Subject: भारतीय इतिहास

  • प्रतिहार वंश (730-1036 ई.) : मिहिर भोज

    📚 विषय सूची

    प्रतिहार: भारत की सीमाओं के प्रहरी

    ➣ प्रतिहार वंश को गुर्जर प्रतिहार वंश कहा गया, क्योंकि ये गुर्जरों की ही एक शाखा थे, जिनकी उत्पत्ति गुजरात व दक्षिण-पश्चिम राजस्थान में हुई थी।

    अग्नि कुंड से उत्पन्न चार राजपूत वंश यथा प्रतिहार, चालुक्य, चौहान और परमार में से सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रतिहार वंश था जिसे गुर्जर-प्रतिहार भी कहा जाता है।

    सन 712 ई. में अरबों ने सिंध पर आधिपत्य जमा कर भारत विजय का मार्ग प्रशस्त कर दिया था। सन 725 ई. में अरबों जैसलमेर, मारवाड़, मांडलगढ और भडौच आदि इलाकों पर अपना आधिपत्य जमा लिया।

    ➣ ऐसे समय में दो शक्तियों का प्रादुर्भाव हुआ। एक गुर्जर-प्रतिहार एंव दूसरा गोहलोत।

    ➣ प्रतिहार शासक नागभाट ने जैसलमेर, मारवाड, मांडलगढ से अरबों को खदेड़कर जालौर में प्रतिहार राज्य की नींव डाली और बप्पा रायडे ने चित्तौड़ दुर्ग पर अधिकार कर सन 734 ई. में मेवाड़ में गहलौत वंश का वर्चश्व स्थापित किया।

    ➣ नागभट्ट प्रथम ने अरबों को पश्चिमी राजस्थान और मालवा से खदेड़ दिया। बापा ने यही कार्य मेवाड़ और उसके आसपास के प्रदेश से किया।

    ➣ दोनों राजपूती वंशो ने अरबी आक्रमणों को सिंध क्षेत्र से आगे नहीं बढ़ने दिया।

    गुर्जर प्रतिहारों ने विदेशियों के आक्रमण के समय भारत के द्वारपाल की भूमिका निभाई थी। ह्वेनसांग ने गुर्जर राज्य को पश्चिमी भारत का दूसरा सबसे बड़ा राज्य कहा है।

    ➣ ग्वालियर प्रशस्ति में गुर्जर प्रतिहार शासकों को श्रीराम के अनुज लक्ष्मण का वंशज बताया गया है।

    ➣ गुर्जर जाति का सर्वप्रथम उल्लेख पुलकेशिन द्वितीय के एहोल अभिलेख में हुआ है उसने प्रतिहार साम्राज्य का पुनर्निर्माण किया तथा लगभग 838 ई. में कन्नौज पर फिर से अधिकार कर लिया। यह नगर लगभग एक सदी तक प्रतिहार साम्राज्य की राजधानी रहा।

    ➣ कक्कुक के घटियाले अभिलेख में प्रतिहारों को ब्राह्मण बताया गया है। बाण के हर्षचरित में भी गुर्जर जाति का उल्लेख मिलता है।

    ➣ इस वंश का आदिपुरूष हरिशचन्द्र (रोहिलद्धि) नामक व्यक्ति था।, किन्तु इस वंश का प्रथम वास्तविक शासक नागभट्ट प्रथम था।

    ➣ पाल वंश का वह पहला शासक वत्सराज था, जिसने सम्राट की उपाधि धारण की इसने ही त्रि – पक्षीय का आरम्भ किया था।

    ➣ प्रतिहार साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक और इस राजवंश का महानतम शासक भोज (836-885 ई.) था। जो मिहिरभोज से विख्यात हुआ।

    शासक शासनकाल राजधानी / क्षेत्र विस्तार प्रमुख युद्ध / संघर्ष परिचय / प्रमुख तथ्य
    नागभट्ट प्रथम (730-756 ई.) 730 – 756 ई. राजस्थान, मालवा और गुजरात क्षेत्र अरब सेनाओं के विरुद्ध रक्षा अरब आक्रमणों को रोका और प्रतिहार वंश की नींव रखी। इन्हें “अरब आक्रमणों का रक्षक” माना जाता है।
    वत्सराज 783 – 795 ई. कन्नौज और उत्तर भारत हेतु संघर्ष त्रिपक्षीय संघर्ष की शुरुआत पाल और राष्ट्रकूट वंश के साथ कन्नौज पर अधिकार हेतु संघर्ष शुरू किया।
    नागभट्ट द्वितीय 795 – 833 ई. कन्नौज और उत्तर भारत पाल वंश के विरुद्ध संघर्ष कन्नौज पर विजय प्राप्त कर प्रतिहार शक्ति को मजबूत किया।
    रामभद्र 833 – 836 ई. सीमित क्षेत्र आंतरिक संघर्ष कमजोर शासन और आंतरिक अस्थिरता का दौर।
    मिहिरभोज (भोज प्रथम) 836 – 889 ई. कन्नौज केंद्र, विशाल उत्तर भारत अरब आक्रमणों और पाल वंश से संघर्ष प्रतिहार वंश का स्वर्णकाल, विशाल साम्राज्य विस्तार और मजबूत रक्षा नीति।
    महेन्द्र पाल 890 – 910 ई. कन्नौज, बिहार और उत्तर भारत पाल वंश से संघर्ष साम्राज्य को स्थिर रखा और शक्ति बनाए रखी।
    महिपाल 914 – 944 ई. कन्नौज और सीमित क्षेत्र राष्ट्रकूट आक्रमण साम्राज्य बचाने का प्रयास किया लेकिन पतन शुरू हुआ।
    भोज द्वितीय सीमित क्षेत्र आंतरिक विद्रोह कमजोर शासन और आंतरिक संघर्ष।
    विनायकपाल उत्तर भारत का छोटा भाग क्षेत्रीय विद्रोह साम्राज्य तेजी से कमजोर हुआ।
    महेन्द्रपाल द्वितीय बहुत सीमित क्षेत्र आंतरिक विघटन केंद्रीय सत्ता लगभग समाप्त।
    देवपाल 940 – 955 ई. कन्नौज का कमजोर नियंत्रण पाल वंश से दबाव पतनकालीन शासक।
    महिपाल द्वितीय नाममात्र का क्षेत्र आक्रमण और विद्रोह साम्राज्य लगभग समाप्त अवस्था में।
    विजयपाल बहुत सीमित क्षेत्र केंद्रीय नियंत्रण का अभाव नाममात्र का शासन।
    राज्यपाल खंडित साम्राज्य लगातार आक्रमण सत्ता कमजोर होती गई।
    यशपाल – 1036 ई. कन्नौज और आसपास का अंतिम क्षेत्र गज़नवी आक्रमण का प्रभाव प्रतिहार वंश के अंतिम शासक, इनके बाद वंश समाप्त हो गया।

    नागभट्ट प्रथम (730 – 756 ई.) : अरब आक्रमणों का प्रतिरोध

    ➣ नागभट्ट प्रथम गुर्जर प्रतिहार वंश का प्रथम महत्त्वपूर्ण शासक था। नागभट्ट प्रथम प्रतिहारों की भीनमाल (जालौर) एवं उज्जैन शाखा का संस्थापक था।

    ➣ नागभट्ट प्रथम ने राजधानी मण्डौर से मेड़ता स्थानान्तरित की। मण्डौर को दूसरी राजधानी तथा भीनमाल को तीसरी राजधानी बनाया। इसके बाद उज्जैन को प्रतिहारों का केन्द्र बनाया।

    ➣ उसके विषय में ग्वालियर अभिलेख से जानकारी मिलती है, जिसके अनुसार उसने अरबों को सिंध से आगे नहीं बढ़ने दिया। अरबों का नेतृत्व जुनैद कर रहा था।

    ➣ इसी अभिलेख में बताया गया है कि, वह नारायण रूप में लोगों की रक्षा के लिए उपस्थित हुआ था तथा उसे मलेच्छों का नाशक बताया गया है।

    ➣ राष्ट्रकूट नरेश अमोघवर्ष के संजन ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि दन्तिदुर्ग ने एक महादान (हिरण्य गर्भदान यज्ञ) किया जिसमें उसने गुर्जर प्रतिहार नरेश नागभट्ट प्रथम को अवन्ति/उज्जैन में प्रतिहार (द्वारपाल) बनाया।

    ➣ नागभट्ट प्रथम के दो भतीजे कक्कुक एवं देवराज के शासन के बाद देवराज का पुत्र वत्सराज गद्दी पर बैठा।

    वत्सराज (783 – 795 ई.) : कन्नौज पर अधिकार हेतु त्रिकोण संघर्ष

    ➣ वत्सराज को प्रतिहार साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक कहा जाता है। वह सम्राट की उपाधी धारण करने वाला गुर्जर प्रतिहार वंश का पहला शासक था।

    ➣ उसने राजस्थान के मध्य भाग एवं उत्तर भारत के पूर्वी भाग को जीतकर वत्सराज ने अपने राज्य में मिला लिया।

    ➣ वत्सराज के समय से कन्नौज के लिए त्रिपक्षीय संघर्ष शुरू हुआ। उसने पाल शासक धर्मपाल को मुंगेर (मुद्गगिरी) के युद्ध में पराजित किया। किन्तु राष्ट्रकूट शासक ध्रुव से पराजित हुआ।

    वानोडिन्डोरी तथा राधानपुर लेखों से ज्ञात होता है कि ध्रुव ने वत्सराज को पराजित करके राजपूताना में शरण लेने को विवश किया और वे दो राजछत्र भी छीन लिए जिसे उन्होंने गौडराज से छीना था।

    नागभट्ट द्वितीय (795 – 833 ई.) : प्रतिहार सत्ता का विस्तार

    ➣ यह वत्सराज का पुत्र एवं उसका उत्तराधिकारी था। उसने गुर्जर प्रतिहार वंश की प्रतिष्ठा को बहुत आगे बढाई।

    ➣ वत्सराज के पुत्र नागभट्ट द्वितीय ने भी त्रि-पक्षीय संघर्ष में भाग लिया और पाल शासक धर्मपाल को पराजित कर कन्नौज को अपनी राजधानी बनायी, परन्तु उसे राष्ट्रकूट नरेश गोविन्द तृतीय से परास्त होना पड़ा।

    ग्वालियर अभिलेख के अनुसार उसने कन्नौज से चक्रायुध को भगाकर उसे अपनी राजधानी बनाया।

    ➣ नागभट्ट द्वितीय ने सम्राट की हैसियत से परभट्टारक, महाराजाधिराज तथा परमेश्वर आदि की उपाधियाँ धारण की थीं।

    ➣ ग्वालियर अभिलेखों में नागभट्ट द्वितीय को तुरुष्क (मुसलमान) , किरात, मत्स्य, वत्स का विजेता कहा गया है।

    चन्द्रप्रभास कृत प्रभावकचरित से जानकारी मिलती है कि, नागभट्ट द्वितीय ने 833 ई. में गंगा नदी में जल समाधि के द्वारा अपना प्राण त्याग किया।

    ➣ नागभट्ट द्वितीय के बाद कुछ समय (833 से 836 ई.) के लिए उसका पुत्र रामभद्र गद्दी पर बैठा। जिसे पाल वंश से परास्त होना पड़ा।

    मिहिर भोज (836 – 885 ई.) : प्रतिहार वंश का स्वर्णकाल

    रामभद्र के तीन वर्ष के निर्बल शासन के पश्चात् मिहिरभोज प्रथम शासक बना। यह इस वंश का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण शासक था। कल्हण एवं अरब यात्री सुलेमान भी हमें उसके समय की जानकारी देते हैं।

    ➣ भोज प्रथम अथवा मिहिरभोज गुर्जर प्रतिहार वंश का सर्वाधिक प्रतापी एवं महान् शासक था। उसका मूल नाम मिहिर था और भोज कुल नाम अथवा उपनाम था।

    ➣ उसका साम्राज्य काठियावाड़, पंजाब, मालवा तथा मध्य देश तक फैला था। राज्य उत्तर में हिमालय, दक्षिण में नर्मदा, पूर्व में बंगाल और पश्चिम में सतलुज तक विस्तृत था।

    ➣ भोज प्रथम विशेष रूप से भगवान विष्णु के वराह अवतार का उपासक था। उसके सिक्कों पर आदि-वराह को उत्कीर्ण प्राप्त होता है।

    ➣ भोज प्रथम ने 836 ई. के लगभग कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया, जो आगामी सौ वर्षो तक प्रतिहारों की राजधानी बनी रही।

    ➣ उसे बंगाल के पाल शासक धर्मपाल से पराजित होना पड़ा। 842 -60 ई. के बीच उसे राष्ट्रकूट शासक ध्रुव ने भी पराजित किया।

    ➣ राष्ट्रकूट वंश के अमोधवर्ष एवं कृष्ण द्वितीय मिहिरभोज के समकालीन थे। कृष्ण द्वितीय को मिहिरभोज ने नर्मदा तट पर पराजित किया।

    ➣ पाल वंश के शासक देवपाल की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारी नारायण को भोज प्रथम ने परास्त कर पाल राज्य के एक बड़े भू-भाग पर अधिकार कर लिया।

    ➣ उसके शासन काल का विवरण अरब यात्री सुलेमान से मिलता है। अरब यात्री सुलेमान उसे बरुआ कहता है।

    ➣ भोज प्रथम के बारे में सुलेमान कहता है कि इस राजा के पास बहुत बड़ी सेना है और अन्य किसी दूसरे राजा के पास उसकी जैसी सेना नहीं है। भारत में भोज के राज्य के अतिरिक्त कोई दूसरा राज्य नहीं है, जो डाकुओं से इतना सुरक्षित हो।”

    ➣ अरब यात्री सुलेमान के अनुसार वह अरबों का स्वाभाविक शत्रु था। उसने पश्चिम में अरबों का प्रसार रोक दिया था।

    ➣ भोज वैष्णव धर्म का अनुयायी था। भोज प्रथम ने आदिवराह एवं प्रभास की उपाधियाँ धारण की थीं– ‘मिहिरभोज’ (ग्वालियर अभिलेख में), ‘प्रभास’ (दौलतपुर अभिलेख में), ‘आदिवराह’ (ग्वालियर चतुर्भुज अभिलेखों) ।

    ➣ शून्य का प्रथम अभिलेखीय प्रमाण मिहिरभोज (भोज प्रतिहार) के ग्वालियर अभिलेख से मिलता है।

    महेंद्रपाल प्रथम (885 – 910 ई.) : साम्राज्य विस्तार एवं स्थिरता

    ➣ मिहिरभोज के पश्चात उसका पुत्र महेन्द्रपाल प्रथम शासक बना। उसने गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य का विस्तार मगध एवं उत्तरी बंगाल तक किया।

    ➣ लेखों के अनुसार उसे परमभट्टारक, महाराजाधिराज तथा परमेश्वर कहा गया है।

    ➣ उसने राष्ट्रकूट शासक इन्द्र तृतीय को पराजित किया, किन्तु उसे कश्मीरी शासक शंकर वर्मन से युद्ध में पराजित होना पड़ा।

    ➣ महेन्द्रपाल के गुरु संस्कृत के प्रसिद्ध विद्वान् राजशेखर थे। राजशेखर ने कर्पूर मंजरी, बालरामायण, बालभारत (प्रचंड पांडव), विद्धसाल भंजिका (ये सभी नाटक हैं), काव्यमीमांसा, हरविलास और भुवनकोष (ये तीनों काव्य ग्रन्थ हैं) आदि ग्रन्थों की रचना की।

    राजशेखर ने अपनी रचनाओं में महेन्द्र पाल का वर्णन निर्भयराज और निर्भय नरेन्द्र के रूप में किया है।

    ➣ राजशेखर ने कर्पूरमन्जरी की रचना अपनी पत्नी अवन्तिसुन्दरी के आग्रह पर की थी।

    ➣ राजशेखर ने प्रतिहार नरेश महेन्द्रपाल को निर्भयराज, रघुकुल तिलकरघुकुल चूड़ा मणि तथा महिपाल प्रथम को रघुवंश मुकुट मणि तथा रघुकुल मुक्ता मणि कहा है।

    महिपाल प्रथम (910 – 940 ई.) : प्रतिहार शक्ति का पतन प्रारंभ

    ➣ महिपाल के शासन काल में लगभग 915-918 ई में राष्ट्रकूट नरेश इन्द्र तृतीय ने कन्नौज पर आक्रमण कर नगर को उजाड़ दिया।

    ➣ उसके शासन काल के दौरान (915-916 ई.) में ही बग़दाद निवासी अलमसूदी गुजरात आया था। उसने गुर्जर प्रतिहारों को अलगुर्जर एवं राजा को बौरा कहा,जो सम्भवतः आदि वराह का विशुद्ध उच्चारण है।

    राजशेखर महीपाल का भी राजगुरु था। राजशेखर ने महीपाल को आर्यावर्त का महाराजाधिराज तथा रघुकुल मुक्तामणि कहा है।

    ➣ महिपाल के समय में ही गुर्जर-प्रतिहार राज्य का पतन होने लगा। उसके बाद के उत्तराधिकारियों भोज द्वितीय, विनायक पाल, महेंद्रपाल द्वितीय, देवपाल, महिपाल द्वितीय, विजयपाल एवं राज्यपाल ने जैसे-तैसे 1013 ई. तक अपने राज्य को कायम रखा।

    अन्य उत्तराधिकारी

    ➣ लगभग 963 ई. में कृष्ण तृतीय ने गुर्जर प्रतिहार वंश के अधिकार से मध्य भारत के क्षेत्र को छीन लिया, इससे कन्नौज का केन्द्रीय शक्ति के रूप में ह्मस हो गया।

    महमूद गजनवी के हमले के समय कन्नौज का शासक राज्यपाल था। महमूद गजनवी से पराजित होकर राज्यपाल ने कन्नौज छोड़कर बारी को राजधानी बनाया।

    ➣ महमूद गजनवी के सामने 1018 ई. में आत्मसमर्पण करने से राजपूत राजा काफी नाराज हुए और गजनवी के लौटने के बाद कालिंजर के चंदेल राजा गंड देव के नेतृत्व में राजपूतों ने राज्यपाल को मार डाला।

    ➣ राज्यपाल की मृत्यु के बाद उसके स्थान पर राजपूतों ने त्रिलोचनपाल को कन्नौज की गद्दी पर बिठाया।

    ➣ यशपाल इस वंश का अंतिम शासक था। 1036 राष्ट्रकूटों ने कन्नौज पर अधिकार कर लिया

    ➣ प्रतिहारों के सामन्त गुजरात के चालुक्य, जेजाकभुक्ति के चन्देल, ग्वालियर के कच्छपघात, मध्यभारत के कलचुरी, मालवा के परमार, दक्षिण भारत के गुहिल तथा शॉकम्भरी के चौहान (चाहमान) आदि स्वतन्त्र हो गये।

    ➣ कन्नौज में 11वीं शताब्दी के द्वितीय चतुर्थांश में गहड़वाल अथवा राठौर वंश ने गुर्जर-प्रतिहार वंश को सदा के लिए समाप्त कर दिया।

  • कश्मीर के राजवंश (7वीं शताब्दी-1339 ई.)

    📚 विषय सूची

    ➣ कश्मीर के हिंदू राज्य का इतिहास कल्हण की राजतरंगिणी से ज्ञात होता है। यह संस्कृत में लिखित प्रथम ऐतिहासिक रचना है।

    ➣ कल्हण जाति से ब्राह्मण था। राजतरंगिणी की रचना उसने जयसिंह (1127-1159 ई.) के शासनकाल में पूरी की थी।

    ➣ 7वीं शताब्दी-12वीं शताब्दी के मध्य कश्मीर में तीन राजवंशों ने शासन किया जिनका क्रम इस प्रकार है।
    i. कार्कोट वंश (7वीं शताब्दी-8 वीं शताब्दी)
    ii. उत्पल वंश (855-1003.ई.)
    iii. लोहार वंश (1003-1339 ई.)

    कार्कोट वंश

    ➣ 7वीं शताब्दी में दुर्लभवर्धन नामक व्यक्ति द्वारा कश्मीर में कार्कोट राजवंश की स्थापना की थी। चीनी वृत्तों में दुर्लभ वर्धन को तु-लोन-प नाम से पुकारा गया है।

    ➣ कर्कोटक वंश के प्रसिद्ध राजाओं में ललितादित्य (724-760 ई.) तथा जयापीड विनयादित्य (770-810 ई.) का नाम मुख्य रूप से लिया जाता है।

    ➣ दुर्लभवर्धन के पुत्र दुर्लभक (632-682 ई.) शासक बना इसने प्रतापदित्य की उपाधि धारण की तथा प्रतातपुर नामक नगर की स्थापना की। इसके अनेक सिक्के प्राप्त हुए हैं। इन पर इसे श्रीप्रताप कहा गया है।

    ➣ दुर्लभक का उत्तराधिकारी चन्द्रपीड था। चन्द्रापीड ने केवल 9 वर्ष तक शासन किया था। इसने अरबों तथा तुर्को के विरुद्ध सहायता के लिए 713 ई. में चीन के शासक के पास एक दूत भेजा था।

    ➣ वह एक न्यायप्रिय शासक था, किन्तु अन्त में अपने भाई तारापीड के षड्यन्त्रों का शिकार हुआ और मार डाला गया। तारापीड उसका उत्तराधिकारी हुआ।

    ललितादित्य मुक्तापीड (724-760 ई.)

    ➣ कश्मीर के शासकों में ललितादित्य मुक्तापीड सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था। वह एक साम्राज्यवादी शासक था।

    ➣ ललितादित्य ने तिब्बतियों, कम्बोजों, तुर्कों आदि को पराजित किया। उसकी विजय ने कश्मीर राज्य को गुप्तों के बाद भारत का सर्वाधिक शक्तिशाली राज्य बना दिया।

    ➣ उसने तिब्बतियों, कम्बोजों एवं तुर्को को पराजित किया। उसकी श्रेष्ठ उपलब्धि थी – कन्नौज नरेश यशोवर्मन की पराजय।

    ➣ उसने 733 ई. में कन्नौज के राजा यशोधर्मन को हराने के बाद उसके दरबारी कवियों भवभूति तथा वाक्पतिराज को ललितादित्य ने कश्मीर बुलाकर अपने दरबार में रखा।

    ह्वेनसांग के विवरण आधार पर कहा जाता है कि उसके राज्य की सीमा के अंतर्गत तक्षशिला, सिंहपुर, उरशा, पुंच एवं राजपूताना शामिल थे।

    ➣ विजेता होने के साथ ही ललितादित्य एक महान् निर्माता भी था। उसके महत्त्वपूर्ण निर्माण कार्यो में सूर्य का प्रसिद्ध मार्तण्ड मंदिर शामिल हैं। उसने कश्मीर में परिहासपुर नगर बसाया।

    ➣ धार्मिक दृष्टि से उदार होने के कारण उसने अनेक बौद्ध मठों एवं हिन्दू मंदिरों का निर्माण करवाया।

    जयापीड विनयादित्य (770 से 810 ई.)

    ➣ ललितादित्य के बाद उसका पुत्र जयापीड विनयादित्य सिंहासन पर बैठा। उसने कन्नौज शासक ब्रजायुध को हराकर अपने राज्य की सीमा का विस्तार किया।

    ➣ उसे विद्धानों के आश्रयदाता के रूप मं भी जाना जाता है। उसके राज दरबार को झीर, उद्भट्ट, दामोदर गुप्त आदि विद्धान सुशोभित करते थें।

    लगभग 810 ई. में उसकी मृत्यु के साथ ही कर्कोटक वंश का अंत हो गया।

    उत्पल वंश (855-1003.ई.)

    ➣ कार्कोट वंश के बाद कश्मीर में उत्पल वंश का शासन स्थापित हुआ। इस वंश की स्थापना अवन्तिवर्मन (855 ई-883ई.) ने अपने मंत्री शूर की सहायता से की।

    अवन्तिवर्मन एक लोकोपकारी शासक था जिसने कृषि की उन्नति के लिए नहरों का निर्माण करवाया। उसने अनेक नगरों के अंतर्गत अवन्तिपुरसुय्यापुरा (आधुनिक सोपार) निर्माण करवाया था।

    ➣ उसके दरबार में आनन्दवर्धन जैसे विद्वान भी रहते थे जिन्होंने काव्यशास्त्र पर प्रसिद्ध पुस्तक ध्वन्यालोक लिखी। अन्य कवि रत्नाकर ने हरिविजय’ की रचना की।

    ➣ अवन्ति वर्मन की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारियों के मध्य गृह युद्ध हुआ, जिसमें अवन्ति वर्मन का वैध उत्तराधिकारी शंकर वर्मन विजयी रहा।

    ➣ अवन्तिवर्मन के बाद उत्तराधिकार युद्ध में शंकर वर्मन (883 से 902ई.) विजयी हुआ। उसने अपने साम्राज्य विस्तार के अन्तर्गत दार्वाभिसार, त्रिगर्त एवं गुर्जर को जीता।

    शंकर वर्मन (885-902 ई.) को लगातार युद्ध करने के कारण धन की कमी का सामना करना पड़ा। इस समस्या को हल करने के लिए व कमी को पूरा करने के लिए उसने जनता (प्रजा) पर कई प्रकार के कर लगाये, जिसके कारण जनता की आर्थिक दुष्प्रभावित हुई।

    ➣ युद्धों के कारण अपने रिक्त खजाने को भरने के लिए उसने मन्दिरों की सम्पत्ति लूटी और राज्य द्वारा विद्या को प्रदान किये जाने वाले संरक्षण में भी कटौती कर दी।

    ➣ इन करों ने उसे प्रजा में अत्यन्त अलोकप्रिय बना दिया तथा उसे एक क्रूर तथा अत्याचारी शासक कहा जाने लगा।

    ➣ शंकरवर्मन की हत्या के बाद उसकी पत्नी सुगन्धा ने अपने पुत्र गोपालवर्मन (902-904 ई) की संरक्षिका के रूप में शासन किया। बाद में प्रभाकर नामक मंत्री द्वारा गोपालवर्मन की हत्या किये जाने पर सुगन्धा ने स्वतंत्र रूप से शासन किया।

    ➣ शंकर वर्मन की विधवा सुगंधा ने 914 ई. तक शासन किया। 904 ई. से 939 ई. के समय दरबार तान्त्रिन (सैनिक गुट) व दो गुटों में बंटा रहा। इसी गुटबन्दी में सुगन्धा की 914 ई. में हत्या कर दी गई।

    ➣ इस कुल के अंतिम राजा उन्मत्तावंती के अनौरस पुत्र सूरवर्मन द्वितीय ने केवल कुछ महीने ही राज किया। उत्पल वंश का अंत मंत्री प्रभाकरदेव द्वारा हुआ।

    यशस्कर वंश

    ➣ 939 ई. में उत्पल वंश के पतन के बाद ब्राह्मणों ने प्रभाकर के पुत्र यशस्कर (939 से 948 ई.) को राजा चुना।

    क्षेमेन्द्रगुप्त 950 ई. में गद्दी पर बैठा। इसका विवाह लोहार वंश की राजकुमारी दिद्दा से हुआ। दिद्दा के नाना काबुल के हिन्दूशाही वंश के राजा थे।

    ➣ क्षेमेन्द्रगुप्त के बाद कश्मीर की सत्ता व्यवहारिक रूप से रानी दिद्दा के हाथ में पचास वर्षों तक रही। वह एक महत्वाकांक्षी शासिका थी।

    ➣ दिद्दा ने 980 से 1003 ई. तक शासन किया। इससे पहले दिद्दा ने 958 से 980 ई. तक अपने अल्प वयस्क पुत्र अभिमन्यु की संरक्षिका के रूप में शासन किया।

    दिद्दा कश्मीर व भारतीय इतिहास की प्रसिद्ध महिला शासिका थी। उसने सिक्कों पर भी अपना नाम चलवाया एवं लक्ष्मी आकृति के सिक्के चलाये।

    1003 ई. में रानी की मृत्यु के बाद संग्रामराज शासक बना, जिसने कश्मीर में लोहार वंश की नींव रखी।

    लोहार वंश (1003-1028 ई.)

