Subject: भारतीय इतिहास

  • सातवाहन वंश (60 ई.पू.-240 ई.) | Q&A Practice

    ➣ किसने अपने साथियों के साथ मिलकर कण्व वंश के अन्तिम शासक सुशर्मा की हत्या कर अपने आंध्र-सातवाहन वंश की स्थापना की?
    उत्तर : सिमुक या सिन्धुक

    ➣ ऊपरी दक्कन अर्थात् महाराष्ट्र आन्ध्र प्रदेश एवं कर्नाटक में मौर्योों के उत्तराधिकारी कौन हुए?
    उत्तर : सातवाहन

    ➣ पुराणों, विशेषकर मत्स्य एवं वायु पुराण में सातवाहन वंश को आंध्र, आंध्र जातीय तथा आंध्र भृत्य कहा गया है। कहां पर इनका उल्लेख सातवाहन के नाम से मिलता है?
    उत्तर : अभिलेखों में

    ➣ आंध्र एक अति प्राचीन जाति थी, जिसका उल्लेख वैदिक ग्रंथ किस ब्राह्मण ग्रन्थ में मिलता है?
    उत्तर : ऐतरेय ब्राह्मण

    ➣ अशोक के एक आदेशलेख में सातवाहनो को क्या बताया कहा गया है?
    उत्तर : अर्द्ध स्वतंत्र जाति

    ➣ सातवाहनों ने किनको पराजित कर मध्य भारत के कुछ भागों में अपनी सत्ता स्थापित की?
    उत्तर : कण्वों को

    ➣ आरंभिक सातवाहन राजा आंध्र में नहीं थे। उन्होंने अपनी सत्ता ऊपरी गोदावरी घाटी सातवाहन के समकालीन दक्षिण में सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी कौन थे?
    उत्तर : शक

    ➣ वायु पुराण के अनुसार, किस आंध्र शासक ने बौद्ध एवं जैन समुदाय का समर्थन प्राप्त करने के लिए उसने कई जैन एवं बौद्ध मंदिरों का निर्माण करवाया ?
    उत्तर : सिमुक

    ➣ सातवाहन वंश में ‘शातकर्णी’ की उपाधि धारण करने वाला वह प्रथम शासक कौन था?
    उत्तर : तीसरा शासक शातकर्णी प्रथम

    ➣ शासक शातकर्णी प्रथम किसका पुत्र था?
    उत्तर : सिमुक का

    ➣ शातकर्णी प्रथम की रानी नागनिका के किस अभिलेख से उसके शासन काल का विवरण प्राप्त होता है, साथ में यह भी ज्ञात होता है कि उसने ‘दक्षिणापथपति’ तथा अप्रतिहतचक्र’ जैसी उपाधियां ग्रहण कीं?
    उत्तर : नानाघाट अभिलेख

    ➣ किसने कलिंगराज खारवेल को युद्ध में परास्त करने के बाद उसका राज्य वापस लौटा दिया?
    उत्तर : शातकर्णी प्रथम

    ➣ किस सातवाहन शासक ने दो अश्वमेध यज्ञ एवं एक राजसूय यज्ञ सम्पन्न कर ‘सम्राट’ की उपाधि धारण की?
    उत्तर : शातकर्णी प्रथम

    ➣ शातकर्णी प्रथम ने गोदावरी के तट पर स्थित किस नगर को अपनी राजधानी बनाया ?
    उत्तर : प्रतिष्ठान

    ➣ हाल ने स्वयं किस भाषा में ‘गाथा सप्तसती’ की रचना की, जो 700 छंदों का शृंगार काव्य है?
    उत्तर : प्राकृत भाषा

    ➣ एक विदेशी जाति क्षहरातों के किस नेता ने लगभग 119-124 ई. में आंध्र साम्राज्य की प्रगति को रोक दिया और दक्षिण में बेल्लारी जिले के सातवाहन विहार तक सीमित कर दिया?
    उत्तर : नहपान

    ➣ किस सातवाहन शासक ने शक-यवन-पहलव और क्षहरात वंश का नाशकर आंध्रों की खोई हुई शक्ति और सत्ता प्राप्त की?
    उत्तर : गौतमीपुत्र शातकर्णी (106-130 ई.)

    ➣ गौतमीपुत्र शातकर्णी 23वां सातवाहन राजा था। किस प्रशस्ति में उसे ‘सातवाहन वंश की प्रतिष्ठा का पुनः संस्थापक’ कहा गया है?
    उत्तर : नासिक प्रशस्ति

    ➣ सातवाहन वंश का वह प्रथम सातवाहन शासक कौन था, जिसके नाम के साथ उसकी माता का नाम भी जुड़ा हुआ था?
    उत्तर : गौतमीपुत्र शातकर्णी

    ➣ किस सातवाहन शासक के लिए ‘एका ब्राह्मण’ शब्द प्रयुक्त हुआ है?
    उत्तर : गौतमीपुत्र शातकर्णी

    ➣ सातवाहन का सबसे बड़ा शासक कौन था?
    उत्तर : गौतमीपुत्र शातकर्णी

    ➣ कौन-सा शासक वर्ण व्यवस्था का रक्षक कहा जाता है ?
    उत्तर : गौतमीपुत्र शातकर्णी

    ➣ किस सातवाहन शासक ने क्षहरात वंश का नाश किया और महाराष्ट्र में सातवाहनों की सत्ता की पुनर्स्थापित की ?
    उत्तर : गौतमीपुत्र ने

    ➣ गौतमीपुत्र ने क्षहरात वंश के किस शासक के चांदी के सिक्कों को पुनः अपने नाम से टंकित कराया?
    उत्तर : नहपान

    ➣ नहपान द्वारा जारी किए गये चांदी के 8000 सिक्के कहां से प्राप्त हुए थे?
    उत्तर : नासिक

    ➣ गौतमीपुत्र की माता गौतमी बलश्री के किस गुहाभिलेख में लिखा है कि “उसके घोड़ों ने तीन समुद्रों का पानी पीया था ?
    उत्तर : नासिक गुहाभिलेख

    ➣ गौतमीपुत्र ने नासिक में किस नगर का निर्माण कराया तथा एक गुफा गृह बनाकर बौद्धों को दान किया?
    उत्तर : वेणाकटक

    ➣ गौतमीपुत्र का उत्तराधिकारी कौन बना, जिसने सातवाहन शक्ति का विस्तार दक्षिण में किया ?
    उत्तर : वासिष्ठीपुत्र पुलुमावी

    ➣ पुलुमावी ने एक नये नगर ‘नवनगर’ की स्थापना की। उसने कौन-सी उपाधियां धारण की?
    उत्तर : ‘महाराज’ और ‘दक्षिणापथ्रेश्वर’

    ➣ सौराष्ट्र (काठियावाड़) के शक शासक रुद्रदामन प्रथम (130-150 ई.) ने सातवाहनों को दो बार हराया, मगर वैवाहिक संबंध के कारण उनका नाश नहीं किया। किसका विवाह शक शासक की पुत्री से हुआ था ?
    उत्तर : वासिष्ठीपुत्र श्री शिव शातकर्णी

    ➣ शक पराजय का उल्लेख किस अभिलेख में मिलता है?
    उत्तर : जूनागढ़ अभिलेख

    ➣ सातवाहन वंश का अंतिम प्रतापी राजा कौन था, जिसने शकों द्वारा जीते गये उत्तर कोंकण और मालवा के भू-भाग पर पुनः अधिकार प्राप्त कर लिया ?
    उत्तर : यज्ञश्री शातकर्णी (165-194 ई.)

    ➣ यज्ञश्री शातकर्णी के सिक्कों पर किसका चित्र है जो जलयात्रा और समुद्री व्यापार के प्रति उसके प्रेम का परिचायक है?
    उत्तर : जहाज

    ➣ यज्ञश्री शातकर्णी के बाद आंध्र साम्राज्य का पतन प्रारंभ हो गया। किस राजवंशों ने सातवाहनों को बिलकुल ही समाप्त कर दिया ?
    उत्तर : इक्ष्वाकु और पल्लव राजवंश

    ➣ इक्ष्वाकुओं का नाम उनके किस राजा के कारण प्रसिद्ध है, जिसने नागार्जुनकोंडा के सुप्रसिद्ध स्तूपों का निर्माण करवाया ?
    उत्तर : वीरपुरुषदत्त

    ➣ सातवाहन नरेशों ने ब्राह्मणों की तुलना में किनको ज्यादा भूमि दान में दिये ?
    उत्तर : बौद्ध भिक्षुओं को

    ➣ सातवाहन शासक ब्राह्मण थे। किस प्रशस्ति में गौतमीपुत्र शातकर्णी को ‘अद्वितीय ब्राह्मण’ कहा गया है?
    उत्तर : नासिक प्रशस्ति

    ➣ सातवाहनों ने किस धर्म को संरक्षण प्रदान किया था?
    उत्तर : बौद्ध धर्म एवं ब्राह्मण धर्म, दोनों को

    ➣ सातवाहनों के समय प्रमुख बौद्ध धर्म के केंद्र कौन थे?
    उत्तर : नागार्जुनकोंडा तथा अमरावती

    ➣ सातवाहन काल में बौद्ध धर्म का कौन-सा सम्प्रदाय उन्नत अवस्था में था?
    उत्तर : महायान सम्प्रदाय

    ➣ किस भाषा को सातवाहनों ने राजकीय संरक्षण प्रदान किया था?
    उत्तर : प्राकृत

    ➣ किन गुफाओं से ज्ञात होता है कि समुद्री मार्ग से पश्चिमी तट पर आए बौद्ध भिक्षुओं को वहां शरण मिलती थी?
    उत्तर : कन्हेरी की गुफाओं से

    ➣ पेरीप्लस के अनुसार, सातवाहन काल में पश्चिम से आया सामान किस बंदरगाह पर उतारा जाता था ?
    उत्तर : बैरीगाजा (भरुकच्छ भड़ौच )

    ➣ सातवाहनों के काल में कृष्णा और गोदावरी की घाटी में किस नयी कला शैली का विकास हुआ ?
    उत्तर : अमरावती शैली ( 150 ई. पू. 400 ई.)

    ➣ अमरावती शैली के मुख्य केन्द्र अमरावती, नागार्जुनकोंडा और जग्गयापेट थे। इसमें मुख्यतः किस प्रकार के पत्थरों का उपयोग किया जाता था ?
    उत्तर : सफेद पत्थरों का

    ➣ अमरावती स्तूप सर्वाधिक प्रसिद्ध था, जिसको वेदिका तथा गुम्बद दोनों ही संगमरमर के बने हुए थे। इसके चारों ओर बुद्ध की प्रतिमाएं बनाई गयी थीं। नागार्जुनकोंडा से प्राप्त स्तूप किस आकार थे?
    उत्तर : गोलाकार

    ➣ अमरावती के विशाल स्तूप में बुद्ध के जीवन की घटनाओं का चित्रण किससे किया गया है?
    उत्तर : चूना पत्थर

    ➣ सातवाहनों के परवर्ती इक्ष्वाकुओं की राजधानी कहां स्थापित की गयी थी?
    उत्तर : नागार्जुनकोंडा

    ➣ किन शासकों ने सर्वप्रथम सीसे के सिक्के चलवाए ?
    उत्तर : सातवाहनों ने

    ➣ सातवाहन राजपरिवार की महिलाएं बौद्ध धर्म को प्रश्नय देती थीं। पुरुष किस धर्म का पालन करते थे?
    उत्तर : वैदिक धर्म

  • सातवाहन साम्राज्य: प्रशासन, संस्कृति और व्यापार का उत्कर्ष

    📚 विषय सूची

    सातवाहन वंश (230 BCE – 220 CE) : दक्षिण भारत का उत्कर्ष

    📌 ध्यान दें: सातवाहन साम्राज्य की स्थापना से पहले ही हिन्द-यूनानी तथा शक भारत की पश्चिमोत्तर सीमा पर अधिकार कर चुके थे और वहाँ शासन कर रहे थे।

    📌 इसके बाद ईसा पूर्व तथा ईस्वी के प्रारम्भिक काल में दो अन्य विदेशी जातियाँ — पह्लव तथा कुषाण — भी भारत की सीमाओं तक पहुँच गई थीं।

    📌 उस समय भारत मुख्यतः दो भागों में विभाजित था — उत्तरी एवं दक्षिणी। उत्तरी क्षेत्र में विदेशियों का प्रभाव था, जबकि दक्षिण में ब्राह्मण वंशीय सातवाहन साम्राज्य का प्रभुत्व था।

    सातवाहन  साम्राज्य

    मगध के पतन बाद भारत का एकमात्र शक्तिशाली साम्राज्य सातवाहन उभरकर सामने आया जिसने भारत में विदेशियों की जड़ें मजबूत नहीं होने दी।

    ➣ सातवाहन साम्राज्य से प्रसिद्ध राजा गौतमी पुत्र शातकर्णी (106-130 ई.) हुआ जिसने दक्षिण से विदेशियों को उत्तरी सुदूर इलाकों तक खदेड़ दिया।

    ➣ विदेशी शासकों में केवल कुषाण वंश, सम्राट कनिष्क (78-102 ई.) के नेतृत्व में ही फला-फुला। जिसके शासनकाल में मध्य एशियाई सभ्यता ने भारत में अपने पांव जमाये।

    ➣ भारत पर सर्वाधिक समय तक शासन करने वाला सातवाहन वंश पहला राजवंश था। इनका मूल निवास स्थान महाराष्ट्र में प्रतिष्ठान (गोदावरी) था।

    ➣ वी.एस. सुक्थंकर महोदय वेल्लारी (कर्नाटक) एवं स्मिथ, भण्डारकर, रेप्सन आदि आन्ध्रप्रदेश को सातवाहनों का मूल निवास मानते हैं।

    ➣ पुराणों में सातवाहन वंश को आन्ध्रजातीय या आन्ध्रभृत्य कहा गया है। सातवाहन वंश के शासकों का दक्षिणाधिपति तथा इनके द्वारा शासित प्रदेश दक्षिणापथ कहा जाता है।

    ➣ इस वंश की स्थापना सिमुक ने की थी। इस वंश के इतिहास के लिए मत्स्य पुराण तथा वायु पुराण विशेष रूप से उपयोगी हैं।

    ➣ सातवाहन वंश की राजधानी प्रतिष्ठान/पैठान थी तथा इसकी राजकीय भाषा प्राकृत तथा लिपि ब्राह्मी थी एंव चैत्य राजचिह्न था।

    ➣ सातवाहनों की प्रारम्भिक राजधानी धान्यकटक (अमरावती) थी। शातकर्णी प्रथम ने सर्वप्रथम गोदावरी नदी के किनारे प्रतिष्ठान/पैठन को राजधानी बनाया।

    सिमुक (60–37 ई.पू.): सातवाहन वंश का संस्थापक

    ➣ पुराणों के अनुसार सिमुक ने कण्व वंश के अन्तिम राजा सुशर्मन को युद्ध में मार कर मगध पर अपना अधिकार स्थापित किया था।

    ➣ पुराणों में सिमुक या सिन्धुक को आन्ध्रजातीय कहा गया है। इसीलिए इस वंश को आन्ध्र-सातवाहन की संज्ञा दी जाती है।

    हाथीगुम्फ़ा शिलालेख के अनुसार कलिंग शासक खारवेल सातवाहन वंश के सातकर्णि का समकालीन था।

    ➣ जैन गाथाओं के अनुसार सिमुक ने अनेक बौद्ध और जैन मन्दिरों का निर्माण कराया था।

    ➣ सिमुक के बाद उसका भाई कृष्ण या कन्ह न राज्य संभाला। सिमुक का पुत्र सातकर्णि था, जो अल्पवस्यक था। इसी कारण सिमुक की मृत्यु के बाद उसका भाई कृष्ण राजगद्दी पर बैठा।

    कृष्ण (37–27 ई.पू.): सातवाहन साम्राज्य का विस्तार

    ➣ सिमुक के बाद उसका भाई कृष्ण राजा बना। जिसकी जानकारी नासिक अभिलेख से मिलती है। पुराणों के अनुसार उसने 18 वर्ष तक राज्य किया।

    ➣ कृष्ण ने भी अपने भाई के समान विजय की प्रक्रिया को जारी रखा तथा नासिक तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया।

    शातकर्णी प्रथम (27–17 ई.पू.): दक्षिण भारत में सातवाहन शक्ति का उदय

    ➣ शातकर्णी प्रथम इस वंश का प्रथम योग्य शासक था। उसकी उपलब्धियों का ज्ञान नायनिका (नागनिका) के नानाघाट अभिलेख (पूना) से होता है।

    ➣ शातकर्णी प्रथम कृष्ण का पुत्र या भतीजा था जिसकी जानकारी पेरिप्लस आफ दि एरिथिसन सी नामक पुस्तक में मिलती है।

    ➣ शातकर्णी प्रथम ने दो अश्वमेधएक राजसूय यज्ञ किया। यह शातकर्णी की उपाधि धारण करने वाला प्रथम शासक था।

    ➣ शातकर्णी प्रथम ने गोदावरी तट पर स्थित प्रतिष्ठान को अपनी राजधानी बनाई। प्रारम्भिक राजधानी धान्यकटक (अमरावती) थी।

    ➣ शिलालेखों में उसे दक्षिणापथ और अप्रतिहतचक्र विशेषणों से विभूषित किया गया है। उसने दक्षिणापथपति की उपाधि धारण की।

    ➣ उसका विवाह अंगीय वंश की राजकुमारीनायनिका या नागरिका के साथ हुआ था, जो एक बड़े महारथी सरदार की दुहिता थी। इस विवाह के कारण सातकर्णि की शक्ति बहुत बढ़ गई।

