिरि (विदिशा, मध्यप्रदेश) की बाघ गुफा से कुमारगुप्त प्रथम के समय (425 ई.) का एक लेख मिला है, जिसके अनुसार शंकर नामक एक व्यक्ति ने जैन तीर्थंकर की मूर्ति का निर्माण करवाया।

    ➣ पूर्व मध्यकाल में राष्ट्रकूट, गंग, गुजरात के चालुक्य एवं चंदेल शासकों ने भी जैन धर्म को प्रश्रय दिया। राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष जैन धर्म का अनुयायी था. इसने रत्नमालिका नामक ग्रंथ की रचना की।

    राष्ट्रकूट राजाओं के शासनकाल (9वीं शताब्दी) में गुजरात एवं राजस्थान में जैन धर्म 11वीं तथा 12वीं शताब्दियों में अधिक लोकप्रिय रहा। खजुराहो के मंदिर हिंदू धर्म और जैन धर्म से संबंधित हैं।

    माउंट आबू के दिलवाड़ा जैन मंदिर संगमरमर के बने हैं। इनका निर्माण गुजरात चालुक्य (सोलंकी) शासक भीमदेव प्रथम के सामंत विमलशाह ने करवाया था।

    श्रवणबेलगोला कर्नाटक राज्य में स्थित है। जहाँ गंग शासक रचमल्ल चतुर्थ (पंचमल्ल) के शासनकाल में चामुंडराय नामक मंत्री ने लगभग 981 ई. में बाहुबली (गोमतेश्वर) की विशालकाय जैन मूर्ति का निर्माण कराया। बाहुबली, प्रथम जैन तीर्थंकर ऋषभदेव के पुत्र माने जाते हैं।

    महामस्तकाभिषेक, जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण उत्सव है, जो 12 वर्ष के अंतराल पर कर्नाटक राज्य के श्रवणबेलगोला में आयोजित किया जाता है।

    दक्षिण भारत में प्रचार

    ➣ एक परवर्ती परंपरा के अनुसार, कर्नाटक में जैन धर्म का प्रचार सम्राट् चंद्रगुप्त मौर्य (322-298 ई० पू०) ने किया। उसने अपने अंतिम समय में राज्य को त्याग दिया और जैन धर्म को अपना लिया। अपने जीवन के अंतिम वर्ष जैन साधु होकर कर्नाटक में जैन धर्म का प्रचार करते हुए बिताए तथा सल्लेखना विधि से प्राण त्याग किये।

    ➣ दक्षिण भारत में जैन धर्म के फैलने का दूसरा कारण यह बताया जाता है कि महावीर के निर्वाण के 200 वर्ष बाद मगध में भारी अकाल पड़ा।

    ➣ अकाल बारह वर्षों तक रहा, अत: बहुत-से जैन बाहुभद्र के नेतृत्व में प्राण बचाने के लिए दक्षिणापथ चले गए, शेष जैन लोग स्थलबाहु के नेतृत्व में मगध में ही रह गए।

    ➣ अकाल समाप्त होने पर जब वे मगध लौट आए तो स्थानीय जैनों से उनका मतभेद हो गया। फलत: जैन संघ दो भागों में विभाजित हुआ। दक्षिणी जैन दिगंबर कहलाए और मगध के जैन श्वेतांबर।

    ➣ जैन धर्म को उतना राजाश्रय नहीं मिला जितना बौद्ध धर्म को, और पूर्वकाल में इसका प्रसार भी उतना तेज नहीं हुआ, तथापि यह जहाँ-कहीं पहुँचा अपना अस्तित्व हुए है। इसके विपरीत बौद्ध धर्म तो मानों भारतीय उपमहादेश से लुप्त ही हो गया।

    जैन धर्म के संरक्षक

    उत्तर भारत के शासक

    • महापद्मनंद व घनानंद (नन्द वंश)
    • बिम्बिसार, अजातशत्रु व उदायिन (हर्यक वंश)
    • चन्द्रगुप्त मौर्य, बिन्दुसार व सम्प्रति (मौर्य वंश)
    • चण्डप्रद्योत (अवंति)
    • उदायिन (सिंधु-सोवीर)
    • खारवेल (कलिंग नरेश)

    दक्षिण भारत के शासक

    • मृगेशवर्मन (कदम्ब वंश)
    • अमोधवर्ष (राष्ट्रकूट वंश)
    • सोमदेव, सिद्धराज जयसिंह व कुमारपाल (चालुक्य/सोलंकी वंश)

    जैन साहित्य

    ➣ अब तक उपलब्ध जैन साहित्य प्राकृत एवं संस्कृत भाषा में मिलते हैं। (प्रारंभिक जैन साहित्य अर्द्ध-मागधी भाषा में लिखा गया। बाद में जैन धर्म ने प्राकृत भाषा को अपनाया। कालांतर में जैनियों ने शौरसेनी, संस्कृत और कन्नड़ भाषा में भी साहित्य लिखा।)

    ➣ जैन साहित्य को आगम (सिद्धांत) कहा जाता है। इसके अंतर्गत 12 अंग, 12 उपांग, 10 प्रकीर्ण, 6 छेदसूत्र, 4 मूलसूत्र, 10 प्रकीर्णसूत्र और 2 चूलिकासूत्र की गणना की जाती है।

    ➣ जैन आगम में बारह अंगों का प्रमुख स्थान है। ये हैं आयारंग-सुत्त (आचारांग-सूत्र), सूयगदंग (सूत्रकृतांग), थाणंग (स्थानांग), समवायंग (समवायांग), भगवई वियाहपन्नति (भगवती व्याख्याप्रज्ञप्ति), णयाधम्म-कहाओ (ज्ञात्रधर्मकथा), उवासगदसाओ (उपासकदशा), अंतगददसाओं (अंतकर्दशा), अणुत्तरोव- वाइयदसाओं (अनुत्तरउपपातिकदाशा), पण्हावागरनाइ (प्रश्नव्याकरण), विवागसूयम (विवाकासुत) और दिट्ठिवाय (दृष्टिवाद) |

    ➣ बारह अंगों से संबंधित एक-एक उपांग ग्रंथ हैं। इनमें ब्रह्मांड का वर्णन, प्राणियों का वर्गीकरण, खगोल विद्या, काल विभाजन, मरणोत्तर जीवन का वर्णन आदि का उल्लेख प्राप्त होता है।

    ➣ बारह उपांग हैं-उववाइय (औपपातिक), रायपसेणइज्जा (राजप्रश्नीय), जीवाजीवाभिगम, पण्णवणा (प्रज्ञापना),सूरियपण्णति (सूर्यप्रज्ञप्ति), जम्बुद्दीवापण्णति (जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति), चंदपण्णति (चन्द्रप्रज्ञप्ति), निश्यावली, कप्पावदंसिआओ (कल्पावतंसिका), पुप्पहिआओ (पुष्पिका), पुप्पहचूलिआओ (पुष्पचूलिका) और वण्हिदसाओं (वृष्णिदशा)।

    दस प्रकीर्ण प्रमुख ग्रंथों के परिशिष्ट हैं। ये हैं-चउसरण (चतःशरण), उरपच्चक्प्वाण (आतुरप्रत्याख्यान), भत्तपरिण्णा (भक्तपरिज्ञा), संथार (संस्तारक), तंदुलवेयालिय (तंदुलवैचारिक), चंदाविज्झय (चन्द्रवेध्यक), देविंदत्थय (देवेन्द्रस्तव), गणिविज्जा (गणिविद्या), महापच्चक्खाण (महाप्रत्याख्यान) और वीरत्थय (वीरस्तव)।

    ➣ छेदसूत्र’ की संख्या छः है। इसमें जैन-भिक्षुओं के लिए विधि नियमों का संकलन है। छ: छेदसूत्र हैं—आयारदसाओ (आचारदरंग), बिहाकप्प (बृहत्कल्प), ववहाद (व्यवहार),निसीह (निशीथ), महानिसीह (महानिशीथ) और जीयकत्प (जीतकल्प) |

    ➣ मूलसूत्र की संख्या चार है। इनमें जैन धर्म के उपदेश, विहार के जीवन, भिक्षुओं के कर्तव्य, यम-नियम आदि का वर्णन है।

    ➣ मूलसूत्र हैं-दसवेयालिय (दशवैकालिक), उत्तरज्झयण (उत्तराध्ययन), आवसय (आवश्यक) और पिंडानिज्जुत्ति (पिंडानिर्युक्ति)।

    दो चूलिका सूत्र हैं- नंदी-सुत्तम (नंदी सूत्र) और अणुओगद्दाराइ (अनुयोगद्धार-सूत्र), जो एक प्रकार का विश्वकोश है। इनमें भिक्षुओं के लिए आचरणीय बातें लिखी गई हैं।

    ➣ उपर्युक्त सभी ग्रंथ श्वेतांबर संप्रदाय के लिए हैं। जबकि दिगंबर संप्रदाय के अनुयायी इनकी प्रामाणिकता को स्वीकार नहीं करते।

    अन्य महत्वपूर्ण ग्रन्थ

    ➣ जैन ग्रंथ के आचारांगसूत्र में जैन भिक्षुओं के आचार-नियम व विधि-निषेधों का विवरण, भगवती सूत्र में महावीर के जीवन, न्यायधम्मकहासुत्त में महावीर की शिक्षाओं का संग्रह तथा उवासगदसूओं में हूण शासक तोरमाण तथा भद्रबाहुचरित से चंद्रगुप्त मौर्य के राज्यकाल की घटनाओं पर प्रकाश पड़ता है।

    ➣ अधिकांश जैन धर्म ग्रंथ अर्धमागधी भाषा में लिखे गये हैं। कुछ ग्रंथ अपभ्रंश में भी लिखे गये हैं। जैन मुनि हेमचन्द्र ने अपभ्रंश भाषा का पहला व्याकरण तैयार किया।

    ➣ जैन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण ग्रन्थ कल्पसूत्र संस्कृत में लिखा गया। कल्पसूत्र की रचना भद्रबाहु ने की।

    ➣ कल्पसूत्र में प्रारम्भिक जैन धर्म का इतिहास मिलता है। कल्पसूत्र तीन भागों में संकलित है, जिनमें पहले भाग में महावीर स्वामी से पूर्व के 23 तीर्थंकरों के जीवन का वर्णन है, दूसरे भाग में जैन धर्म के नियम एवं सिद्धान्त तथा तीसरे भाग में जैन गाथाओं का वर्णन है।

    ➣ भगवती सूत्र, महावीर के जीवन पर प्रकाश डालता है तथा इसमें 16 महाजनपदों का उल्लेख मिलता है। आचरांग सूत्र और भगवती सूत्र सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण अंग हैं।

    सूत्रकृतांग में विभिन्न जैन मतों का वर्णन है। सूत्रकृतांग एवं आचरांग सूत्र प्राचीनतम् जैन अंग हैं।

    शलाकापुरुष अवधारणा जैन धर्म से संबंधित है। जैनों द्वारा 63 शलाकापुरुषों का उल्लेख मिलता है, जिसमें कृष्ण को भी स्थान दिया गया।

    हेमचन्द्र सूरी ने त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरितम् की रचना की, जिसका परिशिष्ट, परिशिष्टपर्व के नाम से जाना जाता है।

    प्राकृत भाषा में रामकथा के जैन रूपान्तर पउमचरिअम का लेखक विमलसूरि था, जिनका समय प्रथम शताब्दी ई. का है।

    ➣ जैन कवि स्वयंभू (सत्यभूदेव) ने सातवीं सदी में पउमचरिअम् (पद्मचरितम्) की रचना अपभ्रंश में की। यह अपभ्रंश में रामायण का जैन रूपान्तरण है। स्वयंभू को अपभ्रंश का वाल्मीकि कहा गया है।

    ➣ महावीर स्वामी द्वारा दिये गये सिद्धान्त चौदह प्राचीन ग्रंथों में संकलित हैं। इन ग्रंथों को पूर्व कहते हैं।

    ➣ उवासगदसाओं में 10 जैन व्यापारियों की कथा का वर्णन है, जिन्होंने जैन धर्म अपनाकर मोक्ष प्राप्त किया।

    ➣ जैनों ने अपभ्रंश भाषा में पहली बार कई महत्त्वपूर्ण ग्रंथ लिखे और इसका पहला व्याकरण तैयार किया। जैन साहित्य में महाकाव्य, पुराण, आख्यायिका और नाटक हैं।

    ➣ बौद्धों की तरह जैन लोग भी आरंभ में मूर्तिपूजक नहीं थे। बाद में वे महावीर और तीर्थंकरों की भी पूजा करने लगे।

    जैन धर्म का समाज पर प्रभाव

    ➣ सर्वप्रथम जैन धर्म ने ही वर्णव्यवस्था की जटिलता और कर्मकांडो की बुराइयों को रोकने के लिये सकारात्मक प्रयास प्रारंभ किये गए।

    ➣ जैनों ने ब्राह्मणीय भाषा संस्कृत के स्थान पर आप जनमानस की भाषा प्राकृत में उपदेश दिया। जैन साहित्य अर्द्ध मागधी लिखे गए हैं।

    ➣ जैन धर्म में अहिंसा पर अत्यधिक बल देने के कारण इसके अनुयायी कृषि तथा युद्ध में संलग्न न होकर व्यापार एवं वाणिज्य को महत्व देते थे, जिससे व्यापार-वाणिज्य की उन्नति हुई।

    ➣ जनता को जैन धर्म के सीधं एवं सरल उपदेशों ने आकर्षित किया तथा उत्तर वैदिककालीन कर्मकांडीय जटिल विचारधारा के जैन धर्म के रूप में जीवन-यापन का सीधा-साधा मार्ग प्रस्तुत किया।

    जैन धर्म के पतन के कारण

    बौद्ध धर्म का विस्तार एवं ब्राह्मण धर्म का पुनरुत्थान।

    ➣ जैन धर्म के कठोर नियम थे जैसे- आत्मपीड़न, कठोर व्रत एवं तपस्या पर बल, अहिंसा पर अत्यधिक बल, जाति व्यवस्था के दर्शन को बनाए रखना।

    अनेकातिवाद, द्वैतवादी तत्वज्ञान आदि को समझना साधारण जनता के वश की बात न थी। परिणामस्वरूप जैन धर्म तपस्वियों तक ही सिमित रहा।

    ➣ प्रारंभ में जैन धर्म एक सशक्त आंदोलन था, किंतु बाद में जैन धर्म दो संप्रदायो- दिगबर और श्वेताबर में विभाजित हो गया। जैन धर्म का यह सांप्रदायिक विभाजन जैन धर्म के लिये अत्यधिक घातक सिद्ध हुआ और जैन धर्म पतन की ओर हो

    ➣ प्रारंभ में जैन साहित्य का लेखन प्राकृत भाषा में था। जो जनसाधारण की भाषा थी, किंतु बाद में जैन साहित्य संस्कृत में लिखा जाने लगा। परिणामतः जनसाधारण का जैन धर्म के प्रति दृष्टिकोण उदासीन होता चला गया।

    ➣ जैन धर्म के उत्कर्ष में तत्कालीन नरेशों का महत्वपूर्ण योगदान था किंतु बाद में जैन धर्म को राजकीय आश्रय प्राप्त न हो सका। फलतः राजाश्रय के अभाव से जैन धर्म के अनुयायियों की संख्या धीरे-धीरे घटने लगी।

    ➣ जैन मठो को बसादी कहा जाता है-

    अयोध्या यहाँ 5 तीर्थकरों का जन्म हुआ था। जिनमे प्रथम तीर्थकर ऋषभदेव का जन्म भी शामिल हैं।
    सम्मेद शिखरयहाँ पार्श्वनाथ ने अपना शरीर त्यागा था।
    पावापुरीयहाँ महावीर स्वामी ने निर्वाण प्राप्त किया था।
    कैलाश पर्वतयहाँ आदिनाथ ऋषभदेव ने निर्वाण प्राप्त किया।
    श्रवणबेलगोलायहाँ गोमतेश्वर बाहुबली की विशाल प्रतिमा है।
    माउंट आबूयहाँ सफेद संगमरमर से बने दिलवाड़ा के जैन मंदिर स्थित है।

