परिचय
➣ शुंग, कण्व, सातवाहन वंश के शासन काल में हिन्द – यवनों , शकों तथा कई अन्य विदेशी आक्रमण हुए थे।
➣ मौर्य जैसा विशाल साम्राज्य अब कई क्षेत्रों में विभक्त हो गया था। इन क्षेत्रों पर स्वदेशी और विदेशी दोनों शासकों ने एक साथ शासन किया था।
➣ 200 ई.पू. के आस-पास हिन्दू कुश को सबसे पहले पार करने वाले यूनानी थे। जिन्होंने उत्तर अफगानिस्तान के क्षेत्र में ओक्सस नदी के दक्षिण में स्थित बैक्ट्रिया (आधुनिक अफगानिस्तान ) पर शासन किया।
उनमें से कुछ ने तो एक ही समय में समानान्तर शासन किया था।
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आक्रमणकारियों का क्रम:- हिन्द-यवन → शक → पहलव → कुषाण।
| विदेशी/शासक | राजधानी | मूल निवास | आगमन
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| 1. हिंद-यवन(डेमेट्रियस) | शाकल ( स्यालकोट ) | बैक्ट्रिया, अफगानिस्तान | 190 ई.पू.
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| 2.शक (माउस) | नासिक | सीथिया, ईरान | 90 ई.पू.
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| 3. पार्थियाई या पहलव/गोंदोफर्नीज | बेग्राम | पार्थिया, ईरान | 1 सदी ई.पू.का अन्त
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| 4. कुषाण या यूची (कुजुल कडफिसेस) | उज्जयिनी | चीनी तुर्किस्तान | 15 ई. |
➣ इन विदेशी आक्रमण के समय 57-58 ई.पू. के आस पास उज्जैन राजा विक्रमादित्य ने शकों पर विजय के उपलक्ष में विक्रम संवत की शुरुवात की थी।
हिन्द-यवन आक्रमण (लगभग 190 ई.पू.)
➣ सिकन्दर के आक्रमण के पश्चात् भारत के उत्तर पश्चिम में बैक्ट्रिया में यूनानी बस्ती बस गई थी, जिन्हें प्राचीन भारतीय साहित्य में यवन कहा जाता है।
➣ भारत पर यवनों का प्रथम आक्रमण पुष्यमित्र शुंग के समय हुआ, जिसका उल्लेख गार्गी संहिता (युगपुराण खण्ड) एवं मालविकाग्निमित्र में मिलता है।
➣ सेल्यूकस सिकन्दर का सेनापति था जिसने उसकी मृत्यु के बाद मध्य एशिया के एक विस्तृत भाग पर यूनानी साम्राज्य स्थापित किया था।
➣ जिसमे बैक्ट्यिा (उत्तरी अफगानिस्तान) तथा पार्थिया (ईरान) भी शामिल था।
➣ सेल्यूकस के पश्चात 223 ई. पू. में सीरिया के राजसिंहासन पर सम्राट एण्टियोकस तृतीय आरूढ़ हुआ।
➣ 200-250 ई. पू. के मध्य तक बैक्ट्रिया के गवर्नर डियोडोरस ने स्वंय को स्वतंत्र घोषित कर दिया। वहीँ पार्थिया से भी अरसक तृतीय स्वतंत्र रूप से शासन करने लग गया।
➣ एण्टियोकस तृतीय ने पार्थिया पर आक्रमण कर उसने उसे जीतने का प्रयत्न किया, पर वह असफल रहा। फलस्वरूप उसने पार्थियन राजा अरसक तृतीय से संधि कर ली।
➣ बैक्ट्रिया शासक डियोडोरस का उत्तराधिकारी यूथीडेमस हुआ। जिसे सीरियन सम्राट एण्टियोकस तृतीय से युद्ध करना पड़ा।
➣ परन्तु सीरियन सम्राट उसे परास्त करने में असफल रहा। अन्त में विवश होकर एण्टियोकस ने बैक्ट्रिया शासक यूथोडेमस के साथ भी सन्धि कर ली और अपनी पुत्री का विवाह बैक्ट्रियन राजा के पुत्र डेमेट्रियस प्रथम के साथ कर दिया।
➣ भारत में डेमेट्रियस के वंशज – यूथीडेमस, मीनाण्डर, स्ट्रेटो प्रथम, स्ट्रेटो द्वितीय शासक हुए।
➣ भारत में यवन साम्राज्य दो कुलों में बंट गया था-
| 1. डेमेट्रियस | डेमेट्रियस, यूथीडेमस, मीनाण्डर, स्ट्रेटो प्रथम, स्ट्रेटो द्वितीय
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| 2. यक्रेटाइड्स | युक्रेटाइडीज, एण्टियालकीड्स, हर्मियस
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➣ डेमेट्रियस से मिनान्डर हुआ जबकि युक्रेटाइड्स से हेलिओक्लीज़ प्रसिद्ध है-/p>
डेमेट्रियस वंश
राजधानी : साकल
(क्षेत्र : झेलम से मथुरा)
↓
डेमेट्रियस प्रथम ↓
मिनान्डर ↓
स्ट्रेटो प्रथम
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युक्रेटाइड्स वंश
राजधानी : तक्षशिला
(क्षेत्र : झेलम से बैक्ट्रिया)
↓
युक्रेटाइड्स ↓
हेलिओक्लीज़ ↓
हर्मियस
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डेमेट्रियस (धर्ममित्र) प्रथम ( 190-160 ई.पू.)