    ➣ इस वंश का संस्थापक संग्राम राज (1003-1028 ई.) था। संग्राम राज रानी दिद्दा का भतीजा था। उसकी मृत्यु के पश्चात उसने लोहार वंश की नीव रखी।

    ➣ संग्राम राज ने अपने मंत्री तुंग को भटिंडा के शाही शासक त्रिलोचन पाल की ओर से महमूद गजनवी से लड़ने के लिए भेजा था।

    ➣ संग्रामराज के बाद अनंत राजा हुआ। उसकी पत्नी सूर्यमती प्रशासन को सुधारने में उसकी सहायता करती थी।

    हर्ष (1089 से 1101 ई.)

    ➣ इस वंश का अन्य महत्त्वपूर्ण राजा हर्ष था। हर्ष में सद्गुणों व दुर्गुणों का विचित्र सम्मिश्रण था। अपनी विद्वत्ता के कारण वह दूसरे राज्यों में प्रसिद्ध हुआ। परंतु शासक के रूप में वह क्रूर व अत्याचारी था। कल्हण उसके अत्याचारों का वर्णन करता है।

    ➣ अपव्यय व आंतरिक विद्रोहों के कारण जब उसका राजशाही कोष रिक्त हो गया तो उसने राजकोष की पूर्ति के लिए मंदिरों को लूटा तथा अपनी प्रजा पर अनेक कर लगाए।

    कल्हण राजतरंगिणी का लेखक तथा हर्ष का आश्रित कवि था। उसने मन्दिर कोष जब्त करने के कारण हर्ष की आलोचना की। हर्ष को राजतरंगिणी में तुरूष्क और मूर्तिभंजक कहा गया है।

    ➣ राज्य में आन्तरिक अशान्ति के कारण हुए विद्रोह में लगभग 1101 ई. में उत्सल एवं सुस्सल नामक भाईयों ने हर्ष की हत्या कर दी।

    ➣ लोहार वंश का अंतिम शासक जयसिंह (1128-1155 ई.) था। उसने अपने शासनकाल में यवनों को परास्त किया। कल्हण को राजतरंगिणी का विवरण जयसिंह के शासन के साथ ही समाप्त हो जाता है।

    1339 ई. में कश्मीर तुर्को के कब्जे में आ गया। तुर्क शासकों में सर्वाधिक लोकप्रिय शासक जैनुल आबदीन था जिसे कश्मीर का अकबर कहा जाता है।

    कल्हण की राजतरंगिणी

    ➣ राजतरंगिणी कल्हण द्वारा रचित एक संस्कृत ग्रन्थ है, जिसकी रचना 1148 से 1150 ई. के बीच हुई।

    ➣ कल्हण ने अपनी राजतरंगिणी हर्ष के समय लिखना प्रारंभ किया और अंतिम लोहार राजा जयसिंह के शासनकाल में पूरा किया।

    ➣ यह ग्रंथ संस्कृत में ऐतिहासिक घटनाओं के क्रमबद्ध इतिहास लिखने का प्रथम प्रयास है। इसमें आदिकाल से लेकर 1151 ई. के आरम्भ तक के कश्मीर के प्रत्येक शासक के काल की घटनाओं का क्रमानुसार विवरण दिया गया है। यह कश्मीर के राजनीतिक उथलपुथल का काल था।

    कश्मीर के इतिहास पर आधारित इस ग्रंथ की रचना में कल्हण ने ग्यारह अन्य ग्रंथों का सहयोग लिया है, जिसमें अब केवल नीलमत पुराण ही उपलब्ध है।

    ➣ कल्हण की राजतरंगिणी में कुल आठ तरंग एवं लगभग 8000 श्लोक हैं। पहले के तीन तरंगों में कश्मीर के प्राचीन इतिहास की जानकारी मिलती है।

    ➣ चौथे से लेकर छठवें तरंग में कार्कोट एवं उत्पल वंश के इतिहास का वर्णन है। अन्तिम सातवें एवं आठवें तरंग में लोहार वंश का इतिहास उल्लिखित है। कल्हण (ब्राह्मण) कश्मीर के लोहार वंशी राजा हर्ष के सलाहकार थे।

  • राष्ट्रकूट वंश (736–973 ई.) : संक्षिप्त परिचय और इतिहास

    📚 विषय सूची

    राष्ट्रकूट वंश (8वीं – 10वीं शताब्दी) : दक्कन की प्रमुख शक्ति

    ➣ इस समय में उत्तरी भारत में दो राजशक्तियाँ प्रधान थीं- पश्चिमी-उत्तर भाग में गुर्जर प्रतिहार एंव पूर्व में मगध के पाल वंश। जबकि दक्षिण में राष्ट्रकूट वंश।

    ➣ राष्ट्रकूट का विस्तार दक्षिण (चेर व पांडय को छोड़कर, वर्तमान – केरल ) से कन्नौज तक था। राष्ट्रकूटों के अभिलेखों में उनका मूल निवास स्थन लातूर माना गया है।

    ➣ राष्ट्रकूट वंश का आरम्भ दन्तिदुर्ग से लगभग 752 -56 ई. में हुआ था। उसने नासिक को अपनी राजधानी बनाया। कालांतर में अमोघवर्ष प्रथम ने राजधानी मान्य खेत स्थान्तरित कर दी। इनकी प्रारम्भिक राजधानी मयूरखण्डी थी।

    ➣ हालाँकि इससे पहले भी इस वंश के राज्य की सत्ता थी, परन्तु राज्य स्वतंत्र नहीं था। संभवत: वह चालुक्य (बादामी /वातापी) साम्राज्य के सामंत थे।

    ➣ राष्ट्रकूट शब्द किसी जाति का सूचक न होकर पद का सूचक है। राष्ट्रकूट पहले प्रशासनिक अधिकारी थे। इस शब्द का अर्थ राष्ट्र (प्रान्त) का कूट अर्थात प्रधान है।

    प्रारंभिक शासक

    ➣ राष्ट्रकूट वंश का प्रथम शासक दन्तिवर्मा (650-665-70 ई.) हुआ। उसकी उपलब्धियाँ अज्ञात है। उसके बाद इन्द्रपृच्छकराज (670-690 ई.) तथा गोविन्दराज (690-700 ई.) राजा बने।

    ➣ इनके कार्यो के विषय में भी कोई जानकारी नहीं है। गोविन्दराज के बाद उसका पुत्र कर्कराज शासक बना।

    ➣ कर्कराज के तीन पुत्रों के (1. इन्द्र, 2.कृष्ण, 3. नन्न) नाम मिलते है। इनमें इन्द्र शक्तिशाली था।

    शासक काल उपलब्धियाँ / कार्य
    दन्तिदुर्ग 736–756 ई. • राष्ट्रकूट वंश की स्थापना की
    • चालुक्यों को पराजित कर स्वतंत्र सत्ता स्थापित की
    • मालवा और दक्कन क्षेत्र में शक्ति विस्तार किया
    • साम्राज्य की राजनीतिक नींव मजबूत की
    कृष्ण प्रथम 756–772 ई. • प्रसिद्ध कैलाश मंदिर (एलोरा) का निर्माण कराया
    • दक्षिण भारत में राष्ट्रकूट शक्ति को सुदृढ़ किया
    • कला एवं स्थापत्य को प्रोत्साहन दिया
    • साम्राज्य का विस्तार जारी रखा
    गोविन्द द्वितीय 773–780 ई. • प्रशासनिक कमजोरियों के कारण प्रभाव सीमित रहा
    • साम्राज्य की स्थिरता बनाए रखने का प्रयास किया
    • आंतरिक संघर्षों का सामना किया
    ध्रुव धारावर्ष 780–793 ई. • त्रिपक्षीय संघर्ष (पाल-प्रतिहार-राष्ट्रकूट) में विजय प्राप्त की
    • उत्तर भारत में कन्नौज तक प्रभाव बढ़ाया
    • राष्ट्रकूटों को अखिल भारतीय शक्ति बनाया
    • सैन्य शक्ति का विस्तार किया
    गोविन्द तृतीय 793–814 ई. • उत्तर भारत तक सफल सैन्य अभियान चलाया
    • कन्नौज पर अधिकार कर राजनीतिक श्रेष्ठता स्थापित की
    • दक्षिण से उत्तर तक विशाल साम्राज्य का निर्माण
    • राष्ट्रकूटों की सर्वोच्च शक्ति का काल
    अमोघवर्ष प्रथम 814–878 ई. • सबसे लंबा शासनकाल (लगभग 64 वर्ष)
    • जैन धर्म का संरक्षण और प्रचार किया
    • कन्नड़ साहित्य को प्रोत्साहन (कविराजमार्ग की परंपरा)
    • शांतिप्रिय नीति अपनाई और युद्धों से दूरी रखी
    • प्रशासनिक स्थिरता स्थापित की
    कृष्ण द्वितीय 878–915 ई. • गुजरात और मालवा में प्रतिहारों से संघर्ष
    • साम्राज्य की सीमाएँ बनाए रखने का प्रयास
    • राजनीतिक संतुलन बनाए रखा
    • व्यापार और अर्थव्यवस्था को सहारा दिया
    इन्द्र तृतीय 915–917 ई. • कन्नौज पर पुनः अधिकार किया
    • राष्ट्रकूट शक्ति का पुनरुत्थान किया
    • उत्तर भारत में राजनीतिक प्रभाव बढ़ाया
    • साम्राज्य को अस्थायी स्थिरता दी
    अमोघवर्ष द्वितीय 917–918 ई. • अत्यल्प शासनकाल
    • प्रशासनिक प्रभाव सीमित रहा
    • आंतरिक अस्थिरता जारी रही
    गोविन्द चतुर्थ 918–934 ई. • विद्रोहों और राजनीतिक कमजोरी का सामना किया
    • केंद्रीय सत्ता कमजोर हुई
    • साम्राज्य के विघटन की शुरुआत हुई
    अमोघवर्ष तृतीय 934–939 ई. • चालुक्यों के बढ़ते दबाव का सामना किया
    • साम्राज्य की रक्षा का प्रयास किया
    • राष्ट्रकूट शक्ति कमजोर पड़ती गई
    कृष्ण तृतीय 939–967 ई. • अंतिम महान राष्ट्रकूट शासक
    • चोलों पर विजय प्राप्त की
    • दक्षिण भारत में साम्राज्य विस्तार किया
    • सैन्य शक्ति और प्रतिष्ठा बढ़ाई
    खोट्टिग अमोघवर्ष 967–972 ई. • चालुक्य आक्रमणों का सामना किया
    • साम्राज्य का तेज़ी से पतन हुआ
    • प्रशासनिक कमजोरी स्पष्ट हुई
    कर्क द्वितीय 972–973 ई. • अंतिम राष्ट्रकूट शासक
    • तैलप द्वितीय (कल्याणी चालुक्य) द्वारा पराजित
    • राष्ट्रकूट वंश का अंत हुआ
    राष्ट्रकूट वंश

    दन्तिदुर्ग प्रथम (750 – 756 ई.) : राष्ट्रकूट वंश की स्थापना

    ➣ राष्ट्रकूट वंश की स्वतन्त्रता का जन्मदाता दन्तिदुर्ग प्रथम था। वह इन्द्र की भवनागा नामक चालुक्य राजकन्या से उत्पन्न पुत्र था।

    ➣ उसने वातापी के चालुक्य नरेश कीर्तिवर्मन द्वितीय को एक युद्ध में परास्त कर स्वंय को स्वतंत्र किया था। इस प्रकार राष्ट्रकूट वंश का उदय हुआ।

    ➣ उसकी उपलब्धियों के विषय में उसके समय के दो लेखों :- दशावतार (742 ई. ) तथा समनगड़ का लेख (753 ई.) से जानकारी प्राप्त करतें है।

    दन्तिदुर्ग ने अपने स्वामी की आज्ञा से गुजरात के चालुक्य राजा जनाश्रय पुलकेशिन की ओर से अरबों से युद्ध कर उन्हें पराजित किया।

    ➣ उसकी इस सफलता से प्रसन्न होकर विक्रमादित्य ने उसे पृथ्वीबल्लभ तथा खड्वालोक की उपाधियों से सम्मानित किया था।

    ➣ उसने कांची, कलिंग, कोशल, श्रीशैल, मालवा, लाट एवं टंक पर विजय प्राप्त कर राष्ट्रकूट साम्राज्य को विस्तृत बनाया। वह दक्षिणापथपति बन गया था।

    काञ्जी की विजय के कारण दक्षिणी भारत का पल्लव राज्य भी उसकी अधीनता में आ गया था। जो प्रदेश वातापी चालुक्यों सम्राटों की अधीनता में थे, प्रायः वे सब अब दन्तिदुर्ग के आधिपत्य में आ गए थे।

    ➣ उसने उज्जयिनी में हरिण्यगर्भ (महादान) यज्ञ किया था। एंव महाराजधिराज परमेश्वर, परमभट्टारक आदि उपाधियां धारण की।

    ➣ दन्तिदुर्ग ने 756 ई. के लगभग तक शासन किया। वह निःसन्तान था, अतः उसके बाद उसका चाचा कृष्ण प्रथम शासक बना था।

    ➣ दन्तिदुर्ग ने ऐलोरा में दशावतार मन्दिर (गुफा संख्या 15) का निर्माण करवाया था।

    कृष्ण प्रथम (756 – 773 ई.) : एलोरा के कैलाशनाथ मंदिर का निर्माण

    ➣ दन्तिदुर्ग के पश्चात उसका चाचा कृष्ण प्रथम 756 ई. में शासक बना कृष्ण प्रथम भी दन्तिदुर्ग के समान एक साम्राज्यवादी शासक था। राज्यारोहण के पश्चात् सभी दिशाओं में उसने अपने साम्राज्य का विस्तार प्रारम्भ किया।

    ➣ उसके राजा बनते ही लाट प्रदेश (दक्षिणी गुजरात) के शासक कर्क द्वितीय, जो उसका भतीजा ने विद्रोह कर अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दिया।

    ➣ कृष्ण प्रथम ने मैसूर के गंग की राजधानी मान्यपुर एवं लगभग 772 ई. में हैदराबाद को अपने अधिकार क्षेत्र में कर लिया।

    ➣ उसने दक्षिण कोंकण के कुछ भाग को भी जीता था। जिसमे इसके समकालीन प्रतिहार राजा ने द्वारपाल का कार्य किया।

    ➣ राष्ट्रकूटों के द्वारा परास्त होने के बाद भी चालुक्यों की शक्ति का पूर्णरूप से अन्त नहीं हुआ था। उन्होंने एक बार फिर अपने उत्कर्ष का प्रयत्न किया, पर उन्हें सफलता नहीं मिली।

    ➣ कृष्णराज (कृष्ण प्रथम) ने बादामी के चालुक्यों के अस्तित्व को पूर्णतः समाप्त कर दिया। यद्दपि इस समय वेंगी के चालुक्य शाखा का उदय हो रहा था।

    ➣ उसने राहप्प नामे किसी शासक को पराजित कर उसकी पालिध्वज पताका को छीन लिया तथा राजाधिराज परमेश्वर की उपाधि ग्रहण किया।

    ➣ उसने राष्ट्रकूट युवराज को न केवल अपने राज्य का एक बड़ा भाग तथा हर्जाना दिया अपितु अपनी कन्या शीलभट्टारिका का विवाह भी गोविन्द के छोटे भाई ध्रुव से कर दिया। इस विजय के फलस्वरूप वेंगी राज्य का अधिकांश भाग राष्ट्रकूट साम्राज्य में मिला लिया गया।

    ➣ उसने ऐलोरा में सुप्रसिद्ध गुहा मंदिर (कैलाशनाथ मंदिर) का एक ही चट्टान काटकर निर्माण करवाया। ऐलोरा के कैलाश मन्दिर का मुख्य वास्तुकार कोंकण था। यह एक आयताकार प्रांगण के बीच स्थित है तथा द्रविड़ कला का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता है।

    772 ई. में कृष्णराज की मृत्यु होने पर उसका पुत्र गोविन्द द्वितीय राजा बना। वह अयोग्य शासक साबित हुआ।

    ➣ कृष्ण प्रथम को क्षतप्रजाबाधः और कृतप्रजापालः कहा गया है। कृष्ण प्रथम की उपाधि शुभतुंग थी।

    गोविन्द द्वितीय (773 – 780 ई.) : अल्पकालीन शासन

    ➣ कृष्ण प्रथम के दो पुत्र (1. गोविन्द द्वितीय, 2. ध्रुव) थे। गोविन्द द्वितीय राजा बना। वह अयोग्य शासक साबित हुआ।

    ➣ उसने अपने छोटे भाई ध्रुव को नासिक का राज्यपाल नियुक्त किया। राज्य की वास्तविक शक्ति उसके भाई ध्रुव के हाथों में थी। कालांतर में अवसर पाकर ध्रुव स्वयं राजसिंहासन पर आरूढ़ हो गया।

    ध्रुव धारावर्ष (780 – 793 ई.) : पाल एवं प्रतिहारों पर विजय

    ➣ अपने भाई गोविन्द को पदच्युत करने के उपरांत ध्रुव सिंहासन आरूढ़ हुआ। राजधानी में अपनी स्थिति सुदृढ़ कर लेने के बाद ध्रुव अपने भाई के सहायको को दंड दिया।

    ➣ सबसे पहले उसने गङ्गवाडि पर आक्रमण किया। इस समय यहां पर गङ्गवंश का राजा शिवमार द्वितीय शासन कर रहा था। वह पराजित हुआ। ध्रुव ने उसके सम्पूर्ण राज्य को राष्ट्रकूट साम्राज्य में मिला लिया तथा अपने पुत्र स्तम्भ को वहां का शासक नियुक्त कर दिया।

    ➣ इसके बाद उसने वेंगी के चालुक्य नरेश विष्णु वर्धन, पल्लव नरेश दंति वर्मन एवं मैसूर के गंगो को पराजित किया तथा उन्हें फिर राष्ट्रकूटों की अधीनता स्वीकृत करने के लिए विवश किया। इससे राष्ट्रकूट राज्य की दक्षिणी सीमा कावेरी तक जा पहुँची।

    ➣ दक्षिण की विजय के बाद वह उत्तर की ओर बढ़ा। सबसे पूर्व भिन्नमाल के गुर्जर प्रतिहार राजा वत्सराज के साथ उसका युद्ध हुआ। जिसमे वत्सराज परास्त हुआ।

    ध्रुव राष्ट्रकूट वंश का पहला शासक था जिसने कन्नौज पर अधिकार करने हेतु त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग लेकर प्रतिहार नरेश वत्सराज एवं पाल नरेश धर्मपाल को पराजित किया।

    ➣ अब ध्रुव ने कन्नौज पर आक्रमण किया। इस समय कन्नौज का राजा इन्द्रायुध था। वह ध्रुव का सामना नहीं कर सका, और राष्ट्रकूट की अधीनता को स्वीकृत करने के लिए विवश हुआ।

    ➣ कन्नौज के राज्य को अपना वशवर्ती बनाने के उपलक्ष्य में ध्रुव ने गंगा और यमुना को भी अपने राजचिह्न्नों में शामिल कर लिया।

    ➣ हालाँकि ध्रुव के दक्षिण की ओर वापस लौटते ही पाल नरेश धर्मपाल ने पुन : कन्नौज पर आक्रमण कर अधिकार कर लिया।

    ➣ इन विजयों के परिणामस्वरूप ध्रुव सम्पूर्ण दक्षिणापथ का एकछत्र शासक बना। अनेक राज्यों की विजय कर 794 ई. में ध्रुव की मृत्यु हुई।

    ➣ राजा होने पर ध्रुव ने निरूपम कालिवल्लभ, श्रीवल्लभ तथा धारावर्ष की उपाधियाँ धारण की थी। ध्रुव को धारा वर्ष भी कहा जाता है।

    गोविन्द तृतीय (793 – 814 ई.) : राष्ट्रकूट शक्ति का उत्कर्ष

    ➣ ध्रुव के तीन पुत्र- (1. कर्क, 2. स्तम्भ, 3. गोविन्द, 4. इन्द्र) थे। इनमें से कर्क अपने पिता के जीवन-काल में ही मर गया। सबसे बड़ा होने के कारण स्तम्भ ही राज्य का वैधानिक उत्तराधिकारी था,

    ➣ किन्तु ध्रुव अपने पुत्र गोविन्द की योग्यता एवं कर्मठता पर मुग्ध था। अतः उसने उसी को अपना उत्तराधिकारी मनोनीत किया तथा स्तम्भ को गंगवाडी तथा इन्द्र को गुजरात और मालवा का राज्यपाल नियुक्त कर दिया।

    ➣ इस प्रकार गोविन्द तृतीय अपने पिता का उत्तराधिकारी बना। कालांतर में स्तम्भ ने अपने भाई के विरुद्ध विद्रोह किया परन्तु वह सफल नहीं हुआ।

    ➣ अपनी मृत्यु के पूर्व उसने अपने एकमात्र पुत्र अमोघवर्ष को गुजरात के राज्यपाल कम्भ कर्क के संरक्षण में डाल दिया।

    ➣ गोविन्द तृतीय के शासन काल को राष्ट्रकूट शक्ति का चरमोत्कर्ष काल माना जाता है।

    ➣ दक्षिण भारत में अपने विशाल राज्य के बाद गोविन्द तृतीय ने उत्तरी भारत की ओर रुख़ किया। उसने कन्नौज पर अधिपत्य हेतु त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग लिया।

    ➣ इसके समकालीन गुर्जर प्रतिहार वंश का राजा इस समय नागभट्ट द्वितीय था। गोविन्द तृतीय ने उसके साथ युद्ध किया, और उसे परास्त किया।

    ➣ इस समय कन्नौज के राज सिंहासन पर राजा चक्रायुध आरूढ़ था। उसे पाल राजा धर्मपाल ने अधिपति बनाया था।

    चक्रायुध गोविन्द तृतीय के द्वारा परास्त हुआ, और इस में राष्ट्रकूट राजा ने हिमालय तक के प्रदेश पर अपना आधिपत्य स्थापित किया। पाल राजा धर्मपाल भी गोविन्द तृतीय के सम्मुख टिक ना सका।

    ➣ राष्ट्रकूटों के उत्कर्ष के कारण अब पाल वंश का शासन केवल मगध और बंगाल तक ही सीमित रह गया।

    ➣ इस समय उसकी अनुपस्थिति में पल्लव, पाण्ड्य, चेर एवं गंग शासकों ने उसके विरुद्ध एक संघ बनाया, पर लगभग 802 ई. में गोविन्द ने इस संघ को पूर्णतः नष्ट कर दिया।

    ➣ गोविन्द तृतीय ने पाल शासक से मालवा छीनकर अपने एक अधिकारी परमार वंश के उपकेन्द्र को सुपर्द कर दिया।

    ➣ गोविन्द तृतीय श्रीलंका के राजा व उसके मंत्री को बन्दी बनाकर हालापुर ले आया तथा लंका के इष्टदेव की दो प्रतिमायें मान्यखेत लाकर शिवमन्दिर के सामने विजय स्तम्भों के रूप में प्रतिष्ठित कराई।

    अमोघवर्ष प्रथम (814 – 878 ई.) : साहित्य एवं कला का संरक्षण

    ➣ गोविन्द तृतीय के बाद उसका पुत्र अमोघवर्ष गद्दी पर बैठा। उस समय वह अवयस्क था, अत: गुजरात के वायसराय कर्क ने उसके संरक्षक के रूप में कार्य करना प्रारम्भ किया।

    ➣ उसने मान्यखेट (हैदराबाद के समीप माल्खेद) नामक एक नया नगर बसाया तथा अपनी राजधानी वही ले गया।

    ➣ तत्कालीन अरब यात्री सुलेमान ने अमोघवर्ष की गणना विश्व के तत्कालीन चार महान शासकों में की थी।

    जिनसेन अमोघवर्ष का गुरू था और उसी के प्रभाव में आकार जैन वह अनुयायी बन गया। महावीराचार्य उसे स्यादवाद का अनुयायी बताता है। जैन मतावलम्बी होते हुए भी हिन्दू देवी देवताओं का सम्मान करता था।

    ➣ अमोघवर्ष महालक्ष्मी का अनन्त भक्त था। उसके संजन ताम्रपत्र से पता चलता है कि उसने प्रजा को महामारी से बचाने के लिए देवी को अपने बाएं हाथ की उंगली चढ़ा दी थी।

    संजन लेख में जैन गुरु जिनसेन उसे साहसांक (चन्द्रगुप्त द्वितीय) से भी महान बताया गया है। उसकी तुलना शिव, दधीचि जैसे पौराणिक व्यक्तियों से की जाती है।

    ➣ अमोघवर्ष का मंत्री करकराज था। अपने सामन्तों के षड़यंत्रों के कारण कुछ समय के लिए अमोघवर्ष को राजसिंहासन से हाथ धोना पड़ा। पर करकराज की सहायता से उसने राज गद्दी पुनः प्राप्त की।

    ➣ आंतरिक अव्यवस्था के कारण अमोघवर्ष राष्ट्रकूट साम्राज्य को अक्षुण्ण रख सकने में असमर्थ रहा, और चालुक्यों ने राष्ट्रकूटों की निर्बलता से लाभ उठाकर एक बार फिर अपने उत्कर्ष के लिए प्रयत्न किया। इसमें उन्हें सफलता भी मिली।

