| युद्ध | वर्ष. | मध्यस्ता | विजयी |
|---|---|---|---|
| दशराज्ञ युद्ध | 1400 ई. पू. | सुदास बनाम दस राजा | सुदास |
| अरवेला का युद्ध | 331 ई. पू. | दारा तृतीय बनाम सिकंदर | सिकंदर |
➣ भारत पर पहला सफल आक्रमण 516 ई पू. में दारा प्रथम (हखामनी साम्राज्य) ने किया था। दारा तृतीय उसका उत्तराधिकारी था। कालांतर में सिकंदर से हुए अरवेला युद्ध के परिणामस्वरूप भारत से ईरानी सत्ता समाप्त हो गया।
| करी या हाइडेस्पीज का युद्ध | 326 ई. पू. | सिकन्दर बनाम पोरस | सिकंदर |
| कलिंग का युद्ध | 261 ई. पू. | अशोक बनाम कलिंग नरेश | अशोक |
➣ अपने राज्याभिषेक के 8वें वर्ष में लगभग 261 ईसा पूर्व में कलिंग पर आक्रमण किया और कलिंग की राजधानी तोसली पर अधिकार कर लिया।
➣ उसके अनुसार, इस दौरान 1,00,000 लोग मारे गए, लाखों तबाह हो गए और 1,50,000 को कैदी बना लिया गया।
➣ युद्ध ने ब्राह्मण और बौद्ध भिक्षुओं को बहुत कष्ट पहुँचाया और इसके लिए अशोक को बहुत दुःख और पश्चाताप हुआ।
➣ अशोक ने साम्राज्य के विजय की नीति त्याग कर, सांस्कृतिक विजय की नीति अपनाई और बौद्ध धर्म का अनुयायी बन गया। कलिंग युद्ध का उल्लेख अशोक ने अपने 13वें अभिलेख में दिया है।
| चन्द्रगुप्त सेल्यूकस युद्ध | 305 ई. पू. | चन्द्रगुप्त मौर्य व सिकंदर | चन्द्रगुप्त मौर्य |
➣ सिकंदर जीते हुए क्षेत्रों को सेनापति सेल्यूकस को सौंप कर वापस चला गया था। सेल्यूकस ने भारत पर आक्रमण की योजना बनाई और चन्द्रगुप्त से परास्त हो गया।
➣ उसे संधि का प्रस्ताव करना पड़ा, जिसके तहत उसको अपनी पुत्री हेलेना का विवाह चन्द्रगुप्त मौर्य से कर दिया और दहेज़ में अपने राज्य का समस्त पूर्वी प्रदेश कन्धार, हेरात, काबुल, गान्धार और बलूचिस्तान को चंद्रगुप्त को समर्पित करने पड़े। इस तरह मौर्य साम्राज्य ईरान तक फैल गया।
| कनिष्क चीन युद्ध | प्रथम सदी | कनिष्क व चीनी सम्राट | कनिष्क |
➣ कनिष्क (78 -102 ई.) का सबसे प्रसिद्ध युद्ध चीन के सेनापति पान-चाऊ साथ हुआ था, जहाँ एक बार पराजित होकर वह दुबारा विजयी हुआ।
➣ फलस्वरूप उसका रेशम मार्ग पर नियत्रण स्थापित हो गया। यह मार्ग मध्य एशिया और अफगानिस्तान से गुजरते हुए ईरान जाता था। इस मार्ग से कुषाणों की आय में काफी वृद्धि हुई।
➣ कनिष्क भारत का ऐसा पहला शासक था जिसने भारत से बाहर आक्रमण किया था।
| तलैयालंगानम युद्ध | 290 ई . | पांड्य शासक बनाम चेर व चोल | पांड्य शासक नेडुजेलियन |
➣ पाण्ड्य राजवंश के शासक नेडुजेलियन ने तलैयालंगानम का युद्ध जीता। इस युद्ध में नेडुंजेलियन ने चोलों एवं चेरों को उनके अन्य 5 सामन्त मित्रों के साथ बुरी तरह पराजित किया था।
➣ नेडुजेलियन ने अपने शत्रुओं को राजधानी मदुरै से खदेड़ दिया और उनका पीछा करते हुए चोल राज्य की सीमा में घुस गया और तंजौर जिले के तिरवालूर से 13 किलोमीटर दूसर उत्तर-पश्चिम में स्थित तलैयालंगानम के युद्ध में शत्रु सेना को बुरी तरह पराजित किया।
➣ उसने चेर शासक जगमुख शेय’ (हाथी की आंख वाला) को बंदी बनाकर कारावास में डाल दिया। इस युद्ध को जीतने के बाद नेडुंजेलियन को काफी प्रसिद्धि मिली।
| आर्यावर्त के युद्ध | चौथी सदी | समुद्रगुप्त व 9 नाग शासक | समुद्रगुप्त |
| स्कन्दगुप्त हूण युद्ध | 466 ई. | स्कन्दगुप्त व हूण | स्कंदगुप्त |
➣ हूण मध्य एशिया की एक बर्बर जाति थी जो मूलतः मंगोलियन थे।
➣ हूणों का प्रथम आक्रमण सम्राट स्कंदगुप्त के शासन-काल में तिगिन एंव ख़ुशनेबाज के नेतृत्व में हुआ था। स्कंदगुप्त ने इनको सफलतापूर्वक रोका।
➣ स्कंदगुप्त एशिया व यूरोप का पहला शासक था जिसने हूणों को परास्त किया था। उसने इन आक्रमणों को गांधार से आगे नहीं बढ़ने दिया।
➣ स्कंदगुप्त के शासनकाल के पश्चात हूणों का आक्रमण तोरमाण के नेतृत्व में फिर हुआ परन्तु उत्तराधिकारी आक्रमण को रोकने में असफल साबित हुए।
➣ इस प्रकार तोरमाण भारत विजय करने वाला वह प्रथम हूण शासक था, जिसने मध्य भारत तक अपना साम्राज्य स्थापित किया। उल्लेखनीय है इससे पहले गांधार क्षेत्र में तिगिन ने हूणों का पहला साम्राज्य स्थापित कर लिया था।
➣ तोरमाण के बाद उसका पुत्र मिहिरकुल शासक बना। लेकिन वह अयोग्य साबित हुआ। मालवा के यशोर्धर्मन ने उसे युद्ध में मार डाला, नेता मिहिरकुल की मृत्यु के पश्चात् नेतृत्वविहीन हूणों का भारत में अधिपत्य समाप्त होने लगा। इस समय गुप्त शासक नरसिंह बालादित्य (495-530ई.) था।
| नर्मदा युद्ध | 630 ई. | हर्ष व पुलकेशिन-II | पुलिकेशन द्वितीय |