➣ यूथोडेमस की मृत्यु के बाद उसके पुत्र डेमेट्रियस प्रथम ने राज्य विस्तार की प्रक्रिया जारी रखी और सर्वप्रथम भारत पर आक्रमण किया।
भारत पर आक्रमण करने वाला प्रथम हिन्द-यवन शासक डेमेट्रियस प्रथम था।
➣ उसने एक बड़ी सेना के साथ लगभग 183 ई.पू. में हिन्दुकुश पर्वत को पार कर सिंध और पंजाब पर अधिकार कर लिया और साकल (स्यालकोट) को अपनी राजधानी बनायी।
➣ डेमेट्रियस के उपरान्त यूक्रेटाइड्स ने भारत के कुछ हिस्सों को जीतकर तक्षशिला को अपनी राजधानी बनाया।
➣ डेमेट्रियस ने भारतीय राजाओं की उपाधि धारण कर यूनानी तथा खरोष्ठी लिपि में सिक्के भी चलवाये थे।
➣ डेमेट्रियस पहला इंडोग्रीक शासक था, जिसने यूनानी व खरोष्ठी दोनों लिपियों वाले सिक्के चलाये।
➣ डेमेट्रियस के भारतीय अभियान की जानकारी पतंजलि के महाभाष्यण गार्गी संहिता एवं मालविकाग्निमित्रम् से होती है।
➣ कलिंग शासक खारवेल के हाथीगुम्फ़ा शिलालेख में भी डेमेट्रियस के आक्रमण का उल्लेख है।
➣ डेमेट्रियस के पुत्र अगाथोक्लिज ने ब्राह्मी एवं ग्रीक के द्विभाषी सिक्के चलाये, जिन पर लक्ष्मी, कृष्ण (वासुदेव) एवं बलराम की आकृति अंकित है।
➣ भारत के यवन राजाओं में सबसे महत्वपूर्ण राजा डेमेट्रियस द्वितीय, अपोलोडोटस द्वितीय और मिनांडर (मिलिंद) थे।
➣ डेमेट्रियस द्वितीय ने एक विस्तृत प्रदेश पर राज किया, जिसमें सिंधु डेल्टा, सौराष्ट्र और कच्छ शामिल थे। उसके सिक्कों पर खरोष्ठी लिपि में महरजस अपडिहतस (अप्रतिहतस्य) दिमेनियस लेख अंकित था।
मिनाण्डर (165-145 ई.पू.)
➣ सबसे प्रसिद्ध यवन शासक मीनान्डर था। जो बौद्ध साहित्य में मिलिन्द के नाम से प्रसिद्ध है। यह सम्भवतः डेमेट्रियस के कुल का था।
➣ मिनांडर वह प्रथम यवन शासक था, जिसने बौद्ध धर्म स्वीकार कर ली। मीनाण्डर ने बौद्ध भिक्षु नागसेन से बौद्ध धर्म की दीक्षा ली।
➣ प्रसिद्ध बौद्ध ग्रन्थ मिलिन्द पन्हो में नागसेन व मीनाण्डर की दार्शनिक वार्ता संकलित है। पालि ग्रन्थ मिलिन्दपन्हो की रचना नागसेन ने की। इसमें सात अध्याय हैं। मीनाण्डर हीनयान का उपासक था।
➣ भारतीयों सिक्कों पर पहले केवल देवताओं के चित्र ही अंकित रहते उनका नाम या तिथि उत्कीर्ण नहीं की जाती। जब से उत्तर-पश्चिमी भारत पर बैक्ट्रिया के यूनानी राजों का शासन आरम्भ हुआ, सिक्कों पर राजाओं के नाम व तिथियाँ उत्कीर्ण की जाने लगीं।
➣ वह पहला शासक था, जिसने सोने के सिक्के चलवाए। चांदी के सिक्कों के लिये द्रम्म शब्द युनानी भाषा से ही लिया गया है। जबकि युक्रेटाइडीज सबसे ज्यादा स्वर्ण मुदाएं जारी करने वाला इंडो-ग्रीक शासक था।
➣ मीनेण्डर ने त्रिभाषिक लेख युक्त मुद्राएं चलाई। मीनाण्डर की कांस्य मुद्राओं पर धर्मचक्र का चिह्न, हाथी के चित्र मिलता है, जबकि अन्य मुद्राओं पर ध्रमिकस की उपाधि है।
सर्वप्रथम इण्डो-ग्रीक शासकों ने ही लेख वाले सिक्के (मुद्रालेख) तथा सोने के सिक्के जारी किये।
➣ प्लूटार्क के अनुसार मीनाण्डर की मृत्यु सैनिक शिविर में हुई थी। मिनांडर को मृत्यु के समय इसका पुत्र स्ट्रेटो प्रथम अल्प वयस्क था, अतः इसकी पत्नी अपने पुत्र की संरक्षिका बनी।
➣ स्ट्रेटो द्वितीय ने सीसे के सिक्के चलाए।
➣ बैक्ट्रिया में यवनों का अंतिम शासक हेलियोक्लीज था। 125 ई.पू. के लगभग बैक्ट्रिया से यवन-शासन समाप्त हो गया और वहाँ शकों का राज्य स्थापित हो गया।
युक्रेटाइड्स
➣ जिस समय डेमेट्रियस और मिनान्डर भारत विजय में लगा था। उनके अपने देश बैक्ट्रिया में उनके विरुद्ध विद्रोह हो गया और युक्रेटाइड्स नामक एक सेनापति ने बैक्ट्रिया के राजसिंहासन पर अपना अधिकार कर लिया।
➣ युक्रेटीदस ने उत्तर-पश्चिमी भारत के कुछ प्रदेशों को जीत लिया था और तक्षशिला को अपनी राजधानी बनाया।
➣ यूक्रेटाइडीज की एक मुद्रा पर कपिशा के नगर देवता का उल्लेख है।
➣ शुंग वंश के नवें शासक भागभद्र के शासन काल के 14वें वर्ष में तक्षशिला के यवन शासक एण्टियालकीड्स के राजदूत हेलियोडोरस ने विदिशा में वासुदेव के सम्मान में गरूड़ स्तम्भ स्थापित किया।
➣ हमियम युक्रेटाइड्स वंश का अंतिम शासक था। उसकी मृत्यु के साथ ही पश्चिमोत्तर भारत से यवनों का लगभग 200 वर्षों का शासन समाप्त हो गया।
यूनानियों की देन
➣ सर्वप्रथम इंडो-ग्रीक शासकों ने लेख वाले सिक्के अर्थात भारत में इण्डो-यूनानी शासक ऐसे पहले शासक थे जिनके सिक्कों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि इसे किस शासक द्वारा जारी किया गया है।
➣ भारत में सबसे पहले हिंद यूनानियों ने ही सोने के सिक्के जारी किए जिनकी मात्रा कुषाण शासन में काफी बढ़ गयी।
➣ भारत में सर्वप्रथम स्वर्ण सिक्के चलाने का श्रेय यूनानियों को जाता है। जबकि व्यापक पैमाने पर प्रचलन कुषाण शासक वीम कडफिसेस ने करवाया था।
➣ सर्वप्रथम भारत में द्विभाषी एवं द्विलिपि मुद्रा यूनानियों ने चलाई थी।
➣ राजत्व का दैवीय सिद्धांत
➣ साँचों से सिक्का-निर्माण की विधि।
➣ काल गणना, संवत् का प्रयोग, सप्ताह के 7 दिन, 12 राशियाँ, कैलेंडर वर्ष।
➣ भारत में ज्योतिष कला का विकास’।
➣ भारत में एक नवीन शैली हेलेनिस्टिक कला का विकास।
➣ भारतीय रंगमंच में यवनिका (पर्दा) का शुभारंभ।
➣ गांधार मूर्तिकला स्पष्टतः यूनानी प्रभाव से प्रेरित है।
➣ भारत के उत्तर-पश्चिमी सीमा में यूनानी शासन ने हेलेनिस्टिक कला की शुरुआत की, फलस्वरूप भारतीय-यूनानी कला का अनोखा मिश्रण हुआ और एक नई कला , गांधार कला, का जन्म हुआ।
शक आक्रमण (90 ई.पू.)