    सांची स्तूप के दक्षिणी तोरण द्वार पर अभिलेख में शातकर्णी प्रथम का उल्लेख है। इस लेख को वशिष्ठपुत्र आनन्द ने खुदवाया था।

    ➣ शातकर्णी प्रथम की पत्नी नागनिका या नायनिका के नानाघाट अभिलेख से पता चलता है शातकर्णी ने ब्राह्मणों को भूमि का दान किया था।

    उल्लेखनीय है नागनिका का नानाघाट अभिलेख भूमि अनुदान का पहला अभिलेखीय साक्ष्य है।

    ➣ सातकर्णी ने ऐसे कई प्रदेशो को जीतकर अपने अधीन कर लिए जो पहले मगध साम्राज्य के अधीन थे। यह काल मौर्य साम्राज्य के पतन का काल था।

    ➣ उसका शासन काल केवल 10 वर्ष तक रहा था। अभी उसके पुत्र वयस्क नहीं हुए थे। अतः उसकी मृत्यु के अनन्तर रानी नायनिका ने शासन-सूत्र का संचालन किया।

    ➣ शातकर्णी प्रथम ने मालवा शैली की गोल मुद्राएं का प्रचलन किया तथा अपनी पत्नी के नाम पर चाँदी की मुद्राओं का प्रचलन किया था। उसके सिक्कों पर श्वसुर अंगीयकुलीन महारथी त्रणकयिरो का नाम भी अंकित है।

    ➣ सातवाहन का अगला शासक नरेश हाल (20 -24 ई. पू.) था। यदि प्रारम्भिक सातवाहन राजाओं के युद्ध में शातकर्णी प्रथम, तो शान्ति में हाल महानतम था।

    ➣ हाल एक बड़ा कवि तथा कवियों एवं विद्वानों का आश्रयदाता था। उसके राजसभा में बृहत्कथा के रचयिता गुणाढ्य पैशाची भाषा में तथा कातन्त्र नामक संस्कृत व्याकरण के लेखक शर्ववर्मन निवास करते थे।

    गाथासप्तशती (प्रेमकाव्य) नामक प्राकृत भाषा में उसने (हाल) ने एक मुक्तक काव्य की रचना की थी। जिसमे उसके प्रेम गाथाओं का वर्णन मिलता है।

    लीलावे लीलावती नामक ग्रंथ में हाल की सैन्य उपलब्धियों का वर्णन है, इसमें हाल के सेनापति विजयानन्द के श्रीलंका जाने का उल्लेख है। हाल की रानी मलयवती संस्कृत की ज्ञाता थी।

    ➣ राजा हाल के बाद क्रमशः पत्तलक, पुरिकसेन, स्वाति और स्कंदस्याति सातवाहन साम्राज्य के राजा हुए। इन चारों का शासन काल कुल लगभग 51 वर्ष था।

    ➣ स्कंदस्याति के बाद महेन्द्र सातकर्णि राजा बना। इसके समय में फिर विदेशियों के आक्रमण भारत में प्रारम्भ हो गए। सातवाहन साम्राज्य का क्षय और कुषाणों का उत्कर्ष का आरम्भ हुआ।

    कडफिसेस हिन्दुकुश के उत्तर-पश्चिम में कम्बोज देश में रहता था। भारत के जीते हुए प्रदेश में उसके क्षत्रप राज्य करते थे।

    ❑ पहली शताब्दी में ईसाई धर्म प्रचारक सेंट थॉमस भारत आया था इसी से भारत में ईसाई धर्म की शुरूआत हुई।

    गौतमी पुत्र शातकर्णी का शासन काल प्रारम्भ होने कुछ वर्ष पहले ही 78 ई.पू- 102 ई. तक कालांतर में उत्तर-भारत के अन्य राज्य में कुषाण शासक कनिष्क ने शासन किया था।

    गौतमीपुत्र शातकर्णी (106–130 ई.): सातवाहन साम्राज्य का महानतम शासक

    ➣ यह इस वंश का 23वां और सबसे महान शासक था। इसे आगमन निलय (वेदों का आश्रय) भी कहा गया है।

    ➣ उसकी विजय की जानकारी उसकी माता गौतमी बलश्री के नासिक अभिलेख से प्राप्त होती है। इस अभिलेख में उसे अद्वितीय ब्राह्मण (एकब्राह्मण) कहा गया है।

    नासिक अभिलेख में गौतमीपुत्र शातकर्णी के बारे में उल्लेखित है कि इसके विजयी घोड़ों ने तीन समुद्रों का पानी पिया है जिसकी पताका अपराजेय है।

    ➣ गौतमी पुत्र शातकर्णी के नासिक से दो अभिलेख मिले हैं, जो उसके राज्यभिषेक के 18वें एवं 24वें वर्ष के हैं।

    ➣ गौतमीपुत्र शातकर्णी ने शक विजय के उपलक्ष में वेणकटक स्वामी की उपाधि धारण की तथा वेणकटक नामक नगर की स्थापना की। इसके अलावा उसने राजाराज तथा विध्यनरेश की भी उपाधि धारण की।

    ➣ गौतमी पुत्र शातकर्णी ने क्षहरात वंश के शासक नहपान को परास्त कर उसके द्वारा चलाये गये चाँदी के सिक्कों को पुनः प्रसारित करवाया। इस विजय की पुष्टि जोगलथम्बी मुद्राभाण्ड (नासिक) से होती

    नासिक (जोगलथंबी) से चांदी के लगभग 8 हजार सिक्के प्राप्त हुए हैं, जिनमें एक तरफ नहपान तथा दूसरी तरफ गौतमीपुत्र शातकर्णी का नाम है।

    ➣ गौतमीपुत्र को अभिलेखों में एक ब्राह्मण (एक बहमन्), शकों को हराने वाला व क्षत्रियों के दर्प को चूर करने वाला (खतियदपमानमदनस) कहा गया है।

    गौतमीपुत्र को चतुर्वर्ण व्यवस्था का रक्षक कहा गया है।

    ➣ उसने छिन्न-भिन्न होती वर्ण व्यवस्था की रक्षा की तथा वर्णसंकर प्रथा को रोका। इसके बारे में जानकारी गौमतीपुत्र की माँ गौतमी बलश्री की नासिक प्रशस्ति से मिलती है, जिसे पुलुमावी के शासन में उत्कीर्ण करवाया गया था।

    ➣ गौतमी पुत्र शातकर्णी ने खखरातवसनिखसेसकरस (अहरात वंश का निर्मूलन करने वाला) की उपाधि धारण की।

    ➣ गौतमीपुत्र ने नासिक बौद्ध संघ को अजकालकिय तथा कार्ले भिक्षु संघ को करजक नामक ग्राम दान में दिए।

    ➣ करजक पहले उपावदात (नहपान का दामाद) के अधिकार में था तथा उपावदात ने भी इसे बौद्ध संघ को दान में दिया था। इस प्रकार करजक ग्राम दो बार बौद्ध संघ को दान में दिया गया।

    ➣ गौतमी पुत्र शातकर्णी प्रथम सातवाहन शासक था, जिसने सम्पूर्ण दक्षिणापथ पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया। उसका साम्राज्य संभवत: उत्तर में मालवा में लेकर दक्षिण में कर्नाटक तक फैला हुआ था।

    ➣ गौतमीपुत्र के पुत्र पुलुमावी के उन्नीसवें वर्ष के नासिक गुहालेख से गौतमी पुत्र द्वारा विजित निम्न क्षेत्रों का पता लगता है-

    1. ऋषिक (कृष्णा नदी का तटीय प्रदेश)
    2. मूलक
    3. अस्मक (गोदावरी का तटीय प्रदेश)
    4. सुराष्ट्र
    5. कुकुट (पश्चिमी राजपूताना)
    6. विदर्भ
    7. अपरान्त (उत्तरी कोंकण)
    8. अनूप (नर्मदा घाटी)
    9. अवन्ति (पश्चिमी मालवा)
    10. आकर (पूर्वी मालवा)

    शून्यवाद के संस्थापक नागार्जुन गौतमी पुत्र शातकर्णि के समकालीन थे।

    माँ के नाम पर राजा के नामकरण की प्रथा गौतमीपुत्र शतकर्णी के शासन काल से हुई थी इसके बाद सभी सातवाहन शासकों ने यह प्रथा अपनाई थी।

    ➣ पुराणों के अनुसार इसने 56 साल और जैन अनुश्रुति के अनुसार 55 साल तक राज्य किया था।

    ➣ कहा जाता है कि अपनी स्थिति को सुरक्षित करने के लिए गौतमी पुत्र शातकर्णी ने अपने पुत्र वाशिष्ठी पुत्र पुलमावि का विवाह शक शासक रुद्रदामन की पुत्री से किया था।

    वाशिष्ठीपुत्र पुलुमावी (130–154 ई.): सातवाहन साम्राज्य की स्थिरता और व्यापार

    ➣ गौतमी पुत्र के बाद उसका पुत्र वाशिष्ठी पुत्र पुलमावि राजा बना। आन्ध्र प्रदेश पर विजय सम्भवतः पुलमावि ने ही प्राप्त की। अतः उसे प्रथम आन्ध्र सम्राट भी कहा जाता है। इससे पहले की सातवाहन शासक ने आंध्र क्षेत्र को नहीं जीता था।

    ➣ वाशिष्ठी पुत्र पुलुमावी के अभिलेख ही सातवाहन वंश के आंध्रप्रदेश में पाये जाने वाले सबसे प्राचीन अभिलेख हैं।

    ➣ नासिक अभिलेख में वशिष्ठी पुत्र पुलुमावी की उपाधि दक्षिणापथेश्वर (आन्ध्र का शासक) थी। पुराणों में इसका नाम पुलोमा मिलता है।

    ➣ पुलमावि ने अपनी राजधानी आन्ध्र प्रदेश के औरंगाबाद जिले में गोदावरी नदी के किनारे पैठन या प्रतिष्ठान में बनाई।

    ➣ उसने शक शासक रुद्रदामन को दो बार पराजित किया। उसने रूद्रदामन की पुत्री से विवाह कर अपनी स्थिति मजबूत की। कन्हेरी अभिलेख में भी इसका वर्णन है।

    ➣ इसके विपरीत रूद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख से पता चलता है कि रूद्रदामन ने वसिष्ठीपुत्र पुलुमावी को दो बार पराजित किया था।

    ➣ पुलमावि के विषय में अमरावती से प्राप्त एक लेख से जानकारी मिलती है। इसके समय में ही अमरावती के बौद्ध स्तूप के चारों ओर वेष्टिनी का निर्माण कर स्तूप को संवर्द्धित किया गया।

    वशिष्ठी पुत्र पुलुमावी एकमात्र सातवाहन शासक है, जिसका अमरावती से अभिलेख मिला है।

    ➣ वशिष्ठी पुत्र पुलुमावी के नासिक से चार अभिलेख मिले हैं (दूसरे, छठे, 19वें एवं 22वें राज्य वर्ष के) एवं कार्ले से 2 अभिलेख मिले हैं।

    ➣ वाशिष्ठी पुत्र पुलुमावी के कुछ सिक्कों पर दो पतवारों वाले जहाज का चित्र बना हुआ है। ये सिक्के कोरोमण्डल तट से मिले हैं। जिससे नौ -सेना शक्ति के विकास के प्रमाण को दर्शाता है।

    ➣ पुलुमावी के बाद शिवधी शातकर्णी (154-163 ई.) तथा शिवस्वादशातकर्णी (165 174 ई.) राजा हुए।

    वाशिष्ठी पुत्र पुलुमावी गौतमीपुत्र शातकर्णी का पुत्र था। इसे पुराणों में पुलोमा कहा गया है।

    ➣ यह शक महाक्षत्रप रुद्रदामन के समकालीन था।

    ➣ उसने बौद्ध संघ को अजकलिकाय तथा कार्ले के भिक्षु संघ को कर्जक नामक ग्राम दान दिए।

    ➣ वाशिष्ठी पुत्र पुलुमावी के समय अमरावती स्तूप का निर्माण हुआ था इससे पता चलता है की उसने महाराज व दक्षिणेश्वर की उपाधि धारण की थी।

    ➣ इसने अपने शासन काल में आंध्र को जीता था जिसके बाद इसे पहला आंध्र सातवाहक शासक या प्रथम आंध्र सम्राट कहा गया। इससे पहले की सातवाहन शासक ने आंध्र क्षेत्र को नहीं जीता था।

    ➣ इसके सिक्कों पर दो पतवारों वाली जहाज का चित्र मिलता है जिससे नौ -सेना शक्ति के विकास के प्रमाण को दर्शाता है।

    यज्ञश्री शातकर्णी (165–194 ई.): सातवाहन साम्राज्य का अंतिम शक्तिशाली शासक

    यज्ञश्री शातकर्णी इस वंश का अन्तिम महत्त्वपूर्ण शासक था। उसने शकों द्वारा जीते गये भू-भाग उत्तर कोंकण और मालवा को पुनः जीत लिया।

    ➣ उसके सिक्के आन्ध्र, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और गुजरात में पाए गए हैं। इन सिक्कों पर जहाज का चित्र है, जो जलयात्रा और समुद्री व्यापार प्रति उसके प्रेम को दर्शाता है।

    ➣ यज्ञ श्री सतकर्णी के उत्तराधिकारी सातवाहन साम्राज्य को आगे बनाए रखने में असमर्थ साबित हुए उनका राज्य पूर्वी दक्कन और कन्नड़ प्रदेश तक सीमित था।

    इक्ष्वाकु और पल्लव राजवंश राजवंशों ने सातवाहनों को समाप्त कर दिया। सन् 220 तक इस साम्राज्य का अन्त हो गया।

    पुलुमावी चतुर्थ इस वंश का अन्तिम शासक था।

    प्रशासन, संस्कृति, धर्म और व्यापार का उत्कर्ष

    भौतिक संस्कृति के पहलु

    ➣ कुषाण ने सोने के सिक्के जारी किये थे जबकि सातवाहन शासकों ने सीसे के सिक्के जारी किए, जो दक्कन से प्राप्त हुए हैं। इसके अलावा उन्होंने पोटिन, ताम्बे और कांसे के पैसे भी जारी किए। पूर्वी दक्कन में

    कृष्णा और गोदावरी के बीच का डेल्टाई क्षेत्र चावल का विशाल भण्डार था। यहाँ के लोग कपास का भी उत्पादन करते थे। जिससे उन्नत ग्रामीण अर्थव्यवस्था विकसित हुई।

    ➣ प्लिनी के अनुसार, आन्ध्र राज्य के पास 1,00,000 पैदल सेना, 2000 घुड़सवार और 1000 हाथी थे।

    ➣ उत्तर के संपर्क, जहाँ विदेशी शासकों का राज था , में आने से, दक्कन के लोगों ने सिक्कों, पकी ईंटों, गोल कुओं, लेखन कला इत्यादि का उपयोग सीखा लिया।

    करीमनगर जिले के पेद्दबाँकुर में (ई.पू. 200–सन् 200), आग में पकी हुई ईंटों एवं चपटे, छेद वाले खपड़ों का नियमित उपयोग मिलता है।

    पेद्दबाँकुर में दूसरी शताब्दी में निर्मित ईंटों की दीवार वाले 22 कुएँ भी मिले हैं।

    ➣ इसके अतिरिक्त इन जगहों पर भूमिगत नालियाँ भी मिली हैं, जो गन्दे पानी को गड्ढे तक पहुंचाती थीं। इसी समय महाराष्ट्र में नगर विकसित हुए।

    ➣ प्लीनी के अनुसार पूर्वी दक्कन एवं आन्ध्र में कई गाँवों के अलावा दीवारों से घिरे 30 शहर थे ।

    सामाजिक संरचना

    ➣ सातवाहन मूल रूप से दक्कनी कबीलाई के ब्राह्मण जाति के लोग थे।

    ➣ उनके सबसे प्रसिद्ध राजा गौतमीपुत्र सतकर्णी ने अव्यवस्थित हो गई चातुर्वर्ण (चार वर्णों वाली) व्यवस्था को पुनः स्थापित कर विभिन्न सामाजिक वर्गों के सम्मिश्रण को भी रोका।

    ➣ सातवाहन, ब्राह्मणों को भूमि अनुदान देने वाले पहले शासक थे, हालाँकि बौद्ध भिक्षुओं के लिए भी ऐसे अनुदानों के उदाहरण मिलते हैं।

    ➣ इस काल में शिल्प और वाणिज्य के बढ़ने से कई व्यापारी और कारीगर अस्तित्व में आए। उन्होंने छोटे-छोटे स्मारक बनवाए।

    ➣ कारीगरों के बीच, गन्धिकाओं या इत्र निर्माताओं का दाताओं के रूप में बार-बार उल्लेख मिलता है। आधुनिक कुलनाम गाँधी इसी प्राचीन शब्द से लिया गया है।

    पारवारिक संरचना

    ➣ उत्तर भारतीय राजा समान्यत: पितृसत्तात्मक समाज से सम्बन्धित थे। जबकि सातवाहनों में मातृवंशीय सामाजिक संरचना के संकेत मिलते हैं।

    ➣ लेकिन उत्तराधिकार पिता से पुत्र को ही प्राप्त होता था। इस काल की दो रानियों नागानिका (शातकर्णी प्रथम की रानी) तथा गौतमी बलश्री ने प्रशासन में सक्रिय रूप से भाग लिया।

    माँ के नाम पर राजा के नामकरण की प्रथा थी। गौतमीपुत्र और वशिष्ठिपुत्र जैसे नामों से स्पष्ट है कि उनके समाज में माँ की अधिक महत्ता थी। कभी-कभी राजा और उसकी माँ दोनों के नाम पर अभिलेख जारी किए जाते थे।

    ➣ गौतमी पुत्र शातकर्णी को आगमन निलय (वेदों का आश्रय) और अद्वितीय ब्राह्मण कहा गया है। उसने छिन्न-भिन्न होती वर्णव्यवस्था को फिर से स्थापित किया।

