मौर्यकालीन स्रोत
| ब्राह्मण साहित्य | कौटिल्य रचित अर्थशास्त्र, अर्थशास्त्र पर भट्टस्वामी की प्रतिपदापंचिका टीका, सोमदेव कृत कथासरित्सागर, क्षेमेन्द्र की वृहत्कथामंजरी, पतंजलि का महाभाष्य,
विष्णु पुराण, विष्णु पुराण पर श्रीधरस्वामी की टीका, विशाखदत्त का मुद्राराक्षस, दसवीं शताब्दी का मुद्राराक्षस का टीकाकार ढुंढ़िराज।
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| बौद्ध साहित्य | दीपवंश, महावंश, महावंश की टीका वंसत्थपकासिनी, दिव्यावदान, महाबोधिवंश, दीर्घनिकाय।
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| जैन साहित्य | भद्रबाहु का कल्प सूत्र, हेमचन्द्र का परिशिष्टपर्व।
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| संगम साहित्य | मामूलनार रूद्रशर्मन द्वारा लिखित अहनानूर एवं कपिलर द्वारा लिखित परणार।
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| विदेशी विवरण | स्ट्रेबो, कर्टिअस, डिओडोरस, प्लिनी, एरियन, जस्टिन, प्लूटार्क, नियार्कस, ओनेसिक्रिटस, एरिस्टोब्युलस आदि यूनानी लेखकों का वर्णन।
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| पुरातत्व | महास्थान अभिलेख (बोगरा, बांग्लादेश) एवं सौहगोरा ताम्रपत्र (गोरखपुर, उत्तर प्रदेश)। सौहगोरा सम्पूर्ण मौर्य काल का एकमात्र लेख है, जो ताम्र-पत्र पर अंकित है।
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| अशोक के अभिलेख | सर्वप्रथम खोज 1750 ई. में टीफेन्थेलर ने दिल्ली-मेरठ स्तम्भ लेख के रूप में की, जबकि 1837 ई. जेम्स प्रिंसेप ने पढ़ा। |
➣ मौयों ने प्रशासन की एक विस्तृत व्यवस्था और तंत्र स्थापित किया। जिसका उल्लेख मेगस्थनीज की इंडिका और कौटिल्य के अर्थशास्त्र में मिलता है। मेगस्थनीज की इंडिका तो अब उपलब्ध नहीं है, लेकिन इसके
उद्धरण परवर्ती लेखकों की रचनाओं में उपलब्ध हैं।
➣ मेगस्थनीज एक यूनानी राजदूत था , जो सेल्यूकस द्वारा चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में भेजा गया था। यहाँ रहकर उसने पाटलिपुत्र नगर के प्रशासन के साथ-साथ पूरे मौर्य साम्राज्य के बारे में लिखा।
➣ मेगस्थनीज की इंडिका नामक पुस्तक ने मौर्य के प्रशासन, समाज और अर्थव्यवस्था पर महत्वपूर्ण प्रकाश डाला है।
➣ कौटिल्य के अर्थशास्त्र को मेगस्थनीज के लेखन का पूरक माना जाता है। इन दोनों स्रोतों से हमें चन्द्रगुप्त मौर्य की प्रशासनिक व्यवस्था की जानकारी मिलती है।
प्रशासनिक व्यवस्था
➣ मौर्यकालीन प्रशासन लोक-कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पर आधारित था। सत्ता का केन्द्रीकरण राजा में होते हुए भी वह निरंकुश नहीं होता था।
➣ मौर्य प्रशासन पूर्णतः एक केन्द्रीयकृत नौकरशाही प्रशासन तंत्र था। जो एक सचिवालय द्वारा संचालित होता था। अशोक ने इस केन्द्रीकृत शासन व्यवस्था को पितृवत निरंकुश राजतंत्र शासन व्यवस्था में परिवर्तित कर दिया।
प्राचीन भारत में सबसे विस्तृत नौकरशाही मौर्यकाल में थी।
➣ सम्राट सभी प्रकार की सत्ता का स्रोत एवं उसका केन्द्र बिन्दु होता था। राजतंत्रीय व्यवस्था सम्राट मौर्य प्रशासन का सर्वोच्च अधिकारी था। वह प्रशासन, विधि एवं न्याय का प्रमुख स्रोत तथा सर्वोच्च न्यायाधीश होता था।
➣ सम्राट अपने शासन कार्यों में अमात्यों, मंत्रियों तथा अधिकारियों से सहायता प्राप्त करता था। अर्थशास्त्र के अनुसार, अमात्य का स्थान सम्राट के बाद दूसरा था।
➣ अर्थशास्त्र के अनुसार, शासन की सुविधा के लिए अनेक प्रशासनिक विभाग बनाये गये थे, जिनकी संख्या 18 थी। जिन्हे तीर्थ या महामात्र अथवा महामात्य कहा गया है। ये निम्नलिखित हैं
| 1. मंत्री एवं पुरोहित | प्रधानमंत्री
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| 2. समाहर्ता | राजस्व की वसूली करनेवाला
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| 3. सन्निधाता | कोषाध्यक्ष
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| 4. सेनापति | युद्ध विभाग का अधिकारी
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| 5. युवराज | उत्तराधिकारी
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| 6. प्रदेष्टा | फौजदारी न्यायालय का न्यायाधीश
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| 7. नायक | सेना का संचालक
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| 8. कान्तिक | उद्योग-धंधों का प्रधान निरीक्षक
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| 9. व्यावहारिक | दीवानी न्यायालय का न्यायाधीश
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| 10. मंत्रिपरिषदाध्यक्ष | मंत्रिपरिषद का प्रमुख (सचिव)
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| 11. दंडपाल | सैन्य सामग्री का प्रबंधकर्ता
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| 12. अंतपाल | सीमावर्ती दुर्गों का रक्षक
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| 13. दुर्गपाल | किलों का प्रबंधक
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| 14. प्रशस्ता | राजकीय कागजातों को सुरक्षित रखने वाला तथा राजकीय आजाओं को लिपिबद्ध करने वाला
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| 15. नागरक | नगर का प्रमुख अधिकारी
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| 16. दौवारिक | राजमहल की देख-रेख करने वाला प्रधान अधिकारी
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| 17. आन्तर्वशिक | राजा की अंगरक्षक सेना का प्रधान
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| 18. आटविक | वन विभाग का प्रधान। |
➣ ये मौर्य-नौकरशाही अथवा प्रशासनिक विभाग एक पिरामिड के समान होती थी। जिसमे सबसे शीर्ष पर मंत्री और उनके नीचे अन्य कर्मचारी थे।
➣ मंत्रियों की नियुक्ति हेतु इनके चरित्र को जाँचा-परखा जाता था, जिसे उपधा परीक्षण कहते थे।
➣ कौटिल्य ने राज्य के सप्तांग सिद्धान्त के सात अंग निर्दिष्ट किये हैं-
| 1. सम्राट | सिर
