भारतीय इतिहास की प्रमुख ऐतिहासिक संधियाँ

भारतीय इतिहास प्राचीन भारत भारतीय इतिहास की
📚 विषय सूची

पुरंदर की सन्धि : छत्रपति शिवाजी और राजा जय सिंह (22 जून 1665 ई.)

22 जून 1665 ई. में पुरंदर के किले पर मुगलों की विजय और रायगढ़ की घेराबंदी के बाद मिर्जा राजा जयसिंहशिवाजी के मध्य हुई।

➣ शिवाजी ने सन 1664 ई. में मुग़लों का एक महत्त्वपूर्ण बंदरगाह सूरत को लूटा था। तत्पश्चात औरंगजेब ने शिवाजी को परास्त करने के लिए आमेर राजा जयसिंह को भेजा।

➣ जय सिंह ने बीजापुर के सुल्तान, यूरोपीय शक्तियाँ तथा छोटे सामन्तों का सहयोग लेकर पूणा में शिवाजी पर आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में शिवाजी को हानि होने लगी और हार की सम्भावना को देखते हुए शिवाजी ने सन्धि का प्रस्ताव भेजा।

➣ संधि के तहत शिवाजी को चार लाख हूण वार्षिक आमदनी वाले 23 क़िले मुग़लों को सौंपने पड़े और उन्होंने अपने लिए सामान्य आय वाले केवल 12 क़िले रखे।

➣ मुग़लों ने शिवाजी के पुत्र शम्भाजी को पंज हज़ारी मनसब एवं उचित जागीर देना स्वीकर किया।

➣ मुग़लों ने शिवाजी के विवेकरहित और बेवफ़ा व्यवहार को क्षमा करना स्वीकार कर लिया।

➣ साथ ही शिवाजी को कोंकण और बालाघाट में जागीरें दी जानी थीं, जिनके बदले उन्हें मुग़लों को 13 किस्तों में चालीस लाख हूण की रक़म अदा करनी थी। इसके अलावा उन्हें बीजापुर के ख़िलाफ़ मुग़लों की सहायता भी करनी थी।

अलीनगर की सन्धि : बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला और अंग्रेज (9 फरवरी, 1757 ई.)

➣ अलीनगर की संधि, 9 फ़रवरी 1757 ई. को बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला और ईस्ट इंडिया कम्पनी के बीच हुई, जिसमें अंग्रेज़ों का प्रतिनिधित्व क्लाइव और वाटसन ने किया।

➣ अंग्रेज़ों द्वारा कलकत्ता पर दुबारा अधिकार कर लेने के बाद यह संधि की गई। इस संधि के द्वारा नवाब और ईस्ट इंडिया कम्पनी में निम्नलिखित शर्तों पर फिर से सुलह हो गई-

➣ ईस्ट इंडिया कम्पनी को मुग़ल बादशाह के फ़रमान के आधार पर व्यापार की समस्त सुविधाएँ फिर से दे दी गईं।

कलकत्ता में क़िले की मरम्मत की इजाज़त भी दे दी गई।

➣ कलकत्ता में सिक्के ढालने का अधिकार भी उन्हें दे दिया गया तथा नवाब के द्वार कलकत्ते पर अधिकार करने से अंग्रेज़ों को जो क्षति हुई थी, उसका हर्जाना देना भी स्वीकार किया गया और दोनों पक्षों ने शान्ति बनाये रखने का एक-दूसरे से वायदा किया।

➣ हालाँकि इस संधि पर हस्ताक्षर करने के एक महीने बाद ही अंग्रेज़ों ने इसका उल्लघंन कर, कलकत्ता से कुछ मील दूर गंगा नदी के किनारे की फ़्राँसीसी बस्ती चन्द्रनगर पर आक्रमण करके उस पर अपना अधिकार कर लिया।

➣ उसके दूसरे महीने जून में अंग्रेज़ों ने मीर ज़ाफ़र और नवाब के अन्य विरोधी अफ़सरों से मिलकर सिराजुद्दौला के विरुद्ध षड़यंत्र रचा। इस षड़यंत्र के परिणाम स्वरूप 23 जून, 1757 ई. को प्लासी की लड़ाई हुई, जिसमें सिराजुद्दौला हार गया तथा मारा गया।

प्लासी युद्ध के पश्चात ही भारत में अंग्रेजी साम्राज्य की नींव पड़ी।

इलाहाबाद की सन्धि : रॉबर्ट क्लाइव और बादशाह शाहआलम द्वितीय (1765 ई.)

➣ इलाहाबाद की सन्धि 1765 ई. में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की ओर से रॉबर्ट क्लाइव और मुग़ल बादशाह शाहआलम द्वितीय के मध्य हुई थी।

➣ इस सन्धि के द्वारा ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने कोड़ा और इलाहाबाद के ज़िले शाहआलम द्वितीय को लौटाना स्वीकार कर लिया।

➣ साथ ही कम्पनी ने बादशाह को 26 लाख रुपये वार्षिक ख़िराज देना स्वीकार किया था।

➣ इस सन्धि के बदले में बादशाह ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी’ (राजस्व वसूलने का अधिकार) सौंप दी।

मद्रास की सन्धि : हैदर अली और अंग्रेज (4 अप्रैल, 1769 ई.)

