मैसूर का गंग वंश (400-1004 ई.) : दुर्विनीत

भारतीय इतिहास प्राचीन भारत मैसूर का गंग वंश (400-1004 ई.)

कदम्बों तथा पल्लवों के राज्यों के बीच आधुनिक मैसूर के दक्षिण में गङ्गों का राज्य स्थित था।

➣ इस स्थान को गङ्गवंश के साथ लम्बे समय तक सम्बद्ध रहने के कारण गङ्गवाडि कहा गया। गङ्गवंश का प्रारम्भिक इतिहास अन्धकारपूर्ण है।

➣ अभिलेखों में इस वंश का प्रथम शासक कोंकणिवर्मा बताया गया है। उसे जाहवेय कुल (गंग का वंश) तथा काण्वायन गोत्र का कहा गया है।

➣ उसने कई युद्धों में ख्याति प्राप्त की तथा अपने लिये एक समृद्धिशाली राज्य का निर्माण कर लिया। वह धर्ममहाराजाधिराज की उपाधि धारक करता था जो उसकी स्वतंत्र स्थिति का सूचक है।

कोंकणिवर्मा का समय 400 ई. के आस पास माना जा सकता है। गङ्गों की प्रारम्भिक राजधानी कुवलाल (कोलर) थी जो बाद में तलकाड हो गयी।

➣ कोंकणिवर्मा का पुत्र तथा उत्तराधिकारी महाराजाधिराज माधव प्रथम (425 ई.) हुआ। वह एक विद्वान राजा था जिसे दत्तकसूत्र पर टीका लिखने का श्रेय दिया गया है। वह सभी शास्त्रो का ज्ञाता था।

➣ इसके बाद अय्यवर्मा (450 ई.) शासक बना। वह योद्धा होने के साथ-साथ शास्त्र, इतिहास एवं पुराणों का भी ज्ञाता था।

➣ उसके तथा उसके छोटे भाई कृष्णवर्मा के बीच राजसिंहासन के लिये युद्ध हुआ। अय्यवर्मा को पल्लव नरेश से सहायता मिली।

➣ इस संघर्ष के फलस्वरूप गङ्ग राज्य दोनो भाइयों के बीच आधा आधा बांट दिया गया। दोनो ने अपने अपने पुत्र का नाम सिंहवर्मा रखा। उनके काल में भी गंग राज्य का विभाजन कायम रहा।

➣ अय्यवर्मा के पुत्र सिंहवर्मा को पल्लव नरेश स्कन्दवर्मा ने राजा बनाया था। उसका विवाह कदम्ब नरेश कृष्णवर्मा प्रथम की वहन से हुआ।

परवर्ती लेखों के अनुसार इस विवाह से अविनीत नामक पुत्र हुआ। वह बचपन में ही राज्य का उत्तराधिकारी बना दिया गया।

गंग नरेश दुर्विनीत (540-600 ई.) ने अपने वंश को पल्लवों की अधीनता से मुक्त किया उसने पुत्राड़ (दक्षिणी मैसूर) तथा कोंगूदेश की विजय किया। उसका चालुक्यों के साथ मैत्री सम्बन्ध था। वह संस्कृत का महान विद्वान था।

➣ इसके बाद श्रीपुरुष (728-788 ई,) इस वंश का एक महत्वपूर्ण शासक हुआ। इसके समय में कोगूप्रदेश के ऊपर पाण्ड्यों का अधिकार हो गया तथा वह पाण्ड्यो की अधीनता में शासन करने लगा। उसने अपनी राजधानी मान्यपुर में स्थानान्तरित कर दिया।

➣ श्रीपुरूष का शासन समृद्धि का काल था। नोलम्बवाडि (चित्तलदुर्ग जिला) के लोग उसकी अधीनता मानते थे।

➣ श्रीपुरूष के बाद गंग राज्य की अवनति प्रारम्भ हुयी। उसके उत्तराधिकारी शिवमार द्वितीय को राष्ट्रकूट शसक ध्रुव तथा गोविन्द तृतीय ने पराजित किया और बन्दी बनाया।

➣ अमोघवर्ष के काल मे नीतिमार्ग (837-870 ई.) के नेतृत्व में गंगों ने पुनः अपनी स्वतन्त्रता घोषित कर दिया।

कृष्ण तृतीय (839-967 ई.) ने पुनः गंग राज्य की विजय की तथा वहां अपने साले भुतुग द्वितीय को शासक बना दिया। इसके बाद गंगवंशी शासक पाण्ड्यों तथा चोलों में लड़ते रहे।

चोल शासक राजराज प्रथम ने 1004 ई. में गंगो को जीता तथा उन्होने चोलो की अधीनता में रहना स्वीकार कर लिया। इस प्रकार क्रमश: गंग राज्य की समाप्ति हो गयी।

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