कलचुरि वंश (9वीं – 11वीं शताब्दी) : मध्य भारत की शक्ति
➣ कलचुरी वंश की स्थापना कोकल्ल प्रथम ने लगभग 845 ई. में की थी। उसने त्रिपुरी को अपनी राजधानी बनाया था। कलचुरि वंश को चेदि या हैहय वंश के नाम से भी पुकारा जाता है।
➣ कलचुरी सम्भवतः चन्द्रवंशी क्षत्रिय थे। कलचुरि अपने को कीर्तिवीर्य अर्जुन का वशंज मानते हैं। कलचुरि नरेश शैव धर्म के अनुयायी थे।
➣ कोकल्ल ने प्रतिहार शासक भोज एवं उसके सामन्तों को युद्ध में हराया था। उसने तुरुष्क, वंग एवं कोंकण पर भी अधिकार कर लिया था।
➣ विलहारी लेख में कोकल्ल के विषय में कहा गया है कि समस्त पृथ्वी को विजित कर उसने दक्षिण में कृष्णराज एवं उत्तर में भोज को अपने दो कीर्ति स्तम्भ के रूप में स्थापित किया।”
➣ कोकल्ल के 18 पुत्रों में से उसका बड़ा पुत्र शंकरगण अगला कलचुरी शासक बना था।
| शासक | शासनकाल | परिचय / प्रमुख तथ्य |
|---|---|---|
| शंकरगण | 878 – 888 ई. | कलचुरि वंश का प्रारंभिक शक्तिशाली शासक, मध्य भारत क्षेत्र में सत्ता मजबूत करने का प्रयास किया। |
| युवराज प्रथम | 915 – 945 ई. | साम्राज्य के विस्तार और प्रशासनिक स्थिरता का काल, कलचुरि शक्ति को मजबूत किया। |
| लक्ष्मणराज | 945 ई. | अल्पकालीन शासक, सीमित समय के कारण प्रभाव कम रहा लेकिन सत्ता निरंतरता बनी रही। |
| गांगेयदेव विक्रमादित्य | 1019 – 1041 ई. | सबसे शक्तिशाली कलचुरि शासकों में से एक, उत्तरी भारत में प्रभाव बढ़ाया और “विक्रमादित्य” उपाधि धारण की। |
| लक्ष्मीकर्ण | 1040 – 1070 ई. | महान विस्तारवादी शासक, कलचुरि वंश का स्वर्णकाल। चेदि, काशी और आसपास के क्षेत्रों में शक्ति स्थापित की। |
शंकरगण (878 – 888 ई.) : प्रारंभिक कलचुरि विस्तार
➣ शंकरगण ने दक्षिणी कोशल के शासक को पराजित कर उसने पाली पर अधिकार कर लिया था ।
➣ उसकी मृत्यु के बाद इसके दो पुत्रों- बालहर्ष एवं चुवराज प्रथम। बालहर्ष का शासन अल्पकालीन रहा। उसके बाद युवराज प्रथम केयूर वर्ष की उपाधि धारण कर सिंहासन पर बैठा।
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युवराज प्रथम (915 – 945 ई.) : साम्राज्य सुदृढ़ीकरण
➣ दसवीं शताब्दी के मध्य युवराज प्रथम महत्त्वपूर्ण राजा हुआ। उसने गौड़ एवं कलिंग को युद्ध में परास्त कर दिया। उसने लाट प्रदेश की भी विजय की।
➣ इसके शासनकाल में राजशेखर कन्नौज छोड़कर त्रिपुरी आ गया। युवराज प्रथम के राजदरबार में रहते हुए ही राजशेखर में अपने दो ग्रंथों- काव्यमीमांसा एवं विद्धसालभंजिका की रचना की।
➣ भेड़ाघाट (जबलपुर) का प्रसिद्ध चौसठ योगिनी मन्दिर का निर्माण युवराज प्रथम ने कराया था। इसे गोलकीमठ भी कहते है।
➣ राजशेखर कृत सिद्धसालभंजिका में युवराज को उज्जयिनी भुजंग कहा गया है।
➣ युवराज प्रथम के बाद क्रमशः लक्ष्मण राज, शंकरगण तृतीय, युवराज द्वितीय और कोक्कल द्वितीय (990- 1019 ई.) ने शासन किया।
लक्ष्मणराज (945 ई.) : अल्पकालीन शासन
