जैन धर्म वर्धमान महावीर MCQ प्रश्न | UPSC

भारतीय इतिहास प्राचीन भारत जैन धर्म वर्धमान महावीर MCQ प्रश्न
1. जैन ‘तीर्थंकर’ पार्श्वनाथ निम्नलिखित स्थानों में से मुख्यतः किससे संबंधित थे?
(a) वाराणसी
(b) कौशाम्बी
(c) गिरिब्रज
(d) चम्पा
U.P.P.C.S (Mains) 2016
उत्तर-(a)
पार्श्वनाथ जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर थे, जिनका जन्म वाराणसी (काशी) में हुआ था। उनके पिता वाराणसी के राजा अश्वसेन और माता वामादेवी थीं। उनका प्रतीक चिह्न सर्प है। पार्श्वनाथ महावीर स्वामी से लगभग 250 वर्ष पहले हुए थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: उल्लेखनीय है कि पार्श्वनाथ ने चातुर्याम (चार महाव्रत) की शिक्षा दी थी — अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह — जबकि महावीर ने इनमें ब्रह्मचर्य जोड़कर पंचमहाव्रत का प्रतिपादन किया। पार्श्वनाथ ने 30 वर्ष की आयु में गृहत्याग किया और सम्मेदशिखर (झारखंड) पर निर्वाण प्राप्त किया।
2. निम्नलिखित में से कौन-सा एक युग्म सही सुमेलित नहीं है?
(तीर्थंकर) (निर्वाण स्थल)
(a) ऋषभनाथ – अष्टापद
(b) वासुपूज्य – सम्मेदशिखर
(c) नेमिनाथ – ऊर्जयंत
(d) महावीर – पावापुरी
U.P.P.C.S. (Pre) 2021
उत्तर-(b)
वासुपूज्य जैन धर्म के 12वें तीर्थंकर थे और उनका निर्वाण सम्मेदशिखर में नहीं, बल्कि चम्पापुरी (वर्तमान भागलपुर, बिहार) में हुआ था। शेष तीनों युग्म पूरी तरह सही हैं। ऋषभनाथ (आदिनाथ) ने अष्टापद पर्वत (कैलाश) पर निर्वाण पाया, नेमिनाथ ने गुजरात के गिरनार (ऊर्जयंत) पर्वत पर, और महावीर ने पावापुरी (नालंदा, बिहार) में।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:उल्लेखनीय है कि सम्मेदशिखर (झारखंड का पारसनाथ पहाड़) जैनियों का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तीर्थस्थल है, जहाँ 24 में से 20 तीर्थंकरों ने निर्वाण प्राप्त किया था।
3. महावीर स्वामी का जन्म कहां हुआ था?
(a) कुंडग्राम में
(b) पाटलिपुत्र में
(c) मगध में
(d) वैशाली में
42nd B.P.S.C. (Pre) 1997
47th B.P.S.C. (Pre) 2005
53rd to 55th B.P.S.C. (Pre) 2011
उत्तर-(a)
महावीर स्वामी का जन्म लगभग 599 ई.पू. में वैशाली गणराज्य के कुंडग्राम (कुंडलपुर) में हुआ था। उनके पिता सिद्धार्थ ज्ञातृक क्षत्रिय कुल के प्रमुख थे और माता त्रिशला वैशाली के लिच्छवी गणनायक चेटक की बहन थीं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बचपन में महावीर को ‘वर्धमान’ नाम से जाना जाता था। उन्होंने 30 वर्ष की आयु में गृहत्याग किया और 12 वर्षों की कठोर तपस्या के बाद 42 वर्ष की आयु में जृम्भिकग्राम के निकट ऋजुपालिका नदी के तट पर ‘कैवल्य ज्ञान’ प्राप्त किया। तभी से उन्हें ‘महावीर’, ‘जिन’ (विजेता) और ‘निग्रंथ’ की उपाधि मिली।
4. जैन धर्म के संस्थापक हैं-
(a) आर्य सुधर्मा
(b) महावीर स्वामी
(c) पार्श्वनाथ
(d) ऋषभदेव
U.P.P.C.S. (Mains) 2010
उत्तर-(d)
जैन धर्म के आदि संस्थापक और प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव (आदिनाथ) हैं। महावीर स्वामी जैन धर्म के 24वें और अंतिम तीर्थंकर थे, जिन्होंने छठी शताब्दी ई.पू. में इस धर्म का व्यापक प्रचार-प्रसार किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऋषभदेव का उल्लेख ऋग्वेद, विष्णु पुराण और भागवत पुराण में भी मिलता है, जो उनकी प्राचीनता को प्रमाणित करता है। जैन मान्यता के अनुसार ऋषभदेव ने ही मनुष्यों को कृषि, शिल्प और असि (शस्त्र विद्या) की शिक्षा दी थी। उनका प्रतीक चिह्न वृषभ (बैल) है।
5. सूची-I को सूची -II से सुमेलित कीजिए तथा नीचे दिए गए कूट से सही
सूची-1 ( तीर्थंकर) सूची-II (प्रतिमा लक्षण)
A. आदिनाथ 1. वृषभ
B. मल्लिनाथ 2. अश्व
C. पार्श्वनाथ 3. सर्प
D. संभवनाथ 4. जल कलश
कूट : उत्तर चुनिए –
A B C D
(a) 1 4 3 2
(b) 1 3 2 4
(c) 2 4 3 1
(d) 3 1 4 2
U.P.P.C.S. (Pre) 2017
उत्तर-(a)
तीर्थंकरों और उनके प्रतीक चिह्नों का सही सुमेलन इस प्रकार है — आदिनाथ: वृषभ (बैल), मल्लिनाथ: जल-कलश, पार्श्वनाथ: सर्प, संभवनाथ: अश्व (घोड़ा)। जैन धर्म में प्रत्येक तीर्थंकर की पहचान उनके विशेष ‘लांछन’ (प्रतीक चिह्न) से होती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:उल्लेखनीय है कि मल्लिनाथ जैन धर्म के 19वें तीर्थंकर थे और श्वेतांबर परंपरा के अनुसार वे एकमात्र महिला तीर्थंकर थीं, जबकि दिगंबर परंपरा उन्हें पुरुष मानती है। संभवनाथ जैन धर्म के तीसरे तीर्थंकर थे।
6. निम्नलिखित तीर्थंकरों पर विचार कीजिए तथा उनको सही कालक्रमानुसार व्यवस्थित कीजिए :
I. अभिनंदन
II. विमल नाथ
III. मुनिसुव्रत नाथ
IV. पद्मप्रभु नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर का चयन कीजिए
कूटः

(a) I, IV, II और III
(c) IV, III, I और II
(b) III, I, II और IV
(d) IV, I, III और II
U.P.R.O./A.R.O. (Mains) 2016
उत्तर-(a)
जैन धर्म में 24 तीर्थंकरों का कालक्रम निश्चित है। इनमें अभिनंदन चौथे, पद्मप्रभु छठे, विमलनाथ तेरहवें और मुनिसुव्रतनाथ बीसवें तीर्थंकर हैं। अतः सही कालक्रम होगा: अभिनंदन (4) → पद्मप्रभु (6) → विमलनाथ (13) → मुनिसुव्रतनाथ (20), अर्थात् I, IV, II और III। जैन तीर्थंकरों को ‘जिन’ (विजेता) भी कहा जाता है क्योंकि उन्होंने इंद्रियों और कषायों (क्रोध, मान, माया, लोभ) पर विजय प्राप्त की। जैन परंपरा के अनुसार प्रत्येक तीर्थंकर अपने काल में ‘धर्मतीर्थ’ (धर्म की नदी) को पुनर्स्थापित करते हैं।
7. जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर कौन थे?
