मदुरैई (मदुरा) के पांड्य
➣ पांड्य राजवंश बहुत प्राचीन वंश है। जो संगम काल से सम्बन्धित है। पाण्ड्य राजवंश का प्रारम्भिक उल्लेख पाणिनि की अष्टाध्यायी में मिलता है।
➣ पाण्ड्याओं का पहला उल्लेख मेगस्थनीज ने किया है, वह पाण्ड्य राज्य का उल्लेख माबर नाम से करता है।
➣ इसके अतिरिक्त अशोक के अभिलेख, महाभारत एवं रामायण में भी पाण्ड्य साम्राज्य के विषय में जानकारी मिलती है।
➣ प्राचीन समय में पांड्य राज्य तमिलनाडु में जहां आजकल मदुरा व तिनेवली जिले हैं, में स्थित था।
➣ पांड्य राज्य की राजधानी मदुरा (मदुरै/मदुरई) थी, जो तमिल संस्कृति और साहित्य का सुप्रसिद्ध केंद्र थी।
➣ नेडियोन पांड्य वंश का प्रथम शासक था। यह संगम कालीन राजवंश रहा। कालांतर में पांड्य वंश की दो अन्य शाखाओं का उदय हुआ।
| प्रथम पांड्य वंश | कुंडुगोन |
| द्वितीय पांड्य वंश | सुन्दर पांड्य |
➣ जिस समय प्रथम पांड्य वंश का उदय हुआ उस समय दक्षिण भारत में बादामी के चालुक्य का शासन था इसके समकालीन अन्य राजवंश चेरी एंव पल्लव शासकों का राज्य था।
प्रथम पाण्ड्य साम्राज्य
कुंडुगोन (590-620 ई.)
➣ वर्ष 590 ई. में कुंडुगोन ने पाण्ड्य शक्ति को पुनजीर्वित किया अतएव उसे पाण्ड्य वंश का पुनर्स्थापक (पांड्य वंश के प्रथम चरण) का संस्थापक कहा जाता है।
➣ उसने कलभ्रों को पराजित करके मदुरा, तिनेवली व अधिकांश केरल पर अधिकार कर लिया। उसकी राजधानी मदुरा थी।
मारवर्मन अवनिशूलमणि (620-645)
➣ यह कंडुगोन का पुत्र था इसने अपने पैतृक राज्य को सुरक्षित बनाये रखा।
जयंतवर्मन/सेलियन सेंदन (645-670 ई.)
➣ यह पांड्य वंश का तीसरा शासक हुआ। उसने चेर राज्य की विजय की तथा इसके उपलक्ष्य में वानवन की उपाधि धारण की थी। यह चेर राजाओं की उपाधि थी।
अरिकेसरी मारवर्मन (670-700 ई.)
➣ अरिकेसरी माडूवर्मन प्रारंभिक पांड्य नरेशों में महान योद्धा व सफल शासक सिद्ध हुआ। प्रारंभ में वह जैन धर्मानुयायी था।
➣ उसका विवाह एक चोल राजकुमारी मंगैपार-करसी के साथ हुआ, जो शिव उपासिका थी।
➣ इसी चोल राजकुमारी के विशेष आग्रह पर शैव भक्त सम्बदर मदुरा में आये जिनके प्रभाव में आकर अरिकेसरी मारवर्मन ने जैन धर्म का परित्याग कर शैव धर्म को अपना लिया।
➣ उसने केरल एवं अन्य पड़ोसी राज्यों को जीतकर अपने राज्य का विस्तार किया।
कोच्चडय्यन (700-730 ई.)
➣ अरिकेसरी माड़वर्मन के पश्चात् कोच्चडय्यन (रणधीर) पांड्य शासक बना। उसने कई उपाधियां (वाणवन, शेम्बियम (शोलान) धारण की थी।
➣ उसे मदुरै कर्नाटक (मधुर कर्नाटक) व कोंगार-कोमान (कोंगू जनता का अधिपति) भी कहा जाता है।
मारवर्मन राजसिंह-I (730-765 ई.)
➣ कोच्चडय्यन के बाद माड़वर्मन राजसिंह-I पांड्य शासक बना। उसे पल्लव-भंजन भी कहा जाता है क्योंकि उसने पल्लवमल्ल को पराजित किया था।
➣ उसने कोंगुओं व भालाकोंगम को भी पराजित किया। मालव सेनापति ने उसके समक्ष आत्मसमर्पण किया।
➣ इसके बाद उसने गंग शासक श्रीपुरूष एवं चालुक्य नरेश कीर्तिवर्मन-II की संयुक्त सेना को वेनभई के युद्ध में पराजित किया। परिणामतः गंग सामंत को अपनी पुत्री का विवाह पांड्य राजकुमार जटिल परांतक के साथ करना पड़ा।
➣ मारवर्मन राजसिंह-I ने अनेक गोसाहार, हिरण्यभार एवं तुलाभार यज्ञ किए। उसने कुदाल, वंजी और कोली का भी पुनरुद्धार किया।
वरगुण-1 (765-815 ई.)
