Subject: भारतीय इतिहास

  • होयसल वंश (1040-1346 ई.) : विष्णुवर्धन

    📚 विषय सूची

    होयसल वंश : दक्षिण भारत की कला एवं मंदिर स्थापत्य

    ➣ होयसालों के राज्य का क्षेत्र वर्तमान समय के मैसूर प्रदेश में था और उनकी राजधानी द्वारसमुद्र थी। आरम्भ में उनकी स्थिति सामन्त राजाओं की थी, जो कभी दक्षिण के चोलों और कभी कल्याणी के चालुक्य राजाओं के आधिपत्य को स्वीकार करते थे।

    ➣ होयसल यादवों की एक शाखा थे जो अपने को चंद्रवंशी मानते थे। वे गड्गवाडि के पश्चिम में चालुक्य नरेशों के सामंत के रूप में शासन करते थे। उनका राज्य चालुक्य तथा चोल साम्राज्यों के बीच एक मध्यस्थ राज्य था।

    चालुक्य नरेश सोमेश्वर-III के समय में इस वंश के विष्णुवर्द्धन ने अपने को स्वतंत्र कर दिया। वह एक महत्वाकांक्षी शासक था और उसने चालुक्य राज्यों को जीत कर अपनी शक्ति का विस्तार प्रारंभ कर दिया।

    ➣ होयसल वंश देवगिरि के यादव वंश के समान ही द्वारसमुद्र के यादव कुल का था। इसलिए इस वंश के राजाओं ने उत्कीर्ण लेखों में अपने को यादवकुलतिलकय कहा है।

    ➣ इस वंश का अंतिम शासक नरसिंह-III का पुत्र वीर बल्लाल-III था।

    ➣ होयसलों की राजधानी द्वारसमुद्र का आधुनिक नाम हालेविड है जो इस समय कर्नाटक राज्य में स्थित है।

    विष्णुवर्धन (1110 – 1141 ई.) : चोलों से स्वतंत्रता

    ➣ विष्णुवर्धन होयसल वंश का एक वीर और प्रतापी राजा था, जो 1110 ई. में द्वारसमुद्र की राजगद्दी पर आरूढ़ हुआ। इसने अनेक युद्ध किए तथा अपने राज्य का विस्तार किया।

    ➣ वह नाममात्र के लिए ही चालुक्यों का अधीनस्थ बना था। बाद में उसने अपने राज्य को चालुक्यों की अधीनता से मुक्त कर अन्य राज्यों पर आक्रमण शुरू किए।

    ➣ सुदूर दक्षिण में चोल, पांड्य और मलाबार के क्षेत्र में विष्णुवर्धन ने विजय यात्राएँ कीं और अपनी शक्ति को प्रदर्शित किया। इसमें सन्देह नहीं कि विष्णुवर्धन के शासन काल में होयसाल राज्य बहुत शक्तिशाली हो गया था।

    ➣ प्रारम्भ में वह जैन मतावलम्बी था, किंतु प्रख्यात वैष्णव आचार्य रामानुज के प्रभाव से वह वैष्णव मतावलम्बी हो गया।

    ➣ मत परिवर्तन के बाद उसने अपना पहले का नाम विहिदेव या विहिव त्याग दिया और विष्णुवर्धन नाम धारण कर लिया।

    ➣ विष्णुवर्धन ने वैष्णव धर्म के प्रचार के लिए अनेक भव्य मन्दिरों का निर्माण करवाया था। इन मन्दिरों में से कुछ आज भी बेलूर और हलेविड में विद्यमान हैं।

    ➣ इनमें सर्वोत्कृष्ट उदाहरण हलेविड होयसलेश्वर मन्दिर का है, जिसमें ग्यारह सज्जा पट्टियाँ हैं। प्रत्येक पट्टी सात सौ फुट या इससे भी अधिक लम्बी हैं। ये पट्टियाँ हाथी, सिंह, अश्वारोही, वृक्षलता, पशु-पक्षी आदि विविध अलंकरणों से सुसज्जित हैं।

    ➣ लगभग 1141 ई. में विष्णवर्धन की मृत्यु हो गई थी।

    अन्य उत्तराधिकारी

    वीर बल्लाल (1173-1220 ई.) विष्णुवर्धन का पौत्र था। वीर बल्लाल का राज्य मैसूर के उत्तर तक विस्तृत था।

    ➣ उसने देवगिरि के यादवों को परास्त किया और होयसलों को दक्षिण भारत में सबसे अधिक शक्तिशाली बना दिया

    नरसिंह होयसल वंश के राजा वीर बल्लाल का पुत्र था। जिस समय नरसिंह राजसिंहासन पर विराजमान था, तब प्रतापी यादव राजा सिंघण ने उसके राज्य पर आक्रमण किया।

    ➣ इस आक्रमण में नरसिंह पराजित हुआ और यादव नरेश सिंघण ने अपने पितामह के अपमान का प्रतिशोध उससे लिया।

    वीर बल्लाल तृतीय (1292 – 1343 ई.) : दिल्ली सल्तनत संघर्ष एवं पतन

    ➣ वीर बल्लाल तृतीय होयसल वंश का अंतिम राजा था। देवगिरि के यादवों के समान ही होयसालों की स्वतंत्र सत्ता का अन्त भी अलाउद्दीन ख़िलजी के द्वारा ही हुआ।

    ➣ 1310 ई. में सुल्तान अलाउद्दीन ख़िलजी के सेनापति मलिक काफ़ूर ने दक्षिण भारत की विजय करते हुए द्वारसमुद्र पर भी आक्रमण किया और उसे जीत लिया।

    ➣ वीर बल्लाल तृतीय को क़ैद करके दिल्ली ले जाया गया और उसने अलाउद्दीन ख़िलजी का वशवर्ती और कर देना स्वीकार कर लिया।

    ➣ अलाउद्दीन के वापस लौट जाने पर बल्लाल ने भी स्वतंत्र होने का प्रयत्न किया, यद्यपि इसमें वह सफल नहीं हो सका।

    ➣ अंत में सुल्तान अलाउद्दीन ख़िलजी ने लगभग 1326 ई. में होयसल वंश का अंत कर दिया।

  • चालुक्य वंश (बादामी, वेंगी, कल्याणी) : पुलकेशिन द्वितीय

    📚 विषय सूची

    चालुक्य वंश (बादामी, वेंगी , कल्याणी )

    ➣ ऐतिहासिक दृष्टि से विन्ध्य पर्वतमाला एवं नर्मदा नदी उत्तर भारत को दक्षिण भारत से विभाजित करती है और विन्ध्य पर्वत क्षेत्र का त्रिकोणात्मक दक्षिणी भाग दक्षिण भारत या दक्कन माना जाता है।

    ➣ 9वीं सदी ई. के मध्य से लेकर 8वीं सदी ई. के मध्य तक दक्षिण भारत का इतिहास वस्तुत: तीन राज्यों के मध्य हुए आपसी संघर्ष का इतिहास है। ये राजा थे-
    बादामी/वातापी के चालुक्य
    कांची के पल्लव
    मदुरई के पांड्य

    चालुक्य वंश

    ➣ चालुक्यों की तीन प्रमुख शाखाएँ थी :-

    शाखाएंसंस्थापक अंतिम शासक पतन
    बादामी पुलकेशिन प्रथम कीर्तिवर्मा द्वितीय राष्ट्रकूट द्वारा (दन्तिदुर्ग )
    वेंगी विष्णु वर्धन कुलोत्तंग चोलदेव चोल वंश में विलय
    कल्याणी तैलप द्वितीय सोमेश्वर चतुर्थ देवगिरि के यादव द्वारा (भिल्लम)

    राजवंशराजधानी
    बादामी/वातापी (मूल शाखा)बादामी (कर्नाटक का बीजापुर जिला)
    वेंगी के चालुक्य वेंगी (आन्ध्र प्रदेश)
    पश्चिमी (कल्याणी) चालुक्यसोमेश्वर द्वारा मान्यखेत से कल्याणी स्थान्तरित

    बादामी (वातापी) के चालुक्य

    बादामी (वातापी) के चालुक्य

    ➣ बादामी के चालुक्य चालुक्यों की प्राचीनतम (मूल शाखा) है। जो कि वातापी चालुक्य के नाम से विख्यात हुआ। चालुक्यों की मूल शाखा का उदय स्थल वातापी (आधुनिक बादामी) बीजापुर जिले के कर्नाटक में था।

    ➣ उदय स्थल बादामी होने के चलते ये बादामी के चालुक्य कहे जाते हैं। इन्हें आरंभिक पश्चिमी चालुक्य भी कहा जाता है।

    ➣ यही से 6वीं शताब्दी में उन्होंने संपूर्ण दक्षिण पथ को राजनैतिक एकता के सूत्र में आबद्ध किया तथा उत्तर के हर्षवर्धन तथा दक्षिण में पल्लव शासको में प्रबल विरोध के बावजूद उन्होंने दो शताब्दियों तक दक्षिण पर अपना प्रभुत्व बनाये रखा।

    पुलकेशिन प्रथम (535 – 566 ई.) : वातापी में चालुक्य सत्ता की स्थापना

    ➣ बादामी के चालुक्य वंश का संस्थापक पुलकेशिन प्रथम था। उसे श्रीपृथ्वीवल्लभ (श्रीवल्लभ) भी कहा गया है।

    ➣ पुलकेशिन प्रथम ने बादामी में दुर्ग का निर्माण करवाया और उसे अपनी राजधानी बनाया।

    ➣ पुलकेशिन प्रथम ने बहुत से अश्वमेध यज्ञ किये। महाकूट अभिलेख में पुलकेशिन प्रथम की तुलना विष्णु से की गई है।

    महाकूट अभिलेख से ज्ञात होता है कि, उसने हिरण्यगर्भ, अश्वमेध, अग्निष्टोम, अग्नि चयन, वाजपेय, बहुसुवर्ण, पुण्डरीक यज्ञ करवाया था।

    ➣ इसने रण विक्रम, सत्याश्रय, धर्म महाराज, पृथ्वीवल्लभराज तथा राजसिंह आदि की उपाधियाँ धारण की थीं।

    ➣ पुलकेशिन प्रथम के दो पुत्र (1. कीर्तिवर्मन-I, 2. मंगलेश) थे। पिता की मृत्यु के बाद कीर्तिवर्मन प्रथम गद्दी पर बैठा।

    कीर्तिवर्मन प्रथम (566 – 597 ई.) : चालुक्य साम्राज्य का विस्तार

    ➣ पुलकेशिन प्रथम की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र कीर्तिवर्मन प्रथम उत्तराधिकारी हुआ। उसे वातापी का प्रथम निर्माता का कहा जाता है।

    ➣ उसने बनवासी के कदम्ब, कोंकण के मौर्य बेल्लारी-कर्नूल क्षेत्र के नलवंशी शासकों को पराजित कर उनके राज्यों को जीत लिया।

    ➣ इनमें सबसे महत्वपूर्ण विजय कदम्बों को जीतना था। उसके द्वारा जीता गया कदम्ब शासक अजयवर्मा था।

    ➣ अभिलेखों में उसे मगध, अंग, कलिंग, मुद्रक, गंग, मषक, पाण्ड्य, चोल, कदम्ब आदि राज्यों का विजेता कहा गया है।

    ➣ कीर्तिवर्मन ने गोवा को जीतकर उसका नाम खेत द्वीप रखा था।

    महाकूट स्तम्भ लेख से पता चलता होता है कि, उसने बहुसुवर्ण एवं अग्निस्टोम यज्ञ को सम्पन्न करवाया था।

    ➣ कीर्तिवर्मा प्रथम ने पुरुरण पराक्रम, पृथ्वी वल्लभ एवं सत्याश्रय की उपाधि धारण की थी।

    लगभग 597 ई. में कीर्तिवर्मा प्रथम की मुत्यु हो गयी। चूंकि कीर्तिवर्मा के पुत्र अल्पवयस्क थे। इसलिए उस के बाद उसका भाई मंगलेश अगला चालुक्य शासक बना।

    मंगलेश (597 – 610 ई.) : कलचुरियों पर विजय

    ➣ मंगलेश वैष्णव धर्म को अनुयायी था। उसने परमभागवत की उपाधि धारण की थी। उसने बादामी के गुहा मंदिर (विष्णु को समर्पित) का निर्माण पूरा करवाया जिसका आरंभ कीर्तिवर्मन-I के समय में हुआ था।

    ➣ मंगलेश ने गद्दी पर बैठने के उपरान्त कलचुरि नरेश बुद्धराज को पराजित किया था। साथ ही कदम्बों को भी समूल रूप से नष्ट कर दिया।

    ऐहोल अभिलेख ज्ञात होता है कि, मंगलेश अपने पुत्र को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहता था। इस बीच में पुलकेशी द्वितीय ने विद्रोह कर दिया। उसने मंगलेश को मारकर राजसिंहासन प्राप्त किया।

    पुलकेशिन द्वितीय (610 – 642 ई.) : हर्षवर्धन को पराजित करने वाला शासक

    ➣ पुलकेशिन-II बादामी के चालुक्य वंश का चौथा व सर्वाधिक शक्तिशाली व प्रसिद्ध शासक था। उसने सत्याश्रय, श्री पृथ्वीवल्लभ महाराज की उपाधि धारण की थी।

    ➣ उसके दरबारी कवि रविकीर्ति द्वारा रचित उसकी प्रशस्ति (गुणवर्णन) वर्णित है।

    ➣ पुलकेशिन द्वितीय के एहोल अभिलेख में महाभारत युद्ध की घटना से काल गणना का उल्लेख मिलता है। उसने अश्वमेध एवं वाजपेय यज्ञ किया।

    मंगलेशपुलकेशिन-II के गृह कलह के अवसर पर चालुक्य वंश की शक्ति बहुत क्षीण गयी थी और चालुक्य राज्य के अनेक प्रदेश फिर से स्वतंत्र हो गये थे।

    ➣ पुलकेशिन द्वितीय अपने समीपवर्ती क्षेत्रों, पल्लव शासक महेंद्र वर्मन (600 -630 ई.) को परास्त कर कृष्णा व गोदावरी क्षेत्र को जीत लिया था।

    ➣ पुलकेशिन द्वितीय ने कदम्बो की राजधानी वनवासी पर आक्रमण कर उसे ध्वस्त कर दिया। गंग शासक दुर्विनीत को पराजित किया। दुर्विनीत ने अपनी पुत्री का विवाह पुलकेशिन द्वितीय से कर अधीनता स्वीकार की।

    ➣ उसके दरबारी कवि रविकीर्ति द्वारा रचित उसके ऐहोल प्रशस्ति लेख से पता चलता है कि पुलकेशिन द्वितीय ने विंध्याचल के दक्षिण में संपूर्ण दक्षिणी भारत पर अधिकार कर लिया था। वह दक्षिणी भारत का अधिपति बन गया।

    पल्लव नरसिंह वर्मन प्रथम ने पुलकेशिन द्वितीय को परियल, मणिमंगल एवं शूरमाल के युद्धों में परास्त किया।

    ➣ पुलकेशिन द्वितीय के समय पल्लव-चालुक्य संघर्ष (630 ई. में) तब शुरू हुआ था जब पुलकेशिन ने महेन्द्र वर्मन प्रथम के समय पल्लवों के उत्तरी प्रदेश पर आक्रमण कर छीन लिया तथा अपने अनुज विष्णु वर्धन को सौंप दिया। यह शाखा वेंगी के चालुक्य कहलाई। जिन्हें पूर्वी चालुक्य भी कहा जाता है।

    ➣ वर्धन वंश शासक कन्नौज का सम्राट हर्षवर्धन (606-647ई.) पुलकेशिन द्वितीय का समकालीन था। वह उत्तरी भारत में अपने साम्राज्य की स्थापना में तत्पर था।

    ➣ एहोल अभिलेख से पता चलता है कि पुलिकेशन ने हर्षवर्धन को उसके दक्षिण अभियान में परास्त किया था एंव दक्षिणापथेश्वर(दक्षिण का ईश्वर या दक्षिण का स्वामी) की उपाधि धारण की।

    ➣ 642 ई. पल्लव शासक नरसिंह वर्मन ने पुलिकेशन द्वितीय को युद्ध में परास्त कर दिया और वातापी कोण्ड की उपाधि धारण कर राजधानी वातापी पर अधिकार कर लिया।

    अजन्ता की प्रथम गुफा के भित्ति चित्र में पुलकेशिन द्वितीय को ईरानी राजदूत फारसी शाह परवेज खुसरो द्वितीय का स्वागत करते हुये गया है। पुलकेशिन द्वितीय ने भी एक दूत फारस के शाह के दरबार में भेजा था।

    ➣ चीनी यात्री ह्वेनसांग 641 ई. में पुलकेशिन द्वितीय की राज्यसभा में आया और उसके राज्य का भ्रमण किया था। उल्लेखनीय है ह्वेनसांग 629-30 ई. में भारत आया था।

    विक्रमादित्य प्रथम (654 – 681 ई.) : पल्लवों से वातापी की पुनर्प्राप्ति

    ➣ विक्रमादित्य प्रथम पुलकेशी द्वितीय का पुत्र था, 13 वर्षों के राजनीतिक व्यवधान के बाद उसने बादामी को पुन: हासिल किया तथा 655 ई. सिंहासन पर आरूढ़ हुआ।

    ➣ साथ ही शत्रुओं द्वारा विजित कई अन्य क्षेत्रों को भी पुन: अपने साम्राज्य में मिला लिया। इसने चोल, चेर एवं पाण्डयों को हराया जिससे इन्हें तीन समुद्रों का स्वामी कहा गया है।

    ➣ उसने अपने भाई जयसिंह, जिसने उसका हमेशा साथ दिया, को लाट का गवर्नर बना दिया। इस प्रकार विक्रमादित्य के राज्यकाल में जयसिंह लाट (दक्षिणी गुजरात) की चालुक्य शाखा का संस्थापक बना।

    ➣ विक्रमादित्य ने श्रीपृथ्वीवल्लभ, भट्टारक, महाराजाधिराज, परमेश्वर, रण रसिक आदि उपाधियाँ धारण की।

    ➣ उसके शासन काल में चोलों, पाण्ड्यों एवं पल्लवों ने अपने को स्वतंत्र घोषित कर दिया था।

    ➣ उसने अपने समकालीन पल्लव राजा महेन्द्र वर्मन द्वितीय (668-70ई.) को युद्ध में परास्त कर मार डाला था।

    ➣ विक्रमादित्य प्रथम सम्भवतः अपने शासन काल के अन्तिम दिनों में पल्लव नरेश परमेश्वर वर्मन प्रथम से पराजित हुआ था।

    विनयादित्य (681 – 696 ई.) : चालुक्य शक्ति का सुदृढ़ीकरण

    ➣ विक्रमादित्य प्रथम के पश्चात उसका पुत्र विनयादित्य का उत्तराधिकारी था। उसके समय में चालुक्य साम्राज्य की शक्ति अक्षुण्ण बनी रही। विनयादित्य ने पल्लवों से संघर्ष जारी रखा।

    ➣ अभिलेखों में इसका उल्लेख त्रैराज्यपल्लवपति के रूप में किया गया है।

    ➣ उसके अभिलेखों से पता चलता है कि उसने चोलों, पांड्यों एवं केरल के साथ दक्षिण भारत के राजवंश युद्धों में विजय प्राप्त की।

    जेजुरी ताम्रपत्र के अनुसार- विनयादित्य ने अपने शासन के ग्यारहवें एवं चौदहवें वर्ष में पल्लवों, कलभों, मालवों एवं चोलों पर विजय प्राप्त की थी।

    ➣ मालवों कों जीतने के उपरान्त विनयादित्य ने सकलोत्तरपथनाथ की उपाधि धारण की थी।

    ➣ इसके अतिरिक्त उसने युद्धमल्ल, भट्टारक, महाराजाधिराज, राजाश्रय आदि की उपाधियाँ धारण कीं।

    सिरसी लेख में उसे सकलोन्तरापथनाथ, पलिध्वज, पंचमहाशब्द, पद्मरागमणि आदि का प्राप्त कहा गया है।

    ➣ उसने संभवतः उत्तरी भारत (उत्तरापथ) पर भी आक्रमण किया और इसी दौरान युद्ध में मारा गया।

    विजयादित्य (696 – 733 ई.) : दीर्घ एवं शांतिपूर्ण शासनकाल

    ➣ विजयादित्य का शासन काल ब्राह्मण धर्म के पुनरुत्थान एवं स्थापत्य तथा ललित कलाओं के विकास का काल था। इसका शासन सबसे दीर्घकालीन था।

    ➣ विजयादित्य ने भी पललवों की राजधानी कांची पर आक्रमण कर वहां के राजा परमेश्वरवर्मन-II से पर्याप्त धन वसूला।

    ➣ उसने बीजापुर ज़िले के पट्टडकल नामक स्थान में विजयेश्वर शिव मंदिर का निर्माण कराया था।

    ➣ उसकी बहन कुमकुम देवी ने लक्ष्मेश्वर में आनेसेज्येयवसादि नामक एक भव्य जैन मंदिर का निर्माण कराया।

    ➣ विजयादित्य पिता की भांति उसने श्रीपृथ्वीवल्लभ, महाराजाधिराज, परमेश्वर, सत्याश्रम, भट्टारक, साहसरसिक तथा समस्त भुवनाश्रय आदि जैसी उपाधि धारण की थी।

    विक्रमादित्य द्वितीय (733 – 747 ई.) : कांची विजय एवं पल्लवों पर प्रभुत्व

    ➣ विक्रमादित्य-II ने गंग सामंत श्रीपुरूष की सहायता से पल्लव नरेश नंदिवर्मन को पराजित किया और कांचिनकोंड (कांची का विजेता) की उपाधि धारण की।

    ➣ अरब आक्रमणकारियों के प्रयास को विक्रमादित्य-II के भतीजे पुलकेशिन ने विफल कर दिया जिससे प्रसन्न होकर विक्रमादित्य ने उसे अवनिजनारय (पृथ्वी के लोगों का शरणदाता) की उपाधि दी।

    ➣ परंतु लाट (दक्षिणी गुजरात की चालुक्य शाखा) पर राष्ट्रकूटों ने अधिकार कर वहां से चालुक्यों का शासन समाप्त कर दिया। उसने चोलों, पांड्यों, केरलों और कलभ्रों को भी परास्त किया।

    ➣ विक्रमादित्य-II की प्रथम पत्नी लोकमहादेवी ने पट्टदकल में लोकेश्वरनाथ मंदिर (शिव को समर्पित मंदिर) एवं द्वितीय पत्नी त्रैलोक्य महादेवी ने त्रैलोकेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया।

    कीर्तिवर्मन द्वितीय (747 – 757 ई.) : राष्ट्रकूटों द्वारा चालुक्य सत्ता का अंत

    ➣ चालुक्यों की बादामी शाखा का अंतिम शासक कीर्तिवर्मन-II था। वह विक्रमादित्य द्वितीय का पुत्र तथा उत्तराधिकारी था।

    ➣ इसने अपने युवराज काल में पल्लव नरेश नन्दि वर्मन को परास्त कर बहुमूल्य रत्न, हाथी एवं सुवर्ण प्राप्त किया था।

    ➣ उसने सार्वभौम, लक्ष्मी, पृथ्वी का प्रिय, राजाओं का राज एवं महाराज आदि की उपाधियाँ धारण की थीं।

    ➣ इस समय तक चालुक्य-पल्लव संघर्षों ने चालुक्यों की शक्ति कमजोर कर दी थी। फलतः उनके सामंत शक्तिशाली बनने लगे।

    ➣ ऐसे ही एक सामंत दंतिदुर्ग ने चालुक्य साम्राज्य के उत्तरी भाग पर अधिकार कर 753 ई. में राष्ट्रकूट राज्य की स्थापना की थी।

    समनगढ़ अभिलेख से जानकारी मिलती है कि चालुक्यों के सामंत दंतिदुर्ग (राष्टकूट) ने कीर्तिवर्मा द्वितीय को परास्त कर लगभग 753 ई. के आसपास अपने को स्वतंत्र शासक के रूप में स्थापित किया।

    ➣ राष्ट्रकूटों के उदय के साथ ही चालुक्यों की मूल शाखा (वातापी के चालुक्य) का अंत हो गया।

    ➣ कालांतर में 900 ई. के आसपास राष्टकूट के पतन के पश्चात् कल्याणी के चालुक्य की शाखा का उदय हुआ।

    वेंगी (आंध्र) पूर्वी चालुक्य

    वेंगी (आंध्र) पूर्वी चालुक्य

    ➣ वेंगी का प्राचीन राज्य आधुनिक आंध्र प्रदेश की कृष्णागोदावरी नदियों के बीच स्थित था। वेंगी की पहचान गोदावरी जिले में स्थित पेंडवेगि नामक स्थान से की जाती है।

    ➣ वातापी के प्रसिद्ध चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय ने इसे जीतकर अपने छोटे भाई विष्णुवर्धन को यहां का उपराजा बनाया था।

    ➣ कालांतर में उसी ने यहां एक स्वतंत्र चालुक्य वंश की स्थापना की जिसे पूर्वी चालुक्यवंश कहा जाता है। इसकी राजधानी वेंगी थी।

    ➣ हालाँकि जब तक वातापी के चालुक्य वंश की शक्ति क़ायम रही, वेंगि के पूर्वी चालुक्यों को अपने उत्कर्ष का अवसर नहीं मिल सका।

    ➣ 753 ई. के लगभग राष्टकूट शासक दन्तिदुर्ग द्वारा वातापी के चालुक्य राज्य का अन्त कर दिया गया, कालांतर में वेंगि में अनेक प्रतापी राजों हुए जिन्होंने ना केवल राष्ट्रकूटों से युद्ध किया अपितु अपने साम्राज्य का भी विस्तार किया।

    विष्णुवर्धन (615 – 633 ई.) : पूर्वी चालुक्य वंश की स्थापना एवं वेंगी पर अधिकार

    ➣ वेंगी के चालुक्य का संस्थापक कुब्ज विष्णुवर्धन था जो पुलिकेशन का छोटा भाई था। उसका राज्य विशाखापट्टनम से उत्तरी नेल्लोर तक फैला था। अभिलेखों के अनुसार उनका शासन संपूर्ण वेंगीमंडल पर था।

    ➣ चालुक्य की यह शाखा पुलिकेशन द्वितीय के शासनकाल में लगभग 615 ई. में स्थापित हुई थी। सम्भवत: यह शाखा कृष्णा तथा गोदावरी के दोआब क्षेत्र में पनपी थी जिसे पुलिकेशन द्वितीय ने पल्लवों से, पल्लव शासक महेंद्र वर्मन से छीना था।

