चालुक्य वंश (बादामी, वेंगी , कल्याणी )
➣ ऐतिहासिक दृष्टि से विन्ध्य पर्वतमाला एवं नर्मदा नदी उत्तर भारत को दक्षिण भारत से विभाजित करती है और विन्ध्य पर्वत क्षेत्र का त्रिकोणात्मक दक्षिणी भाग दक्षिण भारत या दक्कन माना जाता है।
➣ 9वीं सदी ई. के मध्य से लेकर 8वीं सदी ई. के मध्य तक दक्षिण भारत का इतिहास वस्तुत: तीन राज्यों के मध्य हुए आपसी संघर्ष का इतिहास है। ये राजा थे-
बादामी/वातापी के चालुक्य
कांची के पल्लव
मदुरई के पांड्य
➣ चालुक्यों की तीन प्रमुख शाखाएँ थी :-
| शाखाएं | संस्थापक | अंतिम शासक | पतन
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| बादामी | पुलकेशिन प्रथम | कीर्तिवर्मा द्वितीय | राष्ट्रकूट द्वारा (दन्तिदुर्ग )
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| वेंगी | विष्णु वर्धन | कुलोत्तंग चोलदेव | चोल वंश में विलय
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| कल्याणी | तैलप द्वितीय | सोमेश्वर चतुर्थ | देवगिरि के यादव द्वारा (भिल्लम) |
| राजवंश | राजधानी
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| बादामी/वातापी (मूल शाखा) | बादामी (कर्नाटक का बीजापुर जिला)
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| वेंगी के चालुक्य | वेंगी (आन्ध्र प्रदेश)
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| पश्चिमी (कल्याणी) चालुक्य | सोमेश्वर द्वारा मान्यखेत से कल्याणी स्थान्तरित |
बादामी (वातापी) के चालुक्य
➣ बादामी के चालुक्य चालुक्यों की प्राचीनतम (मूल शाखा) है। जो कि वातापी चालुक्य के नाम से विख्यात हुआ। चालुक्यों की मूल शाखा का उदय स्थल वातापी (आधुनिक बादामी) बीजापुर जिले के कर्नाटक में था।
➣ उदय स्थल बादामी होने के चलते ये बादामी के चालुक्य कहे जाते हैं। इन्हें आरंभिक पश्चिमी चालुक्य भी कहा जाता है।
➣ यही से 6वीं शताब्दी में उन्होंने संपूर्ण दक्षिण पथ को राजनैतिक एकता के सूत्र में आबद्ध किया तथा उत्तर के हर्षवर्धन तथा दक्षिण में पल्लव शासको में प्रबल विरोध के बावजूद उन्होंने दो शताब्दियों तक दक्षिण पर अपना प्रभुत्व बनाये रखा।
पुलकेशिन प्रथम (535 – 566 ई.) : वातापी में चालुक्य सत्ता की स्थापना
➣ बादामी के चालुक्य वंश का संस्थापक पुलकेशिन प्रथम था। उसे श्रीपृथ्वीवल्लभ (श्रीवल्लभ) भी कहा गया है।
➣ पुलकेशिन प्रथम ने बादामी में दुर्ग का निर्माण करवाया और उसे अपनी राजधानी बनाया।
➣ पुलकेशिन प्रथम ने बहुत से अश्वमेध यज्ञ किये। महाकूट अभिलेख में पुलकेशिन प्रथम की तुलना विष्णु से की गई है।
➣ महाकूट अभिलेख से ज्ञात होता है कि, उसने हिरण्यगर्भ, अश्वमेध, अग्निष्टोम, अग्नि चयन, वाजपेय, बहुसुवर्ण, पुण्डरीक यज्ञ करवाया था।
➣ इसने रण विक्रम, सत्याश्रय, धर्म महाराज, पृथ्वीवल्लभराज तथा राजसिंह आदि की उपाधियाँ धारण की थीं।
➣ पुलकेशिन प्रथम के दो पुत्र (1. कीर्तिवर्मन-I, 2. मंगलेश) थे। पिता की मृत्यु के बाद कीर्तिवर्मन प्रथम गद्दी पर बैठा।
कीर्तिवर्मन प्रथम (566 – 597 ई.) : चालुक्य साम्राज्य का विस्तार
➣ पुलकेशिन प्रथम की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र कीर्तिवर्मन प्रथम उत्तराधिकारी हुआ। उसे वातापी का प्रथम निर्माता का कहा जाता है।
➣ उसने बनवासी के कदम्ब, कोंकण के मौर्य बेल्लारी-कर्नूल क्षेत्र के नलवंशी शासकों को पराजित कर उनके राज्यों को जीत लिया।
➣ इनमें सबसे महत्वपूर्ण विजय कदम्बों को जीतना था। उसके द्वारा जीता गया कदम्ब शासक अजयवर्मा था।
➣ अभिलेखों में उसे मगध, अंग, कलिंग, मुद्रक, गंग, मषक, पाण्ड्य, चोल, कदम्ब आदि राज्यों का विजेता कहा गया है।
➣ कीर्तिवर्मन ने गोवा को जीतकर उसका नाम खेत द्वीप रखा था।
➣ महाकूट स्तम्भ लेख से पता चलता होता है कि, उसने बहुसुवर्ण एवं अग्निस्टोम यज्ञ को सम्पन्न करवाया था।
➣ कीर्तिवर्मा प्रथम ने पुरुरण पराक्रम, पृथ्वी वल्लभ एवं सत्याश्रय की उपाधि धारण की थी।
➣ लगभग 597 ई. में कीर्तिवर्मा प्रथम की मुत्यु हो गयी। चूंकि कीर्तिवर्मा के पुत्र अल्पवयस्क थे। इसलिए उस के बाद उसका भाई मंगलेश अगला चालुक्य शासक बना।
मंगलेश (597 – 610 ई.) : कलचुरियों पर विजय
➣ मंगलेश वैष्णव धर्म को अनुयायी था। उसने परमभागवत की उपाधि धारण की थी। उसने बादामी के गुहा मंदिर (विष्णु को समर्पित) का निर्माण पूरा करवाया जिसका आरंभ कीर्तिवर्मन-I के समय में हुआ था।
➣ मंगलेश ने गद्दी पर बैठने के उपरान्त कलचुरि नरेश बुद्धराज को पराजित किया था। साथ ही कदम्बों को भी समूल रूप से नष्ट कर दिया।
➣ ऐहोल अभिलेख ज्ञात होता है कि, मंगलेश अपने पुत्र को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहता था। इस बीच में पुलकेशी द्वितीय ने विद्रोह कर दिया। उसने मंगलेश को मारकर राजसिंहासन प्राप्त किया।
पुलकेशिन द्वितीय (610 – 642 ई.) : हर्षवर्धन को पराजित करने वाला शासक
➣ पुलकेशिन-II बादामी के चालुक्य वंश का चौथा व सर्वाधिक शक्तिशाली व प्रसिद्ध शासक था। उसने सत्याश्रय, श्री पृथ्वीवल्लभ महाराज की उपाधि धारण की थी।
➣ उसके दरबारी कवि रविकीर्ति द्वारा रचित उसकी प्रशस्ति (गुणवर्णन) वर्णित है।
➣ पुलकेशिन द्वितीय के एहोल अभिलेख में महाभारत युद्ध की घटना से काल गणना का उल्लेख मिलता है। उसने अश्वमेध एवं वाजपेय यज्ञ किया।