➣ मद्रास की संधि (1769) यह संधि प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध के बाद हैदर अली और अंग्रेज की बीच हुई थी।

➣ हैदर ने अंग्रज़ों (जनरल जोसेफ स्मिथ) से प्रतिशोध लेने के लिए फ़्राँसीसी सेना के साथ निज़ाममराठों से समझौता किया और एक संयुक्त सैनिक मोर्चा निकाला।

➣ निज़ाम की सहायता से उसने कर्नाटक पर अधिकार कर लिया, किन्तु शीघ्र ही 1768 ई. में निज़ाम युद्ध से पीछे हो गया और उसने अकेले हैदर अली को अंग्रेज़ों का सामना करने के लिए छोड़ दिया।

1768 ई. में वह मद्रास के पाँच मील निकट तक पहुँच गया तथा 1769 ई. में हैदर ने मंगलोर पर आक्रमण कर उस पर पुन: अधिकार करके अंग्रेज़ों को अपने अनुकूल सन्धि करने पर बाध्य कर दिया। अंग्रेज़ों ने विविश होकर मद्रास में हैदर अली की शर्तों पर 4 अप्रैल, 1769 को मद्रास की संधि कर ली।

➣ दोनों पक्षों ने एक दूसरे के जीते हुए क्षेत्रों को वापस किया, परन्तु हैदर अली ने करुर के क्षेत्र को वापस नहीं किया।

➣ इस सन्धि के अनुसार अंग्रेज़ों ने हैदर अली के विजित प्रदेशों पर उसके आधिपत्य को स्वीकार कर लिया और यह वायदा किया कि जब कभी भी मैसूर पर हमला होगा, अंग्रेज़ हैदर अली की मदद करेंगे।

➣ हालांकि 1770 ई. में जब मराठों (पेशवा माधवराव) ने मैसूर राज्य पर हमला किया तब अंग्रेज़ों ने अपना संधि के तहत सहयोग नहीं दिया।

बनारस की प्रथम सन्धि : अवध के नवाब शुजाउद्दौला तथा अंग्रेज (1773 ई.)

➣ यह सन्धि अवध के नवाब शुजाउद्दौला तथा ईस्ट इंडिया कम्पनी के बीच में हुई।

1772 ई. में नवाब ने रुहलों से इस आशय की सन्धि की थी कि यदि मराठों ने उन पर आक्रमण किया, तो वह मराठों को इधर नहीं बढ़ने देंगे और इसके बदले में रुहल उसे 40 लाख रुपये की धनराशि देंगे।

➣ 1773 में मराठों ने रूहेलखण्ड पर आक्रमण किया, किन्तु वे बिना किसी युद्ध के ही वापस लौट गये। अब शुजाउद्दौला ने रुहलों से 40 लाख रुपयों की निर्धारित धनराशि की माँग की, और रुहेल उसे देने में आनाकानी करने लगे।

➣ अतएव शुजाउद्दौला ने ईस्ट इंडिया कम्पनी के साथ बनारस की प्रसिद्ध बनारस सन्धि कर ली,

➣ इस सन्धि के अनुसार कड़ा तथा इलाहाबाद ज़िले अवध के नवाब के अधीन कर दिये गए। अवध के नवाब शुजाउद्दौला ने इन ज़िलों की एवज में कम्पनी को पचास लाख रुपये तथा वार्षिक आर्थिक सहायता देना स्वीकार किया।

➣ इससे पहले यह ज़िले मुग़ल बादशाह शाहआलम द्वितीय को दिये गये थे।

➣ नवाब की शर्त के अनुसार कम्पनी ने नवाब के संरक्षण के लिए अवध में अपनी एक सैनिक टुकड़ी तैनात करना स्वीकार कर लिया और सेना का सम्पूर्ण व्यय-भार नवाब को वहन करना होगा।

➣ बनारस में ही उसे बंगाल के गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स द्वारा यह आश्वासन मिला, कि कम्पनी रुहलों से 40 लाख रुपये प्राप्त करने में शुजाउद्दौला की सहायता अंग्रेज़ पलटन के द्वारा करेगी क्योंकि शुजाउद्दौला की दृष्टि में रुहलों से वह धनराशि उसको मिलनी थी।

बनारस की द्वितीय सन्धि : राजा चेतसिंह और अंग्रेज (1775 ई.)

