गुप्त साम्राज्य के ऐतिहासिक स्रोत
➣ गुप्त राजवंश का इतिहास जानने के निम्नलिखित तीन महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं-
- साहित्यिक स्रोत
- पुरातात्त्विक स्रोत
- विदेशी यात्रियों के विवरण
साहित्यिक स्रोत
➣ विशाखदत्तं के नाटक देवीचंद्रगुप्तम् से गुप्त शासक रामगुप्त एवं चंद्रगुप्त द्वितीय के बारे में जानकारी मिलती है।
➣ इसके अलावा कालिदास की रचनाएँ (ऋतुसंहार, कुमारसंभवम्, मेघदूत, मालविकाग्निमित्रम्, अभिज्ञान शाकुंतलम्) तथा शूद्रक कृत मृच्छकटिकम् और वात्स्यायन कृत कामसूत्र से, भी गुप्त काल, की जानकारी मिलती है।
पुरातात्त्विक स्रोत
➣ पुरातात्त्विक स्रोत में अभिलेखों, सिक्कों तथा स्मारकों से गुप्त राजवंश के इतिहास का ज्ञान होता है।
➣ समुद्रगुप्त के प्रयाग प्रशस्ति अभिलेख से उसके बारे में जानकारी मिलती है।
➣ स्कंदगुप्त के भीतरी स्तंभलेख से हूण आक्रमण के बारे में जानकारी मिलती है, जबकि स्कंदगुप्त के जूनागढ़ अभिलेख से इस बात की जानकारी प्राप्त होती है कि उसने सुदर्शन झील का पुनर्निर्माण करवाया था।
➣ गुप्तकालीन राजाओं के सोने, चांदी तथा तांबे के सिक्के प्राप्त हुए हैं। इस काल में सोने के सिक्कों को दीनार, चांदी के सिक्कों को रूपक अथवा रूप्यक तथा तांबे के सिक्कों को माषक कहा जाता था।
➣ गुप्तकालीन स्वर्ण सिक्कों का सबसे बड़ा ढेर राजस्थान प्रांत के बयाना से प्राप्त हुआ है।
➣ मंदिरों में लगवा का विष्णु मंदिर (जबलपुर, मध्य प्रदेश). भूमरा का शिव मंदिर (सतना, मध्य प्रदेश), नचना कुठारा का पार्वती मंदिर (पन्ना, मध्य प्रदेश), भीतरगाँव का मंदिर (कानपुर, उत्तर प्रदेश), देवगढ़ का दशावतार मंदिर (झाँसी, उत्तर प्रदेश) आदि विशेष उल्लेखनीय हैं।
➣ गुप्तकालीन स्मारकों, जैसे- मंदिर, मूर्तियाँ, चैत्यगृह आदि से तत्कालीन कला और स्थापत्य की जानकारी मिलती है।
➣ अजंता एवं बाघ की गुफाओं के कुछ चित्र भी गुप्त कालीन माने जाते हैं।
विदेशी यात्रियों के विवरण
➣ फाहियानः यह चीनी यात्री था और चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में भारत आया था। इसने मध्य देश का वर्णन किया है।
➣ ह्वेनसांग: इसने कुमारगुप्त प्रथम, बुधगुप्त, नरसिंहगुप्त बालादित्य आदि गुप्त शासकों का उल्लेख किया है। इसके विवरण से ही यह पता चलता है कि कुमारगुप्त ने नालंदा महाविहार की स्थापना करवाई थी।
प्रशासन व्यवस्था
➣ गुप्त प्रशासन राजतंत्रात्मक व्यवस्था पर आधारित था। देवत्व का सिद्वान्त गुप्तकालीन शासकों में प्रचलित था। राजा अपने बड़े पुत्र को युवराज घोषित करता था।
➣ गुप्तों की प्रशासनिक व्यवस्था को प्राक्-सामंती व्यवस्था कहा जा सकता हैं दूसरी विशेषता यह थी कि संपूर्ण साम्राज्य में एक-जैसी व्यवस्था नहीं थी।
➣ गुप्त साम्राज्य के अंतर्गत विभिन्न अधीनस्थ शासक राज्य, आश्रित राज्य इत्यादि थे जिन्हें प्रशासनिक स्वायत्तता प्राप्त थी।
➣ गुप्तों की शासन व्यवस्था पूर्णतया मौलिक नहीं थी। उसमें मौर्यों, सातवाहनों, शकों तथा कुषाणों के प्रशासन की विधियों का समावेश था।
➣ गुप्त राजाओं की तुलना सूर्य, अग्नि, यम, कुबेर, विष्णु से की गई है।
➣ गुप्त काल में प्रशासन की एक मुख्य विशेषता यह थी कि इस समय वेतन नक़द में न देकर सामान्यतः भूमि अनुदान के रूप में दी जाती थी।
➣ दो तरह का भूमि अनुदान प्रचलन में था। अग्रहार सिर्फ़ ब्राह्मणों को प्राप्त होने वाला अनुदान होता था। इसके अंतर्गत आने वाली भूमि कर मुक्त होती थी।
➣ दूसरे प्रकार का भूमि अनुदान वह होता था जिसे राजा अपने अधिकारियों को उनकी सेवा के बदले उपहार के रूप में देता था।
➣ यद्दपि सातवाहन काल से भूमिदान की प्रथा शुरू हुई थी। किन्तु सर्वाधिक भूमि अनुदान गुप्तकाल में दिया गया।
साम्राज्य संरंचना
देश या भुक्ति
(राजा)
↓
विषय
(विषयपति)
↓
बीथि
↓
पेठ
(ग्रामो का समूह)
↓
ग्राम
(ग्रामिक)
➣ गुप्त साम्राज्य अनेक प्रांतों में विभक्त था। प्रांतों को देश, भुक्ति या अवनी कहा जाता था। भुक्ति के अधिकारी को उपरिक कहा जाता था।
➣ जूनागढ़ अभिलेख में सौराष्ट्र को एक देश कहा गया है। चन्द्रगुप्त के एक अभिलेख में सुकुती (मध्यभारत) नामक देश का उल्लेख मिलता है।
➣ सीमा प्रांतों के प्रशासक को गोप्ता कहा जाता था। इन पदों पर राजकुमारों या विश्वसनीय व्यक्तियों को ही नियुक्त किया जाता था। इन अधिकारियों की नियुक्ति पांच वर्ष के लिए की जाती थी।
प्रांतीय शासन
➣ प्रांतों को जिलों में बांटा जाता था, जिसे विषय कहा जाता था। विषय का प्रधान अधिकारी विषयपति कहलाता था। विषयपति की नियुक्ति उपरिक करते थे।
➣ विषयपति का प्रधान कार्यालय अधिष्ठान कहलाता है। विषयपति के अधीन कर्मचारियों में शामिल थे-
| शौक्किक | कर वसूलने वाला।
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| गौल्मिक | स्थानीय फ़ौज अथवा जंगलों का अधिकारी।
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| पुस्तपाल, करणिक | दस्तावेज संरक्षण
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➣ विषयपति के सहयोग हेतु एक परिषद् होती थी। इनके सदस्यों को विषयमहत्तर कहा जाता था, जिनमें निम्न वर्ग के लोग सदस्य होते थे-
| नगरश्रेष्ठि | पूंजीपति वर्ग का नेता
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| सार्थवाह | विषय के व्यापारियों का नेता
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| प्रथम कुलिक | शिल्पियों व व्यवसायियों का मुखिया
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| प्रथम कायस्थ | मुख्य लेखक।
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➣ विषय को वीथियों में बांटा गया था। वीथि की समिति में भू-स्वामियों एवं सैनिक कार्यों से संबद्ध व्यक्तियों को रखा गया था। गुप्तों ने प्रथम बार इतनी व्यवस्थित प्रांतीय शासन की व्यवस्था की थी।
➣ वीथि से छोटी इकाई पेठ थी। जिसका उल्लेख संक्षोभ के खोह अभिलेख में मिलता है। पेठ अनेक ग्रामों के समूह को कहा जाता था।