    ➣ पुलिकेशन की ओर से उसने विभिन्न युद्धों में भाग लिया। सतारा अभिलेख से पता ज्ञात होता है वह अपने युवराज तथा वातापी शासक (पुलिकेशन द्वितीय ) का प्रिय कहता था।

    ➣ कालांतर में जब पुलकेशिन पल्लव नरेश नरसिंह वर्मा प्रथम के साथ भीषण युद्ध में फंसा हुआ था उसी समय विष्णुवर्धन ने वेंगी में अपनी स्वाधीनता घोषित कर दी।

    ➣ इसकी सूचना देने के लिये उसने दो ताम्रपत्र जारी किये तथा पृथ्वीवल्लभ, युवराज, विषमसिद्धि की उपाधि धारण की एंव चांदी के सिक्के चलाये जिस पर सिंह , दीपक तथा त्रिशूल के चित्र अकिंत थे।

    ➣ दक्षिण में विष्णुकुंडिन वंश का मयंणभट्टारर्क तथा कोंडपडुमटि वंश का बुद्ध राज उसके सामंत के रूप में शासन करते थे।

    ➣ इस प्रकार विष्णुवर्धन ने संपूर्ण वेंगी राज्य पर अपना अधिकार कर लिया। उसके लेखों से पता चलता है कि उसके राज्य में कलिंग का कुछ भाग सम्मिलित था।

    ➣ विष्णुवर्द्धन के बाद उसका उत्तराधिकारी उसका पुत्र जय सिंह प्रथम हुआ।

    जयसिंह प्रथम (633 – 663 ई.) : वेंगी क्षेत्र में चालुक्य प्रशासन का सुदृढ़ीकरण

    ➣ विष्णुवर्धन का पुत्र जयसिंह-I उसके बाद शासक हुआ। कुछ विद्वानों का मत है कि जयसिंह प्रथम ने अपने को पुलकेशी द्वितीय से स्वतंत्र कर लिया और इस प्रकार पूर्वी चालुक्य वंश का प्रादुर्भाव हुआ।

    ➣ अत: जय सिंह वेंगी के चालुक्य का प्रथम ऐतिहासिक शासक माना जाता है।

    ➣ उसने पृथ्वीबल्लभ, पृथ्वीजयसिंह तथा सर्वसिद्धि जैसी उपाधियां धारण की थी। लेख में उसे कई सामंत शासकों पराजित करने वाला बताया गया है।

    कैरा ताम्रपत्र अभिलेखीय से प्रमाणित होता है कि, जयसिंह, चालुक्य राजवंश का प्रथम ऐतिहासिक शासक था।

    ➣ जयसिंह का उत्तराधिकारी उसका भाई इन्द्रवर्मन हुआ। चालुक्य लेखों के अनुसार उसने केवल एक सप्ताह तक राज्य किया।

    ➣ उसके बाद उसका पुत्र विष्णुवर्धन-II गद्दी पर बैठा। उसने विषमसिद्धि, मकरध्वज तथा प्रलयादित्य जैसी उपाधियां ग्रहण की थी।

    ➣ उसका पुत्र तथा उत्तराधिकारी मंगि युवराज था जिसे विजयसिद्धिसर्वलोकाश्रय भी कहा जाता है। उसने 25 वर्षी तक शासन किया।

    जयसिंह द्वितीय (697 – 710 ई.) : पल्लवों एवं राष्ट्रकूटों से संघर्ष

    ➣ मंगि युवराज का पुत्र जयसिंह द्वितीय, जिसे सर्वलोकाश्रय तथा सर्वसिद्धि भी कहा गया है, अपने पिता की मृत्यु के बाद राजा बना तथा 13 वर्षो तक शासन किया।

    ➣ जयसिंह द्वितीय की मृत्यु के बाद वेंगी पर उसके सौतेले भाई कोकुलि विक्रमादित्य ने अधिकार कर लिया तथा उसने केवल 6 माह तक राज्य किया। उसने एलमंचिलि पर पुनः अधिकार कर लिया।

    कोकुलि विक्रमादित्य को हटाकर उसका बड़ा भाई विष्णुवर्धन तृतीय राजा बन बैठा। उसने एलमचिलि क्षेत्र को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया।

    ➣ उसके समय में पृथ्वीव्याघ्र नामक एक निषाद शासक ने उसके राज्य के दक्षिणी भाग पर अधिकार कर लिया परंतु बाद में विष्णुवर्धन ने उसे पुनः जीत लिया।

    ❑ उल्लेखनीय है यह वह समय था जब भारत पर मुस्लिम आक्रमण हो रहे थे जिसमे 712 ई. का प्रसिद्ध आक्रमण है जो भारतीय पश्चिमोत्तर सीमा से हुआ था (मुहम्मद बिन कासिम के नेतृत्व में) भारत से इस समय सिंध पृथक हो गया था।

    ❑ भारत के पश्चिमोत्तर भाग में गुर्जर प्रतिहार शासकों का शासन था। ग्वालियर अभिलेख से ज्ञात होता है कि नागभट्ट प्रथम ने अरबों को सिंध से आगे नहीं बढ़ने दिया।

    विजयादित्य प्रथम (746 – 764 ई.) : पूर्वी चालुक्य सत्ता का पुनर्गठन एवं स्थिरता

    ➣ विष्णुवर्धन तृतीय के पश्चात् उसका पुत्र विजयादित्य प्रथम वेंगी के चालुक्य वंश का राजा बना। उसने त्रिभुवनांकुशविजयसिद्धि जैसी उपाधियां धारण की थी।

    ➣ उसके समय में बादामी के चालुक्य वंश का राष्ट्रकूटों ने उन्मूलन कर दिया इसके बाद राष्ट्रकूटों का वेंगी के पूर्वी चालुक्यों के साथ संघर्ष प्रारंभ हुआ।

    विष्णुवर्धन चतुर्थ (764 – 799 ई.) : राष्ट्रकूट प्रभाव की स्वीकृति

    ➣ विजयादित्य प्रथम के पश्चात् उसका पुत्र विष्णुवर्धन-IV (764-799 ई.) राजा बना। इस समय राष्ट्रकूट वंश में कृष्ण प्रथम का शासन था।

    ➣ उसने अपने पुत्र गोविंद द्वितीय को वेंगी के चालुक्य राज्य पर आक्रमण करने के लिये भेजा।

    ➣ राष्ट्रकूट वंश के अलस अभिलेख (769 ई.) से पता चलता है कि युवराज गोविंद द्वितीय ने वेंगी के विरूद्ध अभियान का नेतृत्व किया था एंव उसने मुसीकृष्णा नदियों के संगम पर अपने विजय शिविर में कोष, सेना तथा भूमि सहित बेंगी नरेश के समर्पण को स्वीकार किया था।

    विजयादित्य तृतीय (848 – 892 ई.) : पल्लवों एवं पांड्यों पर विजय, चालुक्य उत्कर्ष

    ➣ इस वंश का सबसे प्रतापी शासक विजयादित्य तृतीय था।

    ➣ उसने लौह – रक्तनीति का अनुसरण करके दक्षिण और उत्तर में अनेक शासकों को परास्त किया। इस अभियान में इसका सेनापति पड़रंग था।

    दिग्विजय के क्रम में उसका सबसे पहला अभियान नेल्लोर के आसपास शासन करने वाली बोय जाति के विरुद्ध था जिन्होंने विष्णुवर्धन पंचम की मृत्यु के बाद स्वंय को स्वंतत्र घोषित कर दिया था।

    ➣ विजयादित्य ने दक्षिणी राज्यों चोल , पल्लवों एवं पाण्ड्यों को पराजित कर उन्हें अपने अधीन कर लिया था। इसके समकालीन पल्लव शासक अपराजित था।

    ➣ दक्षिणी क्षेत्रों को जीतने के पश्चात् उसने उत्तर की ओर राष्ट्रकूटों के विरुद्ध अभियान छेड़ा। जिसमे उसने राष्ट्रकूट शासक कृष्ण द्वितीय को पराजित किया।

    ➣ उसने राष्ट्रकूट के राजचिन्ह छीनकर वल्लभ की उपाधि धारण की तथा स्वयं को दक्षिणापथ का महानतम शासक घोषित किया।

    ➣ विजयादित्य नि: संतान था इसलिए उसने अपने छोटे भाई विक्रमादित्य को युवराज नियुक्त किया परन्तु उसके शासनकाल में ही उसकी मृत्यु हो गयी।

    ➣ फलस्वरूप विक्रमादित्य का पुत्र भीम प्रथम उत्तराधिकारी हुआ।

    अन्य उत्तराधिकारी

    ➣ वेंगी के विजयादित्य-IV,विजयादित्य-V, भीम-I,शक्तिवर्मा, राजेन्द्र कुलोत्तुंग इत्यादि शासक हुए। इन राजाओं ने राष्टकूटों के मुक़ाबले में अपने राज्य की स्वतंत्र सत्ता क़ायम रखने में सफलता प्राप्त की।

    ➣ 10वीं सदी के अन्तिम में चोल शासक राजराज प्रथम (985-1014) ने पश्चिमी (कल्याणी) चालुक्य राजा सत्याश्रय (997-1008 ई.) को परास्त किया, अपितु वेंगि के चालुक्य राजा पर भी आक्रमण किया।

    ➣ इस समय वेंगि के राजसिंहासन पर शक्तिवर्मा विराजमान था। उसने चोल आक्रान्ता से मुक़ाबला कर वेंगी की स्वंतंत्रता बनाए रखी।

    ➣ कालांतर उत्तराधिकारी विमलादित्य’ (1011-1018) ने चोल सम्राट की अधीनता स्वीकार कर ली।

    ➣ राजराज प्रथम ने विमलादित्य के साथ अपनी पुत्री का विवाह कर उसे अपना सम्बन्धी व परम सहायक बना लिया।

    ➣ विमलादित्य के बाद उसका पुत्र विष्णुवर्धन पूर्वी चालुक्य राज्य का स्वामी बना। उसका विवाह भी चोलवंश की ही एक कुमारी के साथ हुआ था।

    ➣ उसका पुत्र राजेन्द्र था, जो कुलोत्तुंग के नाम से वेंगि का राजा बना। उसका विवाह भी एक चोल राजकुमारी के साथ हुआ, और विवाहों के कारण वेंगि के चालुक्य वंश और चोल वंश का सम्बन्ध बहुत घनिष्ठ हो गया।

    ➣ चोल शासक अधिराजेन्द्र 1070 ई. में चोल राज्य का गद्दी पर बैठा उसकी कोई संतान नहीं थी। शासन के एक वर्ष के भीतर ही उसकी मृत्यु भी हो गई।

    ➣ इस परिस्थिति में वेंगि के चालुक्य राजा राजेन्द्र कुलोत्तुंग ने चोल वंश का राज्य भी प्राप्त कर लिया, क्योंकि वह चोल राजकुमारी का पुत्र था।

    ➣ इस प्रकार चोल राज्य और वेंगि का पूर्वी चालुक्य राज्य परस्पर मिल कर एक हो गए, और राजेन्द्र कुलोत्तुंग के वंशज इन दोनों राज्यों पर दो सदी के लगभग तक शासन करते रहे।

    सन 1070 ई. के बाद वेंगि के राजवंश की अपनी कोई पृथक् सत्ता नहीं रह गई।

    ➣ इस प्रकार वेंगी के चालुक्य शाखा का अंतिम शासक राजेन्द्र कुलोत्तुंग (1163 -1118 ई.) था।

    कल्याणी के पश्चिमी चालुक्य

    कल्याणी के पश्चिमी चालुक्य

    ➣ कल्याणी के चालुक्यवंश का उदय राष्ट्रकूटों के पतन के पश्चात् हुआ।

    तैल चालुक्य अथवा तैलप द्वितीय चालुक्य राजवंश का संस्थापक था। उसके पूर्व कीर्त्तिवर्मा तृतीय, तैल प्रथम, विक्रमादित्य तृतीय, भीमराज, अय्यण प्रथम तथा विक्रमादित्य चतुर्थ के नाम मिलते हैं। ये सभी राष्ट्रकूटों के सामंत थे।

    ➣ तैल ने 972 ई. के आसपास उसने अन्तिम राष्ट्रकूट राजा कर्क द्वितीय को परास्त किया था। राष्ट्रकूट राज्य का अन्त हो गया, और तैलप के लिए दिग्विजय का मार्ग निष्कंटक हो गया।

    ➣ तैलप द्वारा स्थापित इस राजवंश ने लगभग 1119 ई. तक शासन किया। इसकी राजधानी कल्याणी थी।

    ➣ साहित्यिक ग्रंथों में बिल्हण कृत विक्रमाकदेवचरित सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। जिससे इस वंश के सबसे प्रतापी शासक विक्रमादित्य-VI के जीवन तथा उसकी उपलब्धियों पर प्रकाश पड़ता है।

    ➣ कल्याणी के चालुक्यों का पारिवारिक चिह्न वराह था। उनके राजचिह्नों में मयूरध्वज भी शामिल था।

    तैल द्वितीय (973 – 997 ई.) : पश्चिमी चालुक्य सत्ता का पुनरुत्थान

    ➣ कल्याणी के चालुक्यों का स्वतंत्र राजनेतिक इतिहास तैलप द्वितीय के समय से प्रारंभ होता है।

    जिलगुंड लेख से पता चलता है कि अय्यण ने राष्ट्रकूट नरेश कृष्ण द्वितीय की कन्या से विवाह कर दहेज में विपुल सम्पत्ति प्राप्त कर लिया था।

    ➣ उसके पुत्र विक्रमादित्य-IV का विवाह कलचुरि राजा लक्ष्मणसेन की कन्या बोन्धादेवी के साथ सम्पन्न हुआ था। कालांतर में इसी से तैल द्वितीय का जन्म हुआ।

    ➣ ये सभी शासक बीजापुर तथा उसके समीपवर्ता क्षेत्र में शासन करते थे जो इस वंश की मूल राजधानी के पास में था।

    ➣ धीरे-धीरे उसने अपनी शक्ति का विस्तार करना प्रारंभ किया। कृष्ण तृतीय के उत्तराधिकारियों खोढिग तथा कर्क-II के समय में राष्ट्रकूट वंश की स्थिति अत्यंत निर्बल पड़ गयी।

    ➣ महत्वाकांक्षी तैलप ने इसका लाभ उठाया। 973-74 ई, में उसने राष्ट्रकूटों की राजधानी मान्यखेत पर आक्रमण कर दिया। युद्ध में कर्क मारा गया तथा राष्ट्रकूट राज्य पर तैलप का अधिकार हो गया।

    ➣ उसकी इस सफलता का उल्लेख खारेपाटन अभिलेख में मिलता है। इसके बाद तैलप ने राष्ट्रकूट सामंतों को अपने अधीन करने के लिये अभियान किया।

    ➣ शिमोगा (कर्नाटक) जिले के सोराब तालुक के सामंत शांतिवर्मा, जो पहले राष्ट्रकूट नरेश कर्क के अधीन, ने तैलप की अधीनता स्वीकार की थी।

    ➣ तैलप ने युद्ध में गंग सामंत पांचालदेव को बेल्लारी के सामंत भूतिगदेव की सहायता से परास्त किया था। प्रसन्न होकर तैलप ने भूतिगदेव को आहवमलल की उपाधि प्रदान किया।

    ➣ तैलप का परमार शासक मुंज से लम्बे समय तक संघर्ष चला। मेरुतुंग की प्रबंध चिंतामणि से ज्ञात होता है कि उसने मुंज पर छः बार आक्रमण किया किंतु हर बार उसे पराजय का सामना करना पड़ा।

    कन्नड़ कथाओं में तैलप द्वितीय को भगवान श्रीकृष्ण का अवतार कहा गया है।

    ➣ उसके इस साम्राज्य विस्तारवादी नीति का प्रबल विरोधी गंग नरेश पांचाल देव था। जिसे उसने वेल्लारी के सामन्त शासक गंगभूतिदेव की सहायता से पराजित कर मार दिया।

    ➣ लगभग 24 वर्ष के शासन के बाद 967 ई. में तैलप की मृत्यु हो गई।

    सत्याश्रय (997 – 1008 ई.) : चोल संघर्ष

    ➣ तैलप का उत्तराधिकारी सत्याश्रय हुआ। सत्याश्रय को सत्तिग अथवा सत्तिम नाम से भी सम्बोधित किया गया है।

    ➣ वह भी अपने पिता के ही समान महत्वाकांक्षी एवं साम्राज्यवादी शासक था। राजा बनने के बाद उसने अपना विजय अभियान प्रारंभ किया।

    ➣ सर्वप्रथम उसने उत्तरी कोंकण के शीलाहार वंशी शासक अपराजित तथा गुर्जर नरेश चामुड राज के विरूद्ध सफलतायें प्राप्त की।

    ➣ परंतु परमार शासक सिंधुराज ने उसे हराकर उन प्रदेशों को पुनः अपने अधिकार में कर लिया जिसे तैलप ने उसके भाई मुंज से जीता था।

    ➣ उसके शासन काल की मुख्य घटना चोल राज्य के अधिपति राजराज प्रथम की दिग्विजय है। जिसका वेंगी के चालुक्यों पर प्रभाव था।

    ➣ 1006 ई. में सत्याश्रय ने वेंगी पर आक्रमण किया। उसे प्रारंभिक सफलता मिली तथा उसकी सेना ने गुंदूर जिले पर अधिकार जमा लिया।

    ➣ सत्याश्रय के काल का सबसे भीषण युद्ध चोल शासक अरुमोलिवर्मन अथवा राजा रामप्रथम के साथ हुआ। इस युद्ध में सत्याश्रय पराजित हुआ।

    ➣ उसने आकर्लक चरित्र, इरिवेंडंग एवं आहवमल्ल आदि अनेक विरुद्वों को धारण किया था।

    ➣ सत्याश्रय व्यक्तिगत रूप से जैन धर्म का अनुयायी था। इसका गुरु विमलचन्द्र जैन दर्शन का महान् विद्धान था।

    ➣ सत्याश्रय विद्धानों का संरक्षक भी था। कन्नड़ कवि गदायुद्ध को इसका संरक्षण प्राप्त था।

    विक्रमादित्य V (1008 – 1015 ई.) : चालुक्य सत्ता का संरक्षण

    ➣ विक्रमादित्य पंचम, सत्याश्रय के बाद कल्याणी के राजसिंहासन पर आरूढ़ हुआ। सत्याश्रय का कोई पुत्र नहीं था। अतः उसके बाद उसका भतीजा विक्रमादित्य पंचम राजा बना।

    ➣ वह दशवर्मा का बड़ा पुत्र था। कैथोम लेख में उसे यशस्वी तथा दानशील शासक बताया गया हैं उसने 1015 ई. तक राज्य किया।

    ➣ उसके समय में मालवा के परमारों के साथ चालुक्यों का पुनः संघर्ष हुआ, और वाकपतिराज मुञ्ज की पराजय व हत्या का प्रतिशोध करने के लिए परमार राजा भोज ने चालुक्य राज्य पर आक्रमण कर उसे परास्त किया। पर बाद में राजा भोज ने भी विक्रमादित्य पंचम से पराजय का मुँह देखा।

    ➣ अभिलेखों में इसके वल्लभवनरेन्द्र तथा त्रिभुवनमल्ल आदि उपाधियों का उल्लेख मिलता है।

    ➣ एक अभिलेख में उसकी बहन अनुष्कादेवी का उल्लेख मिलता है, जो किसकाड राज्य की शासिका थी।

    अय्यण द्वितीय (1015 ई.) : अल्पकालीन शासन

    ➣ अय्यण विक्रमादित्य पंचम के बाद राजगद्दी पर बैठा। वह विक्रमादित्य पंचम का भाई था।

    ➣ 1015 ई. में उसके भाई जयसिंह द्वितीय ने उसे राजगद्दी से हटाकर स्वंय सत्ता पर अधिकार कर लिया।

    जयसिंह-II (1015 – 1043 ई.) : चोलों से संघर्ष

    ➣ सन 1015 ई. जयसिंह द्वितीय शासक बना। उसने कई युद्ध किये। मालवा के परमार शासक भोज ने उसके राज्य पर आक्रमण किया था।

    लाट और कोंकण पर अधिकार कर लिया। परंतु बाद में जयसिंह ने उसे पराजित कर पुनः अपने प्रदेशों पर अधिकार कर लिया। उसके समय में पुनः चोलों के साथ युद्ध किया। वेंगी पर इस समय चोलों का प्रभाव था।

    ➣ 1019 ई. में वहां के शासक विमलादित्य की मृत्यु के बाद उसके चोल राजकुमारी कुंदवै देवी से उत्पन्न पुत्र राजराज तथा उसके सौतेले भाई विष्णुवर्धन विजयादित्य-VII के बीच शासन के लिये संघर्ष हुआ।

    ➣ चोल राजराज के समर्थक थे। अतः जयसिंह ने विजयादित्य की सहायता के लिये वेंगी पर आक्रमण किया।

    ➣ जयसिंह ने तुंगभद्रा नदी पार कर बेलारी पर अधिकार कर लिया। उसका सामना करने के लिये राजेन्द्र चोल ने दो सेनायें उत्तर की ओर भेजीं।

    ➣ पहली सेना ने राजेन्द्र चोल के नेतृत्व में मस्की के युद्ध में जयसिंह को पराजित कर उसे तुंगभद्रा के उत्तर में भगा दिया।

    ➣ दूसरी सेना को भी वेंगी में सफलता मिली तथा विजयादित्य युद्ध में पराजित हुआ और भाग गया।

    ✨ विशेष:
    इस समय भारत के पश्चिमी -उत्तरी सीमा पर महमूद गौरी ने सोमनाथ मंदिर (1025 ई0 ) को लूटा था। दक्षिण-भारत अभी इन विदेशी आक्रमणों से सुरक्षित था।

    सोमेश्वर-I (1048 – 1068 ई.) : कल्याणी को राजधानी बनाया

    ➣ जयसिंह द्वितीय के बाद उसका पुत्र सोमेश्वर प्रथम कल्याणी के चालुक्य वंश का सबसे प्रतापी राजा था। इसने आहवमल्ल की उपाधि धारण की थी। अन्य उपाधियाँ- सर्वज्ञ चक्रवर्ती, भूलोक मल्ल, त्रिभुवन मल्ल।

    ➣ उसने चालुक्यों की राजधानी मान्यखेत से कल्याणी ( हैदराबाद ) स्थानांतरित की। विल्हण के अनुसार उसने कल्याण नगर को इतना सजाया कि वह विश्व के सभी नगरों में श्रेष्ठ बन गया।

    ➣ वह एक विजेता था। उसकी विजयों का एक विवरण नान्देड़ के लेख में मिलता है जिसके अनुसार सोमेश्वर ने मगध, कलिंग और अंग के शत्रु राजाओं की हत्या कर दी।

    ➣ उसने अपने समकालीन परमार राजा भोज को परास्त कर उसनी राजधानी धार पर अधिकार कर लिया।

    ➣ उसने अपने शासनकाल गुर्जर प्रतिहार वंश (कन्नौज) पर आक्रमण कर वहां के शासक को भागने पर विवश कर दिया।

    ➣ चेदि के कलचुरी राजा कर्णदेव (1063-1093) ने चालुक्य पर आक्रमण किया था जिसे सोमेश्वर के सम्मुख परास्त होना पड़ा।

    ➣ कालांतर में कोप्पम(1054) तथा कुडलसंगम(1062) के युद्धों में सोमेश्वर प्रथम का चोलों से लगातार संघर्ष हुआ, किन्तु इन युद्धों में चोलों को प्रमुख सफलता प्राप्त हुई।

    ➣ सोमेश्वर प्रथम महान विजेता व साम्राज्य निर्माता था। चोलों के सिवाय अन्य सभी मोर्चों पर उसे सफलता प्राप्त हुई। चोलों से पराजित होने के बाद भी उसके साम्राज्य की सीमा क्षतिग्रस्त नहीं हुई।

    ➣ उसने 25 वर्षों तक राज्य किया। बिल्हण के अनुसार उसने स्वेच्छा से तुंगभद्रा नदी के जल में डूब कर अपनी जीवन-लीला समाप्त कर दी।

    सोमेश्वर-II (1068 – 1076 ई.) : विक्रमादित्य VI से संघर्ष

    ➣ अपने पिता सोमेश्वर प्रथम की मृत्यु के बाद बड़ा पुत्र सोमेश्वर द्वितीय सिंहासन आरूढ़ हुआ। पर वह अयोग्य शासक साबित हुआ।

    उत्तरी भारत की यात्राओं में सोमेश्वर का छोटा पुत्र विक्रमादित्य IV ने अंग, बंग, मगध आदि की विजय कर अदभुत पराक्रम दिखाया था।

    ➣ पिता की मृत्यु के समय वह सुदूर दक्षिण में चोल राज्य के साथ संघर्ष में व्याप्त था। विक्रमादित्य की अनुपस्थिति से लाभ उठाकर सोमेश्वर द्वितीय ने कल्याणी की राजगद्दी पर क़ब्ज़ा कर लिया

    ➣ चोल नरेश वीर राजेन्द्र ने सोमेश्वर द्वितीय के राज्य पर आक्रमण किया। सोमेश्वर के भाई विक्रमादित्य ने कुछ सामंतों के साथ चोल नरेश से संधि कर ली।

    ➣ वीर राजेन्द्र ने अपनी एक पुत्री का विवाह उससे कर दिया तथा सोमेश्वर द्वितीय पर दबाव डालकर विक्रमादित्य को चालुक्य राज्य के दक्षिणी भाग पर युवराज के रूप में शासन करने का अधिकार दिला दिया। इस तरह चालुक्य राज्य दो भागों में विभाजित हो गया।

    ➣ सोमेश्वर ने अपने भाई विक्रमादित्य के विरूद्ध अपनी स्थिति मजबूत करने के लिये कुलोत्तुंग के साथ मैत्री संबंध स्थापित कर लिया।

    ➣ कालांतर में दोनों ने सम्मिलित रूप से विक्रमादित्य के ऊपर आक्रमण कर दिया। चोलों ने गंगवाड़ी का प्रदेश छीन लिया इस युद्ध में विक्रमादित्य ने सोमेश्वर को बंदी बना लिया और उसे कारागार में डाल दिया गया।

    सन 1076 ई. में छोटा भाई विक्रमादित्य VI कल्याणी के राजसिंहासन पर आरूढ़ हुआ।

    विक्रमादित्य-VI (1076 – 1126 ई.) : चालुक्य साम्राज्य का स्वर्णकाल

    ➣ विक्रमादित्य सोमेश्वर प्रथम का कनिष्ठ पुत्र तथा सोमेश्वर द्वितीय का छोटा भाई था। यह कल्याणी के चालुक्य शाखा का अन्तिम महान् शासक था। उसने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की थी।

