Subject: भारतीय इतिहास

  • गहलौत वंश चितौड़ (7वीं शताब्दी–1303 ई.) : बप्पा रावल

    📚 विषय सूची

    गुहिल/गहलोत वंश/सिसोदिया वंश : मेवाड़ की प्रमुख राजपूत शक्ति

    ➣ सन् 556 ई. में जिस गुहिल वंश की स्थापना हुई, बाद में वही गहलौत वंश बना और इसके बाद यह सिसोदिया राजवंश के नाम से जाना गया। गहलौत वंश का इतिहास ही सिसोदिया वंश का इतिहास है।

    सन 712 ई. में अरबों ने सिंध पर आधिपत्य जमा कर भारत विजय का मार्ग प्रशस्त कर दिया था। इस काल में न तो कोई केन्द्रीय सत्ता थी और न कोई सबल शासक था। फ़लतः अरबों के और कई आक्रमण होने लगे।

    सन 725 ई. में अरबों जैसलमेर, मारवाड़, मांडलगढ और भडौच आदि इलाकों पर अपना आधिपत्य जमा लिया। ऐसे समय में दो शक्तियों का प्रादुर्भाव हुआ। एक गुर्जर-प्रतिहार एंव दूसरा गोहलोत।

    ➣ प्रतिहार शासक नागभाट ने जैसलमेर, मारवाड, मांडलगढ से अरबों को खदेड़कर जालौर में प्रतिहार राज्य की नींव डाली और बप्पा रायडे ने चित्तौड़ दुर्ग पर अधिकार कर सन 734 ई. में मेवाड़ में गहलौत वंश का वर्चश्व स्थापित किया।

    नागभट्ट प्रथम ने अरबों को पश्चिमी राजस्थान और मालवा से खदेड़ दिया। बापा ने यही कार्य मेवाड़ और उसके आसपास के प्रदेश के लिए किया।

    ➣ दोनों राजपूती वंशो ने अरबी आक्रमणों को सिंध क्षेत्र से आगे नहीं बढ़ने दिया। इस प्रकार आधुनिक भारत कुछ शताब्दियों तक मुस्लिम आक्रमण से सुरक्षित रहा।

    शासक शासनकाल परिचय / प्रमुख तथ्य
    राजा गूहिल / गुहादित्य लगभग 566 ई. गुहिल (गहलोत) वंश के संस्थापक माने जाते हैं। मेवाड़ क्षेत्र में प्रारंभिक राजपूत सत्ता स्थापित की और आगे चलकर यही वंश सिसोदिया राजवंश के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
    बप्पा रावल 734 – 753 ई. गुहिल वंश का महान और प्रसिद्ध शासक। मेवाड़ में शक्ति स्थापित की तथा अरब आक्रमणों के विरुद्ध संघर्ष के लिए प्रसिद्ध है। चित्तौड़ को अपनी राजधानी बनाया और मेवाड़ राज्य को मजबूत किया।
    रतन सिंह 1301 – 1303 ई. मेवाड़ का शासक, अलाउद्दीन खिलजी के चित्तौड़ आक्रमण (1303 ई.) के समय शासन किया। रानी पद्मिनी/पद्मावती की कथा तथा चित्तौड़ में पहला जौहर से जुड़ा महत्वपूर्ण नाम माना जाता है।

    राजा गूहिल / गुहादित्य (लगभग 566 ई.) : गुहिल वंश की स्थापना

    राजा गूहिल / गुहादित्य को मेवाड़ का वास्तविक संस्थापक माना गया है । इनके पिता शिलादित्य वल्लभी के शासक थे।

    शिलादित्य की रानी पुष्पवती ने मल्हियाँ गुफा के भीतर गुहिल को जन्म दिया। गुहिल का जन्म गुफा के भीतर हुआ इसलिए माता पुष्पावती ने बालक का नाम गोह/गुहिल रखा।

    ➣ गुहिल को कमलावती ने ईडर के राजा मांडलिक के पास संरक्षण के लिए रख दिया। ईडर के राजा मांडलिक भील ने गुहिल का लालन-पालन किया।

    ➣ कालांतर में यह ईडर के शासक बने और फिर राजस्थान के कई इलाकों पर अपना अधिकार कर लिया। ईडर से मेवाड़ स्थापित होने पर रावल गहलौत हो गई।

    रणसिंह (1158–1165) के शासनकाल में गुहिल/गहलौत वंश दो शाखाओं में बट गया- राणा शाखा एंव रावल शाखा।

    ➣ राजवंश की एक शाखा सिसोदे की जागीर की स्थापना करके सिसोदिया हो गई। चूँकि यह केन्द्रीय रावल गहलौत शाखा कनिष्ठ थी। इसलिये इसे राणा की उपाधि मिली।

    रावण रण सिंह के बाद रावल गहलोत की एक शाखा और हुई। जो सिसोदिया के जागीर पर आसीन हुई इसके संस्थापक माहव एवं राहप दो भाई थे। सिसोदा में बसने के कारण ये लोग सिसोदिया गहलौत कहलाये।

    ➣ कुछ पीढियों बाद एक युद्ध में रावल शाखा का अन्त हो गया और मेवाड़ की केन्द्रीय सत्ता पर सिसोदिया राणा का आधिपत्य हो गया। केन्द्रीय सत्ता के राणा, महाराणा हो गये।

    बप्पा रावल (734 – 753 ई.) : मेवाड़ शक्ति का विस्तार एवं अरब प्रतिरोध

    ➣ बप्पा रावल को कालभोज भी कहा जाता था। उनके पिता ईडर के शाषक महेंद्र द्वितीय (697–728) थे।

    ➣ जनता ने बप्पा रावल के प्रजासंरक्षण, देशरक्षण आदि कामों से प्रभावित होकर भीलों इसे बप्पा पदवी से विभूषित किया था।

    ➣ जब बप्पा रावल 3 वर्ष के थे तब भील समुदाय ने उनके प्राण बचाए थे। बप्पा रावल का बचपन भील जनजाति के बीच ही रहकर बिता। उनकी सेना में भीलों की प्रमुखता बतायी जाती है।

    ➣ बप्पा रावल के समय मेवाड़ की सामाजिक-आर्थिक संरचना कृषिप्रधान थी। उन्होंने क्षेत्रीय सामंतों व स्थानीय आदिवासी भीलों को अपनी वफादारी में लाने के लिए सहजीव नीति अपनाई।

    ➣ कर्नल टॉड के अनुसार सन् 734 ई. में बप्पा रावल ने चित्तौड़ दुर्ग (चित्रकूट) को राजपूताने पर राज्य करने वाले मौर्य वंश के अंतिम शासक मोन मौर्य से छीनकर गुहिल वंशीय राज्य की स्थापना की। रिचर्ड मैजलियार और आर. वी. सोमानी के अनुसंधान के अनुसार अरब आक्रमणों के बाद बप्पा रावल ने मोरियों के पतन के पश्चात चित्तौड़ पर विजय पाई

    ➣ बप्पा परम् शिव(एकलिंगनाथ) भक्त थे। उदयपुर के उत्तर में कैलाशपुरी में स्थित एकलिंगजी का मन्दिर का निर्माण 734 ई. में बप्पा रावल ने करवाया था। इसके अलावा उन्होंने सास – बहु का मंदिर(नागदा) आदिवराह मंदिर भी बनवाए।

    ➣ अपने सैन्य अभियानों में बप्पा ने ईरान के हज्जात , अरब के जुनैद , अफगान के सलीम को पराजित किया। पाकिस्तान के शहर रावलपिण्डी का नाम बप्पा के नाम से ही पड़ा जाना माना जाता है।

    ➣ बप्पा रावल प्रथम गुहिल शासक थे जिसने मेवाड़ में सोने के सिक्के चलाए।

    ➣ अजमेर में कुछ सोने के सिक्के मिले हैं जिन्हें बापा रावल का बताया गया है। इस सिक्के का तोल 115 ग्रेन (65 रत्ती) है।

    लगभग 753 ई. मे राजकार्य से सन्यास ले लिया। आम्र कवि द्वारा लिखित एकलिंग प्रशस्ति में बप्पा रावल के संन्यास लेने की घटना की पुष्टि होती है ।

    ➣ बप्पा रावल की मृत्यु राजधानी नागदा में हुई जहां उसकी समाधि बनी हुई है। जिसे वर्तमान में बप्पा रावल के नाम से जानते हैं।

    कुम्भलगढ़ प्रशस्ति में बप्पा रावल को विप्रवंशीय बताया गया है। इसके अलावा कीर्ति स्तम्भ शिलालेख, आबू के शिलालेख में भी बप्पा रावल का वर्णन मिलता है।

    रतन सिंह (1301 – 1303 ई.) : अलाउद्दीन खिलजी का चित्तौड़ आक्रमण

    ➣ रावल रतन सिंह (रतनसेन) गुहिलोत राजवंश की रावल शाखा के सदस्य थे। उनका वर्णन राजस्थानी लोक महाकाव्य पद्मावत में भी रतनसेन के नाम से मिलता है

    ➣ कुछ इतिहासकार इनका राज्याभिषेक 1301 ई. मानते हैं, पर सर्वाधिकतः 1302 में चित्तौड़ की बागडोली नामक किले से शासन प्रारंभ हुआ माना जाता है

    ➣ रतन सिंह को समकालीन दिल्ली का शासक अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण का सामना करना पड़ा था।

    ➣ रतन सिंह की पत्नी पद्मिनी या पद्मावती अद्वितीय सुन्दरी थी। ऐसा कहा जाता है कि उनके रूप का वर्णन सुनकर सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण किया था। लेकिन यह ऐतिहासिक स्रोतों में पुष्ट नहीं है।

    ➣ चित्तौड़ पर आक्रमण करने के लिए 28 जनवरी 1303 ई को अलाउद्दीन खिलजी सेना सहित दिल्ली से रवाना हुआ।

    ➣ इस आक्रमण में खिलजी के साथ प्रसिद्ध लेखक अमीर खुसरो भी था। खुसरो ने इस युद्ध का सजीव चित्रण करते हुए अपनी पुस्तक खजाइनुल फुतूह मैं किया है।

    ➣चित्तौड़ का छह माह तक भयंकर घेराबन्दी के बाद अंततः रावल रतन सिंह वीरगति को प्राप्त हुए। बाद में किले पर कब्जा होने पर रानी पद्मिनी सहित अन्य महिलाओं ने जौहर किया।

    ➣ युद्ध में रतन सिंह के दो सेनापति गोरा और बादल के नेतृत्व में राजपूतों ने केसरिया वस्त्र धारण कर किले के फाटक खोल कर शत्रुओं की सेना पर टूट पड़े और वीरगति को प्राप्त हुए।

    यह चित्तौड़गढ़ का प्रथम जौहर था।

    📌: मालिक मुहम्मद जयासी द्वारा रचित अवधी पद्य पद्मावत में इसे जीवंत रूप से वर्णित किया गया है। इसमें रानी पद्मिनी के जौहर का भव्य विवरण मिलता है।

    ➣युद्ध भूमि में रावल रतन सिंह के वीरगति को प्राप्त होने के साथ ही गुहिलोत राज की रावल शाखा का अंत हो गया।।

    ➣इनका शासनकाल अत्यन्त अल्प (लगभग 1 वर्ष) रहा और युद्ध की स्थिति में व्यतीत हुआ, कोई नया प्रशासनिक सुधार या नीति नहीं हुई। सम्भवतः पिछले शासनकाल की नीतियों का ही अनुसरण कर रहे थे।

    ➣ इस प्रकार 26 अगस्त 1303 ई को चित्तौड़गढ़ किला अलाउद्दीन खिलजी के अधीन हुआ। अल्लाउद्दीन खिलजी ने अपने पुत्र खिज्रखां को चित्तौड़गढ़ का शासन देकर दिल्ली लौट गया।

    ➣ अलाउद्दीन खिलजी ने अपने पुत्र खिज्र खां के नाम पर चित्तौड़ का नाम बदलकर खिजराबाद रख दिया।

    22 दिसंबर 1316 में अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु हो गई जिस कारण खिज्र खां चित्तौड़ से वापस दिल्ली गया और मेवाड़ मालदेव सोनगरा को सौंप दिया।

    ➣ इसके पश्चात मेवाड़ में एक नई शाखा सिसोदिया शाखा का आरंभ हुआ जिसके सूत्रधार राणा हम्मीर सिसोदिया थे।

    ➣ राणा हम्मीर से पहले चित्तौड़ के गुहिल वंश शासक रावल एवं गहलौत कहलाते थे (जैसे बप्पा रावल, रावल रतन सिंह )। राणा हमीर के पश्चात मेवाड़ का राजवंश सिसोदिया राजवंश के नाम से विख्यात हुआ।

  • चौहान वंश दिल्ली (8वीं शताब्दी–1192 ई.) : पृथ्वीराज चौहान

    📚 विषय सूची

    चौहानों की उत्पति

    कवि चंद बरदाई द्वारा लिखित पृथ्वीराज रासो के अनुसार एक बार ऋषियों ने आबू पर्वत पर यज्ञ करना आरंभ किया तो राक्षसों ने अपवित्र वस्तुएं डालकर यज्ञ को भ्रष्ट करने की चेष्टा की।

    ➣ इस पर महर्षि वसिष्ठ ने यज्ञ की रक्षा के लिये मंत्र-सिद्धि से चार पुरुषों को उत्पन्न किया जो प्रतिहार, परमार, चौलुक्य और चौहान कहलाये।

    ➣ पुराणों में आए आबू पर्वत के यज्ञ के वर्णन के आधार पर चारण तथा भाट चौहान, चौलुक्य, प्रतिहार एवं परमारों को अग्निवंशीय मानते हैं।

    पृथ्वीराज विजय, हम्मीर रासो, हम्मीर महाकाव्य आदि ग्रंथो में चौहानों को सूर्यवंशीय बताया गया है।

    ➣ चौहानों के एक भी शिलालेख में यह नहीं कहा गया है कि वे अग्निवंशी हैं। प्रत्येक शिलालेख में चौहानों ने स्वयं को सूर्यवंशी ही लिखा है।

    डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने भी चौहानों को सूर्यवंशीय क्षत्रिय माना है जिन्हें गोत्रोच्चार में चंद्रवंशीय माना जाता है।

    डॉ. दशरथ शर्मा चौहानों को ब्राह्मणों से उत्पन्न हुआ मानते हैं। चाहमानों का एक अत्यंत प्राचीन शिलालेख राजा रायपाल के समय का मिला है। इसे सेवाड़ी अभिलेख कहते हैं। इस अभिलेख में चाहमानों को इंद्र का वंशज बताया गया है।

    ➣ कुछ प्रमाणों के आधार पर चौहानों का सम्बन्ध मोरी वंश से जोड़ा जाता है जो प्राचीन मौर्य राजकुल के वंशज थे तथा चित्तौड़गढ़ के आसपास शासन करते थे।

    कर्नल टॉड ने इन्हें विदेशी माना है तथा अपने कथन के समर्थन में कहा है कि चाहमानों के रस्म और रिवाज मध्य एशियाई जाति के रस्म और रिवाज जैसे हैं। डॉ. स्मिथ तथा क्रुक ने भी इसी मत को स्वीकार किया है किंतु ओझा इस मत को स्वीकार नहीं करते।

    ➣ प्राचीन ग्रंथों में कहा गया है कि चौहानों का प्रारम्भिक राज्य राजस्थान के बीकानेर एवं नागौर क्षेत्र में था। यह रेगिस्तानी प्रदेश है तथा महाभारत काल से ही जांगल प्रदेश कहलाता था।

    मौर्य काल से लेकर गुप्तवंश के काल में इस क्षेत्र पर प्राचीन नागवंशी क्षत्रिय शासन करते थे। उनकी राजधानी को अहिछत्रपुर और नागौर भी कहा जाता था।

    ➣ अजमेर के सरस्वती कण्ठाभरण मंदिर (अब ढाई दिन का झौंपड़ा) परिसर से चौहान शासक विग्रहराज (चतुर्थ) के समय का एक शिलालेख मिला है जो अब राजकीय संग्रहालय अजमेर में सुरक्षित है।

    ➣ इस शिलालेख में चौहानों के आदि पुरुष चाहमान की स्तुति की गई है तथा उसे मालव वंश में उत्पन्न बताया गया है जो कि सूर्यवंश के इक्ष्वाकु कुल में उत्पन्न भगवान राम के छोटे पुत्र कुश के वंशज थे।

    मालव जाति प्रथम शताब्दी ईस्वी के अंत तक वर्तमान अजमेर जिले की सीमा पर वर्तमान जयपुर तथा टोंक नगरों के आसपास शासन करती थी। अतः पर्याप्त संभव है कि मालवों में से ही चाहमान नामक कोई राजा हुआ हो और उसके वंशजों से चौहानों की अलग शाखा चली हो।

    ➣ चूंकि चौहानों ने अपने शिलालेखों में स्वयं को रघुवंशी एवं सूर्यवंशी लिखा है, इसलिए चौहानों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में यही मत सर्वाधिक विश्वसनीय प्रतीत होता है कि वे मूलतः मालव थे।

    ➣ भारत के अधिकांश लोग पृथ्वीराज रासो को पृथ्वीराज चौहान का समकालीन ग्रंथ मानते हैं जो गलत है। पृथ्वीराज चौहान 12वीं सदी का शासक था जबकि पृथ्वीराज रासो 16वीं शताब्दी ई में लिखी गई।

    चन्दरबरदाई उसका मित्र व राजकवि था जिसका ग्रंथ पृथ्वीराज रासो हिन्दी साहित्य का प्रथम महाकाव्य माना जाता है।

    ➣ पृथ्वीराज चौहान के समय में कश्मीरी पंडित जयानक द्वारा पृथ्वीराज विजयम् संस्कृत महाकाव्य नामक ग्रंथ की रचना की गई थी। केवल यही ग्रंथ पृथ्वीराज चौहान के समय घटित घटनाओं का सबसे प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है।

    शासक शासनकाल परिचय / प्रमुख तथ्य
    अजयदेव चौहान 1105 – 1133 ई. चौहान वंश का महत्वपूर्ण शासक, अजमेर नगर को विकसित किया और उसे राजधानी के रूप में मजबूत बनाया। तुर्क आक्रमणों के विरुद्ध प्रतिरोध की नीति अपनाई।
    विग्रहराज चतुर्थ (वीसलदेव) 1155 – 1163 ई. चौहान वंश का शक्तिशाली शासक, दिल्ली और हरियाणा क्षेत्र तक प्रभाव बढ़ाया। साहित्य और शिक्षा का संरक्षक था। संस्कृत विद्यालयों और विद्वानों को संरक्षण दिया।
    पृथ्वीराज द्वितीय 1165 – 1169 ई. अल्पकालीन शासक, चौहान सत्ता की स्थिरता बनाए रखने का प्रयास किया लेकिन राजनीतिक चुनौतियाँ बढ़ती रहीं।
    सोमेश्वर 1169 – 1178 ई. पृथ्वीराज तृतीय के पिता, अजमेर और शाकंभरी क्षेत्र में चौहान शक्ति को बनाए रखा। उनके समय में चौहान साम्राज्य उत्तर भारत की प्रमुख शक्तियों में शामिल था।
    पृथ्वीराज तृतीय (पृथ्वीराज चौहान) 1178 – 1192 ई. चौहान वंश का सबसे प्रसिद्ध और अंतिम महान शासक। तराइन के प्रथम युद्ध (1191 ई.) में मुहम्मद गोरी को हराया, लेकिन तराइन के द्वितीय युद्ध (1192 ई.) में पराजित हुआ। इसके बाद उत्तर भारत में तुर्क शक्ति और दिल्ली सल्तनत की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ।

    प्रारम्भिक शासक

    राजशेखर (नौवीं-दसवीं शताब्दी ई) द्वारा लिखित प्रबंधकोष के अनुसार चौहान शासकों में वासुदेव पहला शासक था जिसने 551 ई. में सपादलक्ष (सांभर) में शासन किया।

    सन 551 ई. के लगभग चौहान शासक वासुदेव ने बीकानेर और नागौर के शुष्क रेतीले क्षेत्रों से आगे बढ़कर शाकंभरी नामक झील पर अधिकार कर लिया जिसे सांभर भी कहा जाता है। इस कारण उन्हें शाकंभरीश्वर तथा साम्भरेश्वर कहा जाने लगा।

    ➣ कुछ प्राचीन ग्रंथों में आए एक वर्णन के अनुसार भगवान शिव की पत्नी पार्वती देवी ने किसी चौहान राजकुमार की सेवा से प्रसन्न होकर इस पूरे क्षेत्र की भूमि को चांदी की झील में बदल दिया। तभी से इस देवी का नाम शाकंभरी पड़ा और वह चौहानों की कुल देवी कहलाई।

    वासुदेव चौहान का समय 551 के आसपास माना जाता है। पर्याप्त संभव है कि यह चौहानों का पहला राजा नहीं हो और चौहान राजवंश उससे पहले ही अस्तित्व में आ चुका हो क्योंकि वासुदेव तो चौहानों का वह पहला राजा था जिसने सांभर झील का प्रवर्तन किया था।

    ➣ वासुदेव चौहान का पुत्र सामंतदेव/सामंतराज हुआ। सामंतदेव का वंशज अजयराज था। अजयराज के वंशज प्रतिहार शासकों के अधीन रहकर राज्य करते थे।

    683 ई. के आसपास अजयपाल चौहानों का राजा हुआ। उसने अजमेर नगर की स्थापना की। अपने अंतिम वर्षों में वह अपना राज्य अपने पुत्र को देकर पहाड़ियों में जाकर तपस्या करने लगा। आज भी वे पहाड़ियां अजयपाल की घाटी कहलाती हैं।

    ➣ अजमेर में अजयपाल की पूजा अजयपाल बाबा के नाम से होती है। उसके नाम पर प्रतिवर्ष एक मेला भरता है जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु अजयपाल बाबा को श्रद्धांजलि देते हैं

    ➣ अजयपाल के बाद उसका पुत्र विग्रहराज प्रथम अजमेर का शासक हुआ। विग्रहराज प्रथम के बाद विग्रहराज प्रथम का पुत्र चंद्रराज प्रथम, चंद्रराज प्रथम के बाद विग्रहराज प्रथम का दूसरा पुत्र गोपेन्द्रराज अजमेर का राजा हुआ। इसे गोविंदराज प्रथम भी कहते हैं।

    ➣ गोविंदराज प्रथम मुसलमानों से लड़ने वाला पहला चौहान राजा था। उसने मुसलमानों की सेनाओं को अजमेर पहुचने से पहले ही नष्ट करके उनके सेनापति सुल्तान बेग वारिस को बंदी बनाया था।

    ➣ गोविंदराज प्रथम के बाद दुर्लभराज प्रथम अजमेर का राजा हुआ। अनेक ग्रंथों में इसे दुर्लभराय, दूल्हराय तथा दूलाराय भी कहा गया है। वह प्रतिहारों के अधीन शासन करता था।

    ➣ जब प्रतिहार शासक वत्सराज ने बंगाल के शासक धर्मपाल पर आक्रमण किया तब दुर्लभराज, प्रतिहारों के सेनापति के रूप में इस युद्ध में सम्मिलित हुआ था। दुलर्भराय का गौड़ राजपूतों से भी संघर्ष हुआ।

    चौहान शासक दुर्लभराज प्रथम पहला राजा था जिसके समय में अजमेर नगर पर मुसलमानों का सर्वप्रथम आक्रमण हुआ।

    अजमेर पर मुस्लिम आक्रान्ताओं का कब्ज़ा

    दुर्लभराज प्रथम के शासन काल में 724 ई. के लगभग खलीफा वली अब्दुल मलिक की सेना व्यापारियों के वेष में सिंध के मार्ग से अजमेर तक चढ़ आई।

    ➣ कुछ इतिहासकारों के अनुसार अजमेर दुर्ग पर यह आक्रमण 724 – 726 ई. के बीच, अब्दुल रहमान अल मारी के पुत्र जुनैद के नेतृत्व में हुआ जो खलीफा हाशम के अधीन सिंध का कमाण्डर था। खलीफा हाशम का काल 724 -743 ई. माना जाता है।

    ➣ इस युद्ध में राजा दुर्लभराज को प्रमुख चौहान सामंतों का सहयोग प्राप्त नहीं हुआ हुआ। इस कारण दुर्लभराज के परिवार के प्रत्येक पुरुष ने युद्ध में तलवार लेकर शत्रु का सामना किया था।

    ➣ इस युद्ध में राजा दुर्लभराज प्रथम का सात वर्षीय पुत्र लोत एक तीर लग जाने से वीर गति को प्राप्त हुआ। राजा दुर्लभराज की भी युद्धक्षेत्र में ही हत्या कर दी गई और तथा चौहान रानियों ने तारागढ़ दुर्ग में जौहर का आयोजन किया।

    ➣ इस प्रकार चौहानों के प्रमुख दुर्ग तारागढ़ पर मुसलमानों का अधिकार हो गया।

    ➣ राजा दुर्लभराज का छोटा भाई माणक राय अजमेर छोड़कर सांभर भाग गया। उसने संभवतः इस युद्ध में राजा दुर्लभराज का साथ नहीं दिया था। माणकराय सांभर का राजा बन गया। उसने सांभर में शाकम्भरी देवी का मंदिर बनवाया।

    ➣ खलीफा के गवर्नर द्वारा नासिरुद्दीन को अजमेर का शासक नियुक्त किया गया। संभवतः कुछ दिनों बाद मुसलमानों ने सांभर पर भी आक्रमण किया तथा राजा माणिकपाल भी मुसलमानों के हाथों मारा गया।

    ➣ कालांतर में जब राजा दुर्लभराज प्रथम का पुत्र गूवक बड़ा हुआ तो उसने तारागढ़ पर आक्रमण करके नासिरुद्दीन से अजमेर छीन लिया।

    कर्नल जेम्स टॉड ने मुलसमानों से अजमेर लेने वाले राजा का नाम हर्षराय लिखा है। वस्तुतः हर्षराय, राजा गूवक की उपाधि थी जो उसने भगवान शिव का हर्ष मंदिर बनवाकर प्राप्त की थी।

    चौहान शासक स्वयं को राय कहते थे। गूवक के पिता दुर्लभराज को दूल्हराय तथा चाचा माणिकपाल को माणिकराय कहा जाता था। इसी प्रकार पृथ्वीराज चौहान को राय पिथौरा कहा जाता था।

    ➣ राजा गूवक, जालौर के प्रतिहार राजा नागभट्ट का सामंत था। एक शिलालेख में कहा गया है कि राजा दुर्लभराज के पुत्र गूवक को 805 में नागावलोक की सभा में सम्मनित किया गया तथा उसे वीर की उपाधि दी गई। इस नागावलोक का आशय नागभट्ट से है।