    सल्लेखना विधि

    ➣ जैन दर्शन में सल्लेखना सत्लेखना शब्द से मिलकर बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ अच्छाई का लेखा जोखा होता है।

    ➣ जैन दर्शन में सल्लेखना शब्द उपवास द्वारा प्राणत्याग करने की विधि का वर्णन मिलता है। इस दर्शन में अहिंसा एवं काया-क्लेश पर अत्यधिक बल दिया गया है।

    ➣ ई.पू. तीसरी सदी में सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य ने श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) में सल्लेखना विधि द्वारा ही अपने शरीर का त्याग किया था। अन्य मौर्य शासक अशोक का उत्तराधिकारी सम्प्रति का भी सल्लेखना विधि से प्राण त्यागने की जानकारी मिलती है।

    ➣ आधुनिक काल में ‘सल्लेखना’ को राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी और विनोवा भावे जैसे महापुरुषों द्वारा व्यापक समर्थन मिला।

    ➣ सल्लेखना को निष्प्रतीकारमरण वयकुण्ठ (वय यानि ‘आयु कुण्ठित’ यानी क्षीण या नष्ट हो जाना) भी कहा जाता है।

    ➣ इस पर राजस्थान हाईकोर्ट ने 10 अगस्त, 2015 को रोक लगा दी थी। हाईकोर्ट ने इस प्रथा को आत्महत्या की श्रेणी में माना है। जैन धर्म के लोगों द्वारा भारी विरोध के बाद हाई कोर्ट को अपना फैसला वापस लेना पड़ा।

    ➣ सल्लेखना को प्रायः संथारा के नाम से भी जाना जाता है।

    प्रसिद्ध जैन मंदिर

    ➣ प्रारंभ में जैनों ने स्तूपों का निर्माण किया, बाद में मूर्तिकला एवं मंदिरों का विकास हुआ। कुषाण काल में मथुरा जैन कला का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। गुप्त काल में जैन कला की मथुरा शैली उन्नत अवस्था में थी। प्रमुख जैन मंदिर हैं-

    ऋषभनाथ मंदिर, जलमंदिर, दिलवाड़ा का जैन मंदिर, पारसनाथ का जैन मंदिर, मेगुती जैन मंदिर, कुमारग्राम प्राचीन मंदिर, दिगंबर जैन मंदिर-पार्श्वनाथ का मंदिर, रणकपुर जैन मंदिर, शोभनाथ मंदिर, श्री नाकोड़ा पार्श्वनाथ, जैन श्वेतांबर-त्रिलोकपुर तीर्थ आदि।

    संधारा प्रथा

    ➣ संथारा प्रथा के अंतर्गत जब किसी व्यक्ति को लगता है कि वह मृत्यु के निकट है तो वह एकांतवास ग्रहण कर लेता है और अन्न जल त्याग देता है और मोन व्रत धारण करता है। इसके बाद वह किसी भी दिन देह त्याग देता है।

    ➣ उल्लेखनीय है कि राजस्थान हाईकोर्ट ने 10 अगस्त 2015 में संधारा प्रथा पर रोक लगा दी थी। हाईकोर्ट इस प्रथा को आत्महत्या की श्रेणी में रखते हुए भारतीय दंड संहिता 306 तथा 309 के तहत दंडनीय बताया था।

    ➣ परंतु सुप्रीम कोर्ट ने जैन समुदाय से जुड़े संगठनों की याचिकाओं पर ‘संथारा’ को गैर-कानूनी घोषित करने वाले राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी।

    गोमटेश्वर की मूर्ति

    ➣कर्नाटक के हासन जिला के श्रवणबेलगोला में बिना किसी सहारे खड़ी पत्थर से निर्मित विश्व की ऊँची प्रतिमा स्थापित है।

    ➣गोमटेश्वर या बाहुबलि जैन धर्म के प्रथम उपदेशक ऋषभदेव के पुत्र थे।

    ➣गोमटेश्वर की विशालकाय प्रतिमा 17.5 मीटर ऊँची है यह एक बड़ी चट्टान को काटकर बनायी गई है।

    ➣यह मूर्ति विजयनगर के शासकों भैरासा सामंतों द्वारा 1432 ई. में स्थापित की गई थी।

    प्रत्येक 12 वर्ष बाद इस मूर्ति को विधि-विधान से दूध-दही व घी से स्नान कराया जाता है। इस प्रक्रिया को महामस्तकाभिषेक कहते हैं।

    जैन धर्म के 24 तीर्थंकर व प्रतीक चिह्न

    . . तीर्थंकरजन्म स्थल प्रतीक चिह्नवृक्ष निर्वाण-स्थल
    1. ऋषभदेव (आदिनाथ)विनित्तानाग; पुरिमतल बैलवात (बरगद) अष्टपद (कैलश)
    2. अजितनाथअयोध्या; सम्मेत शिखर हाथीशाल (शोरि रोबस्टा) सम्मेद शिखर
    3. सम्भवनाथश्रावस्ती (सावथी) घोड़ाप्रयाल सम्मेद शिखर
    4. अभिनंदननाथअयोध्या; सम्मेत शिखर बंदरप्रियांगु सम्मेद शिखर
    5. सुमतिनाथअयोध्या; सम्मेत शिखर चकवाजेवियर सेला सम्मेद शिखर
    6. पद्मप्रभुकौशाम्बी, सम्मेत शिखर लाल कमलछत्र सम्मेद शिखर
    7. सुपार्श्वनाथवाराणसी; सम्मेत शिखर स्वस्तिकबबूल सम्मेद शिखर
    8. चंद्रप्रभुचन्द्रपुर; सम्मेत शिखर चंद्रमानाग सम्मेद शिखर
    9. सुविधिनाथ (पुष्पदंत )कनान्दिनाग; सम्मेत शिखर मगरसलि सम्मेद शिखर
    10. शीतलनाथभद्रपुरा (आदिलपुरा) कल्पवृक्षप्रियांगु सम्मेद शिखर
    11. श्रेयांसनाथसिंहापुरी गैंडातन्दुक सम्मेद शिखर
    12. वासुमूल चम्पापुरी, सम्मेत शिखर भैंसापटल चम्पापुरी
    13. विमलनाथकांपिल्यपुरा, सम्मेत शिखर शूकरजम्बू सम्मेद शिखर
    14. अनन्तनाथअयोध्या; सम्मेत शिखर सेहीअशोक सम्मेद शिखर
    15. धर्मनाथरत्नापुरी, सम्मेत शिखर वज्रदण्डदधिपर्ण सम्मेद शिखर
    16. शांतिनाथगजपुरा, सम्मेत शिखर हिरण (मृग)नंदी. सम्मेद शिखर
    17. कुन्थुनाथगजपुरा, सम्मेत शिखर बकराभिलक सम्मेद शिखर
    18. अरनाथ (अरहनाथ जी)गजपुरा, सम्मेत शिखर मच्छ (मीन)उदेग ननाई सम्मेद शिखर
    19. मल्लिनाथसम्मेद शिखर कलशअशोक सम्मेद शिखर
    20. मुनिसुब्रतनाथ राजगृह; सम्मेत शिखर कछुआचंपक सम्मेद शिखर
    21. नमिनाथसम्मेद शिखर नील कमलबाकुला सम्मेद शिखर
    22. अरिश्टनेमि (नेमिनाथ)सौरिपुर व उज्जैन शंखजीबेटासा गिरनार पर्वत
    23. पार्श्वनाथवाराणसी सर्पधताकी सम्मेद शिखर
    24. महावीरकुण्डग्राम सिंहसागौन पावापुरी
  • महत्वपूर्ण तथ्य, बौद्ध संगीति और परीक्षा उपयोगी नोट्स

    📚 विषय सूची

    बौर्द्ध धर्म से सम्बंधित स्थल

    ➣ बुद्ध के जीवन से जुड़े हुए आठ स्थानों को बौद्ध ग्रन्थों में अष्टमहास्थान कहा गया है। ये हैं –

    1. लुम्बिनी
    2. बोधगया
    3. सारनाथ
    4. कुशीनगर
    5. श्रावस्ती
    6. संकास्य
    7. राजगृह
    8. वैशाली
    gautam-bauddh

    लुम्बिनी

    ➣ यह स्थल गोरखपुर जिले के नौगढ़ रेलवे स्टेशन से 35 किमी. दूरी पर स्थित है।

    महारानी महामाया ने शाल वृक्षों के नीचे राजकुमार सिद्धार्थ (गौतम) को जन्म दिया था।

    ➣ अशोक का रूम्मिनदेई अभिलेख यहाँ से प्राप्त हुआ इसमें भी लुम्बिनी नाम का उल्लेख मिलता है।

    कपिलवस्तु

    उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थ नगर जिले में स्थित पिपरहवा नामक स्थल से कपिलवस्तु की पहचान की गई।

    ➣ कपिल का शाब्दिक अर्थ कपिल का स्थल है। कपिलवस्तु शाक्य गणराज्य की राजधानी थी, जहाँ के शासक गौतम के पिता शुद्धोधन थे। यह नगर कपिलमुनि कुटी के स्थल पर बसा हुआ था। राप्ती की सहायक रोहणी नदी के तट पर अवस्थित था।

    धर्मचक्र परिवर्तन के उपरान्त गौतम बुद्ध ने यहाँ की यात्रा की थी तथा अपने, पिता, माता, पुत्र व भाई देवदत्त को बौद्ध धर्म में दीक्षित किया था।

    श्रावस्ती

    ➣ यह कोसल महाजनपद की राजधानी थी। यह उत्तर प्रदेश में गोरखपुर से 195 किमी. दूरी पर अवस्थित है। वर्तमान में यह गोंडा जिले के सहेत-महेत गाँव के नाम से जाना जाता है।

    ➣ बुद्ध व उनके अनुयायी वर्षाकाल में श्रावस्ती में ही व्यतीत करते थे। उन्होंने अपने जीवन के 25 वर्षाकाल यहीं पर व्यतीत किये थे। प्रसिद्ध जेतवन विहार श्रावस्ती में ही था, जो समस्त बौद्ध धर्म के अनुयायियों को आकर्षित करता था।

    ➣ भगवान बुद्ध ने यहाँ पर त्रिपिटकों की व्याख्या की और अपने 6 विरोधियों को बौद्ध धर्म की दीक्षा भी दी थी।

    ➣ जैन धर्म के तीसरे तीर्थंकर स्वयंभूनाथ का जन्म श्रावस्ती में ही हुआ था।

    सारनाथ

    काशी महाजनपद का प्रमुख बौद्ध स्थल है जिसका अर्थ आध्यात्मिक प्रकाश की नगरी है।

    ➣ यह वाराणसी से 10 किमी. की दूरी पर अवस्थित है।

    ➣ गौतम बुद्ध ने अपना प्रथम धर्मोपदेश 5 ब्राह्मण शिष्यों को दिया था जो धर्मचक्र प्रवर्तन के नाम से जाना जाता है।

    ➣ मौर्य शासक अशोक ने यहाँ पर प्रस्तर स्तम्भ का निर्माण कराया। स्तम्भ के शीर्ष पर स्थापित चतुर्मुखी सिंह था।

    15 अगस्त, 1947 को देश के स्वतन्त्र होने पर स्तम्भशीर्ष को राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में चुना गया।

    बोधगया

    ➣ मगध साम्राज्य के अन्तर्गत वर्तमान बिहार में फाल्गु नदी के तट पर स्थित एक बौद्ध स्थल है।

    ➣ गौतम बुद्ध ने (शाक्यमुनि) बोधिवृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त (निर्वाण) किया था।

    ➣ यहाँ का महाबोधि मन्दिर भगवान बुद्ध की विभिन्न अवस्थाओं में ज्ञान प्राप्ति की प्रतिमाएँ प्राप्त होती हैं।

    ➣ मौर्य शासक अशोक ने यहाँ पर बौद्धस्तूप का निर्माण करवाया है।

    कुशीनगर

    ➣ इसकी पहचान आधुनिक कसिया/कसया के नाम से की गई है जो वर्तमान उत्तर प्रदेश के देवरिया जिला में है।

    ➣ यह गौतम बौद्ध के जीवन का स्थल है यहाँ बुद्ध ने महापरिनिर्वाण प्राप्त किया था।

    बोधिवृक्ष : गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्ति का वृक्ष

    ➣ बोधिवृक्ष, पीपल का वह वृक्ष था जिसके नीच बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ। यह वृक्ष बोधगया में स्थित था। वर्तमान बोधिवृक्ष अपनी पीढ़ी का चौथा वृक्ष है तथा लगभग 136 साल पुराना है।

    ➣ मौर्य काल में सम्राट अशोक ने अपने शासन काल में इसकी टहनियों को अपने पुत्र महेन्द्र व पुत्री संघमित्रा को देकर श्रीलंका में बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार करने के लिए भेजा था।

    ➣ ऐसा कहा जाता है कि सम्राट अशोक की अनुपस्थिति में एक वैश्य रानी तिष्यरक्षिता ने चोरी-छुपे वृक्ष समय कटवा दिया था।

    ➣ लेकिन कुछ ही वर्षो के बाद उस कटे हुऐ बोधिवृक्ष की जड़ से एक नया वृक्ष उग आया। यह दूसरी पीढ़ी का वृक्ष था और यह लगभग 800 सालों तक मौजूद रहा।

    ➣ इस दूसरे वृक्ष को बंगाल के गौड़ वंश के नरेश शशांक जोकि शैव सम्प्रदाय का अनुयायी था और कट्टर बौद्ध विरोधी था, ने जड़ सहित उखड़वाने का प्रयास किया लेकिन जब वह इसमें असफल रहा तो उसने बोधिवृक्ष को कटवाकर उसकी जड़ों में आग लगवाकर नष्ट कर दिया।

    ➣ लेकिन इसकी जड़े पूर्ण रूप से नष्ट नहीं हो पायी और कालांतर में कुछ ही सालों के बाद उन्हीं जड़ों से तीसरी पीढ़ी का बोधिवृक्ष निकला। और यह लगभग 1250 सालों तक जीवित रहा।

    ➣ सन् 1876 में यह वृक्ष एक प्राकृतिक आपदा का शिकार होकर नष्ट हो गया। तब लार्ड कानिंघम ने सन् 1880 में श्रीलंका के अनुराधापुरम से बोधिवृक्ष की शाखा को मांगवाकर इसे बोधगया में पुनः स्थापित कराया जो इस पीढ़ी का चौथा बोधिवृक्ष हुआ।

    ➣ उल्लेखनीय है कि सम्राट अशोक ने अपने पुत्र महेन्द्र व पुत्री संघमित्रा को बोधिवृक्ष की जिन टहनियों को देकर श्रीलंका में बौद्ध धम्म का प्रचार करने भेजा था। वह आज भी श्रीलंका के अनुराधापुरम में स्थित है तथा विश्व के लिखित इतिहास की दृष्टि से यह अब तक का ज्ञात सबसे प्राचीन वृक्ष (लगभग 2250 वर्ष पुराना) है।

    बौद्ध धर्म के प्रमुख आचार्य या विद्वान

    अश्वघोष

    ➣ ये कनिष्क के समकालीन एक प्रतिभा सम्पन्न कवि, नाटककार, संगीतकार, विद्वान एवं तर्कशास्त्री थे।

    ➣ संस्कृत में बौद्ध महाकाव्यों की रचना का सूत्रपात सर्वप्रथम महाकवि अश्वघोष ने ही किया था।

    ➣ उन्होंने भगवान बुद्ध के जीवन चरित्र का वर्णन करने वाले प्रथम ग्रंथ बुद्धचरित नामक महाकाव्य की रचना की थी।

    नागार्जुन

    ➣ ये आन्ध्र के सातवाहन राजा यज्ञ श्री गौतमी पुत्र (166-196 ई.) के मित्र एवं समकालीन थे।

    ➣ इन्होंने बौद्ध दर्शन के माध्यमिक विचार धारा का प्रतिपादन किया जिसे सामान्यतया: शून्यवाद के नाम से जाना जाता है।