    बिल्हण के विवरण से पता चलता है कि वह सोमेश्वर के पुत्रों में सबसे योग्य था जिसके कारण सोमेश्वर इसे ही युवराज बनाना चाहता था। किंतु सोमेश्वर द्वितीय के रहते यह संभव नहीं हो पाया।

    ➣ विक्रमादित्य प्रारंभ में गंगवाडी तथा बनवासी पर सामंत की हैसियत से शासन करता था। अनुकूल अवसर पाकर अंततः उसने कल्याणी के राजसिंहासन पर अधिकार कर लिया।

    हैदराबाद संग्रहालय में सुरक्षित दो दानपत्रों से भी इसका समर्थन होता है जिनके विवरण के अनुसार विक्रमादित्य ने अपने बाहुबल से सोमेश्वर से राजलक्ष्मी को ग्रहण कर लिया था।

    ➣ 1076 ई. में अपने राज्यारोहण के समय उसने एक संवत् का प्रवर्तन किया जिसे चालुक्य-विक्रम कहा जाता है। इतिहास में वह विक्रमादित्य-VI के नाम से प्रसिद्ध है।

    ➣ विक्रमादित्य षष्ठ ने कलिंग, बंग, मरु (राजस्थान), मालवा, चेर (केरल) और चोल राज्यों को परास्त किया। उसके शासन काल में चालुक्य साम्राज्य दक्षिण में कन्याकुमारी से लेकर उत्तर में बंगाल तक विस्तृत था।

    ➣ उसने चोल राजा वीर राजेन्द्र तथा कदम्ब शासक की सहायता से चालुक्य राज्य के दक्षिणी भाग पर अधिकार कर लिया।

    ➣ विक्रमादित्य षष्ठ का काल शांति स्थापित रही। इसके समय चोल-चालुक्य संघर्ष काफी समय तक रुक गया। इसने विक्रमपुर नमक नये नगर की स्थापना की।

    नीरुगंद के ताम्र लेख से ज्ञात होता है कि, अपने राज्य में विद्या तथा धर्म की अभिवृद्धि के लिए उसने 500 तमिल ब्राह्मणों को अपने राज्य में बसाया।

    ➣ विक्रमादित्य षष्ठ की राजसभा में विक्रमांकदेवचरित के रचयिता राजकवि विल्हण तथा मिताक्षरा (हिन्दू विधि ग्रंथ ) के लेखक विज्ञानेश्वर मिश्र नामक लेखक रहते थे।

    बंगाल को छोड़कर शेष भारत में विज्ञानेश्वर मिश्र की मिताक्षरा हिंदू को कानून का सबसे आधिकारिक ग्रंथ माना जाता है। याज्ञवल्क्य स्मृति जो पर आधारित एक प्रसिद्ध टीका है।

    ➣ 1015 ई. में नर्मदा नदी के तट पर उसने तुला-पुरुष-दान तथा चन्द्रदेवी नदी के तट पर दान कर्म सम्पन्न करवाया।

    ➣ विक्रमादित्य ने 50 वर्षों तक शासन किया। उसकी मृत्यु 1126 ई. में हुई। उसे कल्याणी के चालुक्य वंश का महानतम शासक कहा जा सकता है।

    सोमेश्वर तृतीय (1126 – 1138 ई.) : मानसोल्लास ग्रंथ की रचना

    ➣ विक्रमादित्य-VI के पश्चात् कल्याणी के चालुक्य वंश की अवनति प्रारंभ हुई। उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र सोमेश्वर-III चालुक्य राजवंश का शासक बना।

    ➣ राज्यारोहण के उपलक्ष्य में उसने भूलोकमल्ल वर्ष नामक एकनवीन वर्ष का प्रचलन किया तथा भूलोकमल्ल और त्रिभुवनमल्ल उपाधियां धारण की।

    ➣ उसने युद्ध से अधिक, शांति की ओर ध्यान दिया। किन्तु वह एक निर्बल शासक साबित हुआ जिसके समय में चालुक्य साम्राज्य की अवनति प्रारंभ हो गयी।

    चोल शासक विक्रम ने वेंगी पर पुनः अधिकार कर लिया। 1133 ई. में गोदावरी नदी के तट पर चोलों ने सोमेश्वर की सेना को परास्त किया।

    ➣ इसी समय होयसल भी स्वतंत्र हो गये। उनके शासक विष्णुवर्धन में नोलम्बवाडी, हंगल तथा बनवासी पर अधिकार कर लिया।

    ➣ वह स्वयं बड़ा विद्वान था जिसने मानसोल्लास नामक शिल्पशास्त्र के प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की थीं। अपनी विद्धता के कारण सोमेश्वर तृतीय सर्वज्ञभूप के रूप में प्रसिद्ध था।

    ➣ किन्तु उसकी बहुमुखी प्रतिभा एवं विद्वत्ता उसकी सैन्य संगठन शक्ति में सहायक न हो सकी। उसके शासन काल में अधीनस्थ सामंतों ने चालुक्य साम्राज्य की प्रभुत्ता त्यागकर स्वतंत्र शासन करना आरम्भ कर दिया, फलस्वरूप चालुक्य शक्ति का ह्रास होने लगा।

    ➣ सोमेश्वर तृतीय के बाद उसके दो पुत्रों[जगदेक मल्ल-II (1138-1151 ई.), तैलप-II (1151-1156 ई.)] ने शासन किया।

    जगदेकमल्ल द्वितीय (1138 – 1151 ई.) : चालुक्य सत्ता का संरक्षण

    ➣ जगदेक मल्ल-II द्वितीय के समय तक चालुक्य साम्राज्य सुरक्षित बचा रहा तथा होयसल उसकी अधीनता मानते रहे।

    चित्तलदुर्ग लेख (1143 ई.) में कहा गया है कि उसने चोलों तथा होयसलों को जीता था।

    तेलप तृतीय (1151 – 1156 ई.) : कलचुरि संघर्ष

    ➣ जगदेकमल्ल-II के बाद उसका छोटा भाई तैलप-III राजा बना। वह अत्यंत निर्बल शासक था।

    ➣ उसके काल में होयसल, कलचुरि, यादव आदि सामंतों ने अपनी-अपनी स्वाधीनता घोषित कर दी।

    अनमकोंड अभिलेख से पता चलता है कि काकतीय शासक प्रोल ने युद्ध में उसे बंदी बना लिया किंतु बाद से दया करके उसे मुक्त कर दिया। इस प्रकार चालुक्य राज्य अत्यंत जर्जर हो गया।

    ➣ अंतत: कलचुरि वंशी बिज्जल ने कल्याणी पर अधिकार कर लिया।

    सोमेश्वर-चतुर्थ (1181 – 1189 ई.) : पश्चिमी चालुक्य सत्ता का पतन

    ➣ चालुक्य वंश का अंतिम शासक तैल तृतीय का पत्र सोमेश्वर-IV (1181-1189ई.) हुआ। वह कुछ शक्तिशाली था और उसने कल्याणी को पुनः जीत लिया।

    ➣ लेखों में उसे चालुक्याभरण श्रीमतत्रैलोक्यमल्ल भुजबलवीर कहा गया है। संभवतः भुजबलवीर की उपाधि उसने कलचुरियों के विरूद्ध सफलता के उपलक्ष्य में ही धारण की थी।

    ➣ एक लेख में उसे कलचुरी वंश का उन्मूलन करने वाला (कलचूर्यकुल निर्मूलता) कहा गया है।

    ➣ सोमेश्वर ने चालुक्य वंश की प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित कर दिया। कुछ समय तक वह अपने साम्राज्य को सुरक्षित रखने में सफल रहा।

    ➣ परंतु उसके राज्य में चतुर्दिक विद्रोह उठ खड़े हुए और वह अपनी स्थिति संभाल नहीं सका। उसके अधीन कई सामंतों जैसे देवगिरि के यादवों ने उसे परास्त कर चालुक्य राजधानी कल्याणी पर अधिकार कर लिया।

    होयसल बल्लाल द्वितीय ने भी चालुक्य सेनापति ब्रह्म को पराजित कर दिया। साम्राज्य के दक्षिणी भागों पर होयसलों का अधिकार स्थापित हुआ तथा सोमेश्वर ने भागकर बनवासी में शरण ली।

    ➣ संभवत: वहीं रहते हुए उसका निधन इसके साथ ही कल्याणी के चालुक्य वंश का अंत हो गया।

    चालुक्य संस्कृति

    ➣ चालुक्यों का राजचिह्न मयूरध्वज था। उनके लेख संस्कृत भाषा में हैं।

    ➣ चालुक्य शासकों ने परमेश्वर, महाराजाधिराज, परमभट्टारक, परम्भागवत, सत्याश्रय, श्री पृथ्वीवल्लभ, पृथ्वीवल्लभ जैसी विशाल उपाधियां ग्रहण की।

    ➣ चालुक्य लेखों में मंत्री परिषद का उल्लेख नहीं मिला। इसके अभिलेखों में महासंधिविग्रहिक, विषयपति, ग्रामकूट, महत्तराधिकारिन आदि केन्द्रीय पदाधिकारियों के नाम मिलते हैं।

    ➣ अधिकारियों के विशेषीकरण की एक नई प्रवृत्ति भी मिलती है, जिन्हें संधिविग्रहिक कहा जाता था। जैसे- लाट संधिविग्रहिक।

    ➣ ह्वेनसांग ने चालुक्य राज्य के लोगों को विद्या का व्यसनी बताया है।

    ➣ पुलकेशिन द्वितीय के सामन्त गंगराज दुर्विनीत ने शब्दावतार नामक व्याकरण ग्रन्थ की रचना की।

    ➣ पंडित उदयदेव ने जैनेन्द्र व्याकरण लिखी।

    ➣ सोमदेव सूरि ने यशस्तिलक चंपू तथा नीतिवाक्यामृत नामक ग्रन्थों की रचना की।

    ➣ चालुक्यों का कुल देवता विष्णु तथा उनका प्रतीक वराह था।

    ➣ एहोल अभिलेख का रचयिता रविकीर्ति जैन था उसने ऐहोल में 634 ई. में जिनेन्द्र के जैन मंदिर का निर्माण करवाया जिसे मेगुती मन्दिर कहा जाता है।

    ➣ चालुक्य मंदिर के उत्कृष्ट उदाहरण बादामी, एहोल तथा पडकल से प्राप्त होते हैं।

    ➣ बादामी में चार गुफा मन्दिर हैं। प्रथम शैव, दूसरी एवं तीसरी वैष्णव और चौथी गुफा जैन धर्म से सम्बन्धित है। हरि-हर की प्राचीनतम प्रतिमा गुफा संख्या 3 में मिलती है।

    ➣ एहोल को मंदिरों का नगर कहा जाता है, यहां 70 मंदिर मिले हैं। यहां के प्रसिद्ध मंदिर मेगुती का जैन मंदिर, लाडखा का सूर्य मंदिर, दुर्गा का मंदिर आदि हैं।

    दुर्गा मन्दिर (दुर्ग मन्दिर) में दुर्गा की प्रतिष्ठा नहीं की गई हैं। वस्तुतः यह एक दुर्ग में स्थित है।

    ➣ पडकल के दस मंदिरों में नागर शैली के 4 मंदिर बने हैं, जिनमें पापनाथ का मंदिर प्रसिद्ध है। द्रविड़ शैली में बने विरूपाक्ष (लोकेश्वर मन्दिर), त्रेलोकेश्वर मन्दिर (मल्लिकार्जुन मन्दिर) तथा संगमेश्वर मंदिर विशेष रूप में उल्लेखनीय है ।

    ➣ विरूपाक्ष मन्दिर का वास्तुकार गण्ड (दक्षिण भारत का वास्तुविद) था।

    ➣ चालुक्य काल में सर्वप्रथम विरूपाक्ष मन्दिर में गोपुरम मिलता है। मन्दिर की दीवारों पर रामायण के दृश्यों का अंकन है।

    आलमपुर मन्दिर समूह, कर्नाटक में चालुक्यों द्वारा निर्मित 9 मन्दिरों का समूह है, जो नव ब्रह्मा देवालय कहे जाते हैं।

    ➣ वातापी के चालुक्यों का राज्याभिषेक (महावीर सिंहासन) पडल में होता था।

    ➣ चालुक्य शासन काल में महिलाओं को उच्च पदों पर नियुक्त किया जाता था। विक्रमादित्य द्वितीय की दो पत्नियाँ लोकमहादेवी और त्रैलोक्य महादेवी कलचुरि वंश की कन्याएँ थी, जिन्होंने चालुक्य प्रशासन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    ➣ लोकमहादेवी ने विरुपाक्ष मन्दिर तथा त्रैलोक् महादेवी ने त्रैलोकेश्वर (मल्लिकार्जुन) नाम से विशाल पाषाण मंदिर बनवाए।

    ➣ जयसिंह द्वितीय की बहिन अक्कादेवी कई प्रान्तों की गवर्नर रह चुकी थी। वातापी के चालुक्य शासक विक्रमादित्य प्रथम के भाई चन्द्रादित्य की पत्नी विजय भटारिका ने भी प्रान्त से शासन किया।

  • मदुरैई के पांड्य (590-1345 ई.) : जाटवर्मन सुंदर पांड्य प्रथम

    📚 विषय सूची

    मदुरैई (मदुरा) के पांड्य

    ➣ पांड्य राजवंश बहुत प्राचीन वंश है। जो संगम काल से सम्बन्धित है। पाण्ड्य राजवंश का प्रारम्भिक उल्लेख पाणिनि की अष्टाध्यायी में मिलता है।

    ➣ पाण्ड्याओं का पहला उल्लेख मेगस्थनीज ने किया है, वह पाण्ड्य राज्य का उल्लेख माबर नाम से करता है।

    ➣ इसके अतिरिक्त अशोक के अभिलेख, महाभारत एवं रामायण में भी पाण्ड्य साम्राज्य के विषय में जानकारी मिलती है।

    ➣ प्राचीन समय में पांड्य राज्य तमिलनाडु में जहां आजकल मदुरातिनेवली जिले हैं, में स्थित था।

    ➣ पांड्य राज्य की राजधानी मदुरा (मदुरै/मदुरई) थी, जो तमिल संस्कृति और साहित्य का सुप्रसिद्ध केंद्र थी।

    नेडियोन पांड्य वंश का प्रथम शासक था। यह संगम कालीन राजवंश रहा। कालांतर में पांड्य वंश की दो अन्य शाखाओं का उदय हुआ।

     प्रथम पांड्य वंश कुंडुगोन
     द्वितीय पांड्य वंशसुन्दर पांड्य

    ➣ जिस समय प्रथम पांड्य वंश का उदय हुआ उस समय दक्षिण भारत में बादामी के चालुक्य का शासन था इसके समकालीन अन्य राजवंश चेरी एंव पल्लव शासकों का राज्य था।

    प्रथम पाण्ड्य साम्राज्य

    कुंडुगोन (590-620 ई.)

    ➣ वर्ष 590 ई. में कुंडुगोन ने पाण्ड्य शक्ति को पुनजीर्वित किया अतएव उसे पाण्ड्य वंश का पुनर्स्थापक (पांड्य वंश के प्रथम चरण) का संस्थापक कहा जाता है।

    ➣ उसने कलभ्रों को पराजित करके मदुरा, तिनेवली व अधिकांश केरल पर अधिकार कर लिया। उसकी राजधानी मदुरा थी।

    मारवर्मन अवनिशूलमणि (620-645)

    ➣ यह कंडुगोन का पुत्र था इसने अपने पैतृक राज्य को सुरक्षित बनाये रखा।

    जयंतवर्मन/सेलियन सेंदन (645-670 ई.)

    ➣ यह पांड्य वंश का तीसरा शासक हुआ। उसने चेर राज्य की विजय की तथा इसके उपलक्ष्य में वानवन की उपाधि धारण की थी। यह चेर राजाओं की उपाधि थी।

    अरिकेसरी मारवर्मन (670-700 ई.)

    अरिकेसरी माडूवर्मन प्रारंभिक पांड्य नरेशों में महान योद्धा व सफल शासक सिद्ध हुआ। प्रारंभ में वह जैन धर्मानुयायी था।

    ➣ उसका विवाह एक चोल राजकुमारी मंगैपार-करसी के साथ हुआ, जो शिव उपासिका थी।

    ➣ इसी चोल राजकुमारी के विशेष आग्रह पर शैव भक्त सम्बदर मदुरा में आये जिनके प्रभाव में आकर अरिकेसरी मारवर्मन ने जैन धर्म का परित्याग कर शैव धर्म को अपना लिया।

    ➣ उसने केरल एवं अन्य पड़ोसी राज्यों को जीतकर अपने राज्य का विस्तार किया।

    कोच्चडय्यन (700-730 ई.)

    ➣ अरिकेसरी माड़वर्मन के पश्चात् कोच्चडय्यन (रणधीर) पांड्य शासक बना। उसने कई उपाधियां (वाणवन, शेम्बियम (शोलान) धारण की थी।

    ➣ उसे मदुरै कर्नाटक (मधुर कर्नाटक)कोंगार-कोमान (कोंगू जनता का अधिपति) भी कहा जाता है।

    मारवर्मन राजसिंह-I (730-765 ई.)

    ➣ कोच्चडय्यन के बाद माड़वर्मन राजसिंह-I पांड्य शासक बना। उसे पल्लव-भंजन भी कहा जाता है क्योंकि उसने पल्लवमल्ल को पराजित किया था।

    ➣ उसने कोंगुओंभालाकोंगम को भी पराजित किया। मालव सेनापति ने उसके समक्ष आत्मसमर्पण किया।

    ➣ इसके बाद उसने गंग शासक श्रीपुरूष एवं चालुक्य नरेश कीर्तिवर्मन-II की संयुक्त सेना को वेनभई के युद्ध में पराजित किया। परिणामतः गंग सामंत को अपनी पुत्री का विवाह पांड्य राजकुमार जटिल परांतक के साथ करना पड़ा।

    ➣ मारवर्मन राजसिंह-I ने अनेक गोसाहार, हिरण्यभार एवं तुलाभार यज्ञ किए। उसने कुदाल, वंजी और कोली का भी पुनरुद्धार किया।

    वरगुण-1 (765-815 ई.)

    ➣ मारवर्मन राजसिंह-I के बाद उसका पुत्र जटिल परांतक नेंडुनजड़ैयन उपाधि धारण कर वरगुण-I रूप में पांड्य शासक बना। वह पांड्य वंश का महान एवं सफलतम शासक सिद्ध हुआ।

    वेलविक्कुडि अभिलेख के अनुसार, उसने पेण्णागडम् (तंजौर के निकट स्थित) के युद्ध पल्लव शासक मंदिवर्मन-I एवं उसके सहयोगी नाट्टक्कुरुम्बु शासक आयवेल की संयुक्त सेना को पराजित किया।

    ➣ उसने करवंडपुरम (तिनेवली का कलक्काड) के एक दुर्ग का निर्माण कराया।

    वेलविक्कुडि अभिलेख के अनुसार, उसने पेण्णागडम् (तंजौर के निकट स्थित) के युद्ध में पल्लव शासक मंदिवर्मन-I एवं उसके सहयोगी नाट्टक्कुरूम्बु के शासक आयवेल की संयुक्त सेना को पराजित किया।

    ➣ उसने करवंडपुरम (तिनेवली का कलक्काड) के एक दुर्ग का निर्माण तथा कांजीवयप्पेसर नामक स्थान पर एक विशाल विष्णु मंदिर का निर्माण कराया एवं परम वैष्णव की उपाधि धारण की।

    ➣ उसने अपने शक्तिशाली शत्रुओं को पराजित करने के उपलक्ष्य में परांतक की उपाधि धारण की थी।

    ➣ विद्यानुरागी व विद्वानों का महान संरक्षक होने के कारण उसने पॉडतवत्सल की उपाधि धारण की थी।

    ➣ संभवत: वह महान साम्राज्य निर्माता व अपने समय का तमिल देश का सर्वाधिक प्रभावशाली व पराक्रमी शासक था।

    श्रीमार श्रीवल्लभ (815-862 ई.)

    ➣ वरगुण-I के परणोपरांत उसका पुत्र श्रीमार श्रीवल्लभ पांड्य शासक बना। उसने एकवीर, पराचक्रकोलाहन एवं अवनीयशेखर की उपाधि धारण की।

    पल्लव नरेश नंदिवर्मन तृतीय ने उसे तेलारू में हरा दिया। तथापि कुछ ही समय बाद श्रीमार श्रीबल्लभ ने कुभंमोजय के युद्ध में पराजित किया। किंतु पल्लव नरेश नृपतुंग ने उसे पुनः अरिचित के युद्ध में हरा दिया।

    ➣ इसके बाद श्रीलंका की सेना ने उसके राज्य पर हमला करके उसकी राजधानी मदुरा पर अधिकार कर लिया।

    वरगुण-II (862-880 ई.)

    श्रीमार श्रीवल्लभ के मरणोपरांत उसका ज्येष्ठ पुत्र वरगुणवर्मन-II पांड्य राज्य की राजगद्दी पर बैठा।

    ➣ उसने 18 वर्षों तक शासन किया। इसके बाद वह परांतक वीरनारायण द्वारा राज्यसत्ता से अपदस्थ कर दिया।

    परांतक वीरनारायण (880-900 ई.)

    ➣ वरगुण-II को राज्य-सत्ता से अपदस्थ करने के बाद परांतक वीरनारायण ने 880ई. में पांड्य शासन को अपने अधीन कर लिया। दलवयपुरम के कुछ ताम्रपत्र उसी के शासनकाल में प्रदान किये गये।

    ➣ परांतक वीरनारायण ने कोंगु प्रदेशकावेरी नदी के दक्षिणी भू-भाग को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया।

    मारवर्मन राजसिंह-II (900-920 ई.)

    ➣ परांतक वीरनारायण के बाद उसका पुत्र मारवर्मन राजसिंह-II पांड्य शासक बना।

    ➣ उसके शासनकाल के चोल सम्राट परांतक-I (907-953 ई.) ने पांड्य शक्ति को कुचलने के लिए मदुरा पर आक्रमण कर दिया।

    मारवर्मन राजसिंह-II की चोलों के हाथों लगातार पराजयों के कारण पांड्य वंश की पर्याप्त क्षीण हो गई और उसकी मृत्यु के बाद पांड्य राज्य पर चोलों का वर्चस्व स्थापित हो गया।

    वीर पांड्य (920-949 ई.)

    ➣ राजसिंह द्वितीय का पुत्र तथा उत्तराधिकारी वीर पांड्य बना। वह कुछ शक्तिशाली राजा था।

    ➣ सन 949 ई. में उसने चोल शासक गंडरादित्य को तक्कोलम के युद्ध में पराजित किया तथा अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी। किंतु उसकी सफलता स्थायी नहीं रही। गंडरादित्य के तीसरे उत्तराधिकारी सुंदरचोल ने उसे परास्त किया।

    ➣ कालांतर में श्रीलंका के शासक महिन्द चतुर्थ ने पांड्यो की सहायता की। किंतु चेबूर के युद्ध में चोल सेना ने वीर पांड्य को बुरी तरह पराजित किया। सभवत वह युद्ध-भूमि से मार डाला गया।

    ➣ इसके साथ ही पांड्य वंश की स्वाधीनता का लगभग अंत हुआ तथा उन्हें चोलों की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी।

    12वीं सदी ई. के अंत में चोलों के पतन काल में जटावर्मन कुलशेखर (1190-1216 ई.) ने पांड्य राज्य की पुनर्स्थापना की थी।

    द्वितीय पाण्डय साम्राज्य

    जटावर्मन सुन्दर पाण्ड्रय-I (1251-1268 ई.)

    ➣ उसने अपने वंश की स्वाधीनता प्राप्त कर ली। वह पाण्ड्य वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली राजा था।

    ➣ उसने चेर, होयसल राजाओं को जीता तथा चोल शक्ति का पूर्ण विनाश किया। उसने उत्तरी सिंहल की भी विजय की, कांची पर अधिकार कर लिया। कालांतर में काकतीय नरेश गणपति को भी हरा दिया।

    ➣ उसने विजित प्रदेशों से उसे अतुल सम्पत्ति प्राप्त हुई जिसका उपयोग उसने श्रीरंगन तथा चिदम्बरम के मंन्दिरो को भव्य एवं सुन्दर बनाने में किया।\

    मारवर्मन कुलशेखर पाण्ड्य-I (1268-1309 ई.)

    ➣ जटावर्मन के बाद मारवर्मन कुलशेखर राजा बना। उसने होयसल रामनाथ तथा राजेन्द्र चोल तृतीय दोनों को 1279 ई. में पराजित किया।

    कुलशेखर चोल प्रदेश तथा रामनाथ द्वारा शासित होयसल के तमिल जिलों का एकछत्र शासक बना। केरल में उसने एक विद्रोह का दमन किया।

    ➣ उसने अपने मंत्री आर्यचक्रवर्ती के नेतृत्व में एक सेना सिंहल पर आक्रमण करने के लिए भेजी। वहां का शासक भुवनायकवाहु परास्त हुआ तथा 20 वर्षों तक सिंहल पाण्ड्य राज्य का एक प्रान्त बना रहा।

    ➣ अपने राज्य काल के अन्त तक कुलशेखर ने अपने राज्य को अक्षुण्ण बनाये रखा। उसका शासन काल आर्थिक दृष्टि से समृद्धि का काल रहा।

    ➣ उसके समय 1293 ई. में वेनिस का प्रसिद्ध यात्री मार्कोपोलो पाण्ड्य देश की यात्रा पर आया था।

    ➣ वह कुलशेखर के सुशासन एवं उसके राज्य की समृद्धि की काफी प्रशंसा करता है। यहां का व्यापार वाणिज्य अत्यधिक विकसित था तथा राज्य की ओर से विदेशी व्यापारियों तथा यात्रियों को काफी सुविधायें प्रदान की जाती थी।

    ➣ इस राज्य का कैल (कायल) नामक नगर ऐश्वर्य एवं वैभव से परिपूर्ण था। यहां के शासक के पास परिपूर्ण कोष तथा विशाल सेना थी।

    वीर पाड्य-IV (1309-1345 ई.)