➣ गुप्तोतर काल में पुष्यभूति वंश से हर्षवर्धन (606-647 ई.) उत्तर-भारत का सम्राट हुआ जिसने अपनी राजधानी कन्नौज स्थान्तारित की। गुप्त साम्राज्य के पश्चात हर्षवर्धन ने ही पुरे उत्तर-भारत पर शासन किया जिसका साम्राज्य कशमीर तक फैला था।
➣ हर्षवर्धन ने दक्षिण भारत को जितने की चाह से अपना दक्षिण अभियान शुरू किया, किन्तु वह दक्षिणी अभियान में सफल नहीं हो सका। उसको नर्मदा नदी के तट पर बादामी के चालुक्य वंशीय शासक पुलकेशिन द्वितीय ने पराजित कर दिया। इसके पश्चात ही पुलिकेशन द्वितीय ने दक्षिणीपथेवर अर्थात दक्षिण का स्वामी उपाधि धारण की।
➣ हर्षवर्धन को अंतिम हिन्दू सम्राट भी कहा गया है। लेकिन वह ना ता कट्टर हिन्दू था ना ही पुरे देश का शासक।
➣ चीनी यात्री ह्वेनसांग सातवीं शताब्दी में हर्षवर्धन के काल में ही भारत आया था। जो लगभग 629-644 ई. तक भारत में रहा।
➣ पुलकेशिन II की ऐहोल प्रशस्ति एवं ह्वेनसांग का विवरण इस युद्ध के साक्ष्य हैं।
| शूरमार युद्ध | 641-42 ई. | नरसिंहवर्मन-I व पुलेशिन-II | नरसिंहवर्मन |
| परिमल युद्ध | 641-42 ई. | नरसिंहवर्मन-I व पुलेशिन-II | नरसिंहवर्मन |
| मणिमंगलाई युद्ध | 642 ई. | नरसिंहवर्मन-I पुलकेशिन-II | नरसिंहवर्मन |
| सिंध या रावल का युद्ध | 712 ई. | दाहिर सेन व मुहम्मद बिन कासिम | मुहम्मद बिन कासिम |
➣ मुहम्मद बिन कासिम, इराक के शासक अल हज्जाज का दामाद और उमैयद खलीफा (उमर खलीफा) का सेनापति था। यह भारत पर आक्रमण करने वाला प्रथम अरब मुस्लिम था जिसने मात्र 17 वर्ष की उम्र में सिन्ध व मुल्तान को (712 ई.) जीत लिया।
➣ कासिम के आक्रमण के समय सिंध पर राजा दाहिर सेन का शासन था। यह युद्ध के फलस्वरूप ही पहली बार भारत में सिन्धुवासियों से जजिया कर (एक गैर-धार्मिक कर) मोहम्मद बिन कासिम द्वारा लगाया गया।
➣ उल्लेखनीय है यह भारत पर पहला व अंतिम अरबी मुस्लिम आक्रमण था। सिंध विजय के पश्चात् ही कासिम की मृत्यु 715 ई. में 20 वर्ष की की उम्र में उसके विरोधियों द्वारा हो गयी थी। इसके बाद 300 वर्षों पश्चात 11वीं सदी में तुर्की मुसलमानों का आक्रमण हुआ था।
➣ अरबों की सिंध विजय के बारे में अलीअहमद द्वारा लिखित पुस्तक चचनामा से पता चलता है।
| त्रिपक्षीय युद्ध | 8-10वी सदी | पाल. प्रतिहार व राष्ट्रकूट | प्रतिहार |
➣ त्रिपक्षीय युद्ध का मुख्य कारण कन्नौज था। गुप्त साम्राज्य के पतन के पश्चात उत्तर- भारत की राजनीतिक शक्ति का केन्द्र बिंदु पाटलिपुत्र के स्थान पर कन्नौज (उत्तर प्रदेश) स्थानांतरित हो गया था।
यह हर्षवर्धन की राजधानी थी और हर्षवर्धन का कोई पुत्र नहीं था (पुत्री थी, जिसका विवाह वल्लभी के मैत्राकी वंश में हुआ था)।➣ उल्लेखनीय है कन्नौज प्रारंभ में मौखरी वंशो की राजधानी थी और यह हर्षवर्धन की बहन का सुसुराल था किन्तु उसके बहनोई की मृत्यु के पश्चात सिंहासन रिक्त हो गया इसलिए हर्षवर्धन ने अपनी राजधानी थानेश्वर से कन्नौज स्थान्तरित कर दी थी।
➣ ईस्वी सन् 750 और 1000 के बीच भारत के तीन कोनों में तीन शक्तिशाली राजवंशों (दक्षिण में राष्ट्रकूट और पूर्व में पाल वंश , पश्चिम व उत्तरी भारत में गुर्जर प्रतिहार वंश) का उदय हुआ। कन्नौज पर आधिपत्य के लिए इन तीन महाशक्तियों के मध्य हुए संघर्ष को त्रि-पक्षीय संघर्ष की संज्ञा दी गई है।
➣ इस संघर्ष की शुरुआत करने वाला प्रतिहार राजा वत्सराज था। जिसने कन्नौज शासक इंद्रायुध को पराजित कर उत्तर भारत में अपनी सत्ता का विस्तार प्रारम्भ किया।
➣ राष्ट्रकूट नरेश ध्रुव ने भी त्रि-पक्षीय संघर्ष में हस्तक्षेप किया और वत्सराज को पराजित किया। इस युद्ध में भाग लेकर राष्ट्रकूट उत्तर भारत की राजनीति में हस्तक्षेप करने वाले दक्षिण भारत की प्रथम शक्ति बन गया।
➣ ध्रुव के वापस दक्षिण लौटते ही पाल वंशीय धर्मपाल ने कन्नौज पर आक्रमण कर इंद्रायुध के स्थान पर चक्रायुध को सिंहासन पर बैठा दिया। यह त्रि-पक्षीय संघर्ष 200 वर्षों तक चला।
➣ अंतत: इसका परिणाम गुर्जर-प्रतिहार शासक नागभट्ट द्वितीय (795-833ई.) के पक्ष में रहने के साथ इस युद्ध का समापन हो गया।
नागभट्ट द्वितीय ने कन्नौज को गुर्जर-प्रतिहार साम्राज्य की राजधानी बनाया।
| वेण्णि का युद्ध | – | चोल बनाम चेर, पाण्ड्य सहित 11 शासक | चोल शासक करिकाल |
➣ तंजौर के निकट वेण्णि के युद्ध से चोल शासक करिकाल को अत्यधिक प्रसिद्धि प्राप्त हुई। इस युद्ध में उसने चेर तथा पाण्ड्य राज्य के 11 राजाओं के समूह पर पर विजय प्राप्त की थी
➣ इस युद्ध में हारने के पश्चात चेर शासक पेरूमशेरलादान ने आत्महत्या कर ली थी।
| बेल्लूर का युद्ध | – | परान्तकम बनाम पाण्ड्य व श्रीलंका | परान्तक |
