परमार वंश मालवा (945-1055 ई.) : राजा भोज

भारतीय इतिहास प्राचीन भारत परमार वंश मालवा (945-1055 ई.)
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परमार वंश (9वीं – 14वीं शताब्दी) : मालवा की प्रमुख शक्ति

➣ परमार वंश का आरंभ नवीं शताब्दी के प्रारंभ में नर्मदा नदी के उत्तर मालवा (प्राचीन अवन्ति) क्षेत्र में उपेंद्र अथवा कृष्णराज द्वारा हुआ था। आरंभ में वे संभवतः राष्ट्रकूटों या पुनःप्रतिहारों के सामंत थे।

➣ उपेन्द्र के बाद कई छोटे-छोटे शासक हुए इनमें वैरिसिंह प्रथम, सीयक प्रथम,वाक्पति प्रथम तथा वैरिसिंह द्वितीय के नाम मिलते है जिन्होंने 790-945 ई. तक शासन किया।

➣ परमार वंश का प्रथम स्वतंत्र एवं शक्तिशाली शासक सीयक अथवा श्री हर्ष था। परमारों की प्रारंभिक राजधानी उज्जैन थी, जो बाद में धार हो गई।

➣ परमारों की शाखाएँ धारा, चन्द्रावती (माउन्ट आबू), वागड़ (बाँसवाड़ा), ज्वालिपुर (जालोर) तथा किरातकूप (किराडु, बाड़मेर) थी। इनमें धारा (उज्जैन) की शाखा सबसे प्रमुख थी।

शासक शासनकाल परिचय / प्रमुख तथ्य
हर्ष / सीयक-II 945 – 972 ई. परमार वंश का प्रारंभिक शक्तिशाली शासक, राष्ट्रकूटों से स्वतंत्रता प्राप्त करने का प्रयास किया और मालवा क्षेत्र में शक्ति स्थापित की।
वाक्पति मुंज 973 – 994 ई. प्रसिद्ध परमार शासक, साहित्य और कला का संरक्षक। चालुक्यों के विरुद्ध युद्ध किया लेकिन अंततः बंदी बना लिए गए और मृत्यु हो गई।
सिन्धुराज 994 – 1010 ई. राज्य की स्थिरता बनाए रखने का प्रयास किया, चालुक्यों से संघर्ष जारी रखा।
परमार भोज (राजा भोज) 1010 – 1055 ई. परमार वंश का सबसे प्रसिद्ध और महान शासक, “विक्रमादित्य” की तरह आदर्श राजा माना जाता है। साहित्य, विज्ञान, वास्तुकला और शिक्षा का महान संरक्षक; भोजपुर नगर और भोजशाला से जुड़ा।

हर्ष / सीयक-II (945 – 972 ई.) : प्रारंभिक परमार विस्तार

➣ इस वंश का प्रथम स्वतंत्र व शक्तिशाली शासक सीयक (श्रीहर्ष) था। सीयक ने राष्ट्रकूट नरेश खोटिटंग को हराया एवं राष्ट्रकूटों की अधीनता से मुक्त हुए।

➣ परमार वंश का प्रथम अभिलेख सीयक द्वितीय का हरसोल अभिलेख है, जिसमें परमार शासकों की वंशावली है। परमारों की स्वतंत्रता का जन्मदाता सीयक द्वितीय था।

➣ परमारों की प्रारंभिक राजधानी उज्जैन थी जो बाद में धारा (मध्य प्रदेश) स्थानांतरित की गई।

➣ इसके राजदरबार में यशोरूपावलोक के रचयिता धनिक, नवसाहसांकचरित के लेखक पद्मगुप्त, दशरूपक के लेखक धनंजय आदि रहते थे।

➣ सीयक को कोई पुत्र नहीं था। संयोगवश उसे एक दिन मुंज घास में पड़ा एक नवजात शिशु मिला। सीयक उसे उठाकर घर लाया तथा पालन पोषण करके बड़ा किया। मुंज में पड़े होने से ही उसका नाम मुंज रखा गया।