    प्रशासन

    ➣ सातवाहनों ने अशोक कालीन कई प्रशासनिक इकाइयों को यथावत बनाए रखा। उनके जिलों को भी आहार कहा जाता था, जैसा कि अशोक के समय में था।

    ➣ मौर्य काल की तरह ही उनके अधिकारी अमात्य और महामात्य कहलाते थे। सेनापति की नियुक्ति प्रान्त के राज्यपाल या शासनाध्यक्ष के रूप में होती थी।

    ➣ हालांकि उनके प्रशासनिक विभागों को राष्ट्र और उनके उच्च अधिकारियों को महाराष्ट्रिक कहा जाता था।

    ➣ ग्रामीण इलाकों में प्रशासन का काम-काज, गौल्मिका को सौंपा जाता था। गौल्मिका सेना की एक टुकड़ी का प्रधान होता था, जिसमें नौ रथ, नौ हाथी, पच्चीस घोडे और पैंतालिस पैदल सैनिक होते थे।

    कटक और स्कन्दवर सैन्य शिविर एवं बस्तियाँ होते थे। जो राजा के आने पर प्रशासनिक केन्द्रों के रूप में कार्य करती थीं।

    ➣ गाँव का प्रशासक गौल्मिक (गौलिक) कहलाता था। गौल्मिक सैनिक टुकड़ी का प्रधान होता था। हालिक भी ग्राम प्रशासन के अधिकारी थे। इस समय सामन्तों की तीन श्रेणियां थी-

    • राजा (सिक्का ढालने का अधिकार)
    • महाभोज
    • सेनापति

    ब्राह्मणों और बौद्ध भिक्षुओं को कर-मुक्त गाव प्रदान करने की प्रथा सातवाहनों ने ही शुरू की थी।

    ➣ ब्राह्मणों को भूमिदान देने की प्रथा को सातवाहनों ने प्रारम्भ किया। हालांकि उन्होंने अधिकतर भूमिदान बौद्ध भिक्षुओं को दिया।

    ➣ इस भूमिदान की प्रथा ने प्रशासनिक विकेन्द्रीकरण एवं सामन्तवाद को जन्म दिया, क्योंकि गुप्त एवं गुप्तोत्तर काल में प्रशासनिक अधिकारियों को भी वेतन के बदले कर मुक्त भूमिदान दी जाने लगी।

    गौतमी पुत्र शातकर्णी का नासिक लेख प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य है, जिसमें भूमिदान के साथ शुल्क मुक्ति एवं अन्य विशेषाधिकारों की चर्चा की गई है।

    ➣ इस काल में कृषि की उन्नति के साथ व्यापार वाणिज्य की भी प्रगति हुई। राजा कृषकों के उपज का छठा भाग कर के रूप में प्राप्त करता था।

    मिलिदफ्हो एवं महावस्तु से व्यवसायों एवं शिल्पियों की विभिन्न श्रेणियों का पता चलता है जिसके प्रधान को श्रेष्ठन कहा जाता था।

    सातवाहन कालीन सिक्के

    ➣ सातवाहनों ने कुषाणों की भांति सोने के सिक्के नहीं चलाए। सोने का प्रयोग बहुमूल्य धातु के रूप में किया जाता था। उनके अधिकांश सिक्के शीशे के हैं।

    सर्वप्रथम सीसे की मुद्रा सातवाहनों ने ही चलाई थी।

    ➣ सातवाहनों की मुद्राओं पर राजशिर, पांच पत्तियों वाला चैत्य वृक्ष, स्वास्तिक का अंकन है। जहाज का अंकन वाले सिक्के सीसे के थे।

    शातकर्णी प्रथम ने सर्वप्रथम राजा के नाम से सिक्के जारी किए।

    कार्षापण (काहापन) नामक सिक्के का प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य नागनिका का नानाघाट अभिलेख है।

    ➣ भारी मात्रा में मिले सातवाहन एवं रोमन सिक्कों से बढ़ते हुए व्यापार की ओर संकेत मिलता है। सातवाहनों ने पोटीन, ताँबे व काँसे की मुद्रा भी चलाई।

    व्यापार

    ➣ यहाँ कपास का भारी मात्रा में उत्पादन होता था। भड़ौंच इस समय का प्रमुख बन्दरगाह व व्यापारिक केन्द्र था।

    ➣ इस काल में आतंरिक एवं बाहय दोनों ही व्यापार होते थे। पश्चिमी देशों के साथ-ही-साथ श्रीलंका, जावा, सुमात्रा आदि के साथ जल मार्ग से व्यापार होता था।

    ➣ सातवाहन काल में व्यापार व्यवसाय में चाँदी एवं ताँबे के सिक्कों का प्रयोग होता था। जिसे कार्षापण कहा जाता था।

    ➣ शिल्पियों में गान्धिको का नाम दाता के रूप में बारम्बार उल्लिखित है। गान्धिक वे शिल्पी कहलाते थे, जो इत्र आदि बनाते थे।

    ➣ शिल्प एवं वाणिज्य में हुई उन्नति के फलस्वरूप इस काल में अनेक वणिक और शिल्पी चमक उठे। शिल्पी और वणिक दोनों ने बौद्ध धर्म के निमित्त उदारतापूर्ण दान दिये।

    ➣ सातवाहन काल में पश्चिमी व दक्षिण भारत में तगर (तेर), पैठान, धान्य कटक, अमरावती, नागार्जुनकोंडा, भड़ौच, सोपारा, अरिकमेडु, कावेरीपट्टनम आदि समृद्ध नगर थे।

    महारठी तथा महाभोज बड़े सामन्त होते थे, जिन्हें अपने क्षेत्र में सिक्के उत्कीर्ण कराने का अधिकार था।

    ➣ पुलुमावी के कार्ले लेख में कारूकर शब्द कारीगरों के लिए आया है।

    ➣ व्यापारियों एवं शिल्पियों में महायान बौद्ध धर्म प्रचलित था। बाकी समाज वैष्णव एवं शैव धर्म की प्रधानता थी।

    सातवाहन साम्राज्य का राज-धर्म

    ➣ राजपरिवार की महिलाएँ बौद्ध धर्म को प्रश्रय देती थी, जबकि पुरुष वैदिक धर्म को।

    ➣ हाल की गाथासप्तशती के प्रारंभ में ही शिव की पूजा की गई है तथा इंद्र, कृष्ण, पशुपति एवं गौरी की पूजा का भी इसमें उल्लेख मिलता है।

    ➣ सातवाहन काल में राजा स्वयं के साथ देवताओं का तादात्म्य स्थापित करने लगे, जैसे- गौतमी पुत्र शातकर्णी ने स्वयं को कृष्ण, बलराम और संकर्षण का रूप स्वीकार किया था।

    ➣ फिर भी सातवाहन शासकों ने भिक्षुओं को भूमिदान कर बौद्ध धर्म को बढ़ावा दिया। उनके राज्य में, बौद्ध धर्म के महायान सम्प्रदाय का प्रभाव था।

    ➣ आन्ध्र प्रदेश में नागार्जुनकोण्डा और अमरावती नगर बौद्ध संस्कृति के मुख्य केन्द्र बन गए।

    भाषा

    ➣ सातवाहनों की राजकीय भाषा प्राकृत और लिपि ब्राह्मी थी। उनके सारे अभिलेख इसी भाषा और लिपि में लिखे गए हैं।

    ➣ प्राकृत ग्रन्थ गाथासत्तसई या गाथासप्तसती हल नामक सातवाहन राजा द्वारा लिखा गया। इसमें 700 छन्द शामिल थे, सभी प्राकृत में लिखे गए।

    वास्तुकला

    ➣ सातवाहनों की महत्त्वपूर्ण स्थापत्य कला है कार्ले का चैत्य एवं अमरावंती स्तूप कला का विकास।

    ➣ सातवाहन काल में, पश्चिमोत्तर दक्कन या महाराष्ट्र में ठोस चट्टानों को काट कर कई पवित्र स्थलों और मठों (विहार) का निर्माण हुआ है।

    ➣ सबसे प्रसिद्ध चैत्य पश्चिमी दक्कन में कार्ले का है। लगभग 40 मीटर लंबाई, 15 मीटर चौड़ाई और 15 मीटर ऊंचाई वाला, यह चैत्य विशाल चट्टान वास्तुकला का सबसे प्रभावशाली नमूना है।

    ➣ बरसात के मौसम में भिक्षुओं के निवास हेतु, चैत्यों के निकट ही खुदाई कर मठ बनाए जाते थे।

    नासिक में तीन विहार पाए गए हैं। यहाँ नहपन और गौतमीपुत्र के अभिलेख मिलते हैं, जो पहली-दूसरी शताब्दी के हैं।

    ➣ आन्ध्र के कृष्णा-गोदावरी क्षेत्र में चट्टान काटकर बनाई गई (शिलाखण्डीय) वास्तुकलाएँ भी पाई गई हैं, किन्तु यह क्षेत्र वस्तुत: स्वतन्त्र बौद्ध संरचनाओं, ज्यादातर स्तूपों के लिए प्रसिद्ध है।

    ➣ इनमें सबसे अधिक प्रसिद्ध अमरावती और नागार्जुनकोण्डा के स्तूप हैं। अमरावती स्तूप की शुरुआत ई.पू. 200 के आस-पास हुई, लेकिन दूसरी शताब्दी के उत्तरार्ध में इसका निर्माण पूर्ण हुआ।

    ➣ सातवाहनों के उत्तराधिकारियों, अर्थात् ईक्ष्वाकुओं के संरक्षण में दूसरी-तीसरी शताब्दी में नागार्जुनकोण्डा सबसे अधिक समृद्ध हुआ।

    अमरावती मूर्तिकला: बौद्ध शिल्पकला का उत्कर्ष

    ➣ अमरावती मूर्तिकला एक प्राचीन मूर्तिकला शैली है, जो दक्षिण-पूर्वी भारत में लगभग दूसरी शताब्दी ई.पू.- तीसरी शताब्दी ई. पू. तक सातवाहन वंश के शासनकाल में फलो-फूली।

    ➣ अमरावती स्तूप का निर्माण 200 ई.पू. में आरम्भ हुआ। इसका पता सर्वप्रथम ‘मैकेन्जी’ ने 1797 ई. में लगाया। यह स्तूप भित्ति-प्रतिमाओ से भरा हुआ है। जो विश्व में कथात्मक मूर्तिकला का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।

    ➣ इस मूर्तिकला का विकास अमरावती में होने के कारण इसे अमरावती मूर्तिकला शैली कहा गया।

    ➣ अमरावती दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले के पास स्थित है। अमरावती मूर्तिकला स्वदेशी शैली से विकसित हुई है।

    ➣ इस पर बाह्य संस्कृतियों का प्रभाव नहीं है। यह मूर्तिकला आंध्र प्रदेश के जग्गबयापेट, नागार्जुनकोंडा तथा महाराष्ट्र में तेर के स्तूप के अवशेषों में देखी जा सकती है।

    ➣ अमरावती मूर्तिकला में ज्यादातर बुद्ध के जीवन की घटनाओं, पूर्वजन्म की कथाओं (जातक कथाओं) का चित्रण है। हाव-भाव तथा सौंदर्य की दृष्टि से इस शैली की मूर्तियां सभी मूर्तियों में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती हैं।

    ➣ अमरावती में चित्रांकन की दो विधियां हैं और ये दोनों एक ही फलक पर साथ-साथ दिखाई देती हैं। पहली विधि – मूर्त रूप, जिसमें बैठे या खड़े हुए बुद्ध की प्रतिमा दिखाई गयी है। दूसरी विधि-अमूर्त या प्रतीकात्मक रूप है, जिसमें बुद्ध की उपस्थिति का प्रतीक खाली सिंहासन है।

    अमरावती स्तूप: सातवाहन काल का बौद्ध स्मारक

    ➣ अमरावती स्तूप का निर्माण लगभग 200 ई.पू. में प्रारंभ किया गया था, जिसमें कई बार नवीनीकरण तथा विस्तार किया गया।

    अमरावती स्तूप सर्वाधिक प्रसिद्ध था, जिसकी वेदिका तथा गुम्बद दोनों ही संगमरमर के बने हुए थे। इसके चारों ओर बुद्ध की प्रतिमाएं बनाई गयी थीं।

    ➣ अमरावती के विशाल स्तूप में बुद्ध के जीवन की घटनाओं का चित्रण चूना-पत्थर किया गया है।

    ➣ यह स्तूप बौद्ध काल में बनाए गये विशाल आकार के स्तूपों में से एक था। इसका व्यास लगभग 50 मीटर तथा ऊंचाई 30 मीटर थी, जो अब अधिकांशतः नष्ट हो चुकी है।

    ➣ इसके कई पत्थर 19वीं सदी में स्थानीय ठेकेदारों द्वारा चूना बनाने के काम में ले लिए गये। बचे हुए अनेक कथात्मक उभरे चित्र फलक तथा सजावटी फलक अब चेन्नई के राजकीय संग्रहालय और लन्दन के ब्रिटिश म्यूजियम में हैं।

    ➣ लंदन में रखे एक चारदीवारी के पत्थर पर बनी इस स्मारक की एक प्रतिकृति में इसके दूसरी सदी के स्वरूप की झलक मिलती है।

    ➣ इसमें एक अर्द्धवृत्ताकार नीचा स्तूप प्रदर्शित है, जो चारों ओर से सूक्ष्म नक्काशीदार रेलिंग से घिरा हुआ है।

  • शुंग, कण्व एवं सातवाहन राजवंश | One-Liner Practice

    ❑ मौर्य वंश के बाद शुंग वंश ने राज्य स्थापित किया।

    ❑ पुष्यमित्र शुंग मौर्यों का सेनापति था। मौर्य वंश के अंतिम शासक वृहद्रथ की हत्या करके पुष्यमित्र शुंग राजा बना।

    ❑ शुंग वंश का संस्थापक पुष्यमित्र शुंग (184 ई.पू. में) था।

    ❑ पुष्यमित्र शुंग ब्राह्मण धर्म का उपासक एवं संरक्षक था। इसी ने अशोक द्वारा निर्मित 84 हजार बौद्ध स्तूपों को नष्ट किया था।

    ❑ पुष्यमित्र शुंग के दो बार अश्वमेध यज्ञ करने की पुष्टि पतंजलि के महाभाष्य से होती है।

    ❑ इण्डो यूनानी शासक मिनाण्डर ने पुष्यमित्र शुंग को हराया था।

    ❑ शुंग वंश का चौथा प्रतापी राजा वसुमित्र (यवनों को हराया था) था।

    ❑ शुंग शासकों की राजधानी विदिशा थी।

    ❑ शुंगकाल में संस्कृत भाषा एवं ब्राह्मण व्यवस्था का पुनरुत्थान हुआ। इसी काल में पहला स्मृति ग्रंथ मनुस्मृति की रचना की गई।

    ❑ कालिदास के मालविकाग्निमित्र नाटक का नायक अग्निमित्र था।

    ❑ पुष्यमित्र शुंग को कलिंग नरेश खारवेल ने पराजित किया था।

    ❑ पाणिनि की अष्टाध्यायी पर पतंजलि ने महाभाष्य लिखा।

    ❑ भरहुत एवं साँची के स्तूपों का पुनर्निर्माण शुंगकाल में हुआ था।

    ❑ शुंग वंश के अंतिम शासक देवभूति को उसके अमात्य (प्रधानमंत्री) वासुदेव ने 73 ई. पू. में हत्या करके कण्व वंश की स्थापना की।

    ❑ सुशर्मा कण्व वंश का अंतिम शासक था जिनकी हत्या सातवाहन नरेश सिमुक नै कर दी।

    ❑ सातवाहन वंश की स्थापना सिमुक ने (30 ई.पू. में) की थी।

    ❑ शातकर्णि प्रथम के बारे में नागनिका के नानाघाट अभिलेख से जानकारी मिलती है।

    ❑ शातकर्णि प्रथम ने अपनी राजधानी प्रतिष्ठान को बनाया।

    ❑ गाथा सप्तशती की रचना सातवाहन नरेश हाल ने (हाल कवि एवं साहित्यकार भी था) की। यह प्राकृत भाषा का ग्रन्थ है।

    ❑ सातवाहन वंश का महानतम शासक गौतमी पुत्र शातकर्णि था।

    ❑ गौतमी पुत्र ने वेणकटक स्वामी की उपाधि धारण की थी।

    ❑ शून्यवाद के संस्थापक नागार्जुन गौतमी पुत्र शातकर्णि के समकालीन थे।

    ❑ शक महाक्षत्रप रुद्रदामन की पुत्री का विवाह – वाशिष्ठी पुत्र पुलुमावी से हुआ था।

    ❑ पुलुमावी ने दक्षिणापथेश्वर की उपाधि धारण की थी।

    ❑ सातवाहनों ने अधिकांशतः सीसे के सिक्के चलाये।

    ❑ सातवाहन सीसे का आयात रोम से करते थे।

    ❑ सातवाहन काल में चाँदी एवं ताँबे के सिक्कों का प्रयोग होता था जिसे कार्षापण कहा जाता था।

    ❑ ब्राह्मणों को सर्वप्रथम भूमिदान एवं जागीर देने की प्रथा का आरम्भ सातवाहनों ने किया।

    ❑ सातवाहनों की राजकीय भाषा प्राकत थी जो कि ब्राह्मी लिपि में थी।

    ❑ अजंता एवं एलोरा की गुफाओं का निर्माण, अमरावती एवं नागार्जुनकोंडा के स्तूपों का निर्माण तथा कार्ले के चैत्य का निर्माण सातवाहनों ने कराया।