    ➣ इन्होने पारा की खोज की थी। इन्हे भारत का आइन्सटीन भी कहा जाता है।

    असंग व वसुबंधु

    ➣ ये दोनों भाई थे और प्रथम शताब्दी ई. के पंजाब के प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु थे। असंग अपने गुरू मैत्रेयनाथ द्वारा स्थापित योगाचार या विज्ञानवाद सम्प्रदाय के महत्वपूर्ण आचार्य थे।

    ➣ वसुबन्धु ने वैभाषिक सिद्धांतों का सम्यक प्रतिपादन करने के लिए अभिधर्मकोश नामक ग्रन्थ की रचना की थी, इस ग्रन्थ को बौद्ध धर्म का विश्वकोश माना जाता है।

    नागसेन

    ➣ नागसेन एक प्रसिद्ध तथा प्रमुख बौद्ध भिक्षुक था, जिसने यवन सम्राट मिलिन्द (मिनांडर) से वाद-विवाद किया था। इस वाद-विवाद के फलस्वरूप ही मिलिन्द नागसेन से प्रभावित हुआ और उसने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था।

    नागसेन और मिलिन्द के मध्य हुए वाद-विवाद का उल्लेख मिलिन्द प्रश्न (मिलिन्दपन्ह) नामक काव्य में मिलता है।

    ➣ उल्लेखनीय है मिनांडर पहला यवन शासक था जिसने बौद्ध धर्म स्वीकार किया था।

    बुद्धघोष

    ➣ 5वीं शताब्दी ई. के पाली भाषा के महान विद्वान थे। आचार्य बुद्धघोष का जीवन चरित्र गंधवंश, बुद्धघोसुपत्ति सद्धम्मसंग्रह आदि में मिलता है।

    ➣ इनकी लिखित पुस्तक विशुद्धिमार्ग (विसुद्धिमग्ग) हीनयान सम्प्रदाय का प्रमुख ग्रंथ है। इस ग्रन्थ को बौद्ध धर्म का लघु विश्वकोश माना जाता है।

    ➣ उन्होंने त्रिपिटक की अट्ठकथा लिखना भी आरंभ किया। बुद्धघोष ने पालि में सर्वप्रथम अट्ठकथाओं की रचना की।

    ➣ बौद्ध धर्म में बुद्धघोष को भावी बुद्ध मैत्रेय का अवतार माना गया है।

    दिग्डनाग

    ➣ 5वीं शताब्दी के यह बौद्ध धर्म के तर्क शास्त्र के प्रवर्तक के रूप में सुविख्यात हैं। उन्होंने तर्कशास्त्र पर लगभग 100 ग्रंथ लिखे उन्हें प्रायः मध्यकालीन न्याय के जनक के रूप में निर्दिष्ट किया जाता है।

    ➣ धर्मकीर्ति द्वारा प्रणीत प्रमाणवार्तिक, प्रमाणविनिश्चय, न्यायबिन्दु, हेतुबिन्दु, सम्बन्धपरीक्षा, सन्तानन्तरसिद्धि और वादन्याय सातों प्रसिद्ध ग्रन्थ प्रमाणसमुच्चय की टीका के रूप में उपनिबद्ध हैं।

    ➣ दिङ्नाग के बाद आचार्य धर्मकीर्ति ने दिङ्नाग के ग्रन्थों में छिपे हुए गूढ़ तथ्यों का प्रकाशन करते हुए सात ग्रन्थों (सप्त प्रमाणशास्त्र) की रचना की।

    धर्मकीर्ति

    ➣ धर्मकीर्ति धर्मपाल और ईश्वरसेन के शिष्य थे। ये महायान संप्रदाय के योगाचार शाखा के दार्शनिक थे। इनको भारत का काण्ट कहा जाता है।

    ➣ वे 17वीं शताब्दी के महान बौद्ध न्यायिक रहे, उन्हें सूक्ष्म दार्शनिक, चिंतक तथा भाषा वैज्ञानिक थे उनकी रचनाएं परवर्ती बौद्ध धर्म के ज्ञान मीमांसात्मक चिंतन में शीर्षस्थ मानी जाती है।

    ➣ आचार्य धर्मकीर्ति के प्रमाणशास्त्र विषयक सात ग्रन्थ प्रसिद्ध हैं। ये हैं – प्रमाणवार्तिक, प्रमाणविनिश्चय,न्यायबिन्दु, हेतुबिन्दु, वादन्याय, सम्बन्धपरीक्षा,सन्तानान्तरसिद्धि।

    कश्यप मतंग

    ➣ इनका जन्म मगध में हुआ था। ये चीन जाने वाले प्रथम बौद्ध भिक्षु थे।

    कश्यप मतंग ने ही सर्वप्रथम चीन को बौद्ध धर्म से परिचय करवाया था।

    मोगलिपुत तिस्स

    ➣ ये मौर्य सम्राट अशोक के समकालीन बौद्ध भिक्षु थे। इन्होने तृतीय बौद्ध महासंगीति की अध्यक्षता किया था।

    वसुमित्र

    ➣ ये कनिष्क के दरबारी विद्वान थे। इन्होने कनिष्क के द्वारा कश्मीर के कुण्डलवन में आयोजित चतुर्थ बौद्ध संगीति की अध्यक्षता की थी।

    ➣ इन्होने संस्कृत भाषा में महाविभाष शास्त्र (त्रिपिटक पर टीका) की रचना की जिसे बौद्ध धर्म का महाकोश/विश्वकोश माना जाता है।

    भारत के महत्वपूर्ण बौद्ध मठ

    ➣ यद्दपि बौद्ध धर्म जन्म भारत में हुआ किन्तु भारत में इसका उतना प्रभाव नहीं दिखता जितना की अन्य देशों में। किन्तु भारत में बौद्ध स्थापत्य का परवर्ती स्वरूप मठो के रूप में दिखाई पड़ता है। भारत के विभिन्न भागो में बौद्ध मठ स्थापित किए गए है। देश में सबसे ज्यादा मठ सिक्किम में है।

    मठस्थानराज्य
    टाबो मठतबो गाँव (स्पीति घाटी, हिमाचल प्रदेश)स्पीति नदी के तट पर स्थित इस मठ को 996 ई. में स्थापित किया गया था। इस मठ की दीवारो पर 10 वी सदी के भित्ति चित्र बने है, जिस कारण इसे हिमाचल की अजन्ता कहा जाता है।
    नामग्याल मठधर्मशाला, हिमाचल प्रदेशयह मठ तिब्बती बौद्धो के सर्वोच्च धर्मगुरू दलाई लामा का आधिकारिक निवास है।
    हेमिस मठलद्दाख, जम्मू कश्मीरद्रुकपा समुदाय का यह मठ 1630 ई. में निर्मित हुआ था। यहां पर प्रतिवर्ष जून में हेमिस महोत्सव (पद्मसम्भव का जन्म महोत्सव) मनाया जाता है जिसमें लामा छामनृत्य करते है।
    थिकसे मठलद्दाख, जम्मू कश्मीरलेह में स्थित इस 12 मंजिले मठ मे प्रतिवर्ष थिकसे महोत्सव का आयोजन किया जाता है।
    रूमटेक मठगंगटोक, सिक्कमराज्य का सबसे बड़ा मठ है। इसे धर्म चक्र केन्द्र भी कहते है।
    तवांग मठअरुणाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेशअरूणाचल प्रदेश के तबांग जिले में बोमडीला दर्रे के समीप यह मठ भारत का सबसे बड़ा तथा एशिया का दूसरा सबसे बड़ा मठ है।
    बोधिमंडा मठबोधगया, बिहारबुद्ध का ज्ञान प्राप्ति स्थल, महाबोधि मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है।
    माथे मठलेह, जम्मू-कश्मीरसिन्धु नदी के तट पर स्थित यह मठ थंगका चित्रकारी तथा माथो नागरंग महोत्सव के लिए प्रसिद्ध है।
    घूम मठदार्जिलिंग, पश्चिम बंगालगेलुकपा या पीला हैट संप्रदाय से संबंधित है। यह मैत्रेय बुद्ध की उच्च प्रतिमा (15 मीटर) के लिए प्रसिद्द है।

    बौद्ध संघ : बौद्ध भिक्षुओं का संगठन

    ➣ बौद्ध संघ का संगठन गणतांत्रिक प्रणाली पर आधारित था। संघ में प्रवेश पाने के लिए गृहस्थ जीवन का त्याग व कम से कम 15 वर्ष की आयु का होना आवश्यक था।

    माता-पिता की आज्ञा के बिना कोई भी व्यक्ति इसमें प्रवेश नहीं पा सकता था। चोर, हत्यारों,अस्वस्थ, शारीरिक विकलांग, ऋणी, सैनिक और दासों का संघ में प्रवेश वर्जित था।

    ➣ वैशाली में भिक्षुणी संघ की स्थापना की गई तथा बुद्ध ने पहली बार प्रिय शिष्य आनंद के कहने पर महिलाओं को संघ में शामिल होने की अनुमति वैशाली में दी।

    ➣ परन्तु साथ ही यह भी कहा कि महिलाओं के प्रवेश से बौद्ध धर्म एवं संघ का 500 वर्षों में ही पतन हो जायेगा।

    ➣ भिक्षुओं के वस्त्र चीवर एवं भिक्षुणियों के वस्त्र उद्दूकसाटि कहलाते थे। बुद्ध राजा बिम्बसार के राजवैद्य जीवक के अनुरोध पर ये वस्त्र लागू किये थे। जीवक को बौद्ध संघ का आभूषण कहा जाता है।

    ➣ संघ की सभा में प्रस्ताव को नत्ति या वृत्ति कहा जाता था, जबकि प्रस्ताव पाठ को अनुसावन कहते थें। बहुमत से पारित प्रस्ताव भूकस्किम कहा जाता था। किसी भी प्रस्ताव पर मतभेद को अधिकरण कहा जाता था।

    ➣ मतभेद पर मत विभाजन (मतदान) होता था। मतदान गुल्हक (गुप्त) तथा विवतक (प्रत्यक्ष) दोनों से होता था।

    ➣ सभा में बैठने की व्यवस्था करने वाला अधिकारी आसन प्रज्ञापक कहलाता था। इसकी बैठक के लिए न्यूनतम उपस्थिति (कोरम) 20 थी।

    ➣ प्रत्येक 15वें दिन पूर्णिमा या अमावस्या को सांयम उपोसथ नामक सभा होती थी, जिसमें पातिमोक्ख का पाठ किया जाता था। (पातिमोक्ख विनयपिटक की मठ संबंधी सूची है, जिसमें 226 प्रकार के अपराधों और उनके प्रायश्चित करने की सूची दी गई है।)

    ➣ इस सभा में प्रत्येक सदस्य इसके माध्यम से स्वयं नियमों के उल्लंघन को स्वीकार करता था। गंभीर अपराध पर वयस्कों एवं वृद्धों की समिति विचार करती थी और सदस्यों को प्रायश्चित करने या संघ से निकालने की आज्ञा देती थी।

    ➣ वर्षा ऋतु के दौरान मठों में प्रवास के समय भिक्षुओं द्वारा अपराध स्वीकारोक्ति समारोह पवरन कहलाता था।

    ➣ बौद्धों के लिये महीने के चार दिन-अमावस्या, पूर्णिमा और दो चतुर्थी दिवस उपवास के दिन होते थे।

    ➣ जब किसी विशेष अवसर पर सभी भिक्षु-भिक्षुणियां धर्मवार्ता के लिए एकत्रित होकर धर्मवार्ता करते थे तो उसे उपोसथ कहते थे।

    ➣ संघ में प्रविष्ट होने को उपसम्पदा कहा जाता था। गृहस्थ जीवन का त्याग प्रवज्या कहलाता था। प्रवज्या ग्रहण करने वाले को श्रामणेर कहते थे।

    श्रामणेर किसी आचार्य से शिक्षा प्राप्त कर लेने के बाद उपसम्पदा या भिक्षुपद का अधिकारी बन जाता था। इसके लिए उसे 20 वर्ष की आयु का होना आवश्यक था।

    ➣ श्रामणेरों को 10 शिक्षाओं का पालन करना पड़ता था, जिसे शिक्षापद कहा जाता था।

    ➣ बौद्ध धर्म के अनुयायी दो वर्गों (1. भिक्षु/भिक्षुणी, 2. उपासक उपासिकाएं) में बंटे हुए थे। गृहस्थ जीवन में रहकर ही बौद्ध धर्म को मानने वाले लोगों को उपासक कहा जाता था।

    ➣ बौद्ध संघ का प्रमुख विनयधर कहलाता था। बुद्ध समय-समय पर जो उपदेश देते थे, उसे उनके निरन्तर साथ रहने वाले शिष्य श्रवण करते थे और स्मरण करने का प्रयत्न करते थे। यही लोग कालान्तर में विनयधर कहलाने लगे थे।

    ➣ बौद्ध संघ का सबसे बड़ा दण्ड ब्रह्मदण्ड था। बुद्ध ने अपने सारथी छन्दक को ब्रह्मदण्ड दिया था।

    ➣ बुद्ध के चचेरे भाई देवदत्त ने बुद्ध को मारने का असफल प्रयास किया था। उसने बुद्ध को हटाकर बौद्ध संघ का प्रधान बनने की चेष्टा की थी।

    ➣ बुद्ध ने अपनी मृत्यु के समय संघ का प्रमुख किसी को भी नामित नहीं किया था।

    ➣ बौद्ध दैनिक प्रार्थनाओं में बुद्धशरणं गच्छामि। धम्मं शरणं गच्छामि का उच्चारण करते हैं।

    स्तूप : बौद्ध स्थापत्य कला और महत्व

    ➣ स्तूप के निर्माण की प्रथा बुद्ध काल के पूर्व की है। स्तूप का शाब्दिक अर्थ किसी वस्तु का ढेर होता है। चूंकि यह चिता के स्थान पर बनाया जाता था, अत: इसका एक नाम चैत्य भी हो गया।

    ➣ चैत्यगृहों के समीप ही भिक्षुओं के रहने के लिए आवास बनाए गए, जिन्हें विहार कहा गया।

    ➣ मौलिक रूप में स्तूप का सम्बन्ध मृतक संस्कार से था। शव-दाह के बाद बची हुई अस्थियों को किसी पात्र में रखकर मिट्टी से ढक देने की प्रथा से स्तूप का जन्म हुआ।

    ➣ महात्मा बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनकी अस्थियों को 8 भागों में बाँटा गया तथा उन पर समाधियों का निर्माण किया गया। सामान्यतः इन्हीं को स्तूप कहा जाता है।

    ➣ स्तूप का उल्लेख सर्वप्रथम ऋग्वेद में प्राप्त होता है जहाँ अग्नि की उठती हुई ज्वालाओं को स्तूप कहा गया है बुद्ध के पहले ही स्तूप का सम्बन्ध महापुरुष के साथ जुड़ गया था।

    ➣ इसके अतिरिक्त अथर्ववेद, वाजसनेयी संहिता, तैत्तिरीय ब्राह्मण संहिता, पंचविश ब्राह्मण आदि ग्रंथों से स्तूप के संबंध में जानकारी मिलती है।

    ➣ कालान्तर में बौद्धों ने इसे अपनी संघ-पद्धति में अपना लिया। इन स्तूपों में बुद्ध अथवा उनके प्रमुख शिष्यों धातु रखी जाती थी जो बौद्धों की श्रद्धा व उपासना के प्रमुख केन्द्र बन गये।

    ➣ स्तूप के 4 भेद हैं-1. शारीरिक स्तूप, 2. पारिभौगिक स्तूप, 3. उद्देशिका स्तूप तथा 4. पूजार्थक स्तूप।

    ➣ इनमें बुद्ध तथा उनके प्रमुख शिष्यों की अस्थियों तथा उनके शरीर के विविध अंग (दंत, नख, केश ) रखे जाते थे।

    पारिभौगिक

    ➣ इनमें बुद्ध द्वारा उपयोग में लाई गयी वस्तुयें (भिक्षा पात्र, चरण-पादुका, आसन) रखी जाती थी।