गुप्त साम्राज्य में ग्राम समूह की छोटी इकाई को पेठ कहते थे।
नगरीय शासन
➣ नगरों का प्रशासन नगर महापालिकाओं द्वारा चलाया जाता था। नगरपति (पुरपाल, द्रांगिक) नगर का मुख्य अधिकारी होता था।
➣ वह कुमारामात्य के श्रेणी का अधिकारी होता था। जूनागढ़ लेख से ज्ञात होता है कि गिरनार नगर का पुरपाल चक्रपालित था।
➣ नगर के शासन के लिए नियुक्ति समिति को सम्भवतः पौर कहा जाता था।
स्थानीय शासन
➣ ग्राम प्रशासन की सबसे छोटी इकाई थी। जिसका प्रशासन ग्राम सभा द्वारा संचालित होता था।
➣ ग्राम सभा का मुखिया ग्रामिक कहलाता था एवं सदस्यों को महत्तर कहा जाता था जो ग्राम के प्रतिष्ठित एवं कुलीन व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व करते थे।
➣ कुछ गुप्तकालीन अभिलेखों में ग्राम सभा को ग्राम जनपद एवं पंचमंडली कहा गया है।
केंद्रीय शासन
➣ गुप्त प्रशासन में राजा को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था। सिद्धांत: राज्य की समग्र प्रशासनिक शक्तियां उसी में केंद्रित थी।
➣ वह कार्यपालिका, न्यायापालिका एवं सैनिक मामलों का प्रधान था, लेकिन उसे कानून बनाने का अधिकार नहीं था। वह धर्मप्रवर्तक (कानून का पालक) माना जाता था।
➣ गुप्त शासकों ने गौरवपूर्ण उपाधियों (महाराजाधिराज, परमभट्टारक, परमेश्वर, परमदेवता) द्वारा जनता पर अपना प्रभाव स्थापित किया।
➣ इन उपाधियो में विदित होता है कि गुप्त शासकों के अधीन अनेक छोटे राजा थे तथा गुप्त राजा देवता के सदृश थे।
➣ राजा को शासन कार्य में सहायता देने के लिए मंत्रिपरिषद होती थी। इसको प्रयाग प्रशस्ति में राज्य सभा कहा गया है। जबकि राज्य सभा के सदस्यों को संभय कहा जाता था।
➣ सदस्य सामान्यतः उच्च वंश से नियुक्त किए जाते थे। इनका पद वंशगत होता था। इनका मुख्य कार्य विभिन्न विभागों की देखभाल करना एवं राजा को मंत्रणा देना था।
➣ पुलिस विभाग के मुख्य अधिकारी को दण्डपाशिक कहा जाता था। इस विभाग के साधारण कर्मचारियों को चास्ट और भास्ट कहते थे।
➣ समुद्रगुप्त की प्रयाग-प्रशस्ति से ज्ञात होता है कि हरिषेण एक ही साथ कुमारामात्य, सांधिविग्रिहिक एवं महादंडनायक का कार्य करता था।
➣ नौकरशाही को अमात्य के नाम से भी जाना जाता है अमात्य का पद अधिकतर ब्राह्मणों के लिए सुरक्षित रहता था, परंतु अन्य वर्णों के व्यक्तियों की भी इस पद पर नियुक्ति होती थी।
➣ गुप्तकाल में अधिकारियों का पद वंशानुगत बन गया। उन्हें वेतन के रूप में नकद राशि से ज्यादा भूमि दी जाती थी।
गुप्तकालीन अधिकारी
| पद | कार्य |
| 1. महासेनापति | सेना का सर्वोच्च अधिकारी
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| 2. रणभांडगारिक | सेना की आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाला प्रधान अधिकारी ।
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| 3. महाबलाधिकृत | सैनिक अधिकारी
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| 4. दडपाशिक | पुलिस विभाग का प्रधान
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| 5. महादण्डनाय | युद्ध व न्याय विभाग का कार्य देखने वाला
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| 6. महासंधिविग्रिहिक | युद्ध व शांति का प्रधान
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| 7. विनयस्थितिस्थापक | शांति-व्यवस्था का प्रधान
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| 8. महाभांडगरिधिकृत | राजकीय कोष का प्रधान
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| 9. महाक्षपटलिक | अभिलेख विभाग का प्रधान
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| 10. सर्वाध्यक्ष | केंद्रीय सचिवालय का प्रधान
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| 11. महाप्रतिहार | राजप्रसाद का मुख्य सुरक्षा अधिकारी
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| 12. ध्रुवाधिकरण | कर वसूलने वाले विभाग का प्रधान
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| 13. अग्रहारिक | दान विभाग का प्रधान |
गुप्तकालीन न्याय व्यवस्था
➣ गुप्तकाल में न्याय व्यवस्था पहले की तुलना में अधिक विकसित थी। स्मृतियों में गुप्तकालीन न्याय प्रणाली का उल्लेख है, जबकि गुप्त अभिलेखों में न्याय प्रणाली का उल्लेख नहीं है।
➣ न्यायालय के चार वर्ग थे- (1) राजा का न्यायालय, (2) पूग,(3) श्रेणी, (4) कुल
➣ राजा सर्वोच्च न्यायाधीश होता था। सम्राट की अनुपस्थिति में सर्वोच्च न्यायधीश प्राड्विवाक होता था।
➣ राजा न्याय- निर्णय ब्राह्मण. पुरोहित की सहायता से करता था। शिल्पी, वणिक आदि के संगठनों (श्रेणियों) पर उनके अपने ही नियम लागू होते थे।
➣ पूग नगर में रहने वाली विभिन्न जातियों की समिति होती थी, जबकि कुल समान परिवार के सदस्यों की समिति थी।
➣ गाँवों में ग्राम पंचायत न्याय कार्य करती थी।
➣ न्यायाधीश को दण्डनायक महादण्डनायक, सर्वदण्डनायक कहा जाता था। न्याय आसन को धर्मासन्न कहते थे।
➣ व्यापारियों की श्रेणियों के अलग न्यायालय व अपने कानून होते थे जो अपने सदस्यों के विवादों का निपटारा करते थे।
➣ पहली बार दीवानी और फौजदारी (व्यवहार विधि और दण्डविधि) कानून भली-भाँति परिभाषित एवं पृथक हुए। इसका प्रमुख कारण था- भूमिदान की प्रक्रिया में तेजी का आना।
➣ प्रथम विधि निर्माता बृहस्पति को माना जाता है। इस काल में गुप्तचर प्रणाली की भी सीमित जानकारी मिलती है।
➣ मृच्छकटिकम् में नगर के न्यायालय को अधिकरण मंडप और न्यायाधीश को अधिकरणिक कहा गया।
➣ फाह्यान के विवरण के अनुसार दण्डविधान कोमल था तथा शारीरिक यातनायें व मृत्युदण्ड नहीं दिये जाते थे। हालाँकि बार-बार राजद्रोह करने वाले व्यक्ति का दाहिना हाथ काट लिया जाता।
➣ इस काल में वर्ण व्यवस्था के आधार पर न्याय किया जाता था और दंड में वर्णभेद कायम था। मनुस्मृति के अनुसार चोरी करने पर ब्राह्मण को सबसे अधिक दंड और शूद्र को सबसे कम दंड दिया जाता था।