➣ यूनानियों के बाद शक आए। शक मध्य एशिया की घुमक्कड़ जाति थी जो चारगाह की खोज में भारत आये थे।
➣ कालान्तर में मध्य एशिया के खानाबदोश कबीलों ने, जिनमें सीथियन लोग भी थे, बैक्ट्रिया पर हमला कर दिया।
➣ चीन के सम्राट शी-हुआंग-टी द्वारा तीसरी शताब्दी ई.पू. चीन की विशाल दीवार बना देने के कारण कबीलों को पश्चिम में बढ़ने के लिए बाध्य होना पड़ा।
➣ जिसके परिणामस्वरूप सीथियनों को विस्थापित होकर भारत के इण्डो-ग्रीक भागों पर आक्रमण करना पड़ा।
- शक बोलन दरें से भारत में आए।
- शकों को भारतीय साहित्य में सीथियन कहा गया है।
- शकों ने क्षत्रप प्रणाली ईरान से ग्रहण की।
- शक राजाओं को क्षत्रप कहा जाता था।
- भारत में क्षत्रप प्रणाली का प्रचलन शकों ने किया।
➣ शक शासक मुरूण्ड की उपाधि धारण करते थे, जिसका शाब्दिक अर्थ ‘स्वामी’ होता था। स्टेन कोनो ने इसे शक-मुरूण्ड जाति नाम पुकारते हैं।
➣ बैक्ट्रिया के यवन राज्य का अन्त शक जाति के आक्रमण द्वारा हुआ था।
➣ शकों की पाँच शाखाएं थी-
- सिन्ध और पश्चिमी भारत के शक कुल
- गान्धार के शक कुल
- महाराष्ट्र के शक-क्षत्रप कुल
- मथुरा के शक-क्षत्रप कुल
➣ शकों की भारत में दो शाखाएं हो गई-
- उत्तरी क्षत्रप – तक्षशिला एवं मथुरा
- पश्चिमी क्षत्रप – नासिक एवं उज्जैन
- तक्षशिला – मज्ज / मोग
- मथुरा – राजुल
- उज्जैन – चष्टन
- नासिक – भूमक व नहपान, रूद्रदामन
माउस (85-60 ई पू लगभग)
➣ तक्षशिला का प्रथम शक शासक माउस/मेउस/मावेज था जो भारत का प्रथम शक शासक था। उसके शासन काल में शक शक्ति का विस्तार मथुरा तक हो गया।
➣ गंधार प्रदेशों में प्राप्त सिक्कों में इसका नाम खरोष्ठी लिपि में मोय और यूनानी लिपि में माउस लिखा है।
➣ माओस के बाद एजीस प्रथम गद्दी पर बैठा। उसने अपने सिक्कों पर अपने साथ अपने पिता स्पलिरिसेस का नाम भी अंकित कराया।
➣ एजीस प्रथम के बाद उसका पुत्र एजिलाइसेस गद्दी पर बैठा। तत्पश्चात एजिलाइसेस का पुत्र एजीस द्वितीय राजा बना।
क्षहरात वश
➣ भूमक क्षहरात वंश का प्रथम शासक था। नहपान भूमक का उत्तराधिकारी था।
➣ नासिक अभिलेख संख्या 10 के अनुसार नहपान के दामाद उषावदात (ऋषभदत्त) ने ब्राह्मणों व बौद्ध भिक्षुओं को दान दिया।
➣ कन्हेरी अभिलेख में कार्ले के बौद्ध संघ के लिए करजिक ग्राम के दान का उल्लेख है। इसी अभिलेख में वर्णासा व प्रभास के ब्राह्मणों को गांव दान देने का उल्लेख है।
➣ प्राकृत जैन ग्रन्थ कालकाचार्य कथानक के अनुसार उज्जैन के शासक विक्रमादित्य द्वारा जैन धर्म ग्रहण करने का वर्णन व विक्रमादित्य द्वारा शकों को 57 ई.पू. में पराजित कर विक्रम संवत जारी करने का उल्लेख है। इसे मालव संवत भी कहते हैं।
➣ जिस प्रकार कोई महान् पराक्रम करने पर रोमन सम्राट सीजर की उपाधि धारण करते थे, उसी प्रकार भारतीय शासक विक्रमादित्य की उपाधि धारण करते थे।
➣ लगभग 57-78 ई. के लगभग उज्जैन राजा विक्रमादित्य ने शकों को पीछे खदेड़ दिया।
➣ कालान्तर में जिसने भी महान पराक्रम दिखाया उसने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की सबसे विख्यात विक्रमादित्य चन्द्रगुप्त द्वितीय था।
भारतीय इतिहास में लगभग 14 विक्रमादित्य हुए जिसमे सातवाहन शासक गौतमी पुत्र शतकर्णी से लेकर अंतिम विक्रमादित्य हेमचन्द्र (पानीपत का तृतीय युद्ध में वीरगति को प्राप्त) शामिल हैं।
पश्चिमी क्षत्रप
➣ श्चिमी क्षत्रपों में क्षहरात वंश (नासिक) का नहपान (मिननगर) तथा कार्दमकवंश (चष्टन वंश) (उज्जैन) का रूद्रदामन अधिक प्रसिद्ध थे।
➣ शकों ने पश्चिमी भारत में लगभग चार सदियों तक शासन किया और बड़ी संख्या में चांदी के सिक्के चलाए।
➣ ताँबे के सिक्कों में भूमक ने अपने आपकों क्षत्रप लिखा है।
➣ अभिलेखों से ज्ञात होता है कि नहपान का राज्य उत्तर में राजपूताना तक था। उसके राज्य में काठियावाड़, दक्षिणी गुजरात, पश्चिमी मालवा, उत्तरी कोंकण, पूना आदि शामिल थे।
➣ नहपान के समय भड़ौच एक बंदरगाह था। उज्जैन, प्रतिष्ठान (आधुनिक :औरंगाबाद ) आदि से बहुत सा व्यापारिक सामान लाकर वहाँ पर एकत्र किया जाता था।
➣ अपने राज्यारोहण के 18वें वर्ष में सातवाहन वंश के राजा गौतमीपुत्र शातकर्णी ने क्षहरातों पर आक्रमण करके नहपान तथा उसके दामाद ऋषभदत्त (उषवदात) को मार डाला।
➣ नहपान के सिक्कों पर उसके लिये राजा संबोधन हुआ है। उसके सिक्के अजमेर से नासिक तक मिलते हैं।
रुद्रदामन प्रथम (130-150 ई.)