    उद्देशिका

    ➣ इनमें वे स्तूप आते थे जिन्हें महात्मा बुद्ध के जीवन की घटनाओं से संबंधित अथवा उनकी यात्रा से पवित्र हुए स्थानों पर घटनाओं से संबंधित अथवा उनकी यात्रा से पवित्र हुए स्थानों पर स्मृति रूप में निर्मित किया जाता था।

    ➣ ऐसे स्थल बोधगया, लुम्बिनी, सारनाथ, कुशीनगर में है।

    संकल्पित

    ➣ ये छोटे आकार के होते थे और इन्हें बौद्ध तीर्थ स्थलों पर श्रद्धालुओं द्वारा स्थापित किया जाता था। बौद्ध धर्म में इसे पुण्य का काम बताया गया है।

    स्तूप के महत्त्वपूर्ण हिस्से

    वेदिका (रेलिंग) – इसका निर्माण स्तूप की सुरक्षा के लिये होता था।

    मेधि (कुर्सी)- वह चबूतरा था, जिसपर स्तूप का मुख्य हिस्सा आधारित होता था।

    अंड- स्तूप का अर्द्धगोलाकार हिस्सा होता था।

    हमिंका- स्तूप के शिखर पर अस्थि की रक्षा के लिये।

    छत्र- धार्मिक चिह्न का प्रतीक।

    सोपान- मेधि पर चढ़ने-उतरने हेतु सीढ़ी।

    चैत्य- चैत्य का शाब्दिक अर्थ होता है-चिता संबंधी। एक चैत्य, बौद्ध मंदिर है जिसमें एक स्तूप समाहित होता है। पूजार्थक स्तूप को चैत्य कहा जाता है।

    विहार : बौद्ध मठ और शिक्षा केंद्र

    ➣ बौद्ध चैत्यों के पास भिक्षुओं के रहने के लिये आवास बनाया जाता था, जिसे विहार कहा जाता था। चैत्यों के उपासना स्थल में परिवर्तित हो जाने के कारण उसके समीप ही विहार का निर्माण होने लगा।

    प्रमुख विहार

    ➣ बिम्बिसार ने राजगृह में वेलुवन नामक विहार बनवाया। वेलुवन बौद्ध संघ को प्राप्त प्रथम विहार था ।

    अनाथपिण्डक ने श्रावस्ती में बुद्ध के लिए जेतवन विहार बनवाया। अनाथपिण्डक ने 18 करोड़ स्वर्ण मुद्राओं में जेतवन विहार को जेत राजकुमार से खरीदा था। इस दान का अंकन भरहुत स्तूप पर है।

    ➣ कोशल नरेश प्रसेनजीत ने भी बौद्ध संघ के लिए श्रावस्ती में पुब्बाराम (पूर्वाराम) नाम विहार बनवाया। इसके लिए अंग में श्रेष्ठि की पुत्री विशाखा ने धन दिया था।

    ➣ प्राचीन रत्नगिरि महाविहार राजगृह के पास स्थित था, जो गृद्धकूट के नाम से प्रसिद्ध था। रत्नगिरि विहार बुद्ध का प्रिय निवास स्थान था।

    ➣ बुद्ध के पांचवें वर्षाकाल में लिच्छवियों ने उनके निवास के लिए महावन में प्रसिद्ध कुटाग्रशाला का निर्माण करवाया।

    ➣ वैशाली की प्रसिद्ध नगर-वधू आम्रपाली ने भिक्षु-संघ के निवास के लिए अपनी आम्रवाटिका प्रदान की थी।

    त्रिपिटक : बौद्ध धर्म के प्रमुख ग्रंथ

    ➣ महात्मा बुद्ध के महापरिनिर्वाण के उपरांत आयोजित विभिन्न बौद्ध या संकलित किये गए त्रिपिटक सुभवत: सर्वाधिक प्राचीन धर्म त्रिषिटक सुत्तपिटक, विनयपिटक एवं अभिधम्मपिटक के नाम में जान जाते है।

    ➣ त्रिपिटकों पर महाभाष्य के रूप में अट्ठकथा नामक पुस्तक लिखी गयी।

    ➣ सुत’ का शाब्दिक अर्थ है-धर्मोपदेश

    ➣ सुत्तपिटक में बौद्ध धर्म के सिद्धांतों का उल्लेख है। इसे प्रारम्भिक बौद्ध धर्म का एनसाइक्लोपीडिया कहा जाता है।

    ➣ यह पिटक पाँच निकायों में विभाजित है-

    ❑ 1. दीर्घ निकायः इसमें महात्मा बुद्ध के जीवन के आखिरी समय, अंतिम उपदेशों, मृत्यु तथा अंत्येष्टि का वर्णन किया गया है।

    ❑ 2. मज्झिम निकायः इसमें महात्मा बुद्ध को कहीं साधारण मनुष्य कहीं अलौकिक शक्ति वाले देव के रूप में वर्णित किया गया है।

    ❑ 3. संयुक्त निकायः गद्य एवं पद्य दोनों शैलियों के प्रयोग वाला यह निकाय अनेक संयुक्तों का संकलन मात्र है। इसमें मन्झिम प्रतिपदा एवं आष्टांगिक मार्ग का उल्लेख मिलता है।

    ❑ 4. अंगुत्तर निकाय: इसमें महात्मा बुद्ध द्वारा भिक्षुओं को उपदेश में कही जाने वाली बातों का वर्णन है। इसमें छठी शताब्दी ई.पू. के सोलह महाजनपदों का उल्लेख मिलता है।

    ❑ 5. खुद्दक निकाय: भाषा व विषय-शैली की दृष्टि से सभी निकायों से अलग, लघु ग्रंथों के संकलन वाला यह निकाय अपने आप में स्वतंत्र एवं पूर्ण है।

    ➣ सुत्तपिटक की रचना आनंद ने की थी।

    विनयपिटक : बौद्ध संघ के नियम और अनुशासन

    ➣ इसमें बौद्ध मठों में रहने वाले भिक्षु-भिक्षुणियों के अनुशासन संबंधी नियम दिये गए हैं।

    ➣ बौद्ध संघ की कार्यप्रणाली की व्यवस्था भी इसी ग्रंथ में उल्लिखित है। यह सुत्तविभंग, खदक तथा परिवार में विभक्त है।

    ➣ इसकी रचना उपालि ने की थी।

    अभिधम्मपिटक : बौद्ध दर्शन और सिद्धांत

    ➣ इसम महात्मा बुद्ध के उपदेशा एवं सिद्धांत तथा बोद्ध मत की दार्शनिक व्याख्या की गई है।

    ➣ एक मान्यता के अनुसार इस पिटक का संकलन अशोक के समय में संपन्न तृतीय बौद्ध संगीति में मांगलिपुत्ततिस्स ने किया।

    बोधिसत्व : महायान बौद्ध धर्म में महत्व

    ➣ महायान का आदर्श बोधिसत्व है। बोधिसत्व करुणामय माने गए हैं, जो समस्त प्राणियों को प्रबोध के मार्ग पर चलने में सहायता करने के लिये स्वयं की निर्वाण प्राप्ति विलंबित करते हैं। ये मानव अथवा पशु किसी रूप में भी हो सकते हैं।

    ➣ महायान का आदर्श बोधिसत्व अवलोकितेश्वर था जिसे पद्मपाणि, अमिताभ, मंजूनाथ, मैत्रेय (भावी) आदि नामों से भी जाना जाता है।

    हीनयान एंव महायान संप्रदाय

    हीनयानमहायान
    इसे श्रावकयान प्रत्येक बुद्धयान कहा जाता है।इसे बुद्धयान बोधिसत्वयान एकयान एव श्रेष्ठयान से सम्बोधित किया जाता है।
    हीनयान का शाब्दिक अर्थ हीनयान है।इसका शाब्दिक अर्थ उत्कृष्ठ मार्ग है।
    यह व्यक्तिवादी धर्म है अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति को अपने प्रयत्नो से मोक्ष प्राप्त करनी चाहिए।यह समस्तीवादी धर्म है जिसका उद्देश्य समस्त मानव जाति का कल्याण करना है।
    हीनयानी महात्मा बुद्ध के अप्प दीपों भव को अपना मूलमंत्र मानते है। ये महात्मा बुद्ध को महापुरूष मानता है देवता नही।महायान में बुद्ध को देवता का दर्जा प्राप्त है। महायान में आत्मा एंव पुनर्जन्म को स्वीकार किया गया है जबकि महात्मा बुद्ध अनात्मवादी थे।
    हीनयान त्रिकाय की संकल्पना में विश्वास नही रखते थे।महायान त्रिकाय धर्मकाय निर्माणकाय एंव संभोगकाय की संकल्पना के समर्थक थे।
    हीनयान में वृद्ध की मूर्तिपूजा नही अपितु बोधिवृक्ष धर्मचक्र स्तूप प्रतीको की पूजा विधान था।महायानी मूर्तिपूजक थे और इसमें तीर्थों को महत्व दिया जाता था।
    हीनयान का आदर्श अर्हत पूज्य पद प्राप्त करना है। जो व्यक्ति अपनी साधना से निर्वाण प्राप्तकर्ता अर्हत कहलाते है जैसे यवन शासक मिनाण्डर।महायान का अर्थ बोधिसत्व प्राप्त करना है।
    हीनयान का प्रमुख सम्प्रदाय वैभाषिक व सौत्रान्तिक है।महायान का प्रमुख सम्प्रदाय पूर्व शैल भदयानीय शून्यवाद विज्ञानवाद है।
    हीनयान में केवल पुद्गल शून्यता का उल्लेख है।महायान में पुद्गल शून्यता एवं धर्म शून्यता दोनो का उल्लेख है।
    हीनयान के ग्रन्थ सामान्यतः पालि भाषा में है।महायान के ग्रंथ समान्यत: संस्कृत भाषा में है।
    हीनयान का प्रमुख साहित्य कथावस्तु विशुद्धि मग्ग, अवदान शतक है।महायान का अष्टसा हस्त्रिका प्रज्ञापारमिता प्राचीनतम ग्रन्थ है।
    हीनयान के प्रमुख दार्शनिक वसुबन्धु, कुमारलात, इत्सिंग है।महायान के प्रमुख दार्शनिक नागार्जुन, असंग, ह्वेनसांग, मैत्रेय, वसुबन्धु है।

    बौद्ध के शिष्यायें व शिष्य

    बुद्ध के शिष्यायें (स्त्री शिष्या)

    शिष्यायेंविवरण
    महाप्रजापति गौतमी बुद्ध की मौसी व विमाता, बुद्ध की प्रथम शिष्या।
    यशोधराबुद्ध की पत्नी
    नन्दामहाप्रजापति की पुत्री व नन्द की बहन आम्रपाली वैशाली की नगरवधू, आम्रपाली वन का निर्माण।
    विशाखाअंग जनपद के भछियग्राम के श्रेष्ठी की पुत्री, श्रावस्ती में पूर्वाराम बिहार का निर्माण और बुद्ध को प्रदान।
    क्षेमाबिम्बिसार की पत्नी
    मल्लिकाकोशल नरेश प्रसेनजित की पत्नी
    सामावतीकौशाम्बी नरेश वत्सराज उदायिन की पत्नी

    बुद्ध के शिष्य

    शिष्यविवरण
    तपस्सु व मल्लिक प्रथम अनुयायी
    पंचवर्गीय ब्राह्मणकौण्डिन्य, बप्पा, भादिया, महानामा व असतागी
    यशबनारस का धनाढ्य श्रेष्ठी
    सारिपुत्रराजगृह का ब्राह्मण सारिपुत्र पहले संजय का अनुयायी था बाद में अपने गुरु के साथ बुद्ध से दीक्षित हुआ।
    मौद्गललायनराजगृह का ब्राह्मण मौद्गललायन पहले संजय का अनुयायी बाद में बुद्ध से दीक्षित।
    राहुलगौतम बुद्ध का पुत्र
    नन्दगौतम बुद्ध का सौतेला भाई
    उपालिशाक्य राज्य निवासी व नापित पुत्र
    आनंदबुद्ध का निजी शरीर परिचारक व बुद्ध का परमप्रिय शिष्य
    जीवकराजगृह की गणिका सालवती का पुत्र व प्रसिद्ध वैद्य,
    सुनीतिभंगी जाति
    मातंगचांडाल
    मेण्डकगहीति
    अंगुलिमालशावस्ती का क्रूर डाकू जो बुद्ध से सम्पर्क में जाकर बौद्ध भिक्षु बन गया।
    अनुरूद्धधनाढ्य व्यापारी का पुत्र
    अनाथपिण्डक सुदत्तश्रावस्ती का प्रसिद्ध श्रेष्ठी, जेतवन खरीद कर बुद्ध को प्रदान।
    बिम्बिसारमगध का शासक बिम्बिसार द्वारा बुद्ध को वेणुवन प्रदान
    अजातशत्रुमगध नरेश बिम्बिसार का पुत्र,
    प्रसेनजितकोशल नरेश ( बुद्ध की माता का प्रदेश)
    महाकस्सपमगध का ब्राह्मण, प्रथम बौद्ध महासंगीति के अध्यक्ष।
    सुभछकुशीनारा निवासी, बुद्ध का अन्तिम शिष्य व अन्तिम उपदेश प्राप्तकर्ता।

    ➣ जीवक मगध नरेश का राज वैद्य था। जिसे बिम्बिसार ने बौद्ध की सेवा में भेजा था।

    ➣ बुद्ध के अधिकांश उपदेश आनंद को सम्बोधित थे। इसका सबसे बड़ा योगदान स्त्रियों को संघ की सदस्यता दिलवाना था।

    अजातशत्रु आरम्भ में आजीवक सम्प्रदाय के संस्थापक मक्खलि गोशाल के सम्पर्क में तत्पश्चात् जैन महावीर के सम्पर्क में और अन्ततः गौतम बुद्ध के सम्पर्क में आकर बौद्ध धर्म में दीक्षित हुआ।

    प्रमुख बौद्ध विश्वविद्यालय

    विश्वविद्यालयअवस्थिति संस्थापक (वंश) शिक्षा
    नालंदा विश्वविद्यालयबड़गांव, बिहारकुमारगुप्त-I (गुप्त वंश) बौद्ध शिक्षा
    वल्लभी विश्वविद्यालयभावनगर, गुजरात भट्टार्क : 475-500ई. (मैत्रक वंश) हीनयान शिक्षा
    ओदंतपुरी विश्वविद्यालयबिहारशरीफ, बिहार गोपाल : 750-810ई. (पाल वंश) शिक्षा महायान
    विक्रमशिला विश्वविद्यालयअचिंतकगांव, बिहार धर्मपाल : 770-810 ई. (पाल वंश)वज्रयान शिक्षा
    सोमपुर विश्वविद्यालयनवगांव, बांग्लादेशबौद्ध शिक्षा
    जगदल्ल विश्वविद्यालयराजशाही, बांग्लादेश रामपाल : 1082-1124 ई. (पाल वंश) तंत्रयान शिक्षा

    बौद्ध धर्म व जैन धर्म

    समानताएं

    ➣ दोनों धर्म के प्रवर्तक क्षत्रिय कुल से थे।

    ➣ दोनों धर्म अनीश्वरवादी हैं। दूसरे शब्दों में दोनों धर्म संसार के स्रष्टा के रूप में ईश्वर (भगवान) को नहीं मानते।

    ➣ दोनों धर्म-कर्म का वैदिक सिद्धांत नहीं मानते।

    ➣ दोनों धर्म वैदिक यज्ञ-विधानकर्मकांड का विरोध करते हैं।

    ➣ दोनों धर्मों ने जाति-प्रथालिंग-भेद की निंदा की।

    ➣ दोनों धर्मों में उपदेश की भाषा जनभाषा (जैन धर्म-प्राकृत भाषा जबकि बौद्ध धर्म-पालि भाषा) है।

    ➣ दोनों धर्मों ने स्त्री एंव शूद्रों के लिए अपने द्वार खोले।

    असमानताए

    ➣ जैन धर्म में अहिंसा पर अत्यधिक बल दिया गया है। हालांकि बौद्ध धर्म भी अहिंसावादी लेकिन जैन धर्म की तुलना में कम है।

