Subject: भारतीय इतिहास

  • गुप्त साम्राज्य | One-Liner Practice

    ❑ गुप्त साम्राज्य का उदय तीसरी सदी के अन्त में, प्रयाग के निकट कौशाम्बी में हुआ। इस वंश का संस्थापक श्रीगुप्त था।

    ❑ गुप्त वंश का वास्तविक संस्थापक चन्द्रगुप्त प्रथम (319-330 ई. तक) को माना जाता है।

    ❑ चन्द्रगुप्त प्रथम ने उस समय के प्रसिद्ध लिच्छवि कुल की कुमारदेवी से विवाह किया था।

    ❑ 319-320 ई. में चन्द्रगुप्त प्रथम ने गुप्त संवत् चलाया था।

    ❑ सर्वप्रथम चन्द्रगुप्त प्रथम ने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की।

    ❑ समुद्रगुप्त को अपना उत्तराधिकारी बनाने के बाद चन्द्रगुप्त ने संन्यास ग्रहण कर लिया।

    ❑ समुद्रगुप्त 330 ई. में राजगद्दी पर बैठा। अनेक विद्वान समुद्रगुप्त की तिथि 335-380 ई. मानते हैं।

    ❑ अनेक विद्वान समुद्रगुप्त की तिथि 335-380 ई. मानते हैं। समुद्रगुप्त सम्राट अशोक के विपरीत आक्रमणकारी एवं साम्राज्यवादी शासक था।

    ❑ समुद्रगुप्त का दरबारी कवि हरिषेण था।

    ❑ इलाहाबाद में स्थित प्रयाग प्रशस्ति की रचना हरिषेण ने की थी।

    ❑ प्रयाग प्रशस्ति से समुद्रगुप्त के विषय में जानकारी मिलती है कि उसने अश्वमेध यज्ञ किया, धरणिबन्ध (पृथ्वी को बाँधना) अपना लक्ष्य बनाया।

    ❑ समुद्रगुप्त ने गरुड़, व्याघ्रहन्ता, धनुर्धर, परशु, अश्वमेध एवं वीणाधारी 6 प्रकार की स्वर्ण मुद्रायें जारी करवाई।

    ❑ समुद्रगुप्त ने उत्तर भारत (आर्यावर्त) के नौ शासकों को पराजित किया।

    ❑ विन्सेंट स्मिथ ने समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन कहा था।

    ❑ समुद्रगुप्त के सिक्कों पर उसे वीणा बजाते हुए चित्रित किया गया है तथा कविराज की उपाधि प्रदान की गई है।

    ❑ श्रीलंका के शासक मेघवर्मन ने समुद्रगुप्त से गया में एक बौद्ध मन्दिर बनाने की अनुमति मांगी थी।

    ❑ समुद्रगुप्त के बाद राजगद्दी पर चन्द्रगुप्त द्वितीय (380-415 ई.) बैठा था।

    ❑ भारतीय इतिहास में 14 विक्रमादित्य हुए जिनमे से सबसे विख्यात चन्द्रगुप्त द्वितीय (चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य) हैं।

    ❑ शकों को पराजित करने की स्मृति में चन्द्रगुप्त द्वितीय ने विशेष चाँदी के सिक्के जारी किये तथा शाकारि उपाधि धारण किये।

    ❑ चन्द्रगुप्त द्वितीय ने अपनी पुत्री प्रभावती गुप्त का विवाह वाकाटक नरेश रुद्रसेन से किया।

    ❑ रुद्रसेन की मृत्यु के बाद चन्द्रगुप्त द्वितीय ने अपनी दूसरी राजधानी उज्जैन में बनाई।

    ❑ चन्द्रगुप्त द्वितीय का अन्य नाम देवगुप्त, देवराज, देवश्री तथा उपाधियाँ विक्रमांक, विक्रमादित्य, परमभागवत थी।

    ❑ चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासन काल में चीनी यात्री फाह्यान भारत आया था।

    ❑ चन्द्रगुप्त द्वितीय का सन्धिविग्रहिक वीरसेन शैव था।

    ❑ चन्द्रगुप्त द्वितीय के बाद कुमारगुप्त महेन्द्रादित्य (415-455 ई.) राजगद्दी पर बैठा।

    ❑ कुमारगुप्त की 623 मुद्रायें बयाना-मृद्भाण्ड से मिली हैं।

    ❑ कुमारगुप्त की मयूर मुद्रा विशेष शैली की थी। कुमार गुप्त के सिक्कों से पता चलता है कि उसने अश्वमेध यज्ञ किया था।

    ❑ कुमार गुप्त ने श्री महेन्द्र, महेन्द्रादित्य तथा अश्वमेध महेन्द्र की उपाधियाँ, धारण की।

    ❑ ह्वेनसांग के अनुसार नालंदा बौद्ध विहार का निर्माण शक्रादित्य ने कराया। जिसकी पहचान कुमारगुप्त से की गई है।

    ❑ पुष्यमित्र जातियों के विद्रोह की जानकारी स्कन्दगुप्त के भितरी स्तम्भ लेख (गाजीपुर) से मिलती है।

    ❑ नालन्दा विश्वविद्यालय की स्थापना कुमारगुप्त ने की थी। इस विश्वविद्यालय को ऑक्सफोर्ड ऑफ महायान बौद्ध कहा जाता है।

    ❑ कुमारगुप्त बाद स्कन्दगुप्त (455-467 ई.) राजगद्दी पर बैठा। स्कन्दगुप्त को गद्दी पर बैठते ही हूणों के आक्रमण का सामना करना पड़ा।

    ❑ जूनागढ़ अभिलेख में हूणों को म्लेच्छ कहा गया है।

    ❑ गिरनार पर्वत पर स्थित सुदर्शन झील का पुनर्निर्माण स्कन्दगुप्त ने करवाया।

    ❑ स्कन्दगुप्त को शक्रापम, देवराय एवं श्रीपरिक्षिप्तवृक्षा नाम के सम्बोधनों से सम्बोधित किया गया है।

    ❑ कहौम अभिलेख से विदित है कि स्कंदगुप्त की उपाधि शक्रादित्य था।

    ❑ स्कन्दगुप्त की स्वर्ण मुद्राओं पर क्रमादित्य उपाधि मिलती है।

    ❑ स्कन्दगुप्त ने सुदर्शन झील के पुनर्निर्माण का कार्य गवर्नर पर्णदत्त के पुत्र चक्रपालित को सौंपा था।

    ❑ सुदर्शन झील के किनारे विष्णु मन्दिर चक्रपालित ने बनवाया।

    ❑ हूणों का महत्त्वपूर्ण शासक तोरमाण था। तोरमाण का पुत्र मिहिरकुल था।

    ❑ मिहिरकुल को यशोधर्मन ने 532 ई. में पराजित किया था।

    ❑ गुप्तवंश का अन्तिम शासक विष्णुगुप्त था।

    ❑ प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त को पृथ्वी पर शासन करने वाला ईश्वर का प्रतिनिधि कहा गया है।

    ❑ पदाधिकारियों के सर्वश्रेष्ठ वर्ग को कुमारामात्य कहा जाता था।

    ❑ वेतन की अदायगी भूमि अनुदान के रूप में होती थी।

    ❑ गुप्तकाल में भू-राजस्व से 1/4 से 1/6 भाग लिया जाता था।

    ❑ नगर का मुख्य अधिकारी पुरपाल होता था।

    ❑ मंदसौर अभिलेख से रेशम बुनकरों की श्रेणी द्वारा विशाल सूर्यमन्दिर के निर्माण का उल्लेख मिलता है।

    ❑ सभी व्यापारिक मार्ग उज्जैन में आकर मिलते थे।

    ❑ सर्वाधिक स्वर्ण सिक्के गुप्तों ने ही जारी किये। इन सिक्कों को दीनार कहा जाता था। उल्लेखनीय है सर्वाधिक शुद्ध सोने के सिक्के कुषाणों के थे।

    ❑ गुप्तकाल में वस्त्र उद्योग सबसे महत्त्वपूर्ण था। घोड़ों का आयात बैक्ट्रिया से होता था।

    ❑ गुप्तकाल में आय-व्यय, लेखन कार्य करने वालों को कायस्थ कहा गया। जिसका सर्वप्रथम उल्लेख याज्ञवल्क्य ने किया है।

    ❑ प्रथम सती होने का प्रमाण 510 ई. के एरण अभिलेख से मिलता है।

    ❑ गुप्त शासकों का व्यक्तिगत धर्म वैष्णव धर्म था।

    ❑ गुप्त वंश का राजकीय चिह्न गरुड़ था।

    ❑ वैष्णव एवं शैव धर्म के मध्य समन्वय गुप्तकाल में स्थापित हुआ।

    ❑ गुप्त राजाओं ने परमभागवत धार्मिक उपाधि धारण की।

    ❑ स्कन्दगुप्त का जूनागढ़ अभिलेख एवं बुद्धगुप्त का एरण अभिलेख विष्णु स्तुति से शुरू हुआ है।

    ❑ चन्द्रगुप्त द्वितीय ने विष्णुपद पर्वत पर विष्णुध्वज की स्थापना की।

    ❑ वैष्णव धर्म का प्रधान अंग अवतारवाद था।

    ❑ शिव के अर्द्धनारीश्वर रूप की मूर्तियाँ गुप्तकाल में बनाई गई।

    ❑ गुप्तकाल में ही त्रिमूर्ति के अन्तर्गत ब्रह्मा, विष्णु और महेश की पूजा आरंभ हुई।

    ❑ गुप्तकालीन मन्दिर कला का सर्वोत्तम उदाहरण देवगढ़ का दशावतार मन्दिर (सर्वप्रथम शिखर का प्रयोग) है।

    ❑ अजन्ता की गुफाएँ गुप्तकाल की हैं।

    ❑ गुप्तकाल को संस्कृत साहित्य का स्वर्णकाल कहा जाता है क्योंकि इसी काल में कालिदास एवं अन्य संस्कृत विद्वानों ने अधिकांश संस्कृत साहित्य की रचना की।

    ❑ आर्यभट्ट गुप्तकाल के सबसे बड़े गणितज्ञ थे। उनकी रचना का नाम आर्यभट्टीयम है।

    ❑ सर्वाधिक भूमि अनुदान गुप्तकाल में दिया गया।

    ❑ गुप्त काल ब्राह्मण धर्म के पुनरुत्थान का काल माना जाता है।

    ❑ रामायण तथा महाभारत के अंतिम रूप का संपादन गुप्त काल में ही हुआ था।

    ❑ गुप्त काल में दास प्रथा विद्यमान थी।

    ❑ नारद ने 15 प्रकार के दासों का उल्लेख किया है, जबकि मनु ने 7 प्रकार के।

    ❑ मंदसौर अभिलेख से कुमारगुप्त-I के शासन का वर्णन प्राप्त होता है।

    ❑ तुमुन अभिलेख में कुमारगुप्त-I को शरदकालीन सूर्य कहा गया है।

    ❑ सबसे अधिक अभिलेख (18) कुमारगुप्त-I के मिले हैं।

    ❑ स्कन्दगुप्त का भितरी अभिलेख (गाजीपुर) हूणों द्वारा आक्रमण की जानकारी देता है।

    ❑ तोरमण, मिहिरकुल प्रसिद्ध हूण राजा थे।

    ❑ कहौम स्तम्भलेख में स्कन्दगुप्त को शक्रोपम तथा जूनागढ़ अभिलेख में श्रीपरिक्षिप्तवृक्षा कहा गया है।

  • गुप्त काल MCQ प्रश्न | SSC

    2. गुप्त राजवंश किस लिए प्रसिद्ध था ?
    (a) कला एवं स्थापत्य
    (b) साम्राज्यवाद
    (c) राजस्व एवं भूमि सुधार
    (d) साहित्यिक कार्यों का संरक्षण
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2001
    उत्तर-(a)
    गुप्त राजवंश कला एवं स्थापत्य के लिए प्रसिद्ध था। गुप्त काल में काल की विविध विधाओं जैसे वस्तु स्थापत्य, चित्रकला, मृद्भांड कला आदि में अभूतपूर्व प्रगति देखने को मिलती है। गुप्तकालीन महत्त्वपूर्ण मंदिर हैं- विष्णु मंदिर (तिगवा, जबलपुर, गध्य प्रदेश), शिव मंदिर (भूमरा, नागोद मध्य प्रदेश), पार्वती मंदिर (नचना कुठार, मध्य प्रदेश), दशावतार मंदिर, ( देवगढ़ झांसी, उत्तर प्रदेश), शिव मंदिर (खोह, नागौद, मध्य प्रदेश), भीतरगांव का ईंटों द्वारा निर्मित लक्ष्मण मंदिर (कानपुर, उत्तर प्रदेश) अजन्ता चित्रकला में गुफा संख्या 16 एवं 17 गुप्तकालीन है। अजन्ता के चित्र तकनीकि दृष्टि से विश्व में प्रथम स्थान रखते हैं।
    3. गुप्त युग का प्रवर्तक कौन था?
    (a) घटोत्कच
    (b) श्रीगुप्त
    (c) चन्द्रगुप्त
    (d) समुद्रगुप्त
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2000
    उत्तर-(c)
    गुप्त युग का प्रवर्तक चन्द्रगुप्त प्रथम था। चन्द्रगुप्त प्रथम द्वारा ही गुप्त सवंत (319 ई.) चलाया गया था।
    4. महरौली में जंग-रहित लौह स्तम्भ किसने स्थापित किया?
    (a) गुप्त
    (b) सातवाहन
    (c) गौर्य
    (d) कुषाण
    S.S.C. स्टेनोग्राफर (ग्रेड-‘सी’ एवं ‘डी’) परीक्षा, 2012
    उत्तर-(a)
    महरौली का लौह-स्तम्भ गुप्त शासक चन्द्रगुप्त द्वितीय ने बनवाया था। दक्षिण दिल्ली में महरौली स्थित लौह स्तम्भ में चन्द्र नामक शासक की विजयों का उल्लेख है। यह स्तम्भ गुप्तकालीन धातु-विज्ञान (metallurgy) के समुन्नत होने का ज्वलंत प्रमाण है।
    5.’गुप्त’ राजा जिसने ‘विक्रमादित्य’ की पदवी ग्रहण की थी, वह था-
    (a) स्कन्दगुप्त
    (b) समुद्रगुप्त
    (c) चन्द्रगुप्त-II
    (d) कुमारगुप्त
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2002, 2006
    उत्तर-(c)
    चन्द्रगुप्त द्वितीय को विक्रमांक या ‘विक्रमादित्य’ कहा जाता है। इसकी माता का नाम दत्तदेवी था। इसका काल गुप्तकाल का स्वर्णयुग माना जाता है।
    6.चन्द्रगुप्त द्वितीय और किस नाम से जाना जाता था?
    (a) समुद्रगुप्त
    (b) स्कंदगुप्त
    (c) विक्रमादित्य
    (d) राणा गुप्त
    S.S.C. संयुक्त हायर सेकण्डरी (10+2) स्तरीय परीक्षा, 2010
    उत्तर-(c)
    उपर्युक्त प्रश्न की व्याख्या देखें।
    7.गुप्त वंश का वह राजा कौन था जिसने हूणों को भारत पर आक्रमण करने से रोका ?
    (a) कुमारगुप्त
    (b) समुद्रगुप्त
    (c) स्कन्दगुप्त
    (d) चन्द्रगुप्त
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2002
    उत्तर-(c)
    हूणों तथा स्कन्दगुप्त के बीच युद्ध 445-467 ई. के बीच हुआ था। हूण पश्चिमोत्तर चीन में रहने वाली एक बर्बर तथा आततायी जाति थी। स्कन्दगुप्त ने अत्यावारी हूणों को परास्त कर न केवल गुप्त साम्राज्य की रक्षा की, बल्कि आर्य सभ्यता एवं संस्कृति को भी नष्ट होने से बचाया।
    8.गुप्त काल के चांदी के सिक्कों को कहते थे-
    (a) दीनार
    (b) रूप्यक
    (c) शतमान
    (d) कर्षापण
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 2006
    उत्तर-(b)
    गुप्तकालीन सोने के सिक्कों को दीनार एवं चांदी के सिक्कों को रूप्यक कहा जाता था।
    9. हरिषेण निम्नलिखित राजाओं में से किसका राजकवि था?
    (a) अशोक
    (b) समुद्रगुप्त
    (c) चंद्रगुप्त
    (d) हर्षवर्धन
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2006
    उत्तर-(b)
    हरिषेण समुद्रगुप्त का राज कवि था। हरिषेण ने ‘इलाहाबाद-प्रशस्ति’ लेख की रचना की। समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन कहा जाता है। इन्होंने ‘अश्वमेधकर्ता’ की उपाधि धारण किया था तथा इन्हें ‘कविराज’ भी कहा जाता था।
    10. लिच्छवी दौहित्र किसे कहते थे?
    (a) चन्द्रगुप्त I को
    (b) स्कंदगुप्त को
    (c) कुमारगुप्त को
    (d) समुद्रगुप्त को
    S.S.C. संयुक्त स्नातक स्तरीय (Tier-I) परीक्षा, 2013
    उत्तर-(d)
    लिच्छवी दौहित्र समुद्रगुप्त को कहते हैं। समुद्रगुप्त के प्रयाग अभिलेख में उसे ‘लिच्छवी दौहित्र’ (लिच्छवी कन्या से उत्पन्न) बताया गया है। समुद्रगुप्त की माता का नाम कुमारदेवी था।
    11. रोमन साम्राज्य के साथ भारत का व्यापार रोम पर किसके द्वारा आक्रमण के साथ समाप्त हो गया?
    (a) अरबों द्वारा
    (b) हंगेरियाइयों द्वारा
    (c) हूणों द्वारा
    (d) तुर्की द्वारा
    S.S.C. CPO परीक्षा, 2006
    उत्तर-(c)
    रोमन साम्राज्य के साथ भारत का व्यापार रोम पर हूणों द्वारा आक्रमण के साथ समाप्त हो गया।
    12. निम्न में किनके सिक्के संगीत के प्रति उनका प्रेम दर्शाते हैं?
    (a) मौर्यों के
    (b) नन्दों के
    (c) गुप्तों के
    (d) चोलों के
    S.S.C. संयुक्त हायर सेकण्डरी (10+2) परीक्षा, 2011
    उत्तर-(c)
    समुद्रगुप्त के कुछ सिक्कों पर उसे वीणावादन करते हुए दिखाया गया है। अतः गुप्तों के सिक्के संगीत के प्रति उनके प्रेम को प्रदर्शित करते हैं।
    13. निम्नलिखित में से किसको अपनी विजयों के कारण भारत का नेपोलियन कहा जाता है ?
    (a) स्कन्दगुप्त को
    (b) चन्द्रगुप्त को
    (c) ब्रह्मगुप्त को
    (d) समुद्रगुप्त को
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2002
    S.S.C. स्टेनोग्राफर परीक्षा, 2010
    S.S.C. CPO परीक्षा, 2004
    उत्तर-(d)
    समुद्रगुप्त ने अपने शासन के दौरान (335-375 ई.) कई युद्धों का सामना किया परन्तु उसे किसी भी युद्ध में पराजय का सामना नहीं करना पड़ा। इसी कारण प्रसिद्ध इतिहासकार विसेंट स्मिथ ने उसे ‘भारत का नेपोलियन’ की संज्ञा दी है।
    14. भारतीय संस्कृति का ‘स्वर्ण युग’ था-
    (a) मौर्य काल
    (b) राजपूत काल
    (c) चोल काल
    (d) गुप्त काल
    S.S.C. (लोअर डिवीजन क्लर्क) परीक्षा, 2005
    उत्तर-(d)
    भारतीय संस्कृति का स्वर्ण युग गुप्त काल को माना जाता है।
    15. गुप्तकाल में किस धातु के सर्वाधिक सिक्के जारी किए गए?
    (a) सोना
    (b) चांदी
    (c) तांबा
    (d) लोहा
    S.S.C. (डाटा एंट्री ऑपरेटर) परीक्षा, 2008
    उत्तर-(a)
    प्राचीन भारत के गुप्त राजाओं ने सबसे अधिक स्वर्णमुद्राएं जारी की, जो उनके अभिलेखों में दीनार कही गई हैं। नियन्त्रित आकार और भार वाली ये स्वर्ण मुद्राएं अनेक प्रकारों और उपप्रकारों में पायी जाती हैं। यद्यपि स्वर्णाश में ये मुद्राएं उतनी शुद्ध नहीं हैं। जितनी कुषाण मुद्राएं। कुषाणों के विपरीत गुप्तों के तांबे के सिक्के बहुत ही कम मिलते हैं। इससे यह प्रकट होता है कि जनसामान्य में मुद्रा का प्रयोग जितना कुषाणों के समय होता था उतना अब नहीं रहा।
    16. प्रसिद्ध गुप्त संवत् निम्नलिखित में से किस वर्ष से शुरू किया गया था ?
    (a) 319 ईस्वी
    (b) 600 ईस्वी
    (c) 78 ईस्वी
    (d) 57 ई. पू.
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2008
    उत्तर-(a)
    प्रसिद्ध गुप्त संवत् 319 ईस्वी से शुरू किया गया था। यही चन्द्रगुप्त | के राज्यारोहण की तिथि भी है।
    17. कवि कालिदास किसके राजकवि थे?
    (a) चन्द्रगुप्त मौर्य
    (b) समुद्रगुप्त
    (c) चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य
    (d) हर्ष
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 1999
    उत्तर-(c)
    कालिदास संस्कृत साहित्य के महान कदि थे। ये चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के राजकवि थे। इनकी महत्त्वपूर्ण कृतियाँ हैं-ऋतुसंहार, मेघदूतम्, कुमारसंभवम् एवं रघुवंशम् कालिदास की सर्वोत्कृष्ट कृति उनका नाटक ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ है। इसके अतिरिक्त इन्होंने मालविकाग्निमिन्नम्, विक्रमोर्वशीयन् नाटक की भी रचना की है।
    18. इलाहाबाद स्तंभ के शिलालेख में किसकी उपलब्धियां वर्णित हैं?
    (a) हर्ष
    (b) अशोक
    (c) समुद्रगुप्त
    (d) चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2008
    उत्तर-(c)
    इलाहाबाद स्तंभ के शिलालेख में समुद्रगुप्त की उपलब्धियों का वर्णन है। इसकी रचना समुद्रगुप्त के संधिविग्रहिक हरिषेण ने की थी। इस स्तम्भ लेख की प्रारंभिक पंक्तियां पद्यात्मक तथा बाद की गद्यात्मक है। यह संस्कृत की चम्पू शैली का सुन्दर उदाहरण है।
    19. गुप्त शासन के दौरान निम्नलिखित में से ऐसा व्यक्ति कौन था, जो एक महान् खगोल विज्ञानी तथा गणितज्ञ था?
    (a) भानुगुप्त
    (b) वागभट्ट
    (c) आर्यभट्ट
    (d) वराहमिहिर
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2002
    उत्तर-(c)
    गुप्त शासन के दौरान आर्यभट्ट एक महान खगोल विज्ञानी तथा गणितज्ञ थे। केरल राज्य में 5वीं सदी में में जन्में आर्यभट्ट ने कुसुमपुर (पटना) अपना ज्यादातर समय पटना के ‘तारेगना’ में बिताया।
    20. फाहियान किसके शासन काल के दौरान भारत आया था ?
    (a) चंद्रगुप्त द्वितीय
    (b) समुद्रगुप्त
    (c) रामगुप्त
    (d) कुमारगुप्त
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 2011
    S.S.C. CPO परीक्षा, 2008
    उत्तर-(a)
    फाहियान ने भारत में 399-414 ई. के बीच भ्रमण किया, इस समय उत्तर भारत में गुप्त सन्नाज्य का राबरो प्रतापी राजा चन्द्रगुप्त द्वितीय शासन कर रहा था।
    21. निम्नलिखित में से कौन-सी साहित्यिक रचना शास्त्रीय संस्कृत साहित्य से संबंधित है ?
    (a) धम्मपद’
    (b) ‘वेद’
    (c) मेघदूतम्’
    (d) दीर्घनिकाय’
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 2005
    उत्तर-(c)
    कालिदास का मेघदूतम शास्त्रीय संस्कृत साहित्य से संबंधित है। इनके अन्य ग्रंथ – मालविकाग्निमित्रम, अभिज्ञानशाकुन्तलम् आदि हैं। इनका काल गुप्तकाल माना जाता है।
    22. गुप्त शासकों की सरकारी (दरवारी) भाषा थी-
    (a) पालि
    (b) प्राकृत
    (c) हिन्दी
    (d) संस्कृत
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2002
    उत्तर-(d)
    शासकों की सरकारी (दरबारी) भाषा संस्कृत थी।
    23. निम्नलिखित में से वह व्यक्ति कौन है जो चिकित्सक नहीं है ?
    (a) सुश्रुत
    (b) चरक
    (c) चार्वाक
    (d) धनवंतरी
    S.S.C. संयुक्त हायर सेकण्डरी (10+2) स्तरीय परीक्षा, 2011
    उत्तर-(c)
    सुश्रुत, चरक और धनवंतरी प्राचीन भारत के आयुर्वेद के प्रमुख ज्ञाता और चिकित्सक थे। चार्वाक चिकित्सक नहीं थे, बल्कि वे अपने भौतिकवादी दर्शन के लिए जाने जाते हैं।
    24. प्राचीन भारत के विख्यात चिकित्सक धन्वंतरि ने अपना परामर्श किसके दरवार में दिया था ?
    (a) समुद्रगुप्त
    (b) अशोक
    (c) चंद्रगुप्त द्वितीय
    (d) कनिष्क
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 2006
    उत्तर-(c)
    धन्वंतरि चंद्रगुप्त II या विक्रमादित्य के दरबार के आयुर्वेदाचार्य थे। चन्द्रगुप्त-II के दरबार में रहने वाले कुछ प्रमुख विद्धानों के नाम इस प्रकार थे – कालिदास, बेतालभट्ट, वराहमिहिर, वररुची, अमरसिंह, शंकु, घटकर्पर आदि।
    25. शून्य की खोज किसने की?
    (a) वराहमिहिर
    (b) आर्यभट्ट
    (c) भास्कर
    (d) उपरोक्त में से कोई नहा
    S.S.C. मैट्रिक स्तर परीक्षा, 2001
    उत्तर-(b)
    शून्य की खोज आर्यभट्ट ने की थी। इनका प्रसिद्ध ग्रंथ ‘आर्यभट्टीय है। भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलवेत्ता आर्यभट्ट ने कहा ‘स्थान स्थानं दसा गुणम्’ अर्थात दस गुना करने के लिए उसके आगे शून्य रखो।
    26. वराहमिहिर क्या हैं?
    (a) अंतरिक्ष यात्री
    (b) अंतरिक्ष शटल
    (c) पावर स्टेशन
    (d) एक प्राचीन खगोलज्ञ
    S.S.C. संयुक्त हायर सेकण्डरी (10+2) स्तरीय परीक्षा, 2011
    उत्तर-(d)
    वराहमिहिर भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलज्ञ थे।
    27. अजन्ता की चित्रकारी में क्या निरूपित किया गया है?
    (a) रामायण
    (b) महाभारत
    (c) जातक
    (d) पंचतंत्र
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 2002
    S.S.C. मैट्रिक स्तरीय परीक्षा, 1999
    उत्तर-(c)
    अजन्ता की चित्रकारी में जातक कथाओं को रेखांकित किया गया है। यहाँ के सभी चित्रों के विषय किसी न किसी रूप में गौतम बुद्ध या बोधिसत्वों की जीवन कथाओं से जुड़े हैं। अजन्ता गुफाएँ महाराष्ट्र में औरंगाबाद से 104 किमी. उत्तर-पूर्व में स्थित हैं। इनका समय दूसरी सदी ई. पू. से सातवीं सदी ईस्वी तक है।
    28. अजन्ता चित्रकारी की विषय वस्तु निम्नलिखित में से किससे सम्बन्धित है ?
    (a) जैन धर्म
    (b) बौद्ध धर्म
    (c) वैष्णव मत
    (d) शैव मत
    S.S.C. स्नातक स्तरीय परीक्षा, 2002
    उत्तर-(b)
    अजन्ता चित्रकारी की विषय-वस्तु बौद्ध धर्म से संबंधित है और यहाँ के सभी चित्र किसी न किसी रूप में बुद्ध एवं बोधिसत्वों की जीवन कथाओं से जुड़े हुए हैं।
  • गुप्त साम्राज्य MCQ प्रश्न | UPSC