➣ यह सन्धि राजा चेतसिंह और ईस्ट इंडिया कम्पनी के बीच में हुई थी। चेतसिंह बनारस का राजा था, जो ईस्ट इंडिया कम्पनी के प्रति निष्ठा रखता था। उसकी मैसूर और मराठों से कभी नहीं बनती थी।

➣ पहले चेतसिंह अवध के नवाब का सामन्त था, लेकिन बाद में उसने अपनी निष्ठा ईस्ट इंडिया कम्पनी के प्रति व्यक्त की और संधि कर ली।

➣ उसने यह प्रभुत्व इस शर्त पर स्वीकार किया कि, वह कम्पनी को 22.5 लाख रुपये का वार्षिक नज़राना दिया करेगा।

➣ सन्धि में इस बात का भी उल्लेख था कि, ईस्ट इण्डिया कम्पनी उससे अन्य किसी प्रकार की माँग नहीं करेगी।

➣ एक शर्त यह भी थी कि, कम्पनी का कोई भी व्यक्ति राजा के अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं करेगा, और न ही देश की शांति को भंग करेगा।

➣ इस निश्चित आश्वासन के बावजूद भी वारेन हेस्टिंग्स ने 1778 – 1780 के वर्षों में और भी कई अतिरिक्त धन की माँग की। जिस राजा पुरा ना कर सका।

➣ हेस्टिंग्स ने चेतसिंह का सारा राजपाट ज़ब्त करके उसके भतीजे को इस शर्त पर सौंप दिया। यह घटना भारतीय इतिहास में चेतसिंह के मामले के नाम से जानी जाती है।

ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री पिट ने महसूस किया कि चेतसिंह के मामले में हेस्टिंग्स का व्यवहार क्रूर, अनुचित और दमनकारी था। हेस्टिंग्स पर महाभियोग लगाये जाने का एक कारण यह भी था।

सूरत की सन्धि : राघोवा (रघुनाथराव) और अंग्रेज़ (1775 ई.)

➣ सूरत की सन्धि 1775 ई. में राघोवा (रघुनाथराव) और अंग्रेज़ों के बीच हुई।

➣ राघोवा पेशवा बाजीराव प्रथम का द्वितीय पुत्र था। वह अपने बड़े भाई बालाजी बाजीराव की मृत्यु के बाद उसके पुत्र और अपने भतीजे माधवराव प्रथम को पेशवा बनाये जाने के ख़िलाफ़ था।

1772 ई. में जब माधवराव प्रथम की मृत्यु हो गई और उसका छोटा भाई नारायण राव अगला पेशवा बना। अपनी महत्त्वाकांक्षाओं पर पानी फिर जाने से उसने बम्बई जाकर अंग्रेज़ों से सहायता की याचना की तथा 1775 ई. में उनसे सन्धि कर ली, जो कि सूरत की सन्धि के नाम से प्रसिद्ध है।

➣ सन्धि के अंतर्गत अंग्रेज़ों ने रघुनाथराव की सहायता के लिए 2500 सैनिक देने का वचन दिया, परन्तु इनका समस्त व्यय भार रघुनाथराव को ही वहन करना था।

➣ इसके बाद में रघुनाथराव ने साष्टी और बसई तथा भड़ौच और सूरत ज़िलों की आय का कुछ भाग अंग्रेज़ों को देना स्वीकार कर लिया।

➣ साथ ही उसने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शत्रुओं से किसी प्रकार की सन्धि न करने तथा पूना सरकार से सन्धि या समझौता करते समय अंग्रेज़ों को भी भागी बनाने का वचन दिया।

➣ सन्धि के अनुसार बम्बई के अंग्रेज़ों ने रघुनाथराव का पक्ष लिया और प्रथम मराठा युद्ध आरम्भ हो गया। यह युद्ध 1775 ई. से 1783 ई. तक चलता रहा जिसकी समाप्ति सालबाई की सन्धि से हुई।

पुरन्दर की सन्धि : मराठों तथा अंग्रेज (1776 ई.)

➣ पुरन्दर की संधि मार्च 1776 ई. में मराठों तथा ईस्ट इंडिया कम्पनी के बीच हुई थी।

➣ बम्बई सरकार और अपने को पेशवा मानने वाले राघोवा के बीच 1775 ई. की सूरत की संधि के फलस्वरूप कम्पनी और मराठों के बीच युद्ध छिड़ गया था।[1]

➣ इस युद्ध रोकने के लिए कम्पनी ने अपने प्रतिनिधि कर्नल अपटन को मराठों से संधि वार्ता के लिए भेजा था।

➣ पुरन्दर की संधि के द्वारा अंग्रेज़ों ने इस शर्त पर राघोबा का साथ छोड़ना स्वीकार कर लिया कि, उन्हें साष्टी को अपने अधिकार में रखने दिया जायेगा।

कोर्ट ऑफ़ डाइरेक्टर्स ने इस संधि को नामंज़ूर कर दिया और जिसके फलस्वरूप मराठों से फिर युद्ध छिड़ गया।

➣ यह युद्ध 1782 ई. तक चलता रहा और सालबाई की सन्धि के द्वारा ही समाप्त हुआ।

➣ अंग्रेज़ों ने सालबाई में पुरन्दर की संधि की सभी शर्तें स्वीकार कर लीं और मराठों से एक प्रकार से सुलह कर ली।

बड़गाँव की सन्धि : अंग्रेज (कर्नल करनाक) और मराठा (1779 ई.)