    ➣ गूवक के काल में चौहानों की शक्ति में काफी विस्तार हुआ। उसने अपनी शक्ति के प्रतीक के रूप में भगवान शिव का एक मंदिर बनवाया जिसे हर्ष मंदिर कहा जाता था।

    ➣ भगवान शिव को भी हर्ष कहते हैं तथा उनके एक भैरव अवतार का नाम भी हर्ष है। भगवान हर्ष अजमेर के चौहानों द्वारा पूज्य थे।

    ➣ यह मंदिर इतना महत्वपूर्ण था कि जिन पहाड़ियों पर यह मंदिर स्थित है, उन्हें हर्ष की पहाड़ियां कहा जाता है।

    ➣ वर्तमान में इस मंदिर के खण्डहर राजस्थान के सीकर जिले में स्थित हैं। मंदिर से प्राप्त सबसे पुराना अभिलेख 956 का है जिसमें तत्कालीन चौहान शासक विग्रहराज का नाम अंकित है।

    813 से 833 तक अब्बासिया खानदान का अलमामूं बगदाद का खलीफा हुआ। उसने अपनी सेनाएं भारत पर आक्रमण करने के लिए भेजीं। इस सेना ने चित्तौड़ पर भी आक्रमण किया। उस समय चित्तौड़ पर गुहिल वंशी राजा खुंमाण द्वितीय का शासन था।

    ➣ चौहान शासक गूवक प्रथम के बाद उसका पुत्र चंद्रराज द्वितीय अजमेर का शासक हुआ। उसके बाद गूवक द्वितीय अजमेर का राजा हुआ।

    ➣ इस काल तक चौहानों की प्रतिष्ठा इतनी बढ़ गई थी कि गूवक द्वितीय की बहिन कलावती का विवाह प्रतिहार शासक भोज प्रथम के साथ हुआ।

    ➣ गूवक द्वितीय के बाद चंदनराज अजमेर की गद्दी पर बैठा। चंदनराज ने दिल्ली के निकट तंवरावटी पर आक्रमण किया तथा तंवरावटी के तोमर राजा रुद्रेन अथवा रुद्रपाल का वध कर दिल्ली के तोमर शासक, को अजमेर के अपने अधीन किया। तब से दिल्ली अजमेर के अधीन सामंत हो गए

    पृथ्वीराज विजय के अनुसार चंदनराज का उत्तराधिकारी वाक्पतिराज प्रथम हुआ जिसे बप्पराज भी कहा जाता है। हर्षनाथ लेख में उसे महाराज कहा गया है जो उसकी राजनीतिक स्थिति का सूचक है।

    11वीं शताब्दी ई में वाक्पतिराज चौहान ने प्रतिहारों को परास्त करके उनके कई क्षेत्र अपने राज्य में मिला लिये। इस कारण उसके राज्य की दक्षिणी सीमा विंध्याचल पर्वत तक जा पहुँची।

    ➣ वाक्पतिराज के तीन पुत्र थे। सिंहराज, लक्ष्मणराज तथा वत्सराज। वाक्पतिराज की मृत्यु के बाद 950 में सिंहराज उसका उत्तराधिकारी हुआ। लक्ष्मणराज नाडौल के पृथक राज्य का स्वामी हुआ जिसे लखनसी भी कहते थे।

    ➣ सिंहराज 956 तक जीवित रहा। हर्ष अभिलेख के अनुसार हर्ष मंदिर का निर्माण उसके काल में ही पूरा हुआ। इस अभिलेख में चौहानों की तब तक की वंशावली दी गई है।

    ➣ सिंहराज के बाद उसका पुत्र विग्रहराज द्वितीय चौहानों की गद्दी पर बैठा। विग्रहराज द्वितीय भी अपने पिता सिंहराज की तरह प्रतापी शासक हुआ। शक्राई लेख में उसे महाराजाधिराज लिखा गया है। उसने अपने राज्य का बड़ा विस्तार किया।

    ➣ विग्रहराज द्वितीय ने 973-996 के बीच की अवधि में गुजरात पर आक्रमण किया। इस समय गुजरात का शासक मूलराज सोलंकी (चौलुक्य) अपनी राजधानी छोड़ कच्छ भाग गया।

    हम्मीर महाकाव्य के अनुसार विग्रहराज द्वितीय ने गुजरात के राजा मूलराज का वध किया। यहाँ से चौहानों तथा चौलुक्यों का संघर्ष आरंभ हुआ जिसका लाभ अफगानियों ने उठाया।

    ➣ उसने दक्षिण में अपना राज्य नर्मदा तक बढ़ा लिया। उसने भरूच में आशापूर्णा देवी का मंदिर बनवाया। आशापूर्णा चौहानों की पूज्य देवी है जिसके मंदिर आज भी गुजरात एवं राजस्थान में मिलते हैं।

    ➣ विग्रहराज द्वितीय के बाद दुर्लभराज द्वितीय तथा उसके बाद गोविंदराज द्वितीय अजमेर के शासक हुए।

    1008-09 ई. में जब अफगानी आक्रांता महमूद गजनवी ने अजमेर राज्य पर आक्रमण किया। इस युद्ध में अजमेर के शासक गोविंदराज द्वितीय ने महमूद गजनवी को बुरी तरह परास्त किया था।

    पृथ्वीराज विजय में लिखा है कि गोविंदराज को वैरीघट्ट की उपाधि दी गयी थी। अर्थात् राजा गोविंदराज अपने शत्रुओं के लिए उस चक्की के समान सिद्ध हुआ जिसने शत्रु सेनाओं को अनाज की तरह पीस दिया।

    गोविंदराज चौहान द्वितीय का उत्तराधिकारी उसका पुत्र वाक्पतिराज चौहान द्वितीय हुआ। उसने मेवाड़ के गुहिल शासक अम्बाप्रसाद का वध किया। वाक्पतिराज द्वितीय के बाद वीर्यराम चौहान अजमेर का राजा हुआ।

    महमूद गजनवी को परास्त करने वाले अजमेर के चौहान शासक वीर्यराम की मृत्यु के बाद उसका पुत्र चामुण्डराय चौहान उसका उत्तराधिकारी हुआ।

    ➣ चामुण्डराय के बाद सिंहट और सिंहट के बाद दुर्लभराज चौहान तृतीय अजमेर के शासक हुए।

    दुर्लभराज तृतीय ई.1075 में चौहानों के सिंहासन पर बैठा जिसे दूसल भी कहते हैं। उसने तुर्क सेनापति शहाबुद्दीन को परास्त किया। 1080 ई. में मेवात के शासक महेश ने दुर्लभराज तृतीय की अधीनता स्वीकार की।

    1091 में दुर्लभराज ने गुजरात पर आक्रमण किया तथा वहाँ के चौलुक्य राजा कर्ण को मार डाला ताकि मालवा का शासक उदयादित्य, गुजरात पर अधिकार कर सके।

    ➣ कालांतर में मेवाड़ के गुहिल शासक वैरिसिंह ने चौहान शासक दुर्लभराज तृतीय को कुंवारिया में हुए युद्ध में मार डाला।

    दुर्लभराज तृतीय का उत्तराधिकारी विग्रहराज तृतीय हुआ जिसे वीसल भी कहते हैं। पृथ्वीराज रासो के अनुसार वीसल के सिंहासन पर बैठने के कुछ समय बाद गजनी के शासक की तरफ से अजमेर के शासक से कर तथा वफादारी की शपथ मांगी गई।

    ➣ पृथ्वीराज विजय के अनुसार राजा विग्रहराज तृतीय ने मुस्लिम आक्रांताओं के विरुद्ध एक संघ बनाया। गंगा और यमुना के बीच अंतरप्रदेश के सैनिक तथा समस्त राजपूत शाखाएं विग्रहराज के झण्डे के नीचे एकत्रित हुईं।

    ➣ विग्रहराज के नेतृत्व में भारतीय राजाओं ने मिलकर हांसी, थाणेश्वर और नगरकोट से मुस्लिम गवर्नरों को मार भगाया।

    ➣ वीसलदेव का उत्तराधिकारी पृथ्वीराज प्रथम हुआ। उसके समय में चौलुक्यों की सेना पुष्कर को लूटने आई।

    ➣ पृथ्वीराज प्रथम के बाद अजयदेव अजमेर का राजा हुआ जिसे अजयराज एवं अजयपाल भी कहा जाता है।

    अजयदेव चौहान (1105 – 1133 ई.) : अजयमेरु (अजमेर) नगर का विकास

    ➣ अजयदेव को अजयराज चौहान कहकर भी कई स्थानों पर सम्बोधित किया गया है। उसके काल को चौहानों के साम्राज्य निर्माण का काल कहा जाता है।

    ➣ अजयदेव चौहान ने तारागढ़ की पहाड़ी पर एक क़िला गढ़-बिटली (तारागढ़) नाम से बनवाया था, जिसे कर्नल टॉड ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ में राजपूताने की कुँजी कहा है। चौहान नरेश अजयराज चौहान के नाम पर चारण-भाट इसे अजयमेरु और क़िले को अजयमेरु दुर्ग कहने लगे थे।

    ➣ अजमेर में उसने एक विशाल टकसाल गृह की स्थापना की। पृथ्वीराज विजय के अनुसार अजयदेव ने संसार को सिक्कों से भर दिया।

    ➣ अजयराज ने चांदी तथा ताम्बे के सिक्के चलाये। उसके कुछ सिक्कों पर उसकी रानी सोमलवती का नाम भी अंकित है। उसकी रानी सोमलदेवी नये सिक्कों की डिजाइन बनाने में रुचि रखती थी।

    1123 ई. में राजा अजयदेव चौहान ने मालवा के मुख्य सेनापति साल्हण को पकड़ लिया। उसने अजमेर पर चढ़कर आये मुस्लिम आक्रांताओं को परास्त कर उनका बड़ी संख्या में संहार किया।

    ➣ अजयराज ने चाचिक, सिंधुल तथा यशोराज पर विजय प्राप्त की तथा उन्हें मार डाला। वह मालवा के राजा नरवर्मन को परास्त करके उसके प्रधान सेनापति सल्हण को पकड़ कर अजमेर ले आया तथा उसे एक मजबूत दुर्ग में बंद कर दिया।

    ➣ अजयराज को अजयराज चक्री भी कहते थे क्योंकि उसने चक्र की तरह, दूर-दूर तक बिखरे हुए शत्रुदल को युद्ध में जीता था। अर्थात् वह चक्रवर्ती विजेता था।

    1130 ई. से पहले किसी समय अजयराज ने पुत्र अर्णोराज को राज्य का भार सौंप दिया। राजा अजयराज 1140 तक जीवित रहा।

    ➣ अजयराज स्वयं तो शैवधर्म का उपासक था किंतु वह अन्य धर्मों के प्रति भी धर्म-सहिष्णु था। उसने जैन और वैष्णव धर्मावलम्बियों को सम्मान की दृष्टि से देखा। उसने प्रसिद्ध पार्श्वनाथ जैन मंदिर में स्वर्ण कलश चढ़ाया था।

    ➣ अजयदेव से पृथ्वीराज चौहान तृतीय के समय तक अजमेर, नरायनापुष्कर में जैन विद्वानों के अनेक शास्त्रार्थ होते रहने के उल्लेख भी इतिहास में मिलते हैं।

    राजा अजयदेव चौहान के बाद उसका पुत्र अर्णोराज अजमेर का स्वामी हुआ। अर्णोराज को आनाजी भी कहते हैं। वह 1133 के आसपास चौहानों के सिंहासन पर बैठा तथा 1155 ई. तक शासन करता रहा।

    ➣ इसके शासन काल में चौहानों की शक्ति काफ़ी बढ़ गयी। चौहान शक्ति का सबसे अधिक विस्तार अर्णोराज के समय में ही हुआ। उसने महाराजाधिराज परमेश्वर तथा परम भट्टारक महाराजाधिराज की उपाधियां धारण कीं।

    ➣ 1158 ई. के नरहड़ लेख में विग्रहराज (चतुर्थ) के नाम के आगे परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर श्रीमद्, तथा नाम के पीछे देवराज्ये उपाधियाँ अंकित की गई हैं।

    ➣ उसके राज्य की सीमा पंजाब, राजपूताना तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक फैली थी। उसका समकालीन लाहौर का तुर्क शासक खुशरूशाह था जिसने उसके राज्य पर आक्रमण किया।

    ➣ अर्णोराज तारागढ़ से कुछ किलोमीटर दूर स्थित एक विशाल मैदान में तुर्कों का भयानक संहार किया। इस संहार के कारण तुर्कों की विशाल सेना का इतना रक्त बहा कि पूरा मैदान रक्त से लथपथ हो गया।

    ➣ राजा अर्णोराज पुष्कर की पहाड़ियों से निकलने वाली चन्द्रा नदी से एक नहर बनवाकर इस मैदान की तरफ लाया जिससे सारे शव बहकर दूर चले गये।

    ➣ बाद में अर्णोराज ने इस स्थान की खुदाई करवाकर वहाँ की मिट्टी भी हटवा दी और पक्के घाट बनाकर झील का निर्माण करवा दिया।

    ➣ जिस स्थल पर यवनों का रक्त गिरा था उस स्थल को शुद्ध करने के लिये राजा अर्णोराज ने एक हवन किया तथा उस स्थान पर आनासागर झील बनाई।

    आनासागर झील

    ➣ अजमेर नगर की समृद्धि और विस्तार का जितना श्रेय तारागढ़ दुर्ग को दिया जाता है, उससे कहीं अधिक श्रेय इस झील को जाता है।

    ➣ इस झील के सौन्दर्य पर मुग्ध होकर ही मुगलों, मराठों, राठौड़ों तथा अंग्रेजों ने अजमेर को बहुत महत्त्व दिया।

    जहाँगीर ने इस झील के निकट दौलतबाग का निर्माण करवाया जिसे अब सुभाष उद्यान कहते हैं। शाहजहाँ ने आनासागर झील के तट पर संगमरमर की बारादरी बनवाई।

    ➣ अंग्रेज तो इस झील के दीवाने ही थे। आज भी यह झील अजमेर नगर की पहचान बनी हुई है।

    ➣ राजा अर्णोराज चौहान ने मालवा के राजा नरवर्मन को परास्त किया तथा अपनी विजय पताका को सिंधु और सरस्वती नदी के प्रदेशों तक ले जाकर अपने वंश के महत्त्व को बढ़ाया।

    ➣ अर्णोराज ने हरितानक देश (हरियाणा, दिल्ली एवं मेरठ) तक अभियान का नेतृत्व करके अपनी पैतृक विजय भावनाओं के प्रति कटिबद्धता प्रकट की।

    ➣ इन विजयों से उसने पंजाब के कुछ पूर्वी भाग (अब हरियाणा) और संयुक्त प्रांत (अब उत्तर प्रदेश) के पश्चिमी भाग को अपने साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया।

    ➣ अर्णोराज ने हरियाणा, दिल्ली तथा वर्तमान उत्तरप्रदेश के बुलन्दशहर जिले पर भी अधिकार कर लिया जिसे तब वरणनगर कहते थे।

    ➣ राजा अर्णोराज सनातन धर्म का अनुयाई था किंतु दूसरे सम्प्रदायों के प्रति भी उसमें संकीर्णता नहीं थी। उसने खतरगच्छ के अनुयायियों के लिये भूमिदान दिया तथा पुष्कर में वराह का विश्व-प्रसिद्ध मंदिर बनवाया।

    ➣ अर्णोराज के समय देवबोध तथा धर्मघोष नामक प्रकाण्ड विद्वान हुए जिन्हें अर्णोराज ने सम्मानित किया। इनके नामों से अनुमान होता है कि ये बौद्ध भिक्षु रहे होंगे!

    चौहानों और चौलुक्यों का आपसी संघर्ष

    चौलुक्यों तथा चौहानों के बीच राज्य विस्तार को लेकर पिछली कई शताब्दियों से संघर्ष चला आ रहा था। चौहान शासक अर्णोराज के समय में यह संघर्ष अपने चरम को पहुँच गया।

    ➣ अर्णोराज अपने राज्य का विस्तार मालवा की तरफ करना चाहता था जबकि गुजरात का चौलुक्य शासक सिद्धराज जयसिंह अपने राज्य का विस्तार राजस्थान की ओर बढ़ाना चाहता था। इस कारण दोनों राज्य एक दूसरे से लड़कर राष्ट्र की क्षति करने में लग गए।

    1134 ई. में सिद्धराज जयसिंह ने अजमेर पर आक्रमण किया किंतु अर्णोराज ने उसे परास्त कर दिया। इसके बाद हुई संधि के अनुसार सिद्धराज जयसिंह ने अपनी पुत्री कांचनदेवी का विवाह अर्णोराज से कर दिया। कालान्तर में इस विवाह से सोमेश्वर चौहान हुआ।

    1142 ई. में चौलुक्य कुमारपाल, चौलुक्यों की गद्दी पर बैठा तो चाहमान-चौलुक्य संघर्ष फिर से तीव्र हो गया।

    ➣ विख्यात लेखक एवं व्याकरणाचार्य जैन मुनि हेमचंद्र ने लिखा है कि अर्णोराज ने कुछ राजाओं को एकत्रित करके गुजरात पर धावा बोल दिया।

    ➣ उसने 1145 ई. में कुमारपाल पर आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में कुमारपाल चौलुक्य हार गया तथा उसने अपनी बहिन देवलदेवी का विवाह अर्णोराज चौहान के साथ कर दिया।

    ➣ अर्णोराज तथा कुमारपाल के बीच दूसरा युद्ध 1150 ई. के आसपास हुआ। आबू के निकट दोनों सेनाओं में युद्ध हुआ जिसमें कुमारपाल ने अर्णोराज को परास्त कर दिया।

    ➣ कुछ समय बाद एक बार फिर अर्णोराज ने अपनी विफलता का बदला लेने की योजना बनाई। इस बार फिर चौलुक्य आगे बढ़ते हुए अजमेर तक आ पहुँचे तथा एक बार पुनः अर्णोराज की हार हुई।

    ➣ इस प्रकार 1150 ई. में चौलुक्य कुमारपाल ने अजमेर पर अधिकार कर लिया। अर्णोराज को कुमारपाल के साथ अपनी बहिन का विवाह करना पड़ा तथा हाथी-घोड़े भी उपहार में देने पड़े।

    ➣ लगातार दो बार चौलुक्यों से पराजित हो जाने के कारण चौहानों की प्रतिष्ठा को बड़ा धक्का लगा किंतु कुछ समय बाद ही अर्णोराज ने गजनवियों को परास्त करके खोई हुई प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त कर ली।

    ➣ उसने अपनी विजय पताका सांभर झील से आगे बढ़कर सिंधु और सरस्वती नदी के प्रदेशों में फहरा दी तथा जिससे सांभर के चौहान उत्तरी भारत की सबसे बड़ी शक्ति बन गए।

    ➣ राजा अर्णोराज के तीन पुत्र थे। उनमें से जगदेव तथा विग्रहराज (चतुर्थ) के जन्म मारवाड़ की राजकुमारी सुधवा के गर्भ से हुए थे जबकि सोमेश्वर का जन्म अन्हिलवाड़ा पाटन की चौलुक्य राजकुमारी कंचनदेवी के गर्भ से हुआ था।

    ➣ सोमेश्वर प्रसिद्ध पृथ्वीराज चौहान का पिता था। उसका बचपन अपने नाना सिद्धराज जयसिंह की राजसभा में बीता था।

    ➣ उसके पुत्र राजकुमार जगदेव ने हेमचन्द्र सूरि से वशीभूत होकर राज्य के लालच में सन .1155 ई. में अपने पिता अर्णोराज की हत्या कर दी और स्वयं अजमेर की गद्दी पर बैठ गया।

    ➣ चौहान शासक अर्णोराज वीर, धर्मप्रिय, विद्वानों का सम्मान करने वाला तथा प्रजापालक राजा था

    ➣ कालांतर में अर्णोराज के द्वितीय पुत्र एंव उसके छोटे भाई विग्रहराज ने जगद्देव को पराजित किया एवं सिहांसनरूढ़ हुआ।

    विग्रहराज चतुर्थ / वीसलदेव (1155 – 1163 ई.) : संस्कृत विद्यालय स्थापना एवं दिल्ली विजय

    अजयराज का पौत्र विग्रहराज चतुर्थ अथवा बीसलदेव चौहान वंश का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एवं शक्तिशाली शासक था। उसका काल चौहानों का स्वर्णकाल कहलाता है। इसके समय चौहान साम्राज्य का सर्वाधिक विस्तार हुआ।

    ➣ वीसलदेव ने 1155 से ई.1163 के बीच तोमरों से दिल्ली तथा हॉंसी छीन लिए। नागरी प्रचारिणी पत्रिका के अनुसार वीसलदेव ने तोमर राजा अनंगपाल से दिल्ली छीनी।

    ➣ इसी अनंगपाल ने दिल्ली में विष्णुपाद पहाड़ी पर लोहे का लाट लगावाया था जिस पर आज तक जंग नहीं लगा। यह लाट विष्णु की ध्वजा के रूप में स्थापित करवाया था। इसे कीली भी कहते हैं।

    पृथ्वीराज रासो ने इसी अनंगपाल की पुत्री कमला का विवाह अजमेर के चौहान राजा सोमेश्वर के साथ होना तथा उस विवाह से पृथ्वीराज चौहान का उत्पन्न होना बताया है किंतु अन्य स्रोतों के अनुसार पृथ्वीराज की माता चेदि देश की राजकुमारी कर्पूर देवी थी न कि तंवर/तोमर राजकुमारी कमला।

    ➣ वीसलदेव ने गुजरात के चौलुक्यों और उनके अधीन आबू एवं मारवाड़ क्षेत्र के परमार राजाओं से भारी युद्ध किये तथा उन्हें पराजित करके उनसे नाडोल, पाली, जालोर एवं आसपास के क्षेत्र छीन लिए।

    ➣ वीसलदेव ने जालोर के परमार सामन्त को दण्ड देने के लिए जालोर नगर को जलाकर राख कर दिया। राजा वीसलदेव ने चौलुक्य कुमारपाल को परास्त करके उसने अपने पिता की पराजय का बदला लिया।

    तुर्कों से भी बीसलदेव ने अनेक युद्ध लड़े। वीसलदेव के समय तुर्कों की एक सेना वव्वेरा गांव तक आ गई। वीसलदेव ने उस सेना को परास्त कर दिया।

    ➣ इसके बाद वह एक विशाल सेना लेकर उत्तर दिशा की तरफ बढ़ा। दिल्ली से अशोक का एक स्तंभ लेख मिला है जिस पर वीसलदेव के समय में एक और शिलालेख उत्कीर्ण किया गया।

    ➣ इस शिलालेख के अनुसार वीसलदेव ने देश से मुसलमानों का सफाया कर दिया तथा अपने उत्तराधिकारियों को निर्देश दिया कि वे मुसलमानों को अटक नदी के उस पार तक सीमित रखें।

    ➣ वीसलदेव के राज्य की सीमायें शिवालिक पहाड़ी, सहारनपुर तथा उत्तर प्रदेश तक प्रसारित थीं। शिलालेखों के अनुसार जयपुर और उदयपुर जिले के कुछ भाग उसके राज्य के अंतर्गत थे।

    शिवालिक लेख के अनुसार वीसलदेव के राज्य की सीमायें हिमालय से लेकर विंध्याचल पर्वत तक विस्तृत थीं। इस पूरे क्षेत्र से उसने मुस्लिम गवर्नरों को परास्त करके अटक के उस पार तक मार भगाया था।

    प्रबन्धकोष उसे तुरुष्कों का विजेता बताता है। इस काल में दिल्ली केवल ठिकाणा बन कर रह गई जिसकी राजधानी अजमेर थी।

    ➣ वीसलदेव की विशाल सेना में एक हजार हाथी, एक सौ हजार घुड़सवार तथा उससे भी अधिक संख्या में पैदल सिपाही थे।

    ➣ विग्रहराज (चतुर्थ) साहित्य प्रेमी राजा था और साहित्यकारों का आश्रयदाता भी। उसके समय के लोग उसे कविबांधव कहते थे। वह स्वयं हरकेलि नाटक का रचयिता था।

    पृथ्वीराज विजय के अनुसार जब विग्रहराज की मृत्यु हो गई तो कविबांधव की उपाधि निरर्थक हो गई क्योंकि इस उपाधि को धारण करने की क्षमता किसी में नहीं रह गई थी।

    ➣ उसके दरबारी कवि सोमदेव ने ललित विग्रहराज नामक सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक नाटक की रचना की।

    विग्रहराज (चतुर्थ) ने अजमेर में धार की ही तरह का एक संस्कृत विद्यालय एवं सरस्वती मंदिर बनवाया जो अब अढ़ाई दिन का झौंपड़ा के नाम से अवशेष रूप में रह गया है।

    सरस्वतीकण्ठाभरणविद्यापीठ विग्रहराज द्वारा निर्मित एक संस्कृत विद्यालय था, जिसे बाद में शाहबुद्दीन मुहम्मद ग़ोरी ने अढ़ाई दिन का झोपड़ा नामक मस्जिद का रूप दे दिया।

    ➣ उसने अपने नाम पर अजमेर में वीसलसर झील बनवाई जिसके बीच उसके रहने के प्रासाद और उसके चारों ओर अनेक मंदिर बनवाये।

    ➣ राजा विग्रहराज ने वीसलपुर नामक कस्बे की स्थापना की तथा कई दुर्गों का निर्माण करवाया। धर्मघोष सूरी के कहने पर उसने एकादशी के दिन पशुवध पर प्रतिबन्ध लगाया।

    1158 के नरहड़ लेख में विग्रहराज (चतुर्थ) के नाम के आगे परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर श्रीमद्, तथा नाम के पीछे देवराज्ये अंकित किया गया है।

    ➣ ये उपाधियां चौहानों द्वारा प्रतिहारों से छीनी गई थीं। इन उपाधियों से यह भी ज्ञात होता है कि इस काल में चौहान अपने विशाल साम्राज्य के सम्पूर्णप्रभुत्व सम्पन्न शासक थे।

    1163 ई. में विग्रहराज (चतुर्थ) की मृत्यु के बाद उसका अवयस्क पुत्र अमरगंगेय अथवा अपरगंगेय (1163–1165 ई) अजमेर की गद्दी पर बैठा।

    ➣ अमरगंगेय मात्र 5-6 वर्ष ही शासन कर सका और अपने ही चचेरे भाई पृथ्वीराज द्वितीय द्वारा हटा दिया गया। पृथ्वीराज द्वितीय, पितृहंता जगदेव का पुत्र था।

    विग्रहराज (चतुर्थ) अर्थात् वीसलदेव भारत का प्रथम चौहान सम्राट था और उसका भतीजा पृथ्वीराज चौहान भारत का अंतिम चौहान सम्राट एंव अंतिम हिन्दू सम्राट था।