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| 2. अमात्य | आँख
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| 3. जनपद(क्षेत्र तथा जनसंख्या) | जंघा
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| 4. दुर्ग | बांह
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| 5. कोष/धन | मुख
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| 6. बल (सेना) | मस्तिष्क
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| 7. मित्र | कान |
➣ राजा को इन सभी सात अंगों की आत्मा बताया गया है।
➣ अर्थशास्त्र पहली पुस्तक है, जिसमें कर्मचारियों के नकद वेतन का सुझाव दिया गया है। युवराज, प्रधानमंत्री एवं सेनापति का वेतन 48000 पण वार्षिक था।
➣ मंत्रिपरिषद् के सदस्यों को 12,000 पण वार्षिक मिलते थे, जबकि मन्त्रिणः के सदस्यों को 48,000 पण वार्षिक वेतन मिला था। सेवकों एवं अंगरक्षकों को केवल 60 पण वेतन मिलता था। न्यूनतम वेतन 60 पण वार्षिक था।
➣ राज्यशास्त्र के सिद्धांतों के अनुसार राजा सिर्फ धर्म (कानून) का पालन ने वाला (धर्मप्रवर्तक) होता था, कानून का निर्माता नहीं। परंतु कौटिल्य राजा को कानून निर्माण-संबंधी अधिकार भी देता है।
साम्राज्य संरचना
➣ चंद्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य उत्तर पश्चिम में ईरान (फारस) से लेकर पूर्व में बंगाल तक तथा उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में उत्तरी कर्नाटक (मैसूर) तक फैल हुआ था।
प्रांतीय शासन
➣ सम्पूर्ण मौर्य साम्राज्य कई प्रान्तों में विभाजित किया गया था और इनमें से प्रत्येक प्रान्त एक राजकुमार के अधीन रखा गया था, जो शाही राजवंश के वंशज थे।
➣ मौर्यशासन की स्तरीय खण्ड निम्नलिखित रूप में था-
प्रान्त
प्रमुख अधिकारी कुमार या आर्यपुत्र
↓
मण्डल (कमिश्नरी)
प्रमुख अधिकारी प्रदेष्टा या प्रादेशिक
↓
आहार या विषय (जिला)
प्रमुख अधिकारी विषयपति या स्थानिक
↓
स्थानीय
(800 ग्रामों का समूह)
↓
द्रोणमुख
(400 ग्रामों का समूह)
↓
खार्वटिक
(200 ग्रामों का समूह)
↓
संग्रहण
(10 ग्रामों का समूह)
प्रमुख अधिकारी गोप
↓
ग्राम
प्रमुख अधिकारी ग्रामणी
➣ चन्द्रगुप्त मौर्य ने शासन की सुविधा हेतु अपने विशाल साम्राज्य को चार प्रान्तों में विभाजित किया। इन प्रान्तों को चक्र कहा जाता था।
➣ इन प्रान्तों का शासन सीधे सम्राट द्वारा नियंत्रित न होकर उसके प्रतिनिधि द्वारा संचालित होता था।
➣ आशोक के समय में प्रान्तों की संख्या चार से बढ़कर पाँच हो गई। पाँचवा प्रांत कलिंग था। जिसकी राजधानी तोसली थी। इन प्रान्तों का विवरण निम्नलिखित है-
| 1. उत्तरी प्रांत (उत्तरापथाउदीच्य) | उत्तरापथ ( तक्षशिला )
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| 2. पश्चिमी प्रांत (अतिपथ) | अवंति (उज्जयिनी)
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| 3. पूर्वी प्रांत (प्राच्यपथ) | कलिंग (तोसली)
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| 4. दक्षिणी प्रांत (दक्षिणापथ) | दक्षिणापथ ( सुवर्णगिरि
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| 5. केन्द्रीय प्रांत (मगध) | प्राची (पाटलिपुत्र) |
➣ प्रान्तों का शासन राजवंशीय कुमार या आर्यपुत्र नामक पदाधिकारियों द्वारा होता था। अशोक सिंहासनारूढ़ होने से पूर्व उत्तरापथ एवं अवन्ति का कुमार रह चुका था।
➣ कुमारमात्या की सहायता हेतु प्रत्येक प्रान्त में महामाया नामक अधिकारी होते थे। इनके अन्तर्गत विभिन्न विषयक पदों पर सामन्त अथवा विषयपति होते थे।
➣ प्रान्तों का विभाजन मण्डल में हुआ था। मण्डल का प्रमुख प्रादेशिक था, जिसे अर्थशास्त्र का प्रदेष्टा कहा गया है।
➣ प्रादेशिक समाहर्ता के अधीन कार्य करता था एवं स्थानिक एवं गोप के कार्यों की जाँच करता था।
जिला प्रशासन
➣ जिले को विषय/आहार कहा जाता था। इसका प्रमुख विषयपति होता था, जिसे मेगस्थनीज ने एग्रोनोमोई कहा है। जिले में ही युक्त, राजुक एवं प्रादेशिक अधिकारी होते थे।
➣ अशोक ने युक्त नामक अधिकारियों की नियुक्ति की। ये केन्द्र तथा स्थानीय शासन के बीच की संपर्क कड़ी थे। युक्त धन का अपहरण करते थे।
नगर प्रशासन
➣ मौर्य काल के नगरों की काफी बड़ी संख्या थी। पाटलिपुत्र, कौशाम्बी, उज्जैन और तक्षशिला उनमे सबसे महत्त्वपूर्ण नगर थे। इसमें पाटलिपुत्र प्रमुख राजधानी थी।
➣ नगर के प्रशासन के लिए छह समितियाँ थीं, जिनमें से प्रत्येक में 5-5 सदस्य होते थे।
➣ समितियों को स्वच्छता, विदेशियों की देखभाल, जन्म और मृत्यु के पंजीकरण, वजन और मापन के विनियमन और इसी तरह के अन्य कार्य दिए गए थे।
| शिल्पकला समिति | उद्योगों व कारीगरों पर नियंत्रण
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| वैदेशिक समिति | विदेशियों पर नियंत्रण
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| जनसंख्या समिति | जन्म-मरण का पंजीकरण
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| वाणिज्य समिति | व्यापार व वाणिज्य पर नियंत्रण
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| वस्तुनिरिक्षक समिति | वजन और मापन के विनियमन पर नियंत्रण
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| कर समिति | बिक्री कर व चुंगी वसूल करना
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➣ मेगस्थनीज नगर अधिकारी को ऐस्टोनोमोई कहता है। एग्रोनोमोई नामक अधिकारी जिले में सड़क एवं भवन निर्माण का काम देखता था।
सैन्य व्यवस्था
➣ चंद्रगुप्त ने सैन्य संग्रह के सभी साधनों का उपयोग किया और एक मिली-जुली सेना तैयार की जिसमें मुद्रारक्षस नाटक के अनुसार शक, यवन, किरात, कंबोज, पारसीक, वाह्निक आदि विविध जातियों के सैनिक सम्मिलित थे।
➣ कौटिल्य ने चारों वर्गों के लोगों को सेना में भर्ती होने का उल्लेख है। कौटिल्य के अनुसार सेना चतुरंगिणी (पैदल , घोडा , हाथी और रथ ) थी।
➣ मेगस्थनीज की इण्डिका के अनुसार, चंद्रगुप्त मौर्य के पास 6 लाख पैदल, 50 हज़ार अश्वारोही, 9 हज़ार हाथी तथा 800 रथों से सुसज्जित विराट सेना थी।