(a) पार्श्वनाथ
(b) ऋषभदेव
(c) महावीर
(d) चेतक
Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2013
उत्तर-(b)
जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव (आदिनाथ) हैं। जैन परंपरा में इन्हें इस अवसर्पिणी काल (वर्तमान चक्र) में धर्म का पुनः प्रवर्तन करने वाला प्रथम महापुरुष माना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: हिंदू पौराणिक ग्रंथों में ऋषभदेव को ‘भागवत पुराण’ में विष्णु के 24 अवतारों में से एक बताया गया है। जैन ग्रंथों के अनुसार ऋषभदेव ने अपने पुत्र भरत को राज्य सौंपा था, जिनके नाम पर ही हमारे देश का नाम ‘भारत’ पड़ा — यह जैन परंपरा की एक महत्त्वपूर्ण मान्यता है।
8. कुंडलपुर जन्म स्थान है –
(a) सम्राट अशोक का
(b) गौतम बुद्ध का
(c) महावीर स्वामी का
(d) चैतन्य महाप्रभु का
U.P.P.C.S. (Spl.) (Pre) 2004
उत्तर-(c)
कुंडलपुर (कुंडग्राम) वैशाली के समीप स्थित वह स्थान है जहाँ महावीर स्वामी का जन्म हुआ था। यह स्थान वर्तमान बिहार में है और जैन धर्मावलम्बियों के लिए एक प्रमुख तीर्थस्थल है। महावीर स्वामी का बचपन का नाम वर्धमान था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: उल्लेखनीय है कि महावीर की माता त्रिशला ने उनके जन्म से पूर्व 16 शुभ स्वप्न देखे थे जिनकी व्याख्या ज्योतिषियों ने एक महान् पुरुष के जन्म के संकेत के रूप में की थी — यह विवरण जैन आगम ग्रंथों में विस्तार से मिलता है।
9. जैन धर्म के प्रवर्तक महावीर जी का मोक्ष स्थान कहां स्थित है?
(a) मनेर
(b) राजगीर
(c) पावापुरी
(d) जालन फोर्ट
63rd B.P.S.C. (Pre) 2017
उत्तर-(c)
महावीर स्वामी ने 527 ई.पू. में 72 वर्ष की आयु में बिहार के पावापुरी में कार्तिक कृष्ण अमावस्या को निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया। पावापुरी नालंदा जिले से लगभग 25 किमी. की दूरी पर स्थित है और यह जैनियों का अत्यंत पवित्र तीर्थस्थल है। यहाँ ‘जल मंदिर’ नामक प्रसिद्ध जैन मंदिर एक कमल-सरोवर के मध्य स्थित है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ऐसा माना जाता है कि महावीर के दाह-संस्कार के समय इतनी अधिक मिट्टी ली गई कि वहाँ एक विशाल कुंड बन गया, जो आज जल मंदिर की झील के रूप में विद्यमान है।
10.5.सूची-1 एवं सूची-II को सुमेलित कीजिए तथा नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए –
सूची-1 (तीर्थंकर) सूची-II (उनके संज्ञान)
(a) पार्श्वनाथ (i) वृषभ
(b) आदिनाथ (ii) सिंह
(c) महावीर (iii) सर्प
(d) शांतिनाथ (iv) हिरण
कूट :
(a) A-(ii), B-(iii), C-(iv), D-(i)
(b) A-(iv), B-(iii), C-(ii), D-(i)
(c) A-(i), B-(ii), C-(iii), D- (iv)
(d) A-(iii), B-(i), C-(ii), D-(iv)
R.AS./R.T.S (Pre) 2021
उत्तर-(d)
तीर्थंकरों और उनके संज्ञान (लांछन/प्रतीक) का सही सुमेलन इस प्रकार है — पार्श्वनाथ: सर्प, आदिनाथ: वृषभ, महावीर: सिंह, शांतिनाथ: हिरण। महावीर स्वामी का प्रतीक ‘सिंह’ उनके निर्भय, पराक्रमी और जितेंद्रिय स्वभाव का प्रतीक है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शांतिनाथ जैन धर्म के 16वें तीर्थंकर थे और उन्हें ‘चक्रवर्ती’ भी माना जाता है, अर्थात् वे तीर्थंकर और चक्रवर्ती सम्राट — दोनों रूपों में पूजित हैं। जैन धर्म में ऐसे केवल तीन तीर्थंकर हैं जो चक्रवर्ती भी थे: शांतिनाथ, कुंथुनाथ और अरनाथ।
11. कौन-सा दर्शन त्रिरत्न को मानता है?