    पृथ्वीराज द्वितीय (1165 – 1169 ई.) : चौहान सीमा सुदृढ़ीकरण

    ➣ पृथ्वीराज द्वितीय उपकार के कार्यों के लिये जाना गया। उसने राजा वास्तुपाल को हराया, तुर्कों को पराजित किया तथा हांसी के दुर्ग में एक महल बनवाया।

    ➣ पृथ्वीराज द्वितीय ने मुसलमानों को अपने राज्य से दूर रखने के लिये अपने मामा गुहिल किल्हण को हांसी का अधिकारी नियुक्त किया।

    ➣ उसका राज्य अजमेर और शाकम्भरी के साथ-साथ थोड़े (जहाजपुर के निकट), मेनाल (चित्तौड़ के निकट) तथा हांसी अर्थात् (पंजाब) तक विस्तृत था। 1169 ई. में पृथ्वीराज द्वितीय की निःसंतान अवस्था में ही मृत्यु हो गई।

    ➣ इस समय अर्णोराज के कुल में तीन वयस्क राजकुमार जीवित थे। इनमें से पहला अमरगंगेय अथवा अपरगांग्य था जो स्वर्गीय अर्णोराज का पौत्र था। आरम्भ में इसे ही पृथ्वीराज द्वितीय द्वारा अपदस्थ किया गया था।

    ➣ राज्य का दूसरा दावेदार नागार्जुन था जो स्वर्गीय अर्णोराज का पौत्र तथा राजा विग्रहराज (चतुर्थ) का दूसरा पुत्र था।

    ➣ राज्य का तीसरा दावेदार सोमेश्वर था। वह स्वर्गीय अर्णोराज का तीसरा पुत्र तथा स्वर्गीय विग्रहराज (चतुर्थ) का सबसे छोटा भाई था। अंतत: सामंतो ने सोमेश्वर को ही गद्दी पर बैठाया।

    सोमेश्वर (1169 – 1178 ई.) : पृथ्वीराज तृतीय के पूर्ववर्ती शासक

    ➣ सोमेश्वर का जन्म चौलुक्य राजा सिद्धराज जयसिंह की पुत्री कंचनदेवी के गर्भ से हुआ था। वह बचपन गुजरात में अपने नाना सिद्धराज जयसिंह तथा सौतेले मामा कुमारपाल के दरबार में बीता था।

    ➣ सोमेश्वर ने ननिहाल में रहने के दौरान ही अपने मामा चौलुक्यराज कुमारपाल के शत्रु कोंकण नरेश मल्लिकार्जुन का युद्ध में सिर काटकर ख्याति प्राप्त की थी।

    ➣ कोंकण विजय के समय ही सोमेश्वर ने कलचुरियों की राजकुमारी कर्पूरदेवी से विवाह किया। कर्पूरदेवी का पिता अचलराज चेदि देश का राजा था। चेदि देश वर्तमान जबलपुर के आसपास था।

    रानी कर्पूरदेवी के गर्भ से दो पुत्रों का जन्म हुआ जिनमें से बड़े पुत्र का नाम पृथ्वीराज तृतीय तथा छोटे पुत्र का नाम हरिराज रखा गया।

    ➣ कर्पूरदेवी के ज्येष्ठ पुत्र को ही पृथ्वीराज को इतिहास में पृथ्वीराज तृतीय तथा राय पिथौरा कहा जाता है। राजा सोमेश्वर की एक पुत्री भी था जिसका नाम पृथा था।

    ➣ इन दोनों राजकुमारों की शिक्षा अजमेर की सरस्वती कण्ठाभरण पाठशाला में हुई जिसका निर्माण पृथ्वीराज के ताऊ विग्रहराज चतुर्थ ने करवाया था तथा जिसे अब अढाई दिन का झौंपड़ा कहा जाता है।

    ➣ सोमेश्वर प्रतापी राजा हुआ। उसके राज्य में बीजोलिया, रेवासा, थोड़, अणवाक आदि भाग भी सम्मिलित किए गए। हालाँकि उसके समय में फिर से चौलुक्य-चौहान संघर्ष छिड़ गया जिससे उसे हानि उठानी पड़ी।

    ➣ सोमेश्वर ने भी अपने पूर्वजों की भांति नगर, मंदिर और प्रासादों के निर्माण में रुचि ली। उसने अपने पिता अर्णोराज की मूर्ति बनवाकर तथा अपनी स्वयं की मूर्ति बनवाकर लगवाई और उत्तरी भारत में मूर्ति निर्माण कला को बढ़ावा दिया।

    शैव धर्मावलम्बी होते हुए भी उसने जैन धर्म के प्रति सहिष्णुतापूर्ण नीति का अवलम्बन किया। उसने वैद्यनाथ का विशाल मंदिर बनवाया जो वीसलदेव के महलों से भी ऊँचा था। इस मंदिर में उसने ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश की मूर्तियाँ स्थापित करवाईं ।

    1178 ई. में अजमेर के चौहान राजा सोमेश्वर की मृत्यु हो गई। उस समय पृथ्वीराज केवल 12-13 वर्ष का बालक था।

    पृथ्वीराज तृतीय (1178 – 1192 ई.) : तराइन युद्ध एवं मोहम्मद गोरी संघर्ष

    1178 ई. में सोमेश्वर का पुत्र व उत्तराधिकारी पृथ्वीराज तृतीय अजमेर की गद्दी पर बैठा। वह चौहान राजवंश का अंतिम शासक एंव अंतिम चौहान सम्राट व् हिन्दू सम्राट था।

    ➣ सम्राट पृथ्वीराज चौहान को भारत के इतिहास में पृथ्वीराज चौहान तथा राय पिथौरा के नाम से जाना जाता है।

    ➣ आधुनिक काल में लिखी गई इतिहास की पुस्तकों में उसे पृथ्वीराज तृतीय, भारतेश्वर तथा सपादलक्षेश्वर भी कहा गया है।

    पृथ्वीराज विजय महाकाव्यम् में उसे गुर्जरराज तथा मरुगुर्जरराज कहा गया है जिसका अर्थ होता है- गुर्जर देश अथवा मरु-गुर्जर देश का स्वामी

    ➣ पृथ्वीराज एंव उसके अनुज शिक्षा अजमेर की सरस्वती कण्ठाभरण पाठशाला (अब अढाई दिन का झौंपड़ा) में हुई जिसका निर्माण पृथ्वीराज के ताऊ विग्रहराज चतुर्थ ने करवाया था।

    पृथ्वीराज विजय महाकव्यम् के अनुसार पृथ्वीराज को धर्मशास्त्र, चित्रकला, संगीतकला, इंद्रजाल, कविता, वाणिज्य विनय, संस्कृत एवं अपभ्रंश के साथ-साथ अनेक देशज भाषाएं, पक्षियों की भाषा तथा गणित की भी शिक्षा दी गई।

    ➣ पृथ्वीराज को तलवार, भाला एवं धनुष सहित 36 प्रकार के अस्त्र-शस्त्र धारण करने एवं चलाने आते थे। पृथ्वीराज विजय महाकाव्यम् में लिखा है कि सम्राट पृथ्वीराज को संस्कृत, अपभ्रंश, प्राकृत, पैशाची, मागधी एवं शूरसैनी नामक छः भाषाएं आती थीं।

    कर्पूरदेवी का संरक्षण-काल

    ➣ सिंहासन पर बैठते समय पृथ्वीराज के अल्प वयस्क होने के कारण अजमेर का शासन उसकी माता कर्पूर देवी के हाथों में था।

    ➣ कर्पूर देवी, चेदि देश की राजकुमारी तथा कुशल राजनीतिज्ञ थी। उसने बड़ी योग्यता से अपने अल्पवयस्क पुत्र के राज्य को संभाला। उसने दाहिमा राजपूत कदम्बवास को अपना प्रधानमंत्री बनाया जिसे इतिहास की पुस्तकों में केम्बवास तथा कैमास भी कहा गया है।

    ➣ कर्पूरदेवी का संरक्षण-काल कम समय का था किंतु इस काल में अजमेर और भी सम्पन्न एवं समृद्ध नगर बन गया।

    ➣ कर्पूरदेवी के संरक्षण में सम्राट पृथ्वीराज ने कई भाषाओं और शास्त्रों का अध्ययन किया तथा अपनी माता के निर्देशन में अपनी प्रतिभा को अधिक सम्पन्न बनाया।

    ➣ इसी अवधि में सम्राट पृथ्वीराज ने राज्य-कार्य में दक्षता अर्जित की तथा अपनी भावी योजनाओं को निर्धारित किया जो उसकी निरंतर विजय योजनाओं से प्रमाणित होता है।

    ➣ कर्पूरदेवी के शासन काल में नागों ने चौहानों के विरुद्ध विद्रोह किया किंतु उन्हें सफलता पूर्वक दबा दिया गया।

    ➣ पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि जयानक द्वारा लिखित पृथ्वीराजमहाकाव्यम् नामक ग्रंथ जिसे पृथ्वीराज विजय भी कहा जाता है, में पृथ्वीराज की प्रारंभिक विजयों एवं शासन सुव्यवस्थाओं का श्रेय कर्पूरदेवी को दिया गया है।

    सत्ता पर एकाधिकार

    1180 ई. में केवल 14 वर्ष की आयु में सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने राज्य के समस्त अधिकार अपनी माता से अपने हाथ में ले लिए।

    ➣ इस क्रम में सर्वप्रथम पृथ्वीराज ने राज्य के समस्त उच्च पदों पर नियुक्त अपनी माता के विश्वस्त मंत्रियों एवं अधिकारियों को हटाकर अपने विश्वास के मंत्रियों एवं अधिकारियों को नियुक्त कर दिया।

    ➣ सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने अपने पिता एवं अपनी माता के शासन काल में प्रधानमंत्री पद पर कार्य कर रहे कदम्बवास अथवा कैमास दहिया की शक्ति को कम कर दिया तथा उसके स्थान पर अपने अन्य मंत्री प्रतापसिंह को अधिकार सम्पन्न बना दिया।

    ➣ पृथ्वीराज का मुख्य सेनापति स्कंद गुजरात का नागर ब्राह्मण था। पृथ्वीराज के मंत्रियों में जयानक भी सम्मलित था जिसने पृथ्वीराज महाकाव्यम् की रचना की।

    ➣ पृथ्वीराज का मंत्री रामभट्ट, इतिहास में चन्द बरदायी नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसने पृथ्वीराज रासो की रचना की। जिसे हिन्दी साहित्य का प्रथम महाकाव्य माना जाता है।

    ➣ चौहानों की सेना में बड़ी संख्या में अश्व सैनिक, हस्ति सैनिक और पदाति सैनिक भर्ती किए जाते थे। पृथ्वीराज के राजा बनने के समय उसकी सेना में 70 हजार अश्वारोही सैनिक थे। समय के साथ यह संख्या बढ़ती चली गई।

    ➣ पृथ्वीराज के गद्दी पर बैठने के कुछ समय बाद उसके पिता के चचेरे भाई अपरगांग्य ने विद्रोह का झण्डा उठाया। उसने गुड़पुर पर अधिकार कर लिया जिसे अब गुड़गांव तथा गुरुग्राम कहा जाता है।

    ➣ पृथ्वीराज ने अपरगांग्य को परास्त किया तथा उसकी हत्या करवाई। इस पर अपरगांग्य के छोटे भाई नागार्जुन ने विद्रोह को प्रज्ज्वलित किया तथा गुड़गांव पर अधिकार कर लिया। किन्तु वह भी असफल रहा।

    पृथ्वीराज का दिग्विजय अभियान

    1182 ई. के लगभग पृथ्वीराज चौहान दिग्विजय अभियान प्रारंभ किया। सबसे पहले उसने भण्डानकों पर आक्रमण किया तथा उनकी बस्तियां घेर लीं। बहुत से भण्डानक मारे गये और बहुत से उत्तर दिशा की ओर भाग गये।

    ➣ इस आक्रमण का वर्णन समकालिक लेखक जिनपति सूरि ने किया है। खतरगच्छ पट्टावली में लिखा है कि सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने भण्डानकों की हाथियों की सेना को पकड़ लिया।

    ➣ इस आक्रमण के बाद भण्डानकों की शक्ति सदा के लिये क्षीण हो गई। इसके बाद से इतिहास के पन्नो में भण्डानक जाति का उल्लेख नहीं मिलता है।

    ➣ भण्डानकों के प्रबल दमन का परिणामस्वरूप पृथ्वीराज के राज्य की दो धुरियां- अजमेर तथा दिल्ली एक राजनीतिक सूत्र में बंध गईं। अब चौहान राज्य का स्वरूप एक साम्राज्य जैसा हो गया था।

    1182 में भण्डानकों का दमन करने के पश्चात् पृथ्वीराज चौहान की शक्ति में अद्भुत वृद्धि हो गई। जिसका उपयोग उसने अपने साम्राज्य की सीमाओं में वृद्धि करने के लिए किया। इस समय पृथ्वीराज की आयु मात्र 16 वर्ष थी।

    1182 ई. में ही उसने गुजरात पर आक्रमण किया, पर गुजरात के शासक भीम द्वितीय ने, जो पहले मुइज्जुद्दीन मुहम्मद को पराजित कर चुका था, पृथ्वीराज को मात दी, इस पराजय से बाध्य होकर पृथ्वीराज को पंजाब तथा गंगा घाटी की ओर मुड़ना पड़ा।

    तबकाते नासिरी नामक ग्रंथ में लिखा है कि जम्मू के शासक विजयराज और पृथ्वीराज चौहान के सम्बन्ध अच्छे नहीं थे। इसलिए पृथ्वीराज की सेना ने जम्मू पर आक्रमण करके जम्मू राज्य को लूटा।

    ➣ निरंतर किए गए युद्धों एवं प्राप्त विजयों के कारण पृथ्वीराज चौहान के राज्य की सीमायें उत्तर-पश्चिम में मुस्लिम सत्ता से, दक्षिण-पश्चिम में चौलुक्यों से तथा पूर्व में चंदेलों के राज्य (बुन्देलखण्ड) से जा मिलीं।

    चौहान-चौलुक्य संघर्ष

    ➣ पृथ्वीराज चौहान के काल में चौहान-चौलुक्य संघर्ष फिर से उठ खड़ा हुआ। चौहान शासक पृथ्वीराज तृतीय और चौलुक्य शासक भीमदेव द्वितीय दोनों ही महत्त्वाकांक्षी राजा थे।

    ➣ पृथ्वीराज चौहान की राज्य-विस्तार की नीति के कारण दोनों राज्यों की सीमायें आबू के आसपास एक दूसरे को छूने लगी थीं। इसलिये दोनों में युद्ध होना अवश्यम्भावी था।

    खतरगच्छ पट्टावली एंव वीरावल अभिलेख में 1187 में पृथ्वीराज द्वारा गुजरात अभियान करने का वर्णन मिलता है। कुछ साक्ष्य इस युद्ध की तिथि 1184 बताते हैं। इस युद्ध में चौलुक्यों की पराजय हो गई।

    ➣ इस अभियान में 1187 में पृथ्वीराज चौहान ने आबू के परमार शासक धारावर्ष को भी हराया।

    ➣ चंदेलों के राज्य को बुन्देलखण्ड राज्य, जेजाकभुक्ति तथा महोबा राज्य भी कहा जाता है।

    ➣ चौहान साम्राज्य की पूर्वी सीमा चंदेलों के राज्य से मिलती थी। चंदेलों के राज्य में मध्यभारत के बुन्देलखण्ड, जेजाकभुक्ति तथा महोबा के क्षेत्र आते थे। कलिंजर का प्रसिद्ध दुर्ग भी इसी राज्य में स्थित था।

    ➣ सम्राट पृथ्वीराज का ननिहाल चेदि देश भी बुंदेलखण्ड का ही हिस्सा था किंतु उस पर कलचुरियों का शासन था। इस प्रकार चंदेलों एवं कलचुरियों के पूरे प्रदेश को मिलाकर बुंदेलखण्ड कहा जाता था।

    ➣ पृथ्वीराज के समय में चंदेल राजा परमारदी देव महोबा का राजा था जिसे कुछ ग्रंथों में राजा परमाल भी कहा गया है। महोबा राज्य के दूसरी तरफ कन्नौज राज्य स्थित था।

    माऊ शिलालेख के अनुसार महोबा के चंदेलों और कन्नौज के गाहड़वालों में मैत्री सम्बन्ध था। चंदेलों और गहड़वालों का संगठन, पृथ्वीराज के लिये सैनिक व्यय का कारण बन गया, जिसका फायदा आगे चलकर गौरी को हुआ।

    बुन्देलखण्ड का युद्ध

    1182 ई. में राजा परमारदी देव ने पृथ्वीराज चौहान के कुछ घायल सैनिकों को मरवा दिया। उनकी हत्या का बदला लेने के लिये पृथ्वीराज चौहान ने चंदेलों पर आक्रमण कर दिया।

    ➣ चौहान सेनाएं चंदेल राज्य में घुस गईं तथा लूट-पाट करती हुई महोबा की तरफ बढ़ने लगीं। परमारदी देव ने भी बड़ी भारी सेना लेकर चौहान सेनाओं का सामना किया।

    ➣ उसने अपने, इतिहास-प्रसिद्ध योद्धाओं आल्हा तथा ऊदल को पृथ्वीराज की सेनाओं के विरुद्ध रणक्षेत्र में उतारा। इस प्रकार परमारदी देव की तरफ से चंदेलों के साथ-साथ बनाफरों ने भी भाग लिया।

    बैरागढ़ के मैदान में पृथ्वीराज के सेनापति चामुंडराय, जिसे आल्हखंड में चौड़ा कहा गया है, ने धोखे से ऊदल की हत्या कर दी। ऊदल की हत्या के बाद चौहान योद्धा बड़ी तेजी से चंदेल सेना को मारने लगे।

    ➣ जब आल्हा को अपने छोटे भाई ऊदल के वीरगति को प्राप्त होने की सूचना मिली तो वह अपना आपा खो बैठा और पृथ्वीराज चौहान की सेना पर टूट पड़ा। आल्हा के सामने जो भी आया मारा गया।

    ➣ कुछ समय पश्चात पृथ्वीराज और आल्हा आमने-सामने हो गए। दोनों में भीषण युद्ध हुआ। पृथ्वीराज चौहान बुरी तरह घायल होकर युद्ध के मैदान में ही गिर गया।

    ➣ आल्ह-खण्ड के अनुसार सम्राट पृथ्वीराज चौहान के दो पुत्र भी इस युद्ध में मारे गए।

    ➣ आल्हा के गुरु गोरखनाथ के कहने पर आल्हा ने पृथ्वीराज चौहान को जीवनदान दिया। आल्हा ने उसी क्षण युद्ध बंद कर दिया और गुरु के आदेश पर नाथ पंथ स्वीकार करके योगी बन गया।

    ➣ अंत में चंदेल राजा परमारदी देव की पराजय हो गई। 1182 ई. के मदनपुर लेख के अनुसार सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने जेजाकभुक्ति के प्रदेश को नष्ट कर दिया।

    ➣ यद्यपि इस युद्ध में राजा परमारदी देव परास्त हो गया किंतु उसका राज्य नष्ट नहीं हुआ। वह 1203 तक महोबा पर राज्य करता रहा। 1203 में मुसलमानों ने उसका राज्य नष्ट किया।

    महोबा राज्य पर विजय प्राप्त करने के बाद पृथ्वीराज के राज्य की सीमाएं कन्नौज राज्य से जा लगीं। इस समय वहां का शासक जयचन्द था।

    आल्हा और ऊदल, चंदेल राजा परमल के सेनापति दसराज के पुत्र थे।

    दिल्ली की गद्दी को लेकर विवाद

    ➣ कुछ भाटों के अनुसार राजा अनंगपाल की एक पुत्री का विवाह अजमेर के राजा सोमेश्वर से हुआ जिससे पृथ्वीराज चौहान उत्पन्न हुआ

    ➣ जबकि अनंगपाल की दूसरी पुत्री का विवाह कन्नौज के राजा विजयपाल से हुआ जिसका पुत्र जयचन्द हुआ। इस प्रकार पृथ्वीराज चौहान और जयचन्द मौसेरे भाई थे।

    ➣ अनंगपाल ने पृथ्वीराज की वीरता और कार्यकुशलता को देखकर उसे दिल्ली की भी गद्दी सौंप दी। इस प्रकार दिल्ली और अजमेर दोनों एक हो गए।

    ➣ यदि पृथ्वीराज और जयचंद मौसेरे भाई होते तो पृथ्वीराज संयोगिता का चाचा होता। ऐसी स्थिति में पृथ्वीराज द्वारा संयोगिता का हरण एक अनैतिक कार्य माना जाता। अतः पृथ्वीराज और जयचंद में कोई रक्त सम्बन्ध नहीं माना गया है।

    ➣ बल्कि 1155 ई. में विग्रहराज (चतुर्थ) ने दिल्ली के तोमर राजा अनंगपाल को परास्त करके दिल्ली को दुबारा से चौहानों के अधीन किया था। इसलिए राजा जयचंद का दिल्ली पर किसी भी तरह का दावा नहीं था।

    राजकुमारी संयोगिता

    ➣ संयोगिता कन्नौज के महाराज जयचन्द्र की पुत्री थी। जयचन्द्र ने संयोगिता के विवाह हेतु स्वयंवर का आयोजन किया था, किंतु पृथ्वीराज चौहान से शत्रुता के कारण उसे स्वयंवर का निमंत्रण नहीं भेजा गया।

    ➣ इसके अलावा जयचंद्र ने लोहे की पृथ्वीराज की मूर्ति बनवा कर द्वारपाल के स्थान पर प्रस्थापित कर दी। परन्तु स्वयंवर के समय संयोगिता ने पृथ्वीराज की मूर्ति को ही वरमाला पहनाई।

    ➣ द्वार पर स्थित संयोगिता जब पृथ्वीराज की मूर्ति को वरमाला पहना रही थी, उसी समय पृथ्वीराज ने प्रासाद (महल) में प्रवेश किया और राजकुमारी का हरण कर लिया।

    ➣ इस घटना से दोनों राजाओं में इतनी शत्रुता हो गई कि तराइन के युद्ध में जयचन्द्र ने चौहान और गौरी के युद्ध से तटस्थ ही रहा।

    मुहम्मद गौरी का भारत आक्रमण

    पृथ्वीराज ने कई विजय अभियान किये और अपना काफी साम्राज्य विस्तार किया जिससे उसे उत्तर-भारत काफी ख्याति भी प्राप्त हुई किन्तु साथ ही अन्य राजों एंव उसके मध्य वैमनस्य स्थिति पैदा हो गई।

    ➣ जैसे पश्चिम में मुसलमान प्रांतपति चौहानों के शत्रु थे, वैसे ही उत्तर में जम्मू का राजा, दक्षिण में चौलुक्य शासक, पूर्व में चंदेल और उत्तर-पूर्व में गहड़वाल चौहानों के शत्रु थे।

    ➣ जिस समय पृथ्वीराज चौहान, दक्षिण में चौलुक्यों, उत्तर में जम्मू एवं कांगड़ा के राजाओं, पूर्व में चंदेलों एवं उत्तर-पूर्व में गाहड़वालों से उलझा हुआ था, उस समय पश्चिम दिशा में अफगानिस्तान से आए तुर्क भारत में बड़ी तेजी से अपना विस्तार कर रहे थे।

    ➣ मुहम्मद गौरी के भारत-आक्रमणों के बहुत पहले से सिंध, मुल्तान, पंजाब और नागौर आदि क्षेत्रों में छोटे-छोटे मुसलमान शासक शासन कर रहे थे।

    ➣ जिस समय मुहम्मद गौरी ने भारत पर पहला आक्रमण किया, उस समय उत्तर भारत में चार प्रमुख हिन्दू राजा शासन कर रहे थे –

    1.   सम्राट पृथ्वीराज (चौहान वंश) दिल्ली तथा अजमेर
    2.   राजा जयचंद (गहड़वाल वंश) कन्नौज
    3.   राजा गोविंदपाल (पाल वंश) बिहार
    4.   राजा लक्ष्मण सेन (सेन वंश) बंगाल

    ➣ इन समस्त राज्यों में परस्पर फूट थी तथा ये परस्पर संघर्षों में व्यस्त थे। पृथ्वीराज तथा जयचंद में वैमनस्य चरम पर था।

    ➣ मुहम्मद गौरी का भारत पर पहला आक्रमण 1175 ई.में मुल्तान पर हुआ। मुल्तान पर उस समय शिया मुसलमान करमाथियों का शासन था।

    ➣ मुहम्मद गौरी ने उनको परास्त करके मुल्तान पर अधिकार कर लिया। उसी वर्ष गौरी ने ऊपरी सिंध के कच्छ क्षेत्र पर आक्रमण किया तथा उसे अपने अधिकार में ले लिया।

    ➣ चूंकि इसे मुसलमानों का आपसी मामला समझा गया इसलिए हिन्दू राजाओं द्वारा इस आक्रमण को कोई महत्व नहीं दिया गया।

    ➣ मुहम्मद गौरी का भारत पर दूसरा आक्रमण 1178 ई. में गुजरात के चौलुक्य राज्य पर हुआ जो उस समय एक धनी राज्य हुआ करता था। गुजरात पर इस समय मूलराज द्वितीय शासन कर रहा था। उसकी राजधानी अन्हिलवाड़ा थी।

    ➣ गौरी मुल्तान, कच्छ और पश्चिमी राजपूताना में होकर आबू के निकट पहुंचा। वहाँ कयाद्रा गांव के निकट मूलराज द्वितीय की सेना से उसका युद्ध हुआ।

    ➣ इस युद्ध में नाडौल का चौहान शासक कान्हड़देव, जालोर का चौहान शासक कीर्तिपाल और आबू का परमार शासक धारावर्ष भी अपनी सेनाएं लेकर चौलुक्यों की सहायता के लिए आ गए।

    ➣ इस युद्ध में मुहम्मद गौरी की सेना के बहुत से सैनिक मारे गए। मुहम्मद गौरी बुरी तरह परास्त हुआ। वह अपनी जान बचाकर रेगिस्तान के रास्ते फिर से अफगानिस्तान भाग गया।

    राजपूत राजाओं द्वारा मुहम्मद गौरी को परास्त करके भगा दिया गया था, इसलिए भारत के अन्य राजपूतों ने मुहम्मद गौरी को कोई बड़ी मुसीबत नहीं समझा और भारतीय राजा अपनी परस्पर लड़ाइयों में व्यस्त रहे।

    1178 ई. में गुजरात के चौलुक्यों से मिली कड़ी पराजय के बाद मुहम्मद गौरी ने भारतीय राजाओं से संघर्ष करने के बजाय पहले भारत के मुस्लिम अमीरों को जीतना चाहा ताकि वह भारत में पैर जमाता हुआ धीरे-धीरे आगे बढ़ सके।