जस्टिन चंद्रगुप्त की सेना को डाकुओं का गिरोह कहता है।
➣ कौटिल्य ने सेना को तीन श्रेणियों में विभाजित किया-
- पुश्तैनी सेना
- भाटक सेना
- नगरपालिका सेना
➣ राजा की स्थायी सेना मौलबल कहलाती थी। सैनिक छावनियों को गुल्म एवं सैनिकों के वेतन को गुल्मदेय कहा जाता था।
➣ चंद्रगुप्त मौर्य के प्रशासन की सबसे बड़ी विशेषता उसकी विशाल सेना का रख-रखाव था। प्रशासन की तरफ से सेना का उचित प्रबंधन किया गया था।
➣ मेगस्थनीज के अनुसार सशस्त्र बलों का प्रशासन 30 अधिकारियों के एक बोर्ड, जो 6 समितियों में विभाजित था-
| प्रथम | नौसेना निरीक्षक,
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| दूसरा | युद्ध सामग्री (सेना रसद) निरीक्षक,
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| तीसरा | अश्वारोही निरीक्षक,
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| चौथा | पैदल सैनिक,
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| पांचवां | रथ तथा
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| छठा | हाथी सेना |
➣ अन्तपाल नामक अधिकारी सेना का प्रशासन देखता था। इसके अतिरिक्त वह सीमान्त क्षेत्रों में स्थित दुर्गों की देखभाल भी करता था।
➣ नायक युद्धक्षेत्र में सेना का नेतृत्व करता था। इसे 12000 पण वार्षिक वेतन मिलता था।
➣ कौटिल्य के अर्थशास्त्र में नवाध्यक्ष के उल्लेख से मौर्यों के पास नौसेना प्रकार की सेना होने का प्रमाण भी मिलता है।
➣ सर्वप्रथम ग्रुनवेडेल ने यह बताया कि मौर्यों का वंश चिह्न मोर था ।
गुप्तचर विभाग
➣ मौर्य शासन में सपूर्ण प्रशासन एवं अधिकारियों पर नजर रखने के लिए एक गुप्तचर विभाग स्थापित किया गया था।
➣ अर्थशास्त्र में गुप्तचर व्यवस्था पर विस्तृत एवं महत्वपूर्ण सूचना मिलती है। इसका संचालन गूढ़पूरुष (जासूस) करते थे। ये गूढपूरुष महामात्यपसर्प के नियंत्रण में कार्य करते थे।
➣ अर्थशास्त्र में गुप्तचरों को गूढ़ पुरुष कहा गया है। दो प्रकार के गुप्तचर होते थे-
➣ गुप्तचर दो प्रकार के होते थे- प्रथम संस्था जो एक ही स्थान पर रहते थे तथा द्वितीय संचरा जो भ्रमण करते रहते थे।
संस्था गुप्तचर-
| 1. कापटिक | दूसरे के रहस्यों को जानने वाला, विद्यार्थी के वेश में रहने वाला गुप्तचर ।
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| 2. उदास्थित | संन्यायी वेशधारी गुप्तचर ।
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| 3. गृहपतिक | गरीब किसान के वेश में रहने वाला गुप्तचर ।
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| 4. वैदेहक | गरीब व्यापारी के वेश में रहने वाला गुप्तचर
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| 5. तापस | सिर मुंडाये या जटा धारण किये तपस्वी के वेश में गुप्तचर । |
संचारा गुप्तचर-
| सत्री | समुद्री विद्या, ज्योतिष, व्याकरण, इन्द्रजाल, वशीकरण तथा नाचने- गाने की कला में निपुण गुप्तचर ।
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| तीक्ष्ण | धन के लिये प्राणों की भी परवाह न कर हर तरह के खतरे में कार्य करने वाला गुप्तचर
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| सरद | अपने बन्धुओं से भी स्नेह न रखने वाला, क्रूर तथा प्रकृति से आलसी गुप्तचर।
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| परिव्राजिका (वृषली, भिक्षुकी) | संन्यासिनी के वेश में गुप्तचर कार्य करने वाली स्त्री |
➣ नर गुप्तचरों को सन्ती, तिष्णा तथा सरद कहा जाता था, जबकि स्त्री गुप्तचरों को वृषली, भिक्षुकी तथा परिव्राजक के नाम से जाना जाता था।
➣ मेगस्थनीज एवं डियोडोरस ने गुप्तचरों को ओवरसियर्स (एपिस्कोपई) तथा स्ट्रेबो एवं एरियन ने इंसपेक्टर (एफोरोई) कहा है। विदेशों में नियुक्त होने गुप्तचरों को उभयवेतन कहते थे।
➣ गुप्तचर विभाग में संन्यासी, विद्यार्थी, गृहस्थ एवं विषकन्याओं की नियुक्ति की जाती थी। नियुक्ति उपधा परीक्षण नामक परीक्षा के माध्यम से होती थी।
न्याय व्यवस्था
➣ मौर्य न्याय व्यवस्था कठोर थी। मौर्य सम्राट सर्वोच्च तथा अन्तिम न्यायालय एवं न्यायाधीश था। न्याय का उद्देश्य सुधारवादी न होकर आदर्शवादी था।
➣ चाणक्य के अनुसार मौर्य न्याय व्यवस्था के चार प्रमुख अंग थे-
- धर्म
- व्यवहार (समकालीन विधि संहिताएँ)
- चरित्र (रीति-रिवाज)
- राजशासन / राजाज्ञा
➣ न्याय व्यवस्था के ये चार प्रमुख स्त्रोत थे, जिन्हें चतुष्पाद कानून कहा गया। इन चारों में कौटिल्य ने राजशासन को सर्वश्रेष्ठ एवं सर्वोच्च माना है।
➣ ग्राम सभा सबसे छोटी न्यायालय थी, जहाँ ग्रामणी तथा ग्रामवृद्ध अपना निर्णय देते थे। इसके ऊपर क्रमशः संग्रहण, द्रोणमुक, स्थानीय एवं जनपद के न्यायालय थे।
➣ अर्थशास्त्र में दो प्रकार के न्यायालय का वर्णन है-
- धर्मस्थीय न्यायालय (दीवानी न्यायालय)
- कंटकशोधन न्यायालय (फौजदारी न्यायालय)
धर्मस्थीय न्यायालय
➣ इस वर्ग के न्यायालय नागरिकों के पारस्परिक विवादों को निपटारा करते थे। इन्हें दीवानी अदालत (न्यायालय) कहा जाता था ।
➣ चोरी, डाके व लूट के मामले, जिन्हें साहस कहा जाता था, धर्मस्थीय न्यायालय में पेश होते थे।
➣ कुबचन, मान-हानि, मार-पीट सम्बन्धी मामले भी धर्मस्थीय न्यायालय में लाये जाते थे, जिन्हें वाक पारुष्य या दण्डपारुष्य कहा जाता था।
कंटकशोधन न्यायालय
➣ राज्य तथा नागरिकों के मध्य होने वाले विवाद का निर्णय करने वाले न्यायालय को कंटकशोधन न्यायालय कहा जाता था। ये फौजदारी अदालतें थीं।
➣ मौर्य शासन के दौरान शांति व्यवस्था स्थापित करने के लिए पुलिस होती थी। इन्हें रक्षिन कहा जाता था।
➣ नगर न्यायाधीश को व्यावहारिक महामात्र तथा जनपद न्यायाधीश को राज्जुक कहते थे।
मौर्य काल में ब्राहम्णो को जल में डुबोकर मृत्यु दंड दिया जाता था।
मौर्यकालीन समाज
➣ कौटिल्य के अनुसार वर्णव्यवस्था ही सामाजिक संगठन का आधार है। अतः प्रत्येक वर्ण की स्थिति व उनके कर्तव्यों का विवरण अर्थशास्त्र में दिया गया है। वर्णव्यवस्था की रक्षा करना राजा का प्रमुख कर्तव्य बताया गया है।