➣ जबकि हत्या के आरोपी शूद्र को सर्वाधिक दंड और ब्राह्मण को कम दंड मिलता था। वस्तुतः ब्राह्मण मृत्युदंड की सजा से मुक्त था।
सामाजिक संगठन
➣ गुप्तकालीन समाज वर्ण एवं जाति-व्यवस्था पर आधारित था। समाज में चार प्रमुख वर्णों (1.ब्राह्मण, 2. क्षत्रिय, 3.वैश्य, 4. शूद्र) थे। वर्णों का आधार गुण व कर्म न होकर जन्म ही था।
➣ गुप्तकालीन सामाजिक व्यवस्था की सबसे छोटी इकाई परिवार थी।
➣ समाज में ब्राह्मणों का स्थान सर्वोच्च था। क्षत्रिय वर्ण का मुख्य कार्य क्षेत्र रक्षा तथा सैनिक सेवा थी। वैश्य वर्ण का मुख्य कार्य कृषि एवं व्यवसाय था।
➣ ह्वेनसांग ने शूद्रों को खेतिहर (कृषक) वर्ग के रूप में उल्लेखित किया है। इस काल में शूद्रों की आर्थिक दशा में सुधार हुआ। अब सैनिक वृत्ति भी अपनाने लगे थे।
➣ इसके अतिरिक्त शूद्रों को इस काल में रामायण, महाभारत पढ़ने का अधिकार भी मिल गया। वे अब कृष्ण नामक एक नये देवता की पूजा भी कर सकते थे।
➣ इस काल में वाणिज्य को भी शूद्रों का कर्त्तव्य माना जाने लगा था। मार्कण्डेय पुराण में दान देना और यज्ञ करना शूद्र का कर्त्तव्य बताया गया है।
➣ महाभारत के अनुशासन पर्व में शूद्रों को राजा का नाशक कहा गया है।
➣ ब्राह्मणों ने अन्य वर्णों के कार्य भी अपना लिए थे। इस युग में अनेक ब्राह्मण राजा हुए; परन्तु क्षत्रिय कर्म करते हुए भी उन्हें ब्राह्मण वर्ण में ही माना गया।
➣ चंडाल को चारों वर्णों में सबसे निम्न स्थान प्राप्त था। मछली मारने, शिकार करने और मांस बेचने का कार्य चंडाल लोग ही करते थे।
➣ गुप्त कालीन स्मृतियों में कुछ मिश्रित जातियों के उल्लेख मिलते हैं। जैसी मूर्द्धावषिक्क, करण, अम्बष्ठ, पराशव तथा उग्र। ब्राह्मण पुरुष और वैश्या स्त्री से उत्पन्न सन्तान अम्बष्ठ कही गई।
➣ फाहियान के वर्णन से ज्ञात होता है कि गुप्त काल में अस्पृश्य वर्ग था। इन्हें अंत्यज तथा चंडाल कहा गया है।
➣ गुप्तकाल के धर्मशास्त्रों में स्पष्ट रूप से शूद्रों को अस्पृश्यों और दासों से अलग बताया गया है।
➣ कौटिल्य के अर्थशास्त्र तथा वराहमिहिर की वृहत्संहिता में चारों वर्णों के लिये अलग-अलग बस्तियों का विधान किया है।
➣ न्याय संहिताओं में कहा गया है कि ब्राह्मण की परीक्षा तुला से, क्षत्रियों की अग्नि से, वैश्य की जल से तथा शूद्र की विष से ली जानी चाहिये।
➣ नारद के अनुसार चोरी करने पर ब्राह्मण का अपराध सबसे अधिक व शूद्र का अपराध सबसे कम था।
➣ मृच्छकटिकम् के अनुसार ब्राह्मण चारूदत्त व्यापार वाणिज्य करता था। ऐसे ब्राह्मण जिन्होंने क्षत्रिय कर्म अपना लिया था वे ब्रह्म क्षत्र कहलाते थे।
➣ मृच्छकटिक में कहा गया है कि ब्राह्मण व शूद्र एक ही कुएं से पानी भरते थे।
कायस्थ वर्ग
➣ गुप्तकाल में कायस्थ जाति का भी उल्लेख मिलता है। नई जातियों में भूमि अनुदान की प्रथा के कारण कायस्थों का उदय हुआ। कायस्थों का सर्वप्रथम उल्लेख याज्ञवल्क्य स्मृति में मिलता है।
➣ गुप्त अभिलेखों में कायस्थों को प्रथम कायस्थ या ज्येष्ठकायस्थ कहा गया है। गुप्त काल तक कायस्थ एक वर्ग के रूप में ही थे।
➣ कायस्थ शब्द का उल्लेख गुप्तकालीन नाटक मुद्राराक्षस में भी मिलता है।
➣ कायस्थ लेखाकरण, गणना, आय-व्यय, भूमिकर आदि के अधिकारी थे।
दास-प्रथा
➣ गुप्तकाल में भी दास-प्रथा प्रचलित थी, तथापि दासों को अब आर्थिक कार्यों में न लगाकर मुख्यत: घरेलू कार्यों में लगाया गया।
➣ नारद ने 15 प्रकार के दासों का उल्लेख किया है, जबकि मनु ने सात प्रकार के तथा कौटिल्य ने 9 प्रकार के दासों का उल्लेख किया है।
➣ दास मुक्ति के अनुष्ठान का विधान भी सर्वप्रथम नारद ने ही दिया, जांकि इस काल में दास प्रथा के कमज़ोर होने का संकेत करता है।
➣ भूमिदान के कारण भूमि का विखंडन हुआ, अतः छोटे कृषि क्षेत्रों में अधिक दास रखने की आवश्यकता नहीं थी। यह दास प्रथा के कमजोर होने का मुख्य कारण था।
स्त्रियों की स्थिति
➣ गुप्तकाल में स्त्रियों की अवस्था में गिरावट आई। यद्यपि साहित्यिक स्रोतों में पत्नी और प्रेमिका के रूप में उनका महत्व दिखाया गया है,
➣ तथापित उनकी स्वतंत्रता समाप्त हो गई। अपने जन्म मृत्यु तक उन्हें पुरूष की संरक्षकर्ता स्वीकार करने को बाध्य किया गया।
➣ यद्दपि गुप्त युग में रानियां भी शासन कार्य में सहयोग देती थीं, जिसका प्रमाण कुमारदेवी और प्रभावती गुप्त (वाकाटक वंश ) शासन से मिलता है।
➣ दहेज प्रथा व पर्दाप्रथा नहीं थी, लेकिन कालिदास स्त्रियों में पर्दा प्रथा का प्रथम साहित्यिक प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। बाल विवाह की प्रथा प्रारम्भ हुई।
➣ स्त्री शिक्षा का प्रचलन था। अमरकोश में शिक्षिकाओं के लिये उपाध्याया, उपाध्यायीय और आचार्या शब्द आए हैं।
➣ इस समय उच्च वर्ग की कुछ स्त्रियों के विदुषी और कलाकार होने का भी उल्लेख मिलता है।
➣ अभिज्ञानशाकुंतलम् में अनसूईया को इतिहास का ज्ञाता बताया गया हैं। मालती, माधव में मालती को चित्रकला में निपुण बताया गया हैं।
➣ समाज में सती प्रथा विद्यमान थी। ऐरण अभिलेख (510 ई. ) से पता चलता है कि गोपराज नामक सेनापति की मृत्यु के पश्चात उसकी पत्नी ने सती धर्म का पालन किया। उल्लेखनीय है सती प्रथा स्वछिक थी।
➣ कामसूत्र और मुद्राराक्षस का गणिकाओं, वेश्याओं और मेघदूतम् में उज्जयिनी के महाकाल मंदिर में कार्यरत देवदासियों का वर्णन मिलता है।
➣ स्त्रियों को संपत्ति-संबंधी अधिकार भी दिए गए। याज्ञवल्क्य, बृहस्पति और नारदस्मृतियों में पत्नी एवं पुत्री को संपत्ति का उत्तराधिकारिणी बनाया गया है।
➣ कात्यायन भी स्त्रीधन के समर्थक थे। कात्यायन के अनुसार स्त्री अपनी अचल संपत्ति व स्त्रीधन को बेच या गिरवी रख सकती थी।
➣ प्रायः सभी स्मृतिकारों ने स्त्रीधन के उत्तराधिकार में प्रथम अधिकार पुत्रियों का माना है।
➣ उत्तर गुप्त कालीन स्मृति लेखकों ने स्त्रियों को कुछ विशेष परिस्थितियों में पुनर्विवाह की अनुमति दी। ये हैं:-
- अगर पति मर गया हो
- नष्ट हो गया हो (अशास्त्रीय आचरण के कारण बंधु बांधवों से परित्यक्त)
- संन्यायी बन गया हो