    ➣ जैन धर्म में कैवल्य (मोक्ष) का अर्थ सिद्धावस्था में शरीर का त्याग है। जबकि बौद्ध धर्म में निर्वाण (मोक्ष) का अर्थ अस्तित्व की समाप्ति जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति है।

    ➣ जैन धर्म आत्मा (जीव) को शाश्वत (आत्मवादी) मानता है जबकि बौद्ध धर्म ईश्वर के साथ आत्मा का भी निषेध (अनात्मवादी) करता है।

    ➣ जैन धर्म में कठोर तपस्या का विधान है जिसकी चरम परिणति काया कलेश के द्वारा आत्महत्या में होती है। जबकि बौद्ध धर्म में कठोर तपस्या को अमान्य कर मध्यम मार्ग (मध्यम प्रतिपदा) अपनाने का विधान है।

    ➣ जैन मंदिरों में ब्राह्मणों को स्थान मिला है। इसके विपरीत बौद्ध मंदिरों में ब्राह्मणों को अधिक प्रश्रय नहीं मिला है।

    ➣ जैन धर्म भारत की सीमा से बाहर नहीं फैला। जबकि बौद्ध धर्म विश्वव्यापी हो गया।

    ➣ जैन धर्म मूर्ति पूजक, नग्न मूर्तियों के है, हालांकि बौद्ध धर्म भी मूर्तिपूजक है लेकिन नग्न मूर्तियों के नहीं। उल्लेखनीय है सर्वप्रथम बुद्ध की प्रतिमा स्थापित कर पूजा आरंम्भ भारत में हुई थी।

  • बौद्ध और जैन धर्म MCQ प्रश्न | SSC

    1. गौतम बुद्ध का जन्म स्थान था –
    (a) कुशीनगर
    (b) सारनाथ
    (c) बोधगया
    (d) लुम्बिनी
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 1999
    S.S.C. (लोअर डिवीजन क्लर्क) परीक्षा, 2005
    उत्तर- (d)
    गौतम बुद्ध का जन्म 563 ई. पूर्व में लुम्बिनी नामक स्थान पर हुआ था। इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था। इन्होंने बौद्ध धर्म की स्थापना की। इन्हें ‘एशिया का ज्योति पुंज’ कहा जाता है। बुद्ध के गृह त्याग की घटना को बौद्ध धर्म में महाभिनिष्क्रमण’ कहा गया | तथा इनकी मृत्यु को ‘महापरिनिर्वाण’ कहा गया। ‘जातक’ में बुद्ध के पूर्वजन्मों की कहानी संकलित है।
    2.भगवान बुद्ध ने प्राण कहां त्यागे ?
    (a) राजगीर
    (b) बोधगया
    (c) सारनाथ
    (d) कुशीनगर
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 2001
    उत्तर- (d)
    483 ई.पू. में 80 वर्ष की अवस्था में महात्मा बुद्ध ने कुशीनगर में अपना शरीर त्याग दिया। बौद्ध ग्रन्थों में इस घटना को ‘महापरिनिर्वाण’ कहा गया है।
    3. बुद्ध किस वंश (Clan) से संबंधित थे ?
    (a) ज्ञातृक
    (b) मौर्य
    (c) शाक्य
    (d) कुरु
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 2008
    उत्तर-(c)
    बौद्ध धर्म के प्रवर्तक महात्मा बुद्ध शाक्य वंश से संबंधित थे। इनका जन्म कपिलवस्तु के लुम्बिनी में शाक्य मुखिया शुद्धोधन के यहां हुआ था।
    4.बुद्ध ने अपना प्रथम ने अपना प्रथम धर्म-सान्देश कहां पर दिया था ?
    (a) राजगृह
    (b) पाटलिपुत्र
    (c) गया
    (d) सारनाथ
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2000
    उत्तर- (d)
    बुद्ध ने अपना प्रथम धर्म-संदेश सारनाथ में दिया था, जिसे बौद्ध ग्रंथों में धर्मचक्र प्रवर्तन’ कहा गया है। बुद्ध ने अपने उपदेश ‘पालि’ भाषा में दिए। इन्होंने सर्वाधिक उपदेश कोशल की राजधानी श्रावस्ती में दिए।
    5.प्रथम बौद्ध परिषद कहां आयोजित की गई?
    (a) वैशाली
    (b) कश्मीर
    (c) राजगृह
    (d) पाटलिपुत्र
    S.S.C. मल्टी टॉस्किंग (M.T.S.) परीक्षा, 2013
    उत्तर-(c)
    प्रथम बौद्ध परिषद का आयोजन मगध सम्राट अजातशत्रु के समय में राजगृह की सप्तपर्णी गुफा में किया गया था। इस बौद्ध परिषद की अध्यक्षता महाकस्सप ने की थी।
    6. पांचवी बौद्ध परिषद् का आयोजन किसने किया था?
    (a) अशोक
    (b) कनिष्क
    (c) हर्ष
    (d) बिंदुसार
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2006
    उत्तर-(c)
    पांचवी बौद्ध परिषद् का आयोजन हर्ष के समय में कन्नौज में किया गया था जबकि अशोक के समय तीसरी और कनिष्क के समय में चौथी बौद्ध परिषद का आयोजन किया गया था।
    7. ‘बुद्ध’ का अर्थ है-
    (a) ज्ञान प्राप्त
    (b) धर्म प्रचारक
    (c) प्रतिभाशाली
    (d) शक्तिशाली
    S.S.C. Section Off. परीक्षा, 2006
    उत्तर-(a)
    छः वर्षों की साधना के पश्चात् 35 वर्ष की आयु में वैशाख पूर्णिमा की रात को एक पीपल के वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ को ज्ञान प्राप्त हुआ इसके बाद वह ‘बुद्ध’ के नाम से विख्यात हुए। अतः ‘बुद्ध’ का अर्थ ‘ज्ञान प्राप्त’ से है।
    8. किस भाषा का ज्यादा प्रयोग ‘बौद्धवाद’ के प्रचार के लिए किया गया?
    (a) संस्कृत
    (b) प्राकृत
    (c) पालि
    (d) शौरसेनी
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 1999
    उत्तर-(c)
    बौद्ध धर्म के प्रसार के अनेक कारण थे-
    महात्मा बुद्ध का आकर्षक एवं प्रभावपूर्ण व्यक्तित्व, बौद्ध धर्म की सरलता, जनसामान्य की भाषा पाली का प्रयोग, चारों वर्गों का समर्थन, राजकीय संरक्षण, बौद्ध संघ का योगदान, तत्कालीन व्यापारियों एवं साहूकारों द्वारा उदारतापूर्वक दान।
    9.निम्न में से बौद्ध साहित्य की पहचान कीजिए:
    (a) त्रिपिटक
    (b) उपनिषद
    (c) अंग
    (d) आरण्यक
    S.S.C.F.C.J. परीक्षा, 2012
    उत्तर-(a)
    त्रिपिटक बौद्ध धर्म के साहित्य का अंग है। ये हैं- सुत्त पिटक, विनय पिटक एवं अभिधम्म पिटक उपनिषद एवं आरण्यक वैदिक ब्राह्मण धर्म से तथा अंग जैन धर्म से संबंधित हैं।
    10. “त्रिपिटक” धार्मिक ग्रंथ है-
    (a) जैनों का
    (b) बौद्धों का
    (c) सिक्खों का
    (d) हिन्दुओं का
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2002
    उत्तर-(b)
    उपर्युक्त प्रश्न की व्याख्या देखें।
    11. बौद्ध धर्म ने समाज के दो वर्गों को अपने साथ जोड़कर एक महत्त्वपूर्ण प्रभाव छोड़ा। ये वर्ग थे-
    (a) वणिक एवं पुरोहित
    (b) साहूकार एवं दास
    (c) योद्धा एवं व्यापारी
    (d) स्त्रियां एवं शूद्र
    S.S.C. CPO परीक्षा, 2006
    उत्तर-(d)
    बौद्ध धर्म ने स्त्रियों और शूद्रों के लिए अपने द्वार खोलकर समाज पर गहरा प्रभाव जमाया। ब्राह्मण धर्म ने स्त्रियों और शूद्रों को एक ही दर्जे में रखा और उनके लिए न यज्ञोपवीत संस्कार का विधान किया और न वेदाध्ययन का बौद्ध धर्म ग्रहण करने पर उन्हें इस अधिकार – हीनता से मुक्ति मिल गई।
    12. अजन्ता कलाकृतियाँ किससे संबंधित हैं?
    (a) हड़प्पा काल से
    (b) मौर्य काल से
    (c) बौद्ध काल से
    (d) गुप्त काल से
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2001
    उत्तर-(d)
    अजन्ता की गुफाओं पर उत्कीर्ण कुछ कलाकृतियों का संबंध गुप्त काल से है। इसमें बुद्ध से संबंधित कहानियों को चित्रित किया गया है।
    13. बुद्ध ने अपना प्रथम प्रवचन कहां दिया था ?
    (a) गया
    (b) सारनाथ
    (c) पाटलिपुत्र
    (d) वैशाली
    S.S.C. (डाटा एंट्री ऑपरेटर) परीक्षा, 2008
    उत्तर-(b)
    बुद्ध ने अपना प्रथम प्रवचन (उपदेश) सारनाथ (ऋषिपतनम्) में दिया, जिसे बौद्ध ग्रंथों में धर्मचक्रप्रवर्त्तन कहा गया है। बुद्ध ने अपने उपदेश जनसाधारण की भाषा पालि में दिए।
    14. बौद्ध धर्म निम्न में से किन मतों पर विश्वास करता है?
    (a) दुनिया दुखों से भरी है।
    (b) लोगों को दुख उनकी इच्छाओं के कारण होते हैं।
    (c) यदि इच्छाओं पर काबू पा लिया जाए, तो निर्वाण मिल जाएगा।
    (d) ईश्वर और आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार करना चाहिए।
    कूट :
    (a) A, B, C तथा D
    (b) B तथा C
    (c) A, B तथा C
    (d) B, C तथा D
    S.S.C. मल्टी टॉस्किंग परीक्षा, 2011
    उत्तर-(c)
    बौद्ध धर्म अनीश्वरवादी और अनात्मवादी है। इसके अनुसार दुनिया दुःखों से भरी है, लोगों को दुःख उनकी इच्छाओं (तृष्णा) के कारण होते हैं यदि इच्छाओं पर काबू पा लिया जाए तो निर्वाण मिल जाएगा।
    15. चित्रकला की गांधार शैली का सूत्रपात किसके द्वारा किया गया था ?
    (a) हीनयान संप्रदाय
    (b) महायान संप्रदाय
    (c) वैष्णव संप्रदाय
    (d) शैव संप्रदाय
    S.S.C. CPO परीक्षा, 2003
    उत्तर-(b)
    चित्रकला की गांधार शैली का सूत्रपात महायान सम्प्रदाय द्वारा किया गया था। इसका चरमोत्कर्ष कुषाण वंशी कनिष्क के समय था।
    16. बौद्धों के विश्वास अनुसार गौतम बुद्ध का अगला अवतार किसे माना जाता है?
    (a) अत्रेय
    (b) मैत्रेय
    (c) नागार्जुन
    (d) कल्कि
    S.S.C. CPO परीक्षा, 2003
    उत्तर-(b)
    बौद्धों के विश्वास के अनुसार गौतम बुद्ध का अगला अवतार मैत्रेय को माना जाता है। इन्हें भावी बोधिसत्व भी कहा जाता है। इनका प्रतीक (चिह्न) कलश होगा। इस उद्देश्य पर महावस्तु, ललित विस्तार तथा अश्वघोष कृत बुद्ध चरित महत्त्वपूर्ण पुस्तक है।
    17. धातु से बने सिक्के सबसे पहले प्रकट हुए
    (a) हड़प्पा सभ्यता में
    (b) उत्तर वैदिक काल में
    (c) बुद्ध के काल में
    (d) मौर्यों के काल में
    S.S.C. संयुक्त हायर सेकण्डरी (10+2) स्तरीय परीक्षा, 2010
    उत्तर-(c)
    भारत के प्राचीनतम धातु के सिक्कों को जो 5 वीं अथवा 6 वीं शताब्दी ईसापूर्व (बुद्ध काल) के हैं, पंचमार्क अथवा ‘आहत’ सिक्के कहा जाता है। ये अधिकांशतः चांदी के हैं परन्तु कुछ तांबे के भी आहत सिक्के प्राप्त हुए हैं, इन्हें आहत इसलिए कहा जाता है क्योंकि इन पर अलग से ठप्पा मारकर विभिन्न प्रतीक अंकित किये गये हैं। ऐसे सिक्के समूचे देश में तक्षशिला से मगध तक और मगध से मैसूर तक मिले हैं।
    18.प्रारंभिक बौद्ध धर्म ग्रंथों की रचना किसमें की गई थी?
    (a) प्राकृत पाठ
    (b) पाली पाठ
    (c) संस्कृत पाठ
    (d) चित्रलेखीय पाठ
    S.S.C.F.C.I. परीक्षा, 2012
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2002
    उत्तर-(b)
    प्रारंभिक बौद्ध धर्म ग्रंथों की रचना पाली पाठ में की गई थी। पाली उस समय आम जनों की भाषा थी। बाद में बौद्ध धर्म ग्रंथ संस्कृत में भी लिखे गए।
    19. आरंभिक बौद्ध साहित्य किस भाषा में रचे गए ?
    (a) पालि
    (b) संस्कृत
    (c) अरेमेइक
    (d) प्राकृत
    S.S.C. मल्टी टॉस्किंग परीक्षा, 2011
    उत्तर-(a)
    उपर्युक्त प्रश्न की व्याख्या देखें।
    20. निम्नलिखित में से बौद्धों का पवित्र ग्रंथ कौन-सा है?
    (a) उपनिषद
    (b) वेद
    (c) त्रिपिटक
    (d) जातक
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 2005
    उत्तर-(c)
    त्रिपिटक (सुत्तपिटक, विनयपिटक, अभिधम्मपिटक) बौद्धों का पवित्र ग्रन्थ है। सुत्तपिटक में बौद्ध धर्म के उपदेश संगृहीत हैं। विनय पिटक में भिक्षु और भिक्षुणियों के संघ एवं दैनिक जीवन संबंधी आचार-विचार, नियम संगृहीत हैं, जबकि अभिधम्मपिटक में बौद्ध दार्शनिक सिद्धान्तों का वर्णन है।
    21. निम्नलिखित में से किसके शासनकाल के दौरान प्रसिद्ध अजन्ता गुफाओं में उत्कीर्णन का काम सबसे पहले शुरू किया गया था?
    (a) कदम्ब
    (b) सातवाहन
    (c) राष्ट्रकूट
    (d) मराठा
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2002
    उत्तर-(b)
    अजंता की गुफाओं में उत्कीर्णन का काम सर्वप्रथम सातवाहन काल में शुरू किया गया था। अजंता में निर्मित कुल 29 गुफाओं में से वर्तमान में केवल 6 ही शेष हैं, जिसमें गुफा संख्या 16 तथा 17 के चित्रों का संबंध गुप्त काल से है। इसमें गुफा संख्या 16 में उत्कीर्ण मरणासन्न राजकुमारी का चित्र प्रशंसनीय है। अजंता की गुफाएं बौद्ध धर्म की महायान शाखा से संबंधित हैं।
    22. निम्न में से कौन-सा एक भारत में उत्पन्न सबसे बाद वाला बौद्ध धर्म का ग्रंथ है?
    (a) दिव्य वंदना
    (b) दोहाकोसा
    (c) वज्रछेदिका
    (d) वामसाथपाकसिनी
    S.S.C. (CPO) परीक्षा, 2011
    उत्तर-(d)
    उपर्युक्त विकल्पों में से भारत में रचित सबसे बाद में बौद्ध धर्म ग्रंथ वामसाथपाकसिनी था। इसकी रचना दसवीं शताब्दी में हुई थी।
    23. बौद्ध धर्म में ‘बुल’ का संबंध बुद्ध के जीवन की किस घटना के साथ है ?
    (a) जन्म
    (b) महाभिनिष्क्रमण
    (c) प्रबोध
    (d) महापरिनिर्वाण
    S.S.C. Tax Asst. परीक्षा, 2006
    उत्तर-(a)
    कमल व सांड का संबंध बुद्ध के जन्म से, घोड़ा- गृहत्याग से, पीपल (बोधिवृक्ष)- ज्ञान से, पद चिन्ह निर्वाण से एवं स्तूप का संबंध मृत्यु से है।
    24. अफगानिस्तान में बुद्ध की दो विशाल मूर्तियों को निम्नलिखित में से किस स्थान पर नष्ट किया गया था ?
    (a) कंधार में
    (b) याकाउला में
    (c) बामियान में
    (d) मजार-ए-शरीफ में
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2002
    उत्तर-(c)
    अफगानिस्तान में बुद्ध की दो विशाल मूर्तियों को बामियान में नष्ट किया गया था। इसे तालिबानियों ने ध्वस्त कर दिया।
    25. बुद्ध ने निम्नलिखित में से किस स्थान पर महापरिनिर्वाण प्राप्त किया था ?
    (a) कुशीनगर में
    (b) कपिलवस्तु में
    (c) पावा में
    (d) कुंडग्राम में
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2002
    उत्तर-(a)
    बुद्ध की मृत्यु को बौद्ध धर्म में ‘महापरिनिर्वाण’ कहा गया है, जो 80 वर्ष की अवस्था में कुशीनगर में चुन्द द्वारा अर्पित भोजन करने के बाद हो गयी। तृष्णा के क्षीण हो जाने की अवस्था को बुद्ध ने ‘निर्वाण’ कहा है। बुद्ध के गृह-त्याग की घटना को महाभिनिष्क्रमण’ कहा गया है।
    26. भारत में 5 वीं शताब्दी के प्राचीन विश्वविद्यालय की स्थापना कहां की गई थी ?
    (a) वाराणसी में
    (b) गया में
    (c) नालंदा में
    (d) तक्षशिला में
    S.S.C. (स्टेनोग्राफर) ग्रेड ‘डी’ परीक्षा, 2005
    उत्तर-(c)
    भारत में नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना 5वीं शताब्दी में कुमारगुप्त प्रथम (415455 ई.) द्वारा की गयी थी। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने यहां 18 महीने रह कर अध्ययन किया था। इसके समय में शीलभद्र यहां के कुलपति थे। नालंदा विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध विद्वानों में चंद्रगोमिन, शांतिरक्षित तथा कश्मीरी भिक्षुक पद्मसंभव शामिल हैं।
    27. बुद्ध को प्रबोध कहां प्राप्त हुआ था?
    (a) सारनाथ
    (b) बोध गया
    (c) कपिलवस्तु
    (d) राजगृह
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 2011
    उत्तर-(b)
    बुद्ध को ज्ञान (प्रबोध) बोध गया में प्राप्त हुआ था।
    28. बुद्ध धम्म और संघ मिलकर कहलाते हैं
    (a) त्रिरल
    (b) त्रिवर्ग
    (c) त्रिसर्ग
    (d) त्रिमूर्ति
    S.S.C. संयुक्त स्नातक स्तरीय (Tier-I) परीक्षा, 2013
    उत्तर-(a)
    बुद्ध, धम्म और संघ-ये तीनों बौद्ध धर्म के ‘त्रिरत्न’ कहलाते हैं।
    29. “इच्छा सब कष्टों का कारण है” इसका प्रचार करने वाला धर्म कौन-सा है ?
    (a) बौद्ध धर्म
    (b) जैन धर्म
    (c) सिख धर्म
    (d) हिंदू धर्म
    S.S.C. मल्टी टॉस्किंग (M.T.S.) परीक्षा, 2013
    उत्तर-(a)
    “इच्छा अर्थात तृष्णा सब कष्टों का कारण है” इसका प्रचार करने वाला धर्म, बौद्ध धर्म है।
    30. निम्न में कौन-सा शासक, बुद्ध का समकालीन था ?
    (a) उदयन
    (b) बिंबिसार
    (c) अजातशत्रु
    (d) महापद्म नंद
    S.S.C. मल्टी टॉस्किंग (M.T.S.) परीक्षा, 2013
    उत्तर – (*)
    बुद्ध के समकालीन शासकों में से मगघराज बिंबिसार और अजातशत्रु, कोशल नरेश प्रसेनजित तथा वत्सराज उदयन ने उन्हें राजाश्रय प्रदान किया और उनकी शिष्यता ग्रहण की। महापद्म नंद बुद्ध का समकालीन शासक नहीं था।
    31. तमिल का गौरव-ग्रन्थ ‘जीवक चिंतामणि’ किस धर्म से सम्बन्धित
    (a) जैन
    (b) बौद्ध
    (c) हिन्दू
    (d) ईसाई
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 2001
    उत्तर-(a)
    तमिल महाकाव्य जीवक चिंतामणि की रचना तिरुत्तक्कदेवर ने की थी, जो जैन धर्मावलम्बी थे। इस महाकाव्य में राजकुमार जीवक या शीवक के वीरतापूर्ण एवं अलौकिक कृत्यों का वर्णन किया गया है।
    32. जैनियों के पहले तीर्थंकर कौन थे?
    (a) अरिष्टनेमी
    (b) पार्श्वनाथ
    (c) अजितनाथ
    (d) ऋषभ
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 1999
    उत्तर-(d)
    जैनियों के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव थे। इनकी मृत्यु अट्ठावय (कैलाश पर्वत ) पर हुई थी। चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी थे।
    33. महावीर कौन थे ?
    (a) 21वें तीर्थकर
    (b) 24वें तीर्थंकर
    (c) 23वें तीर्थंकर
    (d) 22वें तीर्थंकर
    S.S. C. संयुक्त स्नातक स्तरीय परीक्षा 2012
    उत्तर-(b)
    महावीर जैनियों के 24वें तीर्थंकर एवं जैन धर्म के वास्तविक संस्थापक माने जाते हैं। इसके 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ थे।
    34. लॉर्ड महावीर की मृत्यु कहां हुई थी ?
    (a) श्रवण बेलगोला
    (b) लुम्बिनी उद्यान
    (c) कलुगुगलै
    (d) पावापुरी
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 1999
    उत्तर-(d)
    भगवान महावीर की मृत्यु पावापुरी में हुई थी। जो मल्ल गणराज्य की राजधानी थी।
    35. महावीर की माता कौन थीं?
    (a) यशोदा
    (b) अनोज्जा
    (c) त्रिशला
    (d) देवानन्दी
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 2004
    उत्तर-(c)
    महावीर स्वामी के बचपन का नाम वर्धमान था। जैन अनुश्रुतियों में इनके पिता सिद्धार्थ के दो अन्य नाम श्रेयाम्स और यसाम्स मिलते हैं। इनकी माता त्रिशला के भी दो नाम प्रियकारिणी और विदेहदत्ता मिलते हैं।
    36. लॉर्ड महावीर का 2600 वां जन्मोत्सव (Anniversary) कब मनाया गया ?
    (a) 2000 ई. में
    (b) 2006 ई. में
    (c) 2001 ई.
    (d) 2005 ई. में
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 1999
    उत्तर-(a)
    महावीर का जन्म 599 ई. पू. में हुआ था, इस जन्मतिथि के आधार पर महावीर का 2600 वां जन्मोत्सव 2000 ई. में था। इस जन्मतिथि के संदर्भ में उनकी मृत्यु 527 ई. पू. में हुई थी। महावीर के जन्म की एक अन्य तिथि 540 ई. पू. तथा मृत्यु की तिथि 463 ई.पू. है।
    37. महावीर का जन्म किस नाम के क्षत्रिय गोत्र में हुआ था?
    (a) शाक्य
    (b) ज्ञात्रिक
    (c) मल्लास
    (d) लिच्छवी
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2000
    उत्तर-(b)
    महावीर का जन्म 599 ई. पूर्व के लगभग वैशाली के निकट कुण्डग्राम में हुआ था। उनके पिता सिद्धार्थ ज्ञातृक क्षत्रियों के संघ के प्रधान थे जो वज्जि संघ का एक प्रमुख सदस्य था। उनकी माता त्रिशला अथवा विदेहदत्ता वैशाली के लिच्छवी कुल के प्रमुख चेटक की बहन थी। अतः स्पष्ट है कि महावीर का जन्म ज्ञात्रिक कुल में हुआ था।
    38. जैन साहित्य को क्या कहते हैं?
    (a) त्रिपिटक
    (b) वेद
    (c) आर्यसूत्र
    (d) अंग
    S.S.C. मल्टी टॉस्किंग (M.T.S.) परीक्षा 2013
    उत्तर-(d)
    जैन साहित्य को ‘आगम’ (सिद्धान्त) कहा जाता है। इसके अंतर्गत 12 अंग, 12 उपांग, 10 प्रकीर्ण, 6 छेदसूत्र, 4 मूलसूत्र एवं अनुयोग सूत्र आते हैं। बौद्ध साहित्य को ‘त्रिपिटक’ कहा जाता है।
    39. प्राचीन भारत का प्रसिद्ध वह शासक कौन था जिसने अपने जीवन के अंतिम दिनों में जैन धर्म अपना लिया था ?
    (a) समुद्रगुप्त
    (b) बिंदुसार
    (c) चंद्रगुप्त
    (d) अशोक
    S.S.C. संयुक्त हायर सेकण्डरी (10+2) स्तरीय परीक्षा, 2011
    उत्तर-(c)
    चंद्रगुप्त मौर्य ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में जैन धर्म अपना लिया था। उसने जैन साधु भद्रबाहु से जैन धर्म की दीक्षा लेकर श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) स्थित चंद्रगिरि पहाड़ी पर 298 ई.पू. में उपवास द्वारा अपना शरीर त्यागा था।
  • बौद्ध धर्म: गौतम बुद्ध | Q&A Practice