    ➣ उन दिनों पंजाब में कई छोटे-छोटे मुस्लिम-अमीर शासन कर रहे थे जिन्हें महमूद गजनवी ने भारत में स्थापित किया था। इसलिए मुहम्मद गौरी ने गुजरात को छोड़कर पंजाब के रास्ते भारत में घुसने की योजना बनाई।

    ➣ उस समय पेशावर पर गजनवी वंश का खुसरव मलिक शासन कर रहा था। गौरी ने 1179 में पेशावर पर आक्रमण करके पेशावर पर अधिकार कर लिया। 1181 ई. में गौरी ने पंजाब पर दूसरा आक्रमण किया तथा स्यालकोट तक का प्रदेश जीत लिया।

    1182 ई. में मुहम्मद गौरी ने भारत के निचले सिंध क्षेत्र पर आक्रमण करके देवल नामक राज्य को जीता तथा वहाँ के हिन्दू शासक को अपनी अधीनता स्वीकार करने पर विवश किया।

    1185 ई. में मुहम्मद गौरी ने तीसरा आक्रमण लाहौर पर किया तथा लाहौर तक का प्रदेश अपने राज्य में शािमल कर लिया।

    ➣ इस प्रकार मुहम्मद गौरी गजनी से लेकर लाहौर तक के विशाल क्षेत्र का स्वामी बन गया। अब वह भारत के राजाओं से सीधा संघर्ष कर सकता था।

    लाहौर पर अधिकार कर लेने के बाद मुहम्मद गौरी के राज्य की सीमा पंजाब के सरहिंद तक आ पहुंची थी जिसे मुस्लिम इतिहासकारों ने तबरहिंद कहा है।

    मुहम्मद गौरी से संघर्ष

    सरहिंद का दुर्ग दिल्ली एवं अजमेर के चौहान शासक पृथ्वीराज तृतीय के साम्राज्य के अधीन था। मुहम्मद गौरी ने यहीं से चौहान साम्राज्य पर आक्रमण करने का निर्णय लिया।

    1189 ई. में मुहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान के राज्य पर सीधा पहला आक्रमण किया तथा भटिण्डा के दुर्ग पर अधिकार कर लिया। उस समय भटिण्डा का दुर्ग चौहानों के अधीन था।

    ➣ पृथ्वीराज चौहान उस समय तो चुप बैठा रहा किन्तु 1191 ई. में जब मुहम्मद गौरी, तबरहिंद अर्थात् सरहिंद को जीतने के बाद आगे बढ़ा तो पृथ्वीराज ने करनाल जिले के तराइन के मैदान में उसका रास्ता रोका।

    इस प्रकार गौरी का भटिण्डा अभियान एवं तवरहिन्द के किले को जीतना तराइन के प्रथम युद्ध (1191 ई.) का प्रमुख कारण था।

    ➣ तराइन का यह युद्ध (भारत के इतिहास में तराइन की प्रथम लड़ाई के नाम से प्रसिद्ध) पृथ्वीराज चौहान के पक्ष में रहा एंव गौरी भागकर लाहौर पहुँचा तथा अपने घावों का उपचार करवाकर गजनी लौट गया।

    ➣ सम्राट पृथ्वीराज ने आगे बढ़कर सरहिंद के दुर्ग पर फिर से अधिकार कर लिया तथा मुहम्मद गौरी के किलेदार काजी जियाउद्दीन को बंदी बनाकर अजमेर ले आया।

    ➣ काजी ने पृथ्वीराज चौहान से प्रार्थना की कि काजी का जीवन बख्श दिया जाए। बदले में काजी ने पृथ्वीराज को विपुल धन दिया। जियाउद्दीन काजी चौहानों से मुक्त होकर गजनी लौट गया।

    ➣ गजनी पहुँचने के बाद पूरे एक साल तक मुहम्मद गौरी अपनी सेना में वृद्धि करता रहा। जब उसकी सेना में 1,20,000 सैनिक जमा हो गये तो 1192 ई. में वह पुनः पृथ्वीराज से लड़ने के लिये अजमेर की ओर चल दिया।

    तराइन का द्वितीय युद्ध भारतीय इतिहास के निर्णायक युद्धो में माना जाता है। जिसने भारतीय भूमि में मुस्लिम सत्ता स्थापित होने का मार्ग प्रशस्त कर दिया था।

    पृथ्वीराज रासो के अनुसार पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गौरी के बीच इक्कीस लड़ाइयाँ हुईं जिनमें चौहान विजयी रहे।

    हम्मीर महाकाव्य ने पृथ्वीराज द्वारा सात बार गौरी को परास्त किया जाना लिखा है।

    सिंघवी जैन ग्रंथ माला, पृथ्वीराज प्रबन्ध के संदर्भ से आठ बार हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष का उल्लेख करता है।

    प्रबन्धकोष का लेखक बीस बार मुहम्मद गौरी को पृथ्वीराज द्वारा कैद करके मुक्त करना बताता है।

    सुर्जन चरित्र में इक्कीस बार और प्रबन्ध चिन्तामणि में तेबीस बार गौरी का हारना अंकित है।

    ➣ इतने सारे विवरणों के आधार पर इतना अवश्य कहा जा सकता है कि मुहम्मद गौरी और पृथ्वीराज चौहान की सेनाओं के बीच कई बार संघर्ष हुआ।

    ➣ पुष्ट ऐतिहासिक विवरणों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि मुहम्मद गौरी एवं सम्राट पृथ्वीराज चौहान के बीच सम्मुख युद्ध दो बार हुआ जिन्हें तराइन की पहली लड़ाई एवं तराइन की दूसरी लड़ाई के नाम से जाना जाता है।

    तराइन का द्वितीय युद्ध भारतीय इतिहास के निर्णायक युद्धो में माना जाता है। जिसने भारतीय भूमि में मुस्लिम सत्ता स्थापित होने का मार्ग प्रशस्त कर दिया था।

    पृथ्वीराज रासो के अनुसार पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गौरी के बीच इक्कीस लड़ाइयाँ हुईं जिनमें चौहान विजयी रहे।

    हम्मीर महाकाव्य ने पृथ्वीराज द्वारा सात बार गौरी को परास्त किया जाना लिखा है।

    सिंघवी जैन ग्रंथ माला, पृथ्वीराज प्रबन्ध के संदर्भ से आठ बार हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष का उल्लेख करता है।

    प्रबन्धकोष का लेखक बीस बार मुहम्मद गौरी को पृथ्वीराज द्वारा कैद करके मुक्त करना बताता है।

    सुर्जन चरित्र में इक्कीस बार और प्रबन्ध चिन्तामणि में तेबीस बार गौरी का हारना अंकित है।

    ➣ इतने सारे विवरणों के आधार पर इतना अवश्य कहा जा सकता है कि मुहम्मद गौरी और पृथ्वीराज चौहान की सेनाओं के बीच कई बार संघर्ष हुआ।

    ➣ पुष्ट ऐतिहासिक विवरणों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि मुहम्मद गौरी एवं सम्राट पृथ्वीराज चौहान के बीच सम्मुख युद्ध दो बार हुआ जिन्हें तराइन की पहली लड़ाई एवं तराइन की दूसरी लड़ाई के नाम से जाना जाता है।

    1192 में चौहान सम्राट पृथ्वीराज तृतीय की मृत्यु के साथ ही भारत का इतिहास मध्यकाल में प्रवेश कर जाता है। अब अजमेर, दिल्ली, हांसी, सिरसा, समाना तथा कोहराम के क्षेत्र मुहम्मद गौरी के अधीन हो गये।

    ➣ अजमेर नगर में पृथ्वीराज चौहान के ताऊ विग्रहराज (चतुर्थ) अर्थात् वीसलदेव द्वारा निर्मित संस्कृत पाठशाला एवं सरस्वती मंदिर को भी तोड़ डाला गया तथा उसके एक हिस्से को मस्जिद में बदल दिया गया।

    ➣ गौरी के दरबारी लेखक हसन निजामी ने अपनी पुस्तक ताज-उल-मासिर में लिखा है कि पृथ्वीराज को मारने के बाद शहाबुद्दीन गौरी ने पृथ्वीराज चौहान के अवयस्क पुत्र गोविन्दराज से विपुल कर धन लेकर गोविंदराज (1192 ई) को अजमेर की गद्दी पर बैठा दिया। इसके बाद शहाबुद्दीन गौरी कुछ समय तक अजमेर में रहकर दिल्ली चला गया।

    ➣ पृथ्वीराज के पश्चात उसका भाई हरिराज (1193–1194 ई) कुछ समय के लिए राजा बना। उसने अजमेर पर आक्रमण कर गोरी द्वारा नियुक्त पृथ्वीराज के अवयस्क पुत्र से सिंहासन छीनने का प्रयास किया। किन्तु गोरी के सेनापति कुतुबद्दीन ऐबक ने उसे पराजित किया।

    ➣ कालांतर में सेनानियों के विद्रोह के बाद पृथ्वीराज के पुत्र को भी गद्दी से उतार दिया गया और उसकी जगह अजमेर का शासन एक तुर्की सेनाध्यक्ष को सौंपा दिया गया।

    ➣ दिल्ली पर तुर्कों का शासन हो गया और दिल्ली सल्तनत का शासन आरंभ हुआ। गौरी ने चौहान साम्राज्य के छोटे-छोटे टुकड़े कर दिये।

    कुतुबुद्दीन ऐबक को दिल्ली का गवर्नर बनाया तथा भारत के समस्त मुस्लिम आधिपत्य वाले क्षेत्र उसके अधीन कर दिए।

    अजमेर तथा नागौर मुस्लिम सत्ता के प्रमुख केन्द्र बनाये गए। गौरी ने अमीर अली को नागौर का मुक्ति अर्थात् जागीरदार तथा हमीदुद्दीन नागौरी को नागौर का काजी अर्थात् न्यायाधीश नियुक्त किया।

    डॉ. दशरथ शर्मा तथा एडवर्ड थॉमस ने अजमेर से प्राप्त एक सिक्के का उल्लेख किया है जिसके एक तरफ पृथ्वीराज चौहान तथा दूसरी तरफ मुहम्मद बिन साम अंकित है।

    ➣ शहाबुद्दीन गौरी को ही मुहम्मद-बिन-साम कहते थे। यह सिक्का संभवतः उस समय का है जब शहाबुद्दीन अजमेर में था तथा पृथ्वीराज जीवित था।

    ➣ गौरी ने अजमेर से और भी कई सिक्के चलाये। उसके चलाये हुए सोने के सिक्कों पर एक ओर देवी लक्ष्मी की मूर्ति और दूसरी ओर नागरी लिपि में श्रीमहमद-विनि-साम लिखा हुआ मिलता है।

    ➣ संभवतः यह भी सम्राट पृथ्वीराज अथवा उससे पूर्व के किसी चौहान राजा द्वारा जारी किया गया सिक्का था, इसी कारण इसके एक तरफ लक्ष्मीजी की मूर्ति है तथा दूसरी ओर गौरी ने अपना नाम अंकित करवाया।

    ➣ गौरी के अजमेर से मिले ताम्बे के सिक्कों पर एक ओर नंदी तथा त्रिशूल के साथ ‘स्रीमहमद-साम और दूसरी तरफ चौहानों के सिक्कों के समान स्रीहमीर लेख है।

    नंदी एवं त्रिशूल वाला सिक्का संभवतः कोई पुराना सिक्का था जिसे मुहम्मद गौरी ने फिर से जारी किया जबकि दोनों तरफ लेख वाला सिक्का मुहम्मद गौरी से सम्बन्ध नहीं रखता।

    1193 ई. में मुहम्मद गौरी ने कन्नौज के राजा जयचंद पर आक्रमण करके उसे भी मार डाला तथा उसका राज्य नष्ट कर दिया। इससे कन्नौज तथा बदायूं आदि के क्षेत्र भी मुसलमानों के अधीन हो गए।

    हम्मीर महाकाव्य में पृथ्वीराज को कैद किए जाने और अंत में मरवा दिए जाने का उल्लेख है।

    ➣ पृथ्वीराज चौहान के दो समसामयिक लेखक यूफी तथा हसन निजामी पृथ्वीराज को कैद किये जाने का उल्लेख तो करते हैं।

    हसन निजामी ने ताजुल मासिर में लिखा है कि पृथ्वीराज को कैद कर अजमेर ले जाया गया जहां उसने गौरी के अधीनस्थ कुछ वर्षों तक शासन किया। हसन निजामी के इस कथन की पुष्टि संस्कृत ग्रंथकिसलविधिविद्धमसां से भी होती है।

    मिनहाज उस सिराज पृथ्वीराज के भाग जाने पर पकड़े जाने और फिर मरवाए जाने का उल्लेख करता है। मिन्हाज के अनुसार पृथ्वीराज की मृत्यु सिरसा (सरसुती) में हुई। फरिश्ता भी इसी कथन का अनुमोदन करता है।

    इलियट ने भी मिन्हाज उस सिराज तथा फरिश्ता द्वारा लिखे गए मत को स्वीकार किया है।

    अबुल फजल ने आइन-ए-अकबरी में लिखा है कि पृथ्वीराज को सुलतान गजनी ले गया जहाँ पृथ्वीराज की मृत्यु हो गई।

    चन्दरबरदाई उसका मित्र व राजकवि था जिसका ग्रंथ पृथ्वीराज रासो हिन्दी साहित्य का प्रथम महाकाव्य माना जाता है।

    ➣ पृथ्वीराज को युद्ध क्षेत्र से पकड़कर अजमेर लाया गया तथा कुछ दिनों तक बंदी बनाकर रखने के बाद अजमेर में ही उसकी हत्या की गई।

    ➣ इस अनुमान की पुष्टि पृथ्वीराज चौहान के उन सिक्कों से भी होती है जिन्हें मुहम्मद गौरी ने एक तरफ अपने नाम का खुतबा लिखवाकर फिर से जारी करवाया। ऐसा एक सिक्का अजमेर से मिला है।

    निष्कर्ष

    ➣ यह सम्राट पृथ्वीराज की अदूरदर्शिता ही कही जाएगी कि उसने अपने स्वजातीय बंधुओं महोबा नरेश परमारदी चंदेल, कन्नौज नरेश जयचंद गाहड़वाल, अन्हिलवाड़ा नरेश भोला भीम, जम्मू नरेश विजयराज अथवा चक्रदेव आदि को अपना शत्रु बना लिया।

    ➣ उसका सेनापति स्कंद, मंत्री प्रतापसिंह एवं सोमेश्वर भी उसके प्रति समर्पित नहीं थे। इन सब कारणों से 1192 में पृथ्वीराज चौहान मुहम्मद गौरी के हाथों परास्त हुआ और अपमानजनक स्थितियों में मारा गया।

    ➣ यदि पृथ्वीराज पर लगे अदूरदर्शिता के आक्षेप को अलग रख दिया जाए तो पृथ्वीराज का जीवन शौर्य और वीरता की अनुपम कहानी है। वह वीर, विद्यानुरागी, विद्वानों का आश्रयदाता था।

    ➣ उसे भारत का अन्तिम हिन्दू सम्राट भी कहा जाता है। उसका राज्य सतलज नदी से बेतवा तक तथा हिमालय के नीचे के भागों से लेकर आबू पर्वत तक विस्तृत था। उसके बाद कोई हिन्दू राजा इतने बड़े भू-भाग का स्वामी नहीं हुआ।

    1190 ई. में पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि कश्मीरी पण्डित जयानक ने सुप्रसिद्ध ग्रंथ पृथ्वीराजविजय महाकाव्यम् की रचना की।

    ➣ उसके दरबार में विद्वानों का एक बहुत बड़ा समूह रहता था। उसे छः भाषायें आती थीं तथा वह प्रतिदिन व्यायाम करता था। वह उदारमना तथा विराट व्यक्तित्व का स्वामी था।

    जिनपलोदय, खतरगच्छ गौरवावली के अनुसार पृथ्वीराज की सभा में धार्मिक एवं साहित्यक चर्चाएं होती थीं। उसके शासनकाल में अजमेर में खतरगच्छ के जैन आचार्य जिनपति सूरि तथा उपकेशगच्छ के आचार्य पद्मप्रभ के बीच शास्त्रार्थ हुआ।

    मृत्युपरांत भारत की स्थिति

    पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु के बाद देश का राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक परिदृश्य बहुत तेजी से बदलने लगा। हिन्दू राजा नेपथ्य में जाने लगे और दिल्ली सल्तनत का विस्तार होने लगा। सर्वाधिक हानि चौहान राज्य की हुई।

    ➣ चौहानों ने अब अजमेर से दूर रहकर छोटे-छोटे राज्य स्थापित करने के प्रयास आरंभ कर दिये। उनकी शक्ति रणथंभौर, बूंदी, कोटा, नाडोल, जालोर, सिरोही तथा आबू के राज्यों में बँटती चली गई।

    रणथम्भौर के चौहान

    ➣ पृथ्वीराज चौहान के पुत्र गोविंदराज ने रणथंभौर की चौहान शाखा की नींव रखी। आगे चलकर इस वंश में हम्मीर चौहान नामक विख्यात राजा हुआ जिसने 1282 से 1301 ई. तक अपनी मृत्यु पर्यन्त राज्य किया।

    ➣ हम्मीर चौहान जो अपनी शरणागत वत्सलता, प्रण और वीरता के लिए प्रसिद्ध हुआ। उसने अल्लाउद्दीन के खेमे से भागकर आए हुए मुसलमानों की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया।

    हम्मीर चौहान ने अपने राज्य की सीमा मालवा में उज्जैन तक तथा राजपूताना में आबू पर्वत तक बढ़ा ली थी। उसने मालवा का एक भाग तथा गढ़मंडल जीत लिया था। बूंदी और कोटा के चौहान राज्य भी इसी गोविंदराज के वंशजों ने स्थापित किए।

    ➣ कालांतर में अलाउद्दीन ख़िलजी दिल्ली की गद्दी पर बैठा। प्रारम्भ में उसे सफलता नहीं मिली। किन्तु कई आक्रमणों के पश्चात सन 1301 ई. में उसने रणथम्भौर को दिल्ली सल्तनत में मिला लिया।

    उल्लेखनीय है रणथम्भौर को जीतने वाला प्रथम मुस्लिम शासक इल्तुतमिश था।

    ➣ अकबर के समय में बूंदी और रणथंभौर के राज्य गोविंदराज के वंशज सुरजनराय के अधीन थे। सुरजनराय ने अकबर से इस शर्त पर संधि की कि बूंदी राज्य की राजकुमारियों के डोले कभी भी मुगलों के लिए नहीं भेजे जाएंगे।

    जालौर के चौहान

    ➣ जालौर के चौहान शाखा का संस्थापक कीर्तिपाल था। प्राचीन शिलालेखों में जालौर का नाम जाबालिपुर और क़िले का सुवर्णगिरि मिलता है, जिसको अपभ्रंश में सोनगढ़ कहते हैं। इसी पर्वत के नाम से चौहानों की यह शाखा सोनगरा कहलाई।

    नाडोल का चौहान राज्य पृथ्वीराज चौहान के पूर्वज चौहान राजकुमारों द्वारा स्थापित किया गया था। जालोर का चौहान राज्य इसी नाडौल राज्य के चौहान राजकुमारों द्वारा स्थापित किया गया था।

    ➣ जालोर के चौहानों द्वारा सिरोही, आबू एवं मण्डोर में अलग चौहान राज्यों की स्थापना की गई थी। जब इल्तुतमिश दिल्ली का सुल्तान हुआ तो उसने जालोर, मण्डोर तथा नाडोल के चौहानों को परास्त कर उनके छोटे-छोटे राज्यों पर अधिकार कर लिया।

    ➣ दिल्ली के अगले प्रबल सुल्तान बलबन ने रणथंभौर एवं नागौर पर अधिकार करके लाहौर से रणथंभौर तक का भाग अपने अधीन कर लिया जिसकी राजधानी नागौर में रखी।

    ➣ इनमें से कुछ राज्यों ने स्वतंत्र होने का प्रयास किया किंतु अलाउद्दीन खिलजी ने रणथंभौर, चित्तौड़, सिवाना एवं जालौर पर अधिकार करके उन्हें फिर से दिल्ली सल्तनत के अधीन कर लिया। इस प्रकार कुछ ही वर्षों में सम्पूर्ण चौहान साम्राज्य मुसलमानों के अधीन चला गया।

    ➣ लगभग 1311 ई. में जालौर का पूर्णत: पतन हो गया।

    ➣ भारतीय जनमानस यह मानता आया है कि राजा जयचंद गाहड़वाल ने सम्राट पृथ्वीराज चौहान से अपनी पुरानी शत्रुता का बदला लेने के लिए 1192 ई. में गजनी के शासक मुहम्मद गौरी को भारत पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया था।

    ➣ इस धारणा का मुख्य आधार मिनाहाजुद्दीन सिराज द्वारा लिखी गई पुस्तक तबकाते नासिरी है। मिनहाजुद्दीन सिराज दिल्ली का काजी था। वह 1246 से 1266 तक दिल्ली के सुल्तान रहे नासिरुद्दीन महमूद का समकालीन था।

    ➣ सिराज ने लिखा है कि गौरी को कन्नौज के राजा जयचंद तथा जम्मू के विजयपाल द्वारा सैन्य सहायता उपलब्ध करवाई गई।

    तबकात-ए-नासिरी के इस कथन की पुष्टि किसी भी अन्य ग्रंथ से नहीं होती कि राजा जयचंद ने इस युद्ध में मुहम्मद गौरी की सहायता की थी।

    ➣ अतः हम कह सकते हैं कि केवल मिनहाजुद्दीन सिराज की तबकाते नासिरी को आधार बनाकर जयचंद को दोषी ठहराना इतिहास की एक बड़ी भूल है।

    चंदबरदाई की पृथ्वीराज रासो : हिंदी साहित्य का प्राचीनतम महाकाव्य

    पृथ्वीराज रासो हिंदी साहित्य का प्राचीनतम महाकाव्य माना जाता है। इसकी रचना चंदबरदाई ने की थी, जो पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि तथा मित्र थे। इसकी रचना 12वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मानी जाती है।

    ➣ इस ग्रंथ में वीर रस की प्रधानता है, साथ ही श्रृंगार रस भी अत्यंत सुंदर रूप में व्यक्त हुआ है। इसकी भाषा अपभ्रंश मिश्रित पुरानी अवधी-हिंदी है, जो उस काल की लोकभाषा को प्रतिबिंबित करती है।

    ➣ यह महाकाव्य राजा पृथ्वीराज चौहान के पूर्ण जीवन चरित्र पर आधारित है। इसमें उनके जन्म, बाल्यकाल, शिक्षा, योद्धा के रूप में वीरता, अजमेर और दिल्ली पर शासन, कन्नौज के राजा जयचंद की पुत्री संयोगिता के साथ स्वयंवर तथा प्रेम विवाह का वर्णन मिलता है।

    ➣ साथ ही मोहम्मद ग़ोरी के साथ हुए तराइन के दो प्रसिद्ध युद्धों (1191 एवं 1192 ई.), पृथ्वीराज के बंदी बनाए जाने, आँखों में लोहे की सलाखें डालकर अंधा किए जाने तथा उनकी अंतिम वीरगाथा का भी विस्तृत वर्णन मिलता है।

    ➣ कुछ आधुनिक विद्वान (जैसे रामचंद्र शुक्ल आदि) इसकी पूर्ण ऐतिहासिकता पर संदेह व्यक्त करते हैं, फिर भी यह रचना राजपूत शौर्य, स्वाभिमान, देशप्रेम, वीरता और योद्धा परंपरा का अद्भुत एवं जीवंत चित्रण प्रस्तुत करती है।

  • बंगाल का सेन वंश (1070-1230 ई.): बल्लालसेन

    📚 विषय सूची

    सेन वंश (11वीं – 13वीं शताब्दी) : बंगाल एवं बिहार की प्रमुख शक्ति

    ➣ पाल राजवंश के पतनोपरान्त बंगाल का शासन सेन राजवंश के नियंत्रण में आ गया जिसका स्थापना सामंत सेन ने राढ़ नामक स्थल पर किया था। सेन मूलतः दक्कन के कर्नाटक क्षेत्र के थे। देवपाड़ा प्रशस्ति में सेन अपने आपको ब्रह्म क्षत्रिय मानते थे।

    शासक शासनकाल परिचय / प्रमुख तथ्य
    सामंतसेन व हेमंतसेन 1070 – 1096 ई. सेन वंश के प्रारंभिक शासक, बंगाल (राढ़ क्षेत्र) में आधार स्थापित किया। पाल वंश के पतन का लाभ उठाकर स्वतंत्र सत्ता की नींव रखी।
    विजयसेन 1095 – 1158 ई. सेन वंश का वास्तविक संस्थापक, बंगाल में पूर्ण स्वतंत्रता स्थापित की। गौड़ क्षेत्र पर नियंत्रण किया और सेना को मजबूत किया।
    बल्लाल सेन 1158 – 1178 ई. प्रशासनिक सुधार और सामाजिक व्यवस्था (जाति व्यवस्था) के लिए प्रसिद्ध। नदिया (Nadia) को प्रमुख केंद्र बनाया और राज्य को स्थिर किया, बंगाल के ब्राह्मणों और कायस्थों में कुलीन प्रथा (Kulin System) का प्रवर्तक।
    लक्ष्मणसेन 1178 – 1205 ई. सेन वंश का अंतिम महान शासक। साहित्य, धर्म और संस्कृति का संरक्षक। उसकी राजधानी नदिया थी। 1204–1205 ई. में बख्तियार खिलजी के आक्रमण से बंगाल में सेन वंश का पतन हुआ।

    सामंतसेन व हेमंतसेन (1070 – 1096 ई.) : सेन वंश की नींव

    ➣ बंगाल में सेनवंश का संस्थापक सामंत सेन को माना जाता है।

    ➣ अपने जीवन के आरंभिक चरण में उसने कर्णाट में अपनी सैनिक गतिविधियां व राढ़ में स्थायी रूप से छोटा सा राज्य स्थापित किया परन्तु कोई राजकीय पद धारण नहीं किया।

    ➣ सामंतसेन का पुत्र हेमंत सेन उसका उत्तराधिकारी बना अभिलेखों में उसे महाराजाधिराज की उपाधि से विभूषित किया गया।

    ➣ सामंतसेन की तुलना में हेमंतसेन की सत्ता अधिक सुदृढ़ थी।

    विजयसेन (1095 – 1158 ई.) : बंगाल में सेन शक्ति का विस्तार

    ➣ इस वंश का प्रथम महत्वपूर्ण शासक था जो सामंत सेन का पुत्र था। विजयसेन सेन वंश का पराक्रमी शासक हुआ। उमापतिधर द्वारा रचित देवपाड़ा प्रशस्ति में विजय सेन की विजयों का उल्लेख मिलता है।