    1. प्रयाग प्रशस्ति किसके सैन्य अभियान के बारे में जानकारी देती है?
    (a) चंद्रगुप्त प्रथम
    (b) समुद्रगुप्त
    (d) कुमारगुप्त
    (c) चंद्रगुप्त द्वितीय
    U.P. Lower Sub. (Pre) 2004
    उत्तर-(b)
    प्रयाग प्रशस्ति समुद्रगुप्त के सैन्य अभियानों का विस्तृत वर्णन करती है। यह प्रशस्ति इलाहाबाद के अशोक स्तंभ पर उत्कीर्ण है और इसकी रचना समुद्रगुप्त के दरबारी कवि एवं संधिविग्रहिक हरिषेण ने संस्कृत में की थी। इसमें समुद्रगुप्त द्वारा उत्तर भारत के 9 राजाओं और दक्षिण भारत के 12 राजाओं को पराजित करने का उल्लेख है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: समुद्रगुप्त एक कुशल वीणावादक भी थे और उनके सिक्कों पर उन्हें वीणा बजाते हुए दर्शाया गया है, जो उनके बहुमुखी व्यक्तित्व का प्रमाण है। उन्होंने ‘कविराज’ की उपाधि भी धारण की थी।
    2. ‘भारत का नेपोलियन’ किसे कहा जाता है ?
    (a) चंद्रगुप्त मौर्य
    (b) चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य
    (c) अशोक महान
    (d) समुद्रगुप्त
    U.P.P.C.S. (Pre) 1990
    Chhttisgarh P.C.S. (Pre) 2005
    U.P. Lower Sub. (Pre) 2009
    उत्तर-(d)
    प्रसिद्ध इतिहासकार विंसेंट स्मिथ ने अपनी पुस्तक ‘अर्ली हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ में समुद्रगुप्त को ‘भारत का नेपोलियन’ कहा है। यह उपाधि उन्हें उनकी अजेय सैन्य विजयों और विशाल साम्राज्य विस्तार के कारण दी गई। समुद्रगुप्त ने अपने पिता चंद्रगुप्त प्रथम से राजगद्दी प्राप्त की और लगभग समूचे भारतीय उपमहाद्वीप में अपना प्रभुत्व स्थापित किया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: समुद्रगुप्त ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया था, जिसका प्रमाण उनके अश्वमेध प्रकार के सोने के सिक्कों से मिलता है। श्रीलंका के राजा मेघवर्ण ने समुद्रगुप्त से बोधगया में एक बौद्ध मठ बनाने की अनुमति मांगी थी, जो उनकी अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा को दर्शाता है।
    3. इलाहाबाद स्तंभ अभिलेख निम्नलिखित में से किस एक से संबद्ध है?
    (a) महापद्मनंद
    (b) चंद्रगुप्त मौर्य
    (c) अशोक
    (d) समुद्रगुप्त
    I.A.S. (Pre) 2006
    उत्तर-(c & d)
    इलाहाबाद का अशोक स्तंभ मूलतः मौर्य सम्राट अशोक से संबंधित है, किंतु इसी स्तंभ पर समुद्रगुप्त के दरबारी कवि हरिषेण ने समुद्रगुप्त की विजयों का संस्कृत में प्रशंसात्मक वर्णन उत्कीर्ण कराया, जिसे ‘प्रयाग प्रशस्ति’ कहते हैं। यह गुप्त काल का सबसे महत्वपूर्ण अभिलेखीय साक्ष्य माना जाता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इसी अशोक स्तंभ पर मुगल सम्राट जहाँगीर का एक फारसी अभिलेख भी उत्कीर्ण है, जिससे यह स्तंभ तीन अलग-अलग कालखंडों — मौर्य, गुप्त और मुगल — का साक्षी है। यह स्तंभ वर्तमान में प्रयागराज के किले में स्थित है।
    4.’परम भागवत’ उपाधि धारण करने वाला प्रथम गुप्त शासक था-
    (a) चंद्रगुप्त प्रथम
    (b) समुद्रगुप्त
    (c) चंद्रगुप्त द्वितीय
    (d) रामगुप्त
    U.P.P.C.S. (Pre) 2015
    उत्तर-(b)
    नालंदा एवं गया के ताम्रपत्र अभिलेखों के आधार पर समुद्रगुप्त को ‘परम भागवत’ उपाधि धारण करने वाला पहला गुप्त शासक माना जाता है। ‘परम भागवत’ का अर्थ है — विष्णु के परम भक्त। उल्लेखनीय है कि कुछ विद्वान और राज्य लोक सेवा आयोग इस उपाधि का श्रेय चंद्रगुप्त द्वितीय को देते हैं, जबकि UGC ने समुद्रगुप्त को इसका प्रथम धारक स्वीकार किया है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्त शासक मूलतः वैष्णव धर्म के अनुयायी थे, परंतु उन्होंने बौद्ध एवं जैन धर्म के प्रति भी सहिष्णुता का भाव रखा। समुद्रगुप्त ने बौद्ध विद्वान वसुबंधु को अपने दरबार में आश्रय दिया था।
    5. निम्नलिखित में से किस गुप्त राजा का एक अन्य नाम देवगुप्त था?
    (a) समुद्रगुप्त
    (b) चंद्रगुप्त द्वितीय
    (c) कुमारगुप्त
    (d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
    U.P.P.C.S. (Mains) 2007
    उत्तर-(b)
    चंद्रगुप्त द्वितीय ‘विक्रमादित्य’ के अनेक नाम अभिलेखों में प्राप्त होते हैं — देवगुप्त, देवराज और देवश्री। उन्होंने शकों को पराजित कर ‘शकारि’ की उपाधि भी धारण की। चंद्रगुप्त द्वितीय का शासनकाल (375-415 ई.) गुप्त साम्राज्य का स्वर्णयुग माना जाता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चंद्रगुप्त द्वितीय के दरबार में नवरत्न थे जिनमें महाकवि कालिदास, आयुर्वेदाचार्य धन्वंतरि और खगोलशास्त्री वराहमिहिर जैसे विद्वान शामिल थे। चीनी यात्री फाह्यान उन्हीं के शासनकाल में भारत आया था और उसने तत्कालीन भारत की सुख-समृद्धि का वर्णन किया है।
    6. गुप्त वंश ने…..अवधि में शासन किया।
    (a) 319-500 ई.
    (b) 319-324 ई.
    (c) 325-375 ई.
    (d) 566-597 ई.
    Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2003
    उत्तर-(a)
    गुप्त वंश का इतिहास लगभग 275 ई. से 550 ई. तक फैला हुआ है। वंश की स्थापना श्रीगुप्त ने की थी, परंतु वास्तविक राजनीतिक शक्ति चंद्रगुप्त प्रथम (319-335 ई.) के समय से प्रारंभ हुई, जिन्होंने ‘महाराजाधिराज’ की उपाधि सर्वप्रथम धारण की। विकल्प (a) इस दृष्टि से सर्वाधिक उपयुक्त है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्त संवत् की शुरुआत 319-320 ई. में चंद्रगुप्त प्रथम के राज्यारोहण के उपलक्ष्य में हुई मानी जाती है। गुप्त काल को भारतीय इतिहास का ‘स्वर्णयुग’ कहा जाता है क्योंकि इस युग में कला, साहित्य, विज्ञान और व्यापार का अभूतपूर्व विकास हुआ।
    7. निम्नलिखित शासकों में से किस एक ने चार अश्वमेघों का संपादन किया था?
    (a) पुष्यमित्र शुंग
    (b) प्रवरसेन प्रथम
    (c) समुद्रगुप्त
    (d) चंद्रगुप्त द्वितीय
    U.P.P.C.S. (Mains) 2003
    U.P.P.C.S. (Mains) 2011
    उत्तर-(b)
    वाकाटक वंश के शक्तिशाली शासक प्रवरसेन प्रथम ने चार अश्वमेध यज्ञों का सफलतापूर्वक आयोजन किया। इसके साथ ही उन्होंने अग्निष्टोम, आप्तोर्याम और वाजपेय जैसे अन्य वैदिक यज्ञ भी संपन्न किए। प्रवरसेन प्रथम ही एकमात्र वाकाटक शासक थे जिन्होंने ‘सम्राट’ की उपाधि धारण की।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वाकाटक वंश के एक अन्य शासक प्रवरसेन द्वितीय ने ‘सेतुबंध’ नामक प्राकृत काव्य की रचना की, जो रावण द्वारा सीता हरण की कथा पर आधारित है। वाकाटक वंश का गुप्त वंश से वैवाहिक संबंध भी था — चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती गुप्त का विवाह वाकाटक राजा रुद्रसेन द्वितीय से हुआ था।
    8. इलाहाबाद का अशोक स्तंभ किसके शासन के बारे में सूचना प्रदान करता है ?
    (a) चंद्रगुप्त मौर्य के
    (b) चंद्रगुप्त प्रथम के
    (c) चंद्रगुप्त द्वितीय के
    (d) समुद्रगुप्त के
    U.P.P.C.S. (Spl) (Mains) 2004
    उत्तर-(d)
    इलाहाबाद का अशोक स्तंभ समुद्रगुप्त के शासनकाल की जानकारी का प्रमुख स्रोत है। इस स्तंभ पर उत्कीर्ण ‘प्रयाग प्रशस्ति’ में समुद्रगुप्त की सैन्य विजयों, राजनीतिक उपलब्धियों और व्यक्तिगत गुणों का वर्णन किया गया है। यह अभिलेख गुप्त काल के इतिहास का आधारभूत स्तंभ माना जाता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इस स्तंभ पर अशोक के अभिलेखों के अतिरिक्त समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति और मुगल सम्राट जहाँगीर का लेख — कुल तीन कालों के अभिलेख एक साथ मिलते हैं। यह पॉलिश किया गया बलुआ पत्थर का स्तंभ लगभग 10.6 मीटर ऊँचा है।
    9.’प्राचीन भारत का नेपोलियन’ किसे कहा जाता है ?
    (a) चंद्रगुप्त मौर्य
    (b) पुष्यमित्र
    (c) कनिष्क
    (d) समुद्रगुप्त
    56th to 59th B.P.S.C. (Pre) 2015
    उत्तर-(d)
    विंसेंट स्मिथ द्वारा समुद्रगुप्त को ‘भारत का नेपोलियन’ एवं ‘प्राचीन भारत का नेपोलियन’ दोनों संज्ञाएं दी गई हैं। यह उपमा उनकी निरंतर विजय अभियानों और असाधारण सैन्य प्रतिभा के कारण दी गई। समुद्रगुप्त ने अपने जीवनकाल में कोई भी युद्ध नहीं हारा, इसीलिए उन्हें यह सम्मान मिला।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: समुद्रगुप्त ने अपनी दिग्विजय के दौरान पराजित राजाओं को मारने के स्थान पर उन्हें पुनः अपने राज्य सौंप दिया, जो उनकी ‘ग्रहण-मोक्षानुग्रह’ नीति कहलाती है। इस नीति के कारण ही दक्षिण भारत के राजाओं को उन्होंने केवल अधीनता स्वीकार करवाई, उनके राज्य नहीं छीने।
    10. प्रथम गुप्त शासक जिसने ‘परम भागवत’ की उपाधि धारण की, वह था –
    (a) चंद्रगुप्त प्रथम
    (b) समुद्रगुप्त
    (c) चंद्रगुप्त द्वितीय
    (d) श्रीगुप्त
    U.P.P.C.S. (Pre) 2009
    उत्तर-(b)
    नालंदा और गया से प्राप्त ताम्रपत्रों के साक्ष्य के आधार पर समुद्रगुप्त को ‘परम भागवत’ उपाधि धारण करने वाला पहला गुप्त शासक स्वीकार किया जाता है। यह उपाधि वैष्णव धर्म के प्रति उनकी गहरी आस्था की द्योतक है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने इसी मत को प्रामाणिक माना है, जबकि U.P. लोक सेवा आयोग ने चंद्रगुप्त द्वितीय को यह श्रेय दिया था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्त काल में वैष्णव धर्म राजधर्म के रूप में प्रतिष्ठित था। इसी काल में दशावतार की अवधारणा का विकास हुआ और विष्णु के दस अवतारों को दर्शाने वाली अनेक मूर्तियाँ तथा मंदिर निर्मित किए गए, जिनमें देवगढ़ का दशावतार मंदिर विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
    11. गुप्त सम्राट, जिसने ‘हूणों’ को पराजित किया, थे-
    (a) समुद्रगुप्त
    (b) चंद्रगुप्त द्वितीय
    (c) स्कंदगुप्त
    (d) रामगुप्त
    53rd to 55th B.P.S.C. (Pre) 2011
    उत्तर-(c)
    स्कंदगुप्त (शासनकाल लगभग 455–467 ई.) गुप्त वंश का वह शासक था जिसने हूणों के प्रबल आक्रमण को सफलतापूर्वक विफल किया। हूणों को परास्त कर उसने साम्राज्य की रक्षा की, किंतु इस संघर्ष ने गुप्त राजकोष को भारी क्षति पहुँचाई।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: स्कंदगुप्त के जूनागढ़ (गिरनार) अभिलेख में हूणों पर उसकी विजय का गर्वपूर्ण उल्लेख है। इसके अतिरिक्त, स्कंदगुप्त ने ‘विक्रमादित्य’ और ‘क्रमादित्य’ की उपाधियाँ भी धारण की थीं, जो उसकी वीरता और विजय का प्रतीक मानी जाती हैं।
    12. दिल्ली की कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद के प्रांगण में उन्नत प्रसिद्ध लौह-स्तंभ किसकी स्मृति में –
    (a) अशोक
    (b) चंद्र
    (c) हर्ष
    (d) अनंगपाल
    U.P.P.C.S. (Pre) 2002
    उत्तर-(b)
    मेहरौली (दिल्ली) स्थित यह विश्वप्रसिद्ध लौह स्तंभ ‘चंद्र’ नामक राजा की स्मृति में निर्मित है, जिसे अधिकांश इतिहासकार गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय से समीकृत करते हैं। यह स्तंभ भगवान विष्णु को समर्पित था और इसके शिखर पर गरुड़ की आकृति थी। चंद्रगुप्त द्वितीय विष्णु के परम भक्त थे, इसीलिए उन्होंने ‘परमभागवत’ की उपाधि ग्रहण की थी।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यह लौह स्तंभ धातुकर्म की दृष्टि से विश्व की अनूठी धरोहर है — लगभग 1,600 वर्षों से खुले वातावरण में रहने के बावजूद इसमें जंग (Rust) नहीं लगी। वैज्ञानिकों के अनुसार, इसमें प्रयुक्त लोहे में फॉस्फोरस की उच्च मात्रा और एक विशेष धातु-परत (Misawite) इसे संक्षारण से बचाती है।
    13. निम्नलिखित कथन पढ़िए-
    1. हरिषेण समुद्रगुप्त के दरबार का प्रसिद्ध कवि था।
    2. उसने ‘देवीचंद्रगुप्तम’ महाकाव्य की रचना की।
    3. वह ‘प्रयाग प्रशस्ति’ का भी रचयिता था। सही उत्तर चुनिए-
    (a) 1, 2 एवं 3 सही हैं
    (b) 1 एवं 2 सही हैं
    (c) 2 एवं 3 सही हैं
    (d) 1 एवं 3 सही हैं।
    Chhattisgarh P.S.C. (Pre) 2017
    उत्तर-(d)
    हरिषेण समुद्रगुप्त के राजदरबार का विद्वान कवि एवं ‘संधिविग्रहिक’ (विदेश मंत्री के समकक्ष) था। उसने इलाहाबाद स्तंभ पर संस्कृत भाषा में समुद्रगुप्त की विजयों और गुणों का वर्णन उत्कीर्ण करवाया, जिसे ‘प्रयाग प्रशस्ति’ कहते हैं। ‘देवीचंद्रगुप्तम’ नाटक हरिषेण की नहीं, बल्कि विशाखदत्त की रचना है, जो रामगुप्त और चंद्रगुप्त द्वितीय से संबंधित है। अतः कथन 1 और 3 सत्य हैं, कथन 2 असत्य है।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: प्रयाग प्रशस्ति गुप्तकालीन संस्कृत साहित्य की उत्कृष्ट रचनाओं में मानी जाती है। इसमें समुद्रगुप्त को ‘कविराज’ भी कहा गया है, जो यह दर्शाता है कि वे स्वयं भी उच्चकोटि के कवि थे। उनकी वीणावादन की प्रतिभा उनके सोने के सिक्कों (वीणाधर प्रकार) पर भी अंकित है।
    14. हूणों ने भारत पर आक्रमण किया था-
    (a) चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में
    (b) कुमारगुप्त प्रथम के शासनकाल में
    (c) स्कंदगुप्त के शासनकाल में
    (d) बुधगुप्त शासनकाल में
    U.P.P.C.S. (Mains) 2006
    उत्तर-(c)
    हूणों का पहला सुसंगठित आक्रमण स्कंदगुप्त के शासनकाल में हुआ। स्कंदगुप्त ने उन्हें बुरी तरह पराजित किया, परंतु इन युद्धों ने गुप्त साम्राज्य की आर्थिक नींव कमजोर कर दी। स्कंदगुप्त के पश्चात 5वीं–6वीं शताब्दी में हूणों ने उत्तर-पश्चिम भारत के बड़े भूभाग पर अधिकार जमा लिया।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: हूण मूलतः मध्य एशिया की खानाबदोश जाति थी। भारत में इनके सबसे क्रूर आक्रमणकारी शासक तोरमाण और उसके पुत्र मिहिरकुल थे, जिन्होंने 6वीं शताब्दी में उत्तर भारत में भारी विनाश किया। अंततः यशोधर्मन (मालवा के शासक) ने मिहिरकुल को पराजित किया।
    15. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए। नीचे दिए कूटों में सही उत्तर का चयन कीजिए।
    सूची-I (दक्षिण भारत के समुद्रगुप्त के समकालीन नरेश) सूची-II (उनके राज्य)
    A. धनंजय 1. अवमुक्त
    B. नीलराज 2. कांची
    C. उग्रसेन 3. कुस्तलपुर
    D. विष्णुगोपा 4. पालक्का
    कूट :
    A B C D
    (a) 1 2 3 4
    (b) 2 1 4 3
    (c) 3 1 4 2
    (d) 4 3 2 1
    U.P.P.C.S. (Pre) 2018
    उत्तर-(c)
    प्रयाग प्रशस्ति में दक्षिणापथ के 12 राज्यों और उनके शासकों का उल्लेख है। सही सुमेलन इस प्रकार है — धनंजय : कुस्तलपुर, नीलराज : अवमुक्त, उग्रसेन : पालक्का, विष्णुगोपा : कांची। समुद्रगुप्त ने इन सभी को पराजित कर पुनः राज्य लौटा दिया, जिसे ‘ग्रहणमोक्षानुग्रह’ नीति कहा जाता है।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: समुद्रगुप्त की दक्षिण भारत नीति को इतिहासकार वी.ए. स्मिथ ने ‘धर्मविजय’ की संज्ञा दी है, जो ‘दिग्विजय’ से भिन्न है। इस नीति का उद्देश्य दक्षिण में प्रत्यक्ष प्रशासन स्थापित करना नहीं, बल्कि साम्राज्यिक प्रभुत्व और प्रतिष्ठा को सुदृढ़ करना था।
    16. समुद्रगुप्त के ‘प्रयाग प्रशस्ति’ में कोसल के शासक का क्या नाम था?
    (a) शिवगुप्त
    (b) सोमेश्वर देव
    (d) महिपाल
    (c) महेंद्र
    Chhattisgarh P.S.C. (Pre) 2017
    उत्तर-(c)
    प्रयाग प्रशस्ति की 19वीं-20वीं पंक्तियों में दक्षिणापथ के 12 राज्यों का वर्णन है, जिनमें कोशल (वर्तमान छत्तीसगढ़ क्षेत्र) के शासक का नाम महेंद्र मिलता है। समुद्रगुप्त ने इन राजाओं को जीतने के बाद ‘ग्रहणमोक्षानुग्रह’ नीति के अंतर्गत उन्हें पुनः स्वतंत्र कर दिया।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: उस काल में ‘कोशल’ राज्य की राजधानी श्रीपुर (वर्तमान सिरपुर, छत्तीसगढ़) थी, जो आगे चलकर शरभपुरीय और सोमवंशी राजाओं के अधीन एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक केंद्र बना। सिरपुर से प्राप्त बौद्ध एवं हिंदू स्मारक इस क्षेत्र की ऐतिहासिक समृद्धि को दर्शाते हैं।
    17. कौन-सा राजवंश हूणों आक्रमण से अत्यंत विचलित हुआ?
    (a) मौर्य
    (b) कुषाण
    (c) गुप्त
    (d) शुंग
    U.P.P.C.S. (Pre) 1993
    उत्तर-(c)
    गुप्त राजवंश को हूणों के आक्रमणों से सर्वाधिक आघात पहुँचा। भले ही स्कंदगुप्त ने प्रारंभिक आक्रमण को विफल किया, किंतु लगातार युद्धों से गुप्त साम्राज्य की सैन्य और आर्थिक शक्ति क्षीण होती गई। इससे गुप्त साम्राज्य के पतन की प्रक्रिया तीव्र हो गई।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: हूणों के आक्रमण के प्रभाव से गुप्तकालीन नालंदा जैसे शिक्षण केंद्रों और नगरीय जीवन को भारी क्षति पहुँची। चीनी यात्री सोंगयुन (518 ई.) ने मिहिरकुल के अत्याचारों का आँखों देखा विवरण अपने यात्रा-वृत्तांत में दर्ज किया है।
    18. ‘पृथिव्या प्रथम वीर’ उपाधि थी-
    (a) समुद्रगुप्त की
    (b) राजेंद्र प्रथम की
    (c) अमोघवर्ष की
    (d) गौतमीपुत्र शातकर्णी की
    U.P.P.C.S(Pre) 2016
    उत्तर-(a)
    समुद्रगुप्त ने अश्वमेध यज्ञ की सफल समाप्ति के पश्चात ‘पृथिव्यामप्रतिरथ’ (पृथ्वी पर जिसका कोई प्रतिद्वंद्वी न हो) की उपाधि धारण की, जिसे सरल भाषा में ‘पृथिव्या प्रथम वीर’ कहा जाता है। इतिहासकार वी.ए. स्मिथ ने उनकी विजयों और बहुमुखी प्रतिभा के कारण उन्हें ‘भारत का नेपोलियन’ की संज्ञा दी।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: समुद्रगुप्त को ‘कविराज’ भी कहा जाता था, क्योंकि वे संगीत और काव्य में भी निपुण थे। उनके स्वर्ण सिक्कों में ‘वीणाधर’ प्रकार के सिक्के इस बात के साक्ष्य हैं कि वे वीणावादन में भी दक्ष थे — एक सम्राट का यह असाधारण गुण इतिहास में विरल है।
    19. समुद्रगुप्त के प्रयाग प्रशस्ति वाले स्तंभ पर निम्नलिखित में से किसका लेख मिलता है ?
    (a) जहांगीर
    (b) शाहजहां
    (c) औरंगजेब
    (d) दारा शिकोह
    U.P.R.O/A.R.O. (Pre) 2016
    उत्तर-(a)
    इलाहाबाद स्तंभ पर समुद्रगुप्त की ‘प्रयाग प्रशस्ति’ के साथ-साथ मुगल सम्राट जहांगीर का एक अभिलेख भी उत्कीर्ण है। इस स्तंभ पर अशोक का लेख, रानी का अभिलेख और जहांगीर का लेख — तीन अलग-अलग कालखंडों के अभिलेख एक साथ उपलब्ध हैं। इसे मूलतः अकबर ने कौशाम्बी से मंगवाकर इलाहाबाद किले में स्थापित कराया था।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यह स्तंभ अशोककालीन स्तंभों में से एक है और इस पर उत्कीर्ण ‘रानी का अभिलेख’ अशोक की पत्नी से संबंधित माना जाता है जिसमें उनके दान-पुण्य का वर्णन है। इस एकल स्तंभ पर तीन अलग-अलग युगों के अभिलेखों का होना इसे भारतीय पुरालेख विज्ञान की दृष्टि से अत्यंत दुर्लभ और बहुमूल्य बनाता है।
    20. निम्नलिखित में से किस गुप्त शासक ने हूणों पर विजय प्राप्त की ?
    (a) चंद्रगुप्त द्वितीय
    (b) कुमारगुप्त प्रथम
    (c) स्कंदगुप्त
    (d) भानुगुप्त
    U.P.P.C.S. (Spl) (Mains) 2004
    उत्तर-(c)
    गुप्त शासकों में स्कंदगुप्त एकमात्र सम्राट था जिसने हूणों को सफलतापूर्वक पराजित किया। उसने सिंधु नदी के तट पर हूणों को निर्णायक युद्ध में हराया। हालाँकि इस विजय के पश्चात भी हूणों के आक्रमण जारी रहे और अंततः गुप्त साम्राज्य के विघटन में सहायक सिद्ध हुए।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: स्कंदगुप्त के भितरी स्तंभ अभिलेख में उसकी हूण विजय का उल्लेख काव्यात्मक शैली में किया गया है। इसमें कहा गया है कि हूणों की आँधी को रोकने के लिए स्कंदगुप्त ने धरती को अपनी भुजाओं का सहारा दिया — यह प्रशस्ति गुप्तकालीन संस्कृत साहित्य का उत्कृष्ट उदाहरण है।
    21. गुप्तकाल में उत्तर भारतीय व्यापार निम्नलिखित में से किस एक पत्तन से संचालित होता था ?
    (a) ताम्रलिप्ति
    (b) भड़ौच
    (c) कल्याण
    (d) काम्बे
    U.P.P.S.C. (R.I.) 2014
    I.A.S. (Pre) 1999
    उत्तर-(a)
    गुप्तकाल में ताम्रलिप्ति (वर्तमान पश्चिम बंगाल का तामलुक) बंगाल की खाड़ी तट पर स्थित एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण बंदरगाह था। यहीं से उत्तर भारत का व्यापार दक्षिण-पूर्व एशिया, श्रीलंका, जावा, सुमात्रा और चीन जैसे देशों के साथ होता था। पश्चिमी भारत का प्रमुख बंदरगाह भृगुकच्छ (भड़ौच) था, जो पश्चिमी देशों से व्यापार का केंद्र था।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: प्रसिद्ध चीनी यात्री फाह्यान ने अपनी भारत यात्रा (399-414 ई.) के दौरान ताम्रलिप्ति से ही समुद्री मार्ग द्वारा श्रीलंका की यात्रा की थी। इससे इस बंदरगाह के अंतरराष्ट्रीय महत्त्व का पता चलता है। गुप्तकाल में ताम्रलिप्ति से निर्यात होने वाली मुख्य वस्तुओं में मलमल, मसाले और हाथीदाँत प्रमुख थे।
    22. किस अभिलेख से ज्ञात होता है कि स्कंदगुप्त ने हूणों को पराजित किया था?
    (a) भितरी स्तंभ-लेख
    (b) इलाहाबाद स्तंभ-लेख
    (c) मंदसौर अभिलेख
    (d) उदयगिरि अभिलेख
    U.P.R.O./A.R.O. (Pre) 2014
    उत्तर-(a)
    उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले की सैदपुर तहसील में स्थित भितरी नामक स्थान से प्राप्त भितरी स्तंभ-लेख में स्कंदगुप्त के पुष्यमित्रों और हूणों के विरुद्ध किए गए युद्धों का विस्तृत वर्णन मिलता है। हूणों का भारत पर पहला आक्रमण स्कंदगुप्त के शासनकाल (455-467 ई.) में हुआ, जिसमें वे स्कंदगुप्त से बुरी तरह परास्त हुए।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: भितरी स्तंभ-लेख में स्कंदगुप्त की तुलना देवराज इंद्र से की गई है और यह प्रशस्ति शैली में लिखा गया है। इसके अतिरिक्त, जूनागढ़ शिलालेख भी स्कंदगुप्त से संबंधित एक महत्त्वपूर्ण अभिलेख है, जिसमें सुदर्शन झील की मरम्मत का उल्लेख है — यह झील गुजरात में स्थित थी।
    23. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर का चयन कीजिए :
    सूची-I(शासक) सूची-II (रानियां)
    A. चंद्रगुप्त 1. दत्तादेवी
    B. समुद्रगुप्त 2. कुबेरनागा
    C. चंद्रगुप्त द्वितीय 3. कुमारदेवी
    D. कुमारगुप्त प्रथम 4. अनन्तदेवी
    कूट :<
    A B C D
    (a) 3 1 2 4
    (b) 2 1 3 4
    (c) 1 2 3 4
    (d) 4 3 2 1
    U.P.B.E.O. (Pre) 2019
    उत्तर-(a)
    गुप्त शासकों और उनकी रानियों का सही सुमेलन निम्नानुसार है — चंद्रगुप्त प्रथम की रानी कुमारदेवी थीं जो लिच्छवि वंश से थीं; समुद्रगुप्त की रानी दत्तादेवी थीं; चंद्रगुप्त द्वितीय की रानी कुबेरनागा थीं जो नागवंश की राजकुमारी थीं; तथा कुमारगुप्त प्रथम की रानी अनन्तदेवी थीं। अतः विकल्प (a) सही उत्तर है।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चंद्रगुप्त प्रथम और लिच्छवि राजकुमारी कुमारदेवी के विवाह को गुप्त वंश के लिए एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक गठबंधन माना जाता है। इस विवाह की स्मृति में चंद्रगुप्त प्रथम ने विशेष “कुमारदेवी-चंद्रगुप्त” स्वर्ण सिक्के चलाए, जो गुप्त इतिहास में किसी रानी के नाम पर जारी पहले सिक्के थे।
    24. ‘शक-विजेता’ किसे जाना जाता है?
    (a) चंद्रगुप्त प्रथम
    (b) समुद्रगुप्त
    (c) चंद्रगुप्त द्वितीय
    (d) कुमारगुप्त
    U.P.U.D.A./ L.D.A. (Pre) 2010
    उत्तर-(c)
    गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय ‘विक्रमादित्य’ को ‘शक-विजेता’ कहा जाता है। उन्होंने पाँचवीं सदी के प्रथम दशक में पश्चिम भारत के अंतिम शक शासक रुद्रसिंह तृतीय को परास्त कर शक सत्ता का उन्मूलन किया। इस उपलब्धि के कारण उन्हें ‘शकारि’ (शकों का शत्रु) की उपाधि भी मिली।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शकों पर विजय के बाद चंद्रगुप्त द्वितीय ने गुजरात और काठियावाड़ के सम्पूर्ण क्षेत्र पर अधिकार कर लिया, जिससे गुप्त साम्राज्य का विस्तार पश्चिमी समुद्र तट तक हो गया और अरब सागर के बंदरगाहों से व्यापार पर नियंत्रण स्थापित हुआ। उन्होंने अपनी राजधानी पाटलिपुत्र से उज्जयिनी भी स्थानांतरित की।
    25. ईसा की तीसरी शताब्दी से, जबकि हूण आक्रमण से रोमन साम्राज्य समाप्त हो गया, भारतीय व्यापारी अधिकाधिक निर्मर हो गए-
    (a) अफ्रीकी व्यापार पर
    (b) पश्चिमी-यूरोपीय व्यापार पर
    (c) दक्षिण-पूर्व एशियाई व्यापार पर
    (d) मध्य-पूर्वी व्यापार पर
    I.A.S. (Pre) 1999
    उत्तर-(c)
    ईसा की तीसरी शताब्दी में हूणों के आक्रमण से रोमन साम्राज्य के पतन के बाद भारत का पश्चिमी व्यापार बुरी तरह प्रभावित हुआ। इसके परिणामस्वरूप भारतीय व्यापारी दक्षिण-पूर्व एशिया — जिसमें वर्तमान इंडोनेशिया, मलेशिया, वियतनाम, कम्बोडिया आदि क्षेत्र शामिल हैं — के साथ व्यापार पर अधिकाधिक निर्भर होते गए।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इसी काल में भारतीय संस्कृति, धर्म और भाषा का दक्षिण-पूर्व एशिया में व्यापक प्रसार हुआ, जिसे इतिहासकार ‘भारतीयकरण’ (Indianization) की प्रक्रिया कहते हैं। कम्बोडिया का ‘फूनान राज्य’ और इंडोनेशिया के प्रारंभिक हिंदू-बौद्ध राज्य इसी भारतीय सांस्कृतिक प्रसार के उदाहरण हैं।
    26. निम्नलिखित में से कौन सही सुमेलित नहीं है?
    (a) कुमारगुप्त I मंदसौर अभिलेख
    (b) पतिक तक्षशिला अभिलेख
    (c) प्रभावती गुप्ता उदयगिरि गुहा अभिलेख
    (d) समुद्रगुप्त एरण अभिलेख
    U.P.P.C.S. (Mains) 2017
    उत्तर-(c)
    प्रश्न में दिए गए विकल्पों में ‘प्रभावती गुप्ता – उदयगिरि गुहा अभिलेख’ सुमेल सही नहीं है, क्योंकि उदयगिरि गुहा अभिलेख चंद्रगुप्त द्वितीय से संबंधित है। प्रभावती गुप्ता का उदयगिरि से कोई अभिलेख प्राप्त नहीं हुआ है। शेष सुमेलन सही हैं — कुमारगुप्त I का मंदसौर अभिलेख, पतिक का तक्षशिला अभिलेख और समुद्रगुप्त का एरण अभिलेख।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: प्रभावती गुप्ता चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री थीं जिनका विवाह वाकाटक राजा रुद्रसेन द्वितीय से हुआ था। उनके पति की अल्पायु में मृत्यु के बाद प्रभावती गुप्ता ने वाकाटक साम्राज्य की प्रभावशाली शासक के रूप में राज्य संचालन किया और उनके अनेक स्वतंत्र ताम्रपत्र अभिलेख महाराष्ट्र क्षेत्र से प्राप्त हुए हैं।
    27. रजत सिक्के जारी करने वाला प्रथम गुप्त शासक था-
    (a) चंद्रगुप्त प्रथम
    (b) समुद्रगुप्त
    (c) चंद्रगुप्त द्वितीय
    (d) कुमारगुप्त
    U.P. U.D.A./L.D.A. (Spl) (Mains) 2010
    उत्तर-(c)
    गुप्त वंश में रजत (चांदी) के सिक्के जारी करने वाले पहले शासक चंद्रगुप्त द्वितीय ‘विक्रमादित्य’ थे। गुप्त काल में इन रजत सिक्कों को ‘रुप्यक’ या ‘रुपक’ कहा जाता था। चंद्रगुप्त द्वितीय ने शक मुद्राओं के अनुकरण पर ये रजत मुद्राएं चलाईं, क्योंकि शकों पर विजय के बाद पश्चिमी भारत के व्यापारिक क्षेत्रों में रजत मुद्राओं की परंपरा प्रचलित थी।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्त काल में सोने के सिक्कों को ‘दीनार’ कहा जाता था और ये अत्यंत उच्च कोटि के थे। समुद्रगुप्त के स्वर्ण सिक्कों पर उन्हें वीणा वादन करते हुए दर्शाया गया है, जो उनकी संगीत प्रियता का प्रमाण है। गुप्त काल को उनके उत्कृष्ट मुद्राशास्त्रीय योगदान के लिए भी जाना जाता है।
    28. इनमें से किस गुप्त शासक ने हूणों को पराजित किया था?
    (a) समुद्रगुप्त
    (b) चंद्रगुप्त II
    (c) कुमारगुप्त
    (d) स्कंदगुप्त
    U.P. Lower (Pre) 2015
    उत्तर-(d)
    स्कंदगुप्त (शासनकाल लगभग 455-467 ई.) वह गुप्त सम्राट थे जिन्होंने हूणों को भारत में प्रवेश करने से रोका और उन्हें बुरी तरह पराजित किया। यह जानकारी भितरी स्तंभ-लेख से प्राप्त होती है। स्कंदगुप्त की इस जीत ने कुछ समय के लिए हूणों के भारत आक्रमण को थाम दिया।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: हूण मध्य एशिया की एक खानाबदोश जाति थी जिन्होंने 4थी-5वीं शताब्दी में रोमन साम्राज्य और गुप्त साम्राज्य दोनों को चुनौती दी। स्कंदगुप्त की मृत्यु के पश्चात् गुप्त साम्राज्य कमजोर पड़ता गया और तोरमाण तथा मिहिरकुल जैसे हूण शासकों ने उत्तर भारत में अपना शासन स्थापित कर लिया, जिसने गुप्त साम्राज्य के पतन को त्वरित किया।
    29. प्रसिद्ध चीनी यात्री फाह्यान ने किसके शासनकाल में भारत की यात्रा की ?
    (a) चंद्रगुप्त I
    (b) चंद्रगुप्त II
    (c) रामगुप्त
    (d) श्रीगुप्त
    63rd B.P.S.C. (Pre) 2017
    उत्तर-(b)
    प्रसिद्ध चीनी बौद्ध यात्री फाह्यान ने लगभग 399 ई. से 414 ई. के बीच भारत की यात्रा की, जो चंद्रगुप्त द्वितीय ‘विक्रमादित्य’ के शासनकाल में थी। फाह्यान बौद्ध ग्रंथों की प्रतिलिपि और बौद्ध तीर्थ स्थलों के दर्शन हेतु आया था। उसने अपनी यात्रा का विवरण ‘फो-क्वो-की’ नामक ग्रंथ में लिखा।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: फाह्यान के विवरण से पता चलता है कि गुप्तकाल में जनता सुखी और समृद्ध थी, राज्य में दंड व्यवस्था अत्यंत उदार थी, और मृत्युदंड का प्रचलन लगभग नहीं था। उसने मध्यदेश की जनता को विशेष रूप से सभ्य और धार्मिक बताया है। यह यात्रा विवरण गुप्तकालीन सामाजिक-धार्मिक जीवन का एक अमूल्य स्रोत है।
    30. गुप्त साम्राज्य के पतन के विभिन्न कारण थे। निम्नलिखित कथनों में कौन-सा कारण नहीं था ? उत्तर वर्ती गुप्तों का बौद्ध धर्म स्वीकार करना
    (a) हूण आक्रमण
    (b) प्रशासन का सामंतीय ढांचा
    (c)
    (d) अरब आक्रमण
    Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2012
    उत्तर-(d)
    प्रश्न में दिए गए कारणों में ‘अरब आक्रमण’ गुप्त साम्राज्य के पतन का कारण नहीं था। भारत पर अरबों का आक्रमण 712 ई. में मुहम्मद बिन कासिम के नेतृत्व में हुआ, जो गुप्त साम्राज्य के पतन (6ठी शताब्दी) के बहुत बाद की घटना है। गुप्त साम्राज्य के पतन के वास्तविक कारणों में हूण आक्रमण, सामंतीय प्रशासनिक ढाँचा और उत्तरवर्ती गुप्त शासकों की दुर्बलता शामिल थे।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्त साम्राज्य के पतन में आंतरिक उत्तराधिकार संघर्ष भी एक प्रमुख कारण था। स्कंदगुप्त के बाद पुरुगुप्त, कुमारगुप्त द्वितीय, बुधगुप्त, नरसिंहगुप्त आदि कमजोर शासक हुए। 550 ई. के आसपास यशोधर्मन (मालवा के राजा) ने हूण शासक मिहिरकुल को पराजित किया, पर तब तक गुप्त साम्राज्य की केंद्रीय शक्ति पूरी तरह क्षीण हो चुकी थी।
    31. प्राचीन कालीन भारत में हुई वैज्ञानिक प्रगति के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
    1. प्रथम शती ईस्वी में विभिन्न प्रकार के विशिष्ट शल्य औजारों का उपयोग आम था।
    2. तीसरी शती ईस्वी के आरंभ में मानव शरीर के आंतरिक अंगों का प्रत्यारोपण शुरू हो चुका था।
    3. पांचवीं शती ईस्वी में कोण के ज्या का सिद्धांत ज्ञात था।
    4. सातवीं शती ईस्वी में चक्रीय चतुर्भुज का सिद्धांत ज्ञात था।
    निम्नलिखित कूटों के आधार पर सही उत्तर चुनिए :
    (a) केवल 1 और 2
    (c) केवल 1, 3 और 4
    (b) केवल 3 और 4
    (d) 1, 2, 3 और 4
    I.A.S. (Pre) 2012
    उत्तर-(c)
    प्राचीन भारत में शल्य चिकित्सा का विकास प्रथम शताब्दी ईस्वी तक पर्याप्त उन्नत हो चुका था और विभिन्न विशिष्ट शल्य उपकरण प्रचलन में थे, किंतु अंग प्रत्यारोपण की अवधारणा उस युग में अस्तित्व में नहीं थी, अतः कथन 2 असत्य है। गुप्तकाल में गणित की अभूतपूर्व प्रगति हुई — 5वीं शताब्दी ईस्वी में आर्यभट्ट ने ‘आर्यभट्टीय’ तथा ‘सूर्य सिद्धांत’ जैसे ग्रंथों में त्रिकोणमिति के ज्या (Sine) और कोज्या (Cosine) के सिद्धांत प्रतिपादित किए। 7वीं शताब्दी में गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त ने अपने ग्रंथ ‘ब्रह्मस्फुटसिद्धांत’ में चक्रीय चतुर्भुज का सुप्रसिद्ध सूत्र दिया।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: आर्यभट्ट ने शून्य की अवधारणा के विकास में भी योगदान दिया तथा पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने का सिद्धांत प्रस्तुत किया, जो उस युग के लिए अत्यंत क्रांतिकारी था। ब्रह्मगुप्त पहले गणितज्ञ थे जिन्होंने ऋणात्मक संख्याओं (Negative Numbers) के नियमों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया।
    32. गुप्तकाल में गुजरात, बंगाल, दक्कन एवं तमिल राष्ट्र में स्थित केंद्र किससे संबंधित थे?
    (a) वस्त्र उत्पादन
    (b) बहुमूल्य मणि एवं रत्न
    (c) हस्तशिल्प
    (d) अफीम खेती
    R.A.S./R.T.S. (Pre) 2010
    उत्तर-(a)
    गुप्तकाल में वस्त्रोद्योग सर्वाधिक विकसित उद्योगों में से एक था। गुजरात, बंगाल, दक्कन और तमिलनाडु के क्षेत्र अपनी उत्कृष्ट वस्त्र निर्माण परंपरा के लिए विख्यात थे। इन क्षेत्रों से निर्मित कपड़ों का व्यापार रोमन साम्राज्य सहित दक्षिण-पूर्व एशिया तक होता था।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्तकाल में ‘दुकूल’ (बारीक मलमल), ‘क्षौम’ (रेशम) और ‘कार्पास’ (सूती वस्त्र) विशेष रूप से प्रसिद्ध थे। चीनी यात्री फाह्यान ने अपने विवरण में भारतीय वस्त्रों की उत्कृष्टता की चर्चा की है। बंगाल का ‘वंग’ क्षेत्र महीन मलमल के उत्पादन के लिए विशेष रूप से जाना जाता था।
    33. निम्नलिखित में से कौन गुप्तकाल में अपनी आयुर्विज्ञान विषयक रचना के लिए जाना जाता है?
    (a) सौमिल्ल
    (b) शूद्रक
    (c) शौनक
    (d) सुश्रुत
    I.A.S. (Pre) 1996
    U.P. Lower Sub. (Spl.) (Pre) 2002
    उत्तर-(*)
    इस प्रश्न में दिए गए चारों विकल्पों में से कोई भी गुप्तकाल में आयुर्विज्ञान के क्षेत्र में कार्य के लिए सुस्थापित नहीं है। सुश्रुत शल्यचिकित्सा के जनक माने जाते हैं, किंतु उनका काल लगभग 600 ई.पू. माना जाता है, जबकि गुप्त साम्राज्य का प्रारंभ तीसरी शताब्दी ईस्वी (श्रीगुप्त, लगभग 275 AD) से होता है — यह अंतर लगभग 800-1000 वर्षों का है। शूद्रक और सौमिल्ल गुप्तकालीन नाटककार थे, जबकि शौनक ऋग्वैदिक काल के ऋषि थे। बिहार लोक सेवा आयोग ने प्रारंभिक उत्तर-पत्रक में (a) माना था, किंतु यह कालक्रम की दृष्टि से सटीक नहीं है।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्तकाल में धन्वंतरि चंद्रगुप्त II के नवरत्नों में सम्मिलित थे और वे आयुर्वेद के प्रमुख विद्वान थे। सुश्रुत की रचना ‘सुश्रुतसंहिता’ में 300 से अधिक शल्य क्रियाओं और 120 से अधिक शल्य उपकरणों का विस्तृत वर्णन मिलता है, जो प्राचीन चिकित्सा विज्ञान का अद्भुत उदाहरण है।
    34. इनमें से कौन गुप्तकाल में औषधि के क्षेत्र में अपने कार्य के लिए जाने जाते हैं?
    (a) सुश्रुत
    (b) सौमिल्ल
    (c) शूद्रक
    (d) शौनक
    (e) उपर्युक्त में से कोई नहीं/ उपर्युक्त में से एक से अधिक
    65th B.P.S.C. (Pre) 2019
    उत्तर-(e)
    उपर्युक्त विकल्पों में से कोई भी गुप्तकाल में औषधि क्षेत्र के लिए निर्विवाद रूप से उपयुक्त नहीं है। सुश्रुत (600 ई.पू.) गुप्तकाल से बहुत पूर्व के हैं, सौमिल्ल और शूद्रक साहित्यकार थे, तथा शौनक वैदिककालीन ऋषि थे। BPSC ने अंतिम उत्तर-पत्रक में (e) को सही माना है, जो ऐतिहासिक तथ्यों की दृष्टि से अधिक तर्कसंगत है।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्तकाल में वाग्भट्ट ने ‘अष्टांगहृदयम्’ की रचना की जो आयुर्वेद का महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसके अलावा ‘नवनीतकम्’ नामक ग्रंथ भी इसी काल में रचा गया जिसमें औषधीय योगों का संकलन है। ये दोनों ग्रंथ प्राचीन भारतीय चिकित्सा परंपरा की समृद्धि को दर्शाते हैं।
    35. लीलावती के लेखक थे-
    (a) महावीराचार्य
    (b) हेमचंद्राचार्य
    (c) भाष्कराचार्य
    (d) कालकाचार्य
    U.P. G.I.C. प्रवक्ता, 2017
    उत्तर-(c)
    ‘लीलावती’ की रचना 12वीं शताब्दी के महान भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री भास्कराचार्य (द्वितीय) ने की थी। यह संस्कृत में काव्यात्मक शैली में रचित गणित का उत्कृष्ट ग्रंथ है और वास्तव में उनके वृहद ग्रंथ ‘सिद्धांतशिरोमणि’ का प्रथम भाग है। इसमें अंकगणित, बीजगणित, क्षेत्रमिति आदि विषयों का सुंदर विवेचन है।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: किंवदंती के अनुसार भास्कराचार्य ने यह ग्रंथ अपनी पुत्री ‘लीलावती’ को गणित पढ़ाने के लिए लिखा था। ‘सिद्धांतशिरोमणि’ के चार भाग हैं — लीलावती, बीजगणित, गोलाध्याय और ग्रहगणित। भास्कराचार्य ने ‘चक्रवाल विधि’ (Cyclic Method) का उपयोग करके द्विघात समीकरणों के हल भी प्रस्तुत किए, जो यूरोप में 600 वर्ष बाद खोजी गई।
    36. निम्नलिखित में से किसका प्राचीन भारत के आयुर्वेद शास्त्र से संबंध नहीं है ?
    (a) धन्वंतरि
    (b) भास्कराचार्य
    (c) चरक
    (d) सुश्रुत
    I.A.S. (Pre) 1993
    उत्तर-(b)
    धन्वंतरि, चरक और सुश्रुत — तीनों आयुर्वेद के महान विद्वान थे। धन्वंतरि चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के नवरत्नों में थे और औषधिशास्त्र के प्रकांड पंडित माने जाते हैं। चरक कनिष्क के राजवैद्य थे जिन्होंने ‘चरकसंहिता’ की रचना की। सुश्रुत ने ‘सुश्रुतसंहिता’ में शल्यचिकित्सा का विस्तृत वर्णन किया। इसके विपरीत, भास्कराचार्य गणितज्ञ और खगोलशास्त्री थे — उनका आयुर्वेद से कोई संबंध नहीं था।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘चरकसंहिता’ में 341 वनस्पतियों और 177 पशुज औषधियों का उल्लेख मिलता है। धन्वंतरि को हिंदू परंपरा में चिकित्सा के देवता के रूप में पूजा जाता है और उनकी जयंती ‘धनतेरस’ पर ‘राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस’ मनाया जाता है।
    37. विशाखदत्त के प्राचीन भारतीय नाटक मुद्राराक्षस की विषय-वस्तु है-
    (a) प्राचीन हिंदू जनश्रुति के देवताओं और राक्षसों के बीच संघर्ष के बारे में
    (b) एक आर्य राजकुमार और एक कबीली महिला की प्रेम कथा के बारे में
    (c) दो आर्य कबीलों के बीच सत्ता के संघर्ष की कथा के बारे में
    (d) चंद्रगुप्त मौर्य के समय में राजदरबार की दुरभिसंधियों के बारे में
    I.A.S. (Pre) 2002
    उत्तर-(d)
    विशाखदत्त रचित ‘मुद्राराक्षस’ संस्कृत साहित्य का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक नाटक है। इसकी केंद्रीय विषय-वस्तु चंद्रगुप्त मौर्य के काल की राजनीतिक चालों, कूटनीतिक षड्यंत्रों और राजदरबारी दांव-पेचों पर आधारित है। इस नाटक में चाणक्य द्वारा मगध के मंत्री राक्षस को चंद्रगुप्त की सेवा में लाने की कुशल कूटनीति का वर्णन है।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘मुद्राराक्षस’ नाम ‘मुद्रा’ (अंगूठी/मुहर) और ‘राक्षस’ (मंत्री का नाम) से मिलकर बना है — अर्थात् राक्षस की मुहर, जो नाटक की कथा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह नाटक इतिहासिक दृष्टि से मौर्यकालीन राजनीति को समझने का एक महत्वपूर्ण साहित्यिक स्रोत माना जाता है और इसमें नंद वंश के पतन का भी उल्लेख मिलता है।
    38. प्राचीन भारत में देश की अर्थव्यवस्था में अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली ‘श्रेणी’ संगठन के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
    1. प्रत्येक ‘श्रेणी’ राज्य की एक केंद्रीय प्राधिकरण के साथ पंजीकृत होती थी और प्रशासनिक स्तर पर राजा उनका प्रमुख होता था।
    2.’श्रेणी’ ही वेतन, काम करने के नियमों, मानकों और कीमतों को सुनिश्चित करती थीं।
    3. ‘श्रेणी’ का अपने सदस्यों पर न्यायिक अधिकार होता था।
    निम्नलिखित कूटों के आधार पर सही उत्तर चुनिए :
    (a) केवल 1 और 2
    (b) केवल 3
    (c) केवल 2 और 3
    (d) 1, 2 और 3
    I.A.S. (Pre) 2012
    उत्तर-(c)
    प्राचीन भारत में ‘श्रेणी’ व्यापारियों और शिल्पकारों के स्वायत्त संगठन थे जो आधुनिक व्यापार-संघों (Trade Guilds) जैसे कार्य करते थे। श्रेणियां अपने सदस्यों के वेतन, कार्य-नियम, मानक और मूल्य-निर्धारण स्वयं करती थीं तथा उनके आंतरिक विवादों में न्यायिक निर्णय भी देती थीं। कथन 1 असत्य है क्योंकि श्रेणियां राज्य के अधीन नहीं थीं — राजा उनके संचालन में हस्तक्षेप नहीं करता था और उनका अपना स्वतंत्र प्रमुख (श्रेष्ठी/सेट्ठि) होता था।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मौर्यकालीन ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ में कौटिल्य ने श्रेणियों के विस्तृत नियमों का उल्लेख किया है। श्रेणियां बैंकिंग कार्य भी करती थीं — वे जनता से धन जमा लेती थीं और ब्याज पर ऋण देती थीं। संचालन के लिए श्रेणियों के पास अपनी मुहरें (Seals) होती थीं, जिनके पुरातात्विक साक्ष्य मिले हैं।
    39. भारत ने दक्षिण-पूर्वी एशिया के साथ अपने आरंभिक सांस्कृतिक संपर्क तथा व्यापारिक संबंध बंगाल की खाड़ी के पार बना रखे थे। निम्नलिखित में से कौन-सी बंगाल की खाड़ी के इस उत्कृष्ट आरंभिक समुद्री इतिहास की सबसे विश्वसनीय व्याख्या / व्याख्याएं हो सकती है हैं ?
    (a) प्राचीन काल तथा मध्य काल में भारत के पास दूसरों की तुलना में अति उत्तम पोत-निर्माण तकनीकी उपलब्ध थी
    (b) इस उद्देश्य के लिए दक्षिण भारतीय शासकों ने व्यापारियों,ब्राह्मण पुजारियों और बौद्ध भिक्षुओं को सदा संरक्षण दिया
    (c) बंगाल की खाड़ी में चलने वाली मानसूनी हवाओं ने समुद्री यात्राओं को सुगम बना दिया था
    (d) इस संबंध में(a) तथा (b) दोनों विश्वसनीय व्याख्याएं हैं
    I.A.S. (Pre) 2011
    उत्तर-(c)
    भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच समुद्री संपर्क का सर्वाधिक विश्वसनीय कारण बंगाल की खाड़ी में ग्रीष्म और शीत ऋतु में दिशा बदलने वाली मानसूनी हवाएं थीं। इन हवाओं के कारण नाविक बिना अतिरिक्त प्रयास के अनुकूल समय पर आना-जाना कर सकते थे। पोत-निर्माण की श्रेष्ठता और राजकीय संरक्षण के दावे ऐतिहासिक साक्ष्यों द्वारा उतने पुष्ट नहीं हैं।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ग्रीक नाविक हिपालस (लगभग 1 शताब्दी ई.पू.) ने मानसूनी हवाओं के इस नियमित पैटर्न की खोज का श्रेय प्राप्त किया, जिससे भारत-रोम व्यापार भी त्वरित हुआ। इस समुद्री मार्ग से भारतीय संस्कृति, हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म का प्रसार कंबोडिया, इंडोनेशिया और थाईलैंड जैसे देशों में हुआ, जिसके प्रमाण अंगकोरवाट जैसे स्मारकों में आज भी दृष्टिगोचर होते हैं।
    40. निम्नलिखित में से कौन-सा बंदरगाह गुप्तकाल में उत्तर भारतीय व्यापार के लिए उपयोग किया जाता था?
    (a) कल्याण
    (b) ताम्रलिप्ति
    (c) भड़ौच
    (d) काम्बे
    (e) उपर्युक्त में से कोई नहीं/ उपर्युक्त में से एक से अधिक
    उपर्युक्त प्रश्न की व्याख्या देखें।
    65th B.P.S.C. (Pre) 2019
    उत्तर-(e)
    गुप्तकाल में उत्तर भारतीय व्यापार के लिए एक से अधिक बंदरगाहों का उपयोग होता था, इसलिए उत्तर (e) सही है। ताम्रलिप्ति (वर्तमान तामलुक, पश्चिम बंगाल) पूर्वी समुद्री व्यापार का प्रमुख केंद्र था जहाँ से दक्षिण-पूर्व एशिया और श्रीलंका के लिए जहाज जाते थे। भड़ौच (भृगुकच्छ) पश्चिमी तट का महत्वपूर्ण बंदरगाह था जो रोम व अरब से व्यापार के लिए प्रसिद्ध था।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चीनी यात्री फाह्यान ने 5वीं शताब्दी में ताम्रलिप्ति बंदरगाह का उल्लेख किया है और यहाँ से श्रीलंका की यात्रा की थी। भड़ौच का उल्लेख यूनानी भूगोलवेत्ता टॉलेमी और ‘पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी’ जैसे रोमन ग्रंथों में ‘बैरीगाजा’ नाम से हुआ है, जो इसके अंतरराष्ट्रीय महत्व को दर्शाता है।
    41. गुप्तकालीन रजत मुद्राओं को नाम दिया गया था-
    (a) कार्षापण
    (b) दीनार
    (c) रूपक
    (d) निष्क
    I.A.S. (Pre) 1996
    U.P. Lower Sub. (Spl.) (Pre) 2002
    उत्तर-(c)
    गुप्त साम्राज्य में मुद्रा व्यवस्था अत्यंत विकसित थी। चांदी के सिक्कों को ‘रूपक’ तथा सोने के सिक्कों को ‘दीनार’ कहा जाता था। गुप्त शासकों के सिक्के उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, मध्य प्रदेश, राजस्थान और ओडिशा में बड़ी संख्या में मिले हैं। सिक्कों की सबसे प्रसिद्ध प्राप्ति स्थल राजस्थान का बयाना (भरतपुर) है जहाँ से लगभग 1821 सोने के सिक्के एक साथ मिले थे।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: समुद्रगुप्त के सिक्कों पर वीणा वादन का दृश्य अंकित है, जो उनकी संगीत प्रेमी छवि को दर्शाता है। गुप्त सिक्कों पर लक्ष्मी की आकृति का अंकन गुप्तकालीन वैष्णव धर्म की प्रधानता को प्रमाणित करता है।
    42. सती प्रथा का प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य प्राप्त हुआ है-
    (a) एरण से
    (b) जूनागढ़ से
    (c) मंदसौर से
    (d) सांची से
    U.P.P.C.S. (Mains) 2010
    उत्तर-(a)
    सती प्रथा के सबसे पुराने अभिलेखीय प्रमाण के रूप में मध्य प्रदेश के एरण (सागर जिला) से प्राप्त 510 ई. का अभिलेख अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इस अभिलेख में भानुगुप्त के सेनापति गोपराज की पत्नी के स्वेच्छा से पति की चिता में सती होने का उल्लेख मिलता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: एरण अभिलेख गुप्तकाल का है और इसी स्थल से हूण आक्रांता तोरमाण के शासनकाल का भी एक महत्त्वपूर्ण अभिलेख प्राप्त हुआ है। सती प्रथा को कानूनी रूप से 1829 ई. में लॉर्ड विलियम बेंटिंक ने राजा राममोहन राय के प्रयासों से प्रतिबंधित करवाया था।
    43. भारतीय यात्रा में ‘फाह्यान’ ने एक अस्पताल का उल्लेख किया है, यह स्थित था-
    (a) उज्जैन
    (b) कौशांबी
    (c) ताम्रलिप्ति
    (d) पाटलिपुत्र
    Chhattisgarh P.C.S. (Pre), 2019
    उत्तर-(d)
    चीनी यात्री फाह्यान लगभग 399-414 ई. के बीच चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में भारत आया था। उसने अपने यात्रा विवरण में पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना) के धनी नागरिकों द्वारा स्थापित एक धर्मार्थ अस्पताल का उल्लेख किया है, जहाँ निर्धन और असहाय रोगियों को निःशुल्क चिकित्सा, भोजन और औषधि प्रदान की जाती थी।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: फाह्यान का मुख्य उद्देश्य बौद्ध धर्म के पवित्र ग्रंथों की खोज करना था और वह लंका होते हुए समुद्री मार्ग से वापस चीन लौटा था। फाह्यान ने गुप्तकालीन समाज को अत्यंत सुखी, शांतिप्रिय और सुशासित बताया है तथा यह भी उल्लेख किया कि उस काल में मृत्युदंड का प्रावधान नहीं था।
    44. निम्नलिखित में से किस गुप्त शासक ने सर्वप्रथम सिक्के जारी किए?
    (a) चंद्रगुप्त प्रथम ने
    (b) घटोत्कच ने
    (c) समुद्रगुप्त ने
    (d) श्रीगुप्त ने
    U.P.P.C.S. (Mains) 2010
    U.P.P.C.S. (Pre) 2011
    उत्तर-(a)
    गुप्त वंश के शासकों में चंद्रगुप्त प्रथम (319-335 ई.) वह पहले शासक थे जिन्होंने राजकीय सिक्के जारी किए। इनके पूर्ववर्ती शासक श्रीगुप्त और घटोत्कच के सिक्के जारी करने का कोई ठोस पुरातात्विक प्रमाण अब तक नहीं मिला है। चंद्रगुप्त प्रथम ने अपनी पत्नी कुमारदेवी (लिच्छवि राजकुमारी) के साथ संयुक्त रूप से ‘राजा-रानी प्रकार’ के स्वर्ण सिक्के जारी किए।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इन सिक्कों के एक तरफ चंद्रगुप्त और कुमारदेवी की आकृति और दूसरी तरफ सिंह पर आरूढ़ लक्ष्मी की आकृति अंकित है, जो लिच्छवि गणराज्य के साथ वैवाहिक गठबंधन के राजनीतिक महत्त्व को दर्शाती है।
    45. कालिदास किसके शासनकाल में थे?
    (a) समुद्रगुप्त
    (b) अशोक महान
    (c) चंद्रगुप्त I
    (d) चंद्रगुप्त II
    M.P.P.C.S. (Pre) 1990
    उत्तर-(d)
    महाकवि कालिदास चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य (375-415 ई.) के दरबार के नवरत्नों में सर्वश्रेष्ठ माने जाते थे। इनकी प्रमुख रचनाओं में अभिज्ञानशाकुंतलम्, मेघदूत, रघुवंश, कुमारसंभव, मालविकाग्निमित्र और ऋतुसंहार शामिल हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जर्मन कवि गेटे ने अभिज्ञानशाकुंतलम् पढ़कर इसे विश्व साहित्य की अमूल्य कृति बताया था। कालिदास की रचना ‘मेघदूत’ को विरह-काव्य की सर्वोत्तम रचना माना जाता है जिसमें यक्ष अपनी प्रियतमा के लिए मेघ को दूत बनाकर संदेश भेजता है।
    46. चंद्रगुप्त के नौ रत्नों में से निम्न में से कौन फलित-ज्योतिष से संबंधित था?
    (a) वररुची
    (b) शंकु
    (c) क्षपणक
    (d) अमर सिंह
    U.P. Lower Sub. (Spl) (Pre) 2008
    उत्तर-(c)
    चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य के दरबार में नौ विद्वान थे जिन्हें ‘नवरत्न’ कहा जाता था। इनमें क्षपणक फलित ज्योतिष (Astrology) के विशेषज्ञ थे। नवरत्नों में कालिदास (कवि), वराहमिहिर (खगोलशास्त्री), धन्वंतरि (वैद्य), वेतालभट्ट, घटकर्पर, अमरसिंह, शंकु और वररुची भी शामिल थे।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अमरसिंह ने संस्कृत के प्रसिद्ध कोश ग्रंथ ‘अमरकोश’ की रचना की थी। वराहमिहिर ने ‘बृहत्संहिता’ और ‘पञ्चसिद्धान्तिका’ जैसे महत्त्वपूर्ण ज्योतिष ग्रंथों की रचना की जो आज भी भारतीय खगोलशास्त्र में संदर्भ ग्रंथ माने जाते हैं।
    47. इनमें से किसने पहली बार यह व्याख्या की थी कि पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने के कारण प्रतिदिन सूर्योदय एवं सूर्यास्त होता है?
    (a) आर्यभट्ट
    (b) भास्कर
    (c) ब्रह्मगुप्त
    (d) वराहमिहिर
    (e) उपर्युक्त में से कोई नहीं/उपर्युक्त में से एक से अधिक
    64th B.P.S.C. (Pre) 2018
    उत्तर-(a)
    गुप्तकाल के महान गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री आर्यभट्ट (476-550 ई.) ने सर्वप्रथम वैज्ञानिक आधार पर यह सिद्ध किया कि पृथ्वी गोल है और अपनी धुरी पर घूमती है, जिससे दिन और रात होते हैं। उनकी प्रसिद्ध कृति ‘आर्यभट्टीय’ में यह सिद्धांत प्रतिपादित किया गया है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: आर्यभट्ट ने ‘शून्य’ की अवधारणा और दशमलव प्रणाली को विकसित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने ‘π’ (पाई) का मान 3.1416 निकाला जो आधुनिक गणना के अत्यंत निकट है। भारत का पहला कृत्रिम उपग्रह ‘आर्यभट्ट’ (1975) उन्हीं के नाम पर रखा गया।
    48.अधोलिखित में कौन गुप्तकालीन स्वर्ण मुद्रा है?
    (a) कौड़ी
    (b) दीनार
    (c) निष्क
    (d) पण
    U.P.P.C.S. (Pre) 1992
    उत्तर-(b)
    गुप्तकाल में स्वर्ण मुद्रा को ‘दीनार’ कहा जाता था। यह शब्द रोमन ‘Denarius’ से व्युत्पन्न माना जाता है जो भारत के पश्चिमी व्यापारिक संपर्कों को दर्शाता है। फाह्यान के विवरण के अनुसार सामान्य जनता दैनिक लेन-देन में कौड़ियों का उपयोग करती थी जबकि बड़े व्यापारिक लेन-देन में दीनार प्रचलित था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्त शासकों ने सर्वाधिक शुद्ध और कलात्मक सोने के सिक्के जारी किए जो मौर्यकाल के सिक्कों की तुलना में बहुत अधिक परिष्कृत थे। समुद्रगुप्त के ‘अश्वमेध प्रकार’ के दीनार विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं जो उनकी साम्राज्यवादी विजयों का स्मरण कराते हैं।
    49. गुप्त स्वर्ण मुद्रा को कहा जाता था-
    (a) कार्षापण
    (b) दीनार
    (c) निष्क
    (d) सुवर्ण
    U.P. R.O/A.R.O. (Mains) 2017
    उत्तर-(b)
    गुप्त साम्राज्य की स्वर्ण मुद्रा ‘दीनार’ कहलाती थी। गुप्त सम्राटों ने विभिन्न प्रकार के दीनार जारी किए जिनमें धनुर्धर प्रकार, अश्वारोही प्रकार, सिंहनिहंता प्रकार और वीणावादक प्रकार प्रमुख हैं। ये सिक्के गुप्त शासकों की विभिन्न उपलब्धियों और व्यक्तित्व को दर्शाते हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्तकालीन स्वर्ण मुद्राओं की शुद्धता लगभग 90% से अधिक थी। ‘कार्षापण’ मुख्यतः मौर्यकालीन चांदी की मुद्रा थी, जबकि ‘निष्क’ वैदिक काल की स्वर्ण मुद्रा या आभूषण था — इन्हें गुप्तकालीन मुद्रा से भ्रमित नहीं करना चाहिए।
    50. गुप्तकाल में लिखित संस्कृत नाटकों में स्त्री और शूद्र बोलते थे-
    (a) संस्कृत
    (b) प्राकृत
    (c) पाली
    (d) शौरसेनी
    I.A.S. (Pre) 1995
    उत्तर-(b)
    गुप्तकालीन संस्कृत नाटकों में भाषा का प्रयोग सामाजिक वर्ण-व्यवस्था के अनुसार होता था। ब्राह्मण, क्षत्रिय और उच्च वर्ण के पात्र संस्कृत में संवाद करते थे, जबकि स्त्री पात्र और शूद्र प्राकृत भाषा बोलते थे। यह व्यवस्था नाट्यशास्त्र के नियमों के अनुरूप थी।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: प्राकृत भाषाएँ सामान्य जनभाषाएँ थीं और इनकी अनेक बोलियाँ जैसे शौरसेनी, मागधी, महाराष्ट्री आदि प्रचलित थीं — नाटकों में पात्र की क्षेत्रीय पृष्ठभूमि के अनुसार इनका प्रयोग होता था। कालिदास के नाटक ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’ में शकुंतला और उसकी सखियाँ प्राकृत में तथा राजा दुष्यंत संस्कृत में बात करते हैं, जो इसी परंपरा का उत्कृष्ट उदाहरण है।
    51. प्राचीन भारत में किस वंश का शासनकाल ‘स्वर्ण युग’ कहा जाता है?
    (a) मौर्य
    (b) शुंग
    (c) गुप्त
    (d) मगध
    U.P.P.C.S. (Spl) (Pre) 2004
    उत्तर-(c)
    गुप्तकाल (लगभग 320–550 ई.) को इतिहासकारों ने भारत का ‘स्वर्ण युग’ कहा है। इस काल में साहित्य, कला, विज्ञान, दर्शन और धर्म का अभूतपूर्व विकास हुआ। कालिदास जैसे महान कवि, आर्यभट्ट जैसे गणितज्ञ और वराहमिहिर जैसे खगोलशास्त्री इसी युग में हुए। इस काल को ‘क्लासिक युग’ (Classical Age) तथा ‘भारत का पेरीक्लीन युग’ भी कहा जाता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: आर्यभट्ट ने इसी काल में ‘आर्यभटीय’ नामक ग्रंथ की रचना की, जिसमें शून्य और दशमलव पद्धति का प्रयोग किया गया। इसी काल में अजंता की गुफाओं में श्रेष्ठतम चित्रकारी भी हुई।
    52. किस प्रकार की भूमि को ‘अप्रहत’ कहा जाता था?
    (a) बिना जोती हुई जंगली भूमि
    (b) सिंचित भूमि
    (c) घने जंगल वाली भूमि
    (d) जोती हुई भूमि
    (e) उपर्युक्त में से कोई नहीं/उपर्युक्त में से एक से अधिक
    60th to 62nd B.P.S.C. (Pre) 2016
    उत्तर-(a)
    गुप्तकालीन राजस्व व्यवस्था में भूमि को उसकी उपजाऊ स्थिति के आधार पर विभिन्न वर्गों में विभाजित किया गया था। ‘अप्रहत’ उस भूमि को कहते थे जो जंगली और बिना जोती हुई हो। इसके अतिरिक्त ‘क्षेत्र’ जुती हुई कृषि भूमि, ‘खिल’ परती भूमि और ‘वास्तु’ आवासीय भूमि को कहा जाता था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्तकालीन भूमि-अनुदान ताम्रपत्रों में इन श्रेणियों का विस्तृत उल्लेख मिलता है। गुप्तकाल में भूमि के हस्तांतरण के लिए राजकीय अनुमति आवश्यक होती थी, जो उस समय की सुव्यवस्थित राजस्व प्रणाली को दर्शाती है।
    53. गुप्त संवत की स्थापना किसने की?
    (a) चंद्रगुप्त I
    (b) श्रीगुप्त
    (c) चंद्रगुप्त II
    (d) घटोत्कच
    M.P.P.C.S. (Pre) 1991
    उत्तर-(a)
    गुप्त संवत का प्रवर्तक चंद्रगुप्त प्रथम था। इस संवत की प्रारंभ तिथि 319-320 ई. मानी जाती है। चंद्रगुप्त प्रथम ने लिच्छवि राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह कर अपनी शक्ति को सुदृढ़ किया और ‘महाराजाधिराज’ की उपाधि धारण की।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चंद्रगुप्त प्रथम ने ‘चंद्रगुप्त-कुमारदेवी’ प्रकार के सिक्के चलाए, जो उस काल के एकमात्र ऐसे सिक्के हैं जिन पर पति और पत्नी दोनों के नाम अंकित हैं। गुप्त संवत, शक संवत (78 ई.) से लगभग 241 वर्ष बाद प्रारंभ हुआ।
    54. हिंदू विधि द्वारा मान्य कर कितना था?

    (a) उपज का आधा भाग

    (b) उपज का छठा भाग

    (c) उपज का एक-तिहाई भाग

    (d) उपज का एक-चौथाई भाग
    U.P.P.C.S. (Pre) 1992
    उत्तर-(b)
    हिंदू धर्मशास्त्रों और स्मृतियों के अनुसार राजा को उपज का छठा भाग (1/6) कर के रूप में लेने का अधिकार था। मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति दोनों में इस दर का उल्लेख है। यह दर न्यायसंगत मानी जाती थी क्योंकि राजा प्रजा की रक्षा के बदले यह कर लेता था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भूमि की उर्वरता और सिंचाई के आधार पर कर की दर 1/4 से 1/6 तक निर्धारित करने का उल्लेख है। आपातकाल में राजा 1/4 तक कर वसूल सकता था।
    55. सूची-I का सूची-II से मिलान कीजिए तथा नीचे दिए गए कूटों का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए-

    सूची-1 (सम्राट) सूची-II (विरुद)

    A. अशोक 1. परक्रमांक

    B. समुद्रगुप्त 2. प्रियदर्सिन

    C. चंद्रगुप्त-II 3. क्रमादित्य

    D. स्कंदगुप्त 4. विक्रमादित्य

    कूट :
    A B C D

    (a) 1 2 3 4

    (b) 3 2 1 4

    (c) 2 1 4 3

    (d) 4 3 2 1
    U.P. P.C.S. (Pre) (Re-Exam) 2015
    उत्तर-(c)
    सम्राटों और उनके विरुदों (उपाधियों) का सही सुमेलन इस प्रकार है — अशोक: प्रियदर्शिन (अभिलेखों में उल्लिखित); समुद्रगुप्त: परक्रमांक (अत्यंत पराक्रमी); चंद्रगुप्त-II: विक्रमादित्य (विक्रम और सूर्य का प्रतीक); स्कंदगुप्त: क्रमादित्य। ‘विरुद’ किसी शासक की विशेष उपलब्धि या गुण के आधार पर प्रदान की गई आधिकारिक उपाधि होती थी।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: समुद्रगुप्त को ‘भारत का नेपोलियन’ कहा जाता है — यह उपाधि इतिहासकार वी. ए. स्मिथ ने दी थी। प्रयाग प्रशस्ति (इलाहाबाद स्तंभ) में हरिषेण ने समुद्रगुप्त की विजयों का विस्तृत वर्णन किया है।
    56. धर्मशास्त्रों में भू-राजस्व की दर क्या है?
    (a) 1/3
    (b) 1/4
    (c) 1/6
    (d) 1/8
    40th B.P.S.C. (Pre) 1995
    उत्तर-(c)
    प्रायः सभी प्रमुख हिंदू धर्मशास्त्रों — मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, पराशर स्मृति आदि — में भू-राजस्व की दर उपज का 1/6 (षष्ठांश) निर्धारित की गई है। इसे राजा का ‘भाग’ कहा जाता था। यह दर किसानों पर अत्यधिक आर्थिक बोझ न पड़े, इसे ध्यान में रखकर निर्धारित की गई थी।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मनुस्मृति के अनुसार राजा अकाल या विपदा के समय कर में छूट दे सकता था। शुक्रनीतिसार में कर-वसूली के लिए नियुक्त अधिकारियों की ईमानदारी पर विशेष बल दिया गया है।
    57. किस शासक वंश ने मंदिरों एवं ब्राह्मणों को सबसे अधिक ग्राम अनुदान में दिया था?
    (a) गुप्त वंश
    (b) पाल वंश
    (c) राष्ट्रकूट
    (d) प्रतिहार
    39th B.P.S.C. (Pre) 1994
    उत्तर-(a)
    गुप्त वंश के शासकों ने मंदिरों एवं ब्राह्मणों को सर्वाधिक ग्राम अनुदान (अग्रहार) दिए। इन भूमिदानों का विवरण गुप्तकालीन ताम्रपत्रों में मिलता है। भूमिदान के साथ-साथ उस गांव की समस्त राजस्व-आय और प्रशासनिक अधिकार भी अनुदान प्राप्तकर्ता को सौंप दिए जाते थे। इससे ब्राह्मणों की राजनीतिक और आर्थिक शक्ति में वृद्धि हुई।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्तकाल में भूमिदान की यह प्रथा सामंतवाद के उदय का एक प्रमुख कारण बनी। दामोदरपुर ताम्रपत्र (5वीं शताब्दी ई.) में भूमि क्रय-विक्रय और अनुदान की प्रक्रिया का विस्तृत विवरण मिलता है।
    58. नगरों का क्रमिक पतन किस काल की एक महत्वपूर्ण विशेषता थी?
    (a) गुप्तकाल
    (b) प्रतिहार युग
    (c) राष्ट्रकूट
    (d) सातवाहन युग
    40th B.P.S.C. (Pre) 1995
    उत्तर-(a)
    गुप्तकाल में गंगा घाटी के अनेक समृद्ध नगरों का क्रमिक पतन हुआ। पाटलिपुत्र जैसा भव्य नगर ह्वेनसांग के आगमन तक एक छोटे गांव में सिमट गया था। इसका प्रमुख कारण व्यापार का ह्रास, भूमिदान प्रथा और विदेशी व्यापारिक मार्गों का बदलना था। मथुरा, सोनपुर, कुम्रहार जैसे नगर भी इस ह्रास से प्रभावित हुए।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इस नगर-पतन के कारण आर्थिक गतिविधियाँ नगरों से ग्रामों की ओर स्थानांतरित हो गईं, जिसे इतिहासकार R. S. Sharma ने ‘सामंतवाद के उदय’ से जोड़कर देखा है। रोमन साम्राज्य के पतन के बाद भारत के पश्चिमी बंदरगाहों से व्यापार में भी गिरावट आई।
    59. गुप्त युग में भूमि राजस्व की दर क्या थी?
    (a) उपज का चौथा भाग
    (b) उपज का छठा भाग
    (c) उपज का आठवां भाग
    (d) उपज का आधा भाग
    42nd B.P.S.C. (Pre) 1997
    उत्तर-(b)
    गुप्तकाल में राजकीय भूमि पर कृषि करने वाले किसानों को अपनी उपज का 1/6 (षष्ठांश) भाग कर के रूप में राजा को देना होता था। गुप्त अभिलेखों में इस भूमिकर को ‘उद्रंग’ तथा ‘भागकर’ कहा गया है। यह दर धर्मशास्त्र सम्मत भी थी।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्तकालीन अभिलेखों में ‘हिरण्य’ (नकद) और ‘मेय’ (अनाज) दो प्रकार के करों का उल्लेख मिलता है। इसके अतिरिक्त किसानों को ‘बलि’, ‘भोग’ और ‘कर’ जैसे विविध उपकर भी देने पड़ते थे, जो कुल मिलाकर उनके आर्थिक दायित्व को बढ़ा देते थे।
    60. निम्न में से किस काल में स्त्रियों की पुरुषों से बराबरी थी?
    (a) गुप्तकाल
    (b) मौर्यकाल
    (c) चोलों में
    (d) इनमें से किसी में भी नहीं
    U.P.P.C.S. (Pre) 1994
    उत्तर-(d)
    ऋग्वैदिक काल को छोड़कर प्राचीन भारतीय इतिहास के किसी भी काल में स्त्रियों की स्थिति पुरुषों के समकक्ष नहीं रही। गुप्तकाल में बाल-विवाह और सती प्रथा के प्रमाण मिलते हैं; मौर्यकाल में भी महिलाओं की सामाजिक गतिशीलता सीमित थी, यद्यपि वे राज्य के लिए गुप्तचर का कार्य कर सकती थीं। चोलकाल में भी स्त्री-अधिकार सीमित थे।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्तकाल में स्त्रियों की संपत्ति के अधिकार को ‘स्त्रीधन’ के रूप में मान्यता थी, परंतु यह केवल आभूषण और विशेष उपहारों तक सीमित था। ऋग्वैदिक काल में गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषी स्त्रियां दार्शनिक वाद-विवाद में पुरुषों के समकक्ष भाग लेती थीं।
    61. तोरमाण किस जातीय दल का था?
    (a) सिथियन
    (b) हूण
    (c) यूची
    (d) शक
    I.A.S. (Pre) 1995
    उत्तर-(b)
    तोरमाण हूण जाति का शक्तिशाली आक्रमणकारी था, जिसने भारत पर दूसरे हूण आक्रमण का नेतृत्व किया। मध्य भारत के एरण (सागर जिला, मध्य प्रदेश) नामक स्थान पर स्थापित वाराह प्रतिमा के अभिलेख में उसका उल्लेख मिलता है, जिससे ज्ञात होता है कि धन्यविष्णु उसके शासन के प्रथम वर्ष में उसका सामंत था।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तोरमाण का पुत्र मिहिरकुल अत्यंत क्रूर शासक था, जिसे ‘हूणों का नीरो’ कहा जाता है। तोरमाण ने गुप्त साम्राज्य के पतन का लाभ उठाकर पंजाब, राजपूताना और मध्य भारत के बड़े भू-भाग पर अधिकार कर लिया था।
    62. घंटाशाला, कतूरा तथा चौल किसलिए विख्यात थे?