    ➣ ई.पू. छठी शताब्दी में किन दो धर्मों ने ब्राह्मणों के प्रभुत्व और क्रूरता का विरोध करते हुए वेदों व वैदिक कर्मकांडों का खंडन किया तथा अहिंसा, अपरिग्रह व प्रेम के सिद्धान्तों की शिक्षा दी?
    उत्तर : बौद्ध एंव जैन धर्म

    ➣ जैन और बौद्ध धर्म के संस्थापक महावीर एवं गौतम बुद्ध दोनों किस वर्ण से आते थे?
    उत्तर : क्षत्रिय धर्म

    ➣ बौद्ध धर्म के संस्थापक कौन थे?
    उत्तर : गौतम बुद्ध

    ➣ किस धर्म ने छटीं शताब्दी ईसा पूर्व में ब्राह्मणवादी धर्म को सबसे अधिक आघात पहुंचाया ?
    उत्तर : बौद्ध धर्म

    ➣ बौद्ध धर्म के तीन आधार स्तम्भ कौन से हैं?
    उत्तर : बुद्ध (संस्थापक), धम्म (उपदेश), और संघ

    ➣ संघ किनका संगठन था ?
    उत्तर : भिक्षु और भिक्षुणियों का

    ➣ गौतमबुद्ध के बचपन का नाम क्या था ?
    उत्तर : सिद्धार्थ

    ➣ गौतम बुद्ध को तथागत, शाक्यमुनि, बोधिसत्व,सुगाता, अरहंत, चक्रवर्तिन, सम्मा सम्बुद्धस्सा भी कहते हैं। उनको किस अन्य नाम से भी जाना जाता है?
    उत्तर : प्रछन्न

    ➣ बुद्ध का जन्म कब हुआ था?
    उत्तर : 563 ई.पू. में बैशाख पूर्णिमा के दिन कपिलवस्तु के राजकीय उपवन, लुम्बिनी में

    ➣ बुद्ध का जन्म स्थान कपिलवस्तु किस गणराज्य की राजधानी हुआ करती थी ?
    उत्तर : शाक्य गणराज्य

    ➣ उनकी माता और पिता का क्या नाम था ?
    उत्तर : क्रमशः महामाया और शुद्धोधन

    ➣ गौतम बुद्ध की माता किस वंश से संबंधित थीं?
    उत्तर : कोलिय वंश

    ➣ बुद्ध के जन्म के सातवें दिन उनकी माता का देहांत हो जाने के कारण उनका पालन-पोषण किसने किया ?
    उत्तर : मौसी प्रजापति गौतमी ने

    ➣ 16 वर्ष की आयु में बुद्ध का विवाह किस से हुआ था ?
    उत्तर : यशोधरा

    ➣ बुद्ध के पुत्र का क्या नाम था ?
    उत्तर : राहुल

    ➣ गौतम किस किस उम्र में घर छोड़कर चले गये थे?
    उत्तर : 29 वर्ष

    ➣ गृह त्याग के समय बुद्ध के सारथी का नाम क्या था?
    उत्तर : चन्ना

    ➣ कमल का फूल’ बुद्ध के जन्म का, ‘घोड़ा’ गृह त्याग का और ‘पीपल’ ज्ञान प्राप्ति का प्रतीक है। ‘स्तूप’ किसका प्रतीक है?
    उत्तर : मृत्यु का

    ➣ 35 वर्ष की आयु में वैशाख पूर्णिमा की एक रात बोधगया (उरुवेला ) पीपल के नीचे किस नदी के तट पर सिद्धार्थ को ज्ञान प्राप्त हुआ, जिस दिन से ही वे तथागत हो गये?
    उत्तर : पुनपुन (निरंजना)

    ➣ गौतम बुद्ध ने अपना पहला धर्मोपदेश किस स्थल में दिया ?
    उत्तर : बनारस के निकट सारनाथ में

    ➣ गौतम बुद्ध के प्रथम अनुयायी कौन थे ?
    उत्तर : तवस्सु’ एवं ‘मल्लिक’ नामक दो बंजारे

    ➣ बुद्ध के धर्मोपदेश को क्या कहा जाता है?
    उत्तर : धर्मचक्रप्रवर्तन

    ➣ धर्मचक्रप्रवर्तन के उपरांत बुद्ध काशी होते हुए मगध की राजधानी राजगृह गये, जहाँ मगध शासक उनका शिष्य बना, उस समय मगध का शासक कौन था?
    उत्तर : बिम्बिसार (चन्द्रगुप्त का पुत्र)

    ➣ बुद्ध के दो प्रधान कौन-कौन थे?
    उत्तर : उपालि और आनंद

    ➣ 483 ई.पू. में 80 वर्ष की अवस्था में हिरण्यवती नदी के तट पर स्थित किस स्थल में बुद्ध की मृत्यु हो गयी थी ?
    उत्तर : कुशीनगर (उत्तर प्रदेश) में

    ➣ बौद्ध परंपरा में गौतम बुद्ध की मृत्यु को किस अन्य नाम से जाना जाता है?
    उत्तर : महापरिनिर्वाण

    ➣ बौद्ध धर्म के त्रिरत्न कौन-कौन से हैं ?
    उत्तर : बुद्ध, धम्म तथा संघ

    ➣ सबसे पहले बौद्ध धर्म की स्थापना कहां हुई?
    उत्तर : सारनाथ में

    ➣ बुद्ध ने सर्वाधिक उपदेश कहां दिये थे?
    उत्तर : श्रावस्ती में

    ➣ बौद्ध धर्म के मूलाधार चार आर्य सत्य कौन-कौन से हैं?
    उत्तर : 1. दुःख, 2. दुःख समुदय, 3. दुःख निरोध, 4. दुःख निवारक मार्ग अर्थात् अष्टांगिक मार्ग

    ➣ बुद्ध नारी को दोक्षित नहीं करना चाहते थे, परंतु किसके कहने पर उन्होंने अपनी पालक माता प्रजापति गौतमी को बौद्ध धर्म में दीक्षित किया?
    उत्तर : आनन्द

    ➣ पावापुरी के किस व्यक्ति के घर पर शूकर का मांस ग्रहण करने से हुआ उदर विकार सम्भवतः बुद्ध को मृत्यु का कारण बना ?
    उत्तर : चंद ( सुनार)

