चालुक्य (सोलंकी) वंश : गुजरात की प्रमुख शक्ति
➣ प्राचीन ग्रंथ कुमारपाल चरित व वर्णरत्नाकर में परम्परागत 36 राजपूत कुलों की सूची मिलती है।
➣ चालुक्य (सोलंकी) अग्निकुल से उत्पन्न राजपूतों में से एक थे। इस वंश के शासक जैन धर्म के पोषक व संरक्षक थे।
➣ चालुक्यों की उत्पत्ति का विषय अत्यंत ही विवादास्पद है। वराहमिहिर की बृहत्संहिता में इन्हें शूलिक जाति का माना गया है, जबकि पृथ्वीराज रासो ने इनकी उत्पत्ति आबू पर्वत पर किये गए यज्ञ के अग्निकुंड से बताई है।
| शासक | शासनकाल | परिचय / प्रमुख तथ्य |
|---|---|---|
| मूलराज प्रथम | 941 – 995 ई. | सोलंकी (चालुक्य) वंश का संस्थापक, अन्हिलवाड़ पाटन (गुजरात) में सत्ता स्थापित की। प्रारंभिक संघर्षों के बाद राज्य की नींव मजबूत की और स्वतंत्र शासन की शुरुआत की। |
| भीम देव प्रथम | 1022 – 1064 ई. | महमूद गजनवी के सोमनाथ आक्रमण (1025 ई.) के समय शासक। मंदिर के विनाश के बाद पुनर्निर्माण कराया और गुजरात की शक्ति को पुनः संगठित किया। |
| जयसिंह सिद्धराज | 1094 – 1153 ई. | सोलंकी वंश का स्वर्णकालीन शासक। गुजरात की राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक उन्नति हुई। साहित्य, कला और मंदिर निर्माण को संरक्षण दिया। |
| कुमार पाल | 1153 – 1172 ई. | जैन धर्म का महान संरक्षक। आचार्य हेमचंद्र से प्रभावित होकर अहिंसा नीति अपनाई। राज्य में सामाजिक सुधार और धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ावा दिया। |
| अजयपाल | 1172 – 1176 ई. | कमजोर शासक, आंतरिक अस्थिरता और सामंतों की शक्ति बढ़ी। केंद्रीय सत्ता कमजोर होने लगी। |
| मूलराज द्वितीय | 1176 – 1178 ई. | अल्पकालीन शासन, मुहम्मद गोरी की सेनाओं से संघर्ष/विजय, राजनीतिक अस्थिरता और बाहरी दबाव के कारण प्रभाव सीमित रहा। |
| भीम द्वितीय | 1178 – 1238 ई. | दीर्घकालीन लेकिन कमजोर शासन। दिल्ली सल्तनत के उदय के समय शासन किया। लगातार आक्रमणों और आंतरिक विद्रोह के कारण सोलंकी शक्ति पतन की ओर चली गई। |
मूलराज प्रथम (941 – 995 ई.) : सोलंकी वंश की स्थापना
➣ गुजरात के चालुक्य वंश का संस्थापक मूलराज प्रथम था। उसने गुजरात के एक बड़े भाग को जीतकर अन्हिलवाड़ को अपनी राजधानी बनाया।
➣ वर्ष 995-1008 ई. तक मूलराज का पुत्र अन्हिलवाड़ का शासक रहा उसके पुत्र दुर्लभराज ने 1008-1022 ई. तक शासन किया। ।
भीम देव प्रथम (1022 – 1064 ई.) : महमूद गजनवी का सोमनाथ आक्रमण
➣ भीम प्रथम इस वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था। इसके समय में महमूद गजनवी ने सोमनाथ के मन्दिर पर 1025 ई. में आक्रमण किया।
➣ भीमदेव प्रथम ने सोमनाथ मन्दिर को जो पहले लकड़ी और फिर ईंटों द्वारा निर्मित था, के स्थान पर पत्थर द्वारा निर्माण कराया।
➣ कहा जाता है कि भीम प्रथम ने गजनवी द्वारा विनष्ट सोमनाथ के मन्दिर का पुनर्निर्माण करवाया; परन्तु एक अन्य परम्परा के अनुसार इस मन्दिर का पुनर्निर्माण कुमारपाल ने करवाया।