| तक्कोलम का युद्ध | 949 ई. | परान्तक बनाम राष्ट्रकूट व पश्चिमी गंग | परान्तक |
➣ राष्ट्रकूट नरेश कृष्ण तृतीय ने चोल शासक परातंक प्रथम को तक्कोलम के युद्ध में बुरी तरह पराजित किया। राष्ट्रकूटों को यह विजय अपने सेनापति मणलेर तथा गंगराज भुगुत की सहायता से मिली।
➣ चोल युवराज राजादित्य इस युद्ध में मारा गया। चोल राज्य को जीतता हुआ कृष्ण तृतीय रामेश्वरम् जा पहुंचा जहां उसने एक विजय स्तंभ स्थापित किया।
| तिलकाड़ का युद्ध | – | गंग बनाम वेंगी के चालुक्य (विष्णुवर्धन) | विष्णुवर्धन |
| कोप्पम का युद्ध | 1052-54 | चोल (राजाधिराज) बनाम चालुक्य (सोमेश्वर) | चोल राजाधिराज प्रथम |
➣ कोप्पम का युद्ध में चोल शासक राजधिराज प्रथम एवं पश्चिमी चालुक्य नरेश सोमेश्वर के बीच हुआ था। इसमें सोमेश्वर चालुक्य बूरी तरह पराजित हुआ और चोल शासक राजधिराज प्रथम मारा गया किंतु उसके छोटे भाई राजेंद्र द्वितीय ने युद्ध को जीता एवं युद्ध भूमि में ही अपना राज्याभिषेक किया।
| कुण्डलसंगमम् का युद्ध | 1060 ई. | चोल बनाम चालुक्य (सोमेश्वर) | चोल शासक वीर राजेन्द्र |
| वैहन्द का युद्ध | 1008ई. | महमूद गजनवी बनाम आनन्दपाल तथा अन्य हिन्दू शासक | महमूद गजनवी |
➣ मुहम्मद बिन कासिम, के पश्चात भारत पर गजनी वंश के मुस्लिमो का आक्रमण हुआ यह तुर्की मुस्लिम आक्रमण था। सुबुक्तगीन का पुत्र मुहम्मद गजनवी था सुबुक्तगीन ने ही जयपाल के विरुद्ध भारत पर पहला तुर्की मुस्लिम आक्रमण किया। उसकी मृत्यु के पश्चात महमूद गजनवी ने शासन संभाला और अपने पिता की भांति भारत पर आक्रमण किया।
➣ हिन्दूशाही राजधानी वैहिंद (पेशावर के निकट) में महमूद गजनवी और आनन्दपाल के बीच 1008-1009 ई. हुआ। इस युद्ध में सांभर के चौहानों तथा मुल्तान के मुसलमान शासक ने भी आनंदपाल का साथ दिया था,किन्तु युद्ध में दुर्भाग्यवश राजा आनंदपाल की पराजय हो गई थी।
➣ महमूद गजनवी का भारत पर यह छठा आक्रमण था। उल्लेखनीय है उसने भारत 17 बार आक्रमण किया था। अपने सोलहवें आक्रमण (1025 ई.) में महमूद ग़ज़नवी ने प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर को अपना निशाना बनाया था।
| गुजरात का युद्ध | 1178ई. | मुहम्मद गोरी बनाम मूलराज-II | मुहम्मद गोरी |
➣ भारत में मुस्लिम वंश की नींव स्थापित करने श्रेय मुहम्मद गौरी को ही जाता है।
➣ भारत के पश्चिम उत्तर के सीमांत पर मुहम्मद ग़ोरी नामक एक मुसलमान सरदार ने महमूद ग़ज़नवी के वंशजों से राज्याधिकार छीन कर एक नये इस्लामी राज्य, ग़ोर (1173 ई.) की स्थापना की।
➣ वह महमूद ग़ज़नवी की तरह भारत पर आक्रमण करने का इच्छुक था। 1175 ई. में मुहम्मद गोरी ने सर्वप्रथम भारतीय सीमाओं में प्रवेश किया था।
➣ मुहम्मद गोरी ने 1178-79 ई. में गुजरात पर आक्रमण किया, लेकिन गुजरात के शासक मूलराज/भीम द्वितीय ने गौरी को आबू पर्वत के निकट पराजित कर दिया। यह मुहम्मद गौरी की भारत में पहली पराजय थी।
| तराईन का प्रथम युद्ध | 1191 ई. | मुहम्मद गोरी बनाम पृथ्वीराज चौहान | पृथ्वीराज चौहान |
➣ तराईन के प्रथम युद्ध में महमूद गौरी को भारी क्षति उठानी पड़ी थी।
➣ भारत के विरुद्ध युद्ध अभियान में यह उसकी दूसरी बड़ी पराजय थी, जो अन्हिलवाड़ा (गुजरात) के युद्ध के बाद सहनी पड़ी थी। किन्तु एक योजना के साथ गौरी तराईन के मैदान में फिर आ धमका।
| तराईन का द्वितीय युद्ध | 1192 ई. | मुहम्मद गोरी बनाम पृथ्वीराज चौहान | मुहम्मद गोरी |
➣ 1192 में तराईन के द्वितीय युद्ध में मुहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान को पराजित किया। पृथ्वीराज चौहान की पराजय के पश्चात् ही भारत में मुस्लिम शक्ति की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हो गया। इस युद्ध में गाहड़वाल वंशीय कन्नौज नरेश जयचंद्र उससे तटस्थ ही रहा।
➣ मुहम्मद ग़ोरी ने पृथ्वीराज के विरुद्ध जो अभियान किया था, वह एक प्रबल आक्रमण था। इसलिए महमूद ग़ज़नवी के बाद मुहम्मद ग़ोरी ही भारत पर चढ़ाई करने वाला दूसरा मुस्लिम आक्रमणकारी माना गया है।
➣ तराईन के युद्धों का वर्णन मिन्हाज़-उस-सिराज़ द्वारा रचित तबकात-ए-नासिरी ग्रन्थ में मिलता है।
| चन्दावर का युद्ध | 1194 ई. | मूहम्मद गोरी बनाम जयचन्द्र | मूहम्मद गोरी |
➣ मुहम्मद ग़ोरी द्वारा पृथ्वीराज चौहान के पराजित होने से मुसलमानों का आधिपत्य पंजाब से आगे दिल्ली के बड़े राज्य तक हो गया था। उसके बाद उसने कन्नौज के विरुद्ध अपना अभियान आरंभ किया।
➣ कन्नौज का राजा जयचंद्र उस काल में पृथ्वी राज चौहान के पश्चात सबसे शक्तिशाली हिन्दू नरेश था किन्तु जयचंद्र इस युद्ध में मारा गया।