➣ मंगलेश व पुलकेशिन-II के गृह कलह के अवसर पर चालुक्य वंश की शक्ति बहुत क्षीण गयी थी और चालुक्य राज्य के अनेक प्रदेश फिर से स्वतंत्र हो गये थे।
➣ पुलकेशिन द्वितीय अपने समीपवर्ती क्षेत्रों, पल्लव शासक महेंद्र वर्मन (600 -630 ई.) को परास्त कर कृष्णा व गोदावरी क्षेत्र को जीत लिया था।
➣ पुलकेशिन द्वितीय ने कदम्बो की राजधानी वनवासी पर आक्रमण कर उसे ध्वस्त कर दिया। गंग शासक दुर्विनीत को पराजित किया। दुर्विनीत ने अपनी पुत्री का विवाह पुलकेशिन द्वितीय से कर अधीनता स्वीकार की।
➣ उसके दरबारी कवि रविकीर्ति द्वारा रचित उसके ऐहोल प्रशस्ति लेख से पता चलता है कि पुलकेशिन द्वितीय ने विंध्याचल के दक्षिण में संपूर्ण दक्षिणी भारत पर अधिकार कर लिया था। वह दक्षिणी भारत का अधिपति बन गया।
➣ पल्लव नरसिंह वर्मन प्रथम ने पुलकेशिन द्वितीय को परियल, मणिमंगल एवं शूरमाल के युद्धों में परास्त किया।
➣ पुलकेशिन द्वितीय के समय पल्लव-चालुक्य संघर्ष (630 ई. में) तब शुरू हुआ था जब पुलकेशिन ने महेन्द्र वर्मन प्रथम के समय पल्लवों के उत्तरी प्रदेश पर आक्रमण कर छीन लिया तथा अपने अनुज विष्णु वर्धन को सौंप दिया। यह शाखा वेंगी के चालुक्य कहलाई। जिन्हें पूर्वी चालुक्य भी कहा जाता है।
➣ वर्धन वंश शासक कन्नौज का सम्राट हर्षवर्धन (606-647ई.) पुलकेशिन द्वितीय का समकालीन था। वह उत्तरी भारत में अपने साम्राज्य की स्थापना में तत्पर था।
➣ एहोल अभिलेख से पता चलता है कि पुलिकेशन ने हर्षवर्धन को उसके दक्षिण अभियान में परास्त किया था एंव दक्षिणापथेश्वर(दक्षिण का ईश्वर या दक्षिण का स्वामी) की उपाधि धारण की।
➣ 642 ई. पल्लव शासक नरसिंह वर्मन ने पुलिकेशन द्वितीय को युद्ध में परास्त कर दिया और वातापी कोण्ड की उपाधि धारण कर राजधानी वातापी पर अधिकार कर लिया।
➣ अजन्ता की प्रथम गुफा के भित्ति चित्र में पुलकेशिन द्वितीय को ईरानी राजदूत फारसी शाह परवेज खुसरो द्वितीय का स्वागत करते हुये गया है। पुलकेशिन द्वितीय ने भी एक दूत फारस के शाह के दरबार में भेजा था।
➣ चीनी यात्री ह्वेनसांग 641 ई. में पुलकेशिन द्वितीय की राज्यसभा में आया और उसके राज्य का भ्रमण किया था। उल्लेखनीय है ह्वेनसांग 629-30 ई. में भारत आया था।
विक्रमादित्य प्रथम (654 – 681 ई.) : पल्लवों से वातापी की पुनर्प्राप्ति
➣ विक्रमादित्य प्रथम पुलकेशी द्वितीय का पुत्र था, 13 वर्षों के राजनीतिक व्यवधान के बाद उसने बादामी को पुन: हासिल किया तथा 655 ई. सिंहासन पर आरूढ़ हुआ।
➣ साथ ही शत्रुओं द्वारा विजित कई अन्य क्षेत्रों को भी पुन: अपने साम्राज्य में मिला लिया। इसने चोल, चेर एवं पाण्डयों को हराया जिससे इन्हें तीन समुद्रों का स्वामी कहा गया है।
➣ उसने अपने भाई जयसिंह, जिसने उसका हमेशा साथ दिया, को लाट का गवर्नर बना दिया। इस प्रकार विक्रमादित्य के राज्यकाल में जयसिंह लाट (दक्षिणी गुजरात) की चालुक्य शाखा का संस्थापक बना।
➣ विक्रमादित्य ने श्रीपृथ्वीवल्लभ, भट्टारक, महाराजाधिराज, परमेश्वर, रण रसिक आदि उपाधियाँ धारण की।
➣ उसके शासन काल में चोलों, पाण्ड्यों एवं पल्लवों ने अपने को स्वतंत्र घोषित कर दिया था।
➣ उसने अपने समकालीन पल्लव राजा महेन्द्र वर्मन द्वितीय (668-70ई.) को युद्ध में परास्त कर मार डाला था।
➣ विक्रमादित्य प्रथम सम्भवतः अपने शासन काल के अन्तिम दिनों में पल्लव नरेश परमेश्वर वर्मन प्रथम से पराजित हुआ था।
विनयादित्य (681 – 696 ई.) : चालुक्य शक्ति का सुदृढ़ीकरण
➣ विक्रमादित्य प्रथम के पश्चात उसका पुत्र विनयादित्य का उत्तराधिकारी था। उसके समय में चालुक्य साम्राज्य की शक्ति अक्षुण्ण बनी रही। विनयादित्य ने पल्लवों से संघर्ष जारी रखा।
➣ अभिलेखों में इसका उल्लेख त्रैराज्यपल्लवपति के रूप में किया गया है।
➣ उसके अभिलेखों से पता चलता है कि उसने चोलों, पांड्यों एवं केरल के साथ दक्षिण भारत के राजवंश युद्धों में विजय प्राप्त की।
➣ जेजुरी ताम्रपत्र के अनुसार- विनयादित्य ने अपने शासन के ग्यारहवें एवं चौदहवें वर्ष में पल्लवों, कलभों, मालवों एवं चोलों पर विजय प्राप्त की थी।
➣ मालवों कों जीतने के उपरान्त विनयादित्य ने सकलोत्तरपथनाथ की उपाधि धारण की थी।
➣ इसके अतिरिक्त उसने युद्धमल्ल, भट्टारक, महाराजाधिराज, राजाश्रय आदि की उपाधियाँ धारण कीं।
➣ सिरसी लेख में उसे सकलोन्तरापथनाथ, पलिध्वज, पंचमहाशब्द, पद्मरागमणि आदि का प्राप्त कहा गया है।
➣ उसने संभवतः उत्तरी भारत (उत्तरापथ) पर भी आक्रमण किया और इसी दौरान युद्ध में मारा गया।
विजयादित्य (696 – 733 ई.) : दीर्घ एवं शांतिपूर्ण शासनकाल
➣ विजयादित्य का शासन काल ब्राह्मण धर्म के पुनरुत्थान एवं स्थापत्य तथा ललित कलाओं के विकास का काल था। इसका शासन सबसे दीर्घकालीन था।
➣ विजयादित्य ने भी पललवों की राजधानी कांची पर आक्रमण कर वहां के राजा परमेश्वरवर्मन-II से पर्याप्त धन वसूला।
➣ उसने बीजापुर ज़िले के पट्टडकल नामक स्थान में विजयेश्वर शिव मंदिर का निर्माण कराया था।
➣ उसकी बहन कुमकुम देवी ने लक्ष्मेश्वर में आनेसेज्येयवसादि नामक एक भव्य जैन मंदिर का निर्माण कराया।
➣ विजयादित्य पिता की भांति उसने श्रीपृथ्वीवल्लभ, महाराजाधिराज, परमेश्वर, सत्याश्रम, भट्टारक, साहसरसिक तथा समस्त भुवनाश्रय आदि जैसी उपाधि धारण की थी।
विक्रमादित्य द्वितीय (733 – 747 ई.) : कांची विजय एवं पल्लवों पर प्रभुत्व