    ❑ यज्ञ श्री शातकर्णि के सिक्कों पर जलपोत के चिह्न मिलते हैं।

    ❑ गौतमी पुत्र शातकर्णि ने वेणकटक नामक नगर की स्थापना की।

    ❑ शातकर्णि प्रथम को पुराणों में कृष्ण का पुत्र कहा गया है।

    ❑ सर्वमान्य तौर पर सातवाहनों का मूल स्थान महाराष्ट्र के प्रतिष्ठान को माना जाता है।

    ❑ सातवाहन वंश के शासकों को दक्षिणाधिपति तथा इनके द्वारा शासित प्रदेश को दक्षिणापथ कहा जाता है।

    ❑ सातवाहनों में मातृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था थी।

    ❑ वृहतकथा की रचना गुणाढ्य ने की थी।

  • मौर्योत्तर कालीन विदेशी आक्रमण | One-Liner Practice

    ❑ बैक्ट्रियाई शासकों का इतिहास उनके सिक्कों के आधार पर लिखा गया है।

    ❑ बैक्ट्रियाई या यूनानी वंश की दो शाखायें थीं- (1) यूथेडेमस वंश (2) यूक्रेटाइड्स वंश।

    ❑ यूथेडेमस वंश की राजधानी स्यालकोट या साकल थी।

    ❑ यूक्रेटाइड्स वंश की राजधानी तक्षशिला थी।

    ❑ भारत के भीतरी भाग में प्रवेश करने वाला पहला यूनानी शासक डेमेट्रियस था।

    ❑ डेमेट्रियस ने अपने पिता की स्मृति में यूथीडेमिया नामक नगर बसाया।

    ❑ मिलिन्द अथवा मिनाण्डर की बौद्धमत के प्रति बहुत श्रद्धा थी।

    ❑ मिलिन्दपंन्हो नामक ग्रन्थ में मिनाण्डर एवं बौद्ध भिक्षु नागसेन के बीचसंवाद का संकलन है।

    ❑ युक्रेटाइडिस को यूनानी स्रोतों में एशिया का संरक्षक कहा गया है।

    ❑ भारत में सबसे पहले सोने के सिक्के यूनानियों ने जारी किये थे।

    ❑ सिक्कों पर राजाओं के चित्र एवं तिथि लेखन की परिपाटी यूनानियों ने ही बाद में गांधार शैली का रूप लिया।

    ❑ यूनानियों ने ही भारतीयों को हेलनेस्टिक कला से परिचित कराया, जिसने भारत में पहला पार्थियन या पहलव शासक माउस (90 ई. पू.-70 ई. पू.) था।

    ❑ पहलवों का मूल स्थान ईरान में था।

    ❑ गोन्डोफर्निस पहलव वंश का सबसे शक्तिशाली शासक था। इसके शासनकाल का एक अभिलेख तख्तेबही पेशावर से प्राप्त हुआ है।

    ❑ गोन्डोफर्निस के समय ही इसाई धर्म प्रचारक सेन्ट थॉमस भारत आया था।

    ❑ पहलवों के सिक्कों का भण्डार तक्षशिला में सिरकप के पास खुदाई मिला है।

    ❑ भारत में यूनानियों के बाद शक आये थे।

    ❑ शक मूलतः मध्य एशिया के निवासी थे।

    ❑ शक चारागाह की खोज में भारत आए थे।

    ❑ भारत के शक राजा अपने आप को क्षत्रप कहते थे।

    ❑ भारत में शकों की दो शाखायें थी, जो पश्चिमी भारत में केन्द्रित थी-(1) क्षहरात (2) कार्द्धमक

    ❑ क्षहरात शक महाराष्ट्र के नासिक में केन्द्रित थे।

    ❑ कार्द्धमक सौराष्ट्र-क्षेत्र के उज्जैन में केन्द्रित थे।

    ❑ क्षहरात वंश का पहला शासक माउस या मोग था।

    ❑ नहपान ने क्षत्रप और महाक्षत्रप दोनों ही उपाधियाँ धारण की थी। नहपान ने महाराष्ट्र का एक बड़ा भाग सातवाहनों से छीना था।

    ❑ प्रसिद्ध व्यापारिक केन्द्र भड़ौच पर क्षहरातों का कब्जा था।

    ❑ कार्द्धमक शक शाखा का संस्थापक यशोमितिक था।

    ❑ कार्द्धमक शाखा का सबसे प्रसिद्ध शासक रुद्रदामन (130-150 ई०) था। साथ ही शकों का सबसे प्रतापी राजा भी हुआ।

    ❑ रुद्रदामन के सम्बन्ध में जानकारी उसके गिरनार (जूनागढ़) अभिलेख से मिलती है।

    ❑ जूनागढ़ अभिलेख संस्कृत भाषा में लिखा पहला बड़ा शिलालेख है।

    ❑ काठियावाड़ के सुदर्शन झील का जीर्णोद्धार रुद्रदामन I द्वारा कराया गया।

    ❑ शुदर्शन झील का निर्माण किया गया था-मौर्यो द्वारा।

    ❑ कार्द्धमक वंश का अंतिम् शासक रुद्र सिंह द्वितीय था।

    ❑ उज्जैन के एक स्थानीय राजा ने शकों को 58 ई.पू. पराजित कर विक्रमादित्य की उपाधि धारण की।

    ❑ शकों पर विजय के उपलक्ष्य में शुरू किया गया शवत-विक्रम संवत (58 ई.पू.)।

    ❑ गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त II सबसे अधिक विख्यात विक्रमादित्य था।

    ❑ भारत में कुषाण वंश की स्थापना कुजुल कडफिसेस ने 15 ई० में की।

    ❑ चीनी स्रोतों के अनुसार कुषाण चीन के पश्चिमोत्तर क्षेत्र के यू-ची कबीले के थे।

    ❑ कुजुल कडफिसेस ने काबुल और कश्मीर में हरमोयर्स को हराकर अपना राज्य स्थापित किया।

    ❑ कुजुल कडफिसेस ने केवल ताँबे के सिक्के चलवाये।

    ❑ कुजुल कडफिसेस के बाद विम कडफिसेस (65 ई. में) राजा बना।

    ❑ विम कडफिसेस ने सोने एवं ताँबे के सिक्के जारी किये।

    ❑ यद्यपि उसके ताम्र तथा रजत (चाँदी) के सिक्के भी मिले हैं तथापि स्वर्ण सिक्के की संख्या अधिक है।

    ❑ भारत में सर्वप्रथम यूनानियों ने ही सोने के सिक्के किए, जिनकी मात्रा कुषाणों के शासन काल में बढ़ी।

    ❑ कुषाण शासकों ने स्वर्ण एवं ताँबा दोनों ही प्रकार के सिक्कों को प्रचलित किया था।

    ❑ विम कडफिसेस ने महाराज, राजाधिराज, महेश्वर एवं सर्वलोकेश्वर की उपाधि धारण की।

    ❑ विम कडफिसेस के सिक्कों पर शिव, नन्दी एवं त्रिशूल की आकृति खुदी थी।

    ❑ विम कडफिसेस शैव धर्म को मानता था।

    ❑ कुषाण वंश का सबसे प्रतापी शासक कनिष्क था।

    ❑ कनिष्क 78 ई. में राजा बना तथा कनिष्क ने 78 ई. में शक संवत् शुरू किया था। यही आजकल भारत का राष्ट्रीय पंचांग है।

    ❑ कनिष्क की राजधानी पुरुषपुर (पेशावर) थी।

    ❑ कनिष्क की द्वितीय राजधानी मथुरा में थी।

    ❑ कनिष्क ने पाटलिपुत्र के शासक को हराकर, वहाँ से विद्वान अश्वघोष, बुद्ध का भिक्षापात्र एवं एक अनोखा मुर्गा साथ लाया।

    ❑ कनिष्क ने कश्मीर विजय के बाद वहाँ कनिष्कपुर नगर बसाया।

    ❑ कनिष्क की सबसे महत्वपूर्ण विजय चीन के यारकंद, खोतान तथा काशगर की विजय थी।

    ❑ कुषाण राजा देवपुत्र की उपाधि धारण की थी जिसे चीनियों से ली थी।

    ❑ कनिष्क बौद्ध धर्म की महायान शाखा का अनुयायी था।

    ❑ चौथी बौद्ध संगीति में बौद्ध धर्म हीनयान तथा महायान नामक शाखाओं में बँट गया।

    ❑ चौथी बौद्ध संगीति में विभाषाशास्त्र पुस्तक लिखी गई।

    ❑ कनिष्क के सिक्के यूनानी एवं ईरानी भाषा में थी।

    ❑ मथुरा से प्राप्त कनिष्क की मूर्ति सैनिक वेशभूषा में है।

    ❑ बुद्ध के अवशेषों पर कनिष्क ने पेशावर में एक स्तूप एवं मठ का निर्माण करवाया।

    ❑ कनिष्क के दरबार में महान दार्शनिक अश्वघोष रहता था।

    ❑ अश्वघोष कनिष्क के राजकवि थे।

    ❑ अश्वघोष ने बुद्धचरित् एवं सूत्रालंकार की रचना की।

    ❑ कुषाण शासक कनिष्क के समकालीन नागार्जुन, अश्वघोष एवं वसुमित्र थे।

    ❑ इस समय कला की दो शैलियाँ (1) मथुरा शैली तथा (2) गांधार शैली प्रसिद्ध थीं।

    ❑ गांधार शैली में निर्मित बुद्ध तथा बोधिसत्व मूर्तियाँ ही विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

    ❑ मथुरा शैली में अनेक स्तूपों, विहारों तथा मूर्तियों का निर्माण किया गया है।

    ❑ गांधार शैली को यूनानी-बौद्ध, इण्डो ग्रीक-रोमन कला भी कहा जाता है।

    ❑ प्रसिद्ध दार्शनिक एवं वैज्ञानिक तथा शून्यवाद का प्रतिपादक नागार्जुन कनिष्क के दरबार में रहता था।

    ❑ नागार्जुन ने माध्यमिक सूत्र ग्रंथ लिखा।

    ❑ विभाष की रचना वसुमित्र ने की।

    ❑ कनिष्क का दरबारी चिकित्सक चरक था।

    ❑ चरक ने चरक संहिता लिखी थी।

    ❑ बौद्ध धर्म का विश्वकोष विभाषाशास्त्र को कहा जाता है।

    ❑ कनिष्क का पुरोहित संघरक्ष था।

    ❑ कनिष्क को बौद्ध धर्म में अवश्घोष ने दीक्षित किया।

    ❑ भारत का आइन्सटीन नागार्जुन को कहा गया है।

    ❑ कुषाण वंश का अंतिम शासक वासुदेव था। वासुदेव शैव मतानुयायी था। मुद्राओं पर शिव तथा नन्दी की आकृतियाँ उत्कीर्ण मिलती हैं।

    ❑ सोने के सर्वाधिक सिक्के कुषाणों ने चलाये।

    ❑ कुषाण शासकों को देवपुत्र कहा जाता था।

    ❑ कुषाणों में मृत शासकों की मूर्तियों को मन्दिरों में रखा जाता था।

    ❑ सेना में घुड़सवारी की दक्षता, सैनिक वेशभूषा एवं व्यूह रचना के क्षेत्र में कुषाणों ने भारत को नई जानकारियां दी थी।

    ❑ मथुरा से कनिष्क की एक सिर रहित मूर्ति मिली है जिस पर महाराज राजाधिराजा देवपुत्रों कनिष्को अंकित है।

    ❑ चीन से व्यापार करने के लिये रोम को कुषाणों से मधुर संबंध बनाने पड़े।

    ❑ यह व्यापार महान रेशम मार्ग या सिल्क मार्ग से सम्पन्न होता था। इससे कुषाणों को बहुत अधिक आय होती थी।

    ❑ सर्वाधिक बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण गांधार कला के अन्तर्गत हुआ है।

    ❑ पतंजलि ने मथुरा से सटका नामक वस्त्र पाये जाने का उल्लेख किया है।

    ❑ भारत में इथोपिया से हाथी दाँत एवं सोना आता था।

    ❑ तक्षशिला विभिन्न दिशाओं से आने वाले माल के संग्रह स्थल के रूप में प्रसिद्ध था।

  • शुंग वंश (185–73 ई.पू.) एवं कण्व वंश (73–28 ई.पू.)

    📚 विषय सूची

    पुष्यमित्र शुंग ने जिस मगध को अंतिम मौर्य शासक की हत्या कर प्राप्त किया था अब वह पहले जैसा विशाल साम्राज्य नहीं रहा था। 200 ई.पू. में हुए विदेशी आक्रमण के कारण भारत की पश्चिमोत्तर सीमा पर हिन्द – यूनानी शासन करने लगे थे।

    ➣ कालांतर में कई विदेशी जैसे शक , पह्लव तथा कुषाण भी भारत में अपनी जड़ें ज़माने लग गयी थी। इनमे सबसे ज्यादा प्रभाव कुषाणों का रहा जिससे प्रसिद्ध विदेशी शासक कनिष्क हुआ।

    पुष्यमित्र शुंग185 – 149 ई.पू.
    अग्निमित्र149 – 141 ई.पू.
    वसुज्येष्ठ141 – 131 ई.पू.
    वसुमित्र131 – 124 ई.पू.
    अन्धक124 – 122 ई.पू.
    पुलिन्दक122 – 119 ई.पू.
    घोष शुंग
    वज्रमित्र
    भगभद्र
    देवभूति83 – 75 ई.पू.

    पुष्यमित्र शुंग (185 – 149 ई.पू.)

    बाणभट्ट के हर्षचरित से मौर्य सम्राट बृहदथ के सेनापति पुष्यमित्र शुंग द्वारा हत्या का उल्लेख मिलता है। बृहद्रथ को हर्षचरित में प्रज्ञा दुर्बल (दुर्बद्धि) कहा है।

    ➣ हरप्रसाद शास्त्री ने शुंगों को पारसीक/ईरानी बताया है। बाणभट्ट ने निम्न जाति एवं अनार्य बताया है। दिव्यावदान में शुंगों को मौर्य बताया गया है। वह पुष्यधर्म का पुत्र था।

    ➣ पुष्यमित्र ने सेनानी/सेनापति की उपाधि धारण की। घोसुण्डी अभिलेख में पुष्यमित्र को सर्वतात का संकर्षण की उपाधि दी गई है।

    धनदेव (अयोध्या का राज्यपाल) के अयोध्या अभिलेख के अनुसार उन्होंने दो अश्वमेध यज्ञ किए। प्रसिद्ध व्याकरणविद् पतंजलि (गोनर्द निवासी) उनके अश्वमेध यज्ञ के पुरोहित थे। महर्षि पाणिनि ने पुष्यमित्र शुंग को भारद्वाज गोत्र से सम्बंधित बताया था।

    काशीप्रसाद जायसवाल एवं स्मिथ खारवेल के हाथीगुम्फा में उल्लेखित बहसतिमित्र का समीकरण पुष्यमित्र से करते हैं, जिसको खारवेल ने 12वें वर्ष हराया था।

    ➣ पुष्यमित्र के राजा बन जाने पर मगध साम्राज्य को बहुत बल मिला था। जो राज्य मगध की अधीनता स्याग चुके थे पुष्यमित्र ने उन्हें फिर में अपने अधीन कर लिया था।

    ➣ पुष्यमित्र शुंग कट्टर ब्राह्मणवादी था। जिसने बौद्धधर्म के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए ब्राह्मण धर्म का पुनरुत्थान किया। अतः उसका काल वैदिक प्रतिक्रिया अथवा वैदिक पुनर्जागरण का काल भी कहा जाता है।

    ➣ बौद्ध ग्रंथों के अनुसार पुष्यमित्र बौद्ध धर्म का उत्पीड़क था। पुष्यमित्र ने बौद्ध विहारों को नष्ट किया तथा बौद्ध भिक्षुओं की हत्या की थी।

    जी. आर. शर्मा (गोवर्धन राय शर्मा) के अनुसार कौशाम्बी के घोषितराम विहार को पुष्यमित्र ने जला दिया और शाकल में घोषणा की, कि जो मुझे एक बौद्ध भिक्षु का सिर देगा, उसे मैं सौ दीनारें दूंगा।

    दिव्यावदान के अनुसार पुष्यमित्र ने सम्राट अशोक द्वारा निर्मित 84,000 बौद्ध स्तूपों को नष्ट करवा दिया। लेकिन भरहुत स्तूप बनाने का श्रेय पुष्यमित्र शुंग को ही दिया जाता है।

    विदर्भ (बरार) की विजय

    ➣ विदर्भ का शासक यज्ञसेन था। वह मौयों की तरफ से विदर्भ के शासक पद पर नियुक्त हुआ था, परंतु मगध साम्राज्य की दुर्बलता का लाभ उठाकर उसने स्वयं को विदर्भ का स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया।

    ➣ यज्ञसेन को शुंगों का प्रकृत्यामित्र (स्वाभाविक शत्रु) कहा गया है।

    ➣ पुष्यमित्र के पुत्र अग्निमित्र माधवसेन का पक्ष लेते हुए यज्ञसेन को हराया और वर्धा नदी को सीमा मानते हुए विदर्भ राज्य का बंटवारा माधवसेन एवं यज्ञसेन में कर दिया।

    कालिदास के प्रसिद्ध नाटक मालविकाग्निमित्रम् में यज्ञसेन की चचेरी बहन मालविका और अग्निमित्र के प्रेम की कथा के साथ-साथ विदर्भ विजय का वृत्तांत भी उल्लेखित है।

    ➣ मौर्य वंश के अंतिम दिनों में कलिंग देश (ओडिशा) भी स्वतंत्र हो गया था।

    ➣ कलिंग का राजा खारवेल था। हाथीगुम्फा अभिलेख से ज्ञात होता है कि खारवेल ने मगध पर आक्रमण कर पुष्यमित्र शुंग को पराजित किया था।