    (a) विदेशी व्यापार करने वाले बंदरगाह

    (b) शक्तिशाली राज्यों की राजधानियां

    (c) उत्कृष्ट प्रस्तर कला तथा स्थापत्य से संबंधित स्थान

    (d) बौद्ध धर्म के महत्वपूर्ण तीर्थस्थल
    I.A.S. (Pre) 2020
    उत्तर-(a)
    घंटाशाला, कदूरा (कतूरा) और चौल गुप्त काल के प्रमुख बंदरगाह नगर थे। घंटाशाला आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले में स्थित पूर्वी तटीय बंदरगाह था, जबकि कदूरा भी पूर्वी तट पर स्थित था। चौल (Chaul) महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में पश्चिमी तट का महत्वपूर्ण बंदरगाह था। इन बंदरगाहों से दक्षिण-पूर्व एशिया, रोम और अरब देशों के साथ सक्रिय समुद्री व्यापार होता था।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्तकाल में भारत से मुख्यतः मसाले, वस्त्र, हाथी दाँत और रत्न निर्यात किए जाते थे। पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी (Periplus of the Erythraean Sea) नामक ग्रीक ग्रंथ में इस काल के अनेक भारतीय बंदरगाहों का विस्तृत विवरण मिलता है।
    63. निम्नलिखित कथनों को ध्यानपूर्वक पढ़िए-
    1. गुप्त सम्राट स्वयं के लिए दैवीय अधिकारों का दावा करते थे।
    2. उनका प्रशासन नितांत केंद्रीकृत था।
    3. उन्होंने भूमिदान की परंपरा को विस्तारित किया। उत्तर निम्न कूटों के आधार पर दीजिए-
    (a) 1, 2 एवं 3 सही हैं।
    (b) 1 एवं 2 सही हैं।
    (c) 1 एवं 3 सही हैं।
    (d) 2 एवं 3 सही हैं।
    Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2008
    उत्तर-(c)
    गुप्त शासक मौर्यों से भिन्न थे — उन्होंने स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि घोषित किया और ‘परमभट्टारक’, ‘महाराजाधिराज’ जैसी दैवीय उपाधियाँ धारण कीं (कथन 1 सही)। भूमिदान की परंपरा, विशेषकर ब्राह्मणों और मंदिरों को अग्रहार के रूप में दी गई भूमि, गुप्तकाल में और अधिक व्यापक हुई (कथन 3 सही)। परंतु गुप्त प्रशासन केंद्रीकृत न होकर संघात्मक प्रकृति का था — सामंत और प्रांतीय शासक काफी स्वायत्त थे (कथन 2 गलत)।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्त राजाओं ने ‘विक्रमादित्य’ उपाधि को अत्यंत लोकप्रिय बनाया। चंद्रगुप्त II को ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि सर्वप्रथम मिली थी। गुप्तकालीन भूमि अनुदान ताम्रपत्रों (Copper-plate grants) पर अंकित किए जाते थे, जो उस काल के प्रशासनिक विकेंद्रीकरण के प्रमाण हैं।
    64. चीनी यात्री ‘सुंग युन’ ने भारत की यात्रा की थी-
    (a) 515 ई. से 520 ई.
    (b) 525 ई. से 529 ई.
    (c) 545 ई. से 552 ई.
    (d) 592 ई. से 597 ई.
    60th to 62nd B.P.S.C. (Pre) 2016
    उत्तर-(a)
    चीनी यात्री सुंग युन (Song Yun) ने 518 ई. से 521 ई. तक भारत की यात्रा की। उसने अपनी तीन वर्षीय यात्रा के दौरान गांधार और उत्तर-पश्चिम भारत के अनेक क्षेत्रों का भ्रमण किया और बौद्ध धर्म के ग्रंथों की प्रतियाँ एकत्रित कीं। दिए गए विकल्पों में 515-520 ई. वाला विकल्प सर्वाधिक निकट है, अतः (a) सही उत्तर माना जाता है।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सुंग युन की यात्रा का वृत्तांत ‘लुओयांग कियालान जी’ (Luoyang Qielan Ji) नामक ग्रंथ में संकलित है। उसने अपनी यात्रा में हूण शासक मिहिरकुल का भी उल्लेख किया है, जो उस समय गांधार का शासक था — यह भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण समकालीन साक्षी है।
    65. भारत के इतिहास के संदर्भ में, “कुल्यावाप” तथा “द्रोणवाप” शब्द क्या निर्दिष्ट करते हैं?

    (a) भू-माप

    (b) विभिन्न मौद्रिक मूल्यों के सिक्के

    (c) नगर की भूमि का वर्गीकरण

    (d) धार्मिक अनुष्ठान
    I.A.S. (Pre) 2020
    उत्तर-(a)
    गुप्तकाल में कृषि भूमि की माप के लिए विशेष इकाइयाँ प्रचलित थीं। ‘कुल्यावाप’ और ‘द्रोणवाप’ ऐसी ही भू-माप इकाइयाँ थीं, जिनका उल्लेख गुप्तकालीन अभिलेखों में मिलता है। ‘अधवाप’ भी इसी श्रेणी की एक अन्य भू-माप इकाई थी। ‘वाप’ शब्द बीज बोने की मात्रा से भूमि क्षेत्रफल नापने की परंपरा को दर्शाता है।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्तकालीन अभिलेखों, विशेषकर दामोदरपुर ताम्रपत्र अभिलेखों में इन भू-माप इकाइयों का विस्तृत उल्लेख है। तुलनात्मक रूप से मौर्यकाल में भूमि माप के लिए ‘निवर्तन’ और ‘अमन’ जैसी इकाइयाँ प्रयोग में थीं।
    66. निम्नलिखित में से किसने हूण शासक मिहिरकुल को पराजित किया था?
    (a) बुद्धगुप्त
    (b) यशोधर्मन
    (c) शशांक
    (d) प्रभाकरवर्धन
    U.P.P.C.S(Mains) 2016
    उत्तर-(b)
    हूण शासक मिहिरकुल को दो चरणों में पराजित किया गया। पहले गुप्त नरेश नरसिंहगुप्त ‘बालादित्य’ ने उसे युद्ध में हराया, और तत्पश्चात मालव (मंदसौर) के स्वतंत्र शासक यशोधर्मन ने उसे निर्णायक रूप से परास्त किया। इसका प्रमाण मंदसौर लेख और चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा-वृत्तांत से मिलता है।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यशोधर्मन ने विजय के उपलक्ष्य में मंदसौर (मध्य प्रदेश) में दो विजय स्तंभ स्थापित किए, जिन पर उसकी उपलब्धियाँ अंकित हैं। मिहिरकुल ने पराजय के बाद कश्मीर में शरण ली और वहाँ शासन किया; उसे बौद्ध धर्म का कट्टर विरोधी माना जाता है।
    67. तीसरी शताब्दी में वारंगल प्रसिद्ध था-

    (a) तांबे के बर्तनों के लिए

    (b) स्वर्ण आभूषणों के लिए

    (c) लोहे के यंत्रों/उपकरणों हेतु

    (d) हाथी-दांत के काम हेतु
    U.P. U.D.A./L.D.A. (Pre) 2001
    उत्तर-(c)
    तीसरी शताब्दी ईस्वी में वारंगल (वर्तमान तेलंगाना) लोहे के औज़ारों और उपकरणों के निर्माण के लिए प्रसिद्ध था। यह क्षेत्र दक्षिण भारत में धातुकर्म की उन्नत परंपरा का केंद्र था। वारंगल उस काल में इक्ष्वाकु वंश के शासन में था, जो सातवाहनों के पतन के बाद उभरा था।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: प्राचीन भारत में लोहे का उपयोग कृषि उपकरणों और शस्त्र-निर्माण दोनों में होता था; इससे कृषि उत्पादन में व्यापक वृद्धि हुई। वारंगल बाद में काकतीय वंश (12वीं-14वीं शताब्दी) की राजधानी भी बना, जो अपनी स्थापत्य कला, विशेषकर हजार स्तंभ मंदिर के लिए प्रसिद्ध है।
    68. प्राचीन भारत में सिंचाई कर को कहते थे-
    (a) बिदकभागम
    (b) हिरण्य
    (c) उदरंग
    (d) उपरनिका
    U.P.P.C.S. (Mains) 2009
    उत्तर-(a)
    प्राचीन भारत में सिंचाई कर को ‘बिदकभागम’ अथवा ‘उदकभाग’ कहा जाता था। ‘हिरण्य’ मौर्यकाल में नकद रूप में लिए जाने वाले कर का नाम था। गुप्त अभिलेखों में भूमि कर को ‘उद्रंग’ या ‘उदरंग’ कहा गया है। ‘उपरनिका’ राजपूत युग में स्थायी एवं अस्थायी रूप से भूमि पर रहने वाले कृषकों से लिया जाने वाला कर था।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मौर्यकाल में कौटिल्य के अर्थशास्त्र में सिंचाई के स्रोत के अनुसार कर की दर भिन्न-भिन्न निर्धारित की गई थी — कुएँ, तालाब और नहर से सिंचित भूमि पर अलग-अलग दरें लागू होती थीं। गुप्तकाल में ‘भाग’ (उपज का हिस्सा) और ‘भोग’ (नियमित आपूर्ति) भी प्रमुख करों में शामिल थे।
    69. गुप्त साम्राज्य द्वारा निम्न में से किन्हें कर-रहित कृषि भूमि प्रदान की जाती थी?
    (a) सैन्य अधिकारियों को
    (b) सिविल अधिकारियों को
    (c) ब्राह्मणों को
    (d) दरबारी विद्वानों को
    M.P.P.C.S. (Pre) 2014
    उत्तर-(c)
    गुप्तकाल में मंदिरों और ब्राह्मणों को दान में दी जाने वाली भूमि को ‘अग्रहार’ कहा जाता था। यह भूमि समस्त करों से मुक्त होती थी और धारकों को उस पर पूर्ण स्वामित्व प्राप्त था। इस भूमिदान का प्राथमिक उद्देश्य धार्मिक और शैक्षणिक कार्यों को प्रोत्साहित करना था।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुप्तकालीन भूमिदान के प्रमाण ताम्रपत्र अभिलेखों पर मिलते हैं, जिनमें दानपत्र लिखकर भूमि का हस्तांतरण किया जाता था। इस प्रथा ने सामंतवाद के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, क्योंकि बड़े भू-स्वामियों का उदय हुआ और केंद्रीय सत्ता कमज़ोर होती गई।
    70. चीनी तीर्थयात्री जिसने छठी शताब्दी में भारत दर्शन किया-
    (a) युआन च्वांग
    (b) फाहियान
    (c) सुंग युन
    (d) इत्सिंग
    Jharkhand P.C.S. (Pre) 2016
    उत्तर-(c)
    चीनी यात्री सुंग युन (Song Yun) 518 ई. में भारत आया, जो छठी शताब्दी की शुरुआत में आता है। उसने तीन वर्षों में गांधार और उत्तर-पश्चिम भारत का भ्रमण कर बौद्ध ग्रंथों की प्रतियाँ एकत्रित कीं। फाहियान (399-414 ई.) चंद्रगुप्त II के काल में, ह्वेनसांग (629-645 ई.) हर्षवर्धन के काल में, और इत्सिंग (671-695 ई.) बाद में भारत आए।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: फाहियान प्रथम प्रमुख चीनी यात्री था जिसने गुप्तकालीन भारत का जीवंत वर्णन किया; उसके अनुसार उस समय भारत में शांति और समृद्धि थी तथा मृत्युदंड का प्रचलन नहीं था। इत्सिंग ने नालंदा विश्वविद्यालय में अध्ययन किया और वहाँ के शैक्षणिक वातावरण का विस्तृत विवरण दिया।
    71. योग दर्शन के प्रतिपादक हैं-
    (a) पतंजलि
    (b) गौतम
    (c) जैमिनी
    (d) शंकराचार्य
    U.P.P.C.S. (Pre) 1997
    U.P. Lower Sub. (Spl) (Pre) 2002
    U.P. Lower Sub. (Spl) (Pre) 2003
    U.P.P.C.S. (Pre) 2007
    उत्तर-(a)
    महर्षि पतंजलि को योग दर्शन का संस्थापक आचार्य माना जाता है। उन्होंने लगभग 200 ईसा पूर्व ‘योगसूत्र’ नामक ग्रंथ की रचना की, जिसमें योग के 195 सूत्र संकलित हैं। यह ग्रंथ चार पादों — समाधिपाद, साधनपाद, विभूतिपाद और कैवल्यपाद — में विभाजित है। योग दर्शन मूलतः सांख्य दर्शन पर आधारित है, अंतर केवल यह है कि सांख्य निरीश्वरवादी है जबकि योग ईश्वर को स्वीकार करता है।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: पतंजलि ने ‘अष्टांग योग’ का प्रतिपादन किया, जिसके आठ अंग हैं — यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। इसके अतिरिक्त, पतंजलि को ‘महाभाष्य’ नामक संस्कृत व्याकरण ग्रंथ का रचयिता भी माना जाता है, जो पाणिनि की अष्टाध्यायी पर एक महत्वपूर्ण टीका है।
    72. कपिल मुनि द्वारा प्रतिपादित दार्शनिक प्रणाली है- उत्तर मीमांसा
    (a) पूर्व मीमांसा
    (b) सांख्य दर्शन
    (c) न्याय दर्शन
    (d)
    U.P.P.C.S. (Pre) 1998
    उत्तर-(b)
    महर्षि कपिल द्वारा प्रतिपादित सांख्य दर्शन भारत के षड्दर्शनों में सबसे प्राचीन माना जाता है। इस दर्शन का मूल आधार ‘पुरुष’ (चेतना) और ‘प्रकृति’ (जड़ तत्व) के बीच के भेद को समझना है। सांख्य दर्शन के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति प्रकृति के तीन गुणों — सत्व, रज और तम — के असंतुलन से होती है।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सांख्य दर्शन को ‘निरीश्वर दर्शन’ भी कहा जाता है क्योंकि यह ईश्वर की सत्ता को स्वीकार नहीं करता। इस दर्शन में 25 तत्वों का विवेचन किया गया है, जिनमें एक पुरुष, एक प्रकृति और शेष 23 प्रकृति के विकार हैं। महाभारत के शांतिपर्व में भी सांख्य दर्शन के सिद्धांतों का विस्तृत वर्णन मिलता है।
    73. गुप्त काल के दौरान भारत में बलात् श्रम (विष्टि) के संदर्भ में, निम्नलि में से कौन-सा कथन सही है?

    (a) इसे राज्य के लिए आय का एक स्रोत, जनता द्वारा दिया जाने वाला एक प्रकार का कर, माना जाता था।

    (b) यह गुप्त साम्राज्य के मध्य प्रदेश तथा काठियावाड़ क्षेत्रों में पूर्णतः अविद्यमान था।

    (c) बलात् श्रमिक साप्ताहिक मजदूरी का हकदार होता था।

    (d) मजदूर के ज्येष्ठ पुत्र को बलात् श्रमिक के रूप में भेज दिया जाता था।
    IAS (Pre) 2019
    उत्तर-(a)
    गुप्त काल में ‘विष्टि’ (बेगार अथवा बलात् श्रम) को करों की श्रेणी में रखा जाता था। चंद्रगुप्त द्वितीय के उदयगिरि गुहालेख तथा प्रभावती गुप्ता के रिद्धपुर अभिलेख में इसका स्पष्ट उल्लेख है। इस प्रथा के अंतर्गत श्रमिकों, शिल्पियों एवं कृषकों को बिना किसी पारिश्रमिक के राजकीय कार्यों में श्रम करना अनिवार्य था। यह प्रथा मध्य प्रदेश और काठियावाड़ में सर्वाधिक प्रचलित थी, न कि अनुपस्थित।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: विष्टि प्रथा का प्रमाण मौर्य काल से ही मिलता है — कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी इसका उल्लेख है। मध्यकाल में यही प्रथा ‘बेगार’ के नाम से जानी जाती रही और ब्रिटिश काल तक प्रचलित रही, जब तक इसे विधिक रूप से प्रतिबंधित नहीं किया गया।
    74. ‘सांख्य’ दर्शन प्रतिपादित किया गया है-
    (a) गौतम द्वारा
    (b) जैमिनी द्वारा
    (c) कपिल द्वारा
    (d) पतंजलि द्वारा
    U.P.P.C.S. (Mains) 2010
    उत्तर-(c)
    सांख्य दर्शन के मूल प्रणेता महर्षि कपिल हैं। उन्होंने ‘सांख्यसूत्र’ की रचना की जो इस दर्शन का मूलभूत ग्रंथ है। सांख्य शब्द की उत्पत्ति ‘संख्या’ से मानी जाती है, क्योंकि इसमें तत्वों की गणना (25 तत्व) पर विशेष बल दिया गया है। यह दर्शन द्वैतवादी है — पुरुष और प्रकृति दोनों को स्वतंत्र एवं शाश्वत सत्ताएँ मानता है।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सांख्य दर्शन का सबसे प्राचीन उपलब्ध ग्रंथ ‘सांख्यकारिका’ है, जिसकी रचना ईश्वरकृष्ण ने लगभग 4थी-5वीं शताब्दी ई. में की थी। इसमें 72 कारिकाओं (श्लोकों) में सांख्य के समस्त सिद्धांतों का सुव्यवस्थित वर्णन किया गया है।
    75. शूद्रक द्वारा लिखी हुई प्राचीन भारतीय पुस्तक ‘मृच्छकटिकम्’ का विषय था-

    (a) एक धनी व्यापारी और एक गणिका की पुत्री की प्रेम-गाथा

    (b) चंद्रगुप्त II की पश्चिम भारत के शक क्षत्रपों पर विजय

    (c) समुद्रगुप्त के सैन्य अभियान तथा शौर्यपूर्ण कार्य

    (d) गुप्त राजवंश के एक राजा तथा कामरूप की राजकुमारी की प्रेम-गाथा
    I.A.S. (Pre) 2003
    उत्तर-(a)
    ‘मृच्छकटिकम्’ (मिट्टी की छोटी गाड़ी) शूद्रक द्वारा रचित संस्कृत नाटक है, जिसमें दरिद्र ब्राह्मण व्यापारी चारुदत्त और गणिका की पुत्री वसंतसेना की प्रेम-कथा का हृदयग्राही वर्णन किया गया है। यह नाटक गुप्तकालीन नगर जीवन, न्याय व्यवस्था और सामाजिक संरचना पर महत्वपूर्ण प्रकाश डालता है। इसमें उज्जयिनी नगर के विभिन्न वर्गों — व्यापारी, गणिका, चोर और न्यायाधीश — का यथार्थ चित्रण है।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मृच्छकटिकम् में 10 अंक हैं और यह संस्कृत साहित्य के उन विरल नाटकों में से एक है जिसमें नायिका एक गणिका है। इस नाटक में एक उपकथा भी है जिसमें आर्यक नामक व्यक्ति राजा पालक के विरुद्ध विद्रोह करता है — यह तत्कालीन राजनीतिक उथल-पुथल का परिचायक है।
    76. योग के आविष्कारक थे-
    (a) आर्यभट्ट
    (b) चरक
    (c) पतंजलि
    (d) रामदेव
    Uttarakhand U.D.A./L.D.A. (pre) 2007
    उत्तर-(c)
    महर्षि पतंजलि को योग दर्शन का आविष्कारक एवं व्यवस्थित प्रणेता माना जाता है। उन्होंने बिखरी हुई योग-साधनाओं को एकत्र कर ‘योगसूत्र’ के रूप में एक सुसंबद्ध दार्शनिक प्रणाली का रूप दिया। योग का उद्देश्य ‘चित्तवृत्तिनिरोध’ अर्थात मन की वृत्तियों को नियंत्रित करना है, जिससे पुरुष अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान सके।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यद्यपि योग साधना सिंधु-सरस्वती सभ्यता (लगभग 3000 ईसा पूर्व) से प्रचलित मानी जाती है — मोहनजोदड़ो से प्राप्त ‘पशुपति मुद्रा’ में ध्यानस्थ आकृति इसका प्रमाण है। संयुक्त राष्ट्र ने भारत के प्रस्ताव पर 21 जून को ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ घोषित किया है, जिसे पहली बार 2015 में मनाया गया था।
    77. प्राचीन सांख्य दर्शन में किसका महत्वपूर्ण योगदान है?
    (a) कपिल
    (b) गौतम
    (c) नागार्जुन
    (d) चार्वाक
    M.P.P.C.S. (Pre) 1997
    उत्तर-(a)
    भारतीय दर्शन के छह प्रमुख संप्रदायों (षड्दर्शन) में सांख्य सबसे प्राचीन है और इसके प्रवर्तक महर्षि कपिल हैं। सांख्य दर्शन में ज्ञान को तीन प्रमाणों — प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम — पर आधारित माना गया है। यह भारतीय चिंतन परंपरा का पहला व्यवस्थित प्रयास है जिसमें सृष्टि की उत्पत्ति को ईश्वर की इच्छा से नहीं, बल्कि प्रकृति के गुणों के असंतुलन से समझाया गया है।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गौतम न्याय दर्शन के, जैमिनी पूर्व मीमांसा के, नागार्जुन माध्यमिक बौद्ध दर्शन के, और चार्वाक लोकायत (भौतिकवादी) दर्शन के प्रणेता हैं। इस प्रकार प्रत्येक दार्शनिक संप्रदाय का अपना विशिष्ट आचार्य है।
    78. कहा जाता है कि शतरंज का खेल उद्भूत (originate) हुआ था-
    (a) चीन में
    (b) ईरान में
    (c) इंडोनेशिया में
    (d) भारत में
    U.P. Lower Sub. (Spl) (Pre) 2004
    उत्तर-(d)
    शतरंज का उद्गम भारत में हुआ था, जहाँ इसे प्रारंभ में ‘चतुरंग’ कहा जाता था। यह नाम सेना के चार अंगों — पैदल, घुड़सवार, रथ और हाथी — पर आधारित था जो आज के प्यादे, घोड़े, रुख और हाथी के रूप में प्रचलित हैं। गुप्त काल (लगभग 6ठी शताब्दी ई.) में इस खेल का प्रमाण मिलता है। भारत से यह खेल सर्वप्रथम ईरान (फारस) पहुँचा, जहाँ इसे ‘शतरंज’ कहा गया और बाद में अरब व्यापारियों के माध्यम से यूरोप तक फैला।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ईरान में लिखित 6ठी शताब्दी का ग्रंथ ‘विज़िश्न-नामक’ (Wizishn-namak) शतरंज के भारतीय उद्गम का वर्णन करता है। हर्षचरित में भी ‘चतुरंग’ का उल्लेख मिलता है। यूनेस्को ने 2023 में भारत के ‘चतुरंग/शतरंज’ को अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता देने हेतु विचार किया।
    79. भारत में दार्शनिक विचार के इतिहास के संबंध में, सांख्य संप्रदाय से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-
    1. सांख्य पुनर्जन्म या आत्मा के आवागमन के सिद्धांत को स्वीकार नहीं करता है।
    2. सांख्य की मान्यता है कि आत्म-ज्ञान ही मोक्ष की ओर ले जाता है न कि कोई बाह्य प्रभाव अथवा कारक
    उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
    (a) केवल 1
    (b) केवल 2
    (c) 1 और 2 दोनों
    (d) न तो 1 और न ही 2
    I.A.S. (Pre) 2013
    उत्तर-(b)
    कथन 1 असत्य है क्योंकि सांख्य दर्शन पुनर्जन्म और आत्मा के आवागमन के सिद्धांत को स्वीकार करता है। सांख्य के अनुसार जब तक अविवेक (प्रकृति और पुरुष में भेद न जान पाना) बना रहता है, तब तक जीव जन्म-मृत्यु के चक्र में बंधा रहता है। कथन 2 सत्य है — सांख्य में ‘विवेकख्याति’ अर्थात पुरुष और प्रकृति के भेद का बोध ही मोक्ष का एकमात्र साधन है, कोई बाह्य अनुष्ठान या दैवीय कृपा नहीं।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सांख्य दर्शन में तीन प्रकार के दुःखों का वर्णन है — आध्यात्मिक (अपने कारण उत्पन्न), आधिभौतिक (अन्य प्राणियों से उत्पन्न) और आधिदैविक (प्राकृतिक आपदाओं से उत्पन्न)। मोक्ष इन तीनों से सर्वदा मुक्ति की अवस्था है।
    80. निम्नलिखित कथनों को पढ़िए तथा सही विकल्प को चुनिए-
    कथन I : कपिल सांख्य पद्धति के सबसे पुराने प्रणेता हैं।
    कथन II : कपिल यह बताते हैं कि किसी व्यक्ति का जीवन प्रकृति की शक्तियों द्वारा गढ़ा जाता है, किसी दैवी सत्ता द्वारा नहीं।

    (a) कथन I एवं कथन II दोनों ही सही हैं।

    (b) कथन I गलत है, लेकिन कथन II सही है।

    (c) कथन I एवं कथन II दोनों ही गलत हैं।

    (d) कथन I सही है, लेकिन कथन II गलत है।
    Chhattisgarh P.C..S. (Pre) 2020
    उत्तर-(a)
    दोनों कथन सत्य हैं। महर्षि कपिल सांख्य दर्शन के आदि प्रवर्तक हैं और इस परंपरा में सर्वाधिक प्राचीन आचार्य के रूप में सम्मानित हैं। सांख्य के अनुसार सृष्टि और जीव-जगत का संचालन प्रकृति के तीन गुणों (सत्व, रज, तम) के द्वारा होता है — इसमें किसी ईश्वर या दैवीय शक्ति की भूमिका नहीं है। इसीलिए सांख्य को ‘निरीश्वरवादी’ दर्शन कहा जाता है।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सांख्य दर्शन के अनुसार प्रकृति तीन अवस्थाओं में रहती है — सृष्टि, स्थिति और प्रलय। भगवद्गीता के 13वें अध्याय में भी सांख्य के क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विवेचन का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है, जो इस दर्शन के व्यापक प्रभाव को दर्शाता है।
    81. महाभाष्य के लेखक ‘पतंजलि’ समसामयिक थे-
    (a) चंद्रगुप्त मौर्य के
    (b) अशोक के
    (c) पुष्यमित्र शुंग के
    (d) चंद्रगुप्त प्रथम के
    U.P.P.C.S. (Pre) 2011
    उत्तर-(c)
    पतंजलि एक बहुआयामी विद्वान थे जिन्होंने महाभाष्य की रचना की, जो पाणिनि के अष्टाध्यायी पर एक महत्त्वपूर्ण व्याख्या ग्रंथ है। ये शुंग वंश के प्रवर्तक पुष्यमित्र शुंग (184–148 ई.पू.) के समकालीन थे। उल्लेखनीय है कि पतंजलि को ‘शेषनाग का अवतार’ भी माना जाता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: पुष्यमित्र शुंग ने अंतिम मौर्य सम्राट बृहद्रथ की हत्या कर शुंग वंश की स्थापना की थी। पतंजलि का महाभाष्य संस्कृत व्याकरण का एक मूल आधार-ग्रंथ माना जाता है और इसमें तत्कालीन सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन की भी झलक मिलती है।
    82. न्याय दर्शन को प्रचारित किया था-
    (a) चार्वाक ने
    (b) गौतम ने
    (c) कपिल ने
    (d) जैमिनी ने
    U.P.P.C.S. (Pre) 2005
    U.P.P.C.S. (Mains) 2005
    उत्तर-(b)
    न्याय दर्शन की नींव महर्षि गौतम ने रखी, जिन्हें ‘अक्षपाद गौतम’ के नाम से भी जाना जाता है। न्याय शब्द का अर्थ है — तर्कसम्मत विश्लेषण। इस दर्शन में 16 पदार्थों की चर्चा की गई है, जिनमें प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन आदि प्रमुख हैं। न्याय दर्शन का मूल ग्रंथ ‘न्यायसूत्र’ है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: न्याय दर्शन चार प्रमाणों — प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द — को ज्ञान के वैध स्रोत मानता है। वाचस्पति मिश्र ने न्यायसूत्र पर ‘न्यायवार्तिक तात्पर्यटीका’ नामक प्रसिद्ध टीका लिखी, जो इस दर्शन की समझ को और विस्तृत करती है।
    83. चार्वाक दार्शनिक प्रणाली-

    (a) लोकायत प्रणाली भी कहलाती थी।

    (b) आस्तिक प्रणाली भी कहलाती थी।

    (c) मीमांसा प्रणाली भी कहलाती थी।

    (d) वैशेषिक प्रणाली भी कहलाती थी।
    Jharkhand P.C.S. (Pre) 2021
    उत्तर-(a)
    चार्वाक दर्शन भारतीय दर्शन परंपरा की एकमात्र पूर्णतः भौतिकवादी विचारधारा है। इसे ‘लोकायत’ दर्शन भी कहते हैं, क्योंकि यह लोक अर्थात् सांसारिक सुख को ही जीवन का लक्ष्य मानता है। यह नास्तिक दर्शन है जो वेदों की प्रामाणिकता, परलोक, और मोक्ष को नकारता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चार्वाक दर्शन के मूल प्रवर्तक बृहस्पति को माना जाता है, न कि स्वयं चार्वाक को — ‘चार्वाक’ संभवतः इस विचारधारा के एक प्रमुख प्रचारक थे। यह दर्शन केवल ‘प्रत्यक्ष’ को प्रमाण मानता है और अनुमान व शब्द (आगम) को प्रमाण के रूप में अस्वीकार करता है।
    84. निम्नलिखित में से कौन एक ‘आष्टांग योग’ का अंश नहीं है?
    (a) अनुस्मृति
    (b) प्रत्याहार
    (c) ध्यान
    (d) धारणा
    Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2015
    उत्तर-(a)
    महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र में योग के आठ अंग बताए हैं — यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। इन्हें सम्मिलित रूप से ‘अष्टांग योग’ या ‘राजयोग’ कहा जाता है। ‘अनुस्मृति’ इस सूची में नहीं आती, अतः यह आष्टांग योग का अंश नहीं है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: पतंजलि ने योग को ‘योगः चित्तवृत्तिनिरोधः’ के रूप में परिभाषित किया, अर्थात् चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है। संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2014 में 21 जून को ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ घोषित किया, जिसका प्रस्ताव भारत ने रखा था।
    85. केवल प्रत्यक्ष प्रमाण को कौन स्वीकार करता है?
    (a) जैन
    (b) चार्वाक
    (c) बौद्ध
    (d) सांख्य
    Chhattisgarh P.S.C. (Pre) 2018
    उत्तर-(b)
    भारतीय दर्शन में विभिन्न संप्रदाय अलग-अलग संख्या में प्रमाणों को स्वीकार करते हैं। चार्वाक दर्शन सबसे कट्टर भौतिकवादी स्थिति लेते हुए केवल ‘प्रत्यक्ष’ को ही ज्ञान का एकमात्र वैध साधन मानता है। बौद्ध और वैशेषिक दो प्रमाण (प्रत्यक्ष व अनुमान) स्वीकार करते हैं, जबकि न्याय दर्शन चार प्रमाण मानता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मीमांसा दर्शन सर्वाधिक छह प्रमाणों को स्वीकार करता है — प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, उपमान, अर्थापत्ति और अनुपलब्धि। चार्वाक के अनुसार अनुमान विश्वसनीय नहीं है क्योंकि यह व्याप्ति पर आधारित है, और व्याप्ति को प्रत्यक्ष से सिद्ध नहीं किया जा सकता।
    86. नव्य-न्याय संप्रदाय (स्कूल) के संस्थापक कौन थे?
    (a) रघुनाथ शिरोमणि
    (b) गंगेश
    (c) श्रीधर
    (d) उदयन
    U.P.P.C.S. (Pre) 1995
    उत्तर-(b&d)
    नव्य-न्याय दर्शन की स्थापना को लेकर विद्वानों में मतभेद है। मिथिला के तार्किक दार्शनिक उदयनाचार्य को कुछ विद्वान इसका वास्तविक संस्थापक मानते हैं, क्योंकि उनकी रचना ‘न्यायकुसुमांजलि’ को नव्य-न्याय का मूल स्रोत माना जाता है। दूसरी ओर, गंगेश उपाध्याय ने अपनी कृति ‘तत्त्वचिंतामणि’ के माध्यम से नव्य-न्याय को व्यवस्थित रूप दिया, इसीलिए उन्हें भी संस्थापक माना जाता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: रघुनाथ शिरोमणि ने अपनी कृति ‘दीधिति’ से नव्य-न्याय को और परिष्कृत किया। यह संप्रदाय मिथिला (बिहार) और नवद्वीप (बंगाल) में विशेष रूप से फला-फूला।
    87. अधोलिखित में से कौन एक चार्वाक के अनुसार सर्वोच्च मूल्य है?
    (a) धर्म
    (b) अर्थ
    (c) काम
    (d) मोक्ष
    Chhattisgarh P.S.C. (Pre) 2017
    उत्तर-(c)
    चार्वाक दर्शन भारतीय परंपरा में स्वीकृत चार पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में ‘काम’ अर्थात् इन्द्रियजन्य सुख को परम लक्ष्य मानता है। इस दर्शन में मोक्ष और परलोक की अवधारणा को पूरी तरह नकारा गया है। ‘अर्थ’ को चार्वाक केवल सुख-प्राप्ति का साधन मानते हैं, साध्य नहीं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चार्वाक दर्शन के अनुसार शरीर ही आत्मा है और चेतना चार भौतिक तत्त्वों — पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु — के संयोग से उत्पन्न होती है। इस दर्शन में ‘दुःखपरिहार’ के साथ ‘सुखप्राप्ति’ को जीवन का द्विआयामी लक्ष्य माना गया है।
    88. ‘जब तक जीवित रहो, सुख से जीवित रहो, चाहे इसके लिए ऋण ही लेना पड़े, क्योंकि शरीर के भस्मीभूत हो जाने पर पुनरागमन नहीं हो सकता।’ पुनर्जन्म का निषेध करने वाली यह उक्ति किसकी है?

    (a) कापालिक संप्रदाय वालों की के

    (b) नागार्जुन के शून्यवाद वालों की

    (c) आजीविकों की

    (d) चार्वाकों की
    I.A.S. (Pre) 1994
    उत्तर-(d)
    यह प्रसिद्ध उक्ति — ‘यावज्जीवेत् सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्। भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः।’ — चार्वाक दर्शन के मूल सिद्धांत को प्रकट करती है। यह दर्शन पुनर्जन्म, आत्मा की अमरता और मोक्ष को अस्वीकार करता है तथा वर्तमान जीवन में इन्द्रिय सुख को ही परम पुरुषार्थ मानता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चार्वाक दर्शन वेद-विरोधी होने के कारण इसे ‘नास्तिक दर्शन’ की श्रेणी में रखा गया है। इसे ‘बार्हस्पत्य दर्शन’ भी कहते हैं, क्योंकि इसके मूल सूत्र देवगुरु बृहस्पति को आरोपित किए जाते हैं।
    89. न्याय दर्शन के संस्थापक थे-
    (a) कपिल
    (b) कणाद
    (c) गौतम
    (d) जैमिनी
    Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2016
    उत्तर-(c)
    न्याय दर्शन के संस्थापक महर्षि गौतम हैं, जिन्हें ‘अक्षपाद’ भी कहा जाता है। उन्होंने ‘न्यायसूत्र’ की रचना की जो इस दर्शन का आधारभूत ग्रंथ है। न्याय दर्शन का प्रमुख उद्देश्य तर्क और प्रमाणों के माध्यम से सत्य तक पहुँचना है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कपिल ‘सांख्य दर्शन’ के, कणाद ‘वैशेषिक दर्शन’ के और जैमिनि ‘पूर्व मीमांसा’ के संस्थापक हैं — इस प्रकार इन चारों दार्शनिक परंपराओं के संस्थापक अलग-अलग हैं। न्याय और वैशेषिक दोनों दर्शनों को परस्पर पूरक माना जाता है, इसीलिए इन्हें कभी-कभी ‘न्याय-वैशेषिक’ एकीकृत परंपरा के रूप में भी देखा जाता है।
    90. न्याय दर्शन का प्रवर्तक कौन है?
    (a) गौतम
    (b) कपिल
    (c) शंकर
    (d) वल्लभ
    Chhattisgarh P.S.C. (Pre) 2018
    उत्तर-(a)
    न्याय दर्शन के प्रवर्तक गौतम ऋषि हैं। ‘न्याय’ शब्द का अर्थ होता है — वह अनुमान जिसके द्वारा किसी विषय का निश्चयात्मक ज्ञान प्राप्त हो। गौतम के न्यायसूत्र पर वात्स्यायन, उद्योतकर, वाचस्पति मिश्र और उदयन जैसे विद्वानों ने भाष्य और टीकाएँ लिखीं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शंकराचार्य ‘अद्वैत वेदांत’ के और वल्लभाचार्य ‘शुद्धाद्वैत वेदांत’ के प्रवर्तक हैं। कपिल ‘सांख्य दर्शन’ के जनक माने जाते हैं, जो भारत की सबसे प्राचीन व्यवस्थित दार्शनिक परंपराओं में से एक है।
    91. कर्म का सिद्धांत संबंधित है-
    (a) न्याय से
    (b) मीमांसा से
    (c) वेदांत से
    (d) वैशेषिक से
    U.P.P.C.S. (Pre) 1997
    उत्तर-(b)
    कर्म का सिद्धांत मीमांसा दर्शन से संबंधित है। मीमांसा दर्शन को तीन नामों से जाना जाता है — पूर्व मीमांसा, कर्म मीमांसा और धर्म मीमांसा। इस दर्शन के अनुसार वैदिक कर्मकांडों का नियमित अनुष्ठान ही मोक्ष का मार्ग है।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:
    1. मीमांसा दर्शन के प्रमुख आचार्य कुमारिल भट्ट ने तर्कपूर्ण खंडन द्वारा बौद्ध दर्शन का विरोध कर वैदिक धर्म की पुनः प्रतिष्ठा की। उन्हें पूर्व मीमांसा और वेदांत दर्शन के बीच की कड़ी माना जाता है।
    2. मीमांसा दर्शन का एक और प्रमुख आचार्य प्रभाकर मिश्र था, जिसकी विचारधारा को ‘प्रभाकर मत’ या ‘गुरुमत’ कहा जाता है। कुमारिल और प्रभाकर के मतों में अपूर्व (कर्मफल की शक्ति) की व्याख्या को लेकर मतभेद था।
    92. न्याय दर्शन के प्रवर्तक थे-
    (a) गौतम
    (b) कपिल
    (c) कणाद
    (d) जैमिनी
    U.P.P.C.S. (Mains) 2005
    उत्तर-(a)
    भारत के छह प्रमुख आस्तिक दर्शनों (षड्दर्शन) और उनके प्रवर्तकों का सही सुमेलन इस प्रकार है — न्याय दर्शन के प्रणेता महर्षि गौतम, सांख्य दर्शन के कपिल मुनि, वैशेषिक दर्शन के उलूक कणाद, मीमांसा दर्शन के जैमिनी, वेदांत दर्शन के बादरायण और योग दर्शन के पतंजलि हैं।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:
    1. न्याय दर्शन का मूल ग्रंथ ‘न्याय सूत्र’ है, जिसकी रचना महर्षि गौतम ने की। इस दर्शन में सोलह पदार्थों (categories) का विवेचन किया गया है, जिनमें प्रमाण (ज्ञान के साधन) को सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है।
    2. न्याय दर्शन चार प्रमाणों को मान्यता देता है — प्रत्यक्ष (प्रत्यक्ष अनुभव), अनुमान (तर्क), उपमान (तुलना) और शब्द (वेद वचन)। यह दर्शन तर्कशास्त्र और ज्ञानमीमांसा की दृष्टि से भारतीय दर्शन में विशेष महत्त्व रखता है।
    93. निम्न में से किस दर्शन का मत है कि वेद शाश्वत सत्य हैं?
    (a) सांख्य
    (b) वैशेषिक
    (c) मीमांसा
    (d) न्याय
    Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2013
    उत्तर-(c)
    मीमांसा दर्शन वेदों को नित्य, अपौरुषेय और शाश्वत सत्य मानता है अर्थात् वेद किसी मनुष्य या ईश्वर द्वारा रचित नहीं हैं, वे स्वतः सिद्ध हैं। इस दर्शन में वेद के दो भागों पर अलग-अलग विचार किया गया है — पूर्व मीमांसा में कर्मकांड भाग पर और उत्तर मीमांसा (वेदांत) में ज्ञानकांड भाग पर।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:
    1. मीमांसा दर्शन ईश्वर के अस्तित्व को आवश्यक नहीं मानता — इस दृष्टि से यह भारतीय आस्तिक दर्शनों में अपवाद है। इसके अनुसार वेद स्वयंसिद्ध प्रमाण हैं और उन्हें किसी ईश्वरीय सत्ता की आवश्यकता नहीं।
    2. मीमांसा दर्शन ‘शब्द’ को सबसे महत्त्वपूर्ण प्रमाण मानता है और यह सिद्ध करता है कि वैदिक शब्द नित्य हैं — इसे ‘स्फोट सिद्धांत’ के विरोध में ‘शब्द नित्यता’ का सिद्धांत कहा जाता है।
    94. मीमांसा के प्रणेता थे-
    (a) कणाद
    (b) वशिष्ठ
    (c) विश्वामित्र
    (d) जैमिनी
    Uttarakhand U.D.A./L.D.A. (Pre) 2007
    उत्तर-(d)
    मीमांसा दर्शन के प्रणेता महर्षि जैमिनी हैं। उनके द्वारा रचित ‘मीमांसा सूत्र’ (जिसे ‘जैमिनीय सूत्र’ भी कहते हैं) इस दर्शन का मूल ग्रंथ है। इस ग्रंथ में लगभग 2700 सूत्र हैं जो इसे भारतीय दर्शन के सबसे विस्तृत सूत्र-ग्रंथों में से एक बनाते हैं।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:
    1. जैमिनी महाभारत काल के ऋषि माने जाते हैं और वे महर्षि व्यास के शिष्य थे। उन्होंने सामवेद की एक शाखा का भी प्रवर्तन किया जिसे ‘जैमिनीय शाखा’ कहा जाता है।
    2. मीमांसा सूत्र पर सबसे प्राचीन उपलब्ध भाष्य शबर स्वामी द्वारा रचित ‘शाबरभाष्य’ है, जो लगभग 5वीं शताब्दी ई. का माना जाता है। इसी भाष्य पर आगे चलकर कुमारिल भट्ट और प्रभाकर ने अपनी टीकाएं लिखीं।
    95. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूची के नीचे दिए गए कूट से सही
    सूची-I (दर्शन) सूची-II (मोक्ष प्राप्त करने के तरीके)
    A. न्याय दर्शन – 1. वास्तविक ज्ञान का अभिग्रहण
    B. मीमांसा दर्शन – 2. आत्मज्ञान
    C. सांख्य दर्शन – 3. वैदिक अनुष्ठान करना
    D. वेदांत दर्शन – 4. तार्किक चिंतन
    कूट :
    A B C D उत्तर का चयन कीजिए-

    (a) 2 4 1 3

    (b) 4 3 1 2

    (c) 1 4 2 3

    (d) 3 4 1 2
    U.P.B.E.O. (Pre) 2019
    उत्तर-(b)
    षड्दर्शन में मोक्ष प्राप्ति के मार्ग अलग-अलग बताए गए हैं। न्याय दर्शन तार्किक चिंतन को, मीमांसा दर्शन वैदिक अनुष्ठानों को, सांख्य दर्शन पुरुष और प्रकृति के भेद के वास्तविक ज्ञान (विवेकख्याति) को, तथा वेदांत दर्शन आत्मज्ञान (ब्रह्मज्ञान) को मोक्ष का साधन मानता है।

    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:
    1. सांख्य दर्शन भारत का सबसे प्राचीन व्यवस्थित दर्शन माना जाता है। इसमें 25 तत्त्वों (24 प्रकृति के विकार + 1 पुरुष) का विवेचन है। सांख्य दर्शन द्वैतवादी है — यह पुरुष (चेतना) और प्रकृति (जड़) को अलग-अलग और नित्य मानता है।
    2. वेदांत दर्शन (उत्तर मीमांसा) के प्रवर्तक बादरायण हैं और इसका मूल ग्रंथ ‘ब्रह्मसूत्र’ है। इसी दर्शन पर आदि शंकराचार्य ने अद्वैतवाद, रामानुजाचार्य ने विशिष्टाद्वैतवाद और मध्वाचार्य ने द्वैतवाद की स्थापना की — तीनों की व्याख्याएं ब्रह्मसूत्र पर आधारित हैं।
    96. पुराणों के अनुसार, चंद्रवंशीय शासकों का मूल स्थान था –
    (a) काशी
    (b) अयोध्या
    (c) प्रतिष्ठानपुर
    (d) श्रावस्ती
    U.P.P.C.S. (Pre) 2009
    उत्तर-(c)
    पुराणों के अनुसार क्षत्रिय वर्ण के तीन मूल वंश थे — सूर्यवंश, चंद्रवंश (सोमवंश) और अग्निवंश। चंद्रवंश की उत्पत्ति ब्रह्मा → अत्रि → चंद्रमा की परंपरा से मानी जाती है। त्रेतायुग में इनका केंद्र प्रयाग था, किंतु द्वापर युग में चंद्रवंशीय राजा संवारन ने प्रतिष्ठानपुर (वर्तमान झुंसी, प्रयागराज) को अपनी राजधानी बनाया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: महाभारत के पाण्डव और कौरव दोनों इसी चंद्रवंश की शाखाएँ थीं — पाण्डव पाण्डु के वंशज और कौरव धृतराष्ट्र के। इसके अलावा, यदुवंश — जिसमें श्रीकृष्ण का जन्म हुआ — भी चंद्रवंश की एक प्रमुख शाखा थी।
    97. एक चालुक्य अभिलेख के तिथि अंकन में शक संवत् का वर्ष 556 दिया हुआ है। इसका तुल्य वर्ष है-
    (a) 478 ई.
    (b) 499 ई.
    (c) 613 ई.
    (d) 634 ई.
    U.P.P.C.S. (Mains) 2002
    उत्तर-(d)
    शक संवत् 78 ईस्वी से प्रारंभ होता है, अतः किसी भी शक वर्ष को ईस्वी में बदलने के लिए उसमें 78 जोड़ा जाता है। इस प्रकार शक संवत् 556 = 556 + 78 = 634 ईस्वी।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शक संवत् भारत का राष्ट्रीय पंचांग (National Calendar) है जिसे भारत सरकार ने 22 मार्च 1957 को आधिकारिक रूप से अपनाया। इसके अतिरिक्त, इस संवत् का प्रवर्तक कुषाण सम्राट कनिष्क को माना जाता है, जिनका साम्राज्य मध्य एशिया से उत्तर भारत तक फैला हुआ था।
    98. अपूर्व का सिद्धांत संबंधित है-
    (a) चार्वाक से
    (b) जैन से
    (c) बौद्ध से
    (d) मीमांसा से
    Chhattisgarh P.S.C. (Pre) 2018
    उत्तर-(d)
    मीमांसा दर्शन में ‘अपूर्व’ की अवधारणा एक अदृश्य, अतिलौकिक शक्ति को इंगित करती है जो कर्म और उसके फल के बीच की कड़ी का काम करती है। ‘अपूर्व’ का शाब्दिक अर्थ है — “जो पहले नहीं था” या “कोई नई वस्तु जो पहले नहीं जानी गई।” यह शक्ति कर्म समाप्त होने के बाद भी बनी रहती है और भविष्य में फल देती है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मीमांसा दर्शन के प्रवर्तक महर्षि जैमिनी हैं और इसका प्रमुख ग्रंथ ‘मीमांसासूत्र’ है। यह दर्शन वेदों में निहित कर्मकाण्ड (यज्ञ-याग आदि) की व्याख्या पर केंद्रित है और वेद की अपौरुषेयता (किसी मनुष्य द्वारा न रचे जाने) को दृढ़ता से स्वीकार करता है।
    99. विशिष्ट अद्वैत सिद्धांत के संस्थापक कौन थे?
    (a) रामानुजाचार्य
    (b) वल्लभाचार्य
    (c) श्रीकंठाचार्य
    (d) मध्वाचार्य
    I.A.S. (Pre) 2021
    उत्तर-(a)
    रामानुजाचार्य (1017–1137 ई.) ने विशिष्टाद्वैत दर्शन का प्रतिपादन किया। उनके अनुसार ब्रह्म (ईश्वर), जीव और जगत — तीनों सत्य हैं, किंतु जीव और जगत ब्रह्म के विशेष अंग (विशेषण) हैं। इसके विपरीत शंकराचार्य ने जगत को मिथ्या (माया) माना था। रामानुज के दर्शन में मोक्ष का मार्ग भक्ति है। वल्लभाचार्य का मत ‘शुद्धाद्वैत’ तथा मध्वाचार्य का मत ‘द्वैतवाद’ कहलाता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: रामानुजाचार्य श्री वैष्णव संप्रदाय के प्रमुख आचार्य थे और उन्होंने ‘श्रीभाष्य’ नामक ग्रंथ में ब्रह्मसूत्र की विशिष्टाद्वैत दृष्टि से व्याख्या की। उनका दर्शन बाद के भक्ति आंदोलन — विशेषकर दक्षिण भारत में अलवार संतों की परंपरा — का आधार बना।
    100. पुलकेशिन-I का बादामी शिलालेख शक वर्ष 465 का दिनांकित है। यदि इसे विक्रम संवत् में दिनांकित करना हो, तो वर्ष होगा-
    (a) 601
    (b) 300
    (c) 330
    (d) 407
    I.A.S. (Pre) 1997
    उत्तर-(a)
    शक संवत् 78 ई. से और विक्रम संवत् 58 ई.पू. से प्रारंभ होता है। किसी शक वर्ष को विक्रम संवत् में बदलने के लिए सूत्र है: विक्रम संवत् = शक संवत् + 78 + 58 = शक संवत् + 135। अतः 465 + 135 = 600, किंतु चूँकि 78 + 58 = 136 भी उपयोग होता है, सटीक परिणाम 465 + 78 + 58 = 601 होगा।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: पुलकेशिन-I चालुक्य वंश का संस्थापक था जिसने बादामी (वातापी, कर्नाटक) को अपनी राजधानी बनाया था। बादामी के प्रसिद्ध गुफा मंदिर इसी चालुक्य काल की वास्तुकला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं जो 6वीं-7वीं शताब्दी ईस्वी में निर्मित हुए।
    101. निम्न में से किस भारतीय दर्शन ने परमाणु सिद्धांत का प्रतिपादन किया ?
    (a) योग
    (b) न्याय
    (c) सांख्य
    (d) वैशेषिक
    (e) उपर्युक्त में से कोई नहीं/उपर्युक्त में से एक से अधिक
    66th B.P.S.C. (Pre) 2020
    उत्तर-(d)
    वैशेषिक दर्शन के प्रवर्तक महर्षि कणाद हैं, जिन्होंने सर्वप्रथम यह सिद्धांत प्रस्तुत किया कि सम्पूर्ण सृष्टि का निर्माण अणुओं (परमाणुओं) से हुआ है। उनके अनुसार परमाणु नित्य, अविभाज्य और अदृश्य हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वैशेषिक दर्शन सात पदार्थों (द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय और अभाव) की व्याख्या करता है। महर्षि कणाद का मूल नाम ‘उलूक’ था और उनके दर्शन को ‘औलूक्य दर्शन’ भी कहा जाता है; ‘कणाद’ नाम उन्हें इसलिए मिला क्योंकि वे कण-कण (अणु) के चिंतन में लीन रहते थे।
    102. निम्नलिखित में से अद्वैत वेदांत के अनुसार, किसके द्वारा मुक्ति प्राप्त की जा सकती है ?
    (a) ज्ञान
    (b) कर्म
    (c) भक्ति
    (d) योग
    Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2015
    उत्तर-(a)
    अद्वैत वेदांत में मोक्ष का एकमात्र साधन ज्ञान है — “ज्ञानादेव मुक्तिः।” शंकराचार्य के अनुसार अज्ञान (अविद्या) ही बंधन का कारण है और ब्रह्म-ज्ञान प्राप्त होते ही जीव मुक्त हो जाता है। ज्ञानमार्ग के अधिकारी के लिए ‘साधनचतुष्टय’ — विवेक, वैराग्य, षट्सम्पत्ति और मुमुक्षुत्व — अनिवार्य हैं। इसके विपरीत, रामानुज के विशिष्टाद्वैत में भक्ति और मध्वाचार्य के द्वैतवाद में भी भक्ति को ही मोक्ष का साधन माना गया है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शंकराचार्य ने जगत को ‘मिथ्या’ (व्यावहारिक सत्य, पारमार्थिक दृष्टि से असत्य) और ब्रह्म को एकमात्र सत्य बताया। उनका प्रसिद्ध वाक्य है — “ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः।”
    103. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए एवं नीचे दिए गए कूट की सहायता से सही
    सूची-I (संवत्सर) सूची-II (किस समय से गणना)
    A. विक्रम संवत्सर 1.3102 ई.पू.
    B. शक संवत्सर 2.320 ईस्वी
    C. गुप्त संवत्सर 3.78 ईस्वी
    D. कलि संवत्सर 5.85 ईस्वी कूट :
    A B C D उत्तर चुनिए-