(a) बौद्ध दर्शन
(b) न्याय दर्शन
(c) योग दर्शन
(d) जैन दर्शन
Chhattisgarh P.S.C. (Pre) 2017
उत्तर-(*)
जैन दर्शन में मोक्ष-प्राप्ति के लिए तीन अनिवार्य साधन निर्धारित किए गए हैं — सम्यक् दर्शन (सही आस्था), सम्यक् ज्ञान (सही ज्ञान) और सम्यक् चरित्र (सही आचरण)। इन्हें सम्मिलित रूप से ‘त्रिरत्न’ कहा जाता है। उल्लेखनीय है कि बौद्ध दर्शन में भी ‘त्रिरत्न’ की अवधारणा है, किंतु वहाँ इसके अंतर्गत बुद्ध, धम्म और संघ आते हैं — जो जैन त्रिरत्न से भिन्न है। इसी अस्पष्टता के कारण छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग ने इस प्रश्न को मूल्यांकन से बाहर कर दिया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जैन धर्म के अनुसार ‘सम्यक् दर्शन’ का अर्थ है तीर्थंकरों द्वारा प्रतिपादित सत्य में अटूट श्रद्धा रखना। जैन आगमों के अनुसार त्रिरत्न का पालन किए बिना कर्म-बंधन से मुक्ति असंभव मानी जाती है।
12. निम्नलिखित में से कौन एक जैन तीर्थंकर नहीं था?
(a) चंद्रप्रभु
(b) नाथमुनि
(c) नेमि
(d) संभव
U.P.P.C.S. (Spl.) (Mains) 2004
उत्तर-(b)
नाथमुनि जैन तीर्थंकर नहीं थे — वे वैष्णव (तमिल) परंपरा के प्रसिद्ध आचार्य थे। शेष तीनों — चंद्रप्रभु (8वें तीर्थंकर), नेमिनाथ (22वें तीर्थंकर) और संभवनाथ (3रे तीर्थंकर) — जैन धर्म के मान्यताप्राप्त तीर्थंकर हैं। जैन मान्यता के अनुसार कुल 24 तीर्थंकर हुए हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: 22वें तीर्थंकर नेमिनाथ को भगवान कृष्ण का चचेरा भाई माना जाता है — यह तथ्य जैन और वैदिक परंपराओं के बीच एक दिलचस्प सांस्कृतिक संबंध को दर्शाता है। प्रत्येक तीर्थंकर का एक विशेष प्रतीक चिह्न (लांछन) होता है; जैसे ऋषभदेव का लांछन बैल और महावीर का सिंह है।
13. जैन धर्म में ‘पूर्ण ज्ञान’ के लिए क्या शब्द है?
(a) जिन
(b) रत्न
(c) कैवल्य
(d) निर्वाण
I.A.S. (Pre) 1993
उत्तर-(c)
जैन धर्म में आत्मा की सर्वोच्च ज्ञान-अवस्था को ‘कैवल्य’ कहा जाता है। महावीर स्वामी को 12 वर्षों की घोर तपस्या के उपरांत जृम्भिकाग्राम के निकट ऋजुपालिका नदी के तट पर साल वृक्ष के नीचे यह कैवल्य-ज्ञान प्राप्त हुआ, जिसके बाद वे ‘केवलिन’ कहलाए। ‘निर्वाण’ शब्द का प्रयोग जैन धर्म में देहत्याग (मृत्यु) के बाद की मुक्तावस्था के लिए होता है, जबकि बौद्ध धर्म में यह राग-द्वेष से मुक्ति को दर्शाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जैन दर्शन के अनुसार ज्ञान के पाँच स्तर हैं — मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यव और केवल; जिनमें ‘केवल ज्ञान’ (कैवल्य) सर्वोच्च है। कैवल्य-प्राप्ति के बाद साधक को ‘जिन’ (विजेता) कहा जाता है, जिससे ‘जैन’ शब्द की उत्पत्ति हुई।
14. त्रिरत्न सिद्धांत सम्यक् धारण, सम्यक् चरित्र एवं सम्यक् ज्ञान जिस धर्म की महिमा है, वह है-
(a) बौद्ध धर्म
(b) ईसाई धर्म
(c) जैन धर्म
(d) इनमें से कोई नहीं
U.P.P.C.S. (Pre) 2004
उत्तर-(c)
जैन धर्म के त्रिरत्न — सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र — मोक्ष-मार्ग के तीन अनिवार्य स्तंभ हैं। इन तीनों के समन्वित पालन से ही कर्मों का क्षय होकर आत्मा मुक्त होती है। महावीर स्वामी ने इस त्रिरत्न को अपने उपदेशों का केंद्र बिंदु बनाया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जैन धर्म में ‘सम्यक् चरित्र’ के अंतर्गत पाँच महाव्रत आते हैं — अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (संग्रह न करना)। इन पाँच महाव्रतों में ‘अहिंसा’ को सर्वोच्च स्थान दिया गया है और यह जैन धर्म की पहचान का सबसे प्रमुख तत्व है।
15. महावीर जैन की मृत्यु निम्नलिखित में से किस नगर में हुई?
(a) राजगीर
(b) सांची
(c) पावापुरी
(d) समस्तीपुर
45th B.P.S.C. (Pre) 2001
उत्तर-(c)
महावीर स्वामी का निर्वाण (देहांत) बिहार के पावापुरी नगर में 468 ई.पू. (कुछ मतों के अनुसार 527 ई.पू.) में हुआ था। यह स्थान आज जैन धर्म के सर्वाधिक पवित्र तीर्थस्थलों में से एक है। पावापुरी में जलमंदिर नामक एक सुंदर जैन मंदिर है जो उसी स्थान पर बना है जहाँ महावीर का अंतिम संस्कार हुआ था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: महावीर स्वामी का जन्म वैशाली गणराज्य के कुण्डग्राम (वर्तमान बिहार) में चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को हुआ था। उनके पिता सिद्धार्थ क्षत्रिय कुल के थे और माता त्रिशला लिच्छवि राजकुमारी थीं, जिससे महावीर का सम्बन्ध तत्कालीन गणतंत्रीय राजनीति से भी था।
16.त्रिरत्न या तीन रत्न, जैसे सटीक ज्ञान, सच्ची आस्था और सटीक क्रिया, निम्न में से किससे संबंधित हैं?