    ➣ उसने बंगाल को पुनः पूर्ण राजनीतिक एकता प्रदान की। कलिंग, कामरूप एवं मगध को जीत कर विजयसेन ने अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार किया।

    कवि धोयी द्वारा रचित देवपाड़ा प्रशस्ति लेख में विजयसेन की यशस्वी विजयों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि उसने नव्यवीर (नेपाल व मिथिला) को पराजित किया।

    ➣ विजय सेन की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि गौड़राज (पाल शासक) मदनपाल को परास्त करना था। उसने मदनपाल को बंगाल से खदेड़ कर उत्तरी बंगाल में अपनी सत्ता स्थापित कर ली।

    ➣ विजय सेन ने विजयपुरी एवं विक्रमपुरी नामक दो राजधानियां स्थापित की। उसने परमेश्वर, परमभट्टारक तथा महाराजधिराज की उपाधि धारण की।

    ➣ विजय सेन शैव धर्म का अनुयायी था जिसकी पुष्टि उसे अरिराज वृषशंकर की उपाधि से स्पष्ट होता है।

    ➣ उसकी रानी ने कनकतुलापुरुषमहादान यज्ञ करवाया था।

    ➣ विजयसेन की उपलब्धियों से प्रभावित होकर श्री हर्ष ने उसकी प्रशंसा में विजयप्रशस्ति तथा गौड़ोविर्श प्रशस्ति काव्यों की रचना की।

    बल्लालसेन (1158 – 1178 ई.) : सामाजिक सुधार एवं स्थिर शासन

    ➣ बल्लाल सेन विजयसेन की मृत्यु के बाद बंगाल का शासक बना। बंगाल के सेन वंश का प्रमुख शासक था। उसने गोडेश्वर, निःशंक शंकर आदि उपाधियां धारण की।

    ➣ उसने उत्तरी बंगाल पर विजय प्राप्त की और मगध के पालों के विरुद्ध भी अभियान चलाया और बंगाल में पाल वंश के शासन का अन्त कर दिया।

    लघुभारत एवं वल्लालचरित ग्रंथ के उल्लेख से प्रमाणित होता है कि वल्लाल का अधिकार मिथिला और उत्तरी बिहार पर था। इसके अतिरिक्त राधा, वारेन्द्र, वाग्डी एवं वंगा वल्लाल सेन के अन्य चार प्रान्त थे।

    ➣ उसने जाति प्रथा एवं कुलीन को अपने शासन काल में प्रोत्साहन दिया। इसे बंगाल में जाति प्रथाकुलीन प्रथा को संगठित करने का श्रेय प्राप्त है।

    इसलिए उसे बंगाल के ब्राह्मणों और कायस्थों में कुलीन प्रथा का प्रवर्तक माना जाता है।

    ➣ बल्लालसेन स्वयं विद्वान तथा विद्वानों का संरक्षक था। बल्लाल सेन ने आचार सागर व प्रतिष्ठा सागर नामक धार्मिक व सामाजिक ग्रन्थों की रचना की।

    ➣ इसके अलावा उसने दानसागर ग्रंथ की रचना किया था। एक अन्य ग्रंथ अंद्भुत सागर की रचना को प्रारंभ किया, परंतु उसे पूर्ण नहीं करा पाया। पुत्र लक्ष्मण सेन (1178 से 1205 ई.) ने पूरा किया। अद्भुत सागर खगोल विज्ञान की पुस्तक है।

    ➣ उसका साहित्यिक गुरु विद्वान् अनिरुद्ध था। उसने गौड़ेश्वर तथा निशंकर की उपाधि से उसके शैव मतालम्बी होने का आभास होता है। जीवन के अन्तिम समय में वल्लालसेन ने सन्न्यास ले लिया था।

    लक्ष्मणसेन (1178 – 1205 ई.) : बख्तियार खिलजी आक्रमण एवं पतन

    ➣ बल्लालसेन का उत्तराधिकारी पुत्र लक्ष्मणसेन था। उसने प्राचीन राजधानी गौड़ के समीप अन्य राजधानी लक्ष्मणवती (लखनौती) की स्थापना प. बंगाल में किया था।

    ➣ लक्ष्मण सेन अपने वंश के विपरीत वैष्णव धर्म का अनुयायी था। उसके लेख विष्णु की स्तुति से प्रारम्भ होते हैं।

    ➣ उसका शासन सम्पूर्ण बंगाल पर विस्तृत था। कुछ समय तक उसके राज्य सीमा दक्षिण-पूर्व में उड़ीसा और पश्चिम में वाराणसी, इलाहाबाद तक थी।

    ➣ उसका समकालीन कन्नौज का शासक गहड़वाल वंशीय जयचन्द्र एंव अजमेर व दिल्ली का चौहान वंशीय शासक पृथ्वी राज चौहान थे।

    ➣ लक्ष्मणसेन गहड़वाल शासक जयचंद को पराजित कर परमभागवत की उपाधि धारण की इस उपाधि से उसके वैष्णव धर्म का अनुयायी होने का पता चलता है।

    ➣ लक्ष्मण सेन स्वयं विद्वान था। उसने बल्लाल सेन द्वारा प्रारम्भ किये गये उद्भुत सागर नामक ग्रन्थ की रचना को पूरा किया। श्रीधरदास उसका दरबारी कवि था।

    ➣ इसके अतिरिक्त जयदेव (गीत गोविन्द के लेखक), जलायुध (ब्राह्मण सर्वस्व के लेखक), धोई (पवनदूतम् के लेखक) तथा गोवर्धन उसके दरबार को सुशोभित करते थे।

    ➣ हलायुध उसका प्रधान न्यायाधीश तथा मुख्यमंत्री था।

    ➣ लक्ष्मण सेन ने लक्ष्मण संवत चलाया। उसकी राजसभा में 5 रत्न थे जयदेव, धोयी, श्रीधरदास, हलायुध एवं उमापतिधर।

    ➣ सेन शासक शैव धर्म के अनुयायी थे। विजय सेन ने देवपाड़ा में प्रद्युमनेश्वर शिव का शानदार मन्दिर बनवाया।

    ➣ 1202 ई. में इख़्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार ख़िलजी ने लक्ष्मण सेन की राजधानी लखनौती पर आक्रमण कर उसे नष्ट कर दिया। इस घटना का वर्णन मिनहाज ने तबकाते-नासिरी में किया है।

    ➣ सके शासनकाल के अन्तिम चरण में उसके कई सामन्तों ने विद्रोह करके स्वतंत्र राज्य की स्थापना कर ली। लक्ष्मणसेन के बाद कमज़ोर उत्तराधिकारी सत्ता में आये।

    विश्वरूप सेन (1206-1225 ई.) तथा केशवसेन (1225-1230 ई.) शासको की विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है। ये संभवत: सूर्य उपासक थे।

  • कन्नौज का गहड़वाल वंश (1080-1194ई.)

    📚 विषय सूची

    गहड़वाल वंश (11वीं – 12वीं शताब्दी) : कन्नौज की प्रमुख शक्ति

    प्रतिहार साम्राज्य के पतन के पश्चात कन्नौज तथा बनारस में जिस राजवंश का शासन स्थापित हुआ उसे गहड़वाल वंश कहा जाता है। यह चन्द्रवंशी थे।

    ➣ इस वंश के शासक हिन्दू धर्मसंस्कृत के पोषक थे। गहड़वालों का मूल निवास स्थल विन्ध्याचल का पर्वतीय वन प्रांत माना जाता था।

    शासक शासनकाल परिचय / प्रमुख तथ्य
    चन्द्रदेव 1080 – 1100 ई. गहड़वाल वंश का संस्थापक, कन्नौज में सत्ता स्थापित की और प्रतिहारों के बाद उत्तर भारत में नई शक्ति के रूप में उभरे।
    मदनपाल 1104 – 1114 ई. अल्पकालीन शासक, साम्राज्य को स्थिर रखने का प्रयास किया लेकिन सीमित सफलता मिली।
    गोविंद चन्द्र 1114 – 1155 ई. सबसे शक्तिशाली गहड़वाल शासक, कन्नौज का स्वर्णकाल। उत्तर भारत में व्यापक प्रभाव और मजबूत प्रशासन स्थापित किया।
    विजय चन्द्र 1155 – 1169 ई. शासनकाल में स्थिरता बनाए रखने का प्रयास, लेकिन बाहरी दबाव और राजनीतिक कमजोरियाँ बढ़ने लगीं।
    जयचन्द्र 1170 – 1194 ई. अंतिम शक्तिशाली शासक, पृथ्वीराज चौहान से संघर्ष के लिए प्रसिद्ध। तराइन के युद्ध (1192 ई.) के बाद मुहम्मद गोरी के आक्रमण से कन्नौज का पतन हो गया।

    चन्द्रदेव (1080 – 1100 ई.) : कन्नौज में गहड़वाल सत्ता की स्थापना

    गुर्जर प्रतिहारों के बाद चन्द्रदेव ने कन्नौज में गहड़वाल वंश की स्थापना की। चन्द्रदेव ने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की।

    ➣ गहड़वाल शासकों को काशी नरेश के रूप में भी जाना जाता था। क्योंकि बनारस इनके राज्य की पूर्वी सीमा के निकट था। दिल्ली के तोमरों ने भी उसकी अधीनता स्वीकार की।

    ➣ अभिलेखों में उसे परमभटारक, महाराजाधिराज, परमेश्वर उपाधियों से सम्बोधित किया गया।

    बदायूँ तथा सेत-माहेत लेखों में चन्द्रदेव को कन्नौज का राजा (गाधिपुराधिप) कहा गया है।

    ➣ चन्द्रदेव का पुत्र मदनपाल को तुर्क आक्रमणकारियों ने कन्नौज पर आक्रमण करके उसे बंदी बना लिया। उसके पुत्र गोविंद चन्द्र ने संघर्ष के बाद उसे मुक्त कराया।

    गोविंद चन्द्र (1114 – 1155 ई.) : गहड़वाल वंश का स्वर्णकाल

    ➣ चन्द्रदेव का पौत्र गोविन्द चन्द्र इस वंश का सर्वाधिक महत्वपूर्ण शासक था उसने पालों से मगध जीता।

    ➣ गोविन्द चन्द्र ने सबसे पहले कलचुरि राजाओं द्वारा धारण की जाने वाली उपाधियां अश्वपति, गजपति, नरपति, राजत्रयाधिपति धारण किया था।

    ➣ उसने आधुनिक पश्चिमी बिहार से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक का समस्त भाग अपने अधीन करके कन्नौज के प्राचीन गौरव को पुनः स्थापित किया। उसने पालों से मगध जीता तथा मालवा पर अधिकार किया।

    कश्मीर, गुजरात एवं चोल वंश के शासकों से गोविन्द चन्द्र के मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध थे। उसके कार्यकाल में कन्नौज को पुनः उसकी पुरानी प्रतिष्ठा प्राप्त हुई।

    ➣ गोविन्द चन्द्र के समय में उसके मंत्री लक्ष्मीधर ने कल्पद्रुम नामक विधि ग्रंथ की रचना की थी। लक्ष्मीधर को मंत्र महिमा का आश्चर्य कहा गया है। तीर्थ विवेचन काण्ड भी लक्ष्मीघर ने लिखा।

    ➣ एक विद्वान् के रूप में भी गोविन्द्र चन्द्र बड़ा प्रसिद्ध था। उसे उसके लेखों में विविध विद्याविचार वायस्पति कहा गया है।

    ➣ गोविन्द चन्द्र की पत्नी पाल राजकुमारी कुमारदेवी बौद्ध थी। कुमारदेवी ने सारनाथ में धर्मचक्रजिन विहार बनवाया। कुमारदेवी ने अशोक द्वारा सारनाथ में निर्मित धर्मराज का स्तूप का छटा परिवर्धन करवाया।

    ➣ कुमारदेवी के सारनाथ लेख में गोबिन्दचन्द्र को विष्णु का अवतार कहा गया है,

    ➣ गोविन्द चन्द्र स्वयं बढ़ा विद्वान था। उसने विविधविद्याविचारयाचस्पति की व्याधि ग्रहण की।

    ➣ उसने उड़ीसा के बौद्ध मिनु शाक्य रश्चित तथा चोल राज्य के बौद्ध बागेश्वर रश्चित का स्वागत किया और उनके द्वारा संचालित जेतवन बिहार को 6 गाँव दान में दिये।

    ➣ गोविन्द्र चन्द ने कल्चुरी सिक्कों की नकल पर बैठी हुई लक्ष्मी शैली के सोने, चाँदी एवं तांबे के सिक्के चलाए। इससे पूर्व गहड़वालों के सिक्के सोने के नहीं थे।

    ➣ गोविन्द चन्द्र गहड़वाल के 800 स्वर्ण सिक्के 1887 ई. में उत्तरप्रदेश में बहराइच जिले के ननपारा स्थान से मिले। सिक्कों से चार भुजाओं वाली लक्ष्मी की बैठी हुई आकृति मिली।

    ➣ गोविन्द चन्द्र की रानी कुमार देवी के सारनाथ अभिलेख में गोविन्द्रचन्द्र को बनारस की तुर्की से रक्षा करने के लिए हरि का अवतार कहा गया है,लेकिन व्यक्तिगत जीवन में गोविन्द चन्द्र शैव धर्म का अनुयायी था।

    विजय चन्द्र (1155 – 1169 ई.) : प्रशासनिक स्थिरता

    ➣ गोविन्द चन्द्र का उत्तराधिकारी उसका पुत्र विजय चन्द्र हुआ।

    ➣ इसके शासन काल में सेनवंश का शासक लक्ष्मण सेन ने आक्रमण किया किन्तु वह पराजित हुआ।

    ➣ विजयचन्द ने जौनपुर में अटाला देवी के मन्दिर का निर्माण करवाया। बाद में 14वीं सदी में मुसलमानों ने यहां अटाला देवी मस्जिद का निर्माण कराया।

    ➣ विजयचन्द्र के काल में ही गढ़वालों की स्थित कमजोर होना आरम्भ हो गयी थी। दिल्ली का प्रदेश गहड़वालों के हाथ में निकलकर चौहान नरेशों के हाथ में चला गया।

    जयचन्द्र (1170 – 1194 ई.) : तराइन युद्ध एवं गहड़वाल वंश का पतन

    ➣ विजय चन्द्र का पुत्र जयचन्द्र गहड़वाल वंश का अन्तिम शासक था। भारतीय लोक साहित्य तथा कथाओं में वह राजा जयचन्द्र के नाम से विख्यात है। उसका समकालीन दिल्ली तथा अजमेर का चौहान नरेश पृथ्वीराज तृतीय था।

    ➣ चन्दबरदाई के पृथ्वीराजरासो से दोनों की पारस्परिक शत्रुता का पता चलता है। उसके अनुसारपृथ्वीराज चौहान ने जयचन्द्र की पुत्री संयोगिता का अपहरण कर लिया था। यही घटना चौहान व गहड़वाल वंश के मध्य शत्रुता का कारण बनी।

    ➣ जयचन्द्र ने देवगिरि के यादवों, गुजरात के सोलंकियों और तुर्कों को कई बार हराया। अपनी विजय के उपलक्ष्य में उसने राजसूय यज्ञ भी किया था।

    ➣ उसका समकालीन सेनवंशी शासक लक्ष्मणसेन था। सेनवंश के लेखों से पता चलता है कि लक्ष्मणसेन ने काशी के राजा को जीता तथा काशी और प्रयाग में उसने विजय स्तम्भ स्थापित किये थे।

    ➣ जब मुहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज पर आक्रमण किया तब जयचन्द्र तटस्थ रहा। कुछ विद्वानों के अनुसार स्वयं जयचन्द्र ने ही गोरी को पृथ्वीराज के राज्य पर आक्रमण करने के लिए आमन्त्रित किया था।

    तराईन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज को हराने के पश्चात 1194 ई. में मुहम्मद गोरी ने जयचन्द्र के राज्य पर भी आक्रमण किया।

    ➣ दोनों के मध्य चन्दावर (एटा जिला) के मैदान में युद्ध हुआ, जहां कुतुबुउद्दीन ऐबक के नेतृत्व में 5 हजार सैनिकों का जयचन्द्र की विशाल सेना से सामना हुआ। दुर्भाग्यवश हाथी पर सवार जयचन्द्र की आंख में एक तीर लग जाने से उसकी मृत्यु हो गयी।

    ➣ पृथ्वीराज चौहान एंव जयचंद्र की मृत्यु के साथ ही उत्तर-भारत में मुस्लिम शासन का आरम्भ हुआ।

    हरिशचन्द्र इस वंश का अन्तिम शासक था।

    ➣ जयचन्द का कमौली अभिलेख बनारस से प्राप्त ताम्रपत्र अभिलेख है।

    ➣ जयचंद ने संस्कृत के प्रख्यात कवि श्रीहर्ष को संरक्षण प्रदान किया, जिसने नैषेधचरित एवं खंडन-खंड-खाद्य की रचना की। जयचन्द ने स्वयं रम्भामंजरी नाटक लिखा।

    ➣ जयचन्द को दलपुंगल भी कहा गया है, क्योंकि उसकी विशाल सेना सदैव विचरण करती रहती थी।

    ➣ गहड़वाल शासकों की मुहरों पर गरूड़ की आकृति है तथा इनके अभिलेखों में इन्हें परम माहेश्वर कहा गया है।

    ➣ गहड़वाल शासकों ने मुस्लिम व्यापारियों पर तुरुष्कदण्ड या मल्लकर नामक कर लगाया। इसका उल्लेख गोविन्द चन्द्र के मनेर ताम्रपत्र लेख में है।

    ➣ गहड़वाल अभिलेखों में जल कर (उदक भाग) लगाने का साक्ष्य भी है।

    पत्तालपाठक गहड़वालों की प्रशासनिक इकाइयाँ थी।

    ➣ गहड़वाल अभिलेखों में प्रवणि कर का उल्लेख है, जो फुटकर व्यापारियों से लिया जाता था।

  • चालुक्य (सोलंकी) वंश (941-1197 ई.) : सिद्धराज जयसिंह

    📚 विषय सूची

    चालुक्य (सोलंकी) वंश : गुजरात की प्रमुख शक्ति

    ➣ प्राचीन ग्रंथ कुमारपाल चरितवर्णरत्नाकर में परम्परागत 36 राजपूत कुलों की सूची मिलती है।

    ➣ चालुक्य (सोलंकी) अग्निकुल से उत्पन्न राजपूतों में से एक थे। इस वंश के शासक जैन धर्म के पोषक व संरक्षक थे।

    ➣ चालुक्यों की उत्पत्ति का विषय अत्यंत ही विवादास्पद है। वराहमिहिर की बृहत्संहिता में इन्हें शूलिक जाति का माना गया है, जबकि पृथ्वीराज रासो ने इनकी उत्पत्ति आबू पर्वत पर किये गए यज्ञ के अग्निकुंड से बताई है।

    शासक शासनकाल परिचय / प्रमुख तथ्य
    मूलराज प्रथम 941 – 995 ई. सोलंकी (चालुक्य) वंश का संस्थापक, अन्हिलवाड़ पाटन (गुजरात) में सत्ता स्थापित की। प्रारंभिक संघर्षों के बाद राज्य की नींव मजबूत की और स्वतंत्र शासन की शुरुआत की।
    भीम देव प्रथम 1022 – 1064 ई. महमूद गजनवी के सोमनाथ आक्रमण (1025 ई.) के समय शासक। मंदिर के विनाश के बाद पुनर्निर्माण कराया और गुजरात की शक्ति को पुनः संगठित किया।
    जयसिंह सिद्धराज 1094 – 1153 ई. सोलंकी वंश का स्वर्णकालीन शासक। गुजरात की राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक उन्नति हुई। साहित्य, कला और मंदिर निर्माण को संरक्षण दिया।
    कुमार पाल 1153 – 1172 ई. जैन धर्म का महान संरक्षक। आचार्य हेमचंद्र से प्रभावित होकर अहिंसा नीति अपनाई। राज्य में सामाजिक सुधार और धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ावा दिया।
    अजयपाल 1172 – 1176 ई. कमजोर शासक, आंतरिक अस्थिरता और सामंतों की शक्ति बढ़ी। केंद्रीय सत्ता कमजोर होने लगी।
    मूलराज द्वितीय 1176 – 1178 ई. अल्पकालीन शासन, मुहम्मद गोरी की सेनाओं से संघर्ष/विजय, राजनीतिक अस्थिरता और बाहरी दबाव के कारण प्रभाव सीमित रहा।
    भीम द्वितीय 1178 – 1238 ई. दीर्घकालीन लेकिन कमजोर शासन। दिल्ली सल्तनत के उदय के समय शासन किया। लगातार आक्रमणों और आंतरिक विद्रोह के कारण सोलंकी शक्ति पतन की ओर चली गई।

    मूलराज प्रथम (941 – 995 ई.) : सोलंकी वंश की स्थापना

    ➣ गुजरात के चालुक्य वंश का संस्थापक मूलराज प्रथम था। उसने गुजरात के एक बड़े भाग को जीतकर अन्हिलवाड़ को अपनी राजधानी बनाया।

    वर्ष 995-1008 ई. तक मूलराज का पुत्र अन्हिलवाड़ का शासक रहा उसके पुत्र दुर्लभराज ने 1008-1022 ई. तक शासन किया। ।

    भीम देव प्रथम (1022 – 1064 ई.) : महमूद गजनवी का सोमनाथ आक्रमण

    ➣ भीम प्रथम इस वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था। इसके समय में महमूद गजनवी ने सोमनाथ के मन्दिर पर 1025 ई. में आक्रमण किया।

    ➣ भीमदेव प्रथम ने सोमनाथ मन्दिर को जो पहले लकड़ी और फिर ईंटों द्वारा निर्मित था, के स्थान पर पत्थर द्वारा निर्माण कराया।

    ➣ कहा जाता है कि भीम प्रथम ने गजनवी द्वारा विनष्ट सोमनाथ के मन्दिर का पुनर्निर्माण करवाया; परन्तु एक अन्य परम्परा के अनुसार इस मन्दिर का पुनर्निर्माण कुमारपाल ने करवाया।

    ➣ भीम प्रथम ने कलचूरि शासक कर्ण के साथ मिलकर परमार भोज को परास्त किया एवं धारानगरी को लूटा।

    ➣ भीम प्रथम के मंत्री विमलशाह ने विमलशाही (आदिनाथ) के मन्दिर का निर्माण 1031 ई. में देलवाड़ा में करवाया। कीर्तिधर इसका शिल्पकार था।

    ➣ भीम के बाद उसके पुत्र कर्ण ने त्रैलोक्य मल्ल की उपाधि धारण कर शासन किया।

    ➣ भीम प्रथम का पुत्र कर्ण 30 वर्ष शासन किया। वह अपने शासन काल में नाडोल के चौहानमालवा के परमारों से युद्ध में परास्त हुआ था।

    जयसिंह सिद्धराज (1094 – 1153 ई.) : गुजरात का स्वर्णकाल एवं सोमनाथ प्रभाव

    ➣ जयसिंह सिद्धराज महत्वपूर्ण शासक था। कर्ण के पुत्र जयसिंह ने सिद्धराज की उपाधि ग्रहण की।

    ➣ जयसिंह ने 1113-14 ई. में सिंह संवत् प्रारम्भ किया।

    ➣ उसके राज्य की सीमायें पश्चिम में कठियावाड़ तथा गुजरात, पूर्व में भिलसा (मध्य प्रदेश) और दक्षिण में बलि क्षेत्र एवं सांभर तक फैली थी।

    ➣ उसके दरबार में जैन आचार्य हेमचन्द्र रहते थे जिन्होंने कुमारपाल चरित (द्वयाश्रय महाकाव्य) नामक ग्रन्थ लिखा। अष्टादससहस्त्रीत्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित्र की रचना भी हेमचन्द्र ने की। सिद्धहेम व्याकरण ग्रन्थ की रचना हेमचन्द्र ने की थी।

    आबू पर्वत पर उसने एक मंडप का निर्माण करवाया, जहाँ उसने हाथियों पर आरूढ़ अपने सात पूर्वजों की मूर्तियों को प्रतिष्ठापित किया।

    ➣ उसने सिद्धपुर में रूद्रमहाकाल का मंदिर बनवाया। सिद्धराज स्वयं शैव था, लेकिन जैन विद्वान हेमचंद्र का सम्मान करता था।

    ➣ मुस्लिम लेखक औफी के अनुसार जयसिंह सिद्धराज ने खम्भात में एक मस्जिद के जीर्णोद्धार के लिए अपने निजी कोष से एक लाख बलोत्र (स्वर्ण मुद्रा) का अनुदान किया था।

    ➣ जयसिंह सिद्धराज ने सोमनाथ मन्दिर के यात्रियों पर लगने वाले तीर्थयात्रा कर को भी समाप्त कर दिया था।

    ➣ जयसिंह ने चौहान नरेश अर्णोराज को हराया किन्तु बाद में अपनी पुत्री कांचन देवी का विवाह अर्णोराज से किया।

    कुमारपाल (1153 – 1172 ई.) : जैन धर्म संरक्षण एवं प्रशासनिक सुधार

    ➣ जयसिंह का अपना कोई पुत्र नही था। उसका उत्तराधिकारी कुमार पाल हुआ जो एक महत्त्वाकांक्षी शासक था।

    ➣ कुमारपाल ने अपने शासनकाल के आरम्भ में ही अर्णोराज चौहान, विक्रमसिंह परमार तथा मालवा के शासक बल्लार के आक्रमणों को विफल करके अपनी योग्यता को प्रमाणित कर दिया।

    ➣ प्रसिद्ध जैन आचार्य हेमचंद्र ने उसे जैन धर्म में दीक्षित किया था। इससे पहले वह शैव धर्मावलम्बी था। उसके पश्चात् परमअर्हत की उपाधि धारण की और संपूर्ण साम्राज्य में अहिंसा के सिद्धांतों को क्रियान्वित किया।

    ➣ जैन परम्परा के अनुसार कुमारपाल ने अपने सम्पूर्ण साम्राज्य में पशु हत्या, मद्यमान एवं द्यूतक्रीड़ा पर प्रतिबन्ध लगा दिया। कसाइयों को अपना व्यवसाय बन्द करने के लिए उन्हें तीन वर्ष की आय के बराबर धन देकर उसकी क्षतिपूर्ति की गई।

    ➣ कुमारपाल के शासन काल में संन्यासियों को मृगचर्म मिलना बन्द हो गया और शिकारी व्यवसाय विहीन हो गये।

    ➣ कुमार पाल ने 1169 ई. में सोमनाथ मंदिर को अंतिम रूप से पुनर्निर्माण करवाया तथा जैन आचार्य हेमचंद्र के साथ सोमनाथ मंदिर में शिव की अर्चना की।