➣ युवराज प्रथम का पुत्र .एवं उत्तराधिकारी लक्ष्मणराज विस्तावादी प्रवृत्ति का शासक था। उसने पूर्व में उड़ीसा, बंगाल एवं कोशल को जीता।
➣ उड़ीसा अभियान में लक्ष्मणराज ने वहां के शासक से सोने एवं मणियों से निर्मित कलिया नाग को छीन लिया था। अपने विजय अभियान के अन्तर्गत ही लक्ष्मणराज ने सोमनाथ पत्तन को जीता।
➣ वह शैव मतावलम्बी था। लक्ष्मणराज के दो पुत्र शंकरगण द्वितीय एवं युवराज द्वितीय निर्बल शासक थे।
➣ युवराज द्वितीय के पुत्र कोकल्ल द्वितीय (990- 1019 ई.) ने कलचुरी वंश के सिंहासन पर बैठ के सिंहासन पर बैठ कर कलचुरियों की खोई प्रतिष्ठा को पुनः क़ायम किया।
➣ उसने चामुण्डाराज नामक चालुक्य राजा को पराजित किया था। चालुक्यों के अतिरिक्त गौड़ एवं कुन्तल के अभियानों में भी सफलता प्राप्त हुई।
गांगेयदेव विक्रमादित्य (1019 – 1041 ई.) : कलचुरि शक्ति का उत्कर्ष
➣ वह कलचुरी वंश के कोकल्ल द्वितीय का पुत्र था। अपने पूर्वजों के समान ही गांगेयदेव भी शैवमतानुयायी था।
➣ गांगेयदेव एक योग्य, साहसी और महत्वाकांक्षी शासक के रूप में जाना जाता था। उसने विक्रमादित्य की उपाधि धारण करते हुए उत्तर भारत में सर्वशक्तिमान सार्वभौम सम्राट की भाँति स्थिति प्राप्त करने की पूरी कोशिश की।
➣ गांगेयदेव ने भोज परमार एवं राजेन्द्र चोल के साथ एक संघ बनाकर चालुक्य नरेश जयसिंह पर आक्रमण किया, पर सफलता उसके हाथ नहीं लगी।
➣ बाद के समय में उसने अंग, उत्कल, काशी एवं प्रयाग को जीत कर कलचुरी राज्य का विस्तार किया।
➣ 1019 ई. में गांगेयदेव ने सुदूर तिरहुत (आधुनिक उत्तरी बिहार) तक अपनी प्रभुसत्ता स्थापित की। उसने पश्चिमोत्तर के विदेशी हमलावरों और बंगाल के पाल राजाओं से प्रयाग और वाराणसी नगरों की रक्षा की थी।
➣ पूर्व मध्यकाल में स्वर्ण सिक्कों के अप्रचलित हो जाने के बाद गांगेय देव कलचुरि ने उन्हें उत्तर भारत में प्रारम्भ करवाया। गांगेय देव के सिक्कों पर बैठी हुई लक्ष्मी का चिह्न अंकित है।
लक्ष्मीकर्ण (1040 – 1070 ई.) : चंदेल एवं पाल संघर्ष
➣ वह गांगेय देव का पुत्र था और उसके बाद सिंहसानारूढ़ हुआ। उसने चालुक्य नरेश भीम के साथ मिलकर मालवा के परमार वंश के शासक भोज को परास्त किया।
➣ कलिंग विजय के उपरान्त कर्णदेव ने त्रिकलिंगाधिपति की उपाधि धारण की थी। उसका विवाह हूण राजकुमारी आंवलदेवी से हुआ, इससे यशकर्ण पुत्र हुआ।
➣ चन्देल नरेश कीर्तिवर्मन से पराजित होने पर उसकी शक्ति कमज़ोर हो गई और यही से कलचुरी साम्राज्य लड़खड़ाने लगा, जिसका अन्त चन्देल शासक त्रैलोक्य वर्मन ने विजयसिंह को परास्त करके त्रिपुरी को अपने राज्य में मिलाकर कर दिया।
➣ दीपंकर अतिशा ने विग्रपाल तृतीय (1055-1070 ई.) एवं कलचुरी कर्ण के बीच कपाल सन्धि करवाई थी। विग्रहपाल तृतीय ने कर्ण की पुत्री यौवनाश्री से विवाह किया।
➣ कर्णदेव एवं विजयसिंह के मध्य कुछ अन्य कलचुरी शासक यश:कर्ण, गयकर्ण, नरसिंह, जयसिंह आदि हुए। इस वंश का अन्तिम शासक विजय सिंह था।
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