➣ यह युद्ध मुसलमानों के लिए ऐतिहासिक महत्त्व का सिद्ध हुआ क्योंकि उसके पश्वात ही भारत में वास्तविक रूप से मुसलमानी राज्य की स्थापना हुई।
| तराईन का तृतीय युद्ध | 1216ई. | इल्तुतमिश बनाम ताजुद्दीन चल्दौज | इल्तुतमिश |
| कैथल का युद्ध | 1240 ई. | रजिया बनाम मुईजुद्दीन बहरामशाह | मुईजुद्दीन बहरामशाह |
| अलाउद्दीन रणथम्भौर अभियान | 1301 ई. | अलाउद्दीन बनाम हम्मीर | अलाउद्दीन खिलजी |
| अलाउद्दीन चित्तौड़ अभियान | 1303 ई. | अलाउद्दीन बनाम रतनसिंह | अलाउद्दीन खिलजी |
| वारंगल युद्ध | 1308 ई. | अलाउद्दीन बनाम प्रताप रूद्रदेव | अलाउद्दीन खिलजी |
| मालाबार युद्ध | 1311 ई. | अलाउद्दीन बनाम पाण्डेयराज्य | अलाउद्दीन खिलजी |
| रायचूर का युद्ध | 1398ई. | फिरोजशाह बहमनी बनाम बुक्का-II | फिरोजशाह |
| पांगुल का युद्ध | 1420 ई. | फिरोजशाह बहमनी बनाम देवराज-I | देवराज प्रथम |
| कांजीवरम् का युद्ध | 1481 ई. | मुहम्मद-II बहमनी तथा वीरूपाक्ष (विजयनगर) | मुहम्मद-II |
| चोल का युद्ध | 1508 ई. | महमूद बेगड़ा (गुजरात) बनाम पुर्तगाली | महमूद बेगड़ा |
| शिवसमुद्रम का युद्ध | 1511-12 ई. | कृष्णदेव राय व अम्मतूर का नायक | कृष्णदेव राय |
| उदयगिरी का युद्ध | 1514 ई. | कृष्णदेव राय व प्रतापरूद्र (उड़ीसा) | कृष्णदेव राय |
| ग्वालियर का युद्ध | 1518ई. | इब्राहीम लोदी व विक्रमजीत | इब्राहीम लोदी |
| धौलपुर का युद्ध | 1519 ई. | इब्राहिम लोदी बनाम राणा सांगा | राणा सांगा |
| पानीपत का प्रथम युद्ध | 1526 ई. | बाबर बनाम इब्राहीम लोदी | बाबर |
➣ पानीपत का प्रथम युद्ध ज़हीर-उद्दीन बाबर और दिल्ली के लोदी वंश के सुल्तान इब्राहिम लोदी के बीच लड़ा गया था। युद्ध में इब्राहीम लोदी बुरी तरह से परास्त हुआ। पानीपत के प्रथम युद्ध ने ही भारत में मुगल साम्राज्य की नींव रखी।
➣ इस युद्ध में बाबर ने पहली बार प्रसिद्ध तुलगमा युद्ध नीति का प्रयोग किया था।
| खानवा का युद्ध | 1527 ई. | बाबर बनाम राणा सांगा | बाबर |
| चन्देरी का युद्ध | 1528 ई. | बाबर बनाम मेदिनीराय | बाबर |
| घाघरा का युद्ध | 1529 ई. | बाबर बनाम अफगान | बाबर |
| दादर का युद्ध | 1531ई. | हुमायूँ व अफगान | हुमायूँ |
| हुमायू का युद्ध | 1535ई. | हुमायूँ बनाम बहादुरशाह | हुमायूँ |
| सूरजगढ़ का युद्ध | 1534 ई. | शेरखाँन बनाम बंगाल का शासक | शेरखाँन |
| चौसा का युद्ध | 1539 ई. | हुमायँ बनाम शेरखाँन | हुमायूँ |
| कन्नौज/बिलग्राम का युद्ध | 1540ई. | हुमायूँ बनाम शेरखाँन | शेरखाँन |
➣ बिलग्राम के युद्ध पश्चात हुमायूँ के हाथों से दिल्ली की सत्ता निकल गयी और इस युद्ध के बाद शेर ख़ाँ ने आगरा और दिल्ली पर अधिकार कर लिया और सत्ता एक बार फिर से अफ़ग़ानों के हाथ में आ गई।
➣ इसके पश्चात उसे निर्वासित जीवन व्यतीत करना पड़ा। कुछ समय के लिए भारत से मुग़ल वंश का अंत हो गया और शूर वंश का उदय हुआ।
| कालिंजर का युद्ध | 1545ई. | शेरशाह बनाम वीरभान | शेरशाह |
➣ यह शेरशाह का अंतिम अभियान था। रणभूमि में ही उसकी मृत्यु हो गयी थी।
➣ ऐसा माना जाता है कि कालिंजर अभियान के दौरान किले की दीवार से टकराकर लौटे एक गोले के विस्फोट से शेरशाह की 22 मई, 1545 ई. को मृत्यु हो गई। मृत्यु के समय वह उक्का नामक आग्नेयास्त्र चला रहा था।
| मच्छीवाड़ा युद्ध | 1555ई. | हुमायूँ व तातर खौ (अफगान) | हुमायूँ |
| सरहिन्द का युद्ध | 1555ई. | हुमायूँ व सिकन्द शाह | हुमायूँ |
➣ सरहिन्द युद्ध के पश्चात हुमायूँ ने दिल्ली पर पुन: कब्ज़ा कर लिया। युद्ध में अफ़ग़ान सेना का नेतृत्व सुल्तान सिकन्दर सूर एवं मुग़ल सेना का नेतृत्व बैरम ख़ाँ ने किया। युद्ध में अफ़ग़ानों की पराजय हुई।
➣ तत्पश्चात 23 जुलाई, 1555 ई. में हुमायूं ने एक बार पुनः दिल्ली के तख्त पर अधिकार कर लिया। परन्तु शीघ्र ही उसकी मृत्यु हो गयी और हेमचन्द्र (हेमू) ने दिल्ली में हिन्दू साम्राज्य की स्थापना की।
हेमू मध्यकालीन भारत का ऐसा एकमात्र शासक था जिसने दिल्ली पर हिन्दू साम्राज्य को स्थापित किया। हालाँकि यह अल्पकालिक रहा।
| पानीपत का द्वितीय युद्ध | 1556ई. | अकबर बनाम हेमू | अकबर |
➣ अभी अकबर 14 वर्ष का नाबालिग बालक था। इसलिए उसके संरक्षक बैरम खां ने युद्ध का नेतृत्व संभाला और अकबर को दिल्ली की गद्दी पर आसीन किया। इस प्रकार फिर से दिल्ली में मुग़ल वंश की नींव पड़ी।
| तिलवाड़ा का युद्ध | 1560 ई. | बैरम खाँ बनाम मुग़ल सेना | अकबर |
➣ बैरम खां और पीर मोहम्मद के नेतृत्व में मुगल सेना के मध्य व्यास नदी के तट पर तिलवाड़ा का युद्ध हुआ। युद्ध में बैरम खान पराजित हुआ और अकबर के सामने पेश किया जहां अकबर द्वारा तीन प्रस्ताव दिए गए।