- पतित हो (धर्माचरण से भ्रष्ट)
- नपुंसक हो गया
- राजद्रोही हो
- लम्बे समय तक विदेश से वापस न आये।
➣ विधवाओं की स्थिति दयनीय थी। नारद व पाराशर स्मृति में विधवा विवाह का समर्थन मिलता है तथा बृहस्पति स्मृति में विधवा विवाह को निषिद्ध माना गया है।
➣ नारद के अनुसार राजा का यह कर्त्तव्य है कि वह विधवा का भरण पोषण करे। नारद ने इसे सनातन धर्म माना है।
➣ उच्च वर्ग के पास अधिक भूमि होने के कारण गुप्त काल में उच्चवर्ग के पुरूष बहुविवाह करते थे जिससे स्त्री को एक संपत्ति के रूप में देखा जान लगा।
➣ वैश्य व शूद्र वर्ग की महिलाओं को अधिक स्वतन्त्रता थी जबकि उच्च वर्णों की महिलाओं को जीवनयापन के लिये कार्य करने की आर्थिक स्वतन्त्रता नहीं थी।
धार्मिक विकास
➣ इस युग में धर्म, कला, साहित्य और ज्ञान-विज्ञान की अदभुत प्रगति हुई। इसीलिए, अनेक विद्वानों ने गुप्तकाल को हिंदू-पुनर्जागरण या स्वर्णयुग का काल माना है।
आधुनिक हिन्दू धर्म का उदय एंव ब्राह्मणों का पुनरुत्थान
➣ गुप्त काल ब्राह्मण धर्म के पुनरुत्थान का काल माना जाता है। ब्राह्मणों की श्रेष्ठता इस समय पुनः स्थापित हुई। राजा उन्हें भूमिदान करने लगा।
➣ वृहत्संहिता के अनुसार ब्राह्मणों के घरों में 5, क्षत्रियों के 4, वैश्यों के 3, शूद्रो के घरों में केवल 2 कमरे होने का उल्लेख मिलता है।
➣ इस काल में हिन्दू धर्म के तीन महत्त्वपूर्ण पक्ष विकसित हुए-
- मूर्ति उपासना का केन्द्र बन गई।
- यज्ञ का स्थान उपासना ने ले लिया।
- वैष्णव तथा शैव धर्मों का समन्वय हुआ।
➣ हिन्दू धर्म के पुनरुत्थान की प्रक्रिया गुप्त साम्राज्य की स्थापना से पूर्व आरम्भ हो गई थी और गुप्त काल में विकास का यह क्रम अपनी चरम सीमा पर था।
➣ ब्राह्मण अपने निश्चित व्यवसाय से अलग भी कार्य करने लगे। अनेक ब्राह्मणों ने ब्राह्मण-राजवंशों की भी स्थापना वाकाटक और कदंब राजवंश की थी।
➣ वर्तमान में प्रचलित हिन्दू धर्म के स्वरूप का निर्माण इसी युग में हुआ। यज्ञ, बलि प्रथा एवं भक्ति की भावना भी बलवती बन गई।
➣ हिन्दू धर्म के दो मुख्य सम्प्रदाय विकसित हुए-वैष्णव तथा शैव।
वैष्णव धर्म
➣ इस समय वैष्णव एवं शैव धर्म के मध्य समन्वय गुप्तकाल में स्थापित हुआ। यह काल में वैष्णव धर्म अपने चरमोत्कर्ष पर था।
➣ गुप्त शासक वैष्णव धर्म के अनुयायी थे। गुप्त सम्राटों ने सिक्कों पर अपने नाम के साथ परमभागवत विशेषण का प्रयोग किया है।
➣ स्कन्दगुप्त का जूनागढ़ अभिलेख तथा बुद्धगुप्त का एरण स्तम्भलेख विष्णु की स्तुति से प्रारम्भ होते हैं।
➣ विष्णु के साथ लक्ष्मी का सर्वप्रथम उल्लेख जूनागढ़ अभिलेख में है। प्रयाग-प्रशस्ति में वैदिक देवताओं धनद, वरूण, इन्द्र, यम का उल्लेख बादामी गुफाओं में हरिहर का प्राचीनतम प्रतिमाशास्त्रीय अंकन है।
➣ विष्णु और नारायण की मूर्तियां, गरूड़ध्वज मंदिर बने। अवतारवाद की धारणा का उदय हुआ। विष्णु को विभिन्न अवतारों के रूप में चित्रित किया गया।
➣ विष्णु के 10 अवतार (1. मत्स्य, 2. कूर्म, 3. वाराह, 4. नरसिंह, 5, वामन, 6, परशुराम, 7. राम, 8. कृष्ण, 9. बुद्ध, 10.कल्कि) माने गए हैं।
➣ गुप्तकालीन एक अभिलेख (गंगधर अभिलेख) में विष्णु को मधुसुदन कहा गया है।
➣ बनारस से प्राप्त एक मूर्ति में विष्णु को गोवर्धन पहाड़ को गेंद के समान हाथ में उठाए हुए दिखाया गया है।
➣ अनेक पुराणों का नामकरण विष्णु और उनके अवतार के आधार पर किया गया।
➣ त्रिमूर्ति के रूप में ब्रह्मा (सर्जक), विष्णु (पालक) एवं महेश (संहारक) की पूजा गुप्त काल में प्रारम्भ हुई।
➣ देवगढ़ (झांसी) का दशावतार मन्दिर गुप्तकाल में वैष्णव धर्म का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। यह मंदिर पंचायतन श्रेणी का है। इसमें विष्णु को शेषनाग की शैया पर विश्राम करते हुये दिखाया गया है। पहले इसका नाम केशवपुर था।
➣ वैष्णवधर्म का प्रचार समस्त भारत के अतिरिक्त दक्षिण-पूर्वी एशिया, हिंदचीन, कंबोडिया, मलाया और इंडोनेशिया तक हुआ।
शैव धर्म
➣ वैष्ण संप्रदाय के अतिरिक्त शैवमत (शिवभागवत संप्रदाय) का भी विकास हुआ। गुप्तकाल में शैवधर्म के लोकप्रिय होने का अनेक प्रमाण मिलता है। शिव की मूर्तियां बनाई गई एंव अनेक मंदिरों का भी निर्माण हुआ।
➣ गुप्त काल में अनेक शैव मन्दिरों का निर्माण हुआ। शिव की मूर्तियाँ दो प्रकार से बनायी जाती थीं- (1) मानव आकार में (2) लिंग के रूप में।
➣ स्कंदगुप्त के बैल के आकार वाले सिक्कों से शैवधर्म में उसकी अनुरक्ति प्रकट होती है। कुमारगुप्त सिक्कों पर भी मयूर पर आरूढ़ स्कंद के चित्र मिलते हैं।
➣ करमदंडालिंग अभिलेख में कुमारगुप्त प्रथम के मंत्री पृथ्वीसेन द्वारा शिवमंदिर को दिए गए दान का उल्लेख है।
➣ शैवधर्म के अंतर्गत इस समय पाशुपत-संप्रदाय का अधिक विकास हुआ। मथुरा इसका प्रमुख केंद्र था।
➣ कालिदास की रचनाओं में शिवभक्ति की झलक मिलती है। वह गोकर्ण के शिव, काशी के विश्वनाथ और उज्जैन के महाकाल मंदिर के ज्योतिर्लिंग का उल्लेख करते हैं।
➣ वायु व मत्स्यपुराणों में भी शिव की महिमा का बखान है। मत्स्यपुराण में वाणासुर द्वारा शिवलिंग को सिर पर रख कर पूजा करने का उल्लेख मिलता है।
➣ महाभारत के अनुशासन पर्व में भी लिंग पूजा की चर्चा की गई है। अर्द्धनारीश्वर के रूप में शिव-पार्वती और हरिहर के रूप शिव-विष्णु के संयुक्त स्वरूप की पूजा की जाती थी।
➣ गुप्त काल में शैव धर्म के अनेक सम्प्रदायों का विकास हुआ। वामन पुराण में इनकी संख्या चार है- (1) शैव, (2) पाशुपति,(3) कापालिक, (4) कालामुख।
बौद्ध धर्म
➣ गुप्त शासकों का व्यक्तिगत धर्म वैष्णव धर्म था। लेकिन उतरवर्ती गुप्त शासकों ने बौद्ध धर्म अपना लिया।
➣ फाह्यान के वर्णन के अनुसार गुप्त काल में कश्मीर, अफगानिस्तान और पंजाब बौद्ध धर्म के केन्द्र थे। वैशाली, श्रावस्ती व कपिलवस्तु गुप्त युग में बौद्ध धर्म के समृद्ध केन्द्र थे
➣ सैद्धान्तिक रूप से बौद्ध धर्म हिन्दू धर्म का घोर विरोध था; परन्तु उपासना कर्म के व्यवहार में वह ब्राह्मण धर्म के अत्यन्त समीप आ गया।