    ➣ कुलशेखर की मृत्यु के बाद उसके दो पुत्रों (जटावर्मा सुन्दरपाण्ड्य तृतीय, वीरपाण्ड्य) के बीच गद्दी के लिए संघर्ष हुआ। इसमें वीर पाण्ड्य विजयी हुआ।

    ➣ उसने राजगद्दी पर अधिकार कर लिया। किन्तु जटावर्मा इस पराभव को सहन न कर सका तथा उसने अपने भाई को दण्ड देने के लिये अलाउद्दीन खिलजी से सहायता मांगी।

    ➣ उसने 1310 ई. में अपने सेना पति मलिक काफूर को पाण्ड्य राज्य पर आक्रमण करने को भेजा। आक्रमणकारियों ने मदुरा को लूटा तथा ध्वस्त कर दिया।

    मलिक काफूर अपने साथ भारी सम्पत्ति लेकर दिल्ली लौट गया। इसके बाद पाण्ड्य राज्य की स्थिति निर्बल पड़ गयी।

    14वीं शदी के प्रारम्भ में केरल के राजा रविवर्मन ने वीरपाण्ड्य तथा सुन्दरपाण्ड्य दोनों को पराजित किया।

    ➣ तुगलक शासन में भी पाड्य राज्य पर तुर्की ने आक्रमण किये। कुछ समय के लिए इसे दिल्ली सल्तनत का अंग बना लिया गया। इस प्रकार क्रमश: पाण्ड्य राज्य का पतन हो गया।

  • कांची के पल्लव (575-897 ई.)

    📚 विषय सूची

    पल्लव राजवंश का उदय : तीसरी शताब्दी ई.

    ➣ भारत के सुदूर दक्षिण में पल्लव राजवंश का उदय उस समय हुआ, जब सातवाहन साम्राज्य का पूर्णत: विघटन हो गया। आरंभ में पल्लव सातवाहनों के अधीनस्थ शासक थे।

    ➣ परंतु वाकाटक, आभीर, कदम्ब वंशों की भांति पल्लवों ने भी अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली तथा 6वीं सदी ई. तक दक्षिण भारतीय राजनीति में अपना विशेष स्थान बना लिया।

    ➣ पल्लवों का अधिकार दक्षिणी आन्ध्र और उत्तरी तमिलनाडु दोनों पर था। उन्होंने अपनी राजधानी कांची (आधुनिक कांचीपुरम) स्थानान्तरित की।

    ➣ पल्लव अभिलेखों में पल्लवों को ब्राह्मण, भारद्वाजगोत्रीय तथा अश्वात्थामा का वंशज कहा गया है। तालगुंडा अभिलेख से उनके क्षत्रिय होने की जानकारी मिलती है।

    ➣ अधिकांश पल्लव राजा वैष्णव थे। आचार्य अय्यर ने पल्लव राज्य में शैव मत का प्रचार-प्रसार किया था। जिनके प्रभाव से महेन्द्र वर्मन प्रथम ने शैव धर्म अपना लिया।

    ➣ यद्यपि पल्लवों के राजनीतिक तथा सांस्कृतिक उत्कर्ष का केन्द्र कांची थी, किन्तु उनका मूल निवास तोण्डमण्डलम् था।

    ➣ पल्लव राजाओं का शासन काल नयनार (शैव) तथा अलवार (वैष्णव) जैसे भक्ति आंदालनों के लिए प्रसिद्ध रहा।

    ➣ पल्लव शासक महेन्द्र वर्मन प्रथम के शासनकाल में पल्लवों और चालुक्यों के बीच लंबा संघर्ष शुरू होने का उल्लेख मिलता है।

    कांची के पल्लव शासक

    सिंहविष्णु (575 – 600 ई.) : पल्लव शक्ति का पुनरुत्थान

    ➣ पल्लवों का प्रथम प्रमुख राजा सिंहविष्णु था। उसने अवनि सिंह की उपाधि धारण की थी। यह सिंहवर्मन का पुत्र व उत्तराधिकारी था।

    ➣ वह एक वीर व पराक्रमी राजा था। कशाक्कुडि लेख से पता चलता है कि उसने चेर, चोल, पांड्य, मलय, मालवा, कलभ्रसिंहल (श्रीलंका) के राजा को युद्ध में पराजित कर अपनी शक्ति का विस्तार किया।

    ➣ उसकी सत्ता तमिल प्रदेश में पूरी तरह स्थापित हो गयी। उसने अपने राज्य की सीमा कावेरी नदी तक विस्तृत कर ली।

    ➣ उसने माम्मलपुरम का आदिवराह गुहा मंदिर का निर्माण कराया। इस मंदिर में सिंहविष्णुउसकी दो रानियों की प्रतिमा स्थापित की गयी है।

    महेन्द्रवर्मन प्रथम (600 – 630 ई.) : शैलकृत वास्तुकला का प्रारंभ

    ➣ सिंहविष्णु का उत्तराधिकारी महेन्द्रवर्मन प्रथम बहुमुखी प्रतिभा का धनी था। उसने विवित्रचित्त, मत्त-विलास, गुणभर, चैत्याकारी, शत्रुमल्ल, ललितांकुर, अवनिभाजन, संकीर्ण-जाति आदि उपाधि धारण की।

    ➣ इसका समकालीन चालुक्य (बादामी) सम्राट पुलकेशिन द्वितीय था। पुलकेशिन द्वितीय ने महेन्द्रवर्मन प्रथम पर आक्रमण कर पल्लवोंचालुक्यों के बीच लंबे समय तक चलने वाले राजनीतिक संघर्ष को शुरू किया।

    ➣ पुलकेशी द्वितीय अनेक युद्धों में विजयी हुआ, जिनमें पुलकेशी द्वितीय विजयी हुआ। कसक्कुडी ताम्रपत्रों से ज्ञात होता है कि, किसी युद्ध में महेन्द्र वर्मन प्रथम ने भी पुलकेशी को परास्त किया था।

    एहोल अभिलेख के उल्लेख के से पता चलता है कि, पुलकेशी द्वितीय ने पल्लवों से वेंगी को छीन लिया था। जिसमे से चालुक्य की नई शाखा (वेंगी के चालुक्य ) का उदय हुआ।

    ➣ उसने ब्रह्मा, विष्णु और शिव के बहुत से मन्दिर अपने राज्य में बनवाये, और चैत्यकारी की उपाधि धारण किया।

    ➣ उसने मत्तविलास प्रहसन तथा भगवदज्जुकीयम जैसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की। जिसमे मत्तविलास प्रहसन एक हास्य ग्रंथ है। इसमें कपालियों तथा भिक्षुओं पर व्यंग्य कसा गया है।

    ➣ महेन्द्र वर्मन प्रथम ने सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ रुद्राचार्य के निर्देशन में संगीत का अध्ययन किया था।

    ➣ उसके संरक्षण में ही संगीतशास्त्र पर आधारित ग्रंथ कुडमिमालय की रचना हुई, जो वीणाशास्त्र पर आधारित है।

    ➣ उसने शैव सन्त अप्पर या नय्यर के प्रभाव से जैन धर्म का परित्याग कर शैवमत ग्रहण कर लिया था।

    ➣ महेन्द्र वर्मन प्रथम ने सर्वप्रथम दक्षिण भारत में आडम्बरयुक्त मंदिरों के स्थान पर आकर्षक शैल मण्डप वास्तु शैली (महेन्द्रवर्मन शैली) प्रोत्साहित की।

    ➣ कहा जाता है कि, इसने पारलिपुरम के जैन मंदिर को तुड़वाकर उनके अवशेषों से तिवाड़ि (दक्षिण अर्काट) में एक जैन मंदिर बनवाया था।

    नरसिंहवर्मन प्रथम (630 – 668 ई.) : वातापी विजय एवं मामल्लपुरम् का विकास

    ➣ महेन्द्रवर्मन प्रथम के बाद उसका पुत्र नरसिंहवर्मन प्रथम कांची की राजगद्दी पर बैठा। नरसिंहवर्मन प्रथम पल्लव वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था। उसने अपने पिता की पराजय के अपमान का बदला लिया।

    ➣ उसने पल्लवों की सैन्य शक्ति को पुनः संगठित कर उत्तर दिशा में विजय यात्रा आरंभ की और चालुक्य सम्राट पुलकेशिन द्वितीय को तीन युद्धों (परियाल, शूरमार, मणिमंगलम) में परास्त किया। उसे हराने के पश्चात उसने दक्षिणापथेश्वर (दक्षिण का स्वामी) की उपाधि धारण की थी।

    ➣ इस विजय का उल्लेख बादामी में मल्लिकार्जुन मंदिर के पीछे एक पाषाण पर उत्कीर्ण है, जिसे उसके सेनापति शिरुतोण्ड ने उत्कीर्ण करवाया था।

    ➣ नरसिंह वर्मन प्रथम से हुए युद्ध में पुलकेशी द्वितीय ने वीरगति प्राप्त की थी। उसने पुलकेशी द्वितीय की पीठ पर विजय शब्द अंकित करवाया था।

    उल्लेखनीय है पुलकेशी द्वितीय ने उत्तर-भारत सम्राट हर्षवर्धन (606-647 ई.) को उसके दक्षिण अभियान में रोका था।

    ➣ वातापी जीतने के उपलक्ष्य में बातापीकोण्ड (वातापी का विजेता) एवं महामल्ल/माम्मल की उपाधि अपने नाम के साथ जोड़ ली।

    ➣ उसके काशाक्कुटि ताम्रपत्र अभिलेख एवं महावंश के उल्लेख से उसकी लंका विजय प्रमाणित होती है। इसी कारण इस लेख में नरसिंह वर्मा प्रथम की तुलना लंका विजय राम से की गई।

    ➣ महावंश के 47वें अध्याय के अनुसार लंका का राजकुमार मारवर्मन भारतीय राजा नरसिंह वर्मन के दरबार में रहता था।

    ➣ कांची के निकट एक बन्दरगाह वाला नगर महामल्लपुरम (महाबलीपुरम) बसाने का श्रेय नरसिंह वर्मन प्रथम को दिया गया है। इस नगर में उसने अनेक विशाल मंदिरों का निर्माण कराया, जिनमें से धर्मराज मंदिर अब तक विद्यमान है।

    ➣ नरसिंहवर्मन प्रथम ने शिव की उपासना में कई मन्दिर बनवाये थे। परमेश्वर वर्णन प्रथम शिव का अनन्य उपासक था, जिसकी उपाधि परममाहेश्वर की थी।

    ➣ इसके समय में सिंह शीर्षक स्तम्भ की नई शैली (द्रविड़ शैली ) का विकास हुआ, जिसे इसके नाम पर मामल्य शैली का नाम दिया गया।

    ➣ महाबलीपुरम के सप्तरथ इसी के शासनकाल में बनाए गए थे। इनका नामकरण पाण्डव, द्रौपदी तथा गणेश के नाम पर किया गया था। कांची का विश्वविद्यालय शिक्षा का महान् केन्द्र था। कदम्ब वंशीय राजकुमार मयूर शर्मन शिक्षा ग्रहण करने कांची आया था।

    ➣ कदम्ब वंश के शासक मयूरशर्मन ने पल्लवों की राजधानी काँची में शिक्षा प्राप्त की तथा वहाँ अपमानित होने पर बनवासी में कदम्ब राजवंश की स्थापना की थी।

    ➣ उसके शासन काल में 641 ई. में चीनी यात्री ह्वेनसांग कांची गया था। उसके अनुसार कांची में 100 संघाराम थे, जिनमें 1000 भिक्षु निवास करते थे। उल्लेखनीय है ह्वेनसांग 629 ई. में भारत आया था।

    महेन्द्र वर्मन द्वितीय नरसिंह वर्मन प्रथम का पुत्र एवं उत्तराधिकारी था। पल्लव राजा महेन्द्रवर्मन द्वितीय, वातापी के चालुक्य नरेश विक्रमादित्य प्रथम के द्वारा मारा गया था।

    महेन्द्रवर्मन द्वितीय (668 – 670 ई.) : चालुक्यों से संघर्ष

    ➣ नरसिंहवर्मन प्रथम के पश्चात् महेन्द्रवर्मन द्वितीय शासक बना। वह दो वर्ष तक ही शासन कर सका। पल्लव-चालुक्य संघर्ष में उसे पुलकेशिन द्वितीय के पुत्र विक्रमादित्य प्रथम के हाथों हत्या कर दी गयी।

    ➣ कुछ लेखों में इसे मध्यम लोकपाल कहा गया है।

    परमेश्वरवर्मन प्रथम (670 – 700 ई.) : चालुक्य आक्रमणों का प्रतिरोध

    महेन्द्रवर्मन द्वितीय की हत्या के बाद उसका पुत्र परमेश्वरवर्मन प्रथम पल्लव राज्य का शासक बना।

    ➣ परमेश्वरवर्मन प्रथम का समकालीन चालुक्य सम्राट विक्रमादित्य प्रथम था, उसका संघर्ष सबसे पहले चालुक्य नरेश विक्रमादित्य प्रथम से हुआ, जो पुलकेशी द्वितीय के समान ही वीर और विजेता था।

    पेरुडनंल्लुर के युद्ध में चालुक्य (वातापी ) राज विक्रमादित्य से अपनी पहली पराजय का बदला लिया।

    ➣ परमेश्वर वर्मन प्रथम ने विद्याविनीत उग्रदण्ड, लोकादित्य, चित्रमान, गुणाभाजन, श्रीभर एकमल्ल, रणंजय जैसे उपाधि धारण की थी। वह विद्या प्रेमी के कारण विद्याविनीत की उपाधि धारण किया।

    ➣ इसके समय में मामल्लपुर का प्रसिद्ध गणेश मंदिर निर्मित हुआ तथा कूरम के शिव मंदिर का निर्माण हुआ।

    कूरम के शिव मंदिर का नामकरण इसी के नाम पर विद्या विनीत पल्लव परमेश्वरगहम किया गया।

    ➣ यह परम शैव था। यह बात इसकी परमाहेश्वर की उपाधि से प्रमाणित होती है।

    नरसिंहवर्मन द्वितीय ‘राजसिंह’ (700 – 728 ई.) : कैलाशनाथ मंदिर का निर्माण

    ➣ परमेश्वरवर्मन प्रथम के प्रताप और पराक्रम से पल्लवों की शक्ति इतनी बढ़ गयी थी कि जब उसके मरणोपरांत नरसिंहवर्मन द्वितीय कांची की राजगद्दी पर बैठा। उसे किसी बड़े युद्ध में जुझने की आवश्यकता नहीं पड़ी।

    ➣ नरसिंहवर्मन द्वितीय का शासनकाल शांति व व्यवस्था का काल था और इसीलिए वह अपनी शक्ति को निश्चिततापूर्वक मंदिरों के निर्माण में लगा सका।

    ➣ नरसिंहवर्मन द्वितीय ने कांची का कैलाशनाथ मंदिर (राजसिद्धेवश्र मंदिर/राजसिंहेश्वर मंदिर)ऐरावतेश्वर के विशाल मंदिर तथा मामल्लपुरम् के अनेक प्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण करवाया।

    ➣ उसने राजसिंह, आगमप्रिय एवं शंकर भक्त की उपाधियाँ धारण की थीं। उसे राज-सिद्धेश्वर भी कहा जाता था।

    ➣ इसके अतिरिक्त प्रशस्तियों में इसे अन्यन्तकाम, रणंजय, श्रीभर, उग्रदण्ड, अपराजित, शिवचुड़मणि, यित्रकार्मुक, रणविक्रम, आमित्रमल, आहवकेशरी, परमचक्रमर्दन, पाथविक्रय, समरधनन्जय आदि उपाधियों से भी विभूषित किया गया है।

    ➣ मंदिर निर्माण की शैली में नरसिंह वर्मन द्वितीय ने एक नई शैली राजसिंह शैली का प्रयोग किया था।

    ➣ एक महान विजेता के साथ वह एक संगीत प्रेमी भी था। इसकी वाद्यविद्याधर, वीणानारद, अंतोदय-तुम्बुरु उपाधियाँ उसकी संगीत के प्रति रुझान की परिचायक हैं।

    ➣ उसकी राजसभा में प्रसिद्ध लेखक दण्डिन रहते थे जिन्होंने दशकुमारचरित, अवन्तिसुन्दरी कथा तथा काव्यादर्श की रचना की।

    ➣ दण्डि को वाल्मीकि तथा व्यास की कोटि का तीसरा कवि माना जाता है। दशकुमारचरित में पाटलिपुत्र के राजा राजहंस तथा उसके मंत्रियों के दस पुत्रों के जीवन की साहसिक घटनाओं का विवरण है।

    ➣ उसने अपना एक दूतमण्डल चीन भेजा व चीनी बौद्ध यात्रियों के लिये नागपट्टनम में एक विहार निर्मित करवाया।

    ➣ नरसिंह वर्मन द्वितीय ने कांची में घटिका (संस्कृत महाविद्यालय) की स्थापना की। उसे घटिकाओं का पुनर्स्थापक कहा जाता है।

    ➣ नरसिंहवर्मन द्वितीय ने कांची में घटिका (संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना की थी। लगभग 720 ई. में एक दूत मंडल चीन भेजा।

    परमेश्वरवर्मन द्वितीय (728 – 731 ई.) : पल्लव शक्ति का कमजोर होना

    ➣ यह नरसिंह वर्मन द्वितीय का छोटा पुत्र और उसका उत्तराधिकारी था।

    कशाक्कुडि-अभिलेख में इसे बृहस्पति नीति का आदर्श, संरक्षक एवं कुशल प्रशासक कहा गया है।

    ➣ चालुक्यों के उलचल- अभिलेख से ज्ञात होता है कि, चालुक्य राजा विक्रमादित्य द्वितीय ने गंग शासक दुर्विनीत ऐरयप्प की सहायता से पल्लव नरेश परमेश्वर वर्मन द्वितीय पर आक्रमण कर उसे परास्त कर मार डाला था।

    ➣ परमेश्वरवर्मन द्वितीय की हत्या के बाद राजसत्ता के लिए गृहकलह छिड़ गया। गृहकलह का अंत करने के लिए प्रजा के प्रतिनिधियों ने नंदिवर्धन पल्लवमल को 12 वर्ष की अल्पायु में शासक बनाया गया।

    नंदिवर्मन द्वितीय (731 – 800 ई.) : पल्लव सत्ता का पुनर्गठन

    ➣ नंदिवर्मन द्वितीय पल्लवों की दूसरी शाखा (सिंहविष्णु के भाई भीमवर्मन का वंशज) से संबद्ध था। यह हिरण्यवर्मन का पुत्र एंव परमेश्वरवर्मन द्वितीय का उत्तराधिकारी हुआ। इसने पल्लव राजाओं में सबसे अधिक समय तक शासन किया था।

    कशाक्कुण्डि लेख में इसके लिए पल्लवमल्ल, क्षत्रिय मल्ल, राजाधिराज, परमेश्वर एवं महाराज आदि उपाधियों का प्रयोग किया गया है।

    ➣ इसके शासन काल में पल्लवों का चालुक्यों, पाण्ड्यों तथा राष्ट्रकूटों से संघर्ष हुआ। उसने पल्लवों की सैन्य शक्ति को पुनः संगठित किया और कांची को चालुक्यों की अधीनता से मुक्त कराया।

    ➣ यह चालुक्य (वातापी ) का अंतिम नरेश कीर्तिवर्मा द्वितीय के समकालीन था। यह समय चालुक्य की वातापी शाखा के अंत एंव राष्ट्रकूट के उदय का था।

    गोविन्द तृतीय के अभिलेख से प्रमाणित होता है कि, राष्ट्रकूट सत्ता का संस्थापक दतिदुर्ग ने 750 ई. आक्रमण कर कांची पर विजय प्राप्त थी।

    ➣ शांति समझौते के फलस्वरूप अपनी पुत्री रेवा का विवाह नंदिवर्मन द्वितीय के साथ करने के बाद वापस चला गया।

    ➣ कालांतर में नंदिवर्मन द्वितीय का उत्तराधिकारी पुत्र दंतिवर्मन का जन्म इसी राष्ट्रकूट राजकुमारी रेखा से हुआ। इस वैवाहिक संबंध के बावजूद आगे पल्लव-राष्ट्रकूट संघर्ष जारी रहा।

    ➣ नन्दि वर्मन द्वितीय वैष्णव धर्म का अनुयायी था। उसके समय में समकालीन वैष्णव सन्त तिरुमंगै अलवार ने वैष्णव धर्म का प्रचार-प्रसार किया।

    ➣ उसने कला और साहित्य को पर्याप्त प्रोत्साहन दिया। उसने कांची को मुक्तेश्वर मन्दिर तथा बैकुण्ठ पेरुमल मन्दिर का निर्माण करवाया था।

    दन्तिवर्मन (800 – 846 ई.) : राष्ट्रकूट संघर्ष एवं पल्लव पतन की शुरुआत

    ➣ यह नन्दिवर्मन का पुत्र था जो उसकी पत्नी राजमहिषी रेवा (राष्ट्रकूट नरेश दन्तिदुर्ग की कन्या) से उत्पन्न हुआ था। दन्तिवर्मन को उसका महासामन्ताधिपति कहा गया है।

    ➣ दन्तिवर्मन को पाण्ड्यों के आक्रमण का भी सामना करना पड़ा। पाण्ड्य भैरश वरगुण प्रथम तथा उसके पुत्र श्रीमार ने दन्तिवर्मन पर आक्रमण किया तथा कावेरी क्षेत्र पर अपना अधिकार कर लिया।

    तमिल अभिलेख में दन्तिवर्मन को पल्लवकुलभूषण तथा भारद्वाजगोत्रीय कहा गया है।

    ➣ दन्तिवर्मन भी वैष्णव धर्म का अनुयायी था। वैलूरपाल्यम अभिलेख में उसे विष्णु का अवतार कहा गया है।

    ➣ गोविन्द तृतीय ने मनने अभिलेख में दंति वर्मन को समधिगतपंचमहाशब्द एवं महासामन्ताधिपति की उपाधि दी हैं।

    नन्दिवर्मन तृतीय (846 – 869 ई.) : पल्लव सत्ता को पुनः सुदृढ़ करने का प्रयास

    ➣ दन्तिवर्मन की मृत्यु के बाद उसका पुत्र नन्दिवर्मन तृतीय शासक बना। वह एक पराक्रमी शासक था उसे कावेरी द्वारा सिंचित प्रदेश का स्वामी कहा गया है।

    ➣ उसने अपने पराक्रम से चोलों, पाण्ड्यों एवं चेरों को पराजित कर पुनः एक बार पल्लव साम्राज्य को शक्ति प्रदान की।

    ➣ इस प्रकार नन्दिवर्मन ने अपने वंश की पुरानी प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त कर लिया तथा उसने कावेरी क्षेत्र पर पुनः अपना अधिकार सुदृढ़ कर लिया।

    गंग शासको ने भी उसकी अधीनता स्वीकार की। राष्ट्रकूटों के साथ उसका मैत्री संबंध स्थापित हुआ तथा राष्ट्रकूट नरेश अमोघवर्षम ने अपनी कन्या शंखा का विवाह उससे कर दिया।

    ➣ नंदि वर्मन तृतीय की उपाधि अवनिनारायण थी, नंदिप्कलम्बकम् में इसे चारों समुद्रों का स्वामी कहा गया है।

    ➣ इसके संरक्षण में तमिल कवि पेरुन्देवनार ने भारत वेणवा नामक काव्य की रचना की थी।

    ➣ नन्दिवर्मन तृतीय शैव मतानुयायी था। तेल्लारेरिन्द की उपाधि नन्दिवर्मन तृतीय ने धारण की। वैलूर पाल्यम् अभिलेख में नंदि वर्मन तृतीय को विष्णु का अवतार कहा गया है।

    नृपतुंग (869 – 880 ई.) : पांड्य संघर्ष एवं राजनीतिक अस्थिरता

    ➣ नन्दिवर्मन तृतीय का पुत्र का पुत्र नृपतुंग राजा बना। उसने अरचित नदी के तट पर पाण्ड्यों को पराजित किया था। वाण राजवंश ने भी उसकी अधीनता स्वीकार कर ली।

    ➣ उसके शासन काल के अंतिम दिनों में सौतेले भाई अपराजित ने विद्रोह कर दिया। इस विद्रोह में पाण्ड्यों ने नृपत्तुंग का जबकि चोलों व पश्चिमी गंग ने अपराजित का साथ दिया।

    ➣ दोनों के बीच श्रीपुरम्बियम मैदान में घमासान संघर्ष हुआ, इस संघर्ष में नृपतुंग वर्मन पराजित हुआ।

    बाहूर दानपत्र के अनुसार उसके राज्यकाल के 8वें वर्ष उसके मंत्री ने एक विद्यास्थान को तीन ग्राम दान में दिये थे।

    ➣ वह उदार तथा विद्या प्रेमी शासक था। उसके समय वेद वदाङ्ग, मीमांसा, न्याय, पुराण तथा धर्मशास्त्रों के अध्ययन की समुचित व्यवस्था थी।

    अपराजित (880 – 903 ई.) : चोलों द्वारा पल्लव सत्ता का अंत

    कांची के पल्लववंश का यह अंतिम महत्वपूर्ण शासक था। उसने नृपत्तुंग वर्मन को राजसिंहासन से हटाकर पल्लव वंश का राज्याधिकार प्राप्त किया था।

    ➣ उसके समकालीन चोल शासक आदित्य प्रथम ने तोंडमंडलम् पर अधिकार कर लिया।

    885 ई. के लगभग उसने गंग नरेश पृथ्वीपति तथा चोलनरेश आदित्य प्रथम की सहायता प्राप्त कर पाण्डयवंशी शासक वरगुण द्वितीय को श्रीपुरम्बियम के युद्ध में पराजित किया।

    ➣ किन्तु 903 ई. के लगभग उसके मित्र चोल नरेश आदित्य प्रथम ने उसकी हत्या कर दी तथा तोण्डमण्डलम का स्वामी बन बैठा। फलत: दक्षिण भारत में एक नवीन शक्ति के रूप में चोलों का उदय हुआ।

    ➣ अपराजित के बाद तीन राजाओं (नंदिवर्मा प्रथमV-904-926 ई.), कम्प वर्मा 948-926 ई.) का नाम ज्ञात है। ये अपने राज्य को चोल राजाओं से बचाने में असफल रहे।

    ➣ कालांतर में चोल राजाओं द्वारा पल्लव राज्य को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया। इस प्रकार दक्षिण भारत में चोलों की स्थिति मजबूत हो गई।

    राजधर्म

    ➣ पल्लव शासक ब्राह्मण धर्म के अनुयायी थे। पल्लव काल में नयनार (शैव) तथा अलवार (वैष्णव) सन्तों ने भक्ति आन्दोलन प्रारम्भ किया।

    ➣ दक्षिण में वैष्णव आन्दोलन का प्रारम्भ सर्वप्रथम पल्लवों के राज्य से ही हुआ तथा उसके बाद दक्षिण के अन्य भागों में पहुँचा।

    कला तथा स्थापत्य

    ➣ पल्लव नरेशों का शासन काल कला एवं स्थापत्य की उन्नति के लिए प्रसिद्ध है। वस्तुतः उनकी वस्तु एवं तक्षण कला दक्षिण भारतीय कला के इतिहास में सर्वाधिक गौरवशाली अध्याय है।