➣ भारत में शकों का सर्वाधिक प्रसिद्ध राजा रुद्रदामन प्रथम (130-150 ई.) हुआ। रूद्रदामन चष्टन का पौत्र व जयदामन का पुत्र था।
➣ रूद्रदामन ने महाक्षत्रप की उपाधि धारण की थी। उसके राज्याधिकार में सिंध, कोंकण, नर्मदा घाटी, मालवा, काठियावाड़ और गुजरात का एक बड़ा भाग था।
➣ रुद्रादमन के जूनागढ़ अभिलेख से प्रतीत होता है कि पूर्वी पश्चिमी मालवा, द्वारका के आसपास के प्रदेश, सौराष्ट्र, कच्छ, सिंधु नदी का मुहाना, उत्तरी कोंकण, मारवाड़, आदि प्रदेश उनके राज्य में सम्मिलित थे।
➣ रूद्रदामन ने सौराष्ट्र स्थित सुदर्शन झील का जीर्णोद्धार अपने गर्वनर विशाखादत्त की देखरेख में कराया था। इस झील का निर्माण मौर्य काल में हुआ था। उसके समय सौराष्ट्र प्रांत का शासक सुविशाख था।
➣ रूद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख संस्कृत में लिखित प्रथम अभिलेख था। इससे पूर्व के सभी अभिलेख प्राकृत में थे। इसने संस्कृत को राजकीय संरक्षण दिया।
➣ अन्धौ अभिलेख (कच्छ की खाड़ी) से पता चलता है कि रूद्रदामन ने चष्टन के साथ सहशासक के रूप में शासन किया। रूद्रदामन ने चाँदी की मुद्राएं चलाई।
➣ रूद्रदामन ने सातवाहन शासक वशिष्ठी पुत्र पुलुमावी को दो बार पराजित किया किन्तु निकट संबंधी होने के कारण उसे छोड़ दिया (जूनागढ़ अभिलेख ) ।
➣ रुद्रदामन संस्कृत का बड़ा प्रेमी था। उसने ही सबसे पहले विशुद्ध संस्कृत भाषा में जूनागढ़ अभिलेख जारी किया।
➣ रुद्रदामन ने अभिलेखों में संस्कृत भाषा का प्रयोग किया, किंतु सिक्कों पर प्राकृत भाषा का प्रयोग किया।
➣ इस वंश का अंतिम शासक रुद्रसिंह तृतीय था। गुप्त शासक चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य ने उसे पराजित कर पश्चिमी क्षत्रपों के राज्य को अपने साम्राज्य में मिला लिया।
- शकों की मुद्राएँ ब्राह्मी, खरोष्ठी, यूनानी तीन लिपियों युक्त थीं।
- भारत में सर्वप्रथम तिथियुक्त/संवत मुद्रा शकों ने जारी की।
- शक-सातवाहन काल में सोने व चाँदी के सिक्कों की विनिमय दर 1:35 थी।
- शक मुद्राओं पर शिव-पार्वती के चित्र मिलते हैं।
विक्रम संवत (57 ई.पू.) | भारतीय प्राचीन कालगणना संवत
❑ उज्जैन राजा विक्रमादित्य ने शकों पर विजय के उपलक्ष में लगभग 57 ई.पू. में शुरुवात की।
❑ विक्रम संवत के प्रारम्भ के विषय में भी विद्वानों में मतभेद हैं। कुछ लोग सन 78 ई. और कुछ 544 ई. में इसका प्रारम्भ मानते हैं।
❑ चूँकि इतिहास में सबसे प्रसिद्ध विक्रमादित्य चंदगुप्त द्वितीय हुए इसलिए कुछ इसका श्रेय चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य को देते है।
❑ कहा जाता है कि राजा विक्रमादित्य ने अपनी सम्पूर्ण प्रजा का ऋण खुद चुकाकर इस संवत की शुरुआत की थी।
❑ विक्रम संवत में समय की पूरी गणना सूर्य और चांद के आधार पर की गयी है यानी दिन, सप्ताह, मास और वर्ष की गणना पूरी तरह से वैज्ञानिक है।
❑ विक्रम संवत और शक संवत में अंतरः दोनों संवतों के महीनों के नाम समान हैं और दोनों संवतों में शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष भी हैं। अंतर सिर्फ दोनों पक्षों के शुरू होने में है।
❑ विक्रम संवत में नया महीना पूर्णिमा के बाद आने वाली कृष्ण पक्ष से होता है,
❑ जबकि शक संवत में नया महीना अमावस्या के बाद शुक्ल पक्ष से शुरू होता है। इसी कारण इन संवतों के शुरू होने वाली तारीखों में भी अंतर आ जाता है।
❑ शक संवत में चैत्र के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा, उस महीने की पहली तारीख है जबकि विक्रम संवत में यह सोलहवीं तारीख है।
पहलव (पार्थियन) आक्रमण | ई.पू. के अंत में
➣ भारत के पश्चिमोत्तर में शकों के आधिपत्य के बाद पर्थियाई लोगों का शासन स्थापित हुआ। इनका मूल निवास स्थान ईरान था।
➣ प्राचीन भारत के अनेक संस्कृत ग्रंथों में शक और पार्थियाई लोगों का एक साथ उल्लेख शक-पलव के रूप में मिलता है।
➣ पहलव शक्ति का वास्तविक संस्थापक मिथ्रेडेट्स प्रथम था जो यूक्रेटाइड्स का समकालीन था।
गोंडोंफर्नीज (20-41 ई.)