    (a) 2 4 5 1

    (b) 1 3 2 4

    (c) 4 5 2 3

    (d) 4 3 2 1
    I.A.S. (Pre) 1995
    उत्तर-(d)
    विक्रम संवत् 57-58 ई.पू. से प्रारंभ होता है और इसे ‘मालव संवत्’ या ‘कृत संवत्’ भी कहा जाता है। शक संवत् 78 ई. से, गुप्त संवत् 319-320 ई. से (चंद्रगुप्त प्रथम द्वारा स्थापित) और कलि संवत् 3102 ई.पू. से माना जाता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कलि संवत् की शुरुआत महाभारत युद्ध की समाप्ति और श्रीकृष्ण के निर्वाण से जोड़ी जाती है। विक्रम संवत् आज भी राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तर भारत के अनेक राज्यों में धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यों के लिए प्रचलित है।
    104. ‘प्रच्छन्न-बौद्ध’ किसे कहा जाता है?
    (a) शंकर
    (b) कपिल
    (c) रामानुज
    (d) पतंजलि
    Chhattisgarh P.C.S. (Pre), 2019
    उत्तर-(a)
    शंकराचार्य को ‘प्रच्छन्न-बौद्ध’ (छुपा हुआ बौद्ध) इसलिए कहा गया क्योंकि उनके अद्वैत दर्शन में बौद्ध दर्शन — विशेषकर माध्यमिक बौद्ध (शून्यवाद) और योगाचार (विज्ञानवाद) — के कई तत्व समाविष्ट दिखते हैं। यह संज्ञा उनके आलोचकों द्वारा, विशेषकर रामानुज द्वारा, दी गई थी।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शंकराचार्य का जन्म केरल के कालड़ी ग्राम में लगभग 788 ई. में हुआ था। उन्होंने मात्र 32 वर्ष की अल्पायु में चार मठों की स्थापना की — श्रृंगेरी (दक्षिण), द्वारका (पश्चिम), पुरी (पूर्व) और बद्रीनाथ (उत्तर) — जो आज भी ‘शंकराचार्य पीठ’ के रूप में विद्यमान हैं।
    105. लोकायत दर्शन किसको कहा जाता है ?
    (a) जैन
    (b) बौद्ध
    (c) चार्वाक
    (d) सांख्य
    Chhattisgarh P.C.S. (Pre), 2019
    उत्तर-(c)
    चार्वाक दर्शन को ही ‘लोकायत दर्शन’ कहा जाता है। यह भारत का प्रमुख भौतिकवादी दर्शन है जो वेद, ईश्वर, आत्मा और परलोक को नकारता है। इसके अनुसार प्रत्यक्ष ही एकमात्र प्रमाण है और इस जीवन में सुख प्राप्त करना ही जीवन का उद्देश्य है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चार्वाक दर्शन के प्रवर्तक बृहस्पति को माना जाता है। इस दर्शन का मूल ग्रंथ ‘बार्हस्पत्य सूत्र’ था, जो अब उपलब्ध नहीं है। इनका प्रसिद्ध सूत्र वाक्य है — “यावज्जीवेत् सुखं जीवेत्, ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्” अर्थात् जब तक जीयो, सुख से जियो; ऋण लेकर भी घी पियो।
    106. शंकर के दर्शन को कहा जाता है-
    (a) एकत्ववाद
    (b) समग्र एकत्ववाद
    (c) द्वैतवाद
    (d) अद्वैतवाद
    Chhattisgarh P.C.S. (Pre), 2019
    उत्तर-(d)
    शंकराचार्य के दर्शन को ‘अद्वैतवाद’ कहा जाता है। इसके अनुसार ब्रह्म ही एकमात्र परम सत्य है, जीव और ब्रह्म में भेद केवल अज्ञान (अविद्या) के कारण प्रतीत होता है। ब्रह्म निर्गुण, निराकार और सच्चिदानंद स्वरूप है। जगत की प्रतीति ‘माया’ के कारण होती है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शंकराचार्य ने अपने दर्शन की स्थापना के लिए तत्कालीन प्रमुख दार्शनिकों से शास्त्रार्थ (वाद-विवाद) किया, जिनमें मंडन मिश्र से हुई प्रसिद्ध शास्त्रार्थ उल्लेखनीय है। मंडन मिश्र की पत्नी उभय भारती ने निर्णायक की भूमिका निभाई थी।
    107. निम्नलिखित युग्मों में से कौन-सा एक भारतीय षड्दर्शन का भाग नहीं है?
    (a) मीमांसा और वेदांत
    (b) न्याय और वैशेषिक
    (c) लोकायत और कापालिक
    (d) सांख्य और योग
    I.A.S. (Pre) 2014
    उत्तर-(c)
    भारतीय षड्दर्शन में छः आस्तिक दर्शन सम्मिलित हैं — सांख्य (कपिल), योग (पतंजलि), न्याय (गौतम), वैशेषिक (कणाद), मीमांसा (जैमिनी) और वेदांत (बादरायण)। ये सभी वेद-प्रामाण्य को स्वीकार करते हैं, इसीलिए ‘आस्तिक’ कहलाते हैं। लोकायत (चार्वाक) और कापालिक वेद-विरोधी या वेद-बाह्य होने के कारण षड्दर्शन के अंग नहीं हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वेद को न मानने वाले दर्शनों को ‘नास्तिक दर्शन’ कहा जाता है, जिनमें बौद्ध, जैन और चार्वाक — तीन प्रमुख हैं। कापालिक एक तांत्रिक शैव संप्रदाय था जो मुख्यतः 8वीं–12वीं शताब्दी में दक्षिण भारत में सक्रिय था।
    108. अद्वैत दर्शन के संस्थापक हैं-
    (a) शंकराचार्य
    (b) रामानुजाचार्य
    (c) मध्वाचार्य
    (d) महात्मा बुद्ध
    Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2014
    उत्तर-(a)
    अद्वैत वेदांत के संस्थापक आदि शंकराचार्य हैं। उन्होंने उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और भगवद्गीता — इन तीनों को ‘प्रस्थानत्रयी’ कहा और इन पर भाष्य लिखकर अद्वैत दर्शन को सुदृढ़ आधार दिया। ब्रह्मसूत्र पर उनका भाष्य ‘शारीरकभाष्य’ या ‘ब्रह्मसूत्रभाष्य’ के नाम से प्रसिद्ध है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शंकराचार्य ने भारत में बौद्ध धर्म के प्रभाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने ‘दशनामी संप्रदाय’ की भी स्थापना की, जिसमें गिरि, पुरी, भारती, सरस्वती, वन, अरण्य, पर्वत, सागर, तीर्थ और आश्रम — ये दस उपाधियाँ हैं।
    109. निम्न में से किसका संबंध ‘वेदांत दर्शन’ के साथ नहीं
    (a) शंकराचार्य
    (b) अभिनव गुप्त
    (c) रामानुज
    (d) माधव
    M.P.P.C.S. (Mains) 2014
    उत्तर-(b)
    वेदांत दर्शन की प्रमुख शाखाओं के आचार्य हैं — शंकराचार्य (अद्वैतवाद), रामानुजाचार्य (विशिष्टाद्वैत) और मध्वाचार्य (द्वैतवाद)। अभिनव गुप्त (लगभग 950–1020 ई.) का संबंध वेदांत दर्शन से नहीं, बल्कि कश्मीर शैव दर्शन (त्रिक दर्शन) और भारतीय काव्यशास्त्र से है। उन्होंने ‘अभिनवभारती’ (नाट्यशास्त्र की टीका) और ‘तंत्रालोक’ जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अभिनव गुप्त ने ‘रस सिद्धांत’ में ‘अभिव्यक्तिवाद’ का प्रतिपादन किया। काव्यशास्त्र में उनका योगदान इतना महत्वपूर्ण है कि उन्हें भारतीय सौंदर्यशास्त्र (Aesthetics) का सर्वोच्च आचार्य माना जाता है।
    110. निम्न कथनों पर विचार कीजिए तथा नीचे दिए गए कूट से सही
    1. विक्रम संवत् 58 ई.पू. से आरंभ हुआ।
    2. शक संवत् सन् 78 से आरंभ हुआ।
    3. गुप्तकाल सन् 319 से आरंभ हुआ।
    4. भारत में मुसलमान शासन का युग सन् 1192 से शुरू हुआ। कूट :
    उत्तर चुनिए :
    (a) 1 एवं 2
    (b) 3 एवं 4
    (c) 1, 2 एवं 3
    (d) 1, 2, 3 एवं 4
    U.P.P.C.S. (Pre) 2011
    उत्तर-(d)
    सभी चारों कथन आयोग की दृष्टि से सही हैं। विक्रम संवत् 58 ई.पू. (कुछ मत से 57 ई.पू.) से, शक संवत् 78 ई. से, गुप्तकाल चंद्रगुप्त प्रथम के राज्यारोहण (319 ई.) से और भारत में मुस्लिम शासन का युग तराइन के द्वितीय युद्ध (1192 ई.) में मुहम्मद गोरी की विजय से माना जाता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तराइन के द्वितीय युद्ध (1192 ई.) में मुहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान को पराजित किया था। इसके पश्चात् 1206 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली सल्तनत की स्थापना की, जिसे भारत में इस्लामी शासन के संस्थागत आरंभ का प्रतीक माना जाता है।
  • गुप्तकालीन प्रशासन : प्राक्-सामंत व्यवस्था, शासन और प्रशासनिक संरचना

    📚 विषय सूची

    गुप्त साम्राज्य के ऐतिहासिक स्रोत

    ➣ गुप्त राजवंश का इतिहास जानने के निम्नलिखित तीन महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं-

    1. साहित्यिक स्रोत
    2. पुरातात्त्विक स्रोत
    3. विदेशी यात्रियों के विवरण

    साहित्यिक स्रोत

    ➣ विशाखदत्तं के नाटक देवीचंद्रगुप्तम् से गुप्त शासक रामगुप्त एवं चंद्रगुप्त द्वितीय के बारे में जानकारी मिलती है।

    ➣ इसके अलावा कालिदास की रचनाएँ (ऋतुसंहार, कुमारसंभवम्, मेघदूत, मालविकाग्निमित्रम्, अभिज्ञान शाकुंतलम्) तथा शूद्रक कृत मृच्छकटिकम् और वात्स्यायन कृत कामसूत्र से, भी गुप्त काल, की जानकारी मिलती है।

    पुरातात्त्विक स्रोत

    ➣ पुरातात्त्विक स्रोत में अभिलेखों, सिक्कों तथा स्मारकों से गुप्त राजवंश के इतिहास का ज्ञान होता है।

    ➣ समुद्रगुप्त के प्रयाग प्रशस्ति अभिलेख से उसके बारे में जानकारी मिलती है।

    ➣ स्कंदगुप्त के भीतरी स्तंभलेख से हूण आक्रमण के बारे में जानकारी मिलती है, जबकि स्कंदगुप्त के जूनागढ़ अभिलेख से इस बात की जानकारी प्राप्त होती है कि उसने सुदर्शन झील का पुनर्निर्माण करवाया था।

    ➣ गुप्तकालीन राजाओं के सोने, चांदी तथा तांबे के सिक्के प्राप्त हुए हैं। इस काल में सोने के सिक्कों को दीनार, चांदी के सिक्कों को रूपक अथवा रूप्यक तथा तांबे के सिक्कों को माषक कहा जाता था।

    ➣ गुप्तकालीन स्वर्ण सिक्कों का सबसे बड़ा ढेर राजस्थान प्रांत के बयाना से प्राप्त हुआ है।

    ➣ मंदिरों में लगवा का विष्णु मंदिर (जबलपुर, मध्य प्रदेश). भूमरा का शिव मंदिर (सतना, मध्य प्रदेश), नचना कुठारा का पार्वती मंदिर (पन्ना, मध्य प्रदेश), भीतरगाँव का मंदिर (कानपुर, उत्तर प्रदेश), देवगढ़ का दशावतार मंदिर (झाँसी, उत्तर प्रदेश) आदि विशेष उल्लेखनीय हैं।

    ➣ गुप्तकालीन स्मारकों, जैसे- मंदिर, मूर्तियाँ, चैत्यगृह आदि से तत्कालीन कला और स्थापत्य की जानकारी मिलती है।

    अजंता एवं बाघ की गुफाओं के कुछ चित्र भी गुप्त कालीन माने जाते हैं।

    विदेशी यात्रियों के विवरण

    ➣ फाहियानः यह चीनी यात्री था और चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में भारत आया था। इसने मध्य देश का वर्णन किया है।

    ➣ ह्वेनसांग: इसने कुमारगुप्त प्रथम, बुधगुप्त, नरसिंहगुप्त बालादित्य आदि गुप्त शासकों का उल्लेख किया है। इसके विवरण से ही यह पता चलता है कि कुमारगुप्त ने नालंदा महाविहार की स्थापना करवाई थी।

    प्रशासन व्यवस्था

    ➣ गुप्त प्रशासन राजतंत्रात्मक व्यवस्था पर आधारित था। देवत्व का सिद्वान्त गुप्तकालीन शासकों में प्रचलित था। राजा अपने बड़े पुत्र को युवराज घोषित करता था।

    ➣ गुप्तों की प्रशासनिक व्यवस्था को प्राक्-सामंती व्यवस्था कहा जा सकता हैं दूसरी विशेषता यह थी कि संपूर्ण साम्राज्य में एक-जैसी व्यवस्था नहीं थी।

    ➣ गुप्त साम्राज्य के अंतर्गत विभिन्न अधीनस्थ शासक राज्य, आश्रित राज्य इत्यादि थे जिन्हें प्रशासनिक स्वायत्तता प्राप्त थी।

    ➣ गुप्तों की शासन व्यवस्था पूर्णतया मौलिक नहीं थी। उसमें मौर्यों, सातवाहनों, शकों तथा कुषाणों के प्रशासन की विधियों का समावेश था।

    ➣ गुप्त राजाओं की तुलना सूर्य, अग्नि, यम, कुबेर, विष्णु से की गई है।

    ➣ गुप्त काल में प्रशासन की एक मुख्य विशेषता यह थी कि इस समय वेतन नक़द में न देकर सामान्यतः भूमि अनुदान के रूप में दी जाती थी।

    ➣ दो तरह का भूमि अनुदान प्रचलन में था। अग्रहार सिर्फ़ ब्राह्मणों को प्राप्त होने वाला अनुदान होता था। इसके अंतर्गत आने वाली भूमि कर मुक्त होती थी।

    ➣ दूसरे प्रकार का भूमि अनुदान वह होता था जिसे राजा अपने अधिकारियों को उनकी सेवा के बदले उपहार के रूप में देता था।

    ➣ यद्दपि सातवाहन काल से भूमिदान की प्रथा शुरू हुई थी। किन्तु सर्वाधिक भूमि अनुदान गुप्तकाल में दिया गया।

    साम्राज्य संरंचना

    देश या भुक्ति
    (राजा)

    विषय
    (विषयपति)

    बीथि

    पेठ
    (ग्रामो का समूह)

    ग्राम
    (ग्रामिक)

    ➣ गुप्त साम्राज्य अनेक प्रांतों में विभक्त था। प्रांतों को देश, भुक्ति या अवनी कहा जाता था। भुक्ति के अधिकारी को उपरिक कहा जाता था।

    जूनागढ़ अभिलेख में सौराष्ट्र को एक देश कहा गया है। चन्द्रगुप्त के एक अभिलेख में सुकुती (मध्यभारत) नामक देश का उल्लेख मिलता है।

    ➣ सीमा प्रांतों के प्रशासक को गोप्ता कहा जाता था। इन पदों पर राजकुमारों या विश्वसनीय व्यक्तियों को ही नियुक्त किया जाता था। इन अधिकारियों की नियुक्ति पांच वर्ष के लिए की जाती थी।

    प्रांतीय शासन

    ➣ प्रांतों को जिलों में बांटा जाता था, जिसे विषय कहा जाता था। विषय का प्रधान अधिकारी विषयपति कहलाता था। विषयपति की नियुक्ति उपरिक करते थे।

    ➣ विषयपति का प्रधान कार्यालय अधिष्ठान कहलाता है। विषयपति के अधीन कर्मचारियों में शामिल थे-

    शौक्किक कर वसूलने वाला।
    गौल्मिक स्थानीय फ़ौज अथवा जंगलों का अधिकारी।
    पुस्तपाल, करणिकदस्तावेज संरक्षण

    ➣ विषयपति के सहयोग हेतु एक परिषद् होती थी। इनके सदस्यों को विषयमहत्तर कहा जाता था, जिनमें निम्न वर्ग के लोग सदस्य होते थे-

    नगरश्रेष्ठि पूंजीपति वर्ग का नेता
    सार्थवाहविषय के व्यापारियों का नेता
    प्रथम कुलिक शिल्पियों व व्यवसायियों का मुखिया
    प्रथम कायस्थ मुख्य लेखक।

    ➣ विषय को वीथियों में बांटा गया था। वीथि की समिति में भू-स्वामियों एवं सैनिक कार्यों से संबद्ध व्यक्तियों को रखा गया था। गुप्तों ने प्रथम बार इतनी व्यवस्थित प्रांतीय शासन की व्यवस्था की थी।

    ➣ वीथि से छोटी इकाई पेठ थी। जिसका उल्लेख संक्षोभ के खोह अभिलेख में मिलता है। पेठ अनेक ग्रामों के समूह को कहा जाता था।

    गुप्त साम्राज्य में ग्राम समूह की छोटी इकाई को पेठ कहते थे।

    नगरीय शासन

    ➣ नगरों का प्रशासन नगर महापालिकाओं द्वारा चलाया जाता था। नगरपति (पुरपाल, द्रांगिक) नगर का मुख्य अधिकारी होता था।

    ➣ वह कुमारामात्य के श्रेणी का अधिकारी होता था। जूनागढ़ लेख से ज्ञात होता है कि गिरनार नगर का पुरपाल चक्रपालित था।

    ➣ नगर के शासन के लिए नियुक्ति समिति को सम्भवतः पौर कहा जाता था।

    स्थानीय शासन

    ग्राम प्रशासन की सबसे छोटी इकाई थी। जिसका प्रशासन ग्राम सभा द्वारा संचालित होता था।

    ➣ ग्राम सभा का मुखिया ग्रामिक कहलाता था एवं सदस्यों को महत्तर कहा जाता था जो ग्राम के प्रतिष्ठित एवं कुलीन व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व करते थे।

    ➣ कुछ गुप्तकालीन अभिलेखों में ग्राम सभा को ग्राम जनपद एवं पंचमंडली कहा गया है।

    केंद्रीय शासन

    ➣ गुप्त प्रशासन में राजा को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था। सिद्धांत: राज्य की समग्र प्रशासनिक शक्तियां उसी में केंद्रित थी।

    ➣ वह कार्यपालिका, न्यायापालिका एवं सैनिक मामलों का प्रधान था, लेकिन उसे कानून बनाने का अधिकार नहीं था। वह धर्मप्रवर्तक (कानून का पालक) माना जाता था।

    ➣ गुप्त शासकों ने गौरवपूर्ण उपाधियों (महाराजाधिराज, परमभट्टारक, परमेश्वर, परमदेवता) द्वारा जनता पर अपना प्रभाव स्थापित किया।

    ➣ इन उपाधियो में विदित होता है कि गुप्त शासकों के अधीन अनेक छोटे राजा थे तथा गुप्त राजा देवता के सदृश थे।

    ➣ राजा को शासन कार्य में सहायता देने के लिए मंत्रिपरिषद होती थी। इसको प्रयाग प्रशस्ति में राज्य सभा कहा गया है। जबकि राज्य सभा के सदस्यों को संभय कहा जाता था।

    ➣ सदस्य सामान्यतः उच्च वंश से नियुक्त किए जाते थे। इनका पद वंशगत होता था। इनका मुख्य कार्य विभिन्न विभागों की देखभाल करना एवं राजा को मंत्रणा देना था।

    पुलिस विभाग के मुख्य अधिकारी को दण्डपाशिक कहा जाता था। इस विभाग के साधारण कर्मचारियों को चास्ट और भास्ट कहते थे।

    ➣ समुद्रगुप्त की प्रयाग-प्रशस्ति से ज्ञात होता है कि हरिषेण एक ही साथ कुमारामात्य, सांधिविग्रिहिक एवं महादंडनायक का कार्य करता था।

    ➣ नौकरशाही को अमात्य के नाम से भी जाना जाता है अमात्य का पद अधिकतर ब्राह्मणों के लिए सुरक्षित रहता था, परंतु अन्य वर्णों के व्यक्तियों की भी इस पद पर नियुक्ति होती थी।

    ➣ गुप्तकाल में अधिकारियों का पद वंशानुगत बन गया। उन्हें वेतन के रूप में नकद राशि से ज्यादा भूमि दी जाती थी।

    गुप्तकालीन अधिकारी

    पदकार्य
    1. महासेनापतिसेना का सर्वोच्च अधिकारी
    2. रणभांडगारिकसेना की आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाला प्रधान अधिकारी ।
    3. महाबलाधिकृतसैनिक अधिकारी
    4. दडपाशिकपुलिस विभाग का प्रधान
    5. महादण्डनाययुद्ध व न्याय विभाग का कार्य देखने वाला
    6. महासंधिविग्रिहिकयुद्ध व शांति का प्रधान
    7. विनयस्थितिस्थापक शांति-व्यवस्था का प्रधान
    8. महाभांडगरिधिकृत राजकीय कोष का प्रधान
    9. महाक्षपटलिकअभिलेख विभाग का प्रधान
    10. सर्वाध्यक्षकेंद्रीय सचिवालय का प्रधान
    11. महाप्रतिहारराजप्रसाद का मुख्य सुरक्षा अधिकारी
    12. ध्रुवाधिकरणकर वसूलने वाले विभाग का प्रधान
    13. अग्रहारिकदान विभाग का प्रधान

    गुप्तकालीन न्याय व्यवस्था

    ➣ गुप्तकाल में न्याय व्यवस्था पहले की तुलना में अधिक विकसित थी। स्मृतियों में गुप्तकालीन न्याय प्रणाली का उल्लेख है, जबकि गुप्त अभिलेखों में न्याय प्रणाली का उल्लेख नहीं है।

    ➣ न्यायालय के चार वर्ग थे- (1) राजा का न्यायालय, (2) पूग,(3) श्रेणी, (4) कुल

    राजा सर्वोच्च न्यायाधीश होता था। सम्राट की अनुपस्थिति में सर्वोच्च न्यायधीश प्राड्विवाक होता था।

    ➣ राजा न्याय- निर्णय ब्राह्मण. पुरोहित की सहायता से करता था। शिल्पी, वणिक आदि के संगठनों (श्रेणियों) पर उनके अपने ही नियम लागू होते थे।

    पूग नगर में रहने वाली विभिन्न जातियों की समिति होती थी, जबकि कुल समान परिवार के सदस्यों की समिति थी।

    ➣ गाँवों में ग्राम पंचायत न्याय कार्य करती थी।

    ➣ न्यायाधीश को दण्डनायक महादण्डनायक, सर्वदण्डनायक कहा जाता था। न्याय आसन को धर्मासन्न कहते थे।

    ➣ व्यापारियों की श्रेणियों के अलग न्यायालय व अपने कानून होते थे जो अपने सदस्यों के विवादों का निपटारा करते थे।

    ➣ पहली बार दीवानी और फौजदारी (व्यवहार विधि और दण्डविधि) कानून भली-भाँति परिभाषित एवं पृथक हुए। इसका प्रमुख कारण था- भूमिदान की प्रक्रिया में तेजी का आना।

    ➣ प्रथम विधि निर्माता बृहस्पति को माना जाता है। इस काल में गुप्तचर प्रणाली की भी सीमित जानकारी मिलती है।

    मृच्छकटिकम् में नगर के न्यायालय को अधिकरण मंडप और न्यायाधीश को अधिकरणिक कहा गया।

    ➣ फाह्यान के विवरण के अनुसार दण्डविधान कोमल था तथा शारीरिक यातनायेंमृत्युदण्ड नहीं दिये जाते थे। हालाँकि बार-बार राजद्रोह करने वाले व्यक्ति का दाहिना हाथ काट लिया जाता।

    ➣ इस काल में वर्ण व्यवस्था के आधार पर न्याय किया जाता था और दंड में वर्णभेद कायम था। मनुस्मृति के अनुसार चोरी करने पर ब्राह्मण को सबसे अधिक दंड और शूद्र को सबसे कम दंड दिया जाता था।

    ➣ जबकि हत्या के आरोपी शूद्र को सर्वाधिक दंड और ब्राह्मण को कम दंड मिलता था। वस्तुतः ब्राह्मण मृत्युदंड की सजा से मुक्त था।

    सामाजिक संगठन

    ➣ गुप्तकालीन समाज वर्ण एवं जाति-व्यवस्था पर आधारित था। समाज में चार प्रमुख वर्णों (1.ब्राह्मण, 2. क्षत्रिय, 3.वैश्य, 4. शूद्र) थे। वर्णों का आधार गुण व कर्म न होकर जन्म ही था।

    ➣ गुप्तकालीन सामाजिक व्यवस्था की सबसे छोटी इकाई परिवार थी।

    ➣ समाज में ब्राह्मणों का स्थान सर्वोच्च था। क्षत्रिय वर्ण का मुख्य कार्य क्षेत्र रक्षा तथा सैनिक सेवा थी। वैश्य वर्ण का मुख्य कार्य कृषि एवं व्यवसाय था।

    ➣ ह्वेनसांग ने शूद्रों को खेतिहर (कृषक) वर्ग के रूप में उल्लेखित किया है। इस काल में शूद्रों की आर्थिक दशा में सुधार हुआ। अब सैनिक वृत्ति भी अपनाने लगे थे।

    ➣ इसके अतिरिक्त शूद्रों को इस काल में रामायण, महाभारत पढ़ने का अधिकार भी मिल गया। वे अब कृष्ण नामक एक नये देवता की पूजा भी कर सकते थे।

    ➣ इस काल में वाणिज्य को भी शूद्रों का कर्त्तव्य माना जाने लगा था। मार्कण्डेय पुराण में दान देना और यज्ञ करना शूद्र का कर्त्तव्य बताया गया है।

    ➣ महाभारत के अनुशासन पर्व में शूद्रों को राजा का नाशक कहा गया है।

    ➣ ब्राह्मणों ने अन्य वर्णों के कार्य भी अपना लिए थे। इस युग में अनेक ब्राह्मण राजा हुए; परन्तु क्षत्रिय कर्म करते हुए भी उन्हें ब्राह्मण वर्ण में ही माना गया।

    चंडाल को चारों वर्णों में सबसे निम्न स्थान प्राप्त था। मछली मारने, शिकार करने और मांस बेचने का कार्य चंडाल लोग ही करते थे।

    ➣ गुप्त कालीन स्मृतियों में कुछ मिश्रित जातियों के उल्लेख मिलते हैं। जैसी मूर्द्धावषिक्क, करण, अम्बष्ठ, पराशव तथा उग्र। ब्राह्मण पुरुष और वैश्या स्त्री से उत्पन्न सन्तान अम्बष्ठ कही गई।

    ➣ फाहियान के वर्णन से ज्ञात होता है कि गुप्त काल में अस्पृश्य वर्ग था। इन्हें अंत्यज तथा चंडाल कहा गया है।

    ➣ गुप्तकाल के धर्मशास्त्रों में स्पष्ट रूप से शूद्रों को अस्पृश्यों और दासों से अलग बताया गया है।

    कौटिल्य के अर्थशास्त्र तथा वराहमिहिर की वृहत्संहिता में चारों वर्णों के लिये अलग-अलग बस्तियों का विधान किया है।

    ➣ न्याय संहिताओं में कहा गया है कि ब्राह्मण की परीक्षा तुला से, क्षत्रियों की अग्नि से, वैश्य की जल से तथा शूद्र की विष से ली जानी चाहिये।

    ➣ नारद के अनुसार चोरी करने पर ब्राह्मण का अपराध सबसे अधिक व शूद्र का अपराध सबसे कम था।

    मृच्छकटिकम् के अनुसार ब्राह्मण चारूदत्त व्यापार वाणिज्य करता था। ऐसे ब्राह्मण जिन्होंने क्षत्रिय कर्म अपना लिया था वे ब्रह्म क्षत्र कहलाते थे।

    ➣ मृच्छकटिक में कहा गया है कि ब्राह्मणशूद्र एक ही कुएं से पानी भरते थे।

    कायस्थ वर्ग

    ➣ गुप्तकाल में कायस्थ जाति का भी उल्लेख मिलता है। नई जातियों में भूमि अनुदान की प्रथा के कारण कायस्थों का उदय हुआ। कायस्थों का सर्वप्रथम उल्लेख याज्ञवल्क्य स्मृति में मिलता है।

    ➣ गुप्त अभिलेखों में कायस्थों को प्रथम कायस्थ या ज्येष्ठकायस्थ कहा गया है। गुप्त काल तक कायस्थ एक वर्ग के रूप में ही थे।

    ➣ कायस्थ शब्द का उल्लेख गुप्तकालीन नाटक मुद्राराक्षस में भी मिलता है।

    ➣ कायस्थ लेखाकरण, गणना, आय-व्यय, भूमिकर आदि के अधिकारी थे।

    दास-प्रथा

    ➣ गुप्तकाल में भी दास-प्रथा प्रचलित थी, तथापि दासों को अब आर्थिक कार्यों में न लगाकर मुख्यत: घरेलू कार्यों में लगाया गया।

    नारद ने 15 प्रकार के दासों का उल्लेख किया है, जबकि मनु ने सात प्रकार के तथा कौटिल्य ने 9 प्रकार के दासों का उल्लेख किया है।

    दास मुक्ति के अनुष्ठान का विधान भी सर्वप्रथम नारद ने ही दिया, जांकि इस काल में दास प्रथा के कमज़ोर होने का संकेत करता है।

    भूमिदान के कारण भूमि का विखंडन हुआ, अतः छोटे कृषि क्षेत्रों में अधिक दास रखने की आवश्यकता नहीं थी। यह दास प्रथा के कमजोर होने का मुख्य कारण था।

    स्त्रियों की स्थिति

    ➣ गुप्तकाल में स्त्रियों की अवस्था में गिरावट आई। यद्यपि साहित्यिक स्रोतों में पत्नी और प्रेमिका के रूप में उनका महत्व दिखाया गया है,

    ➣ तथापित उनकी स्वतंत्रता समाप्त हो गई। अपने जन्म मृत्यु तक उन्हें पुरूष की संरक्षकर्ता स्वीकार करने को बाध्य किया गया।

    ➣ यद्दपि गुप्त युग में रानियां भी शासन कार्य में सहयोग देती थीं, जिसका प्रमाण कुमारदेवी और प्रभावती गुप्त (वाकाटक वंश ) शासन से मिलता है।

    दहेज प्रथापर्दाप्रथा नहीं थी, लेकिन कालिदास स्त्रियों में पर्दा प्रथा का प्रथम साहित्यिक प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। बाल विवाह की प्रथा प्रारम्भ हुई।

    स्त्री शिक्षा का प्रचलन था। अमरकोश में शिक्षिकाओं के लिये उपाध्याया, उपाध्यायीय और आचार्या शब्द आए हैं।

    ➣ इस समय उच्च वर्ग की कुछ स्त्रियों के विदुषी और कलाकार होने का भी उल्लेख मिलता है।

    अभिज्ञानशाकुंतलम् में अनसूईया को इतिहास का ज्ञाता बताया गया हैं। मालती, माधव में मालती को चित्रकला में निपुण बताया गया हैं।

    ➣ समाज में सती प्रथा विद्यमान थी। ऐरण अभिलेख (510 ई. ) से पता चलता है कि गोपराज नामक सेनापति की मृत्यु के पश्चात उसकी पत्नी ने सती धर्म का पालन किया। उल्लेखनीय है सती प्रथा स्वछिक थी।

    कामसूत्र और मुद्राराक्षस का गणिकाओं, वेश्याओं और मेघदूतम् में उज्जयिनी के महाकाल मंदिर में कार्यरत देवदासियों का वर्णन मिलता है।

    ➣ स्त्रियों को संपत्ति-संबंधी अधिकार भी दिए गए। याज्ञवल्क्य, बृहस्पति और नारदस्मृतियों में पत्नी एवं पुत्री को संपत्ति का उत्तराधिकारिणी बनाया गया है।

    कात्यायन भी स्त्रीधन के समर्थक थे। कात्यायन के अनुसार स्त्री अपनी अचल संपत्तिस्त्रीधन को बेच या गिरवी रख सकती थी।

    ➣ प्रायः सभी स्मृतिकारों ने स्त्रीधन के उत्तराधिकार में प्रथम अधिकार पुत्रियों का माना है।

    ➣ उत्तर गुप्त कालीन स्मृति लेखकों ने स्त्रियों को कुछ विशेष परिस्थितियों में पुनर्विवाह की अनुमति दी। ये हैं:-

    1. अगर पति मर गया हो
    2. नष्ट हो गया हो (अशास्त्रीय आचरण के कारण बंधु बांधवों से परित्यक्त)
    3. संन्यायी बन गया हो
    4. पतित हो (धर्माचरण से भ्रष्ट)
    5. नपुंसक हो गया
    6. राजद्रोही हो
    7. लम्बे समय तक विदेश से वापस न आये।

    ➣ विधवाओं की स्थिति दयनीय थी। नारदपाराशर स्मृति में विधवा विवाह का समर्थन मिलता है तथा बृहस्पति स्मृति में विधवा विवाह को निषिद्ध माना गया है।

    ➣ नारद के अनुसार राजा का यह कर्त्तव्य है कि वह विधवा का भरण पोषण करे। नारद ने इसे सनातन धर्म माना है।

    ➣ उच्च वर्ग के पास अधिक भूमि होने के कारण गुप्त काल में उच्चवर्ग के पुरूष बहुविवाह करते थे जिससे स्त्री को एक संपत्ति के रूप में देखा जान लगा।

    वैश्यशूद्र वर्ग की महिलाओं को अधिक स्वतन्त्रता थी जबकि उच्च वर्णों की महिलाओं को जीवनयापन के लिये कार्य करने की आर्थिक स्वतन्त्रता नहीं थी।

    धार्मिक विकास

    ➣ इस युग में धर्म, कला, साहित्य और ज्ञान-विज्ञान की अदभुत प्रगति हुई। इसीलिए, अनेक विद्वानों ने गुप्तकाल को हिंदू-पुनर्जागरण या स्वर्णयुग का काल माना है।

    आधुनिक हिन्दू धर्म का उदय एंव ब्राह्मणों का पुनरुत्थान

    ➣ गुप्त काल ब्राह्मण धर्म के पुनरुत्थान का काल माना जाता है। ब्राह्मणों की श्रेष्ठता इस समय पुनः स्थापित हुई। राजा उन्हें भूमिदान करने लगा।

    ➣ वृहत्संहिता के अनुसार ब्राह्मणों के घरों में 5, क्षत्रियों के 4, वैश्यों के 3, शूद्रो के घरों में केवल 2 कमरे होने का उल्लेख मिलता है।

    ➣ इस काल में हिन्दू धर्म के तीन महत्त्वपूर्ण पक्ष विकसित हुए-

    1. मूर्ति उपासना का केन्द्र बन गई।
    2. यज्ञ का स्थान उपासना ने ले लिया।
    3. वैष्णव तथा शैव धर्मों का समन्वय हुआ।

    ➣ हिन्दू धर्म के पुनरुत्थान की प्रक्रिया गुप्त साम्राज्य की स्थापना से पूर्व आरम्भ हो गई थी और गुप्त काल में विकास का यह क्रम अपनी चरम सीमा पर था।

    ➣ ब्राह्मण अपने निश्चित व्यवसाय से अलग भी कार्य करने लगे। अनेक ब्राह्मणों ने ब्राह्मण-राजवंशों की भी स्थापना वाकाटक और कदंब राजवंश की थी।

    ➣ वर्तमान में प्रचलित हिन्दू धर्म के स्वरूप का निर्माण इसी युग में हुआ। यज्ञ, बलि प्रथा एवं भक्ति की भावना भी बलवती बन गई।

    ➣ हिन्दू धर्म के दो मुख्य सम्प्रदाय विकसित हुए-वैष्णव तथा शैव।

    वैष्णव धर्म

    ➣ इस समय वैष्णव एवं शैव धर्म के मध्य समन्वय गुप्तकाल में स्थापित हुआ। यह काल में वैष्णव धर्म अपने चरमोत्कर्ष पर था।

    ➣ गुप्त शासक वैष्णव धर्म के अनुयायी थे। गुप्त सम्राटों ने सिक्कों पर अपने नाम के साथ परमभागवत विशेषण का प्रयोग किया है।

    ➣ स्कन्दगुप्त का जूनागढ़ अभिलेख तथा बुद्धगुप्त का एरण स्तम्भलेख विष्णु की स्तुति से प्रारम्भ होते हैं।

    विष्णु के साथ लक्ष्मी का सर्वप्रथम उल्लेख जूनागढ़ अभिलेख में है। प्रयाग-प्रशस्ति में वैदिक देवताओं धनद, वरूण, इन्द्र, यम का उल्लेख बादामी गुफाओं में हरिहर का प्राचीनतम प्रतिमाशास्त्रीय अंकन है।

    विष्णु और नारायण की मूर्तियां, गरूड़ध्वज मंदिर बने। अवतारवाद की धारणा का उदय हुआ। विष्णु को विभिन्न अवतारों के रूप में चित्रित किया गया।

    ➣ विष्णु के 10 अवतार (1. मत्स्य, 2. कूर्म, 3. वाराह, 4. नरसिंह, 5, वामन, 6, परशुराम, 7. राम, 8. कृष्ण, 9. बुद्ध, 10.कल्कि) माने गए हैं।

    ➣ गुप्तकालीन एक अभिलेख (गंगधर अभिलेख) में विष्णु को मधुसुदन कहा गया है।

    ➣ बनारस से प्राप्त एक मूर्ति में विष्णु को गोवर्धन पहाड़ को गेंद के समान हाथ में उठाए हुए दिखाया गया है।

    ➣ अनेक पुराणों का नामकरण विष्णु और उनके अवतार के आधार पर किया गया।

    ➣ त्रिमूर्ति के रूप में ब्रह्मा (सर्जक), विष्णु (पालक) एवं महेश (संहारक) की पूजा गुप्त काल में प्रारम्भ हुई।

    देवगढ़ (झांसी) का दशावतार मन्दिर गुप्तकाल में वैष्णव धर्म का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। यह मंदिर पंचायतन श्रेणी का है। इसमें विष्णु को शेषनाग की शैया पर विश्राम करते हुये दिखाया गया है। पहले इसका नाम केशवपुर था।

    वैष्णवधर्म का प्रचार समस्त भारत के अतिरिक्त दक्षिण-पूर्वी एशिया, हिंदचीन, कंबोडिया, मलाया और इंडोनेशिया तक हुआ।

    शैव धर्म

    ➣ वैष्ण संप्रदाय के अतिरिक्त शैवमत (शिवभागवत संप्रदाय) का भी विकास हुआ। गुप्तकाल में शैवधर्म के लोकप्रिय होने का अनेक प्रमाण मिलता है। शिव की मूर्तियां बनाई गई एंव अनेक मंदिरों का भी निर्माण हुआ।

    ➣ गुप्त काल में अनेक शैव मन्दिरों का निर्माण हुआ। शिव की मूर्तियाँ दो प्रकार से बनायी जाती थीं- (1) मानव आकार में (2) लिंग के रूप में।

    ➣ स्कंदगुप्त के बैल के आकार वाले सिक्कों से शैवधर्म में उसकी अनुरक्ति प्रकट होती है। कुमारगुप्त सिक्कों पर भी मयूर पर आरूढ़ स्कंद के चित्र मिलते हैं।

    करमदंडालिंग अभिलेख में कुमारगुप्त प्रथम के मंत्री पृथ्वीसेन द्वारा शिवमंदिर को दिए गए दान का उल्लेख है।

    ➣ शैवधर्म के अंतर्गत इस समय पाशुपत-संप्रदाय का अधिक विकास हुआ। मथुरा इसका प्रमुख केंद्र था।

    कालिदास की रचनाओं में शिवभक्ति की झलक मिलती है। वह गोकर्ण के शिव, काशी के विश्वनाथ और उज्जैन के महाकाल मंदिर के ज्योतिर्लिंग का उल्लेख करते हैं।

    वायुमत्स्यपुराणों में भी शिव की महिमा का बखान है। मत्स्यपुराण में वाणासुर द्वारा शिवलिंग को सिर पर रख कर पूजा करने का उल्लेख मिलता है।

    ➣ महाभारत के अनुशासन पर्व में भी लिंग पूजा की चर्चा की गई है। अर्द्धनारीश्वर के रूप में शिव-पार्वती और हरिहर के रूप शिव-विष्णु के संयुक्त स्वरूप की पूजा की जाती थी।

    ➣ गुप्त काल में शैव धर्म के अनेक सम्प्रदायों का विकास हुआ। वामन पुराण में इनकी संख्या चार है- (1) शैव, (2) पाशुपति,(3) कापालिक, (4) कालामुख।

    बौद्ध धर्म

    ➣ गुप्त शासकों का व्यक्तिगत धर्म वैष्णव धर्म था। लेकिन उतरवर्ती गुप्त शासकों ने बौद्ध धर्म अपना लिया।

    ➣ फाह्यान के वर्णन के अनुसार गुप्त काल में कश्मीर, अफगानिस्तान और पंजाब बौद्ध धर्म के केन्द्र थे। वैशाली, श्रावस्तीकपिलवस्तु गुप्त युग में बौद्ध धर्म के समृद्ध केन्द्र थे

    ➣ सैद्धान्तिक रूप से बौद्ध धर्म हिन्दू धर्म का घोर विरोध था; परन्तु उपासना कर्म के व्यवहार में वह ब्राह्मण धर्म के अत्यन्त समीप आ गया।

    ➣ इस काल में महायान सम्प्रदाय अधिक लोकप्रिय रहा। इस मत के अन्तर्गत नवीन दार्शनिक सम्प्रदायों, जैसे- माध्यमिक तथा योगाचार का प्रादुर्भाव था।

    ➣ गुप्तकाल में अनेक प्रसिद्ध बौद्ध आचार्यों का आविर्भाव हुआ। उनमें अनेक प्रसिद्ध बौद्ध दार्शनिक महायान शाखा के समर्थक थे, जैसे- आर्यदेव, असंग, वसुबन्धु, मैत्रेयनाथ और दिड्नाग आदि।

    ➣ चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने आम्रकार्द्दव नामक एक बौद्ध को उच्च पद दिया। उसने काकनादबार (साँची) के महाविहार को पच्चीस दीनार दान में दी थी। साँची लेख से यह जानकारी मिलती है।

    ➣ मानकुंवर अभिलेख में बुद्धमित्र द्वारा तथा सारनाथ अभिलेख में अभयमित्र द्वारा बुद्ध की प्रतिमा का उल्लेख है।

    ➣ कुमारगुप्त प्रथम ने नालंदा महाविहार की स्थापना करवाई। जो कालांतर में नालंदा विश्व विद्यालय (महायान शाखा से सम्बंधित) के रूप में उभरा। नालन्दा का दूसरा नाम मृगशिखावन था।

    जैन धर्म

    जैन धर्म का भी प्रभाव सीमित क्षेत्रों में बना रहा। उत्तर भारत में जैनधर्म को राजकीय प्रश्रय नहीं मिला किन्तु दक्षिण के कदम्ब एवं गंग राजाओं ने इसे आश्रय प्रदान किया।

    मथुरा और बल्लभी श्वेताम्बर जैन धर्म के केन्द्र थे और बंगाल में पुंड्रबर्धन दिगम्बर सम्प्रदाय का केन्द्र था। 513 ई. में वल्लभी में जैन सभा हुई। वल्लभी सभा का सभापति जैन आचार्य देवर्धिगणि (क्षमाश्रमण) था।

    कहौम के लेख के अनुसार स्कन्दगुप्त के काल में मद्र नामक व्यक्ति ने पाँच जैन तीर्थंकरों की मूर्तियां स्थापित कराई।

    ➣ मगध से लेकर कलिंग, मथुरा, उदयगिरितमिलनाडु तक जैन धर्म का प्रचार था, परन्तु मगध अब इसका केन्द्र नहीं था।

    ➣ गुप्त काल में ही देवनन्दि नामक एक जैन आचार्य ने सर्वार्थसिद्धि नामक ग्रन्थ लिखा। देवनन्दि ने प्रसिद्ध व्याकरण ग्रन्थ जैनेन्द्र व्याकरण भी लिखा।

    गुप्तकालीन अर्थव्यवस्था

    ➣ गुप्तकालीन आर्थिक व्यवस्था भूमि पर आधारित थी। अतः, कृषि ही आर्थिक व्यवस्था की आधारशिला थी। भूमि पर

    ➣ मुख्यतः राजा का अधिकार होता था।

    ➣ अमरकोश में 12 प्रकार की भूमि का उल्लेख मिलता है। निवर्तन. कुल्यावाप, द्रोणवाप तथा आढ़वाप भूमि माप का पैमाना थी।

    भूमि का वर्गीकरण

    क्षेत्र खेती योग्य भूमि
    खिलबेकार भूमि
    अप्रहत् जंगल भूमि
    गपत सर चारागाह भूमि
    वास्तु निवास करने योग्य भूमि,
    गोचर पशुओं के चारा योग्य भूमि
    सिल न जोती जाने वाली भूमि

    वृहद्संहिता के अनुसार तीन फसलों की जानकारी थी। कृषि अधिकांशतः वर्षा पर ही निर्भर थी। वृहत्संहिता में मौसम के विषय में अनेक भविष्यवाणियां हैं।

    ➣ इत्सिंग के अनुसार चावल और जौ प्रमुख फसलें थी। अष्टांग संग्रह में चावल की 44 किस्मों का वर्णन है।

    ➣ कालिदास ने गन्ना (ईख)चावल (धान) की खेती का उल्लेख किया है। कालिदास के अनुसार कालीमिर्च और इलायची मलय पर्वत (नीलगिरी) के पास बहुत होते थे।

    सिंचाई व्यवस्था

    ➣ सिंचाई का प्रबंध राज्य करता था। सिंचाई का सर्वोत्तम उदाहरण स्कंदगुप्त के जूनागढ़ अभिलेख में मिलता है।

    अमरकोश से ज्ञात होता है कि गुप्तकाल में नदियों से नहरें निकाली गई और तालाब भी बनाये गये।

    अग्नि पुराण के अनुसार कृषि की वृद्धि के लिये सिंचाई के साधन जुटाना राजा के प्रमुख आठ कर्त्तव्यों में से एक है। सिंचाई रहट (अरघट्ट) से भी होती थी।

    हलदण्डकार हल रखने वाले प्रत्येक कृषक द्वारा दिया जाने वाला एक कर था।

    अदेवमातृक भूमि वह भूमि थी जिस पर कृषि वर्षा पर आधारित न होकर कृत्रिम साधनों द्वारा की गई सिंचाई पर निर्भर थी, अर्थात् वह भूमि जिस पर बिना वर्षा के अच्छी खेती हो सके।

    भूमि के नाप

    नल भूमिमाप में प्रयुक्त होने वाली धातु की छड़ या उसी लम्बाई की रस्सी को कहा जाता था।

    पाटक भूमि का बड़ा नाप था। धनुदण्ड भी भूमि नाप थे।

    आढ़वाप, द्रोणवाप, कुल्यवाप, नल, निवर्तन एवं अंगुल भी भूमि के नाप थे। अंगुल सबसे छोटा भूमि माप था।

    4 आढ़वाप 1 द्रोणवाप
    8 द्रोणवाप 1 कुल्यवाप
    5 कुल्यवाप1 पाटक

    ➣ भूमि नापने वाले अधिकारी को क्षेत्रकर कहा जाता था।

    ➣ भूमि विक्री से पहले पुस्तपालविषयपति से अनुमति लेनी पड़ती थी।

    पशुपालन जीविका का अन्य प्रमुख साधन था। अमरकोश में पालतू पशुओं की सूची दी गई है।

    व्यापार

    कपड़े का निर्माण करना इस काल का सर्वप्रमुख उद्योग था। अमरकोश में कताई, बुनाई, हथकरघा, धागे इत्यादि का सन्दर्भ आया है।

    ➣ इस काल में मिट्टी के बर्तन एवं मृणमूर्तियाँ बनाने तथा पत्थर एवं धातु के सामान तैयार करने का उद्योग भी विकसित हुआ। मेहरौली का लौह-स्तंभ गुप्तकालीन धातु निर्माण कला का संवत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।

    पूग विभिन्न जातियों के व्यापारियों का समूह।
    श्रेणी एक ही जाति के व्यापारियों का समहू।
    निगम एक ही नगर के निवासियों का समूह

    ➣ व्यापारियों की एक समिति होती थी, जिसे निगम कहा जाता था।

    ➣ निगम का प्रधान श्रेष्ठि कहलाता था। व्यापारियों के समूह को सार्थ तथा उनके नेताओं को सार्थवाह कहा जाता था।

    ➣ इस काल तक रोमन व्यापार का पतन हो चुका था, लेकिन दक्षिण-पूर्व एशिया एवं चीन के साथ व्यापार में वृद्धि हुई।

    ➣ इस समय बंगाल में ताम्रलिप्ति प्रमुख बन्दरगाह था; जहाँ से चीन, लंका, जावा, सुमात्रा (दक्षिण-पूर्वी एशिया) आदि देशों के साथ व्यापार होता था।

    ➣ पश्चिमी भारत का प्रमुख बन्दरगाह भृगुकच्च (भड़ौच) था, जहाँ से पश्चिमी देशों के साथ समुद्री व्यापार होता था।