➣ यह संधि जनवरी, 1779 ई. में प्रथम मराठा युद्ध (1776-82 ई.) के दौरान भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी की सरकार की ओर से कर्नल करनाक और मराठों के मध्य हुआ।

➣ इस समझौते के अनुसार तय हुआ कि कम्पनी की बम्बई सरकार 1773 ई. के बाद जीते गये समस्त इलाके मराठों को लौटा देगी और अपने वचनों का पालन करने की गारंटी के रूप में कुछ अंग्रेज़ अफ़सरों को बंधक के रूप में मराठों के सुपुर्द कर देगी।

राघोवा को, जिसको पेशवा की गद्दी पर बिठाने के उद्देश्य से अंग्रेज़ों ने लड़ाई छेड़ी थी, उसे मराठों को सौंप देगी। राघोबा ने महादजी शिन्दे की शरण लेकर अपनी प्राणरक्षा की।

➣ बंगाल से मदद के लिए आ रही ब्रिटिश सेना वापस लौटा दी जायेगी और भड़ौंच से प्राप्त राजस्व का एक हिस्सा महादजी शिन्दे को दिया जायेगा।

➣ सैनिक स्थिति अंग्रेज़ों के इतने अनुकूल नहीं थी कि वे इस प्रकार की शर्तें स्वीकार करते। गवर्नर-जनरल ने इस समझौते को अस्वीकृत कर दिया और समझौते करने वाले अंग्रेज़ अधिकारियों को नौकरी से बर्ख़ास्त कर दिया।

सालबाई की सन्धि : अंग्रेज और महादजी शिन्दे (1782 ई.)

➣ सालबाई की सन्धि, मई 1782 ई. में ईस्ट इण्डिया कम्पनी और महादजी शिन्दे के बीच हुई थी। फ़रवरी 1783 ई. में पेशवा की सरकार ने इसकी पुष्टि कर दी।

➣ इस संधि के फलस्वरूप 1775 ई. से चला आ रहा प्रथम मराठा युद्ध समाप्त हो गया।

➣ सन्धि की शर्तों के अनुसार साष्टी टापू अंग्रेज़ों के अधिकार में ही रहा और अंग्रेज़ों ने राघोवा का पक्ष लेना छोड़ दिया और मराठा सरकार ने इसे पेंशन देना स्वीकार कर लिया।

➣ अंग्रेज़ों ने माधवराव नारायण को पेशवा मान लिया और यमुना नदी के पश्चिम का समस्त भू-भाग महादजी शिन्दे को लौटा दिए।

➣ अंग्रेज़ों और मराठों में यह सन्धि 20 वर्षों तक शान्तिपूर्वक चलती रही।

➣ इस सन्धि से सर्वाधिक लाभ अंग्रेज़ों को ही प्राप्त हुआ क्योंकि अब उन्हें टीपू सुल्तान जैसे अन्य शत्रुओं से निश्चिन्तता पूर्वक निपटने तथा अपनी शक्ति और स्थिति को और भी मज़बूत करने का अवसर मिल गया।

मंगलौर की सन्धि : अंग्रेज़ और टीपू सुल्तान (3 मार्च, 1784 ई.)

➣ मंगलौर की सन्धि मार्च, 1784 ई. में अंग्रेज़ों और टीपू सुल्तान के मध्य हुई थी।

➣ टीपू सुल्तान द्वारा कई युद्धों में हारने के बाद मराठों एवं निज़ाम ने अंग्रेज़ों से संधि कर ली थी। ऐसी स्थिति में टीपू ने भी अंग्रेज़ों से संधि का प्रस्ताव किया। इसी के फलस्वरूप मंगलौर की संधि सम्पन्न हुई।

➣ संधि की शर्तों के अनुसार दोनों पक्षों ने एक दूसरे के जीते हुए प्रदेशों को वापस कर दिया। टीपू ने अंग्रेज़ बंदियों को भी रिहा कर दिया।

➣ टीपू ने मैसूर राज्य में अंग्रेज़ों के व्यापारिक अधिकार को माना।

➣ अंग्रेज़ों ने टीपू को आश्वासन दिया कि वे मैसूर के साथ मित्रता बनाये रखेंगे तथा किसी भी संकटकालीन परिस्थिति में उसकी सहायता करेंगे।

➣ टीपू के लिए यह संधि उसकी उत्कृष्ट कूटनीतिक सफलता थी। उसने अंग्रेज़ों से अलग से एक संधि कर मराठों की सर्वोच्चता को अस्वीकार कर दिया।

श्रीरंगपट्टनम की सन्धि : अंग्रेज़ और टीपू सुल्तान (5 फ़रवरी, 1792 ई.)

लॉर्ड कॉर्नवालिस ने तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध के दौरान 5 फ़रवरी, 1792 ई. को श्रीरंगपट्टम के किले पर अधिकार कर लिया। विवश होकर टीपू सुल्तान को अंग्रेजों से मार्च 1792 ई. में श्रीरंगपट्टम की संधि करनी पड़ी।

➣ इस सन्धि के अनुसार टीपू सुल्तान ने अपने दो पुत्रों को बंधक के रूप में अंग्रेज़ों को सौंप दिया और तीन करोड़ रुपये युद्ध के हरजाने के रूप में दिये, जो तीन मित्रों (अंग्रेज़-निज़ाम-मराठा) में बराबर बाँट लिये गये।

➣ साथ ही टीपू सुल्तान ने अपने राज्य का आधा भाग भी सौंप दिया, जिसमें से अंग्रेज़ों ने डिंडीगल, बारा महाल, कुर्ग और मालाबार अपने अधिकार में रखकर टीपू के राज्य का समुद्र से संबंध काट दिया और उन पहाड़ी दर्रों को छीन लिया, जो दक्षिण भारत के पठारी भू-भाग के द्वार थे।

➣ मराठों को वर्धा (वरदा) और कृष्णा नदियोंनिज़ाम को कृष्णा-पनार नदियों के बीच के भू-खण्ड मिले।

सहायक सन्धि : लॉर्ड वेलेजली द्वारा प्रारंभ (1798 ई.)