(a) बौद्ध धर्म
(b) हिंदू धर्म
(c) जैन धर्म
(d) ईसाई धर्म
66th B.P.S.C. (Pre) 2020
उत्तर-(c)
सटीक ज्ञान (सम्यक् ज्ञान), सच्ची आस्था (सम्यक् दर्शन) और सटीक क्रिया (सम्यक् चरित्र) — ये तीनों जैन धर्म के ‘त्रिरत्न’ हैं। जैन धर्म में यह मान्यता है कि इन तीनों का एक साथ पालन ही आत्मा को कर्म-बंधन से मुक्त करता है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जैन दर्शन में ‘अनेकांतवाद’ का सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसके अनुसार सत्य बहुआयामी होता है और किसी एक दृष्टिकोण से उसे पूर्णतः नहीं जाना जा सकता। इस सिद्धांत को ‘स्याद्वाद’ भी कहा जाता है, जो जैन ज्ञान-मीमांसा की अनूठी देन है।
17. प्रभासगिरि जिनका तीर्थ स्थल है, वे हैं-
(a) बौद्ध
(b) जैन
(c) शैव
(d) वैष्णव
U.P.P.C.S. (Spl) (Pre) 2008
उत्तर-(b)
प्रभासगिरि उत्तर प्रदेश के कौशाम्बी जिले में स्थित एक महत्वपूर्ण जैन तीर्थस्थल है। यह स्थान जैन धर्म के छठे तीर्थंकर पद्मप्रभ से संबंधित है — मान्यता है कि उनका जन्म यहीं हुआ था। कौशाम्बी प्राचीन काल में वत्स महाजनपद की राजधानी थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जैन धर्म के अनुसार तीर्थंकर पद्मप्रभ का प्रतीक चिह्न (लांछन) ‘लाल कमल’ है। कौशाम्बी का उल्लेख बौद्ध और जैन दोनों साहित्यों में मिलता है — भगवान बुद्ध ने भी यहाँ कई वर्षावास किए थे, जो इस नगर की तत्कालीन धार्मिक महत्ता को दर्शाता है।
18. जैन तीर्थंकरों के क्रम में अंतिम कौन था?
(a) पार्श्वनाथ
(b) ऋषभदेव
(c) महावीर
(d) मणिसुव्रत
I.A.S. (Pre) 1993
उत्तर-(c)
जैन धर्म की परंपरा में 24 तीर्थंकर हुए हैं। इस क्रम में प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव (आदिनाथ) और 24वें तथा अंतिम तीर्थंकर वर्धमान महावीर थे। 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ महावीर से लगभग 250 वर्ष पूर्व हुए थे। ऋषभदेव का उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है, जो जैन धर्म की प्राचीनता का प्रमाण माना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ ने महावीर से पहले ‘चतुर्याम’ (चार व्रत) का उपदेश दिया था — अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह। महावीर ने इसमें ‘ब्रह्मचर्य’ जोड़कर पाँच महाव्रत स्थापित किए, जो जैन आचार-संहिता की आधारशिला बने।
19. महावीर स्वामी को किस नदी के तट पर ज्ञानोदय प्राप्त हुआ था?
(a) स्वर्णसिक्ता
(b) पलाशिनी
(c) गंगा
(d) ऋजुपालिका
U.P.R.O/A.R.O. (Mains) 2017
उत्तर-(d)
महावीर स्वामी को 12 वर्षों की अखंड साधना और तपस्या के पश्चात जृम्भिकाग्राम के निकट ऋजुपालिका (ऋजुवालिका) नदी के तट पर एक साल वृक्ष के नीचे कैवल्य-ज्ञान की प्राप्ति हुई। यह घटना लगभग 468 ई.पू. मानी जाती है। ज्ञान-प्राप्ति के उपरांत उन्हें ‘महावीर’, ‘जिन’ और ‘निग्रंथ’ जैसी उपाधियाँ मिलीं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: महावीर स्वामी ने ज्ञान प्राप्ति के बाद लगभग 30 वर्षों तक पूरे भारत में भ्रमण करते हुए अपने उपदेश दिए। उनके प्रथम शिष्य (गणधर) इन्द्रभूति गौतम थे, जो उनसे मिलने आए एक विद्वान ब्राह्मण थे और महावीर की तर्कशक्ति से प्रभावित होकर उनके शिष्य बन गए।
20. तीर्थंकर शब्द संबंधित है-
(a) बौद्ध
(b) ईसाई
(c) हिंदू
(d) जैन
U.P.P.C.S. (Pre) 1993
उत्तर-(d)
‘तीर्थंकर’ शब्द विशेष रूप से जैन धर्म से सम्बद्ध है। संस्कृत में ‘तीर्थंकर’ का शाब्दिक अर्थ है — ‘तीर्थ (मुक्ति-मार्ग) का निर्माण करने वाला।’ जैन परंपरा में कुल 24 तीर्थंकर हुए हैं जिन्होंने अपने-अपने युग में धर्म का पुनरुद्धार किया। प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव और अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जैन धर्म में तीर्थंकरों को देव, मनुष्य और नारकी प्राणियों में सर्वोच्च माना जाता है। प्रत्येक तीर्थंकर के जन्म को ‘कल्याणक’ कहा जाता है और उनके जीवन में पाँच कल्याणक माने गए हैं — गर्भ, जन्म, दीक्षा, ज्ञान और मोक्ष। ये पाँचों कल्याणक जैन पर्वों के रूप में मनाए जाते हैं।
21. भारत की धार्मिक प्रथाओं के संदर्भ में ‘स्थानकवासी’ संप्रदाय का संबंध किससे है ?