➣ दिए गए कई प्रस्ताव में बैरम खां ने हज यात्रा को स्वीकारा और यात्रा पर निकल गया। इसी दौरान गुजरात में मुबारिज खां नामक व्यक्ति, जिसके पिता को बैरम खां ने मछीवाड़ा के युद्ध में मार दिया था, ने बैरम खां की हत्या कर दी।
| मालवा युद्ध | 1561ई. | अकबर बनाम बाजबहादुर | अकबर |
| तालीकोटा का युद्ध | 1565ई. | विजयनगर बनाम मुस्लिम संघ | मुस्लिम संघ |
➣ तालीकोटा मुस्लिम संघ (अहमदनगर, बीजापुर, गोलकुण्डा और बीदर ) तथा विजय नगर (दक्षिण भारत का हिन्दू राज्य) के मध्य हुआ। विजय नगर की तरफ से नेतृत्व प्रधानमंत्री रामराय ने किया। युद्ध में रामराय मारा गया, फलत: विजयनगर समाप्त हो गया।
➣ गोलकुण्डा और बरार के मध्य पारस्परिक शत्रुता के कारण बरार इस युद्ध बरार शामिल नहीं हुआ।
➣ इस युद्ध को राक्षसी तंगड़ी का युद्ध और बन्नीहट्टी का युद्ध के नाम से भी जाना जाता है।
| हल्दीघाटी का युद्ध | 1576 ई. | प्रताप बनाम अकबर | अकबर |
➣ हल्दीघाटी के युद्ध की गणना महत्वपूर्ण युद्धों में की जाती है। इसमें महाराणा प्रताप ने बहलोल खान को उसके घोड़े समेत दो हिस्सों में चीर दिया था।
➣ युद्ध में मुग़ल सेना का नेतृत्व हिन्दू सेनापति मान सिंह ने किया था। यद्दपि युद्ध में महाराणा प्रताप परास्त हुए किन्तु इस युद्ध से उन्हें इतिहास में ख्याति प्राप्त हुई।
| काबुल का युद्ध | 1581 ई. | अकबर बनाम मिर्जा हकीम | अकबर |
| अहमदनगर का युद्ध | 1600 ई. | अकबर व चाँदबीबी | अकबर |
| असीरगढ़ का युद्ध | 1601 ई. | अकबर बनाम मीरन बहादुरशाह | अकबर |
➣ असीरगढ़ का युद्ध अकबर का अंतिम अभियान था। तत्पश्चात 21 अक्टूबर, 1605 को अकबर की मृत्यु हो गयी।
| जहाँगीर के मेवाड अभियान | 1608-14 ई. s | जहाँगीर बनाम अमरसिंह | जहाँगीर |
| शाहजहाँ के मध्य एशियाई युद्ध | 1645 ई. | शाहजहाँ बनाम नजर मुहम्मद | |
| कन्धार के अभियान | 1648-53 ई. | शाहजहाँ बनाम फारस | अनिर्णित |
| इलाहाबाद के युद्ध | 1657 ई. | दारा बनाम शुजा | दारा |
| धरमत का युद्ध | 1658 ई. | दारा बनाम औरंगजेब व मुराद | औरंगजेब व मुराद |
| सामूगढ़ का युद्ध | 1658 ई. | दारा बनाम औरंगजेब व मुराद | औरंगजेब व मुराद |
| देवराई का युद्ध | 1659ई. | औरंगजेब बनाम दारा | औरंगजेब |
➣ उत्तराधिकार की अन्तिम लड़ाई दारा एवं औरंगज़ेब के मध्य 12 -14 अप्रैल, 1659 ई. को देवरई की घाटी में हुआ। इस युद्ध में पराजित होने के उपरांत दारा को उसके दोनों
बेटों सुलेमान और सिपहर को गिरफ़्तार कर मार दिया गया।➣ देवराई के युद्ध के पश्चात औरंगजेब दिल्ली की गद्दी पर आसीन हुआ। ज्ञातव्य हो शाहजहां ने बड़े पुत्र दारा शिकोह को उत्तरधिकारी नियुक्त किया था।
| पुरन्दर का युद्ध | 1664 ई. | शिवाजी बनाम मुगल | मुग़ल |
➣ इस युद्ध के दौरान ही शिवाजी ने मुग़लों के प्रसिद्ध बंदरगाह सूरत को लूटा था। इसके पश्चात औरंगजेब ने शिवाजी को रोकने के लिए राजा जय सिंह को भेजा था, इसके पश्चात ही राजा जय सिंह और शिवाजी के मध्य पुरंदर की संधि हुई थी।
| तिलपत का युद्ध | 1670 ई. | गोकला जाट बनाम मुगल | गोकला जाट |
| सलहार का युद्ध | 1672 ई. | शिवाजी बनाम मुग़ल | शिवाजी |
➣ इस युद्ध के बाद शिवाजी ने उन सारे प्रदेशों पर अधिकार कर लिया था, जो पुरन्दर की संधि के अन्तर्गत उन्हें मुग़लों को देने पड़े थे।
| औरंगजेब मेवाड़ युद्ध | 1679 ई. | औरंगजेब बनाम राजसिंह | औरंगजेब |
| औरंगजेब मारवाड़ युद्ध | 1680 ई. | औरंगजेब बनाम राठौड़ | औरंगजेब |
| बीजापुर का विलय | 1686ई. | औरंगजेब बनाम सिकन्दर आदिलशाह | औरंगजेब |
| गोलकुण्डा का विलय | 1687 ई. | औरंगजेब बनाम अबुल हसन | औरंगजेब |
| संगमनेर का युद्ध | 1689 ई. | औरंगजेब बनाम शम्भाजी | औरंगजेब |
| चमकौर का युद्ध | 1703 ई. | गोविन्द सिंह बनाम मुगल | मुगल |
| जाजऊ का युद्ध | 1707 ई. | मुअज्जम(बहादुर शाह जफ़र) बनाम आजम | मुअज्जम |
| बीजापुर का युद्ध | 1709 ई. | मुअज्जम बनाम आजम | मुअज्जम |
➣ औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात तीनो शहजादों (मुहम्मद मुअज्जम, काम्बख्स ,मुहमद आजम, अन्य दो उत्तराधिकारियों की मृत्यु पहले ही हो चुकी थी) में उत्तरधिकारी के लिए युद्ध हुआ। गुरु गोविन्द सिंह ने इस उत्तराधिकार युद्ध में मुहम्मद मुअज्जम (बहादुरशाह प्रथम) का साथ दिया।
➣ जाजऊ का युद्ध तथा बीजापुर का युद्ध दोनों इसी से सम्बंधित हैं। बीजापुर के युद्ध में ने मुअज्जम ने कामबख़्श को पराजित किया। इस युद्ध कामबख़्श घायल हुआ तथा अगले ही दिन उसकी मृत्यु हो गयी।
