होयसल वंश (1040-1346 ई.) : विष्णुवर्धन

भारतीय इतिहास प्राचीन भारत होयसल वंश (1040-1346 ई.)
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होयसल वंश : दक्षिण भारत की कला एवं मंदिर स्थापत्य

➣ होयसालों के राज्य का क्षेत्र वर्तमान समय के मैसूर प्रदेश में था और उनकी राजधानी द्वारसमुद्र थी। आरम्भ में उनकी स्थिति सामन्त राजाओं की थी, जो कभी दक्षिण के चोलों और कभी कल्याणी के चालुक्य राजाओं के आधिपत्य को स्वीकार करते थे।

➣ होयसल यादवों की एक शाखा थे जो अपने को चंद्रवंशी मानते थे। वे गड्गवाडि के पश्चिम में चालुक्य नरेशों के सामंत के रूप में शासन करते थे। उनका राज्य चालुक्य तथा चोल साम्राज्यों के बीच एक मध्यस्थ राज्य था।

चालुक्य नरेश सोमेश्वर-III के समय में इस वंश के विष्णुवर्द्धन ने अपने को स्वतंत्र कर दिया। वह एक महत्वाकांक्षी शासक था और उसने चालुक्य राज्यों को जीत कर अपनी शक्ति का विस्तार प्रारंभ कर दिया।

➣ होयसल वंश देवगिरि के यादव वंश के समान ही द्वारसमुद्र के यादव कुल का था। इसलिए इस वंश के राजाओं ने उत्कीर्ण लेखों में अपने को यादवकुलतिलकय कहा है।

➣ इस वंश का अंतिम शासक नरसिंह-III का पुत्र वीर बल्लाल-III था।

➣ होयसलों की राजधानी द्वारसमुद्र का आधुनिक नाम हालेविड है जो इस समय कर्नाटक राज्य में स्थित है।

विष्णुवर्धन (1110 – 1141 ई.) : चोलों से स्वतंत्रता

➣ विष्णुवर्धन होयसल वंश का एक वीर और प्रतापी राजा था, जो 1110 ई. में द्वारसमुद्र की राजगद्दी पर आरूढ़ हुआ। इसने अनेक युद्ध किए तथा अपने राज्य का विस्तार किया।

➣ वह नाममात्र के लिए ही चालुक्यों का अधीनस्थ बना था। बाद में उसने अपने राज्य को चालुक्यों की अधीनता से मुक्त कर अन्य राज्यों पर आक्रमण शुरू किए।

➣ सुदूर दक्षिण में चोल, पांड्य और मलाबार के क्षेत्र में विष्णुवर्धन ने विजय यात्राएँ कीं और अपनी शक्ति को प्रदर्शित किया। इसमें सन्देह नहीं कि विष्णुवर्धन के शासन काल में होयसाल राज्य बहुत शक्तिशाली हो गया था।

➣ प्रारम्भ में वह जैन मतावलम्बी था, किंतु प्रख्यात वैष्णव आचार्य रामानुज के प्रभाव से वह वैष्णव मतावलम्बी हो गया।

➣ मत परिवर्तन के बाद उसने अपना पहले का नाम विहिदेव या विहिव त्याग दिया और विष्णुवर्धन नाम धारण कर लिया।

➣ विष्णुवर्धन ने वैष्णव धर्म के प्रचार के लिए अनेक भव्य मन्दिरों का निर्माण करवाया था। इन मन्दिरों में से कुछ आज भी बेलूर और हलेविड में विद्यमान हैं।

➣ इनमें सर्वोत्कृष्ट उदाहरण हलेविड होयसलेश्वर मन्दिर का है, जिसमें ग्यारह सज्जा पट्टियाँ हैं। प्रत्येक पट्टी सात सौ फुट या इससे भी अधिक लम्बी हैं। ये पट्टियाँ हाथी, सिंह, अश्वारोही, वृक्षलता, पशु-पक्षी आदि विविध अलंकरणों से सुसज्जित हैं।

➣ लगभग 1141 ई. में विष्णवर्धन की मृत्यु हो गई थी।

अन्य उत्तराधिकारी

वीर बल्लाल (1173-1220 ई.) विष्णुवर्धन का पौत्र था। वीर बल्लाल का राज्य मैसूर के उत्तर तक विस्तृत था।

➣ उसने देवगिरि के यादवों को परास्त किया और होयसलों को दक्षिण भारत में सबसे अधिक शक्तिशाली बना दिया

नरसिंह होयसल वंश के राजा वीर बल्लाल का पुत्र था। जिस समय नरसिंह राजसिंहासन पर विराजमान था, तब प्रतापी यादव राजा सिंघण ने उसके राज्य पर आक्रमण किया।

➣ इस आक्रमण में नरसिंह पराजित हुआ और यादव नरेश सिंघण ने अपने पितामह के अपमान का प्रतिशोध उससे लिया।

वीर बल्लाल तृतीय (1292 – 1343 ई.) : दिल्ली सल्तनत संघर्ष एवं पतन

➣ वीर बल्लाल तृतीय होयसल वंश का अंतिम राजा था। देवगिरि के यादवों के समान ही होयसालों की स्वतंत्र सत्ता का अन्त भी अलाउद्दीन ख़िलजी के द्वारा ही हुआ।

➣ 1310 ई. में सुल्तान अलाउद्दीन ख़िलजी के सेनापति मलिक काफ़ूर ने दक्षिण भारत की विजय करते हुए द्वारसमुद्र पर भी आक्रमण किया और उसे जीत लिया।

➣ वीर बल्लाल तृतीय को क़ैद करके दिल्ली ले जाया गया और उसने अलाउद्दीन ख़िलजी का वशवर्ती और कर देना स्वीकार कर लिया।

➣ अलाउद्दीन के वापस लौट जाने पर बल्लाल ने भी स्वतंत्र होने का प्रयत्न किया, यद्यपि इसमें वह सफल नहीं हो सका।

➣ अंत में सुल्तान अलाउद्दीन ख़िलजी ने लगभग 1326 ई. में होयसल वंश का अंत कर दिया।

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