    ➣ अमोघवर्ष के शासन काल में ही कन्नौज के गुर्जर प्रतिहार राजा मिहिरभोज ने अपने विशाल साम्राज्य का निर्माण किया, और उत्तरी भारत से राष्ट्रकूटों के शासन का अन्त कर दिया।

    ➣ उसने जिनसेन आदिपुराण के रचनाकार, महावीरचार्य गणितसार-संग्रह के रचनाकार एवं सक्तायाना के रचनाकार जैसे विद्धानों को आश्रय दिया था।

    ➣ अमोघवर्ष धार्मिक और विद्याव्यसनी था उसने स्वयं ही कन्नड़ के प्रसिद्ध ग्रंथ कविराज मार्ग और प्रश्नोत्तरमालिका की रचना की। यह ग्रन्थ दण्डिन के काव्यादर्श पर आधारित है।

    ➣ अमोघवर्ष प्रथम की पुत्री चन्द्रोबलब्बे/चन्द्रवल्लभी ने कुछ समय तक रायचूर दोआब का प्रशासन संभाला। अमोघवर्ष प्रथम की उपाधि नृपतुंग एवं वीरनारायण थी।

    ➣ अपने अंतिम दिनों में राजकार्य मंत्रियों और युवराज पर छोड़ वह विरक्त रहने लगा था तथा संभवतः उसकी मृत्यु 878 ई. में हुई।

    कृष्ण द्वितीय (878 – 915 ई.) : चालुक्य संघर्ष

    ➣ कृष्ण द्वितीय राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष का पुत्र था। पिता की मृत्यु के बाद वह 878 ई. में राजसिंहासन पर आरूढ़ हुआ।

    ➣ कृष्ण द्वितीय एक कमज़ोर शासक था। उसे प्रतिहार एवं चोल शासकों से परास्त होना पड़ा।

    वेंगि और अन्हिलवाड़ा में चालुक्यों के जो दो राजवंश इस समय स्थापित हो गए थे, उन दोनों के साथ ही उसके युद्ध हुए। अब राष्ट्रकूटों में इतनी शक्ति नहीं रह गई थी कि वे अपने प्रतिस्पर्धी चालुक्यों को पराभूत कर सकते।

    ➣ कृष्ण द्वितीय का सुदूर दक्षिण के चोलों के साथ भी संघर्ष हुआ। पहले चोलों के साथ उसने संबंध मधुर थे। उसकी एक पुत्री का विवाह चोल नरेश आदित्य प्रथम के साथ हुआ था तथा इससे कन्नर नाम एक पुत्र था।

    आदित्य प्रथम की मृत्यु के बाद 907 ई. में परान्तक चोलवंश का राजा हुआ।

    ➣ कृष्ण द्वितीय के पश्चात उसका पुत्र इन्द्र तृतीय राजा बना क्योंकि उसके पुत्र जगत्तुंग की मृत्यु पहले ही हो गयी थी। वह राज्यारोहण सैनिक योग्यता वाला शासक था।

    इन्द्र तृतीय (915 – 927 ई.) : राष्ट्रकूट सत्ता का पुनर्स्थापन

    ➣ यह कृष्ण द्वितीय का पौत्र था। यद्यपि शासन की बागडोर उसके हाथों में सिर्फ़ चार वर्ष तक ही रही थी, किन्तु इतने कम समय में ही इन्द्र तृतीय ने विलक्षण पराक्रम दिखाया।

    ➣ इन्द्र तृतीय का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य था- गुर्जर प्रतिहार राजा महीपाल को परास्त करना।

    ➣ इन्द्र तृतीय ने पाल वंश के देवपाल प्रथम को परास्त करके कन्नौज पर अधिकार कर लिया।

    ➣ इन्द्र तृतीय ने कन्नौज की शक्ति को जड़ से ही हिला दिया। उसने एक बहुत बड़ी सेना लेकर उत्तरी भारत पर आक्रमण किया और कन्नौज पर चढ़ाई कर इस प्राचीन नगरी का बुरी तरह से बर्बाद कर दिया।

    ➣ कन्नौज के प्रतापी सम्राट मिहिरभोज की मृत्यु 890 ई. में हो चुकी थी और उसके बाद निर्भयराज महेन्द्र (890-907 ई.) ने गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य को बहुत कुछ सम्भाले रखा था,

    ➣ लेकिन महेन्द्र के उत्तराधिकारी महीपाल के समय में कन्नौज की शक्ति घटना प्रारम्भ हो गई थी। वह राष्ट्रकूट इंद्रा तृतीय के सम्मुख असहाय रहा।

    ➣ उसके समय में ही अल मसूदी अरब से भारत आया था। अल मसूदी ने तत्कालीन राष्ट्रकूट शासकों को भारत का सर्वश्रेष्ठ शासक कहा।

    अन्य उत्तराधिकारी

    अमोघवर्ष द्वितीय (917-918 ई.) राष्ट्रकूट शासक इंद्र तृतीय का पुत्र था। उसके शासन काल की किसी भी घटना के विषय में ज्ञात नही है।

    ➣ उसकी मृत्यु की परिस्थितियां अज्ञात है। उसके बाद उसका छोटा भाई गोविन्द चतुर्थ 930 ई. में राजा बना।

    ➣ 918 ई. के लगभग गोविन्द चतुर्थ (918-934 ई.) मान्यखेत के राजसिंहासन पर आरूढ़ हुआ। यह निर्बल शासक साबित हुआ।

    इन्द्र तृतीय ने राष्ट्रकूट की शक्ति का पुनरुद्धार करने में जो सफलता प्राप्त की थी, वह गोविन्द चतुर्थ के निर्बल शासन में नष्ट हो गई।

    ➣ वेंगि के चालुक्यों ने इस समय शक्तिशाली हुए उनके आक्रमणों के कारण राष्ट्रकूट राज्य की शक्ति बहुत क्षीण हो गई।

    ➣ इसके पश्चात् अमोघवर्ष तृतीय राष्ट्रकूट वंश का राजा बना। उसके शासन काल में दक्षिण के राष्ट्रकूटों और सुदूर दक्षिण के चोल राजाओं के मध्य शत्रुता आरम्भ हो गयी।

    अमोघवर्ष तृतीय (936 – 939 ई.) : अल्पकालीन शासन

    ➣ उसका वास्तविक नाम पड्डेग था तथा पहले वह त्रिपुरा में निवास करता था। यही से उसने मान्यखेट को प्रस्थान किया तथा मंत्रियों और सामन्तों के सहयोग से 936 ई. में राष्ट्रकूट सिंहासन पर अधिकार कर लिया।

    ➣ अमोघवर्ष तृतीय धार्मिक प्रवृति का शासक था और वह शासन कार्य सम्भाला। उसने गंगवाडि के शासक राजमल्ल पर आक्रमण कर उसे पदच्युत किया तथा अपने साले भूतुग को राजा बनाया।

    ➣ युवराज के काल में ही उसने बुन्देलखण्ड क्षेत्र में भी सैनिक अभियान किया।

    कृष्ण तृतीय (939 – 967 ई.) : चोलों पर विजय एवं विस्तार

    ➣ यह राष्ट्रकूट वंश के सबसे प्रतापी राजाओं में से एक था। उसने एक बार फिर राष्ट्रकूटों के गौरव को स्थापित किया और दक्षिणउत्तर दोनों दिशाओं में अपनी शक्ति का विस्तार किया।

    ➣ राज्यारोहण के समय उसने अकालवर्ष की उपाधि ग्रहण की। बल्लभनरेन्द्र, पृथ्वीबल्लभ, जैसी अन्य उपाधियाँ भी उसकी मिलती है।

    कांची और तंजोर को जीतने के बाद उसने कांचीयुम तंजेयमकोड (कांची तथा तंजोर का विजेता) की भी उपाधि ग्रहण की थी।

    सैन्य अभियान

    ➣ कृष्ण-तृतीय एक कुशल सैनिक तथा सामाज्यवादी शासक था। राजा बनने के बाद कुछ वर्षों तक उसने अपनी आन्तरिक स्थिति सुदृढ़ किया। तत्पश्चात् उसने दिग्विजय की एक व्यापक योजना तैयार की। इस प्रक्रिया में सर्वप्रथम उसने चोलो के विरूद्ध सैनिक अभियान किया।

    दक्षिण भारत का अभियान

    ➣ 943 ई. में उसने अपने साले गंगनरेश भूतुग के साथ चोल शासक परान्तक के ऊपर आक्रमण कर दिया। उसका अभियान सफल रहा तथा कांची और तंजोर के ऊपर उसने अधिकार कर लिया।

    ➣ कुछ समय बाद परान्तक ने सेना एकत्रित कर राष्ट्रकूटो को चुनौती दी। इस सेना का नेतृत्व युवराज राजादित्य ने किया।

    ➣ 949 ई. में चोल नरेश परान्तक प्रथम तथा राष्ट्रकूट सेनाओं के बीच उत्तरी अर्काट जिले के तकोलम नामक स्थान पर निर्णायक युद्ध हुआ। इतिहास में यह युद्ध तक्कोलम का युद्ध नाम से प्रसिद्ध है।

    ➣ राष्ट्रकूट लेखों से पता चलता है कि यह युद्ध बड़ा भयानक था। इसमें पहले तो चालुक्य सैनिक प्रबल रहे किन्तु बाद में अपने सेनापति मणलेर तथा गंगराज भूतुग युद्ध में मारा गया।

    ➣ कृष्ण तृतीय ने कांचीतंजौर को जीतने के बाद कांचीयुम तंजेयम कोंड की उपाधि धारण की तथा तक्कोलम के युद्ध के बाद उसकी सेनायें रामेश्वरम् तक पहुंच गई एवं रामेश्वरम् में एक विजय स्तम्भ का निर्माण कराया।

    ➣ तत्पश्चात रामेश्वरम में उसने कृष्णेश्वर तथा गण्डमार्तण्डादित्य के मन्दिर बनवाये जो सुदूर दक्षिण में उसकी विजय के प्रमाण है।

    कर्हाद के लेख से पता लगता है। कि उसने चोलों के अतिरिक्त पाण्ड्य केरल तथा लंका के शासकों को भी पराजित किया था।

    उत्तर-भारत का अभियान

    ➣ दक्षिण के युद्धो से निवृत्त होने के बाद कृष्ण ने उत्तर भारत की ओर ध्यान दिया।

    ➣ 10वी सदी के मध्य बुन्देलखण्ड के चन्दल प्रबल हो उठे तथा उन्होंने कालंजर तथा चित्रकूट के दुर्ग के ऊपर. जो अमोघवर्ष के समय में राष्ट्रकूटों के अधिकार में थे अपना अधिकार कर लिया।

    ➣ इन दुर्गों को पुनः अपने नियंत्रण में करने के लिये कृष्ण ने उत्तर भारत में सैन्य अभियान किया। इस बार उसका साथ चेदि नरेश मारसिंह ने दिया |

    ➣ जो भूतुग का उत्तराधिकारी था। कृष्ण का इन दुर्गो पर पुनः अधिकार हो गया। इसके बाद 963 ई में उसने मालवा के परमार शासक सीयक को परास्त कर उज्जयिनी पर अधिकार कर लिया

    ➣ बाद में ताल द्वितीय राजा बना। अम्म ने एसे मारकर पुन: गद्दी पर अधिकार कर लिया। कृष्ण ने उसके सौतेले भाई दानार्णव का समर्थन किया तथा उसकी सहायता में एक सेना वेंगी भेजी।

    ➣ 956 ई. इस सेना ने अम्म को पुनः परास्त किया तथा उसने भागकर कलिंग के राजा के यहां शरण ली। दानार्णव को कृष्ण ने वेंगी की गद्दी पर आसीन करवाया किन्तु राष्ट्रकूटों सेना के हटते ही अम्म को मुक्त कर दिया।

    ➣ इस प्रकार कृष्ण अपने वंश के योग्यतम शासकों में से अन्तिम शासक था। वह सही अर्थों में सम्पूर्ण दक्षिणापथ का सार्वभौम सम्राट था और यह श्रेय उसके किसी भी पूर्ववर्ती राजा ने नहीं प्राप्त किया था। गोविन्द तृतीय ने यद्यपि कांची को जीता था लेकिन

    ➣ वह रामेश्वरम तक नही पहुच पाया था तथा द्रविड़ राजाओं की शक्ति का विनाश भी उसने नहीं किया था। वेंगी पर उसका पूर्णयता अधिकार नहीं था।

    ➣ किन्तु कृष्ण ने पल्लव तथा खेल राज्य पर अपना नियंत्रण रखने में सफलता पाई थी। चोल राज्य पर अपना नियंत्रण रखने में सफलता पाई थी। चोल के बड़े भाग पर तो वह स्वंय शासन करता था ।

    साहित्यिक उपलब्धियाँ

    ➣ वह विद्वानों का आश्रयदाता भी था जिसकी राजसभा में कन्नड़ भाषा का कवि पोन्न निवास करता था। उसने शान्तिपुराण की रचना की थी।

    ➣ उसकी सभा का दूसरा विद्वान पुष्पदन्त था जिसकी रचना ज्वालामालिनीकल्प है । उसने 967 ई. तक शासन किया।

    खोट्टिग अमोघवर्ष (967 – 972 ई.) : कमजोर शासन

    ➣ कृष्ण तृतीय नि:सन्तान था। अत: उसका भाई खोट्टिग उसके बाद राष्ट्रकूट वंश का राजा बना। वह अत्यन्त निर्बल शासक था।

    ➣ खोट्टिग के समय से राष्ट्रकूट साम्राज्य का पतन प्रारंभ हो गया। उसके उत्तर में स्थित मालवा के परमारों ने राष्ट्रकूटों के क्षेत्रों पर आक्रमण करने शुरू कर दिए थे।

    उदयपुर प्रशस्ति से ज्ञात होता है कि परमार राजा हर्षदेव (सियक द्वितीय) ने खोट्टिग की राज्यलक्ष्मी को युद्ध में बंदी बना लिया था। परमारों के इस आक्रमण के समय खोट्टिग काफ़ी वृद्ध हो चुका था और वह उसका सफलतापूर्वक सामना नहीं कर सका।

    ➣ लगभग 972 ई. में परमार सेनाओं ने नर्मदा नदी को पार कर राष्ट्रकूट राजधानी मान्यखेट को लूटा और उस पर अधिकार कर लिया गया।

    ➣ उसी वर्ष 972 ई. में दु:खी जीवन में ही उसका निधन हो गया।

    कर्क द्वितीय (972 – 973 ई.) : राष्ट्रकूट वंश का अंत

    ➣ खोट्टिग का उत्तराधिकारी उसका भतीजा कर्क द्वितीय हुआ। वह भी एक अयोग्य तथा निर्बल शासक था। अपने दो वर्ष के काल में वह सामंतों के विद्रोह हुए जिसे वह दबाने में असमर्थ रहा।

    कर्क द्वितीय राष्ट्र वंश का अन्तिम शासक था। उसके साथ ही दक्षिणापथ से राष्ट्रकूटों का दो सदियों का राज्य तथा शासन समाप्त हुआ।

    तर्दवाडि बीजापुर जिला के सामन्त तैल द्वितीय ने उसके ऊपर आक्रमण कर उसे पदच्युत कर दिया तथा सिंहासन पर अधिकार जमा लिया।

    975 ई तक तैल उसके अन्य सामंतों तथा सहयोगियों को पूरी तरह समाप्त कर दक्षिणापथ का एकछत्र शासक बन गया। तैल ने जिस वंश की स्थापना की उसे कल्याणी का पश्चिमी चालुक्यवंश कहा जाता है।

    जानकारी के स्रोत

    ➣ राष्ट्रकूट राजवंश का इतिहास मुख्य रूप से उसके शासकों द्वारा खुदवाये गये बहुसंख्यक अभिलेखों तथा दानपत्रों से ज्ञात करते है जो उनके साम्राज्य के विभिन्न भू-भाग से प्राप्त किये गये है।

    • दन्तिदुर्ग के एलौरा तथा सामन्तगढ़ के ताम्रपत्राभिलेख।
    • गोविन्द तृतीय के राधनपुर, वनि दिन्दोरी तथा बड़ौदा के लेख
    • अमोघवर्ष प्रथम का संजन अभिलेख
    • इन्द्र तृतीय का कमलपुर अभिलेख
    • गोविन्द IV के काम्बे तथा संगली के लेख
    • कृष्ण तृतीय के कोल्हापुर, देवली तथा कर्नाटक के लेख

    ➣ अमोघवर्ष का संजन लेख, गोविन्द चतुर्थ का केम्बे एवं संगली लेख राष्ट्रकूट वंश की जानकारी के प्रमुख अभिलेखीय स्रोत हैं।

    ➣ उपर्युक्त लेखों में से अधिकांश तिथियुक्त है। इनसे राष्ट्रकूट राजाओं की वंशावली, उनके सैनिक अभियानों, धार्मिक अभिरूचि, शासन-व्यवस्था का ज्ञान प्राप्त होता है।

    ➣ राष्ट्रकूट काल में कन्नड़ तथा संस्कृत भाषों में अनेक ग्रंथों का रचना हुई थी। इनमें आदिपुराण, महावीराचार्य का गणितसार संग्रह, अमोघवर्ष का कविराजमार्ग उल्लेखनीय है। इनसे अमोघवर्ष के धार्मिक जीवन के विषय में सूचनायें मिलती है।

    अशोक के लेखों में रठिक नामक पदाधिकारियों का उल्लेख है। सातवाहन नानाघाट के लेख में मुहारठी त्रनकयिरों का उल्लेख मिलता है। हाथीगुम्फा लेख से पता चलता है कि खारवेल ने रठिकों को पराजित किया था।

    ➣ बादामी के चालुक्यों को अपदस्थ करने वाले राष्ट्रकूट मूलतः लट्टलूर (महाराष्ट्र के उस्मानाबाद जिले में वर्तमान लाटूर) के निवासी थे। लेखों में उन्हें लट्टलूरपुरवराधीश्वर कहा गया है।

    ➣ यह स्थान पहले कर्नाटक में था। इस कुल के लोग चालुक्यों के राज्य में जिलाधिकारी (राष्ट्रकूट) थे। उनकी मातृभाषा कन्नड़ थी। इस वंश के कुछ पूर्वज बरार में जाकर बस गए और 640 ई. में वहां उन्होंने सामंत पद प्राप्त कर लिया।

    साहित्य एवं संस्कृति

    अमोघवर्ष प्रथम का गुरु जिनसेन तथा कृष्ण द्वितीय का गुरु गुणभद्र था। श्री विजय और नरसिंह नामक राष्ट्रकूट सेनापति जैन थे।

    ➣ जैन आचार्य जिनसेन ने हरिवंश तथा पार्वाभ्युदय नामक ग्रन्थ लिखे। आदि पुराण नामक ग्रन्थ की रचना भी जिनसेन ने शुरू की किन्तु इसे पूर्ण इनके शिष्य गुणचन्द्र ने किया।

    ➣ इन्द्र तृतीय के समय त्रिविक्रम नामक विद्वान ने नल चम्पू लिखा।

    ➣ कृष्ण तृतीय के शासन काल में हलायुध ने कवि रहस्य लिखा तथा कन्नड़ भाषा के आदि कवि पम्पा ने आदि पुराण की रचना की।

    ➣ शान्ति पुराण का लेखक पोन्न संस्कृत और कन्नड़ दोनों भाषाओं का कवि था इसी कारण इसे उभय कवि चक्रवर्तिन की उपाधि दी गई है।

    ➣ राष्ट्रकूट नरेशों अमोघवर्ष प्रथम, कृष्ण द्वितीय, इन्द्र तृतीय और इन्द्र चतुर्थ ने जैन धर्म को राजकीय संरक्षण दिया।

    ➣ सतलोगी का त्रयी पुरूष मन्दिर उच्च शिक्षा का केन्द्र था। इसका निर्माण राष्ट्रकूटों ने करवाया था।

    ➣ अरब लेखक अबूजैद के अनुसार राष्ट्रकूट राजवंश की महिलाएं चेहरे पर पर्दा नहीं करती थी।”

    ➣ राष्ट्रकूटों ने अपने राज्य में अरब व्यापारियों को बसने, इस्लाम के प्रचार एवं मस्जिद बनवाने की स्वतंत्रता दी थी।

    ➣ दक्षिण से उत्तर भारत की राजनीति में हस्तक्षेप करने वाली दक्षिण की पहली शक्ति राष्ट्रकूट थी।

    कन्हेरी बौद्ध विहार को शिक्षा के प्रसिद्ध विश्वविद्यालय के रूप में ख्याति राष्ट्रकूटों के काल में मिली।

    ➣ राष्ट्रकूट शासन में ग्राम महाजन या ग्राम महत्तर (गांव के बुजुर्ग) गाँव के मुखिया की सहायता करते थे।

  • राष्ट्रकूट वंश (736-973 ई.) | Q&A Practice

    ➣ राष्ट्रकूट वंश की स्थापना 736 ई. में किसने की ?
    उत्तर : दंतिदुर्ग

    ➣ दंतिदुर्ग वातापी ने किस अंतिम चालुक्य शासक को पराजित करके दक्षिण में चालुक्यों की सत्ता समाप्त कर दी थी?
    उत्तर : कीर्तिवर्मा द्वितीय

    ➣ राष्ट्रकूट की प्रारंभिक राजधानी कहाँ थी?
    उत्तर : नासिक

    ➣ राष्ट्रकूट शासकों ने अपनी राजधानी नासिक से स्थान्तरित कर किसको बनाया ?
    उत्तर : मान्यखेत (आधुनिक मालखंड )

    ➣ दंतिदुर्ग किस धर्म से सम्बंधित था?
    उत्तर : ब्राह्मण धर्मावलम्बी

    ➣ दंतिदुर्ग का उत्तराधिकारी उसका चाचा बना। उसका क्या नाम था ?
    उत्तर : कृष्ण प्रथम (756-773 ई.)

    ➣ कृष्ण प्रथम ने एलोरा में किस सुप्रसिद्ध मंदिर का निर्माण करवाया?
    उत्तर : कैलाशनाथ मंदिर

    ➣ किस राष्ट्रकूट शासक ने गुर्जर प्रतिहार शासक वत्सराज और पाल शासक धर्मपाल को त्रिपक्षीय संघर्ष में पराजित किया ?
    उत्तर : ध्रुव (चौथा शासक)

    ➣ पांचवें शासक गोविंद तृतीय (793-814 ई.) ने उत्तरी भारत पर आक्रमण करके किस गुर्जर प्रतिहार शासक को पराजित किया?
    उत्तर : नागभट्ट द्वितीय

    ➣ किसके शासनकाल में राष्ट्रकूट साम्राज्य अपनी उन्नति के शिखर पर था?
    उत्तर : गोविंद तृतीय

    ➣ छठा शासक अमोघवर्ष (814-878 ई.) ने कहां पर राष्ट्रकूटों की नई राजधानी बनाई?
    उत्तर : मान्यखेत (मालखंड )

    ➣ अमोघवर्ष को राजनीति पर कन्नड़ की प्रथम कृति की रचना करने का श्रेय दिया जाता है। कन्नड़ में लिखी गयी उनके एक काव्य ग्रंथ का क्या नाम है?
    उत्तर : कविराजमार्ग

    ➣ अमोघवर्ष के किस दरबारी कवि ने ‘आदिपुराण’ की रचना की?
    उत्तर : जिनसेन

    ➣ राष्ट्रकूट शासक प्राचीन हिंदू धर्म के प्रबल समर्थक थे। किंतु अमोघवर्ष किस धर्म को मानता था ?
    उत्तर : जैन धर्म

    ➣ किस अरब यात्री ने अमोघवर्ष की गणना विश्व के तत्कालीन चार महान शासकों में की है?
    उत्तर : सुलेमान

    ➣ अरबों ने राष्ट्रकूट वंश के शासकों को क्या कहकर सम्बोधित किया है ?
    उत्तर : बल्हर (बलाहार या बल्लराज )

    ➣ कृष्ण द्वितीय तथा इंद्र तृतीय ने कन्नौज के किस तत्कालीन शासक को पराजित कर भागने पर विवश किया ?
    उत्तर : महिपाल

    ➣ किस राष्ट्रकूट शासक के शासनकाल में दक्षिण के चोल शासकों ने एक दीर्घकालीन संघर्ष आरम्भ किया, जो राष्ट्रकूटों के उत्तराधिकारी चालुक्यों के राज्यकाल में भी चलता रहा?
    उत्तर : कृष्ण तृतीय

    ➣ राष्ट्रकूट राजवंश का अंतिम प्रतापी राजा कौन था?
    उत्तर : कृष्ण तृतीय

    ➣ कृष्ण तृतीय ने किस चोल राजा के उत्तरी भाग पर अधिकार कर लिया ?
    उत्तर : राजराज प्रथम

    ➣ कृष्ण तृतीय ने दक्षिण में कई प्रदेशों को जीतकर किस शहर में एक विजयस्तंभ स्थापित किया एवं एक मंदिर का निर्माण कराया ?
    उत्तर : रामेश्वरम

    ➣ राष्ट्रकूट राजवंश का अंतिम शासक कौन था?
    उत्तर : कर्क द्वितीय

    ➣ किस चालुक्य शासक ने 973 ई. में इस वंश के अंतिम शासक को पराजित करके राजधानी मान्यखेत पर अधिकार कर लिया ?
    उत्तर : तैलप

    ➣ राष्ट्रकूट किनके उत्तराधिकारी थे?
    उत्तर : बादामी के चालुक्यों के

    ➣ दक्षिणी भारत का प्रसिद्ध ‘तक्कोलम का युद्ध’ किनके बीच हुआ था ?
    उत्तर : चोल एवं राष्ट्रकूटों के बीच

  • चालुक्य वंश (बादामी, वेंगी, कल्याणी) | Q&A Practice

    📚 विषय सूची

    बादामी (वातापी ) का चालुक्य वंश

    ➣ बादामी के चालुक्य वंश की स्थापना किसने की थी?
    उत्तर : पुलकेशिन प्रथम (535-566 ई.)

    ➣ छठी शताब्दी के मध्य से आठवीं शताब्दी के मध्य तक दक्षिणापथ पर बादामी के चालुक्यों का अधिपत्य रहा। इस शाखा को क्या कहा गया है?
    उत्तर : पूर्वकालीन पश्चिमी चालुक्य

    ➣ बादामी का चालुक्य की राजधान कहां स्थित थी?
    उत्तर : वातापी ( वर्तमान में कर्नाटक राज्य के बीजापुर जिले में स्थित)

    ➣ वातापी का प्रथम निर्माता किसे कहा जाता है?
    उत्तर : कीर्तिवर्मन प्रथम (566-97 ई.)