    ➣ पल्लव वास्तुकला ही दक्षिण की द्रविड़ कला शैली का आधार बनी। इसे प्रारम्भ करने का श्रेय महेन्द्रवर्मन प्रथम को है।

    ➣ दक्षिण भारत की मंदिर स्थापत्य के तीन प्रमुख अंग थे।
    1. मण्डप
    2. रथ
    3. विशाल मन्दिर

    ➣ पल्लव वास्तुकला को पर्सी ब्राउन ने चार भागों में बांटा हैं।
    1. महेंद्रवर्मन शैली
    2. मामल्ल शैली
    3. राजसिंह शैली
    4. अपराजित शैली

    पल्लवकालीन पदाधिकारी

    राष्ट्रिक जिले का प्रधान अधिकारी
    देशाधिकृत स्थानीय संरक्षक
    ग्रामभोजक गांव का मुखिया
    अमात्य, आरक्षाधिकृत, गौल्मिक सैनिक चौकियों के प्रधान
    तैर्थिक तीर्थों अथवा घाटों का सर्वेक्षक
    संवरन्तक गुप्तचर

    ➣ पल्लव वास्तुकला दक्षिण की द्रविड़ शैली का आधार बनी। चट्टान काटकर बनाये गये मंदिर पल्लव काल में विकसित हुए।

    ➣ पल्लव वास्तुकला के चार प्रमुख स्थलों में से तीन हैं- महाबलीपुरम, पुडुकोटई, तंजौर तथा कांचीपुरम हैं।

    पल्लव कला एवं वास्तुकला

    विमान चोल द्रविड़ शैली की मुख्य विशेषता
    गोपुरम पाण्ड्य द्रविड़ शैली की मुख्य विशेषता
    मण्डपम पल्लव द्रविड़ कला शैली की मुख्य विशेषता

    ➣ द्रविड़ शैली पल्लवों के नेतृत्व में द्रविड, शैली का विकास चार चरणों में हुआ।

    महेंद्रवर्मन शैली (मण्डप शैली)

    महेंद्रवर्मन शैली (610-640 ई.) के तहत कठोर पाषाण को काटकर गुहा-मंदिरों का निर्माण हुआ, जिन्हें मंडप कहा जाता है।

    ➣ इस शैली के प्रारम्भिक मंडप सादे तथा अलंकार रहित हैं, किंतु बाद के मंडपों को अलंकृत करने की प्रवृत्ति दिखायी देती है।

    पंच पांडव मंडप में छह अलंकृत स्तम्भ लगाये गये हैं। महेंद्र शैली के मंडपों में उल्लेखनीय हैं- पल्लवरम् का पंच पांडव मंडप, महेंद्रवाड़ी का महेंद्रविष्णु गृह मंडप, त्रिचनापल्ली का ललितांकुर पल्लेश्वर गृह मंडप, मंडगपटु का त्रिमूर्ति मंडप, मामंडूर का विष्णु मंडप।

    मामल्ल शैली (नरसिंह शैली)

    मामल्ल शैली (640-674 ई.) का विकास नरसिंह वर्मन प्रथम के काल में हुआ।

    ➣ इसके तहत दो प्रकार के स्मारक बने- मण्डल तथा एकाश्मक मंदिर, जिन्हें रथ कहा गया।

    ➣ इस शैली में निर्मित सभी स्मारक मामल्लपुरम (महाबलीपुरम) में ही स्थित हैं।

    मामल्ल शैली के रथ अपनी मूर्तिकला के लिए भी प्रसिद्ध हैं।

    ➣ मामल्ल शैली के अन्तर्गत दो प्रकार के स्मारक बने-
    1. मण्डप
    2. रथ या एकाश्मक मन्दिर

    ➣ मामल्ल शैली के एकाश्मक मन्दिर में द्रोपदी रथ सबसे छोटा है तथा धर्मराज रथ सबसे बड़ा है। इस रथ पर नरसिंह वर्मन की मूर्ति अंकित है।

    ➣ महाबलीपुरम के ये रथ मन्दिर ग्रेनाइट पत्थरों के हैं। इन रथ मन्दिरों को सप्तपगोड़ा भी कहा जाता है। ये आठ रथ मन्दिर निम्न लिखित हैं:- द्रोपदी रथ, भीम रथ, पिडारी रथ, नकुल-सहदेव रथ, धर्मराज रथ, वलैयंकट्टैथ रथ, अर्जुन रथ, गणेश रथ

    ➣ ये रथ मन्दिर संभवतः शिव मन्दिर थे। शिव की दक्षिणामूर्ति स्वरूप में उन्हें शिक्षक के रूप में प्रदर्शित किया गया है।

    ➣ रथ मंदिर में धर्मराज रथ सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं। इसे द्रविड़ मंदिर शैली का अग्रदूत भी कहा जा सकता है। इसी मंदिर पर नरसिंह वर्मन की मूर्ति अंकित है।

    ➣ रथ मंदिर में द्रौपदी रथ सबसे छोटा है। इसमें किसी प्रकार का अलंकरण नहीं मिलता है।

    ➣ नकुल सहदेव रथ पर विशाल गजमूर्ति उत्कीर्ण है। अर्जुन रथ में वृषभ पर विराजमान शिव एवं नंदी की मूर्ति उत्कीर्ण हैं |

    ➣ पिडारी रथ का नाम पिडारी देवी पर तथा वलैयंकट्टैथ रथ का नाम इस नाम के ही एक पोखर (तालाब) पर पड़ा है।

    महाबलीपुरम/मामल्लपुरम में स्वतंत्र रूप से खड़े शिलाखण्डों पर भागीरथ की तपस्या, अर्जुन की तपस्या, गंगावतरण का दृश्य, महिषासुर वध करती दुर्गा की मूर्तियां उत्कीर्ण है।

    राजसिंह शैली (680 से 800 ई.)

    राजसिंह शैली (674-800 ई.) का प्रारम्भ पल्लव नरेश नरसिंह वर्मन द्वितीय राजसिंह ने किया।

    ➣ इस शैली के तहत गुहा-मंदिरों के स्थान पर पाषाण, ईंट आदि की सहायता से इमारती मंदिरों का निर्माण करवाया गया।

    ➣ इस शैली के मंदिरों में से तीन महाबलीपुरम से प्राप्त होते हैं- शोर मंदिर (तटीय शिव मंदिर), ईश्वर मंदिर और मुकुंद मंदिर। शोर मंदिर इस शैली का प्रथम उदाहरण है।

    ➣ इनके अतिरिक्त उल्लेखनीय मंदिर हैं- पनमलाई (उत्तरी अकोट) मंदिर, कांची के कैलाशनाथ (शिव मंदिर) और बैकुंठपेरूमाल मंदिर (वैष्णव मंदिर)।

    ➣ कांची के कैलाशनाथ मंदिर का निर्माण नरसिंह वर्मन द्वितीय के काल से शुरू हुआ एवं परमेश्वर वर्मन द्वितीय के समय इसकी रचना पूर्ण हुई।

    कैलाशनाथ मन्दिर का विमान तटीय मन्दिर की तुलना में अधिक विकसित है।

    ➣ कांची का बैकुण्ठ पेरूमल मन्दिर का निर्माण परमेश्वरवर्मन द्वितीय ने प्रारम्भ कराया एवं नन्दिवर्मन द्वितीय ने पूर्ण करवाया।

    ईश्वर मंदिर तथा मुकुन्दपुर मंदिर एंव अर्काट का पनमलाई मंदिर भी राजसिंह शैली में ही है।

    नन्दि वर्मन या अपराजित शैली (800 से 900 ई.)

    अपराजित शैली के अंतर्गत अपेक्षाकृत छोटे मंदिरों का निर्माण हुआ।

    ➣ इसके उदाहरण हैं- कांची के मुक्तेश्वर एवं मातंगेश्वर मंदिर, ओरगडम् का बड़मल्लिश्वर मंदिर, तिरूतैन का वीरट्टानेश्वर मंदिर और गुडिडमल्लम् का परशुरामेश्वर मंदिर।

    ➣ कांची के मंदिर इस शैली के प्राचीनतम नमूने हैं। इनमें प्रवेश द्वार पर स्तम्भयुक्त मंडप बने हैं। इसके बाद के मंदिर चोल शैली से प्रभावित एवं उसके निकट हैं।

    विभिन्न शैलियों में निर्मित मंदिर

    रथ मंदिर मामल्लपुरम
    कैलाशनाथ मंदिर कांचीपुरम, तमिलनाडु
    बैकुंठ पेरुमल मंदिर कांचीपुरम, तमिलनाडु
    बृहदेश्वर मंदिर तंजावूर, तमिलनाडु
    गंगैकोण्डचोलपुरम मंदिर अरियलूर, तमिलनाडु
    तिरुमलाई मंदिर तमिलनाडु
    नटराज मंदिर चिदंबरम, तमिलनाडु
    लिंगराज मंदिर भुवनेश्वर, ओडिशा
    जगन्नाथ मंदिर भुवनेश्वर, ओडिशा सूर्य मंदिर, पुरी, ओडिशा
    खजुराहो मंदिर छत्तरपुर, मध्य प्रदेश
    महादेव मंदिर छत्तरपुर, मध्य प्रदेश
    दिलवाड़ा जैन मंदिर माउंट आबू, राजस्थान
    कैलाश मंदिर एलोरा, महाराष्ट्र
    दशावतार मंदिर देवगढ़, मध्य प्रदेश
    एलिफेंटा गुहा मंदिर महाराष्ट्र
    दुर्गा मंदिर ऐहोल, महाराष्ट्र

    प्रसिद्ध लेखक और उनकी पुस्तकें

    वादिराज पार्श्वनाथ चरित और यशोधरचरित्र
    विल्हण विक्रमांकदेवचरित
    विज्ञानेश्वर मिताक्षरा
    शिष्य नारायण व्यवहारशिरोमणि
    सोमेश्वर तृतीय मानसोल्लास अथवा अभिलषितार्थीचिंतामणि
    विद्यामाधव पार्वतीरुक्तिमणीय
    जगदेकमल्ल द्वितीय सगीतचूड़ामणि
    शांतिनाथ सुकुमारचरित्र
    नागवर्माचार्य चंद्रचूडामणिशतक
    चामुंडराय चामुंडारायपुराण
    नागवर्मा प्रथम छंदोंबुधि, कर्णाटककादंबरी
    नागवर्मा द्वितीय काव्यालोकन, कर्णाटकभाषाभूषण, वास्तुकोश
    कर्णपार्य मेलीमाधव, नेमिनाथपुराण
    चंद्रराज मदनतिलक
    श्रीधराचार्य चंद्रप्रभचरिते, जातकतिलक (कन्नड में ज्योतिष का प्रथम ग्रंथ)
    नागचंद्र मल्लिनाथपुराण, रामचंद्रचरितपुराण
    वादि कुमुदचंद्र रामायण
    नयसेन धर्मामृत
    जगद्दल सोमनाथ कर्णाटक कल्याणकारक
    सारंगधर संगीतरत्नाकर
    भास्कराचार्य सिद्धांतशिरोमणि
  • मैसूर का गंग वंश (400-1004 ई.) : दुर्विनीत

    कदम्बों तथा पल्लवों के राज्यों के बीच आधुनिक मैसूर के दक्षिण में गङ्गों का राज्य स्थित था।

    ➣ इस स्थान को गङ्गवंश के साथ लम्बे समय तक सम्बद्ध रहने के कारण गङ्गवाडि कहा गया। गङ्गवंश का प्रारम्भिक इतिहास अन्धकारपूर्ण है।

    ➣ अभिलेखों में इस वंश का प्रथम शासक कोंकणिवर्मा बताया गया है। उसे जाहवेय कुल (गंग का वंश) तथा काण्वायन गोत्र का कहा गया है।

    ➣ उसने कई युद्धों में ख्याति प्राप्त की तथा अपने लिये एक समृद्धिशाली राज्य का निर्माण कर लिया। वह धर्ममहाराजाधिराज की उपाधि धारक करता था जो उसकी स्वतंत्र स्थिति का सूचक है।

    कोंकणिवर्मा का समय 400 ई. के आस पास माना जा सकता है। गङ्गों की प्रारम्भिक राजधानी कुवलाल (कोलर) थी जो बाद में तलकाड हो गयी।

    ➣ कोंकणिवर्मा का पुत्र तथा उत्तराधिकारी महाराजाधिराज माधव प्रथम (425 ई.) हुआ। वह एक विद्वान राजा था जिसे दत्तकसूत्र पर टीका लिखने का श्रेय दिया गया है। वह सभी शास्त्रो का ज्ञाता था।

    ➣ इसके बाद अय्यवर्मा (450 ई.) शासक बना। वह योद्धा होने के साथ-साथ शास्त्र, इतिहास एवं पुराणों का भी ज्ञाता था।

    ➣ उसके तथा उसके छोटे भाई कृष्णवर्मा के बीच राजसिंहासन के लिये युद्ध हुआ। अय्यवर्मा को पल्लव नरेश से सहायता मिली।

    ➣ इस संघर्ष के फलस्वरूप गङ्ग राज्य दोनो भाइयों के बीच आधा आधा बांट दिया गया। दोनो ने अपने अपने पुत्र का नाम सिंहवर्मा रखा। उनके काल में भी गंग राज्य का विभाजन कायम रहा।

    ➣ अय्यवर्मा के पुत्र सिंहवर्मा को पल्लव नरेश स्कन्दवर्मा ने राजा बनाया था। उसका विवाह कदम्ब नरेश कृष्णवर्मा प्रथम की वहन से हुआ।

    परवर्ती लेखों के अनुसार इस विवाह से अविनीत नामक पुत्र हुआ। वह बचपन में ही राज्य का उत्तराधिकारी बना दिया गया।

    गंग नरेश दुर्विनीत (540-600 ई.) ने अपने वंश को पल्लवों की अधीनता से मुक्त किया उसने पुत्राड़ (दक्षिणी मैसूर) तथा कोंगूदेश की विजय किया। उसका चालुक्यों के साथ मैत्री सम्बन्ध था। वह संस्कृत का महान विद्वान था।

    ➣ इसके बाद श्रीपुरुष (728-788 ई,) इस वंश का एक महत्वपूर्ण शासक हुआ। इसके समय में कोगूप्रदेश के ऊपर पाण्ड्यों का अधिकार हो गया तथा वह पाण्ड्यो की अधीनता में शासन करने लगा। उसने अपनी राजधानी मान्यपुर में स्थानान्तरित कर दिया।

    ➣ श्रीपुरूष का शासन समृद्धि का काल था। नोलम्बवाडि (चित्तलदुर्ग जिला) के लोग उसकी अधीनता मानते थे।

    ➣ श्रीपुरूष के बाद गंग राज्य की अवनति प्रारम्भ हुयी। उसके उत्तराधिकारी शिवमार द्वितीय को राष्ट्रकूट शसक ध्रुव तथा गोविन्द तृतीय ने पराजित किया और बन्दी बनाया।

    ➣ अमोघवर्ष के काल मे नीतिमार्ग (837-870 ई.) के नेतृत्व में गंगों ने पुनः अपनी स्वतन्त्रता घोषित कर दिया।

    कृष्ण तृतीय (839-967 ई.) ने पुनः गंग राज्य की विजय की तथा वहां अपने साले भुतुग द्वितीय को शासक बना दिया। इसके बाद गंगवंशी शासक पाण्ड्यों तथा चोलों में लड़ते रहे।

    चोल शासक राजराज प्रथम ने 1004 ई. में गंगो को जीता तथा उन्होने चोलो की अधीनता में रहना स्वीकार कर लिया। इस प्रकार क्रमश: गंग राज्य की समाप्ति हो गयी।

  • बनबासी का कदम्ब वंश (345-570 ई.)

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    ➣ चतुर्थ शताब्दी ईस्वी के मध्य से मयूर शर्मा नामक व्यक्ति के नेतृत्व में कदम्बों का दक्षिणापथ के दक्षिण-पश्चिम में उत्कर्ष हुआ।

    ➣ इस समय समुद्रगुप्त के दक्षिणापथ अभियान के परिणामस्वरूप कांची के पल्लवों की शक्ति अत्यन्त क्षीण हो चुकी थी।

    ➣ कदम्ब लोग मानव्यगोत्रीय ब्राह्मण थे जो अपने को हारीति पुत्र कहते थे। उनका मुख्य कार्य वेदों का अध्ययन तथा वैदिक यज्ञों का अनुष्ठान करना था। पहले वे पल्लवों की अधीनता स्वीकार करते थे।

    मयूरशर्मन (345-360 ई.)

    ➣ इस वंश के मयूर शर्मन ने पल्लवो के विरूद्ध विद्रोह किया तथा अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दिया। वह कदम्ब वंश का संस्थापक था।

    ➣ मयूरशर्मन ने पल्लवों के सीमान्त अधिकारियों को परास् श्रीपर्वत के आस पास के घने वनो पर अधिकार कर लिया।

    ➣ कालान्तर में पल्लव राजाओ ने उससे मैत्री सम्बन्ध स्थापित किया तथा उसे स्वतंत्र शासक स्वीकार कर लिया तथा पश्चिमी समुद्र एवं प्रेहरा (संभवत: तुंगभद्रा व मलप्रभ नदी) के बीच के भूभाग पर उसका प्रभुत्व मान लिया।

    ➣ बाद की कथाओ में मयूरशर्मन को 18 अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान करने वाला कहा गया है।

    बनवासी (वैजयन्ती) उसकी मुख्य राजधानी तथा पालासिका उप-राजधानी थी। मयूरशर्मन ने लगभग 345-360 ई. तक शासन किया।

    ➣ कदम्बवंशी शासकों की वंशावली एकमात्र तालगुण्ड स्तम्भलेख से ज्ञात होती है।

    ➣ मयूरशर्मन के पश्चात् काकुत्सबर्मन इस कुल का सर्वाधिक शक्तिशाली राजा हुआ। उन्होने 425 ई. तक शासन किया।

    ➣ उसके पूर्व तीन राजाओं के नाम ज्ञात होते है- कंगवर्मन् भगीरथ तथा लघु।

    कंगवर्मन् के विषय में यह बताया गया है कि उसने वासीम शाखा के वाकाटक नरेश विंध्यसेन के कुन्तल राज्य पर आक्रमण का सफलतापूर्वक प्रतिरोध किया था।

    भगीरथ (385-410 ई.)

    ➣ संभवतः भगीरथ के काल में ही गुप्तशासक चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य ने कालिदास के नेतृत्व में अपना एक दूत मण्डल कुन्तल नरेश के दरबार में भेजा था।

    काकुत्सवर्मन (425-450 ई.)

    ➣ भगीरथ के बडे पुत्र रघु को अनेक शत्रुओ का विजेता कहा गया है। उसके शासन के अन्त में उसका छोटा भाई काकुत्सवर्मन 425 ई. मे राजा बना।

    ➣ उसका शासन काल अत्यन्त समृद्धिशाली था तथा उसने अपनी कन्याओ का विवाह वाकाटक तथा गुप्त राजवंशो में किया था।

    तालगुण्ड प्रशस्ति में काकुत्सवर्मन् की शक्ति की बड़ी प्रशंसा की गयी है। उसने तालगुण्ड में एक विशाल तालाब खुदवाया था। काकुत्सवर्मन ने 450 ई. तक शासन किया।

    शान्तिवर्मन (450-475 ई.)

    ➣ काकुत्सवर्मन का उत्तराधिकारी उसका पुत्र शान्तिवर्मन हुआ। उसे अत्यन्त यशस्वी शासक बताया गया है जो तीन ताज (पट्टत्रय) धारण करता था।

    ➣ उसके पुत्र मृर्गेश के एक लेख से पता चलता है कि उसने अपने शत्रुओं की लक्ष्मी को उनके महलों से बलपूर्वक खींच निकाला था।

    ➣ शान्तिवर्मन के काल में कदम्ब राज्य को पल्लवों से खतरा बना हुआ था। अतः उसने अपने राज्य के दक्षिणी भाग को अपने छोटे भाई कृष्णवर्मन् की अधीनता में कर दिया। यह स्पष्टतः राज्य का विभाजन था।

    ➣ कृष्णवर्मन् ने अश्वमेध यज्ञ किया था। कालांतर में वह पल्लवों के साथ युद्ध में मार डाला गया। उसका पुत्र विष्णुवर्मा पल्लवों द्वारा अभिषिक्त किया गया।

    मृगेशवर्मन् (470-488 ई.)

    ➣ शान्तिवर्मन के बाद उसका पुत्र मृगेशवर्मन् शासक बना। उसका बनवासी तथा पलाशिका दोनो पर अधिकार था। गङ्ग तथा पल्लव शासकों के विरूद्ध उसे सफलता प्राप्त हुयी।

    ➣ वह अपनी विदूता तथा बुद्धिमत्ता के लिये प्रसिद्ध था। वह एक कुशल सैनिक भी था जिसे घोड़े तथा हाथियों की सवारी का शैक था।

    ➣ उसने अपने पिता की स्मृति में पलाशिका में एक जैन मन्दिर का निर्माण करवाया था तथा उसे उदारतापूर्वक दान दिया था।

    रविवर्मा (500-538 ई.)

    ➣ मृगेश के बाद रविवर्मा एक महत्वपूर्ण शासक हुआ। हल्सी लेख से पता चलता है कि उसने विष्णुवर्धन तथा अन्य राजाओं को युद्ध में मार डाला एवं पलाशिका से पल्लवों को निकाल कर वहां अपना अधिकार जमा लिया।

    ➣ उसकी विजयों के फलस्वरूप समस्त प्राचीन कदम्ब राज्य पर उसका अधिकार पुनः स्थापित हो गया।

    हरिवर्मा (538-550 ई.)

    ➣ रविवर्मा का उत्तराधिकारी हरिवर्मा बना। वह शान्त प्रकृति का शासक था। उसके राज्यकाल मे 545 ई. के लगभग चालुक्य नरेश पुलकेशिन प्रथम ने कदम्ब राज्य के उत्तरी भाग को जीत लिया तथा बादामी में अपनी राजधानी बनाई।

    ➣ कदम्बों में पारिवारिक विवाद के कारण एकता नही थी। उनकी छोटी शाखा (जिसकी स्थापना दक्षिण में कृष्णवर्मा प्रथम ने की थी) के कृष्णवर्मा द्वितीय (550-556 ई०) ने वैजयन्ती पर आक्रमण कर वहां अपना अधिकार कर लिया और इस प्रकार बड़ी शाखा के अन्तिम शासक हरिवर्मा का अन्त हुआ।

    कृष्णवर्मा द्वितीय अथवा उसके पुत्र अजवर्मा के समय मे पुलकेशिन प्रथम के पुत्र कीर्त्तिवर्मा ने वनवासी को अन्तिम रूप से जीतकर अपने राज्य में मिला लिया।

    ➣ इस प्रकार कदम्ब राज्य की स्वाधीनता का अन्त हुआ।

  • चोल साम्राज्य की प्रशासनिक एवं स्थानीय स्वशासन व्यवस्था

    ➣ चोल शासन का स्वरूप राजतन्त्रात्मक था। केन्द्रीय प्रशासन में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति राजा था। राजा के मौखिक आदेश तिरूवायकेल्वि कहलाते थे।

    ➣ केंद्रीय प्रशासन का सर्वोच्च अधिकारी राजा होता था।

    ➣ सम्राट का न्यायालय धर्मासन, धर्मासन का निर्णय धर्मासन भट्ट तथा न्यायाधीशों को धर्मभट्ट कहा जाता था।

    ➣ राजा की शक्ति और प्रतिष्ठा का पता इस बात से चलता है कि चोल राजाओं और रानियों की मूर्तियां मंदिरों में स्थापित कर उनकी पूजा की जाती है।

    ➣ राज्यपद वंशानुगत था तथा युवराज ज्येष्ठता के आधार पर राज्य का उत्तराधिकारी बनता था। चोल वंश के शासक अपने शासनकाल में ही उत्तराधिकारी घोषित कर देते थे।

    ➣ समाज में सरकारी अधिकारियों का एक अलग वर्ग था, जो दो श्रेणियों में विभक्त था। इनमें ऊपरी श्रेणी पेरुन्दनम तथा निम्नस्थ श्रेणी शिरूदनम कहलाती थी। सरकारी पद वंशानुगत होते थे।

    ➣ राजा के व्यक्तिगत अंगरक्षकों को वेडैक्कार कहा जाता था। राजाओं के स्नानघर एवं भोजनालय का प्रबंध स्त्रियां देखती थी।

    ➣ राज्य के उच्च अधिकारियों को उडैनकूट्टम कहा जाता था।

    ➣ उडैनकूट्टम का अर्थ है सदा प्रस्तुत समूह। ये राजा के निजी सहायक होते थे तथा राजा के आदेशों को लिपिबद्ध करते थे। अधिकारियों को वेतन के रूप में भूमि प्रदान की जाती थी।

    ➣ कुछ प्रमुख अधिकारी निम्न थे :-

    1. औलेनायकम प्रधान सचिव के रूप में कच्चे आदेशों की जाँच।
    2. तिरून्दनम एक प्रधान कर्मचारी
    3. विडैयाधिकारिन कार्य प्रेषक
    4. नडुविरूक्कै राजा व प्रजा के मध्य का अधिकारी
    5. आणत्ति राजा के आदेशों को प्रेषित करने वाला अधिकारी
    6. मुगवेट्टि एवं पट्टोल राजस्व विभाग के छोटे कर्मचारी
    7. करूमिगल अधिकारी
    8. ककाणी लेखा विभाग की जांच के लिए नियुक्त अधिकारी।

    ➣ चोल अभिलेखों में मन्त्रिमंडल का उल्लेख नहीं मिलता। शासन में राजां के सहयोगी उच्च पदाधिकारी होते थे।

    श्रीमुख राजा द्वारा स्थानीय संस्थाओं को दिए गये आदेश।
    पुरवुवीर एक प्रकार भूमिकर
    वारिप्पपोत्रगम लगान
    पणिमक्कल नौकर को कहा जाता था।
    आदिगरिगल सैनिक व असैनिक व्यक्ति।
    प्रभुमान्यम’ राजा के स्वामित्व की भूमि
    मडप्पुर मठों को प्रदत्त भूमि
    ब्रह्मदेय ब्राह्मणों को दी गई भूमि
    देवदान, देवाप्रहार व देवभोग मंदिरों को दी गई भूमि
    एक भोग्य ब्राह्मण को निजी उपयोग हेतु दी गई भूमि
    शालाभोग शैक्षणिक प्रयोजन के लिए दी गई भूमि।
    अग्रहार या गणयोग्य ब्राह्मणों की सामूहिक भूमि।