➣ इस काल में महायान सम्प्रदाय अधिक लोकप्रिय रहा। इस मत के अन्तर्गत नवीन दार्शनिक सम्प्रदायों, जैसे- माध्यमिक तथा योगाचार का प्रादुर्भाव था।
➣ गुप्तकाल में अनेक प्रसिद्ध बौद्ध आचार्यों का आविर्भाव हुआ। उनमें अनेक प्रसिद्ध बौद्ध दार्शनिक महायान शाखा के समर्थक थे, जैसे- आर्यदेव, असंग, वसुबन्धु, मैत्रेयनाथ और दिड्नाग आदि।
➣ चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने आम्रकार्द्दव नामक एक बौद्ध को उच्च पद दिया। उसने काकनादबार (साँची) के महाविहार को पच्चीस दीनार दान में दी थी। साँची लेख से यह जानकारी मिलती है।
➣ मानकुंवर अभिलेख में बुद्धमित्र द्वारा तथा सारनाथ अभिलेख में अभयमित्र द्वारा बुद्ध की प्रतिमा का उल्लेख है।
➣ कुमारगुप्त प्रथम ने नालंदा महाविहार की स्थापना करवाई। जो कालांतर में नालंदा विश्व विद्यालय (महायान शाखा से सम्बंधित) के रूप में उभरा। नालन्दा का दूसरा नाम मृगशिखावन था।
जैन धर्म
➣ जैन धर्म का भी प्रभाव सीमित क्षेत्रों में बना रहा। उत्तर भारत में जैनधर्म को राजकीय प्रश्रय नहीं मिला किन्तु दक्षिण के कदम्ब एवं गंग राजाओं ने इसे आश्रय प्रदान किया।
➣ मथुरा और बल्लभी श्वेताम्बर जैन धर्म के केन्द्र थे और बंगाल में पुंड्रबर्धन दिगम्बर सम्प्रदाय का केन्द्र था। 513 ई. में वल्लभी में जैन सभा हुई। वल्लभी सभा का सभापति जैन आचार्य देवर्धिगणि (क्षमाश्रमण) था।
➣ कहौम के लेख के अनुसार स्कन्दगुप्त के काल में मद्र नामक व्यक्ति ने पाँच जैन तीर्थंकरों की मूर्तियां स्थापित कराई।
➣ मगध से लेकर कलिंग, मथुरा, उदयगिरि व तमिलनाडु तक जैन धर्म का प्रचार था, परन्तु मगध अब इसका केन्द्र नहीं था।
➣ गुप्त काल में ही देवनन्दि नामक एक जैन आचार्य ने सर्वार्थसिद्धि नामक ग्रन्थ लिखा। देवनन्दि ने प्रसिद्ध व्याकरण ग्रन्थ जैनेन्द्र व्याकरण भी लिखा।
गुप्तकालीन अर्थव्यवस्था
➣ गुप्तकालीन आर्थिक व्यवस्था भूमि पर आधारित थी। अतः, कृषि ही आर्थिक व्यवस्था की आधारशिला थी। भूमि पर
➣ मुख्यतः राजा का अधिकार होता था।
➣ अमरकोश में 12 प्रकार की भूमि का उल्लेख मिलता है। निवर्तन. कुल्यावाप, द्रोणवाप तथा आढ़वाप भूमि माप का पैमाना थी।
भूमि का वर्गीकरण
| क्षेत्र | खेती योग्य भूमि
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| खिल | बेकार भूमि
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| अप्रहत् | जंगल भूमि
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| गपत सर | चारागाह भूमि
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| वास्तु | निवास करने योग्य भूमि,
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| गोचर | पशुओं के चारा योग्य भूमि
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| सिल | न जोती जाने वाली भूमि |
➣ वृहद्संहिता के अनुसार तीन फसलों की जानकारी थी। कृषि अधिकांशतः वर्षा पर ही निर्भर थी। वृहत्संहिता में मौसम के विषय में अनेक भविष्यवाणियां हैं।
➣ इत्सिंग के अनुसार चावल और जौ प्रमुख फसलें थी। अष्टांग संग्रह में चावल की 44 किस्मों का वर्णन है।
➣ कालिदास ने गन्ना (ईख) व चावल (धान) की खेती का उल्लेख किया है। कालिदास के अनुसार कालीमिर्च और इलायची मलय पर्वत (नीलगिरी) के पास बहुत होते थे।
सिंचाई व्यवस्था
➣ सिंचाई का प्रबंध राज्य करता था। सिंचाई का सर्वोत्तम उदाहरण स्कंदगुप्त के जूनागढ़ अभिलेख में मिलता है।
➣ अमरकोश से ज्ञात होता है कि गुप्तकाल में नदियों से नहरें निकाली गई और तालाब भी बनाये गये।
➣ अग्नि पुराण के अनुसार कृषि की वृद्धि के लिये सिंचाई के साधन जुटाना राजा के प्रमुख आठ कर्त्तव्यों में से एक है। सिंचाई रहट (अरघट्ट) से भी होती थी।
➣ हलदण्डकार हल रखने वाले प्रत्येक कृषक द्वारा दिया जाने वाला एक कर था।
➣ अदेवमातृक भूमि वह भूमि थी जिस पर कृषि वर्षा पर आधारित न होकर कृत्रिम साधनों द्वारा की गई सिंचाई पर निर्भर थी, अर्थात् वह भूमि जिस पर बिना वर्षा के अच्छी खेती हो सके।
भूमि के नाप
➣ नल भूमिमाप में प्रयुक्त होने वाली धातु की छड़ या उसी लम्बाई की रस्सी को कहा जाता था।
➣ पाटक भूमि का बड़ा नाप था। धनु व दण्ड भी भूमि नाप थे।
➣ आढ़वाप, द्रोणवाप, कुल्यवाप, नल, निवर्तन एवं अंगुल भी भूमि के नाप थे। अंगुल सबसे छोटा भूमि माप था।
| 4 आढ़वाप | 1 द्रोणवाप
|
| 8 द्रोणवाप | 1 कुल्यवाप
|
| 5 कुल्यवाप | 1 पाटक |
➣ भूमि नापने वाले अधिकारी को क्षेत्रकर कहा जाता था।
➣ भूमि विक्री से पहले पुस्तपाल व विषयपति से अनुमति लेनी पड़ती थी।
➣ पशुपालन जीविका का अन्य प्रमुख साधन था। अमरकोश में पालतू पशुओं की सूची दी गई है।
व्यापार
➣ कपड़े का निर्माण करना इस काल का सर्वप्रमुख उद्योग था। अमरकोश में कताई, बुनाई, हथकरघा, धागे इत्यादि का सन्दर्भ आया है।
➣ इस काल में मिट्टी के बर्तन एवं मृणमूर्तियाँ बनाने तथा पत्थर एवं धातु के सामान तैयार करने का उद्योग भी विकसित हुआ। मेहरौली का लौह-स्तंभ गुप्तकालीन धातु निर्माण कला का संवत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।
| पूग | विभिन्न जातियों के व्यापारियों का समूह।
|
| श्रेणी | एक ही जाति के व्यापारियों का समहू।
|
| निगम | एक ही नगर के निवासियों का समूह |
➣ व्यापारियों की एक समिति होती थी, जिसे निगम कहा जाता था।
➣ निगम का प्रधान श्रेष्ठि कहलाता था। व्यापारियों के समूह को सार्थ तथा उनके नेताओं को सार्थवाह कहा जाता था।
➣ इस काल तक रोमन व्यापार का पतन हो चुका था, लेकिन दक्षिण-पूर्व एशिया एवं चीन के साथ व्यापार में वृद्धि हुई।
➣ इस समय बंगाल में ताम्रलिप्ति प्रमुख बन्दरगाह था; जहाँ से चीन, लंका, जावा, सुमात्रा (दक्षिण-पूर्वी एशिया) आदि देशों के साथ व्यापार होता था।
➣ पश्चिमी भारत का प्रमुख बन्दरगाह भृगुकच्च (भड़ौच) था, जहाँ से पश्चिमी देशों के साथ समुद्री व्यापार होता था।
➣ गुप्तकाल में व्यापारिक सम्बन्ध मुख्य रूप से बेजन्टाइन साम्राज्य तथा चीन के साथ था। चीन और भारत का व्यापार इस समय सम्भवतः वस्तु विनिमय प्रणाली पर आधारित था।