➣ उत्तराधिकारी के युद्ध में 63 वर्षीय मुहम्मद मुअज्जम (बहादुरशाह प्रथम) विजयी रहा और दिल्ली की राजगद्दी पर बैठा।
| शकूरखेड़ा का युद्ध | 1724 ई. | निजाम बनाम मुबारिज खाँ | निजाम |
| पालखेद का युद्ध | 1727ई. | निजाम बनाम बाजीराव | बाजीराव |
| वार्ना का युद्ध | 1730 ई. | श्रीपतराव बनाम शम्भाजी-II | श्रीपतराव |
| दभई का युद्ध | 1731 ई. | न्यम्बकराव दाभाड़े बनाम बाजीराव | बाजीराव |
| भोपाल का युद्ध | 1737 ई. | बाजीराव बनाम निजाम | बाजीराव |
| करनाल का युद्ध | 1739 ई. | नादिरशाह बनाम मुहम्मदशाह | नादिरशाह |
➣ नादिरशाह, फारस का शासक जिसे ईरान का नेपोलियन भी कहा जाता है , एक विदेशी आक्रमणकारी था।
➣ मुग़ल सम्राट मुहम्मद शाह युद्ध परास्त हो गया फलत: 20 मार्च 1739 को नादिरशाह ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया और फारसी साम्राज्य की स्थापना की।
➣ मुग़ल सम्राट मुहम्मद शाह ने अपनी पुत्री का विवाह नादिरशाह के पुत्र नासिरूल्लाह मिर्जा से कर दिया। फलस्वरूप नादिरशाह ने मुहम्मद शाह को मुग़ल सम्राट घोषित कर दिया।
➣ 1 /2 महीने दिल्ली में रहने के पश्चात नादिरशाह वापस चला गया और अपने साथ वह कोहिनूर हीरा और तख्ते-ए ताऊस भी साथ ले गया।
आगे चलकर कोहिनूर/ हीरा नादिरशाह के उत्तरधिकारियों में शाहशुजा ने महाराजा रणजीत सिंह को भेंट किया और रणजीत सिंह के उत्तरधिकारियों में दिलीप सिंह ने एक समझौते के तहत इसे महारानी विक्टोरिया को भेंट कर दिया।
| प्रथम कर्नाटक युद्ध | 1744-48 ई. | अंग्रेज बनाम फ्रांसीसी | फ्रांसीसी |
➣ अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के मध्य हुए संघर्ष को कर्नाटक युद्धों से जाना जाता है। इस युद्ध का प्रमुख कारण अंग्रेजों द्वारा फ्रांसीसी जहाजों का अधिग्रहण करना था। युद्ध समझौते के तहत समाप्त हुआ।
| उदयगिरी का युद्ध | 1760 ई. | बालाजी बाजीराव बनाम निजाम | बालाजी बाजीराव |
| पानीपत का तृतीय युद्ध | 1761 ई. | अहमदशाह अब्दाली बनाम मराठा | अहमदशाह अब्दाली |
➣ अफगानिस्तान का द्रुरानी शासक अहमदशाह अब्दाली नादिरशाह का सेनापति था। जिसने उसके पश्चात भारत पर आक्रमण किया।
➣ इससे पहले अब्दाली ने भारत पर पहला आक्रमण 1749 में पंजाब पर किया था। दिल्ली को विजित करने के पश्चात वहां उत्तराधिकारी नियुक्त कर वापस चला गया।
➣ मार्च, 1858 में पेशवा रघुनाथराव (राघोवा) दिल्ली पहुँचा और नजीबुद्दौला को दिल्ली से निकाल दिया तथा अदीना बेग को पंजाब का गर्वनर नियुक्त कर दिया।
➣ अहमदशाह अब्दाली ने मराठों से प्रतिशोध लेने के पुन: भारत आया। फलस्वरूप 14 जनवरी 1761 ई. में पानीपत का तृतीय युद्ध हुआ।
➣ पानीपत के तृतीय युद्ध के पश्चात मराठा शक्ति क्षीण हो गयी। युद्ध में बालाजी के पुत्र विश्वास राव, सदाशिव राव भाऊ भी मारे गए। इस युद्ध का ज्यादा फायदा अंग्रेजों को हुआ उन्हें इस बीच अपनी शक्ति बढाने को मौका मिल गया।
| वांडीवाश का युद्ध | 1760-61ई. | अंग्रेज बनाम फ्रांसीसी | अंग्रेज |
➣ वांडीवाश के युद्ध ने भारत से फ्रांसीसी शक्ति को ख़त्म कर दिया। युद्ध में फ़्राँसीसियों की हार हुई और उन्हें पाण्डिचेरी अंग्रेज़ों को सौंपना पड़ा
➣ अंग्रेजी सेना का नेतृत्व सर आयरकूट ने तथा फ्रांसीसी सेना की कमान लाली ने संभाली
➣ वाडीवाश का युद्ध फ़्राँसीसियों के लिए निर्णायक युद्ध था, क्योंकि विजय के साथ ही अंग्रेज़ों ने भारत में फ्राँसीसियों की राजनीतिक शक्ति समाप्त कर दी।
| प्लासी का यद्ध | 1757ई. | अंग्रेज बनाम सिराजुद्दौला | अंग्रेज |
➣ 23 जून 1757 को अंग्रेजों तथा बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला के मध्य हुआ। जिसमे अंग्रेजों का नेतृत्व रोबर्ट क्लाइव ने किया।
➣ नवाब की तरफ से मीरमदान, मोहनलाल तथा कुछ फ्रांसीसी सैनिक ने भाग लिया। मीरजाफ़र ने युद्ध में नवाब को धोखा दे दिया। युद्ध के कुछ समय बाद ही नवाब सिराजुद्दौला की भी हत्या कर दी गयी।
➣ प्लासी के युद्ध के पश्चात् अंग्रेजों ने मीरजाफर को बंगाल का नवाब बना दिया।
➣ इस युद्ध के पश्चात ही भारत में अंग्रेजी साम्राज्य की नींव पड़ी।
ब्लैक हॉल की घटना सिराजुद्दौला के समय ही घटित हुई थी।
| वेदरा का युद्ध | 1759 ई. अंग्रेज व डच | अंग्रेज |
➣ इस युद्ध ने डचों को भारतीय व्यापार से अलग कर दिया। अब फ्रांसीसी और डचों के बाद अंग्रेज शक्तिशाली बनकर उभरे।
| बक्सर का युद्ध | 1764 ई. | अंग्रेज बनाम मीर कासिम, शुजाउदैला व शाहआलम | अंग्रेज |