    यवनों का आक्रमण

    ➣ पुष्यमित्र शुंग के समय यवनों का आक्रमण हुआ। यवन आक्रमण का उल्लेख पतंजलि के महाभाष्य, गार्गी संहिता के युग पुराण खण्ड में तथा कालिदास के नाटक मालविकाग्निमित्र में मिलता है।

    गार्गी संहिता के युग पुराण में लिखा है कि यवन साकेत, पांचाल एवं मथुरा को जीतते हुए कुसुमध्वज (पाटलिपुत्र) तक पहुंच गए।’ पतंजलि लिखता है कि यवनों ने साकेत (अयोध्या), माध्यमिका (चित्तौड़) पर आक्रमण किया।

    डेमेट्रियस (दिमित्र) नामक यवन राजा पुष्यमित्र का समकालीन था। अधिकांश विद्वानों ने यवन आक्रमणकारी डिमेट्रियस प्रथम माना है। पुष्यमित्र के पौत्र वसुमित्र ने सिन्धु नदी के दाएं किनारे यवनों को हराया था।

    ➣ पुष्यमित्र के समय प्रथम यूनानी आक्रमण डेमेट्रियस के नेतृत्व में हुआ था जिसमे पुष्यमित्र ने यूनानी सेनापति मिनाण्डर को दो बार पराजित किया।

    ➣ शुंगवशीय शासकों के नामों में मिस्रईरान में प्रचलित मिस्र (सूर्य) की पूजा में सम्बन्ध था।

    भरहुत का स्तूप बनवाया तथा साँची के स्तूप के चारों ओर चहार दीवारी का निर्माण कराया।

    ➣ शुग काल में संस्कृत भाषा का पुनरूत्थान हुआ। जिसका श्रेय महर्षि पंतजलि को जाता है।

    ➣ पुष्यमित्र के समय रामायण, महाभारत व मनुस्मृति की रचना हुयी।

    अग्निमित्र (149 – 141ई.पू.),

    ➣ पुष्यमित्र की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अग्निमित्र साम्राज्य का उत्तराधिकारी हुआ।

    ➣ पुष्यमित्र के राजत्व काल में ही अग्निमित्र विदिशा का गोप्ता (उपरांजा) बनाया गया था।

    ➣ कालिदास के नाटक मालविकाग्निमित्र का नायक भी अग्निमित्र था। कालिदास द्वारा रचित मालविकाग्निमित्रम् नाटक में अग्निमित्र और मालविका की प्रेम कथा का वर्णन किया गया है।

    ➣ अग्निमित्र की सभा में भगवती कौशिकी नामक बौद्ध धर्मावलम्बी स्त्री रहती थी।

    ➣ अग्निमित्र के बाद पुराणों में क्रमश: सुज्येष्ठ/वसुज्येष्ठ (141 ई.पू. – 131 ई.पू.), वसुमित्र (131-ई.पू. – 124 ई.पू.), आन्ध्रक, पुलिन्दक, घोष, वज्रमित्र, भागभद्र, देवभूति नामक राजाओं का वर्णन मिलता है।

    भागभद्र के शासन काल के 14वें वर्ष में तक्षशिला के यवन शासक एण्टियालकीड्स के राजदूत हेलियोडोरस ने विदिशा में वासुदेव के सम्मान में गरूड़ स्तम्भ स्थापित किया।

    देवभूति इस वंश का अंतिम शासक था। हर्षचरित के अनुसार इसके मंत्री वसुदेव ने इसकी हत्या कर एक नए वंश (कण्व वंश) की स्थापना की।

    राजनैतिक एंव सांस्कृतिक विकास

    ➣ शुंग काल में विदिशा का राजनैतिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व सर्वाधिक हो गया था। शुंग काल में ही संस्कृत भाषा तथा हिंदू धर्म का पुनरुत्थान हुआ। इनके उत्थान में महर्षि पतंजलि का विशेष योगदान था।

    ➣ मथुरा के समीप मोरा नामक स्थान से प्राप्त प्रथम शताब्दी ईस्वी के लेख में तोस नामक विदेशी महिला द्वारा वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, साम्बअनिरूद्ध की मूर्तियों (पंचवृष्णि वीरों) की स्थापना का उल्लेख है। अतः शुंग काल भागवत धर्म के विकास के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है।

    मनुस्मृति: वैदिक काल का प्रमुख धर्मग्रंथ

    मनुस्मृति (मानव धर्मशास्त्र) प्राचीन भारत का एक अत्यंत महत्वपूर्ण धर्मशास्त्र ग्रंथ है, जिसे समाज, कानून, नैतिकता और कर्तव्यों का संकलन माना जाता है।

    ❑ इस ग्रंथ में समाज को चार वर्णों में विभाजित किया गया है- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य,शूद्र। हर वर्ण के लिए अलग-अलग कर्तव्य और जिम्मेदारियाँ बताई गई हैं।

    ❑ मनुस्मृति के वर्तमान स्वरूप की रचना इसी युग में हुई है। मनुस्मृति के अनुसार ब्राह्मण को छोड़कर ‘राजा सबका शासक है। मनु भृगुवंश के थे।

    ❑ मनुस्मृति का अंग्रेजी अनुवाद N.B. हेलहेक ने A code of Zentoo Law के नाम से किया।

    अधिकारियों को भूमिदान के माध्यम से भुगतान को मान्यता देने वाली प्रथम कृति मनुस्मृति है।

    ❑ मनु ने विवाह को आजीवन चलने वाली संस्था कहा। मनु ने तलाक एवं पुनर्विवाह को मान्यता नहीं दी एवं मनु विधवाओं के मुण्डन का प्रावधान करते हैं।

    स्तूप

    ➣ मौर्य काल में स्तूप कच्ची ईटों और मिट्टी की सहायता से बनते थे, परंतु शुंग काल में उनके निर्माण में पाषाण का प्रयोग किया गया है।

    साँची के स्तूप को पाषाण द्वारा संवर्धित कर उसका आकार बढ़ाया गया। भरहुतबौधगया के स्तूपोंतोरण द्वारों का निर्माण शुंग काल में हुआ।

    कनिंघम महोदय ने 1873 ई. में भरहुत स्तूप का पता लगाया। उसकी वेष्टनी और तोरणद्वार अधिकांशतः शुंग कालीन थे।

    भरहूत स्तूप के पूर्वी तोरण द्वार पर शुंग शासक धनभूति का उल्लेख है। इन तोरण द्वारों पर जातक कथाओं का अंकन, लोक धर्म से संबंधित चित्र तथा गौतम बुद्ध से संबंधित चित्र प्राप्त होते हैं, किन्तु शुंग काल में बुद्ध का मनुष्य रूप में अंकन शुरू नहीं हुआ था।

    ➣ शुंग काल में बुद्ध का अंकन, स्तूप, धर्मचक्र, छत्र, बोधिवृक्ष, चरण चिह्न आदि माध्यम से किया गया।

    • विदिशा का गरुणध्वज
    • भाजा का चैत्य एवं विहार
    • अजन्ता का नवाँ चैत्य मन्दिर
    • नासिक तथा कार्ले के चैत्य
    • मथुरा की अनेक यज्ञ-यक्षणियों की मूर्तियाँ

    ➣ शुंग वंश के इतिहास के बारे में जानकारी साहित्यिक एवं पुरातात्त्विक दोनों साक्ष्यों से प्राप्त होती है-

    पुराण (वायु और मत्स्य पुराण) इससे पता वंश का संस्थापक पुष्यमित्र शुंग था।
    हर्षचरित इसकी रचना बाणभट्ट ने की थी।इससे पता चलता है कि पुष्यमित्र ने अंतिम मौर्य नरेश बृहदृथ की हत्या कर सिंहासन पर अधिकार कर लिया था।
    पतंजलि का महाभाष्य पतंजलि पुष्यमित्र के पुरोहित थे। इस ग्रंथ में यवनों के आक्रमण की चर्चा है।
    गार्गी संहिता इसमें भी यवन आक्रमण का उल्लेख है। यह एक ज्योतिष ग्रंथ है।
    अयोध्या अभिलेख इस अभिलेख को पुष्यमित्र शुंग के उत्तराधिकारी धनदेव ने लिखवाया था। इसमें पुष्यमित्र शुंग द्वारा कराए गए दो अश्वमेध यज्ञ की चर्चा है।
    मालविकाग्निमित्रम् यह कालिदास का नाटक है, जिससे शुंगकालीन राजनीतिक गतिविधियों का ज्ञान प्राप्त होता है।
    दिव्यावदान इसमें पुष्यमित्र शुंग को अशोक के 84,000 स्तूपों को तोड़ने वाला बताया गया है।
    बेसनगर का अभिलेख यह यवन राजदूत हेलियोडोरस का है जो गरुड़ स्तंभ के ऊपर खुदा है। इससे भागवत धर्म की लोकप्रियता का पता चलता है।
    भरहुत का लेख इससे भी शुंग काल के बारे में जानकारी प्राप्त होती है।

    ➣ उपर्युक्त साक्ष्यों के अतिरिक्त साँची, बेसनगर, बोधगया आदि स्थानों से प्राप्त स्तूप एवं स्मारक शुंगकालीन कला एवं स्थापत्य की विशिष्टता का ज्ञान कराते हैं।

    ➣ शुंग काल की कुछ मुद्राएँ कौशांबी, अहिच्छत्र, अयोध्या तथा मथुरा से प्राप्त हुई हैं, जिनसे तत्कालीन ऐतिहासिक जानकारी प्राप्त होती है।

    कण्व-वंश ( लगभग 73-38 ई. पू.)

    ➣ शुंग वंश के अन्तिम सम्राट देवभूति की हत्या करके उसके सचिव वासुदेव ने 75 ई.पू. में कण्व वंश की नींव रखी। इस घटना का वर्णन हर्षचरित में मिलता है।

    ➣ शुंगों के समान यह भी एक ब्राह्मण वंश था। वैदिक धर्म एवं संस्कृति संरक्षण को जो परंपरा शुंगों ने प्रारंभ की थी, उसे कण्व वंश ने जारी रखा।

    ➣ वसुदेव के शासन काल में भारत की पश्चिमोत्तर सीमा में शक का आक्रमण हुआ था। जिनके कारण न केवल मगध साम्राज्य के सुदूरवर्ती जनपद ही साम्राज्य से निकल गये थे, बल्कि मगध के समीपवर्ती प्रदेशों में भी असमाजिकता फ़ैल गयी।

    ➣ वासुदेव ने कुल नौ वर्ष तक राज्य किया था। तदोपरान्त तीन राजा हुए- यथा- भूमिपुत्र, नारायण तथा सुशर्मा जिन्होंने क्रमश चौदह, बारह तथा दस वर्षों तक राज्य किया।

    सुशर्मा इस वंश का अन्तिम शासक था। वायु पुराण के अनुसार वह अपने आन्ध्रजातीय भृत्य सिमुक (सिन्धुक) द्वारा मार डाला गाया।जिसने कालांतर में सातवाहन वंश (30 ई.पू. से 250 ई.) वंश की नींव रखी।

  • मौर्योत्तर काल में सामाजिक एवं राजनीतिक परिवर्तन

    📚 विषय सूची

    मौर्योत्तरकालीन प्रशासन

    ➣ मौर्योत्तर काल में विकेन्द्रीकरण की प्रवृत्तियों पर नियंत्रण रखने के लिए राजतन्त्र में दैवी तत्वों को समाविष्ट करने की प्रवृत्ति अपनाई गई। गौतमीपुत्र शातकर्णी की तुलना कई देवताओं से की गई।

    ➣ चीनी शासकों के अनुरूप कुषाण राजाओं ने देवपुत्र जैसी उपाधियाँ धारण कीं। मूर्तिपूजा का आरंभ कुषाण काल से ही माना जाता है।

    ➣ सम्भवतः रोम का उदाहरण लेकर कुषाण शासकों ने मृत राजाओं की मूर्तियाँ स्थापित करने के लिए मंदिर बनवाने की प्रथा (देवकुल) भी प्रारम्भ की।

    ➣ कुषाणों ने राज्य शासन में क्षेत्रप-प्रणाली चलाई। शकों एवं पार्थियन ने दो आनुवंशिक राजाओं के संयुक्त शासन की परिपाटी चलाई।

    ➣ शक-कुषाण काल से प्रशासन में सामन्तीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई। सर्वप्रथम अश्वघोष (प्रथम शताब्दी ई.) ने बुद्धचरित में सामन्त शब्द का प्रयोग जागीरदार (अधीनस्थ शासक) के लिए किया है।

    ➣ सातवाहन शासकों ने ब्राह्मणों एवं बौद्ध भिक्षुओं को पहली शताब्दी ई.पू. में कर-मुक्त भूमि प्रदान करने की प्रथा प्रारंभ की।

    नानाघाट अभिलेख में भूमिदान का प्रथम अभिलेखीय प्रमाण मिलता है।

    ➣ आरम्भ में ये दान केवल कर-मुक्त ही होते थे, किन्तु धीरे-धीरे दान की गई भूमि पर से राजाओं ने प्रशासनिक नियंत्रण हटाकर इसे दानग्रहीता को ही समर्पित करना आरम्भ कर दिया।

    शकों तथा पार्थियन शासकों ने संयुक्त शासन का प्रचलन प्रारम्भ किया, जिसमें युवराज सत्ता के उपभोग में राजा के बराबरी का सहभागी होता था।

    ➣ प्रशासन में सामन्तीकरण की प्रक्रिया शक, कुषाण काल में ही प्रारम्भ होता दिखाई देता है।

    ➣ कुषाण लेखों में हम पहली बार दण्डनायक तथा महादण्डनायक जैसे पदाधिकारियों का उल्लेख पाते हैं।

    ➣ स्मृतिकारों ने शक, पहलव, यवनकुषाणों को निम्न कोटि के क्षत्रिय माना है तथा

    मौर्योत्तरकालीन व्यापार

    ➣ यद्यपि मौर्योत्तर काल में विकेन्द्रीकरणसामन्तवाद को बढ़ावा मिला किन्तु आर्थिक गतिविधियों व व्यापार-वाणिज्य के विकास की दृष्टि से यह युग अत्यधिक उन्नति का था।

    ➣ कुषाण, सातवाहन काल में नगरीकरण अपने चरम पर था, क्योंकि रोम साम्राज्य से व्यापार उन्नत अवस्था में था। रोमन साम्राज्य से व्यापार का अधिक लाभ कुषाणों के बजाय सातवाहनों को मिला।

    ➣ कुषाण साम्राज्य के अधीन मध्य एशिया तक के प्रदेश थे तथा चीन को रोमन साम्राज्य से जोड़ने वाले सिल्कमार्ग पर भी कुषाणों का नियन्त्रण था, अतः भारत का मध्य एशियापाश्चात्य विश्व से घनिष्ठ व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित हुआ।

    अवदान शतक से कनिष्क कालीन व्यापार की जानकारी मिलती है। कनिष्क ने प्रथम बार अन्तर्राष्ट्रीय साम्राज्य की स्थापना की। कुषाण शासकों को सिल्क पर नियन्त्रण से भारी आय हुई। वे इससे चुंगी लेते थे।

    ➣ ईसा की पहली सदी में 46 ई. में हिप्पोलस नामक ग्रीक नाविक ने अरब सागर में चलने वाली मानसूनी हवाओं की खोज की। इसने समुद्री व्यापार को अधिक आसान कर दिया।

    ➣ इस समय व्यापार मुख्यतः अरब सागर के तटवर्ती बंदरगाहों पर होता था। इस काल में बारबेरिकस (सिंधु के मुहाने पर), अरिकामेडु (पूर्वीतट पर), बेरीगाजा या भड़ौच (पश्चिमी तट पर) आदि महत्त्वपूर्ण चंदरगाह थे।

    भड़ौच मौर्योत्तर काल का सबसे महत्त्वपूर्ण एवं उन्नतिशील बन्दरगाह था।

    ➣ पेरिप्लस के अनुसार पश्चिमी तट का सबसे महत्वपूर्ण बन्दरगाह बेरीगाजा (भृगुकच्छ) था।

    शूर्पारक (सोपारा) सबसे प्राचीन बन्दरगाह एवं कल्याण सबसे बड़ा बन्दरगाह था। ये दोनों पश्चिमी तट पर थे।

    ➣ पेरिप्लस ने दक्षिणा पथ में संगम कालीन दो महत्वपूर्ण अन्तरराज्य बाजारों का उल्लेख किया है, ये हैं :- प्रतिष्ठान एवं तगर । प्रतिष्ठान (पैठन) प्रसिद्ध व्यापारिक नगर था।

    ➣ प्लिनी ने भारतीय बहुमूल्य रत्नों की एक लम्बी सूची दी है और भारत को बहुमूल्य रत्नों का एक बड़ा उत्पादक देश बताया है। उसने भारतीय नदियों को रत्न धारक उपाधि से विभूषित किया है।

    ➣ यूनानी वनस्पतिशास्त्री थ्रियोकाइटस ने अपनी पुस्तक हिस्ट्री आफ प्लान्ट्स में भारत के विविध पौधों और जड़ी-बूटियों के औषधियों के रूप में प्रयोग का विवरण है।

    ➣ प्लिनी व पेरिप्लस के अनुसार पाण्ड्य देश में कॉलची (कॉलकै) बन्दरगाह मोतियों के लिये प्रसिद्ध था। सीप से मोती निकालने का काम अपराधियों से लिया जाता था।.