    ➣ कीर्तिवर्मन प्रथम ने कौन-सी उपाधियां धारण कीं?
    उत्तर : पृथ्वीवल्लभ और सत्याश्रय

    ➣ महाकूट स्तंभ लेख में कीर्तिवर्मन प्रथम को कौन-सा यज्ञ करने वाला कहा गया है ?
    उत्तर : बहुसुवर्ण अग्निष्टोम यज्ञ

    ➣ कोर्तिवर्मन प्रथम ने वातापी के गुहा मंदिरों का निर्माण कराना प्रारम्भ किया। किसने इन गुहा मंदिरों का निर्माण पूरा कराया?
    उत्तर : मंगलेश

    ➣ मंगलेश वैष्णव मत का अनुयायी था। इसे कौन-सी उपाधि दी गयी थी?
    उत्तर : परमभागवत

    ➣ पुलकेशिन प्रथम ने स्वयं को दिग्विजयी राजा घोषित करने के लिए किस यज्ञ का आयोजन कराया ?
    उत्तर : अश्वमेध यज्ञ

    ➣ कौन अपने चाचा मंगलेश व उसके सहयोगियों की हत्या कर 609-10 ई. में शासक बना?
    उत्तर : पुलकेशिन द्वितीय

    ➣ पुलकेशिन द्वितीय (608-642 ई.) में किस पल्लव नरेश द्वारा पराजित हुआ और मारा गया?
    उत्तर : नरसिंह वर्मा

    ➣ पुलकेशिन द्वितीय ने 637-638 ई. में कन्नौज के शासक हर्षवर्धन को पराजित करने के बाद कौन-सी उपाधि धारण की?
    उत्तर : परमेश्वर और दक्षिणापथेश्वर

    ➣ इस वंश के ऐतिहासिक प्रमाण के रूप में सर्वाधिक महत्वपूर्ण पुलकेशिन द्वितीय का ऐहोल अभिलेख है। इस अभिलेख की रचना किसने की थी?
    उत्तर : रविकीर्ति

    ➣ पुलकेशिन द्वितीय का ऐहोल अभिलेख एक प्रशस्ति के रूप में किस भाषा और लिपि में उत्कीर्ण है?
    उत्तर : संस्कृत भाषा और दक्षिणी ब्राह्मी लिपि

    ➣ चालुक्य शासक पुलकेशिन की हर्षवर्धन पर विजय का वर्ष क्या था?
    उत्तर : 618 ई.

    ➣ कहां के भित्ति चित्रों में ईरान के राजदूत का स्वागत करते हुए पुलकेशिन द्वितीय का चित्र दिखाई देता है?
    उत्तर : अजंता

    ➣ बादामी के चालुक्यों ने दो शताब्दियों तक दक्षिणापथ पर शासन किया। वे किस धर्म से संबंधित थे ?
    उत्तर : हिंदू

    ➣ बादामी के चालुक्य वंश में मंत्रीपरिषद का अस्तित्व नहीं था। यह कथन सत्य है या असत्य?
    उत्तर : सत्य

    ➣ मालवा जीतने के बाद किसने सकलोत्तरपथनाथ की उपाधि धारण की?
    उत्तर : – विनयादित्य

    ➣ किस चालुक्य शासक ने ईरान, श्रीलंका और कामेर के राजाओं से शुल्क वसूल किये?
    उत्तर : विक्रमादित्य प्रथम

    ➣ 655 ई. में किस राजा ने चालुक्य शक्ति पुनः प्रतिष्ठित किया?
    उत्तर : पुलकेशिन के पुत्र विक्रमादित्य प्रथम ने

    ➣ 740 ई. में किस चालुक्य नरेश ने पल्लवों की राजधानी कांची पर अधिकार कर लिया ?
    उत्तर : विक्रमादित्य द्वितीय

    ➣ विक्रमादित्य द्वितीय ने पल्लव नरेश नन्दिवर्मा द्वितीय को परास्त कर कौन-सी उपाधि धारण की?
    उत्तर : कांचीकोंड

    ➣ विक्रमादित्य द्वितीय के काल में अरबों ने दक्कन पर आक्रमण किया, जिसका सफल मुकाबला उसके भतीजे पुलकेशी ने किया। इसके लिए विक्रमादित्य द्वितीय ने पुलकेशी को कौन-सी उपाधि प्रदान की?
    उत्तर : अवनिजनाश्रय

    ➣ किस चालुक्य शासक की पहली पत्नी लोकमहादेवी ने पट्टदकल में विरूपाक्षमहादेव मंदिर और दूसरी पत्नी त्रैलोक्यदेवी ने त्रैलोकेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया?
    उत्तर : विक्रमादित्य द्वितीय

    ➣ चालुक्य वंश का अंतिम शासक कौन था?
    उत्तर : दंतिदुर्ग

    ➣ किसने बादामी के चालुक्य वंश के अंतिम शासक को दंतिदुर्ग ने पराजित कर राष्ट्रकूट वंश की स्थापना की कीर्तिवर्मन द्वितीय

    कल्याणी का चालुक्य वंश

    ➣ राष्ट्रकूट शासक कर्क को पराजित कर किसने कल्याणी के चालुक्य वंश की स्थापना की?
    उत्तर : तैलप द्वितीय

    ➣ कल्याणी के चालुक्यों का पारिवारिक चिह्न क्या था?
    उत्तर : वराह

    ➣ किस राजा ने चालुक्यों की राजधानी मान्यखेत से कल्याणी स्थानांतरित की?
    उत्तर : सोमेश्वर प्रथम

    ➣ कोप्पम और कुडलसंगम के युद्ध में चोल शासक राजेन्द्र से मिली लगातार हार के बाद सोमेश्वर प्रथम ने किस नदी में डूबकर आत्महत्या कर ली ?
    उत्तर : तुंगभद्रा नदी

    ➣ ‘विक्रमांक’ के नाम से विख्यात विक्रमादित्य षष्ठ (1076-1126 ई.) ने राज्यारोहण के समय 1076 ई. में किस संवत् की शुरुआत की ?
    उत्तर : विक्रम संवत्

    ➣ विक्रमादित्य षष्ठ ने किस नये नगर की स्थापना की?
    उत्तर : विक्रमपुर

    ➣ विक्रमादित्य षष्ठ की राजसभा में विल्हण और विज्ञानेश्वर मिश्र नामक लेखक रहते थे। इनमें से कौन राजकवि था?
    उत्तर : विल्हण

    ➣ विक्रमांकदेवचरित के लेखक कौन हैं?
    उत्तर : विल्हण

    ➣ विज्ञानेश्वर मिश्र की प्रसिद्ध कृति का क्या नाम है?
    उत्तर : मिताक्षरा ( हिन्दू विधि ग्रंथ)

    ➣ बंगाल को छोड़कर शेष भारत में किसको हिंदू कानून का सबसे आधिकारिक ग्रंथ माना जाता है?
    उत्तर : मिताक्षरा

    ➣ मिताक्षरा’ किस स्मृति पर आधारित एक प्रसिद्ध टोका है ?
    उत्तर : याज्ञवल्क्य स्मृति

    ➣ सोमेश्वर तृतीय ने कौन-सी उपाधियां धारण कीं?
    उत्तर : भूलोकमल्ल और त्रिभुवनमल्ल

    ➣ सोमेश्वर तृतीय स्वयं एक विद्वान व्यक्ति था। इसने किस शिल्पशास्त्र की रचना की?
    उत्तर : मानसोल्लास

    ➣ कल्याणी के चालुक्य वंश का अंतिम शासक कौन था?
    उत्तर : सोमेश्वर चतुर्थ

    ➣ किस वंश के राजचिह्नों में मयूरध्वज भी शामिल था?
    उत्तर : कल्याणी का चालुक्य वंश

    वेंगी का चालुक्य

    ➣ वातापी के प्रसिद्ध चालुक्य सम्राट ने 615 ई. में वेंगी में चालुक्य वंश की स्थापना की?
    उत्तर : कुब्ज विष्णुवर्धन

    ➣ वेंगी का चालुक्यों की राजधानी वेंगी में थी, जो वर्तमान में किस राज्य में स्थित है?
    उत्तर : आंध्र प्रदेश

    ➣ वेंगी का राज्य चालुक्यों के मुख्य राजवंश, जिसने कल्याणी को राजधानी बनाकर शासन किया, के राज्य से पूर्व में स्थित था। इसलिए इनको इतिहास में क्या कहा गया है?
    उत्तर : पूर्वी चालुक्य

    ➣ इस वंश के सबसे प्रतापी राजा विजयादित्य तृतीय था। इसका सेनापति कौन था?
    उत्तर : पंडरंग

    ➣ वेंगी के चालुक्य वंश का अंतिम शासक कौन था?
    उत्तर : कुलोत्तुंग चोलदेव

    ➣ वेंगी के किस चालुक्य राजा ने चोल वंश का राज्य भी प्राप्त हुआ था?
    उत्तर : राजेन्द्र कुलोत्तुंग / कुलोत्तुंग चोलदेव

    ➣ किस वर्ष के बाद वेंगी के राजवंश की अपनी कोई पृथक् सत्ता नहीं रह गयी थी ?
    उत्तर : 1070

    ➣ 738 ईस्वी में अरबों को किन्होंने पराजित किया था?
    उत्तर : चालुक्यों ने

    ➣ चीन में 72 व्यापारी किसके कार्यकाल में भेजे गये थे?
    उत्तर : कुलोत्तुंग प्रथम

  • गंग वंश | Q&A Practice

    ➣ गंग वंश के प्रथम शासक कौन था?
    उत्तर : कोंगनिवर्मा

    ➣ 983 ई. में गंग चतुर्थ के किस मंत्री ने श्रवणबेलगोला में गोमतेश्वर की 56.5 फुट ऊंची विशाल प्रतिमा का निर्माण कराया?
    उत्तर : सेनापति चावुंडराय

    ➣ श्रवणबेलगोला में भगवान बाहुबली की मूर्ति किसके शासन काल में बनायी गयी?
    उत्तर : पश्चिमी गंगा वंश (बाहुबली की इस मूर्ति या प्रतिमा का निर्माण

    ➣ पूर्वी गंग वंश ने 1028 से 1434-35 ई. तक कहां पर शासन किया?
    उत्तर : कलिंग पर

    ➣ किस पूर्वी गंग शासक ने 1028 ई. में ‘त्रिकलिंगाधिपति’ (तीन कलिंगों का शासक) की उपाधि धारण की थी?
    उत्तर : वज्रास्त तृतीय

    ➣ किस गंग शासक का शासन उत्तर में गंगा के उद्गम स्थल से लेकर दक्षिण में गोदावरी के उद्गम स्थल तक फैला हुआ था ?
    उत्तर : अनंतवर्मन कोडगंगदेव

    ➣ अनंतवर्मन कोडगंगदेव ने 11वीं शताब्दी के अंत में पुरी में किस विशाल मंदिर का निर्माण आरंभ करवाया?
    उत्तर : जगन्नाथ मंदिर

    ➣ गंग वंश के किस शासक ने 1243 ई. में कोणार्क का विश्वभर में प्रसिद्ध सूर्य मंदिर बनवाया था?
    उत्तर : नरसिंह देव प्रथम ने

    ➣ पूर्वी गंग वंश के किस शासक ने भुवनेश्वर स्थित लिंगराज मंदिर का निर्माण करवाया था?
    उत्तर : केसरी

    ➣ अकबर ने किस वर्ष ओडिशा को अपने अधीन कर अपने शासन में शामिल कर लिया?
    उत्तर : सन् 1592 में

    ➣ मुगलों के पतन के बाद और सन् 1803 में ब्रिटिश राज से पहले ओडिशा पर किसका अधिकार रहा ?
    उत्तर : मराठों का

    ➣ 1264 ई. में किसकी मृत्यु के साथ ही पूर्वी गंग वंश का पतन शुरू हो गया?
    उत्तर : नरसिंह प्रथम

    ➣ गंग वंश के अंतिम प्रसिद्ध शासक के मंत्री कपिलेंद्र ने उन्हें सत्ताच्युत करके 1434-35 में किस वंश की नींव रखी ?
    उत्तर : सूर्य वंश

    ➣ गंगों की प्रथम राजधानी कहां बनायी गयी थी?
    उत्तर : कोलार

  • पल्लव वंश (575-897 ई.) | Q&A Practice

    ➣ पल्लव वंश की स्थापना 575ई. में किसने की?
    उत्तर : सिंह विष्णु (575-600 ई.)

    ➣ शासन करने से पहले पल्लव किनके सामंत हुआ करते थे?
    उत्तर : सातवाहनों के

    ➣ पल्लव वंश की प्रथम जानकारी कहाँ से मिलती है?
    उत्तर : हरिषेण की प्रयाग प्रशस्ति और ह्वेनसांग के यात्रा वृत्तांतों से

    ➣ पल्लवों की राजधानी कहां थी?
    उत्तर : कांची/ कांचीपुरम, तमिलनाडु

    ➣ सुप्रसिद्ध लेखक भारवि सिंह विष्णु के दरबार में थे। उन्होंने किस प्रमुख पुस्तक की रचना की?
    उत्तर : किरातार्जुनीयम्

    ➣ सिंह विष्णु ने कहां आदिवराह मंदिर का निर्माण करवाया?
    उत्तर : मामल्लपुरम

    ➣ पल्लव वंश के दुसरे राजा महेन्द्रवर्मन प्रथम को किस चालुक्य शासक ने पराजित किया था?
    उत्तर : पुलकेशिन द्वितीय

    ➣ महेन्द्रवर्मन प्रथम ने किस हास्य व्यंग्य नाटक की रचना की?
    उत्तर : मत्ताविलासप्रहासन

    ➣ अपने शासनकाल में किस पल्लव शासक ने मतविलास, विचित्रचित और गुणभार नामक उपाधियां धारण कों?
    उत्तर : महेन्द्रवर्मन प्रथम

    ➣ चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय को लगभग 642 ई. किस पल्लव राजा ने पराजित कर ‘वातापिकोंड’ और ‘महामल्ल’ की उपाधि धारण की?
    उत्तर : नरसिंह वर्मन प्रथम

    ➣ किस पल्लव शासक ने चोल, चेर और पांड्य शासकों को भी पराजित किया?
    उत्तर : नरसिंह वर्मन प्रथम

    ➣ नरसिंह वर्मन प्रथम के शासनकाल के दौरान 641 ई. में किस चीनी यात्री ने कांचीपुरम का दौरा किया था?
    उत्तर : ह्वेनसांग

    ➣ नरसिंह वर्मन प्रथम ने किस शहर की स्थापना कर वहां प्रसिद्ध अखंड (एकल पत्थर से बना गुम्बद ) रॉककर मंदिरों की स्थापना की?
    उत्तर : महाबलीपुरम ( मामल्लपुरम )

    ➣ महाबलीपुरम के एकाश्म मंदिर, जिन्हें रथ मंदिर भी कहा जाता है। इन रथ मंदिरों में से सबसे छोटा मंदिर कौन-सा है ?
    उत्तर : द्रौपदी रथ मंदिर

    ➣ कौन-सा पल्लव राजा विक्रमादित्य प्रथम के द्वारा मारा गया था ?
    उत्तर : महेन्द्रवर्मन द्वितीय

    ➣ अरबों के आक्रमण के समय पल्लवों का शासक कौन था नरसिंह वर्मन द्वितीय

    ➣ कांची में कैलाशनाथ मंदिर का निर्माण किसने करवाया, जिसको राजसिद्धेश्वर मंदिर भी कहा जाता है?
    उत्तर : नरसिंह वर्मन द्वितीय ने

    ➣ राजसिद्धेश्वर मंदिर के निर्माण से किस स्थापत्य कला की शुरुआत की गयी?
    उत्तर : द्रविड़ स्थापत्य कला

    ➣ नरसिंह वर्मन द्वितीय के दरबार में रहने वाले उस प्रसिद्ध लेखक का क्या नाम है, जिन्होंने ‘दशकुमारचरित’ की रचना की ?
    उत्तर : दण्डी

    ➣ कांची के मुक्तेश्वर मंदिर और बैकुण्ठ पेरूमल मंदिर का निर्माण किस पल्लव राजा ने कराया ?
    उत्तर : नन्दिवर्मन द्वितीय

    ➣ प्रसिद्ध वैष्णव संत तिरुमंगई अलवार किस पल्लव राजा के समकालीन थे?
    उत्तर : नन्दिवर्मन द्वितीय

    ➣ नन्दिकुलम्बकम’ के लेखक पोरुन्देवनार को किस राजा द्वारा राजाश्रय प्राप्त था?
    उत्तर : नन्दिवर्मन तृतीय

    ➣ पल्लव वंश का अंतिम शासक कौन था?
    उत्तर : अपराजित (879-897 ई.)

    ➣ पल्लव शासक अपराजित ने विरुत्तनि में किस मंदिर का निर्माण करवाया था?
    उत्तर : वीरट्टानेश्वर मंदिर

    ➣ पल्लव वंश के प्रारम्भिक अभिलेख प्राकृत भाषा में मिले हैं। बाद के अभिलखों में किस भाषा का इस्तेमाल हुआ है?
    उत्तर : संस्कृत

    ➣ पल्लव अभिलेखों में भी पल्लवों को ब्राह्मण, भारद्वाजगोत्रीय तथा अश्वात्थामा का वंशज कहा गया है। किस अभिलेख में उन्हें क्षत्रिय कहा गया है?
    उत्तर : तालगुण्ड अभिलेख

    ➣ अधिकांश पल्लव राजा वैष्णव थे। आचार्य अय्यर ने पल्लव राज्य में शैव मत का प्रचार-प्रसार किया। उनके प्रभाव से कौन-सा राजा शैव हो गया ?
    उत्तर : महेन्द्र वर्मन प्रथम

    ➣ पल्लवों के राजनीतिक तथा सांस्कृतिक उत्कर्ष का केन्द्र कहाँ था?
    उत्तर : कांची

    ➣ पल्लवों का मूल निवास कहां था ?
    उत्तर : तोण्डमण्डलम्

    ➣ कांचीपुरम में उपलब्ध हुए दो ताम्रपत्रों में किस राजा के दान पुण्य तथा उसके लिए ‘युवमहाराजय’ और ‘धम्ममहाराजाधिराज’ नामक उपाधियों का उल्लेख है?
    उत्तर : स्कन्दवर्मा

    ➣ कांची के पल्लव नरेश किस धर्म के अनुयायी थे?
    उत्तर : ब्राह्मण धर्मानुयायी

    ➣ पल्लव राजाओं का शासन काल किनके भक्ति आंदालनों के लिए प्रसिद्ध रहा?
    उत्तर : नयनार (शैव ) तथा अलवार (वैष्णव)

    ➣ नरसिंह वर्मन प्रथम ने शिव की उपासना में कई मंदिर बनवाए थे।

    ➣ पल्लव राजा परमेश्वर वर्मन प्रथम शिव का उपासक था, जिसके कारण उसको कौन-सी उपाधि मिली?
    उत्तर : परममाहेश्वर

    ➣ दक्षिण भारत में किस धार्मिक आंदोलन का प्रारम्भ पल्लवों के राज्य से हुआ?
    उत्तर : वैष्णव आंदोलन

    ➣ कौन-सी वास्तुकला दक्षिण की द्रविड़ शैली का आधार बनी?
    उत्तर : पल्लव वास्तुकला

    ➣ चट्टान काटकर बनाये गये मंदिर किस काल में विकसित हुए?
    उत्तर : पल्लव काल

    ➣ पल्लव वास्तुकला के चार प्रमुख स्थलों में से तीन हैं-महाबलीपुरम, पुडुकोटई और तंजौर, चौथा स्थल कौन-सा हैं ?
    उत्तर : कांचीपुरम

    ➣ किस पल्लव शासक के शासनकाल में पल्लवों और चालुक्यों के बीच लंबा संघर्ष शुरू हो गया था?
    उत्तर : महेन्द्र वर्मन प्रथम

