राजपूत युग (750–1206 ई.) : राजपूतों की उत्पत्ति

भारतीय इतिहास प्राचीन भारत राजपूत युग (750–1206 ई.)

➣ एक शक्तिशाली राजवंश के स्थान पर इस युग में उत्तर भारत में अनेक राजपूत राजवंशों ने शासन किया। इसलिए इस युग को राजपूत युग भी कहा जाता है।

➣ डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने इस काल के भारत को राज्य के अन्दर राज्यों का काल कहा है।

➣ स्मिथ के अनुसार हर्ष की मृत्यु के बाद से तुकों के आधिपत्य तक राजपूत इतने प्रभावशाली हो गये थे कि सातवीं शताब्दी (647 ई.) से 12वीं शताब्दी (1191-92 ई.) तक के काल को राजपूत काल कहा जाता है।’

➣ विदेशों से बर्बर हूणों के होने वाले आक्रमण तथा आन्तरिक विघटन के परिणामस्वरूप गुप्त साम्राज्य के प्रान्तीय शासकों ने अपनी स्वतन्त्रता घोषित कर उत्तर भारत के विभिन्न भागों में अपने स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिए।

➣ गुप्त साम्राज्य के पतन के साथ ही मगध साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र जो छठी शताब्दी ई.पू. से छठी शताब्दी ई. तक उत्तर भारत की राजनीतिक गतिविधियों का केन्द्र बिन्दु रहा था, का गौरव भी नष्ट हो गया।

➣ इस काल के दौरान दो महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए-

  • पाटलिपुत्र के स्थान पर अब कन्नौज के रूप में उत्तरी भारत के एक नवीन राजनीतिक केन्द्र का उदय हुआ।
  • सामन्तवाद का उत्कर्ष, जिसने प्रशासनिक विकेन्द्रीकरण को बढ़ावा दिया और देश की राजनैतिक एकता को नष्ट कर दिया।

राजपूतों की उत्पत्ति

➣ राजपूतों की उत्पत्ति के विषय में भिन्न-भिन्न मत प्रचलित हैं। कुछ विद्वान इसे भारत में रहने वाली एक जाति मानते हैं तो कुछ अन्य इन्हें विदेशियों की संतान।

अग्निकुंड से उत्पति

➣ कुछ विद्वान राजपूतों को आबू पर्वत पर वशिष्ठ के अग्निकुंड से उत्पन्न हुआ मानते हैं। यह सिद्धांत चंदबरदाई की पृथ्वीराज रासो पर आधारित है।

➣ अग्नि कुंड से चार जातियों की उत्पत्ति मानी जाती है। इनका क्रम – 1. गुर्जर-प्रतिहार (परिहार) 2. चालुक्य (सोलंकी) 3. परमार (पंवार) 4. चाहमान (चौहान)

विलियम क्रुक एवं कर्नल टॉड ने अप्रत्यक्ष रूप से इसका समर्थन करते हुए राजपूतों को विदेशी बताया है।

➣ अग्निकुण्ड सिद्धान्त का ओझा जी ने अग्निपुराण ग्रंथ के अनुसार खण्डन किया।

दशरथ शर्मा ने अग्निकुण्ड का सिद्धान्त राजपूत, चारण एवं भाटों की मानसिक कल्पना की उपज बताया है।

➣ डॉ. गोपीनाथ शर्मा ने इस मत का विरोध किया और चन्दबरदाई की बात को काल्पनिक माना है।

ब्राह्मणों से उत्पति

डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने इसे ब्राह्मणों का एक प्रतिष्ठित जाति की महत्ता निर्धारित करने का प्रयास कहा है।

➣ सर्वप्रथम डॉ. भण्डारकर ने चित्तौड़ एवं अचलेश्वर से प्राप्त शिलालेखों के आधार पर राजपूतों की उत्पत्ति नागर ब्राह्मणों से बताई है।

घटियाला लेख (मण्डौर, जोधपुर) से प्राप्त शिलालेख में प्रतिहारों को ब्राह्मणवंश का बताया गया है। इस शिलालेख के अनुसार प्रतिहार ब्राह्मण हरिशचन्द एवं उसकी पत्नी भ्रदा/मादरा की सन्तान थे।

बिजौलिया शिलालेख के अनुसार वासुदेव का उत्तराधिकारी सामन्त वत्सगोत्रीय ब्राह्मण था।

राजशेखर ब्राह्मण का विवाह अवन्ति सुन्दरी के साथ होना, चौहानों के ब्राह्मण होने का स्पष्ट प्रमाण है।

डॉ. गोपीनाथ शर्मा के अनुसार मेवाड़ के गुहिलों को नागर जाति के ब्राह्मण गुहादत का वंशज बताया है।

पिंगल सूत्रवृत्ति में भी राजपूतों (मेवाड़ के गुहिलों को) को ब्राह्मण से उत्पन्न बताया गया है। किन्तु डॉ. दशरथ शर्मा ने तर्क सहित इस मत का खण्डन किया है।