➣ अर्थशास्त्र में शूद्रों को मलेच्छों से पृथक माना है तथा उन्हें आर्य शूद्र कहा है। अर्थशास्त्र में शूद्रों को कृषक कहा गया है।
➣ अर्थशास्त्र के मुताबिक वर्णाश्रम व्यवस्था के तहत सभी चार वर्णो के लोगों को सेना में भर्ती करने का उल्लेख मिलता है।
➣ मेगस्थनीज के अनुसार अपराध करने वाले ब्राह्मण को यातना नहीं दी जाती थी। ब्राह्मणों को छोड़कर कोई भी न तो अन्तर्जातीय विवाह और नहीं दूसरों का पेशा (व्यवसाय) ही अपना सकता था।
➣ मेगस्थनीज ने भारतीय समाज को सात वर्गों– दार्शनिक (ब्राह्मण), कृषक (किसान, शूद्र एवं वैश्य), सैनिक (क्षत्रिय), पशुपालक (चरवाहा), शिल्पकार (दस्तकार), मजिस्ट्रेट (न्यायाधीश) और मंत्री/सलाहकार/पार्षद में विभाजित किया।
➣ ब्राह्मण समाज की शिक्षा एवं संस्कृति के संरक्षक थे, जिन्हें कर से मुक्त रखा जाता था। अपराध करने पर उन्हें यातना के बजाय माथे पर एक चिह्न दागा जबकि मृत्यु दंड में जल में डुबोकर मृत्यु दी जाती थी।
➣ मेगस्थनीज के अनुसार दार्शनिक दो प्रकार के होते थे- 1. ब्रोकामेन (गृहस्थ) 2. सारामेन (संन्यासी)
➣ मेगस्थनीज ने दार्शनिक मण्डलिक एवं सिकन्दर के बीच वार्तालाप का विवरण दिया है।
➣ मेगस्थनीज के अनुसार भारतीय यूनानी देवता डायोनिसियस (शिव) तथा हेराक्लीज (कृष्ण) की पूजा करते थे।
➣ अर्थशास्त्र में कृषि, पशुपालन तथा वाणिज्य को शूद्रों का धर्म बताया है। शूद्रों को सेना में भर्ती होने का अधिकार भी था।
➣ मौर्य काल में कृषकों की संख्या सर्वाधिक थी। दूसरे स्थान क्षत्रिय या योद्धा वर्ण था।
➣ संयुक्त परिवार की प्रथा ज्यादातर प्रचलित थी। अधिकांश विवाह एकात्मक का ही होते थे, यद्यपि बहु-विवाह के भी उदाहरण मिलते हैं।
➣ मेगस्थनीज ने अपनी पुस्तकों में बहुपत्नी प्रथा, विधवा पुनर्विवाह एवं विवाह विच्छेद (तलाक) का उल्लेख किया है।
➣ अर्थशास्त्र में 8 प्रकार के विवाहों (1.ब्रह्म, 2.दैव, 3.आर्य, 4.प्रजापत्य, 5.असुर, 6.गांधर्व, 7.राक्षस, 8.पैशाच) का उल्लेख किया गया है।
➣ अनुलोम व प्रतिलोम विवाह भी विशेष परिस्थितियों में उचित थे। नियोग का भी प्रचलन था।
➣ अर्थशास्त्र में सती प्रथा का उल्लेख नहीं मिलता है। हालाँकि यूनानी लेखक भारत के उत्तर-पश्चिम में योद्धाओं की पत्नियों के सती होने का में उल्लेख करते हैं।
सती प्रथा का पहला अभिलेखीय प्रमाण 510 ई. में गुप्त काल के ऐरण अभिलेख में मिलता है।
स्त्रियों की दशा
➣ मौर्यकालीन समाज में स्त्रियों की स्थिति स्मृति काल की अपेक्षा अधिक सुरक्षित थी। उन्हें विवाह विच्छेद की अनुमति थी, जिसे अर्थशास्त्र में मोक्ष कहा गया है। उन्हें पुनर्विवाह एवं नियोग की अनुमति भी थी।
➣ उच्च वर्ग की स्त्रियाँ, जो घरों के अन्दर रहती थी, उन्हें कौटिल्य ने अनिष्कासिनी एवं सूर्य को न देखने वाली स्त्रियों को असूर्यपश्या कहा है
➣ मौर्यकालीन समाज में विधवा विवाह प्रचलित था। कुछ विधवाएँ स्वतंत्र रूप से जीवन यापन करती थीं, जिन्हें छंदवासिनी कहा जाता था।
➣ समाज में वेश्यावृति की प्रथा प्रचलित थी तथा उसे राजकीय संरक्षण भी प्राप्त था। स्वतंत्र रूप से वेश्यावृति करने वाली स्त्रियाँ रूपाजीवा कहलाती थीं। इनके कार्यों का निरीक्षण गणिकाध्यक्ष करता था।
➣ पुरुष गायक एवं नर्तक कलाकारों को रंगोपजीवी तथा ऐसी महिलाओं को रंगोपजीवनी कहा जाता था।
➣ मौर्य काल में महिलाओं को महल के रक्षकों, राजा के अंगरक्षकों तथा जासूसों के रूप में नियुक्त करने का उल्लेख मिलता है।
➣ इसके अलावा स्त्री दासों के रूप में धातृ, उपचारिका व परिचारिका का उल्लेख कौटिल्य ने किया है। स्त्री दासों की एक श्रेणी बंधकों भी थी।
दास प्रथा
➣ मेगस्थनीज तथा स्ट्रैबो के अनुसार भारत में दास प्रथा नहीं थी, जबकि मौर्यकालीन अर्थव्यवस्था में दासों का महत्त्वपूर्ण योगदान था।
➣ मेगस्थनीज दास प्रथा को इसलिये नहीं देख पाया, क्योंकि दासों की स्थिति सन्तोषजनक थी। उनके साथ दयापूर्ण व्यवहार होता था तथा उन्हें संपत्ति रखने तथा बेचने का अधिकार भी था।
➣ इसके विपरीत यूरोप में दासों की स्थिति बेहद ही दयनीय थी। अशोक ने अपने अभिलेखों में दासों को उचित सम्मान व व्यवहार करने का निर्देश दिया था।
➣ त्रिपिटक में चार प्रकार तथा कौटिल्य ने नौ प्रकार के दासों का उल्लेख किया है। अशोक के शिलालेखों में दास और कर्मकार का उल्लेख मिलता है।
➣ कौटिल्य 9 प्रकार के दास हैं-
| 1. ध्वजाहृत | युद्ध में जीता हुआ दास
|
| 2. उदर दास | पेट का दास
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| 3. गृहजात | घर में दासी द्वारा उत्पन्न दास
|
| 4. दायागत | पैतृक सम्पत्ति के रूप में प्राप्त दास
|
| 5. लब्ध | दान में प्राप्त हुआ दास
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| 6. क्रीत | क्रय किया हुआ दास
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| 7. आत्मविक्रयी | स्वयं को बेचने वाला दास
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| 8. अहितक | ऋण के बदले धरोहर के रूप में रखा गया दास
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| 9. दंडप्रणीत | दण्ड के परिणाम स्वरूप बनाया गया दास |
➣ कौटिल्य के अनुसार केवल अनार्य (म्लेच्छ, युद्धबन्दी ) को ही दास बनाया जा सकता है।
➣ कौटिल्य के अनुसार किसी भी परिस्थिति में आर्य (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्व एवं शूद्र) दास नहीं बनाया जा सकता।
➣ कौटिल्य के अर्थशास्त्र से बड़े पैमाने पर दासों को कृषि कार्यों में लगाए जाने वर्णन मिलता है। ये दास सम्भवत कैदी के रूप में कलिंग से लाये गए थे।
राजस्व स्रोत
➣ राज्य में आय का प्रमुख स्रोत भूमिकर था। यह मुख्यतः उपज का 1/6 भाग होता था। भूमिकर दो प्रकार का होता था- 1. सेतु कर, 2. वन कर
➣ इसके अतिरिक्त सिंचाई की सुविधाओं से युक्त भूमि पर उपज का 1/5 से 1/3 भाग तक अतिरिक्त भूमि कर लिया जाता था।
➣ अशोक के रुम्मिनदेई अभिलेख के अनुसार, लुबिनी ग्राम से उत्पादन का मात्र 8वां भाग ही कर के रूप में लिया जाता था।