    ➣ ईसा की प्रथम शताब्दी में अज्ञात यूनानी नाविक द्वारा लिखी पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी नामक पुस्तक में भारत रोम व्यापार का वर्णन है। इसमें लाल सागर से भारत तक समुद्री यात्रा का वर्णन है।

    ➣ पेरिप्लस का कथन है कि फारस की खाड़ी से भृगुकच्छ में दासों का व्यापार किया जाता था।

    ➣ रोम को निर्यातित प्रमुख वस्तुएँ-मसाले, काली मिर्च, मलमल, हाथी दाँत की वस्तुएँ, इत्र, चंदन, कछुए की खोपड़ी, केसर, जटामासी, हीरा, रत्न, तोता, शेर, चीता आदि थीं। इनके क्रय का भुगतान स्वर्ण के रूप में करते थे।

    ➣ रोम से आयातित वस्तुएँ- शराब के दो हत्ये वाला कलश, शराब, सोना एवं चांदी के सिक्के, पुखराज, टिन, तांबा, सीसा आदि।

    ➣ पश्चिम के लोगों को भारतीय काली मिर्च (गोल मिर्च) इतनी प्रिय थी कि संस्कृत में काली मिर्च का नाम ही यवनप्रिय पड़ गया।

    मसाला एवं लोहे की वस्तुएँ खासकर बर्तन रोमन साम्राज्य को भेजे जाने वाली मुख्य वस्तुएँ थीं। मसाले के लिए दक्षिण भारत प्रसिद्ध था।

    कश्मीर, कोशल, विदर्भ और कलिंग हीरों के लिए विख्यात थे एंव मगध वृक्षों के रेशों से बने वस्त्रों के लिए तथा बंगाल मलमल के लिए प्रसिद्ध था।

    व्यापार एवं विनिमय में मुद्राओं का प्रयोग मौर्योत्तर युग की सबसे बड़ी देन है।

    वाणिज्य एवं व्यवसाय

    ➣ इस समय तक उद्योगों का स्थानीयकरण हो चुका था। यह काल प्राचीन भारत के शिल्प एवं वाणिज्य के इतिहास में चरमोत्कर्ष का काल था।

    सूती वस्त्र उद्योग सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उद्योग था। उौयूरअरिकमेडु सूती वस्त्र के प्रमुख केन्द्र थे। मोटे वस्त्र उत्पादन के लिए प्रतिष्ठान एवं तगर प्रसिद्ध थे।

    ➣ जातकों में 18 प्रकार के शिल्पियों का उल्लेख किया गया है। दीघनिकाय में 24, महावस्तु में 36 तथा मिलिन्दपन्हो में 75 प्रकार के व्यवसायों का उल्लेख है।

    ➣ जहां मौर्य काल में शिल्पी राज्य के नियन्त्रण में थे, वहीं मौर्योत्तर काल में वे स्वतन्त्र रूप से कार्य करने लगे।

    ➣ व्यापारिक प्रगति के कारण शिल्पकारों ने शिल्प श्रेणियों को संगठित किया। श्रेणियों के पास अपना सैन्य बल होता था।

     निगम का प्रधान श्रेष्ठि
     श्रेणी का प्रधान प्रमुख
     पूग का प्रधान ज्येष्ठक

    ➣ श्रेष्ठियों को उत्तर भारत में सेठ एवं दक्षिण भारत में शेट्टि या चेट्टियार कहा जाता था।

    ➣ स्ट्रेबो के अनुसार किसी शिल्पी की आँख व हाथ को क्षति पहुंचाने वाले को मृत्युदण्ड दिया जाता था।

    ➣ इसी समय के मथुरा क्षेत्र के एक लेख में इस बात का उल्लेख आया है, कि एक प्रमुख ने आटा पीसने वाले कारीगरों के पास धन जमा कराया था।

    ➣ मथुरा साटक (सटका) नामक एक विशेष प्रकार के वस्त्र के निर्माण का एक बड़ा केन्द्र था। इसका उल्लेख पतंजलि ने भी किया है।

    ➣ इस काल के शिल्पियों की कम से कम चौबीस-पच्चीस श्रेणियां प्रचलित थीं। अभिलेखों से प्राप्त अधिकतर शिल्पी मथुरा क्षेत्र में तथा पश्चिमी दक्कन में जमे थे।

    ➣ स्ट्रैबो के अनुसार यदि कोई व्यक्ति किसी हस्तशिल्पी के हाथ या आँख को क्षति पहुँचाता था, तो उसे मृत्युदण्ड दिया जाता

    ➣ कुषाण काल में भवन निर्माण तकनीक के विकास के प्रमाण मिले हैं, सूखी तथा पकायी हुई मिट्टी के खपड़े का प्रयोग इस काल का विशेषता है।

    ➣ यूनानी साक्ष्य एवं जातकों से यह प्रमाण मिलता है कि व्यवसाय सामान्यतः आनुवांशिक होता था।

    ➣ बौद्ध साहित्य में ऐसे अनेक सन्दर्भ है, जिनसे यह स्पष्ट होता है कि ब्राह्मण एवं क्षत्रिय केवल आपात काल में ही नहीं अपितु सामान्य परिस्थितियों में भी व्यापारिक उद्यमों को अपनाते थे।

    ➣ मौर्योत्तर काल में विभिन्न जातियों के लिये अलग-अलग ब्याज दर थी। मनु, गौतमयाज्ञवल्क्य के अनुसार ब्राह्मण 2 प्रतिशत, क्षत्रिय 3 प्रतिशत, वैश्य 4 प्रतिशत व शूद्र 5 प्रतिशत ब्याज देते थे।

    ➣ मौर्योत्तर प्रशासनिक व्यवस्था में व्यापारी एवं शिल्पकारों की श्रेणियों का बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान है।

    मौर्योत्तरकालीन सिक्के

    ➣ मुद्राओं पर लेख लिखनाविनिमय में नियमित रूप से मुद्रा का प्रयोग मौर्योत्तर युग की सबसे बड़ी देन है।

     सोने का सिक्कानिष्क, स्वर्ण तथा पल
     चाँदी का सिक्काशतमान
     ताँबे का सिक्काकाकणि

    ➣ मौर्योत्तर काल में सर्वाधिक प्रचलित सिक्का कार्षापण था। चार धातु सोना, चाँदी, ताँबा एवं शीशे से कार्षापण नामक सिक्का बनता था।

    हिंद-यवन शासकों ने सर्वप्रथम सोने के सिक्के चलाए। उनके सिक्कों पर द्विभाषिक लेख होते थे एक तरफ यूनानी भाषा, यूनानी लिपि में तथा दूसरी तरफ प्राकृत भाषा, खरोष्ठी लिपि में।

    ➣ कुषाणों ने सर्वप्रथम शुद्ध स्वर्ण के सिक्के चलवाए, जो 124 ग्रेन का था।

    ➣ सातवाहना ने सीसे के अतिरिक्त चादी. तांब्रा. पोटीन(ताबा, जिंक, सोसा तथा मिश्र धातु) आदि के सिक्के भी चलाए।

    ➣ कुषाण शासकों ने दीनार नामक स्वर्णमुद्रा रोमन संपर्क के फलस्वरूप चलाई। दीनार गुप्तकाल में अत्यधिक लोकप्रिय थी।

    सामाजिक व्यवस्था

    ➣ विदेशी आक्रमणों की वजह से परम्परागत वर्ण व्यवस्था को खतरा पैदा हो गया एवं अनगिनत वर्णसंकर जातियाँ उत्पन्न हुई। मनुस्मृति में 60 वर्ण संकर जातियों का उल्लेख है।

    ➣ कौटिल्य ने भी अनेक वर्णसंकर जातियों का उल्लेख किया है। इनकी उत्पत्ति विभिन्न वर्णों के अनुलोम एवं प्रतिलोम विवाहों से बताई गई है।

    ➣ कौटिल्य ने चाण्डाल के अतिरिक्त अन्य सभी वर्णसंकर जातियों को शूद्र माना है।

    मनुस्मृति में कहा गया है कि पवित्र धार्मिक संस्कारों तथा ब्राह्मणों की अवहेलना करने के कारण ही यवन, शक, पहलव आदि जातियाँ धीरे- धीरे शूद्रों की श्रेणी में गिर गई।

    ➣ उन्हे व्रात्य क्षत्रिय (पतित क्षत्रिय) कह कर वर्ण व्यवस्था में स्थान दिया है। भगवत पुराण में कहा गया है कि ये जातियां विष्णु पूजन से पवित्र हो जाती हैं।

    पाणिनी एवं पतंजलि ने दो प्रकार के शुद्रों का उल्लेख किया है-

    1. मिरवसित – नगर के बाहर रहने वाले।
    2. अनिरवसित – नगर की सीमा में रहने वाले (यवन एवं शकों को अनिरवसित श्रेणी में रखा गया है।)

    ➣ मनु के अनुसार शूद्रों का कार्य तीन उच्चतर वर्णों की सेवा करना था।

    मनुस्मृति ने विधवाओं के मुंडन की संस्तुति की है। मनु ने कहा यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमन्ते तत्र देवता

    ➣ मनुस्मृति में आठ प्रकार के विवाहों की चर्चा मिलती है। मनु ने नियोग को पशुधर्म कहा।

    ➣ मनु के अनुसार जिस स्त्री को पति ने छोड़ दिया हो या जो विधवा हो गई हो यदि वह अपनी इच्छा से दूसरा विवाह करे तो वह पुनर्भू तथा उसकी सन्तान पुनर्भव कहलाती थी।

    ➣ ब्राह्मण पुरूष एवं वैश्य माता से उत्पन्न संतान (अनुलोम विवाह) अम्बष्ठ कहलाई एवं उसकी वृत्ति चिकित्सक की कही गई।

    ➣ ब्रह्मण माता एवं शुद्र पिता से उत्पन्न संतान (प्रतिलोम विवाह) चाण्डाल कहलाई एवं उसकी वृत्ति वधिक या शव दाह करना मानी गई ।

    ➣ नियोग से उत्पन्न पुत्र क्षेत्रज कहलाता था। अविवाहित लड़की के पुत्र को सहोदर कहा जाता था।

    ➣ घर में रहने वाली कन्या या दासी से उत्पन्न पुत्र को कानीन कहा जाता था।

    ➣ विधि अनुसार समान वर्ण में विवाह से उत्पन्न पुत्र को औरस कहा जाता था। औरस, पुत्रों की श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ पुत्र था।

    महाक्षत्रप शोंडास के समय एक अन्य अभिलेख में भगवत वसुदेव के मन्दिर के प्रवेश द्वार तथा वेदिकाओं के निर्माण का उल्लेख है।

    ➣ हुविष्क की एक स्वर्ण मुद्रा पर एक देवता अपने हाथ में चक्र और दूसरे में ऊर्ध्वलिंग लिए चित्रित किया गया है। सम्भवतः यह समन्वित देवता हरिहर की प्रतिमा का पूर्व रूप है।

    ➣ प्रारम्भिक स्मृतिकारों के अनुसार ब्राह्मण को शूद्र द्वारा दिया गया व स्पर्श किया गया अन्न किसी भी स्थिति में ग्रहण नहीं करना चाहिये।

    ➣ मौर्योत्तर काल में अधिकतर शिल्पी शूद्र वर्ण में ही आते थे, किन्तु उनके धन एवं प्रतिष्ठा में अब वृद्धि हो गई। इस प्रकार वैश्य एवं शूद्रों के बीच अन्तर कम हो गया।

    ➣ मौर्योत्तर काल में सती प्रथा नहीं थी एवं बाल विवाह होता था।

    मौर्योत्तरकालीन कला

    ➣ इस काल में कला का आधार मुख्यतः बौद्ध धर्म ही रहा। इस काल में कला को प्रेरणा बौद्ध धर्म एवं यूनानी प्रभाव से मिली।

    हिन्द-यूनानी शासकों ने भारत के पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्त में यूनान की प्राचीन कला चलाई जिसे हेलेनिस्टिक आर्ट कहते हैं। भारत में गान्धार कला इसका उत्तम उदाहरण है।

    ➣ कनिष्क के शासन काल में कला के क्षेत्र में दो स्वतन्त्र शैलियों का विकास हुआ- (1) गन्धार कला, (2) मथुरा कला

    ➣ मथुरा कला शैली आदर्शवादीगान्धार शैली यथार्थवादी है। गान्धार व मथुरा शैली में अन्तर यह है कि गान्धार कला में शरीर रचना संबंधी विवरणों तथा शारीरिक सौंदर्य पर बल दिया गया है, जबकि मथुरा में मूर्ति को पवित्र आध्यात्मिक भावना देने का प्रयत्न किया गया है।

    गांधार कला/नग्न कला

    ➣ ई.पृ. प्रथम शताब्दी के मध्य उत्तर-पश्चिम में गांधार में कला की एक शैली का विकास हुआ, जिसे गांधार शैली कहते हैं।

    ➣ इस शैली को इण्डो-ग्रीक शैली या ग्रीक बुद्धिष्ट शैली भी कहा जाता है। इसका सर्वाधिक विकास कुषाण काल में हुआ।

    ➣ गांधार शैली में काले रंग के स्लेटी पत्थर का प्रयोग हुआ है, जबकि मथुरा शैली में लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग हुआ है।

    ➣ गांधार कला के अंतर्गत मूर्तियों के शरीर की आकृति को सर्वथा यथार्थ दिखाने का प्रयत्न किया गया है। इस कला की विषय-वस्तु बौद्ध परंपरा से ली गई है, किंतु निर्माण का ढंग यूनानी था।

    ➣ गांधार मूर्तिकला शैली में बुद्ध की मूर्तियाँ यूनानी देवता अपोलो के समान बनाई गई है।

    ➣ गांधार कला शैली की उत्पत्ति का स्रोत एशिया माइनर तथा हेलेनिस्टिक कला थी।

    ➣ गांधार कला के अंतर्गत बुद्ध की धर्मचक्रमुद्रा, ध्यानमुद्रा, अभयमुद्रा और वरदमुद्रा आदि मूर्तियों का निर्माण किया गया।

    ➣ गन्धार कला के अन्तर्गत बुद्ध तथा बोधिसत्वों की बहुसंख्यक मूर्तियों का निर्माण हुआ। बोधिसत्व मूर्तियों में सबसे अधिक मैत्रेय की हैं।

    मथुरा कला

    ➣ जैन धर्म के अनुयायियों ने मथुरा में मूर्तिकला की एक शैली को प्रश्रय दिया; जहाँ शिल्पियों ने महावीर की एक मूर्ति बनाई ।

    ➣ यह कला शैली, जो मथुरा शैली के नाम से प्रसिद्ध हुई, ई.पू. पहली शताब्दी के अन्त में आरम्भ हुई। कालान्तर कुषाण शासकों का प्रश्रय पाकर यह फली फूली ।

    ➣ मथुरा शैली की मूर्तियों में आध्यात्मिकता एवं भावुकता की प्रधानता थी। इस शैली में मुख्यत: लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग किया जाता था।

    ➣ भारतीय कला में गढ़ी हुई बुद्ध की सबसे प्राचीन मूर्ति मथुरा में ही मिली थी।

    ➣ मथुरा कला का भरहुत और साँची की कलाओं के साथ निकट का सम्बन्ध है। यह कला (मथुरा कला) विशुद्ध भारतीय कला है।

    ➣ ब्राह्मण धर्म से सम्बन्धित देवी देवताओं की मूर्तियों का प्रथम निर्माण मथुरा । शैली में हुआ। इसमें नग्नता का अभाव है। इस कला में बुद्ध के पीछे प्रभामण्डल है।

    बुद्ध के जन्म, अभिषेक, महाभिनिष्क्रमण, सम्बोधि, धर्मचक्रप्रवर्तन, महापरिनिर्वाण आदि जीवन की विविध घटनाओं का कुशलतापूर्वक अंकन मथुरा कला के शिल्पियों द्वारा किया गया।

    ➣ मथुरा शैली हिन्दू, बौद्ध एवं जैन धर्म से सम्बन्धित शैली है। इस शैली का सर्वाधिक विकास गुप्तकाल में हुआ।

    गांधार कलामथुरा कला
    गहरे नीले एवं काले पत्थर का प्रयोग लाल पत्थर का प्रयोग
    संरक्षक शक एवं कुषाणसरक्षक-कुषाण
    यथार्थवादीआदर्शवादी
    मुख्यत: बौद्ध की मूर्तियाँबौद्ध, जैन तथा ब्राह्मण धर्म से संबंधित मूर्तियाँ

    मथुरा संग्रहालय में कुषाण कालीन मूर्तियों का भारत में सबसे बड़ा संग्रह है।

    मौर्योत्तरकालीन धर्म

    भक्ति का विकास इस काल के धर्म की प्रमुख विशेषता है, बाद में भक्ति के साथ अवतारवाद की परिकल्पना भी जुड़ गई, हांलाकि इसका पूर्ण विकास गुप्तकाल में हुआ था।

    ➣ वैदिक देवताओं के स्थान पर नवीन देव वर्ग का उदय हुआ, जिनमें ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश की त्रिमूर्ति बहुत विख्यात है।

    ➣ आर्य देवताओं के समानांतर गैर-आर्य देवता भी स्थापित हो गए, जैसे –गणेश, कार्तिकेय, मातृदेवी, वृक्ष पूजा, पशु पूजा, सर्प पूजा आदि।

    ➣ द्वितीय शताब्दी ई.पू. के घोसुण्डी वेदिका लेख में वासुदेव-संकर्षण की मूर्ति की पूजा का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।

    ➣ मौर्योत्तर काल में बौद्ध धर्म और उसकी महायान शाखा का सर्वाधिक प्रचार-प्रसार हुआ।

    ➣ बौद्ध धर्म में मूर्ति पूजा आरंभ हुई एवं इसका प्रचलन ब्राह्मण, समुदाय में भी हुआ। संभवतः भारत में सबसे पहले बुद्ध की मूर्तियों की पूजा की गई।