➣ पहलव वंश का सबसे प्रतापी शासक गोंडोंफर्नीज था जिसकी राजधानी तक्षशिला थी।
➣ खरोष्ठी लिपि में उत्कीर्ण तख्तेबही अभिलेख में इसे गुदुव्हर कहा गया है। फ़ारसी में इसका नाम विन्दफ़र्ण है जिसका अर्थ है यश विजयी।
➣ गोंडोफर्निस के शासनकाल में 57 ई. में भारत में पहली बार ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिए सेंट टॉमस भारत आया था, जो बाद में दक्षिण चला गया।
➣ गोंडोफर्निस और सेंट टॉमस के बीच संबंधों का प्रथम उल्लेख – एक्टर्स ऑफ सेंट थॉमस सीरियाई ग्रंथ में मिलता है।
➣ ईसाई अनुश्रुति में कहा जाता है कि गोंडोफर्निस ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया था, लेकिन पर्थियनों के सिक्कों पर धार्मिय उपाधि अंकित होने से उसके द्वारा बौद्ध धर्म को ग्रहण करने का प्रमाण मिलता है।
➣ हज़ारा ज़िले के पंजतर अभिलेख (65 ई.) में से ज्ञात होता है कि पहलव साम्राज्य का अन्त कुषाणों के द्वारा हुआ।
कुषाण आक्रमण (15 ई.)
➣ पार्थियाइयों के पश्चात् कुषाण आये। इन्हे यूची या टोचेरियन कहा जाता था। यूची पाँच सम्प्रदायों में बँट हुआ था। इनमें कोई-चाउ-आंग शाखा ने भारत में कुषाण वंश की स्थापना की।
➣ कुषाणों का उद्गम चीन का पश्चिमी क्षेत्र एवं मध्य एशिया है। कुषाणों ने सबसे पहले बैक्ट्रिया या उत्तर अफगानिस्तान पर कब्जा किया और वहाँ से शकों को विस्थापित कर दिया।
➣ धीरे-धीरे वे काबुल घाटी की और बड़े और हिन्दूकुश पार करके गंधार पर कब्जा किया, और वहां यूनानियों और पार्थिवाइयों को अपदस्थ कर सत्ता जमाई।
➣ अंततः उन्होंने निचली सिंधु घाटी पर भी अधिकार कर लिया। इस प्रकार उनका साम्राज्य अमुदरिया से गंगा तक, मध्य एशिया के खुरासान से उत्तर प्रदेश के वाराणसी तक फैल गया।
➣ कुषाणों के दो राजवंश थे, जो एक के बाद एक आए। पहले राजवंश की स्थापना कडफिसेस नामक सरदारों के एक परिवार ने की। इस घराने का शासन 50 ई. से 28 वर्षों तक चला।
➣ इस राजवंश का पहला राजा कुजुल कडफिसेस था।
कुजुल कडफिसेस (15 -65 ई. )
➣ कुषाण वंश का प्रथम शासक कुजुल कैडफाइसिस (कैडफाइसिस प्रथम) था। प्रारंभ में वह यूनानी राजा हर्मियस के अधीन था। किन्तु बाद में स्वतंत्र हो गया।
➣ इसने रोमन सिक्कों की नकल पर तांबे के सिक्के ढलवाये तथा महाराजाधिराज एवं भ्रमथित की उपाधि धारण की। ये सिक्के द्विलिपिक (यूनानी व खरोष्ठी) थे।
➣ कुजुल कैडफाइसिस के दो प्रकार के सिक्के मिलते हैं। प्रथम प्रकार के सिक्कों के मुखभाग पर काबुल के अंतिम यवन शासक हर्मियस का नाम यूनानी लिपि में लिखा है जबकि उसके पृष्ठ भाग पर कुजुल का नाम खरोष्ठी लिपि में लिखा गया है।
➣ दुसरे प्रकार के सिक्कों पर उसको राजकीय उपाधियां, महाराजस महतस् कुषाण-कुयुल कफस, उत्कीर्ण हैं।
➣ उसने बड़ी संख्या में सोने के सिक्के जारी किये। उसके सिक्कों पर एक ओर यूनानी लिपि तथा दूसरी ओर खरोष्ठी लिपि उत्कीर्ण है।
विम कडफिसेस (15 -65 ई. )
➣ विम कडफिसस भारत में कुषाण शक्ति का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। उसने सिंधु नदी पार करके तक्षशिला और पंजाब पर अधिकार कर लिया।
➣ उसने बड़ी संख्या में सोने एंव ताम्बे के सिक्के जारी किये। उसके सिक्कों पर एक ओर यूनानी लिपि तथा दूसरी ओर खरोष्ठी लिपि उत्कीर्ण है।
➣ उसने अपने सोने और ताँबे के सिक्कों में महाराज, राजाधिराज, महीश्वर, सर्वलोकेश्वर आदि उपाधियां धारण किए।
➣ वह शैव मतानुयायी था तथा उसने ‘महेश्वर’ की उपाधि धारण की। उसके कुछ सिक्कों पर शिव, नंदी तथा त्रिशूल की आकृतियाँ मिलती हैं।
भारत में व्यापक पैमाने पर सर्वप्रथम स्वर्ण सिक्के चलाने का श्रेय विम कडफिसस या कडफिसस द्वितीय को ही जाता है।
➣ यवन शासक एजेज द्वितीय की चांदी की मुद्राओं में मिलावट एवं अन्तराष्ट्रीय व्यापार में बढ़ती स्वर्ण मुदओं की साख के कारण विम कडफिसस को स्वर्ण मुद्राएँ जारी करने के लिए प्रेरित किया।
➣ वेदी पर यज्ञ में लगे राजा की आकृति वाले सिक्के भी सबसे पहले विम कडफिसेस ने ही चलाये।
➣ विम का समकालीन सातवाहन राजा कुन्तल सातकर्णि था, जो विक्रमादित्य द्वितीय के नाम से विख्यात था।
➣ कडफिसेस राजवंश के बाद कनिष्क राजवंश आया। इस वंश के राजाओं ने ऊपरी भारत और निचली सिंधु घाटी में अपना प्रभुत्व फैलाया।
विम तक्षमकुषाण ( 65 -78 ई. )
➣ विम तक्षम कुजुल का उत्तराधिकारी हुआ। उसने कुषाण साम्राज्य को भारत में उत्तर पश्चिम तक बढ़ा दिया था।
➣ विम तक्षम जारी करवाये गए सिक्के बनारस से लेकर पंजाब तक बहुत बड़ी मात्रा में मिले है।
➣ उसके सिक्कों पर एक तरफ राजा की मूर्ति अंकित है तथा सिक्के के दूसरी तरफ शिव के भक्त नंदी बैल के साथ खड़े हुए शिव अंकित हैं।