    ➣ गुप्तकाल में व्यापारिक सम्बन्ध मुख्य रूप से बेजन्टाइन साम्राज्य तथा चीन के साथ था। चीन और भारत का व्यापार इस समय सम्भवतः वस्तु विनिमय प्रणाली पर आधारित था।

    बेजन्टाइन साम्राज्य को निर्यात की जाने वाली दो अत्यन्त महत्त्वपूर्ण वस्तुएं रेशम और मसाले थे। रेशम व्यापार अतिमहत्त्वपूर्ण था।

    ➣ विदेशों को निर्यात की जाने वाली वस्तुओं में सर्वाधिक महत्वपूर्ण मसाला था।

    कॉसमॉस के वृत्तान्त से पता चलता है कि भारत और चीन व्यापार में सिंहलद्वीप (श्रीलंका) एक महत्त्वपूर्ण बिचौलिए के रूप में काम करता था।

    ➣ इस काल में चीन से रेशम (चीनांशुक), इथियोपिया से हाथीदांत तथा अरब, ईरान एवं बैक्ट्रिया से घोड़ों का आयात किया जाता था।

    ➣ पश्चिमी जगत से भारत में आयातित सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण वस्तुएं थी- मदिरा, बहुमूल्य रत्न, औषधियाँ और जड़ी-बूटियाँ आदि।

    गुप्तकालीन मुद्राएँ

    ➣ गुप्त साम्राज्य के विभिन्न भागों से सिक्कों के 16 ढेर मिले हैं, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण बयाना (भरतपुर, राजस्थान) से मिले हुए सिक्कों के ढेर हैं।

    ➣ गुप्त शासकों ने सर्वाधिक स्वर्ण मुद्राएँ जारी की, जिन्हें उनके अभिलेखों में दीनार कहा गया है। सोने का सिक्का 144 ग्रेन का होता था।

    ➣ चाँदी का सिक्का रूपक एवं तांबे का सिक्का माषक था।

    चांदी के सिक्के का प्रयोग स्थानीय लेन-देन में किया जाता था। चांदी के सिक्के सर्वप्रथम चंद्रगुप्त द्वितीय ने शकों पर विजय के पश्चात् आरंभ किये थे।

    ➣ फाह्यान के अनुसार साधारण जनता रोज के विनिमय में वस्तुओं की अदला-बदली तथा कौड़ियों से काम चलाती थी।

    ➣ कुषाण शासकों ने जहां ताँबे के अधिक सिक्के चलाये, वहीं गुप्तों के ताँबे के सिक्के बहुत ही कम मिले हैं। अतः जन सामान्य में मुद्रा का प्रयोग कुषाण काल की तुलना में गुप्तकाल में काफी कम हो गया।

    सैनिक संगठन

    ➣ गुप्त काल में स्थायी सेना थी। सेना के चार प्रमुख अंग थे-पदाति,रथरोही,अश्वारोही,गजसेना।

    ➣ सेना का सर्वोच्च अधिकारी महाबलाधिकृत कहलाता था। गजसेना का प्रधान महापीलुपति तथा अश्वसेना का प्रधान भटाश्वत था।

    हाबलाधिकृत सर्वाच्च सेनाधिकारी
    महापीलुपतिहाथियों की सेना का प्रधान
    भटाश्श्वपतिघुडसवारों की सेना का प्रधान
    रणभण्डागरिका पदाति समानों की अवस्था करने वाले अधिकारी
    चमूय पदाति सेना की टुकड़ी
    कटुक गजसेना का नायक
    अटाश्वपतअश्वारोही सेना का प्रमुख

    ➣ पैदल सेना की छोटी टुकड़ी को चमूय तथा साधारण सैनिक को चाट कहा जाता था।

    ➣ सेना के साजोसामान की देखरेख करने वाला अधिकारी रणभाण्डागारिक कहलाता था।

    ➣ गुप्तचर कर्मचारी को दूत तथा पुलिस कर्मचारी को भट (भाट) कहा जाता था।

    ➣ पुलिस विभाग के पदाधिकारियों में उपरिक, दशापराधिक, चौरोद्धरणिक, दंडपाशिक, अंगरक्षक आदि प्रमुख पद थे।

    ➣ रथों का महत्त्व समाप्त हो गया व घोड़ों का महत्व बढ़ा। प्रयाग प्रशस्ति के गुप्तकाल के कुछ अस्त्र-शस्त्रों के नाम मिलते है जैसे- परशु, शर, शंकु, तोमर, मिन्दिपाल, नाराच आदि।

    रणभांडागारिक (पदाति वस्तुओं की व्यवस्था रने वाला अधिकारी) रसद की व्यवस्था करता था।

    राजस्व व्यवस्था

    ➣ प्राचीन परम्परा के अनुसार राजा भूमि का स्वामी होता था। अर्थशास्त्र में भी राजा को भूमि का स्वामी माना गया है। मनुगौतम ने भी राजा को भूमि का अधिपति बताया है।

    ➣ राजा भूमिकर के रूप में उपज का छठा हिस्सा लेता था। इसीलिये कालिदास ने सम्राट को षष्टमांश वृत्ति कहा है। इस कर को भाग कहा जाता था।

    ➣ भूमि कर भोग का उल्लेख मनुस्मृति में तथा भेंट नामक कर का उल्लेख हर्षचरित में किया गया है।

    ➣ गुप्तकाल में भूमि सम्बन्धी करों की संख्या बढ़ गई, किन्तु वाणिज्य-करों की संख्या घटी (संभवतः 1/4 से 1/6 तक)। कुछ प्रमुख करों के नाम निम्न हैं-

    भाग भूमि उपज का लगभग 1/6 भाग।
    भोग राजा को प्रतिदिन दी जाने वाली फल-सब्जी आदि की भेंट
    उद्रंग एक प्रकार का भूमिकर।
    उपरिकर एक प्रकार का भूमिकर।
    भूतावात प्रत्याय विदेशी वस्तुओं के आयात पर लगा कर।
    शुल्कसीमा, बिक्री की वस्तुओं आदि पर लगने वाला कर।

    ➣ कृषक अपना भूमिकर हिरण्य (नकद)मेय (अन्न के रूप में) दोनों रूपों में दे सकते थे।

    ➣ राजस्व का एक अन्य स्रोत भूमि रत्न, गड़ा हुआ गुप्त धन, खान, नमक इत्यादि थे।

    ➣ भूपति कृषकों व उनकी स्त्रियों से बेगार भी ले सकता था। बेगार को विष्टि कहा जाता था। विष्टि का उल्लेख वाकाटक अभिलेख एवं कामसूत्र में मिलता है, लेकिन गुप्त लेखों में उल्लेख नहीं है।

    ➣ भूमिकर संग्रह करने के लिए धुवाधिकरण तथा भूमि अभिलेखों को सुरक्षित करने के लिए महाक्षपटलिका और कारणिक नामक पदाधिकारी थे। न्यायाधिकरण नामक अधिकारी भूमि सम्बन्धी विवादों का निपटारा करते थे।

    ध्रुवाधिकरण भूमिकर संग्रह अधिकारी
    महाक्षपटलिक एवं करणिकआय-व्यय, लेखा-जोखा अधिकारी
    शौल्किकसीमा शुल्क यां भू-कर अधिकारी
    न्यायाधिकरणभूमि संबंधी विवादों का निपटारा करने वाला अधिकारी

    ➣ गुप्त काल के प्रारम्भिक दिनों में केन्द्रीय प्रान्तों में राजा की अनुमति के बिना सामन्त को भूमिदान देने का अधिकार नहीं था परन्तु छठी शताब्दी से राजा की अनुमति के बिना भी भूमिदान देने की परम्परा शुरू हो गई।

    ➣ पांचवीं सदी तक के अभिलेखों से ज्ञात होता है कि राजा चोरों को दंडित करता था; परन्तु आगे चलकर चोरों को दण्डित करना या परिवार की सम्पत्ति इत्यादि के झगड़ों पर न्याय देने का अधिकार भी भूमिदान के साथ ब्राह्मणों को हस्तान्तरित किया जाने लगा।

    ➣ मंदिरों तथा ब्राह्मणों को शैक्षणिकधार्मिक उद्देश्यों से जो कर मुक्त भूमि दान में दी जाती थी उसे अग्रहार कहा जाता था। सामान्य तौर पर ये अनुदान स्थायी होते थे।

    ➣ ब्राह्मणों के भरण पोषण हेतु प्रदत्त कर मुक्त भूमि ब्रह्मदेय थी।

    ➣ बाद में गुप्तशासकों ने राजकीय कर्मचारियों को भी वेतन के बदले भूमिदान देना शुरू कर दिया तथा अनुदान व राजकीय पद वंशानुगत होने लगे।

    ➣ भूमिकर संग्रह (धान्य में राजा का अंश) के लिये ध्रुवाधिकरण नामक अधिकारी होता था।

    ➣ भूमि अभिलेखों को सुरक्षित करने के लिये महाअक्षपटलिक तथा करणिक नामक अधिकारी होते थे।

    ➣ भूमि सम्बन्धी विवादों के निपटारे के लिये न्यायाधिकरण नामक अधिकारी होते थे।

    ➣ किसी भी गुप्त शासक द्वारा प्रत्यक्ष रूप से भूमिदान का एकमात्र साक्ष्य स्कन्दगुप्त का भीतरी लेख है, जिसमें विष्णु मन्दिर को भूमिदान दिया था।

    गुप्तकालीन राजस्व के मुख्य स्रोत

    भाग भू-राजस्व को भाग कहा जाता था, जो उपज का छठां भाग होता था। यह आय का मुख्य स्रोत था।
    भोग भेंट स्वरूप राजा को दिया गया हिस्सा भोग कहलाता था।
    शुल्क यह सीमा कर था, जो बिक्री की वस्तुओं पर लगाया जाता था। इसको वसूलने वाला अधिकारी शौल्किक कहलाता था।
    उपरि कर एवं उद्रंग यह एक प्रकार का भूमि कर होता था। उद्रग भी एक अतिरिक्त कर था जो सम्भवत पुलिस कर था।
    क्लिप्त एवं उपक्लिप्त क्रय एवं विक्रय कर।
    हलिव कर हल रखने वाले प्रत्येक किसान से लिया जाने वाला कर।
    हिरण्य नगद रूप लिया जाने वाला भूमिकर
    मेय अन्न रूप लिया जाने वाला भूमिकर
    विष्टि बेगार प्रथा
    ध्रुवाधिकरण भूमिकर संग्रह करने वाले अधिकारी
    महाक्षपटलिक तथा करणिक भूमि अभिलेखों को रखने वाला अधिकारी
    निगम गुप्तकालीन व्यापारियों की समिति
    श्रेष्ठि निगम का प्रधान
    सार्थ एक स्थान से दूसरे स्थान पर माल ले जाकर व्यापार करने वाले व्यापारी
    सार्थवाह सार्थों का मुखिया
    पूग एक स्थान के रहने वाले किंतु अलग-अलग व्यवसाय करने वाले लोगों की संस्था/नगर में रहने वाली विभिन्न जातियों की समिति
    कुल समान परिवारों के सदस्यों की समिति
    श्रेणीएक ही प्रकार के व्यवसाय करने वाले सदस्यों की संस्था

    राजस्व शब्दावली

    शब्दअर्थ
    1. ध्रुवाधिकरणभूमिकर संग्रह करने वाला पदाधिकारी
    2. महाखपटलिकभूमि आलेखों को सुरक्षित रखनेवाला अधिकारी
    3. न्यायाधिकरणभूमि संबंधी विवादों का निपटारा करने वाला पदाधिकारी
    4. अयुक्तक व विनियुक्तकभूमि क्रय-विक्रय से संबंधित अधिकारी
    5. उदंगस्थायी कृषकों से लिया जानेवाला कर
    6. उपरि करअस्थायी कृषकों से लिया जाने वाला कर
    7. भाग करराजा को दिया जानेवाला उपज का 1/6 भाग
    8. भोगराजा को फल व सब्जियों के रूप में दिया जाने वाला कर
    9. हलदंड करहल पर लगने वाला कर
    10. शुल्कसीमा, बिक्री की वस्तुओं पर लगने वाला कर। शुल्क वसूलने वाला पदाधिकारी

    स्थापत्य – कला

    ➣ गुप्तकाल में ही मंदिर निर्माण कला का जन्म हुआ। गुप्तयुगीन मन्दिर नागर शैली में बने हैं। गुप्तकाल के अधिकांश मन्दिर पाषाण निर्मित हैं।

    ➣ गुप्तकाल में पंचायतन शैली के मन्दिर बनने शुरू हुए। पंचायतन शैली का प्राचीनतम उदाहरण देवगढ़ का दशावतार मन्दिर है।

    शिखरयुक्त मन्दिरों का निर्माण गुप्तकाल की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी। इस काल के मन्दिरों के निर्माण में छोटी-छोटी ईंटों तथा पत्थरों का प्रयोग किया जाता था।

    ➣ गुप्तकाल में ब्राह्मण एवं बौद्ध गुहा मन्दिरों का भी निर्माण हुआ। गुप्तकाल में मन्दिरों के सबसे ज्यादा साक्ष्य मध्यप्रदेश से प्राप्त होते हैं।

    ➣ गुप्तकाल में मूर्तिकला के तीन प्रमुख केन्द्र थे- मथुरा, सारनाथ और पाटलिपुत्र। गंगा और यमुना की मूर्ति रूप गुप्त काल की ही देन है।

    ➣ गुप्त मूर्ति कला के सर्वोत्तम उदाहरण सारनाथ की मूर्तियाँ हैं और चित्रकला के सर्वोत्कृष्ट उदाहरण अजन्ता बौद्ध कला के उदाहरण हैं।

    ➣ गुप्त युग में विभिन्न कलाओं- मूर्तिकला, चित्रकला, वास्तुकला, संगीत तथा नाट्य कला के क्षेत्र में अत्यधिक उन्नति हुई। प्राचीन भारत में स्थापत्य एवं चित्रकला के क्षेत्र में विकास की चरम सीमा गुप्तकाल में ही प्राप्त होती है।

    ➣ गुप्त काल में नागर एवं द्रविड़ शैली (मंदिर निर्माण शैली) का विकास हुआ। जिसमे से नागर शैली में मंदिर बनाये जाते थे।

    ➣ मूर्तियों में विष्णु, शिव, पार्वती, ब्रह्मा के अतिरिक्त बुद्ध तथा जैन तीर्थंकर की मूर्तियों का निर्माण भी हुआ।

    मन्दिर निर्माण कला का जन्म गुप्तकाल में ही हुआ। देवगढ़ का दशावतार मन्दिर भारतीय मन्दिर निर्माण में शिखर का सम्भवतः पहला उदाहरण है। दशावतार मंदिर में नाग-शैया पर विष्णु को विश्राम करते हुए दिखाया गया है।

    ➣ अधिकांश मंदिर विष्णु के बने हैं। इन मंदिरों में उल्लेखनीय है- देवगढ़ (झांसी) का दशावतार-मंदिर,तिगवा (जबलपुर) का विष्णु-मंदिर, सिरपुर का लक्ष्मण-मंदिर, एरण के वराह व विष्णु-मंदिर, अंतर्वेदी का सूर्य-मंदिर बघेलखंड का नचनाकुठारा, नागोद में भ्रमरा एवं खोह के शिव मंदिर तथा भितरगांव का कृष्ण मंदिर

    ब्राह्मणगुहा मंदिर का सबसे बढ़िया उदाहरण उदयगिरी का गुहा मंदिर (विष्णुमंदिर) है। इसका निर्माण चंद्रगुप्त द्वितीय के सेनापति वीरसेन ने करवाया था।

    सारनाथ की बुद्धमूर्ति, मथुरा की वर्धमान महावीर की मूर्ति, विदिशा की वराह अवतार की मूर्ति, झाँसी की शेषशायी विष्णु की मूर्ति, काशी की गोवर्धनधारी कृष्ण की मूर्ति आदि इस युग की मूर्तिकला के प्रमुख उदाहरण हैं।

    अजन्ता की 16 एवं 17 और 19 गुफा के चित्र एवं बाघ गुफा इसी समय चित्रित किए गए, जो चित्रकला के सर्वोत्तम उदाहरण हैं। यह महाराष्ट्र राज्य में अवस्थित हैं।

    बाघ एवं अजंता की गुफा में बुद्ध के जीवन से संबद्ध घटनाओं को दर्शाया गया है।

    ➣ अजन्ता के चित्र मुख्यतः धार्मिक विषयों पर आधारित हैं, जबकि बाघ के चित्र मनुष्य के लौकिक जीवन से लिए गये हैं।

    सारनाथमथुरा की बौद्ध प्रतिमासुल्तानगंज की ताम्र-बौद्ध प्रतिमा जो बुद्ध मूर्तियों की विशेषता है। घुंघराले बाल, अलंकृत प्रभामंडल तथा मुद्राओं की विविधता है।

    ➣ वास्तुकला के अन्तर्गत विभिन्न मन्दिर, गुफा, चैत्य, विहार, स्तूप इत्यादि का निर्माण हुआ। इनके निर्माण में पत्थरों तथा पक्की ईंटों का प्रयोग किया गया।

    ➣ सारनाथ का धम्मेख स्तूप तथा राजगृह स्थित जरासंध की बैठक गुप्तकाल की देन है।

    नालंदा महाविहार की भी स्थापना गुप्तकाल में ही हुई, जो आगे चलकर विश्वविख्यात शैक्षणिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ।

    साहित्य विकास

    ➣ गुप्त काल में राजकीय भाषा संस्कृत थी।

    ➣ गुप्तकाल को संस्कृत साहित्य का स्वर्णकाल कहा जाता है। इसी काल में कालिदास एवं अन्य संस्कृत विद्वानों ने अधिकांश संस्कृत साहित्य की रचना की।

    ➣ गुप्तकाल में काशी, मथुरा, नासिक, पद्मावती, उज्जयिनी, अवरपुर, वल्लभी, पाटलिपुत्र तथा काँची आदि गुप्तकाल के प्रमुख शैक्षिक केन्द्र थे।

    षड्दर्शन अर्थात सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, पूर्व-मीमांसा एवं उत्तर-मीमांसा की रचना गुप्त काल में हुई।

    विष्णु शर्मा द्वारा पंचतन्त्र और नारायण पण्डित द्वारा हितोपदेश की रचना की गई। तथा नारदबृहस्पति पुराण इसी काल में रचे गए।

    महाभारतरामायण का भी अंतिम संकलन इसी काल में हुआ। प्रसिद्ध हिन्दू ग्रन्थ भागवतगीता की रचना इसी समय हुई।

    ➣ भारवि ने किरातार्जुनीय, अमरसिंह ने अमरकोष, कामन्दक ने नीतिसार तथा चन्द्रगोमिन ने चन्द्र व्याकरण इसी समय लिखा।

    हरिषेण, वीरसेन, कालिदास तथा विशाखदत्त आदि इस युग के प्रसिद्ध विद्वान् थे।

    ➣ बौद्ध विद्वानों में असंग,वसुबन्धु, दिङ्नाग तथा धर्मपाल, जैन विद्वानों में उपेशवती, सिद्धसेन तथा भद्रबाहु

    ➣ गुप्त काल में पाणिनि और पतंजलि के ग्रंथों के आधार पर संस्कृत व्याकरण का विकास हुआ।

    असंग (महायान) ने योगाचारभूमिशास्त्र, प्रकरणआर्य वाचा, महायानसूत्रालंकार, वज्रक्षेदिका टीका, महायान सम्परिग्रह और महायानभिधर्मसंगीतशास्त्र आदि ग्रंथ लिखे।

    बसुबंधु बौद्ध विद्वान ने अभिधर्मकोश नामक ग्रंथ लिखा। जिसमें बौद्ध धर्म के मौलिक सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है।

    ➣ बौद्ध साहित्य दीपवंशमहावंश की रचना गुप्तकाल में ही हुयी। बुद्धघोष ने हीनयान धर्म पर प्रसिद्ध ग्रंथ विसुद्धिमग्ग लिखा।

    ➣ गुप्तकालीन धातुकला का सबसे बेहतर नमूना महरौली का लौह स्तंभ एवं सुल्तानगंज से प्राप्त ताम्रनिर्मित बुद्ध की भव्य प्रतिमा प्रस्तुत करते हैं।

    विष्णु शर्मापंचतन्त्र
    कालिदासमालविकाग्निमित्रम्, विक्रमोर्वशीयम्, मेघदूत, अभिज्ञानशाकुन्तलम्, कुमारसम्भव, ऋतुसंहार, रघुवंश महाकाव्य
    विशाखदत्तमुद्राराक्षस, देवीचन्द्रगुप्तम्
    भारविकिरातार्जुनीयम्
    भासस्वप्नवासवदत्तम्, चारुदत्तम्
    शूद्रकमृच्छकटिकम्
    वराहमिहिरवृहत्संहिता, पञ्चसिद्धान्तिका
    आर्यभट्टसूर्य सिद्धान्त, आर्यभट्टीयम्
    ब्रह्मगुप्तब्रह्म सिद्धान्त
    बाणभट्टअष्टांग हृदय (चिकित्सा से सम्बन्धित)
    धन्वंतरिशल्यशास्त्र (चिकित्सा से सम्बन्धित)
    अमर सिंहअमरकोश
    राजशेखरकाव्यमीमांसा
    वत्सभट्टिरावणवध

    विज्ञान एंव तकनीक

    ➣ गुप्तयुग में गणित, पदार्थ विज्ञान, धातु विज्ञान, रसायन विज्ञान, ज्योतिष विज्ञान तथा चिकित्सा विज्ञान की बहुत उन्नति हुई।

    दशमलव तथा शून्य का अविष्कार गुप्तकाल में ही हुआ। पारा का आविष्कार भी इसी समय हुआ।

    आर्यभट्ट प्रथम, वराहमिहिर, भास्कर प्रथम एवं ब्रह्मगुप्त प्रमुख गणितज्ञ थे।

    ➣ आर्यभट्ट ने आर्यभट्टीयम् नामक ग्रन्थ की रचना की, जिसमें अंकगणित, बीजगणित तथा रेखागणित की विवेचना की गई है।

    ➣ आर्यभट्ट ने सूर्यसिद्धान्त नामक ग्रन्थ में यह सिद्ध किया कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है। आर्यभट्ट ने ही सर्वप्रथम सौरवर्ष की लंबाई 365 दिन होती है , का तथ्य दिया।

    वराहमिहिर ने ज्योतिष के क्षेत्र में महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रतिपादित किए। उन्होंने पंचसिद्धांतिका, बृहत्संहिता, बृहज्जातकलघुजातक की रचना की, इनमें ज्योतिष विज्ञान की महत्वपूर्ण बातें लिखी गई।

    ➣ ब्रहागुप्त ने अपनी पुस्तक ब्रहासिद्धांतम की रचना की और सूर्यग्रहणचन्द्रग्रहण के बारे में सर्वप्रथम बताया।

    ➣ प्रसिद्ध आयुर्वेदाचार्य धनवन्तरि ने रसचिकित्सा नामक पुस्तक की रचना की तथा सिद्ध किया कि सोना, चाँदी, लोहा, ताँबा आदि धातुओं में रोग निवारण की शक्ति विद्यमान है।

    ➣ गुप्तकाल के पशु चिकित्सक कापलाव्य ने हस्त्यायुर्वेद की रचना की जिसमें हाथियों की चिकित्सा के बारे में जानकारी मिलती है।

    ➣ गुप्तकाल में विश्व के पहले शल्य चिकित्सक सुश्रुत थे जिन्होंने त्वचारोपण (प्लास्टिक सर्जरी) एंव मोतियाविन्द के चिकित्सक थे।

    वागभट्ट द्वारा रचित अष्टांग हृदय एक आयुर्वेदिक ग्रंथ है। नवनीतकम् इस युग की प्रसिद्ध चिकित्सा पुस्तक है।

    महरौली का लौहस्तंभ गुप्तकालीन धातु निर्माण कला का सर्वोत्कृष्ठ उदाहरण माना जाता है। धूप व वर्षा में सदियों तक रहने के बावजूद इसमें अभी तक जंग नहीं लगा है।

    गुप्तकालीन प्रसिद्ध ग्रंथ

    रचनाकारग्रंथ विषय
    आर्यभट्ट सूर्यसिद्धांतिका खगोलशास्त्र
    आर्यभट्ट आर्यभट्टीयम गणित, ज्योतिष
    वराहमिहिर वृहत संहिताखगोलशास्त्र
    वराहमिहिर पंचसिद्धांतिका ज्योतिष
    ब्रह्मगुप्त ब्रह्म सिद्धांत गणित, ज्योतिष
    ब्रह्मगुप्त खंड खाद्य गणित
    वराहमिहिरनवनीतकम् चिकित्सा
    पालकाप्य हस्त्यायुर्वेद पशु चिकित्सा
    भास्कर प्रथममहाभास्कर्य गणित, ज्योतिष
    चरक चरक सहिंता आयुर्वेद
    सुश्रुत सुश्रुतसहिंता आयुर्वेद, शल्य चिकित्सा
    धनवन्तरिधनवन्तरि सहिंता आयुर्वेद

  • गुप्त साम्राज्य (319–550 ई.): शासक, स्वर्ण युग, पतन और प्रारंभिक हूण आक्रमण

    📚 विषय सूची

    गुप्त सम्राज्य (275-550 ई. ) : भारत का पेराक्लीज युग

    मौर्या साम्राज्य के पतन बाद , सातवाहन (दक्षिण-भारत) तथा कुषाण (उत्तर-भारत) दो शक्तिशाली समकालीन राज्य उभरे। जिसमे सातवाहन स्वदेशी जबकि कुषाण विदेशी थे।

    तीसरी शताब्दी के मध्य तक इन दोनों साम्राज्यों का भी पतन हो गया। इनके पतन के बाद एक नया राज वंश उभरा जो गुप्त साम्राज्य कहलाया। संभवत: ये कुषाणों के सामंत थे।

    ➣ गुप्त साम्राज्य, मौर्य साम्राज्य जैसा विशाल नहीं था, लेकिन उत्तर भारत की राजनीतिक एकता को यह एक शताब्दी से अधिक समय तक (लगभग 335-555 ) बनाए रखने में सफल रहा।

    ➣ साम्राज्य का केंद्र मगध था एंव राजधानी पाटलिपुत्र थी। कालांतर में चन्द्रगुप्त द्वितीय, जिसे चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य भी कहा जाता है , ने द्वितीय राजधानी उज्जैन को बनाया।

    ➣ गुप्त काल कई दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा इसमें साहित्य , कला , विज्ञानं-तकनीक, चिकित्सा एंव आधुनिक हिन्दू धर्म का विकास हुआ। इतिहास में गुप्त काल को भारत का स्वर्णयुग की संज्ञा दी गई है।

    ➣ गुप्तकाल में वैष्णव धर्म अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचा गया। प्रारंभिक गुप्त शासक के अनुयायी थे जबकि स्कन्दगुप्त के उत्तराधिकारियों में से कई शासकों ने बौद्ध धर्म को अपना लिया।

    ➣ गुप्त के समकालीन दक्षिण में वाकाटक, चोल तथा पाण्ड्य शासकों का शासन था। हालाँकि गुप्त इनमे सबसे शक्तिशाली साम्राज्य था।

    ➣ गुप्तकाल भारत का पेराक्लीज युग (Pericles Era) था। पेरिक्लीज़ युग प्राचीन यूनान के इतिहास में एथेंस का एक स्वर्णकाल माना जाता है, जो लगभग 461–429 ईसा पूर्व के बीच एथेंस के प्रमुख नेता थे। गुप्त साम्राज्य

    ➣ गुप्त वंश का आरम्भिक राज्य उत्तर प्रदेश और बिहार में था।

    ➣ गुप्तों की उत्पत्ति से संबंधित प्रश्न बड़ा विवादास्पद है। गुप्तों की उत्पत्ति के बारे में विद्वानों के मत निम्नलिखित हैं-

    वज्जिका द्वारा लिखित कीर्तिकौमुदी नाटक में लिच्छिवियों को मलेच्छ तथा चण्डसेन (चन्द्रगुप्त प्रथम) को कारस्कर कहा गया है।

    चन्द्रगोमिन के व्याकरण नामक ग्रन्थ में गुप्तों को जर्ट अर्थात् जाट कहा गया है। इसके आधार पर ही जायसवाल गुप्तों को जाट मानते हैं।

     के. एम. मुंशी स्वर्ण युग
     पुराण मागध गुप्त
     मैक्समूलर पुनर्जागरण काल
     आर.डी. बनर्जी पुनर्जागरण कला

    ➣ गुप्तों की उत्पत्ति के विषय में जितने भी मत दिये गये हैं, उनमें उनको ब्राह्मण जाति से सम्बन्धित करने का मत कुछ तर्कसंगत प्रतीत होता है।

    ➣ गुप्त वंशीय लोग धारण गोत्र के थे। यह उल्लेख चन्द्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती गुप्ता ने अपने पूना ताम्रपत्र में किया है। यह गोत्र उसके पिता का ही था, क्योंकि उसका पति वाकाटक नरगेश रुद्रसेन द्वितीय विष्णुवृद्धि गोत्र का ब्राह्मण था।

    ➣ गुप्त वंशावली का परिचय देने के लिए हमारे पास अनेक अभिलेख हैं, जिनमें सबसे प्रमुख हैं- समुद्रगुप्त का प्रयाग प्रशस्ति अभिलेख, कुमार गुप्त का विलसड स्तम्भ लेख और स्कन्दगुप्त का भीतरी स्तम्भ लेख।

    ➣ गुप्त राजवंश की स्थापना के संबंध में अधिकांश इतिहासकारों में मतभेद है। दो मुहरें जिनमें से एक के ऊपर संस्कृत में श्रीगुप्तस्य अंकित है, से प्रतीत होता है कि श्रीगुप्त नामक व्यक्ति ने इस वंश की स्थापना की थी।

     प्रान्त क्षेत्र
     अवन्तिपश्चिमी मालवा
     पुण्ड्रवर्धनउत्तरी बंगाल
     एरणपूर्वी मालवा
     वर्द्धमानउत्तरी बंगाल
     तीरभुक्तिउत्तरी बिहार मगध
     मगधपश्चिमी बिहार

    गुप्त साम्राज्य के शासकों(275–550 ई.) की सूची

    क्रम शासक शासनकाल महत्वपूर्ण घटनाएँ / तथ्य
    1श्रीगुप्त275–300 ई.गुप्त वंश की नींव; प्रारंभिक सत्ता का विकास
    2घटोत्कच गुप्त300–319 ई.गुप्त शक्ति का विस्तार प्रारंभ
    3चन्द्रगुप्त प्रथम319–330 ई.लिच्छवि राजकुमारी से विवाह; साम्राज्य की स्थापना
    4समुद्रगुप्त330–380 ई.दिग्विजय अभियान; भारत का नेपोलियन कहा जाता है
    5रामगुप्तकुछ महीनेसिक्कों और कथाओं में उल्लेख; विवादित शासक
    6चन्द्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य)380–415 ई.स्वर्ण युग का उत्कर्ष; शकों पर विजय
    7कुमारगुप्त प्रथम (महेन्द्रादित्य)415–455 ई.नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना; प्रशासनिक स्थिरता
    8स्कन्दगुप्त (शंक्रादित्य)455–468 ई.हूण आक्रमण का सफल प्रतिरोध
    9पुरूगुप्त467–476 ई.साम्राज्य में कमजोरी प्रारंभ
    10कुमारगुप्त द्वितीय473–477 ई.आंतरिक अस्थिरता
    11बुधगुप्त476–495 ई.गुप्त साम्राज्य का अंतिम मजबूत शासक
    12नरसिंहगुप्त बालादित्य495–510 ई.बौद्ध धर्म का संरक्षण; हूणों से संघर्ष
    13भानुगुप्त510 ई.गुप्त सत्ता का कमजोर चरण
    14वैन्यगुप्त507 ई.क्षेत्रीय नियंत्रण में गिरावट
    15कुमारगुप्त तृतीय530–543 ई.छोटे क्षेत्रीय शासन का अस्तित्व
    16विष्णुगुप्त543–550 ई.गुप्त साम्राज्य का अंतिम चरण
    🧠 याद रखें:
    गुप्त साम्राज्य का उदय चंद्रगुप्त प्रथम (लगभग 320 ई.) के समय हुआ, जबकि उससे पहले ही श्रीगुप्त (लगभग 275–300 ई.) ने गुप्त वंश की नींव रख दी थी। वंश और साम्राज्य में अंतर होता है इसलिए गुप्त वंश (लगभग 275 ई. से प्रारंभ) और गुप्त साम्राज्य (लगभग 320 ई. से प्रारंभ)।, दोनों की समयरेखामें भी अंतर है।
    गुप्त साम्राज्य के शासकों की सूची

    श्रीगुप्त (275–300 ई.) : गुप्त वंश की नींव

    ➣ दो मुहरें जिनमें से एक के ऊपर संस्कृत में श्रीगुप्तस्य अंकित है, से प्रतीत होता है कि श्रीगुप्त नामक व्यक्ति ने इस वंश की स्थापना की थी।

    ➣ गुप्त वंश का संस्थापक श्रीगुप्त था। उसने महाराज की उपाधि धारण की थी।

    ➣ प्रभावती गुप्ता के पूना ताम्रपत्र अभिलेख में श्रीगुप्त को आदिराज कहा गया है।

    ➣ श्रीगुप्त का राज्य प्रयाग, साकेत एवं मगध के कुछ भागों पर था।

    इत्सिंग के अनुसार श्रीगुप्त ने मगध में एक मंदिर का निर्माण करवाया था जिसके लिए 24 गांव दान दिए।

    ➣ इसके द्वारा धारण की गयी उपाधि महाराज सामंतों द्वारा धारण की जाती थी, जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि श्रीगुप्त किसी शासक के अधीन शासन करता था।

    घटोत्कच गुप्त (280–319 ई.) : शक्ति का विस्तार प्रारंभ

    ➣ श्रीगुप्त के बाद गुप्त वंश का शासक उसका पुत्र घटोत्कच गुप्त बना। इसने भी महाराज की उपाधि धारण की थी।

    ➣ स्कंदगुप्त के सुपिया के लेख (रोया, मध्य प्रदेश) में भी गुप्तों की वंशावली घटोत्कच के समय से ही प्रारंभ मानी जाती है। अत: इससे ज्ञात होता है कि गुप्तों का राजनैतिक इतिहास घटोत्कच के समय से ही प्रारंभ हुआ।

    ➣ प्रभावती गुप्त के पूना एवं रिद्धपुर ताम्रपत्र अभिलेखों के अनुसार घटोत्कच का राज्य मगध के आस-पास तक ही सीमित था।

    ➣ इन प्राप्त अभिलेखों में घटोत्कच को ही गुप्त वंश का प्रथम शासक बताया गया है। इसने लगभग 319 ई. तक शासन किया।

    चन्द्रगुप्त प्रथम (319–350 ई.) : गुप्त साम्राज्य की स्थापना

    ➣ गुप्त वंश का तीसरा एवं प्रथम महान शासक चन्द्रगुप्त प्रथम था। इसे गुप्त वंश का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।

    ➣ गुप्त वंशावली में चन्द्रगुप्त प्रथम पहला शासक था जिसने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की। श्रीगुप्त ने महाराज की उपाधि धारण की थी।

    गुप्त वंश के पहले दो राजा केवल महाराज कहे गए हैं, जबकि चंद्रगुप्त को महाराजाधिराज कहा गया है। इससे प्रतीत होता है, कि उसके समय में गुप्त वंश की शक्ति बहुत बढ़ गई थी।

    ➣ यह गुप्त वंश का प्रथम वास्तविक संस्थापक शासक था। यह घटोत्कच पुत्र था। उसके राज्याभिषेक की तिथि 319ई. है, इसे गुप्त संवत् का आरंभ माना जाता है।

    ➣ चंद्रगुप्त प्रथम ने अपने शासन काल में एक नया संवत् चलाया, जिसे गुप्त संवत् कहा जाता है। यह संवत् गुप्त सम्राटों के काल तक ही प्रचलित रहा।

    अलबरूनी के अनुसार गुप्त संवत का प्रारम्भ शक संवत के 241 वर्ष बाद (319 ई. में) हुआ।

    मगध तथा उत्तर प्रदेश के बहुत से प्रदेशों को जीत लेने के कारण चंद्रगुप्त के समय में गुप्त साम्राज्य बहुत विस्तृत हो गया था। उसने पाटलिपुत्र को राजधानी बनाया।

    वैवाहिक संबंध

    ➣ मगध के उत्तर में लिच्छवियों का जो शक्तिशाली साम्राज्य था, चंद्रगुप्त ने उसके साथ वैवाहिक संबंध स्थापित किया। कुषाण काल के पश्चात् इस प्रदेश में सबसे प्रबल भारतीय शक्ति लिच्छवियों की ही थी।

    ➣ उसने लिच्छवि-राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह किया, जिससे कालांतर में समुद्रगुप्त उत्पन्न हुआ। इस वैवाहिक संबंध का प्रमाण उसके स्वर्ण सिक्कों व अभिलेखों से भी मिलता है-

    1. स्वर्ण सिक्के, जिसमें चंद्रगुप्त कुमारदेवी प्रकार, लिच्छवी प्रकार, राजा-रानी प्रकार, विवाह प्रकार आदि हैं।
    2. दूसरा प्रमाण समुद्रगुप्त के प्रयाग अभिलेख हैं, जिसमें उसे लिच्छवी दौहित्र कहा गया है।

    ➣ लिच्छवी राजकुमारी कुमारदेवी के साथ विवाह कर चंद्रगुप्त प्रथम ने वैशाली राज्य प्राप्त किया। उसने अपने स्वर्ण सिक्के पर अपना और कुमारदेवी का नाम खुदवाया। इन सिक्कों के पृष्ठ भाग पर लिच्छवयः (लिच्छवी) उत्कीर्ण है।

    गुप्त वंश में ही सर्वप्रथम चन्द्रगुप्त प्रथम ने ही रजत (चाँदी) मुद्राओं का प्रचलन करवाया था।

    ➣ उसके समय गुप्त-साम्राज्य का विस्तार दक्षिण-बिहार से लेकर अयोध्या तक था।

    प्रयाग प्रशस्ति के अनुसार, चन्द्रगुप्त प्रथम ने अपने राज्यकाल में ही कनिष्ठ पुत्र समुद्रगुप्त को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया और स्वंय सन्न्यास ग्रहण कर लिया।

    गुप्त संवत

    ❑ गुप्त संवत को गुप्त प्रकाल भी कहा गया है। गुप्त वंश के तीसरे शासक चन्द्रगुप्त प्रथम ने 319 ई. को गुप्त संवत चलाया था।

    ❑ इस संवत का सर्वप्रथम उल्लेख मथुरा अभिलेख में मिलता है। अल्बेरूनी के विवरण से स्पष्ट होता है कि गुप्त व शक संवत में 241 वर्षों का अन्तर था।

    गुप्त संवत319 ई.
    शक संवत78 ई.
    अन्तर241 वर्ष

    ➣ उल्लेखनीय है विक्रम सवंत लगभग 78 ई.. में उज्जैन शासक राजा विक्रमादिया ने शकों के विजय के उपलक्ष में चलाया थे। यह संवत भारत सरकार का राष्ट्रीय पंचाग है।

    समुद्रगुप्त (330–380 ई.) : भारत का नेपोलियन

    ➣ चंद्रगुप्त प्रथम के बाद समुद्रगुप्त राजगद्दी पर बैठा। उसका शासनकाल भारत के लिये स्वर्णयुग की शुरूआत कहा जाता है।

    ➣ प्रयाग प्रशस्ति अनुसार समुद्रगुप्त को भाईयों / तुल्यकुलज से उत्तराधिकार युद्ध लड़ना पड़ा। समुद्रगुप्त के समय गुप्त साम्राज्य का सर्वाधिक विस्तार हुआ।

    ऋद्धपुर लेख में समुद्रगुप्त को तत्पादपरिगृहित कहा गया है। (चन्द्रगुप्त प्रथम द्वारा राज्य त्याग कर समुद्रगुप्त को राजा बनाना।)

    उपाधियाँ

    ➣ प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त की उपाधि- कविराज, पृथिव्याम प्रतिरथ, धर्म प्राचीर बन्ध, सर्वराजोच्छेता, लिच्छवि दौहित्र। समुद्रगुप्त की एक उपाधि विक्रमांक मिलती है।

    ➣ गुप्त शासक समुद्रगुप्त ने धरणिबन्ध, सम्पूर्ण पृथ्वी को जीतने वाला और पृथिव्या प्रथम वीर की उपाधि भी ग्रहण की थी।

    ➣ इसके अलावा अन्य उपधिया जैसे – अश्वमेघकर्ता, पराक्रमांक, अप्रतिरथ,व्याघ्रपराक्रम भी धारण की। अभिलेखों में उसके लिए सर्वराजोच्छेता उपाधि प्रयुक्त हुआ है।

    विजय नीतियाँ

    राज्य प्रसभोद्धरण मगध के आसपास के राज्यों को पराजित कर उन्हें अपने राज्य में मिला लिया।
    सर्वकरंदानाज्ञाकरण यह नीति सीमांत क्षेत्रों के लिये थी।
    परिचारिकीकृत आटविक (जनजातीय) राज्यों को सेवक बनाने की नीति।
    ग्रहणमोक्षानुग्रह दक्षिण भारत के 12 राजाओं के संघ को पराजित कर उन्हें पुनः उनके राज्य सौंप दिये।
    कन्योपायन विदेशियों को पराजित कर उनके साथ वैवाहिक संबंधों की नीति।

    दिग्विजय अभियान

    ➣ समुद्रगुप्त ने सम्राट अशोक की शान्ति एवं अनाक्रमण नीति के विपरीत हिंसा एवं विजय की नीति अपनाई एंव दिग्विजय की योजना बनाई थी।

    ➣ उसने आर्यावर्त तथा दक्षिणावर्त के 12-12 शासकों को पराजित किया। इन्हीं विजयों के कारण इतिहासकार विंसेट स्मिथ ने अपनी पुस्तक अर्ली हिस्ट्री ऑफ इंडिया में समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन (फ्रांस का शासक) कहा है।

    प्रयाग प्रशस्ति में उसकी विजय का उल्लेख है। प्रयाग-प्रशस्ति के अनुसार इस योजना का ध्येय है –धरणि-बन्ध जिसका अर्थ है – भूमण्डल को बाँधना।

    प्रयाग प्रशस्ति में सर्वप्रथम भारतवर्ष का उल्लेख मिलता है।

    ➣ प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त को एक महान विजेता तथा संपूर्ण पृथ्वी को विजय (धरणि बंध) करने वाला बताया गया है।

    ➣ प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त को पृथ्वी पर निवास करने वाला देवता कहा गया है।

    ➣ अशोक निर्मित यह स्तंभ मूलतः कौशांबी में स्थित था, जिसे अकबर ने इलाहाबाद में स्थापित करवाया था। इस स्तंभ पर अशोक, समुद्रगुप्त, अकबर, बीरबल, जहाँगीर का उल्लेख मिलता है।

    ➣ प्रयाग प्रशस्ति के अनुसार समुद्रगुप्त की दिग्विजयों का उद्देश्य धरणिबन्ध था। उसकी उत्तरी भारत में अपनाई गई नीति प्रसभोद्धरण (जड़ मूल से उखाड़ फेंकना) तथा दक्षिणापथ की नीति ग्रहणमोक्षानुग्रह कहलाती है।

    ➣ अपनी दिग्विजय की प्रक्रिया में समुद्रगुप्त ने सर्वप्रथम उत्तर भारत में एक छोटा-सा युद्ध किया, जिसमें उसने तीन शक्तियों- अच्युत (नागवंशी राजा), नागसेन (नागवंशी राजा) और कोतकुलज को पराजित किया।

    ➣ प्रयाग प्रशस्ति के 7 वें श्लोक में समुद्रगुप्त की सामरिक विजय एवं नागो के विरूद्ध लड़े युद्ध का वर्णन है।

    दक्षिणापथ से तात्पर्य उत्तर में विन्ध्य पर्वत से लेकर दक्षिण में कृष्णा तथा तुंगभद्रा नदियों के बीच के प्रदेश से है।

    ➣ सुदूर दक्षिण के तमिल राज्य इसकी परिधि से बाहर थे। महाभारत में विदर्भ तथा कोशल के दक्षिण में स्थित प्रदेश को दक्षिणापथ की संज्ञा प्रदान की गयी है।

    ➣ दक्षिणापथ के युद्ध में समुद्रगुप्त ने बारह राजाओं को पराजित किया। प्रयाग प्रशस्ति की 19वीं20वीं पंक्ति में दक्षिणापथ के 12 राजाओं व राज्यों का उल्लेख मिलता है, ये 12 राज्य थे-

     शासकराज्य
     1.मंत्रराज कौराल
     2. महेन्द्रगिरीपिष्टपुर
     3. हेन्द्रकोशल
     4. व्याघ्रराजमहाकान्तार
     5. स्वामीदत्तकोट्टर
     6. दमनएरण्ड पल्ल
     7. नीलराजअवमुक्त
     8. हस्तिवर्मावेंगी
     9. उग्रसेनपालक्क
     10. कुबेरदेवराष्ट्र
     11. धनन्जयकौस्थलपुर
     12. विष्णु गोपकांची

    ➣ अंतिम विजयी शासक दक्षिण के कांची का पल्लव वंश का विष्णुगोप था ।

    ➣ इन राज्यों के प्रति समुद्रगुप्त ने ग्रहण मोक्षानुग्रह की नीति अपनाई और उनसे भेंट-उपहार आदि प्राप्त कर उन्हें स्वतंत्र कर दिया।

    ➣ कालीदास ने रघुवंश नाटक में इस तरह की विजय को धर्म विजय कहा है एवं राय चौधरी ने भी दक्षिण विजय को धर्म विजय कहा है।

    दक्षिणापथ के अभियान से निवृत्त होने के बाद समुद्रगुप्त ने उत्तर भारत में पुनः एक युद्ध किया जिसे ‘आर्यावर्त का द्वितीय युद्ध’ कहा गया है।

    ➣ प्रयाग प्रशस्ति की 21वीं पंक्ति में आर्यावर्त के नौ राजाओं का उल्लेख हुआ है। ये नौ राजा थे- रुद्रदेव, मत्तिल, नागदत्त, चन्द्रवर्मा, गणपतिनाग, नागसेन, अच्युत, नन्दि और बलवर्मा।

    ➣ इन राजाओं के प्रति समुद्रगुप्त ने प्रसभोद्धरण की नीति अपनाई। इस नीति का अर्थ है जड़ मूल से उखाड़ फेंकना।

    ➣ आर्यावर्त के दूसरे अभियान के बाद एरण विजय की, जो उत्तर भारत की अन्तिम विजय थी।

    ➣ प्रशस्ति की 21वीं पंक्ति में ही आटविक राज्यों की विजय का उल्लेख किया गया है।

    उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले से लेकर मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले तक के वन प्रदेश में ये सभी 18 राज्य फैले हुए थे। इनके प्रति परिचारकीकृत नीति (दास बनाने की नीति अपनाई।

    उत्तर तथा दक्षिण भारत के बीच के आवागमन को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें नियंत्रण में रखना आवश्यक था।

    ➣ लगता है कि जब समुद्रगुप्त दक्षिणी अभियान पर जा रहा था, इन राज्यों ने उसके मार्ग में अवरोध उत्पन्न किया। अतः उसने उन्हें जीतकर पूर्णतया अपने नियंत्रण में कर लिया।

    ➣ प्रयाग प्रशस्ति की 22वीं पंक्ति में प्रत्यतर राज्यों की एक लम्बी सूची मिलती है जो समुद्रगुप्त की पूर्वी, उत्तरी-पूर्वी तथा पश्चिमी सीमाओं पर स्थित थे।

     राज्यवर्तमान स्थिति
     समतटपूर्वी बंगाल (बांग्लादेश) का समुद्रतटवर्ती प्रदेश
     डवाकअसम स्थित डबोक स्थान या ढाका व चटगाँव
     कामरूपअसम
     कर्त्तृपुरकुमायूँ, गढ़वाल और रूहेलखण्ड के क्षेत्र
     नेपालआधुनिक नेपाल राज्य

    ➣ इनके विषय में यह कहा गया है कि वे समुद्रगुप्त को सभी प्रकार के कर देते थे (सर्वकरदान), उसकी आज्ञाओं का पालन करते थे (आज्ञाकरण) तथा उसे प्रणाम करने के लिए (राजधानी में) उपस्थित होते थे (प्रणामागमन )।

     1. मालव    2. आर्जुनायन
     3. यौधेय   4. मद्रक
     5. आभीर   6. प्रार्जुन
     7. सनकानीक   8. काक
     9. खारपरिक

    ➣ इन गणराज्यों ने स्वेच्छा से समुद्रगुप्त की अधीनता स्वीकार की तथा इसके प्रति भी प्रत्यन्त राज्यों वाली सर्वकरदान,आज्ञाकरण, प्रणामागमन नीति अपनाई।

    ➣ समुद्रगुप्त के समकालीन विदेशी शासक केदार कुषाण (पेशावर), शक शासक रूद्धसिंह तृतीय एवं पूर्वी भारत का शासक मुरूण्ड आदि थे।

    ➣ प्रयाग प्रशस्ति की 23वीं24वीं पंक्ति के अनुसार शक, कुषाण आदि विदेशी शक्तियों ने समुद्रगुप्त की अधीनता निम्न तीन विधियों से मानी-

    1. आत्म निवेदन स्वयं दरबार में उपस्थित होकर।
    2. कन्योपायन अपनी पुत्रियों का गुप्त राजवंश में विवाह कर।
    3. गरुत्मंदक स्वविषयभुक्तिशासनयाचना अपने विषय या भुक्ति के लिये शासनादेश प्राप्त करना ।

    ➣ इलाहाबाद की प्रशस्ति (प्रशंसात्मक ) अभिलेख से पता चलता है कि, समुद्रगुप्त कोई भी युद्ध नहीं हरा था। इस बहादुरी एवं युद्ध कौशलता के कारण उसे भारत का नेपोलियन कहा जाता है।

    ➣ समुद्रगुप्त ने सैन्य विजय के बाद एक अश्वमेघ यज्ञ किया। पूना ताम्रपत्र में उसे चिरोत्सन्न अश्वमेधाहर्ता एंव अनेकाश्वमेधयाजी कहा गया है। हालाँकि, प्रयाग प्रशस्ति में अश्वमेध यज्ञ का वर्णन नहीं है।

    ➣ लिच्छवी कुमारी श्रीकुमारदेवी का पुत्र होने के कारण भी उसका विशेष महत्त्व था। वह स्वयं को लिच्छवी दौहित्र कहने पर गर्व का अनुभव करता था।

    सम्राज्य विस्तार

    ➣ समुद्रगुप्त ने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की, जो उत्तर में हिमालय से दक्षिण में विंध्य पर्वत तक तथा पूर्व में बंगाल की खाड़ी से लेकर पश्चिम में पूर्वी मालवा तक विस्तृत था। कश्मीर, पश्चिमी पंजाब, पश्चिमी राजपूताना, सिंध तथा गुजरात को छोड़कर समस्त उत्तर भारत इसमें सम्मिलित था।

    ➣ समुद्रगुप्त द्वारा विजित प्रदेशो को पांच भागों में विभाजित किया गया है-

    प्रथम गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र ,
    द्वितीयपूर्वी हिमालय के राज्यों और कुछ सीमावर्ती राज्यों के क्षेत्र जैसे- नेपाल, असम, बंगाल।
    तृतीयआटविक राज्य , जो विंध्य क्षेत्र में स्थित वन क्षेत्र।
    चतुर्थपूर्वी दक्कन और दक्षिण भारत के 12 शासक थे, जिन्हें पराजित कर छोड़ दिया गया। समुद्रगुप्त तमिलनाडु में कांची तक पहुँचा, जहाँ पल्लवों ने गुप्त अधीनता स्वीकार की।
    पाँचवेंशकों और कुषाणों, जिनमें से कुछ अफगानिस्तान में शासन करते थे।

    व्यक्तित्व

    ➣ समुद्रगुप्त एक उदार शासक, कुशल सेनापति और कला का संरक्षक था। एरण अभिलेख में समुद्रगुप्त की दानवीरता की तुलना पृथु एवं राघव से की गई है।

    ➣ वामन के काव्यालंकारसूत्र में समुद्रगुप्त का नाम चन्द्रप्रकाश है। गरूड़ मुद्राओं में समुद्रगुप्त को सौ युद्धों का विजेता कहा गया है।

    ➣ वह एक उच्च कोटि का कवि भी था। उसने कविराज नाम से कई कविताएँ भी लिखीं। एक सिक्के पर उसे वीणा बजाते दिखाया गया है।

    ➣ उसका राजकवि हरिसेण था जिसके द्वारा रचित इलाहाबाद स्तम्भ अभिलेख में समुद्रगुप्त की विजयों का वर्णन मिलता है। यह अभिलेख अशोक के अभिलेखीय स्तम्भ पर ही लिखा गया है।