➣ विक्रमादित्य-II ने गंग सामंत श्रीपुरूष की सहायता से पल्लव नरेश नंदिवर्मन को पराजित किया और कांचिनकोंड (कांची का विजेता) की उपाधि धारण की।
➣ अरब आक्रमणकारियों के प्रयास को विक्रमादित्य-II के भतीजे पुलकेशिन ने विफल कर दिया जिससे प्रसन्न होकर विक्रमादित्य ने उसे अवनिजनारय (पृथ्वी के लोगों का शरणदाता) की उपाधि दी।
➣ परंतु लाट (दक्षिणी गुजरात की चालुक्य शाखा) पर राष्ट्रकूटों ने अधिकार कर वहां से चालुक्यों का शासन समाप्त कर दिया। उसने चोलों, पांड्यों, केरलों और कलभ्रों को भी परास्त किया।
➣ विक्रमादित्य-II की प्रथम पत्नी लोकमहादेवी ने पट्टदकल में लोकेश्वरनाथ मंदिर (शिव को समर्पित मंदिर) एवं द्वितीय पत्नी त्रैलोक्य महादेवी ने त्रैलोकेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया।
कीर्तिवर्मन द्वितीय (747 – 757 ई.) : राष्ट्रकूटों द्वारा चालुक्य सत्ता का अंत
➣ चालुक्यों की बादामी शाखा का अंतिम शासक कीर्तिवर्मन-II था। वह विक्रमादित्य द्वितीय का पुत्र तथा उत्तराधिकारी था।
➣ इसने अपने युवराज काल में पल्लव नरेश नन्दि वर्मन को परास्त कर बहुमूल्य रत्न, हाथी एवं सुवर्ण प्राप्त किया था।
➣ उसने सार्वभौम, लक्ष्मी, पृथ्वी का प्रिय, राजाओं का राज एवं महाराज आदि की उपाधियाँ धारण की थीं।
➣ इस समय तक चालुक्य-पल्लव संघर्षों ने चालुक्यों की शक्ति कमजोर कर दी थी। फलतः उनके सामंत शक्तिशाली बनने लगे।
➣ ऐसे ही एक सामंत दंतिदुर्ग ने चालुक्य साम्राज्य के उत्तरी भाग पर अधिकार कर 753 ई. में राष्ट्रकूट राज्य की स्थापना की थी।
➣ समनगढ़ अभिलेख से जानकारी मिलती है कि चालुक्यों के सामंत दंतिदुर्ग (राष्टकूट) ने कीर्तिवर्मा द्वितीय को परास्त कर लगभग 753 ई. के आसपास अपने को स्वतंत्र शासक के रूप में स्थापित किया।
➣ राष्ट्रकूटों के उदय के साथ ही चालुक्यों की मूल शाखा (वातापी के चालुक्य) का अंत हो गया।
➣ कालांतर में 900 ई. के आसपास राष्टकूट के पतन के पश्चात् कल्याणी के चालुक्य की शाखा का उदय हुआ।
वेंगी (आंध्र) पूर्वी चालुक्य
➣ वेंगी का प्राचीन राज्य आधुनिक आंध्र प्रदेश की कृष्णा व गोदावरी नदियों के बीच स्थित था। वेंगी की पहचान गोदावरी जिले में स्थित पेंडवेगि नामक स्थान से की जाती है।
➣ वातापी के प्रसिद्ध चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय ने इसे जीतकर अपने छोटे भाई विष्णुवर्धन को यहां का उपराजा बनाया था।
➣ कालांतर में उसी ने यहां एक स्वतंत्र चालुक्य वंश की स्थापना की जिसे पूर्वी चालुक्यवंश कहा जाता है। इसकी राजधानी वेंगी थी।
➣ हालाँकि जब तक वातापी के चालुक्य वंश की शक्ति क़ायम रही, वेंगि के पूर्वी चालुक्यों को अपने उत्कर्ष का अवसर नहीं मिल सका।
➣ 753 ई. के लगभग राष्टकूट शासक दन्तिदुर्ग द्वारा वातापी के चालुक्य राज्य का अन्त कर दिया गया, कालांतर में वेंगि में अनेक प्रतापी राजों हुए जिन्होंने ना केवल राष्ट्रकूटों से युद्ध किया अपितु अपने साम्राज्य का भी विस्तार किया।
विष्णुवर्धन (615 – 633 ई.) : पूर्वी चालुक्य वंश की स्थापना एवं वेंगी पर अधिकार
➣ वेंगी के चालुक्य का संस्थापक कुब्ज विष्णुवर्धन था जो पुलिकेशन का छोटा भाई था। उसका राज्य विशाखापट्टनम से उत्तरी नेल्लोर तक फैला था। अभिलेखों के अनुसार उनका शासन संपूर्ण वेंगीमंडल पर था।
➣ चालुक्य की यह शाखा पुलिकेशन द्वितीय के शासनकाल में लगभग 615 ई. में स्थापित हुई थी। सम्भवत: यह शाखा कृष्णा तथा गोदावरी के दोआब क्षेत्र में पनपी थी जिसे पुलिकेशन द्वितीय ने पल्लवों से, पल्लव शासक महेंद्र वर्मन से छीना था।
➣ पुलिकेशन की ओर से उसने विभिन्न युद्धों में भाग लिया। सतारा अभिलेख से पता ज्ञात होता है वह अपने युवराज तथा वातापी शासक (पुलिकेशन द्वितीय ) का प्रिय कहता था।
➣ कालांतर में जब पुलकेशिन पल्लव नरेश नरसिंह वर्मा प्रथम के साथ भीषण युद्ध में फंसा हुआ था उसी समय विष्णुवर्धन ने वेंगी में अपनी स्वाधीनता घोषित कर दी।
➣ इसकी सूचना देने के लिये उसने दो ताम्रपत्र जारी किये तथा पृथ्वीवल्लभ, युवराज, विषमसिद्धि की उपाधि धारण की एंव चांदी के सिक्के चलाये जिस पर सिंह , दीपक तथा त्रिशूल के चित्र अकिंत थे।
➣ दक्षिण में विष्णुकुंडिन वंश का मयंणभट्टारर्क तथा कोंडपडुमटि वंश का बुद्ध राज उसके सामंत के रूप में शासन करते थे।
➣ इस प्रकार विष्णुवर्धन ने संपूर्ण वेंगी राज्य पर अपना अधिकार कर लिया। उसके लेखों से पता चलता है कि उसके राज्य में कलिंग का कुछ भाग सम्मिलित था।
➣ विष्णुवर्द्धन के बाद उसका उत्तराधिकारी उसका पुत्र जय सिंह प्रथम हुआ।
जयसिंह प्रथम (633 – 663 ई.) : वेंगी क्षेत्र में चालुक्य प्रशासन का सुदृढ़ीकरण
➣ विष्णुवर्धन का पुत्र जयसिंह-I उसके बाद शासक हुआ। कुछ विद्वानों का मत है कि जयसिंह प्रथम ने अपने को पुलकेशी द्वितीय से स्वतंत्र कर लिया और इस प्रकार पूर्वी चालुक्य वंश का प्रादुर्भाव हुआ।
➣ अत: जय सिंह वेंगी के चालुक्य का प्रथम ऐतिहासिक शासक माना जाता है।
➣ उसने पृथ्वीबल्लभ, पृथ्वीजयसिंह तथा सर्वसिद्धि जैसी उपाधियां धारण की थी। लेख में उसे कई सामंत शासकों पराजित करने वाला बताया गया है।
➣ कैरा ताम्रपत्र अभिलेखीय से प्रमाणित होता है कि, जयसिंह, चालुक्य राजवंश का प्रथम ऐतिहासिक शासक था।
इन्द्रवर्मन (663 ई.)