➣ मथुरा ज़िले में मांट गाँव के पास इटोकरी नामक टीले से विम की बिना धड़ वाली विशाल मूर्ति प्राप्त हुई है।
कनिष्क (78 -102 ई. )
➣ कनिष्क सबसे प्रसिद्ध कुषाण शासक था। राबाटक शिलालेख से ज्ञात होता है कि कनिष्क कुषाण वंश का चौथा शासक था।
➣ कंकाली टीला अभिलेख (मथुरा) में कनिष्क को महाराजा राजाधिराज देवपुत्र कनिष्क कहा गया है।
➣ कनिष्क ने अपने राज्यारोहण को उत्सव के रूप में मनाने और उस तिथि को यादगार बनाने के लिए 78 ई, से शक संवत की शुरुआत की थी।
शक संवत भारत सरकार द्वारा प्रयोग में लाया जाता है।
➣ रोमन सम्राट की भाँति कनिष्क ने कैंसर या सीजर की उपाधि धारण की तथा शकों की भाँति क्षत्रप शासन व्यवस्था लागू की।
➣ मथुरा संभवतः उसके शासन का मुख्य केन्द्र था तथा दूसरा प्रशासनिक केन्द्र वाराणसी में था।
➣ इसका साम्राज्य मध्य एशिया के आधुनिक उज़्बेकिस्तान तजाकिस्तान, चीन के आधुनिक सिक्यांग एवं कांसू प्रान्त से लेकर अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और समस्त उत्तर भारत में बिहार एवं उड़ीसा तक फैला था।
➣ इतने विस्तृत साम्राज्य के शासन के लिए सम्राट् ने क्षत्रपों तथा महाक्षत्रपों की नियुक्ति की जिनका उल्लेख उसके लेखों में मिलता है।
➣ कनिष्क की प्रथम राजधानी पेशावर (पुरुषपुर) एवं दूसरी राजधानी मथुरा थी। राजतरंगिणी में उल्लेख है कि कनिष्क ने कश्मीर जीतकर वहाँ कनिष्कपुर नामक नगर बसाया।
➣ कनिष्क ने तक्षशिला में सिरमुख नामक स्थान पर एक नये नगर का निर्माण किया।
➣ पुरुषपुर (पेशावर) स्थित कनिष्क चैत्य का निर्माण वास्तुकार अंगिलस ने किया। यह पहला चैत्य है जिसमें लोहे के छत्र का प्रयोग हुआ है।
➣ श्रीधर्मपिटकनिदानसूत्र के चीनी अनुवाद से ज्ञात होता है कि कनिष्क ने पाटलिपुत्र पर आक्रमण कर वहां से प्रसिद्ध विद्वान अश्वघोष, बुद्ध का मिक्षापात्र तथा अनोखा मुर्गा प्राप्त किया।
चीन से युद्ध एंव सिल्क मार्ग पर अधिकार
➣ कनिष्क ने चीनी सेनापति के पास दूत भेजकर हान वंशीय राजकुमारी से विवाह की मांग की, जिसे ठुकरा दिया गया, बाद में कनिष्क चीनी सेनापति पान-चाओ से पराजित हुआ।
➣ बाद में पानचाओ के उत्तराधिकारी को हराकर चीनी शासक से खोतान, काशगर व यारकन्द छीने। उसका रेशम मार्ग पर नियत्रण स्थापित हो गया।
➣ कनिष्क ने चीन से रोम को जाने वाले सिल्क मार्ग की तीन मुख्य शाखाओं पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया।
- कैस्पियन सागर से होकर जाने वाला मार्ग।
- मर्व से फरात नदी होते हुए रूम सागर पर बने बंदरगाह तक जाने वाला मार्ग।
- भारत से लाल सागर तक जाने वाला मार्ग।
➣ यह रेशम या सिल्क मार्ग कुषाणों के लिए आय का बड़ा स्रोत था वे इस मार्ग पर व्यापारियों से चुंगी की वसूल करते थे।
➣ इस प्रकार कनिष्क ने प्रथम बार अन्तरराष्ट्रीय साम्राज्य की स्थापना की।
➣ कनिष्क का साम्राज्य बहुत विस्तृत था। उसकी उत्तरी सीमा चीन से स्पर्श होती थी। इसलिए उसने एक नया नगर कुसुमपुर (पाटलिपुत्र) की स्थापना की, और उसे पुष्पपुर नाम दिया। यही वर्तमान में पेशावर है।
➣ पेशावर के निकट कनिष्क ने एक बड़ा स्तूप और मठ बनवाया, जिसमें बुद्ध के अवशेष रखे गए। एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि इस स्तूप का निर्माण एक यूनानी इंजीनियर एजिसिलाओस ने कराया था।
धार्मिक नीति
➣ कनिष्क ने सब धर्मों के प्रति सहिषुणता की नीति अपनाई। उसने अपनी मुद्राओं पर यूनानी, ईरानी, हिन्दू और बौद्ध देवी देवताओं की मूर्तियाँ अंकित करवाई थी।
➣ कनिष्क ने बौद्ध धर्म का मुक्त हृदय से संपोषण एवं संरक्षण किया। मौर्य वंशीय सम्राट अशोक के बाद कनिष्क ही बौद्ध धर्म का प्रवल समर्थक था।
कनिष्क को द्वितीय अशोक कहा जाता है।
➣ कनिष्क बौद्ध धर्म (महायान शाखा) का अनुयायी था। आचार्य अश्वघोष ने उसे बौद्ध धर्म में दीक्षित किया था। जिसे वह पाटलिपुत्र से लाया था।
भारत में पहले सूर्य मन्दिर की स्थापना मुल्तान में हुई थी जिसे कुषाणों ने बनाया था।
➣ कनिष्क ने भारत में कार्तिकेय की पूजा को आरम्भ किया और उसे विशेष बढ़ावा दिया। उसने कार्तिकेय और उसके अन्य नामों का अंकन भी अपने सिक्कों पर करवाया।
चौथी बौद्ध संगीति
➣ पार्श्व कनिष्क के राजगुरु थे। पार्श्व की सलाह से ही कनिष्क ने चौथी बौद्ध संगीति का आयोजन किया।
➣ कनिष्क के शासनकाल में कश्मीर में कुण्डलवन में वसुमित्र की अध्यक्षता में चौथी बौद्ध संगीति हुई।
➣ चतुर्थ बौद्ध संगीति के उपाध्यक्ष एवं मुख्य अतिथि अश्वघोष थे, जिन्हें विशेष रूप से साकेत से बुलाया गया था। अश्वघोष कनिष्क के राजकवि थे।
➣ चौथी बौद्ध संगीति में बौद्ध ग्रन्थों पर जो टीकायें लिखी गई, उन्हें विभाषा शास्त्र कहा जाता है। विभाषा शास्त्र की रचना वसुमित्र ने की।