    ➣ बुद्ध ने अपना अन्तिम उपदेश किन दो व्यक्तियों को दिये?
    उत्तर : सुभद्र (भ्रमणशील परिव्राजक) और आनन्द

    ➣ बुद्ध के पंचशीलों का विवरण किस उपनिषद में मिलता है?
    उत्तर : छान्दोग्य उपनिषद

    ➣ बौद्ध धर्म को तीन महत्त्वपूर्ण अवधारणाएं कौन-कौन सी हैं?
    उत्तर : अनित्यता, अनात्मा, अनीश्वरवाद

    ➣ बुद्ध ने कहा कि चूंकि विश्व को प्रत्येक वस्तु अनित्य है, अतः नित्य आत्मा की परिकल्पना नहीं की जा सकती। यह कथन सत्य है या असत्य ?
    उत्तर : सत्य

    ➣ बुद्ध ने मृत्यु के बाद आत्मा द्वारा दूसरा शरीर धारण करने की बात को भी अस्वीकार कर दिया, लेकिन उन्होंने पुनर्जन्म की व्याख्या करने के लिए किस सिद्धांत का प्रतिपादन किया?
    उत्तर : प्रतीत्यसमुत्पाद सिद्धांत

    ➣ बुद्ध ने पुनर्जन्म तथा जन्म-मरण के चक्र का मूल कारण क्या बतलाया है?
    उत्तर : अविद्या

    ➣ बुद्ध ने ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार या अस्वीकार नहीं किया। इसलिए उनको क्या कहा जाता है?
    उत्तर : अज्ञेयवादी

    ➣ भगवान बुद्ध के उपदेश तीन साहित्य खंडों में संकलित हैं, जिन्हें ‘त्रिपिटक’ कहा जाता है। ये तीनों साहित्य खंड कौन-कौन से हैं?
    उत्तर : विनय पिटक, सुत्त पिटक और अभिधम्म पिटक

    ➣ त्रिपिटकों की रचना किस भाषा में की गयी है?
    उत्तर : पालि भाषा

    ➣ बुद्ध के विभिन्न घटनाओं और अवसरों पर दिये उपदेश किसमे संकलित हैं?
    उत्तर : विनय पिटक में

    ➣ किस पिटक में भगवान बुद्ध द्वारा विभिन्न अवसरों पर जनसामान्य को दिये गये छोटे-बड़े प्रवचनों का संकलन है?
    उत्तर : सुत पिटक

    ➣ सुत्त पिटक के पांच निकाय (संग्रह) हैं, इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण निकाय कौन-सा है, जिसमें बौद्ध धर्मदर्शन से संबंधित 15 ग्रंथ हैं?
    उत्तर : खुद्दक निकाय

    ➣ बौद्ध धर्म में किस ग्रंथ का वही स्थान है, जो हिन्दू धर्म में गीता का है?
    उत्तर : धम्मपद

    ➣ बुद्ध के पूर्व जन्म (550 जन्म) कथाओं का वर्णन किसमें संकलित है?
    उत्तर : जातक

    ➣ किस ग्रंथ में बौद्ध भिक्षुणियों के जीवन चरित्र का वर्णन किया गया है?
    उत्तर : थेरीगाथा

    ➣ किस पिटक में बुद्ध की शिक्षाओं का दार्शनिक विवेचन एवं आध्यात्मिक विचारों का पाण्डित्यपूर्ण शैली में संकलन किया गया है ?
    उत्तर : अभिधम्म पिटक

    ➣ किस ग्रंथ को त्रिपिटक के महाभाष्य के रूप में लिखा गया था?
    उत्तर : अढकथा

    ➣ पालि भाषा में रचित वह प्रसिद्ध ग्रंथ कौन है जिसमें इण्डो-बैक्ट्रियाई ग्रीक नरेश मिनांडर (मिलिंद) के बीच हुए प्रश्नोत्तरों को संकलित किया गया है?
    उत्तर : मिलिन्दपन्हो’

    ➣ मिलिन्दपन्हो की रचना किसने की थी ?
    उत्तर : आचार्य नागसेन

    ➣ बुद्धघोष द्वारा रचित किस ग्रंथ को बौद्धों का विश्व कोश माना जाता है ?
    उत्तर : विसुद्धमग्ग ( विशुद्ध मार्ग )

    ➣ ललितविस्तार’ मूलत: कैसा ग्रंथ है?
    उत्तर : एक महायान ग्रंथ

    ➣ महायान साहित्य मुख्यतः किस भाषा में लिखा गया है ?
    उत्तर : संस्कृत भाषा

    ➣ कौन-सा काल महायान क्लासिकी ग्रंथों के लेखन एवं अनुवाद कार्यों का काल माना जाता है?
    उत्तर : दूसरी से छठीं सदी ई. के मध्य का काल

    ➣ कनिष्क के किस दरबारी कवि ने’ बुद्धचरित् नामक ग्रंथ की रचना की, जिसमें बुद्ध का जीवन चरित वर्णित है?
    उत्तर : अश्वघोष

    ➣ प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन महाकश्यप की अध्यक्षता में कहां हुआ था?
    उत्तर : राजगृह (सप्तपर्णी गुफा)

    ➣ प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन किसके शासनकाल में 483 ई.पू. में हुआ ?
    उत्तर : अजातशत्रु (हर्यक वंश)

    ➣ बुद्ध की मृत्यु के पश्चात प्रथम बौद्ध संगीति की अध्यक्षता किसने की?
    उत्तर : महाकस्सप उपालि

    ➣ द्वितीय बौद्ध संगीति 383 ई.पू. में कालाशोक (शिशुनागवंश) के शासनकाल में साबकमीर (सर्वकामनी) की अध्यक्षता में कहां आयोजित किया गया?
    उत्तर : वैशाली

    ➣ किस बौद्ध संगीति के दौरान अनुशासन को लेकर मतभेद के समाधान के लिए बौद्ध धर्म दो भागों- स्थविर एवं महासांघिक में बंट गया ?
    उत्तर : द्वितीय बौद्ध संगीति

    ➣ किस बौद्ध संगीति के दौरान संघ भेद के विरुद्ध कठोर नियमों का प्रतिपादन करके बौद्ध धर्म को स्थायित्व प्रदान करने का प्रयत्न किया गया ?
    उत्तर : तृतीय बौद्ध संगीति

    ➣ मोग्गलिपुत्ततिस्स की अध्यक्षता में अशोक (मौर्य वंश) के शासनकाल में 251 ई.पू. में तृतीय बौद्ध संगीति का आयोजन कहां किया गया?
    उत्तर : पाटलिपुत्र

    ➣ कश्मीर के कुण्डलवन में लगभग ईसा की प्रथम शताब्दी में चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन हुआ। इसके अध्यक्ष और उपाध्यक्ष कौन थे?
    उत्तर : क्रमशः वसुमित्र एवं अश्वघोष

    ➣ कनिष्क (कुषाण वंश) के शासनकाल में आयोजित चतुर्थ बौद्ध संगीति के समय बौद्ध धर्म किन दो सम्प्रदायों में विभाजित हो गया ?
    उत्तर : हीनयान और महायान

    ➣ छठी शताब्दी में बौद्ध धर्म में कौन-सा एक अलग पंथ बन गया ?
    उत्तर : वज्रयान

    ➣ वसुबंधु किस बौद्ध पंथ के महानतम विद्वान थे?
    उत्तर : सर्वास्तिवाद

    ➣ सर्वास्तिवाद को अन्य नाम से भी जाना जाता है?
    उत्तर : हेतुवाद

    ➣ महासांघिक पंथ में बुद्ध को सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति माना गया, जिसमें बहुत सारे दैवीय गुण थे। इसका प्रमुख केन्द्र कहां था?
    उत्तर : वैशाली

    ➣ किस पंथ के अनुयायी बुद्ध की मौलिक शिक्षाओं में विश्वास करते थे तथा वे बुद्ध की नहीं, बल्कि उनके प्रतीक चिन्हों की पूजा करते थे?
    उत्तर : हीनयान

    ➣ बौद्ध धर्म के किस सम्प्रदाय में बुद्ध को देवता मानकर उनकी पूजा की जाती थी ?
    उत्तर : महायान

    ➣ बुद्ध की मूर्ति को सर्वप्रथम किस देश में पूजा गया?
    उत्तर : भारत में

    ➣ महायान के ग्रंथ मुख्यतः किस भाषा में लिखे गये?
    उत्तर : संस्कृत

    ➣ कालान्तर में महायान भी किन दो सम्प्रदायों में वर्गीकृत हो गया?
    उत्तर : माध्यमिक और योगाचार विज्ञानवाद

    ➣ ईसा की पांचवीं छठीं शताब्दी में तंत्रवाद से प्रभावित होकर बौद्ध धर्म के किस सम्प्रदाय का उदय हुआ?
    उत्तर : वज्रयान सम्प्रदाय

    ➣ तांत्रिक बौद्ध धर्म का प्राचीनतम ज्ञात ग्रंथ कौन-सा है?
    उत्तर : आर्यमंजूश्रीमूलकल्प

    ➣ वज्रयान की परिधि में ही नौवीं-दसवीं शताब्दी में किस नाम से एक नये सम्प्रदाय का उदय हुआ?
    उत्तर :

    ➣ कालचक्रयान सम्प्रदाय के प्रमुख देवता कौन थे?
    उत्तर : भगवान श्रीकालचक्र

    ➣ धातु से बने सिक्के सबसे पहले प्रकट हुए थे ?
    उत्तर : बुद्ध के काल में

    ➣ अजंता की चित्रकारी किससे प्रेरित है?
    उत्तर : दयालु बुद्ध

    ➣ नालंदा विश्वविद्यालय किस धर्म से संबंधित विद्या का एक महान केंद्र था?
    उत्तर : बौद्ध धर्म

    ➣ बौद्ध धर्म ने समाज के दो वर्गों को अपने साथ जोड़कर एक महत्वपूर्ण प्रभाव छोड़ा। ये वर्ग कौन-से थे ?
    उत्तर : स्त्रियां एवं शूद्र

    ➣ बौद्ध संघ में भिक्षुणी के रूप में स्त्रियों के प्रवेश की अनुमति बुद्ध द्वारा कहां दी गयी धी?
    उत्तर : वैशाली

    ➣ बौद्ध धर्म में ‘बुल’ का संबंध बुद्ध के जीवन की किस घटना के साथ है?
    उत्तर : जन्म

    ➣ भगवान बौद्ध बुद्ध के जीवन काल के दौरान सातवीं और छठी शताब्दी ईसा पूर्व में कितनी महान शक्तियां (महाजनपद) अस्तित्व में थीं?
    उत्तर : 16

    ➣ भारत में लिखित सबसे बाद वाला बौद्ध धर्म ग्रंथ कौन-सा है?
    उत्तर : वामसाथपाकसिनी

    ➣ भगवान बुद्ध की सबसे ऊंची प्रतिमा कहां स्थापित की गयी थी?
    उत्तर : बामियान

    ➣ बुद्ध के उपदेश किससे संबंधित हैं?
    उत्तर : आचरण की शुद्धता व पवित्रता से

    ➣ बोधगया में ‘बोधि वृक्ष’ अपने वंश की किस पीढ़ी का है?
    उत्तर : चतुर्थ

    ➣ बोधगया में महाबोधि मंदिर कहां बनाया गया है?
    उत्तर : – जहां बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था

    ➣ बोधगया का प्रसिद्ध नगर किसके द्वारा बनवाया गया ?
    उत्तर : अजातशत्रु

    ➣ अशोक ने किस धर्म को अपनाया ?
    उत्तर : बौद्ध धर्म

    ➣ संसार अस्थिर और क्षणिक है’ का संबंध किससे है ?
    उत्तर : गौतम बुद्ध

    ➣ बुद्ध के जीवनकाल में ही कौन संघ का प्रमुख होना चाहता था ?
    उत्तर : देवदत्त

    ➣ आजीवक संप्रदाय किस संप्रदाय का समसायिक था?
    उत्तर : बुद्ध का समसामयिक

    ➣ बौद्धों के विश्वास के अनुसार गौतम बुद्ध का अगला अवतार किसे माना जाता है?
    उत्तर : मैत्रेय

    ➣ क्षणिकवाद’ के अनुसार, इस ब्रह्मांड में सब कुछ क्षणिक और नश्वर है, कुछ भी स्थायी नहीं है, सब कुछ परिवर्तनशील है। इस वाद का प्रतिपादन किसने किया?
    उत्तर : बुद्ध ने

  • बौद्ध धर्म | One-Liner Practice

    ❑ बुद्ध का अर्थ ज्ञान होता है।

    ❑ बौद्ध धर्म की स्थापना गौतम बुद्ध ने की थी।

    ❑ गौतम बुद्ध का जन्म नेपाल की तराई में स्थित कपिलवस्तु के लुम्बिनी ग्राम में शाक्य कुल में 563 ई. पू. में हुआ था।

    ❑ बुद्ध की माता का नाम महामाया था जो कोसल राजतंत्र (कोलिय वंश) की कन्या थीं।

    ❑ बुद्ध का पालन-पोषण मौसी प्रजापति गौतमी ने किया था।

    ❑ बुद्ध के प्रारम्भिक गुरु आलारकलाम थे तथा उसके बाद राजगीर के रुद्रकरामपुत्त से शिक्षा प्राप्त की।

    ❑ गौतम बुद्ध को बोधगया में, फल्गु नदी के किनारे पीपल वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था।

    ❑ बौद्ध धर्म ने वर्ण व्यवस्था एवं जाति व्यवस्था का विरोध किया।

    ❑ भारतीय दर्शन में तर्कशास्त्र का विकास बौद्ध धर्म के प्रभाव का परिणाम था।

    ❑ गौतम बुद्ध ने 29 वर्ष की अवस्था में गृह त्याग दिया।

    ❑ बुद्ध के गृहत्याग की घटना को महाभिनिष्क्रमण कहा गया है।

    ❑ बुद्ध सात वर्ष तक वे ज्ञान की खोज में इधर-उधर भटकने के बाद सर्वप्रथम वैशाली के समीप अलार कलाम तथा उदक रामपुत्र नामक दो गुरुओं से शिक्षा ली थी।

    ❑ अलार-कलाम सांख्य सम्प्रदाय के अनुयायी थे।

    ❑ छः वर्ष तक अथक परिश्रम एवं घोर तपस्या के बाद वैशाख पूर्णिमा की रात फल्गु, निरंजना या पुनपुन नदी के किनारे पीपल वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ को ज्ञान प्राप्त हुआ। इसी दिन से वे तथागत हो गये।

    ❑ उरुवेला से बुद्ध सारनाथ (ऋषिपत्तनम एवं मृगदाव) आये। यहाँ पर उन्होंने पांच ब्राह्मण संन्यासियों (भद्दि, वप्पा, अश्जीत (अस्सागी), महानाम तथा कौण्डिय) को अपना प्रथम उपदेश दिया जिसे बौद्ध ग्रन्थों में धर्मचक्र प्रवर्तन नाम से जाना जाता है।

    ❑ बुद्ध ने तपस्स एवं काल्पिक नामक दो शूद्रों को बौद्ध धर्म का सर्वप्रथम महात्मा बुद्ध अनुयायी बनाया।

    ❑ बुद्ध ने सर्वाधिक उपदेश श्रावस्ती में दिये।

    ❑ बौद्ध धर्म का सर्वाधिक प्रचार कोशल राज्य में हुआ।

    ❑ बुद्ध के पाँच प्रिय शिष्य अनिरुद्ध, आनन्द, उपालि, सारिपुत्र तथा मोद्गल्यायन थं।

    ❑ बुद्ध के प्रसिद्ध अनुयायी शासक बिम्बिसार, प्रसेनजित तथा उदयन थे।

    ❑ बुद्ध अपना प्रचार करते हुए वे मल्लों की राजधानी पावा पहुँचे, जहाँ वे चुंद नामक लुहार की आम्रवाटिका में ठहरे।

    ❑ उसने बुद्ध को सूकर मछव खाने को दिया, इससे उन्हें रक्तातिसार हो गया और भयानक पीड़ा उत्पन्न हुई। इस वेदना के बाद भी वे कुशीनारा (मल्ल गणराज्य की राजधानी) पहुँचे।