➣ बक्सर के युद्ध में विजय के बाद ही भारत में वास्तविक रूप से ब्रिटिश सत्ता स्थापित हुई थी।
➣ बक्सर का युद्ध 1763 ई. से ही आरम्भ हो चुका था, किन्तु मुख्य रूप से यह युद्ध 22 अक्तूबर, सन् 1764 ई. में लड़ा गया।
➣ इस युद्ध में एक ओर मुग़ल सम्राट शाह आलम द्वितीय, अवध का नवाब शुजाउद्दौला तथा मीर क़ासिम थे जबकि दूसरी ओर अंग्रेज़ी सेना का नेतृत्व उनका सेनापति कैप्टन मुनरो कर रहा था।
➣ किन्तु मीर कासिम अपने कुछ सहयोगियों की गद्दारी के कारण युद्ध हार गया। अब मुग़ल सम्राट शाह आलम द्वितीय, बंगाल का नवाब मीर क़ासिम एवं अवध का नवाब शुजाउद्दौला तीनों पूर्ण रूप से कठपुतली शासक हो गये थे।
| प्रथम आंग्ल मैसूर युद्ध | 1769-72 ई. | हैदर अली बनाम अंग्रेज | अनिर्णायक |
➣ युद्ध में अंग्रेजों का नेतृत्व जनरल जोसेफ स्मिथ ने किया। हैदर अली ने कूटनीति का प्रयोग कर मराठों और हैदराबाद के निजाम को अपनी तरफ मिला लिया और इस युद्ध में अंग्रेजों को बुरी तरह हराया।
➣ इसकी वजह से अंग्रेज हैदर के साथ 4 अप्रैल, 1769 को मद्रास की संधि करने के लिये विवश हो गए। इस संधि से कैदियों एवं विजित क्षेत्रों का आदान-प्रदान हुआ तथा अन्य राज्य द्वारा आक्रमण किये जाने की स्थिति में हैदर अली को अंग्रेज़ों ने सहायता प्रदान करने का वादा किया।
| प्रथम आंग्ल मराठा युद्ध | 1775-82 ई. | मराठे व अंग्रेज | अनिर्णायक |
➣ यह युद्ध सूरत की संधि का परिणाम था जो माधव रघुनाथ नारायण और अंग्रेजों के बीच हुई थी। परन्तु शीघ्र ही 1882 में महादजी सिंधिया की मध्यस्थता से सालबाई की संधि द्वारा प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध समाप्त हुआ।
➣ सूरत की संधि 1775 ई. में राघोवा (रघुनाथराव) और अंग्रेज़ों के बीच हुई। इस सन्धि के अनुसार अंग्रेज़ों ने राघोवा को सैनिक सहायता देना स्वीकार कर लिया। अंग्रेज़ों ने युद्ध में विजय के उपरांत उसे पेशवा बनाने का भी वचन दिया।
| द्वितीय आंग्ल मैसूर युद्ध | 1780-84 ई. | हैदर अली बनाम अंग्रेज | अनिर्णायक |
➣ यह अंग्रेजो के विश्वाघात का परिणाम था, 19 मार्च, 1779 को अंग्रेज़ों ने माही (हैदर अली के अधिकार क्षेत्र में स्थित एक छोटी फ़्राँसीसी बस्ती) पर अधिकार कर लिया। परिणाम स्वरूप द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध का सूत्रपात हुआ।
➣ फरवरी 1880 में हैदर अली अंग्रेज विरोधी गुट में शामिल होकर जुलाई, 1780 में सेना को लेकर कर्नाटक में कर्नल बेली के नेतृत्व में अंग्रेज़ी सेना को हराते हुए अर्काट पर अधिकार कर लिया।
| पोर्टोनोवा का युद्ध | 1781 ई. | अंग्रेज व हैदर अली | अंग्रेज |
➣ पोर्टो नोवो की लड़ाई 1781 ई. में मैसूर के हैदरअली और सर आयरकूट के नेतृत्व में कम्पनी फ़ौजों के बीच की गई।
➣ पोर्टोनोवा के युद्ध में हैदर अली परास्त तो हुआ परन्तु अंग्रेजो के इसका लाभ नहीं मिला। कुछ समय पश्चात ही हैदर अली ने अंग्रेजी सेना को परास्त कर दिया।
इसलिए ऐसा कहा जाता है कि हैदर अली एकमात्र ऐसा शासक था जो अंग्रेजों से कभी परास्त नहीं हुआ।
| तृतीय आंग्ल मैसूर युद्ध | 1790-92 ई. | अंग्रेज व मैसूर | अंग्रेज |
➣ तृतीय आंग्ल मैसूर युद्ध का प्रारम्भ अंग्रेजों द्वारा टीपू सुल्तान पर फ्रांसीसियों से अंग्रेजों के विरुद्ध गुप्त समझौता आरोप लगाकर प्रारम्भ किया गया।
➣ लॉर्ड कार्नवालिस ने दिसम्बर 1790 ई. में वेल्लोर और अम्बर की ओर से बढ़ते हुए मार्च 1791 में. में बंगलोर पर अधिकार कर लिया और 1790 तक टीपू की राजधानी श्रीरंगपट्टनम की घेराबंदी कर संधि करने के लिए बाध्य कर दिया।
| चतुर्थ आंग्ल मैसूर युद्ध | 1798-99 ई. | अंग्रेज व मैसूर | अंग्रेज |
➣ चतुर्थ आंग्ल मैसूर युद्ध के समय अंग्रेजी सेना का नेतृत्व बैलेजली हेरिस और स्टुअर्ट द्वारा के द्वारा किया गया। श्रीरंगपट्ट्नम को 17 अप्रैल को घेर लिया गया और 4 मई 1799 ई. को उस पर अधिकार हो गया।
➣ 4 मई, 1799 ई. को दुर्ग की रक्षा करते हुए टीपू शहीद हो गया। उसके पुत्रों ने आत्मसर्मपण कर दिया।
➣ तत्पश्चात अंग्रेजों के द्वारा मैसूर की गद्दी पर आडियार वंशीय बालक कृष्णाराय को बैठाया गया।
| लाखेड़ी का युद्ध | 1793ई. | मल्हार राव होल्कर बनाम महादजी | महादजी |
| द्वितीय आंग्ल मराठा युद्ध | 1802-05 ई. | अंग्रेज बनाम मराठा | अंग्रेज |
➣ बेसिन की सन्धि के परिणामस्वरूप अंग्रेज़ों और मराठों के बीच द्वितीय-आंग्ल मराठा युद्ध हुआ, युद्ध में तीन अन्य प्रमुख मराठा शक्तियों (पेशवा बाजीराव द्वितीय,दौलत राव सिंधिया, गायकवाड़,होल्कर-इंदौर,भोसले) की पराजय हुई।