➣ वर्ष 1798 में लॉर्ड वेलेजली ने भारत में सहायक संधि प्रणाली की शुरुआत की, जिसके तहत सहयोगी भारतीय राज्य के शासक को अपने शत्रुओं के विरुद्ध अंग्रेज़ों से सुरक्षा प्राप्त करने के बदले में ब्रिटिश सेना के रखरखाव के लिये आर्थिक रूप से भुगतान करने को बाध्य किया गया था।

➣ इसने संबंधित शासक के दरबार में एक ब्रिटिश रेज़िडेंट की नियुक्ति का प्रावधान किया, जो शासक को अंग्रेज़ों की स्वीकृति के बिना किसी भी यूरोपीय को उसकी सेवा में नियुक्त करने से प्रतिबंधित करता था।

➣ कभी-कभी शासक वार्षिक रूप से आर्थिक भुगतान करने के बजाय अपने क्षेत्र का हिस्सा सौंप देते थे।

➣ सहायक संधि पर हस्ताक्षर करने वाला पहला भारतीय शासक हैदराबाद का निजाम था।

➣ सहायक संधि करने वाले देशी राजा अथवा शासक किसी अन्य राज्य के विरुद्ध युद्ध की घोषणा करने या अंग्रेज़ों की सहमति के बिना समझौते करने के लिये स्वतंत्र नहीं थे।

बसई की सन्धि : मराठा पेशवा बाजीराव द्वितीय और अंग्रेज़ (31 दिसम्बर, 1802 ई.)

बसई की सन्धि अथवा बसीन की सन्धि 31 दिसम्बर, 1802 में, भारत में पूना (पुणे) के मराठा पेशवा बाजीराव द्वितीय और अंग्रेज़ों के मध्य हुई थी।

➣ यह ‘मराठा महासंघ’ को तोड़ने की दिशा में एक निर्णायक क़दम था। इसके फलस्वरूप 1818 ई. में पेशवा के पश्चिमी भारत के क्षेत्रों का ईस्ट इण्डिया कम्पनी में विलय का मार्ग प्रशस्त हुआ।

बाजीराव द्वितीय एक क़ायर और विश्वासघाती व्यक्ति था। उसका मंत्री नाना फड़नवीस थे। किन्तु 1800 ई. में नाना फड़नवीस की मृत्यु के बाद उसके रिक्त पद के लिए दौलतराव शिन्दे और जसवन्तराव होल्कर में प्रतिद्वन्द्विता शुरू हो गई थी।

➣ इस प्रतिद्वंद्विता के कारण जो युद्ध हुआ, उसमें बाजीराव द्वितीय ने शिन्दे का साथ दिया, लेकिन होल्कर की सेना ने उन दोनों की संयुक्त सेना को पराजित कर दिया।

➣ भयभीत पेशवा बाजीराव द्वितीय ने 1801 ई. में बसई भागकर अंग्रेज़ों की शरण ली और वहीं एक अंग्रेज़ी जहाज़ पर बसई की सन्धि पर हस्ताक्षर कर दिये।

➣ संधि के अनुसार अंग्रेज़ों ने बाजीराव द्वितीय को राजधानी पूना में पुन: सत्तासीन करने का वचन दिया और पेशवा की रक्षा के लिए उसने राज्य में पर्याप्त सेना रखने की ज़िम्मेदारी ली।

➣ सन्धि के तहत पेशवा अंग्रेज़ों की सेना की छह बटालियनों का ख़र्च वहन करने को राज़ी हुआ, जिसका ख़र्च उठाने के लिए एक इलाका प्रत्यर्पित किया गया।

➣ इसके साथ ही सभी यूरोपीय लोगों को सेवा से हटाने, सूरत व बड़ौदा पर दावा ख़त्म करने और अंग्रेज़ों की सलाह से ही अन्य देशों के साथ सम्बन्ध रखने की भी शर्तें मान ली गईं।

➣ बदले में आर्थर वेलेजली (जो बाद में वेलिंग्डन के पहले ड्यूक बने) ने मई, 1803 में पेशवा को पूना वापस दिला दिया। इस तरह से अग्रणी मराठा राज्य अंग्रेज़ों की मदद लेने लगा था।

➣ मराठा सरदारों ने बसई की सन्धि के प्रति अपना रोष प्रकट किया, क्योंकि उन्हें लगा कि पेशवा ने अपनी क़ायरता के कारण उन सभी की स्वतंत्रता बेच दी है।

➣ इस युद्ध सन्धि के परिणामस्वरूप अंग्रेज़ों और मराठों के बीच दूसरा मराठा युद्ध (1803-05 ई.) हुआ, जिसमें तीन अन्य प्रमुख मराठा शक्तियों की पराजय हुई।

देवगाँव की सन्धि : रघुजी भोंसले और अंग्रेज (17 दिसम्बर, 1803 ई.)