➣ बिक्री के लिए नगर में लाई गई वस्तुओं पर कर लगाए जाते थे और नगरों के प्रवेश द्वार पर भी वसूली की जाती थी। इसके अलावा, राज्य को खनन, शराब की बिक्री, हथियारों के निर्माण आदि में एकाधिकार प्राप्त था।
➣ विभिन्न कर निम्न प्रकार थे-
| सीता | राजकीय एवं वन्य भूमि से आय पर कर
|
| सेतुबन्ध | राज्य की ओर से सिंचाई के प्रबन्ध हेतु कर।
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| वर्तनी | सड़क कर।
|
| तरदेय | पुल पार करने पर।
|
| भाग | किसानों की भूमि से लिया जाने वाला भूमिकर।
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| बलि | भाग के अतिरिक्त अन्य कर (धार्मिक कर)।
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| प्रणय | संकटकालीन अवस्था में राजा द्वारा वसूला जाने वाला कर।
|
| पिण्डकर | राजा द्वारा पूरे गांव से वर्ष में एक बार वसूला जाने वाला कर।
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| सेनाभक्तकर | सेना के प्रयाण के समय प्रजा से तेल और चावल के रूप में लिया जाने वाला योगदान।
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| औपायनिक | विशेष अवसरों पर राजा को दी जाने वाली भेंट।
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| पार्श्व | अधिक लाभ होने पर व्यापारियों से लिया जाने वाला कर।
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| कौष्ठेयक | सरकारी जलाशयों के नीचे की भूमि पर लगाया जाने वाला कर।
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| परिहीनक | सरकारी भूमि पर पशुओं द्वारा की गयी हानि के बदले में लिया जाने वाला हर्जाना।
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| रज्जु | भूमि की नाप के समय लिया जाने वाला कर।
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| बिवीत | पशुओं की रक्षा के लिए लिया जाने वाला शुल्क।
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| सेतु | फल-फूल पर लिया जाने वाला कर।
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| ध्रुवाधिकरण | भूमिकर संग्रहकर्ता को ध्रुवाधिकरण कहा जाता था। |
➣ ब्राह्मणों को राज्य से करमुक्त भूमि दान में मिलती थी। अर्थशास्त्र में ऐसी भूमि को ब्रह्मदेय कहा गया है।
अर्थव्यवस्था
➣ राज्य की अर्थ-व्यवस्था कृषि, पशुपालन और वाणिज्य या व्यापार पर आधारित थी। जिन्हें सम्मिलित रूप से वार्ता कहा गया है।
वार्ता = कृषि + पशुपालन + वाणिज्य या व्यापार
➣ कौटिल्य ने सर्वप्रथम वार्ता को शूद्र वर्ण की सामान्य वृत्ति माना।
कृषि
➣ मौर्य काल मुख्यतः कृषि प्रधान था। भूमि पर राज्य तथा कृषक का अधिकार होता था।
➣ राजकीय भूमि की व्यवस्था करने वाला प्रधान अधिकारी सीताध्यक्ष कहलाता था। अर्थशास्त्र में हल से जोतकर उत्पन्न किये गये पदार्थ को सीता कहा गया है।
➣ अर्थशास्त्र के अनुसार दासों को कृषि कार्य में लगाया जाता था। यह एक महत्वपूर्ण सामाजिक परिवर्तन था।
➣ कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में दस प्रकार की भूमियों का वर्णन किया है। इनमें कुछ भूमि इस प्रकार हैं-
| 1. अदेवमातृक | वह भूमि, जिसमें बिना वर्षा के (कृत्रिम साधनों से) भी अच्छी खेती हो सके।
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| 2. देवमातृक | सिर्फ वषां द्वारा खेती पर निर्भर भूमि।
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| 3. कृष्ट | जुती हुई भूमि।
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| 4. अकृष्ट | बिना जुती हुई भूमि।
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| 5.स्थल | ऊँची भूमि। |
➣ अदेवमातृक मुख्य कृषि भूमि होती थी जिसमे बिना वर्षा के भी अच्छी खेती होती थी। निजी खेती करने पर राजा को उपज का 1/6 भाग दिया जाता था।
➣ अर्थशास्त्र में धान को सर्वोत्तम जबकि गन्ने को निम्नतम फसल कहा गया है। अर्थशास्त्र से 1 ही वर्ष में 3 प्रकार के फसलों के बोये जाने का वर्णन मिलता है –
| हैमन | रबी फसल
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| गृष्मिक | खरीफ फसल
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| केदा | जायफ फसल |
➣ कौटिल्य ने ईंख (गन्ने) की खेती को अधम कहा है। वार्ता शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख गौतम ने किया।
➣ सिंचाई पर विशेष ध्यान दिया जाता था। प्राकृतिक स्रोतों से सिंचाई सहोदय सेतु एवं कृत्रिम उपायों से सिंचाई आहार्योदक सेतु कहलाती थी।
➣ अर्थशास्त्र में आय के सात साधनों (दुर्ग, राष्ट्र, खनिज, सेतु, वन, ब्रज, वणिक पथ) को राज्य का आय रूपी शरीर कहा है।
➣ कृषक उपज का 1 /6 से लेकर 1 /4 भाग तक भूमिकर राज्य को देते थे।
➣ कर मुक्त गाँवों को परिहारिका कहा जाता था। जो गाँव सैनिक आपूर्ति करते थे, उन्हें आयुधिका तथा जो गाँव कच्चे माल की आपूर्ति करते थे, उन्हें कुप्य कहा जाता था।
➣ अशोक के रूम्मिनदेई अभिलेख में केवल दो करों का उल्लेख मिलता है- बलि और भाग। अर्थशास्त्र में कुल 21 प्रकार के करों का उल्लेख है।
➣ निजी भूमि से प्राप्त आय भाग कहलाती थी एवं राजकीय भूमि से प्राप्त आय सीता कहलाती थी।
➣ अर्थशास्त्र में प्रणय कर (1/3 से 1/4) का उल्लेख है। यह एक आपातकालीन कर था।
➣ मेगस्थनीज के अनुसार भारत में अकाल नहीं पड़ता, जबकि अर्थशास्त्र के अनुसार भारत में अकाल पड़ते थे। अर्थशास्त्र में अकाल के समय राजा द्वारा जनता की भलाई के उपायों का वर्णन है।
➣ अर्थशास्त्र में वनों के प्रकारों का भी वर्णन मिलता है , जिसमे मृगवन पालतू पशुओं के लिए, द्रव्यवन उपयोगी खानो व लकड़ी के लिए जबकि हस्तिवन हाथियों के लिए होता था। कुप्याध्यक्ष वन सम्पदा की देखभाल करता था।
वाणिज्य या व्यापार
➣ मौर्य काल में व्यापार (आंतरिक एवं बाह्य), जल एवं स्थल दोनों मार्गों से होता था। मौर्य काल में पूर्वी तट पर ताम्रलिप्ति और पश्चिमी तट पर भृगुकच्छ तथा सोपारा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बन्दरगाह थे।