    कुमारपालचरित (कुमारपालचार) नामक काव्य में जयसिंह सूरी नामक कवि ने उसका यशोगान किया है।

    अजयपाल (1172 – 1176 ई.) : अल्पकालीन शासन

    ➣ कुमारपाल के बाद उसका उत्तराधिकारी भतीजा अजयपाल शासक बना। अजयपाल को जैन परम्पराओं में जैनियों के संत्रासक के रूप में वर्णित किया गया है।

    ➣ उसके शासनकाल में शैव एवं जैन धर्मावलंबियों के मध्य गृहयुद्ध आरंभ हो गया, जिसके कारण अनेक जैन भिक्षुओं को हत्या कर दी गई और अनेक जैन मंदिरों को नष्ट कर दिया गया।

    मूलराज द्वितीय (1176 – 1178 ई.) : मुहम्मद गोरी से संघर्ष एवं विजय

    मूलराज द्वितीय 1176 – 1178 ई. अल्पकालीन शासन। आबू के निकट (काशहद के मैदान) 1178 ई. में मुहम्मद गोरी की सेनाओं से संघर्ष/विजय का उल्लेख मिलता है, लेकिन राजनीतिक अस्थिरता और बाहरी दबाव के कारण सोलंकी शक्ति मजबूत नहीं रह सकी।

    ➣ मूलराज द्वितीय ने आबू के निकट (काशहद का मैदान) 1178 ई. में मुहम्मद गोरी को हराया था। उल्लेखनीय है यह गौरी की भारत में पहली पराजय थी।

    ➣ मूलराज द्वितीय की संरक्षिका उनकी माता नाईकि देवी ने ही वास्तव में मुहम्मद गौरी के विरुद्ध 1178 ई. में आबू के युद्ध में सेना का संचालन किया।

    भीम द्वितीय (1178 – 1238 ई.) : सोलंकी वंश का पतन

    ➣ चालुक्य वंश का अन्तिम महान शासक भीम द्वितीय था। उसने चालुक्य राज्य की शक्ति एवं प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित किया।

    ➣ 1178 ई. में जब मुहम्मद गोरी ने गुजरात पर आक्रमण किया तो भीमदेव द्वितीय ने इस आक्रमण को विफल कर दिया।

    ➣ चालुक्य वंश का अन्तिम महान् शासक भीम द्वितीय (1178 से 1238 ई.) था। 1197 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक ने गुजरात पर आक्रमण कर अन्हिलवाड़ को लूटा।

    ➣ भीम द्वितीय के समय वास्तुपाल एवं तेजपाल ने 1231-32 ई. में देलवाड़ा में लूणवसहि (नेमिनाथ) मन्दिर का निर्माण करवाया। इनका वास्तुकार शोभनदेव था। इस मन्दिर को देवरानी-जेठानी का मन्दिर भी कहा जाता है।

    अन्य सम्बंधित तथ्य

    ➣ चालुक्यों के बाद बघेला शासकों ने गुजरात पर शासन किया। कालांतर में भीमदेव-II के एक मंत्री लवण प्रसाद ने गुजरात में बघेल वंश की स्थापना की।

    वास्तुपालतेजपाल द्वारा निर्मित दिलवाड़ा का नेमिनाथ का जैन मन्दिर (आबू) वास्तव में बघेला शासक वीरधवल के समय बना। बघेला प्रारम्भ में चालुक्यों के सामन्त थे।

    ➣ भीम द्वितीय के समय बघेला सामन्त लवणप्रसाद एवं उसका पुत्र वीरधवल चालुक्य राज्य के वास्तविक शासक बन गए थे।

    उदयसुन्दरीकथा के लेखक सोद्दलप्रबन्ध चिन्तामणि के लेखक मेरूतुंग चालुक्य शासकों के समय थे।

    ➣ चालुक्य शासकों द्वारा तीर्थ यात्रियों से कुट नामक कर लिया जाता था।

    ➣ चालुक्य शासकों ने उमापति वरलब्ध की उपाधि धारण की जिससे यह प्रतीत होता है कि उनका राजधर्म शैव था।

    सन 1195 ई. उसने कुतुबद्दीन को हराकर अजमेर भगा दिया था परन्तु दूसरे वर्ष 1197 ई. में कुतुबद्दीन ऐबक ने गुजरात पर आक्रमण कर अन्हिलवाड़ पर अधिकार कर लिया।

  • परमार वंश मालवा (945-1055 ई.) : राजा भोज

    📚 विषय सूची

    परमार वंश (9वीं – 14वीं शताब्दी) : मालवा की प्रमुख शक्ति

    ➣ परमार वंश का आरंभ नवीं शताब्दी के प्रारंभ में नर्मदा नदी के उत्तर मालवा (प्राचीन अवन्ति) क्षेत्र में उपेंद्र अथवा कृष्णराज द्वारा हुआ था। आरंभ में वे संभवतः राष्ट्रकूटों या पुनःप्रतिहारों के सामंत थे।

    ➣ उपेन्द्र के बाद कई छोटे-छोटे शासक हुए इनमें वैरिसिंह प्रथम, सीयक प्रथम,वाक्पति प्रथम तथा वैरिसिंह द्वितीय के नाम मिलते है जिन्होंने 790-945 ई. तक शासन किया।

    ➣ परमार वंश का प्रथम स्वतंत्र एवं शक्तिशाली शासक सीयक अथवा श्री हर्ष था। परमारों की प्रारंभिक राजधानी उज्जैन थी, जो बाद में धार हो गई।

    ➣ परमारों की शाखाएँ धारा, चन्द्रावती (माउन्ट आबू), वागड़ (बाँसवाड़ा), ज्वालिपुर (जालोर) तथा किरातकूप (किराडु, बाड़मेर) थी। इनमें धारा (उज्जैन) की शाखा सबसे प्रमुख थी।

    शासक शासनकाल परिचय / प्रमुख तथ्य
    हर्ष / सीयक-II 945 – 972 ई. परमार वंश का प्रारंभिक शक्तिशाली शासक, राष्ट्रकूटों से स्वतंत्रता प्राप्त करने का प्रयास किया और मालवा क्षेत्र में शक्ति स्थापित की।
    वाक्पति मुंज 973 – 994 ई. प्रसिद्ध परमार शासक, साहित्य और कला का संरक्षक। चालुक्यों के विरुद्ध युद्ध किया लेकिन अंततः बंदी बना लिए गए और मृत्यु हो गई।
    सिन्धुराज 994 – 1010 ई. राज्य की स्थिरता बनाए रखने का प्रयास किया, चालुक्यों से संघर्ष जारी रखा।
    परमार भोज (राजा भोज) 1010 – 1055 ई. परमार वंश का सबसे प्रसिद्ध और महान शासक, “विक्रमादित्य” की तरह आदर्श राजा माना जाता है। साहित्य, विज्ञान, वास्तुकला और शिक्षा का महान संरक्षक; भोजपुर नगर और भोजशाला से जुड़ा।

    हर्ष / सीयक-II (945 – 972 ई.) : प्रारंभिक परमार विस्तार

    ➣ इस वंश का प्रथम स्वतंत्र व शक्तिशाली शासक सीयक (श्रीहर्ष) था। सीयक ने राष्ट्रकूट नरेश खोटिटंग को हराया एवं राष्ट्रकूटों की अधीनता से मुक्त हुए।

    ➣ परमार वंश का प्रथम अभिलेख सीयक द्वितीय का हरसोल अभिलेख है, जिसमें परमार शासकों की वंशावली है। परमारों की स्वतंत्रता का जन्मदाता सीयक द्वितीय था।

    ➣ परमारों की प्रारंभिक राजधानी उज्जैन थी जो बाद में धारा (मध्य प्रदेश) स्थानांतरित की गई।

    ➣ इसके राजदरबार में यशोरूपावलोक के रचयिता धनिक, नवसाहसांकचरित के लेखक पद्मगुप्त, दशरूपक के लेखक धनंजय आदि रहते थे।

    ➣ सीयक को कोई पुत्र नहीं था। संयोगवश उसे एक दिन मुंज घास में पड़ा एक नवजात शिशु मिला। सीयक उसे उठाकर घर लाया तथा पालन पोषण करके बड़ा किया। मुंज में पड़े होने से ही उसका नाम मुंज रखा गया।

    ➣ उसकी अपनी पत्नी से सिंन्धुराज नामक पुत्र भी उत्पन्न हुआ। किन्तु वह अपने दत्तक पुत्र से पूर्ववत् स्नेह करता रहा। सीयक ने स्वयं उसे अपना उत्तराधिकारी घोषित किया।

    वाक्पति मुंज (973 – 994 ई.) : साहित्य एवं कला संरक्षण

    ➣ सीयक के दो पुत्र (मुंज, सिंधुराज) थे इनमें प्रथम उसका दत्तक पुत्र था। सीयक की मृत्यु के बाद वही गद्दी पर बैठा।

    ➣ इतिहास में वह वाक्पति मुंज तथा उत्पलराज के नाम से भी प्रसिद्ध है। कौथेम दानपात्र से विदित होता है कि वाक्पति मुंज ने हूणों को भी पराजित किया था।

    ➣ उसने कलचुरी शासक युवराज द्वितीय तथा चालुक्य राजा तैलप द्वितीय को युद्व में परास्त किया। मुंज ने कलचूरी शासक युवराज द्वितीय को पराजित कर मार दिया।

    ➣ कालांतर में मुंज राष्ट्रकूट सेनाओं द्वारा पराजित किया गया तथा बन्दी बना लिया गया। चालुक्यराज तैल ने नर्मदा नदी तक परमार राज्य के दक्षिणी भाग पर अधिकार कर लिया।

    ➣ मुंज को तैलप द्वितीय की बहिन मृणालवती से कारागार में प्रेम हो गया। लेकिन मृणालवती ने मुंज को धोखा दे दिया। कारागार में ही परमार नेरश मुंज का वध करवा दिया गया।

    कौथेम दानपत्र से विदित होता है कि वाक्पति मुंज ने हूणों को भी पराजित किया था।

    ➣ मुंज एक प्रतिभावान कवि व विद्वानों का संरक्षक था। उसके दरबार में नवसाहसांक चरित के लेखक पद्यगुप्त, दशरूपक के लेखक धनंजय’, दशोरूपावलोक तथा काल निर्णय के लेखक धनिक तथा शोभन, हलायुध एवं अमितगति आदि विद्वान रहते थे।

    ➣ अमितगति ने सुभाषित रत्न संदोह नामक ग्रन्थ लिखा। हलायुध ने पिंगलछन्द शास्त्र पर मृत संजीवनी नामक टीका तथा अभिधान रत्नमाला नामक ग्रन्थ की रचना की।

    ➣ मुंज की राजसभा में महासेन नामक विद्वान ने प्रद्युम्नचरित नामक ग्रन्थ लिखा।

    ➣ वाक्पति मुंज ने धार में अपने नाम से मुज सागर नामक तालाब का निर्माण कराया था।

    ➣ मुंज ने पृथ्वी वल्लभ, श्री वल्लभ और अमोघवर्ष जैसी राष्ट्रकूट शासकों की उपाधियां धारण की।

    ➣ वाक्पति मुंज के बाद उसका छोटा भाई सिंधु परमार वंश का शासक हुआ।

    सिन्धुराज (994 – 1010 ई.) : साम्राज्य सुदृढ़ीकरण

    ➣ मुंज के कोई पुत्र नहीं थे अतः उसकी मृत्यु के बाद उसका छोटा भाई सिंधुराज शासक बना। नवसाहसांक चरित में इसी की जीवनी है। उसने कुमार नारायण, साहसांक आदि उपाधियां धारण की।

    ➣ उसका समकालीन कल्याणी का चालुक्य नरेश सत्याश्रय (997-1008ई.) था। सिन्धुराज ने चालुक्य नरेश सत्याश्रय को पराजित कर अपने भाई की हत्या का बदला लिया।

    ➣ अनुग्रहीत नाग शासक ने सिंधुराज के साथ अपनी कन्या शशिप्रभा का विवाह कर दिया।

    ➣ गुजरात के चालुक्य शासक मूलराज प्रथम के पुत्र चामुण्डराज के द्वारा सिंधुराज पराजित हुआ।

    राजा भोज (1010 – 1055 ई.) : परमार वंश का स्वर्णकाल

    ➣ भोज परमार मालवा के परमार अथवा पवार वंश का 9वाँ राजा था। वह सिंधुराज का पुत्र था। उसने नवसाहसाक अर्थात् नव विक्रमादित्य की पदवी धारण की थी।

    ➣ भोज ने उज्जैन के स्थान पर धारा को अपनी राजधानी बनायी।

    ➣ भोज मालवा के परमार वंश का यशस्वी राजा था। उदयपुर प्रशस्ति के अनुसार, उसने तुरूष्कों (तुर्कों) को पराजित किया। उसने 1008 ई. में महमूद गजनवी के विरुद्ध शासक आनंदपाल को सैनिक सहायता दी थी।

    कुलचंद्र, साढ़ तथा तरादित्य इसके सेनापति थे, जिनकी सहायता से भोज ने राज्य संचालन सुचारु रूप से किया।

    ➣ वाक्पति मुंज की ही भाँति भोज भी पश्चिमी भारत में एक साम्राज्य स्थापित करना चाहा। उसने अपने सेनापति कुलचंद्र को गुजरात के विरुद्ध युद्ध करने के लिए भेजा।

    ➣ इस समय वहां भीम का शासनकाल था। कुलचंद्र ने पूरे प्रदेश पर विजय प्राप्त की तथा उसकी राजधानी अनहिलपट्टण (अन्हिलवाड़) को लूटा (मेरुतुंग के प्रबन्धचिन्तामणि के अनुसार)।

    ➣ भोज परमार ने राजस्थान में शाकंभरी के चाहमनों (चौहान) के विरुद्ध भी युद्ध की घोषणा की और तत्कालीन राजा चाहमान वीर्यराम को हराया।

    ➣ भोज, चालुक्यों से बदला लेन के लिए दक्षिण की ओर बढ़ा। उसने दाहल के कलचुरी गांगेयदेव तथा तंजौर के राजेंद्र चोल से संधि की ओर चालुक्य जयसिंह द्वितीय पर भी आक्रमण कर दिया,

    ➣ परंतु तत्कालीन राजा चालुक्य जयसिंह द्वितीय ने बहादुरी से सामना किया और अपना राज्य बचा लिया।

    सन 1044 ई. में जयसिंह के पुत्र सोमेश्वर द्वितीय ने परमारों से फिर शत्रुता कर ली और मालव राज्य पर आक्रमण कर भोज को भागने के लिये बाध्य कर दिया।

    धारानगरी पर अधिकार कर लेने के बाद उसने आग लगा दी, परंतु कुछ ही दिनों बाद सोमेश्वर ने मालव छोड़ दिया और भोज ने राजधानी में लोटकर फिर सत्ताधिकार प्राप्त कर लिया।

    चालुक्य राज चामुण्डराय के पुत्र एवं उत्तराधिकारी बल्लभराज ने भोज पर आक्रमण कर दिया, किन्तु रास्ते में ही चेचक से उसकी मृत्यु हो गई।

    ➣ इसके बाद वल्लभराज के छोटे भाई दुर्लभराज ने सत्ता की बागडोर अपन हाथों में ली। कुछ समय बाद भोज ने उसे भी युद्ध में हराया।

    ➣ अपने शासन काल के अंतिम वर्षों में भोज परमार को गुजरात के चालुक्य राजा तथा चन्देल शासक विद्याधर की संयुक्त सेनाओं ने लगभग 1060 ई. में भोज परमार को पराजित कर दिया।

    ➣ भोज के अन्तिम समय में कलचुरि नरेश लक्ष्मीकर्ण और गुजरात के नरेश भीम प्रथम ने एक संघ बनाकर उसे पराजित किया व उसकी राजधानी धारा नगरी को लूटा। भोज की इसी अभियान के समय मृत्यु हो गई।

    ➣ भोज परमार की मृत्यु पर यह कहावत प्रचलित हो गई, जिसका उल्लेख धनपाल की तिलकमंजरी में है। उसकी मृत्यु पर यह कहावत प्रचलित हो गई है कि अद्य धारा निराधार निरालम्बा सरस्वती (विद्या और विद्वान दोनों निराश्रित हो गये ) ।

    कविराज भोज

    ➣ भोज अपनी विद्वता के कारण कविराज की उपाधि से विख्यात था। परमार भोज को मध्ययुग का विक्रमादित्य कहा जाता है।

    ➣ कहा जाता है कि उसने विविध विषयों-चिकित्साशास्त्र,खगोलशास्त्र, धर्म, व्याकरण, स्थापत्यशास्त्र आदि पर बीस से अधिक ग्रंथों की रचना की।

    ➣ उसने विविध विषयों पर अनेक ग्रन्थ लिखे जिनमें व्यवहारमंजरी, शृंगार प्रकाश, शृंगार मंजरी, चंपुरामायण, अवनिकुमार, कोदण्ड काव्य, तत्व प्रकाश, “आयुर्वेद सर्वस्व”, स्थापत्य शास्त्र पर समरांगण सूत्र धार आदि प्रमुख हैं।

    ➣ इसके अतिरिक्त भोज की अन्य प्रसिद्ध पुस्तकें सरस्वती कंठाभरण, विद्याविनोद, राजमार्तण्ड, युक्ति कल्प तरू, सिद्धान्त संग्रह, योग सूत्र वृत्ति, चारूचर्चा, आदित्य प्रताप सिद्धान्त, राजमृगांक, व्यवहार समुच्चय, शब्दानुशासन, नाममालिका है। युक्ति कल्प तरू में विविध प्रकार की नावों के निर्माण की चर्चा है।

    ➣ परमार शासक भोज ने समरांगणसूत्रधार में विभिन्न प्रकार के काल्पनिक वैज्ञानिक उपकरणों का उल्लेख किया है।

    ➣ भोज द्वारा लिखित ग्रंथों में चिकित्सा शास्त्र पर आयुर्वेदसर्वस्व तथा स्थापत्य शास्त्र पर समरांगणसूत्रधार विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

    ➣ भोज ने शैव धर्म से संबंधित पुस्तक तत्व परीक्षा लिखी। भोज के दरबारी कवि उवट ने मंत्र भाष्य लिखा तथा वैदिक साहित्य पर टीका लिखी।

    आइने अकबरी के अनुसार उसकी राजसभा में 500 विद्वान थे। इनमें भास्कर भट्ट, दामोदर मिश्रधनपाल प्रमुख थे। जैन लेखक धनपाल ने तिलक मंजरी तथा पाइयलच्छीमाला की रचना की।

    ➣ तिलक मंजरी धनपाल की पुत्री का भी नाम था। मूल ग्रन्थ जल कर नष्ट होने पर तिलक मंजरी ने इसे अपने पिता से स्मृति के आधार पर पुनः लिखवाया। अतः इसका नाम तिलक मंजरी रखा गया।

    ➣ 11वीं शताब्दी में धारा मध्यभारत में संस्कृत शिक्षा का सबसे बड़ा केन्द्र था। भोज ने धारा में भोजशाला नामक संस्कृत महाविद्यालय (सरस्वती कण्ठाभरण) की स्थापना कर उसमें वाग्देवी (सरस्वती) की प्रतिमा स्थापित की। वाग्देवी की प्रतिमा जो ज्ञानपीठ पुरस्कार का प्रतीक चिन्ह है, वह भोज द्वारा स्थापित वाग्देवी की प्रतिमा से ली गई है।

    ➣ भोज की सभा का नाम भुवन विजय था। भोज ने चित्तौड़ में त्रिभुवननारायण मन्दिर (शिव मन्दिर) बनवाया।

    ➣ भोज ने अपने नाम पर भोजपुर नगर बसाया तथा एक बड़े भोजसर नामक तालाब को निर्मित करवाया, जिसका क्षेत्रफल 250 वर्ग मील से भी अधिक विस्तृत था।

    अन्य

    ➣ परमार शासक नरवर्मन (1093-1133 ई.) ने निर्वाण नारायण की उपाधि धारण की।

    ➣ अन्ततः 1305 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने महलक देव परमार को परास्त कर मालवा पर अधिकार कर लिया।

  • कलचुरी वंश त्रिपुरी (9वीं शताब्दी) : गांगेयदेव

    📚 विषय सूची

    कलचुरि वंश (9वीं – 11वीं शताब्दी) : मध्य भारत की शक्ति

    ➣ कलचुरी वंश की स्थापना कोकल्ल प्रथम ने लगभग 845 ई. में की थी। उसने त्रिपुरी को अपनी राजधानी बनाया था। कलचुरि वंश को चेदि या हैहय वंश के नाम से भी पुकारा जाता है।

    ➣ कलचुरी सम्भवतः चन्द्रवंशी क्षत्रिय थे। कलचुरि अपने को कीर्तिवीर्य अर्जुन का वशंज मानते हैं। कलचुरि नरेश शैव धर्म के अनुयायी थे।

    ➣ कोकल्ल ने प्रतिहार शासक भोज एवं उसके सामन्तों को युद्ध में हराया था। उसने तुरुष्क, वंग एवं कोंकण पर भी अधिकार कर लिया था।

    विलहारी लेख में कोकल्ल के विषय में कहा गया है कि समस्त पृथ्वी को विजित कर उसने दक्षिण में कृष्णराज एवं उत्तर में भोज को अपने दो कीर्ति स्तम्भ के रूप में स्थापित किया।”

    ➣ कोकल्ल के 18 पुत्रों में से उसका बड़ा पुत्र शंकरगण अगला कलचुरी शासक बना था।

    शासक शासनकाल परिचय / प्रमुख तथ्य
    शंकरगण 878 – 888 ई. कलचुरि वंश का प्रारंभिक शक्तिशाली शासक, मध्य भारत क्षेत्र में सत्ता मजबूत करने का प्रयास किया।
    युवराज प्रथम 915 – 945 ई. साम्राज्य के विस्तार और प्रशासनिक स्थिरता का काल, कलचुरि शक्ति को मजबूत किया।
    लक्ष्मणराज 945 ई. अल्पकालीन शासक, सीमित समय के कारण प्रभाव कम रहा लेकिन सत्ता निरंतरता बनी रही।
    गांगेयदेव विक्रमादित्य 1019 – 1041 ई. सबसे शक्तिशाली कलचुरि शासकों में से एक, उत्तरी भारत में प्रभाव बढ़ाया और “विक्रमादित्य” उपाधि धारण की।
    लक्ष्मीकर्ण 1040 – 1070 ई. महान विस्तारवादी शासक, कलचुरि वंश का स्वर्णकाल। चेदि, काशी और आसपास के क्षेत्रों में शक्ति स्थापित की।

    शंकरगण (878 – 888 ई.) : प्रारंभिक कलचुरि विस्तार

    ➣ शंकरगण ने दक्षिणी कोशल के शासक को पराजित कर उसने पाली पर अधिकार कर लिया था ।

    ➣ उसकी मृत्यु के बाद इसके दो पुत्रों- बालहर्ष एवं चुवराज प्रथम। बालहर्ष का शासन अल्पकालीन रहा। उसके बाद युवराज प्रथम केयूर वर्ष की उपाधि धारण कर सिंहासन पर बैठा।

    युवराज प्रथम (915 – 945 ई.) : साम्राज्य सुदृढ़ीकरण

    ➣ दसवीं शताब्दी के मध्य युवराज प्रथम महत्त्वपूर्ण राजा हुआ। उसने गौड़ एवं कलिंग को युद्ध में परास्त कर दिया। उसने लाट प्रदेश की भी विजय की।

    ➣ इसके शासनकाल में राजशेखर कन्नौज छोड़कर त्रिपुरी आ गया। युवराज प्रथम के राजदरबार में रहते हुए ही राजशेखर में अपने दो ग्रंथों- काव्यमीमांसा एवं विद्धसालभंजिका की रचना की।

    ➣ भेड़ाघाट (जबलपुर) का प्रसिद्ध चौसठ योगिनी मन्दिर का निर्माण युवराज प्रथम ने कराया था। इसे गोलकीमठ भी कहते है।

    ➣ राजशेखर कृत सिद्धसालभंजिका में युवराज को उज्जयिनी भुजंग कहा गया है।

    ➣ युवराज प्रथम के बाद क्रमशः लक्ष्मण राज, शंकरगण तृतीय, युवराज द्वितीय और कोक्कल द्वितीय (990- 1019 ई.) ने शासन किया।

    लक्ष्मणराज (945 ई.) : अल्पकालीन शासन

    ➣ युवराज प्रथम का पुत्र .एवं उत्तराधिकारी लक्ष्मणराज विस्तावादी प्रवृत्ति का शासक था। उसने पूर्व में उड़ीसा, बंगाल एवं कोशल को जीता।

    ➣ उड़ीसा अभियान में लक्ष्मणराज ने वहां के शासक से सोने एवं मणियों से निर्मित कलिया नाग को छीन लिया था। अपने विजय अभियान के अन्तर्गत ही लक्ष्मणराज ने सोमनाथ पत्तन को जीता।

    ➣ वह शैव मतावलम्बी था। लक्ष्मणराज के दो पुत्र शंकरगण द्वितीय एवं युवराज द्वितीय निर्बल शासक थे।

    ➣ युवराज द्वितीय के पुत्र कोकल्ल द्वितीय (990- 1019 ई.) ने कलचुरी वंश के सिंहासन पर बैठ के सिंहासन पर बैठ कर कलचुरियों की खोई प्रतिष्ठा को पुनः क़ायम किया।

    ➣ उसने चामुण्डाराज नामक चालुक्य राजा को पराजित किया था। चालुक्यों के अतिरिक्त गौड़ एवं कुन्तल के अभियानों में भी सफलता प्राप्त हुई।

    गांगेयदेव विक्रमादित्य (1019 – 1041 ई.) : कलचुरि शक्ति का उत्कर्ष

    ➣ वह कलचुरी वंश के कोकल्ल द्वितीय का पुत्र था। अपने पूर्वजों के समान ही गांगेयदेव भी शैवमतानुयायी था।

    ➣ गांगेयदेव एक योग्य, साहसी और महत्वाकांक्षी शासक के रूप में जाना जाता था। उसने विक्रमादित्य की उपाधि धारण करते हुए उत्तर भारत में सर्वशक्तिमान सार्वभौम सम्राट की भाँति स्थिति प्राप्त करने की पूरी कोशिश की।

    ➣ गांगेयदेव ने भोज परमार एवं राजेन्द्र चोल के साथ एक संघ बनाकर चालुक्य नरेश जयसिंह पर आक्रमण किया, पर सफलता उसके हाथ नहीं लगी।

    ➣ बाद के समय में उसने अंग, उत्कल, काशी एवं प्रयाग को जीत कर कलचुरी राज्य का विस्तार किया।