➣ जयसिंह का उत्तराधिकारी उसका भाई इन्द्रवर्मन हुआ। चालुक्य लेखों के अनुसार उसने केवल एक सप्ताह तक राज्य किया।
वर्धन-II (668ई. – 672 ई.)
➣ उसके बाद उसका पुत्र विष्णुवर्धन-II गद्दी पर बैठा। उसने विषमसिद्धि, मकरध्वज तथा प्रलयादित्य जैसी उपाधियां ग्रहण की थी।
मंगि युवराज (672ई. – 697 ई.)
➣ उसका पुत्र तथा उत्तराधिकारी मंगि युवराज था जिसे विजयसिद्धि व सर्वलोकाश्रय भी कहा जाता है। उसने 25 वर्षी तक शासन किया।
जयसिंह द्वितीय (697 – 710 ई.) : पल्लवों एवं राष्ट्रकूटों से संघर्ष
➣ मंगि युवराज का पुत्र जयसिंह द्वितीय, जिसे सर्वलोकाश्रय तथा सर्वसिद्धि भी कहा गया है, अपने पिता की मृत्यु के बाद राजा बना तथा 13 वर्षो तक शासन किया।
कोकुलि विक्रमादित्य (710 ई.)
➣ जयसिंह द्वितीय की मृत्यु के बाद वेंगी पर उसके सौतेले भाई कोकुलि विक्रमादित्य ने अधिकार कर लिया तथा उसने केवल 6 माह तक राज्य किया। उसने एलमंचिलि पर पुनः अधिकार कर लिया।
विष्णु वर्धन तृतीय (710-746 ई.)
➣ कोकुलि विक्रमादित्य को हटाकर उसका बड़ा भाई विष्णुवर्धन तृतीय राजा बन बैठा। उसने एलमचिलि क्षेत्र को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया।
➣ उसके समय में पृथ्वीव्याघ्र नामक एक निषाद शासक ने उसके राज्य के दक्षिणी भाग पर अधिकार कर लिया परंतु बाद में विष्णुवर्धन ने उसे पुनः जीत लिया।
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❑ उल्लेखनीय है यह वह समय था जब भारत पर मुस्लिम आक्रमण हो रहे थे जिसमे 712 ई. का प्रसिद्ध आक्रमण है जो भारतीय पश्चिमोत्तर सीमा से हुआ था (मुहम्मद बिन कासिम के नेतृत्व में) भारत से इस समय सिंध पृथक हो गया था।
❑ भारत के पश्चिमोत्तर भाग में गुर्जर प्रतिहार शासकों का शासन था। ग्वालियर अभिलेख से ज्ञात होता है कि नागभट्ट प्रथम ने अरबों को सिंध से आगे नहीं बढ़ने दिया।
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विजयादित्य प्रथम (746 – 764 ई.) : पूर्वी चालुक्य सत्ता का पुनर्गठन एवं स्थिरता
➣ विष्णुवर्धन तृतीय के पश्चात् उसका पुत्र विजयादित्य प्रथम वेंगी के चालुक्य वंश का राजा बना। उसने त्रिभुवनांकुश व विजयसिद्धि जैसी उपाधियां धारण की थी।
➣ उसके समय में बादामी के चालुक्य वंश का राष्ट्रकूटों ने उन्मूलन कर दिया इसके बाद राष्ट्रकूटों का वेंगी के पूर्वी चालुक्यों के साथ संघर्ष प्रारंभ हुआ।
विष्णुवर्धन चतुर्थ (764 – 799 ई.) : राष्ट्रकूट प्रभाव की स्वीकृति
➣ विजयादित्य प्रथम के पश्चात् उसका पुत्र विष्णुवर्धन-IV (764-799 ई.) राजा बना। इस समय राष्ट्रकूट वंश में कृष्ण प्रथम का शासन था।
➣ उसने अपने पुत्र गोविंद द्वितीय को वेंगी के चालुक्य राज्य पर आक्रमण करने के लिये भेजा।
➣ राष्ट्रकूट वंश के अलस अभिलेख (769 ई.) से पता चलता है कि युवराज गोविंद द्वितीय ने वेंगी के विरूद्ध अभियान का नेतृत्व किया था एंव उसने मुसी व कृष्णा नदियों के संगम पर अपने विजय शिविर में कोष, सेना तथा भूमि सहित बेंगी नरेश के समर्पण को स्वीकार किया था।
विजयादित्य तृतीय (848 – 892 ई.) : पल्लवों एवं पांड्यों पर विजय, चालुक्य उत्कर्ष
➣ इस वंश का सबसे प्रतापी शासक विजयादित्य तृतीय था।
➣ उसने लौह – रक्तनीति का अनुसरण करके दक्षिण और उत्तर में अनेक शासकों को परास्त किया। इस अभियान में इसका सेनापति पड़रंग था।
➣ दिग्विजय के क्रम में उसका सबसे पहला अभियान नेल्लोर के आसपास शासन करने वाली बोय जाति के विरुद्ध था जिन्होंने विष्णुवर्धन पंचम की मृत्यु के बाद स्वंय को स्वंतत्र घोषित कर दिया था।
➣ विजयादित्य ने दक्षिणी राज्यों चोल , पल्लवों एवं पाण्ड्यों को पराजित कर उन्हें अपने अधीन कर लिया था। इसके समकालीन पल्लव शासक अपराजित था।
➣ दक्षिणी क्षेत्रों को जीतने के पश्चात् उसने उत्तर की ओर राष्ट्रकूटों के विरुद्ध अभियान छेड़ा। जिसमे उसने राष्ट्रकूट शासक कृष्ण द्वितीय को पराजित किया।
➣ उसने राष्ट्रकूट के राजचिन्ह छीनकर वल्लभ की उपाधि धारण की तथा स्वयं को दक्षिणापथ का महानतम शासक घोषित किया।
➣ विजयादित्य नि: संतान था इसलिए उसने अपने छोटे भाई विक्रमादित्य को युवराज नियुक्त किया परन्तु उसके शासनकाल में ही उसकी मृत्यु हो गयी।
➣ फलस्वरूप विक्रमादित्य का पुत्र भीम प्रथम उत्तराधिकारी हुआ।
अन्य उत्तराधिकारी
➣ वेंगी के विजयादित्य-IV,विजयादित्य-V, भीम-I,शक्तिवर्मा, राजेन्द्र कुलोत्तुंग इत्यादि शासक हुए। इन राजाओं ने राष्टकूटों के मुक़ाबले में अपने राज्य की स्वतंत्र सत्ता क़ायम रखने में सफलता प्राप्त की।
➣ 10वीं सदी के अन्तिम में चोल शासक राजराज प्रथम (985-1014) ने पश्चिमी (कल्याणी) चालुक्य राजा सत्याश्रय (997-1008 ई.) को परास्त किया, अपितु वेंगि के चालुक्य राजा पर भी आक्रमण किया।
➣ इस समय वेंगि के राजसिंहासन पर शक्तिवर्मा विराजमान था। उसने चोल आक्रान्ता से मुक़ाबला कर वेंगी की स्वंतंत्रता बनाए रखी।
➣ कालांतर उत्तराधिकारी विमलादित्य’ (1011-1018) ने चोल सम्राट की अधीनता स्वीकार कर ली।
➣ राजराज प्रथम ने विमलादित्य के साथ अपनी पुत्री का विवाह कर उसे अपना सम्बन्धी व परम सहायक बना लिया।