  • चोल, चालुक्य, पल्लव, संगम युग MCQ प्रश्न | UPSC

    1. चोल काल किसके लिए प्रसिद्ध था?
    (a) ग्राम पंचायत (Village Assembly)
    (b) राष्ट्रकूट राजवंश के साथ युद्ध
    (c) श्रीलंका के साथ व्यापार
    (d) तमिल संस्कृति की उन्नति
    63rd B.P.S.C. (Pre) 2017
    उत्तर-(a)
    चोल काल अपनी विकसित ग्राम सभाओं के लिए इतिहास में विशेष स्थान रखता है। ये सभाएं तीन प्रकार की होती थीं — ‘उर’ (सामान्य ग्रामसभा), ‘सभा’ या ‘महासभा’ (ब्राह्मण बहुल गांवों में) और ‘नगरम्’ (व्यापारिक बस्तियों में)। ग्राम प्रशासन में ‘वारियम्’ नामक समितियाँ होती थीं जो भूमि, बगीचे, तालाब आदि की देख-रेख करती थीं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: उत्तरमेरूर शिलालेख (Uttaramerur Inscription), जो 10वीं शताब्दी का है, चोल ग्राम सभाओं के चुनाव नियमों का विस्तृत विवरण देता है — इसमें उम्मीदवारों की योग्यता, अयोग्यता और कार्यकाल तक का उल्लेख है। यह विश्व के प्राचीनतम लिखित लोकतांत्रिक दस्तावेजों में से एक माना जाता है।
    2. कुशल ग्रामीण प्रशासन के लिए प्रसिद्ध राजवंश था-
    (a) चोल
    (b) राष्ट्रकूट
    (c) चालुक्य
    (d) पल्लव
    M.P.P.C.S. (Pre) 2014
    उत्तर-(a)
    दक्षिण भारत के राजवंशों में चोल अपने सुव्यवस्थित ग्रामीण प्रशासन के लिए सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। चोल साम्राज्य में ग्राम स्वशासन इतना सुदृढ़ था कि राजतंत्र के बावजूद गाँव अपने आंतरिक प्रशासन में पूर्णतः स्वायत्त थे। ग्रामसभाएं न्याय, कर संग्रह, सिंचाई और भूमि प्रबंधन जैसे कार्य स्वयं संभालती थीं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चोल काल में ‘सभा’ के सदस्यों को ‘वारियपेरुमक्कल’ कहा जाता था। इन समितियों में भ्रष्टाचार रोकने के लिए नियम थे — यदि कोई सदस्य अपने या अपने रिश्तेदार के मामले में निर्णय लेता, तो उसे अयोग्य घोषित किया जा सकता था।
    3. नवीं शताब्दी ई. में निम्नलिखित में से किसके द्वारा चोल साम्राज्य की नींव डाली गई ?
    (a) कृष्ण I
    (b) राजराज चोल
    (c) विजयालय
    (d) परांतक
    R.A.S. / R.T.S (Pre) 2016
    उत्तर-(c)
    मध्यकालीन चोल साम्राज्य की स्थापना विजयालय ने लगभग 850 ई. में की थी। वह पहले पल्लव राजाओं के अधीन एक सामंती सरदार था। पल्लवों और पाण्ड्यों के आपसी संघर्ष का लाभ उठाकर उसने तंजौर (तंजावुर) पर अधिकार कर लिया और वहाँ देवी दुर्गा का एक मंदिर बनवाया। विजयालय ने लगभग 871 ई. तक शासन किया और मध्यकालीन चोल वंश की नींव रखी।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: विजयालय के पुत्र आदित्य प्रथम ने पल्लव राजा अपराजित को पराजित कर पल्लव सत्ता का पूर्णतः अंत कर दिया और चोल साम्राज्य का विस्तार किया। संगम काल में भी चोल वंश अस्तित्व में था, जिसकी राजधानी उरैयूर थी — यह मध्यकालीन चोलों से भिन्न एवं पुराना वंश था।
    4. चोलों की राजधानी थी-
    (a) कावेरीपत्तन
    (b) महाबलीपुरम्
    (c) कांची
    (d) तंजौर
    U.P. Lower Sub. (Pre) 2009
    उत्तर-(d)
    मध्यकालीन चोल साम्राज्य की प्रमुख राजधानी तंजौर (तंजावुर) थी। बाद में राजेंद्र चोल प्रथम ने गंगैकोंडचोलपुरम् नामक नई राजधानी बसाई, जो उनकी उत्तर भारत विजय की स्मृति में बनाई गई थी। संगम काल में चोलों की राजधानी उरैयूर थी और कावेरीपट्टनम् (पुहार) उनका प्रमुख बंदरगाह नगर था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गंगैकोंडचोलपुरम् में राजेंद्र प्रथम ने एक भव्य शिव मंदिर बनवाया जो तंजौर के बृहदीश्वर मंदिर की प्रतिकृति के रूप में निर्मित था। तंजौर आज भी तमिलनाडु की ‘सांस्कृतिक राजधानी’ के रूप में जाना जाता है।
    5. चोलों का राज्य किस क्षेत्र में फैला था ?
    (a) विजयनगर क्षेत्र
    (b) मालाबार तट
    (c) होयसल
    (d) कोरोमंडल तट, दक्कन के कुछ भाग
    U.P.P.C.S. (Pre) 1991
    उत्तर-(d)
    चोल साम्राज्य मुख्यतः कोरोमंडल तट (पूर्वी तट) पर फैला था, जिसमें वर्तमान तमिलनाडु का अधिकांश भाग, दक्कन के कुछ क्षेत्र तथा उरैयूर, कावेरीपट्टनम् और तंजावुर जैसे महत्वपूर्ण केंद्र सम्मिलित थे। राजेंद्र चोल प्रथम के काल में साम्राज्य का विस्तार श्रीलंका, मालदीव और दक्षिण-पूर्व एशिया तक हो गया था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: राजेंद्र चोल प्रथम ने 1025 ई. में श्रीविजय साम्राज्य (वर्तमान मलेशिया-इंडोनेशिया) पर नौसैनिक अभियान चलाया — यह भारतीय इतिहास के सबसे दूरगामी नौसैनिक अभियानों में से एक था, जिसने हिंद महासागर व्यापार मार्गों पर चोलों का वर्चस्व स्थापित किया।
    6. किस दक्षिण भारतीय राज्य में उत्तम ग्राम प्रशासन था ?
    (a) चेर
    (b) चालुक्य
    (c) चोल
    (d) वातापी
    U.P.P.C.S. (Pre) 1991
    उत्तर-(c)
    दक्षिण भारत के सभी प्रमुख राज्यों में चोल साम्राज्य का ग्राम प्रशासन सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। चोल काल में गाँव एक स्वायत्त इकाई के रूप में कार्य करते थे। ग्राम सभाओं की ‘वारियम्’ (उपसमितियाँ) अलग-अलग विभागों जैसे तालाब, बगीचे, मंदिर संपत्ति आदि की देखभाल करती थीं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चोल काल में ‘नाडु’ नामक प्रशासनिक इकाई भी होती थी, जो कई गांवों का समूह थी। ‘नाडु’ की अपनी सभा होती थी जिसे ‘नाट्टार’ कहते थे। इस प्रकार चोल प्रशासन गाँव से लेकर ‘मंडलम्’ तक एक सुव्यवस्थित बहुस्तरीय ढाँचे पर आधारित था।
    7. निम्नलिखित में से किस मंदिर परिसर में एक भारी-भरकम नंदी की मूर्ति है, जिसे भारत की विशालतम नंदी मूर्ति माना जाता है ?
    (a) वृहदीश्वर मंदिर
    (b) लिंगराज मंदिर
    (c) कंदरिया महादेव मंदिर
    (d) लेपाक्षी मंदिर
    U.P.P.C.S. (Pre) 1999
    उत्तर-(a)
    तंजौर का बृहदीश्वर मंदिर (राजराजेश्वर मंदिर) चोल स्थापत्य कला का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है। इस मंदिर का 500′ × 250′ का विशाल प्रांगण, ऊँचा विमान (शिखर) और प्रवेशद्वार पर द्वारपालों की मूर्तियाँ इसे अनोखा बनाती हैं। मंदिर के बाहरी भाग में एकाश्म (एक ही पत्थर से निर्मित) नंदी की विशाल मूर्ति स्थापित है, जिसे भारत की सबसे बड़ी नंदी प्रतिमा माना जाता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बृहदीश्वर मंदिर को UNESCO ने 1987 में ‘ग्रेट लिविंग चोल टेम्पल्स’ के अंतर्गत विश्व धरोहर स्थल घोषित किया। इस मंदिर का 66 मीटर ऊँचा विमान (शिखर) अपने ऊपर एक 80 टन के ग्रेनाइट पत्थर को धारण करता है, जिसे बिना क्रेन के ढलान पथ (inclined plane) के माध्यम से चढ़ाया गया था — यह तत्कालीन अभियांत्रिकी की अद्भुत उपलब्धि है।
    8. निम्नलिखित में कौन चोल प्रशासन की विशेषता थी?
    (a) साम्राज्य का मंडलम में विभाजन
    (b) ग्राम प्रशासन की स्वायत्तता
    (c) राज्य के मंत्रियों को समस्त अधिकार
    (d) कर संग्रह प्रणाली का सस्ता व उचित होना
    U.P.P.C.S. (Pre) 1995
    उत्तर-(b)
    चोल प्रशासन की सबसे प्रमुख विशेषता स्वायत्त ग्राम प्रशासन था। ग्राम सभाएं अपनी भूमि, जलाशय, मंदिर और स्थानीय विवादों का प्रबंधन स्वयं करती थीं। केंद्रीय शासन इनके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता था, बल्कि ये सभाएं राज्य को कर संग्रह में सहयोग देती थीं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चोल साम्राज्य प्रशासनिक दृष्टि से ‘मंडलम्’ (प्रांत), ‘वलनाडु’ (जिला), ‘नाडु’ (तालुका), और ‘ग्राम’ में विभाजित था। यह बहुस्तरीय विकेंद्रीकृत व्यवस्था आधुनिक संघीय ढाँचे की प्रारंभिक अवधारणा से मेल खाती है।
    9. चोल युग प्रसिद्ध था, निम्न के लिए-
    (a) धार्मिक विकास
    (b) ग्रामीण सभाएं
    (c) राष्ट्रकूटों से युद्ध
    (d) लंका से व्यापार
    R.A.S. / R.T.S. (Pre) 1993
    उत्तर-(b)
    चोल युग में ग्रामीण सभाओं की एक सुदृढ़ व्यवस्था थी जो तत्कालीन भारत में अद्वितीय थी। इन सभाओं को कर लगाने, स्थानीय विवाद सुलझाने और सार्वजनिक निर्माण कार्यों की देखरेख करने के अधिकार प्राप्त थे। यह व्यवस्था इतनी सक्षम थी कि राजसत्ता परिवर्तन होने पर भी ग्रामीण जीवन अप्रभावित रहता था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चोल काल में ‘देवदान’ और ‘ब्रह्मदेय’ नामक भूमि-अनुदान प्रचलित थे, जिनमें क्रमशः मंदिर और ब्राह्मणों को भूमि दी जाती थी। ऐसी भूमि पर राजकीय कर नहीं लगता था, और इनका प्रबंधन भी संबंधित ग्राम सभा ही करती थी।
    10. तंजौर का वृहदीश्वर मंदिर निर्मित हुआ था, शासनकाल में चोल सम्राट-
    (a) परांतक प्रथम के
    (b) राजराज प्रथम के
    (c) राजेंद्र प्रथम के
    (d) राजाधिराज प्रथम के
    U.P.P.C.S. (Mains) 2008
    उत्तर-(b)
    तंजौर का बृहदीश्वर मंदिर (जिसे राजराजेश्वर मंदिर भी कहते हैं) चोल सम्राट राजराज प्रथम के शासनकाल में 1010 ई. में बनकर पूर्ण हुआ। यह द्रविड़ स्थापत्य शैली का सर्वश्रेष्ठ नमूना है। मंदिर का विशाल विमान (शिखर) तथा प्रांगण में एकाश्म नंदी मूर्ति इसे विशेष बनाती है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: राजराज प्रथम (985–1014 ई.) ने न केवल यह मंदिर बनवाया, बल्कि तमिल साहित्य की महान कृति ‘तेवारम्’ (शैव भजन संग्रह) को संकलित करवाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने मंदिर की दीवारों पर नृत्य करती हुई देवांगनाओं की अत्यंत सजीव मूर्तियाँ बनवाईं, जो चोल कला की परिपक्वता का प्रमाण हैं।
    11. 72 व्यापारी, चीन में किसके कार्यकाल में भेजे गए थे?
    (a) कुलोत्तुंग-I
    (b) राजेंद्र – I
    (c) राजराज-I
    (d) राजाधिराज-I
    U.P.P.C.S. (Pre) 1992
    उत्तर-(a)
    चोल शासक कुलोत्तुंग प्रथम (1070–1120 ई.) के शासनकाल में वर्ष 1077 ई. में 72 व्यापारियों का एक दूत मंडल चीन के सुन्ग वंश के दरबार में भेजा गया था। यह चोल-चीन संबंधों का एक महत्वपूर्ण अध्याय है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कुलोत्तुंग प्रथम चालुक्य-चोल वंश का संस्थापक माना जाता है, क्योंकि वह पूर्वी चालुक्य और चोल दोनों वंशों से संबंधित था। इसके अलावा, कुलोत्तुंग प्रथम ने श्रीलंका पर अपना आधिपत्य बनाए रखा और उसे कर देने से मुक्त कर दिया, जिससे उसे ‘शुंगम् तविर्त्त’ (करों को हटाने वाला) की उपाधि मिली।
    12. कौन-सा मध्यकालीन भारतीय साम्राज्य व्यापक स्तर पर स्थानीय स्वशासन के लिए प्रसिद्ध था?
    (a) चालुक्य
    (b) चोल
    (c) सोलंकी
    (d) परमार
    66th B.P.S.C. (Pre) 2020
    उत्तर-(b)
    चोल साम्राज्य मध्यकालीन भारत में स्थानीय स्वशासन की अत्यंत विकसित व्यवस्था के लिए विख्यात था। चोलों के अंतर्गत ग्रामीण स्तर पर ‘उर’, ‘सभा’ और ‘नगरम्’ जैसी स्वायत्त संस्थाएँ कार्य करती थीं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चोल काल की ग्राम सभाओं का सबसे विस्तृत विवरण तमिलनाडु के उत्तरमेरूर शिलालेखों (919 ई. और 921 ई.) से मिलता है, जो परांतक प्रथम के शासनकाल के हैं। इन अभिलेखों में समिति सदस्यों की योग्यताएँ, चुनाव प्रक्रिया और अयोग्यता के नियम तक अंकित हैं, जो इस व्यवस्था की परिपक्वता को दर्शाते हैं।
    13. शिव की ‘दक्षिणामूर्ति’ प्रतिमा उन्हें किस रूप में प्रदर्शित करती है?
    (a) शिक्षक
    (b) नृत्य करते हुए
    (c) विश्राम करते हुए
    (d) ध्यानमग्न
    U.P.P.C.S. (Pre) 2013
    उत्तर-(a)
    शिव की ‘दक्षिणामूर्ति’ प्रतिमा में उन्हें परम गुरु (शिक्षक) के रूप में दर्शाया जाता है। इस प्रतिकृति में शिव दक्षिण दिशा की ओर मुख करके वृक्ष के नीचे बैठे होते हैं और अपने भक्तों व शिष्यों को योग, ज्ञान, संगीत और शास्त्रों की शिक्षा देते हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘दक्षिणामूर्ति’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है ‘दक्षिण दिशा की ओर मुख करने वाले’, क्योंकि दक्षिण दिशा को मृत्यु के देवता यम की दिशा माना जाता है और शिव मृत्यु पर विजेता हैं। इस स्वरूप में शिव के चार शिष्यों — सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार — को उनके चरणों में बैठे दर्शाया जाता है।
    14. चोल काल में निर्मित नटराज की कांस्य प्रतिमाओं में देवाकृति प्रायः
    (a) अष्टभुज है
    (b) षड्भुज है
    (c) चतुर्भुज है
    (d) द्विभुज है
    I.A.S. (Pre) 1995
    उत्तर-(c)
    चोल काल में निर्मित नटराज की कांस्य प्रतिमाओं में शिव की आकृति सामान्यतः चतुर्भुज (चार भुजाओं वाली) होती है। इन प्रतिमाओं में शिव को आनंद तांडव नृत्य की मुद्रा में दिखाया जाता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: नटराज की इन प्रतिमाओं में शिव के चारों ओर एक ज्वाला-मण्डल (प्रभामण्डल) होता है जिसे ‘तिरुवासि’ या ‘प्रभावली’ कहते हैं, जो सृष्टि-चक्र का प्रतीक है। प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी फ्रिट्जोफ काप्रा ने अपनी पुस्तक ‘The Tao of Physics’ में नटराज की इस नृत्य-मुद्रा की तुलना आधुनिक परमाणु भौतिकी के ऊर्जा नृत्य से की है।
    15. चोलों के अधीन ग्राम प्रशासन के बहुत से ब्यौरे जिन शिलालेखों में हैं, वे कहां हैं? उत्तर मेरूर
    (a) तंजावुर
    (b) उरैयूर
    (c) कांचीपुरम
    (d)
    I.A.S. (Pre) 1993
    उत्तर-(d)
    चोल शासनकाल में ग्राम सभाओं और उनकी कार्यकारिणी समितियों (‘वारियम्’) की विस्तृत कार्यप्रणाली का वर्णन उत्तरमेरूर (वर्तमान तमिलनाडु) के शिलालेखों में मिलता है। प्रत्येक गाँव की अपनी स्वतंत्र सभा होती थी जो केंद्रीय नियंत्रण से प्रायः मुक्त होकर कार्य करती थी।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: उत्तरमेरूर के शिलालेखों में ‘कुडवोलई’ प्रणाली का उल्लेख है — यह एक प्रकार की लॉटरी प्रणाली थी जिसमें ताड़ के पत्तों पर उम्मीदवारों के नाम लिखकर एक बर्तन में डाले जाते थे और बच्चे द्वारा यादृच्छिक रूप से नाम निकाले जाते थे। यह विश्व की प्राचीनतम लोकतांत्रिक चुनाव प्रणालियों में से एक मानी जाती है।
    16. निम्न कथनों पर विचार कीजिए-
    1. चोलों ने पाण्ड्य तथा चेर शासकों को पराजित कर प्रायद्वीपीय भारत पर प्रारंभिक मध्यकालीन समय में अपना प्रभुत्व स्थापित किया।
    2. चोलों ने दक्षिण-पूर्वी एशिया के शैलेंद्र साम्राज्य के विरुद्ध सैन्य चढ़ाई की तथा कुछ क्षेत्रों को जीता। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
    (a) केवल 1
    (b) केवल 2
    (c) दोनों 1 और 2
    (d) दोनों में से कोई भी नहीं
    I.A.S. (Pre) 2003
    उत्तर-(c)
    दोनों कथन सही हैं। चोल शासक परांतक प्रथम ने पाण्ड्य राजा को पराजित कर ‘मदुरैकोंड’ की उपाधि ली, तथा राजराज प्रथम ने चेर (केरल) को कंडलूर के युद्ध में हराया। राजराज प्रथम एवं उनके पुत्र राजेंद्र प्रथम ने दक्षिण-पूर्वी एशिया के शैलेंद्र साम्राज्य (सुमात्रा-मलाया क्षेत्र) पर सफल सैन्य अभियान चलाया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: राजेंद्र प्रथम का यह समुद्री अभियान (लगभग 1025 ई.) भारतीय इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण नौसैनिक अभियानों में से एक था, जिसमें चोल सेना ने श्रीविजय साम्राज्य के कई बंदरगाहों को जीता। इसी विजय के उपलक्ष्य में राजेंद्र प्रथम ने ‘मुडिकोंड चोलपुरम’ नामक नई राजधानी की स्थापना की और ‘गंगैकोंड चोल’ की उपाधि धारण की।
    17. चोल शासकों के समय में बनी हुई प्रतिमाओं में सबसे अधिक विख्यात हुईं-
    (a) पत्थर की प्रतिमाएं
    (b) संगमरमर की प्रतिमाएं
    (c) विष्णु भगवान की पत्थर की शिलाओं पर अंकित प्रतिमाएं
    (d) नटराज शिव की कांसे की प्रतिमाएं
    ng>R.A.S. / R.T.S. (Pre) 1994)
    उत्तर-(d)
    चोल काल में धातु-शिल्प (विशेषतः कांस्य-मूर्तिकला) अपने उत्कर्ष पर पहुँची और नटराज शिव की कांस्य प्रतिमाएँ विश्व-विख्यात हुईं। इन्हें ‘खोया मोम’ (Lost Wax / Cire Perdue) तकनीक से बनाया जाता था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चोलकालीन कांस्य प्रतिमाओं में नटराज के अतिरिक्त ‘अर्धनारीश्वर’, ‘कल्याणसुंदर’ और ‘उमा-महेश्वर’ की प्रतिमाएँ भी अत्यंत प्रसिद्ध हैं। भारत सरकार ने नटराज की प्रतिमा को अपने प्रतीक-चिह्न के रूप में अपनाया है और जिनेवा स्थित CERN (यूरोपीय नाभिकीय अनुसंधान संगठन) के परिसर में भी नटराज की एक विशाल प्रतिमा स्थापित है।
    18.निम्नलिखित में से किसको दक्षिण भारत के विशेषकर चोल युग के स्थापत्यों की विश्व में श्रेष्ठतम प्रतिमा-रचना माना जाता है?
    (a) महिषासुरमर्दिनी
    (b) नटराज
    (c) राम
    (d) सोमस्कंद
    I.A.S. (Pre) 1993
    उत्तर-(b)
    चोल युग की कांस्य मूर्तिकला में नटराज (नृत्य करते शिव) की प्रतिमा को विश्व की श्रेष्ठतम प्रतिमा-रचनाओं में स्थान दिया जाता है। इसे भारतीय कला-दर्शन और ब्रह्मांड की सृष्टि-स्थिति-लय की अवधारणा का सर्वोत्कृष्ट दृश्य-अभिव्यक्ति माना जाता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: नटराज की प्रतिमा में चार प्रतीकात्मक तत्व होते हैं — ऊपरी दाएँ हाथ में डमरू (सृष्टि का प्रतीक), ऊपरी बाएँ हाथ में अग्नि (विनाश का प्रतीक), अभय मुद्रा (संरक्षण का प्रतीक) और पैर तले दबा अपस्मार पुरुष (अज्ञान पर विजय का प्रतीक)। चेन्नई के सरकारी संग्रहालय में संरक्षित 11वीं शताब्दी की नटराज प्रतिमा को इस कला-परंपरा का सर्वोत्तम उदाहरण माना जाता है।
    19. नटराज की प्रसिद्ध कांस्य मूर्ति किस कला का उदाहरण है?
    (a) चोल क़ला का
    (b) गांधार कला का
    (c) गुप्त कला का
    (d) मौर्य कला का
    U.P.P.C.S. (Pre) 2006
    उत्तर-(a)
    नटराज की प्रसिद्ध कांस्य मूर्ति चोल कला का अप्रतिम उदाहरण है। चोल कलाकारों ने ‘मधुच्छिष्ट विधान’ (Lost Wax Casting) पद्धति से इन मूर्तियों का निर्माण किया जो तकनीकी दृष्टि से भी अत्यंत उन्नत थी।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गांधार कला यूनानी-बौद्ध कला का मिश्रण थी जो मुख्यतः बुद्ध प्रतिमाओं के निर्माण के लिए जानी जाती है, जबकि गुप्त कला की विशेषता मथुरा और सारनाथ की पाषाण प्रतिमाओं में दिखती है। चोल कला इन सबसे भिन्न है — यह द्रविड़ परंपरा की विशुद्ध अभिव्यक्ति है जिसमें आगम शास्त्रों के अनुसार प्रतिमा-लक्षणों का पालन किया जाता था।
    20. चोल शासकों के शासनकाल में निम्नलिखित में से कौन-सा वारियम् उद्यान प्रशासन का कार्य देखता था?
    (a) पोन वारियम्
    (b) एरि वारियम्
    (c) टोट्ट वारियम्
    (d) सम्वत्सर वारियम्
    U.P.R.O./A.R.O. (Mains) 2013
    उत्तर-(c)
    चोल काल में गाँव की विभिन्न गतिविधियों की देखरेख के लिए विशेष कार्यकारिणी समितियाँ (वारियम्) होती थीं। उद्यान प्रशासन का दायित्व ‘टोट्ट वारियम्’ पर था। अन्य समितियों में एरि वारियम् (तालाब/सिंचाई समिति), पोन वारियम् (स्वर्ण/कोष समिति) और सम्वत्सर वारियम् (वार्षिक समिति) प्रमुख थीं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चोल काल में ‘एरि वारियम्’ (तालाब समिति) का विशेष महत्व था क्योंकि तमिलनाडु की कृषि व्यवस्था जलाशयों पर निर्भर थी — इन्हें ‘एरि’ कहा जाता था। इन समितियों के सदस्यों के लिए कड़ी योग्यता शर्तें थीं, जैसे उनके पास न्यूनतम भूमि होनी चाहिए, वे किसी भ्रष्टाचार के दोषी न हों और उनके परिवार पर कोई ऋण न हो।
    21. निम्नलिखित चोल शासकों में जिसने बंगाल की खाड़ी को ‘चोल झील’ का स्वरूप प्रदान कर दिया, वह कौन था?
    (a) राजराज प्रथम
    (b) राजेंद्र प्रथम
    (c) अधिराज
    (d) कुलोत्तुंग
    U.P. P.C.S. (Spl) (Pre) 2008
    उत्तर-(b)
    राजेंद्र प्रथम (1014–1044 ई.) चोल वंश के सर्वाधिक शक्तिशाली शासकों में से एक था। उसने अपनी विस्तारवादी नीति के अंतर्गत बंगाल की खाड़ी के समस्त तटीय व द्वीपीय क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया, जिससे इस खाड़ी को ‘चोल झील’ कहा जाने लगा। उसने 1017 ई. में श्रीलंका को पूरी तरह अपने अधीन कर सिंहल नरेश महेंद्र पंचम को बंदी बना लिया। उत्तर भारत अभियान में उसने पाल शासक महीपाल को परास्त किया और ‘गंगैकोंड’ की उपाधि धारण कर ‘गंगैकोंडचोलपुरम्’ नाम से नई राजधानी बसाई।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: राजेंद्र प्रथम ने दक्षिण-पूर्व एशिया में श्रीविजय साम्राज्य (आधुनिक मलेशिया-इंडोनेशिया क्षेत्र) पर भी नौसैनिक आक्रमण किया, जो किसी भारतीय राजवंश द्वारा किया गया सुदूर समुद्री अभियानों में सबसे उल्लेखनीय माना जाता है। उसने ‘मुडिकोंड चोल’, ‘पंडित चोल’ तथा ‘कडारम कोंड’ जैसी अनेक विरुदावलियाँ भी धारण की थीं।
    22. निम्न में से दक्षिण भारत का कौन-सा राजवंश अपनी नौसैनिक शक्ति के लिए प्रसिद्ध था ?
    (a) चोल
    (b) चेर
    (c) पल्लव
    (d) राष्ट्रकूट
    R.A.S./ R.T.S. (Pre) 1993
    U.P.P.C.S. (Pre) 1992
    U.P. P.C.S. (Pre) 2004
    उत्तर-(a)
    चोल राजवंश दक्षिण भारत का वह साम्राज्य था जिसने अपनी शक्तिशाली नौसेना के बल पर न केवल भारतीय उपमहाद्वीप के तटीय क्षेत्रों बल्कि श्रीलंका, मालदीव, श्रीविजय (मलेशिया-इंडोनेशिया) जैसे दूरस्थ द्वीपों तक अपना वर्चस्व स्थापित किया। चोलों की नौसेना में युद्धपोत, रसद-नौकाएँ और प्रशिक्षित नाविकों की विशाल संख्या शामिल थी।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चोल नौसेना का मुख्य केंद्र ‘नागपट्टिनम’ बंदरगाह था, जो उस काल का एक प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक केंद्र भी था। चोल राजाओं ने अपनी नौसेना को ‘कडलपडै’ कहा जाता था। इतिहासकारों के अनुसार चोल नौसेना की शक्ति का चरमोत्कर्ष राजराज प्रथम और राजेंद्र प्रथम के शासनकाल में हुआ।
    23. ‘गंगैकोंडचोलपुरम्’ की स्थापना किसने की थी ?
    (a) राजराज-I
    (b) राजाधिराज
    (c) राजेंद्र-I
    (d) विजयादित्य
    U.P.P.C.S. (Spl) (Mains) 2008
    उत्तर-(c)
    राजेंद्र प्रथम ने गंगा घाटी (उत्तर-पूर्वी भारत) पर विजय प्राप्त करने के स्मरण में ‘गंगैकोंड’ की उपाधि ग्रहण की और इस विजय के उपलक्ष्य में ‘गंगैकोंडचोलपुरम्’ नाम से एक भव्य नई राजधानी की स्थापना की। यह नगर आज तमिलनाडु के अरियालुर जिले में स्थित है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गंगैकोंडचोलपुरम् में राजेंद्र प्रथम ने एक विशाल शिव मंदिर ‘बृहदीश्वर मंदिर’ (गंगैकोंडचोलेश्वर मंदिर) का निर्माण भी कराया था, जो तंजावुर के बृहदीश्वर मंदिर के समकक्ष माना जाता है। यह मंदिर द्रविड़ स्थापत्य शैली का अत्यंत उत्कृष्ट उदाहरण है और आज भी इतिहासकारों व पुरातत्त्वविदों के लिए शोध का विषय है।
    24. निम्नलिखित में से किस चोल शासक को चोलगंगम् नामक वृहद कृत्रिम झील बनवाने का श्रेय दिया जाता है?
    (a) राजराज प्रथम
    (b) राजेंद्र
    (c) राजाधिराज
    (d) राजराज द्वितीय
    U.P.P.C.S(Mains) 2016
    उत्तर-(b)
    राजेंद्र प्रथम ने अपनी नई राजधानी गंगैकोंडचोलपुरम् के समीप सिंचाई की आवश्यकता को पूरा करने के लिए ‘चोलगंगम्’ नामक एक विशाल कृत्रिम झील का निर्माण कराया। इस जलाशय का उद्देश्य कृषि भूमि को जल उपलब्ध कराना और स्थानीय जनजीवन को समृद्ध बनाना था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चोल शासक जल-प्रबंधन में अत्यंत दक्ष थे — उन्होंने कावेरी नदी के डेल्टा क्षेत्र में सिंचाई के लिए नहरों और बाँधों का एक सुव्यवस्थित जाल बिछाया था, जिसे आधुनिक इंजीनियरिंग दृष्टि से भी प्रभावशाली माना जाता है। चोल काल में ‘एरी’ (तालाब) प्रणाली द्वारा वर्षाजल संग्रह करने की परंपरा इतनी विकसित थी कि आज भी तमिलनाडु में सैकड़ों ऐसे प्राचीन जलाशय कार्यरत हैं।
    25. निम्नांकित राजवंशों में से किसके शासक अपने शासनकाल में ही अपना उत्तराधिकारी घोषित कर देते थे?
    (a) चालुक्य
    (b) चोल
    (c) कदंब
    (d) कलचुरि
    U.P. U.D.A./L.D.A. (Pre) 2001
    उत्तर-(*)
    प्राचीन भारत के अधिकांश हिंदू राजवंशों में यह परंपरा थी कि राजा अपने जीवनकाल में ही ‘युवराज’ की घोषणा कर देता था, जिससे उत्तराधिकार का विवाद उत्पन्न न हो। यह प्रवृत्ति चोल वंश में विशेष रूप से संस्थागत रूप में दिखाई देती है। इसीलिए उत्तर (*) दिया गया है, क्योंकि यह परंपरा केवल एक राजवंश तक सीमित नहीं थी।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चोल राजवंश में ‘युवराज पट्टाभिषेक’ एक महत्त्वपूर्ण राजकीय समारोह था, जिसमें राजकुमार को विधिपूर्वक उत्तराधिकारी घोषित किया जाता था। राजराज प्रथम ने भी अपने पुत्र राजेंद्र को अपने जीवनकाल में युवराज घोषित किया था, और राजेंद्र ने राज्य संचालन में उनका सक्रिय सहयोग भी किया था।