➣ फलत: अंग्रेजों ने दिल्ली पर भी अधिकार कर लिया। अब मुग़ल बादशाह शाहजहां तृतीय अंग्रेजों का पेंशनर बनकर रह गया।
| तृतीय आंग्ला मराठा युद्ध | 1817-18 ई. | अंग्रेज एवं मराठा | अंग्रेज |
➣ यह युद्ध अन्तिम रूप से लॉर्ड हेस्टिंग्स के भारत के गवर्नर-जनरल बनने के बाद लड़ा गया।
➣ इस युद्ध के पश्चात अंग्रेज़ों ने पेशवा के पद को ही समाप्त कर दिया और तत्कालीन बाजीराव द्वितीय को कानपुर के निकट बिठूर में पेंशन पर जीने के लिए भेज दिया, जहाँ पर 1853 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।
बाजीराव द्वितीय अंतिम पेशवा हुए। मराठों के पतन में सर्वाधिक योगदान बाजीराव द्वितीय का ही माना जाता है।
| प्रथम आंग्ल बर्मा युद्ध | 1824 ई. | अंग्रेज एवं बर्मा | अंग्रेज |
➣ युद्ध का मुख्य कारण बर्मा राज्य की सीमाओं का ब्रिटिश साम्राज्य के आस-पास तक फैल जाना था, जिस कारण से अंग्रेज़ों के समक्ष एक संकट खड़ा होने का ख़तरा बड़ गया था।
➣ इस ख़तरे से छुटकारा पाने के लिए लॉर्ड एम्सहर्स्ट की सरकार ने बर्मा के विरुद्ध युद्ध घोषित कर दिया।
➣ अंग्रेज़ों ने दक्षिणी बर्मा की राजधानी प्रोम पर क़ब्ज़ा कर बर्मा सरकार को यन्दबू की सन्धि (1826 ई.) के लिए मजबूर कर दिया।
➣ अराकान और तेनासरीम के सूबे अंग्रेज़ों को सौंप दिये गये और मणिपुर को स्वाधीन राज्य के रूप में मान्यता प्रदान कर दी गई।
| प्रथम आंग्ल अफगान युद्ध | 1839-42 ई. | अंग्रेज एवं अफगानिस्तान | अनिर्णायक |
➣ युद्ध गवर्नर-जनरल लॉर्ड ऑकलैण्ड के समय में शुरू हुआ और यह उसके उत्तराधिकारी लॉर्ड एलनबरो के समय तक चलता रहा। इस युद्ध से कोई लाभ नहीं हुआ।
➣ रूस अपनी शक्ति काफ़ी बढ़ा चुका था और अब वह अफ़ग़ानिस्तान पर भी अपना प्रभाव जमाना चाहता था। रूस के समर्थन से फ़ारस की सेना ने अफ़ग़ानिस्तान के सीमावर्ती नगर हेरात को घेर लिया। जिसे इंग्लैंड की सरकार ने ब्रिटिश साम्राज्य के लिए ख़तरा माना।
➣ हालांकि उस समय फ़ारस और भारत के ब्रिटिश साम्राज्य के बीच में पंजाब में रणजीत सिंह और अफ़ग़ानिस्तान में दोस्त मुहम्मद का स्वतंत्र राज्य था।
| सिंध युद्ध | 1843 ई. | अंग्रेज बनाम सिन्ध | अंग्रेज |
| अलीवाल का युद्ध | 1845 ई. | अंग्रेज बनाम सिख | अंग्रेज |
| चिलयांनवाला का युद्ध | 1848 ई. | अंग्रेज बनाम सिख | अंग्रेज |
| गुजरात का युद्ध | 1849 ई. | अंग्रेज बनाम सिख | अंग्रेज |
| द्वितीय आंग्ल बर्मा युद्ध | 1852 ई. | अंग्रेज बनाम बर्मा | अंग्रेज |
➣ लॉर्ड डलहौज़ी ने, जो उस समय ब्रिटिश गवर्नर-जनरल था। उसने दक्षिणी बर्मा को ब्रिटिश भारत में मिला लिया।
➣ इस युद्ध में बर्मा की पराजय हुई तथा वह एक स्थलीय राज्य बनकर ही रह गया। अब उसके सभी विदेशी सम्बन्ध सिर्फ़ अंग्रेज़ों की इच्छा पर आश्रित हो गये।
| द्वितीय आंग्ल अफगान युद्ध | 1878-1880 ई. | अंग्रेज बनाम अफगान | अनिर्णायक |
➣ यह युद्ध वायसराय लॉर्ड लिटन प्रथम (1876-1880 ई.) के शासन काल में प्रारम्भ हुआ।
➣ द्वितीय आंग्ल-अफ़ग़ान युद्ध दो नीतियों की पारस्परिक प्रतिक्रिया का परिणाम था। एक नीति, जिसे अग्रसर नीति (फ़ारवर्ड पालिसी) कहा जाता था, इसके अनुसार कंधार तथा क़ाबुल दोनों ब्रिटिश साम्राज्य के लिए आवश्यक माने गये।
➣ दूसरी नीति के अनुसार रूस और इंग्लैंड, जो पूर्व में अपने साम्राज्य का विस्तार करने के कारण एक दूसरे के प्रतिद्वन्द्वी थे, दोनों अफ़ग़ानिस्तान को अपने प्रभाव के अंतर्गत रखना चाहते थे।
➣ इस दूसरे युद्ध में विजय के लिए अंग्रेज़ों को भारी क़ीमत चुकानी पड़ी। अंग्रेज़ अफ़ग़ानिस्तान पर स्थायी रूप से क़ब्ज़ा तो नहीं कर सके, लेकिन उन्होंने उसकी नीति पर नियंत्रण बनाये रखा।
| तृतीय आंग्ल बर्मा | 1882 ई. | अंग्रेज बनाम बर्मा | अंग्रेज |
➣ इस युद्ध के बाद उत्तरी बर्मा को ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य में मिला लिया गया। मांडले जेल यहीं स्थित हैं।
| तृतीय आंग्ल-अफ़ग़ान युद्ध | 1919 ई. | अंग्रेज बनाम अफगान | अनिर्णायक |
➣ अफ़ग़ानिस्तान के अमीर हबीबुल्लाह (1901-1919 ई.) के पुत्र शाह अमानुल्लाह (1919-1929 ई.) ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया जिसके फलस्वरूप तृतीय आंग्ल-अफ़ग़ान युद्ध शुरू हो गया।
➣ इस युद्ध में ब्रिटिश भारतीय सेना ने आधुनिक हथियारों तथा विमानों आदि का प्रयोग किया और अफ़ग़ानों को बुरी तरह पराजित किया।
➣ रावलपिण्डी की सन्धि-1919 के साथ ही यह युद्ध समाप्त हो गया। संधि के अंतर्गत अफ़ग़ानिस्तान के शाह को भारत से दी जाने वाली आर्थिक सहायता भी बंद कर दी गई।
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