    ➣ 1019 ई. में गांगेयदेव ने सुदूर तिरहुत (आधुनिक उत्तरी बिहार) तक अपनी प्रभुसत्ता स्थापित की। उसने पश्चिमोत्तर के विदेशी हमलावरों और बंगाल के पाल राजाओं से प्रयाग और वाराणसी नगरों की रक्षा की थी।

    ➣ पूर्व मध्यकाल में स्वर्ण सिक्कों के अप्रचलित हो जाने के बाद गांगेय देव कलचुरि ने उन्हें उत्तर भारत में प्रारम्भ करवाया। गांगेय देव के सिक्कों पर बैठी हुई लक्ष्मी का चिह्न अंकित है।

    लक्ष्मीकर्ण (1040 – 1070 ई.) : चंदेल एवं पाल संघर्ष

    ➣ वह गांगेय देव का पुत्र था और उसके बाद सिंहसानारूढ़ हुआ। उसने चालुक्य नरेश भीम के साथ मिलकर मालवा के परमार वंश के शासक भोज को परास्त किया।

    ➣ कलिंग विजय के उपरान्त कर्णदेव ने त्रिकलिंगाधिपति की उपाधि धारण की थी। उसका विवाह हूण राजकुमारी आंवलदेवी से हुआ, इससे यशकर्ण पुत्र हुआ।

    चन्देल नरेश कीर्तिवर्मन से पराजित होने पर उसकी शक्ति कमज़ोर हो गई और यही से कलचुरी साम्राज्य लड़खड़ाने लगा, जिसका अन्त चन्देल शासक त्रैलोक्य वर्मन ने विजयसिंह को परास्त करके त्रिपुरी को अपने राज्य में मिलाकर कर दिया।

    दीपंकर अतिशा ने विग्रपाल तृतीय (1055-1070 ई.) एवं कलचुरी कर्ण के बीच कपाल सन्धि करवाई थी। विग्रहपाल तृतीय ने कर्ण की पुत्री यौवनाश्री से विवाह किया।

    ➣ कर्णदेव एवं विजयसिंह के मध्य कुछ अन्य कलचुरी शासक यश:कर्ण, गयकर्ण, नरसिंह, जयसिंह आदि हुए। इस वंश का अन्तिम शासक विजय सिंह था।

  • गांधार का हिंदूशाही वंश (9वीं शताब्दी) : जयपाल

    📚 विषय सूची

    हिन्दूशाही वंश : उत्तर-पश्चिम भारत की रक्षा शक्ति

    9वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में हिंदूशाही वंश की स्थापना तुर्की शाही वंश के शासक लगर्तमान को उसके ब्राह्मण मंत्री कल्लर ने गद्दी से हटाकर कर काबुल घाटीगंधार प्रदेश में स्थापित की थी।

    कल्लर के विषय में कल्हण की राजतरंगिणी से जानकारी मिलती है।

    ➣ उत्तरी पश्चिमी भाग में हिन्दू शाही वंश, भारत का पहला महत्त्वपूर्ण हिन्दू राज्य था। जिसके कमजोर होने के पश्चात विदेशी अक्रमंकारियों के लिए रास्ता खुल गया। इसकी राजधानी उद्भांडपुर थी।

    ➣ हालाँकि इससे पहले 712 ई. में अरबी मुस्लिम मुहम्मद बिन कासिम के नेतृत्व में हुआ था किन्तु यह अस्थायी था। यह भारत में पाँव नहीं जमा पाया। इस समय प्रतिहार और सिसोदिया वंश के शासको जिनमे क्रमश: नागभट्ट और बप्पा रावल का नाम प्रमुख, ने इन अक्रान्तों को आगे नहीं बढ़ने दिया।

    उत्तर भारत में सिंध पहला राज्य था जो मुस्लिम आक्रमणों का शिकार हुआ। उस समय वहां राजा दाहिर का शासन था।

    ✨ विशेष:
    ❑ जबकि दक्षिण भारत में देवगिरी के यादव वंश मुस्लिम आक्रमण का पहला शिकार हुआ था।
    ❑ यह आक्रमण अल्लाउद्दीन खिलजी के शासनकाल के समय उसके सेनापति मालिक काफूर के नेतृत्व हुआ था। इस समय वहां का शासक रामचंद्र था।

    ➣ जयपाल के पुत्र आनन्दपाल और उसके वंशज त्रिलोचनपाल तथा भीमपाल ने कई बार महमूद ग़ज़नवी से युद्ध किया। अलबेरूनी के अनुसार हिन्दूशाही राजाओं में कुछ तुर्क और कुछ हिन्दू थे।

    ➣ हिन्दू राजाओं को काबुलशाह या महाराज धर्मपति कहा जाता था। इन राजाओं में कल्लार, सामन्तदेव, भीम, अष्टपाल, जयपाल, आनन्दपाल, त्रिलोचनपाल, भीमपाल आदि उल्लेखनीय हैं।

    शासक परिचय / प्रमुख तथ्य
    जयपाल हिंदू शाही वंश का प्रमुख शासक, उत्तर-पश्चिम भारत (काबुल–पेशावर क्षेत्र) में शासन किया। महमूद गजनवी के विरुद्ध संघर्ष किया लेकिन पराजित हुआ, जिससे शाही शक्ति कमजोर हुई।
    आनन्दपाल जयपाल का उत्तराधिकारी, गजनवी आक्रमणों के खिलाफ कई युद्ध लड़े। हिंदू शाही वंश को बचाने का प्रयास किया लेकिन लगातार हार के कारण शक्ति घटती गई।
    त्रिलोचनपाल हिंदू शाही वंश का कमजोर शासक, गजनवी के बढ़ते प्रभाव के कारण राज्य लगातार सिकुड़ता गया। संघर्ष जारी रखा लेकिन निर्णायक सफलता नहीं मिली।
    भीमपाल शाही वंश के अंतिम शासकों में से एक, शासनकाल में राज्य लगभग समाप्ति की ओर था। मुस्लिम आक्रमणों के बाद शाही सत्ता का पूर्ण पतन हो गया।

    जयपाल : महमूद गजनवी से प्रारंभिक संघर्ष

    ➣ जयपाल इस वंश का योग्य एवं पराक्रमी शासक था। उसके राज्य की सीमायें, सरहिन्द, लमगान, कश्मीर एवं मुल्तान तक फैली थीं।

    ➣ उसके समय में ग़ज़नी की गद्दी पर उसका समकालीन अमीर सुबुक्तगीन (977-997) सिंहासनासीन था। उसने जयपाल के विरुद्ध आक्रमण किया।

    ➣ युद्ध के लिए जयपाल भी सेना लेकर ग़ज़नी और लगमान के बीच गुजुक नामक स्थान तक बढ़ गया। परन्तु अचानक एक बर्फीला तूफान आ गया और जयपाल को बड़ा भारी नुकसान उठाना पड़ा।

    ➣ उसे सुबुक्तगीन के साथ एक अपमानजनक संधि कर लेनी पड़ी। परंतु उसने शीघ्र ही इस संधि की शर्तों की तोड़ दिया और सुबुक्तगीन के साथ फिर से लड़ाई छिड़ गई।

    ➣ सुबुक्तगीन की 997 में मृत्यु हो गई। उसके बाद उसके उत्तराधिकारी सुल्तान महमूद ग़ज़नवी ने फिर से युद्ध शुरू कर दिया और 1001 ई. में पेशावर के निकट जयपाल को बुरी तरह परास्त किया।

    ➣ तुर्क आक्रमणकारी महमूद ग़ज़नवी से हारने के उपरान्त जयपाल ने 1001 ई. में अग्नि में कूद कर आत्महत्या कर ली।

    ➣ जयपाल एकमात्र हिन्दू राजा था, जिसने उत्तर-पश्चिम से भारत पर आक्रमण करने वाले मुस्लिमों के ख़िलाफ़ आक्रामक नीति अपनायी और अपनी आहूति देकर आत्महत्या का अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया।

    आनन्दपाल : हिंदूशाही प्रतिरोध का नेतृत्व

    ➣ वह राजा जयपाल का पुत्र और उत्तराधिकारी था। जयपाल के बाद उसके पुत्र आनन्दपाल को भी महमूद ग़ज़नवी ने परास्त किया।

    ➣ सुल्तान महमूद ग़ज़नवी ने 1006 ई. में अब मुल्तान पर क़ब्ज़ा कर लिया और 1008 ई. में आनन्दपाल के राज्य पर फिर से हमला किया।

    ➣ आनन्दपाल ने उज्जैन, ग्वालियर, कन्नौज, दिल्ली और अजमेर के हिन्दू राजाओं का संघ बनाकर सुल्तान की सेना का पेशावर के मैदान में सामना किया।

    ➣ दुर्भाग्यवंश युद्ध गजनवी के पक्ष में रहा। इस युद्ध में आनन्दपाल का पुत्र युवराज ब्राह्मणपाल भी मारा गया। सुल्तान की सेना ने कांगड़ा तथा भीमनगर के क़िलों में घूस गई।

    ➣ कालांतर में आनन्दपाल ने नमक की पहाड़ियों से मुसलमानों का लगातार प्रतिरोध किया लेकिन कुछ वर्ष बाद ही उसकी मृत्यु हो गई।

    त्रिलोचनपाल : साम्राज्य का पतन काल

    ➣ वह आनन्दपाल का पुत्र था और राज्य का उत्तराधिकारी बना था। महमूद ग़ज़नवी के साथ रामगंगा के युद्ध में त्रिलोचनपाल को पराजय का सामना करना पड़ा।

    ➣ अपने 10वें आक्रमण में महमूद ने लाहौर पर आक्रमण किया और त्रिलोचनपाल को खदेड़ दिया। युद्ध में पराजय के बाद 1021-1022 ई. में त्रिलोचनपाल की मृत्यु हो गई।

    भीमपाल : हिन्दूशाही वंश का अंतिम शासक

    ➣ यह हिन्दू शाही राजवंश का अंतिम हिन्दू राजा था। त्रिलोचनपाल की मृत्यु के बाद उसका पुत्र भीमपाल कश्मीर विस्थापित हो गया।

    ➣ इस वंश के शासक भीम ने अपनी पुत्री की शादी लोहर वंश (कश्मीर का राजवंश) के शासक सिंह राम से किया जिनके कालांतर में दिद्दर नाम की पुत्री उत्पन्न हुई। इसका विवाह क्षेमेंद्र गुप्त से किया गया था।

    ➣ इस प्रकार जयपाल, आनन्दपाल, त्रिलोचनपाल एवं भीमपाल ने लगभग 50 वर्षों तक महमूद ग़ज़नवी से संघर्ष किया।

    ➣ इस समय तक तुर्कियों ने पंजाब पर अधिकार अधिकार कर लिया था। आगे चलकर पंजाब से गजनवी के उत्तराधिकारियों को अफगान सेनानायक गौरी द्वारा खदेड़ा जाता है।

  • चन्देल वंश बुन्देलखंड (831-1203 ई.) : विद्याधर

    📚 विषय सूची

    चंदेल वंश (9वीं – 13वीं शताब्दी) : खजुराहो मंदिरों का निर्माण

    ➣ चन्देल वंश गोंड जनजातीय मूल का राजपूत वंश था, जिसने 8वीं से 12वीं शताब्दी तक स्वतंत्र रूप से राज किया। चन्देल प्रतिहारों के सामंत थे। प्रतिहारों के पतन के साथ ही चंदेल नौवीं शताब्दी में सत्ता में आए।

    ➣ उनका साम्राज्य उत्तर में यमुना नदी से लेकर सागर (मध्य प्रदेश, मध्य भारत) तक और धसान नदी से विंध्य पहाड़ियों तक फैला हुआ था। सुप्रसिद्ध कालिंजर का क़िला, खजुराहो, महोबा और अजयगढ़ उनके प्रमुख किले थे।

    चंदेल राजा नंद या गंड ने लाहौर में तुर्कों के विरुद्ध अभियान में एक अन्य राजपूत सरदार जयपाल की मदद की, लेकिन ग़ज़ना (ग़ज़नी) के महमूद ने उन्हें पराजित कर दिया था।

    1023 ई. में चंदेलों का स्थान बुंदेलों ने ले लिया। खजुराहो के मंदिर निर्माण के लिए ही चंदेल संभवत: सबसे अधिक विख्यात हैं। खजुराहो उनकी राजधानी थी।

    जयसिंह अथवा जेजा या जयशक्ति के नाम पर यह प्रदेश जेजाकभुक्ति कहलाया। बुन्देलखंड का प्राचीन नाम जेजाकभुक्ति था। च चंदेल पूर्व मध्यकाल में हिन्दी की देवनागरी लिपि का अपने अभिलेखों में प्रयोग करने वाले प्रथम शासक थे।

    ➣ इस वंश के अंतिम शासक परमार्दिदेव अथवा परमल का पृथ्वी राज चौहान से युद्ध हुआ था जिसमे वह परास्त हुआ।

    शासक शासनकाल परिचय / प्रमुख तथ्य
    नन्नुक 831 – 845 ई. चन्देल वंश के संस्थापक, बुंदेलखंड (जेजाकभुक्ति) क्षेत्र में प्रारंभिक सत्ता स्थापित की। प्रतिहारों के अधीन रहते हुए स्थानीय शक्ति का उदय किया।
    वाक्पति 845 – 870 ई. चन्देल शक्ति का विस्तार प्रारंभ, छोटे-छोटे क्षेत्रों पर नियंत्रण बढ़ाया और वंश को स्थिरता दी।
    जयशक्ति और विजयशक्ति 870 – 900 ई. संयुक्त शासन, चन्देल राज्य को मजबूत किया और क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाया। प्रारंभिक प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित की।
    राहिल 900 ई. कम जानकारी उपलब्ध, संक्रमण काल का शासक, वंश की स्थिरता बनाए रखने का प्रयास।
    हर्ष चन्देल 900 – 925 ई. राजनीतिक स्थिरता लाने का प्रयास, चन्देल शक्ति को पुनर्गठित किया।
    यशोवर्मन 925 – 950 ई. महत्वपूर्ण शासक, चन्देल वंश को पहचान दिलाई। खजुराहो मंदिरों की नींव रखी और सांस्कृतिक विकास को बढ़ावा दिया।
    धंगदेव 950 – 1003 ई. चन्देल वंश का स्वर्णकालीन शासक, स्वतंत्रता स्थापित की और खजुराहो मंदिरों का उत्कर्ष हुआ। कला, स्थापत्य और संस्कृति का विकास चरम पर पहुँचा।
    गंडदेव 1003 – 1017 ई. साम्राज्य को बनाए रखने का प्रयास, लेकिन राजनीतिक दबाव और बाहरी आक्रमणों का प्रभाव बढ़ा।
    विद्याधर 1017 – 1029 ई. सबसे शक्तिशाली चन्देल शासकों में से एक, महमूद गजनवी के आक्रमणों का सफल प्रतिरोध किया।
    विजयपाल 1030 – 1045 ई. साम्राज्य को स्थिर रखने का प्रयास, लेकिन केंद्रीय शक्ति कमजोर होने लगी।
    देववर्मन 1050 – 1060 ई. कमजोर शासन, आंतरिक संघर्ष और क्षेत्रीय शक्तियों का प्रभाव बढ़ा।
    कीरतवर्मन (कीर्तिवर्मन) 1060 – 1100 ई. चन्देल शक्ति को पुनर्जीवित करने का आंशिक प्रयास, कुछ क्षेत्रों में नियंत्रण पुनः स्थापित किया।
    सल्लक्षणवर्मन 1100 – 1115 ई. पतन काल की शुरुआत, राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी और साम्राज्य कमजोर हुआ।
    जयवर्मन 1115 ई. अल्पकालीन शासन, प्रभाव लगभग नगण्य।
    पृथ्वीवर्मन 1120 – 1129 ई. साम्राज्य की शक्ति बहुत कमजोर हो चुकी थी, सीमित क्षेत्रीय नियंत्रण।
    मदनवर्मन 1129 – 1162 ई. चन्देल वंश का अंतिम शक्तिशाली शासक, कुछ समय के लिए स्थिरता और शक्ति पुनः स्थापित की।
    यशोवर्मन द्वितीय 1165 – 1166 ई. नाममात्र का शासक, वास्तविक सत्ता समाप्त हो चुकी थी।
    परमार्दिदेव (परमल) 1166 – 1203 ई. चन्देल वंश का अंतिम शासक, कुतुबुद्दीन ऐबक के आक्रमणों के बाद वंश का पतन हो गया।

    नन्नुक (831 – 900 ई.) : चंदेल वंश की स्थापना

    ➣ चन्देल वंश की स्थापना 831 ई. के लगभग नन्नुक नामक व्यक्ति ने की थी। उसकी उपाधि नृप तथा महीपति की मिलती है।

    ➣ वह स्वतंत्र शासक न होकर कोई सामन्त सरदार रहा होगा। इस समय की सार्वभौम सत्ता प्रतिहारों की थी।

    ➣ नन्नुक के बाद क्रमश: वाक्पति, जयशक्ति, विजयशक्तिराहिल के नाम मिलते है।

    हर्ष (900 – 925 ई.) : प्रारंभिक विस्तार

    राहिल का पुत्र तथा उत्तराधिकारी हर्ष एक शक्तिशाली शासक था। खजुराहों लेख में उसे परमभट्टारक कहा गया है जो उसकी स्वतंत्र स्थिति का द्योतक है।

    ➣ हर्ष ने अपने समकालीन दो राजवंशों (चौहान, कलचुरि) के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली।

    ➣ उसने अपने वंश की कन्या नट्टादेवी का विवाह कलचुरि नरेश कोक्कल के साथ तथा स्वयं अपना विवाह चाहमान वंश की कन्या कंचुका के साथ किया था।

    यशोवर्मन (925 – 950 ई.) : राज्य सुदृढ़ीकरण

    ➣ यशोवर्मन (लक्ष्मणवर्मन) इस वंश का प्रथम शक्तिशाली शासक था। यशोवर्मन एक साम्राज्यवादी शासक था। यशोवर्मन के शासन काल चन्देलों की शक्ति अपने चरमोत्कर्ष पर थी।

    ➣ यशोवर्मन ने सर्वप्रथम प्रतिहारों के अधीन कन्नौज पर आक्रमण किया, तत्पश्चात् राष्ट्रकूटों से कालिंजर दुर्ग जीता। उसने मालवा, चेदि और मद्यकोशल पर आक्रमण करके अपने राज्य का पर्याप्त विस्तार किया।

    ➣ यशोवर्मन ने प्रतिहार राजा देवपाल को पराजित किया एंव प्रतिहारों से कालिंजर छीन लिया। कालिंजर को जीतने के बाद यशोवर्मन के राज्य की सीमा गंगा एवं यमुना तक विस्तृत हो गई थी।

    खजुराहो में प्राप्त एक लेख के वर्णन के आधार पर यशोवर्मन को गौड़, खस, कोशल, मालवा, चेदि, कुरु, गुर्जर आदि का विजेता माना जाता है।

    ➣ यशोवर्मन ने खजुराहो में एक विशाल विष्णु मन्दिर, जो कि कन्दारिया महादेव मन्दिर के नाम से प्रसिद्ध है, का निर्माण करवाया। इस मन्दिर को चतुर्भुज मंदिर भी कहा जाता है तथा मंदिर में वैकुण्ठ की मूर्ति यशोवर्मन ने स्थापित करायी थी।

    ➣ यशोवर्मन सम्भवत: 950 ई. में मृत्यु हो गई। धंगदेव उसका उत्तराधिकारी बना।

    ➣ धंग ने ब्राह्मणों को भूमि दान में दिया तथा उन्हें उच्च प्रशासनिक पदों पर नियुक्त किया। धंग ने तुलापुरूष दान किया था।

    धंग देव (950 – 1002 ई.) : खजुराहो मंदिरों का उत्कर्ष

    यशोधर्मन का पुत्र धंग देव इस वंश का प्रसिद्ध शासक था। जिसका वर्णन खजुराहो एवं नन्योरा अभिलेख करता है। इसने ही प्रतिहारों से पूर्ण स्वतंत्रता की घोषणा की।

    ➣ धंग की ग्वालियर विजय के पश्चात् ही चन्देल प्रतिहारों की अधीनता से मुक्त हुए इसलिए धंग को चन्देलों की स्वाधीनता का वास्तविक जन्मदाता कहा जाता है।

    ग्वालियर की विजय धंग देव की सबसे महत्वपूर्ण सफलता थी।।

    ➣ धंग ने सर्वप्रथम कालिंजर को राजधानी बनाया लेकिन बाद में राजधानी खजुराहो स्थानान्तरित कर दी।

    ➣ धंग देव का साम्राज्य पश्चिम में ग्वालियर, पूर्व में वाराणसी, उत्तर में यमुनादक्षिण में चेदि एवं मालवा तक विस्तृत था ।

    ➣ धंग ने भटिण्डा के शाही शासक जयपाल को सुबुक्तगीन के विरुद्ध सैनिक सहायता भेजी थी तथा उसके विरुद्ध बने हिन्दू राजाओं के संघ में सम्मिलित हुआ।

    ➣ उसने ब्राह्मणों को उच्च पदों पर नियुक्त किया। उसका मुख्य न्यायाधीश भट्टयशोधर तथा प्रधानमंत्री प्रभास जैसे विद्वान् ब्राह्मण थे।

    ➣ धंग प्रसिद्ध विजेता होने के साथ ही उच्चकोटि का निर्माता भी था। उसके शासन काल में निर्मित खजुराहो का विश्व विख्यात मंदिर स्थापत्य कला का एक अनोखा उदाहरण है। इसमें जिननाथ, वैद्यनाथ, विश्वनाथ विशेष उल्लेखनीय हैं।

    ➣ धंग 100 साल से अधिक जीवित रहा। अपने अंत समय में उसने प्रयाग में गंगा-यमुना के संगम में अपना शरीर त्याग दिया।

    गण्ड देव (1002 – 1019 ई.) : चंदेल शक्ति का कमजोर होना

    ➣ धंग देव के पश्चात उसका पुत्र गण्ड देव चन्देलवंश का राजा बना। वह अधिक आयु में शासक बना था। इसी कारण ही वह न तो विजय किया और न कोई लेख लिखवाये।

    ➣ गण्ड के काल में चन्देलों की शक्ति अक्षुण रही। त्रिपुरी के कलचुरि-चेदी तथा ग्वालियर के कच्छपघात शासक उसकी अधीनता स्वीकार करते थे।

    ➣ गंडदेव ने 1008 ई. में महमूद ग़ज़नवी के विरुद्ध जयपाल के पुत्र आनन्दपाल द्वारा बनाये गये संघ में भाग लिया था।

    विद्याधर (1019 – 1029 ई.) : महमूद गजनवी से संघर्ष

    ➣ गण्ड देव के पश्चात उसका पुत्र विद्याधर शासक बना। वह चन्देल शासकों में सर्वाधिक शक्तिशाली था। मुस्लिम लेखक उसका उल्लेख चन्द्र एवं विदा नाम से करते है।

    1019 ई. में महमूद ने कन्नौज के प्रतिहार शासक राज्यपाल के ऊपर आक्रमण किया। राज्यपाल ने डरकर बिना युद्ध के ही आत्मसमर्पण कर दिया। क्रोध वश विद्याधर ने प्रतिहार शासक राज्यपाल की हत्या कर दी।

    विद्याधर ही अकेला ऐसा भारतीय राजा था जिसने महमूद गजनवी की महत्वाकांक्षाओं का सफलतापूर्वक प्रतिरोध किया।

    ➣ विद्याधर ने मालवा के परमार शासक भोज एवं कलचुरि गांगेय देव को अपनी अधीनता मानने के लिए बाध्य किया था।

    ➣ विद्याधर के समय गजनवी ने चन्देलों पर आक्रमण किया लेकिन गजनवी उन्हें परास्त नहीं कर सका।

    1022 ई. में महमूद के दूसरे आक्रमण के समय विद्याधर ने उससे शांति का समझौता कर लिया। विद्याधर की मृत्यु के पश्चात चन्देल वंश की शक्ति का क्रमिक हास प्रारम्भ हुआ।

    ➣ उसके पुत्र विजयपाल तथा पौत्र देववर्मन के काल में चन्देल, कलचुरि- चेदि वंशी शासक गांगेयदेव तथा कर्ण की अधीनता स्वीकार करते थे। एक लेख में विजयपाल को नृपेन्द्र कहा गया है।

    कीर्तिवर्मन (1060 – 1100 ई.) : पुनरुत्थान काल

    देववर्मन के उपरान्त उसका छोटा भाई कीर्त्तिवर्मन राजा बना। वह सफल शासक सिद्ध हुआ।

    ➣ उसके राज्यारोहण के समय संभवतः चेदि नरेश कर्ण ने देववर्मन को हराकर चन्देल राज्य पर अधिकार कर लिया था।

    ➣ कीर्तिवर्मा ने अपने सामंत गोपाल की सहायता से कर्ण को हराया था। इस संस्कृत नाटक में चेदिराज के विरुद्ध गोपाल के युद्धों और विजयों का उल्लेख है।

    ➣ उसमें कहा गया है कि गोपाल ने नृपति तिलक कीर्तिवर्मा को पृथ्वी के साम्राज्य का स्वामी बनाया तथा उनके दिग्विजय व्यापार में शामिल हुआ।

    ➣ महोबा के निकट कीरत सागर नामक एक झील का निर्माण कीर्तिवर्मा ने करवाया था।

    ➣ प्रबोधचन्द्रोदय का रचयिता श्री कृष्णा मिश्र चन्देल शासक कीर्तिवर्मा (1060 ई. से 1100 ई.) का राज कवि था। इस नाटक में विष्णु भक्ति का वर्णन है।

    मदन वर्मा (1100 – 1163 ई.) : स्थिरता एवं प्रशासन

    पृथ्वी वर्मन का पुत्र मदन वर्मा चन्देल वंश का एक शक्तिशाली राजा हुआ।

    बुन्देलखण्ड के चार प्रमुख स्थान ( कालिंजर, खजुराहों, अजयगढ़, महोबा) में चन्देल सत्ता पुनः स्थापित हो गया था।

    ➣ उसका साम्राज्य त्रिभुजाकार रूप में बढ़ गया जिसके आधार का निर्माण विन्ध्य, भाण्डीर तथा कैमूर की पर्वत श्रेणियां करती थी तथा यमुना और बेतवा नदियों उसकी दो भुजायें थी।

    34 वर्षों के दीर्घकाली शासन के उपरान्त मदन वर्मा 1163 ई. में निधन हुआ था।

    ➣ चन्देल लेखों में सामान्यतः मदनवर्मा के बाद परमर्दि का नाम मिलता है। उसे तत्पादानुध्यात कहा गया है। इससे सूचित होता है कि मदन वर्मा का तत्कालिक उत्तराधिकारी परमर्दि की हुआ।