    ➣ सभा कोटि के गाँवों में ब्रह्मदेय और अग्रहार गाँव आते थे। अग्रहार गाँवों की भूमि पर तो दानग्राही ब्राह्मणों का व्यक्तिगत स्वामित्व होता था, पर उनके कामकाज सामूहिक होते थे।

    प्रशासनिक व्यवस्था

    ➣ चोल साम्राज्य प्रान्तों में विभाजित था। प्रान्तों को मण्डलम कहा जाता था। इनकी संख्या छः थी।

    ➣ चोल साम्राज्य के चरम के समय प्रान्तों की संख्या आठ हो गई, श्रीलंका के मिलने पर यह नौ भी हो जाती थी।

    ➣ प्रशासन की सुविधा के लिए विशाल चोल साम्राज्य प्रांतों में विभक्त था। प्रांतों को मंडलम् कहा जाता था, जिन पर राजपरिवार के लोग नियुक्त होते थे।

    ➣ साम्राज्य → मंडलम (प्रांत) → कोट्टम या वलनाडु (कमिश्नरी) →नाडु (जिला) → कुर्रम (गाँव)

    मण्डल प्रशासन से लेकर ग्राम प्रशासन तक शासकीय कार्यों की सहायता करने हेतु स्थानीय सभाएँ होती थीं। नाडु की स्थानीय सभा को नट्टार तथा व्यापारिक संघ की सभा को नगरट्टार (नगरम् ) कहते थे।

    स्थानीय स्वशासन

    ➣ चोलों की सबसे महत्वपूर्ण देन स्थानीय स्वशासन है। परान्तक प्रथम के उत्तरमेरूर अभिलेखों से चोलों की स्थानीय स्वशासन व्यवस्था पर प्रकाश पड़ता है।

    ➣ स्वायत्त शासन प्रणाली के कारण ही चोल वंश को प्राचीन भारत में महत्त्वपूर्ण राजवंश माना जाता है।

    ➣ स्थानीय प्रशासन में बड़े नगरों में अलग कुर्रम (ग्राम संघ) गठित किये जाते थे जिन्हें तनियूर/तकुर्रम कहा जाता था।

    उर एक सामान्य प्रकार की (सर्वसाधारण लोगों की) ग्राम सभा थी, जिसमें ग्राम, पुर या नगर दोनों सम्मिलित थे। उर का शाब्दिक अर्थ पुर है। इसकी कार्यकारिणी समिति को आलुंगणम् कहा जाता था।

    सभा या महासभा गाँवों के वरिष्ठ ब्राह्मणों जिन्हें अग्रहार कहा जाता था, की सभा थी अर्थात् यह मूल रूप से अग्रहारों अथवा ब्राह्मण बस्तियों की संस्था थी।

    ग्राम तथा नगरों की सभाएं नियमित शासन की मूलभूत इकाइयाँ थीं। नाडु की प्रशासनिक सभाएँ प्रतिनिधियों द्वारा निर्मित होती थीं।

    ➣ चोल सम्राटों ने स्थानीय प्रशासन व्यवस्था समिति प्रणाली को लागू किया, जिसे वारियम कहा जाता था।

    ➣ चोल अभिलेखों में मोटे तौर पर तीन प्रकार की ग्राम सभाओं का उल्लेख प्राप्त होता है, वे हैं-उर, सभा या महासभा और नगरम्।

    ➣ इस काल के स्थानीय स्वशासन में उर तथा सभा या महासभा बालिक सदस्यों द्वारा निर्मित होती थी।

    ➣ स्थानीय प्रशासन समितियों द्वारा संचालित होता था। इन समितियों को वारियम कहते थे। सामान्यतः वारियम के सदस्यों की कार्य अवधि तीन वर्ष की होती थी।

    ➣ कुछ प्रमुख समितियाँ इस प्रकार थीं-

    • तोट्टवारियम् – उद्यान समिति
    • एरिवारियम् – सिंचाई/तालाव समिति
    • पोन्वारियम् – मुद्रा नियमन से संबंधित समिति
    • सम्वत्सर वारियम् – वार्षिक समिति

    ➣ वारियम (समिति) की सदस्यता के लिए निम्न शर्तों को पूरा करना पड़ता था।

    • 35 से 70 वर्ष के बीच आयु।
    • डेढ़ एकड़ अर्थात् 1/4 वेलि भूमि का मालिक होना।
    • अपनी भूमि में बने मकान में रहना।
    • वैदिक मंत्रों का ज्ञाता होना।

    ➣ चोरी के अपराध में दण्डित व्यक्ति सदस्य नहीं बन सकता था।

    ➣ महासभा को पेरुंगुर्रि, इसके सदस्यों को पेरुमक्कल तथा समिति के सदस्यों को वारियप्पेरूमक्कल कहा जाता था। सभा की बैठक गाँव के मन्दिर, वृक्ष के नीचे या जलाशय के किनारे होती थी।

    ➣ कभी-कभी सदस्यों के चुनाव के नियम सम्राट द्वारा निर्धारित किये जाते थे, किन्तु अधिकतर ग्राम सभा द्वारा ही इसके निर्धारण का प्रचलन था।

    ➣ सार्वजनिक भूमि पर महासभा का स्वामित्व होता था। गाँव के हित के लिए महासभा कर भी लगाती थी।

    ➣ समिति के सदस्यों को चुनने के लिए प्रत्येक गाँव को तीस वार्डों में बाँटा गया था। प्रत्येक वार्ड से एक-एक व्यक्ति का चुनाव लॉटरी द्वारा किया जाता था।

    नगरम्– व्यापारी समुदाय की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण प्रशासकीय सभा थी। चोल अभिलेख में नगरम् का उल्लेख प्रायः व्यापारिक केन्द्रों के प्रबन्ध कार्य हेतु किया जाता था।

    ➣ नगरम् की प्रशासनिक व्यवस्था में मुख्यरूप से व्यापारियों को ही सम्मिलित किया जाता था।

    ग्राम सभा– यह भूमि कर का संग्रह करती थी तथा संग्रहीत राशि को राजकोष में जमा करती थी। इन्हीं सभाओं द्वारा ग्रामीण विवादों (मुकदमों) का फैसला भी किया जाता था।

    मन्दिरों का निर्माण, जीर्णोद्धार तथा उनकी आय-व्यय का उचित प्रबन्धन ग्राम सभाओं का ही उत्तरदायित्व था।

    ➣ भूमि सर्वेक्षण का कार्य केन्द्रीय सरकार द्वारा किया जाता था, किन्तु भूमि के वर्गीकरण या उसकी श्रेणी में किसी भी प्रकार के परिवर्तन के लिए ग्राम सभा की अनुमति आवश्यक थी।

    ➣ प्रत्येक ग्राम में मध्यस्थ नामक कुछ वेतन भोगी कर्मचारी होते थे, जो ग्राम सभा के कार्यों में सहायता प्रदान करते थे। ग्राम सभाएं नहरोंतालाबों का निर्माण भी करती थीं।

    नाडु नाडु की सभा को नाट्टार कहा जाता था।
    नाडु विनियोगम नाडु के खर्च के लिये कर।

    ➣ दक्षिण भारत में व्यापारियों एवं सौदागरों की बस्तियों को नगरम् कहा जाता था। नगरम् के शासन संचालन में व्यापारियों की प्रमुख भूमिका होती थी।

    राजस्व व्यवस्था

    ➣ भूमिकर राज्य की आय का प्रमुख साधन था। भूमिकर कृषि उत्पादन का एक तिहाई था।

    अकाल तथा आपदा की स्थिति में भूमि कर में छूट दी जाती थी, किंतु यह भी उल्लेख मिलता है कि भू-राजस्व न जमा करने पर किसानों की भूमि नीलाम कर दी जाती थी।

    ➣ चोल अभिलेखों में उपज के अनुसार भूमि को कुल 12 कोटियों में विभाजित किया गया है। व्यापार कर, विवाह कर तथा निकटवर्ती राज्यों में लूटमार भी आय का साधन थे।

    ➣ चोल अभिलेखों में करों के लिए प्रयुक्त शब्द इरै, वरि, मरूपाडु तथा दण्डम है।

    ➣ चोल लेखों में सर्वाधिक उल्लिखित कर वेट्टी (बेगार) एवं कडमै (भूराजस्व) है।

    ➣ राजस्व को आयम, सोने के सिक्के को काशु तथा अन्न के माप को कलम (तीन मण) कहा जाता था। भूमि माप भी कलम कहलाता था। मा एवं वेलि भूमिमाप की इकाई थी।

    ➣ करों की वसूली ग्रामसभाएं करती थी तथा नगरों में यह काम नगर समितियाँ करती थी।

    ➣ राजस्व विभाग का प्रमुख वरिपोत्तराक कहलाता था एवं राजस्व विभाग को वारिपोत कहा जाता था।

    ➣ प्रत्येक नगर एवं गाँव में कुछ भू-क्षेत्र कर मुक्त रहते थे, जैसे कि हस्तशिल्पकारों एवं कारीगरों के आवास स्थान, चाण्डालों की बस्तियाँ, मन्दिर, तड़ाग, नहरें, शमशान भूमि आदि।

    ➣ चोल अभिलेखों में उल्लिखित प्रमुख कर निम्न हैं:-

    1. तरिइरै हथकरघों पर कर
    2. मनैइरै गृहकर
    3. सैक्करै (पेविर) तेलघानीकर
    4. सेतैरै व्यापार कर
    5. तत्तारपात्तम (तट्टोलि) सुनारों पर कर
    6. ओलुक्कुनीर पात्तम पशु व पानी के साधनों, तालाब आदि पर कर
    7. उप्पायम नमक कर
    8. वलीआयम पथकर
    9. मरमज्जाड़ि वृक्षकर
    10. कडमै सुपारी के बागान पर कर, लगान या शुल्क
    11. किडाक्काशु नर पशुधन कर
    12. मगन्मै लुहार, कुम्हार, बढ़ई आदि पर लगने वाला कर/शिल्पकर
    13. वाशल्पिरमम् द्वारकर
    14. कढ़इरै व्यापारिक प्रतिष्ठान पर कर
    15. पाडिकावल कूलि ग्राम पर कर।

    ➣ यह स्थानीय प्रधानों को गाँववासियों द्वारा सुरक्षा के बदले दिया जाने वाला कर था।

    ➣ भूमि को तीन भागों में बाँटा गया था-ब्रहादेय, देवदान तथा शालभोग।

    ➣ कृषकों को सिंचाई की सुविधा उपलब्ध कराई जाती थी, जिसमें राज्य सरकार के अलावा मंदिरों तथा व्यक्तिगत प्रयासों की भी भूमिका होती थी।

    ➣ सिंचाई पर कर लगता था। कुछ लोगों को इस कर से छूट मिलती थी, जो सेवाविधि के रूप में जानी जाती थी।

    बढ़ई, सुनार, लुहार, धोबी आदि के व्यावसायिक समुदाय थे, जिन्हें कलने कहा जाता था।

    ➣ नगरों में व्यापारियों के विभिन्न संगठन थे, जिनके लिये बणज्ज शब्द का उल्लेख मिलता है। इन्हें वलजियम्, वलंजियर, बलजि आदि नामों से जाना जाता है। व्यापारिक क्षेत्र के लिये नगरम् का भी प्रयोग हुआ है।

    ➣ मानक सिक्का कलंजु या कल्याणजू कहलाता था।

    ➣ चोल काल में मंदिर आर्थिक गतिविधियों के केंद्र थे। ये मंदिर बैंकिंग का कार्य भी करते थे।

    ➣ दक्षिण भारत में घटिका प्रायः मंदिरों के साथ संबद्ध विद्यालय होते थे।

    सैन्य संगठन

    ➣ चोल सेना के तीन प्रमुख अंग थे-1. पैदल, 2. अश्वारोही, 3. गजारोही

    ➣ सेना को मुन्रूकई महासेनई अथवा रपडईविडु कहा जाता था।

    ➣ सेना के बैरक (छावनी) को कड़गम या पडेविडु तथा टुकड़ी को गुल्प कहा जाता था।

    ➣ थल सेना के प्रमुख अंग निम्नलिखित थे-

    • कुडिरैच्चेवगर (अश्वारोही)
    • विलीगल (धनुर्धर)
    • कुंजिरमल्लर अथवा अनैयाटकल (गजारोही)
    • बडपेर्रकौक्कोलर (पैदल सैनिक)

    ➣ थल सेना के मुख्य अंग थे- धनुर्धर (विल्लिगल), गजारोही (कुजिरमल्ल), घुड़सवार (कुडिरैच्चेवगर) तथा पैदल सेना (बड़पेई कैक्कोलर) आदि।

    ➣ चोलों की अश्वसेना (मनरुकैमहासनै) में अश्वों का अरब एवं खाड़ी देशों से आयात किया जाता था।

    ➣ सेना की टुकड़ियों के प्रमुख को नायक व प्रधान सेनापति को महादण्डनायक कहा जाता था।

    ➣ राजा के निजी अंगरक्षकों को वेडैक्कार (वेलैक्कार) अथवा कैकोलप्तेरुम्बर्ड कहा जाता था।

    ➣ सेना में अनेक सेनापति ब्राह्मण थे, जिन्हें ब्राह्माधिराज कहा जाता था। न्याय समितियों को न्यायातर कहा जाता है।

    ➣ चोल शासकों ने नौसेना को भी सुव्यवस्थित ढंग से संगठित किया। रथ सेना का अस्तित्व नहीं था।

    ➣ युद्ध में विशेष वीरता प्रदर्शित करने वाले सैनिकों को क्षत्रिय शिरोमणि की उपाधि दी जाती थी।

    ➣ चोल सेना में 70 रेजीमेंट थे। युद्ध में बन्दी बनाये गए स्त्री पुरुष जिन्हें दास बना दिया जाता था, वेलम कहे जाते थे।

    ➣ राज्य भूमि की उपज का 1/3 भाग भू-राजस्व के रूप में वसूलता था।

    ➣ प्रशासनिक सुविधा के लिए संपूर्ण साम्राज्य विभिन्न मंडलों में विभक्त था। मंडल, जिनकी संख्या 7-8 थी, क्रमश: नाडु, कुर्रम (कोट्टम) में बंटे हुए थे।

    गांव सबसे छोटी प्रशासनिक इकाई थीं।

    ➣ चोलों के शासनकाल में स्थानीय स्वशासन में उत्तर, सभा, महासभा, नाट्टुर तथा उर का विशेष महत्व था। उर सर्वसाधार की तथा सभा ब्राह्मणों का संगठन था।

    ➣ महासभा गांवों में होती थी। नाडुओं की समितियां नाट्टुर तथा व्यापारियों की समितियां नगरत्तार (नगरम्) कहलाती थी।

    सामाजिक संगठन

    ➣ चोल समाज में क्षत्रियवैश्य वर्ग अनुपस्थित थे। समाज दो भागों ब्राह्मणोंअब्राह्मणों में बंटा हुआ था। अब्राह्मणों में सबसे महत्त्वपूर्ण शूद्र थे।

    ➣ चोल काल में दक्षिण वर्गीय (वलंगई) तथा वामवर्गीय (इडंगई) औद्योगिक वर्गीय दो समूह थे। दक्षिण वर्गीय जातियाँ मुख्यतः कृषक एवं श्रमिक जातियाँ थी तथा वामवर्गीय जातियाँ हस्त शिल्पकारों या दस्तकारों की जातियाँ थीं।

    ➣ चोल काल में इडंगई की अपेक्षा वलंगई कहीं अधिक अधिकारयुक्त होते थे। वलंगई का प्रभाव दरबार तथा सेना में कहीं अधिक था। इडंगई लोग अपनी आजीविका व्यापार तथा दस्तकारी के द्वारा चलाते थे।

    ➣ समाज में कुछ वर्गों को अछूत (परैया) माना जाता था। बेल्लाल शूद्र कृषक थे,लेकिन ये बड़े भूस्वामी थे।

    ➣ चोलकाल में रथराज नामक नये वर्ग का उदय हुआ, जिनकी उत्पत्ति उच्च वर्ग के पुरुषों और निम्न वर्ग की महिलाओं के संयोग से हुई था।

    ➣ समाज में सजातीय विवाह के अतिरिक्त अनुलोम और प्रतिलोम विवाह भी होते थे।

    पर्दा प्रथा का प्रचलन नहीं था, परंतु सती प्रथाबहु-विवाह प्रचलित थे। देवदासी प्रथा भी विद्यमान थी।

    व्यापार

    ➣ व्यापार श्रेणियों द्वारा नियन्त्रित होता था जिनमें मणिग्रामम्, वलंजियर तथा नानादेशि प्रमुख थी। इनमें सबसे शक्तिशाली नानादेशि थी।

    ➣ दसवीं सदी में दक्षिण भारत में कई व्यापारिक संगठनों का उदय हुआ। अभिलेखों में इन संगठनों को समाया कहा गया है।

    ➣ दक्षिण भारत की दो प्रमुख श्रेणियाँ हैं- आयवोले और मणिग्रामम्। मणिग्रामम आन्तरिक व समुद्र तटीय व्यापार में संलग्न श्रेणी थी।

    अंजुवण्णम् तथा वीरवनंजुस विदेशी व्यापारियों की प्रसिद्ध श्रेणियाँ थी। ये श्रेणियाँ मन्दिरों आदि को दान देने व धार्मिक कार्यों के लिए सभा तथा उर में धन जमा कराती थी।

    ➣ चोल युगीन बन्दरगाह नागापट्टनम, महाबलीपुरम, कावेरीपत्तनम, शालियूर, कोरकई आदि थे। श्रीलंका व दक्षिण भारत के मध्य मुक्त व्यापार का केन्द्र केन्टन का बन्दरगाह था।

    कावेरी नदी चोल साम्राज्य की जीवन रेखा थी। कांचीपुरम प्रमुख कपास उत्पादक क्षेत्र था।

    कुडमुक्कु क्षेत्र पान-पत्ता एवं सुपारी की उन्नत फसल का उत्पादक क्षेत्र था।

    एरिभट्ट व्यक्तिगत दान था जो सिंचाई की व्यवस्थाओं हेतु दिया जाता था, जिससे तालाबों की मरम्मत तथा देखरेख होती थी।

    मार्कोपोलो एवं वसाफ कालीकट को भारतीय व्यापार का सबसे बड़ा गोदाम कहते है।

    ➣ चोल काल में आयातित वस्तुओं में घोड़े सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण थे।

    ➣ घुमक्कड़ व्यापारियों के समूह को अय्यावोल कहते थे।

    ➣ मालाबार क्षेत्र में उत्पादित काली मिर्चसफेद मिर्च का निर्यात क्वीलो बन्दरगाह से किया जाता था।

    ➣ चोलों द्वारा निर्यातित वस्तुओं में प्रमुख थी-मसाले (कालीमिर्च), औषधियां, कच्चा मालसूती वस्त्र

    सूती वस्त्र उद्योग अत्यधिक विकसित अवस्था में था। इसका केन्द्र कालीकट था।

    ➣ निर्यात योग्य नील का उत्पादन त्रावणकोर में होता था। मार्कोपोलो के अनुसार चोल राज्य में उत्तम किस्म का नील तथा हाथीदाँत उत्पन्न होता था।

    ➣ फारस की खाड़ी स्थित सिराफ संपूर्ण विश्व की सबसे बड़ी व्यापारिक मण्डी थी।

    ➣ चोल कालीन स्वर्ण सिक्का कलंजु कहलाता था। सोने एवं तांबे का सिक्का काशु (काषु) कहलाता था। सोने के सिक्के को कन्नड़ क्षेत्र में पोन या हून कहते थे। कलंजु एवं काशु में 1 : 2 का अनुपात था।

    ➣ चोल सिक्कों पर बाघ, मछली एवं धनुष का अंकन हुआ है। सबसे बड़ी मुद्रा निधि/सिक्कों का ढेर धवलेश्वरम से प्राप्त हुआ है। चोलों की मानक स्वर्ण मुद्राएं काशु एवं माडै थी।

    कलात्मक विकास

    ➣ चोलों ने द्रविड़-शैली के अनेक मंदिरों का निर्माण करवाया। चोल द्रविड़ शैली की प्रमुख विशेषता वर्गाकार या ऊँचे विमान थी। आरंभिक चोल मंदिर छोटे थे, परंतु बाद में भव्य मंदिर भी बने।

    ➣ चोल मंदिरों में विस्तृत प्रांगण, विशाल विमान तथा ऊंचे और अलंकृत गोपुरम् देखने को मिलते हैं।

    ➣ चोल मन्दिरों के विषय में फर्ग्युसन ने कहा है कि चोल कलाकारों ने दानवों की भांति इनका निर्माण किया तथा रत्नकारों (जौहरियों) के रूप में इनका विन्यास किया।

    ➣ आर.एस.शर्मा ने चोल मन्दिरों को राज्य के अन्दर राज्य कहा है।

    ➣ विजयालय द्वारा निर्मित नरतमलै के चोलेश्वर मन्दिर में मन्दिर की बाहरी दीवारों को सुन्दर भित्ति चित्रों से सजाया गया है।

    ➣ नरत्तमलै का विजयालय चोलेश्वर मंदिर तथा श्रीनिवासनल्लूर कोरण्डनाथ के मंदिर गर्भगृहयुक्त है।

    ➣ राजराज प्रथम ने राजराजेश्वर या वृहदेश्वर मंदिर का निर्माण तंजौर में करवाया। यह मंदिर एक चतुष्कोण प्रांगण में बना हुआ था। यह 58.5 मीटर ऊंचा था। यह मंदिर द्रविड़-शैली का विशिष्ट उदाहरण है।

    वृहदेश्वर मन्दिर का निर्माण 1003-1011 ई. के मध्य हुआ। पर्सी ब्राउन के अनुसार इसका विमान न केवल द्रविड़ शैली की सर्वोत्तम रचना है, अपितु इसे समस्त भारतीय स्थापत्य की कसौटी कहा जाता है।

    ➣ वृहदेश्वर मन्दिर के बहिर्भाग में एकाश्म नंदी की मूर्ति है जो भारत में नंदी की दूसरी सबसे बड़ी मूर्ति है। यह मन्दिर चोलयुगीन चित्रकला का भी अनुपम उदाहरण है।

    ➣ राजेंद्र चोल ने गंगैकोंडचोलपुरम् में भी एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया।

    ➣ चोलकालीन अन्य प्रमुख मंदिरों में ऐरावतेश्वर तथा त्रिभुवनेश्वर के मंदिरों का उल्लेख किया जा सकता है। इस युग की मूर्तिकला का सबसे बढ़िया नमूना कांसे की बनी नटराज की अनेक मूर्तियां प्रस्तुत करती हैं।

    ➣ पाण्ड्यकालीन कला के अंतर्गत विशाल व अलंकृत गोपुरम इसकी विशेषता थी। मंदिर के प्रवेश द्वार को गोपुरम कहा जाता था।

     प्रमुख मंदिर शासक स्थान
    1. चोलेश्वर मंदिर विजयालय नरत्तमलै
    2. कोरंगनाथ मंदिर परान्तक प्रथम (त्रिचनापल्ली) श्रीनिवासनल्लूर
    3. वृहदेश्वर मन्दिर राजराज प्रथम तंजौर
    4. ऐरावतेश्वर मन्दिर राजराज द्वितीय धारासुरम (तंजौर)
    5. त्रिभुवनेश्वर मन्दिर कुलोत्तुंग तृतीय त्रिभुवन (तंजौर)
    6. शिवमन्दिर तिरूवलीश्वरम (तिन्नेवेली)
    7. कम्हरेश्वर मंदिर कुलोत्तुंग तृतीय त्रिभुवन (कुंभकोणम)

    ➣ इस कला के प्रमुख मंदिर है:- 1. तिरूमलाई मन्दिर 2. चिदम्बरम मन्दिर 3. कुंबकोणम् मन्दिर।

    राजनीतिक सबध

    ➣ पल्लव-पांड्य संघर्ष का लाभ उठा कर चोलों ने अपना राजनीतिक प्रभाव बढ़ाना आरंभ कर दिया। चोल शक्ति के पुर्नरूत्थान का श्रेय विजयालय (850 से 871 ई.) तथा परांतक प्रथम (907 से 953 ई.) को दिया जाता है।

    राजराज प्रथम के सामुद्रिक अभियान केवल श्रीलंका तक ही सीमित नहीं थे।

    ➣ श्रीलंका पर अधिकार करने के अतिरिक्त उसने मालदीष द्वीप समूह के विरूद्ध भी सामुद्रिक अभियान किए।

    ➣ श्रीलंका पर विजय के अतिरिक्त राजेंद्र प्रथम ने कडारम (केद्दह) के श्रीविजय साम्राज्य के विरूद्ध भी सामुद्रिक अभियान किया।

    राजेंद्र चोल की बढ़ती हुई शक्ति का प्रभाव दक्षिण-पूर्व एशिया के अन्य देशों पर भी पड़ा।

    ➣ उसकी शक्ति से भयभीत होकर कम्बुज (कम्पूचिया) के शासक सूर्यवर्मन ने राजेंद्र चोल से मैत्री की याचना की तथा इसे संपुष्ट करने के लिए चोल सम्राट को बहुमूल्य उपहार भेजे।

    ➣ इस प्रकार राजेंद्र चोल के सामुद्रिक अभियानों से चोलों का प्रभाव दक्षिण-पूर्व एशिया तक पहुंच गया।

    ➣ समूहों का गठन उद्देश्य विशेष की पूर्ति के लिए किया जाता था। आर्थिक कार्यों (व्यापार) से संबद्ध समूहों में बलंजयार और मनिग्रामम् का उल्लेख चोल अभिलेखों में मिलता है।

    मूलपरूदियार नामक समूह मंदिरों का प्रबंध देखता था। प्रत्येक ग्राम और नगर को विभिन्न गलियों में विभक्त कर उनकी व्यवस्था के लिए विभिन्न समूहों का गठन किया जाता था।

    चोल कालीन शब्दावली

    वडैक्कार राजा के व्यक्तिगत अंगरक्षक
    उडनकूट्टम राजा के उच्च अधिकारी (मंत्री)
    नट्टार नाडु की स्थानीय सभा
    नगरद्वार (नगरम्) व्यापारिक संघ की सभा
    कलम अन्न के तौल की इकाई
    काशु सोने/तांबे के सिक्के
    वेलि भूमि माप की इकाई
    आयाम राजस्व
    रित्पोत्तराक राजस्व विभाग का प्रमुख
    न्यायत्तार न्याय समितियां
    पेरूमक्कल महासभा (पेरूंगुरिं) के सदस्य
    वारियप्पेरूमक्कल समिति के सदस्य
    वल्लाल बड़े भूस्वामी व कृषक
    प्रभुमान्यम् राजा के स्वामित्व वाली भूमि
    शालाभोग शैक्षणिक प्रयोजनों के लिए प्रदत्त भूमि