➣ विमलादित्य के बाद उसका पुत्र विष्णुवर्धन पूर्वी चालुक्य राज्य का स्वामी बना। उसका विवाह भी चोलवंश की ही एक कुमारी के साथ हुआ था।
➣ उसका पुत्र राजेन्द्र था, जो कुलोत्तुंग के नाम से वेंगि का राजा बना। उसका विवाह भी एक चोल राजकुमारी के साथ हुआ, और विवाहों के कारण वेंगि के चालुक्य वंश और चोल वंश का सम्बन्ध बहुत घनिष्ठ हो गया।
➣ चोल शासक अधिराजेन्द्र 1070 ई. में चोल राज्य का गद्दी पर बैठा उसकी कोई संतान नहीं थी। शासन के एक वर्ष के भीतर ही उसकी मृत्यु भी हो गई।
➣ इस परिस्थिति में वेंगि के चालुक्य राजा राजेन्द्र कुलोत्तुंग ने चोल वंश का राज्य भी प्राप्त कर लिया, क्योंकि वह चोल राजकुमारी का पुत्र था।
➣ इस प्रकार चोल राज्य और वेंगि का पूर्वी चालुक्य राज्य परस्पर मिल कर एक हो गए, और राजेन्द्र कुलोत्तुंग के वंशज इन दोनों राज्यों पर दो सदी के लगभग तक शासन करते रहे।
➣ सन 1070 ई. के बाद वेंगि के राजवंश की अपनी कोई पृथक् सत्ता नहीं रह गई।
➣ इस प्रकार वेंगी के चालुक्य शाखा का अंतिम शासक राजेन्द्र कुलोत्तुंग (1163 -1118 ई.) था।
कल्याणी के पश्चिमी चालुक्य
➣ कल्याणी के चालुक्यवंश का उदय राष्ट्रकूटों के पतन के पश्चात् हुआ।
➣ तैल चालुक्य अथवा तैलप द्वितीय चालुक्य राजवंश का संस्थापक था। उसके पूर्व कीर्त्तिवर्मा तृतीय, तैल प्रथम, विक्रमादित्य तृतीय, भीमराज, अय्यण प्रथम तथा विक्रमादित्य चतुर्थ के नाम मिलते हैं। ये सभी राष्ट्रकूटों के सामंत थे।
➣ तैल ने 972 ई. के आसपास उसने अन्तिम राष्ट्रकूट राजा कर्क द्वितीय को परास्त किया था। राष्ट्रकूट राज्य का अन्त हो गया, और तैलप के लिए दिग्विजय का मार्ग निष्कंटक हो गया।
➣ तैलप द्वारा स्थापित इस राजवंश ने लगभग 1119 ई. तक शासन किया। इसकी राजधानी कल्याणी थी।
➣ साहित्यिक ग्रंथों में बिल्हण कृत विक्रमाकदेवचरित सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। जिससे इस वंश के सबसे प्रतापी शासक विक्रमादित्य-VI के जीवन तथा उसकी उपलब्धियों पर प्रकाश पड़ता है।
➣ कल्याणी के चालुक्यों का पारिवारिक चिह्न वराह था। उनके राजचिह्नों में मयूरध्वज भी शामिल था।
तैल द्वितीय (973 – 997 ई.) : पश्चिमी चालुक्य सत्ता का पुनरुत्थान
➣ कल्याणी के चालुक्यों का स्वतंत्र राजनेतिक इतिहास तैलप द्वितीय के समय से प्रारंभ होता है।
➣ जिलगुंड लेख से पता चलता है कि अय्यण ने राष्ट्रकूट नरेश कृष्ण द्वितीय की कन्या से विवाह कर दहेज में विपुल सम्पत्ति प्राप्त कर लिया था।
➣ उसके पुत्र विक्रमादित्य-IV का विवाह कलचुरि राजा लक्ष्मणसेन की कन्या बोन्धादेवी के साथ सम्पन्न हुआ था। कालांतर में इसी से तैल द्वितीय का जन्म हुआ।
➣ ये सभी शासक बीजापुर तथा उसके समीपवर्ता क्षेत्र में शासन करते थे जो इस वंश की मूल राजधानी के पास में था।
➣ धीरे-धीरे उसने अपनी शक्ति का विस्तार करना प्रारंभ किया। कृष्ण तृतीय के उत्तराधिकारियों खोढिग तथा कर्क-II के समय में राष्ट्रकूट वंश की स्थिति अत्यंत निर्बल पड़ गयी।
➣ महत्वाकांक्षी तैलप ने इसका लाभ उठाया। 973-74 ई, में उसने राष्ट्रकूटों की राजधानी मान्यखेत पर आक्रमण कर दिया। युद्ध में कर्क मारा गया तथा राष्ट्रकूट राज्य पर तैलप का अधिकार हो गया।
➣ उसकी इस सफलता का उल्लेख खारेपाटन अभिलेख में मिलता है। इसके बाद तैलप ने राष्ट्रकूट सामंतों को अपने अधीन करने के लिये अभियान किया।
➣ शिमोगा (कर्नाटक) जिले के सोराब तालुक के सामंत शांतिवर्मा, जो पहले राष्ट्रकूट नरेश कर्क के अधीन, ने तैलप की अधीनता स्वीकार की थी।
➣ तैलप ने युद्ध में गंग सामंत पांचालदेव को बेल्लारी के सामंत भूतिगदेव की सहायता से परास्त किया था। प्रसन्न होकर तैलप ने भूतिगदेव को आहवमलल की उपाधि प्रदान किया।
➣ तैलप का परमार शासक मुंज से लम्बे समय तक संघर्ष चला। मेरुतुंग की प्रबंध चिंतामणि से ज्ञात होता है कि उसने मुंज पर छः बार आक्रमण किया किंतु हर बार उसे पराजय का सामना करना पड़ा।
➣ कन्नड़ कथाओं में तैलप द्वितीय को भगवान श्रीकृष्ण का अवतार कहा गया है।
➣ उसके इस साम्राज्य विस्तारवादी नीति का प्रबल विरोधी गंग नरेश पांचाल देव था। जिसे उसने वेल्लारी के सामन्त शासक गंगभूतिदेव की सहायता से पराजित कर मार दिया।
➣ लगभग 24 वर्ष के शासन के बाद 967 ई. में तैलप की मृत्यु हो गई।
सत्याश्रय (997 – 1008 ई.) : चोल संघर्ष
➣ तैलप का उत्तराधिकारी सत्याश्रय हुआ। सत्याश्रय को सत्तिग अथवा सत्तिम नाम से भी सम्बोधित किया गया है।
➣ वह भी अपने पिता के ही समान महत्वाकांक्षी एवं साम्राज्यवादी शासक था। राजा बनने के बाद उसने अपना विजय अभियान प्रारंभ किया।
➣ सर्वप्रथम उसने उत्तरी कोंकण के शीलाहार वंशी शासक अपराजित तथा गुर्जर नरेश चामुड राज के विरूद्ध सफलतायें प्राप्त की।
➣ परंतु परमार शासक सिंधुराज ने उसे हराकर उन प्रदेशों को पुनः अपने अधिकार में कर लिया जिसे तैलप ने उसके भाई मुंज से जीता था।
➣ उसके शासन काल की मुख्य घटना चोल राज्य के अधिपति राजराज प्रथम की दिग्विजय है। जिसका वेंगी के चालुक्यों पर प्रभाव था।
➣ 1006 ई. में सत्याश्रय ने वेंगी पर आक्रमण किया। उसे प्रारंभिक सफलता मिली तथा उसकी सेना ने गुंदूर जिले पर अधिकार जमा लिया।