➣ इस समय भारत का बाह्य व्यापार रोम, सीरिया, फारस, मिग्र तथा अन्य पश्चिमी देशों के साथ होता था। यह व्यापार पश्चिमी भारत में भृगुकच्छ बंदरगाह से तथा पूर्वी भारत में ताम्रलिप्ति के बंदरगाहों द्वारा किया जाता था।
➣ आंतरिक व्यापार के प्रमुख केंद्र थे। तक्षशिला, काशी, उज्जैन, कौशांबी तथा तोसली (कलिंग राज्य की राजधानी) आदि।
➣ भारत विदेश में हाथीदांत, मोती, कछुए, सीपिया, रंग, नील एवं वस्त्र निर्यात करता था, जबकि सोना, कीमती वस्त्र, मीठी शराब आयात करता था।
| चीनीपट्ट | चीन से आने वाला रेशम
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| पत्रोम | पेड़ के पत्तों या रेशों से बनाये गये वस्त्र
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| दुकुल | श्वेत एवं चिकना वस्त्र (पेड़ की छाल से)
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| क्षौम | एक प्रकार का रेशमी वस्त्र
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| कौसेय | कौटिल्य द्वारा वर्णित एक प्रकार का वस्त्र |
➣ व्यापारिक जहाजों का निर्माण इस काल का प्रमुख उद्योग था। स्टैबो ने लिखा है कि मौर्यकाल में जलयान निर्माण पर राज्य का एकाधिकार था।
➣ अन्तर्देशीय व्यापार गाड़ियों तथा सार्थवाहों के माध्यम से किया जाता था।
➣ अर्थशास्त्र के अनुसार काशी, बंग, पुण्डू, कलिंग, मालवा सूती वस्त्रों के लिए प्रसिद्ध थे। काशी और पुण्डू में रेशमी कपड़े भी बनते थे। प्राचीन काल में बंग का मलमल विश्वविख्यात था।
➣ कौटिल्य ने चीनी पट्ट का भी उल्लेख किया, जिससे पता चलात है कि रेशम चीन से आता था।
➣ अन्य वस्त्रों में दुकूल (स्वेत एवं चिकना वस्त्र) क्षौम (एक प्रकार का रेशमी वस्त्र) का भी उल्लेख मिलता है। बढ़ई गिरी भी एक प्रमुख उद्योग था।
➣ मिस्र से भारत आने वाली वस्तुओं का विनिमय अरब सागर के तटवर्ती बन्दरगाहों पर होता था। भारत से मित्र को हाथीदाँत, कछुए, सीपियाँ, मोती, रंग, नील और बहुमूल्य लकड़ी का निर्यात होता था।
➣ मित्र एवं भारत के बीच मौर्यकाल में होने वाले व्यापार को और अधिक बढ़ाने के लिए टालमी ने लाल सागर पर बरनिस नामक बन्दरगाह की स्थापना की थी।
➣ भारत के साथ बैक्ट्रियाई व्यापार को सुसाध्य बनाने के लिए एण्टियोकस प्रथम ने सेल्यूकस के साथ अपने संयुक्त शासन के समय एटिक मानक के स्थान पर भारतीय मानक के सिक्के प्रसारित किये।
व्यापारिक मार्ग
| प्रथम मार्ग | बंगाल के समुद्र-तट पर स्थित ताम्रलिप्ति नामक बन्दरगाह से पश्चिमोत्तर भारत में पुष्कलावती तक जाता था (उत्तरापथ)।
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| दूसरा मार्ग | पश्चिम में पाटल से पूर्व में कौशाम्बी के समीप उत्तरापथ मार्ग से मिलता था।
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| तीसरा मार्ग | दक्षिण में प्रतिष्ठान से उत्तर में श्रावस्ती तक जाता था।
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| चौथा मार्ग | यह मार्ग भृगुकच्छ से मथुरा तक जाता था। जिसके मार्ग में उज्जयिनी पड़ता था।
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➣ कौटिल्य ने दक्षिण-मार्ग श्रावस्ती से प्रतिष्ठान (गोदावरी) को अधिक लाभदायक बताया है; क्योंकि दक्षिण से बहुमूल्य व्यापार की वस्तुएं जैसे मुक्ता, मणि, हीरे, सोना, शंख इत्यादि इन्हीं मार्गों से आते थे। (तीसरा मार्ग)
➣ व्यापारी श्रेणियों में संगठित थे। इनका मुखिया श्रेष्ठी कहलाता था। जातकों में 18 प्रकार की श्रेणियों का उल्लेख है।
- व्यापार शुल्क तीन प्रकार के बताए गए हैं:
- स्वदेश में उत्पन्न वस्तु पर लिया जाने वाला शुल्क बाह्य कहलाता था।
- राजधानी में लिया जाने वाला शुल्क अभ्यांतर कहलाता था।
- विदेशी माल पर वसूल किया जाने वाला शुल्क आघित्य कहलाता था।
➣ इसी प्रकार निर्यात पर निष्क्रामय तथा आयात पर प्रवेश्य लगाया जाता था।
➣ स्थानीय वस्तुओं (देशज) पर 4 प्रतिशत एवं विदेशों से आयातित वस्तुओं पर 10 प्रतिशत बिक्रीकर था।
➣ मेगस्थनीज के अनुसार एस्तिनोमाई नामक अधिकारी सडकों की देखभाल करता था तथा दूरी निर्देशित करने के लिए 10 स्टेडिया की दूरी पर पत्थर स्थापित करते थे।
दूरी मापने की इकाई को 10 स्टेडिया कहा जाता था।
➣ कर्टियस के अनसार भारतीय सन के वस्त्र एवं वृक्षों की छाल का (भोजपत्र) प्रयोग लिखने के लिए करते थे।
उद्योग
➣ उद्योग-धंधों की संस्थाओं को श्रेणी कहा जाता था। श्रेणियों के पृथक न्यायालय होते थे जो व्यापार-व्यवसाय से संबंधित विवादों का निपटारा करते थे। श्रेणी न्यायालय के प्रधान को महाश्रेष्ठि कहा जाता था।
| 1. श्रेणी | शिल्पियों का संगठन
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| 2. निगम | व्यापारियों का संगठन
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| 3. संघ | महाजनों व देनदारों का संगठन
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| 4. सार्थवाह | अनाज से संबद्ध व्यापारियों का समूह
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| 5. समय | संगठनों के कानून का समूह |
➣ मौर्यकाल का प्रधान उद्योग सूत काटना एंव बुनना था।
➣ कारखानों में बनी वस्तुएं पण्याध्यक्ष के नियंत्रण में बाजारों में बेची जाती थी।
➣ यूनानी लेखक कर्टियस ने श्वेत लोहे की तलवार का उल्लेख किया है तथा यह भी कहा है कि मौर्यकाल में लौह उद्योग अत्यन्त विकसित अवस्था में था।
मौर्यकालीन सिक्के
➣ मौर्यकाल तक मुद्रा का भी प्रचलन प्रारम्भ हो गया था। मुद्रा के निर्माण एवं संचालन पर राज्य का एकाधिकार था। मौर्यकाल में मुद्राओं की दो कोटियां, कोष प्रवेश्य और व्यावहारिक थीं-
- कोष प्रवेश्य – सम्पूर्ण राजकीय कार्यों में किया जाता था।
- व्यावहारिक – साधारण लेन-देन में किया जाता था।
➣ मौर्यकालीन सिक्के आहत सिक्के (पंचमार्क) थे। वेदिका से घिरा वृक्ष मौर्यकालीन आहत सिक्कों पर प्रतीक है।
➣ अर्थशास्त्र में चांदी के रूप्यरूप, सोने के स्वर्णरूप एवं तांबे के ताम्ररूप का उल्लेख है।
➣ अर्थशास्त्र से भी विस्तृत मुद्रा प्रणाली की चर्चा की गई है। विभिन्न प्रकार के सिक्कों का उल्लेख मिलता है-