➣ देवगाँव की संधि अथवा ‘देवगढ़ की संधि’ 17 दिसम्बर, 1803 ई. को रघुजी भोंसले और अंग्रेज़ों के बीच हुई थी।

द्वितीय मराठा युद्ध के दौरान आरगाँव की लड़ाई , नवम्बर, 1803 में अंग्रेज़ों ने रघुजी भोंसले को पराजित किया था, उसी के फलस्वरूप यह संधि हुई।

➣ इस संधि के अनुसार बरार के भोंसला राजा ने अंग्रेज़ों को कटक का प्रान्त दे दिया, जिसमें बालासौर के अलावा वरदा नदी के पश्चिम का समस्त भाग शामिल था।

➣ भोंसला राजा को अपनी राजधानी नागपुर में ब्रिटिश रेजीडेण्ट रखने के लिए मजबूर होना पड़ा। उसने निज़ाम अथवा पेशवा के साथ होने वाले किसी भी झगड़े में अंग्रेज़ों को पंच बनाना स्वीकार कर लिया।

➣ अंग्रेज़ों ने उससे यह वायदा भी लिया कि, वह अपने यहाँ कम्पनी सरकार की अनुमति के बिना किसी भी यूरोपीय अथवा अमेरिकी को नौकरी नहीं देगा।

➣ व्यावहारिक दृष्टिकोण से इस संधि ने भोंसले को अंग्रेज़ों का आश्रित बना दिया।

सुर्जी अर्जुनगाँव की सन्धि : अंग्रेज़ और दौलतराव शिन्दे (1803 ई.)

➣ अमृतसर की सन्धि 25 अप्रैल, 1809 ई. को रणजीत सिंह और ईस्ट इंडिया कम्पनी के बीच हुई। उस समय लॉर्ड मिण्टो प्रथम, भारत का गवर्नर-जनरल था, जिसमे अंग्रेजो का प्रतिनिधित्व किया।

➣ इसके अनुसार रणजीत सिंह ने लुधियाना पर से अधिकार हटा लिया और अपने राज्यक्षेत्र को सतलुज नदी के उत्तर और पश्चिम तक ही सीमित रखना स्वीकार किया। इस प्रकार सतलज के पश्चिम में पंजाब राज्य का शासक महाराजा रणजीत सिंह को मान लिया गया।

➣ साथ ही उन्होंने सतलुज को दक्षिणवर्ती रियासतों के झगड़ों में हस्तक्षेप न करने का वचन दिया। परिणामस्वरूप ये सभी रियासतें अंग्रेज़ों के संरक्षण में आ गईं।

➣ कश्मीर जो रणजीत सिंह के राज्य का हिस्सा था, उसे राजा दलीप सिंह से ले लिया गया और अंग्रेज़ों ने उसे गुलाब सिंह को दे दिया। गुलाब सिंह लाहौर दरबार का एक सरदार था। इसके बदले में उसने अंग्रेज़ों को दस लाख रुपये दिये।

➣ इसके बाद महाराजा रणजीत सिंह का विजय-अभियान पश्‍चिम और उत्‍तर की ओर ही रहा। इस समझौते ने एक पीढ़ी तक आंग्‍ल-सिक्‍ख संबंध को क़ायम रखा।

➣ इस संधि का तात्‍कालिक कारण नेपोलियन की रुसियों के साथ तिलसित संधि (1807) हो जाने के बाद पश्‍चिमोत्‍तर क्षेत्र में फ्रांसीसियों के हमले की आशंका एवं महाराजा रणजीत सिंह के सतलुज राज्‍यों को अपने नियंत्रण में लाने के संयुक्‍त प्रयास थे।

रणजीत सिंह एकमात्र ऐसा शासक था जिसने न तो अंग्रेज़ों से कोई युद्ध किया और न ही अंग्रेजी सेना को अपने राज्य के अन्दर घुसने दिया।

अमृतसर की सन्धि : रणजीत सिंह और अंग्रेज (25 अप्रैल, 1809 ई.)

सुर्जी अर्जुनगाँव की सन्धि, 1803 ई. में अंग्रेज़ों और दौलतराव शिन्दे के बीच हुई थी। इस सन्धि के फलस्वरूप दोनों के बीच चलने वाला युद्ध समाप्त हो गया।

➣ सन्धि के अनुसार शिन्दे ने अपने दरबार में ब्रिटिश रेजीडेन्ट रखना स्वीकार कर लिया और बसई की सन्धि को स्वीकार किया।

➣ शिन्दे ने निज़ाम के ऊपर अपने सारे दावे त्याग दिए और अंग्रेज़ों की सहमति के बिना अपनी नौकरी में किसी भी विदेशी को न रखने का वचन दिया।