➣ सत्याश्रय के काल का सबसे भीषण युद्ध चोल शासक अरुमोलिवर्मन अथवा राजा रामप्रथम के साथ हुआ। इस युद्ध में सत्याश्रय पराजित हुआ।
➣ उसने आकर्लक चरित्र, इरिवेंडंग एवं आहवमल्ल आदि अनेक विरुद्वों को धारण किया था।
➣ सत्याश्रय व्यक्तिगत रूप से जैन धर्म का अनुयायी था। इसका गुरु विमलचन्द्र जैन दर्शन का महान् विद्धान था।
➣ सत्याश्रय विद्धानों का संरक्षक भी था। कन्नड़ कवि गदायुद्ध को इसका संरक्षण प्राप्त था।
विक्रमादित्य V (1008 – 1015 ई.) : चालुक्य सत्ता का संरक्षण
➣ विक्रमादित्य पंचम, सत्याश्रय के बाद कल्याणी के राजसिंहासन पर आरूढ़ हुआ। सत्याश्रय का कोई पुत्र नहीं था। अतः उसके बाद उसका भतीजा विक्रमादित्य पंचम राजा बना।
➣ वह दशवर्मा का बड़ा पुत्र था। कैथोम लेख में उसे यशस्वी तथा दानशील शासक बताया गया हैं उसने 1015 ई. तक राज्य किया।
➣ उसके समय में मालवा के परमारों के साथ चालुक्यों का पुनः संघर्ष हुआ, और वाकपतिराज मुञ्ज की पराजय व हत्या का प्रतिशोध करने के लिए परमार राजा भोज ने चालुक्य राज्य पर आक्रमण कर उसे परास्त किया। पर बाद में राजा भोज ने भी विक्रमादित्य पंचम से पराजय का मुँह देखा।
➣ अभिलेखों में इसके वल्लभवनरेन्द्र तथा त्रिभुवनमल्ल आदि उपाधियों का उल्लेख मिलता है।
➣ एक अभिलेख में उसकी बहन अनुष्कादेवी का उल्लेख मिलता है, जो किसकाड राज्य की शासिका थी।
अय्यण द्वितीय (1015 ई.) : अल्पकालीन शासन
➣ अय्यण विक्रमादित्य पंचम के बाद राजगद्दी पर बैठा। वह विक्रमादित्य पंचम का भाई था।
➣ 1015 ई. में उसके भाई जयसिंह द्वितीय ने उसे राजगद्दी से हटाकर स्वंय सत्ता पर अधिकार कर लिया।
जयसिंह-II (1015 – 1043 ई.) : चोलों से संघर्ष
➣ सन 1015 ई. जयसिंह द्वितीय शासक बना। उसने कई युद्ध किये। मालवा के परमार शासक भोज ने उसके राज्य पर आक्रमण किया था।
➣ लाट और कोंकण पर अधिकार कर लिया। परंतु बाद में जयसिंह ने उसे पराजित कर पुनः अपने प्रदेशों पर अधिकार कर लिया। उसके समय में पुनः चोलों के साथ युद्ध किया। वेंगी पर इस समय चोलों का प्रभाव था।
➣ 1019 ई. में वहां के शासक विमलादित्य की मृत्यु के बाद उसके चोल राजकुमारी कुंदवै देवी से उत्पन्न पुत्र राजराज तथा उसके सौतेले भाई विष्णुवर्धन विजयादित्य-VII के बीच शासन के लिये संघर्ष हुआ।
➣ चोल राजराज के समर्थक थे। अतः जयसिंह ने विजयादित्य की सहायता के लिये वेंगी पर आक्रमण किया।
➣ जयसिंह ने तुंगभद्रा नदी पार कर बेलारी पर अधिकार कर लिया। उसका सामना करने के लिये राजेन्द्र चोल ने दो सेनायें उत्तर की ओर भेजीं।
➣ पहली सेना ने राजेन्द्र चोल के नेतृत्व में मस्की के युद्ध में जयसिंह को पराजित कर उसे तुंगभद्रा के उत्तर में भगा दिया।
➣ दूसरी सेना को भी वेंगी में सफलता मिली तथा विजयादित्य युद्ध में पराजित हुआ और भाग गया।
✨ विशेष:
इस समय भारत के पश्चिमी -उत्तरी सीमा पर महमूद गौरी ने सोमनाथ मंदिर (1025 ई0 ) को लूटा था। दक्षिण-भारत अभी इन विदेशी आक्रमणों से सुरक्षित था।
सोमेश्वर-I (1048 – 1068 ई.) : कल्याणी को राजधानी बनाया
➣ जयसिंह द्वितीय के बाद उसका पुत्र सोमेश्वर प्रथम कल्याणी के चालुक्य वंश का सबसे प्रतापी राजा था। इसने आहवमल्ल की उपाधि धारण की थी। अन्य उपाधियाँ- सर्वज्ञ चक्रवर्ती, भूलोक मल्ल, त्रिभुवन मल्ल।
➣ उसने चालुक्यों की राजधानी मान्यखेत से कल्याणी ( हैदराबाद ) स्थानांतरित की। विल्हण के अनुसार उसने कल्याण नगर को इतना सजाया कि वह विश्व के सभी नगरों में श्रेष्ठ बन गया।
➣ वह एक विजेता था। उसकी विजयों का एक विवरण नान्देड़ के लेख में मिलता है जिसके अनुसार सोमेश्वर ने मगध, कलिंग और अंग के शत्रु राजाओं की हत्या कर दी।
➣ उसने अपने समकालीन परमार राजा भोज को परास्त कर उसनी राजधानी धार पर अधिकार कर लिया।
➣ उसने अपने शासनकाल गुर्जर प्रतिहार वंश (कन्नौज) पर आक्रमण कर वहां के शासक को भागने पर विवश कर दिया।
➣ चेदि के कलचुरी राजा कर्णदेव (1063-1093) ने चालुक्य पर आक्रमण किया था जिसे सोमेश्वर के सम्मुख परास्त होना पड़ा।
➣ कालांतर में कोप्पम(1054) तथा कुडलसंगम(1062) के युद्धों में सोमेश्वर प्रथम का चोलों से लगातार संघर्ष हुआ, किन्तु इन युद्धों में चोलों को प्रमुख सफलता प्राप्त हुई।
➣ सोमेश्वर प्रथम महान विजेता व साम्राज्य निर्माता था। चोलों के सिवाय अन्य सभी मोर्चों पर उसे सफलता प्राप्त हुई। चोलों से पराजित होने के बाद भी उसके साम्राज्य की सीमा क्षतिग्रस्त नहीं हुई।
➣ उसने 25 वर्षों तक राज्य किया। बिल्हण के अनुसार उसने स्वेच्छा से तुंगभद्रा नदी के जल में डूब कर अपनी जीवन-लीला समाप्त कर दी।
सोमेश्वर-II (1068 – 1076 ई.) : विक्रमादित्य VI से संघर्ष
➣ अपने पिता सोमेश्वर प्रथम की मृत्यु के बाद बड़ा पुत्र सोमेश्वर द्वितीय सिंहासन आरूढ़ हुआ। पर वह अयोग्य शासक साबित हुआ।
➣ उत्तरी भारत की यात्राओं में सोमेश्वर का छोटा पुत्र विक्रमादित्य IV ने अंग, बंग, मगध आदि की विजय कर अदभुत पराक्रम दिखाया था।
➣ पिता की मृत्यु के समय वह सुदूर दक्षिण में चोल राज्य के साथ संघर्ष में व्याप्त था। विक्रमादित्य की अनुपस्थिति से लाभ उठाकर सोमेश्वर द्वितीय ने कल्याणी की राजगद्दी पर क़ब्ज़ा कर लिया