    इलाहाबाद के स्तम्भ लेख में समुद्रगुप्त की धर्म प्रचार बन्धु उपाधि का उल्लेख मिलता है।

    ➣ उसने प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु वसुबंधु को संरक्षण दिया था। वसुबन्धु ने अभिधर्मकोष लिखी। उसके दरबार में एक अन्य विद्वान असंग रहता था। जिसकी योगाचार है।

    ➣ उसके शासन काल में दो बौद्ध-भिक्षु बोधगया की तीर्थयात्रा के लिए आए थे। उनके अनुरोध पर सिहंल द्वीप (श्रीलंका) के राजा मेघवर्मन् ने गया में बुद्ध का मंदिर बनवाने की अनुमति प्राप्त करने के लिए समुद्रगुप्त के पास दूत भेजा था।

    ➣ समुद्रगुप्त के गया और नालन्दा ताम्रपत्र लेख में उसे परमभागवत कहा गया है, किन्तु फ्लीट एवं डी.सी. सरकार ने इन ताम्र पत्रों को प्रमाणित नहीं माना है।

    ➣ चीनी स्रोतों के अनुसार श्रीलंका के शासक मेघवर्मन ने समुद्रगुप्त के पास दूत भेज कर गया (बोधगया) में एक बौद्ध मंदिर के निर्माण की अनुमति प्राप्त की।

    सिक्के

    ➣ समुद्रगुप्त ने विभिन प्रकार के सिक्कों चलाए। उसके सिक्कों का वर्गीकरण इस प्रकार किया गया है-

    गरुड़ प्रकार इसके मुखभाग पर अलंकृत वेश-भूषा में राजा की आकृति, गरुड़ध्वज, उसका नाम और मुद्रा लेख (सैकड़ों युद्धों को जीतने और शत्रुओं का नाश करने वाला) अंकित है। पृष्ठभाग पर सिंहासनासीन देवी के साथ-साथ पराक्रमः शब्द अंकित है।
    धुनर्धारी प्रकार इनके मुखभाग पर सम्राट धनुष-बाण लिए हुए खड़ा है तथा मुद्रा लेख अजेय राजा पृथ्वी को जीतकर उत्तम कर्मों द्वारा स्वर्ग को जीतता है लिखा हुआ है। पृष्ठभाग पर सिंहवाहिनी देवी के साथ उसकी उपाधि अप्रतिरथः अंकित है।
    परशु प्रकारमुखभाग पर बाएं हाथ में परशु धारण किए हुए राजा का चित्र और मुद्रा लेख कृतांत परशु राजा, राजाओं का विजेता तथा अजेय है उत्कीर्ण है। पृष्ठभाग पर देवी की आकृति तथा उसकी उपाधि कृतांत परशु अंकित है।
    अश्वमेध प्रकार इसके मुखभाग पर यज्ञ यूप में बंधे हुए घोड़े का चित्र तथा मुद्रा लेख राजाधिराज पृथ्वी को जीतकर तथा अवश्मेध यज्ञ का अनुष्ठान कर स्वर्ग लोक की विजय करता है’ लिखा है। पृष्ठभाग पर राजमहिषी की आकृति के साथ-साथ अश्वमेध पराक्रमः अंकित है।
    व्याघ्र हनन प्रकार मुखभाग पर धनुष-बाण से व्याघ्र का आखेट करते हुए राजा की आकृति तथा उसकी उपाधि व्याघ्र पराक्रमः अंकित है। पृष्ठभाग पर मकर वाहिनी गंगा की आकृति के साथ-साथ राजा समुद्रगुप्त उत्कीर्ण है।
    वीणावादन प्रकार मुखभाग पर वीणा बजाते हुए राजा की आकृति तथा मुद्रा लेख महाराजाधिराज श्रीसमुद्रगुप्त : उत्कीर्ण हैं। पृष्ठभाग पर हाथ में कार्नकोपिया लिए हुए लक्ष्मी की आकृति अंकित है।

    ➣ समुद्र गुप्त के दो पुत्र थे-रामगुप्त,चंद्रगुप्त। समुद्र गुप्त के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र रामगुप्त मगध का सम्राट हुआ।

    रामगुप्त : अल्पकालीन विवादित शासक

    ➣ समुद्रगुप्त के बाद उसका बड़ा पुत्र रामगुप्त गुप्तवंश का अगला शासक बना, किंतु वह एक अयोग्य शासक साबित हुआ। गुप्त अभिलेखों की वंशावली में रामगुप्त का उल्लेख नहीं है।

    रामचंद्र गुणचंद्र कृत नाटक दपर्ण से ज्ञात होता है कि रामगुप्त समुद्रगुप्त का उत्तराधिकारी था।

    ➣ रामगुप्त का विवाह ध्रुवदेवी के साथ हुआ था। ध्रुवस्वामिनी देवी को प्राप्त करने के लिए शको ने आक्रमण किया। हिमालय की उपत्यका में युद्ध हुआ, जिसमें रामगुप्त हार गया।

    ➣ दोनों के मध्य संधि हुई जिसमे एक शर्त यह भी थी कि महादेवी ध्रुवदेवी को शकराज के सुपुर्द कर दिया जाए। रामगुप्त इसके लिए भी तैयार हो गया। पर उसका छोटा भाई चंद्रगुप्त इसे सह न सका।

    ➣ चंद्रगुप्त ने स्वयं ध्रुवदेवी का रूप धारण किया और स्त्री वेश में शक राजा की हत्या कर दी।

    ➣ कालांतर में रामगुप्त का वधकर और उसकी पत्नी ध्रुवदेवी से विवाह कर चन्द्रगुप्त द्वितीय स्वयं सिंहासनारूढ़ हो गया।

    विशाखदत्त कृत देवीचंद्रगुप्तम नामक नाटक में रामगुप्त नामक शासक का उल्लेख मिलता है।

    ➣ बाणभट्टकृत हर्षचरित, भोज की शृंगार प्रकाश, शंकराचार्य कृत हर्षचरित की टीका, राजशेखर की काव्यमीमांसा तथा अरबी लेखक अबुल हसन अली कृत मुजमल-उल-तवारीख में भी रामगुप्त का उल्लेख है।

    चन्द्रगुप्त द्वितीय (380–415 ई.) : स्वर्ण युग, प्रसिद्ध विक्रमादित्य

    ➣ समुद्रगुप्त की प्रधान रानीदत्त देवी (अग्रमहिषी पट्टमहादेवी) से उत्पन्न चन्द्रगुप्त द्वितीय 375 ई. के लगभग शासक बना।

    ➣ चन्द्रगुप्त द्वितीय का दूसरा नाम देवराज या देवगुप्त था। हालाँकि धाव नाम से भी उसका उल्लेख कई स्थानों पर हुआ है।

    ➣ चन्द्रगुप्त द्वितीय का अन्य नाम देवश्री, देवगुप्त, देवराज आदि हैं। इसने विक्रमांक, विक्रमादित्य, नरेन्द्रचन्द्र, श्रीविक्रम सिंह, सिंह विक्रम, अजित विक्रम, परमभागवत आदि उपाधियां धारण की।

    ➣ चन्द्रगुप्त द्वितीय को लेखों में तत्परिगृहीत (समुद्रगुप्त द्वारा चुना हुआ) कहा गया है।

    गढ़वा अभिलेख में चन्द्रगुप्त द्वितीय को परमभागवत कहा गया है। परमभागवत उपाधि धारण करने वाला वह प्रथम गुप्त सम्राट था। इसके पश्चात कुमारगुप्त प्रथम, स्कन्दगुप्त, नरसिंहगुप्त बालादित्य जैसे शासकों ने भी परमभागवत उपाधि धारण की।

    चन्द्रगुप्त (विक्रमादित्य) द्वितीय परमभागवत उपाधि धारण करने वाला वह प्रथम गुप्त सम्राट था।

    साम्राज्य विस्तार

    ➣ चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में गुप्त साम्राज्य अपने शिखर पर पहुँचा। मालवा, काठियावाड़, गुजरात और उज्जयिनी को अपने साम्राज्य में मिलाकर उसने राज्य का और भी विस्तार किया।

    महरौली के लौह स्तम्भ के अनुसार उसने सिन्ध के सप्तमुखों को पार कर वाल्हीक (बल्ख) देश तक युद्ध में विजय प्राप्त की थी। पंजाब की सात नदियों यमुना, सतलुज, व्यास, रावी, चिनाब, जेलहम और सिन्धु का प्रदेश प्राचीन समय में सप्तसैन्धव कहलाता था।

    विष्णु पुराण और वायु पुराण जैसे पुराणों से पता चलता है कि चन्द्रगुप्त द्वितीय ने कोसल, पुंडू (बंगाल) तथा ताम्रलिप्ति तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया।

    ➣ दिल्ली में महरौली के कुतुबमीनार के पास स्थित लौह स्तम्भ पर चन्द्र नाम उत्कीर्ण है, जिसे चन्द्रगुप्त द्वितीय माना जाता है, जिसके मुताबिक पश्चिमी भारत एवं बंगाल के अधिकांश भागों पर उनका आधिपत्य था।

    ➣ इस प्रकार साम्राज्य पश्चिम में गुजरात से लेकर, और हिन्दूकुश के पार वंक्षु नदी तक, पूर्व में बंगाल तक तथा उत्तर में हिमालय की तलहटी से दक्षिण में नर्मदा नदी तक विस्तृत था।

    वैवाहिक सम्बन्ध

    चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने वैवाहिक संबंधों और विजयों के द्वारा अपने साम्राज्य की सीमा बढ़ायी। उसने वाकाटक, नागवंश एवं कदम्ब राजवंश राजवंशों से वैवाहिक संबंध स्थापित किये।

    नागवंश (मथुरा, अहिच्छन्न,पद्मावती क्षेत्रों में स्थित) :- विक्रमादित्य ने नाग राजकुमारी कुबेरनागा से विवाह किया। उससे एक कन्या प्रभावती गुप्त उत्पन्न हुई।

    वाकाटक वंश (आधुनिक महाराष्ट्र प्रांत) :- वाकाटकों का सहयोग प्राप्त करने के लिए चन्द्रगुप्त अपनी पुत्री प्रभावती गुप्त का विवाह वाकाटक नरेश रूदसेन-द्वितीय के साथ कर दिया।

    कदम्ब राजवंश [कुंतल (कर्नाटक)] :- तालगुंड अभिलेख से पता चलता है कि इस वंश के एक शासक काकुत्सवर्मन ने अपनी एक पुत्री का विवाह चन्द्रगुप्त द्वितीय के पुत्र कुमारगुप्त प्रथम से कर दिया था।

    भोज एवं श्वेमेन्द्र के अनुसार कालिदास को यहाँ दूत बनाकर भेजा था। कालिदास ने कुन्तलेश्वरदोत्य की रचना यहाँ की थी।

    ➣ कालांतर में रुद्रसेन की मृत्यु के बाद चन्द्रगुप्त ने अप्रत्यक्ष रूप से वाकाटक राज्य को अपने राज्य में मिला लिया।

    शकों पर विजय

    ➣ पुत्री प्रभावती गुप्त अपने पिता चन्द्रगुप्त के हितों को बढ़ावा दिया। फलत: चन्द्रगुप्त द्वितीय ने कुषाणों से मथुरा को जीत लिया।

    ➣ लगभग चार शताब्दियों तक शक क्षत्रपों के अधीन रहे, पश्चिमी मालवा और गुजरात पर भी उसने कब्जा कर लिया।

    ➣ उसने शक शासक रुद्रसिंह तृतीय को पराजित कर शकारि एवं विक्रमादित्य की उपाधि धारण की।

    ➣ शक विजय के फलस्वरूप उसने चांदी के व्याघ्र (सिंह निहन्ता) शैली के सिक्के चलवाए। इन चाँदी के सिक्कों का भार 32 से 36 ग्रेन तक है।

    ➣ उसने उज्जयिनी के अंतिम शक शासक रुद्रसिंह तृतीय को पराजित कर शकारि (शकों का विजेता) एवं विक्रमादित्य की उपाधि धारण की।

    उल्लेखनीय है सदी पहले शकों का इसी प्रकार से उच्छेद कर सातवाहन सम्राट गौतमी पुत्र सातकर्णि ने भी शकारि और विक्रमादित्य की उपाधियाँ ग्रहण की थीं।

    ➣ भारतीय इतिहास में 14 शासकों ने विक्रमादित्य धारण की थी जिसमे चन्द्रगुप्त द्वितीय सबसे प्रसिद्ध विक्रमादित्य हैं। अंतिम विक्रमादित्य मध्यकालीन शासक हेमू(भारत का एकमात्र हिन्दू शासक जिसने दिल्ली की गद्दी पर अधिकार किया) था।

    ➣ शकों से छीनकर उज्जैन को साम्राज्य की दूसरी राजधानी बनायी। इसी कारण चन्द्रगुप्त द्वितीय को उज्जैनपुरवराधीश्वर भी कहा जाता है।

    ➣ उल्लेखनीय है प्रारम्भिक राजधानी पाटलिपुत्र थी। इसलिए चन्द्रगुप्त द्वितीय को पाटलिपुत्र पुरावधीश्वर भी कहा गया है।

    ➣ शकों पर विजय के परिणामस्वरूप पश्चिमी समुद्र तट के प्रसिद्ध बन्दरगाह भृगुकच्छ पर चन्द्रगुप्त द्वितीय का नियंत्रण स्थापित हो गया। जिससे अरब सागर एवं भूमध्य सागर के व्यापार पर गुप्तों को प्रवेश मिला।

    सिक्के अथवा मुद्राए

    ➣ गुप्त शासकों में सर्वप्रथम चाँदी के सिक्के चलाने का श्रेय चन्द्रगुप्त द्वितीय को है। यद्यपि हाल ही में चन्द्रगुप्त प्रथम का भी एक चाँदी का सिक्का मिला है।

    ➣ चन्द्रगुप्त ने 8 प्रकार की मुद्रा चलाई- धनुर्धारी सिंह निहन्ता, अश्वारोही, छत्रधारी, पर्यंक स्थित राजा-रानी, ध्वजधारी, चक्र विक्रम, पर्यंक प्रकार की।

    ➣ चक्र विक्रम मुद्रा पर भगवान विष्णु को राजा को 3 गोल वस्तुएं देते हुए दिखाया गया है।

    चक्राधारी विष्णु की आकृति चन्द्रगुप्त द्वितीय के सिक्कों पर है।

    ➣ चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के मुख्य अभिलेख उदयगिरि गुहा लेख, गढ़वा अभिलेख, सांची अभिलेखमथुरा शिलालेख हैं।

    ➣ चन्द्रगुप्त उदार और न्याय-परायण सम्राट था। उसके समय में भारतीय संस्कृति का चतुर्दिक विकास हुआ। वह स्वयं वैष्णव था, पर अन्य धर्मों के प्रति भी उदार-भावना रखता था।

    ➣ चन्द्रगुप्त द्वितीय का प्रधान सचिव एवं संधिविग्रहिक वीर सेन शैव धर्मावलम्बी था। जबकि उसका सेनापति आम्रकार्दव बौद्ध धर्म को मानता था।

    ➣ गुप्त राजाओं के काल को भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग कहा जाता है। इसका बहुत कुछ श्रेय चंद्रगुप्त विक्रमादित्य की शासन-व्यवस्था को है।

    ➣ उसके दरबार में नौ विद्वानों की एक मंडली निवास करती थी, जिसे नवरत्न कहा गया है। चन्द्रगुप्त द्वितीय के दरबार में 9 रत्न थे-

    रत्नसबंधित क्षेत्र रचना /कृति
    1. कालिदासनाटक एवं काव्यअभिज्ञानशाकुंतलम , मेघदूत
    2. धन्वन्तरिचिकित्सा औषधि, आयुर्वेद
    3. क्षपणकज्योतिष विद्या ज्योतिष शास्त्र
    4. अमर सिंहशब्दकोषसंहिता, अमरकोश
    5. शंकुशिल्पशास्त्रवास्तुकला
    6. वेतल भट्टजादूमंत्रशास्त्र
    7. हरिषेण कवि कविता
    8. वराहमिहिरखगोल विज्ञानज्योतिष, वृहदसंहिता
    9. वररुचिव्याकरणव्याकरण (संस्कृत)

    चन्द्रगुप्त II का काल साहित्य और कला का स्वर्ण युग कहा जाता है।

    ➣ चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय में पाटलिपुत्र एवं उज्जैयिनी विद्या के प्रमुख केन्द्र थे।

    ➣ इसके शासक के समय में चीनी बौद्ध यात्री फाह्यान 399 ई. में भारत आया और 414 ई. तक रहा।

    चीनी यात्री : फाहियान (399-414 ई.)

    ➣ चन्द्रगुप्त II के शासनकाल में चीनी यात्री फाहियान भारत आया ।

    ➣ फाहियान चीन, मध्य एशिया पेशावर के स्थल मार्ग से 399 ई. में भारत आया व ताम्रलिप्ति से श्रीलंका तथा पूर्वी द्वीपों से होते हुए।

    ➣ समुद्री मार्ग से 414 ई. में स्वदेश लौटा। उसके वर्णन इस प्रकार हैं-

    ❑ मध्य देश ब्राह्मणों का देश था। यहाँ के लोग सुखी एवं संपन्न थे। लोगों को मृत्युदंड नहीं दिया जाता था, केवल आर्थिक दंड का प्रचलन था।

    ❑ मध्य देश के लोग किसी जीवित प्राणी की हत्या नहीं करते थे तथा मांस, मदिरा, प्याज तथा लहसुन आदि का प्रयोग नहीं करते। थे (चंडाल-अपवाद )।

    ❑ उसने नालंदा, राजगृह, बोधगया, वैशाली, श्रावस्ती तथा कपिलवस्तु की भी यात्राएँ की।

    ❑ मध्य देश के लोग क्रय-विक्रय में कौड़ियों का प्रयोग करते थे।

    ➣ फाहियान ने पवित्र बौद्ध स्थानों की यात्राएँ की। सकिसा तथा श्रावस्ती में उसने अनेक स्मारक तथा भिक्षु देखे।

    ➣ पाटलिपुत्र में अशोक का राजमहल देखा तथा उससे इतना प्रभावित हुआ कि उसे देवताओं द्वारा निर्मित बताया।

    ➣ चीनी ग्रंथों में भारत को यिन-तू कहा गया है।

    कुमारगुप्त प्रथम (महेन्द्रादित्य) (415–455 ई.) : नालंदा विश्वविद्यालय स्थापना

    चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के पश्चात् उसका पुत्र कुमारगुप्त प्रथम, गुप्त साम्राज्य का अगला शासक बना। वह प्रधान रानी ध्रुवदेवी का पुत्र था। इसने सर्वाधिक समय तक शासन (40 वर्ष) किया।

    ➣ कुमारगुप्त प्रथम ने महेन्द्रादित्य, श्रीमहेन्द्र, अश्वमहेन्द आदि उपाधियाँ धारण की। गढ़वा लेख (इलाहाबाद) में कुमारगुप्त-I को परमभागवत कहा गया है।

    ➣ कुमारगुप्त के बिलसड़ अभिलेख, मंदसौर अभिलेख, करमदंडा अभिलेख आदि से उसके शासनकाल की जानकारी मिलती है।

    ➣ गुप्त शासकों में सर्वाधिक 18 अभिलेख एवं सर्वाधिक 14 प्रकार के सिक्के कुमारगुप्त प्रथम के मिले हैं।

    ➣ उसके सुव्यवस्थित शासन का वर्णन उसके मंदसौर अभिलेख से मिलता है। यह अभिलेख एक प्रशस्ति के रूप में है जिसकी रचना वत्सभट्टि ने की थी।

    ➣ चन्द्रगुप्त द्वितीय ने अपने पुत्र कुमारगुप्त प्रथम का विवाह कदम्ब वंश के शासक काकुत्सवर्मन की पुत्री के साथ किया था।

    मुद्राएं

    ➣ गुप्त शासकों में सर्वाधिक स्वर्ण मुद्राएं कुमारगुप्त ने जारी की।

    मध्य भारत (गंगाघाटी) में चांदी के सिक्कों का प्रचलन कुमारगुप्त प्रथम ने किया। पश्चिमी भारत में चन्द्रगुप्त द्वितीय को यह श्रेय जाता है।

    ➣ कुमारगुप्त ने मुद्राओं पर गरुड़ के स्थान पर मयूर की आकृति उत्कीर्ण कराई। इस प्रकार की मुद्रा के मुख भाग पर मयूर को खिलाते हुए राजा की आकृति तथा पृष्ठ भाग पर आसीन कार्तिकेय की आकृति उत्कीर्ण है।

    ➣ कुमारगुप्त प्रथम ने अप्रतिघ प्रकार, गजारूढ़ प्रकार, खड़ग निहन्ता प्रकार और खड़ग प्रकार की मुद्राएं चलवाई। खड़ग निहन्ता प्रकार में कुमारगुप्त को गैंडा मारते हुए दिखाया है।

    ➣ उसके स्वर्ण सिक्कों पर उसे गुप्तकुलामल चन्द्र एवं गुप्तकुल व्योमशशि कहा गया है।

    ➣ इनमें मयूर शैली की मुद्राएँ में चाँदी की कुछ मुद्राएँ सबसे पहले मध्यप्रदेश में प्राप्त हुईं।

    ➣ इसके समय की गुप्तकालीन स्वर्ण मुद्राओं का सबसे बड़ा ढेर बयाना मुद्राभंडार (राजस्थान के भरतपुर जिले में) से प्राप्त हुआ है, जिसमें 623 मुद्राएँ मिली हैं।

    ➣ कुमारगुप्त प्रथम के स्वर्ण सिक्कों से पता चलता है कि उसने अश्वमेध यज्ञ किया, किन्तु उसके अभिलेखों में अश्वमेध यज्ञों का उल्लेख नहीं है।

    धार्मिक नीति

    ➣ कुमारगुप्त स्वयं वैष्णव धर्मानुयायी था, किन्तु उसने धर्म-सहिष्णुता की नीति का पालन कर सभी धर्मो को आश्रय दिया। उसके उदयगिरि के अभिलेख में पार्श्वनाथ के मूर्ति निर्मांण का भी वर्णन है।

    ➣ ह्वेनत्सांग का शक्रादित्य की पहचान कुमारगुप्त महेन्द्रादित्य से की गयी है इसलिए उसे नालन्दा विश्वविद्यालय (ऑक्सफोर्ड ऑफ महायान) का संस्थापक भी कहा गया है।

    ➣ कुमारगुप्त के अंतिम दिनों में साम्राज्य पर दो आक्रमण हुए थे। पहला आक्रमण नर्मदा नदी और विध्यांचल पर्वतवर्ती(मध्य प्रदेशीय क्षेत्रों) में बसने वाली पुष्यमित्र नाम की किसी जाति का था।

    ➣ दूसरा आक्रमण हूणों का था, जो संभवत उसके जीवन के अंतिम वर्ष में हुआ था। हूणों ने गंधार (पाकिस्तान व अफगानिस्तान क्षेत्र) पर क़ब्ज़ा कर गंगा की ओर बढ़ना प्रारंभ कर दिया था।

    ➣ स्कंदगुप्त आक्रमणकारियों को मार गिराने में सफल हुआ। दोनों आक्रमणों को राजकुमार स्कंदगुप्त ने सफलतापूर्वक रोका। इसका उल्लेख स्कन्दगुप्त के भीतरी अभिलेख में मिलता है।

    ➣ गुप्त वंश की शक्ति उसके शासन काल में अपनी चरम सीमा पर पहुँच गई थी। मंदसौर अभिलेख में कुमारगुप्त के लिए लिखा है कि चारों ओर समुद्र से घिरे पृथ्वी के भाग पर उसका शासन था।

    प्रमुख अभिलेख

    ➣ उसने गुप्त शासकों में सर्वाधिक 18 अभिलेख जारी किये। कुमार गुप्त प्रथम पहला गुप्त शासक है, जिसके अभिलेख बंगाल से मिले हैं।

    ➣ अभिलेखों में उसे परमदैवत, परमभट्टारक, महाराजाधिराज, अश्वमेघमहेंद्र, महेंद्रादित्य, श्रीमहेंद्र, महेंद्रसिंह कहा गया है।

    वत्सभट्टि द्वारा लिखित मन्दसौर प्रशस्ति से (473 ई.) कुमारगुप्त प्रथम के शासन की जानकारी मिलती है। यह अभिलेख कुमारगुप्त द्वितीय के समय का है।

    करमदण्डा लेख (फैजाबाद) के अनुसार इसके सन्धिविग्रह पृथ्वीसेन ने शिव प्रतिमा स्थापित कराके पृथ्वीश्वर शिवलिंग स्थापित करवाया।

    मानकुंवर लेख (इलाहाबाद) में बुद्धमित्र द्वारा बुद्ध प्रतिमा स्थापित करवाये जाने का उल्लेख है।

    उदयगिरि लेख (मध्यप्रदेश) में शंकर नामक व्यक्ति द्वारा पार्श्वनाथ की मूर्ति स्थापित किए जाने का उल्लेख है।

    भितरी अभिलेख के अनुसार स्कन्दगुप्त ने हूणों को पराजित करके क्रमादित्य व विक्रमादित्य की उपाधियां धारण की।

    मदंसौर प्रशस्ति/दशपुर प्रशस्ति मालव नरेश यशोवर्मन की भी है, जिसका लेखक वासुल था। मन्दसौर अभिलेख में सुमेरू पर्वत एवं कैलाश पर्वत का भी उल्लेख है।

    मन्दसौर प्रशस्ति के अनुसार मन्दसौर (मालवा) का राज्यपाल बन्धुवर्मा था। इसमें बधुवर्मा द्वारा सूर्य मन्दिर के निर्माण का भी उल्लेख है।

    तुमैन अभिलेख (ग्वालियर- म.प्र.) जो 435 ई. का है, इसमें कुमार गुप्त प्रथम को शरद्कालीन सूर्य की भांति बताया गया है।

    स्कन्दगुप्त(455–468 ई.) : हूणों का विजेता, शक्रादित्य

    ➣ स्कन्दगुप्त गुप्त वंश का अन्तिम प्रतापी शासक था। उसने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया।

    ➣ स्कन्दगुप्त ने किसी नए प्रदेश को जीतकर गुप्त साम्राज्य का विस्तार नहीं किया। सम्भवतः इसकी आवश्यकता भी नहीं थी।

    भीतरी स्तंभलेख के अनुसार स्कन्दगुप्त को गद्दी पर बैठते ही हूणों के आक्रमण का सामना करना पड़ा। जूनागढ़ अभिलेख के अनुसार स्कंदगुप्त ने हूणों के आक्रमण को विफल कर दिया था।

    ➣ स्कंदगुप्त को कहोम स्तम्भ लेख में शक्रादित्य, भितरी अभिलेख में विक्रमादित्य तथा स्वर्ण सिक्कों पर क्रमादित्य कहा गया है।

    ➣ स्कन्दगुप्त के शासन काल की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना हूणों की पराजय है। स्कन्दगुप्त के समय में हूण गान्धार से आगे नहीं बढ़ सके। गुप्त साम्राज्य का वैभव उसके शासन काल में प्रायः अक्षुण्ण रहा।

    स्कन्दगुप्त यूरोप व एशिया का पहला शासक था जिसने हूणों को परास्त किया।

    जूनागढ़ लेख में समय गणना (काल गणना) सम्बन्धी साक्ष्य व सुदर्शन झील (गिरनार) का स्कन्दगुप्त द्वारा पुनर्निर्माण का उल्लेख है।

    ➣ सुदर्शन झील का पुनर्निर्माण सौराष्ट्र के गवर्नर पर्णदत्त के पुत्र चक्रपालित की देखरेख में हुआ। उसने झील के किनारे एक विष्णु मन्दिर का निर्माण भी करवाया।

    ➣ इस झील का निर्माण मूलतः चन्द्रगुप्त मौर्य के गवर्नर पुष्यगुप्त वैश्य ने किया था, बाद में अशोक के गवर्नर यवनराज तुषास्प तथा रूद्रदामन के गवर्नर सुविशाख ने इसकी मरम्मत करवायी।

    ह्वेनसांग ने नालंदा संघाराम को बनवाने वाले शासकों में शंक्रादित्य के नाम का उल्लेख किया है, जिससे स्कंदगुप्त द्वारा नालंदा संघाराम को सहायता देने का प्रमाण मिलता है।

    ➣ स्कन्दगुप्त ने चीन से राज नैतिक सम्बन्ध बनाने के लिए एक राजदूत 466 ई. में चीनी सम्राट सांग के दरबार में राजदूत भेजा था।

    ➣ स्कन्दगुप्त के बाद गुप्त साम्राज्य का ह्रास प्रारम्भ हो गया। इसके बाद क्रमशः पुरुगुप्त, कुमारगुप्त द्वितीय, बुद्धगुप्त, नृसिंहगुप्त बालादित्य, भानुगुप्त, कुमारगुप्त तृतीय और विष्णुगुप्त राजा हुए।

    प्रमुख अभिलेख

    भितरी अभिलेख गाजीपुर जिले की सैदपुर तहसील में है। इसमें पुष्यमित्रों और हूणों के साथ स्कन्दगुप्त के युद्ध का स्पष्ट वर्णन है।

    जूनागढ़ अभिलेख में सुदर्शन झील (गिरनार) का स्कन्दगुप्त द्वारा पुनर्निर्माण का भी उल्लेख है।

    ➣ स्कन्दगुप्त को कहौम स्तम्भ लेख में शक्रोपम तथा जूनागढ़ अभिलेख में श्रीपरिक्षिप्तवक्षा कहा गया है।

    कहौम अभिलेख में वर्णित है, कि भद्र नामक व्यक्ति ने 5 जैन तीर्थकरों की प्रतिमा बनवाई।

    इन्दौर ताम्रपत्र में तैली श्रेणी द्वारा सूर्य पूजा एवं सूर्य मन्दिर को दान का उल्लेख है।

    गढ़वा अभिलेख स्कन्दगुप्त का अन्तिम लेख है।

    सिक्के

    ➣ स्कन्दगुप्त के काल में स्वर्ण सिक्कों का वजन बढ़कर 144 से 146 ग्रेन तक हो गया, जो गुप्तकाल में सबसे भारी सिक्के थे। इससे पूर्व गुप्त सम्राटों के समय यह 118 से 123 ग्रेन होता था।

    ➣ स्कन्दगुप्त के समय के सिक्कों में मिलावट भी ज्यादा थी। सबसे ज्यादा मिलावट अन्तिम गुप्त शासक विष्णुगुप्त के समय थी।

    ➣ स्कन्दगुप्त पश्चिमी भारत में चाँदी के सिक्कों को जारी रखने वाला गुप्त वंश का अन्तिम शासक था।

    ➣ स्कन्दगुप्त ने नन्दी (बैल) प्रकार की मुद्राएं चलाई।

    उत्तरकालीन गुप्त शासक : पतन काल और कमजोर केंद्रीय सत्ता

    ➣ स्कन्दगुप्त का मृत्यु के पश्चात् गुप्त साम्राज्य का पतन प्रारम्भ हो गया। इसके पश्चात उत्तरकालीन गुप्त शासक इस प्रकार से हैं-

    पुरुगुप्त
    (468-473 ई.)

    कुमारगुप्त द्वितीय
    (473-477 ई.)

    बुधगुप्त
    (477-495 ई.)

    नरसिंहगुप्त बालादित्य
    (495-530ई.)

    भानुगुप्त
    (510- ई.)

    वैन्यगुप्त
    (507- ई.)

    कुमारगुप्त तृतीय
    (530-543 ई.)

    विष्णुगुप्त (अंतिम शासक)
    (543-550 ई.)

    ➣ बौद्ध धर्म अपनाने वाला प्रथम गुप्त शासक पुरूगुप्त था, जो सर्वाधिक आयु में (वृद्धावस्था) शासक बना।

    पुरुगुप्त (467–476 ई.) : कमजोर शासन प्रारंभ

    ➣ यह कुमारगुप्त प्रथम का ही पुत्र तथा स्कंदगुप्त का सोतेला भाई था। संभवत: स्कंदगुप्त सन्तानहीन था, और उसके बाद सत्ता पुरूगुप्त के हाथों में आयी।

    भीतरी मुद्रालेख में उसकी माता का नाम महादेवी अनन्ततदेवी तथा पत्नी का नाम चन्द्रदेवी मिलता है।

    ➣ चूंकि वह वृद्धावस्था में राजा हुआ, अतः उसका शासन अल्पकालीन रहा। उसके समय में गुप्त साम्राज्य की अव्यवस्था प्रारंभ हो गयी थी।

    परमार्थकृत वसबन्धुजीवनवृत्त के अनुसार पुरूगुप्त बौद्ध मतानुयायी था। बुद्ध गुप्त को परमदैवत कहा गया है।

    हूणों के आक्रमणों के समय इन्होंने फिर से अपनी शक्ति को बढ़ाना शुरू किया, स्कन्दगुप्त के मरते ही वाकाटक राजा नरेन्द्रसेन ने भी स्वंय को स्वतंत्र उदघोषित कर दिया।

    कुमारगुप्त द्वितीय (473–477 ई.) : केंद्रीय सत्ता कमजोर

    पुरूगुप्त का उत्तराधिकारी कुमारगुप्त द्वितीय हुआ। सारनाथ से गुप्त संवत् 154 अर्थात् 473 ई. का उसका लेख मिलता है जो बौद्ध प्रतिमा पर खुदा हुआ है।

    ➣ यह निश्चित रूप से पता नहीं कि वह स्कन्दगुप्त का पुत्र अथवा पुरूगुपत का था।

    ➣ कुमारगुप्त द्वितीय ने वाकाटक राजा से कई युद्ध किए और मालवा के प्रदेश को जीतकर फिर से अपने साम्राज्य में मिला लिया। वाकाटकों की शक्ति अब फिर से क्षीण होने लगी।

    ➣ अन्य गुप्त सम्राटों के समान ही कुमारगुप्त द्वितीय वैष्णव धर्म का अनुयायी था और उसे भी परम भागवत् लिखा गया है।

    ➣ सारनाथ लेख में भूमि रक्षति कुमारगुप्ते उत्कीर्ण मिलता है। उल्लेखनीय है कि यहां कुमारगुप्त को महाराज भी नहीं कहा गया है।

    ➣ ऐसा लगता है कि वह स्वतंत्र शासक न होकर पुरूगुप्त का गोप्ता था जो सारनाथ में उसके प्रतिनिधि के रूप में शासन करता था।

    ➣ कुमारगुप्त द्वितीय के कुछ सिक्के भी प्राप्त हुए हैं। उनमें यह अवश्य ज्ञात होता है कि उसने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की थी।

    ➣ लगभग 474 ई. में उसकी मृत्यु हो गई। उसका उत्तराधिकारी बुधगुप्त हुआ,

    बुधगुप्त (476–495 ई.) : अंतिम मजबूत गुप्त शासक

    ➣ कुमारगुप्त द्वितीय के बाद बुधगुप्त शासक हुआ। प्रारंभ में विद्वानों का विचार था कि वह कुमारगुप्त का पुत्र था क्योंकि ह्वेनसांग उसके पिता का नाम शक्रादित्य बताता है।

    ➣ किंतु नालंदा से उसकी मुहर प्राप्त हो जाने के पश्चात् यह सिद्ध हो गया है कि वह पुरूगुप्त का पुत्र था।

    ➣ उसकी माता का नाम चन्द्रदेवी था। गुप्त संवत् 157 अर्थात् 477 ई. का उसका सारनाथ से लेख मिला हैं। यह उसके शासन काल की प्रथम ज्ञात तिथि है। इससे अनुमान किया जाता है कि उसने 477 ई. में अपना शासन प्रारंभ किया।

    ➣ सारनाथ के अतिरिक्त मध्य प्रदेश के सागर जिले में स्थित एरण से भी उसका स्तंभ लेख मिला है।

    उत्तरी बंगाल के दामोदरपुर तथा पहाड़पुर से उसके ताम्रपत्र मिल हैं। इसमें गुप्त संवत् की तिथियां दी गयी हैं।

    दामोदरपुर ताम्रपत्र में उसे परमभट्टारक महाराजाधिराज कहा गया है। इसके अतिरिक्त उसकी कुछ रजत मुद्रायें भी प्राप्त हुई हैं। जिन पर उसके शासन काल की अंतिम तिथि गुप्त संवत् 175 अर्थात् 495 ई. उत्कीर्ण मिलती है।

    ➣ अंत: ऐसा निष्कर्ष निकलता है कि बुधगुप्त ने 477 ई. से 495 ई. तक शासन किया था।

    स्कंदगुप्त के उत्तराधिकारियों में बुधगुप्त सबसे अधिक शक्तिशाली राजा था जिसने एक विस्तृत प्रदेश पर शासन किया।

    ➣ स्वर्ण मुद्राओं पर उसकी उपाधि श्रीविक्रम मिलती है। उसके अभिलेखों से उसके कुछ प्रांतीय पदाधिकारियों की सूचना मिलती है।

    ➣ एरण अभिलेख से पता चलता है कि पूर्वी मालवा में मातृविष्णु उसका सामंत था।

    चीनी यात्री ह्वेनसांग के विवरण से पता चलता है कि बुधगुप्त बौद्धमतानुयायी था। उसने नालंदा महाविहार को धन दान दिये थे।

    ➣ वह अंतिम गुप्त सम्राट था जिसने हिमालय से लेकर नर्मदा नदी तक तथा मालवा से लेकर बंगाल तक के विस्तृत भू-भाग पर शासन किया।

    नरसिंहगुप्त बालादित्य (495–510 ई.) : हूणों से संघर्ष एवं बौद्ध धर्म का संरक्षक

    ➣ यह बुधगुप्त का छोटा भाई था जो उसकी मृत्यु के बाद शासक बना। भितरी मुद्रालेख में नरसिंहगुप्त की माता का नाम महादेवी चन्द्रदेवी मिलता है।

    ➣ ऐसा प्रतीत होता है कि इस समय गुप्त साम्राज्य तीन राज्यों में बंट गया था।

    मगध वाले क्षेत्र में नरसिंहगुप्त राज्य करता था, मालवा क्षेत्र में भानुगुप्त जबकि बंगाल में वैन्यगुप्त ने अपना स्वतंत्र शासन स्थापित कर लिया था।

    नरसिंहगुप्त इन दोनो से अधिक शक्तिशाली था। अतः मगध साम्राज्य के केन्द्रीय भाग में उसने अपना अधिकारी सुदृढ़ कर लिया। उसकी सबसे बड़ी सफलता हूणों को पराजित करना है।

    हूण नरेश मिहिरकुल बड़ा क्रूर व आतातायी था। ह्वेनसांग के विवरण से पता चलता है कि उसने के राजा बालादित्य पर आक्रमण किया किन्तु पराजित हुआ और बंदी बना लिया गया।

    ➣ बालादित्य ने अपनी माता के कहने पर उसे मुक्त कर दिया। कालांतर में उसकी यह भारी भूल साबित हुई।

    ➣ नरसिंहगुप्त बौद्धमतानुयायी था। उसने बौद्ध विद्वान बसुबन्धु की शिष्यता ग्रहण की थी। उसने अपने राज्य को स्तूपों तथा विहारों से सुसज्जित करवाया था।

    ह्वेनसांग, परमार्थ तथा आर्यमंजुश्रीमूलकल्प के लेखक ने उसके बौद्ध प्रेम का उल्लेख किया है। उसी के काल में वसुबन्धु का निधन हुआ था।

    नालंदा मुद्रालेख में नरसिंहगुप्त को परमभागवत कहा गया है। लगता है कि बौद्ध धर्म अंगीकार कर लेने पर भी उसने अपने पूर्वजों के समान परमभागवत की उपाधि ग्रहण की थी।

    ➣ उल्लेखनीय है ह्वेनसांग ने जिस बालादित्य का उल्लेख किया है उसके समीकरण के विषय से मतभेद है। संभवत: वह नरसिंहगुप्त बालादित्य ही है।

    भानुगुप्त (510 ई.) : पतनकालीन शासक

    ➣ भानुगुप्त का शासन मालवा क्षेत्र में था। सम्भवतः भानु गुप्त हूणों के विरुद्ध संघर्षरत था।

    ➣ भानुगुप्त का एरण से एक प्रस्तर स्तंभ-लेख प्राप्त हुआ है। यह 510 ई. का है। इसमें उसे विश्व में सर्वश्रेष्ठ वीर (जगति प्रवीरों) तथा महान् राजा कहा गया है।

    ➣ यह लेख उसके मित्र गोपराज का भी उल्लेख करता था। वह हूणों के विरूद्ध भानुगुप्त की ओर लड़ता हुआ मार डाला गया तथा उसकी पत्नी अग्नि में जल कर सती हो गई।

    यह सती प्रथा का प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य है।

    ➣ बुधगुप्त के बाद पूर्वी मालवा में जो हूणसत्ता स्थापित हुई, उसी का अंत करने के लिये भानुगुप्त यह युद्ध किया और इसमें उसे सफलता प्राप्त हुई ।

    ➣ इतिहासकार हेमचन्द्र राय चौधरी ने इस युद्ध को स्वतंत्रता संग्राम की संज्ञा दी गयी है।

    वैन्यगुप्त (507 ई.) : विघटन काल

    ➣ इसके विषय में जानकारी का मुख्य स्रोत गुणैधर (बांग्लादेश के कोमिल्ला में स्थित) का ताम्रपत्र है जो गुप्त संवत् 188 अर्थात् 507 ई. का है।

    नालंदा से उसकी एक मुहर मिली है जिस पर महाराजाधिराज का विरूद्ध अंकित है।

    गुणैधर ताम्रपत्र में उसके दो प्रांतीय शासकों (1.विजयसेन, 2.रूद्रदत्त) के नाम मिलते हैं तथा बौद्ध विहार के लिये कुछ भूमिदान दिये जाने का वर्णन है।

    ➣ उसके कुछ स्वर्ण सिक्के भी मिलते हैं। उसके सिक्कों पर एक ओर उसका चित्र है, जिसमें वह बाएँ हाथ में धनुष और दाएँ हाथ में बाण लिए हुए है।

    ➣ सिक्कों के दूसरी ओर कमलासन पर विराजमान लक्ष्मी की मूर्ति है। साथ वैण्य की उपाधि द्वादशादित्य उत्कीर्ण है।

    ➣ इसके शासनकाल में सोने के सिक्कों में सोने की मात्रा का फिर से बढ़ जाना यह सूचित करता है, कि उसका काल समृद्धि का काल था।

    कुमारगुप्त तृतीय (530–543 ई.) : नाममात्र शासन

    नरसिंहगुप्त के बाद उसका पुत्र कुमारगुप्त तृतीय मगध के सिंहासन पर बैठा।

    भितरी अभिलेख तथा नालंदा मुद्रालेखों में उसकी माता का नाम महादेवी मित्रदेवी मिलता है।

    दामोदरपुर के 5वे ताम्रपत्र में किसी शक्तिशाली गुप्त राजा का उल्लेख मिलता है जिसकी उपाधियां परमदैवत परमभट्टारक महाराजाधिराज मिलती है।

    ➣ कुमारगुप्त तृतीय ने अपने पिता नरसिंह गुप्त के समान ही सोने के सिक्के चलवाये उसके सिक्कों पर क्रमादित्य उपाधि मिलती है।

    ➣ इस समय सिक्कों की शुद्धता में गिरावट आने लग गयी थी। जो इस समय के गुप्त शासकों के तेज़ी से पतन की ओर जाने का संकेत करता है।

    विष्णुगुप्त (543–550 ई.) : अंतिम शासक, साम्राज्य का अंत

    ➣ कुमारगुप्त तृतीय गुप्तवंश का अंतिम शासक था।

    नालंदा से प्राप्त एक मुद्रालेख से विष्णुगुप्त का लेख मिलता है जो संभवत: उसका पुत्र था और 550 ई. तक राज्य करता रहा। इसके बाद गुप्त साम्राज्य पूर्णतया समाप्त हो गया।

    ➣ जिसके के बाद कई राज्यों का उदय हुआ जिनमें प्रमुख थे- उत्तर भारत में हर्षवर्धन (पुष्यभूति वंश) का राज्य और दक्षिण भारत में वातापी के चालुक्य और कांचीपुरम के पल्लवों का राज्य।

    गुप्त शासकों की उपाधियाँ

    श्रीगुप्तश्री , आदिराज, महाराज
    घटोत्कचमहाराज
    चन्द्रगुप्त-Iमहाराजाधिराज
    समुद्रगुप्तविक्रमांक, कविराज, पृथिव्याम प्रतिरथ, धर्म प्राचीर बन्ध, सर्वराजोच्छेता, लिच्छवि दौहित्र, सर्वराजोच्छेता, तत्पादपरिगृहित,अश्वमेघकर्ता, पराक्रमांक, अप्रतिरथ,व्याघ्रपराक्रम
    चन्द्रगुप्त-IIविक्रमादित्य, साहसांक, विक्रमांक, देवराज, शकारि,विक्रमांक, नरेन्द्रचन्द्र, श्रीविक्रम सिंह, सिंह विक्रम, अजित विक्रम, परमभागवत, तत्परिगृहीत
    कुमारगुप्त-Iमहेन्द्रादित्य, महेन्द्रादित्य, श्रीमहेन्द्र, अश्वमहेन्द,परमभागवत
    स्कन्दगुप्तक्रमादित्य, विक्रमादित्य, शक्रादित्य
    कुमारगुप्त-IIपरम भागवत्,विक्रमादित्य
    बुधगुप्तपरमभट्टारक, महाराजाधिराज, श्रीविक्रम
    नरसिंहगुप्त परमभागवत
    कुमारगुप्त-IIIपरमदैवत, परमभट्टारक, महाराजाधिराज, क्रमादित्य
  • कन्नौज संघर्ष: त्रिपक्षीय संघर्ष और साम्राज्य की होड़

    📚 विषय सूची

    कन्नौज : एक नजर में

    कन्नौज
    मौखरी वंश का उदय (5वीं सदी)
    ईशानवर्मन (550-574 ई.)

    पुष्य भूति वंश/वर्धन
    हर्षवर्धन (606-647ई.) की राजधानी

    यशोवर्मन
    (725 -752 ई.)

    त्रि-पक्षीय संघर्ष (गुर्जर-प्रतिहार, राष्ट्रकूट व पाल के मध्य)
    कालांतर में गुर्जर-प्रतिहार शासक नागभट्ट द्वितीय (800 – 833 ई.) की राजधानी

    गहड़वाल/राठौर वंश (1080-1194ई.)
    जयचंद्र (पृथ्वीराज चौहान की पत्नी संयोगिता के पिता)

    दिल्ली सल्तनत का हिस्सा
    1194 में मुहम्मद गौरी के अधीन

    दिल्ली सल्तनत की राजधानी
    शम्सुद्दीन इल्तुतमिश (1210-1236 ई.) द्वारा राजधानी स्थान्तरित

    गुप्त साम्राज्य के पतन के पश्चात शक्ति केंद्र का स्थानान्तरण

    ➣ दक्षिण में दूसरी शताब्दी में चोल , पाण्ड्य का उल्लेख मिलता है जबकि उत्तर-भारत में गुप्त साम्राज्य। हालाँकि गुप्त साम्राज्य शक्तिशाली था। जिसे भारत का स्वर्ण युग कहा जाता है।

    ➣ गुप्त साम्राज्य के समकालीन वाकाटक वंश का भी उल्लेख मिलता है। वाकाटक छठी शताब्दी के मध्य तक चालुक्य वंश के उदय होने तक दक्कन में सबसे महत्त्वपूर्ण शक्तिशाली साम्राज्य था। किन्तु गुप्तों के सम्मुख वाकाटकों की शक्ति कमजोर पड़ गयी थी।

    ➣ गुप्तोत्तर काल में दक्षिण-भारत में चालुक्य व पल्लव का सघर्ष मिलता है जबकि उत्तर-भारत में हर्षवर्धन (कन्नौज) का विशाल साम्राज्य (कश्मीर को छोड़कर)।

    ➣ गुप्त साम्राज्य के पतन के पश्चात् 5 -6वीं में भारत दो शक्ति केन्द्रो में विभक्त होने लगा। पहला दक्षिण भारत , दूसरा उत्तर-भारत।

    ➣ उत्तर-भारत में हर्षवर्धन का विशाल साम्राज्य था जबकि दक्षिण में बादामी ,वेंगी के चालुक्यों का शासन था।

    🧠 याद रखें: हर्षवर्धन को अंतिम हिन्दू सम्राट कहा गया है। जिसका इतने बड़े भू-भाग पर शासन था। ध्यान रहे पृथ्वी राज चौहान को भी अंतिम हिन्दू सम्राट का जाता है, क्योंकि उनकी पराजय के पश्चात ही भारत में मुस्लिम शासन स्थापित हुआ।

    ➣ हर्षवर्धन ने दक्षिण जीतने के लिए दक्षिण-अभियान किया जिसे वातापी के चालुक्य पुलिकेशन द्वितीय ने रोका था। जिसके पश्चात पुलिकेशन ने दक्षिणीपथेवर अर्थात दक्षिण का स्वामी उपाधि धारण की थी।

    6वीं शताब्दी ई. में गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद ही राजनीतिक शक्ति के केंद्र के रूप में पाटलिपुत्र का महत्व समाप्त हो गया। फलस्वरूप इसका स्थान उत्तर भारत में स्थित कन्नौज ने ले लिया।

    ➣ प्रारंभ में यह मौखरी वंश की राजधानी रही किन्तु हर्षवर्धन के बहनोई गृहवर्मा(600-605ई.) की हत्या होने के पश्चात हर्षवर्धन ने कन्नौज पर अप्रत्यक्ष शासन किया और उसे अपनी दूसरी राजधानी बनाई।

    ➣ हर्षवर्धन का कोई पुत्र नहीं (पुत्री थी) था। उसकी मृत्यु के पश्चात कन्नौज पर यशोवर्मा का अधिकार हुआ। यशोवर्मन की मृत्यु के बाद कन्नौज पर आधिपत्य को लेकर तीन महाशक्तियों में संघर्ष हुआ है। ये शक्तियाँ थी :- पाल (पूर्व ) , गुर्जर-प्रतिहार (प्रश्चिम) तथा राष्ट्रकूट (दक्षिण)।

    ➣ कालांतर में 7वीं के मध्य भारत में शक्ति के तीन प्रमुख केंद्र उभरे,

    📌

    इसी मध्य भारत की पश्चिमोत्तर सीमा में 7वीं शताब्दी में विदेशी आक्रमण होने लग गए थे जिसमे 712 ई0 का मुहम्मद बिन कासिम का आक्रमण प्रमुख है इस आक्रमण के फलस्वरूप भारत का पश्चिमोत्तर क्षेत्र सिंध (पाकिस्तान-अफगानिस्तान ) भारतीय साम्राज्य से पृथक हो जाता है। लेकिन या अल्पकालिक रहा।

    अभी तक विदेशी आक्रमण आधुनिक भारत की सीमा (पंजाब तथा राजस्थान ) तक नहीं पहुंचे थे।

    ➣ उत्तर भारत में शक्ति केंद्र कन्नौज था एंव अब हर्षवर्धन की भी मृत्यु हो चुकी थी। सामरिक दृष्टि से यह महत्वपूर्ण था। अत: कन्नौज पर अधिपत्य स्थापित करने के लिए इन तीनों शक्तियों मे आपसी संघर्ष होने लगा।

    ➣ इतिहास में कन्नौज के लिए हुए इन तीनों शक्तियों के मध्य हुए संघर्ष को त्रि – पक्षीय संघर्ष के नाम से भी जाना जाता है। इस संघर्ष में अंतिम सफलता गुर्जर-प्रतिहारों (नाग्भट्ट द्वितीय ) को मिली। कन्नौज संघर्ष त्रिपक्षीय संघर्ष

    ➣ त्रि – पक्षीय संघर्ष का आरम्भ प्रतिहार शासक वत्सराज (775 -800 ई0) ने की थी जिसने कन्नौज पर आक्रमण कर इंद्रायुध को पराजित किया और उत्तर भारत में अपनी सत्ता का विस्तार किया।

    ➣ इसके पश्चात् दक्षिण की शक्ति राष्ट्रकूट नरेश ध्रुव प्रथम (780 -93 ई0) ने इस संघर्ष में हस्तक्षेप किया जिसने प्रतिहार राजा वत्सराज तथा पाल नरेश धर्मपाल को पराजित किया।

    ➣ ध्रुव नरेश के वापस दक्षिण लौटते ही पाल नरेश धर्मपाल (770 -810 ई0) ने कन्नौज पर आक्रमण कर इंद्रायुध को सिंहासन से निष्कासित कर चक्रायुध को सिंहासन आरूढ़ किया।

    ➣ धर्मपाल के खलीमपुर ताम्रपत्र से धर्मपाल द्वारा इन्द्रायुध को पराजित करने तथा चक्रायुध को कन्नौज की गद्दी पर बैठाने का उल्लेख मिलता है।

    ➣ पाल शासक की यह सफलता प्रतिहार शासकों के लिए असहनीय थी अतः वत्सराज के पुत्र नागभट्ट द्वितीय (800 – 833 ई.) ने धर्मपाल को परास्त कर कन्नौज पर अधिकार कर लिया।

    ➣ कालांतर में नागभट्ट को राष्ट्रकूट शासक गोविन्द तृतीय से परास्त होना पड़ा। इस पराजय से गुर्जर-प्रतिहारों की शक्ति काफी क्षीण हो गयी।

    ➣ कालांतर में धर्मपाल की मृत्यु के उपरांत एक बार फिर नागभट्ट द्वितीय ने कन्नौज पर अधिकार का प्रयास किया, वह सफल भी हुआ और उसने कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया।

    ➣ इस प्रकार लगभग 200 वर्षों तक चले। इस संघर्ष में प्रतिहार शासक विजयी रहे। छोटे संघर्ष 9वीं शताब्दी तक चलते रहे।

    त्रि-पक्षीय संघर्ष में भाग लेने वाले शासक

    गुर्जर-प्रतिहार (पश्चिमी भारत) राष्ट्रकूट (दक्षिण-भारत) पाल वंश (पूर्वी भारत)
    वत्सराज (783-800 ई.) ध्रुव प्रथम (780-793 ई.) धर्मपाल (770-810 ई.)
    नागभट्ट द्वितीय (800-833 ई.) गोविंद तृतीय (793-814 ई.) देवपाल (810-850 ई.)
    मिहिरभोज (836-885 ई.) अमोघवर्ष प्रथम (814-878 ई.) विग्रहपाल (850-854 ई.)
    महेन्द्रपाल प्रथम (885-910 ई.) कृष्ण द्वितीय (854-915 ई.) नारायण पाल (878-915 ई.)
    महीपाल प्रथम (912-943 ई.) इन्द्र तृतीय (915-922 ई.)
    गूर्जर प्रतिहारराष्ट्रकूटपाल
    1. वत्सराज (783-795 ई.)1. ध्रुव (779-793 ई.)1. धर्मपाल (770-819 ई.)
    2. नाग भट्ट-II (795-833)2. गोविन्द तृतीय (793-814 ई.)2. देवपाल (819-855 ई.)
    3. राम भट्ट (833-836 ई.)3. अमोघवर्ष (814-878 ई.)3. विग्रहपाल (855-860 ई.)
    4. मिहिर भोज (836-885 ई.)4. कृष्ण (878-914 ई.)4. नारायणपाल (860-915 ई.)
    5. महेन्द्रपाल (885-910 ई.)