    26. चालुक्य वंश का सबसे महान शासक कौन था?
    (a) विक्रमादित्य
    (b) मंगलेश
    (c) पुलकेशिन द्वितीय
    (d) पुलकेशिन प्रथम
    U.P.P.C.S. (Pre) 1991
    उत्तर-(c)
    पुलकेशिन द्वितीय चालुक्य वंश के शासकों में सर्वाधिक योग्य तथा शक्तिशाली था। उसने 610 ई. से 642 ई. तक शासन किया। उसकी उपलब्धियों का विवरण हमें ऐहोल अभिलेख से प्राप्त होता है।
    27. वह चोल राजा कौन था, जिसने श्रीलंका को पूर्ण स्वतंत्रता दी और सिंहल राजकुमार के साथ अपनी पुत्री का विवाह कर दिया था?
    (a) कुलोत्तुंग- I
    (b) राजेंद्र – I
    (c) अधिराजेंद्र
    (d) राजाधिराज – I
    U.P.P.C.S. (Pre) 2012
    उत्तर-(a)
    कुलोत्तुंग प्रथम के समय में श्रीलंका के राजा विजयबाहु ने अपनी स्वतंत्रता घोषित की। किंतु कुलोत्तुंग प्रथम ने श्रीलंका में चोल प्रभाव की समाप्ति के प्रति किसी कटुता का प्रदर्शन नहीं किया तथा उसने अपनी पुत्री का विवाह श्रीलंका के राजकुमार वीरप्पेरुमाल के साथ कर दिया।
    28. प्राचीन भारत का निम्नलिखित में से कौन-सा महत्वपूर्ण व्यापार केंद्र उस व्यापार मार्ग पर था, जो कल्याण को वेंगी से जोड़ता था?
    (a) तगर
    (b) श्रीपुर
    (c) त्रिपुरी
    (d) ताम्रलिप्ति
    I.A.S. (Pre) 1994
    उत्तर-(a)
    तगर प्राचीन भारत का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था, यह कल्याण तथा वेंगी के मध्य स्थित था।
29. चोल राजाओं में किस एक ने सीलोन (Ceylon) पर विजय प्राप्त की थी ?
(a) आदित्य-I
(b) राजराज-I
(c) राजेंद्र-I
(d) विजयालय
I.A.S. (Pre) 2001
उत्तर-(c)
चोल राजा राजेंद्र प्रथम ने सिंहल द्वीप या श्रीलंका विजय (सीलोन- श्रीलंका) का कार्य पूर्ण किया था। यद्यपि राजराज-I ने भी श्रीलंका पर आक्रमण कर वहां के कुछ प्रदेशों पर अपना अधिकार कर लिया था, किंतु संपूर्ण श्रीलंका पर उसका अधिकार नहीं हो पाया था। राजेंद्र प्रथम ने वहां के शासक महेंद्र पंचम को बंदी बनाकर चोल राज्य भेज दिया, जहां 12 वर्ष बाद उसकी मृत्यु हो गई। संपूर्ण श्रीलंका पर राजेंद्र का अधिकार हो गया था।
30. चालुक्यों की राजधानी कहां थी ?
(a) वातापी
(b) श्रावस्ती
(c) कांची
(d) कन्नौज
U.P.P.C.S. (Pre) 1991
उत्तर-(a)
बीजापुर (कर्नाटक) जिले के वातापी नामक प्राचीन नगर का आधुनिक नाम बादामी है। छठी-सातवीं शताब्दी ई. में यह चालुक्यों की राजधानी थी। वातापी के चालुक्य राजवंश का वास्तविक संस्थापक पुलकेशिन प्रथम था।
31. किस चोल राजा ने जल सेना प्रारंभ की थी ?
(a) राजेंद्र चोल
(b) परांतक चोल
(c) राजराज प्रथम
(d) राजराज द्वितीय
Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2014
उत्तर-(c)
चोल साम्राज्य की महत्ता का वास्तविक संस्थापक परांतक द्वितीय (सुंदर चोल) का पुत्र अरिमोलिवर्मन था, जो 985 ई. में ‘राजराज’ के नाम से गद्दी पर बैठा। यह विजेता के साथ-साथ कुशल प्रशासक तथा महान निर्माता भी था। राजराज प्रथम ने एक स्थायी सेना तथा विशाल नौसेना का गठन किया। उसने समस्त भूमि की नाप कराई।
32. निम्न में से कौन-सी संस्था विदेशी व्यापार से संबंधित थी?
(a) श्रेणी
(b) नगरम
(c) नानादेशि
(d) मणिग्राम
U.P.P.C.S. (Pre) 2018
उत्तर-(c&d)
‘श्रेणी’ एक ही प्रकार के व्यवसाय करने वाले लोगों की समिति होती थी। ‘नगरम’ व्यापारियों के स्थानीय संगठनों को कहा जाता था। इस प्रकार के संगठन कांची तथा मामल्लपुरम् में विद्यमान थे। लेखों से हमें विभिन्न व्यापारिक संघों के विषय में जानकारी प्राप्त होती है। ये व्यापारी संघ हैं- मणिग्रामम्, नानादेशिस (नानादेशि), वलैंग, बलंजियर, इदंगै आदि। माणिग्रामम्, नानादेशिस दूसरे देशों के साथ भी व्यापार करते थे।
33. निम्नलिखित में से किस वंश द्वारा प्रायः महिलाओं को प्रशासन उच्च पद प्रदान किए जाते थे?
(a) चोल
(b) चालुक्य
(c) पाल
(d) सेन
U.P.P.C.S. (Mains) 2007
उत्तर-(b)
चालुक्यों के शासनकाल में प्रायः महिलाओं को उच्च पदों पर नियुक्त किया जाता था। विजयादित्य प्रथम के भाई चंद्रादित्य की रानी विजय भट्टारिका ने अपने नाम से दो ताम्रपत्र लिखवाए थे। वह एक अच्छी कवयित्री भी थी। विजयादित्य ने अपनी छोटी बहन कुमकुम देवी के कहने पर एक विद्वान ब्राह्मण को एक गांव दान में दिया था। कीर्तिवर्मन द्वितीय की महारानी महादेवी के उसके साथ रक्तपुर के स्कंधावार में उपस्थित रहने का उल्लेख मिलता है। इस वंश की विजय भट्टारिका ने. कुशलतापूर्वक शासन संचालित किया था।
34. चोल शासक का नाम बताइए, जिसने श्रीलंका के उत्तर ी भाग पर विजय प्राप्त की।
(a) राजराज प्रथम
(b) राजेंद्र प्रथम
(c) परांतक प्रथम
(d) आदित्य प्रथम
U.P.P.C.S. (Mains) 2014
उत्तर-(a)
चोल शासक राजराज प्रथम ने सिंहल (श्रीलंका) पर आक्रमण करके उत्तरी सिंहल को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया। विजित क्षेत्र में राजराज ने अनुराधापुर को नष्ट कर पोलोन्नरुवा को इस क्षेत्र की राजधानी बनाया और इसका नाम ‘जननाथ मंगलम्’ रखा। राजराज शैव मतावलम्बी था, उसने ‘शिवपादशेखर’ की उपाधि धारण की थी।
35. नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को कथन (a) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है-
कथन (a) : हमें चोलों के विषय में उनके पूर्ववर्ती राजवंशों की अपेक्षा अधिक जानकारी है।
कारण (R) : चोल शासकों ने मंदिरों की दीवारों पर अभिलेख उत्कीर्ण करने का चलन प्रारंभ किया, जिनमें उनकी विजयों के ऐतिहासिक विवरण दिए जाते थे। नीचे दिए गए कूट में से सही
कूट :
उत्तर का चयन कीजिए।
(a) (a) और (R) दोनों सही हैं और (R), (a) की सही व्याख्या करता है।
(b) (a) और (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (a) की सही व्याख्या नहीं करता है।
(c) (a) सत्य है, परंतु (R) गलत है।
(d) (a) गलत है, परंतु (R) सही है।
U.P.P.C.S. (Pre) 2020
उत्तर-(a)
चोलों के विषय में हमें उनके पूर्ववर्ती राजवंशों की अपेक्षा अधिक जानकारी है। राजराज प्रथम एवं राजेंद्र प्रथम ने मंदिरों की ऐतिहासिक दीवारों पर शिलालेख स्थापित किए। राजराज प्रथम ने अभिलेखों द्वारा अपने पूर्वजों के इतिहास को संकलित करने एवं अपने काल की घटनाओं और विजयों को लेखों में जोड़ने की प्रथा का प्रारंभ किया। इसका अनुकरण बाद के राजाओं ने किया। अतः स्पष्ट है कि कथन और कारण दोनों सत्य हैं तथा कारण (R), कथन (a) की सही व्याख्या करता है।
36. भारत के इतिहास के संदर्भ में निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए-
शब्द विवरण
1. एरिपत्ति – भूमि, जिससे मिलने वाला राजस्व अलग से ग्राम जलाशय के रख-रखाव के लिए निर्धारित कर दिया जाता था।
2. तनियूर – एक अकेले ब्राह्मण अथवा एक ब्राह्मण समूह को दान में दिए गए ग्राम 3. घटिका- प्रायः मंदिरों के साथ संबद्ध विद्यालय उपर्युक्त में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित है/हैं?
(a) 1 और 2
(b) केवल 3
(c) 2 और 3
(d) 1 और 3
I.A.S. (Pre) 2016
उत्तर-(d)
एरिपत्ति चोल प्रशासन के अंतर्गत वह भूमि होती थी, जिससे मिलने वाला राजस्व अलग से ग्राम जलाशय के रख-रखाव के लिए निर्धारित कर दिया जाता था। 7वीं, 8वीं सदी में दक्षिण भारत में घटिका प्रायः मंदिरों के साथ संबद्ध विद्यालय थे। चोल कालीन स्थानीय प्रशासन में बड़े नगरों में अलग कुर्रम (ग्राम संघ) गठित किए जाते थे, जिन्हें ‘तनियूर’ अथवा ‘तकुर्रम’ कहा जाता था।
37. प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में प्राप्य ‘यवनप्रिय’ शब्द द्योतक था-
(a) एक प्रकार के उत्कृष्ट भारतीय मलमल का
(b) हाथी दांत का
(c) नृत्य के लिए यवन राजसभा में भेजी जाने वाली नर्तकियों का
(d) काली मिर्च का
I.A.S. (Pre) 1995
उत्तर-(d)
प्राचीन संस्कृत साहित्य में ‘यवन’ शब्द मूलतः यूनानियों (Greeks) के लिए प्रयुक्त होता था, जो बाद में रोमवासियों के लिए भी इस्तेमाल होने लगा। काली मिर्च यूनानियों और रोमवासियों की अत्यंत प्रिय वस्तु थी, इसीलिए संस्कृत ग्रंथों में इसे ‘यवनप्रिय’ की संज्ञा दी गई। रोम में काली मिर्च इतनी मूल्यवान थी कि इसे ‘काला सोना’ कहा जाता था और कभी-कभी कर (Tax) के रूप में भी स्वीकार किया जाता था। 410 ई. में जब विसिगोथ राजा अलारिक ने रोम को घेरा, तो उसने फिरौती में 3,000 पाउंड काली मिर्च की माँग की थी।
38. शिलप्पादिकारम का लेखक था-
(a) इलंगो
(b) परणर
(c) करिकाल
(d) विष्णुस्वामिन
U.P.P.C.S. (Mains) 2002
उत्तर-(a)
‘शिलप्पादिकारम’ (जिसका अर्थ है ‘नूपुर की कहानी’) तमिल साहित्य के पाँच महाकाव्यों में से एक है। इसकी रचना इलंगो आडिगल ने की थी, जो चेर वंश के राजकुमार थे और उन्होंने राजपाट छोड़कर बौद्ध भिक्षु का जीवन अपनाया। इस महाकाव्य की नायिका कण्णगी है, जिसकी कहानी पति कोवलन की अन्यायपूर्ण मृत्यु के बाद उसके प्रतिशोध पर केंद्रित है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:इस कृति में तत्कालीन तीनों तमिल राज्यों — चेर, चोल और पांड्य — की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक झलक मिलती है, जिससे यह एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत भी है।
39. कवि कालिदास के नाम का उल्लेख किसमें हुआ है?
(a) इलाहाबाद स्तंभ लेख में
(b) ऐहोल के उत्कीर्ण लेख में
(c) अलपादुदान लेख में
(d) हनुमकोंडा उत्कीर्ण लेख में
I.A.S. (Pre) 1994
उत्तर-(b)
ऐहोल प्रशस्ति (634 ई.) चालुक्य नरेश पुलकेशिन-II की उपलब्धियों का वर्णन करने वाला एक महत्वपूर्ण अभिलेख है, जिसकी रचना दरबारी कवि रविकीर्ति ने संस्कृत भाषा और दक्षिण ब्राह्मी लिपि में की थी। प्रशस्ति के अंत में रविकीर्ति ने दावा किया है कि उसने यह रचना कर कालिदास और भारवि जैसे महाकवियों की श्रेणी में स्थान पाया है — इसी कारण इस अभिलेख में कालिदास का नाम आता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:इस अभिलेख में हर्षवर्धन पर पुलकेशिन-II की विजय का भी उल्लेख है, जो हर्ष के नर्मदा के दक्षिण में विस्तार को रोकने की दृष्टि से ऐतिहासिक महत्व की घटना है। रविकीर्ति इस अभिलेख में स्वयं को ‘जिनेंद्र भक्त’ (जैन धर्मावलंबी) भी बताते हैं।
40. संस्कृत के कवि और नाटककार कालिदास का उल्लेख हुआ है-
(a) पुलकेशिन-II के ऐहोल अभिलेख में
(b) मिहिरभोज के ग्वालियर अभिलेख में
(c) कुमारगुप्त-I के करमदंडा शिवलिंग अभिलेख में
(d) चंद्रगुप्त-II के मथुरा स्तंभ लेख में
U.P.P.C.S. (Mains) 2013
उत्तर-(a)
ऐहोल अभिलेख में रविकीर्ति ने कालिदास और भारवि का नाम लेकर उनसे अपनी तुलना की है। कालिदास को परंपरागत रूप से चंद्रगुप्त-II (विक्रमादित्य) के नवरत्नों में से एक माना जाता है और उनकी कृतियाँ — अभिज्ञानशाकुन्तलम्, मेघदूतम्, रघुवंशम् — संस्कृत साहित्य की सर्वोत्कृष्ट रचनाएँ हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ का सर्वप्रथम यूरोपीय अनुवाद 1789 में सर विलियम जोन्स ने किया था, जिसे पढ़कर जर्मन कवि गेटे ने इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की थी।
41. ईसा की प्रारंभिक शताब्दियों में भारत तथा रोम के बीच घनिष्ठ व्यापारिक संबंधों की सूचना किस पुरास्थल की खुदाइयों से प्राप्त होती है?
(a) मदुरै
(b) ताम्रलिप्ति
(c) तोंडी
(d) अरिकामेडु
U.P.P.C.S. (Pre) 2001
U.P. U.D.A./L.D.A. (Pre) 2002
U.P.P.C.S. (Pre) 2003
उत्तर-(d)
अरिकामेडु (प्राचीन नाम ‘पोडुके’) पुडुचेरी के दक्षिण में कोरोमंडल तट पर स्थित एक महत्वपूर्ण रोमन व्यापारिक केंद्र था। यहाँ 1945 में सर मोर्टिमर व्हीलर के नेतृत्व में व्यापक उत्खनन हुआ, जिसमें रोमन अम्फोरा (दो हत्थों वाले मदिरा-कलश), रोमन दीपक, काँच के बर्तन और अरेटाइन मृद्भांड (Arretine ware) मिले। ये साक्ष्य प्रमाणित करते हैं कि यहाँ रोमन व्यापारियों की एक स्थायी बस्ती थी जो पहली-दूसरी शताब्दी ई. में विशेष रूप से सक्रिय थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:इसके अतिरिक्त यहाँ से प्राप्त मनके-निर्माण की कार्यशालाएँ यह भी दर्शाती हैं कि स्थानीय कारीगर रोमन ग्राहकों की रुचि के अनुसार माल तैयार करते थे।
42. किस शासक ने सिंहल द्वीप के विरुद्ध 642 ई. में दो समुद्री अभियान भेजा था?
(a) राजाराम
(b) नरसिंह वर्मन I
(c) कीर्ति वर्मन I
(d) जयसिंह I
U.P.R.O./A.R.O. (Mains) 2016
उत्तर-(b)
पल्लव शासक नरसिंह वर्मन-I (630–668 ई.) को ‘महामल्ल’ की उपाधि प्राप्त थी और उन्हीं के नाम पर प्रसिद्ध बंदरगाह नगर ‘मामल्लपुरम’ (महाबलीपुरम) का नाम पड़ा। उन्होंने चालुक्य राजा पुलकेशिन-II को वातापी की लड़ाई में परास्त किया और ‘वातापीकोंड’ की उपाधि धारण की। सिंहल के राजकुमार मानवर्मा ने उनसे सहायता माँगी, जिसके फलस्वरूप उन्होंने दो शक्तिशाली नौसैनिक अभियान भेजकर मानवर्मा को सिंहल की गद्दी पर बैठाया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:यह घटना पल्लव नौसैनिक शक्ति की श्रेष्ठता का प्रमाण है। नरसिंह वर्मन-I के शासनकाल में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी दक्षिण भारत की यात्रा की थी।
43. तोल्काप्पियम ग्रंथ संबंधित है-
(a) प्रशासन से
(b) विधि से
(c) व्याकरण और काव्य से
(d) उपर्युक्त सभी से
U.P.P.C.S. (Pre) 1997
उत्तर-(c)
‘तोल्काप्पियम’ तमिल भाषा का सबसे प्राचीन व्याकरण ग्रंथ है, जिसकी रचना तोल्काप्पियर ने की थी, जो ऋषि अगस्त्य के बारह प्रमुख शिष्यों में से एक थे। यह ग्रंथ तीन भागों में विभाजित है — एझुत्तदिकारम् (ध्वनि एवं लिपि), सोल्लदिकारम् (शब्द एवं व्याकरण), और पोरुलदिकारम् (साहित्य एवं काव्यशास्त्र)। यह संगम साहित्य का आधारभूत ग्रंथ माना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:उल्लेखनीय है कि ‘तोल्काप्पियम’ न केवल भाषाई नियमों को निर्धारित करता है, बल्कि इसमें तत्कालीन तमिल समाज के प्रेम-संबंधों और भौगोलिक परिवेश (तिणै पद्धति) का भी विस्तृत विवेचन है, जो इसे साहित्यिक दृष्टि से अद्वितीय बनाता है।
44. संगम साहित्य में ‘तोल्काप्पियम’ एक ग्रंथ है-
(a) तमिल कविता का
(b) तमिल व्याकरण का
(c) तमिल वास्तुशास्त्र का
(d) तमिल राजशास्त्र का
U.P.P.C.S. (Mains) 2014
उत्तर-(b)
‘तोल्काप्पियम’ तमिल साहित्य का सर्वाधिक प्राचीन उपलब्ध ग्रंथ है जो मुख्यतः व्याकरण और काव्यशास्त्र पर केंद्रित है। इसकी रचना सूत्र शैली में की गई है, जो संस्कृत व्याकरण परंपरा से मिलती-जुलती है। विद्वानों के अनुसार इस ग्रंथ का रचनाकाल ईसा पूर्व तीसरी से दूसरी शताब्दी के बीच माना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:इसमें तमिल काव्य के लिए ‘अकम’ (प्रेम) और ‘पुरम’ (वीरता) जैसी काव्य-शैलियों का वर्गीकरण किया गया है, जो संगमकालीन कविता की आत्मा है।
45. सूची-I के पदों को सूची-II के पदों के साथ सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए कूटों से सही उत्तर चुनिए :
सूची-I सूची-II
A. तिरुक्कुरल 1. प्रेम कथा
B. तोल्काप्पियम 2. दर्शन
C. शिल्पादिकारम 3. वणिक कथा
D. मणिमेकलै 4. व्याकरण
कूट :
A B C D
(a) 1 2 4 3
(b) 2 3 4 1
(c) 4 2 3 1
(d) 2 4 1 3
U.P.P.S.C. (R.I.) 2014
उत्तर-(d)
इन चारों तमिल कृतियों का सही परिचय इस प्रकार है — तिरुक्कुरल (तिरुवल्लुवर रचित) एक दार्शनिक ग्रंथ है जो अर्थशास्त्र, नीति और प्रेम पर आधारित 1330 द्विपदियों में विभाजित है; तोल्काप्पियम तमिल का सबसे पुराना व्याकरण ग्रंथ है; शिल्पादिकारम इलंगो आडिगल रचित प्रेम-आधारित महाकाव्य है; और मणिमेकलै (सत्तनार रचित) एक बौद्ध दार्शनिक महाकाव्य है जिसमें एक नर्तकी की पुत्री मणिमेकलै की वणिक-परिवेश में बौद्ध धर्म की ओर यात्रा वर्णित है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:उल्लेखनीय है कि ‘तिरुक्कुरल’ का अनुवाद विश्व की 80 से अधिक भाषाओं में हो चुका है और इसे ‘तमिल वेद’ भी कहा जाता है।
46. शैव संतों के लेखन के संग्रह को पांचवां वेद भी समझा जाता है। उपर्युक्त संग्रह का क्या नाम है?
(a) तोल्कापियम
(b) सिल्पद्दीकरन
(c) मणीमेखलय
(d) तिरुमुराय
Jharkhand P.C.S.P.C.S. (Pre) 2021
उत्तर-(d)
‘तिरुमुराय’ तमिल भाषा में शैव भक्ति साहित्य का बारह खंडों में विभाजित विशाल संकलन है, जिसे 6वीं से 11वीं शताब्दी के मध्य तमिल नायनार संतों ने रचा। इसके प्रथम सात खंड ‘तेवारम’ के नाम से जाने जाते हैं, जिन्हें तिरुज्ञानसंबंदर, तिरुनावुक्करसर और सुंदरमूर्ति ने लिखा। आठवाँ खंड ‘तिरुवासकम’ माणिक्कवाचकर की अमर रचना है। इसे वेदों और शैव आगमों के साथ तमिलनाडु में शैव सिद्धांत का प्रमुख आधारग्रंथ माना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:उल्लेखनीय है कि ‘तिरुमुराय’ में वर्णित मंदिर तमिलनाडु के शिव मंदिरों की ‘पाडल पेत्र स्थलम’ सूची के निर्माण का आधार हैं।
47. धार्मिक कविताओं का संकलन ‘कुरल’ किस भाषा में है?
(a) ग्रीक
(b) तमिल
(d) पालि
(c) तेलुगू
M.P.P.C.S. (Pre) 1997
उत्तर-(b)
‘कुरल’ तमिल भाषा में रचित एक अत्यंत महत्वपूर्ण काव्य-ग्रंथ है, जिसकी रचना महान तमिल कवि तिरुवल्लुवर ने की थी। इसे तमिल साहित्य का ‘लघुवेद’ और ‘तमिल बाइबिल’ भी कहा जाता है तथा ‘मुप्पाल’ के नाम से भी जाना जाता है। अनुश्रुतियों के अनुसार तिरुवल्लुवर को ब्रह्मा का अवतार माना गया है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कुरल में कुल 1,330 दोहे (कुरल छंद) हैं, जो तीन भागों — अरम् (धर्म), पொருள् (अर्थ) और इन्बम् (काम/प्रेम) — में विभाजित हैं। इसका अनुवाद विश्व की 40 से अधिक भाषाओं में हो चुका है, जिससे यह भारत के सर्वाधिक अनूदित प्राचीन ग्रंथों में से एक है।
48. रोमन बस्ती कहां से प्राप्त हुई है?
(a) कालीबंगा
(b) अरिकामेडु
(c) रंगपुर
(d) सतारा
U.P. Lower Sub. (Pre) 2009
उत्तर-(b)
अरिकामेडु (वर्तमान पुदुचेरी के निकट) से रोमन बस्ती के प्रमाण मिले हैं। यहाँ के उत्खनन में रोमन मिट्टी के पात्र, एम्फोरा जार, काँच की वस्तुएँ और रोमन दीपक आदि प्राप्त हुए हैं, जो भारत-रोम व्यापार की पुष्टि करते हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अरिकामेडु की पहली व्यवस्थित पुरातात्विक खुदाई 1945 में सर मॉर्टिमर व्हीलर के नेतृत्व में की गई थी। यहाँ से प्राप्त ‘अरेटाइन पॉटरी’ (Arretine Ware) इटली में बनाई जाती थी, जो यह सिद्ध करती है कि अरिकामेडु पहली-दूसरी शताब्दी ईस्वी में भूमध्यसागरीय व्यापारियों का एक सक्रिय केंद्र था।
49. निम्नलिखित राजवंशों में किसका उल्लेख संगम साहित्य में नहीं हुआ है?
(a) कदंब
(b) चेर
(c) चोल
(d) पाण्ड्य
41st B.P.S.C. (Pre) 1996
उत्तर-(a)
संगम साहित्य में मुख्यतः तीन तमिल राजवंशों — चोल, चेर और पाण्ड्य — का विस्तृत उल्लेख मिलता है। कदंब राजवंश का संगम साहित्य में कोई उल्लेख नहीं है। संगम साहित्य कृष्णा नदी के दक्षिण से सुदूर प्रायद्वीप तक की राजनीतिक गतिविधियों पर प्रकाश डालता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कदंब राजवंश की स्थापना लगभग चौथी शताब्दी ईस्वी में मयूरशर्मन ने की थी और इसकी राजधानी वनवासी (वर्तमान कर्नाटक) थी — यह संगम काल के बाद का राजवंश है, इसीलिए इसका संगम साहित्य में उल्लेख नहीं है। संगम साहित्य की रचना लगभग 300 ई.पू. से 300 ई. के मध्य मानी जाती है।
50. निम्नलिखित तमिल ग्रंथों में किसे ‘लघुवेद’ की संज्ञा दी गई है?
(a) नन्दिकलम्बकम्
(b) कलिंगत्तुपर्णि
(c) पेरियपुराणम्
(d) कुरल
U.P.R.O./A.R.O. (Mains) 2013
उत्तर-(d)
तमिल ग्रंथ ‘कुरल’ को ‘लघुवेद’ की संज्ञा दी गई है। इसे ‘तमिल बाइबिल’ और ‘मुप्पाल’ भी कहा जाता है। इसकी रचना तिरुवल्लुवर ने की थी। यह ग्रंथ नीति, प्रेम और धर्म — तीनों विषयों को समेटे हुए है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तिरुवल्लुवर की स्मृति में तमिलनाडु में ‘तिरुवल्लुवर दिवस’ प्रतिवर्ष ‘पोंगल’ के दूसरे दिन मनाया जाता है। कन्याकुमारी में समुद्र के बीच स्थित विशाल तिरुवल्लुवर प्रतिमा (133 फीट ऊँची) कुरल की 133 अध्यायों (अधिकारों) का प्रतीक है।
51. पूर्वी भारत में प्रमुख भारतीय-रोमन व्यापारिक स्थान था-
(a) राजगीर
(b) अरिकामेडु
(c) भाग्रपीर
(d) तामलुक
Jharkhand P.C.S.P.C.S. (Pre) 2021
उत्तर-(b)
प्रश्न में ‘पूर्वी भारत’ शब्द भ्रामक लग सकता है, किन्तु अरिकामेडु (पुदुचेरी के निकट, दक्षिण-पूर्वी तट) भारत-रोम व्यापार का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पुरातात्विक रूप से प्रमाणित व्यापारिक केंद्र था। यहाँ से रोमन मुद्राएँ, एम्फोरा जार और अन्य रोमन वस्तुएँ मिली हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तामलुक (ताम्रलिप्ति, वर्तमान पश्चिम बंगाल) भी एक महत्वपूर्ण बंदरगाह था, किन्तु वह मुख्यतः दक्षिण-पूर्व एशिया और श्रीलंका के साथ व्यापार के लिए जाना जाता था, न कि रोमन व्यापार के लिए। रोमन साम्राज्य के साथ भारत का व्यापार मुख्यत: पश्चिमी और दक्षिणी तटों — भरूच (बारिगाजा), मुजिरिस और अरिकामेडु — के माध्यम से होता था।
52. एम्फोरा जार होता है, एक-
(a) छिद्रयुक्त जार
(b) लंबा एवं दोनों तरफ हत्थेदार जार
(c) चित्रित धूसर जार
(d) काला और लाल मिट्टी का जार
U.P.P.S.C. (R.I.) 2014
उत्तर-(b)
एम्फोरा जार एक विशेष प्रकार का लंबा, संकीर्ण गर्दन वाला और दोनों तरफ हत्थों (handles) से युक्त मिट्टी का पात्र है। प्राचीन रोम और ग्रीस में इसका उपयोग जैतून का तेल, शराब (wine) और मछली की चटनी (garum) आदि के भंडारण एवं परिवहन के लिए होता था। अरिकामेडु की खुदाई में इसके अवशेष मिले हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: एम्फोरा जार का आकार जानबूझकर नुकीली पेंदी (pointed base) वाला बनाया जाता था ताकि इसे जहाज की रेत या मिट्टी में खड़ा किया जा सके और समुद्री यात्रा के दौरान यह स्थिर रहे। एक मानक रोमन एम्फोरा की क्षमता लगभग 26 लीटर होती थी और इसका वजन भरे होने पर 50 किलोग्राम से अधिक हो सकता था।
53. निम्नलिखित में से कौन एक तमिल देश के संगम युग का राजवंश नहीं था?
(a) चेर
(b) चोल
(c) पल्लव
(d) पाण्ड्य
U.P.U.D.A./L.D.A.(Mains) 2010
उत्तर-(c)
संगम युग के तमिल देश के तीन प्रमुख राजवंश चेर, चोल और पाण्ड्य थे। पल्लव राजवंश संगम काल का नहीं था — पल्लवों का उदय लगभग तीसरी-चौथी शताब्दी ईस्वी में हुआ, जो संगम काल की समाप्ति के पश्चात का काल है। पल्लवों की राजधानी कांचीपुरम थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: पल्लव राजवंश अपनी द्रविड़ स्थापत्य शैली के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। महाबलीपुरम (मामल्लपुरम) के रथ मंदिर और शोर टेम्पल पल्लव स्थापत्य के उत्कृष्ट उदाहरण हैं, जिनका निर्माण पल्लव राजा नरसिंहवर्मन प्रथम (मामल्ल) के शासनकाल में हुआ था। इसके विपरीत, संगम युग के चोल, चेर और पाण्ड्य शासकों की जानकारी मुख्यतः संगम काव्य-ग्रंथों से ही प्राप्त होती है।
54. निम्नलिखित में से कौन-सा बंदरगाह पोडुके नाम से ‘दी पेरिप्लस ऑफ दी इरिथ्रियन सी’ के लेखक को ज्ञात था?
(a) अरिकामेडु
(b) ताम्रलिप्ति
(c) कोरके
(d) बारबेरिकम
U.P. P.C.S. (Pre) 1997
उत्तर-(a)
अरिकामेडु को ‘दी पेरिप्लस ऑफ दी इरिथ्रियन सी’ नामक यूनानी ग्रंथ में ‘पोडुके’ नाम से संदर्भित किया गया है। यह ग्रंथ लगभग पहली शताब्दी ईस्वी में एक अज्ञात यूनानी नाविक/व्यापारी द्वारा लिखा गया था और इसमें हिंद महासागर के व्यापारिक मार्गों व बंदरगाहों का विस्तृत विवरण है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘पेरिप्लस ऑफ दी इरिथ्रियन सी’ में भारत के पश्चिमी तट के बंदरगाहों — बारिगाजा (भरूच), मुजिरिस (कोडुंगल्लूर) और नेलसिंडा — का भी उल्लेख है। ‘इरिथ्रियन सी’ उस काल में हिंद महासागर, लाल सागर और अरब सागर के संयुक्त क्षेत्र को कहा जाता था। यह ग्रंथ प्राचीन भारत-रोम व्यापार को समझने का एक अमूल्य ऐतिहासिक स्रोत है।
55. दक्षिणी भारत का प्रसिद्ध ‘तक्कोलम का युद्ध’ हुआ था- उत्तर चालुक्यों के मध्य
(a) चोल एवं
(b) चोल एवं राष्ट्रकूटों के मध्य
(c) चोल एवं होयसल के मध्य
(d) चोल एवं पाण्ड्यों के मध्य
U.P. U.D.A./L.D.A. (Pre) 2001
उत्तर-(b)
तक्कोलम का युद्ध (949 ई.) चोल शासक परांतक प्रथम और राष्ट्रकूट शासक कृष्ण तृतीय के बीच हुआ था। इस युद्ध में पश्चिमी गंग शासक बुत्तुग द्वितीय ने राष्ट्रकूटों का साथ दिया, और चोलों को निर्णायक पराजय मिली। इस जीत के उपलक्ष्य में कृष्ण तृतीय ने ‘तंजैयुकोंड’ की उपाधि धारण की और तंजौर पर अधिकार कर लिया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कृष्ण तृतीय ने रामेश्वरम तक दक्षिण में विजय प्राप्त की और वहाँ एक विजय-स्तंभ तथा मंदिर का निर्माण करवाया। तक्कोलम की पराजय के बाद चोल सत्ता कुछ दशकों के लिए अत्यंत कमज़ोर हो गई, और उसका पुनरुत्थान बाद में राजराज प्रथम के काल में हुआ।
56. निम्नलिखित में से कौन तमिल रामायणम या रामावतारम का लेखक था?