    चोलकालीन ऐतिहासिक स्थल

    तोण्डमंडल नवीन चोलवंश से संबंध भूमि संजौर: चोल-साम्राज्य की राजधानी, जहां राजराज प्रथम द्वारा निर्मित बृहदेश्वर मंदिर है।
    बेलूर यहां पाण्ड्योंश्रीलंका की संयुक्त सेना को परांतक प्रथम ने हराया था।
    तक्कीलम् यहां 949 ई. में हुए युद्ध में राष्ट्रकूटों द्वारा चोल उत्तराधिकारी राजादित्य की मृत्यु हुई।
    कण्डलूर त्रिवेंद्रम के निकट स्थित, जहां राजराज प्रथम ने चेरों को हराया।
    वेंगी आंध्रतट पर स्थित, जहां राजराज प्रथम ने पूर्वी चालुक्यों पर प्रभुत्व स्थापित किया।
    अनुराधापुर चोलयुग में श्रीलंका की राजधानी, जिसे राजराज प्रथम ने ध्वस्त कर दिया था।
    पोलन्नरूआ इसे राजराज प्रथम ने श्रीलंका पर प्रभुत्व कायम कर उसे अपने साम्राज्य का अंग बनाया।
    अनईमंगलम यह गांव शैलेन्द्रशासक को चूडामणि विहार के निर्माण के निमित्त दिया गया था।
    शण्डिमट्टिक्यू अरबसागर में स्थित क्षेत्र, जहां राजेन्द्र प्रथम ने अपना प्रभुत्व स्थापित किया।
    गंगैकोण्डचोलपुरम कावेरीपट्टनम के पास यह नगर राजेन्द्र प्रथम ने उत्तर भारत अभियान की सफलता के बाद बनवाया था।
    चिदंबरम् यहां भी चोल शासकों का राज्याभिषेक होता था।
    उत्तरमेरूर यहां से चोलवंश से संबद्ध 909 ई.-929 ई. के दो अभिलेख मिले हैं।
    नेगापट्टम कोरोमंडल तट पर स्थित, जहां शैलेन्द्रशासक ने राजराज प्रथम के समय विहार बनवाया था।
    नयम्मिलई यहां विजयालय चोलेश्वर मंदिर के अवशेष हैं।
  • चोल एवं चालुक्य वंश | Q&A Practice

    ➣ तमिल भाषा की प्रसिद्ध पुस्तक ‘कुरल’ के रचयिता कौन थे?
    उत्तर : तिरुवल्लुवर

    ➣ चोल वंश का प्रथम राजा किसको कहा जाता है, जिसने पुहार या पुगार नगर को नींव डाली ?
    उत्तर : करिकाल

    ➣ करिकाल ने चोलों की राजधानी को उरगपुर ( उरयूर) से कहां ले गये?
    उत्तर : कावेरीपट्टनम

    ➣ 850 ई. में किस चोल राजा ने चोल वंश की वास्तविक स्थापना की और अपनी राजधानी तंजौर बनायी?
    उत्तर : विजयालय

    ➣ विजयालय ने कौन-से मंदिर का निर्माण करवाया था?
    उत्तर : निशुम्भसूदिनी देवी मंदिर

    ➣ विजयालय ने कौन-सी उपाधि धारण की?
    उत्तर : नरकेसरी

    ➣ पल्लव नरेश अपराजित को हराकर आदित्य प्रथम ने कौन-सी उपाधि धारण की?
    उत्तर : कोदण्डराम

    ➣ पांड्य शासक राजसिंह द्वितीय को पराजित करने के बाद चोल शासक परांतक प्रथम ने कौन सी उपाधि धारण की?
    उत्तर : मदुरैकोण्ड

    ➣ परांतक प्रथम किस युद्ध में राष्ट्रकूट एवं पश्चिम गंग की सम्मिलित सेना से पराजित हुआ?
    उत्तर : तक्कोलम का युद्ध

    ➣ राजराज प्रथम ने अपनी राजधानी तंजौर में भगवान शिव का कौन सा मंदिर बनवाया?
    उत्तर : राजराजेश्वर मंदिर

    ➣ दक्षिण भारत में किस नरेश ने स्वायत्तशासी लोक प्रशासन स्थापित किया और भूमि की पैमाइश एवं सर्वेक्षण करवाया ?
    उत्तर : राजराज प्रथम

    ➣ राजराज प्रथम ने शैलेन्द्र राजा श्रीमार विजयोतुंगवर्मन द्वारा निर्मित किस बौद्ध विहार को आर्थिक सहायता दी?
    उत्तर : चूड़ामणि बौद्ध विहार

    ➣ राजराज प्रथम ने श्रीलंका के राजा महेन्द्र पंचम को हराकर चोल प्रदेश की राजधानी पोलोन्नरुवा ( श्रीलंका का एक नगर) में स्थापित की। इसका नया नाम क्या रखा गया?
    उत्तर : जगन्नाथमंगलम

    ➣ प्रथम भारतीय शासक कौन था, जिसने अरब सागर में भारतीय नौसेना की सर्वोच्चता स्थापित की?
    उत्तर : राजराज प्रथम

    ➣ किस चोल राजा ने जल सेवा / सेना प्रारंभ की थी ?
    उत्तर : राजराज प्रथम

    ➣ राजराज प्रथम के पुत्र और उत्तराधिकारी राजेंद्र प्रथम ने नयी राजधानी गंगैकोण्ड चोलपुरममें सिंचाई के लिए किस नाम से तालाब का निर्माण करवाया ?
    उत्तर : चोलगंगम

    ➣ राजेंद्र प्रथम ने 1017 ई. में किस लंका नरेश को परास्त कर संपूर्ण सिंहल राज्य पर अधिकार कर लिया ?
    उत्तर : महेन्द्र पंचम

    ➣ दक्षिण भारत का नेपोलियन किसको कहा जाता है ?
    उत्तर : राजेंद्र प्रथम

    ➣ चालुक्य राजा सोमेश्वर ने किस चोल शासक को कोप्पम के युद्ध में पराजित कर मार डाला ?
    उत्तर : राजाधिराज प्रथम

    ➣ वीर राजेन्द्र ने किस नदी के तट पर विजयस्तम्भ की स्थापना की थी?
    उत्तर : तुंगभद्रा नदी

    ➣ किस चोल राजा के शासनकाल में 1055 ई. में चोल राज्य में अकाड़ पड़ा था ?
    उत्तर : राजेन्द्र प्रथम

    ➣ किस चोल शासक को 1070 ई. में लोगों ने जनविद्रोह में मार डाला था?
    उत्तर : अधिराजेन्द्र

    ➣ व्यापारिक वस्तुओं से कर हटा लेने के कारण कुलोतुंग प्रथम को कौन-सी उपाधि दी गयी?
    उत्तर : संगतवित

    ➣ किस चोल राजा ने अभाव और अकाल की शिकार गरीब जनता से राजस्त्र वसूल कर चिदंबरम मंदिर का विस्तार करवाया ?
    उत्तर : विक्रम चोल

    ➣ किस चोल शासक ने चिदम्बरम मंदिर में स्थित गोविन्दराज (विष्णु) की मूर्ति को समुद्र में फेंकवा दिया?
    उत्तर : कलोतुंग द्वितीय

    ➣ किस वैष्णव आचार्य ने उक्त मूर्ति का पुनरुद्धार कर उसे तिरुपति मंदिर में प्रतिष्ठित किया?
    उत्तर : रामानुजाचार्य

    ➣ चोल वंश का अंतिम राजा कौन था?
    उत्तर : राजेन्द्र तृतीय

    ➣ चोल प्रशासन किस पद्धति पर आधारित थी?
    उत्तर : ग्राम पंचायत प्रणाली पर

    ➣ सम्पूर्ण चोल राज्य छह प्रांतों में बंटा हुआ था। इन प्रांतों का क्या कहा जाता था?
    उत्तर : मंडलम्

    ➣ किस विद्वान को तमिल व्यास कहा जाता है?
    उत्तर : नाबिआंडारनबि

    ➣ किस शिलालेख में परांतक प्रथम के शासनकाल के सभा-संस्था का विस्तृत वर्णन किया गया है?
    उत्तर : उत्तरमेरूर शिलालेख

    ➣ किस चोलकालीन प्रतिमा को चोल कला का सांस्कृतिक सार कहा जाता है?
    उत्तर : नटराज प्रतिमा

    ➣ किसके शासनकाल में के दौरान बुद्धमित्र ने तमिल व्याकरण विरोसोलियम की रचना की थी?
    उत्तर : राजेंद्र चोल

    ➣ 13वीं सदी के किस चीनी लेखक के विवरण से पता चलता है कि जघन्य अपराधों में अपराधी का सिर काट लिया जाता था अथवा हाथी द्वारा कुचलवा कर मृत्युदंड दिया जाता था?
    उत्तर : चाऊ-जू-कुआ

    ➣ चोल राजाओं ने किस धर्म को संरक्षण प्रदान किया ?
    उत्तर : शैव धर्म

    ➣ किसने श्रीलंका एवं दक्षिण-पूर्व एशिया को जीता?
    उत्तर : चोलों ने

    ➣ चोल वशं में ग्राम प्रशासन के बारे में किस शिलालेख में उल्लेख मिलता है?
    उत्तर : उत्तरामेरुर

    ➣ दक्षिण भारत का कौन-सा राजवंश अपनी नौ- सैनिक शक्ति के लिए प्रसिद्ध था ?
    उत्तर : चोल

    ➣ किस राजवंश के शासक अपने शासनकाल में ही अपना उत्तराधिकारी घोषित कर देते थे?
    उत्तर : चोल

    ➣ वह चोल राजा कौन था जिसने श्रीलंका को पूर्ण स्वतंत्रता दी और सिंहल राजकुमार के साथ अपनी पुत्री का विवाह कर दिया था?
    उत्तर : कुलोत्तुंग प्रथम ने

    ➣ मंदिरों की उत्तरी शैली किस रूप में जानी जाती है?
    उत्तर : नागर शैली

    ➣ पुंड्रवर्धन भुक्ति कहां अवस्थित थी ?
    उत्तर : उत्तर बंगाल में

    ➣ भास्कर का ‘लीलावती’ किस विषय का मानक मूल ग्रंथ है?
    उत्तर : गणित

    ➣ किसने ‘हिरण्यगर्भ धार्मिक कार्य कराया था ?
    उत्तर : दंतिदुर्ग

    ➣ कौन-सी संस्था विदेशी व्यापार से संबंधित थी?
    उत्तर : नानादेशि

  • राजपूत युग (750–1206 ई.) : राजपूतों की उत्पत्ति

    ➣ एक शक्तिशाली राजवंश के स्थान पर इस युग में उत्तर भारत में अनेक राजपूत राजवंशों ने शासन किया। इसलिए इस युग को राजपूत युग भी कहा जाता है।

    ➣ डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने इस काल के भारत को राज्य के अन्दर राज्यों का काल कहा है।

    ➣ स्मिथ के अनुसार हर्ष की मृत्यु के बाद से तुकों के आधिपत्य तक राजपूत इतने प्रभावशाली हो गये थे कि सातवीं शताब्दी (647 ई.) से 12वीं शताब्दी (1191-92 ई.) तक के काल को राजपूत काल कहा जाता है।’

    ➣ विदेशों से बर्बर हूणों के होने वाले आक्रमण तथा आन्तरिक विघटन के परिणामस्वरूप गुप्त साम्राज्य के प्रान्तीय शासकों ने अपनी स्वतन्त्रता घोषित कर उत्तर भारत के विभिन्न भागों में अपने स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिए।

    ➣ गुप्त साम्राज्य के पतन के साथ ही मगध साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र जो छठी शताब्दी ई.पू. से छठी शताब्दी ई. तक उत्तर भारत की राजनीतिक गतिविधियों का केन्द्र बिन्दु रहा था, का गौरव भी नष्ट हो गया।

    ➣ इस काल के दौरान दो महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए-

    • पाटलिपुत्र के स्थान पर अब कन्नौज के रूप में उत्तरी भारत के एक नवीन राजनीतिक केन्द्र का उदय हुआ।
    • सामन्तवाद का उत्कर्ष, जिसने प्रशासनिक विकेन्द्रीकरण को बढ़ावा दिया और देश की राजनैतिक एकता को नष्ट कर दिया।

    राजपूतों की उत्पत्ति

    ➣ राजपूतों की उत्पत्ति के विषय में भिन्न-भिन्न मत प्रचलित हैं। कुछ विद्वान इसे भारत में रहने वाली एक जाति मानते हैं तो कुछ अन्य इन्हें विदेशियों की संतान।

    अग्निकुंड से उत्पति

    ➣ कुछ विद्वान राजपूतों को आबू पर्वत पर वशिष्ठ के अग्निकुंड से उत्पन्न हुआ मानते हैं। यह सिद्धांत चंदबरदाई की पृथ्वीराज रासो पर आधारित है।

    ➣ अग्नि कुंड से चार जातियों की उत्पत्ति मानी जाती है। इनका क्रम – 1. गुर्जर-प्रतिहार (परिहार) 2. चालुक्य (सोलंकी) 3. परमार (पंवार) 4. चाहमान (चौहान)

    विलियम क्रुक एवं कर्नल टॉड ने अप्रत्यक्ष रूप से इसका समर्थन करते हुए राजपूतों को विदेशी बताया है।

    ➣ अग्निकुण्ड सिद्धान्त का ओझा जी ने अग्निपुराण ग्रंथ के अनुसार खण्डन किया।

    दशरथ शर्मा ने अग्निकुण्ड का सिद्धान्त राजपूत, चारण एवं भाटों की मानसिक कल्पना की उपज बताया है।

    ➣ डॉ. गोपीनाथ शर्मा ने इस मत का विरोध किया और चन्दबरदाई की बात को काल्पनिक माना है।

    ब्राह्मणों से उत्पति

    डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने इसे ब्राह्मणों का एक प्रतिष्ठित जाति की महत्ता निर्धारित करने का प्रयास कहा है।

    ➣ सर्वप्रथम डॉ. भण्डारकर ने चित्तौड़ एवं अचलेश्वर से प्राप्त शिलालेखों के आधार पर राजपूतों की उत्पत्ति नागर ब्राह्मणों से बताई है।

    घटियाला लेख (मण्डौर, जोधपुर) से प्राप्त शिलालेख में प्रतिहारों को ब्राह्मणवंश का बताया गया है। इस शिलालेख के अनुसार प्रतिहार ब्राह्मण हरिशचन्द एवं उसकी पत्नी भ्रदा/मादरा की सन्तान थे।

    बिजौलिया शिलालेख के अनुसार वासुदेव का उत्तराधिकारी सामन्त वत्सगोत्रीय ब्राह्मण था।

    राजशेखर ब्राह्मण का विवाह अवन्ति सुन्दरी के साथ होना, चौहानों के ब्राह्मण होने का स्पष्ट प्रमाण है।

    डॉ. गोपीनाथ शर्मा के अनुसार मेवाड़ के गुहिलों को नागर जाति के ब्राह्मण गुहादत का वंशज बताया है।

    पिंगल सूत्रवृत्ति में भी राजपूतों (मेवाड़ के गुहिलों को) को ब्राह्मण से उत्पन्न बताया गया है। किन्तु डॉ. दशरथ शर्मा ने तर्क सहित इस मत का खण्डन किया है।

    विदेशी उत्पत्ति का मत

    कर्नल जेम्स टॉड, विलियम क्रुक, वी.ए. स्मिथ, कनिंघम, ईश्वरी प्रसाद एवं भण्डारकर राजपूतों को विदेशी जातियों की सन्तान कहा है

    ➣ राजपूतों के वंशजों का उद्भव, शक/कुषाणों के आक्रमण के समय माना है। कनिंघम ने 978 ई. के बोंच गुर्जर ताम्रपत्र के आधार पर राजपूतों को यूची जाति (कुषाण) की संतान माना है।

    ➣ डॉ. भण्डारकर ने चारों अग्निवंशीय (परमार, प्रतिहार, चौहान, चालुक्य) को विदेशी सिद्ध करने का प्रयास किया है।

    ➣ डॉ. भण्डारकर के अनुसार हूण जाति के साथ भारत में एक और खज जाति का भी आगमन हुआ और गुर्जर इन्हीं खजों की सन्तान हैं। इसलिए गुर्जर प्रतिहार विदेशी हैं।

    राजौर अभिलेख में प्रतिहारों की एक शाखा को गुर्जर कहा गया है। अतः गुर्जर पांचवीं शताब्दी में हूणों के साथ भारत में प्रविष्ट हुए।

    प्राचीन क्षत्रियों की सन्तान

    डॉ. गौरीशंकर हीराचन्द्र ओझा (राजपूताने का प्राचीन इतिहास 1925 ई.)के अनुसार राजपूत प्राचीन वैदिक क्षत्रियों की सन्तान थे।

    सी.एम. वैद्य ने भी ओझा का समर्थन करते हुए, राजपूतों को वैदिक क्षत्रियों की सन्तान कहा है।

    ➣ नद्धहरण से प्राप्त एक शिलालेख के अनुसार महाकाव्य काल के राम एवं कृष्ण क्षत्रिय थे अतः राजपूत भी वैदिक आर्यों की सन्तान है।

    मनुस्मृति में राजपूतों को ब्रह्मा की सन्तान बताया है।

    ऋग्वेद के दसवें मण्डल के पुरुष सूक्त में राजपूतों (क्षत्रियों) को ब्रह्मा की भुजाओं से उत्पन्न बताया है।

    सूर्यवंशी एवं चन्द्रवंशी

    ➣ राजपूत स्वयं को वैदिक आर्यों से सम्बन्धित सूर्य एवं चन्द्रवंशी बताते प्रतिहार राजपूत राम के भाई लक्ष्मण की सन्तान बताते हुए सूर्यवंशी होने का दावा करते हैं।

    श्री जगदीशसिंह गहलोत के अनुसार राजपूतों के राजवंश वैदिक एवं पौराणिक काल में राजन्य, क्षत्रिय आदि नाम से प्रसिद्ध सूर्य एवं चन्द्रवंशी क्षत्रियों की सन्तान थे। यह न तो विदेशी हैं और न ही अनार्यों के वंशज।

    डॉ. दशरथ शर्मा ने अपनी पुस्तक- राजस्थान थ्रू द एजेज में राजपूतों को सूर्यवंशी एवं चन्द्रवंशी स्वीकार करते हुए उन्हें आर्यों की सन्तान एवं भारत का मूल निवासी माना है।

    ओझा ने अग्निवंशीय मत का खण्डन करते हुए राजपूतों को सूर्यवंशी तथा चन्द्रवंशी बताते हुए उन्हें विशुद्ध प्राचीन क्षत्रियों का वंशज कहा है।

    हर्षनाथ अभिलेख (सीकर) में चौहानों को सूर्यवंशी बताया है। वंशावलियों में राठौड़ों को सूर्यवंशी, यादवों एवं भाटियों को चन्द्रवंशी बताया है।

    मिश्रित जातियों से उत्पत्ति

    डॉ. बी.डी. चटोपाध्याय ने राजपूतों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में एक नया सिद्धान्त ब्रह्म-क्षत्र सिद्धान्त प्रस्तुत किया। इसके अनुसार राजपूत मिश्रित जातियों के सन्तान थे।

    दशरथ शर्मा, वी.एस.पाठक एवं वी.एन. पाठक का मानना है कि राजपूत जाति में कई क्षत्रियेत्तर वर्ण भी शामिल थे।

    स्मिथ महोदय ने यह तर्क प्रस्तुत किया है कि राजपूत प्राचीन आदिम जातियों गोंड, खरवार, भर आदि के वंशज थे।

    पृथ्वीराज रासो में 36 राजपूत कुलों का उल्लेख मिलता है। कुमारपाल चरित, वर्ण रत्नाकर एवं राजतंरगिणी में भी 36 कुलों का उल्लेख है।

  • गुप्तकालीन महत्वपूर्ण तथ्य और परीक्षा नोट्स

    📚 विषय सूची

    गुप्तकालीन प्रमुख नाटक

    नाटकनाटककारनाटक का विषय
    लविकाग्निमित्रम्कालिदासअग्निमित्र व मालविका की प्रेम-कथा पर आधारित।
    विक्रमोर्वशीयम् कालिदाससम्राट पुरूरवा व उर्वशी अप्सरा की प्रेम-कथा पर आधारित।
    अभिज्ञानशाकुंतलम कालिदासदुश्यंत व शकुंतला की प्रेम कथा पर आधारित ।
    मुद्राराक्षसमविशाखदत्तइस ऐतिहासिक नाटक में चन्द्रगुप्त मौर्य के मगध के सिंहासन पर बैठने की कथा का वर्णन है।
    देवीचन्द्रगुप्तम विशाखदत्तइस ऐतिहासिक नाटक में चन्द्रगुप्त द्वारा शकराज का वध कर ध्रुव-स्वामिनी से विवाह का वर्णन है।
    मृच्छकटिकम् शूद्रकइस नाटक में नायक चारूदत्त, नायिका वसंतसेना के अतिरिक्त राजा, ब्राह्मण, जुआरी, व्यापारी, वेश्या, चोर, धूर्तदास का वर्णन है।
    स्वप्रवासवदत्तम भासइसमें महाराज उदायिन व वासवदत्ता की प्रेमकथा का वर्णन किया गया है।
    प्रतिज्ञायौगंधरायणम् भासइसमें महाराज उदायिन किस तरह यौगंधरायण की सहायता से वासवदत्ता को उज्जैयिनी से लेकर भागने का वर्णन है।
    चारूदत्तमभासइस नाटक का नायक चारूदत्त मूलत: भास की कल्पना है।

    गुप्तकाल में विदेशी यात्री

     विदेशी यात्रीयात्रा वृत्तांत
    फाह्यानफो-क्यो-की
    ह्वेनसांगसी यू-की
    इत्सिंग काउ-फा-काओ-सांग-चुन
    वांग-हेन-त्सेफा-चुआन चु-लिन
    अलबरूनीतहकीक-ए-हिंद

    गुप्त साम्राज्य के समकालीन राजवंश

    राजवंशस्थापनासंस्थापकराजधानी/शासित क्षेत्र
    वाकाटक राजवंश255 ई.
    330 ई.
    विंध्यशक्ति
    सर्वसेन
    पुरिका (प्रवरपुर, महाराष्ट्र) कोंकण व विदर्भ क्षेत्र
    वत्सगुल्म (आधुनिक बसीम, अकोला, महाराष्ट्र); विदर्भ क्षेत्र
    नाग राजवंश305 ई.भवनागपद्मावती (आधुनिक मदम पवाया, ग्वालियर, मध्य प्रदेश)
    त्रैकूटक राजवंश415 ई.इंद्रदत्तअनिरूद्धपुर (नासिक, महाराष्ट्र)
    हूण राजवंश500 ई.तोरमाणपंजाब क्षेत्र
    शालकायन राजवंश300 ई.देववर्मनवेंगी (पेडुवेगी, गोदावरी जिला, महाराष्ट्र); निचली गोदावरी व कृष्णा के बीच का क्षेत्र
    विष्णु कुंडिन राजवंश 475 ई.विक्रमेन्द्र-Iविष्णुकुंडीन (कृष्णा , आन्ध्र-प्रदेश)
    माथुर राजवंश325 ई., 350अच्युत, शंकरवर्मनपिष्टपुर (कलिंग, उड़ीसा), कलिंग क्षेत्र

    गुप्तकालीन शासक के अभिलेख

    समुद्रगुप्त प्रयाग प्रशस्ति, एरण प्रशस्ति, नालंदा, गया ताम्र शासन लेख।
    चन्द्रगुप्त द्वितीय मथुरा स्तंभलेख, उदयगिरी का प्रथम और द्वितीय गुहा लेख, गढ़वा का प्रथम शिलालेख, सांची शिलालेख, महरौली प्रशस्ति।
    कुमारगुप्त प्रथम बिल्सड़ स्तंभलेख, गढ़वा का द्वितीय शिलालेख, गढ़वा का तृतीय शिलालेख, उदयगिरी का तृतीय गुहलेख, धनदैह अभिलेख, मथुरा का जैन मूर्ति लेख, तुमैन शिलालेख, मंदसौर शिलालेख, कर्मदंडा लिंगलेख, कुलाईकुरी ताम्रलेख, दामोदरपुर प्रथम एवं द्वितीय ताम्रलेख, बैग्राम ताम्रलेख, मानकुंवर बुद्धमूर्ति लेख।
    स्कंदगुप्त जूनागढ़ प्रशस्ति, कहांव स्तंभलेख, सुपिया स्तंभलेख, इंदौर ताम्रलेख, भितरी स्तंभलेख।
    कुमारगुप्त द्वितीय सारनाथ बुद्धमूर्ति लेख।
    पुरुगुप्त एवं उसका पुत्र बिहार स्तंभलेख।
    बुद्धगुप्त सारनाथ बुद्धमूर्ति लेख, पहाड़पुर ताम्रलेख, राजघाट (वाराणसी) स्तंभलेख, नंदपुर ताम्रलेख।
    वैन्यगुप्त गुनईधर (टिपरा) ताम्रलेख।
    भानुगुप्त एरण स्तंभलेख।
    विष्णुगुप्त पंचम दामोदरगुप्त ताम्रलेख।

    ➣ गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम के सबसे ज्यादा अभिलेख 18 प्राप्त हुए हैं।

    प्रमुख अभिलेख/लेख

    जूनागढ़ अभिलेख इस अभिलेख से पता चलता है कि स्कन्दगुप्त ने हूणों को परास्त कर सौराष्ट्र प्रांत में पर्णदत्त को अपना राज्यपाल नियुक्त किया था।
    गिरनार अभिलेख शक शासक रुद्रदामन (130-150 ई.) रूद्रदामन का यह अभिलेख संस्कृत गद्य में लिखा देश का प्राचीनतम अभिलेख है। अशोक के स्तंभ (इलाहाबाद) पर लिखी समुद्रगुप्त की प्रशस्ति उसके दरबारी कवि हरिषेण द्वारा लिखी गयी है।
    मंदसौर शिलालेख यह कुमारगुप्त द्वितीय तथा बंधुवर्धन (मालवा सम्वत् 529) के समय का शिलालेख है।
    पिपरहवा अभिलेख भगवान बुद्ध से संबंधित।
    सौहगौड़ ताम्न पत्र लेख यह तीसरी सदी ई.पू. का शुद्ध रूप से प्रशासनिक अभिलेख है। कुशीनगर के महानिर्वाण स्तूप से एक ताम्र पत्र मिला है, जिसमें 13 पंक्तियां अंकित हैं। इसमें बुद्ध के उदान सुत्त का उल्लेख किया गया है।
    एरण स्तंभलेख भानुगुप्त के इस अभिलेख में सर्वप्रथम सती होने का प्रमाण मिलता है।