    भारत में नए शक्ति केंद्रों का उदय

    ➣ सन 712 ई. में अरबों ने सिंध पर आधिपत्य जमा कर भारत विजय का मार्ग प्रशस्त कर दिया। अरबों का यह सफल आक्रमण मुहम्मद बिन कासिम के नेतृत्व में हुआ था।

    ➣ उस समय भारत में कोई केन्द्रीय शक्ति नहीं थी जो इनका समना कर सके। फलत: सन 725 ई. अरबों ने जैसलमेर, मारवाड़, मांडलगढ और भडौच आदि इलाकों पर अपना आधिपत्य जमा लिया।

    ➣ ऐसे समय में दो शक्तियों का प्रादुर्भाव हुआ। एक ओर जहां नागभाट ने जैसलमेर, मारवाड, मांडलगढ से अरबों को खदेड़कर जालौर में प्रतिहार राज्य की नींव डाली,

    ➣ वहीँ दूसरी ओर बप्पा रायले ने चित्तौड़ के प्रसिद्ध दुर्ग पर अधिकार कर सन 734 ई. में मेवाड़ में गुहिल वंश अथवा गहलौत वंश (सिसोदिया वंश) का वर्चश्व स्थापित किया।

    ➣ इस प्रकार लगभग ढाई सौ वर्षों तक राजपूतों राजाओं ने अरबों को सिंध से आगे नहीं बढ़ने दिया।

    ➣ कालांतर में सिसोदिया वंश से ही राणा कुम्भा, रांणा सांगा एंव महाराणा प्रताप जैसे प्रतापी राजपूतों का उदय हुआ।


    ➣ पूर्व में पाल व दक्षिण में राष्ट्रकूट इन विदेशी आक्रमणकारियों से अभी सुरक्षित थे। समकालीन, पूर्व में पाल नरेश महिपाल प्रथम (988 – 1038 ई.) का शासन था। इसका पडोसी राज्य (कन्नौज) गहडवाल वंश का शासन था।

    ➣ दक्षिण में राष्ट्रकूट का अंत कर चालुक्य (कल्याणी के चालुक्य नाम से ) फिर से सत्ता प्राप्त करते हैं जिनका शासनकाल 9-12शताब्दी तक मिलता है।

    ➣ 9वीं शताब्दी के मध्य लगभग 850 ई. में विजयालय (850-875 ई.) के नेतृत्व में चोल शक्ति का भी पुनरुत्थान हुआ। सामान्यत: इसे 9वीं शताब्दी का चौल वंश नाम से भी जाना जाता है।

    सन 1000 ई. में विदेशी आक्रमणकारी आधुनिक भारत की सीमा तक पहुँच गए। इसमें सर्वप्रथम आक्रमण महमूद गजनवी का था जिसने भारत पर 17 बार चढाई की।

    ➣ उसके इन आक्रमणों का उद्देश्य केवल भारत को लूटना था। उसने भारत में कोई मुस्लिम सत्ता स्थापित नहीं की। उसके इन आक्रमणों में मुख्य आक्रमण 1025 ई. गुजरात स्थित शिव का सोमनाथ मंदिर लूटना था।

    12वीं शताब्दी के अंत तक विदेशी आक्रमणकारी उत्तर भारत तक पहुँच गए जिसमे मुहम्मद गौरी व पृथ्वी राज चौहान का तराईन युद्ध (1191-92 ई ) का उल्लेख मिलता है।

    ➣ जहाँ उत्तर-भारत में धीरे धीरे मुस्लिम सत्ता स्थापित होने लगी थी वहीँ दक्षिण-भारत अभी इन मुस्लिम आक्रान्ताओं से सुरक्षित था।

    मुहम्मद गौरीपृथ्वी राज चौहान के मध्य हुए तराईन के द्वितीय युद्ध (1192 ई) में पृथ्वी राज चौहान की पराजय के साथ ही भारत में मुस्लिम सत्ता स्थापित हुई। भारत में गौरी को ही मुस्लिम सत्ता स्थापित करने का श्रेय जाता है।

    ➣ 13वीं शताब्दी तक दक्षिण -भारत विदेशी आक्रमणों से सुरक्षित रहा हालाँकि 6वीं शताब्दी के मध्य मुंबई में अरबी आक्रमण का उल्लेख प्राप्त होता है जिसका उद्देशय केवल लूटपाट बताया गया है।

    ➣ 13वीं शताब्दी एक मध्य पहली बार एक मुस्लिम शासक अल्लाउदीन खिलजी ने दक्षिण-अभियान किया और दक्षिण के कई राज्यों को दिल्ली सल्तनत के अधीन किया। किन्तु उन्हें दिल्ली सल्तनत का हिस्सा नहीं बनाया गया अपितु उनसे कर वसूला गया।

    ➣ कालांतर में सर्वप्रथम फिरोजशाह तुगलक ने अल्लाउदीन खिलजी की नीति के विपरीत दक्षिणी राज्यों को दिल्ली सल्तनत में मिलाया। अब शक्ति का केंद्र दिल्ली की तरफ स्थान्तरित होने लगा था।

    मुहम्मद बिन तुगलक के समय दक्षिण-भारत में विजयनगर और बहमनी राज्य अस्तित्व में आते हैं। इसमें विजयनगर एक हिन्दु साम्राज्य था।

    ➣ मध्यकाल भारत के इतिहास में विजयनगर एकमात्र हिन्दू साम्राज्य था। जिसने हिन्दू धर्म को अक्षुण रखा। तत्कालीन भारत का सर्वाधिक शक्तिशाली राजा कृष्ण देवराय विजयनगर साम्राज्य (तुलुव वंश) से सम्बंधित था।

    ➣ 15वीं सदी में मुग़ल बादशाह अकबर दोनों दक्षिण व उत्तर को एक कर (क्षेत्रफल की दृष्टि से नहीं, अपितु शक्ति) भारत पर एक मात्र मुस्लिम शासक के रूप में किया। हालाँकि इसमें आधुनिक दक्षिणी क्षेत्र शामिल नहीं था।

    ➣ उल्लेखनीय है अकबर के साम्राज्य में उत्तर में कश्मीर सम्मलित था किन्तु पूर्व में गोलकुंडा (पूर्वी उत्तर-प्रदेश और बिहार क्षेत्र) राज्य इसमें शामिल नहीं था।

    ➣ भारतीय इतिहास में मौर्य शासक (चन्द्रगुप्त एंव अशोक) ही ऐसे शासक थे। जिन्होंने सम्पूर्ण भारत पर एक छत्र शासक के रूप में शासन किया था। जिसका क्षेत्रफल आधुनिक भारत से अधिक था।

    ➣ हालाँकि इसमें वर्तमान भारत के क्षेत्र शामिल नहीं थे अपितु आधुनिक नाम फारस-सीमा ( ईरान), अफगानिस्तान , पाकिस्तान सम्मिलित थे जबकि अधिकांश केरल तथा पूर्वी भारत जैसे अरुणांचल , मणिपुर , मिजोरम जैसे क्षेत्र मौर्य वंश में शामिल नहीं थे।

  • संगम काल प्रशासन: राज्य व्यवस्था और समाज

    📚 विषय सूची

    संगम कालीन प्रशासनिक ढांचा

    ➣ संगम काल में राजतंत्रात्मक व्यवस्था का उल्लेख मिलता है। चेर, चोल और पांड्य तीनों राज्यों में राजतंत्रात्मक व्यवस्था ही प्रचलित थी।

    राजपद वंशानुगत था। समस्त अधिकार राजा में निहित थे। राजा को कोन, को, मन्नम, वेन्दन, कारेवन, इरैवन इत्यादि उपाधियाँ दी गई थी। ये उपाधियाँ राजा एवं देवता दोनों के लिए होती थी।

    ➣ राजा का सर्वोच्च न्यायालय राजा की सभा (मनरम) ही होता था। संगम युग के प्रतिनिधियों की सभा मनरम् कहलाती थी।

    ➣ कवियों द्वारा शाही ढोल मुरचु को बजाकर सुबह राजा को नींद से जगाया जाता था। राजा की सुरक्षा हेतु सशस्त्र महिलाएं नियुक्त होती थी।

    ➣ राजा प्रतिदिन अपनी सभा में प्रजा के कष्टों को सुनता था और न्याय कार्य संपन्न करता था। राजधानी में एक राजसभा होती थी जिसे नालवै कहा जाता था। यह राजा के साथ न्याय का कार्य करता था।

    ➣ इस काल के शासक ब्राह्मण मतानुयायी थे, इसलिये उन्होंने ब्राह्मणों को प्रशासन में सर्वोच्च अधिकार एवं सुविधाएँ प्रदान की थी।

    ➣ पुरनानुरू में राजाओं की प्रशंसा में 400 पद्य है तथा एक कविता में चक्रवर्ती राजा की चर्चा की गई है।

    ➣ इस काल के शासक युद्ध प्रेमी होते थे तथा चक्रवर्ती सम्राट बनने की अभिलाषा रखते थे। युद्ध में वीरगति शुभ कार्य माना जाता था।

    ➣ राजा की निरंकुशता पर अंकुश लगाने के लिये पाँच समितियों का गठन किया गया था, जो है-

     1. मंत्रीअमाइच्चार अथवा अमैच्चार
     2. पुरोहित पुरोहितार
     4. राजदूत दूतार
     3. सेना नायक सेनापतियार
     5. गुप्तचर ओर्रार

    नगरीय एवं ग्रामीण प्रशासन

    ➣ प्रशासनिक सुविधा की दृष्टि से राज्य को विभिन्न छोटी-छोटी इकाइयों में विभाजित किया गया था। प्रत्येक इकाई का अपना एक प्रशासनिक अधिकारी होता था।

    ➣ संगम काल में ग्रामीण व नगर शासन प्रबंध में मनरम मुख्य थे। ग्राम प्रशासन की सबसे छोटी इकाई पोडियल (सार्वजनिक स्थल) थी।

    ➣ संगमकालीन प्रशासनिक सुविधा के लिए राज्यों को विभिन्न इकाइयों में विभाजित किया गया था-

    सम्पूर्ण राज्य (मंडलम)

    प्रांत (नाडु)

    नगर या बड़े ग्राम (उर या पेरुर)

    छोटा ग्राम (सिरैयूर)

    पुराना ग्राम (मुडूर)

    छोटे ग्रामों की सभा (अवै)

    ग्राम, प्रशासन की सबसे छोटी इकाई होती थी। छोटे ग्रामों की सभा अवै कहलाती थी, जो स्थानीय विवादोंव्यापार तथा रोजगार आदि से संबंधित होती थी।

    ➣ बड़े ग्राम या नगर को उर कहा जाता था। छोटा ग्राम सिरैयूर/सिरूर कहलाता था।

     मंडलम सम्पूर्ण राज्य
     नाडु प्रांत
     उर (पेरुर) नगर या बड़े ग्राम
     सिरैयूर छोटा ग्राम
     मुडूर पुराना ग्राम
     अवै छोटे ग्रामों की सभा
     पट्टिनम तटीय शहर
     सालै प्रमुख सड़क
     तेरु नगर की प्रमुख गली
     पेडियल सार्वजनिक स्थल

    सैनिक व्यवस्था

    कंल्लिबेली संगम साहित्य में युद्ध पद्धति की जानकारी है। सेना चतुरंगिनी थी (पैदल, हाथी, अश्व एवं रथ )। सेना में वेल्लाल (धनी कृषक) भर्ती किए जाते थे।

    ➣ युद्ध क्षेत्र में संकेत के रूप में ढोल या शंख का उपयोग होता था।

    ➣ सेना को पदै कहा जाता था। युद्ध में शौर्य प्रदर्शित करने वाले वीरों को मारया की उपाधि दी जाती थी।

    ➣ सेना के सेनापति को एनाडि की उपाधि दी जाती थी। सेना की अग्र टुकड़ी को तुसी तथा पिछली टुकड़ी को कुलै कहा जाता था।

    ➣ युद्ध में शहीद हुए सैनिकों की मूर्तियाँ बनाई जाती थी, जिसमें उनका नाम और उनकी उपलब्धियाँ अंकित होती थीं। इस प्रकार के Hero stone को नडुकल या वीरकाल कहते थे।

    कर प्रणाली या राजस्व

    ➣ राज्य का अस्तित्व खेती पर आधारित था। भूमिकर– राजस्व का प्रमुख साधन था। भूराजस्व की दर उत्पादन का 1/6 भाग था।

    भूमिकर नकद या अनाज दोनों रूपों में वसूल किया जाता था।

    ➣ संगम काल में युद्ध से लूटा हुआ धन भी आय का एक मुख्य साधन था।

    ➣ कर अदा करने वाले क्षेत्र की एक प्रसिद्ध इकाई वरियमवारि थी। भूमि का उस इकाई से कर वसूलने वाला प्रभारी वरियार कहलाता था।

    ➣ भूमि निवर्तन के अनुसार मापी जाती थी। सुदूर दक्षिण में मा और वेलि भूमि के माप थे।

    ➣ यहाँ कर देने के लिये अनाज को अंबानम् में तौला जाता था। संभवतः यह बड़ा तौल था। छोटे तौल के रूप में नालि, उलाकू और अलाक प्रचलित थे।

     मा या वेल्लि भूमि की दो प्रसिद्ध माप
     करै भूमिकर
     उल्गु या संगम चुंगी एवं सीमा शुल्क
     कडमै या पाडु राजा को अदा किये जाने वाले कर
     इखैअतिरिक्त या जबरन वसूला जाने वाला कर

    ➣ कर अदा करने वाले क्षेत्र की एक प्रसिद्ध इकाई वरियमवारि थी। जिसका अर्थ ‘कर’ था। भूमि का उस इकाई से कर वसूलने वाला प्रभारी वरियार कहलाता था।

    ➣ राजा का जन्मदिन प्रतिवर्ष एक उत्सव के रूप में मनाया जाता था। जिसको पेरूनल कहा जाता था।

    ➣ कर अदा करने वाले क्षेत्र की एक प्रसिद्ध इकाई वरियमवारि थी।

    ➣ भूमि का उस इकाई से कर वसूलने वाला प्रभारी वरियार कहलाता था।

    सामाजिक व्यवस्था

    ➣ सामाज चार वर्णों में विभक्त था, किंतु यह वर्ण व्यवस्था आर्ययुगीन वर्ण व्यवस्था से भिन्न थी-

    राजा (अरासार)

    ब्राह्मण (अंदणर)

    वैश्य (वेणिसार)

    कृषक (बेल्लाल)

    ➣ पुरूननानुरू में 4 जातियां (कुंडि) का उल्लेख मिलता है। ये तुडियन, पाणन, परैयम तथा कडम्बन थे।

    ➣ संगम काल में भी जाति प्रथा का आधार व्यवसाय ही थे। व्यवसाय का आधार विभिन्न क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति हुआ करती थी।

    ➣ इनके अतिरिक्त कुछ व्यावसायिक वर्गों का भी उल्लेख जैसे-

     परियार पशु की खाल या चमड़े का काम करने वाले।
     एनियर शिकारी ।
     पुलैयन रस्सी की चारपाई बनाने वाले या रस्सी का कार्य करने वाले।
     मलवर या कलवर उत्तरी सीमा पर रहने वाले लोग जो डाका डालते थे।

    क्षत्रिय वर्ग, वैश्य वर्ग तथा किसान वर्ग मिलकर गैर ब्राह्मण वर्ग बनाते थे। अतः समाज मोटे रूप से ब्राह्मण एवं गैर ब्राह्मण दो भागों में ही बंटा था।

    ➣ खेतों में काम करने वाले मजदूरों को कडैसियर कहते थे, जो निर्धन वर्ग में आते थे।

    ➣ वेल्लाल दो वर्गों में विभाजित थे- 1. धनी कृषक वर्ग, 2. भूमिहीन/निर्धन वर्ग।

    वेनिगर शब्द का उल्लेख व्यापारी वर्ग के लिये किया जाता था। किंतु इनकी सामाजिक प्रतिष्ठा अच्छी नहीं थी।

    ➣ चोल राज्य में धनी कृषकों को वेलआरशु की उपाधि दी थी व पाण्ड्य राज्य में इन्हें कविदि की उपाधि दी जाती थी।

    ➣ इस समय तक दक्षिण के राज्यों का आर्यीकरण हो गया था तथा वैदिक यज्ञ होने लगे थे। ब्राह्मणों को दान में भूमि, घोड़े, रथ. हाथी और स्वर्ण मुद्राएँ दी जाती थीं।

    ➣ तमिल क्षेत्र में ब्राह्मणों का आगमन सर्वप्रथम संगम काल में ही होता है। ब्राह्मण मांस खाते थे और ताड़ी पीते थे, जो समाज में बुरा नहीं माना जाता था।

    स्त्रियों की दशा एंव दास प्रथा

    ➣ स्त्रियों की दशा अच्छी नहीं थी, किन्तु स्त्रियों को राजसिंहासन पर आसीन होने का भी अधिकार था। मेगस्थनीज के अनुसार पाण्ड्य राज्य में हेराक्लीज की पुत्री का शासन था।

    सती प्रथा का प्रचलन था। यह प्रथम विशेष कर उच्च सैनिक वर्गों में था। विधवाओं का जीवन दुरूह था।

    ➣ विदुषी औरतों को अवैयार कहा जाता था। दरबारों में गायकों के साथ नर्तकियाँ नाचती थीं, जिन्हें पाणर और विडैलियर कहा जाता था।

    वेश्यावृति को सम्मानीय दर्जा प्राप्त था। वैश्याओं के दो वर्ग थे- कविगैय्यर एवं परतियर |

    चारण काव्य को वाचने वाली एवं नृत्य करने वाली स्त्रियां वीरलियार कहलाती थी।

    ➣ अन्तर्जातीय विवाह भी प्रचलित था। दो प्रकार के विवाह प्रचलित थे-

    • कलाबु – यह माता-पिता की जानकारी के बगैर किया जाता था।
    • कार्पू – यह परिवार वालों द्वारा किया जाता था।
     पांचतिणै – संगम काल में स्त्री पुरुषों का प्रणय निवेदन
     पेरून्दिणै – अनुचित प्रेम
     कैक्किडै- एक पक्षीय प्रणय निवेदन

    ➣ तमिल व्याकरण ग्रंथ तोल्काप्पियम् में बताया गया है कि संगम काल में विवाह को संस्कार के रूप में मान्यता दी गई थी। वैदिक धर्मशास्त्रों में वर्णित आठ प्रकार के विवाहों की चर्चा तोल्काप्पियम् में भी की गई है।

    ➣ संगम साहित्य में मृतक संस्कार विधियों का भी उल्लेख मिलता है। इस काल में अग्निदाह तथा समाधीकरण दोनों ही विधियाँ प्रचलित थीं।

    ➣ युद्ध में बन्दी बनाई गई स्त्रियाँ दास बना ली जाती थीं और उन्हें सार्वजनिक उपासना स्थलों पर रखा जाता था। जहाँ उन्हें प्रतिदिन संध्याकाल में स्नान करके दीप जलाने का कार्य कराया जाता था।

    ➣ समाज में अन्तर्जातीय विवाह प्रचलित था। दास प्रथा भी प्रचलित थी तथा दास-बाजारों के अस्तित्व की भी जानकारी मिलती है।

    कौवा को शुभ पक्षी माना जाता था, जो अतिथि आगमन, विरहिणी को पति के आगमन की सूचना देता था एवं समुद्री जहाज की यात्रा में भी इसे साथ रखा जाता था।

     1. उमनारनमक
     2. कुचावरकुम्हार
     3. कोल्लारलोहार
     4. थैचरखाती
     5. वन्नारधोबी
     6. उलावारहलवाई
     7. परादावारमछुआरा

    आर्थिक व्यवस्था

    ➣ संगम काल में कषि, पशुपालनशिकार जीविका के मुख्य आधार थे। संगमकालीन राज्यों की मुख्य उपज चावल थी।

    ➣ कावेरी नदी डेल्टा बारे में कहा जाता था- जितनी जमीन पर एक हाथी लेट सकता हो, उतनी जमीन सात आदमियों का पेट भर सकती है।

    ➣ कृषि के अंतर्गत धान, गन्ना, रागी, कुल्थी तथा जौ प्रमुख फसलें थीं। संगम साहित्य में गेहूँ का उल्लेख नहीं मिलता है।

    ➣ कृषि के अतिरिक्त मछली उत्पादन, जहाजों का निर्माण तथा कताई-बुनाई महत्त्वपूर्ण उद्योग थे।

    ➣ चेरों का राज्य काली मिर्च, हल्दी, मछली, कटहल तथा भैंस आदि के लिये प्रसिद्ध था। चोलों के राज्य में कावेरी नदी के जल का प्रयोग सिंचाई के लिये किया जाता था।

    ➣ निम्न वर्ग की महिलाएं मुख्यतः खेती कार्य में संलग्न थी, जिन्हें कडैसियर कहा जाता था।

    ➣ संगम साहित्य में पाँच प्रकार की भूमियों का उल्लेख है, जो तिलाई (भौगोलिक संरचना) से जुड़ी है।

    ➣ भूमिकर को करई कहते थे जो 1/6 था। कडमई / कडमे राजा को दिया जाने वाला भाग था।

    ➣ दक्षिण भारत में अगस्त्य ऋषि द्वारा कृषि का विस्तार किया गया।

    व्यापार

    कोडुमनल संगम काल का एक व्यापारिक केन्द्र है। संगम साहित्य से यहाँ भारत रोमन व्यापार का वर्णन मिलता है।

    उरैयूर या ओर्थोरा (चोलों की प्राचीनतम राजधानी) मलमल, सूतीवस्त्रमोतियों के लिए प्रसिद्ध थी। उरैयूर सूती वस्तु उद्योग का महत्त्वपूर्ण केन्द्र था।

    ➣ अज्ञात नाविक द्वारा लिखी गई पेरिप्लस आफ दि ऐरिथ्रियन सी से संगम काल के व्यापार (आयात-निर्यात) के संबंध में जानकारी मिलती है।

    ➣ संगम काल में व्यापार का माध्यम वस्तु विनिमय था। अनाज विनिमय का सर्वाधिक स्वीकृत माध्यम होता था।

    ➣ आयात- घोड़ा, सोना, चांदी, तांबा, रांगा, सीसा, गदला, काँच, शराव, दोहत्थे कलश, मुद्राएँ, पुखराज इत्यादि। सर्वाधिक आयात सोना-चाँदी का था।

    ➣ निर्यात मसाले (जटामासी, तेजपत्ता, काली मिर्च इत्यादि), वस्त्र, मलमल, विलासिता के सामान, कछुए की खोपड़ी, मोती इत्यादि। रोमिला थापर ने कालीमिर्च को काला सोना कहा है।

    कोरकई (कौल्ची) पाण्ड्यों की प्रारम्भिक राजधानी थी व मोतियों के लिए प्रसिद्ध थी।

    ➣ इस काल में सर्वाधिक व्यापार रोमन साम्राज्य के साथ होता था। रोमन सम्राट आगस्टस के सिक्के पुहार, मुजिरिस और अरिकामेडु से मिले हैं।

    अरिकामेडु भारत-रोमन व्यापार का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थल था। अरिकामेडु स्थल जीजी या अयिरनकूपय नदी तट पर था।

    ➣ अरिकमेडु से तीन प्रकार के मृदभाण्ड मिले है- एरेटाइन, एम्फोरा, चक्रांकित मृदभाण्ड या रोलेट। पेरिप्लस ने अरिकमेडु को पोडुका कहा है।

    ➣ माना जाता है कि यवन व्यापारी अपने जहाजों से यहाँ सोना लाते थे और यहाँ से काली मिर्च, मोती, कीमती रत्न तथा पर्वतों को अमूल्य वस्तुएँ ले जाते थे।

    ➣ इस काल में उत्तर भारत एवं सुदूर दक्षिण के बीच व्यापार का भी उल्लेख मिलता है। प्राचीन बौद्ध ग्रंथों में जिस मार्ग का संकेत मिलता है, वह गंगा घाटी से गोदावरी घाटी तक जाता था। यह दक्षिणापथ के नाम से जाना जाता था।

    संगमयुग के प्रमुख बन्दरगाह

    ➣ पेरिप्लस ने संगमयुग के 24 बन्दरगाहों का उल्लेख किया है, जो सिन्धु मुहाने से लेकर कन्याकुमारी तक विस्तृत थे। संगम युग का महत्वपूर्ण बन्दरगाह, पुहार था।

    ➣ इस काल में पूर्वी तट की अपेक्षा पश्चिमी तट पर बंदरगाहों की संख्या अधिक थी। पश्चिमी तट के मुख्य बन्दरगाह नौरा, तोण्डी, मुशिरी, कोडुमणम, बन्दर, वांजी, करोरा और नेल्सिंडा थे।

    ➣ पाण्ड्य राज्य के बन्दरगाह- शालियूर एवं कोरकै (कौल्ची) पूर्वी तट पर तथा नेल्सिंडा पश्चिम तट पर था।

    ➣ चोल राज्य के बन्दरगाह (सभी पूर्वी तट पर)-पुहार (कावेरीपत्तनम),उरैयूर, पोड्डुका

    नीरपेयारू भी एक समुद्री बन्दरगाह था जहां से पश्चिम से घोड़े आयात किए जाते थे।

    तिरुक्काम्युलियर नामक स्थान चेर, चोल और पांड्य राज्य के संगम स्थल के रूप में था। इस काल में रोम के अतिरिक्त मिस्र, अरब, चीन और मालदीव के साथ भी व्यापार होता था।

    ➣ इस समय व्यापारिक (स्थल मार्ग) कारवाँ का नेतृत्व करने वाले सार्थवाह को मासातुवान एवं समुद्री सार्थवाह को मानामिकन् कहा जाता था।

    धार्मिक व्यवस्था

    ➣ संगम काल में मुख्य रूप से तीन धार्मिक मत थे- (1) ब्राह्मण मत, (2) बौद्ध मत और (3) जैन मत

    ➣ यद्दपि संगम युग के दौरान बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म का भी साथ-साथ विकास हुआ। लेकिन ब्राह्मणवादी वैदिक धर्म के अंतर्गत ही इनका प्रसार हुआ।

    ➣ इस काल तक दक्षिण भारत में वैदिक यज्ञ की शुरुआत हो चुकी थी। लोगों का कर्म, पुनर्जन्म तथा भाग्यवाद पर विश्वास था।

    ➣ इस युग में धर्म का संबंध कर्मकांडों और कतिपय आध्यात्मिक अवधारणाओं से था। उनके कर्मकांड का संबंध जीवात्मावादी तथा मानवरूपी देवपूजा के विविध रूपों में था।

    ➣ संगम कालीन मन्दिरों में विभिन्न देवताओं के अनेक मन्दिरों का विशेष उल्लेख हुआ है। मन्दिर नागर, कोइल, कोट्टम, पुराइदेवालय कहलाते थे।

    ➣ दक्षिण भारत के प्रमुख देवता मुरुगन थे। मुरुगन का एक अन्य नाम सुब्रह्मण्यम भी मिलता है। मुरुगन का प्रतीक मुर्गा अर्थात् कुक्कुट है। मुरुगन की उपासना में किए जाने वाले नृत्य को वेलनाडल कहा जाता था।

    ➣ संगम काल में पहाड़ी क्षेत्र के शिकारी पर्वत देव रूप में मुरुगन की पूजा करते थे।

    मछुआरे तथा तटवर्ती क्षेत्र के लोग वरुण की पूजा करते थे।

    किसान लोग मरुद्रम (इंद्र देव) की पूजा करते थे। पुहार में वार्षिक उत्सव में इंद्र की विशेष प्रकार की पूजा होती थी।

    मरियम्मा शीतला माता थी, जो चेचक से संबंधित थीं।

    ➣ संगम काल में शिव, अर्द्धनारीश्वर, अनंतशायी विष्णु, कृष्ण, बलराम आदि देवताओं की उपासना भी लोकप्रिय थी। विष्णु का तमिल नाम तिरूमल है। विष्णु मन्दिर को विनागर कहते हैं।

    कोरावई विजयं की देवी एंव येलम्मा सीमा की देवी थी।

    वन देवी (कुडुरैकरडावुल) जिसकी प्रायः दुर्गा देवी के साथ तुलना की जाती है, की उपासना भी एक अन्य अवशिष्ट धार्मिक परंपरा थी।

    ➣ आयकरण के प्रभाव से शिवाख्यान, वामनावतार रास लीलाएँ आदि कथाएँ प्रचलित हो गई थीं।

    ➣ मणिमेखलै में कापालिक शैव संन्यासियों का वर्णन है। इसमें बौद्ध धर्म के दक्षिण में प्रसार का भी वर्णन है।

    शिल्प्पादिकारम् तथा मणिमेखलै महाकाव्यों तथा कावेरीपट्टिनम (तंजाबुर) में बौद्ध तथा जैन संस्थानों के उल्लेख मिलते हैं।

     1. कुरिचि (पहाड़ियाँ)कुर्वासमुरूगन
     2. पलाई (सूखी रेतीली भूमि)मारावरकोनाईवई या कोरावई (दुर्गा)
     3. मुलाई (जंगली व चारागाह भूमि)अवारमेयन (विष्णु)
     4. मरूदम (कृषि व उपजाऊ भूमि)वैलारसइन्द्र
     5. नैडल (समुद्र तटीय मैदान)मिनिवारवरूण
    कण्णगी/पत्तिनी पातिव्रत्य की देवी, हिंदू धर्म की देवी सावित्री के समतुल्य।
    अयल रानी वैदिक देव इन्द्र की पत्नी इन्द्राणी के समतुल्य।
    उमाइ वैदिक देव शिव की पत्नी उमा के समतुल्य।
    कडुरैकरडावुल वनदेवी, वैदिक देवी दुर्गा के समतुल्य।
    मरियम्मा चेचक की देवी शीतला के समतुल्य।
    येलम्मा सीमा की देवी।
    कोर्रवल विजय की देवी।

    संगम कालीन साहित्य

    ➣ पाण्ड्य शासकों के संरक्षण में कुल तीन संगम आयोजित किये गये, जिनमें संकलित साहित्य को संगम साहित्य की संज्ञा दी गई। उल्लेखनीय है संगम साहित्य धार्मिक नहीं है।

    ➣ संगम साहित्य की भाषा तमिल एंव लिपि ब्राह्मी थी। प्राचीन काल के बाद के दिनों से तमिलों ने ग्रंथी लिपि का प्रयोग शुरू किया।

    ➣ प्रथम संगम मदुरा में, द्वितीय संगम कपाटपुरम् में तथा तृतीय संगम उत्तरी मदुरा में आयोजित किया गया।

    ➣ प्रथम संगम का कोई ग्रन्थ इस समय उपलब्ध नहीं है। तृतीय संगम के भी अधिकांश ग्रन्थ नष्ट हो गये हैं, लेकिन अवशिष्ट तमिल साहित्य तीसरे संगम से ही संबंधित है।

    तोल्लकाप्पियम् द्वितीय संगम का एकमात्र उपलब्ध प्राचीनतम् साहित्य है। यह सबसे प्राचीन तमिल व्याकरण ग्रन्थ है जो सूत्र शैली में रचित है।

    ➣ तोल्लकाप्पियम् के रचनाकार तोल्लकाप्पियर थे, जो अगस्त्य ऋषि के 12 शिष्यों में से एक थे। इसमें आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख है।

    ➣ संगम साहित्य की दो मुख्य विषय वस्तु है-

    • अहूम – इसका सम्बन्ध प्रेम से है।
    • पुरम – ये युद्ध के बारे में है (शासकों की उपलब्धियाँ)।

    ➣ संगम साहित्य को मोटे तौर पर तीन भागों में बाँटा जा सकता है- (1) पत्थुप्पातु, (2) इत्थुथोकै, (3) पदिनेनकीलकन्कु

    ➣ पत्थुप्पातु दस संक्षिप्त पदों का संग्रह है। संभवत: इन पदों को लिखे जाने का समय द्वितीय सदी ईसवी का है।

    ➣ इन संक्षिप्त पदों में पाण्ड्य राजा नेडुजेलियन और चोल राजा करिकाल के विषय में जानकारी मिलती है।

    ➣ इत्थुथोकै आठ कविताओं का संग्रह है।

    ➣ इन कविताओं में संगम काल के राजाओं के नाम और तात्कालिक समाज का विवरण है। ये कविताएँ प्राचीन तमिल साहित्य की उत्कृष्ट कृतियाँ हैं।

    ➣ पदिनेनकीलकन्कु अठारह छोटी कविताओं का संकलन है। इनका भाव उपदेशात्मक है।

    ➣ इन कविताओं में तिरुवल्लुवर द्वारा रचित तिरुक्कुरल या कुरल उत्कृष्ट रचना है। इस रचना में राजनीति शास्त्र, अर्थशास्त्र, आचारशास्त्र और प्रेम जैसे विषय सम्मिलित हैं।

    ➣ संगम काल में महाकाव्यों की भी रचना की गई। यद्यपि ये ग्रंथ संगम साहित्य के अंतर्गत नहीं आते तथापि इनसे तत्कालीन जन-जीवन के विषय में पर्याप्त जानकारी प्राप्त हो जाती है।

    ➣ इस काल के पाँच प्रसिद्ध महाकाव्य हैं- शिलप्पादिकारम्, मणिमेखलै, जीवकचितामणि, वलयपति तथा कुंडलकेशि। इनमें प्रथम तीन ही उपलब्ध हैं।

    ➣ संगमकालीन महाकाव्यों में शिलप्पादिकारम् महाकाव्य का बहुत अधिक महत्त्व है।

    शिलप्पादिकारम् महाकाव्य की रचना चेर शासक शेनगुट्टुवन के भाई इलंगोआदिगल ने की थी।

    ➣ तमिल साहित्य में शिलप्पादिकारम् को एक राष्ट्रीय काव्य के रूप में मान्यता प्राप्त है।

    ➣ यह एक प्रेम कथा पर आधारित महाकाव्य है। इस महाकाव्य के नायक और नायिका क्रमश: कोवलन और कण्णगी है। जो एक पति पत्नी थे।

    ➣ इस महाकाव्य का नायक कोवलन अपनी पत्नी कण्णगी की उपेक्षा कर माधवी नामक एक वेश्या पर अपना सारा धन लूटा देता है।

    ➣ कालांतर में कोवलन अपनी पत्नी के पास आता है और काबुण्डी नामक जैन भिक्षुणी के साथ मदुरा चला जाता है।

    ➣ मदुरा पर चोरी का झूठा आरोप लगता है। राजा कोवलन को जल्दबाजी में मृत्युदण्ड दे देता है। कण्णगी अपने पति को निर्दोष साबित करती है।

    ➣ निर्दोष कोवलन को मृत्युदण्ड देने की ग्लानि में राजा की मृत्यु हो जाती है तथा कण्णगी के शाप से मदुरा जल कर राख हो जाता है।

    ➣ प्रो. मेहण्डाले ने शिलप्पदिकारम को तमिल काव्य का इलियड और मणिमेखलै को तमिल काव्य का ओडेसी कहा है।

    ➣ इस महाकाव्य की रचना मदुरा के एक बौद्ध व्यापारी सीतलैसत्तनार द्वारा की गई।

    ➣ इस ग्रन्थ में महायान बौद्ध धर्म, तर्कशास्त्र की भ्रान्तियों की लम्बी सूची, कांची में पड़े अकाल, संगमकालीन चित्रकला की जानकारी मिलती है।

    ➣ इस महाकाव्य में महाकाव्य की नायिका मणिमेखलै के साहसिक जीवन का वर्णन है। मणिमेखलै’, शिलप्पादिकारम् के नायक कोवलन और उसकी प्रेमिका माधवी से उत्पन्न पुत्री थी।

    ➣ उल्लेखनीय है कि जहाँ पर शिलप्पादिकारम् की कहानी खत्म होती है, वहीं से मणिमेखलै की कहानी प्रारंभ होती है।

    ➣ इस महाकाव्य के लेखक जैन धर्मावलंबी तिरुत्तक्कदेवर हैं। इस महाकाव्य में इसके नायक जीवक का चरित्र-चित्रण किया गया है।

    ➣ ऐसा माना जाता है कि जीवक कुल आठ विवाह करता है और गृह जीवन के बाद परिवार का त्याग करके जैन धर्म अपनाकर संन्यास ग्रहण कर लेता है।

    जीवकचिंतामणि में आठ विवाहों के वर्णन के कारण इसे धर्मग्रंथ (मणमूल) भी कहा जाता है।

    ➣ जीवक चिन्तामणि को विवाह की किताब भी कहा जाता है।

    ➣ संगम साहित्य में सर्वाधिक प्राचीन वंश चेर वंश है तथा इसका ही सबसे अधिक उल्लेख है।

    ओवैयार तथा नच्चेलियर संगम काल की दो प्रसिद्ध कवयित्रियां (विदुषी स्त्रियाँ) थी।

    ➣ पट्टिनप्पालै भी कावेरीपत्तनम पर लिखी एक लम्बी कविता है, इसकी रचना रूद्रन कन्नार ने की।

    ➣ संगम कवि कपिलर को पारि नामक चेर राजा ने संरक्षण दिया। कपिलर ने परणार, कलिथोकै और कुरिन्जप्पात्तु नामक ग्रन्थ लिखे।

    मामूलनार नामक तमिल कवि ने नन्दोंमौर्यों का उल्लेख किया है। तथा नन्दों ने कोष गंगा में छिपाया था, का भी उल्लेख किया है।

    नच्चिरविकनियर ने संगम कृतियों पर टीका लिखी।

    ➣ संगम साहित्य में आठ गीतों के एक संग्रह को एत्तुतोकै कहा जाता है। इनमें आठवाँ गीत पुरनानुरू सबसे प्रसिद्ध है।

    तिरुक्कुरल को तमिल साहित्य का आधार ग्रन्थ भी माना जाता है। इस ग्रन्थ की रचना श्रीलंका के शासक इल्ल एवं उसके पुत्र को शिक्षित करने के लिए की गई थी। इसे लघु वेद, पंचम वेदतमिल बाईबिल भी कहते है।

    ➣ तिरुक्कुरल की गणना साहित्यिक त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) के अन्तर्गत की जाती है। इसमें 133 खण्ड हैं। प्रत्येक में दस कवितायें हैं।

    ➣ एत्तुतोकै के चौथे संग्रह पदिरूप्पत्रु में दस कविताएं हैं। इनमें आठ चेर शासकों की प्रशस्ति मिलती है। इसमें चर राज्य में प्रचलित कलश शवाधाना का उल्लेख है/समाधियों का भी उल्लेख है।

    ➣ अठारह लघु गीतों का एक संग्रह पडिनैन्किल्कनक्कु है। इनमें तिरूवल्लुवर द्वारा लिखा गया तिरूक्कुरल या कुरल तमिल दर्शन ग्रन्थ है तथा दूसरा प्राचीन तमिल ग्रन्थ भी है।

    ➣ तमिल साहित्य के पिता अगस्तस्य थे। संगम साहित्य से ज्ञात होता है कि दक्षिण में आर्य सभ्यता का विस्तार ऋषि अगस्त्य एवं कौंडिन्य ने किया।

    ग्रन्थ लेखकविशेषता
    तोलकाप्पियम् तोलकप्पियार तमिल साहित्य का प्राचीनतम ग्रन्थ, एक व्याकरण ग्रन्थ है,
    शिलप्पदिकारम्इलांगो अदिगलयह एक महाकाव्य है।
    एतुतोग,अहनानूरू रूद्रसर्मनइस ग्रन्थ की रचना तृतीय संगम के दौरान हुई।
    मणिमैकलेसीतलैसंत्तनारब्राह्मण तथा अन्य सम्प्रदायों के सदस्यों से वाद-विवाद तथा मतों का उल्लेख है।
    जीवक चिंतामणि तिरुन्तक्कदेवरइस महाकाव्य में जीवक के पराक्रमपूर्ण कार्यों के बारे में बताया गया है।
    पत्तुपातुइसमे चेर शासकों के शौर्य की गाथा संकलित है।

    संगमकालीन प्रदेश

    कुरुंजि पहाड़ी शिकारीमुरूगन
    पल्लईशुष्क भूमि योद्धाकोवैि एवं दुर्गा
    मुल्नै वन भूमि गडरिएकृष्ण एवं मेयन (विष्णु)
    मरुदममैदानी कृषकसेनन एवं इंद्र
    नेयतल तटीय मछुआरेवरुण एवं काड़लण

    संगम कालीन प्रमुख नगर

     पुहारप्रसिद्ध बन्दरगाह तथा समुद्र तटीय राजधानी (चोल)
     डरैयूरचोलों की द्वीपीय राजधानी तथा सूती कपड़ों का बहुत बड़ा केन्द्र
     कोरकाईपाण्डयों की तटीय राजधानी
     मदुरैपाण्ड्यों की राजधानी
     वांजि या उरैयूर तथा मरंदैचेरों की राजधानी
     कांचीपल्लवों की राजधानी
     मुशिरी या मुजीरिसचेर बन्दरगाह

    संगम काल से संबंधित शब्दावली

    मा या वेल्लि भूमि की दो प्रसिद्ध माप
    करै/कराई भूमिकर
    उलगू या संगम चुंगी एवं सीमा कर
    कडमै या पाठ कर राजा को अदा किया जाने वाला कर
    इरवै अतिरिक्त या जबरन वसूला जाने वाला कर
    मनरम राजा का न्यायालय
    नलवैराजा की सभा
    एनाडि सेनानायक की उपाधि
    औरंर गुप्तचर
    पेरुनल राजा का जन्मदिन
    पोडियाल सार्वजनिक स्थल
    मलवर डाकू
    कोल्लम लोहार
    तच्छन बढ़ई
    कलउ गंधर्व विवाह
    पंचतिणै सहज प्रेम या स्त्री-पुरुषों का प्रणय निवेदन
    कैकिणै एकपक्षीय प्रेम प्रणय निवेदन
    पेरुन्दिणै अनुचित प्रेम
    उलावर कृषक वर्ग
    मरुवर धनी यवन लोगों का निवास स्थान
    अवनम बाजार जो लेनदेन का एक केन्द्र होता था।
    पारण और विडैलियर दरबारों में गायकों के साथ नर्तकियां
    कोरलै विजय की देवी ।
    येलम्मा सीमा की देवी थीं।
    मरुगन तमिलों का सर्वश्रेष्ठ देव
    वेलन मरुगन का दूसरा नाम
    माशनम प्रतिनिधि सभा
    वेनिगर व्यापारी वर्ग
    वेल्लाल धनी किसान
    इराबू राज को दिया जाने वाला उपहार
  • संगम युग | One-Liner Practice

    ❑ संगम युग का समय लगभग 300 ई.पू. से 300 ई. तक था।

    ❑ ‘संगम’ का शाब्दिक अर्थ होता है—साहित्यकारों की सभा या मंडली।

    ❑ भारत में तीन संगम-प्रथम मदुरई, दूसरा कपाटपुरम और तीसरा पुनः मदुरई में हुए।

    ❑ संगम साहित्य से हमें सुदूर दक्षिण के तीन प्रमुख राज्यों-पांड्य, चोल तथा चेर के उद्भव और विकास का विवरण प्राप्त होता है।

    ❑ तृतीय संगम में जैन, बौद्ध, हिन्दू तीनों संप्रदाय के लोगों ने भाग लिया था।

    ❑ दक्षिण भारत में आर्य संस्कृति अगस्त्य ऋषि ने फैलाई।

    ❑ दक्षिण भारत की प्राचीन भाषा तमिल है।

    ❑ संगम शब्द का प्रयोग विद्वत् परिषद् के लिये होता था। विद्वत् परिषद् मदुरई एवं कपाटपुरम में आयोजित होती थी।

    ❑ पाण्डय शासकों की राजधानी मदुरई में थी।

    ❑ तोलकाप्पियम् की रचना तोलकाप्पियर ने की थी, जिसे तमिल भाषा का व्याकरण कहा जाता है।

    ❑ शिल्प्पादिकारम् की रचना इलांगोआदिगल ने की। यह एक प्रेम कथा है। यह तमिल काव्य का इलियड कहलाता है।

    ❑ मणिमेखलै सित्तलैसित्तनार ने लिखा था। इसे तमिल काव्य का ओडिसी कहा जाता है। इसमें संगमयुगीन ललितकला के विकास का उल्लेख है।

    ❑ चेर राज्य की राजधानी वांजि या करूयुर थी।

    ❑ चोलों की राजधानी उरैयुर में थी और राजकीय चिह्न बाघ था।

    ❑ संगम युग में सती प्रथा का उल्लेख मणिमेखलै अभिलेख में मिलता है।

    ❑ मेगास्थनीज ने सर्वप्रथम पाण्ड्यों का उल्लेख किया है।

    ❑ चेर देश गोलमिर्च एवं हल्दी के लिये प्रसिद्ध था।

    ❑ चेरों का राजकीय चिह्न धनुष था।

    ❑ उरैयुर सूती वस्त्र के लिये प्रसिद्ध था।

    ❑ बड़े कृषक तथा शासक वर्ग को वेल्लाल कहा जाता था और शिकारियों को एनियार कहा जाता था।

    ❑ पाण्ड्य देश मोतियों के लिये प्रसिद्ध था।

    ❑ पाण्ड्यों का राजकीय चिह्न मछली था।

    ❑ वेंगी नदी पाण्ड्य राज्य की जीवन रेखा थी।

    ❑ यवन व्यापारियों की बस्तियाँ मुजरिस, पुहार तथा तोण्डी में थी। रथों को बैलों से खींचा जाता था।

    ❑ संगमकाल के प्रमुख निर्यात मोती, मसाले, कीमती पत्थर, हाथी बनी वस्तुएं थी।

    ❑ संगमकाल की प्रमुख फसलें- धान, गन्ना एवं रागी (मरूआ) थीं।

    ❑ संगमकालीन लोगों का प्रिय भोजन चावल था।

    ❑ संगम युग के प्रतिनिधियों की सभा मनरम् कहलाती थी।

    ❑ अरिकमेडु व्यापारिक केन्द्र के रूप में प्रसिद्ध था।

    ❑ विष्णु पुराण का उल्लेख मणिमेखलै अभिलेख में मिलता है।

    ❑ सिन्धु से कन्याकुमारी तक चौबीस बन्दरगाहों का उल्लेख पेरिप्लस ऑफ द इरिथ्रियन सी नामक अज्ञात लेखक की पुस्तक में मिलता है।

    ❑ सबसे शक्तिशाली चोल शासक करिकाल था।

    ❑ भारत एवं रोम के बीच व्यापार का पता पेरिप्लस ऑफ द इरिथ्रियन सी से चलता है।

    ❑ मॉनसून की खोज हिप्पोलस ने की थी।

    ❑ रोमनों ने मुजरिस स्थल पर आगस्टस का मन्दिर बनवाया।

    ❑ पत्नि पूजा चेर शासक शेनगुट्टूवन के शासनकाल से प्रारम्भ हुआ।

    ❑ चोल शासक करिकाल ने कावेरी नदी पर लम्बा बाँध बनवाया।

    ❑ भूमि कर को करै, सीमाशुल्क को उल्गु तथा अतिरिक्त कर को इखै कहा जाता था।

    ❑ तमिल क्षेत्र में छोटे गांव को सिकर तटीय शहर को पट्टिनम प्रमुख सड़कों को साले एवं नगर की मुख्य गली को तेरु कहा जाता था।

    ❑ संगम युग का सर्वाधिक लोकप्रिय देवता मुरुगन था।

    ❑ इन्द्र, मुरुगन, शिव, विष्णु, कृष्ण, बलराम को संयुक्त रूप से देववृन्द कहा जाता था।

    ❑ संगम युग में मन्दिर को नागर कहा जाता था।

    ❑ संगम युग की संस्कृति तमिल और आर्य संस्कृतियों का समन्वय है।

    ❑ मनरम्-शाब्दिक अर्थ-यवन। पोडियाल- शाब्दिक अर्थ-सार्वजानिक स्थल।

    ❑ सर्वोच्च न्यायालय-मनरम्। राजा-मन्नम, राजा का जन्मदिन-पेरुनल।

    ❑ कुरलमारम/कादीमारम-राजमहल में प्रचलित एक विशेष प्रथा जिसके अंतर्गत प्रत्येक शासक अपनी शक्ति के प्रतीक के रूप में अपने राजमहल मैं एक महान वृक्ष रखते थे।

    ❑ पुरुनानुरु से चक्रवर्ती राजा की अवधारणा का उल्लेख मिलता है।

    ❑ गायकों के गायन के साथ नर्तकियाँ नाचती थी, जिन्हें पाणर या विडैलियर कहा जाता था।

    ❑ पेरूर-बड़े गाँव, सिरूर-छोटे गाँव, मुडुर-पुराने गाँव को कहा जाता था।

    ❑ कृषि-राजकीय आय का मुख्य स्रोत। आवूर किलार के अनुसार-हाथी के लेटने में जितनी जमीन घिरती थी, उतनी जमीन में सात लोगों के खाने के लिए अनाज पैदा होता था।

    ❑ महत्वपूर्ण बंदरगाह-पुहार (चोल), शालीपुर (पाण्ड्य), बंदर (चेर) था।

    ❑ चेरों की प्राचीन राजधानी कुरूर, से रोमन सामग्री प्राप्त होती है।

    ❑ विरुक्काम्पलिया-चोल, चेर, पांड्य-तीनों राज्यों का संगम स्थल था।

    ❑ रोम के अतिरिक्त मिस्र, अरब, चीन और मालद्वीप के साथ व्यापार होता था।

    ❑ तिरुक्करल ग्रंथ को तमिल बाइबिल के नाम से जाना जाता है।

    ❑ तोलकाप्पियम– में आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख है जो धर्म शास्त्रों में व्यवस्थित है।

    ❑ एक अन्य कवि के अनुसार-एक वेलि भूमि में एक सहस कलम चावल पैदा होता था।

    ❑ नडुमान अंजी (चेर) ने दक्षिण में गन्ने की खेती की परंपरा का शुभारंभ किया।

    ❑ एनाडि-सेनानायक को दी जाने वाली उपाधि।

    ❑ वल्लाल-धनी किसान-चोल एवं पांड्य राज्य में इनकी नियुक्ति सैनिक एवं असैनिक पद पर की जाती थी।

    ❑ कडैसियर-निचले वर्ण के खेत मजदूर होते थे।

    ❑ अटियोर/विनैवल्लार– खेत मजदूर होते थे।

  • संगम काल (दक्षिण भारत) | Q&A Practice

    ➣ दक्षिण भारत में पाषाण युग के बाद दक्कन के पठार तथा सुदूर प्रायद्वीप में लगभग 1000 ई. पू. के आस-पास किस संस्कृति का उदय हुआ ?
    उत्तर : महापाषाणीय संस्कृति

    ➣ अशोक के अभिलेखों में उल्लिखित चोल, पाण्ड्य और केरलपुत्र (चेर) भौतिक संस्कृति की किस अवस्था के लोग थे?
    उत्तर : उत्तर महापाषाणिक अवस्था

    ➣ किस राज्य के दक्षिणी जिलों में रहने वाले महापाषाणिक लोग मृतकों के अस्थिपंजर को लाल कलश में डालकर गड्ढों में दफनाते थे?
    उत्तर : तमिलनाडु

    ➣ इस संस्कृति के लोगों का पता हमें उनकी बस्तियों के बजाय किससे चलता है?
    उत्तर : उनकी कब्रों से

    ➣ इन कब्रों को महापाषाण कहा जाता है, क्योंकि इन्हें पत्थरों के बड़े-बड़े टुकड़ों से घेर दिया जाता था। इन कब्रों में दफनाए गये लोगों के अस्थि पंजर के साथ किस प्रकार की वस्तुएं मिली हैं?
    उत्तर : लोहे की वस्तुएं और विभिन्न प्रकार के मृद्भाण्ड

    ➣ महापाषाण कन्नों से त्रिशूल, बाणाग्र, बरछे की नोंक, फावड़े तथा हंसिया भी प्राप्त हुई हैं। इनमें मिले मृद्भाण्डों में किस रंग के मृदुद्भाण्ड सर्वाधिक प्रचलित थे?
    उत्तर : काला और लाल

    ➣ ऐतिहासिक युग के प्रारम्भ में दक्षिण भारत का क्रमबद्ध इतिहास हमें जिस साहित्य से ज्ञात होता है, उसे क्या कहा जाता है?
    उत्तर : संगम साहित्य

    ➣ किन राजाओं के संरक्षण में कुल तीन संगम आयोजित कर ‘संगम साहित्य’ का संकलन किया गया?
    उत्तर : पाण्ड्य

    ➣ पाण्ड्य राज्य का उल्लेख सर्वप्रथम किसने किया था, जिसके अनुसार पाण्ड्य राज्य मोतियों के लिए प्रसिद्ध था तथा यहां का शासन एक स्त्री के हाथों में था ?
    उत्तर : मेगास्थनीज

    ➣ अशोक के किस अभिलेख में चोल, चेर, पाण्ड्य और सतिय पुत्र का उल्लेख मिलता है ?
    उत्तर : दूसरे अभिलेख

    ➣ संगम युग की संस्कृति की जानकारी संगम कालीन साहित्यिक रचनाओं से प्राप्त होती है। सामान्यतः इसका काल क्या माना जाता है?
    उत्तर : 300 ई. पू. से 300 ई.