➣ बेजन्टाइन साम्राज्य को निर्यात की जाने वाली दो अत्यन्त महत्त्वपूर्ण वस्तुएं रेशम और मसाले थे। रेशम व्यापार अतिमहत्त्वपूर्ण था।
➣ विदेशों को निर्यात की जाने वाली वस्तुओं में सर्वाधिक महत्वपूर्ण मसाला था।
➣ कॉसमॉस के वृत्तान्त से पता चलता है कि भारत और चीन व्यापार में सिंहलद्वीप (श्रीलंका) एक महत्त्वपूर्ण बिचौलिए के रूप में काम करता था।
➣ इस काल में चीन से रेशम (चीनांशुक), इथियोपिया से हाथीदांत तथा अरब, ईरान एवं बैक्ट्रिया से घोड़ों का आयात किया जाता था।
➣ पश्चिमी जगत से भारत में आयातित सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण वस्तुएं थी- मदिरा, बहुमूल्य रत्न, औषधियाँ और जड़ी-बूटियाँ आदि।
गुप्तकालीन मुद्राएँ
➣ गुप्त साम्राज्य के विभिन्न भागों से सिक्कों के 16 ढेर मिले हैं, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण बयाना (भरतपुर, राजस्थान) से मिले हुए सिक्कों के ढेर हैं।
➣ गुप्त शासकों ने सर्वाधिक स्वर्ण मुद्राएँ जारी की, जिन्हें उनके अभिलेखों में दीनार कहा गया है। सोने का सिक्का 144 ग्रेन का होता था।
➣ चाँदी का सिक्का रूपक एवं तांबे का सिक्का माषक था।
➣ चांदी के सिक्के का प्रयोग स्थानीय लेन-देन में किया जाता था। चांदी के सिक्के सर्वप्रथम चंद्रगुप्त द्वितीय ने शकों पर विजय के पश्चात् आरंभ किये थे।
➣ फाह्यान के अनुसार साधारण जनता रोज के विनिमय में वस्तुओं की अदला-बदली तथा कौड़ियों से काम चलाती थी।
➣ कुषाण शासकों ने जहां ताँबे के अधिक सिक्के चलाये, वहीं गुप्तों के ताँबे के सिक्के बहुत ही कम मिले हैं। अतः जन सामान्य में मुद्रा का प्रयोग कुषाण काल की तुलना में गुप्तकाल में काफी कम हो गया।
सैनिक संगठन
➣ गुप्त काल में स्थायी सेना थी। सेना के चार प्रमुख अंग थे-पदाति,रथरोही,अश्वारोही,गजसेना।
➣ सेना का सर्वोच्च अधिकारी महाबलाधिकृत कहलाता था। गजसेना का प्रधान महापीलुपति तथा अश्वसेना का प्रधान भटाश्वत था।
| हाबलाधिकृत | सर्वाच्च सेनाधिकारी
|
| महापीलुपति | हाथियों की सेना का प्रधान
|
| भटाश्श्वपति | घुडसवारों की सेना का प्रधान
|
| रणभण्डागरिका | पदाति समानों की अवस्था करने वाले अधिकारी
|
| चमूय | पदाति सेना की टुकड़ी
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| कटुक | गजसेना का नायक
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| अटाश्वपत | अश्वारोही सेना का प्रमुख |
➣ पैदल सेना की छोटी टुकड़ी को चमूय तथा साधारण सैनिक को चाट कहा जाता था।
➣ सेना के साजोसामान की देखरेख करने वाला अधिकारी रणभाण्डागारिक कहलाता था।
➣ गुप्तचर कर्मचारी को दूत तथा पुलिस कर्मचारी को भट (भाट) कहा जाता था।
➣ पुलिस विभाग के पदाधिकारियों में उपरिक, दशापराधिक, चौरोद्धरणिक, दंडपाशिक, अंगरक्षक आदि प्रमुख पद थे।
➣ रथों का महत्त्व समाप्त हो गया व घोड़ों का महत्व बढ़ा। प्रयाग प्रशस्ति के गुप्तकाल के कुछ अस्त्र-शस्त्रों के नाम मिलते है जैसे- परशु, शर, शंकु, तोमर, मिन्दिपाल, नाराच आदि।
➣ रणभांडागारिक (पदाति वस्तुओं की व्यवस्था रने वाला अधिकारी) रसद की व्यवस्था करता था।
राजस्व व्यवस्था
➣ प्राचीन परम्परा के अनुसार राजा भूमि का स्वामी होता था। अर्थशास्त्र में भी राजा को भूमि का स्वामी माना गया है। मनु व गौतम ने भी राजा को भूमि का अधिपति बताया है।
➣ राजा भूमिकर के रूप में उपज का छठा हिस्सा लेता था। इसीलिये कालिदास ने सम्राट को षष्टमांश वृत्ति कहा है। इस कर को भाग कहा जाता था।
➣ भूमि कर भोग का उल्लेख मनुस्मृति में तथा भेंट नामक कर का उल्लेख हर्षचरित में किया गया है।
➣ गुप्तकाल में भूमि सम्बन्धी करों की संख्या बढ़ गई, किन्तु वाणिज्य-करों की संख्या घटी (संभवतः 1/4 से 1/6 तक)। कुछ प्रमुख करों के नाम निम्न हैं-
| भाग | भूमि उपज का लगभग 1/6 भाग।
|
| भोग | राजा को प्रतिदिन दी जाने वाली फल-सब्जी आदि की भेंट
|
| उद्रंग | एक प्रकार का भूमिकर।
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| उपरिकर | एक प्रकार का भूमिकर।
|
| भूतावात प्रत्याय | विदेशी वस्तुओं के आयात पर लगा कर।
|
| शुल्क | सीमा, बिक्री की वस्तुओं आदि पर लगने वाला कर। |
➣ कृषक अपना भूमिकर हिरण्य (नकद) व मेय (अन्न के रूप में) दोनों रूपों में दे सकते थे।
➣ राजस्व का एक अन्य स्रोत भूमि रत्न, गड़ा हुआ गुप्त धन, खान, नमक इत्यादि थे।
➣ भूपति कृषकों व उनकी स्त्रियों से बेगार भी ले सकता था। बेगार को विष्टि कहा जाता था। विष्टि का उल्लेख वाकाटक अभिलेख एवं कामसूत्र में मिलता है, लेकिन गुप्त लेखों में उल्लेख नहीं है।
➣ भूमिकर संग्रह करने के लिए धुवाधिकरण तथा भूमि अभिलेखों को सुरक्षित करने के लिए महाक्षपटलिका और कारणिक नामक पदाधिकारी थे। न्यायाधिकरण नामक अधिकारी भूमि सम्बन्धी विवादों का निपटारा करते थे।
भूमिकर से जुड़े अधिकारी
| ध्रुवाधिकरण | भूमिकर संग्रह अधिकारी
|
| महाक्षपटलिक एवं करणिक | आय-व्यय, लेखा-जोखा अधिकारी
|
| शौल्किक | सीमा शुल्क यां भू-कर अधिकारी
|
| न्यायाधिकरण | भूमि संबंधी विवादों का निपटारा करने वाला अधिकारी |
➣ गुप्त काल के प्रारम्भिक दिनों में केन्द्रीय प्रान्तों में राजा की अनुमति के बिना सामन्त को भूमिदान देने का अधिकार नहीं था परन्तु छठी शताब्दी से राजा की अनुमति के बिना भी भूमिदान देने की परम्परा शुरू हो गई।
➣ पांचवीं सदी तक के अभिलेखों से ज्ञात होता है कि राजा चोरों को दंडित करता था; परन्तु आगे चलकर चोरों को दण्डित करना या परिवार की सम्पत्ति इत्यादि के झगड़ों पर न्याय देने का अधिकार भी भूमिदान के साथ ब्राह्मणों को हस्तान्तरित किया जाने लगा।
➣ मंदिरों तथा ब्राह्मणों को शैक्षणिक व धार्मिक उद्देश्यों से जो कर मुक्त भूमि दान में दी जाती थी उसे अग्रहार कहा जाता था। सामान्य तौर पर ये अनुदान स्थायी होते थे।
➣ ब्राह्मणों के भरण पोषण हेतु प्रदत्त कर मुक्त भूमि ब्रह्मदेय थी।