➣ मारवर्मन राजसिंह-I के बाद उसका पुत्र जटिल परांतक नेंडुनजड़ैयन उपाधि धारण कर वरगुण-I रूप में पांड्य शासक बना। वह पांड्य वंश का महान एवं सफलतम शासक सिद्ध हुआ।
➣ वेलविक्कुडि अभिलेख के अनुसार, उसने पेण्णागडम् (तंजौर के निकट स्थित) के युद्ध पल्लव शासक मंदिवर्मन-I एवं उसके सहयोगी नाट्टक्कुरुम्बु शासक आयवेल की संयुक्त सेना को पराजित किया।
➣ उसने करवंडपुरम (तिनेवली का कलक्काड) के एक दुर्ग का निर्माण कराया।
➣ वेलविक्कुडि अभिलेख के अनुसार, उसने पेण्णागडम् (तंजौर के निकट स्थित) के युद्ध में पल्लव शासक मंदिवर्मन-I एवं उसके सहयोगी नाट्टक्कुरूम्बु के शासक आयवेल की संयुक्त सेना को पराजित किया।
➣ उसने करवंडपुरम (तिनेवली का कलक्काड) के एक दुर्ग का निर्माण तथा कांजीवयप्पेसर नामक स्थान पर एक विशाल विष्णु मंदिर का निर्माण कराया एवं परम वैष्णव की उपाधि धारण की।
➣ उसने अपने शक्तिशाली शत्रुओं को पराजित करने के उपलक्ष्य में परांतक की उपाधि धारण की थी।
➣ विद्यानुरागी व विद्वानों का महान संरक्षक होने के कारण उसने पॉडतवत्सल की उपाधि धारण की थी।
➣ संभवत: वह महान साम्राज्य निर्माता व अपने समय का तमिल देश का सर्वाधिक प्रभावशाली व पराक्रमी शासक था।
श्रीमार श्रीवल्लभ (815-862 ई.)
➣ वरगुण-I के परणोपरांत उसका पुत्र श्रीमार श्रीवल्लभ पांड्य शासक बना। उसने एकवीर, पराचक्रकोलाहन एवं अवनीयशेखर की उपाधि धारण की।
➣ पल्लव नरेश नंदिवर्मन तृतीय ने उसे तेलारू में हरा दिया। तथापि कुछ ही समय बाद श्रीमार श्रीबल्लभ ने कुभंमोजय के युद्ध में पराजित किया। किंतु पल्लव नरेश नृपतुंग ने उसे पुनः अरिचित के युद्ध में हरा दिया।
➣ इसके बाद श्रीलंका की सेना ने उसके राज्य पर हमला करके उसकी राजधानी मदुरा पर अधिकार कर लिया।
वरगुण-II (862-880 ई.)
➣ श्रीमार श्रीवल्लभ के मरणोपरांत उसका ज्येष्ठ पुत्र वरगुणवर्मन-II पांड्य राज्य की राजगद्दी पर बैठा।
➣ उसने 18 वर्षों तक शासन किया। इसके बाद वह परांतक वीरनारायण द्वारा राज्यसत्ता से अपदस्थ कर दिया।
परांतक वीरनारायण (880-900 ई.)
➣ वरगुण-II को राज्य-सत्ता से अपदस्थ करने के बाद परांतक वीरनारायण ने 880ई. में पांड्य शासन को अपने अधीन कर लिया। दलवयपुरम के कुछ ताम्रपत्र उसी के शासनकाल में प्रदान किये गये।
➣ परांतक वीरनारायण ने कोंगु प्रदेश व कावेरी नदी के दक्षिणी भू-भाग को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया।
मारवर्मन राजसिंह-II (900-920 ई.)
➣ परांतक वीरनारायण के बाद उसका पुत्र मारवर्मन राजसिंह-II पांड्य शासक बना।
➣ उसके शासनकाल के चोल सम्राट परांतक-I (907-953 ई.) ने पांड्य शक्ति को कुचलने के लिए मदुरा पर आक्रमण कर दिया।
➣ मारवर्मन राजसिंह-II की चोलों के हाथों लगातार पराजयों के कारण पांड्य वंश की पर्याप्त क्षीण हो गई और उसकी मृत्यु के बाद पांड्य राज्य पर चोलों का वर्चस्व स्थापित हो गया।
वीर पांड्य (920-949 ई.)