(a) कंबन
(b) कुट्टन
(c) नन्नय
(d) टिक्कण
U.P.U.D.A./L.D.A. (Mains) 2010
उत्तर-(a)
कंबन 12वीं शताब्दी के महान तमिल कवि थे, जिन्होंने चोल शासनकाल में ‘कंब रामायणम’ (जिसे रामावतारम भी कहते हैं) की रचना की। यह रचना वाल्मीकि की संस्कृत रामायण से प्रेरित होते हुए भी स्वतंत्र काव्य-व्यक्तित्व रखती है। इसमें लगभग 10,000 पद हैं और इसे तमिल साहित्य की सर्वोच्च कृतियों में गिना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कंबन को ‘कविचक्रवर्ती’ की उपाधि दी गई थी। इनके ग्रंथ में रावण को एक जटिल और दार्शनिक पात्र के रूप में चित्रित किया गया है, जो वाल्मीकि रामायण से एक महत्त्वपूर्ण अंतर है।
57. निम्नलिखित में से कौन-सा एक प्राचीन भारत में व्यापारियों का निगम था?
(a) चतुर्वेदीमंगलम्
(b) परिषद
(c) अष्टदिग्गज
(d) मणिग्रामम्
I.A.S. (Pre) 1997
उत्तर-(d)
मणिग्रामम् दक्षिण भारत, विशेषतः चोल काल में व्यापारियों का एक प्रमुख संगठन (व्यापारिक गिल्ड) था। इस प्रकार के व्यापारिक निगम दूरस्थ व्यापार, विशेषकर दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ वाणिज्य संचालन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। ‘वलंजीयर’ इसी तरह का एक अन्य प्रसिद्ध व्यापारिक संघ था। चतुर्वेदिमंगलम् ब्राह्मणों को दान में दिए गए गाँव को कहा जाता था, न कि व्यापारियों के संगठन को।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मणिग्रामम् के व्यापारी अपना स्वयं का सशस्त्र दल रखते थे और इन्हें राज्य की ओर से विशेष व्यापारिक अधिकार व कर-छूट प्राप्त थी। ये संगठन मंदिर-निर्माण और सामाजिक कार्यों में भी आर्थिक योगदान देते थे।
58. चोल साम्राज्य को अंततः किसने समाप्त किया?
(a) महमूद गजनवी ने
(b) बख्तियार खिलजी ने
(c) मुहम्मद गौरी ने
(d) मलिक काफूर
U. P. Lower Sub. (Pre) 2004
उत्तर-(*)
चोल साम्राज्य का पतन किसी एक आक्रमणकारी के हाथों नहीं हुआ, बल्कि यह आंतरिक कमज़ोरी और होयसल व पाण्ड्य राज्यों के उभार का परिणाम था। 13वीं शताब्दी के मध्य तक राजेंद्र तृतीय को पाण्ड्यों की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी और लगभग 1279 ई. के बाद स्वतंत्र चोल सत्ता का कोई प्रमाण नहीं मिलता। मलिक काफूर ने 1310-11 ई. में दक्षिण भारत पर आक्रमण किया, किंतु तब तक चोल साम्राज्य पहले ही समाप्त हो चुका था। इसलिए प्रश्न के विकल्पों में कोई भी उत्तर पूर्णतः सही नहीं है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चोल वंश की स्थापना विजयालय ने लगभग 850 ई. में की थी और उसका स्वर्णकाल राजराज प्रथम (985-1014 ई.) तथा राजेंद्र प्रथम (1014-1044 ई.) के शासनकाल में रहा, जब चोल नौसेना ने श्रीलंका और मलय प्रायद्वीप तक विजय प्राप्त की थी।
59. सूची-I और सूची-II को सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए हुए कूट का प्रयोग करते हुए सही
सूची-I सूची-II
A. गुप्त 1. बादामी
B. चंदेल 2. पनमलै
C. चालुक्य 3. खजुराहो
D. पल्लव 4. देवगढ़
कूट : उत्तर का चयन कीजिए-
(a) A-4, B-3, C-1, D-2
(c) A-2, B-3, C-4, D-1
(b) A-4, B-2, C-3, D-1
(d) A-3, B-4, C-1, D-2
I.A.S. (Pre) 1997
उत्तर-(a)
सही सुमेलन इस प्रकार है — गुप्त वंश का संबंध देवगढ़ (उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले में स्थित) से है, जहाँ प्रसिद्ध गुप्तकालीन दशावतार मंदिर स्थित है। चंदेल शासकों ने खजुराहो (मध्य प्रदेश) में भव्य मंदिर-समूह का निर्माण करवाया, जिनमें कंदरिया महादेव मंदिर सर्वाधिक प्रसिद्ध है। चालुक्यों की राजधानी बादामी (कर्नाटक) थी और पनमलै पल्लव स्थापत्य का उदाहरण है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: देवगढ़ का दशावतार मंदिर पंचायतन शैली का प्रारंभिक उदाहरण है और इसमें शेषशायी विष्णु की अत्यंत कलात्मक प्रतिमा है। खजुराहो के मंदिरों को यूनेस्को ने 1986 में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया है।
60. मध्यकालीन भारत के सांस्कृतिक इतिहास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-
1. तमिल क्षेत्र के सिद्ध (सित्तर) एकेश्वरवादी थे तथा मूर्तिपूजा की निंदा करते थे।
2.कन्नड़ क्षेत्र के लिंगायत पुनर्जन्म के सिद्धांत पर प्रश्नचिह्न लगाते थे तथा जाति अधिक्रम को अस्वीकार करते थे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1, न ही 2
I.A.S. (Pre) 2016
उत्तर-(c)
तमिल क्षेत्र के सिद्ध (सित्तर) संत एकेश्वरवाद में विश्वास रखते थे और मूर्तिपूजा, कर्मकांड तथा जातिभेद का विरोध करते थे। कन्नड़ क्षेत्र के लिंगायत संप्रदाय की स्थापना 12वीं शताब्दी में बसवण्णा (बसवेश्वर) ने की थी। लिंगायत मान्यता के अनुसार मृत्यु के पश्चात भक्त शिव में विलीन हो जाता है और पुनर्जन्म नहीं होता — इस प्रकार उन्होंने पुनर्जन्म के सिद्धांत को नकारा। इन्होंने जाति-व्यवस्था और ब्राह्मणीय श्रेष्ठता का भी खंडन किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: लिंगायत साहित्य ‘वचन’ कहलाता है, जो कन्नड़ गद्य-पद्य का अमूल्य भंडार है। बसवेश्वर ने ‘अनुभव मंटप’ नामक एक आध्यात्मिक संसद की स्थापना की थी, जिसमें महिलाएँ और निम्न जाति के लोग भी भाग लेते थे।
61. किस ऋषि के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने दक्षिण भारत का आर्यकरण किया, उन्हें आर्य बनाया?
(a) विश्वामित्र
(b) अगस्त्य
(c) वशिष्ठ
(d) सांभर
Jharkhand P.C.S.P.C.S. (Pre) 2013
उत्तर-(b)
दक्षिण भारत को आर्य संस्कृति से परिचित कराने का श्रेय महर्षि अगस्त्य को दिया जाता है। उन्होंने विंध्य पर्वत को पार कर दक्षिण की ओर प्रस्थान किया और वहीं स्थायी रूप से निवास किया। तमिल परंपरा में उन्हें ‘तमिल भाषा और साहित्य के आदि जनक’ माना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अगस्त्य ने ‘अगस्त्यम्’ नामक तमिल व्याकरण की रचना की थी, जो अब अनुपलब्ध है। संगम साहित्य के अनुसार प्रथम और द्वितीय संगम दोनों की अध्यक्षता भी महर्षि अगस्त्य ने ही की थी।
62. भारत के इतिहास में निम्नलिखित घटनाओं पर विचार कीजिए- ‍‍‍‍
1. राजा भोज के अधीन प्रतिहारों का उदय ‍‍‍‍
2. महेंद्रवर्मन – I के अधीन पल्लव सत्ता की स्थापना ‍‍‍‍
3. परांतक – I द्वारा चोल सत्ता की स्थापना ‍‍‍‍
4. गोपाल द्वारा पाल राजवंश की संस्थापना ‍‍‍‍
उपर्युक्त घटनाओं का, प्राचीन काल से आरंभ कर, सही कालानुक्रम क्या है ?
(a) 2-1-4-3
(b) 3-1-4-2
(c) 2-4-1-3
(d) 3-4-1-2
I.A.S. (Pre) 2020
उत्तर-(c)
इन घटनाओं का सही कालानुक्रम इस प्रकार है — सर्वप्रथम महेंद्रवर्मन I के अधीन पल्लव सत्ता की स्थापना (600–630 ई.), तत्पश्चात गोपाल द्वारा पाल राजवंश की स्थापना (750–770 ई.), फिर राजा भोज (मिहिरभोज) के नेतृत्व में प्रतिहारों का उत्कर्ष (836–885 ई.), और अंत में परांतक I द्वारा चोल सत्ता की सुदृढ़ स्थापना (907–953 ई.)।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गोपाल को बंगाल की अराजकता समाप्त करने के लिए जनता द्वारा लोकतांत्रिक ढंग से राजा चुना गया था — यह भारतीय इतिहास में निर्वाचन का एक दुर्लभ उदाहरण है। परांतक I ने पाण्ड्यों को परास्त कर ‘मदुरैकोंड’ की उपाधि धारण की थी।
63. संगम युग में ‘उरैयूर’ किसलिए विख्यात था?
(a) मसालों के व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र
(b) कपास के व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र
(c) विदेशी व्यापार का महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र
(d) आंतरिक व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र
39th B.P.S.C. (Pre) 1994
उत्तर-(b)
उरैयूर वर्तमान तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली जिले में कावेरी नदी के तट पर स्थित था। यह संगम काल में चोल राज्य की प्रारंभिक राजधानी भी था। यह नगर उस काल में उत्कृष्ट कोटि के सूती वस्त्रों के निर्माण और व्यापार के लिए सुप्रसिद्ध था। प्रसिद्ध यूनानी ग्रंथ ‘पेरिप्लस ऑफ दी एरीथ्रियन सी’ में इस नगर का उल्लेख ‘ओरेओ’ नाम से मिलता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: रोमन साम्राज्य के साथ व्यापार में उरैयूर के सूती वस्त्र अत्यधिक लोकप्रिय थे। कालांतर में चोलों ने अपनी राजधानी उरैयूर से पुहार (कावेरीपत्तनम) स्थानांतरित कर दी थी।
64. निम्नलिखित में से कौन-सी जोड़ी (6वीं से 12वीं शताब्दी तक दक्षिण भारत का राज्य एवं उसकी राजधानी) सुमेलित नहीं है ?
(a) पल्लव – कांचीपुरम्
(b) पाण्ड्य – मदुरै
(c) चेर – पुडुचेरी
(d) चोल – तंजौर
Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2016
उत्तर-(c)
चेर राज्य वर्तमान केरल के क्षेत्र में विस्तृत था, जिसमें त्रावणकोर, कोचीन एवं मालाबार का कुछ भाग सम्मिलित था। चेर राज्य की राजधानी ‘वांजी’ अथवा ‘वांची’ थी, न कि पुडुचेरी। शेष सभी युग्म — पल्लव-कांचीपुरम्, पाण्ड्य-मदुरै और चोल-तंजौर — सही सुमेलित हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चेर राज्य का मुख्य बंदरगाह ‘मुशिरि’ (आधुनिक कोडुंगल्लूर/मुज़िरिस) था, जो रोमन व्यापार का प्रमुख केंद्र था। चेर राजा उदयन जेरल इरुम्पोरई ने ‘पट्टिनप्पालै’ में वर्णित अनेक सैन्य अभियान किए थे।
65. सूची-I और सूची-II को सुमेलित कीजिए और नीचे दिए हुए कूट से सही
सूची-I सूची-II
A. चालुक्य 1. मदुरई
B. पल्लव 2. कन्नौज
C. हर्ष 3. बादामी
D. पाण्ड्य 4. कांचीपुरम्
कूट :
A B C D उत्तर चुनिए-
(a) 3 4 2 1
(b) 4 3 2 1
(c) 1 4 2 3
(d) 1 3 2 4
U.P.P.C.S. (Spl) (Pre) 2004
उत्तर-(a)
बादामी (वातापी) के चालुक्यों की राजधानी बादामी थी। पल्लवों की राजधानी कांचीपुरम् थी। हर्षवर्धन ने कन्नौज को अपना मुख्य केंद्र बनाकर शासन किया और पाण्ड्यों की राजधानी मदुरई थी। चालुक्य राजा पुलकेशिन II ने हर्षवर्धन को नर्मदा नदी के तट पर पराजित किया था — यह जानकारी कवि रविकीर्ति की ऐहोल प्रशस्ति (634 ई.) से प्राप्त होती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बादामी के अतिरिक्त चालुक्यों की एक अन्य शाखा ‘वेंगी के चालुक्य’ थी जिनकी राजधानी वेंगी थी। हर्षवर्धन ने कन्नौज में एक विशाल धार्मिक सभा का आयोजन किया था जिसमें चीनी यात्री ह्वेनसांग भी उपस्थित था।
66. तृतीय संगम हुआ था –
(a) अरिकामेडु में
(b) इरनाकुलम में
(c) मदुरई में
(d) तूकोरिन में
U.P.P.C.S. (Pre) 2006
उत्तर-(c)
संगम का शाब्दिक अर्थ है ‘विद्वान कवियों की परिषद्’। पाण्ड्य राजाओं के संरक्षण में तीन संगमों का आयोजन किया गया था। प्रथम संगम मदुरई में हुआ जिसकी अध्यक्षता अगस्त्य ऋषि ने की। द्वितीय संगम कपाटपुरम् (अलैवाई) में हुआ, जिसकी अध्यक्षता पहले अगस्त्य ने और बाद में तोल्काप्पियर ने की। तृतीय संगम पुनः मदुरई में हुआ जिसकी अध्यक्षता नक्कीरर ने की — इसी संगम में तमिल साहित्य का अधिकांश भाग संकलित हुआ।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तृतीय संगम का प्रमुख ग्रंथ ‘तोल्काप्पियम्’ है, जो तमिल का प्राचीनतम उपलब्ध व्याकरण ग्रंथ माना जाता है। संगम साहित्य में ‘अकम्’ (प्रेम) और ‘पुरम्’ (वीरता) दो प्रमुख काव्य-विधाएँ थीं।
67. पाण्ड्य राज्य की जीवन रेखा कौन-सी नदी थी?
(a) गोदावरी
(b) कृष्णा
(c) तुंगभद्रा
(d) वेंगी
U.P. Lower Sub. (Spl) (Pre) 2010
उत्तर-(d)
पाण्ड्य राज्य कावेरी नदी के दक्षिण में अवस्थित था, जिसमें आधुनिक मदुरा, तिन्नेवेल्ली जिले और त्रावणकोर का कुछ भाग सम्मिलित था। इस राज्य की जीवन रेखा वेंगी नदी थी जो अपनी असाधारण भूमि की उर्वरता के लिए प्रसिद्ध थी। पाण्ड्यों की राजधानी मदुरा थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यूनानी राजदूत मेगस्थनीज ने अपनी पुस्तक ‘इंडिका’ में पाण्ड्य राज्य का उल्लेख किया है और यहाँ की मोती एवं रत्नों के व्यापार की प्रशंसा की है। पाण्ड्य शासकों ने रोमन साम्राज्य में अपने दूत भेजे थे, जिसका उल्लेख रोमन लेखक प्लिनी ने किया है।
68. निम्नलिखित में से कौन-से संगम पत्तन पश्चिमी तट पर स्थित थे? नीचे दिए कूट से सही
1. कोरकै 2. पुहार
3. तोंडी 4. मुशिरि कूट :
उत्तर चुनिए –
(a) केवल 1 एवं 2
(c) केवल 3 एवं 4
(b) केवल 2 एवं 3
(d) केवल 4 एवं 1
U.P.P.C.S. (Pre) 2012
उत्तर-(c)
एक अज्ञात यूनानी नाविक द्वारा प्रथम शताब्दी ई. में रचित ‘पेरिप्लस ऑफ दी एरीथ्रियन सी’ में प्राचीन भारत के बंदरगाहों का विस्तृत विवरण मिलता है। इसके अनुसार नौरा, तोंडी, मुशिरि और नेलिसंडा पश्चिमी तट के प्रमुख बंदरगाह थे। कोरकै और पुहार पूर्वी तट (कोरोमंडल तट) पर स्थित थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मुशिरि (मुज़िरिस) को रोमन व्यापारियों द्वारा ‘प्रथम बंदरगाह’ की संज्ञा दी गई थी, यहाँ रोमन व्यापारियों की एक स्थायी बस्ती थी जिसे ‘Augustus का मंदिर’ भी कहा जाता था। 2004 में मिस्र में खोजा गया ‘मुज़िरिस पेपाइरस’ (द्वितीय शताब्दी ई.) इस बंदरगाह के रोम के साथ व्यापार का एक प्रामाणिक दस्तावेज़ है।
69. संगम कालीन साहित्य में ‘कोन’, ‘को’ एवं ‘मन्नन’ किसके लिए प्रयुक्त होते थे?
(a) प्रधानमंत्री
(b) राजस्व मंत्री
(c) सेनाधिकारी
(d) राजा
R.A.S. / R.T.S. (Pre) 2010
उत्तर-(d)
संगम कालीन तमिल साहित्य में राजा को संदर्भित करने के लिए ‘कोन’, ‘को’ और ‘मन्नन’ शब्दों का प्रयोग किया जाता था। ये शब्द राजा की शक्ति, संप्रभुता और शासनाधिकार के प्रतीक थे। संगम साहित्य में राजा के कर्तव्यों और गुणों का विस्तृत वर्णन मिलता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: संगम काल में राजा को ‘वेंदन’ भी कहा जाता था, जो सर्वोच्च शासक का द्योतक था। इस युग में राजा की तीन प्रमुख जिम्मेदारियाँ थीं — युद्ध में विजय, प्रजा का पालन, और कवियों को संरक्षण देना, जिसे तमिल में ‘कडमै’ कहते थे।
70. निम्नलिखित पल्लव शासकों का नाम उनके राज्यकाल को दृष्टिगत रखते हुए सही कालानुक्रमानुसार व्यवस्थित कीजिए और नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर का चयन कीजिए :
1. परमेश्वरवर्मन I
2. नरसिंहवर्मन I
3. नन्दिवर्मन II
महेंद्रवर्मन I
कूट :
(a) 4, 2, 1, 3
(c) 1, 3, 2, 4
(b) 4, 3, 1, 2
(d) 3, 2, 1, 4
U.P.B.E.O. (Pre) 2019
उत्तर-(a)
पल्लव शासकों का सही कालानुक्रम इस प्रकार है — महेंद्रवर्मन I (600–630 ई.), नरसिंहवर्मन I (630–668 ई.), परमेश्वरवर्मन I (लगभग 670–700 ई.) और नन्दिवर्मन II (731–795 ई.)। इस प्रकार सही क्रम 4, 2, 1, 3 होता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: महेंद्रवर्मन I प्रारंभ में जैन धर्म का अनुयायी था, बाद में शैव संत अप्पर के प्रभाव से वह शैव बन गया। नरसिंहवर्मन I ने चालुक्य राजा पुलकेशिन II को वातापी के युद्ध (642 ई.) में पराजित किया और ‘वातापीकोण्ड’ की उपाधि धारण की।
71. दक्षिण भारत के मंदिरों के आकर्षक द्वार क्या कहलाते हैं?
(a) शिखर
(b) गोपुरम्
(c) देवालय
(d) मंडपम्
(e) उपर्युक्त में से कोई नहीं/उपर्युक्त में से एक से अधिक
63rd B.P.S.C. (Pre) 2017
उत्तर-(b)
दक्षिण भारत के मंदिरों के विशाल और अलंकृत प्रवेश द्वारों को ‘गोपुरम्’ कहा जाता है। यह द्रविड़ स्थापत्य शैली की सबसे पहचानी जाने वाली विशेषता है। पाण्ड्य और चोल शासकों के काल में यह शैली अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँची। चोल कालीन स्थापत्य की पहचान वास्तव में भव्य मंदिरों से नहीं, बल्कि इन्हीं गोपुरमों से होती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मदुरई के मीनाक्षी अम्मन मंदिर में कुल 14 गोपुरम हैं, जिनमें से दक्षिणी गोपुरम सबसे ऊँचा (लगभग 170 फीट) है। गोपुरम की बाहरी दीवारें देवी-देवताओं, पौराणिक कथाओं और लोक जीवन के दृश्यों से सजी असंख्य मूर्तियों से आच्छादित होती हैं, जो हिन्दू धर्मशास्त्र का दृश्य विश्वकोश मानी जाती हैं।
72. किस राजवंश ने उत्तर भारत पर शासन नहीं किया है?
(a) चालुक्य
(b) राजपूत
(c) गुप्त
(d) मौर्य
Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2010
उत्तर-(a)
दिए गए विकल्पों में चालुक्य वंश एकमात्र ऐसा राजवंश था जिसने उत्तर भारत पर कभी शासन नहीं किया। चालुक्यों का साम्राज्य मुख्यतः दक्कन और दक्षिण भारत तक सीमित था। उनकी प्रमुख शाखा बादामी (वातापी) के चालुक्यों की राजधानी वर्तमान कर्नाटक में थी। पुलकेशिन द्वितीय इस वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था जिसने सम्राट हर्षवर्धन को नर्मदा नदी के तट पर पराजित किया था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चालुक्यों की तीन प्रमुख शाखाएँ थीं — बादामी के चालुक्य (6वीं-8वीं सदी), वेंगी के पूर्वी चालुक्य और कल्याणी के पश्चिमी चालुक्य। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने पुलकेशिन द्वितीय के दरबार का दौरा किया था और उसे एक महान एवं पराक्रमी राजा बताया था।
73. मीनाक्षी मंदिर स्थित है-
(a) मदुरई में
(b) पुदुकोट्टै में
(c) श्री रंगम में
(d) तंजावुर में
U.P.P.C.S. (Pre) 1992
U.P. Lower Sub. (Pre) 2004
उत्तर-(a)
विश्वप्रसिद्ध मीनाक्षी अम्मन मंदिर तमिलनाडु के मदुरई नगर में स्थित है। मदुरई पाण्ड्य वंश की राजधानी थी। संगम काल में मदुरई साहित्य और संस्कृति का केंद्र थी — यहाँ प्रथम और तृतीय संगम (साहित्यिक सम्मेलन) आयोजित हुए थे। यह मंदिर देवी पार्वती (मीनाक्षी) और भगवान शिव (सुन्दरेश्वर) को समर्पित है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मीनाक्षी मंदिर के वर्तमान स्वरूप का अधिकांश निर्माण 17वीं शताब्दी में नायक शासक तिरुमलई नायक के शासनकाल में हुआ था। यह मंदिर लगभग 45 एकड़ क्षेत्र में फैला है और इसमें 33,000 से अधिक मूर्तियाँ हैं — इसे UNESCO की विश्व धरोहर सूची के लिए नामांकित किया जा चुका है।
74. निम्न में से किस चीनी यात्री ने चालुक्यों के शासनकाल में चीन एवं भारत के संबंधों का विवरण दिया है?
(a) फाह्यान
(b) ह्वेनसांग
(c) इत्सिंग
(d) मात्वालिन
U.P.P.C.S. (Mains) 2014
उत्तर-(d)
मात्वालिन (Ma Tuan-lin) एक चीनी इतिहासकार और लेखक थे जिन्होंने चालुक्य शासनकाल के दौरान चीन और भारत के राजनयिक एवं व्यापारिक संबंधों का विस्तृत विवरण अपने ग्रंथ ‘वेन्हियान तुन्गकाओ’ में दिया है। फाह्यान गुप्तकाल में, ह्वेनसांग हर्षकाल में और इत्सिंग 7वीं सदी के अंत में भारत आए थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मात्वालिन ने स्वयं भारत की यात्रा नहीं की थी, वे चीनी स्रोतों और पूर्व यात्रियों के विवरणों का संकलन करके लिखते थे। उनका ग्रंथ ‘वेन्हियान तुन्गकाओ’ प्राचीन एशियाई इतिहास की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है और इसमें भारत-चीन के बीच दूतमंडलों के आदान-प्रदान का भी उल्लेख है।
75. निम्नलिखित में से किस राजा ने अपने मंत्रियों को पशुओं पर क्रूरता पर प्रतिबंध लगाने के लिए काशी क्षेत्र भेजा था?
(a) चालुक्य राजा सिद्धराज जयसिंह
(b) चालुक्य राजा कुमारपाल
(c) चोल राजा कुलोत्तुंग I
(d) कश्मीरी राजा जयसिंह
U.P.R.O./A.R.O. (Mains) 2016
उत्तर-(b)
गुजरात के चालुक्य (सोलंकी) शासक कुमारपाल (1143-1173 ई.) ने जैन धर्म अपना लिया था और वे प्रसिद्ध जैन आचार्य हेमचंद्र के शिष्य थे। अहिंसा के सिद्धांत से प्रेरित होकर उन्होंने अपने राज्य में पशुवध पर कठोर प्रतिबंध लगाया और इसे लागू करने के लिए अपने मंत्रियों को काशी जैसे दूरस्थ क्षेत्रों में भी भेजा।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: आचार्य हेमचंद्र ने कुमारपाल के लिए ‘कुमारपालचरित’ नामक ग्रंथ की रचना की थी। कुमारपाल के शासनकाल को गुजरात के सोलंकी वंश का स्वर्णकाल माना जाता है — उन्होंने अनेक जैन मंदिरों का निर्माण करवाया और पाटन (अन्हिलवाड़) को एक समृद्ध सांस्कृतिक केंद्र बनाया।
76. सुमेलित कीजिए :
(a) मीनाक्षी मंदिर (1) तिरूमाल (आंध्र प्रदेश)
(b) वेंकटेश्वर मंदिर (2) मदुरई (बालाजी विश्वनाथ)
(c) महाकाल मंदिर (3) हावड़ा (प. बंगाल)
(d) बेलूर मठ (4) उज्जैन
कूट :
A B C D
(a) 1 2 3 4
(b) 2 1 4 3
(c) 4 3 1 2
(d) 3 4 1 2
M.P.P.C.S. (Pre) 1994
उत्तर-(b)
सही सुमेलन इस प्रकार है — मीनाक्षी मंदिर: मदुरई (तमिलनाडु), वेंकटेश्वर (बालाजी) मंदिर: तिरुमाल/तिरुपति (आंध्र प्रदेश), महाकाल मंदिर: उज्जैन (मध्य प्रदेश), बेलूर मठ: हावड़ा (पश्चिम बंगाल)। बेलूर मठ में रामकृष्ण मिशन का मुख्यालय है जिसकी स्थापना 1897 ई. में स्वामी विवेकानंद ने की थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तिरुपति वेंकटेश्वर मंदिर विश्व के सर्वाधिक धनी धार्मिक स्थलों में से एक है और यहाँ प्रतिदिन औसतन 50,000 से 1,00,000 श्रद्धालु आते हैं। महाकालेश्वर मंदिर (उज्जैन) भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है और यह एकमात्र ज्योतिर्लिंग है जिसकी मूर्ति दक्षिणमुखी (दक्षिण की ओर मुख) है।
77. निम्नलिखित में से कौन-सा एक काकतीय राज्य में अति महत्वपूर्ण समुद्र पत्तन था?
(a) काकीनाडा
(b) मोटुपल्ली
(c) मछलीपत्तनम (मसूलीपत्तनम)
(d) नेल्लुरु
I.A.S. (Pre) 2017
उत्तर-(b)
मोटुपल्ली काकतीय राज्य का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री बंदरगाह था। यह वर्तमान आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले में स्थित है। इतालवी यात्री मार्कोपोलो ने इस बंदरगाह का दौरा किया था और काकतीय शासकों के अधीन आंध्र प्रदेश की व्यापारिक समृद्धि का उल्लेख किया। 13वीं शताब्दी के गणपति देव द्वारा जारी मोटुपल्ली शिलालेख में यहाँ से कपूर, मोती, हाथीदाँत, रेशम, काली मिर्च आदि के व्यापार का विवरण मिलता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: काकतीय वंश की राजधानी वारंगल (वर्तमान तेलंगाना) थी। काकतीय रानी रुद्रमादेवी (1262-1289 ई.) इतिहास की उन विरल महिला शासकों में से एक हैं जिन्होंने स्वतंत्र रूप से राज्य किया — मार्कोपोलो ने स्वयं उनकी वीरता और कुशल शासन की प्रशंसा की है।
78. कदंब राजाओं की राजधानी थी-
(a) तंजौर
(b) वनवासी
(c) कांची
(d) बादामी
U.P.P.C.S. (Mains) 2005
उत्तर-(b)
कदंब राजवंश की राजधानी वनवासी (वर्तमान कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिले में) थी। इस वंश की स्थापना 4थी शताब्दी ईस्वी में मयूरशर्मन ने की थी। कदंब वंश दक्षिण भारत के उन प्रारम्भिक राजवंशों में से एक था जिसने कन्नड़ भाषा को राजकीय संरक्षण दिया। बाद में इस राज्य को चालुक्य शासक पुलकेशिन-II ने अपने साम्राज्य में मिला लिया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कदंब वंश ने कन्नड़ साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया — उनके शासनकाल में कन्नड़ भाषा में पहले शिलालेख (हल्मिडी शिलालेख, लगभग 450 ई.) प्राप्त होते हैं जो कन्नड़ लिपि के प्राचीनतम प्रमाणों में से एक हैं। उल्लेखनीय है कि तंजौर चोलों की, कांची पल्लवों की और बादामी चालुक्यों की राजधानी थी।
79. दक्षिण भारत के किस वंश के राजा ने रोम राज्य में एक दूत 26 ई.पू. में भेजा था ?
(a) चोल
(b) चेर
(c) पाण्ड्य
(d) चालुक्य
M.P.P.C.S. (Pre) 2005
उत्तर-(c)
पाण्ड्य वंश के राजा ने 26 ई.पू. में रोम के सम्राट ऑगस्टस के पास अपना राजदूत भेजा था। यह भारत और रोम के बीच प्राचीन कूटनीतिक संबंधों का महत्वपूर्ण प्रमाण है। पाण्ड्यों की राजधानी मदुरई थी और उनका शासन तमिलनाडु के दक्षिणी भाग पर था। इस दूतमंडल का उल्लेख रोमन इतिहासकार स्ट्राबो और कैसियस डियो ने किया है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: पाण्ड्यों और रोम के बीच व्यापार अत्यंत समृद्ध था — मुख्य रूप से मोती, मसाले, हाथी दाँत और कीमती पत्थरों का व्यापार होता था। रोमन लेखक प्लिनी ने शिकायत की थी कि रोम का अत्यधिक सोना भारतीय व्यापार में जा रहा है, जो भारत-रोम व्यापार की व्यापकता को दर्शाता है।
80. मीनाक्षी मंदिर यहां अवस्थित है –
(a) चेन्नई
(b) कोलकाता
(c) मदुरई
(d) महाबलीपुरम्
Uttarakhand U.D.A./L.D.A. (Pre) 2007
U.P.P.C.S. (Pre) 1991
उत्तर-(c)
मीनाक्षी अम्मन मंदिर तमिलनाडु राज्य के मदुरई शहर में वैगई नदी के दक्षिणी तट पर स्थित है। यह मंदिर देवी मीनाक्षी (पार्वती का रूप) और उनके पति सुन्दरेश्वर (शिव) को समर्पित है। मदुरई पाण्ड्य साम्राज्य की राजधानी थी जो प्राचीन संगम युग से ही एक प्रमुख धार्मिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक केंद्र रहा है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मदुरई को ‘पूर्व का एथेंस’ कहा जाता है क्योंकि यह प्राचीन काल से ही विद्या और संस्कृति का केंद्र रहा है। संगम काल में यहाँ तीन महान साहित्यिक संगम (सम्मेलन) हुए थे जिनसे तमिल साहित्य की अमूल्य धरोहर — संगम साहित्य — का सृजन हुआ।
  • यादव वंश देवगिरि (1187-1312 ई.) : सिंघण