(a) बौद्ध मत
(b) जैन मत
(c) वैष्णव मत
(d) शैव मत
I.A.S. (Pre) 2018
उत्तर-(b)
स्थानकवासी, श्वेतांबर जैनों की एक महत्वपूर्ण शाखा है जिसकी स्थापना सन् 1653 ई. में हुई। यह संप्रदाय ‘लोंका’ शाखा से विकसित हुआ, जिसे 15वीं शताब्दी में अहमदाबाद के व्यापारी लोंकाशाह ने प्रारंभ किया था। स्थानकवासी मूर्तिपूजा को अस्वीकार करते हैं और मंदिरों की बजाय ‘स्थानक’ (साधारण हॉल) में पूजा-अर्चना करते हैं। इनके साधु-साध्वी मुँह पर ‘मुहपत्ति’ (सफेद कपड़ा) बाँधते हैं, जो सूक्ष्म जीवों की हिंसा से बचने का प्रतीक है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जैन धर्म में श्वेतांबर और दिगंबर के अलावा तेरापंथी भी एक प्रमुख उपसंप्रदाय है, जिसकी स्थापना 1760 ई. में आचार्य भिक्षु ने की थी। स्थानकवासी संप्रदाय केवल 31 आगमों को प्रामाणिक मानता है, जबकि अन्य श्वेतांबर 45 आगमों को मान्यता देते हैं।
22. अनेकांतवाद निम्नलिखित में से किसका क्रोड सिद्धांत एवं दर्शन है?
(a) बौद्ध मत
(b) जैन मत
(c) सिख मत
(d) वैष्णव मत
I.A.S. (Pre) 2009
Jharkhand P.C.S. (Pre) 2011
उत्तर-(b)
अनेकांतवाद जैन दर्शन की आत्मा है। इसके अनुसार किसी भी वस्तु या सत्य को एक ही दृष्टिकोण से नहीं समझा जा सकता; उसके अनेक पहलू होते हैं। इसे ‘सप्तभंगी नय’ भी कहते हैं क्योंकि इसमें किसी कथन के सात संभावित रूप माने जाते हैं — स्यात् अस्ति, स्यात् नास्ति, स्यात् अस्ति नास्ति, आदि। महावीर स्वामी ने इसे एकांतिक (absolutist) विचारों के विरुद्ध मध्यम मार्ग के रूप में प्रस्तुत किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अनेकांतवाद का व्यावहारिक रूप ‘नयवाद’ है, जो यह बताता है कि प्रत्येक दृष्टिकोण सत्य का एक आंशिक पहलू है। आधुनिक दार्शनिक इसे बहुलवाद (pluralism) से जोड़ते हैं। जैन आचार्य हेमचंद्र (12वीं शताब्दी) ने इस सिद्धांत को व्यापक रूप से प्रतिपादित किया था।
23. जैन धर्म का आधारभूत बिंदु है-
(a) कर्म
(b) निष्ठा
(c) अहिंसा
(d) विराग
U.P.P.C.S. (Pre) 1993
उत्तर-(c)
अहिंसा जैन धर्म की सर्वोच्च नैतिक आज्ञा है। जैन धर्म में ‘अहिंसा परमो धर्मः’ की भावना इतनी गहरी है कि जैन मुनि जमीन पर चलते समय झाड़ू लगाते हैं ताकि सूक्ष्म जीवों की हत्या न हो। पंच महाव्रतों में अहिंसा प्रथम और सर्वप्रमुख है। गृहस्थों के लिए इसका लघु रूप ‘अहिंसाणुव्रत’ है जिसमें स्थूल हिंसा से बचने का नियम है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जैन धर्म में हिंसा के चार प्रकार बताए गए हैं — संकल्पी (जानबूझकर), आरंभी (जीविकोपार्जन में), उद्योगी (व्यवसाय में) और विरोधी (आत्मरक्षा में)। महात्मा गांधी ने स्वीकार किया है कि जैन विचारक श्रीमद् राजचंद्र से प्रेरणा लेकर उन्होंने अहिंसा को अपने आंदोलन का मूल आधार बनाया।
24. निम्नलिखित में से कौन-सा धर्म ‘विश्व विनाशकारी प्रलय’ की अवधारणा में विश्वास नहीं करता ?
(a) बौद्ध धर्म
(b) जैन धर्म
(c) हिंदू धर्म
(d) इस्लाम
U.P.P.C.S. (Mains) 2014
उत्तर-(b)
जैन धर्म ईश्वर की सत्ता में विश्वास नहीं रखता, अतः किसी सर्वशक्तिमान सृष्टिकर्ता या संहारकर्ता की कल्पना भी नहीं की गई है। जैन मान्यता के अनुसार यह संसार अनादि और अनंत है — इसकी न कोई शुरुआत है, न कोई अंत। इसलिए ‘प्रलय’ जैसी किसी विनाशकारी घटना को जैन दर्शन स्वीकार नहीं करता। ब्रह्मांड नित्य और शाश्वत है, केवल उसमें मौजूद जीव और पुद्गल परिवर्तनशील हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:जैन कालचक्र की अवधारणा के अनुसार समय ‘उत्सर्पिणी’ (आरोही) और ‘अवसर्पिणी’ (अवरोही) दो अर्ध-चक्रों में चलता रहता है — इसमें सभ्यता का उत्थान और पतन होता है, परंतु पूर्ण विनाश नहीं। वर्तमान काल को जैन दर्शन ‘पंचम आरा’ (पाँचवाँ चरण) मानता है जो नैतिक पतन का काल है।
25. यापनीय किसका एक संप्रदाय था?