| स्वर्ण के सिक्के | निष्क एवं सुवर्ण |
| चांदी के सिक्के | पण, अर्द्धपण, रूप्य, धारण, शतमान, पाद, अष्टभाग |
| तांबे के सिक्के | माशक, अर्द्धमाशक, काकणी व अर्द्धकाकणी |
| चांदी एवं तांबा मिश्रित | काषार्पण |
➣ मौर्यों की राजकीय मुद्रा पण थी। पण 3/4 तोले के बराबर चाँदी का सिक्का था। इसके ऊपर सूर्य, चन्द्र, पीपल, मयूर, बैल, सर्प आदि के चित्र खुदे होते थे।
➣ लक्षणाध्यक्ष मुद्रा जारी करता था। लोग जब स्वयं सिक्के बनाते थे तो उसे राज्य को व्याज रुपिका और परीक्षण के रूप में देना पड़ता था।
➣ मुद्राओं का परीक्षण करने वाले अधिकारी को रूपदर्शक कहा जाता था।
➣ राज्य के शीर्षस्थ अधिकारियों को 48000 पण जबकि सबसे निम्न अधिकारियों को 60 पण वेतन मिलता था। सेनापति का वार्षिक वेतन 48 हजार पण था।
➣ मयूर, पर्वत और अर्द्धचन्द्र की छाप वाली आहत रजत मुद्राएं मौर्य साम्राज्य की मान्य मुद्राएं थीं।
मौर्यकालीन कला
➣ हड़प्पा सभ्यता के पश्चात पहली बार भारतीय कला के सम्बन्ध में स्पष्ट प्रमाण मौर्य काल के मिलते हैं। मौर्या काल में वास्तुकला व मूर्तिकला की अनोखी प्रगति हुई।
➣ कुमारस्वामी ने मौर्य कला को राजकीय कला एवं लोक कला में विभाजित किया। राजकीय कला में राजरक्षकों द्वारा निर्मित स्मारकों को शामिल किया गया, जैसे-स्तंभ, गुहा, स्तूप आदि।
➣ पाटलिपुत्र/पटना के समीप बुलन्दीबाग से नगर के परकोटे एवं कुम्रहार से 80 स्तम्भ वाले राजप्रसाद के अवशेष मिले हैं। इन्हें प्रकाश में लाने का श्रेय स्पूनर महोदय को है।
➣ मौर्य काल के सर्वोत्कृष्ट नमूने अशोक के एकाश्म स्तंभ हैं जोकि उसने धम्म प्रचार के लिये देश के विभिन्न भागों में स्थापित किये थे।
अशोक के स्तम्भ
➣ अशोक के एकाश्मक स्तम्भ (एक ही पत्थर को तराश कर बनाये गये) मौर्य कला के सर्वश्रेष्ठ नमूने हैं। इन पर चमकदार पॉलिश है।
➣ अशोक के स्तम्भ उत्तर प्रदेश के चुनार (मिर्जापुर) के बलुआ पत्थर से बने हैं।
➣ सांची एवं भरहुत के मूल स्तूप के निर्माण का श्रेय भी अशोक को दिया जाता है।
➣ उल्लेखनीय है अशोक को स्तम्भ लगवाने एवं उन पर अभिलेख खुदवाने का विचार अखैमनी (ईरान) के शासक डेरियस या दारा प्रथम (522 ई.पू. से 486 ई.पू.) से मिला।
➣ अशोक का प्रथम स्तम्भ बसाढ़ बखिरा (वैशाली) का कोलुहा स्तम्भ है। इसके शीर्ष पर शेर की मूर्ति है, यह बुद्ध के अन्तिम उपदेश की स्मृति में निर्मित है।
➣ फाह्यान ने 6 एवं ह्वेनसांग ने अशोक के 15 स्तम्भों का उल्लेख किया, जबकि वर्तमान में 30 स्तम्भ प्राप्त हैं।
➣ रूम्मिनदेई स्तम्भ सबसे छोटा है एवं इसके शीर्ष पर घोड़े की आकृति है।
➣ सारनाथ स्तम्भ चौकी/फलक पर पशुओं का क्रम-गज (हाथी), वृषभ (बैल), घोड़ा, सिंह है। यह आज हमारा राष्ट्रीय चिह्न है। ज्ञातव्य हो अशोक स्तम्भ के फोटो में केवल बैल एवं घोड़ा ही दिखते हैं।
लोककला
➣ मौर्य काल में मिट्टी की मूर्ति बड़े पैमाने पर तैयार की जाती थी। जो सामान्यत: जानवरों और महिलाओं के प्रतीक थे।
➣ मौर्य काल में मूर्तियों का निर्माण चिपकवा विधि (अंगुलियों या चुटकियों का इस्तेमाल करके) या साँचे में ढालकर किया जाता था।
➣ महिलाओं में देवियाँ और जानवरों में हाथी की मूर्तिया हुआ करती थी। इन मूर्तियों को हाथ से तैयार किया गया था।
➣ मौर्यकालीन मूर्तियों में विशेष उल्लेखनीय परखम (मथुरा) से प्राप्त यक्ष की मूर्ति,पटना से प्राप्त यक्ष की 2 मूर्तियां, दीदारगंज से प्राप्त चामरधारिणी यक्षी की मूर्ति, लोहानीपुर से प्राप्त नग्न तीर्थंकर की मूर्ति, बेसनगर में मिली यक्षी-मूर्तियां हैं।
➣ दीदारगंज की यक्षी मौर्यकालीन मूर्तिकला की सर्वोत्तम कृति मानी गयी हैं। पुरे विश्व में इसके समकक्ष अन्य कोई भी मूर्ति नहीं है।
➣ पटना के बुलन्दीबाग से नर्तकी की एक मृणमूर्ति है तथा रथ का एक पहिया मिला है, जिसमें 24 तीलियाँ हैं। लोहानीपुर (पटना) से दो जैन तीर्थंकरों की प्रतिमा प्राप्त हुई हैं।
➣ रोपड़ से मौर्यकालीन हाथीदांत की एक मुहर मिली है। इस पर शासक का नाम भदूपालकस लिखा है, जो यहाँ का स्थानीय शासक था।
वास्तुकला
➣ मौर्यों ने वास्तुकला में उल्लेखनीय योगदान दिया और बड़े पैमाने पर पत्थरों के भवन निर्माण की भी शुरुआत की।
➣ मेगस्थनीज के अनुसार पाटलिपुत्र में मौर्य महल ईरान की राजधानी के महल की तरह शानदार था।
➣ पत्थर के खम्भों और उनके टुकड़ों के साक्ष्य आधुनिक पटना के सीमावर्ती क्षेत्र कुम्हरा में मिले हैं। जो एक 84-स्तम्भों वाले हॉल के अस्तित्व का संकेत देते हैं।
गुहाकला
➣ मौर्य कारीगरों ने, बौद्ध भिक्षुओं के निवास के लिए चट्टानों को काट कर गुफा बनाने की भी शुरुआत की। सबसे पहला उदाहरण, गया से 30 किलोमीटर की दूरी पर बराबर की गुफा है।
➣ मौर्यकाल में कुल सात गुफाओं का निर्माण हुआ। बराबर (पूर्व में गया जिला, वर्तमान जेहानाबाद) की तीन गुफाओं का निर्माण अशोक ने करवाया। A passage to India में बराबर की गुफाओं का उल्लेख है।
➣ बराबर की पहाड़ियों में लोमश ऋषि की गुफा भी मौर्यकालीन है। इसका निर्माण दशरथ ने करवाया था।
➣ इनके नाम कर्ण चौपार, सुदामा तथा विश्वकर्मा (विश्व झोंपड़ी) हैं। सुदामा गुफा एवं विश्वकर्मा गुफा अशोक ने राज्याभिषेक के 12वें वर्ष एवं कर्ण चौपार राज्याभिषेक के 19वें वर्ष में आजीविकों को प्रदान की।
➣ अशोक के पौत्र दशरथ ने भी नागार्जुनी पहाड़ियों में आजीविकों को 3 गुफाएँ प्रदान की। इनमें गोपी गुफा प्रसिद्ध है। वापी गुफा तथा पदथिक गुफा अन्य गुफाएँ हैं।
➣ राजगृह के निकट सीतामढ़ी गुफा है। यह किसी पहाड़ी पर नहीं है, बल्कि स्वतंत्र रूप से ग्रेनाइट पत्थर को भीतर से खोदकर बनाया गया है। इसका निर्माण सम्भवतः दशरथ कराया था।
धर्म
➣ मौर्य काल में वैदिक धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म तथा आजीवक धर्म प्रमुख थे। चंद्रगुप्त मौर्य जैन धर्म का अनुयायो, बिंदुसार आजीवक तथा अशोक बौद्ध धर्म का अनुयायी था।
➣ सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म को अपने शासनकाल में राजकीय संरक्षण दिया था।