➣ बाद में गुप्तशासकों ने राजकीय कर्मचारियों को भी वेतन के बदले भूमिदान देना शुरू कर दिया तथा अनुदान व राजकीय पद वंशानुगत होने लगे।
➣ भूमिकर संग्रह (धान्य में राजा का अंश) के लिये ध्रुवाधिकरण नामक अधिकारी होता था।
➣ भूमि अभिलेखों को सुरक्षित करने के लिये महाअक्षपटलिक तथा करणिक नामक अधिकारी होते थे।
➣ भूमि सम्बन्धी विवादों के निपटारे के लिये न्यायाधिकरण नामक अधिकारी होते थे।
➣ किसी भी गुप्त शासक द्वारा प्रत्यक्ष रूप से भूमिदान का एकमात्र साक्ष्य स्कन्दगुप्त का भीतरी लेख है, जिसमें विष्णु मन्दिर को भूमिदान दिया था।
गुप्तकालीन राजस्व के मुख्य स्रोत
| भाग | भू-राजस्व को भाग कहा जाता था, जो उपज का छठां भाग होता था। यह आय का मुख्य स्रोत था।
|
| भोग | भेंट स्वरूप राजा को दिया गया हिस्सा भोग कहलाता था।
|
| शुल्क | यह सीमा कर था, जो बिक्री की वस्तुओं पर लगाया जाता था। इसको वसूलने वाला अधिकारी शौल्किक कहलाता था।
|
| उपरि कर एवं उद्रंग | यह एक प्रकार का भूमि कर होता था। उद्रग भी एक अतिरिक्त कर था जो सम्भवत पुलिस कर था।
|
| क्लिप्त एवं उपक्लिप्त | क्रय एवं विक्रय कर।
|
| हलिव कर | हल रखने वाले प्रत्येक किसान से लिया जाने वाला कर।
|
| हिरण्य | नगद रूप लिया जाने वाला भूमिकर
|
| मेय | अन्न रूप लिया जाने वाला भूमिकर
|
| विष्टि | बेगार प्रथा
|
| ध्रुवाधिकरण | भूमिकर संग्रह करने वाले अधिकारी
|
| महाक्षपटलिक तथा करणिक | भूमि अभिलेखों को रखने वाला अधिकारी
|
| निगम | गुप्तकालीन व्यापारियों की समिति
|
| श्रेष्ठि | निगम का प्रधान
|
| सार्थ | एक स्थान से दूसरे स्थान पर माल ले जाकर व्यापार करने वाले व्यापारी
|
| सार्थवाह | सार्थों का मुखिया
|
| पूग | एक स्थान के रहने वाले किंतु अलग-अलग व्यवसाय करने वाले लोगों की संस्था/नगर में रहने वाली विभिन्न जातियों की समिति
|
| कुल | समान परिवारों के सदस्यों की समिति
|
| श्रेणी | एक ही प्रकार के व्यवसाय करने वाले सदस्यों की संस्था |
राजस्व शब्दावली
| शब्द | अर्थ
|
|---|
| 1. ध्रुवाधिकरण | भूमिकर संग्रह करने वाला पदाधिकारी
|
| 2. महाखपटलिक | भूमि आलेखों को सुरक्षित रखनेवाला अधिकारी
|
| 3. न्यायाधिकरण | भूमि संबंधी विवादों का निपटारा करने वाला पदाधिकारी
|
| 4. अयुक्तक व विनियुक्तक | भूमि क्रय-विक्रय से संबंधित अधिकारी
|
| 5. उदंग | स्थायी कृषकों से लिया जानेवाला कर
|
| 6. उपरि कर | अस्थायी कृषकों से लिया जाने वाला कर
|
| 7. भाग कर | राजा को दिया जानेवाला उपज का 1/6 भाग
|
| 8. भोग | राजा को फल व सब्जियों के रूप में दिया जाने वाला कर
|
| 9. हलदंड कर | हल पर लगने वाला कर
|
| 10. शुल्क | सीमा, बिक्री की वस्तुओं पर लगने वाला कर। शुल्क वसूलने वाला पदाधिकारी |
स्थापत्य – कला
➣ गुप्तकाल में ही मंदिर निर्माण कला का जन्म हुआ। गुप्तयुगीन मन्दिर नागर शैली में बने हैं। गुप्तकाल के अधिकांश मन्दिर पाषाण निर्मित हैं।
➣ गुप्तकाल में पंचायतन शैली के मन्दिर बनने शुरू हुए। पंचायतन शैली का प्राचीनतम उदाहरण देवगढ़ का दशावतार मन्दिर है।
➣ शिखरयुक्त मन्दिरों का निर्माण गुप्तकाल की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी। इस काल के मन्दिरों के निर्माण में छोटी-छोटी ईंटों तथा पत्थरों का प्रयोग किया जाता था।
➣ गुप्तकाल में ब्राह्मण एवं बौद्ध गुहा मन्दिरों का भी निर्माण हुआ। गुप्तकाल में मन्दिरों के सबसे ज्यादा साक्ष्य मध्यप्रदेश से प्राप्त होते हैं।
➣ गुप्तकाल में मूर्तिकला के तीन प्रमुख केन्द्र थे- मथुरा, सारनाथ और पाटलिपुत्र। गंगा और यमुना की मूर्ति रूप गुप्त काल की ही देन है।
➣ गुप्त मूर्ति कला के सर्वोत्तम उदाहरण सारनाथ की मूर्तियाँ हैं और चित्रकला के सर्वोत्कृष्ट उदाहरण अजन्ता बौद्ध कला के उदाहरण हैं।
➣ गुप्त युग में विभिन्न कलाओं- मूर्तिकला, चित्रकला, वास्तुकला, संगीत तथा नाट्य कला के क्षेत्र में अत्यधिक उन्नति हुई। प्राचीन भारत में स्थापत्य एवं चित्रकला के क्षेत्र में विकास की चरम सीमा गुप्तकाल में ही प्राप्त होती है।
➣ गुप्त काल में नागर एवं द्रविड़ शैली (मंदिर निर्माण शैली) का विकास हुआ। जिसमे से नागर शैली में मंदिर बनाये जाते थे।
➣ मूर्तियों में विष्णु, शिव, पार्वती, ब्रह्मा के अतिरिक्त बुद्ध तथा जैन तीर्थंकर की मूर्तियों का निर्माण भी हुआ।
➣ मन्दिर निर्माण कला का जन्म गुप्तकाल में ही हुआ। देवगढ़ का दशावतार मन्दिर भारतीय मन्दिर निर्माण में शिखर का सम्भवतः पहला उदाहरण है। दशावतार मंदिर में नाग-शैया पर विष्णु को विश्राम करते हुए दिखाया गया है।
➣ अधिकांश मंदिर विष्णु के बने हैं। इन मंदिरों में उल्लेखनीय है- देवगढ़ (झांसी) का दशावतार-मंदिर,तिगवा (जबलपुर) का विष्णु-मंदिर, सिरपुर का लक्ष्मण-मंदिर, एरण के वराह व विष्णु-मंदिर, अंतर्वेदी का सूर्य-मंदिर बघेलखंड का नचनाकुठारा, नागोद में भ्रमरा एवं खोह के शिव मंदिर तथा भितरगांव का कृष्ण मंदिर।
➣ ब्राह्मणगुहा मंदिर का सबसे बढ़िया उदाहरण उदयगिरी का गुहा मंदिर (विष्णुमंदिर) है। इसका निर्माण चंद्रगुप्त द्वितीय के सेनापति वीरसेन ने करवाया था।
➣ सारनाथ की बुद्धमूर्ति, मथुरा की वर्धमान महावीर की मूर्ति, विदिशा की वराह अवतार की मूर्ति, झाँसी की शेषशायी विष्णु की मूर्ति, काशी की गोवर्धनधारी कृष्ण की मूर्ति आदि इस युग की मूर्तिकला के प्रमुख उदाहरण हैं।
➣ अजन्ता की 16 एवं 17 और 19 गुफा के चित्र एवं बाघ गुफा इसी समय चित्रित किए गए, जो चित्रकला के सर्वोत्तम उदाहरण हैं। यह महाराष्ट्र राज्य में अवस्थित हैं।
➣ बाघ एवं अजंता की गुफा में बुद्ध के जीवन से संबद्ध घटनाओं को दर्शाया गया है।
➣ अजन्ता के चित्र मुख्यतः धार्मिक विषयों पर आधारित हैं, जबकि बाघ के चित्र मनुष्य के लौकिक जीवन से लिए गये हैं।
➣ सारनाथ व मथुरा की बौद्ध प्रतिमा व सुल्तानगंज की ताम्र-बौद्ध प्रतिमा जो बुद्ध मूर्तियों की विशेषता है। घुंघराले बाल, अलंकृत प्रभामंडल तथा मुद्राओं की विविधता है।