    ➣ संगम साहित्य से तमिल प्रदेश के किन तीन राज्यों का विवरण प्राप्त होता है, जिनका तत्कालीन तमिल राजनीति में बोलबाला था ?
    उत्तर : चोल, चेर तथा पाण्ड्य

    ➣ चोल का राज्य उत्तर-पूर्व में और चेर का राज्य दक्षिण-पश्चिम में स्थित था। पाण्ड्यों का राज्य किस क्षेत्र में स्थित था?
    उत्तर : दक्षिण-पूर्व में

    ➣ प्रथम संगम का आयोजन पाण्ड्यों की प्राचीन राजधानी मदुरा में हुआ था, जो अब समुद्र में विलीन हो गयी है। इस संगम की अध्यक्षता किसने की थी ?
    उत्तर : अगस्त्य ऋषि

    ➣ तृतीय संगम का आयोजन मदुरा में किया गया। इसमें संकलित कविताएं आज भी मौजूद हैं। इनकी संख्या कितनी है?
    उत्तर : मात्र 49

    ➣ तृतीय संगम को 49 पाण्ड्य राजाओं का संरक्षण प्राप्त हुआ। इसकी अध्यक्षता किसने की थी ?
    उत्तर : नक्कीरर

    ➣ द्वितीय संगम का आयोजन कपाटपुरम् (अलैवाई) में किया गया। प्राचीन मदुरा के समान कपाटपुरम् भी समुद्र में विलीन हो गया। इस संगम की अध्यक्षता किसने की थी?
    उत्तर : तोलकाप्पियर

    ➣ दक्षिण में आर्य सभ्यता के प्रचार का श्रेय प्रदान किया गया है, साथ ही, उन्होंने सनातन धर्म का प्रचार पूरे विश्व में भी किया ?
    उत्तर : अगस्त्य ऋषि

    ➣ अगस्त्य को सप्तर्षियों में से एक माना जाता है। उनकी पत्नी विदर्भ देश की राजकुमारी थीं। उनका क्या नाम था ?
    उत्तर : लोपामुद्रा

    ➣ भारत में किस युद्धकौशल को बढ़ावा देने का श्रेय अगस्त्य ऋषि को जाता है?
    उत्तर : मार्शल आर्ट

    ➣ प्रथम संगम में कुल 549 सदस्य सम्मिलित हुए थे। इस संगम को पाण्ड्य वंश के 89 राजाओं ने संरक्षण प्रदान किया। इसमें कई महत्वपूर्ण ग्रंथ संकलित किये गये। वर्तमान में उन ग्रंथों में से कितने उपलब्ध हैं?
    उत्तर : एक भी नहीं

    ➣ संगम काल के दौरान संकलित कई ग्रंथों में से वर्तमान में एकमात्र व्याकरण ग्रंथ ही उपलब्ध है, जिसकी रचना तोलकाप्पियर ने की थी। इस ग्रंथ का क्या नाम है ?
    उत्तर : तोलकाप्पियम

    ➣ विषय वस्तु के आधार पर संगम साहित्य का विभाजन दो भागों में किया जा सकता है। पहला है ‘अहम या आगम’ जिसका संबंध प्रेम से है। दूसरे भाग को क्या कहा जाता है, जो युद्ध से संबंधित है?
    उत्तर : पुरम

    ➣ उपलब्ध संगम साहित्य को किन तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है?
    उत्तर : पत्थुप्पातु, इत्थुथोकै और पदिदेन कीलकन्क्कु

    ➣ पाण्ड्यों के संरक्षण में संपन्न संगम में सर्वाधिक प्राचीन किस वंश का सबसे अधिक उल्लेख मिलता है?
    उत्तर : चेर वंश

    ➣ तमिल प्रदेश में किनका उदय सर्वप्रथम संगम काल में ही हुआ ?
    उत्तर : ब्राह्मणों का

    ➣ संगम साहित्य के अनुसार, ब्राह्मणों के बाद संगम युगीन समाज में ‘वेल्लार’ वर्ग का प्रमुख स्थान था। उनका मुख्य उद्यम क्या था?
    उत्तर : कृषि

    ➣ संगम साहित्य में व्यापारी की सामाजिक प्रतिष्ठा अच्छी नहीं थी। उन्हें शूद्रों की कोटि में रखा गया था। उनको क्या कहा जाता था ?
    उत्तर : बेनिगर

    ➣ तमिल देश के उत्तर में निवास करने वाली किस जाति के लोग अशिक्षित थे और उनका पेशा लूटपाट करने का था ?
    उत्तर : मलवर

    ➣ संगम साहित्य मुख्य रूप से किस भाषा में लिखे गये हैं?
    उत्तर : तमिल

    ➣ किस संग्रह ग्रंथ में तृतीय संगम के आठ ग्रंथों का संग्रह है?
    उत्तर : एतुत्तौके

    ➣ संगम साहित्य को मोटे तौर पर दो समूहों में बांटा जा सकता है आख्यानात्मक और उपदेशात्मक। मेलकणक्कु (अठारह मुख्य ग्रंथ) किस प्रकार का ग्रंथ है?
    उत्तर : आख्यानात्मक ग्रन्थ

    ➣ राज्य के गठन, सेना, कर संग्रह प्रणाली, न्याय व्यवस्था, व्यापारियों, वणिकों, शिल्पियों और कृषकों के बारे में जानकारी किस ग्रंथ से मिलती है?
    उत्तर : आख्यानात्मक संगम ग्रंथ

    ➣ संगमकालीन ग्रंथों में कई नगरों का उल्लेख है, जैसे- कांची, कोर्कई, मदुरै, पुहार और उरैयूर उनमें सबसे प्रसिद्ध नगर कौन-सा था ?
    उत्तर : पुहार या कावेरीपट्टनम

    ➣ संगम ग्रंथों का बहुत कुछ अंश जिसमें उपदेशात्मक अंश भी शामिल है, की रचना किसने की?
    उत्तर : संस्कृत और प्राकृत जानने वाले ब्राह्मण पंडितों ने

    ➣ किन ग्रंथों में न केवल राजा और राजसभा के लिए बल्कि विविध सामाजिक और व्यावसायिक वर्गों के लिए भी आचार-नियम बताए गये हैं?
    उत्तर : उपदेशात्मक ग्रंथों में

    ➣ किस तमिल ग्रंथ में दार्शनिक विचार और सूक्तियां मिलती हैं?
    उत्तर : तिरुकुरल

    ➣ संगम युग में कुल पांच महाकाव्य हैं- शिलप्पादिकारम्, मणिमेखलै जीवकचिन्तामणि, वलयपति तथा कुण्डलकेशि । इनमें से कौन-से महाकाव्य वर्तमान में उपलब्ध हैं?
    उत्तर : प्रथम तीन

    ➣ किस ग्रन्थ को तमिल साहित्य का उज्ज्वलतम रत्न माना जाता है?
    उत्तर : शिलप्पादिकारम् (नूपुर की कहानी)

    ➣ शिलप्पादिकारम् (नूपुर की कहानी) के लेखक चेर शासक सेनगुट्टवन का भाई है। उसका क्या नाम है?
    उत्तर : इलांगोआदिगल

    ➣ दूसरे तमिल महाकाव्य मणिमेखलै (मणियों युक्त कंगन) के रचयिता एक बौद्ध अन्न व्यापारी है। उनका क्या नाम है?
    उत्तर : सीतलैसत्तनार

    ➣ मणिमेखलै’ को एक बौद्ध पुस्तक भी माना जाता है। यह धार्मिक अधिक है, साहित्यिक कम। इसे तमिल साहित्य का क्या कहा जाता है?
    उत्तर : ओडिसी (प्राचीन ग्रीक राष्ट्रीय महाकाव्यों में से एक )

    ➣ जीवक चिन्तामणि (शीबग शिन्दामणि) का लेखन एक जैन संन्यासी और कवि ने की , जो संभवतः चोल राजकुमार था। उस लेखक का क्या नाम है?
    उत्तर : तिरुक्कदेवर

    ➣ संगम समाज में माता-पिता की जानकारी के बगैर किया जाने वाला विवाह क्या कहलाता था?
    उत्तर : कलावु

    ➣ संगम समाज में परिवार वालों द्वारा व्यवस्थित विवाह को क्या कहा जाता था?
    उत्तर : कार्पू

    ➣ संगमयुगीन राज्यों में सर्वाधिक शक्तिशाली किनका राज्य था?
    उत्तर : चोलों का राज्य

    ➣ चोलों का राज्य किन दो नदियों के बीच में स्थित था?
    उत्तर : पेन्नार तथा दक्षिणी वेल्लारु

    ➣ प्रारम्भ में चोल राज्य की राजधानी ‘उत्तरी मनलूर’ थी, लेकिन ऐतिहासिक युग में राजधानी कहाँ स्थान्तरित हो गयी ?
    उत्तर : उरैयूर

    ➣ चोल राजवंश का प्रथम ऐतिहासिक शासक कौन था, जिसकी राजधानी उरैयुर थी ?
    उत्तर : उरवप्पहर्रेइलनजेतचेन्नी

    ➣ बाद में चोल शासक करिकाल ने किंस नगर की स्थापना कर उसे अपनी राजधानी बनाया?
    उत्तर : पुहार नगर ( आधुनिक कावेरीपत्तनम )

    ➣ ई.पू. दूसरी सदी में किस चोल राजा ने श्रीलंका पर विजय प्राप्त की और लगभग 50 वर्षों तक शासन किया?
    उत्तर : एलारा

    ➣ चोलों का प्राचीनतम उल्लेख किसके द्वारा किया गया?
    उत्तर : कात्यायन

    ➣ चोलों का राजचिन्ह क्या था ?
    उत्तर : बाघ

    ➣ संगम काल का सबसे प्रथम एवं महत्त्वपूर्ण शासक कौन था?
    उत्तर : करिकाल

    ➣ करिकाल ब्राह्मण मतानुयायी था, उसने इस धर्म को राजकीय संरक्षण प्रदान किया। उसने किस बंदरगाह का निर्माण करवाया ?
    उत्तर : पुहारपत्तन

    ➣ किस चोल राजा ने कावेरी नदी के मुहाने पर बांध बनवाया तथा उसके जल का उपयोग सिंचाई के लिए करने के उद्देश्य से नहरों का निर्माण करवाया ?
    उत्तर : करिकाल

    ➣ शासन के प्रारम्भिक वर्षों में करिकाल को पदच्युत कर दिया गया था तथा उसे कैद कर लिया गया था। किस लंबी कविता में उसके पुनः गद्दी प्राप्त करने का वर्णन है?
    उत्तर : पत्तुपात्तु

    ➣ तंजौर के निकट वेण्णि के युद्ध से करिकाल को अत्यधिक प्रसिद्धि प्राप्त हुई। इस युद्ध में उसने किस पर विजय प्राप्त की ?
    उत्तर : चेर तथा पाण्ड्य राज्य के 11 राजाओं के समूह पर

    ➣ वेण्णि युद्ध में किस चेर शासक ने अपनी पराजय के बाद आत्महत्या कर ली?
    उत्तर : पेरुमशेरलआदन

    ➣ करिंकाल ने किस युद्ध में 9 राजाओं को परास्त किया?
    उत्तर : वाटैप्परन्दलइ युद्ध

    ➣ करिकाल के काल में व्यापार और वाणिज्य का बहुत बड़ा केंद्र कौन-सा था, जिसका गोदीबाड़ा बहुत विशाल था ?
    उत्तर : कावेरीपत्तनम

    ➣ करिकाल ने अपने राज्य की आर्थिक उन्नति के लिए किसे आधार बनाया?
    उत्तर : कृषि तथा व्यापार

    ➣ करिकाल ने पत्तिनपालै के रचयिता को 16 लाख स्वर्ण मुद्राएं प्रदान कीं। उनका क्या नाम था ?
    उत्तर : रूद्धनकन्नार

    ➣ नौवीं शताब्दी के मध्य किसके नेतृत्व में पुनः चोल सत्ता का उत्थान हुआ?
    उत्तर : विजयालय

    ➣ चोल साम्राज्य की स्थापना से पूर्व विजयालय किनका एक सामंती सरदार था?
    उत्तर : पल्लवों का

    ➣ राष्ट्रकूट शासक कृष्ण तृतीय ने 949 ई. में किस चोल सम्राट को पराजित किया और चोल साम्राज्य के उत्तरी क्षेत्र पर अधिकार कर लिया ?
    उत्तर : परान्तक प्रथम

    ➣ 965 ई. में किसकी मृत्यु और राष्ट्रकूटों के पतन के बाद चोल एक बार फिर उठ खड़े हुए ?
    उत्तर : कृष्ण तृतीय

    ➣ पाण्ड्यों की राजधानी कहां स्थित थी ?
    उत्तर : मदुरई (आधुनिक तंजौर )

    ➣ चेर शासकों का शासन की आधुनिक क्षेत्र में था?
    उत्तर : केरल

    ➣ कर्नाटक क्षेत्र में किनका शासन था ?
    उत्तर : कदम्ब तथा गंगवंशों का

    ➣ किन तीन राज सत्ताओं ने आपस में मिलकर राष्ट्रकूटों के विरुद्ध संघर्ष किया?
    उत्तर : पल्लव, पाण्ड्य तथा चेर

    ➣ पल्लव अधिकतर किस मत के अनुयायी थे?
    उत्तर : शैव मत

    ➣ पल्लवों ने आधुनिक चेन्नई के निकट किस स्थान पर कई मन्दिरों का निर्माण करवाया ?
    उत्तर : महाबलीपुरम

    ➣ चोल वंश के सबसे शक्तिशाली कौन था, जिसने अपने किंस पुत्र को अपने जीवन काल में ही अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया?
    उत्तर : राजा राजराज (985-1014 ई.)

    ➣ किस चोल राजा ने त्रिवेन्द्रम के निकट चेर की नौसेना को नष्ट किया, मदुरई तक विजय प्राप्त की, पाण्ड्य शासक को बंदी बना लिया तथा श्रीलंका पर आक्रमण कर उस द्वीप के उत्तरी हिस्से को अपने साम्राज्य का अंग बना लिया?
    उत्तर : राजराज ने

    ➣ किस चोल राजा ने साम्राज्य के विस्तार की नीति को अपनाया और पाण्ड्य व चेर देशों पर विजय प्राप्त कर उन्हें अपने साम्राज्य में मिला लिया ?
    उत्तर : राजेन्द्र प्रथम

    ➣ राजेन्द्र प्रथम ने किस देश पर पूर्ण विजय प्राप्त कर वहां के राजा और रानी के मुकुटों और राज चिह्नों को अपने अधिकार में ले लिया ?
    उत्तर : श्रीलंका

    ➣ राजराज तथा शैलेन्द्र प्रथम ने विभिन्न जगहों पर शिव तथा विष्णु के मन्दिरों का निर्माण कर अपने विजय के प्रमाण दिए। इनमें से सबसे प्रसिद्ध राजराजेश्वर मन्दिर है,यह मंदिर कहां स्थित है?
    उत्तर : तंजावुर

    ➣ राजेन्द्र प्रथम ने कावेरी के तट पर एक नयी राजधानी ‘गंगा के चोल विजेता का शहर’ का निर्माण किया?
    उत्तर : गंगैकोंडचोलपुरम्

    ➣ तंजौर के बृहदेश्वर मंदिर को किस वर्ष यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत सूची में शामिल किया गया था?
    उत्तर : 1987 में

    ➣ दरासुरम के एरावतेश्वर मंदिर और गंगैकोंडचोलपुरम मंदिर को किस वर्ष एक ही साथ यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल किया गया?
    उत्तर : वर्ष 2004 में

    ➣ चोलकालीन मंदिरों का निर्माण किस शैली में किया गया था ?
    उत्तर : द्रविड़ शैली

    ➣ चोलकाल में वैष्णव मत के प्रसिद्ध आचार्य रामानुजाचार्य थे। उन्होंने किस मत का प्रतिपादन किया ?
    उत्तर : विशिष्टाद्वैत मत

    ➣ चोलयुगीन मूर्तियों में किसकी कांस्य प्रतिमा सर्वोत्कृष्ट है, जिसे चोल कला का सांस्कृतिक कसौटी कहा गया है?
    उत्तर : नटराज

    ➣ तमिल कवियों में प्रसिद्ध ‘जयन्गोन्दार’ किस चोल शासक का राजकवि था ?
    उत्तर : कुलोत्तुंग प्रथम

    ➣ कुलोत्तुंग तृतीय के दरबार में रहने वाले किस कवि का काल तमिल साहित्य का स्वर्ण काल माना जाता है?
    उत्तर : कवि कम्बन

    ➣ चोल 12वीं शताब्दी तक समृद्धशाली बने रहे, लेकिन 13वीं शताब्दी के आरम्भ में उनका पतन शुरू हो गया। दक्षिण में चोल साम्राज्य की जगह किन शासकों ने ले ली?
    उत्तर : पाण्ड्य तथा होयसल सम्राटों ने

    ➣ चोल साम्राज्य का अंतिम शासक किसको कहा जाता है?
    उत्तर : कुलोत्तुंग द्वितीय

    ➣ चौदहवीं शताब्दी के आरम्भ में किन्होंने पाण्ड्य होयसल यादव और काकतीय सम्राटों को जड़ से उखाड़ दिया?
    उत्तर : दिल्ली के सुल्तानों ने

    ➣ चोल राज्य की आय का मुख्य साधन क्या था?
    उत्तर : भूराजस्व

    ➣ चोल काल में भूमि कर उपज का कितना हुआ करता था, जिसे अन्न व नकद दोनों रूपों में लिया जाता था?
    उत्तर : एक तिहाई

    ➣ चोल काल में सेना की टुकड़ी का नेतृत्व करने वाले को नायक तथा सेनाध्यक्ष को क्या कहा जाता था?
    उत्तर : महादण्डनायक

    ➣ चोल काल में सेना में अनेक सेनापति ब्राह्मण थे। उन्हें क्या कहा जाता था?
    उत्तर : ब्रह्माधिराज

    ➣ चोलों के समय में किन धर्मों का व्यापक प्रचार हुआ?
    उत्तर : वैष्णव धर्म एवं शैव धर्म

    ➣ चोल शासक किस धर्म को मानते थे?
    उत्तर : कट्टर शैव

    ➣ चोल राजाओं के समय में तमिल भाषा एवं साहित्य का विकास हुआ। तमिल कवियों में प्रसिद्ध जयन्गोन्दार किस राजा का राजकवि था?
    उत्तर : कुलोत्तुंग प्रथम

    ➣ कुलोत्तुंग तृतीय के दरबार में रहने वाले किस कवि का काल तमिल साहित्य का स्वर्ण काल माना जाता है?
    उत्तर : कवि कंबन

    ➣ चोल साम्राज्य दक्षिण भारत का निस्सन्देह सबसे शक्तिशाली साम्राज्य था। इनके पास कौन-सी सेना सबसे शक्तिशाली थी ?
    उत्तर : नौसेना

    ➣ कुछ इतिहासकारों ने चोल काल को दक्षिण भारत का कौन-सा युग कहा है?
    उत्तर : स्वर्ण युग

    ➣ चोल शासकों की भाषा क्या थी?
    उत्तर : तमिल

    ➣ संगमकालीन पाण्ड्य राज्य का संस्थापक तथा प्रथम राजा कौन था?
    उत्तर : नेडियोन

    ➣ पाण्ड्य राज्य की प्रारंभिक राजधानी कोरकई थी। बाद में इसकी राजधानी कहां स्थापित की गयी?
    उत्तर : मदुरै

    ➣ पाण्ड्य राज्य का प्रतीक चिह्न क्या था?
    उत्तर : एक प्रकार की मछली

    ➣ नेडुजेलियन पाण्ड्य राजाओं में सबसे विख्यात था। इसके समय का प्रसिद्ध युद्ध कौन-सा था?
    उत्तर : तलैयालंगानम् का युद्ध (लगभग 290 ई. )

    ➣ तलैयालंगानम् का युद्ध में नेडुजेलियन ने चोल तथा चेर शासकों एवं अन्य पांच मित्र सामंतों के गुट को पराजित किया। इस विजय के बाद इसने कौन-सी उपाधि धारण की?
    उत्तर : तलैयालंगानम्

    ➣ मदुरा तथा पाण्ड्य देश के संबंध में किस रचना में नेडुजेलियन के कुशल शासन का विस्तृत विवरण प्राप्त होता है?
    उत्तर : मदुरैकांची

    ➣ पाण्ड्य राजा नेडुंजेलियन स्वयं एक कवि था। वह कवियों एवं विद्धानों का सरंक्षक भी था। इसके दो प्रमुख आश्रित कवि कौन थे?
    उत्तर : नक्कीरर और मामुंडिमरूदन

    ➣ शिलप्पादिकारम् के नायक कोवलन को मृत्युदंड किसके काल में दिया गया?
    उत्तर : नेडुंजेलियन

    ➣ पाण्ड्य राजवंश का वर्णन सर्वप्रथम मेगास्थनीज ने अपनी किस पुस्तक में किया था ?
    उत्तर : इंडिका में

    ➣ पाण्ड्यों का उल्लेख मेगस्थनीज ने भी किया है। उसने पाण्ड्य राज्य पर किसकी पुत्री के शासन की बात की है तथा बताया है कि वह राज्य मोतियों के लिए प्रसिद्ध था?
    उत्तर : हेराक्ल

    ➣ पाण्ड्य राजाओं को रोमन सम्राट के साथ व्यापार में लाभ होता था। नेडुंजेलियन ने किस रोमन सम्राट के दरबार में अपना दूत भेजा था ?
    उत्तर : सम्राट आगस्टस

    ➣ संगम काल में संकलित अनुश्रुतियों के अनुसार, किस पाण्ड्य राजा ने पहरूली नामक नदी को अस्तित्व प्रदान किया तथा समुद्र पूजा भी प्रारम्भ करायी ?
    उत्तर : नेडियोन

    ➣ पाण्ड्य वंश का प्रथम ऐतिहासिक राजा विजित राजाओं के प्रति वह कठोर नीति अपनाता था। उसने कई वैदिक यज्ञ भी आयोजित किये। उसका क्या नाम था ?
    उत्तर : पल्शालइ मुदुकुडुमी

    ➣ जतवर्मन सुंदरा पाण्ड्य को श्रीलंका के द्वीपों को जीतने की वजह से क्या कहा गया ?
    उत्तर : द्वितीय राम

    ➣ पल्शालइ मुदुकुडुमी ने कौन-सी उपाधियां धारण की?
    उत्तर : पलशालै तथा महेश्वर

    ➣ संगम युग का अंतिम ज्ञात पाण्ड्य शासक कौन था?
    उत्तर : नल्लिवकोडन

    ➣ मेगस्थनीज ने अपनी पुस्तक इंडिका में पाण्ड्य राज्य का उल्लेख किस नाम से किया?
    उत्तर : माबर

    ➣ पाण्ड्यों का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक केंद्र कहां था?
    उत्तर : मदुरै

    ➣ चेरों का राज्य किस प्रांत में स्थित था?
    उत्तर : आधुनिक केरल

    ➣ चेर राज्य का राजचिह्न क्या था?
    उत्तर : धनुष

    ➣ चेर राज्य की राजधानी पहली वांजि या करुयूर थी। इसकी द्वितीय राजधानी कहां थी?
    उत्तर : तोण्डी

    ➣ संगम युग का प्रथम ऐतिहासिक चेर शासक कौन था, जिसके बारे में यह कहा जाता है कि उसने महाभारत युद्ध में भाग लेने वाले सभी योद्धाओं को भोजन कराया था?
    उत्तर : उदियनजेरल (लगभग 130 ई.)

    ➣ उदयनजेरल का उत्तराधिकारी उसका पुत्र नेदुनजेरल आदन (लगभग 135 ई.) ने सात राजाओं को हराकर कौन-सी उपाधि धारण की?
    उत्तर : अधिराज

    ➣ नेदुनजेरल आदन का किस चोल शासक से भीषण संघर्ष हुआ। जिसमे दोनों मारे गये और दोनों की रानियां सती हो गयीं?
    उत्तर : इलंजेतिचिन्न

    ➣ सबसे प्रतापी चेर राजा कौन था, जिसे ‘लाल या भला चेर’ भी कहा जाता था?
    उत्तर : सेनगुट्टवन

    ➣ चेर शासक सेनगुट्टवन ने किस धार्मिक सम्प्रदाय को समाज में प्रतिष्ठित किया ?
    उत्तर : पत्तिनी

    ➣ संगम काल का अंतिम चेर शासक कौन था, जिसके समकालीन पाण्ड्य शासक नेडुंजेलियन ने इसे पराजित कर चेर राज्य को स्वाधीनता का अंत कर दिया?
    उत्तर : सेड़यै (लगभग 210 ई.)

    ➣ चेर शासकों के समय प्रमुख बन्दरगाह कहां बनाया गया था?
    उत्तर : मुजरिस

    ➣ किसने दक्षिण भारत में गन्ने की खेती शुरू करवाई?
    उत्तर : – आदिगइमान (नड्डुमान अंजी)

    ➣ संगम युग में युद्ध क्षेत्र में संकेत के रूप में किसका उपयोग होता था?
    उत्तर : ढोल या शंख

    ➣ सेना की अग्रिम टुकड़ी को तुसी कहा जाता था। पिछली टुकड़ी क्या कहा जाता था ?
    उत्तर : कुलै

    ➣ किस समुद्री बंदरगाह से पश्चिम से घोड़ों और उत्तर से अन्य उत्पादित वस्तुएं लायी जाती थीं?
    उत्तर : नीरूपेयारू

    ➣ राजा का सर्वोच्च न्यायालय राजा की सभा (मनरम) ही होता था। राजा का जन्मदिन प्रतिवर्ष मनाया जाता था। इस उत्सव को क्या कहा जाता था?
    उत्तर : पेरूनल

    ➣ संगम काल में ग्राम प्रशासन की सबसे छोटी इकाई क्या थी ?
    उत्तर : पोडियल (सार्वजनिक स्थल)

    ➣ कर अदा करने वाले क्षेत्र की एक प्रसिद्ध इकाई क्या थी?
    उत्तर : वरियमवारि

    ➣ भूमि कर वसूलने वाला प्रभारी क्या कहलाता था?
    उत्तर : बरियार

    ➣ तमिल भूमि में ब्राह्मण का दर्शन सबसे पहले किस युग में होता है ?
    उत्तर : संगम युग

    ➣ संगम काल में किसान वर्ग को क्या कहा जाता था?
    उत्तर : बल्लाल

    ➣ संगम काल में खेतिहर मजदूरों को क्या कहा जाता था?
    उत्तर : कडैसियर

    ➣ तमिल प्रदेश की उत्तरी सीमा पर रहने वाले किस जाति के लोगों का मुख्य पेशा लूटपाट, डाका डालना आदि था?
    उत्तर : मलवर या कलवर

    ➣ 300 ई.पू. से 600 ई.पू. के बीच किसने तमिल देश पर कब्जा कर लिया था; इस अवधि को इतिहासकारों द्वारा एक अंतरिम या अंधकार युग कहा जाता था?
    उत्तर : कालभ्रस

    ➣ संगम काल में रोमन व्यापार का केंद्र कौन-सा नगर था?
    उत्तर : अरिकमेडु

    ➣ संगम काल में तमिल में ‘महाभारत’ किसने लिखी?
    उत्तर : पेरुन्देवनार

  • संगम काल: दक्षिण भारत के चोल, चेर और पांड्य राजवंश

    📚 विषय सूची

    संगम युग : परिचय

    ➣ सुदूर दक्षिण के अंतर्गत तुंगभद्रा नदी के दक्षिण का समस्त भूभाग सम्मिलित था। इस भाग को द्रविड़ (तमिल देश) कहा जाता था। यही चोल, चेरपांड्य राज्यों के अस्तित्व का भाग मिलता है।

    ➣ पेरीप्लस में इस भाग को दमिरिका (दमिलकम्) कहा गया है। इस तिकोने भूभाग में कृष्णा, तुंगभद्रा, कावेरी तथा उसकी सहायक नदियां बहती है।

    ➣ नवपाषाणकालीन संस्कृति के पश्चात् सुदूर दक्षिण के इतिहास में जिस संस्कृति का प्रारंभ हुआ, उसे महापाषाणयुगीन संस्कृति कहा जाता है।

    ➣ इस संस्कृति के लोग लौह उपकरणों का प्रयोग करते थे तथा इनके पास काले तथा लाल रंग के मृदभांड थे।

    ➣ ऐतिहासिक युग के प्रारंभ में दक्षिण भारत का क्रमबद्ध इतिहास हमें जिस साहित्य से ज्ञात होता है, उसे संगम साहित्य कहा जाता है।

    संगम शब्द का अर्थ परिषद अथवा गोष्ठी होती है, जिनमें तमिल कवि और विद्वान एकत्र होते थे।

    ➣ परंपरा के अनुसार अतिप्राचीन समय में पाण्ड्य राजाओं के संरक्षण में कुल तीन संगम आयोजित किये गये। इनमें संकलित साहित्य को ही संगम साहित्य की संज्ञा प्रदान की जाती है।

    ➣ संगम काल में 473 कवियों द्वारा लगभग 2289 रचनाएँ की गई थी।

    संगम साहित्य-तीन संगम

    • स्थान : मदुरई
    • 89 पाण्ड्य राजाओं का संरक्षण, भाग लेने वाले कुल 549 संस्थान, 7 कवि, 4499 लेखक
    • अवधि : 4400 वर्ष
    • अध्यक्षता : ऋषि अगस्त (अगत्तियवार)
    • प्रमुख उपस्थित देवता : अगस्त्य, तिरिपुरामेरीथा (शिव), कुमरामेरिंडा (मुरुगन या सुब्रह्मण्यम), मुरांजीयुर (आदि शेष)
    • ग्रंथ : अक्कतियम (अगस्त्यकृत), परिपदल, मुदुनरै, मुदकुग, कलरियाविरुई आदि।
    • उपलब्ध ग्रंथ : कोई नहीं
    • इस संगम के आचार्य थे अगत्तियार या अगस्त्य जो कि उत्तर भारत से आर्य-संस्कृति को लेकर दक्षिण भारत आये।
    • स्थान : कपाटपुरम (वर्तमान अलवै-समुद्र में विलीन)
    • 59 पाण्ड्य राजाओं का संरक्षण
    • भाग लेने वाले 49 अकादमी सदस्य, 3700 कवि
    • अवधि : 3700 वर्ष
    • इस संगम के आचार्य थे अगत्तियार एवं तोलकाप्पियर (कार्यकारी अध्यक्ष)
    • मानक ग्रंथ : अक्कतियम (अगस्त्यकृत), तोलकाप्पियम, मापुरानम, इसै-नुनुक्कम्, भूतपुरानम्, केलि, कुरुकु, वेन्दालि एवं व्यालमलय आदि।
    • तोलकाप्पियम : लेखक – तोलकाप्पियर
    • उपलब्ध ग्रंथ : तोलकाप्पियम यह तमिल भाषा का प्राचीनतम व्याकरण ग्रंथ है। इसके तीन भाग हैं –
    • (i) इलुथु वर्ग विचार
    • (ii) सोल वाक्य विचार
    • (iii) पोरूल वस्तु
    • स्थान : उत्तरी मदुरई
    • इसमें 49 पाण्ड्य राजा, 49 संस्थान और 449 कवि सम्मिलित थे।
    • अवधि : 1850 वर्ष
    • प्रमुख उपस्थित व्यक्ति – नक्कीरर (अध्यक्ष), पाण्ड्यराजा उद्र, सित्तले सित्तनार, कपिलर, परनर आदि।
    • इस संगम के आचार्य थे नक्कीरर।
    • ग्रंथ – पदित्तुप्पत्रु, परिपादल, वरि, वेरिसै आदि।
    • द्वितीय शताब्दी तमिल साहित्य का स्वर्णयुग – अगस्त्य युग
    • तृतीय संगम में जैन, बौद्ध, हिन्दू तीनों संप्रदाय के लोगों ने भाग लिया।

    ➣ संगमकालीन राजनैतिक इतिहास का ज्ञान हमें संगम साहित्य से ही मिलता है। संगम साहित्य में तीन महत्त्वपूर्ण राज्यों- चेर, चोल और पांड्य का उल्लेख किया गया है।

    ➣ संगम साहित्य के अनुसार चेर का राज्य दक्षिण-पश्चिम में, चोलों का राज्य उत्तर-पूर्व में तथा पांड्यों का राज्य दक्षिण-पूर्व में स्थित था।

    तिरुक्काम्पुलियर चेर, चोल, पाण्ड्य तीनों राज्यों का संगम स्थल था।

    चेरचोलपांड्य
    क्षेत्रकेरल/कावेरी नदी (उत्तर-पूर्व)आन्ध्र प्रदेश/पेन्नार व बेल्लार नदी (सुदूर दक्षिण)तमिलनाडु/कावेरी व ताम्रपणि नदी (सुदूर दक्षिण)
    अवस्थितिकोचिन व मालावार क्षेत्रतंजावुर व तिरुचिरापल्लीतिन्नेवल्ली व रामनाथपुरम
    राजधानी वंजि/करूयूरउरैयूरमदुरै
    समुद्री राजधानी मुजिरिसपुहार/कावेरी पट्टनमकोरकई
    राजकीय चिह्नधनुषबाघमछली
    प्रथम शासक उखप्पहर्रेउदियन, नेडियोन
    प्रथम उल्लेखएतरेय ब्राह्मणअष्टाध्यायीमेगास्थनीज
    उपनामसबसे प्राचीन राज्यसर्वाधिक शक्तिशाली राज्यदक्षिणी राज्य
    शाब्दिक अर्थपर्वतीय देशनया देशप्राचीन देश

    प्रारम्भिक चोल राज्य(300 ई. पू. – 1279 ई)

    ➣ संगम काल के तीनों राज्यों में चोल राज्य सर्वाधिक शक्तिशाली था। यह पांड्य राज्य के उत्तर-पूर्व में अवस्थित था।

    ➣ चोल राज्य पेन्नार तथा वेल्लारू नदियों के मध्य स्थित था। चोल राज्य चोलमंडलम् या कोरोमंडल के नाम से भी जाना जाता था।

    ➣ चोलों का प्राचीनतम् उल्लेख कात्यायन ने किया है, इनका प्रतीक चिन्ह बाघ था।

    ➣ प्रारम्भ में चोल राज्य की राजधानी उत्तरी मनलूर थी, लेकिन ऐतिहासिक युग में उरैयूर राजधानी हो गयीं। तंजावूर भी चोलों की राजधानी रही है।

    ➣ बाद में करिकाल ने पुहार नगर (आधुनिक कावेरीपत्तनम) की स्थापना कर उसे अपनी राजधानी बनाया।

    उरवप्पहरेइलनजेतचेन्नी

    ➣ यह चोल राजवंश का प्रथम ऐतिहासिक शासक कौन था. जिसकी राजधानी उरैयुर थी। कहा जाता है कि वह युद्ध में अपने सुन्दर रथों के लिए जाना जाता था।

    एलारा

    ➣ ई.पू. दूसरी सदी के मध्य में एलारा नामक चोल राजा ने श्रीलंका पर विजय प्राप्त की और लगभग 50 वर्षों तक शासन किया।

    करिकाल

    ➣ करिकाल इस काल में सबसे महत्त्वपूर्ण चोल शासक था। उसने 190 ई. के आस-पास शासन किया।

    ➣ करिकाल का अर्थ होता है पांव जला व्यक्ति व् शत्रुदल के हाथियों का विनाश करने वाला।

    ➣ करिकाल ने अपने समकालीन चेर तथा पाड्य राजाओं को परास्त किया तथा कावेरी नदी घाटी में अपनी स्थिति सुदृढ़ की।

    ➣ वह ब्राह्मण मतानुयायी था। उसने इस धर्म को राजकीय संरक्षण प्रदान किया।

    ➣ करिकाल ने कावेरी नदी के मुहाने पर बांध बनवाया तथा उसके जल का उपयोग सिंचाई के लिए करने के उद्देश्य से नहरों का निर्माण करवाया था।

    ➣ शासन के प्रारम्भिक वर्षों में करिकाल को पदच्युत कर दिया गया था तथा उसे कैद कर लिया गया था। पत्तुपात्तु नामक कविता में उसके पुनः गद्दी प्राप्त करने का वर्णन है।

    ➣ तंजौर के निकट वेणिण के युद्ध से करिकाल को अत्यधिक प्रसिद्धि प्राप्त हुई। इस युद्ध में उसने चेर तथा पाण्ड्य राज्य के 11 राजाओं के समूह पर पर विजय प्राप्त की थी।

    वेण्णि युद्ध में चेर शासक पेरुमशेरलआवन ने अपनी पराजय के बाद आत्महत्या कर ली थी।

    ➣ करिकाल ने एक अन्य युद्ध बाटैप्परन्तलइ युद्ध में 9 राजाओं को परास्त किया था।

    ➣ करिकाल ने पत्तिनपालै के रचयिता, रूद्धनकन्नार को 16 लाख स्वर्ण मुद्राएं प्रदान की थी। पट्टिनप्पालै में करिकाल की सफलताओं का वर्णन है।

    शिलप्पदिकारम नामक ग्रन्थ में करिकाल द्वारा हिमालय तक भारत विजय का वर्णन है।

    ➣ करिकाल की संगीत में रूचि थी। पेरुनानुन्नुपादे में करिकाल को संगीत के सप्त स्वरों का विशेषज्ञ बताया गया है।

    ➣ करिकाल के काल में व्यापार और वाणिज्य का बहुत बड़ा केंद्र कावेरीपत्तनम था। उसने पुहारपत्तन बंदरगाह का निर्माण करवाया।

    ➣ करिकाल ने अपने राज्य की आर्थिक उन्नति के लिए कृषि तथा व्यापार को पर्याप्त प्रोत्साहन दिया। जंगली भूमि को साफ करवाकर कृषि योग्य बनवाया। उसने सिंचाई के लिए तालाब निर्मित करवाए।

    ➣ करिकाल के पश्चात चोल राज्य कमजोर हो गया। करिकाल के तीन पुत्रों क्रमश: नलगिल्ली, नेहमुरदुक्किलि तथा मावलत्तान के अतिरिक्त संगम साहित्य में चोल वंश के कुछ अन्य राजाओं के नाम भी प्राप्त होते हैं- कोप्परुन्जोलन, पेरुनरकिल्लि, कोचेगणान् आदि।

    पेरूनरकिल्लि

    ➣ यह अत्यंत पराक्रमी चोल शासक था। चोल राजाओं में इसी ने राजयूस जैसे महान यज्ञ का अनुष्ठान किया।

    शेनगणान

    ➣ इसके बारे में प्रचलित था कि पूर्व जन्म में यह मकड़ा था। इसके संपूर्ण देश में शैव मंदिरों का निर्माण करवाया।

    ➣ कल्लिवल्लि नामक पुस्तक के एक युद्ध में चेर राजा कणक्काल को पराजित कर बंदी बना लिया था, लेकिन चेर राजा के मित्र पौपगे ने चोल राजा की प्रंशसा कर उसे मुक्त करा दिया था।

    ➣ संगमयुगीन चोल शासकों ने दूसरी चौथी सदी तक शासन किया। तत्पश्चात उरैयूर के चोलवंश का इतिहास अंधकारपूर्ण हो जाता है।

    ➣ नौवीं शताब्दी के मध्य विजयालय के नेतृत्व में पुनः चोल सत्ता का उत्थान हुआ।

    पाण्ड्य राज्य (300 ई.पू. – 12वीं शताब्दी ई)

    ➣ पांड्य राज्य का क्षेत्र कावेरी के दक्षिण में स्थित था जिसमें वर्तमान मदुरै तथा तिरुनेलवेली के जिले और त्रावणकोर के कुछ क्षेत्र सम्मिलित थे। वैगई/वैगी नदी पाण्ड्यों की जीवन रेखा थी।

    ➣ पाण्ड्याओं का पहला उल्लेख मेगस्थनीज ने किया है, उसके अनुसार यह राज्य मोतियों के लिए प्रसिद्ध था और एक महिला (हेराक्ल की पुत्री) द्वारा शासित था,

    ➣ जो पाण्ड्य समाज में कुछ हद तक मातृसत्तात्मक प्रभाव को दर्शाता है।

    ➣ पाण्ड्य राज्य का उल्लेख पाणिनी की अष्टाध्यायी में है। मेगस्थनीज ने पांड्य राज्य का उल्लेख माबर नाम से किया है।

    ➣ पाण्ड्यों का प्रतीक चिह्न मछली (कार्प) था। इनकी प्रारम्भिक राजधानी कोरकई (कौल्ची) थी, बाद में मदुरै (मदुरा) राजधानी बनी।

    नेडियोन

    ➣ संगम ग्रंथों के अनुसार नेडियोन प्रथम पांड्य शासक था। नेडियोन का अर्थ लम्बा आदमी है।

    ➣ नेडियोन ने पहरूली नदी को अस्तित्व प्रदान किया तथा समुद्र की पूजा भी इसने प्रारंभ करवाई, परंतु इसकी ऐतिहासिकता संदिग्ध है।

    पलशालइ मुदुकुडुमी

    ➣ इसे पांड्य वंश का प्रथम ऐतिहासिक शासक माना जाता है। पलशालै का अर्थ अनेक यज्ञशालाएं बनाने वाला है। इसने अनेक यज्ञ भी किए।

    ➣ पल्शालइ मुदुकुडुमी ने पलशालै तथा महेश्वर उपाधियां धारण की थी।

    नेदुजेलियन

    ➣ नेदुजेलियन पाण्ड्य राजाओं में सबसे विख्यात था। इसका शासक काल लगभग 210.ई. था।

    ➣ नक्कीरर तथा मांमुडि मरुदन, जैसे प्रसिद्ध कवियों ने नेडुंजेलियन पर कविताएँ लिखीं जो ‘पत्तुपात्र’ में संकलित है। ‘मदुरैकांजी’ नामक एक रचना जो मदुरा और पांड्यों से संबंधित थी, में नेडुजेलियन को कुशल शासक बताया गया है।

    तलैयालंगानम का युद्ध (290 ई.)

    ➣ नेडुंजेलियन इस युद्ध को जीतने के कारण बहुत प्रसिद्ध हुआ। लगभग 290 ई. हुए इस युद्ध में नेह्युजेलियन ने चोल तथा चेर शासकों एवं अन्य पांच मित्र सामंतों के गुट को पराजित किया।

    ➣ इसी युद्ध में उसने चेर शासक शेय (हाथी की आंख वाला) को बंदी बनाकर पांड्य राज्य के बंदीगृह में डाल दिया। इस विजय के बाद इसने तलैयालंगानम की उपाधि धारण की।

    मदुरा तथा पाण्ड्य देश के संबंध में मदुरैकांची नामक रचना में नेडुजेलियन के कुशल शासन का विस्तृत विवरण प्राप्त होता है।

    ➣ नेडुजेलियन स्वयं एक कवि था। वह कवियों एवं विद्धानों का सरंक्षक भी था। इसके दो प्रमुख आश्रित कवि नक्कीरर और मामुंडिमरूतन थे।

    ➣ नेडुंजेलियन के काल में ही शिलप्पादिकारम् के नायक कोवलन को मृत्युदंड दिया गया था। कहा जाता है कि वह निर्दोष था।

    ➣ पाण्ड्य राजाओं को रोमन सम्राट के साथ व्यापार में लाभ होता था। डुजेलियन ने रोमन सम्राट आगस्टस के दरबार में अपना दूत भेजा था।

    ➣ नेडुजेलियन ने वैदिक धर्म को प्रोत्साहन दिया और बहुत से यज्ञ किये थे।

    ➣ इसके समय पांड्यों की राजधानी मदुरै, नेडुंजेलियन के काल में सांस्कृतिक और व्यापारिक क्रियाकलापों का केंद्र थी।

    वैखिरशेलिय कौरके

    ➣ नेडुंजेलियन की मृत्यु के बाद इसका छोटा भाई कौरके गद्दी पर बैठा। इसकी मृत्यु भित्ति चित्रों को देखते हुए हुई थी। इसलिए इसे चित्तिरमरदत्रुतुंजियवमरन के नाम से भी जाना जाता है।

    जतवर्मन सुंदरा पाण्ड्य ने पाण्ड्य साम्राज्य पर 1251-61 ई. तक शासन किया। उसे श्रीलंका के द्वीपों को जीतने की वजह से द्वितीय राम कहा गया।

    ➣ संगम युग का अंतिम ज्ञात पाण्ड्य शासक नल्लिवकोडन था। जिसका प्रमाण नातनार की कविता में मिलता है।

    चेर वंश (300 ई.पू. – 14वीं शताब्दी ई)

    ➣ चेर राज्य मालाबार (केरल) क्षेत्र में था। संगम साहित्य में सर्वाधिक प्राचीन वंश चेर वंश है तथा इसका ही सबसे अधिक उल्लेख है।

    ➣ चेरों का प्रतीक चिह्न धनुष तथा राजधानी वांजि (करूवुर) एवं दूसरी राजधानी तोण्डी थी।

    ➣ तीसरे संगम के समय एत्तुतोगै (अष्ट पदावली) का चौथा संग्रह पट्रिप्पत्तु (पदिरूपत्तु) है। पदिट्रप्पत्तु में दस कविताओं का संग्रह है। इसमें आठ चेर शासकों की शौर्य गाथाओं का वर्णन मिलता है।

    उदियन जेरल (130 ई.)

    ➣ यह प्रथम चेर शासक था। इसका काल लगभग 130 ई. माना जाता है। इनके संदर्भ में कहावत है कि इसने कुरूक्षेत्र में भाग लेने वाले सभी योद्धाओं को भोजन कराया। इसी कारण से इन्हें महाभोजन उदियनजेरल की उपाधि मिली।

    ➣ उदियनजेरल अधिराज की उपाधि धारण करता था जो किसी समकालीन शासक पर विजय का प्रतीक था।

    ➣ उदियनजेरल नियमित रूप से जनता में भोजन वितरित करवाता था। इस कार्य हेतु उसने एक बड़ी पाकशाला भी बनवाई थी।

    नेदुनजेरल आदन (155 ई.)

    ➣ इसकी राजधानी मदुरै थी। कहा जाता है कि नेदुनजेरल आदन ने सात अभिषिक्त राजाओं को पराजित कर अधिराज की उपाधि धारण की।

    ➣ इसके द्वारा हिमालय तक विजय और पर्वत पर चेर राजचिन्ह अंकित करने की बात की गई है। जिसके उपकक्ष में इसने इमयवरम्बन उपाधि धारण की जिसका अर्थ होता है – हिमालय तक सीमा वाला।

    नेदुन जेरल आदन के समय में पश्चिमी जगत से व्यापार महत्वपूर्ण था। लेकिन व्यापार में बांधा कदम्बु नामक जनजाति करती थी जिसका इन्होंने दमन किया।

    ➣ मालाबारतट पर स्थित यवन व्यापारियों को बंदी बना लिया था। बाद में हीरे-मोती एवं बहुमूल्य मणियों को लेकर उन्हें मुक्त कर दिया।

    ➣ इसका चोल शासक इलंजेति चिन्न से संघर्ष हुआ। संघर्ष में दोनों मारे गए और दोनों की रानियां सती हो गई।

    कुट्टवन (180 ई.)

    ➣ नेदुंजेरल आदन के छोटे भाई कुट्टवन ने कोन्गू के युद्ध में सफलता प्राप्त करके चेर राज्य को पूर्वी तथा पश्चिमी समुद्र तक विस्तृत कर दिया।

    ➣ इसने अनेक सामंतों को भी हराया। इसके पास बड़ी संख्या में हाथी थे। कुट्टवन को हाथियों का स्वामी कहा जाता है (यह शेनगुट्टुवन से पहले शासक बना था।)

    शेनगुट्टवन अथवा धर्मपरायण कुट्टवन (180 ई.)

    ➣ चेर वंश का सबसे प्रतापी शासक जिसका गुणगान कवि परणर ने भी किया है। इस शासक को लाल (भला चेर) भी कहा जाता था। यह इमयवरम्बन का पुत्र था।

    ➣ इसने भी अधिराज की उपाधि धारण की तथा चेर राज्य में पत्तिनी (पत्नी) पूजा प्रारंभ की जिसका उल्लेख दशगीत में मिलता है। इसे कण्णगी पूजा भी कहा गया।

    शिलप्पादिकारम् के अनुसार पत्नी पूजा के प्रचलन में पांड्य तथा चोल शासकों के साथ श्रीलंका के शासक भी सहायक चेर बलिपुरम् के युद्ध में इसने 9 चोल शासकों को पराजित किया तथा कदम्बों का विनाश किया।

    ➣ इसके बाद ही इसने कदलपिरक्कोत्तिय अर्थात् समुद्र को पीछे हटाने वाला की उपाधि धारण की थी।

    ➣ इसके पास एक शक्तिशाली नौसेना थी। कहा जाता है कि लाल शेनगुटुवन ने उत्तर दिशा में चढ़ाई की और गंगा को पार किया।

    गजबाहु एक तमिल कवि इलम्बोधियार के साथ शेनगुट्टवन के दरबार में आया।

    ➣ संगम कालीन कवि परणर ने शेनगुट्टुवन का यशोगान किया है। उसके पास जहाजी बेड़ा भी था।

    पेरून्जेरल इरंपोरई (190 ई.)

    ➣ यह चोल शासक करिकाल का समकालीन था।

    ➣ इसने सामेल जिले में तगडूर (धर्मपुर) के शासक आदिगैमान नडुमानअंजी को परास्त किया। आदिग इमान को दक्षिण में गन्ने की खेती प्रारम्भ करने का श्रेय प्राप्त है।

    सैईयै (लगभग 210 ई.)

    ➣ संगम काल का अंतिम चेर शासक सेइयै ( लगभग 210 ई.) था, जिसके समकालीन पाण्ड्य शासक नेडुजेलियन ने इसे पराजित कर चेर राज्य की स्वाधीनता का अंत कर दिया।

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