➣ इसके अलावा उसने गंगा और यमुना के बीच का सारा दोआब, जिसमें दिल्ली और आगरा भी सम्मिलित था, अंग्रेज़ों को सौंप दिए।

➣ इस प्रकार उत्तरी भारत, दक्षिण तथा गुजरात में दौलतराव शिन्दे के समस्त राज्य पर अंग्रेज़ों का प्रभुत्व स्थापित हो गया।

➣ शिन्दे ने राजपूताना के अधिकांश राज्यों की राजनीति में भी कोई हस्तक्षेप न करने का वचन दिया।

➣ अर्जुनगाँव की सन्धि के द्वारा शिन्दे की स्वतंत्रता समाप्त हो गई तथा उत्तरी भारत के अधिकांश भाग में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना साकार हुई।

ग्वालियर की संधि : लॉर्ड हेस्टिंग्स एवं मराठा सरदार महादजी शिन्दे, 5 नवंबर 1817

➣ पिंडरियों के विरुद्ध अभियान के दौरान अंग्रेज़ अधिकारी लॉर्ड हेस्टिंग्स एवं मराठा सरदार महादजी शिन्दे के बीच 5 नवंबर 1817 को एक संधि हुई, जिसे ग्वालियर की संधि कहा जाता है।

➣ इस सिन्धु के अनुसार सिंधिया पिंडरियों की पुनः नियुक्ति नहीं करेगा और न कोई सहायता करेगा।

➣ सिंधिया पिंडरियों के विरुद्ध 5000 घुड़सवार नियुक्त करेगा। *सिंधिया अंग्रेजों की सहमति के बिना अपनी सेना की स्थिति परिवर्तन एवं उनकी बढ़ोतरी नहीं करेगा।

➣ इसके साथ ही अरजानगांव और सुरजी की संधियों के होने के बावजूद अंग्रेजों को उदयपुर, जोधपुर, कोटा, बूंदी और चंबल के किनारे के अन्य राज्यों के साथ संबंध बनाने में छूट होगी।

पूना की संधि : ( बाजीराव द्वितीय और कंपनी, 3 जून, 1818)

➣ यह संधि तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध के अंत में हुई, जिसके बाद पेशवा ने अपना राज्य छोड़ दिया और मराठा शक्ति का अंत लगभग हो गया। इस समय अंग्रेजों का गवर्नर-जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स था।

➣ यह संधि 3 जून, 1818 ई. को पेशवा बाजीराव द्वितीय और अंग्रेज़ों के बीच हुई थी। इसमें मराठों की निर्णायक हार हुई।

नवंबर 1817 में बाजीराव द्वितीय ने पूना की अंग्रेज़ी रेजीडेन्सी को लूटकर जला दिया तथा खड़की स्थित अंग्रेज़ी सेना पर आक्रमण किया, परंतु वह पराजित हो गया। इस संघर्ष में उसका योग्य सेनापति गोखले मारा गया।

➣ इसके बाद मराठों की हार जनवरी 1818 में कोरेगाँव और फरवरी 1818 में आष्टी की लड़ाई में हुई।

➣ अंततः 3 जून, 1818 ई. को बाजीराव द्वितीय ने अंग्रेज़ों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया और पूना की संधि स्वीकार की।

➣ इस संधि के बाद अंग्रेज़ों ने पेशवा पद समाप्त कर दिया तथा बाजीराव द्वितीय को बंदी बनाकर बिठूर (कानपुर के निकट) भेज दिया, जहाँ 1853 ई. में उसकी मृत्यु हुई।

➣इस घटना के साथ मराठा शक्ति का अंतिम अंत हो गया और भारत में अंग्रेज़ों का वर्चस्व और मजबूत हो गया।

इस प्रकार मराठों की स्वतंत्रता नष्ट करने के लिए बाजीराव द्वितीय सबसे अधिक ज़िम्मेदार माना गया है।

गंडमक की सन्धि : लॉर्ड लिटन और याक़ूब ख़ाँ (1879 ई.)

➣ गंडमक की संधि द्वितीय अफ़ग़ान युद्ध (1878-1880 ई.) के दौरान मई 1879 ई. में भारतीय ब्रिटिश सरकार के तत्कालीन वाइसराय लॉर्ड लिटन और अफ़ग़ानिस्तान के अपदस्थ अमीर शेरअली के पुत्र याक़ूब ख़ाँ के बीच हुई थी।

➣ इस संधि के अंतर्गत याक़ूब ख़ाँ, जिसे अमीर के रूप में मान्यता दी गई थी, अपने विदेशी सम्बन्ध ब्रिटिश निर्देशन से संचालित करने, राजधानी काबुल में ब्रिटिश रेजीडेंट रखने और कुर्रम दर्रे व पिशीन और सीबी ज़िलों को ब्रिटिश नियंत्रण में कर देने के लिए राज़ी हो गया।

➣ गंडमक की संधि लॉर्ड लिटन की अफ़ग़ान नीति की सबसे बड़ी उपलब्धि थी, किन्तु अंग्रेज़ों की यह विजय अल्पकालीन थी।

➣ गंडमक संधि के केवल चार महीने बाद ही 2 सितम्बर, 1879 ई. को अफ़ग़ानों ने फिर सिर उठाया और उन्होंने ब्रिटिश रेजीडेण्ट की हत्या कर गंडमक संधि को रद्द कर दिया।

➣ अफ़ग़ानिस्तान में युद्ध फिर से भड़क उठा और वह फिर तभी समाप्त हुआ, जब अंग्रेज़ों ने अपने आश्रित याक़ूब ख़ाँ को अफ़ग़ानों के हाथ समर्पित कर दिया और क़ाबुल में अपना रेजीडेण्ट रखने का विचार तथा संधि के अंतर्गत मिला समग्र अफ़ग़ान क्षेत्र त्याग दिया।

सुगौली सन्धि : ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी और नेपाल (04 मार्च, 1816 ई.)