➣ बौद्धों की चतुर्थ संगीति में ही बौद्ध धर्म का दो सम्प्रदायों हीनयान और महायान में विभाजित हो गया था। जिसमे कनिष्क ने बौद्ध धर्म की महायान शाखा को राज्याश्रय प्रदान किया।
कनिष्क के अभिलेख
➣ कनिष्क के कुल 12 अभिलेख प्राप्त होते है, जिनमें प्रमुख निम्न हैं-
| तक्षशिला चिर स्तूप लेख | यह शासन के प्रथम वर्ष का लेख है (78 ई.) । इसे धर्मराजिका स्तूप भी कहते हैं।
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| रबातक अभिलेख | बैक्ट्रियन भाषा एवं ग्रीक लिपि में कुषाणों की वंशावली देने वाला यह प्रथम अभिलेख है। इसमें कनिष्क एवं कडफिसेस शासकों के बीच सम्बन्ध स्पष्ट करता है।
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| सारनाथ एवं कौशाम्बी अभिलेख | शासन के तीसरे वर्ष का है। सारनाथ अभिलेख से कनिष्क के मथुरा के महाक्षत्रप खरपल्लान व वाराणसी के क्षत्रप वनस्पर का नाम मिलता है।
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सिक्के
➣ कनिष्क के सिक्कों पर यूनानी भाषा में मिइरो (सूर्य), मेओ (चन्द्र) शिव आदि अंकित हैं, कुछ सिक्कों में शिव के हाथ में त्रिशूल व डमरू और नाना (सुमेरियन मातृदेवी), ओयशो (भारतीय देव शिव) का अंकन है।
➣ कनिष्क ने युनानियों द्वारा प्रारम्भ द्विभाषी एवं द्विलिपि सिक्के बन्द करवा दिए।
➣ कनिष्क के सिक्के में सूर्य बायीं और खड़े हैं। बांए हाथ में दण्ड है जो रश्ना सें बंधा है। कमर के चारों ओर तलवार लटकी है, का अलकरण मिलता है।
➣ मानव के रूप में बुद्ध की आकृति का अंकन सर्वप्रथम कनिष्क की मुद्राओं पर हुआ। सर्वप्रथम मैत्रेय बुद्ध का अंकन कनिष्क प्रथम के सिक्कों पर है।
➣ कनिष्क के कुछ सिक्कों पर प्रभामण्डल युक्त बुद्ध की खड़ी प्रतिमा एवं नीचे यूनानी लिपि में बुद्ध खुदा हुआ है।
➣ कुछ ताँबे के सिक्कों पर साको मोनो बुद्ध खुदा हुआ है। कुछ सिक्कों पर यूनानी देवताओं की आकृतियां अंकित है।
➣ भारत में सिक्कों पर सूर्य का अंकन किसी शासक द्वारा पहली बार हुआ था।
➣ कनिष्क द्वारा जारी किये गये एक ताँबे के सिक्के पर उसे बलि वेदी पर बलि करते हुए दिखाया गया है।
➣ महास्थान (बोगरा) में पाई गई सोने की मुद्रा पर कनिष्क की एक खड़ी मूर्ति अंकित है।
➣ मथुरा में कनिष्क की एक प्रतिमा मिली है, जिसमें उन्हें घुटने तक चोगा एवं पैरों में भारी जूते पहने हुए दिखाया गया है।
➣ कनिष्क के शासनकाल में कला के क्षेत्र में गांधार शैली तथा मथुरा शैली दो स्वतंत्र शैलियों का विकास हुआ।
➣ महात्मा बुद्ध की प्रथम मूर्ति का निर्माण मथुरा शैली में हुआ है। जबकि सर्वाधिक बौद्ध मूर्तियों का निर्माण गांधार शैली के अंतर्गत हुआ है।
गांधार कला शैली
❑ इसे इंडो-ग्रीक शैली (ग्रीक-बुद्धिष्ट शैली) भी कहा जाता है। इसका केंद्र बिंदु गांधार था, अत: इसे गांधार कला शैली भी कहा जाता है।
❑ इसमें बुद्ध एवं बोधिसत्वों की मूर्तियां काले स्लेटी पाषाण से बनाई गई हैं।
❑ यह यूनानी देवता अपोलो की नकल प्रतीत होती है।
मथुरा कला शैली | कुषाण काल की मूर्तिकला
❑ इस कला शैली का जन्म मथुरा में हुआ। इस शैली में लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग हुआ है।
❑ इसमें बौद्ध, हिंदू एवं जैन धर्मों से संबंधित मूर्तियों का निर्माण किया गया है।
❑ बुद्ध की प्रथम मूर्ति के निर्माण का श्रेय (पहली शती ई.) इसी कला शैली को दिया जाता है।
अमरावती कला शैली | बौद्ध कला शैली
➣ उल्लेखनीय है इतिहास में एक अन्य शैली, अमरावती शैली का भी उल्लेख मिलता है जिसका विकास कृष्णा- गोदावरी की निचली घाटी में सातवाहन शासकों के समय हुआ।
➣ अमरावती शैली की मूर्तियां में सफेद संगमरमर का उपयोग होता है। मुख्य रूप से बौद्ध प्रभाव देखने को मिलता है।
कनिष्क के विद्वान
| चरक | कनिष्क के राजवैद्य थे।
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| अश्वघोष | राजकवि, चौथी बौद्ध संगीति के मुख्य अतिथि व उपाध्यक्ष।
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| वसुमित्र | ये चौथी बौद्ध संगीति के अध्यक्ष ।
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| मातृचेट | अर्घ्यशतकम के लेखक।
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| संगरक्ष | कनिष्क के राजपुरोहित।
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| नागार्जुन | प्रज्ञापारमितासूत्र के लेखक एवं शून्यवाद के प्रतिपादक।
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| एजिसिलाओस | प्रसिद्ध ग्रीक विद्वान। |
➣ अश्वघोष कनिष्क का राजकवि था जिसने बुद्धचरित, सौन्दरनन्द और शारिपुत्र प्रकरण की रचना की थी।
➣ कनिष्क काल में वसुमित्र ने महाविभाष सूत्र की रचना की जिसे बौद्धों का विश्वकोष कहा जाता है।