➣ उसकी अपनी पत्नी से सिंन्धुराज नामक पुत्र भी उत्पन्न हुआ। किन्तु वह अपने दत्तक पुत्र से पूर्ववत् स्नेह करता रहा। सीयक ने स्वयं उसे अपना उत्तराधिकारी घोषित किया।

वाक्पति मुंज (973 – 994 ई.) : साहित्य एवं कला संरक्षण

➣ सीयक के दो पुत्र (मुंज, सिंधुराज) थे इनमें प्रथम उसका दत्तक पुत्र था। सीयक की मृत्यु के बाद वही गद्दी पर बैठा।

➣ इतिहास में वह वाक्पति मुंज तथा उत्पलराज के नाम से भी प्रसिद्ध है। कौथेम दानपात्र से विदित होता है कि वाक्पति मुंज ने हूणों को भी पराजित किया था।

➣ उसने कलचुरी शासक युवराज द्वितीय तथा चालुक्य राजा तैलप द्वितीय को युद्व में परास्त किया। मुंज ने कलचूरी शासक युवराज द्वितीय को पराजित कर मार दिया।

➣ कालांतर में मुंज राष्ट्रकूट सेनाओं द्वारा पराजित किया गया तथा बन्दी बना लिया गया। चालुक्यराज तैल ने नर्मदा नदी तक परमार राज्य के दक्षिणी भाग पर अधिकार कर लिया।

➣ मुंज को तैलप द्वितीय की बहिन मृणालवती से कारागार में प्रेम हो गया। लेकिन मृणालवती ने मुंज को धोखा दे दिया। कारागार में ही परमार नेरश मुंज का वध करवा दिया गया।

कौथेम दानपत्र से विदित होता है कि वाक्पति मुंज ने हूणों को भी पराजित किया था।

➣ मुंज एक प्रतिभावान कवि व विद्वानों का संरक्षक था। उसके दरबार में नवसाहसांक चरित के लेखक पद्यगुप्त, दशरूपक के लेखक धनंजय’, दशोरूपावलोक तथा काल निर्णय के लेखक धनिक तथा शोभन, हलायुध एवं अमितगति आदि विद्वान रहते थे।

➣ अमितगति ने सुभाषित रत्न संदोह नामक ग्रन्थ लिखा। हलायुध ने पिंगलछन्द शास्त्र पर मृत संजीवनी नामक टीका तथा अभिधान रत्नमाला नामक ग्रन्थ की रचना की।

➣ मुंज की राजसभा में महासेन नामक विद्वान ने प्रद्युम्नचरित नामक ग्रन्थ लिखा।

➣ वाक्पति मुंज ने धार में अपने नाम से मुज सागर नामक तालाब का निर्माण कराया था।

➣ मुंज ने पृथ्वी वल्लभ, श्री वल्लभ और अमोघवर्ष जैसी राष्ट्रकूट शासकों की उपाधियां धारण की।

➣ वाक्पति मुंज के बाद उसका छोटा भाई सिंधु परमार वंश का शासक हुआ।

सिन्धुराज (994 – 1010 ई.) : साम्राज्य सुदृढ़ीकरण

➣ मुंज के कोई पुत्र नहीं थे अतः उसकी मृत्यु के बाद उसका छोटा भाई सिंधुराज शासक बना। नवसाहसांक चरित में इसी की जीवनी है। उसने कुमार नारायण, साहसांक आदि उपाधियां धारण की।

➣ उसका समकालीन कल्याणी का चालुक्य नरेश सत्याश्रय (997-1008ई.) था। सिन्धुराज ने चालुक्य नरेश सत्याश्रय को पराजित कर अपने भाई की हत्या का बदला लिया।

➣ अनुग्रहीत नाग शासक ने सिंधुराज के साथ अपनी कन्या शशिप्रभा का विवाह कर दिया।

➣ गुजरात के चालुक्य शासक मूलराज प्रथम के पुत्र चामुण्डराज के द्वारा सिंधुराज पराजित हुआ।