➣ भीम प्रथम ने कलचूरि शासक कर्ण के साथ मिलकर परमार भोज को परास्त किया एवं धारानगरी को लूटा।
➣ भीम प्रथम के मंत्री विमलशाह ने विमलशाही (आदिनाथ) के मन्दिर का निर्माण 1031 ई. में देलवाड़ा में करवाया। कीर्तिधर इसका शिल्पकार था।
➣ भीम के बाद उसके पुत्र कर्ण ने त्रैलोक्य मल्ल की उपाधि धारण कर शासन किया।
➣ भीम प्रथम का पुत्र कर्ण 30 वर्ष शासन किया। वह अपने शासन काल में नाडोल के चौहान व मालवा के परमारों से युद्ध में परास्त हुआ था।
जयसिंह सिद्धराज (1094 – 1153 ई.) : गुजरात का स्वर्णकाल एवं सोमनाथ प्रभाव
➣ जयसिंह सिद्धराज महत्वपूर्ण शासक था। कर्ण के पुत्र जयसिंह ने सिद्धराज की उपाधि ग्रहण की।
➣ जयसिंह ने 1113-14 ई. में सिंह संवत् प्रारम्भ किया।
➣ उसके राज्य की सीमायें पश्चिम में कठियावाड़ तथा गुजरात, पूर्व में भिलसा (मध्य प्रदेश) और दक्षिण में बलि क्षेत्र एवं सांभर तक फैली थी।
➣ उसके दरबार में जैन आचार्य हेमचन्द्र रहते थे जिन्होंने कुमारपाल चरित (द्वयाश्रय महाकाव्य) नामक ग्रन्थ लिखा। अष्टादससहस्त्री व त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित्र की रचना भी हेमचन्द्र ने की। सिद्धहेम व्याकरण ग्रन्थ की रचना हेमचन्द्र ने की थी।
➣ आबू पर्वत पर उसने एक मंडप का निर्माण करवाया, जहाँ उसने हाथियों पर आरूढ़ अपने सात पूर्वजों की मूर्तियों को प्रतिष्ठापित किया।
➣ उसने सिद्धपुर में रूद्रमहाकाल का मंदिर बनवाया। सिद्धराज स्वयं शैव था, लेकिन जैन विद्वान हेमचंद्र का सम्मान करता था।
➣ मुस्लिम लेखक औफी के अनुसार जयसिंह सिद्धराज ने खम्भात में एक मस्जिद के जीर्णोद्धार के लिए अपने निजी कोष से एक लाख बलोत्र (स्वर्ण मुद्रा) का अनुदान किया था।
➣ जयसिंह सिद्धराज ने सोमनाथ मन्दिर के यात्रियों पर लगने वाले तीर्थयात्रा कर को भी समाप्त कर दिया था।
➣ जयसिंह ने चौहान नरेश अर्णोराज को हराया किन्तु बाद में अपनी पुत्री कांचन देवी का विवाह अर्णोराज से किया।
कुमारपाल (1153 – 1172 ई.) : जैन धर्म संरक्षण एवं प्रशासनिक सुधार
➣ जयसिंह का अपना कोई पुत्र नही था। उसका उत्तराधिकारी कुमार पाल हुआ जो एक महत्त्वाकांक्षी शासक था।
➣ कुमारपाल ने अपने शासनकाल के आरम्भ में ही अर्णोराज चौहान, विक्रमसिंह परमार तथा मालवा के शासक बल्लार के आक्रमणों को विफल करके अपनी योग्यता को प्रमाणित कर दिया।
➣ प्रसिद्ध जैन आचार्य हेमचंद्र ने उसे जैन धर्म में दीक्षित किया था। इससे पहले वह शैव धर्मावलम्बी था। उसके पश्चात् परमअर्हत की उपाधि धारण की और संपूर्ण साम्राज्य में अहिंसा के सिद्धांतों को क्रियान्वित किया।
➣ जैन परम्परा के अनुसार कुमारपाल ने अपने सम्पूर्ण साम्राज्य में पशु हत्या, मद्यमान एवं द्यूतक्रीड़ा पर प्रतिबन्ध लगा दिया। कसाइयों को अपना व्यवसाय बन्द करने के लिए उन्हें तीन वर्ष की आय के बराबर धन देकर उसकी क्षतिपूर्ति की गई।
➣ कुमारपाल के शासन काल में संन्यासियों को मृगचर्म मिलना बन्द हो गया और शिकारी व्यवसाय विहीन हो गये।