    गुप्तकालीन प्रमुख मंदिर

    मंदिर स्थिति विवरण
    सांची का मंदिर सांची, रायसेन जिला, मध्य प्रदेश गुप्त काल का प्रारंभिक मंदिर, छोटे आकार का तथा सपाट छत वाला।
    तिगवा का विष्णु मंदिर तिगवा, जबलपुर जिला, मध्य प्रदेश गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर मकरवाहिनी गंगा एवं कूर्मवाहिनी यमुना की आकृतियाँ उत्कीर्ण हैं।
    तिगवा का कंकाली देवी मंदिर तिगवा, जबलपुर जिला, मध्य प्रदेश समुद्रगुप्तकालीन मंदिर।
    एरण का विष्णु मंदिर एरण, सागर जिला, मध्य प्रदेश गर्भगृह के सामने स्थापित स्तंभों पर सिंह, गज तथा नारीमुख का अलंकरण।
    नचना-कुठार का पार्वती मंदिर नचना-कुठार, पन्ना जिला, मध्य प्रदेश वर्तमान में उपलब्ध मंदिरों में सर्वाधिक सुरक्षित मंदिरों में से एक।
    भूमरा का शिव मंदिर भूमरा, सतना जिला, मध्य प्रदेश गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर गंगा-यमुना की आकृतियाँ उत्कीर्ण हैं।
    पिपरिया का विष्णु मंदिर पिपरिया, सतना जिला, मध्य प्रदेश द्वार स्तंभ पर वराह अवतार, नवग्रह, व्याघ्रमुख, पूर्णघट तथा पन्नावली का अंकन।
    देवगढ़ का दशावतार मंदिर देवगढ़, ललितपुर जिला, उत्तर प्रदेश वर्तमान में उपलब्ध मंदिरों में सर्वाधिक सुंदर। पंचायतन शैली एवं शिखर शैली का प्रारंभिक उदाहरण। मंदिर की दीवारों पर शेषशायी विष्णु, नर-नारायण, गजेन्द्रमोक्ष, रामायण एवं महाभारत के दृश्य अंकित हैं।
    भीतरगांव का कृष्ण मंदिर भीतरगांव, कानपुर जिला, उत्तर प्रदेश ईंटों से निर्मित शिखरयुक्त मंदिर। दीवारें रामायण, महाभारत एवं पुराणों के आख्यानों से सज्जित हैं।
    सिरपुर का लक्ष्मण मंदिर सिरपुर, रायपुर जिला, छत्तीसगढ़ ईंटों से निर्मित मंदिर। निकट में राम मंदिर एवं जानकी मंदिर के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
    मुकुंद दर्रा का मंदिर मुकुंद दर्रा, कोटा जिला, राजस्थान प्रारंभिक गुप्तकालीन मंदिर का उदाहरण।
    नागोद का शिव मंदिर नागोद, सतना जिला, मध्य प्रदेश वर्तमान में उपलब्ध मंदिरों में अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित।
    खोह का शिव मंदिर खोह, सतना जिला, मध्य प्रदेश
    मढ़ी का मंदिर मढ़ी, जबलपुर जिला, मध्य प्रदेश
    मणि नाग का मंदिर राजगीर, नालंदा जिला, बिहार ईंटों से निर्मित बेलनाकार संरचना वाला मंदिर।

    गुप्तकाल की महत्वपूर्ण रचनाएं

     रचनारचनाकार
     1. ऋतुसहारम्कालिदास
     2. मेघदूतम्कालिदास
     3. कुमारसम्भवम्कालिदास
     4. रघवशमकालिदास
     5. मालविकग्निमित्रम्कालिदास
    6. अभिज्ञानशाकुंतलम्कालिदास
     7. विक्रमोर्वशीयम् कालिदास
    8. मुद्राराक्षसविशाखदत्त
     9. देवी चन्द्रगुप्तम्विशाखदत्त
     10. काव्यदर्शनदण्डिन
     11. दशकुमार चरितदण्डिन
     12. स्वप्नवासवदत्ताभास
     13. चारूदत्ताभास
     14. उरुभंगभास
     15. किरातार्जुनीयमभारवि
     16. योगाचारअसंग
     17. रावण वधवत्सभट्टि
    18. अमरकोषअमर सिंह
     19. चन्द्रव्याकरणचन्द्रगोमिन
     20. विशुद्धिमग्गबुद्धघोष
     21. वृहत्संहितावराहमिहिर
    22. पंचसिद्धांतिकावराहमिहिर
     23. ब्रह्म सिद्धांतआर्यभट्ट
    24. आर्य भट्टियमआर्यभट्ट
    24. सूर्य सिद्धांतआर्यभट्ट
     25. न्यायावतारसिद्धसेन
    26. पंचतंत्रविष्णु शर्मा
     27. नीतिशास्त्रकामदक
    28. कामसूत्रवात्स्यायन
    29. चरक संहिताचरक
     30. मृच्छकटिकम्शूद्रक

    विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विद्वान

    वराहमिहिर : बृहत्संहिता के रचयिता

    ➣ गणितज्ञ, खगोलविद व नक्षत्रविद् जिन्होंने पंचसिद्धान्तिकी, वृहत-संहिता, वृहतजातक जैसे ग्रन्थों की रचना की।

    ट्रिग्नोमेट्री में संकेत टेबलों को सही बनाने के बाद इसका अब भी प्रयोग होता है, पास्कल त्रिभुज के बाइनोमियल नंबरों में एक नया आयाम जोड़ा। ब्रह्माण्ड की रचना व पृथ्वी की अक्षीय भ्रमण का ज्ञात किया।

    ब्रह्मगुप्त : शून्य के सिद्धांत के लिए प्रसिद्ध

    ➣ गणितज्ञ व खगोलविद् जिन्होंने ब्रह्मस्फुटसिद्धान्त, खण्डखाद्य की रचना की।

    जीरो (0) के जनक और इसे जोड़ने-घटाने, गुणा-भाग करने के नियमों की जानकारी, जनरल लीनियर इक्वेशन का हल दिया।

    ➣ प्रामाणिकता-17वीं सदी से पेल्स इक्वेशन के नाम से प्रसिद्ध इक्वेशन ब्रह्मगुप्त के एक ग्रन्थ का ही फार्मूला था।

    सुश्रुत : शल्य चिकित्सा के जनक

    ➣ सुश्रुत शल्य चिकित्सा पद्धति के प्रख्यात आयुर्वेदाचार्य थे। इन्होंने सुश्रुत संहिता नामक ग्रन्थ में शल्य क्रिया का वर्णन किया है।

    ➣ सुश्रुत ने ही त्वचारोपण (प्लास्टिक सर्जरी) और मोतियाबन्द की शल्य क्रिया का विकास किया था। पार्क डेविस ने सुश्रुत को विश्व का प्रथम शल्य चिकित्सक कहा था।

    धन्वंतरि : आयुर्वेद के देवता

    ➣ इन्हें आयुर्वेद के प्रथम आचार्य व प्रवर्तक माना जाता है। इनके ग्रन्थ का नाम ध्वंतरि संहिता है।

    ➣ शल्य चिकित्साशास्त्र के आदि प्रवर्तक सुश्रुत और नागार्जुन इन्हीं की परम्परा में पैदा हुए थे।

    चरक : चरक संहिता के रचयिता

    ➣ चरक एक महर्षि व आयुर्वेद विशेषज्ञ के रूप में विख्यात हैं। वे कुषाण राज्य के राजवैद्य थे।

    ➣ इनके द्वारा रचित चरक संहिता एक प्रसिद्ध आयुर्वेद ग्रन्थ है।

    ➣ इसमें रोगनाशक एवं रोगनिरोधक दवाओं का उल्लेख है तथा सोना, चाँदी, लोहा, पारा, आदि धातुओं के भस्म एवं उनके उपयोग का वर्णन मिलता है।

    ➣ आचार्य चरक ने आचार्य अग्निवेश के अग्निवेशतन्त्र में कुछ स्थान तथा अध्याय जोड़कर उसे नया रूप दिया जिसे आज चरक संहिता के नाम से जानते हैं।

    आर्यभट्ट : महान गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री

    पाई का मान, ट्रिग्नोमेट्री, संख्या पद्धति आर्यभट्ट प्राचीन भारत के एक महान् गणितज्ञ खगोलविद् थे। आर्यभट्ट का जन्म 476-550 ईसा पूर्व पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) में हुआ था।

    ➣ उन्होंने केवल 23 वर्ष की आयु में आर्यभट्ट नामक पुस्तक की रचना की थी। उनकी दूसरी प्रसिद्ध पुस्तक आर्य सिद्धान्त है, जिसमें उन्होंने नक्षत्र विज्ञान से सम्बन्धित अनेक यन्त्रों के बारे में भी लिखा है।

    ➣ जीरो (0) का सही मान आर्यभट्ट ने ही निकाला था। पृथ्वी अपनी कक्षा पर घूमते हुए सूर्य का चक्कर लगाती है और चन्द्रमा पृथ्वी का चक्कर लगाता है। साथ ही चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण के कारणों का भी पता लगा लिया था।

    ➣ गणित का सम हल करते समय ‘पाई’ का प्रयोग किया जाता है। ‘पाई’ (22/7) का सही मान 3.1416 आर्यभट्ट ने दिया था।

    (4 + 100) X 8 + 6200): 20000 = 3.1416 अब विश्व में यही π का सही प्रचलित मान है।

    ➣ इस महान् गणितज्ञ व खगोलविद् के नाम पर ही देश के प्रथम सेटेलाइट का नाम आर्यभट्ट रखा गया था। इस सेटेलाइट को 19 अप्रैल, 1975 को प्रक्षेपित किया गया था।

    भास्कराचार्य प्रथम : आर्यभट्ट के सिद्धांतों के व्याख्याकार

    ➣ विश्व में सभ्यताओं के विकास के साथ ही गिनने, जोड़ने-घटाने के तरीकों के विकास में योगदान।

    ➣ संख्या 9 के बाद दहाई, सैकड़ा, आदि के लिए अलग से चिह्न बनाए गए थे।

    ➣ भारतीय गणतज्ञ भास्कर प्रथम ने 600 ईस्वी में एक छोटे से गोले को नम्बर सिस्टम जोड़ा और संख्याओं ने नया स्वरूप लेना प्रारम्भ किया।

    अन्य विशेष तथ्य

    गुप्तकालीन पुत्रों के प्रकार

    दत्तकदूसरे परिवार से गोद लिया गया था।
    औरसपिता का वैध पुत्र।
    उपागतदूसरे के पुत्र को पुत्रवत समझना तथा लड़का पिता समझे।
    कृतकबिना किसी धार्मिक कांड के सम्पन्न किये हुए दूसरे पुत्र को अपना समझना।
    गुधजवह पुत्र जो अपने पिता से उत्पन्न हो कर दूसरे पिता का पुत्र हो।
    क्षेत्रजउस स्त्री का पुत्र जो दूसरे पुरूष से सहवास करती है।
    करिनकन्या से उत्पन्न पुत्र।
    सहोधशादी से पूर्व ही गर्भधारण जन्म दिया हो।
    पुनर्भवपुनर्विवाह स्त्री से उत्पन्न पुत्र को क्रय करके प्राप्त करना ।

    सुदर्शन झील

    ➣ सुदर्शन झील का निर्माण मौर्य शासक चन्द्रगुप्त मौर्य के आदेश से सौराष्ट्र प्रात के राज्यपाल पुष्यगुप्त वैश्य ने पश्चिमी भारत में सिंचाई की सुविधा हेतु कराया था।

    ➣ मौर्य शासक सम्राट अशोक के समय यवनराज तुषाश्प ने झील का पुर्ननिर्माण कर उस पर बांध बनवाया था।

    शक महाक्षत्रप रूद्रदामन ने अपने राज्यपाल सुविशाख के नेतृत्व में इस पर निर्मित बांध का जीणोद्धार कराया था।

    ➣ 300 साल बाद मरम्मत आदि का काम पूरा होने पर 455-456 ई. में सुदर्शन झील भारी बरसात के कारण फिर क्षतिग्रस्त हो गई थी।

    ➣ कालांतर में गुप्त शासक स्कंदगुप्त के जूनागढ़ के एक शिलालेख से पता चलता है कि सौराष्ट्र के राज्यपाल (क्षत्रप) के पुत्र चक्रपालित (गिरनार का प्रशासक) ने इस बांध को पुनः जीर्णोद्धार कराया था।

    नालन्दा विश्वविद्यालय

    ➣ यह भारत का सबसे विख्यात विश्वविद्यालय था। नालन्दा महाविहार आवासीय सहशिक्षण संस्थान का सबसे पुराना उदाहरण है। यह बिहार राजगृह के आधुनिक बड़गॉव नामक ग्राम के निकट स्थित था।

    ➣ नालंदा का अर्थ-कमल होता है जो ज्ञान प्रदाता का प्रतिनिधित्व करता है। ह्वेनसांग (चीनी यात्री) के अनुसार इसका संस्थापक शक्रादित्य था। अधिकांश इतिहासकारों ने शक्रादित्य की पहचान कुमारगुप्त प्रथम से की है।

    ➣ नालंदा विश्वविद्यालय में समय की माप के लिए जल घड़ा का प्रयोग किया जाता था तथा प्रत्येक छात्रों को विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए प्रतियोगी परीक्षा अनिवार्य थी।


    ➣ नरसिंह बालादित्य ने नालन्दा में 80 फीट ऊँची बुद्ध की प्रतिमा स्थापित करवाया था।

    सम्राट हर्ष ने नालन्दा को चारों तरफ से चहारदीवारी बनवाकर घेर दिया और यहां पर ताम्र बिहार बनवाया। हर्ष ने 100 गॉवों की आय नालन्दा के व्यय हेतु दान में दिया था।

    धर्मपाल ने नालन्दा का पुनरूद्धार किया और इसका व्यय पूरा करने के लिए 200 गॉव अलग कर दिया। देवपाल के समय जावा एवं सुमात्रा के शासक बालपुत्र देव ने नालन्दा मे एक मठ बनवाया।

    ➣ देवपाल ने नागरहार (जलालाबाद) के बौद्ध भिक्षु वीरदेव को नालन्दा अनेक विद्वानों को धार्मिक वाद विवाद में परास्त किया था।

    12वीं शताब्दी में बख्तियार खिलजी ने इस विश्वविद्यालय को नष्ट कर दिया।

    ➣ नालन्दा में एक विशाल पुस्तकालय था जिसे धर्मगज्ज (धर्मयज्ञ) कहा जाता था। यह भारत का प्राचीनतम पुस्तकालय था। रत्नोदधि, रत्नसागर एवं रत्नरंजन इसी पुस्तकालय भाग थे।

    ➣ नालंदा महायान शिक्षा का केन्द्र था। शिक्षा पालि भाषा में दी जाती था। ह्वेनसांग ने यहाँ अध्यापन कार्य भी किया था।

    ➣ नालन्दा में चिकित्सा शास्त्र का अध्ययन सभी के लिए अनिवार्य था। हेनसांग के समय नालंदा कुलपति शीलभद्र सभी संग्रहो के ज्ञाता थे।

    ➣ इत्सिंग 671 ई. में नालन्दा आया। इसने नालंदा में रहकर 400 संस्कृत ग्रंथों की प्रतिलिपियाँ तैयार की। उस समय यहाँ के कुलपति राहुलमित्र थे।

    सारनाथ की बुद्ध मूर्ति

    ➣ गुप्त काल में सारनाथ मूर्तिकला का एक बड़ा केंद्र था। इसका प्राचीन नाम ऋषिपतन (इसिपतन या मृगदाव अर्थात हिरनों का जंगल) था। आधुनिक नाम सारनाथ की उत्पत्ति सारंगनाथ (मृगों के नाथ) अर्थात् गौतम बुद्ध से हुई।

    ➣ इसमें बुद्ध को अपना पथ प्रवचन (धर्मचक्रप्रवर्तन) देते हुए दर्शाया गया है। इसका निर्माण काल 5वीं सदी ई. है। यह भूरे बलुआ पत्थर से बनी है।

    ➣ इसमें बुद्ध पद्मासन मुद्रा में बैठे हैं तथा उनके सिर के पीछे वृत्ताकारअलंकृत प्रभामंडल है। इस प्रभामंडल के दोनों ओर उड़ते गंधर्वो की आकृतियां हैं।

    ➣ हाथ उपदेश देने की मुद्रा (धर्मचक्र मुद्रा) में दिखाया गया है। बुद्ध जिस सिंहासन पर बैठे हैं उसके निचले भाग में 7 मनुष्यों को दिखाया गया है। इनमें से 5 बुद्ध के प्रथम 5 अनुयायी (पंचभद्र) एवं दो दानी युगल हैं।

    ➣ सर्वप्रथम अशोक ने सारनाथ में धर्मराजिका स्तूप, धमेख स्तूप एवं सिंह स्तंभ का निर्माण करवाया था।

    कनिष्क के राज्यकाल के तीसरे वर्ष में भिक्षु बल ने यहाँ एक बोधिसत्व प्रतिमा की स्थापना की। कनिष्क ने अपने शासन-काल में न केवल सारनाथ में वरन् भारत के विभिन्न भागों में बहुत-से विहारों एवं स्तूपों का निर्माण करवाया।

    हर्ष के शासन-काल में ह्वेन त्सांग भारत आया था। उसने सारनाथ को अत्यंत खुशहाल बताया था। कालांतर में महमूद ग़ज़नवी (1017 ई.) के वाराणसी आक्रमण के समय सारनाथ को अत्यधिक क्षति पहुँची।

    ➣ पुन: 1026 ई. में सम्राट महीपाल के शासन काल में स्थिरपाल और बसन्तपाल नामक दो भाइयों ने सम्राट की प्रेरणा से काशी के देवालयों के उद्धार के साथ-साथ धर्मराजिका स्तूप एवं धर्मचक्र का भी उद्धार किया।

    गाहड़वाल वेश के शासन-काल में गोविंदचंद्र की रानी कुमार देवी ने सारनाथ में एक विहार बनवाया था। उत्खनन से प्राप्त एक अभिलेख से भी इसकी पुष्टि होती है।

    ➣ इस क्षेत्र का सर्वप्रथम विस्तृत एवं वैज्ञानिक उत्खनन एच.बी. ओरटल ने करवाया। यहाँ से मुख्य मंदिर तथा अशोक स्तंभ के अतिरिक्त बड़ी संख्या में मूर्तियाँ एवं शिलालेख मिले हैं।

    ➣ प्रमुख मूर्तियों में बोधिसत्व की विशाल अभिलिखित मूर्ति, आसनस्थ बुद्ध की मूर्ति, अवलोकितेश्वर, बोधिसत्व, मंजुश्री, नीलकंठ की मूर्तियाँ तथा तारा, वसुंधरा आदि की प्रतिमाएँ भी हैं।

    सुल्तानगंज की बुद्ध मूर्ति

    बिहार के भागलपुर जिले में स्थित सुल्तानगंज से प्राप्त बुद्ध की खड़ी मुद्रा में प्राप्त मूर्ति गुप्तकालीन मूर्तियों में विशेष रूप से उल्लेखनीय है ।

    ➣ यह ताम्र (तांबे) से बनी है और लगभग 229 सेमी. ऊंची तथा 1 मीटर चौड़ी है। इसका भार दो टन से भी अधिक है। वर्तमान में यह मूर्ति बर्मिघम इंग्लैण्ड के संग्रहालय में सुरक्षित है।

    ➣ बुद्ध के बायें हाथ में संघटि (वस्त्र) है तथा उनका दायां हाथ अभयमुद्रा में है। संघटि का घेरा पैरों तक लटक रहा है। यह मूर्ति अत्यंत सजीव एवं प्रभावशाली हैं।

    ➣ सुल्तानगंज में स्थित यह ताम्र प्रतिमा नालंदा शैली की प्रतीत होती है। जबकि राखाल दास बनर्जी ने इसे पाटलिपुत्र शैली में निर्मित्त माना है।

    बाघ गुफा की चित्रकला

    ➣ बाघ गुफा मध्य प्रदेश राज्य के धार जिले से 97 किमी. दूर बाघ कस्बा के निकट स्थित है। 9 बाघ कस्बा के निकट स्थित होने के कारण ये गुफाएं बाघ की गुफाएं नाम से जानी जाती हैं।

    ➣ ये गुफाएं बाधनी नामक बरसाती नदी, जो नर्मदा नदी की सहायक नदी है, के तट पर स्थित एक पहाड़ी को काटकर बनाई गयी हैं।

    वर्ष 1818 ई. में लेफ्टिनेंट डेंजरफील्ड ने इन गुफाओं की खोज की गयी थी। इन गुफाओं को बौद्ध भिक्षुओं ने चनाई थी।

    ➣ इसमें कुल 9 गुफ़ाएँ हैं, जिनमें से 1,7,8 और 9वीं गुफा नष्टप्राय है तथा गुफा संख्या 2 पाण्डव गुफ़ा के नाम से प्रचलित है जबकि तीसरी गुफा‘हाथीखाना और चौथी रंगमहल के नाम से जानी जाती है। इन गुफा का निर्माण सम्भवतः 5वी-6वीं शताब्दी ई. में हुआ होगा।

    ➣ गुफ़ा संख्या 2 का सर्व प्रसिद्ध चित्र पद्मपाणि बुद्ध का है। इस चित्र में मुखाकृति सौम्य है तथा आभूषण व पुष्पों से शरीर के भाग संसज्जित है।

    ➣ गुफ़ा संख्या 4 अन्य चित्रों की अनुकृतियों में आकाश में संगीत, दृश्य, हाथी एवं घोड़ों के चित्र, संगीत दृश्य तथा लता वल्लरीरेखाचित्रों को प्रदर्शित किया गया है।

    अजन्ता गुफा की चित्रकला

    ➣ अजन्ता गुफा महाराष्ट्र राज्य के औरंगाबाद जिले में जलगांव रेलवे स्टेशन से 52 किमी की दूरी पर अजन्ता नामक गांव के पास स्थित है। अजन्ता के नाम पर ये गुफाएँ अजन्ता की गुफाएँ कहलाती हैं।

    ➣ बाघोर नदी की घाटी में अवस्थित एक ऊँची पहाड़ी के ढाल को काटकर ये गुफाएँ बनाई गई हैं। ये गुफाएँ घोड़े के नाल के आकार की हैं।

    ➣ वर्ष 1819 ई. में मद्रास सेना के कुछ यूरोपीय सैनिकों ने इन गुफाओं की अकस्मात् खोज की थी। वर्ष 1824 ई. में जनरल जेम्स अलेक्जेण्डर ने रायल एशियाटिक सोसाइटी की पत्रिका में पहली बार इनका विवरण प्रकाशित किया था।

    ➣ अजन्ता के गुफाचित्र बौद्ध धर्म से सम्बन्धित हैं। इनमें प्रकृति, बुद्ध व बोधिसत्व एवं जातक कथाओं के वर्णनात्मक दृश्य मिलते हैं।

    ➣ अजन्ता गुफा को यूनेस्को ने विश्व विरासत स्थल की सूची में 1983 ई. में शामिल किया।

    गुप्त काल : भारत का स्वर्णयुग

    ➣ सांस्कृतिक उपलब्धियों के आधार पर अनेक विद्वानों ने गुप्तकाल को भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग, हिंदू-पुनर्जागरण का काल एवं राष्ट्रीयता के पुनरूत्थान का युग माना है।

    ➣ जब गुप्त राजाओं ने भारत में पुनः राजनीतिक एकता स्थापित की, विदेशियों को पराजित किया, प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित की, धर्म, कला और साहित्य तथा ज्ञान-विज्ञान को प्रोत्साहन दिया।

    साहित्य विकास कालिदास (भारत का शेक्सपीयर) द्वारा अभिज्ञान शाकुतलम में दुष्यतशकुतला की प्रेम कहानी वर्णित है। इसके अलावा पंचतंत्र(विष्णु शर्मा) , कामसूत्र (वात्स्यायन) , अमरकोश (अमरसिंह) साहित्यों की रचना इसी समय हुई।
    सती प्रथा गुप्तकाल के एरण अभिलेख में सती प्रथा का प्रथम अभिलेखीय प्रमाण मिलता है।
    गणित का विकास दशमलव की खोजशून्य का विकास, पाई का मान, त्रिकोणमिति, संख्या पद्धति आदि की खोज इसी समय हुई। आर्यभट तथा भास्कराचार्य प्रसिद्ध गणित के महान ज्ञाता थे।
    धातु विज्ञान व् रसायन विज्ञान नागार्जुन रसायन एंव धातु विज्ञानं के ज्ञाता थे। उन्होंने रस चिकित्सा का अविष्कार किया। पारे का अविष्कार भी इसी समय हुआ।
    ज्योतिष विज्ञान वराहमिहिर ने ज्योतिष क्षेत्र में पंचसिद्धांतिका, बृहत्संहिता, बृहज्जातक व लघुजातक की रचना की
    चिकित्सा विज्ञान6वीं शताब्दी में वाग्भट्ट ने आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रंथ अष्टांगहृदय की रचना। चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के दरबार में आयुर्वेद का विद्वान और चिकित्सक धन्वन्तरित थे। हस्तयायुर्वेदअश्व्शास्त पशु चिकित्सा सम्बन्धी पुस्तकें इसी काल में ही लिखी गयी।
    शल्य चिकित्सा शल्य चिकित्सा के प्रख्यात आयुर्वेदाचार्य सुक्ष्रुत ने सुक्ष्रुत सहिंता में शल्य चिकित्सा का वर्णन किया है सुक्ष्रुत ने ही त्वचारोपण (प्लास्टिक सर्जरी) तथा मोतियाबिंद की शल्य चिकित्सा का विकास किया।
    शतरंज की खोज 64 खानों और 32 मोहरों वाले शतरंज खेल की शुरुआत गुप्त साम्राज्य (320-550 ई.) के दौरान भारत में हुई थी।
    हिन्दू धर्म का विकास वर्तमान में प्रचलित हिन्दू धर्म का विकास इसी समय हुआ, पंचाग निर्माण (ब्रहागुप्त द्वारा) एंव व स्तूप का निर्माण भी हुआ। हिन्दू ग्रन्थ महाभारत , रामायण एंव भगवदगीता का अंतिम संकलन भी इसी समय हुआ।
    खगोल विद्या आर्यभट्ट ने आयभट्टीय तथा सूर्य सिद्धांत पुस्तक में पृथ्वी सूर्य के चारो ओर चक्कर लगाती है, सिद्ध किया जो यह आज भी मान्य है।, ब्रहागुप्त का प्रसिद्ध खोगोलशास्त्र सम्बन्धी पुस्तक ब्रहा सिद्धात इसी काल में लिखा गया।

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