राजा भोज (1010 – 1055 ई.) : परमार वंश का स्वर्णकाल

➣ भोज परमार मालवा के परमार अथवा पवार वंश का 9वाँ राजा था। वह सिंधुराज का पुत्र था। उसने नवसाहसाक अर्थात् नव विक्रमादित्य की पदवी धारण की थी।

➣ भोज ने उज्जैन के स्थान पर धारा को अपनी राजधानी बनायी।

➣ भोज मालवा के परमार वंश का यशस्वी राजा था। उदयपुर प्रशस्ति के अनुसार, उसने तुरूष्कों (तुर्कों) को पराजित किया। उसने 1008 ई. में महमूद गजनवी के विरुद्ध शासक आनंदपाल को सैनिक सहायता दी थी।

कुलचंद्र, साढ़ तथा तरादित्य इसके सेनापति थे, जिनकी सहायता से भोज ने राज्य संचालन सुचारु रूप से किया।

➣ वाक्पति मुंज की ही भाँति भोज भी पश्चिमी भारत में एक साम्राज्य स्थापित करना चाहा। उसने अपने सेनापति कुलचंद्र को गुजरात के विरुद्ध युद्ध करने के लिए भेजा।

➣ इस समय वहां भीम का शासनकाल था। कुलचंद्र ने पूरे प्रदेश पर विजय प्राप्त की तथा उसकी राजधानी अनहिलपट्टण (अन्हिलवाड़) को लूटा (मेरुतुंग के प्रबन्धचिन्तामणि के अनुसार)।

➣ भोज परमार ने राजस्थान में शाकंभरी के चाहमनों (चौहान) के विरुद्ध भी युद्ध की घोषणा की और तत्कालीन राजा चाहमान वीर्यराम को हराया।

➣ भोज, चालुक्यों से बदला लेन के लिए दक्षिण की ओर बढ़ा। उसने दाहल के कलचुरी गांगेयदेव तथा तंजौर के राजेंद्र चोल से संधि की ओर चालुक्य जयसिंह द्वितीय पर भी आक्रमण कर दिया,

➣ परंतु तत्कालीन राजा चालुक्य जयसिंह द्वितीय ने बहादुरी से सामना किया और अपना राज्य बचा लिया।

सन 1044 ई. में जयसिंह के पुत्र सोमेश्वर द्वितीय ने परमारों से फिर शत्रुता कर ली और मालव राज्य पर आक्रमण कर भोज को भागने के लिये बाध्य कर दिया।

धारानगरी पर अधिकार कर लेने के बाद उसने आग लगा दी, परंतु कुछ ही दिनों बाद सोमेश्वर ने मालव छोड़ दिया और भोज ने राजधानी में लोटकर फिर सत्ताधिकार प्राप्त कर लिया।

चालुक्य राज चामुण्डराय के पुत्र एवं उत्तराधिकारी बल्लभराज ने भोज पर आक्रमण कर दिया, किन्तु रास्ते में ही चेचक से उसकी मृत्यु हो गई।

➣ इसके बाद वल्लभराज के छोटे भाई दुर्लभराज ने सत्ता की बागडोर अपन हाथों में ली। कुछ समय बाद भोज ने उसे भी युद्ध में हराया।

➣ अपने शासन काल के अंतिम वर्षों में भोज परमार को गुजरात के चालुक्य राजा तथा चन्देल शासक विद्याधर की संयुक्त सेनाओं ने लगभग 1060 ई. में भोज परमार को पराजित कर दिया।

➣ भोज के अन्तिम समय में कलचुरि नरेश लक्ष्मीकर्ण और गुजरात के नरेश भीम प्रथम ने एक संघ बनाकर उसे पराजित किया व उसकी राजधानी धारा नगरी को लूटा। भोज की इसी अभियान के समय मृत्यु हो गई।

➣ भोज परमार की मृत्यु पर यह कहावत प्रचलित हो गई, जिसका उल्लेख धनपाल की तिलकमंजरी में है। उसकी मृत्यु पर यह कहावत प्रचलित हो गई है कि अद्य धारा निराधार निरालम्बा सरस्वती (विद्या और विद्वान दोनों निराश्रित हो गये ) ।