    ➣ विदेशी शासकों ने बौद्ध धर्म को प्रश्रय दिया। मिनांडर वह प्रथम यवन शासक था, जिसने बौद्ध धर्म स्वीकार कर ली। मीनाण्डर ने बौद्ध भिक्षु नागसेन से बौद्ध धर्म की दीक्षा ली।

    ➣ शक क्षत्रप षोडास के मोराकूप लेख में पंचवीरों की प्रतिमा व उनके मंदिर का उल्लेख हुआ है। शक क्षत्रप षोडास के अभिलेख में वासुदेव मन्दिर के प्रवेश द्वार के निर्माण का उल्लेख है।

    ➣ कई विदेशी शासक विष्णु के उपासक बन गए। हेलियोडोरस का बेसनगर (विदिशा) अभिलेखमोरा कूप अभिलेख भागवत धर्म की प्रसिद्धि को सिद्ध करते हैं।

    ➣ कुषाणों के विरुद्ध अपनी विजय के उपलक्ष्य में भारशिव नागों ने वाराणसी में दस अश्वमेध यज्ञ किये। इसी से वह स्थान आज भी दशाश्वमेध यज्ञ के नाम से विख्यात है।

    मौर्योत्तरकालीन साहित्य

    ➣ सबसे प्रसिद्ध स्मृति मनुस्मृति ई. पू. दूसरी सदी में लिखी गई।

    अश्वघोष रचित सौंदरानंद, बुद्ध के सौतेले भाई आनंद्र के बौद्ध धर्म में दीक्षित होने के प्रसंग पर आधारित है।

    अश्वघोष के नाटकों के कुछ भाग मध्य एशिया के एक विहार से प्राप्त हुए हैं।

    ➣ रुद्रदामन का गिरनार अभिलेख संस्कृत काव्य का अनापत उदाहरण है।

    ➣ कुषाण साम्राज्य के सुई विहार के अभिलेख में भी संस्कृत का प्रयोग हुआ है।

     रचनाएँ चनाकार
     गाथासप्तशतीहाल
     कामसूत्रवात्स्यायन
     महाभाष्यपतंजलि
     सौंदरानंद, बुद्धचरित अश्वघाप
     चरक संहिताचरक
     नाट्यशास्त्रभरत मुनि
     स्वप्नवासवदत्ताभास
     चारुदत्ताभास
     मिलिंदपन्हानागसन
     उरुभगभास
  • मौर्योत्तर काल में विदेशी आक्रमण : शासक और राजवंश

    📚 विषय सूची

    परिचय

    शुंग, कण्व, सातवाहन वंश के शासन काल में हिन्द – यवनों , शकों तथा कई अन्य विदेशी आक्रमण हुए थे।

    ➣ मौर्य जैसा विशाल साम्राज्य अब कई क्षेत्रों में विभक्त हो गया था। इन क्षेत्रों पर स्वदेशी और विदेशी दोनों शासकों ने एक साथ शासन किया था।

    200 ई.पू. के आस-पास हिन्दू कुश को सबसे पहले पार करने वाले यूनानी थे। जिन्होंने उत्तर अफगानिस्तान के क्षेत्र में ओक्सस नदी के दक्षिण में स्थित बैक्ट्रिया (आधुनिक अफगानिस्तान ) पर शासन किया। उनमें से कुछ ने तो एक ही समय में समानान्तर शासन किया था।

    आक्रमणकारियों का क्रम:- हिन्द-यवन → शक → पहलव → कुषाण।

    विदेशी/शासक राजधानीमूल निवासआगमन
    1. हिंद-यवन(डेमेट्रियस)शाकल ( स्यालकोट ) बैक्ट्रिया, अफगानिस्तान 190 ई.पू.
    2.शक (माउस) नासिक सीथिया, ईरान 90 ई.पू.
    3. पार्थियाई या पहलव/गोंदोफर्नीजबेग्राम पार्थिया, ईरान1 सदी ई.पू.का अन्त
    4. कुषाण या यूची (कुजुल कडफिसेस) उज्जयिनी चीनी तुर्किस्तान15 ई.
    मौर्योत्तर कालीन विदेशी  आक्रमण

    ➣ इन विदेशी आक्रमण के समय 57-58 ई.पू. के आस पास उज्जैन राजा विक्रमादित्य ने शकों पर विजय के उपलक्ष में विक्रम संवत की शुरुवात की थी।

    हिन्द-यवन आक्रमण (लगभग 190 ई.पू.)

    ➣ सिकन्दर के आक्रमण के पश्चात् भारत के उत्तर पश्चिम में बैक्ट्रिया में यूनानी बस्ती बस गई थी, जिन्हें प्राचीन भारतीय साहित्य में यवन कहा जाता है।

    ➣ भारत पर यवनों का प्रथम आक्रमण पुष्यमित्र शुंग के समय हुआ, जिसका उल्लेख गार्गी संहिता (युगपुराण खण्ड) एवं मालविकाग्निमित्र में मिलता है।

    सेल्यूकस सिकन्दर का सेनापति था जिसने उसकी मृत्यु के बाद मध्य एशिया के एक विस्तृत भाग पर यूनानी साम्राज्य स्थापित किया था।

    ➣ जिसमे बैक्ट्यिा (उत्तरी अफगानिस्तान) तथा पार्थिया (ईरान) भी शामिल था।

    ➣ सेल्यूकस के पश्चात 223 ई. पू. में सीरिया के राजसिंहासन पर सम्राट एण्टियोकस तृतीय आरूढ़ हुआ।

    ➣ 200-250 ई. पू. के मध्य तक बैक्ट्रिया के गवर्नर डियोडोरस ने स्वंय को स्वतंत्र घोषित कर दिया। वहीँ पार्थिया से भी अरसक तृतीय स्वतंत्र रूप से शासन करने लग गया।

    ➣ एण्टियोकस तृतीय ने पार्थिया पर आक्रमण कर उसने उसे जीतने का प्रयत्न किया, पर वह असफल रहा। फलस्वरूप उसने पार्थियन राजा अरसक तृतीय से संधि कर ली।

    ➣ बैक्ट्रिया शासक डियोडोरस का उत्तराधिकारी यूथीडेमस हुआ। जिसे सीरियन सम्राट एण्टियोकस तृतीय से युद्ध करना पड़ा।

    ➣ परन्तु सीरियन सम्राट उसे परास्त करने में असफल रहा। अन्त में विवश होकर एण्टियोकस ने बैक्ट्रिया शासक यूथोडेमस के साथ भी सन्धि कर ली और अपनी पुत्री का विवाह बैक्ट्रियन राजा के पुत्र डेमेट्रियस प्रथम के साथ कर दिया।

    ➣ भारत में डेमेट्रियस के वंशज – यूथीडेमस, मीनाण्डर, स्ट्रेटो प्रथम, स्ट्रेटो द्वितीय शासक हुए।

    ➣ भारत में यवन साम्राज्य दो कुलों में बंट गया था-

    1. डेमेट्रियस डेमेट्रियस, यूथीडेमस, मीनाण्डर, स्ट्रेटो प्रथम, स्ट्रेटो द्वितीय
    2. यक्रेटाइड्स युक्रेटाइडीज, एण्टियालकीड्स, हर्मियस

    ➣ डेमेट्रियस से मिनान्डर हुआ जबकि युक्रेटाइड्स से हेलिओक्लीज़ प्रसिद्ध है-/p>

    डेमेट्रियस वंश
    राजधानी : साकल
    (क्षेत्र : झेलम से मथुरा)

    डेमेट्रियस प्रथम

    मिनान्डर

    स्ट्रेटो प्रथम
    युक्रेटाइड्स वंश
    राजधानी : तक्षशिला
    (क्षेत्र : झेलम से बैक्ट्रिया)

    युक्रेटाइड्स

    हेलिओक्लीज़

    हर्मियस

    डेमेट्रियस (धर्ममित्र) प्रथम ( 190-160 ई.पू.)

    ➣ यूथोडेमस की मृत्यु के बाद उसके पुत्र डेमेट्रियस प्रथम ने राज्य विस्तार की प्रक्रिया जारी रखी और सर्वप्रथम भारत पर आक्रमण किया।

    भारत पर आक्रमण करने वाला प्रथम हिन्द-यवन शासक डेमेट्रियस प्रथम था।

    ➣ उसने एक बड़ी सेना के साथ लगभग 183 ई.पू. में हिन्दुकुश पर्वत को पार कर सिंध और पंजाब पर अधिकार कर लिया और साकल (स्यालकोट) को अपनी राजधानी बनायी।

    ➣ डेमेट्रियस के उपरान्त यूक्रेटाइड्स ने भारत के कुछ हिस्सों को जीतकर तक्षशिला को अपनी राजधानी बनाया।

    डेमेट्रियस ने भारतीय राजाओं की उपाधि धारण कर यूनानी तथा खरोष्ठी लिपि में सिक्के भी चलवाये थे।

    ➣ डेमेट्रियस पहला इंडोग्रीक शासक था, जिसने यूनानीखरोष्ठी दोनों लिपियों वाले सिक्के चलाये।

    ➣ डेमेट्रियस के भारतीय अभियान की जानकारी पतंजलि के महाभाष्यण गार्गी संहिता एवं मालविकाग्निमित्रम् से होती है।

    कलिंग शासक खारवेल के हाथीगुम्फ़ा शिलालेख में भी डेमेट्रियस के आक्रमण का उल्लेख है।

    ➣ डेमेट्रियस के पुत्र अगाथोक्लिज ने ब्राह्मी एवं ग्रीक के द्विभाषी सिक्के चलाये, जिन पर लक्ष्मी, कृष्ण (वासुदेव) एवं बलराम की आकृति अंकित है।

    ➣ भारत के यवन राजाओं में सबसे महत्वपूर्ण राजा डेमेट्रियस द्वितीय, अपोलोडोटस द्वितीय और मिनांडर (मिलिंद) थे।

    ➣ डेमेट्रियस द्वितीय ने एक विस्तृत प्रदेश पर राज किया, जिसमें सिंधु डेल्टा, सौराष्ट्र और कच्छ शामिल थे। उसके सिक्कों पर खरोष्ठी लिपि में महरजस अपडिहतस (अप्रतिहतस्य) दिमेनियस लेख अंकित था।

    मिनाण्डर (165-145 ई.पू.)

    ➣ सबसे प्रसिद्ध यवन शासक मीनान्डर था। जो बौद्ध साहित्य में मिलिन्द के नाम से प्रसिद्ध है। यह सम्भवतः डेमेट्रियस के कुल का था।

    ➣ मिनांडर वह प्रथम यवन शासक था, जिसने बौद्ध धर्म स्वीकार कर ली। मीनाण्डर ने बौद्ध भिक्षु नागसेन से बौद्ध धर्म की दीक्षा ली।

    ➣ प्रसिद्ध बौद्ध ग्रन्थ मिलिन्द पन्हो में नागसेनमीनाण्डर की दार्शनिक वार्ता संकलित है। पालि ग्रन्थ मिलिन्दपन्हो की रचना नागसेन ने की। इसमें सात अध्याय हैं। मीनाण्डर हीनयान का उपासक था।

    ➣ भारतीयों सिक्कों पर पहले केवल देवताओं के चित्र ही अंकित रहते उनका नाम या तिथि उत्कीर्ण नहीं की जाती। जब से उत्तर-पश्चिमी भारत पर बैक्ट्रिया के यूनानी राजों का शासन आरम्भ हुआ, सिक्कों पर राजाओं के नामतिथियाँ उत्कीर्ण की जाने लगीं।

    ➣ वह पहला शासक था, जिसने सोने के सिक्के चलवाए। चांदी के सिक्कों के लिये द्रम्म शब्द युनानी भाषा से ही लिया गया है। जबकि युक्रेटाइडीज सबसे ज्यादा स्वर्ण मुदाएं जारी करने वाला इंडो-ग्रीक शासक था।

    ➣ मीनेण्डर ने त्रिभाषिक लेख युक्त मुद्राएं चलाई। मीनाण्डर की कांस्य मुद्राओं पर धर्मचक्र का चिह्न, हाथी के चित्र मिलता है, जबकि अन्य मुद्राओं पर ध्रमिकस की उपाधि है।

    सर्वप्रथम इण्डो-ग्रीक शासकों ने ही लेख वाले सिक्के (मुद्रालेख) तथा सोने के सिक्के जारी किये।

    ➣ प्लूटार्क के अनुसार मीनाण्डर की मृत्यु सैनिक शिविर में हुई थी। मिनांडर को मृत्यु के समय इसका पुत्र स्ट्रेटो प्रथम अल्प वयस्क था, अतः इसकी पत्नी अपने पुत्र की संरक्षिका बनी।

    ➣ स्ट्रेटो द्वितीय ने सीसे के सिक्के चलाए।

    ➣ बैक्ट्रिया में यवनों का अंतिम शासक हेलियोक्लीज था। 125 ई.पू. के लगभग बैक्ट्रिया से यवन-शासन समाप्त हो गया और वहाँ शकों का राज्य स्थापित हो गया।

    युक्रेटाइड्स

    ➣ जिस समय डेमेट्रियस और मिनान्डर भारत विजय में लगा था। उनके अपने देश बैक्ट्रिया में उनके विरुद्ध विद्रोह हो गया और युक्रेटाइड्स नामक एक सेनापति ने बैक्ट्रिया के राजसिंहासन पर अपना अधिकार कर लिया।

    ➣ युक्रेटीदस ने उत्तर-पश्चिमी भारत के कुछ प्रदेशों को जीत लिया था और तक्षशिला को अपनी राजधानी बनाया।

    यूक्रेटाइडीज की एक मुद्रा पर कपिशा के नगर देवता का उल्लेख है।

    ➣ शुंग वंश के नवें शासक भागभद्र के शासन काल के 14वें वर्ष में तक्षशिला के यवन शासक एण्टियालकीड्स के राजदूत हेलियोडोरस ने विदिशा में वासुदेव के सम्मान में गरूड़ स्तम्भ स्थापित किया।

    हमियम युक्रेटाइड्स वंश का अंतिम शासक था। उसकी मृत्यु के साथ ही पश्चिमोत्तर भारत से यवनों का लगभग 200 वर्षों का शासन समाप्त हो गया।

    यूनानियों की देन

    ➣ सर्वप्रथम इंडो-ग्रीक शासकों ने लेख वाले सिक्के अर्थात भारत में इण्डो-यूनानी शासक ऐसे पहले शासक थे जिनके सिक्कों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि इसे किस शासक द्वारा जारी किया गया है।

    ➣ भारत में सबसे पहले हिंद यूनानियों ने ही सोने के सिक्के जारी किए जिनकी मात्रा कुषाण शासन में काफी बढ़ गयी।

    ➣ भारत में सर्वप्रथम स्वर्ण सिक्के चलाने का श्रेय यूनानियों को जाता है। जबकि व्यापक पैमाने पर प्रचलन कुषाण शासक वीम कडफिसेस ने करवाया था।

    ➣ सर्वप्रथम भारत में द्विभाषी एवं द्विलिपि मुद्रा यूनानियों ने चलाई थी।

    ➣ राजत्व का दैवीय सिद्धांत

    साँचों से सिक्का-निर्माण की विधि।

    काल गणना, संवत् का प्रयोग, सप्ताह के 7 दिन, 12 राशियाँ, कैलेंडर वर्ष।

    ➣ भारत में ज्योतिष कला का विकास’।

    ➣ भारत में एक नवीन शैली हेलेनिस्टिक कला का विकास।

    ➣ भारतीय रंगमंच में यवनिका (पर्दा) का शुभारंभ।

    गांधार मूर्तिकला स्पष्टतः यूनानी प्रभाव से प्रेरित है।

    ➣ भारत के उत्तर-पश्चिमी सीमा में यूनानी शासन ने हेलेनिस्टिक कला की शुरुआत की, फलस्वरूप भारतीय-यूनानी कला का अनोखा मिश्रण हुआ और एक नई कला , गांधार कला, का जन्म हुआ।

    शक आक्रमण (90 ई.पू.)