➣ मौर्यकाल में वैदिक धर्म भी प्रचलित था, किन्तु कर्मकाण्ड प्रधान वैदिक धर्म अभिजात ब्राह्मण तथा क्षत्रियों तक ही सीमित था।
➣ पतंजलि के अनुसार मौर्यकाल में देवमूर्तियों को बेचा जाता था। देवमूर्तियों को बनाने वाले शिल्पियों को देवता कारू कहा जाता था।
➣ जनसाधारण में नागपूजा का प्रचलन था। मूर्तिपूजा भी की जाती थी।
➣ मेगस्थनीज ने धार्मिक व्यवस्था में डायोनिसस एवं हेराक्लीज से की है, जिसकी पहचान क्रमशः शिव एवं विष्णु से की गई है।
भाषा व साहित्य
➣ मौर्य काल में तीन भाषाओं का प्रचलन था- संस्कृत, प्राकृत और पालि। इस युग में इन तीनों भाषाओं में श्रेष्ठ साहित्य की रचना हुई।
➣ अशोक ने इनमें से पालि को सम्पूर्ण साम्राज्य की राजभाषा बनाया और इसी भाषा में अपने अभिलेख भी उत्कीर्ण कराए।
➣ ब्राह्मण, जैन व बौद्धधर्मों के विकास ने धार्मिक साहित्य की रचना को प्रभावित किया।
➣ वेदांगों, गृह्यसूत्रों व धर्मसूत्रों की रचना इसी काल में हुई। इसी प्रकार बौद्ध त्रिपिटकों व जैनसूत्रों की भी रचना हुई।
➣ कौटिल्य का अर्थशास्त्र प्रथम राजनीतिक पुस्तक ,भी इसी काल की रचना है।
मौर्य प्रशासन के विभाग एवं उनके अध्यक्ष
| आकाराध्यक्ष | खान एवं धातुकर्म का प्रमुख अधिकारी
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| अक्षपटलाध्यक्ष | लेखा नियंत्रक
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| आयुधागाराध्यक्ष | आयुध विभाग का अध्यक्ष
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| गणिकाध्यक्ष | मनोरंजनकर्ताओं का नियंत्रक या वेश्यालयों की देख-रेख करने वाला अधिकारी
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| कुप्याध्यक्ष | वन उत्पादों का अध्यक्ष
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| लक्षणाध्यक्ष | टकसाल का प्रमुख
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| लवणाध्यक्ष | नमक अधीक्षक
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| मद्राध्यक्ष | परिपत्र अधिकारी
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| नागावनाध्यक्ष | हाथी वनपाल
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| नवाध्यक्ष | जहाज वाहन नियंत्रक
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| कोषाध्यक्ष | कोष का अध्यक्ष
|
| ध्युताध्यक्ष | द्यूतक्रीड़ा का अध्यक्ष
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| बंधनागाराध्यक्ष | कारागार का अध्यक्ष
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| अश्वाध्यक्ष | अश्वारोही सेना का सेनाध्यक्ष
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| देवताध्यक्ष | मंदिरों का अध्यक्ष
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| गो-अध्यक्ष | राजसी मवेशियों का अध्यक्ष
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| मनाध्यक्ष | सर्वेक्षक एवं समयपालक
|
| पण्याध्यक्ष | राज्य व्यापार नियंत्रक
|
| पौतवाध्यक्ष | माप-तौल का नियंत्रक
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| पत्याध्यक्ष | पैदल सेनाध्यक्ष
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| पत्तनाध्यक्ष | राज्य बंदरगाह नियंत्रक
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| संस्थाध्यक्ष | निजी व्यापार नियंत्रक
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| सीताध्यक्ष | राजसी भूमि का अध्यक्ष
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| सूनाध्यक्ष | पशुओं का रक्षक एवं बूचड़खाना नियंत्रक
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| सुराध्यक्ष | मदिरा नियंत्रक
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| सुत्राध्यक्ष | वस्त्र आयुक्त
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| विविताध्यक्ष | चारागाह नियंत्रक
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| सुवर्णाध्यक्ष | कीमती धातु एवं आभूषण अध्यक्ष
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| शुल्काध्यक्ष | सीमा शुल्क एवं चुंगी नियंत्रक
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| कोष्टगाराध्यक्ष | गोदाम का अध्यक्ष
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| लोहाध्यक्ष | धातुओं का अध्यक्ष
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| रथाध्यक्ष | रथ सेनाध्यक्ष |
मौर्य काल के विभिन्न पदाधिकारी
| युक्त | ये जिले के अधिकारी होते थे जो राजस्व वसूल करते तथा उसका लेखा-जोखा रखते थे और सम्राट की सम्पत्ति का भी प्रबन्ध करते थे।
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| राजुक | इस प्रकार के पदाधिकारी भूमि की पैमाइश करने के लिए अपने पास रस्सी रखते थे। वे आजकल के बंदोबस्त अधिकारी की भांति होते थे।
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| प्रादेशिक | यह मंडल का प्रधान अधिकारी होता था। उसका कार्य आजकल के संभागीय आयुक्त जैसा था।
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| धम्ममहामात्र | इनका कार्य विभिन्न सम्प्रदायों के बीच सामंजस्य बनाये रखना, राजा तथा उसके परिवारों के सदस्यों से धम्म दान प्राप्त करना और उसकी समुचित व्यवस्था करना होता था।
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| रूयाध्यक्ष | यह महिलाओं के नैतिक आचरण की देख-रेख करने वाला अधिकारी होता था।
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| ब्रजभूमिक | यह गोचर भूमि में बसने वाले गोपों की देख-रेख करने वाला अधिकारी था।
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| राजुक | ग्रामीण जनपदों की देखभाल के लिए इसके पास कर संग्रह के साथ-साथ न्यायिक शक्तियां भी थी।
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| प्रादेशिक | जिला अधिकारी महामात्र-उच्च अधिकारी, नगर प्रशासन के सम्बन्धित
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| प्रतिवेदक | इनका कार्य सम्राट को विभिन्न सूचना देना था। |