    📚 विषय सूची

    यादव वंश का उदय

    राष्टकूटों और चालुक्यों के उत्कर्ष काल में यादव वंश के राजा अधीनस्थ सामन्त राजाओं की स्थिति रखते थे, लेकिन जब चालुक्यों की शक्ति क्षीण हुई तो वे स्वतंत्र हो गए।

    ➣ वर्त्तमान हैदराबाद के क्षेत्र में स्थित देवगिरि (दौलताबाद) को केन्द्र बनाकर उन्होंने अपने उत्कर्ष का प्रारम्भ किया।

    भिल्लम (1187-1191 ई.): देवगिरि यादव राज्य की स्थापना

    ➣ चालुक्य नरेश सोमेश्वर-IV के शासनकाल में उसका यादव सामंत भिल्लम अपनी स्वतंत्रता स्थापित करने वाला प्रथम महत्वाकांक्षी व्यक्ति था।

    ➣ 1187 ई. में उसने चालुक्य राज्य पर आक्रमण कर उसके उत्तरी जिलों पर अधिकार कर लिया। फलस्वरूप सोमेश्वर-IV को अपनी राजधानी कल्याणी छोड़कर बनवासी में शरण लेनी पड़ी।

    कल्याणी पर यादवों का अधिकार हो गया। भिल्लम ने देवगिरि नामक नगर की स्थापना की तथा उसे अपनी राजधानी बनाया।

    द्वारसमुद्र (मैसूर) में यादव क्षत्रियों के एक अन्य वंश का शासन था, जो होयसाल कहलाते थे। होयसालों ने भी स्थिति का लाभ उठाया।

    ➣ उनके राजा वीर बल्लाल द्वितीय ने उत्तर की ओर अपनी शक्ति का विस्तार करते हुए भिल्लम के राज्य पर भी आक्रमण किया। इस प्रकार बल्लाल और भिल्लम के मध्य एक ज़ोरदार संघर्ष हुआ।

    ➣ युद्ध में भिल्लम ने वीरगति प्राप्त की और उसके राज्य पर, जिसमें कल्याणी का प्रदेश भी शामिल था, होयसालों का अधिकार हो गया।

    जैत्रपाल (1191 – 1210 ई.) : साम्राज्य विस्तार

    ➣ भिल्लम का उत्तराधिकारी जैत्रपाल प्रथम हुआ, उसने अनेक युद्धों के द्वारा अपने वंश के गौरव का पुनरुद्धार किया।

    ➣ होयसालों ने कल्याणी और देवगिरि पर स्थायी रूप से शासन का प्रयत्न नहीं किया था, इसलिए जैत्रपाल को फिर से अपने राज्य के उत्कर्ष का अवसर मिल गया।

    ➣ उसने वारंगल के काकतीय शासक रुद्रदेव के ऊपर आक्रमण कर उसकी हत्या कर दी तथा उसके भतीजे गणपति को बंदी बना लिया।

    ➣ इस प्रकार अपने पड़ोसी राज्यों से निरन्तर युद्ध करते हुए जैत्रपाल प्रथम ने यादव राज्य की शक्ति को भली-भाँति स्थापित कर लिया।

    ➣ संभवत: रूद्र के भाई महादेव के काल में संभवतः पुनः यादवों तथा काकतीयों में युद्ध हुआ।

    1199 ई. में महादेव की मृत्यु के बाद जैतुगी ने उसके पुत्र गणपति को मुक्त कर दिया तथा उसे वारंगल की गद्दी पर बैठाया।

    सिंघन (1210-1247 ई.) : यादव वंश का स्वर्णकाल

    ➣ जैतुगी का पुत्र तथा उत्तराधिकारी सिंघन हुआ। यह यादव वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था।

    37 वर्ष के अपने शासन काल में उसने चारों दिशाओं में बहुत से युद्ध किए और देवगिरि के यादव राज्य को उन्नति की चरम सीमा पर पहुँचा दिया।

    ➣ होयसल राजा वीर बल्लाल ने उसके पितामह भिल्लम को युद्ध में मारा था और यादव राज्य को बुरी तरह से परास्त किया था।

    ➣ अपने कुल के इस अपमान का प्रतिशोध करने के लिए सिंघण ने द्वारसमुद्र के होयसाल राज्य पर आक्रमण किया और वहाँ के राजा वीर बल्लाल द्वितीय को परास्त कर उसके अनेक प्रदेशों पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया।

    ➣ होयसल राजा कि विजय के बाद सिंघण ने उत्तर भारत में विजय यात्रा के लिए प्रस्थान किया। गुजरात पर उसने कई बार आक्रमण किए और मालवा को अपने अधिकार में लाकर काशी और मथुरा तक विजय यात्रा की।

    ➣ उसने कलचुरी राज्य को परास्त कर अफ़ग़ान शासकों के साथ भी युद्ध किए, जो उस समय उत्तर-भारत के बड़े भाग को अपने स्वामीत्व में ला चुके थे।

    कोल्हापुर के शिलाहार, बनवासी के कदम्ब और पांड्य देश के राजाओं को भी सिंघण ने परास्त किया और अपनी इन दिग्विजयों के उपलक्ष्य में कावेरी नदी के तट पर एक विजय स्तम्भ की स्थापना की।

    ➣ इसमें सन्देह नहीं कि यादव राज सिंघण एक विशाल साम्राज्य का निर्माण करने में सफल हुआ था और न केवल सम्पूर्ण दक्षिणापथ अपितु कावेरी तक का दक्षिणी भारत और विंध्याचल के उत्तर के भी कतिपय प्रदेश उसकी अधीनता में आ गए थे।

    ➣ सिंघण न केवल अनुपम विजेता था, अपितु साथ ही विद्वानों का आश्रयदाता और विद्याप्रेमी भी था। संगीतरत्नाकर का रचयिता सारंगधर उसी के आश्रय में रहता था।

    ➣ प्रसिद्ध ज्योतिषी चांगदेव भी उसकी राजसभा का एक उज्ज्वल रत्न था। भास्कराचार्य द्वारा रचित सिद्धांतशिरोमणि तथा ज्योतिष सम्बन्धी अन्य ग्रंथों के अध्ययन के लिए उसने एक शिक्षाकेन्द्र की स्थापना भी की थी।

    सिंघण के उत्तराधिकारी

    ➣ सिंघण के बाद उसके पोते कृष्ण (1247-1260ई.) ने और फिर कृष्ण के भाई महादेव (1260-1271ई.) ने देवगिरि के राजसिंहासन को सुशोभित किया।

    ➣ इन राजाओं के समय में भी गुजरात और शिलाहार राज्य के साथ यादवों के युद्ध जारी रहे।

    रामचन्द्र’ (1271-1309 ई.) : दिल्ली सल्तनत से संघर्ष

    ➣ महादेव के बाद रामचन्द्र (1271-1309ई.) यादवों का राजा बना। यह यादव वंश का अंतिम स्वतंत्र शासक हुआ।

    ➣ उसके समय में 1294 ई. में दिल्ली के अफ़ग़ान शासक अलाउद्दीन ख़िलजी ने दक्षिणी भारत में विजय अभियान किया।

    अलाउद्दीन ख़िलजी ने दक्षिणी राज्यों में सबसे पहले आक्रमण रामचंद्र पर किया था। इसमें उसका सेनापति मालिक काफूर था।

    ➣ अलाउद्दीन ख़िलज़ी ने यादव राज के प्रति मैत्रीभाव प्रदर्शित कर उस पर अचानक हमला कर दिया। रामचन्द्र ने विवश होकर अलाउद्दीन ख़िलज़ी के साथ सन्धि कर ली।

    ➣ इस सन्धि के परिणामस्वरूप अफ़ग़ान ने अपार सम्पत्ति प्राप्त की। इसके अतिरिक्त रामचन्द्र ने अलाउद्दीन ख़िलज़ी को वार्षिक कर भी देना स्वीकृत किया।

    अलाउद्दीन ख़िलज़ी प्रथम मुस्लिम शासक था जिसने दक्षिण अभियान किया। उल्लेखनीय है उसने दक्षिणी राज्यों को दिल्ली सल्तनत में नहीं मिलाया था केवल वार्षिक कर वसूला।
    दक्षिणी राज्यों को दिल्ली सल्तनत में मिलाने का श्रेय फिरोजशाह तुगलक को है।

    ➣ कालांतर में रामचन्द्र ने फिर स्वतंत्रता होने का प्रयत्न किया और ख़िलज़ी को वार्षिक कर देना बन्द कर दिया।

    ➣ इस पर अलाउद्दीन ने अपने सेनापति मलिक काफ़ूर को उस पर आक्रमण करने के लिए भेजा। काफ़ूर का सामना करने में रामचन्द्र असमर्थ रहा और उसे गिरफ़्तार करके दिल्ली भेज दिया गया।

    ➣ अलाउद्दीन रामचन्द्र की शक्ति से भली-भाँति परिचित था। उसने उसका स्वागत किया और उसे रायरायाओ की उपाधि से विभूषित किया।

    ➣ कुछ समय दिल्ली में रहने के पश्चात उसे वापस उसके राज्य भेज दिया गया रामचन्द्र अब अधीनस्थ राजा बनकर शासन करने लगा।

    शंकर (1309-1312ई.) : यादव वंश का अंत

    ➣ रामचन्द्र के पश्चात उसका पुत्र शंकर उत्तराधिकारी हुआ। यह यादव वंश का अंतिम शासक था।

    ➣ शंकर ने अलाउद्दीन ख़िलज़ी के विरुद्ध विद्रोह किया। एक बार फिर मलिक काफ़ूर देवगिरि पर आक्रमण करने के लिए गया और उससे युद्ध में शंकर ने 1312 ई. में वीरगति प्राप्त की।

    1316 ई. में जब अलाउद्दीन की मृत्यु हुई तो रामचन्द्र के जामाता हरपाल के नेतृत्व में यादवों ने एक बार फिर स्वतंत्र होने का प्रयत्न किया, पर उन्हें सफलता नहीं मिली।

    ➣ इस प्रकार देवगिरि के यादव वंश की सत्ता का अन्त हुआ।

  • काकतीय वंश (1000-1323 ई.) : रुद्रमादेवी

    📚 विषय सूची

    काकतीय वंश : दक्षिण भारत की शक्ति

    ➣ काकतीय वंश के राजाओं का शासन आधुनिक समय के प्रसिद्ध शहर हैदराबाद के पूर्वी भाग तेलंगाना में था।

    कल्याणी के चालुक्य वंश के उत्कर्ष काल में काकतीय वंश के राजा चालुक्यों के सामन्तों के रूप में अपने राज्य का शासन करते थे।

    ➣ काकतीय लोग अपने को चोल करिकाल का वंशज मानते थे। इस वंश का प्रथम ज्ञात शासक बेत प्रथम (1000-1030 ई.) था

    ➣ कालांतर में उसने राजेन्द्र चोल के आक्रमण से उत्पन्न अव्यवस्था का लाभ उठाकर नलगोंड (हैदराबाद) में अपने लिये एक स्वतंत्र राज्य स्थापित कर दिया।

    ➣ उसका पुत्र तथा उत्तराधिकारी प्रोलराज प्रथम (1030-1075 ई.) वातापी के पश्चिमी चालुक्यों का सामंत था।

    ➣ उसने चालुक्य नरेश सोमेश्वर प्रथम की आरे से युद्धों में भाग लिया तथा पर्याप्त ख्याति अर्जित कर ली। उसकी सेवाओं से प्रसन्न होकर सोमेश्वर ने अंमकोंड विषय (वारंगल में हनुमकुंड) का उसे स्थायी सामंत बना दिया।

    ➣ उसके उत्तराधिकारी बेत द्वितीय (1075-1090 ई.) ने चालुक्य नरेश विक्रमादित्य से कुछ और प्रदेश प्राप्त किया तथा अपन राजधानी अंमकोंड में स्थापित किया।

    ➣ कालांतर में क्रमश: प्रोलराज द्वितीय (1110-1158 ई.), रुद्रदेव प्रथम (1158-1195 ई.), महादेव (1195-1198 ई.)गणपतिदेव (1199-1261 ई.) ने शासन किया।

    गणपतिदेव (1199-1261 ई.) : साम्राज्य विस्तार

    ➣ गणपति अपने वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली राजा था। उसने आंध्र, नेल्लोर, कांची, कर्नूल को जीतकर अपने राज्य का विस्तार किया तथा 60 वर्षों तक शासन करता रहा।

    ➣ वह एक सफल प्रशासक था, तथा उसने व्यापार और कृषि का विकास करने पर बहुत ज़ोर दिया। मोटु पटली, जो कि अब कृष्णा ज़िले में है, गणपतिदेव के राज्य का समुद्री बंदरगाह था।

    वारंगल शहर का निर्माण गणपतिदेव ने वहाँ पर दो क़िले बनवाकर पूरा किया था। बाद के समय में उसने यहाँ अपनी राजधानी स्थानांतरित की।

    ➣ गणपतिदेव के एक भी पुत्र नहीं था उसकी दो पुत्रियाँ थीं- रुद्रमा देवी और गणपम्बा। उसने अपने उत्तराधिकारी के रूप में गणपतिदेव ने रुद्रमा देवी को बनाया।

    रुद्रमा देवी (1262 – 1289 ई.) : भारत की प्रमुख महिला शासक

    ➣ वारंगल के काकतीय वंश की रानी थी। उसका प्रारंभिक नाम रुद्राम्बा था। जब रुद्रमा देवी ने शासन सम्भाला तब उसकी आयु मात्र 14 वर्ष थी।

    ➣ रुद्रमा देवी का विवाह चालुक्य वंश के राजकुमार वीरभद्र के साथ हुआ था।

    ➣ इटली के प्रसिद्ध मार्कोपोलो ने अपनी पुस्तक में रुद्रमा देवी की प्रशंसा की है और इसे अनुकरणीय बताते हुए इटली में भी महिला शासिका घोषित की गयी।

    प्रतापरुद्रदेव या रुद्रदेव द्वितीय (1289-1323 ई.) : दिल्ली सल्तनत संघर्ष एवं पतन

    ➣ प्रतापरुद्रदेव काकतीय वंश का अंतिम राजा था। वह रुद्रमा देवी का पुत्र और राज्य का उत्तराधिकारी था।

    ➣ प्रतापरुद्रदेव के शासन काल में ही ख़िलजी एवं तुग़लक़ शासकों ने वारंगल पर आक्रमण हुआ।

    14वीं सदी के प्रारम्भ में अफ़ग़ान सुल्तान अलाउद्दीन ख़िलज़ी का प्रसिद्ध सेनापति मलिक काफ़ूर दक्षिण भारत की विजय के दौरान देवगिरि के यादवों और द्वारसमुद्र के होयसलों के समान वारंगल के काकतीयों की भी विजित कर लिया।

    1512 ई. में हिन्दू राज्य वारांगल के ध्वंसावेषों पर गोलकुण्डा राज्य की स्थापना हुई।

    ➣ सर्वप्रथम काकतीय सम्राज्य मे ही नायंकार प्रणाली का उद्भव हुआ जो कि कालान्तर में विजयनगर के प्रशासन की मुख्य विशेषता बनी।

  • Share This Page

    WhatsApp Telegram