(a) बौद्ध धर्म का
(b) जैन धर्म का
(c) शैव धर्म का
(d) वैष्णव धर्म का
U.P.P.C.S (Pre) 2010
उत्तर-(b)
यापनीय जैन धर्म की एक मध्यवर्ती शाखा थी जो मुख्यतः दक्षिण भारत (कर्नाटक क्षेत्र) में प्रचलित रही। यह संप्रदाय दिगंबर परंपरा से उत्पन्न हुआ, किंतु कुछ श्वेतांबर मान्यताओं को भी स्वीकार करता था — जैसे स्त्रियों की मुक्ति की संभावना और केवली (सिद्ध पुरुष) द्वारा आहार ग्रहण करना। इस संप्रदाय का उल्लेख 5वीं से 11वीं शताब्दी के शिलालेखों में मिलता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यापनीय संप्रदाय के अनुयायी ‘अर्धफालक’ भी कहलाते थे। इस संप्रदाय के ग्रंथ संस्कृत और प्राकृत दोनों भाषाओं में रचे गए। 12वीं शताब्दी के बाद यह संप्रदाय धीरे-धीरे दिगंबर संप्रदाय में विलीन हो गया।
26. जैन दर्शन के अनुसार, सृष्टि की रचना एवं पालन-पोषण –
(a) सार्वभौमिक विधान से हुआ है।
(b) सार्वभौमिक सत्य से हुआ है।
(c) सार्वभौमिक आस्था से हुआ है।
(d) सार्वभौमिक आत्मा से हुआ है।
I.A.S. (Pre) 2011
उत्तर-(a)
जैन दर्शन के अनुसार यह ब्रह्मांड जीव (चेतन) और अजीव (अचेतन) नामक दो नित्य तत्वों से मिलकर बना है। इसका कोई स्रष्टा या नियंत्रक नहीं है — सृष्टि एक स्वाभाविक और शाश्वत नियम (सार्वभौमिक विधान) के अनुसार चलती है। जैन दर्शन में ‘जीव’ का अर्थ उपनिषदों की सार्वभौमिक आत्मा से नहीं, बल्कि अनंत व्यक्तिगत आत्माओं से है। प्रत्येक जीव स्वतंत्र और अनादि है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जैन दर्शन में अजीव के पाँच भेद हैं — पुद्गल (भौतिक पदार्थ), धर्म (गति का माध्यम), अधर्म (स्थिति का माध्यम), आकाश और काल। जैन दर्शन नास्तिक दर्शन प्रणाली में आता है क्योंकि यह वेदों की प्रामाणिकता और ईश्वर की सत्ता दोनों को अस्वीकार करता है।
27. ‘स्याद्वाद’ संबंधित है-
(a) चार्वाक से
(b) जैन से
(c) बौद्ध से
(d) सांख्य से
Chhattisgarh P.S.C. (Pre) 2018
उत्तर-(b)
स्याद्वाद जैन दर्शन का ज्ञानमीमांसीय सिद्धांत है। ‘स्यात्’ शब्द का अर्थ है ‘किसी दृष्टिकोण से’ या ‘संभवतः’। यह सिद्धांत कहता है कि हर कथन सापेक्ष और आंशिक रूप से सत्य होता है। इसे ‘सप्तभंगी नय’ भी कहते हैं क्योंकि इसमें किसी भी विधान के सात संभावित रूप माने जाते हैं। महावीर स्वामी ने एकांतिक (one-sided) मतों का खंडन करते हुए इसे प्रतिपादित किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: स्याद्वाद को आधुनिक तर्कशास्त्र में बहु-मूल्यीय तर्क (multi-valued logic) का प्राचीन भारतीय रूप माना जाता है। जैन दार्शनिक उमास्वाति (लगभग दूसरी शताब्दी ई.) ने अपने ग्रंथ ‘तत्त्वार्थसूत्र’ में स्याद्वाद को सुव्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया — यह ग्रंथ श्वेतांबर और दिगंबर दोनों संप्रदायों को मान्य है।
28. स्याद्वाद सिद्धांत है-
(a) लोकायत धर्म का
(b) शैव धर्म का
(c) जैन धर्म का
(d) वैष्णव धर्म का
Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2005
उत्तर-(c)
स्याद्वाद जैन धर्म का मूलभूत दार्शनिक सिद्धांत है जिसे महावीर स्वामी ने प्रस्तुत किया। महावीर जैन धर्म के 24वें और अंतिम तीर्थंकर थे जिन्होंने वेदों की अपौरुषेयता तथा ईश्वरवाद को अस्वीकार किया। उन्होंने आत्मवादी और नास्तिक दोनों के चरम मतों से बचते हुए ‘अनेकांतवाद’ का मार्ग चुना, जिसका व्यावहारिक रूप स्याद्वाद है। यह सिद्धांत किसी एक कोण से पूर्ण सत्य जानने की सीमा को स्वीकार करता है।
29. निम्नलिखित में से कौन-कौन से सिद्धांत जैन धर्म से संबंधित हैं?
(i) अनेकांतवाद
(ii) सर्वस्तिवाद
(iii) शून्यवाद
(iv) स्यादवाद
नीचे दिए गए कूट का उपयोग कर सही उत्तर चुनिए –
(a) (i) एवं (iv)
(b) (ii) एवं (iv)
(c) (i), (ii) एवं (iii)
(d) (ii) एवं (iii)
R.AS. / R.T.S (Pre) 2021
उत्तर-(a)
जैन धर्म के दो प्रमुख दार्शनिक सिद्धांत हैं — अनेकांतवाद और स्याद्वाद। दोनों परस्पर संबंधित हैं: अनेकांतवाद यह कहता है कि सत्य बहुआयामी है, जबकि स्याद्वाद इसी को भाषायी अभिव्यक्ति में लागू करता है। शून्यवाद बौद्ध दर्शन की माध्यमिक शाखा का सिद्धांत है जिसे आचार्य नागार्जुन (लगभग दूसरी शताब्दी ई.) ने प्रतिपादित किया। सर्वस्तिवाद बौद्ध धर्म की सर्वास्तिवादिन शाखा का मत है जो मानती है कि भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों काल में धर्म (elements) का अस्तित्व रहता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जैन दर्शन में ‘नयवाद’ एक और महत्वपूर्ण सिद्धांत है जो स्याद्वाद का पूरक है — इसके अनुसार हर दृष्टिकोण (नय) वास्तविकता के एक पक्ष को ही उजागर करता है। जैन दर्शन में कुल सात नय (दृष्टिकोण) माने गए हैं: नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ़ और एवंभूत।