➣ सुगौली सन्धि 19वीं सदी के शुरुआती दौर में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी और नेपाल के मध्य हुई थी। यह सन्धि 4 मार्च, 1816 ई. को सम्पन्न हुई।

➣ इस सन्धि के साथ ही अंग्रेज़ोंनेपालियों के बीच वर्ष 1814 ई. से चली आ रही जंग का अंत हो गया।

➣ सन्धि के तहत नेपाल को अपना एक-तिहाई इलाका ब्रिटिश भारत के अधीन कर देना पड़ा। इसमें पूर्वी छोर पर स्थित दार्जिलिंग व तिस्ता, दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र में बसे नैनीताल, पश्चिमी छोर पर बसे कुमाऊँ, गढ़वाल के अलावा कुछ तराई इलाके भी शामिल थे।

➣ सन्धि के अनुसार काठमांडू में एक ब्रिटिश प्रतिनिधि की नियुक्ति तथा ब्रिटेन की सैन्य सेवाओं में गोरखाओं की नियुक्ति का मार्ग भी प्रशस्त हो गया।

वर्ष 1923 ई. में सुगौली सन्धि के स्थान पर सतत शांति व मैत्री संधि के नाम से एक नई संधि की गई।

लाहौर की सन्धि : अंग्रेज़ों और सिक्खों के बीच (09 मार्च, 1846 ई.)

➣ लाहौर की सन्धि अंग्रेज़ों और सिक्खों के मध्य 9 मार्च, 1846 ई. को हुई थी। इस सन्धि से लॉर्ड हार्डिंग ने लाहौर के आर्थिक साधनों को नष्ट कर दिया।

➣ सन्धि की शर्तों के अनुसार अंग्रेज़ों को दलीप सिंह ने सतलुज नदी के पार के प्रदेश तथा सतलुज नदी एवं व्यास नदी के मध्य स्थित सभी दुर्गों को देना भी स्वीकार कर लिया।

➣ इसके अलावा महाराजा ने डेढ़ करोड़ रुपये युद्ध हर्जाना के रूप में देना तथा अपनी सेना को 12,000 घुड़सवार एवं 20,000 पैदल सैनिकों तक सीमित रखना स्वीकार कर लिया। अंग्रेज़ों ने अल्पायु दलीप सिंह को महाराजा, रानी ज़िन्दा कौर (बीबी साहिबा) को संरक्षिका एवं लाल सिंह, जो ज़िन्दा रानी का प्रेमी था, को वज़ीर के रूप में मान्यता दी तथा सर हेनरी लॉरेन्स को लाहौर का रेजीडेन्ट नियुक्त किया।

➣ इसके अलावा 11 मार्च को सम्पन्न हुई एक पूरक सन्धि के द्वारा अंग्रेज़ी सेना को दिसम्बर, 1846 ई. तक लाहौर में रख दिया गया। जिसमे हार्डिंग ने यह तर्क दिया कि महाराजा दलीप सिंह के वयस्क होने तक सेना का वहाँ रहना अनिवार्य है।

वर्साय की सन्धि : जर्मनी और गठबन्धन देश (28 जून 1919 ई.)

➣ वर्साय की संधि 28 जून, 1919 ई. को हुई थी। यह संधि प्रथम विश्व युद्ध के अन्त में जर्मनी और गठबन्धन देशों- ब्रिटेन, फ़्राँस, अमरीका तथा रूस आदि के बीच में हुई।

प्रथम विश्व युद्ध में जर्मनी की पराजय हुई और उसने 28 जून, 1919 के दिन वर्साय की सन्धि पर हस्ताक्षर किये।

➣ इस संधि के परिणामस्वरूप जर्मनी को अपनी भूमि के एक बड़े हिस्से से हाथ धोना पड़ा। दूसरे राज्यों पर उसके द्वारा अधिकार करने पर पाबन्दी लगा दी गयी। उनकी सेना का आकार सीमित कर दिया गया और भारी क्षतिपूर्ति थोप दी गयी।

➣ वर्साय की सन्धि को जर्मनी पर जबरदस्ती थोपा गया था। इस कारण एडोल्फ हिटलर और अन्य जर्मन लोग इसे अपमानजनक मानते थे। यही कारण था कि यह सन्धि द्वितीय विश्व युद्ध के कारणों में से एक थी।

📚 Chapters

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    Swipe left/right to change content

    Share This Page

    WhatsApp Telegram