➣ कुमार पाल ने 1169 ई. में सोमनाथ मंदिर को अंतिम रूप से पुनर्निर्माण करवाया तथा जैन आचार्य हेमचंद्र के साथ सोमनाथ मंदिर में शिव की अर्चना की।
➣ कुमारपालचरित (कुमारपालचार) नामक काव्य में जयसिंह सूरी नामक कवि ने उसका यशोगान किया है।
अजयपाल (1172 – 1176 ई.) : अल्पकालीन शासन
➣ कुमारपाल के बाद उसका उत्तराधिकारी भतीजा अजयपाल शासक बना। अजयपाल को जैन परम्पराओं में जैनियों के संत्रासक के रूप में वर्णित किया गया है।
➣ उसके शासनकाल में शैव एवं जैन धर्मावलंबियों के मध्य गृहयुद्ध आरंभ हो गया, जिसके कारण अनेक जैन भिक्षुओं को हत्या कर दी गई और अनेक जैन मंदिरों को नष्ट कर दिया गया।
मूलराज द्वितीय (1176 – 1178 ई.) : मुहम्मद गोरी से संघर्ष एवं विजय
➣ मूलराज द्वितीय ने आबू के निकट (काशहद का मैदान) 1178 ई. में मुहम्मद गोरी को हराया था। उल्लेखनीय है यह गौरी की भारत में पहली पराजय थी।
➣ मूलराज द्वितीय की संरक्षिका उनकी माता नाईकि देवी ने ही वास्तव में मुहम्मद गौरी के विरुद्ध 1178 ई. में आबू के युद्ध में सेना का संचालन किया।
भीम द्वितीय (1178 – 1238 ई.) : सोलंकी वंश का पतन
➣ चालुक्य वंश का अन्तिम महान शासक भीम द्वितीय था। उसने चालुक्य राज्य की शक्ति एवं प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित किया।
➣ 1178 ई. में जब मुहम्मद गोरी ने गुजरात पर आक्रमण किया तो भीमदेव द्वितीय ने इस आक्रमण को विफल कर दिया।
➣ चालुक्य वंश का अन्तिम महान् शासक भीम द्वितीय (1178 से 1238 ई.) था। 1197 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक ने गुजरात पर आक्रमण कर अन्हिलवाड़ को लूटा।
➣ भीम द्वितीय के समय वास्तुपाल एवं तेजपाल ने 1231-32 ई. में देलवाड़ा में लूणवसहि (नेमिनाथ) मन्दिर का निर्माण करवाया। इनका वास्तुकार शोभनदेव था। इस मन्दिर को देवरानी-जेठानी का मन्दिर भी कहा जाता है।
अन्य सम्बंधित तथ्य
➣ चालुक्यों के बाद बघेला शासकों ने गुजरात पर शासन किया। कालांतर में भीमदेव-II के एक मंत्री लवण प्रसाद ने गुजरात में बघेल वंश की स्थापना की।
➣ वास्तुपाल व तेजपाल द्वारा निर्मित दिलवाड़ा का नेमिनाथ का जैन मन्दिर (आबू) वास्तव में बघेला शासक वीरधवल के समय बना। बघेला प्रारम्भ में चालुक्यों के सामन्त थे।
➣ भीम द्वितीय के समय बघेला सामन्त लवणप्रसाद एवं उसका पुत्र वीरधवल चालुक्य राज्य के वास्तविक शासक बन गए थे।
➣ उदयसुन्दरीकथा के लेखक सोद्दल व प्रबन्ध चिन्तामणि के लेखक मेरूतुंग चालुक्य शासकों के समय थे।
➣ चालुक्य शासकों द्वारा तीर्थ यात्रियों से कुट नामक कर लिया जाता था।
➣ चालुक्य शासकों ने उमापति वरलब्ध की उपाधि धारण की जिससे यह प्रतीत होता है कि उनका राजधर्म शैव था।
➣ सन 1195 ई. उसने कुतुबद्दीन को हराकर अजमेर भगा दिया था परन्तु दूसरे वर्ष 1197 ई. में कुतुबद्दीन ऐबक ने गुजरात पर आक्रमण कर अन्हिलवाड़ पर अधिकार कर लिया।
Leave a Reply