➣ चोल नरेश वीर राजेन्द्र ने सोमेश्वर द्वितीय के राज्य पर आक्रमण किया। सोमेश्वर के भाई विक्रमादित्य ने कुछ सामंतों के साथ चोल नरेश से संधि कर ली।
➣ वीर राजेन्द्र ने अपनी एक पुत्री का विवाह उससे कर दिया तथा सोमेश्वर द्वितीय पर दबाव डालकर विक्रमादित्य को चालुक्य राज्य के दक्षिणी भाग पर युवराज के रूप में शासन करने का अधिकार दिला दिया। इस तरह चालुक्य राज्य दो भागों में विभाजित हो गया।
➣ सोमेश्वर ने अपने भाई विक्रमादित्य के विरूद्ध अपनी स्थिति मजबूत करने के लिये कुलोत्तुंग के साथ मैत्री संबंध स्थापित कर लिया।
➣ कालांतर में दोनों ने सम्मिलित रूप से विक्रमादित्य के ऊपर आक्रमण कर दिया। चोलों ने गंगवाड़ी का प्रदेश छीन लिया इस युद्ध में विक्रमादित्य ने सोमेश्वर को बंदी बना लिया और उसे कारागार में डाल दिया गया।
➣ सन 1076 ई. में छोटा भाई विक्रमादित्य VI कल्याणी के राजसिंहासन पर आरूढ़ हुआ।
विक्रमादित्य-VI (1076 – 1126 ई.) : चालुक्य साम्राज्य का स्वर्णकाल
➣ विक्रमादित्य सोमेश्वर प्रथम का कनिष्ठ पुत्र तथा सोमेश्वर द्वितीय का छोटा भाई था। यह कल्याणी के चालुक्य शाखा का अन्तिम महान् शासक था। उसने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की थी।
➣ बिल्हण के विवरण से पता चलता है कि वह सोमेश्वर के पुत्रों में सबसे योग्य था जिसके कारण सोमेश्वर इसे ही युवराज बनाना चाहता था। किंतु सोमेश्वर द्वितीय के रहते यह संभव नहीं हो पाया।
➣ विक्रमादित्य प्रारंभ में गंगवाडी तथा बनवासी पर सामंत की हैसियत से शासन करता था। अनुकूल अवसर पाकर अंततः उसने कल्याणी के राजसिंहासन पर अधिकार कर लिया।
➣ हैदराबाद संग्रहालय में सुरक्षित दो दानपत्रों से भी इसका समर्थन होता है जिनके विवरण के अनुसार विक्रमादित्य ने अपने बाहुबल से सोमेश्वर से राजलक्ष्मी को ग्रहण कर लिया था।
➣ 1076 ई. में अपने राज्यारोहण के समय उसने एक संवत् का प्रवर्तन किया जिसे चालुक्य-विक्रम कहा जाता है। इतिहास में वह विक्रमादित्य-VI के नाम से प्रसिद्ध है।
➣ विक्रमादित्य षष्ठ ने कलिंग, बंग, मरु (राजस्थान), मालवा, चेर (केरल) और चोल राज्यों को परास्त किया। उसके शासन काल में चालुक्य साम्राज्य दक्षिण में कन्याकुमारी से लेकर उत्तर में बंगाल तक विस्तृत था।
➣ उसने चोल राजा वीर राजेन्द्र तथा कदम्ब शासक की सहायता से चालुक्य राज्य के दक्षिणी भाग पर अधिकार कर लिया।
➣ विक्रमादित्य षष्ठ का काल शांति स्थापित रही। इसके समय चोल-चालुक्य संघर्ष काफी समय तक रुक गया। इसने विक्रमपुर नमक नये नगर की स्थापना की।
➣ नीरुगंद के ताम्र लेख से ज्ञात होता है कि, अपने राज्य में विद्या तथा धर्म की अभिवृद्धि के लिए उसने 500 तमिल ब्राह्मणों को अपने राज्य में बसाया।
➣ विक्रमादित्य षष्ठ की राजसभा में विक्रमांकदेवचरित के रचयिता राजकवि विल्हण तथा मिताक्षरा (हिन्दू विधि ग्रंथ ) के लेखक विज्ञानेश्वर मिश्र नामक लेखक रहते थे।
बंगाल को छोड़कर शेष भारत में विज्ञानेश्वर मिश्र की मिताक्षरा हिंदू को कानून का सबसे आधिकारिक ग्रंथ माना जाता है। याज्ञवल्क्य स्मृति जो पर आधारित एक प्रसिद्ध टीका है।
➣ 1015 ई. में नर्मदा नदी के तट पर उसने तुला-पुरुष-दान तथा चन्द्रदेवी नदी के तट पर दान कर्म सम्पन्न करवाया।
➣ विक्रमादित्य ने 50 वर्षों तक शासन किया। उसकी मृत्यु 1126 ई. में हुई। उसे कल्याणी के चालुक्य वंश का महानतम शासक कहा जा सकता है।
सोमेश्वर तृतीय (1126 – 1138 ई.) : मानसोल्लास ग्रंथ की रचना
➣ विक्रमादित्य-VI के पश्चात् कल्याणी के चालुक्य वंश की अवनति प्रारंभ हुई। उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र सोमेश्वर-III चालुक्य राजवंश का शासक बना।
➣ राज्यारोहण के उपलक्ष्य में उसने भूलोकमल्ल वर्ष नामक एकनवीन वर्ष का प्रचलन किया तथा भूलोकमल्ल और त्रिभुवनमल्ल उपाधियां धारण की।
➣ उसने युद्ध से अधिक, शांति की ओर ध्यान दिया। किन्तु वह एक निर्बल शासक साबित हुआ जिसके समय में चालुक्य साम्राज्य की अवनति प्रारंभ हो गयी।
➣ चोल शासक विक्रम ने वेंगी पर पुनः अधिकार कर लिया। 1133 ई. में गोदावरी नदी के तट पर चोलों ने सोमेश्वर की सेना को परास्त किया।
➣ इसी समय होयसल भी स्वतंत्र हो गये। उनके शासक विष्णुवर्धन में नोलम्बवाडी, हंगल तथा बनवासी पर अधिकार कर लिया।
➣ वह स्वयं बड़ा विद्वान था जिसने मानसोल्लास नामक शिल्पशास्त्र के प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की थीं। अपनी विद्धता के कारण सोमेश्वर तृतीय सर्वज्ञभूप के रूप में प्रसिद्ध था।
➣ किन्तु उसकी बहुमुखी प्रतिभा एवं विद्वत्ता उसकी सैन्य संगठन शक्ति में सहायक न हो सकी। उसके शासन काल में अधीनस्थ सामंतों ने चालुक्य साम्राज्य की प्रभुत्ता त्यागकर स्वतंत्र शासन करना आरम्भ कर दिया, फलस्वरूप चालुक्य शक्ति का ह्रास होने लगा।
➣ सोमेश्वर तृतीय के बाद उसके दो पुत्रों[जगदेक मल्ल-II (1138-1151 ई.), तैलप-II (1151-1156 ई.)] ने शासन किया।
जगदेकमल्ल द्वितीय (1138 – 1151 ई.) : चालुक्य सत्ता का संरक्षण