कविराज भोज

➣ भोज अपनी विद्वता के कारण कविराज की उपाधि से विख्यात था। परमार भोज को मध्ययुग का विक्रमादित्य कहा जाता है।

➣ कहा जाता है कि उसने विविध विषयों-चिकित्साशास्त्र,खगोलशास्त्र, धर्म, व्याकरण, स्थापत्यशास्त्र आदि पर बीस से अधिक ग्रंथों की रचना की।

➣ उसने विविध विषयों पर अनेक ग्रन्थ लिखे जिनमें व्यवहारमंजरी, शृंगार प्रकाश, शृंगार मंजरी, चंपुरामायण, अवनिकुमार, कोदण्ड काव्य, तत्व प्रकाश, “आयुर्वेद सर्वस्व”, स्थापत्य शास्त्र पर समरांगण सूत्र धार आदि प्रमुख हैं।

➣ इसके अतिरिक्त भोज की अन्य प्रसिद्ध पुस्तकें सरस्वती कंठाभरण, विद्याविनोद, राजमार्तण्ड, युक्ति कल्प तरू, सिद्धान्त संग्रह, योग सूत्र वृत्ति, चारूचर्चा, आदित्य प्रताप सिद्धान्त, राजमृगांक, व्यवहार समुच्चय, शब्दानुशासन, नाममालिका है। युक्ति कल्प तरू में विविध प्रकार की नावों के निर्माण की चर्चा है।

➣ परमार शासक भोज ने समरांगणसूत्रधार में विभिन्न प्रकार के काल्पनिक वैज्ञानिक उपकरणों का उल्लेख किया है।

➣ भोज द्वारा लिखित ग्रंथों में चिकित्सा शास्त्र पर आयुर्वेदसर्वस्व तथा स्थापत्य शास्त्र पर समरांगणसूत्रधार विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

➣ भोज ने शैव धर्म से संबंधित पुस्तक तत्व परीक्षा लिखी। भोज के दरबारी कवि उवट ने मंत्र भाष्य लिखा तथा वैदिक साहित्य पर टीका लिखी।

आइने अकबरी के अनुसार उसकी राजसभा में 500 विद्वान थे। इनमें भास्कर भट्ट, दामोदर मिश्रधनपाल प्रमुख थे। जैन लेखक धनपाल ने तिलक मंजरी तथा पाइयलच्छीमाला की रचना की।

➣ तिलक मंजरी धनपाल की पुत्री का भी नाम था। मूल ग्रन्थ जल कर नष्ट होने पर तिलक मंजरी ने इसे अपने पिता से स्मृति के आधार पर पुनः लिखवाया। अतः इसका नाम तिलक मंजरी रखा गया।

➣ 11वीं शताब्दी में धारा मध्यभारत में संस्कृत शिक्षा का सबसे बड़ा केन्द्र था। भोज ने धारा में भोजशाला नामक संस्कृत महाविद्यालय (सरस्वती कण्ठाभरण) की स्थापना कर उसमें वाग्देवी (सरस्वती) की प्रतिमा स्थापित की। वाग्देवी की प्रतिमा जो ज्ञानपीठ पुरस्कार का प्रतीक चिन्ह है, वह भोज द्वारा स्थापित वाग्देवी की प्रतिमा से ली गई है।

➣ भोज की सभा का नाम भुवन विजय था। भोज ने चित्तौड़ में त्रिभुवननारायण मन्दिर (शिव मन्दिर) बनवाया।

➣ भोज ने अपने नाम पर भोजपुर नगर बसाया तथा एक बड़े भोजसर नामक तालाब को निर्मित करवाया, जिसका क्षेत्रफल 250 वर्ग मील से भी अधिक विस्तृत था।

अन्य

➣ परमार शासक नरवर्मन (1093-1133 ई.) ने निर्वाण नारायण की उपाधि धारण की।

➣ अन्ततः 1305 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने महलक देव परमार को परास्त कर मालवा पर अधिकार कर लिया।

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