विदेशी उत्पत्ति का मत

कर्नल जेम्स टॉड, विलियम क्रुक, वी.ए. स्मिथ, कनिंघम, ईश्वरी प्रसाद एवं भण्डारकर राजपूतों को विदेशी जातियों की सन्तान कहा है

➣ राजपूतों के वंशजों का उद्भव, शक/कुषाणों के आक्रमण के समय माना है। कनिंघम ने 978 ई. के बोंच गुर्जर ताम्रपत्र के आधार पर राजपूतों को यूची जाति (कुषाण) की संतान माना है।

➣ डॉ. भण्डारकर ने चारों अग्निवंशीय (परमार, प्रतिहार, चौहान, चालुक्य) को विदेशी सिद्ध करने का प्रयास किया है।

➣ डॉ. भण्डारकर के अनुसार हूण जाति के साथ भारत में एक और खज जाति का भी आगमन हुआ और गुर्जर इन्हीं खजों की सन्तान हैं। इसलिए गुर्जर प्रतिहार विदेशी हैं।

राजौर अभिलेख में प्रतिहारों की एक शाखा को गुर्जर कहा गया है। अतः गुर्जर पांचवीं शताब्दी में हूणों के साथ भारत में प्रविष्ट हुए।

प्राचीन क्षत्रियों की सन्तान

डॉ. गौरीशंकर हीराचन्द्र ओझा (राजपूताने का प्राचीन इतिहास 1925 ई.)के अनुसार राजपूत प्राचीन वैदिक क्षत्रियों की सन्तान थे।

सी.एम. वैद्य ने भी ओझा का समर्थन करते हुए, राजपूतों को वैदिक क्षत्रियों की सन्तान कहा है।

➣ नद्धहरण से प्राप्त एक शिलालेख के अनुसार महाकाव्य काल के राम एवं कृष्ण क्षत्रिय थे अतः राजपूत भी वैदिक आर्यों की सन्तान है।

मनुस्मृति में राजपूतों को ब्रह्मा की सन्तान बताया है।

ऋग्वेद के दसवें मण्डल के पुरुष सूक्त में राजपूतों (क्षत्रियों) को ब्रह्मा की भुजाओं से उत्पन्न बताया है।

सूर्यवंशी एवं चन्द्रवंशी

➣ राजपूत स्वयं को वैदिक आर्यों से सम्बन्धित सूर्य एवं चन्द्रवंशी बताते प्रतिहार राजपूत राम के भाई लक्ष्मण की सन्तान बताते हुए सूर्यवंशी होने का दावा करते हैं।

श्री जगदीशसिंह गहलोत के अनुसार राजपूतों के राजवंश वैदिक एवं पौराणिक काल में राजन्य, क्षत्रिय आदि नाम से प्रसिद्ध सूर्य एवं चन्द्रवंशी क्षत्रियों की सन्तान थे। यह न तो विदेशी हैं और न ही अनार्यों के वंशज।

डॉ. दशरथ शर्मा ने अपनी पुस्तक- राजस्थान थ्रू द एजेज में राजपूतों को सूर्यवंशी एवं चन्द्रवंशी स्वीकार करते हुए उन्हें आर्यों की सन्तान एवं भारत का मूल निवासी माना है।

ओझा ने अग्निवंशीय मत का खण्डन करते हुए राजपूतों को सूर्यवंशी तथा चन्द्रवंशी बताते हुए उन्हें विशुद्ध प्राचीन क्षत्रियों का वंशज कहा है।

हर्षनाथ अभिलेख (सीकर) में चौहानों को सूर्यवंशी बताया है। वंशावलियों में राठौड़ों को सूर्यवंशी, यादवों एवं भाटियों को चन्द्रवंशी बताया है।

मिश्रित जातियों से उत्पत्ति

डॉ. बी.डी. चटोपाध्याय ने राजपूतों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में एक नया सिद्धान्त ब्रह्म-क्षत्र सिद्धान्त प्रस्तुत किया। इसके अनुसार राजपूत मिश्रित जातियों के सन्तान थे।

दशरथ शर्मा, वी.एस.पाठक एवं वी.एन. पाठक का मानना है कि राजपूत जाति में कई क्षत्रियेत्तर वर्ण भी शामिल थे।

स्मिथ महोदय ने यह तर्क प्रस्तुत किया है कि राजपूत प्राचीन आदिम जातियों गोंड, खरवार, भर आदि के वंशज थे।

पृथ्वीराज रासो में 36 राजपूत कुलों का उल्लेख मिलता है। कुमारपाल चरित, वर्ण रत्नाकर एवं राजतंरगिणी में भी 36 कुलों का उल्लेख है।

📚 Chapters

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    Swipe left/right to change content

    Share This Page

    WhatsApp Telegram