➣ जगदेक मल्ल-II द्वितीय के समय तक चालुक्य साम्राज्य सुरक्षित बचा रहा तथा होयसल उसकी अधीनता मानते रहे।
➣ चित्तलदुर्ग लेख (1143 ई.) में कहा गया है कि उसने चोलों तथा होयसलों को जीता था।
तेलप तृतीय (1151 – 1156 ई.) : कलचुरि संघर्ष
➣ जगदेकमल्ल-II के बाद उसका छोटा भाई तैलप-III राजा बना। वह अत्यंत निर्बल शासक था।
➣ उसके काल में होयसल, कलचुरि, यादव आदि सामंतों ने अपनी-अपनी स्वाधीनता घोषित कर दी।
➣ अनमकोंड अभिलेख से पता चलता है कि काकतीय शासक प्रोल ने युद्ध में उसे बंदी बना लिया किंतु बाद से दया करके उसे मुक्त कर दिया। इस प्रकार चालुक्य राज्य अत्यंत जर्जर हो गया।
➣ अंतत: कलचुरि वंशी बिज्जल ने कल्याणी पर अधिकार कर लिया।
सोमेश्वर-चतुर्थ (1181 – 1189 ई.) : पश्चिमी चालुक्य सत्ता का पतन
➣ चालुक्य वंश का अंतिम शासक तैल तृतीय का पत्र सोमेश्वर-IV (1181-1189ई.) हुआ। वह कुछ शक्तिशाली था और उसने कल्याणी को पुनः जीत लिया।
➣ लेखों में उसे चालुक्याभरण श्रीमतत्रैलोक्यमल्ल भुजबलवीर कहा गया है। संभवतः भुजबलवीर की उपाधि उसने कलचुरियों के विरूद्ध सफलता के उपलक्ष्य में ही धारण की थी।
➣ एक लेख में उसे कलचुरी वंश का उन्मूलन करने वाला (कलचूर्यकुल निर्मूलता) कहा गया है।
➣ सोमेश्वर ने चालुक्य वंश की प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित कर दिया। कुछ समय तक वह अपने साम्राज्य को सुरक्षित रखने में सफल रहा।
➣ परंतु उसके राज्य में चतुर्दिक विद्रोह उठ खड़े हुए और वह अपनी स्थिति संभाल नहीं सका। उसके अधीन कई सामंतों जैसे देवगिरि के यादवों ने उसे परास्त कर चालुक्य राजधानी कल्याणी पर अधिकार कर लिया।
➣ होयसल बल्लाल द्वितीय ने भी चालुक्य सेनापति ब्रह्म को पराजित कर दिया। साम्राज्य के दक्षिणी भागों पर होयसलों का अधिकार स्थापित हुआ तथा सोमेश्वर ने भागकर बनवासी में शरण ली।
➣ संभवत: वहीं रहते हुए उसका निधन इसके साथ ही कल्याणी के चालुक्य वंश का अंत हो गया।
चालुक्य संस्कृति
➣ चालुक्यों का राजचिह्न मयूरध्वज था। उनके लेख संस्कृत भाषा में हैं।
➣ चालुक्य शासकों ने परमेश्वर, महाराजाधिराज, परमभट्टारक, परम्भागवत, सत्याश्रय, श्री पृथ्वीवल्लभ, पृथ्वीवल्लभ जैसी विशाल उपाधियां ग्रहण की।
➣ चालुक्य लेखों में मंत्री परिषद का उल्लेख नहीं मिला। इसके अभिलेखों में महासंधिविग्रहिक, विषयपति, ग्रामकूट, महत्तराधिकारिन आदि केन्द्रीय पदाधिकारियों के नाम मिलते हैं।
➣ अधिकारियों के विशेषीकरण की एक नई प्रवृत्ति भी मिलती है, जिन्हें संधिविग्रहिक कहा जाता था। जैसे- लाट संधिविग्रहिक।
➣ ह्वेनसांग ने चालुक्य राज्य के लोगों को विद्या का व्यसनी बताया है।
➣ पुलकेशिन द्वितीय के सामन्त गंगराज दुर्विनीत ने शब्दावतार नामक व्याकरण ग्रन्थ की रचना की।
➣ पंडित उदयदेव ने जैनेन्द्र व्याकरण लिखी।
➣ सोमदेव सूरि ने यशस्तिलक चंपू तथा नीतिवाक्यामृत नामक ग्रन्थों की रचना की।
➣ चालुक्यों का कुल देवता विष्णु तथा उनका प्रतीक वराह था।
➣ एहोल अभिलेख का रचयिता रविकीर्ति जैन था उसने ऐहोल में 634 ई. में जिनेन्द्र के जैन मंदिर का निर्माण करवाया जिसे मेगुती मन्दिर कहा जाता है।
➣ चालुक्य मंदिर के उत्कृष्ट उदाहरण बादामी, एहोल तथा पडकल से प्राप्त होते हैं।
➣ बादामी में चार गुफा मन्दिर हैं। प्रथम शैव, दूसरी एवं तीसरी वैष्णव और चौथी गुफा जैन धर्म से सम्बन्धित है। हरि-हर की प्राचीनतम प्रतिमा गुफा संख्या 3 में मिलती है।
➣ एहोल को मंदिरों का नगर कहा जाता है, यहां 70 मंदिर मिले हैं। यहां के प्रसिद्ध मंदिर मेगुती का जैन मंदिर, लाडखा का सूर्य मंदिर, दुर्गा का मंदिर आदि हैं।
➣ दुर्गा मन्दिर (दुर्ग मन्दिर) में दुर्गा की प्रतिष्ठा नहीं की गई हैं। वस्तुतः यह एक दुर्ग में स्थित है।
➣ पडकल के दस मंदिरों में नागर शैली के 4 मंदिर बने हैं, जिनमें पापनाथ का मंदिर प्रसिद्ध है। द्रविड़ शैली में बने विरूपाक्ष (लोकेश्वर मन्दिर), त्रेलोकेश्वर मन्दिर (मल्लिकार्जुन मन्दिर) तथा संगमेश्वर मंदिर विशेष रूप में उल्लेखनीय है ।
➣ विरूपाक्ष मन्दिर का वास्तुकार गण्ड (दक्षिण भारत का वास्तुविद) था।
➣ चालुक्य काल में सर्वप्रथम विरूपाक्ष मन्दिर में गोपुरम मिलता है। मन्दिर की दीवारों पर रामायण के दृश्यों का अंकन है।
➣ आलमपुर मन्दिर समूह, कर्नाटक में चालुक्यों द्वारा निर्मित 9 मन्दिरों का समूह है, जो नव ब्रह्मा देवालय कहे जाते हैं।
➣ वातापी के चालुक्यों का राज्याभिषेक (महावीर सिंहासन) पडल में होता था।
➣ चालुक्य शासन काल में महिलाओं को उच्च पदों पर नियुक्त किया जाता था। विक्रमादित्य द्वितीय की दो पत्नियाँ लोकमहादेवी और त्रैलोक्य महादेवी कलचुरि वंश की कन्याएँ थी, जिन्होंने चालुक्य प्रशासन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ लोकमहादेवी ने विरुपाक्ष मन्दिर तथा त्रैलोक् महादेवी ने त्रैलोकेश्वर (मल्लिकार्जुन) नाम से विशाल पाषाण मंदिर बनवाए।
➣ जयसिंह द्वितीय की बहिन अक्कादेवी कई प्रान्तों की गवर्नर रह चुकी थी। वातापी के चालुक्य शासक विक्रमादित्य प्रथम के भाई चन्द्रादित्य की पत्नी विजय भटारिका ने भी प्रान्त से शासन किया।