    ❑ कुशीनारा में 483 ई. पू. में 80 वर्ष की अवस्था में उन्होंने शरीर त्याग दिया इसे बौद्ध ग्रंथों में महापरिनिर्वाण कहा जाता है।

    ❑ बौद्ध धर्म के त्रिरत्न हैं- त्रिरत्न, धम्म, सघ।

    ❑ बौद्ध भिक्षुओं के निवास स्थान को विहार कहा जाता है और इनके पूजास्थल को चैत्य कहा गया है।

    ❑ बौद्ध दर्शन में केन्द्रीय सिद्धान्त चार आर्यसत्य एवं प्रतित्यसमुत्पाद है।

    ❑ चतुर्थ बौद्ध संगीति के बाद बौद्धधर्म दो भागों हीनयान एवं महायान में विभाजित हो गया।

    ❑ बौद्ध साहित्य के तीन पिटक हैं – 1. सूत्त पिटक (बुद्ध के धार्मिक विचार और वचनों का संग्रह) 2. विनय पिटक (बौद्ध दर्शन की विवेचना और नियम), 3. अभिधम्म पिटक (बुद्ध के दार्शनिक विचार)

    ❑ बुद्ध के जीवन के चार स्थल-1. लुम्बिनी (जन्म) 2. बोधगया (ज्ञान प्राप्ति) 3. सारनाथ (प्रथम धर्मोपदेश) 4. कुशीनारा (मृत्यु)

    ❑ बुद्ध का जन्म, ज्ञान प्राप्ति तथा महापरिनिर्वाण वैशाख पूर्णिमा को हुई।

    ❑ अपने प्रिय शिष्य आनन्द के आग्रह पर बुद्ध ने वैशाली संघ में स्त्रियों के प्रवेश को अनुमति दी। अल्पवयस्क, चोर, हत्यारे, ऋणी, राजा के सेवक, दासी तथा रोगी बौद्ध संघ में प्रवेश से वंचित थे।

    ❑ जीवक सम्प्रदाय की स्थापना मक्खलि गोशाल ने की थी। यह सम्प्रदाय बुद्ध के समकालीन था।

    ❑ बौद्ध धर्म की पवित्र दिशा दक्षिण थी।

    ❑ बौद्ध धर्म का प्रचार पालि भाषा में किया गया।

    ❑ बौद्ध ग्रंथों में संस्कृत का प्रयोग अभिधम्म पिटक से प्रारम्भ होता है।

    ❑ हीनयान के दो भाग हैं-वैभाषिक एवं सौत्रान्तिक।

    ❑ बौद्ध धर्म के अनुसार इच्छा सब कष्टों का कारण है।

    ❑ निर्वाण बौद्ध धर्म का परम लक्ष्य है, जिसका अर्थ है, दीपक का बुझ जाना अर्थात् जीवन-मरण चक्र से मुक्त हो जाना।

    ❑ मिलिंदपन्हो पुस्तक (मिलिंद के प्रश्न) 100 ई.पू. के एक बौद्ध काव्य है जिसमें भारतीय यूनानी राजा मिनेंडर प्रथम के प्रश्नों का उत्तर बौद्ध विद्वान नागसेन द्वारा किया गया है। इसमें राजा मिलिंद और नागसेन का संवाद है।

    ❑ बौद्धधर्म ने समाज के दो वर्गों को अपने साथ जोड़कर एक महत्वपूर्ण प्रभाव छोड़ा। ये वर्ग स्त्रियां एवं शूद्र थे ।

    ❑ बुद्ध को तथागत एवं शाक्यमुनि नामों से भी जाना जाता है।

    ❑ बुद्ध अनात्मवादी थे, पर पुनर्जन्म में विश्वास करते थे।

    ❑ कालान्तर में महायान सम्प्रदाय दो भागों में बंट गया – शून्यवाद (माध्यमिक) और विज्ञानवाद (योगाचार) ।

    ❑ शून्यवाद के प्रवर्तक नागार्जुन थे।

    ❑ विज्ञानवाद के प्रवर्तक मैत्रेय नाथ थे।

    ❑ बुद्ध वर्षाकाल में वेलुवन तथा जेतवन में निवास करते थे।

    ❑ महात्मा बुद्ध ने सर्वप्रथम उरुवेला में तपस्या की।

    ❑ बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग का स्रोत तैत्तिरीय उपनिषद् है।

    ❑ सूत्तपिटक को प्रारंभिक बौद्ध धर्म का इनसाइक्लोपीडिया कहा जाता है।

    ❑ बुद्ध के पूर्व जन्म की कथाएं (जातक कथाएं) सूत्तपिटक में वर्णित है।

    ❑ बुद्ध के पंचशील सिद्धांत का वर्णन छान्दोग्य उपनिषद् में मिलता है।

    ❑ तिब्बत में बौद्ध धर्म का प्रचार करने वाले बौद्ध भिक्षु पद्मसंभव थे।

    ❑ दिव्यवंदना, दोहाकोसा, वज्रवेदिका तथा वामसाथपाकसिनी में से एक भारत में उत्पन्न सबसे बाद वाला बौद्ध धर्म का ग्रंथ वामसाथपाकसिनी है।

    ❑ वज्रयान सम्प्रदाय का उदय सातवीं शताब्दी में हुआ था। यह बौद्ध धर्म में बढ़ते तन्त्र-मन्त्र के प्रभाव का परिणाम था। ये शक्ति की उपासना करते थे। इसमें तारा आदि देवियों को महत्त्व प्राप्त है।

    ❑ वज्रयान सम्प्रदाय के सिद्धांत ‘मंजुश्री मूलकल्प’ तथा ‘गुह्य समाज’ नामक ग्रन्थों में निहित है।

    ❑ अशोक, मिनाण्डर, कनिष्क, हर्षवर्द्धन ने बौद्ध धर्म के प्रसार में विशिष्ट योगदान दिया था।

    ❑ बिहार एवं बंगाल के पाल शासकों ने बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में अद्वितीय योगदान दिया था।

    ❑ नालन्दा तथा विक्रमशिला विश्वविद्यालय बौद्ध शिक्षा के प्रधान केन्द्र थे।

    ❑ करमापा लामा तिब्बत के बौद्ध संप्रदाय कंग्यूपा वर्ग से संबंधित है।

    चार बौद्ध संगीतियाँ के उद्देश्य
    प्रथम – बुद्ध के उपदेशों को दो पिटकों विनय एवं सूट में संकलित किया
    द्वितीय – अनुशासन को लेकर मतभेद के कारण बौद्ध धर्म स्थविर एवं महासंधिक में बंट गया।
    तृतीय – तीसरा पिटक अभिधम्म जोड़ा गया।
    चतुर्थ – बौद्ध धर्म का दो सम्प्रदायों हीनयान एवं महायान में विभाजन

    ❑ बुद्ध ने मध्यम मार्ग (मध्यम प्रतिपदा) का उपदेश दिया था।

    ❑ अपने अंतिम समय में बुद्ध पावा से कुशीनारा चले गये और यहीं पर सुभच्छ को अपना अंतिम उपदेश दिया।

    ❑ बुद्ध अपनी मृत्यु के उपरान्त बौद्ध संघ के नेतृत्व के लिए किसी को नामित नहीं किया था। बल्कि अपने उपदेशों (धर्म एवं विनय) को ही मार्ग दर्शन बताया।

    ❑ बुद्ध के जन्म पर कालदेव और कौण्डिन्य ने भविष्यवाणी की थी कि यह बालक चक्रवर्ती सम्राट होगा या फिर महान संन्यासी बनेगा।

    ❑ कनिष्क महायान सम्प्रदाय का महान संरक्षक था। उसने पेशावर में एक बौद्ध सभा का आयोजन किया था। यहाँ पर उसने बौद्ध शिक्षाओं को ताम्रपत्रों पर उत्कीर्ण करके एक स्तूप के नीचे गाड़ दिया था।

    ❑ चीन में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार का श्रेय कश्यप मातंग नामक एक भिक्षु को दिया जाता है।

    ❑ अनाथपिंडक और यश नामक श्रेष्ठियों द्वारा बौद्ध धर्म के प्रति अगाध श्रद्धा प्रकट की गई थी।

    ❑ आर्यमंजुश्री मूलकल्प में बौद्ध दृष्टिकोण से गुप्त-सम्राटों का वर्णन मिलता है।

    ❑ बौद्ध ग्रन्थ अंगुत्तर निकाय (सुत्त पिटक) में 16 महाजनपदों का विवरण प्राप्त होता है।

    ❑ बौद्ध ग्रन्थ सुत्तनिपात में गाय को अन्नदा, वन्नदा और सुखदा कहा गया है।

    ❑ योगाचार सम्प्रदाय का प्राचीनतम ग्रन्थ सूत्रालंकार है।

    ❑ बौद्ध तर्कशास्त्र का पर्वर्तक दिग्नाग को माना जाता है।

    ❑ मध्यकालीन न्याय शास्त्र का जनक दिग्नाग था।

    ❑ Buddhism पर सांख्य दर्शन का प्रभाव दिखाई देता है।

    ❑ तिब्बत में बौद्ध धर्म को प्रतिष्ठित करने का श्रेय पद्सम्भव को दिया जाता है।

    ❑ भारत में निर्मित स्तूपों का अवरोही कालक्रम है – साँची, भरहुत, गया, अमरावती, सारनाथ, नालंदा, अजंता, एलोरा और बाघ की गुफाएँ।

    ❑ बौद्ध शिक्षा के महत्वपूर्ण केंद्र नालंदा, विक्रमशील, उदयन्तपूरी/ओदंतपुरी थे।

    ❑ प्रथम सदी में नालंदा विहार का प्रमुख नागार्जुन था।

    ❑ ह्वेनसांग के भारत भ्रमण के दौरान नालंदा विहार का प्रमुख शीलभद्र था।

    ❑ बौद्ध विहार, विक्रमशिला वज्रयान सम्प्रदाय का प्रमुख केंद्र था।

    ❑ संस्कृत भाषा का प्राचीनतम नाटक सारिपुत्र प्रकरण है।

    ❑ बौद्ध मत में त्रिशूल निर्वाण का प्रतीक है।

    ❑ बुद्ध के पंचशील सिद्धांत का वर्णन छान्दोग्य उपनिषद् में मिलता है।

    ❑ बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग का स्रोत ग्रन्थ तैत्तरीय उपनिषद् है।

    ❑ सुत्तपिटक को प्रारम्भिक बौद्ध धर्म का इनसिक्लोपीडिया कहा जाता है।

    ❑ बौद्ध ग्रन्थों में संस्कृत का प्रयोग अभिधम्म पिटक से शुरू होता है।

    ❑ थेरवाद के महत्वपूर्ण पंथ सर्वास्तिवाद की स्थापना राहुल भद्र ने की थी।

    ❑ बौद्ध धर्म का सर्वाधिक प्रचार कोसल राज्य (बुद्ध ने यहाँ सर्वाधिक 21 वास किये थे) में हुआ था।

    ❑ पाणिनी द्वारा प्रयुक्त भण्ट्रा शब्द चमड़े की बनी धौंकनी के प्रयोग का प्रमाण मिलता है।

    ❑ सुत्तविभंग नामक बौद्ध ग्रन्थ में अपराधों की सूची व उनके प्रायश्चित का वर्णन है।

    ❑ दिव्यावदान ग्रन्थ में पुष्यमित्र शुंग को मौर्य शासक बताया गया है।

    ❑ धम्मपद को बौद्ध साहित्य को गीता कहा गया है।

    ❑ ललिताविस्तार में सिद्धार्थ बुद्ध की पत्नी का नाम गोपा बताया गया है।

    ❑ सुत निकाय में बुद्ध के धर्मोपदेश गद्य रूप में और गेय निकाय में गद्य-पद्य रूप में मिलते हैं। वेदाल्ला में बुद्ध के उपदेश प्रश्नोत्तर रूप में है।

    ❑ बिन्दुसार के समय तक्षशिला के विद्रोह को दबाने हेतु अशोक को भेजे जाने का उल्लेख अशोकावदान में है।

    ❑ धार्मिक शिक्षाओं का सबसे पुराना संग्रह सुत्त निपात माना गया है।

    ❑ अभिधम्मपिटक में मूल ग्रन्थ धम्म संगणि है।

    ❑ महाजनपदों का उल्लेख सर्वप्रथम अंगुत्तर निकाय में मिलता है।

    ❑ प्रज्ञा पारमिता नामक महायान सम्प्रदाय की पुस्तक को देवताओं का विभाग भी कहते हैं।

    ❑ वामस्थापकसिनी नामक बौद्ध ग्रन्थ में मौर्यों की उत्पत्ति का वर्णन है।

    ❑ गणराज्यों का उल्लेख आचरांग सूत्र में मिलता है।

    ❑ ओबाइय सूत्र में अजातशत्रु को महावीर का भक्त बताया गया है।

    ❑ बुद्ध की वैशाली यात्रा के विषय में महावस्तु से जानकारी प्राप्त होती है।

    ❑ पंचेन्द्रिय सुखों (पाँच इन्द्रिय सुख) को त्यागने वाले ऋषियों का उल्लेख सुत्तनिपात में मिलता है।

    ❑ बुद्ध क्षेत्र व सैनिक मामलों की महत्त्वपूर्ण जानकारी देने वाला संगमकालीन ग्रन्थ कल्लपली है।

    ❑ दिशा बतलाने वाले कौओं का उल्लेख दीघनिकाय और अंगुत्तर निकाय में है।

    ❑ वासुदेव शब्द घटजातक नामक बौद्ध ग्रन्थ में आया है।

    ❑ आजीवक सम्प्रदाय के विचार सामफल सुत्त और भगवती सूत्र में मिलते हैं।

    ❑ घोषिताराम विहार (यह एक उपवन है जिसको एक सेठ जिसका नाम घोषित था, उसने बुद्ध के निवास के लिए बनवाया था) के अवशेष कौशाम्बी से मिलते हैं।

    ❑ घोषिताराम का निर्माण करने वाला शासक वत्सराज उदयन था। इस विहार के उत्खनन से यह जानकारी मिलती है कि अग्निकांड के द्वारा यह विहार नष्ट हुआ होगा।

    ❑ पुब्बाराम विहार को विशाखा ने बनवाया था।

    ❑ वेलुवन को बिम्बिसार ने बुद्ध को दान दिया।

    ❑ प्रछन्न बौद्ध की संज्ञा शंकराचार्य को दी जाती है।

    ❑ सबसे पहले बुद्ध प्रतिमा का निर्माण मथुरा कला-शैली में हुआ।

    ❑ विसुद्धिमग्ग (Visuddhimagga) बौद्ध धर्म का लघु विश्व कोश है।

    ❑ प्रज्ञपरमिता सूत्र (Prajnaparamita) महायान बौद्ध का सर्वप्रमुख ग्रन्थ है।

    ❑ महात्मा बुद्ध की चार दृश्यों से वैराग्य की कथा महापदानसुत्त में वर्णित है।

    ❑ प्रमुख बौद्ध व्याकरणाचार्य चन्द्रगोमिनी है।

    ❑ बौद्ध विहारों की सर्वाधिक संख्या जुन्नैर नामक स्थान पर है।

    ❑ हीनयान सम्प्रदाय के साहित्य की भाषा पाली है।

    ❑ महायान सम्प्रदाय की साहित्यिक भाषा संस्कृत (चतुर्थ बौद्ध संगीति से) है।

    ❑ बौद्ध धर्म के प्रमुख संरक्षक नरेश : बिम्बिसार, अजातशत्रु, प्रसेनजित, चंड प्रद्योत, अशोक, मिनेंडर, कनिष्क, हर्षवर्धन, धर्मपाल, देवपाल आदि हैं।

    ❑ वज्रयान बुद्ध को अलौकिक दैविक सिद्धियों वाला पुरुष मानने वाला सम्प्रदाय है।

    ❑ आम्रपाली/अम्बपाली/अम्बपालिका गणिका ने आमों का अपना बगीचा बुद्ध को दान किया।