➣ नागार्जुन कनिष्क का दरबारी विद्वान था जिसने माध्यमिक सूत्र की रचना की जिसमें सापेक्षिकता का सिद्धांत प्रस्तुत किया इसके लिए इन्हें भारत का आइंस्टीन कहते है।
➣ कनिष्क के राजवैद्य चरक ने चरक संहिता की रचना की। जिसे शल्य चिकित्सा का प्राचीनतम ग्रंथ माना जाता है। अल्बेरूनी ने इसे औषधिशास्त्र का सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ बताया।
चरक को शल्य चिकित्सा का प्रणेता माना गया है।
➣ कनिष्क ने कुल 23 वर्षों तक राज्य किया। उसकी मृत्यु 101 ई. के लगभग हुई थी। उसका उत्तराधिकारी हुविष्क था।
➣ कनिष्क की मृत्यु के पश्चात उसका बड़ा पुत्र वासिष्क ( 102 106 ई.) राजा हुआ, जिसने मात्र 4 वर्षों तक शासन किया। राजतरंगी इन्हें जुष्क कहा गया है।
शक संवत (78 ई.) : भारत का प्राचीन राष्ट्रीय संवत
➣ इस संवत का आरंभ 78 ई.पू.में हुआ था। कुषाण राजा कनिष्क महान ने अपने राज्यारोहण को उत्सव के रूप में मनाने और उस तिथि को यादगार बनाने के लिए इस संवत की शुरुआत की।
➣ इस संवत की पहली तिथि चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा है और इसी तिथि पर कनिष्क ने राज्य सत्ता सम्हाली थी।
➣ शक संवत भारत का राष्ट्रीय कैलंडर है। भारत सरकार द्वारा इसे प्रयोग में लाया जाता है।
➣ भारत में इस संवत का प्रयोग वराहमिरि द्वारा 500 ई. से किया गया।
➣ यह संवत अन्य संवतों की तुलना में कहीं अधिक वैज्ञानिक और त्रुटिहीन है।
➣ यह संवत प्रत्येक वर्ष में 22 मार्च को शुरू होता है और इस दिन सूर्य विषुवत रेखा के ऊपर होता है और इसी कारण दिन और रात बराबर के समय के होते हैं।
➣ शक संवत के 365 दिन होते हैं और इसका लीप इयर भी अंग्रेजी ग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ ही होता है।
➣ लीप ईयर होने पर शक संवत 23 मार्च को शुरू होता है और उसमें 366 दिन होते हैं।
➣ एक अन्य विचार के अनुसार, उज्जयिनी में शक क्षत्रप चष्टन (78-110 ई.) ने शक संवत का प्रवर्तन किया।
हुविष्क (106-140 ई.)
➣ वासिष्क के उपरांत उसका पुत्र हुविष्क (106-140ई.) शासक बना। इसके समय कुषाण सत्ता का प्रमुख केंद्र पेशावर से हटकर अब मथुरा हो गया था।
➣ इसने कश्मीर में हुष्कपुर नामक नगर (बारामूला के निकट) की स्थापना करवाई। यह शिव व विष्णु का उपासक था। इसके चतुर्भुजी विष्णु के सिक्के प्राप्त हैं।
➣ हुविष्क के सिक्कों पर शिव, स्कन्द तथा विष्णु आदि देवताओं तथा सर्वप्रथम शृंग धारण किए उमा की आकृतियों का अंकन है।
➣ हुविष्क के सिक्कों पर संकर्षण एवं वासुदेव दोनों अंकित है। इसकी मुद्राओं पर ही सर्वाधिक संख्या में हिन्दु देवी देवताओं का अंकन है। साथ ही ईरानी (पारसी) देवता आहुरमज्दा का अंकन भी कुछ सिक्कों पर मिलता है।
➣ उमा एवं पाशुपत धर्म का प्राचीनतम अंकन हुविष्क की मुद्राओं पर ही हुआ है तथा कार्तिकेय और हरिहर का भी अंकन है।
➣ हुविष्क के मथुरा लेख से ज्ञात होता है कि श्रेणियाँ बैंक का कार्य करती थी। इसमें आटा पीसने वाली श्रेणी का उल्लेख है।
➣ हुविष्क ने मथुरा में एक मंदिर और बौद्ध बिहार बनवाया।
➣ वह संभवतः रुद्रदामा द्वारा पराजित हुआ और मालवा शकों के हाथ में चला गया।
वासुदेव प्रथम (192 ई. -232 ई.)
➣ कनिष्क कुल का अन्तिम महान् शासक वासुदेव प्रथम था। वासुदेव प्रथम कुषाण शासक था, जिसका नाम भारतीय देवताओं पर था।
➣ वासुदेव के स्वर्ण व ताम्र सिक्के प्राप्त हुये हैं। सिक्कों पर शिव व उमा का चित्र है। एक सिक्के पर शिव का हाथी के साथ चित्रण है।
➣ कुषाण शासकों के सोने व तांबे के सिक्के बहुतायत से मिलते हैं, लेकिन विम कडफिसस व हुविष्क का एक-एक चाँदी का सिक्का भी प्राप्त हुआ है।
➣ कनिष्क द्वितीय ने रोमन राजाओं की उपाधि सीजर एवं कैसर उपाधि धारण की।
➣ कनिष्क द्वितीय के आरा पाषाण लेख (खरोष्ठी भाषा) में कनिष्क द्वितीय को महरजस रजतिरज देवपुत्रस कैसरस कहा गया है।
वासुदेव द्वितीय (275 ई. – 300 ई.)
➣ वासुदेव द्वितीय अन्तिम कुषाण शासक था। उसके समय में उत्तर पश्चिम का बहुत बड़ा भाग कुषाणों के हाथ से निकल गया। संभवत: ईरान के ससैनियन शासकों ने इसे पराजित कर कुषाण वंश का अन्त किया।
➣ ससैनियन (ईरानी ) शासकों ने वासुदेव के शिव व नन्दी प्रकार के सिक्कों को ग्रहण किया, जिन्हें ससैनियन-कुषाण सिक्के कहा जाता है।
महत्वपूर्ण तथ्य
- प्रथम बार स्वर्ण मुद्रा इंडो-ग्रीक शासकों ने चलाई।
- कुषाणों ने सर्वाधिक शुद्ध स्वर्ण सिक्के (124 ग्रेन के) जारी किए।
- सर्वाधिक स्वर्ण मुद्राएँ गुप्तों ने चलवाई।
- कुषाणों को सर्वाधिक ताम्र सिक्के चलाने का श्रेय भी प्राप्त है।
- उन्होंने चांदी के सिक्के नहीं चलाए; केवल स्वर्ण व तांबे के सिक्के जारी किए।