30. अणुव्रत सिद्धांत का प्रतिपादन किया था-
(a) महायान बौद्ध संप्रदाय ने
(b) हीनयान बौद्ध संप्रदाय ने
(c) जैन धर्म ने
(d) लोकायत शाखा ने
I.A.S. (Pre) 1995
उत्तर-(c)
जैन धर्म में गृहस्थों (श्रावक-श्राविकाओं) के लिए पाँच अणुव्रत निर्धारित किए गए हैं जो मुनियों के पंच महाव्रतों का लघु और व्यावहारिक रूप हैं। ये हैं — (1) अहिंसाणुव्रत (स्थूल हिंसा से बचना), (2) सत्याणुव्रत (बड़े असत्य से बचना), (3) अस्तेयाणुव्रत (चोरी न करना), (4) ब्रह्मचर्याणुव्रत (स्वपत्नी/पति से संतोष), (5) अपरिग्रहाणुव्रत (संग्रह की सीमा)। संसारी जीवन में महाव्रतों का पूर्ण पालन असंभव होने से यह व्यवस्था की गई।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जैन गृहस्थों के लिए अणुव्रतों के अतिरिक्त तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत भी बताए गए हैं — इस प्रकार कुल 12 व्रतों का पालन एक आदर्श जैन गृहस्थ से अपेक्षित है। आधुनिक काल में आचार्य तुलसी ने 1949 में ‘अणुव्रत आंदोलन’ प्रारंभ किया जो नैतिक जीवन के लिए एक सामाजिक अभियान बना।
31. निम्न कथनों पर विचार कीजिए-
1. वर्द्धमान महावीर की माता, लिच्छवी के मुख्य चेटक की पुत्री थी।
2. गौतम बुद्ध की माता कोलिय राजवंश की राजकुमारी थीं।
3. 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ बनारस से थे।
इन कथनों में कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 2 तथा 3
(d) 1, 2 तथा 3
I.A.S. (Pre) 2003
उत्तर-(c)
वर्द्धमान महावीर की माता त्रिशला वैशाली के लिच्छवी प्रमुख चेटक की बहन थीं, न कि पुत्री — इसलिए कथन 1 गलत है। गौतम बुद्ध की माता महामाया कोलिय वंश से थीं, जो सही है। 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ का जन्म वाराणसी (बनारस) में हुआ था, इसलिए कथन 3 भी सही है। अतः सही उत्तर (c) है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: महावीर की माता त्रिशला के संबंध के कारण मगध के हर्यंक वंश के राजा बिंबिसार और अजातशत्रु उनके दूर के संबंधी बनते थे, जिसकी वजह से इन राजाओं का जैन धर्म के प्रति सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण रहा। पार्श्वनाथ के चार महाव्रत (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह) थे; महावीर ने पाँचवाँ ब्रह्मचर्य व्रत जोड़कर पंचमहाव्रत का निर्माण किया।
32. जैन संप्रदाय में प्रथम विभाजन के समय श्वेतांबर संप्रदाय के संस्थापक थे-
(a) स्थूलभद्र
(b) भद्रबाहु
(c) कालकाचार्य
(d) देवर्धि-क्षमा श्रमण
R.A.S./ R.T.S. (Pre) 1999
उत्तर-(a)
मौर्यकाल में मगध में भारी अकाल पड़ने पर जैन संघ के भद्रबाहु अपने शिष्यों के साथ दक्षिण (मैसूर) चले गए। मगध में रहे स्थूलभद्र ने अपने अनुयायियों को श्वेत वस्त्र धारण करने की अनुमति दी, जिससे ‘श्वेतांबर’ संप्रदाय बना। दक्षिण से लौटने पर भद्रबाहु ने दिगंबर (निर्वस्त्र) परंपरा को जारी रखा। इस प्रकार जैन धर्म का प्रथम विभाजन हुआ।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यह विभाजन लगभग 300 ईसा पूर्व में हुआ था। दिगंबर जैन महिलाओं को मोक्ष प्राप्त करने में असमर्थ मानते हैं, जबकि श्वेतांबर इसका खंडन करते हैं।
33. किस जैन सभा में अंतिम रूप से श्वेतांबर आगम का संपादन हुआ?
(a) वैशाली में
(b) वल्लभी में
(c) पावा में
(d) पाटलिपुत्र में
U.P.P.C.S. (Mains) 2008
उत्तर-(d)
चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल (लगभग 310 ईसा पूर्व) में पाटलिपुत्र में प्रथम जैन संगीति आयोजित हुई, जिसमें श्वेतांबर आगम का संपादन किया गया। प्राचीन जैन शास्त्रों के नष्ट हो जाने के कारण यह सभा बुलाई गई थी। दिगंबर पंथ के अनुयायियों ने इसमें भाग नहीं लिया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: द्वितीय जैन सभा 512 ईसवी में वल्लभी (गुजरात) में देवर्धि क्षमाश्रमण की अध्यक्षता में हुई, जिसमें जैन ग्रंथों को अंतिम लिखित रूप दिया गया।
34. निम्नलिखित में से कौन सबसे पूर्वकालिक जैन ग्रंथ कहलाता है?
(a) बारह अंग
(b) बारह उपांग
(c) चौदह पूर्व
(d) चौदह उपपूर्व
41st B.P.S.C. (Pre) 1995
उत्तर-(c)
‘चौदह पूर्व’ जैन परंपरा के सबसे प्राचीन ग्रंथ माने जाते हैं। अंतिम नंद राजा के काल में सम्भूतविजय और भद्रबाहु जैन संघ के प्रमुख थे और ये ही महावीर के उपदेशों पर आधारित चौदह पूर्वों के अंतिम ज्ञाता थे। कालांतर में इन ग्रंथों का ज्ञान लुप्त हो गया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चौदह पूर्वों को ‘पूर्वगत’ भी कहा जाता है और माना जाता है कि ये पार्श्वनाथ काल से भी पहले की मौखिक परंपरा को संरक्षित करते हैं। भद्रबाहु ही एकमात्र जैन आचार्य थे जिन्हें सभी 14 पूर्वों का संपूर्ण ज्ञान था।
35. महावीर का प्रथम अनुयायी कौन था?