    परमर्दिदेव वर्मन (परमल) (1165 – 1203 ई.) : कुतुबुद्दीन ऐबक से संघर्ष एवं पतन

    ➣ परमर्दि चन्देल वंश का अन्तिम महान शासक था। जिसने 1165-1203 ई तक राज्य किया। परमर्दि तथा चाहमान वंश के प्रसिद्ध शासक पृथ्वीराज तृतीय के बीच शत्रुता थी।

    आल्हा तथा ऊदल नामक चन्देल सेना के दो वीर सेनानायक थे। ऊदल पृथ्वीराज के विरूद्ध लड़ते हुये मारा गया जबकि आल्हा ने सन्यास ले लिया।

    आल्हा खण्ड नामक काव्य की रचना जगनिक ने की थी।

    ➣ पृथ्वीराज ने परमर्दिन को पराजित कर महोबा पर अधिकार कर लिया। महोबा (बुन्देलखण्ड) पर उसका अधिकार मदनपुरलेख (1182 ई.) से भी पुष्ठ होता है। 1183 ई. का उसका लेख मिलता है। जिसमें उसे दशार्णाधिपति कहा गया है।

    ➣ 1203 ई. में कुतुबद्दीन ने परमर्दिदेव को पराजित कर कालंजर के दुर्ग पर अधिकार कर लिया। अंततः 1305 ई. में चन्देल राज्य दिल्ली में मिल गया।

    ➣ कालंजर के दुर्ग में ही परमर्दिन की मृत्यु हो गयी। फिरिश्ता के विवरण से पता चलता है कि उसके स्वय के मंत्री अजयदेव ने उसकी कायरता से चिढ़ कर उसकी हत्या कर दी।

  • पाल वंश (750-1150 ई.) : धर्मपाल

    📚 विषय सूची

    पाल वंश (8वीं – 12वीं शताब्दी) : पूर्वी भारत की बौद्ध शक्ति

    उत्तर भारत के शक्तिशाली राज्यों में पाल वंश भी एक हुआ। जिसका उद्भव बंगाल में लगभग 750 ई. में गोपाल से आरम्भ हुआ। जो एक स्थानीय प्रमुख था।

    ➣ सन 619ई. के लगभग गौड़ नरेश शशांक की मृत्यु के पश्चात् बंगाल हर्षवर्धन के अधीन हो गया किन्तु हर्ष की मृत्यु के पश्चात लगभग एक शताब्दी तक बंगाल में अराजकता व अव्यवस्था का वातावरण व्याप्त था।

    ➣ बंगाल में फैली अराजकता को दूर करने के लिए वहां की जनता ने लोकतांत्रिक ढंग से गोपाल को अपना राजा चुना। यह इतिहास में प्रथम निर्वाचित राजा था।

    ➣ पाल शासकों के साम्राज्य का विस्तार संपूर्ण बंगाल, बिहार तथा कन्नौज तक था। उनका शासन खाड़ी से लेकर दिल्ली तक तथा जालंधर से लेकर विंध्य पर्वत तक फैला हुआ था।

    ➣ उसके उत्तराधिकारी में धर्मपाल (770-810 ई.) ने अपने शासनकाल में साम्राज्य का काफ़ी विस्तार किया और कुछ समय तक कन्नौज, उत्तर प्रदेश तथा उत्तर भारत पर भी पाल वंश का नियंत्रण रहा।

    ➣ धर्मपाल के समय ही कन्नौज पर अधिपत्य के लिए त्रि-पक्षीय संघर्ष की शुरुवात हुई जिसका परिणाम अंतिम रूप से प्रतिहार शासकों के पक्ष में रहा।

    ➣ अधिकांश पाल नरेश बौद्ध मतानुयायी थे। उन्होंने ऐसे समय बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया, जब भारत में उसका पतन हो रहा था। विक्रमशिला विश्वविद्यालय धर्मपाल द्वारा ही स्थापित है।

    ➣ इस वंश ने बिहार और बंगाल पर लगभग 12वीं शताब्दी तक शासन किया।

    शासक शासनकाल परिचय / प्रमुख तथ्य
    गोपाल प्रथम 750 – 770 ई. पाल वंश का संस्थापक, बंगाल में सत्ता स्थापित की। बौद्ध धर्म (महायान) का संरक्षक, अराजकता के बाद स्थिरता लाई।
    धर्मपाल 770 – 810 ई. पाल वंश का स्वर्णकालीन शासक, त्रिपक्षीय संघर्ष में सक्रिय। कन्नौज पर अधिकार का प्रयास, विक्रमशिला विश्वविद्यालय का संरक्षण।
    देवपाल 810 – 850 ई. सबसे शक्तिशाली पाल शासकों में से एक, असम, उड़ीसा और उत्तर भारत तक विस्तार। बौद्ध धर्म को व्यापक संरक्षण।
    विग्रहपाल 850 – 860 ई. कमजोर शासन, आंतरिक अस्थिरता प्रारंभ, साम्राज्यिक विस्तार रुक गया।
    नारायणपाल 860 – 915 ई. लंबा शासनकाल, लेकिन राजनीतिक शक्ति कमजोर हुई। पाल साम्राज्य धीरे-धीरे पतन की ओर।
    राज्यपाल कमजोर शासक, प्रतिहार आक्रमणों के कारण बंगाल में प्रभाव घटा।
    गोपाल द्वितीय 940 – 957 ई. पुनर्जीवन का प्रयास, लेकिन पाल शक्ति सीमित क्षेत्रों तक रह गई।
    महिपाल प्रथम 978 – 1030 ई. पाल वंश का पुनर्जागरण काल, बंगाल और बिहार में पुनः शक्ति स्थापित। शिक्षा और बौद्ध संस्कृति का संरक्षण।
    नयपाल 1030 – 1055 ई. साम्राज्यिक स्थिरता बनाए रखने का प्रयास, लेकिन शक्ति कमजोर होती गई।
    महिपाल द्वितीय 1070 – 1075 ई. आंतरिक विद्रोह और सामंती शक्तियों का प्रभाव बढ़ा।
    रामपाल 1075 – 1120 ई. पाल वंश का अंतिम मजबूत शासक, कुछ क्षेत्रों में पुनः नियंत्रण स्थापित किया।
    कुमारपाल सीमित शक्ति, केंद्रीय नियंत्रण लगभग समाप्त।
    गोपाल तृतीय नाममात्र का शासक, वास्तविक सत्ता स्थानीय सामंतों के पास थी।
    मदनपाल 1144 – 1162 ई. पाल वंश का अंतिम महत्वपूर्ण शासक, पतन पूरी तरह तेज हुआ।
    गोविन्द पाल 1162 – 1174 ई. पाल वंश का अंतिम शासक, इसके बाद बंगाल में सेन वंश का उदय हुआ।

    गोपाल प्रथम (750 – 770 ई.) : पाल वंश की स्थापना

    ➣ पाल वंश की स्थापना लगभग 750 ई. के लगभग हुई। जिसका संस्थापक गोपाल था। उसके पिता का नाम वप्यट था। वह बौद्ध धर्म काअनुयायी था।

    हर्षवर्धन के पश्चात् बंगाल की राजनीतिक स्थिति काफ़ी अस्त-व्यस्त हो गयी थी। इस स्थिति को अभिलेखों में मत्स्य न्याय की संज्ञा दी गयी है।

    खालिमपुर अभिलेख में कहा गया है कि मत्स्य न्याय से छुटकारा पाने के लिए सरदारों व जनता ने गोपाल प्रथम को अपना शासक नियुक्त किया।

    तिब्बती लामा एवं इतिहासकार तारानाथ के अनुसार गोपाल प्रथम ने ओदान्तपुर में एक बौद्ध मठ का निर्माण करवाया था।

    धर्मपाल (770 – 810 ई.) : पाल साम्राज्य का विस्तार एवं नालंदा संरक्षण

    ➣ धर्मपाल पाल वंश के गोपाल प्रथम का पुत्र एवं उत्तराधिकारी व एक योग्यतम शासक था। उसकी महत्त्वपूर्ण सफलता , कन्नौज के शासक इंद्रायुध को परास्त कर चक्रायुध को अपने संरक्षण में कन्नौज की गद्दी पर बैठाना, था।

    ➣ कालांतर में प्रतिहार राजा वतसराज (775 -800 ई.) ने कन्नौज पर आक्रमण कर इंद्रायुध को पराजित किया और उत्तर भारत में अपनी सत्ता का विस्तार किया। इस आक्रमण ने त्रि-पक्षीय युद्ध का आगाज कर दिया।

    ➣ इस समय दक्षिण राज्य राष्ट्रकूट शासक ध्रुव ने भी कन्नौज पर अधिकार कर लिया किन्तु उसके वापस जाते ही धर्मपाल ने कन्नौज पर आक्रमण पर इन्द्रायुध को अपदस्थ कर अपने संरक्षण में चक्रायुध को कन्नौज की राजगद्दी पर बैठाया।

    ➣ प्रतिहार शासकों वत्सराज के पुत्र नागभट्ट द्वितीय ने धर्मपाल को परास्त कर दिया और कन्नौज पर अधिकार कर लिया। जो उसके अधिकार में अल्प समय तक ही रहा।

    ➣ धर्मपाल ने पश्चिम में पंजाब से लेकर पूर्व में बंगाल तक तथा उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में बरार तक अपनी शक्ति स्थापित की थी।

    ➣ उसने महाराजाधिराज, परमेश्वर और परभट्टारक जैसी उपाधियाँ धारण की थीं।

    ➣ 11वीं शताब्दी के कवि सोड्ढल (गुजराती) ने उदयसुन्दरी कथा में धर्मपाल को उत्तरापथस्वामिन कहा है।

    ➣ धर्मपाल प्रतिहार वंशी शासक नागभट्ट द्वितीय से पराजित हुआ था। उसे राष्ट्रकूट नरेश ध्रुव ने भी पराजित किया था।

    ➣ धर्मपाल बौद्ध धर्म का अनुयायी था। धर्मपाल के लेखों में उसे ‘परमसौगत’ कहा जाता है।

    ➣ उसने विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना की तथा सोमपुरी (पहाड़पुरी, बंगाल) में मठों का निर्माण करवाया। उसकी सभा में हरिभद्र नामक बौद्ध विद्वान रहते थे।

    ➣ धर्मपाल की सभा में हरिभद्र ने अष्टसहस्त्रिका प्रज्ञापारमिता नामक बौद्ध ग्रन्थ की रचना की थी।

    नारायणपाल अभिलेख में उसे उचित कर लगाने वाला अर्थात् सबसे साथ समान व्यवहार करने वाला कहा गया है।

    ➣ धर्मपाल ने राजत्रयचाधिपति (तीन राजाओं का स्वामी/अश्वपति, गजपति, नरपति) की उपाधि धारण की।

    ➣ धर्मपाल ने बोधगया में चतुर्भुज महादेव मंदिर की स्थापना की थी, उसका मंत्री गर्ग एक ब्राह्मण था।

    ➣ उसके शासन काल में प्रसिद्ध यात्री सुलेमान आया था, जिसने धर्मपाल को रूहमा या धर्म कहा था।

    ➣ धर्मपाल द्वारा बहुत से बिहार एवं मठों का निर्माण करवाया गया था। उसने बिहार में प्रसिद्ध विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना की और नालन्दा विश्वविद्यालय का पुनरुद्धार किया।

    ➣ धर्मपाल ने नालंदा विश्वविद्यालय के ख़र्च के लिए 200 गाँवों के राजस्व को दान में दिया था।

    देवपाल (810 – 850 ई.) : पाल वंश का स्वर्णकाल

    ➣ धर्मपाल का पुत्र देवपाल पिता की मुत्यु के उपरांत 810 ई. में राजा बना। देवपाल बौद्ध धर्म का पुनः प्रतिस्थापक माना जाता है।

    ➣ नारायणपाल के बादल अभिलेख के अनुसार देवपाल ने उत्कल, हूणों, द्रविड़ोंगुर्जरों को पराजित किया।

    ➣ अरब यात्री सुलेमान के 851 ई. के लेख के अनुसार पालों की सेना राष्ट्रकूटोंप्रतिहारों से अधिक शक्तिशाली थी। उसने प्राग-ज्योतिषपुर (असम) और उड़ीसा के कुछ भागों को अपने साम्राज्य में मिला लिया।

    ➣ इसके समकालीन प्रतिहार शासक मिहिर भोज था। जिसे उसने पराजित किया।

    ➣ देवपाल ने मुंगेर को अपनी राजधानी बनाया तथा परमसौगात की उपाधि धारण की।

    ➣ देवपाल की सभा में सुमात्रा के राजा बालपुत्र देव का दूत आया था।

    ➣ देवपाल ने नालन्दा ताम्रपत्र के अनुसार मलाया के शैलेन्द्रवंशी राजा बालपुत्र देव की प्रार्थना पर नालन्दा के वौद्ध विहार को पाँच गाँव दिए तथा वीरसेन नामक बौद्ध विद्वान को नालन्दा विहार में अध्यक्ष नियुक्त किया।

    अन्य उत्तराधिकारी

    विग्रहपाल (लगभग 850-860 ई.) पाल वंश के राजा देवपाल का उत्तराधिकारी था। इस समय के कमज़ोर एवं अयोग्य शासकों में विग्रहपाल की भी गणना की जाती है।

    ➣ तीन या चार वर्ष की अल्प शासन अवधि के बाद ही विग्रहपाल ने गद्दी त्याग दी। उसका उत्तराधिकारी उसका पुत्र नारायणपाल (860-915 ई.) हुआ।

    नारायणपाल (860 – 915 ई.) : साम्राज्य का पुनर्गठन

    ➣ इसका शासन काल बाकी पाल शासकों से काफ़ी लम्बा था। इसे राष्ट्रकूट राजा अमोघवर्ष ने पाल शासक नारायणपाल को पराजित किया था।

    ➣ इसके काल में प्रतिहारों ने पूर्व की ओर अपनी शक्ति का विस्तार करना प्रारम्भ कर दिया था। फलत : मगध तथा उत्तरी बंगाल उसके हाथ से निकल गया। उसका शासन केवल बंगाल तक रह गया।

    ➣ हालाँकि अपने शासन के अंतिम चरणों में नारायणपाल ने प्रतिहारों से उत्तरी बंगाल और दक्षिणी बिहार को छीन लिया था, क्योंकि प्रतिहार राष्ट्रकूटों के आक्रमण के कारण काफ़ी कमज़ोर हो गये थे।

    ➣ नारायणपाल का उत्तराधिकारी उसका पुत्र राज्यपाल था।

    ➣ सन 908-888 ई. तक के 80 वर्षो में तीन राजाओ (राज्यपाल, गोपाल द्वितीय व विग्रहपाल द्वितीय) ने शासन किया।

    ➣ गोपाल द्वितीय बंगाल के पाल वंश का एक परवर्ती राजा था। यह अपने पिता राज्यपाल के बाद राजगद्दी पर बैठा। गोपाल द्वितीय के द्वारा किये गए कार्यों के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त नहीं है।

    महिपाल प्रथम (980 – 1030 ई.) : पाल शक्ति का पुनरुत्थान

    ➣ महिपाल प्रथम ने पाल वंश की शक्ति पुनः स्थापित की। इसे पाल वंश का दूसरा संस्थापक भी कहा जाता है। उसे दीपंकर श्रीज्ञान, जिसे अतिसा नाम से भी जाना जाता था।

    ➣ महिपाल प्रथम का राज्य मगध तक विस्तृत था। उसे राजेन्द्र चोल एवं कलपुरी वंश के मांगेयदेव से युद्ध में परास्त होना पड़ा।

    ➣ महिपाल नें बौद्ध भिक्षु अतिस के नेतृत्व में तिब्बत में एक धर्म प्रचारक मण्डल में भेजा था।

    नयपाल (1038 – 1053 ई.) : सेन वंश से संघर्ष

    नयपाल (1038-1053 ई.) पाल वंश के शासक महीपाल का पुत्र और उत्तराधिकारी था। उसने लगभग 1038-55ई. तक राज्य किया था।

    ➣ उसके राज्य काल में दीर्घकाल तक कलचुरियों से संघर्ष चलता रहा। नयपाल के जीवन का अधिकांश भाग कलचुरी नरेश कर्ण के साथ संघर्ष में ही बीता।

    ➣ पाल शासन का विघटन नयपाल के राज्य काल से ही प्रारम्भ हो गया था। उसके शासन काल में पूर्वी, पश्चिमी तथा दक्षिणी बंगाल उसके हाथ से निकल गया था।

    ➣ इसके पश्चात बाद क्रमशः नयपाल (1038-1055 ई.), विग्रहपाल तृतीय (1055-1070 ई.), महिपाल द्वितीय (1070- 1075 ई.) तथा सुरपाल द्वितीय (1075-1077 ई.) ने शासन किया।

    विग्रहपाल तृतीय (1055 – 1070 ई.) : पतन की शुरुआत

    ➣ विग्रहपाल के समय में साम्राज्य के पतन की प्रतिक्रिया तीव्र हो उठी। उसके समय में कलचुरियों ने बंगाल पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया।

    ➣ कलचुरी कर्ण चालुक्य नरेश विक्रमादित्य चतुर्थ एवं कोशल नरेश महाशिव गुप्त के आक्रमण का सामना करते हुए पाल साम्राज्य के अनेक भागों को हार गये। वह केवल मगध, बंगाल एवं गौड को ही अपने अधीन रख सका।

    अंग में राष्ट्रकूट वंश के एक शासक मथनदेव ने अपना अधिकार कर लिया। गया क्षेत्र में चिकोरवंश के देवरक्षित ने अपना प्रभाव कायम किया।

    ➣ गुजरात के चालुक्यों और उड़ीसा के सोमवंशी शासकों ने भी पालों को परेशान किया। अब विग्रहपाल का अधिकार उत्तरी बिहार तक ही सीमित रहा।

    ➣ विग्रहपाल के पश्चात पालों में उत्तराधिकार का संघर्ष आरंभ हो गया, जिसने उनकी शक्ति और कमजोर कर दी।

    ➣ उत्तराधिकारी महीपाल द्वितीय (1072-1075 ई) को कैवर्तो के विद्रोह का सामना करना पड़ा। कैवर्त नेता दिव्य ने महीपाल की हत्या कर वरेंद्री में स्वतंत्र राज्य की स्थापना कर ली।

    ➣ महीपाल की हत्या के बाद भी गद्दी के दो अन्य उत्तराधिकारियों शूरपाल द्वितीय और रामपाल में संघर्ष जारी रहा। इसमें अंततः रामपाल विजयी हुआ।

    रामपाल (1077 – 1130 ई.) : अंतिम शक्तिशाली शासक

    ➣ रामपाल अन्तिम महत्वपूर्ण शासक था। रामपाल विग्रहपाल तृतीय का पुत्र था। संध्याकरनन्दी द्वारा रचित रामपाल चरित में इसका वर्णन है। यह श्लेष शैली में लिखा गया है इसमें राम की कथा के साथ पाल शासक रामपाल की कथा है।

    संध्याकरनंदी के अनुसार रामपाल (रामचरित के नायक) ने बिहार और बंगाल के 13 सामंतों की सहायता से कैवर्त शासक भी को पराजित कर उसकी हत्या कर दी थी।

    ➣ बंगाल पर अधिकार कर उसने कामरूप (असम) और उड़ीसा पर भी विजय प्राप्त की और कन्नौज के गहड़वाल शासक को बिहार की ओर साम्राज्य विस्तार करने से सफलतापूर्वक रोका।

    जगदल्ल विश्वविद्यालय की स्थापना रामपाल ने की। जो बौद्ध की तंत्रयान शिक्षा का प्रसिद्ध केन्द्र था।

    संध्याकर नंदी ने अपने विलक्षण काव्य ग्रंथ रामपालचरित में रामपाल की उपलब्धियों का वर्णन किया है। संध्याकार नन्दी ने स्वयं को कलिकाल वाल्मीकि (कलियुग का वाल्मीकि) कहा है एवं रामपाल को राम कहा है।

    ➣ उसने रामावती नरामक एक नई राजधानी बनवा कर इसे सुंदर भवनों एवं मूर्तियों से सुसज्जित किया। अपने मित्र मथनदेव की मृत्यु से दुखी होकर रामपाल ने मुंगेर में गंगा में अपने प्राण विसर्जित कर दिए।

    अन्य उत्तराधिकारी

    ➣ रामपाल के बाद कुमारपाल, गोपाल तृतीय, मदनपाल (1144-1162 ई.) क्रमश: शासक हुए। मदनपाल इस वंश का अंतिम प्रभावशाली शासक था।

    ➣ उसके बाद कुमार पाल व मदनपाल के अधीन पालों की शक्ति और कमजोर हो गई। कामरूप स्वतंत्र हो गया, बंगाल में विजयसेन का प्रभाव बढ़ने लगा तथा मगध में गहड़वालों का प्रभाव बढ़ने लगा। मदनपाल को विजयसेन ने बंगाल छोड़ने पर बाध्य कर दिया।

    ➣ गोपाल तृतीय, रामपाल का प्रपौत्र, बंगाल के पाल वंश का परवर्ती राजा था। जो अपने पिता कुमारपाल के बाद पाल साम्राज्य की राजगद्दी पर आसीन हुआ। गोपाल तृतीय के चाचा मदनपाल ने 1145 ई. में इसे गद्दी से उतार दिया था।

    ➣ गोविन्द पाल, पाल राजवंश के अंतिम राजा थे। उन्होंने 1162-74 तक बंगाल पर शासन किया। उसे 1155-1159 ई. के लगभग गहड़वालों ने मगध से पदच्युत कर पाल राजवंश का अंत कर दिया।

    ➣ संध्याकर नन्दी द्वारा रचित रामपाल चरित में इस वंश का अंतिम शासक रामपाल माना गया है।

    ➣ 1199 में बख्तियार खिलजी के पुत्र इख्तियारुद्दीन मुहम्मद खिलजी के नेतृत्व में मुसलमानों ने बिहार से भी पाल वंश का अस्तित्व मिटा दिया।

    1203 ई. में बख्तियार खिलजी के आक्रमण के परिणामस्वरूप धर्मपाल द्वारा स्थापित विक्रमशिला विश्वविद्यालय नष्ट हो गया।

    ➣ 12वीं सदी के मध्य तक सेनवंश के राजाओं ने पालों से बंगाल छीन लिया और पाल वंश पूर्णत: समाप्त हो गया।

    ➣ पालवंश के बाद सेन वंश की स्थापना बंगाल में हुई सेन दक्षिण के कर्णाट देश के थे और अपनी उत्पत्ति ब्रह्मक्षत्र परम्परा से मानते थे।

    जानकारी के स्रोत

    ➣ इस काल के प्रमुख विद्वानों में सन्ध्याकर नन्दी का नाम मिलता है, जिन्होंने रामचरित नामक ऐतिहासिक काव्यग्रन्थ की रचना की। जिस में पाल शासक रामपाल के बारे में ज्ञात होता है।

    ➣ अन्य विद्वानों में हरिभद्र यक्रपाणिदत्त, ब्रजदत्त आदि उल्लेखनीय है। चक्रपाणिदत्त ने चिकित्सासंग्रह तथा आयुर्वेदीपिका की रचना की।

    जीमूतवाहन भी पाल युग में ही हुआ। उसने दायभाग, व्यवहार मालवा तथा काल विवेक की रचना की।

    ➣ वज्रदत्त ने लोपेश्वरशतक की रचना की। कला के क्षेत्र में भी पाल शासकों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। स्मिथ ने पाल युग के दो महान् शिल्पकार धीनमान तथा बीतपाल का उल्लेख किया है।

    ➣ पाल वंश के शासकों ने बंगाल पर 750 से 1155 ई. तक तथा बिहार पर मुसलमानो के आक्रमण (1199 ई.) तक शासन किया।

    ➣ इस प्रकार पाल राजाओं का शासन काल उन राजवंशों में से एक है, जिसमें प्राचीन भारतीय इतिहास में सबसे लम्बे समय तक शासन किया।

    अन्य सम्बन्धित महत्वपूर्ण तथ्य

    ➣ पाल शासकों ने दीपंकर, अभयंकर, ज्ञानपाद, रत्नवज्र, संतरक्षित आदि बौद्ध विद्वानों को विक्रमशिला विश्वविद्यालय, जो धर्मपाल द्वारा स्थापित किया गया, में संरक्षण प्रदान किया।

    ➣ पाल कलाकारों को कांस्य मूर्तियाँ बनाने में महारत हासिल थी। बौद्ध धर्म के महायान और वज्रयान संप्रदायों के प्रभावों से पाल शासनकाल में मूर्तिकला का विकास हुआ। इस कला के प्रमुख केंद्र थे-नालंदा, बोधगया एवं कुर्किहार।

    ➣ 1203 ई. में बख्तियार खिलजी के आक्रमण से नष्ट होने से पूर्व विक्रमशिला शिक्षा का प्रमुख केन्द्र था।

    ➣ अभिलेख में पाल शासकों को परमसौगत (बौद्ध) कहा गया है। उन्होंने ऐसे समय में बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया जब भारत उसका पतन हो रहा था।

    ➣ संस्कृत के अतिरिक्त बांग्ला लिपि एवं भाषा तथा जनभाषा की प्रगति पालों के अधीन हुई। हिंदू काव्य दायभाग के जन्मदाता जीमूतवाहन को पाल शासकों का संरक्षण प्राप्त था।

    ➣ संभवतः पालों की राजधानी मुंगेर थी। सर्वप्रथम देवपाल ने मुगेर राजधानी बनाई।

    ➣ अरवयात्री सुलेमान ने पाल साम्राज्य को रूहमा (धर्मा) कहा है।

    ➣ पाल राजाओं के राज्य काल में वज्रयान में मन्त्रपाठ के विरोध में पृथक तांत्रिक संप्रदाय बना जो सहजयान के नाम से विख्यात हुआ।

    ➣ दायभाग का लेखक जीमूतवाहन (12वीं शती) भी पाल शासकों के दरबार में था।

    ➣ चक्रपाणि दत्त 11वीं शताब्दी का बंगाल का प्रसिद्ध चिकित्साशास्त्री था। इन्होंने चरक संहिता पर आयुर्वेद दीपिका (चरक तत्व प्रदीपिका) तथा सुश्रुत संहिता पर भानुमति नामक टीकाएँ लिखी।

    चक्रपाणिदत्त ने चिकित्सा संग्रह (चक्रदत्ता) नामक प्रसिद्ध ग्रन्थ लिखा, जिसमें विभिन्न रोगों के लक्षण तथा भस्म तैयार करने के नवीन तथ्यों की जानकारी मिलती है।

    धीमान एवं वीतपाल 9वीं सदी के पालशैली के चित्रकार थे। पाल चित्रकला को मगध शैली भी कहा जाता है।

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