➣ वास्तुकला के अन्तर्गत विभिन्न मन्दिर, गुफा, चैत्य, विहार, स्तूप इत्यादि का निर्माण हुआ। इनके निर्माण में पत्थरों तथा पक्की ईंटों का प्रयोग किया गया।
➣ सारनाथ का धम्मेख स्तूप तथा राजगृह स्थित जरासंध की बैठक गुप्तकाल की देन है।
➣ नालंदा महाविहार की भी स्थापना गुप्तकाल में ही हुई, जो आगे चलकर विश्वविख्यात शैक्षणिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ।
साहित्य विकास
➣ गुप्त काल में राजकीय भाषा संस्कृत थी।
➣ गुप्तकाल को संस्कृत साहित्य का स्वर्णकाल कहा जाता है। इसी काल में कालिदास एवं अन्य संस्कृत विद्वानों ने अधिकांश संस्कृत साहित्य की रचना की।
➣ गुप्तकाल में काशी, मथुरा, नासिक, पद्मावती, उज्जयिनी, अवरपुर, वल्लभी, पाटलिपुत्र तथा काँची आदि गुप्तकाल के प्रमुख शैक्षिक केन्द्र थे।
➣ षड्दर्शन अर्थात सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, पूर्व-मीमांसा एवं उत्तर-मीमांसा की रचना गुप्त काल में हुई।
➣ विष्णु शर्मा द्वारा पंचतन्त्र और नारायण पण्डित द्वारा हितोपदेश की रचना की गई। तथा नारद व बृहस्पति पुराण इसी काल में रचे गए।
➣ महाभारत व रामायण का भी अंतिम संकलन इसी काल में हुआ। प्रसिद्ध हिन्दू ग्रन्थ भागवतगीता की रचना इसी समय हुई।
➣ भारवि ने किरातार्जुनीय, अमरसिंह ने अमरकोष, कामन्दक ने नीतिसार तथा चन्द्रगोमिन ने चन्द्र व्याकरण इसी समय लिखा।
➣ हरिषेण, वीरसेन, कालिदास तथा विशाखदत्त आदि इस युग के प्रसिद्ध विद्वान् थे।
➣ बौद्ध विद्वानों में असंग,वसुबन्धु, दिङ्नाग तथा धर्मपाल, जैन विद्वानों में उपेशवती, सिद्धसेन तथा भद्रबाहु ।
➣ गुप्त काल में पाणिनि और पतंजलि के ग्रंथों के आधार पर संस्कृत व्याकरण का विकास हुआ।
➣ असंग (महायान) ने योगाचारभूमिशास्त्र, प्रकरणआर्य वाचा, महायानसूत्रालंकार, वज्रक्षेदिका टीका, महायान सम्परिग्रह और महायानभिधर्मसंगीतशास्त्र आदि ग्रंथ लिखे।
➣ बसुबंधु बौद्ध विद्वान ने अभिधर्मकोश नामक ग्रंथ लिखा। जिसमें बौद्ध धर्म के मौलिक सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है।
➣ बौद्ध साहित्य दीपवंश व महावंश की रचना गुप्तकाल में ही हुयी। बुद्धघोष ने हीनयान धर्म पर प्रसिद्ध ग्रंथ विसुद्धिमग्ग लिखा।
➣ गुप्तकालीन धातुकला का सबसे बेहतर नमूना महरौली का लौह स्तंभ एवं सुल्तानगंज से प्राप्त ताम्रनिर्मित बुद्ध की भव्य प्रतिमा प्रस्तुत करते हैं।
गुप्तकालीन कुछ महत्वपूर्ण साहित्य रचनायें
| विष्णु शर्मा | पंचतन्त्र
|
| कालिदास | मालविकाग्निमित्रम्, विक्रमोर्वशीयम्, मेघदूत, अभिज्ञानशाकुन्तलम्, कुमारसम्भव, ऋतुसंहार, रघुवंश महाकाव्य
|
| विशाखदत्त | मुद्राराक्षस, देवीचन्द्रगुप्तम्
|
| भारवि | किरातार्जुनीयम्
|
| भास | स्वप्नवासवदत्तम्, चारुदत्तम्
|
| शूद्रक | मृच्छकटिकम्
|
| वराहमिहिर | वृहत्संहिता, पञ्चसिद्धान्तिका
|
| आर्यभट्ट | सूर्य सिद्धान्त, आर्यभट्टीयम्
|
| ब्रह्मगुप्त | ब्रह्म सिद्धान्त
|
| बाणभट्ट | अष्टांग हृदय (चिकित्सा से सम्बन्धित)
|
| धन्वंतरि | शल्यशास्त्र (चिकित्सा से सम्बन्धित)
|
| अमर सिंह | अमरकोश
|
| राजशेखर | काव्यमीमांसा
|
| वत्सभट्टि | रावणवध |
विज्ञान एंव तकनीक
➣ गुप्तयुग में गणित, पदार्थ विज्ञान, धातु विज्ञान, रसायन विज्ञान, ज्योतिष विज्ञान तथा चिकित्सा विज्ञान की बहुत उन्नति हुई।
➣ दशमलव तथा शून्य का अविष्कार गुप्तकाल में ही हुआ। पारा का आविष्कार भी इसी समय हुआ।
➣ आर्यभट्ट प्रथम, वराहमिहिर, भास्कर प्रथम एवं ब्रह्मगुप्त प्रमुख गणितज्ञ थे।
➣ आर्यभट्ट ने आर्यभट्टीयम् नामक ग्रन्थ की रचना की, जिसमें अंकगणित, बीजगणित तथा रेखागणित की विवेचना की गई है।
➣ आर्यभट्ट ने सूर्यसिद्धान्त नामक ग्रन्थ में यह सिद्ध किया कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है। आर्यभट्ट ने ही सर्वप्रथम सौरवर्ष की लंबाई 365 दिन होती है , का तथ्य दिया।
➣ वराहमिहिर ने ज्योतिष के क्षेत्र में महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रतिपादित किए। उन्होंने पंचसिद्धांतिका, बृहत्संहिता, बृहज्जातक व लघुजातक की रचना की, इनमें ज्योतिष विज्ञान की महत्वपूर्ण बातें लिखी गई।
➣ ब्रहागुप्त ने अपनी पुस्तक ब्रहासिद्धांतम की रचना की और सूर्यग्रहण व चन्द्रग्रहण के बारे में सर्वप्रथम बताया।
➣ प्रसिद्ध आयुर्वेदाचार्य धनवन्तरि ने रसचिकित्सा नामक पुस्तक की रचना की तथा सिद्ध किया कि सोना, चाँदी, लोहा, ताँबा आदि धातुओं में रोग निवारण की शक्ति विद्यमान है।
➣ गुप्तकाल के पशु चिकित्सक कापलाव्य ने हस्त्यायुर्वेद की रचना की जिसमें हाथियों की चिकित्सा के बारे में जानकारी मिलती है।
➣ गुप्तकाल में विश्व के पहले शल्य चिकित्सक सुश्रुत थे जिन्होंने त्वचारोपण (प्लास्टिक सर्जरी) एंव मोतियाविन्द के चिकित्सक थे।
➣ वागभट्ट द्वारा रचित अष्टांग हृदय एक आयुर्वेदिक ग्रंथ है। नवनीतकम् इस युग की प्रसिद्ध चिकित्सा पुस्तक है।
➣ महरौली का लौहस्तंभ गुप्तकालीन धातु निर्माण कला का सर्वोत्कृष्ठ उदाहरण माना जाता है। धूप व वर्षा में सदियों तक रहने के बावजूद इसमें अभी तक जंग नहीं लगा है।
गुप्तकालीन प्रसिद्ध ग्रंथ
| रचनाकार | ग्रंथ | विषय
|
|---|
| आर्यभट्ट | सूर्यसिद्धांतिका | खगोलशास्त्र
|
| आर्यभट्ट | आर्यभट्टीयम | गणित, ज्योतिष
|
| वराहमिहिर | वृहत संहिता | खगोलशास्त्र
|
| वराहमिहिर | पंचसिद्धांतिका | ज्योतिष
|
| ब्रह्मगुप्त | ब्रह्म सिद्धांत | गणित, ज्योतिष
|
| ब्रह्मगुप्त | खंड खाद्य | गणित
|
| वराहमिहिर | नवनीतकम् | चिकित्सा
|
| पालकाप्य | हस्त्यायुर्वेद | पशु चिकित्सा
|
| भास्कर प्रथम | महाभास्कर्य | गणित, ज्योतिष
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| चरक | चरक सहिंता | आयुर्वेद
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| सुश्रुत | सुश्रुतसहिंता | आयुर्वेद, शल्य चिकित्सा
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| धनवन्तरि | धनवन्तरि सहिंता | आयुर्वेद
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