(a) जमालि
(b) यशोदा
(c) आणोज्जा
(d) त्रिशला
47th B.P.S.C. (Pre) 2005
उत्तर-(a)
भगवान महावीर का प्रथम शिष्य जमालि था, जो उनकी पुत्री प्रियदर्शना का पति था। महावीर की पत्नी यशोदा थीं और जमालि क्षत्रिय कुल का था। दीक्षा लेने के बाद जमालि पहले महावीर का अनुयायी बना, इसीलिए उसे प्रथम शिष्य माना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: हालांकि जमालि बाद में महावीर के मत से असहमत हो गया और उसने अपना अलग संप्रदाय स्थापित किया जिसे ‘बहुरत’ कहा जाता है — यह जैन धर्म का पहला विधर्मी (schismatic) आंदोलन था।
36. जैन साहित्य से संबंधित निम्नलिखित कथनों को पढ़िए तथा सटीक विकल्प को चुनिए-
कथन I : श्वेताम्बर धर्मसूत्र में 12 अंग शामिल हैं।
कथन II : श्वेताम्बर परंपरा के अनुसार, इन अंगों का संकलन
वल्लभी में आयोजित एक धर्मसभा में किया गया था।
(a) कथन I एवं कथन II दोनों ही सही हैं।
(b) कथन I गलत है, लेकिन कथन II सही है।
(c) कथन I एवं कथन II दोनों ही गलत हैं।
(d) कथन I सही है, लेकिन कथन II गलत है।
Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2020
उत्तर-(d)
श्वेतांबर मान्यता के अनुसार 12 अंगों का संकलन 310 ईसा पूर्व में पाटलिपुत्र में हुई प्रथम जैन संगीति में किया गया था — वल्लभी में नहीं। अतः कथन I सत्य है किंतु कथन II असत्य है। दिगंबर पंथियों ने इस संगीति में भाग नहीं लिया क्योंकि उनका मानना था कि 12 अंगों का ज्ञान पहले ही नष्ट हो चुका है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: 12 अंगों में पहला ‘आचारांगसूत्र’ है जो महावीर के जीवन और आचार-विधि का सबसे प्राचीन वर्णन करता है। 12वाँ अंग ‘दृष्टिवाद’ है जो दिगंबरों के अनुसार पूरी तरह लुप्त हो चुका है।
37. निम्नलिखित में से कौन-सा स्थल पार्श्वनाथ से संबद्ध होने के कारण जैन-सिद्ध क्षेत्र माना जाता है ?
(a) चंपा
(b) पावा
(d) ऊर्जयंत
(c) सम्मेद शिखर
U.P.P.C.S. (Pre) 2002
U.P. Lower Sub. (Pre) 2002
उत्तर-(c)
पार्श्वनाथ जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर थे जिनका जन्म वाराणसी में लगभग 850 ईसा पूर्व हुआ। उनके पिता काशी के राजा अश्वसेन और माता वामा थीं। 30 वर्ष की आयु में उन्होंने गृहत्याग किया और 84 दिनों की कठोर साधना के बाद आश्रमपद उद्यान में ‘केवलज्ञान’ प्राप्त किया। उनका परिनिर्वाण झारखंड स्थित सम्मेद शिखर (पारसनाथ पर्वत) पर हुआ, जिसके कारण यह जैनों का पवित्र सिद्ध क्षेत्र है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सम्मेद शिखर को ‘पारसनाथ हिल’ भी कहते हैं और यह झारखंड में 1,365 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। जैन मान्यता के अनुसार 24 तीर्थंकरों में से 20 को यहीं मोक्ष प्राप्त हुआ था।
38. भगवान महावीर का प्रथम शिष्य था-
(a) जमालि
(b) योसुद
(d) प्रभाष
(c) विपिन
U.P.P.C.S. (Pre) 2008
उत्तर-(a)
भगवान महावीर का जन्म 599 ईसा पूर्व में क्षत्रिय सामंत सिद्धार्थ के घर हुआ था। उनकी पत्नी यशोदा से एक पुत्री प्रियदर्शना हुई। प्रियदर्शना का विवाह जमालि नामक क्षत्रिय से हुआ, जो बाद में महावीर के उपदेशों से प्रभावित होकर उनका शिष्य बना। इस प्रकार जमालि महावीर का प्रथम शिष्य था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: महावीर ने 72 वर्ष की आयु में 527 ईसा पूर्व में पावापुरी (बिहार) में निर्वाण प्राप्त किया। इस दिन को जैन धर्म में ‘दीपावली’ के रूप में मनाया जाता है, जो प्रकाश पर्व की उत्पत्ति की एक महत्वपूर्ण परंपरा है।
39. प्रारंभिक जैन साहित्य निम्नलिखित में से किस भाषा में लिखे गए ?
(a) अर्धमागधी
(b) पाली
(c) प्राकृत
(d) संस्कृत
U.P.P.C.S. (Mains) 2006
उत्तर-(a)
प्रारंभिक जैन धार्मिक साहित्य की रचना प्राकृत भाषा की विशेष शाखा ‘अर्धमागधी’ में की गई। 12 अंग सहित अधिकांश प्रारंभिक ग्रंथ इसी भाषा में उपलब्ध हैं। ईसा की छठी शताब्दी में गुजरात के वल्लभी नगर में इन ग्रंथों को अंतिम रूप से संकलित किया गया। आज जैन साहित्य का अनुवाद लगभग सभी प्रमुख भाषाओं में हो चुका है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अर्धमागधी को ‘आर्यमागधी’ भी कहा जाता है। यह महावीर के समय मगध क्षेत्र की बोलचाल की भाषा थी। बाद में दिगंबर जैनों ने शौरसेनी प्राकृत और अपभ्रंश को अपनाया।
40. निम्नलिखित में से कौन-सा आरंभिक जैन साहित्य नहीं है ?
(a) थेरीगाथा
(b) आचारांगसूत्र
(c) सूत्रकृतांग
(d) बृहत्कल्पसूत्र
I.A.S. (Pre) 1996
उत्तर-(a)
‘थेरीगाथा’ जैन नहीं बल्कि बौद्ध साहित्य का भाग है। यह पालि भाषा में लिखा गया ग्रंथ है जिसमें बौद्ध भिक्षुणियों (थेरियों) की गाथाएं संकलित हैं। आचारांगसूत्र, सूत्रकृतांग और बृहत्कल्पसूत्र — ये तीनों प्रारंभिक जैन साहित्य के महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: थेरीगाथा विश्व साहित्य की सबसे प्राचीन ज्ञात रचनाओं में से एक है जो महिलाओं द्वारा लिखी गई थी। वहीं आचारांगसूत्र जैन धर्म का सबसे प्राचीन अंग है जिसमें महावीर के तपश्चर्या के जीवन का वर्णन है।

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