➣ राजसिंह द्वितीय का पुत्र तथा उत्तराधिकारी वीर पांड्य बना। वह कुछ शक्तिशाली राजा था।
➣ सन 949 ई. में उसने चोल शासक गंडरादित्य को तक्कोलम के युद्ध में पराजित किया तथा अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी। किंतु उसकी सफलता स्थायी नहीं रही। गंडरादित्य के तीसरे उत्तराधिकारी सुंदरचोल ने उसे परास्त किया।
➣ कालांतर में श्रीलंका के शासक महिन्द चतुर्थ ने पांड्यो की सहायता की। किंतु चेबूर के युद्ध में चोल सेना ने वीर पांड्य को बुरी तरह पराजित किया। सभवत वह युद्ध-भूमि से मार डाला गया।
➣ इसके साथ ही पांड्य वंश की स्वाधीनता का लगभग अंत हुआ तथा उन्हें चोलों की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी।
➣ 12वीं सदी ई. के अंत में चोलों के पतन काल में जटावर्मन कुलशेखर (1190-1216 ई.) ने पांड्य राज्य की पुनर्स्थापना की थी।
द्वितीय पाण्डय साम्राज्य
जटावर्मन सुन्दर पाण्ड्रय-I (1251-1268 ई.)
➣ उसने अपने वंश की स्वाधीनता प्राप्त कर ली। वह पाण्ड्य वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली राजा था।
➣ उसने चेर, होयसल राजाओं को जीता तथा चोल शक्ति का पूर्ण विनाश किया। उसने उत्तरी सिंहल की भी विजय की, कांची पर अधिकार कर लिया। कालांतर में काकतीय नरेश गणपति को भी हरा दिया।
➣ उसने विजित प्रदेशों से उसे अतुल सम्पत्ति प्राप्त हुई जिसका उपयोग उसने श्रीरंगन तथा चिदम्बरम के मंन्दिरो को भव्य एवं सुन्दर बनाने में किया।\
मारवर्मन कुलशेखर पाण्ड्य-I (1268-1309 ई.)
➣ जटावर्मन के बाद मारवर्मन कुलशेखर राजा बना। उसने होयसल रामनाथ तथा राजेन्द्र चोल तृतीय दोनों को 1279 ई. में पराजित किया।
➣ कुलशेखर चोल प्रदेश तथा रामनाथ द्वारा शासित होयसल के तमिल जिलों का एकछत्र शासक बना। केरल में उसने एक विद्रोह का दमन किया।
➣ उसने अपने मंत्री आर्यचक्रवर्ती के नेतृत्व में एक सेना सिंहल पर आक्रमण करने के लिए भेजी। वहां का शासक भुवनायकवाहु परास्त हुआ तथा 20 वर्षों तक सिंहल पाण्ड्य राज्य का एक प्रान्त बना रहा।
➣ अपने राज्य काल के अन्त तक कुलशेखर ने अपने राज्य को अक्षुण्ण बनाये रखा। उसका शासन काल आर्थिक दृष्टि से समृद्धि का काल रहा।
➣ उसके समय 1293 ई. में वेनिस का प्रसिद्ध यात्री मार्कोपोलो पाण्ड्य देश की यात्रा पर आया था।
➣ वह कुलशेखर के सुशासन एवं उसके राज्य की समृद्धि की काफी प्रशंसा करता है। यहां का व्यापार वाणिज्य अत्यधिक विकसित था तथा राज्य की ओर से विदेशी व्यापारियों तथा यात्रियों को काफी सुविधायें प्रदान की जाती थी।
➣ इस राज्य का कैल (कायल) नामक नगर ऐश्वर्य एवं वैभव से परिपूर्ण था। यहां के शासक के पास परिपूर्ण कोष तथा विशाल सेना थी।
वीर पाड्य-IV (1309-1345 ई.)
➣ कुलशेखर की मृत्यु के बाद उसके दो पुत्रों (जटावर्मा सुन्दरपाण्ड्य तृतीय, वीरपाण्ड्य) के बीच गद्दी के लिए संघर्ष हुआ। इसमें वीर पाण्ड्य विजयी हुआ।
➣ उसने राजगद्दी पर अधिकार कर लिया। किन्तु जटावर्मा इस पराभव को सहन न कर सका तथा उसने अपने भाई को दण्ड देने के लिये अलाउद्दीन खिलजी से सहायता मांगी।
➣ उसने 1310 ई. में अपने सेना पति मलिक काफूर को पाण्ड्य राज्य पर आक्रमण करने को भेजा। आक्रमणकारियों ने मदुरा को लूटा तथा ध्वस्त कर दिया।
➣ मलिक काफूर अपने साथ भारी सम्पत्ति लेकर दिल्ली लौट गया। इसके बाद पाण्ड्य राज्य की स्थिति निर्बल पड़ गयी।
➣ 14वीं शदी के प्रारम्भ में केरल के राजा रविवर्मन ने वीरपाण्ड्य तथा सुन्दरपाण्ड्य दोनों को पराजित किया।
➣ तुगलक शासन में भी पाड्य राज्य पर तुर्की ने आक्रमण किये। कुछ समय के लिए इसे दिल्ली सल्तनत का अंग बना लिया गया। इस प्रकार क्रमश: पाण्ड्य राज्य का पतन हो गया।
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