    ➣ यूनानियों के बाद शक आए। शक मध्य एशिया की घुमक्कड़ जाति थी जो चारगाह की खोज में भारत आये थे।

    ➣ कालान्तर में मध्य एशिया के खानाबदोश कबीलों ने, जिनमें सीथियन लोग भी थे, बैक्ट्रिया पर हमला कर दिया।

    ➣ चीन के सम्राट शी-हुआंग-टी द्वारा तीसरी शताब्दी ई.पू. चीन की विशाल दीवार बना देने के कारण कबीलों को पश्चिम में बढ़ने के लिए बाध्य होना पड़ा।

    ➣ जिसके परिणामस्वरूप सीथियनों को विस्थापित होकर भारत के इण्डो-ग्रीक भागों पर आक्रमण करना पड़ा।

    • शक बोलन दरें से भारत में आए।
    • शकों को भारतीय साहित्य में सीथियन कहा गया है।
    • शकों ने क्षत्रप प्रणाली ईरान से ग्रहण की।
    • शक राजाओं को क्षत्रप कहा जाता था।
    • भारत में क्षत्रप प्रणाली का प्रचलन शकों ने किया।

    ➣ शक शासक मुरूण्ड की उपाधि धारण करते थे, जिसका शाब्दिक अर्थ ‘स्वामी’ होता था। स्टेन कोनो ने इसे शक-मुरूण्ड जाति नाम पुकारते हैं।

    ➣ बैक्ट्रिया के यवन राज्य का अन्त शक जाति के आक्रमण द्वारा हुआ था।

    ➣ शकों की पाँच शाखाएं थी-

    • सिन्ध और पश्चिमी भारत के शक कुल
    • गान्धार के शक कुल
    • महाराष्ट्र के शक-क्षत्रप कुल
    • मथुरा के शक-क्षत्रप कुल
    भारत में शकों का शासन

    ➣ शकों की भारत में दो शाखाएं हो गई-

    • उत्तरी क्षत्रप – तक्षशिला एवं मथुरा
    • पश्चिमी क्षत्रप – नासिक एवं उज्जैन
    • तक्षशिला – मज्ज / मोग
    • मथुरा – राजुल
    • उज्जैन – चष्टन
    • नासिक – भूमक व नहपान, रूद्रदामन

    माउस (85-60 ई पू लगभग)

    ➣ तक्षशिला का प्रथम शक शासक माउस/मेउस/मावेज था जो भारत का प्रथम शक शासक था। उसके शासन काल में शक शक्ति का विस्तार मथुरा तक हो गया।

    ➣ गंधार प्रदेशों में प्राप्त सिक्कों में इसका नाम खरोष्ठी लिपि में मोय और यूनानी लिपि में माउस लिखा है।

    ➣ माओस के बाद एजीस प्रथम गद्दी पर बैठा। उसने अपने सिक्कों पर अपने साथ अपने पिता स्पलिरिसेस का नाम भी अंकित कराया।

    ➣ एजीस प्रथम के बाद उसका पुत्र एजिलाइसेस गद्दी पर बैठा। तत्पश्चात एजिलाइसेस का पुत्र एजीस द्वितीय राजा बना।

    क्षहरात वश

    ➣ भूमक क्षहरात वंश का प्रथम शासक था। नहपान भूमक का उत्तराधिकारी था।

    नासिक अभिलेख संख्या 10 के अनुसार नहपान के दामाद उषावदात (ऋषभदत्त) ने ब्राह्मणों व बौद्ध भिक्षुओं को दान दिया।

    कन्हेरी अभिलेख में कार्ले के बौद्ध संघ के लिए करजिक ग्राम के दान का उल्लेख है। इसी अभिलेख में वर्णासाप्रभास के ब्राह्मणों को गांव दान देने का उल्लेख है।

    ➣ प्राकृत जैन ग्रन्थ कालकाचार्य कथानक के अनुसार उज्जैन के शासक विक्रमादित्य द्वारा जैन धर्म ग्रहण करने का वर्णन व विक्रमादित्य द्वारा शकों को 57 ई.पू. में पराजित कर विक्रम संवत जारी करने का उल्लेख है। इसे मालव संवत भी कहते हैं।

    ➣ जिस प्रकार कोई महान् पराक्रम करने पर रोमन सम्राट सीजर की उपाधि धारण करते थे, उसी प्रकार भारतीय शासक विक्रमादित्य की उपाधि धारण करते थे।

    ➣ लगभग 57-78 ई. के लगभग उज्जैन राजा विक्रमादित्य ने शकों को पीछे खदेड़ दिया।

    ➣ कालान्तर में जिसने भी महान पराक्रम दिखाया उसने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की सबसे विख्यात विक्रमादित्य चन्द्रगुप्त द्वितीय था।

    भारतीय इतिहास में लगभग 14 विक्रमादित्य हुए जिसमे सातवाहन शासक गौतमी पुत्र शतकर्णी से लेकर अंतिम विक्रमादित्य हेमचन्द्र (पानीपत का तृतीय युद्ध में वीरगति को प्राप्त) शामिल हैं।

    पश्चिमी क्षत्रप

    ➣ श्चिमी क्षत्रपों में क्षहरात वंश (नासिक) का नहपान (मिननगर) तथा कार्दमकवंश (चष्टन वंश) (उज्जैन) का रूद्रदामन अधिक प्रसिद्ध थे।

    ➣ शकों ने पश्चिमी भारत में लगभग चार सदियों तक शासन किया और बड़ी संख्या में चांदी के सिक्के चलाए।

    ताँबे के सिक्कों में भूमक ने अपने आपकों क्षत्रप लिखा है।

    ➣ अभिलेखों से ज्ञात होता है कि नहपान का राज्य उत्तर में राजपूताना तक था। उसके राज्य में काठियावाड़, दक्षिणी गुजरात, पश्चिमी मालवा, उत्तरी कोंकण, पूना आदि शामिल थे।

    ➣ नहपान के समय भड़ौच एक बंदरगाह था। उज्जैन, प्रतिष्ठान (आधुनिक :औरंगाबाद ) आदि से बहुत सा व्यापारिक सामान लाकर वहाँ पर एकत्र किया जाता था।

    ➣ अपने राज्यारोहण के 18वें वर्ष में सातवाहन वंश के राजा गौतमीपुत्र शातकर्णी ने क्षहरातों पर आक्रमण करके नहपान तथा उसके दामाद ऋषभदत्त (उषवदात) को मार डाला।

    ➣ नहपान के सिक्कों पर उसके लिये राजा संबोधन हुआ है। उसके सिक्के अजमेर से नासिक तक मिलते हैं।

    रुद्रदामन प्रथम (130-150 ई.)

    ➣ भारत में शकों का सर्वाधिक प्रसिद्ध राजा रुद्रदामन प्रथम (130-150 ई.) हुआ। रूद्रदामन चष्टन का पौत्र व जयदामन का पुत्र था।

    ➣ रूद्रदामन ने महाक्षत्रप की उपाधि धारण की थी। उसके राज्याधिकार में सिंध, कोंकण, नर्मदा घाटी, मालवा, काठियावाड़ और गुजरात का एक बड़ा भाग था।

    ➣ रुद्रादमन के जूनागढ़ अभिलेख से प्रतीत होता है कि पूर्वी पश्चिमी मालवा, द्वारका के आसपास के प्रदेश, सौराष्ट्र, कच्छ, सिंधु नदी का मुहाना, उत्तरी कोंकण, मारवाड़, आदि प्रदेश उनके राज्य में सम्मिलित थे।

    ➣ रूद्रदामन ने सौराष्ट्र स्थित सुदर्शन झील का जीर्णोद्धार अपने गर्वनर विशाखादत्त की देखरेख में कराया था। इस झील का निर्माण मौर्य काल में हुआ था। उसके समय सौराष्ट्र प्रांत का शासक सुविशाख था।

    ➣ रूद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख संस्कृत में लिखित प्रथम अभिलेख था। इससे पूर्व के सभी अभिलेख प्राकृत में थे। इसने संस्कृत को राजकीय संरक्षण दिया।

    ➣ अन्धौ अभिलेख (कच्छ की खाड़ी) से पता चलता है कि रूद्रदामन ने चष्टन के साथ सहशासक के रूप में शासन किया। रूद्रदामन ने चाँदी की मुद्राएं चलाई।

    ➣ रूद्रदामन ने सातवाहन शासक वशिष्ठी पुत्र पुलुमावी को दो बार पराजित किया किन्तु निकट संबंधी होने के कारण उसे छोड़ दिया (जूनागढ़ अभिलेख ) ।

    ➣ रुद्रदामन संस्कृत का बड़ा प्रेमी था। उसने ही सबसे पहले विशुद्ध संस्कृत भाषा में जूनागढ़ अभिलेख जारी किया।

    ➣ रुद्रदामन ने अभिलेखों में संस्कृत भाषा का प्रयोग किया, किंतु सिक्कों पर प्राकृत भाषा का प्रयोग किया।

    ➣ इस वंश का अंतिम शासक रुद्रसिंह तृतीय था। गुप्त शासक चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य ने उसे पराजित कर पश्चिमी क्षत्रपों के राज्य को अपने साम्राज्य में मिला लिया।

    • शकों की मुद्राएँ ब्राह्मी, खरोष्ठी, यूनानी तीन लिपियों युक्त थीं।
    • भारत में सर्वप्रथम तिथियुक्त/संवत मुद्रा शकों ने जारी की।
    • शक-सातवाहन काल में सोनेचाँदी के सिक्कों की विनिमय दर 1:35 थी।
    • शक मुद्राओं पर शिव-पार्वती के चित्र मिलते हैं।

    विक्रम संवत (57 ई.पू.) | भारतीय प्राचीन कालगणना संवत

    ❑ उज्जैन राजा विक्रमादित्य ने शकों पर विजय के उपलक्ष में लगभग 57 ई.पू. में शुरुवात की।

    ❑ विक्रम संवत के प्रारम्भ के विषय में भी विद्वानों में मतभेद हैं। कुछ लोग सन 78 ई. और कुछ 544 ई. में इसका प्रारम्भ मानते हैं।

    ❑ चूँकि इतिहास में सबसे प्रसिद्ध विक्रमादित्य चंदगुप्त द्वितीय हुए इसलिए कुछ इसका श्रेय चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य को देते है।

    ❑ कहा जाता है कि राजा विक्रमादित्य ने अपनी सम्पूर्ण प्रजा का ऋण खुद चुकाकर इस संवत की शुरुआत की थी।

    ❑ विक्रम संवत में समय की पूरी गणना सूर्य और चांद के आधार पर की गयी है यानी दिन, सप्ताह, मास और वर्ष की गणना पूरी तरह से वैज्ञानिक है।

    विक्रम संवत और शक संवत में अंतरः दोनों संवतों के महीनों के नाम समान हैं और दोनों संवतों में शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष भी हैं। अंतर सिर्फ दोनों पक्षों के शुरू होने में है।

    ❑ विक्रम संवत में नया महीना पूर्णिमा के बाद आने वाली कृष्ण पक्ष से होता है,

    ❑ जबकि शक संवत में नया महीना अमावस्या के बाद शुक्ल पक्ष से शुरू होता है। इसी कारण इन संवतों के शुरू होने वाली तारीखों में भी अंतर आ जाता है।

    ❑ शक संवत में चैत्र के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा, उस महीने की पहली तारीख है जबकि विक्रम संवत में यह सोलहवीं तारीख है।

    पहलव (पार्थियन) आक्रमण | ई.पू. के अंत में

    ➣ भारत के पश्चिमोत्तर में शकों के आधिपत्य के बाद पर्थियाई लोगों का शासन स्थापित हुआ। इनका मूल निवास स्थान ईरान था।

    ➣ प्राचीन भारत के अनेक संस्कृत ग्रंथों में शक और पार्थियाई लोगों का एक साथ उल्लेख शक-पलव के रूप में मिलता है।

    ➣ पहलव शक्ति का वास्तविक संस्थापक मिथ्रेडेट्स प्रथम था जो यूक्रेटाइड्स का समकालीन था।

    गोंडोंफर्नीज (20-41 ई.)

    ➣ पहलव वंश का सबसे प्रतापी शासक गोंडोंफर्नीज था जिसकी राजधानी तक्षशिला थी।

    ➣ खरोष्ठी लिपि में उत्कीर्ण तख्तेबही अभिलेख में इसे गुदुव्हर कहा गया है। फ़ारसी में इसका नाम विन्दफ़र्ण है जिसका अर्थ है यश विजयी।

    ➣ गोंडोफर्निस के शासनकाल में 57 ई. में भारत में पहली बार ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिए सेंट टॉमस भारत आया था, जो बाद में दक्षिण चला गया।

    गोंडोफर्निस और सेंट टॉमस के बीच संबंधों का प्रथम उल्लेख – एक्टर्स ऑफ सेंट थॉमस सीरियाई ग्रंथ में मिलता है।

    ➣ ईसाई अनुश्रुति में कहा जाता है कि गोंडोफर्निस ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया था, लेकिन पर्थियनों के सिक्कों पर धार्मिय उपाधि अंकित होने से उसके द्वारा बौद्ध धर्म को ग्रहण करने का प्रमाण मिलता है।

    ➣ हज़ारा ज़िले के पंजतर अभिलेख (65 ई.) में से ज्ञात होता है कि पहलव साम्राज्य का अन्त कुषाणों के द्वारा हुआ।

    कुषाण आक्रमण (15 ई.)

    ➣ पार्थियाइयों के पश्चात् कुषाण आये। इन्हे यूची या टोचेरियन कहा जाता था। यूची पाँच सम्प्रदायों में बँट हुआ था। इनमें कोई-चाउ-आंग शाखा ने भारत में कुषाण वंश की स्थापना की।

    ➣ कुषाणों का उद्गम चीन का पश्चिमी क्षेत्र एवं मध्य एशिया है। कुषाणों ने सबसे पहले बैक्ट्रिया या उत्तर अफगानिस्तान पर कब्जा किया और वहाँ से शकों को विस्थापित कर दिया।

    ➣ धीरे-धीरे वे काबुल घाटी की और बड़े और हिन्दूकुश पार करके गंधार पर कब्जा किया, और वहां यूनानियों और पार्थिवाइयों को अपदस्थ कर सत्ता जमाई।

    ➣ अंततः उन्होंने निचली सिंधु घाटी पर भी अधिकार कर लिया। इस प्रकार उनका साम्राज्य अमुदरिया से गंगा तक, मध्य एशिया के खुरासान से उत्तर प्रदेश के वाराणसी तक फैल गया।

    ➣ कुषाणों के दो राजवंश थे, जो एक के बाद एक आए। पहले राजवंश की स्थापना कडफिसेस नामक सरदारों के एक परिवार ने की। इस घराने का शासन 50 ई. से 28 वर्षों तक चला।

    ➣ इस राजवंश का पहला राजा कुजुल कडफिसेस था।

    कुजुल कडफिसेस (15 -65 ई. )

    ➣ कुषाण वंश का प्रथम शासक कुजुल कैडफाइसिस (कैडफाइसिस प्रथम) था। प्रारंभ में वह यूनानी राजा हर्मियस के अधीन था। किन्तु बाद में स्वतंत्र हो गया।

    ➣ इसने रोमन सिक्कों की नकल पर तांबे के सिक्के ढलवाये तथा महाराजाधिराज एवं भ्रमथित की उपाधि धारण की। ये सिक्के द्विलिपिक (यूनानी व खरोष्ठी) थे।

    कुजुल कैडफाइसिस के दो प्रकार के सिक्के मिलते हैं। प्रथम प्रकार के सिक्कों के मुखभाग पर काबुल के अंतिम यवन शासक हर्मियस का नाम यूनानी लिपि में लिखा है जबकि उसके पृष्ठ भाग पर कुजुल का नाम खरोष्ठी लिपि में लिखा गया है।

    ➣ दुसरे प्रकार के सिक्कों पर उसको राजकीय उपाधियां, महाराजस महतस् कुषाण-कुयुल कफस, उत्कीर्ण हैं।

    ➣ उसने बड़ी संख्या में सोने के सिक्के जारी किये। उसके सिक्कों पर एक ओर यूनानी लिपि तथा दूसरी ओर खरोष्ठी लिपि उत्कीर्ण है।

    विम कडफिसेस (15 -65 ई. )

    ➣ विम कडफिसस भारत में कुषाण शक्ति का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। उसने सिंधु नदी पार करके तक्षशिला और पंजाब पर अधिकार कर लिया।

    ➣ उसने बड़ी संख्या में सोने एंव ताम्बे के सिक्के जारी किये। उसके सिक्कों पर एक ओर यूनानी लिपि तथा दूसरी ओर खरोष्ठी लिपि उत्कीर्ण है।

    ➣ उसने अपने सोने और ताँबे के सिक्कों में महाराज, राजाधिराज, महीश्वर, सर्वलोकेश्वर आदि उपाधियां धारण किए।

    ➣ वह शैव मतानुयायी था तथा उसने ‘महेश्वर’ की उपाधि धारण की। उसके कुछ सिक्कों पर शिव, नंदी तथा त्रिशूल की आकृतियाँ मिलती हैं।

    भारत में व्यापक पैमाने पर सर्वप्रथम स्वर्ण सिक्के चलाने का श्रेय विम कडफिसस या कडफिसस द्वितीय को ही जाता है।

    ➣ यवन शासक एजेज द्वितीय की चांदी की मुद्राओं में मिलावट एवं अन्तराष्ट्रीय व्यापार में बढ़ती स्वर्ण मुदओं की साख के कारण विम कडफिसस को स्वर्ण मुद्राएँ जारी करने के लिए प्रेरित किया।

    वेदी पर यज्ञ में लगे राजा की आकृति वाले सिक्के भी सबसे पहले विम कडफिसेस ने ही चलाये।

    ➣ विम का समकालीन सातवाहन राजा कुन्तल सातकर्णि था, जो विक्रमादित्य द्वितीय के नाम से विख्यात था।

    ➣ कडफिसेस राजवंश के बाद कनिष्क राजवंश आया। इस वंश के राजाओं ने ऊपरी भारत और निचली सिंधु घाटी में अपना प्रभुत्व फैलाया।

    विम तक्षमकुषाण ( 65 -78 ई. )

    ➣ विम तक्षम कुजुल का उत्तराधिकारी हुआ। उसने कुषाण साम्राज्य को भारत में उत्तर पश्चिम तक बढ़ा दिया था।

    ➣ विम तक्षम जारी करवाये गए सिक्के बनारस से लेकर पंजाब तक बहुत बड़ी मात्रा में मिले है।

    ➣ उसके सिक्कों पर एक तरफ राजा की मूर्ति अंकित है तथा सिक्के के दूसरी तरफ शिव के भक्त नंदी बैल के साथ खड़े हुए शिव अंकित हैं।

    ➣ मथुरा ज़िले में मांट गाँव के पास इटोकरी नामक टीले से विम की बिना धड़ वाली विशाल मूर्ति प्राप्त हुई है।

    कनिष्क (78 -102 ई. )

    ➣ कनिष्क सबसे प्रसिद्ध कुषाण शासक था। राबाटक शिलालेख से ज्ञात होता है कि कनिष्क कुषाण वंश का चौथा शासक था।

    कंकाली टीला अभिलेख (मथुरा) में कनिष्क को महाराजा राजाधिराज देवपुत्र कनिष्क कहा गया है।

    ➣ कनिष्क ने अपने राज्यारोहण को उत्सव के रूप में मनाने और उस तिथि को यादगार बनाने के लिए 78 ई, से शक संवत की शुरुआत की थी।

    शक संवत भारत सरकार द्वारा प्रयोग में लाया जाता है।

    ➣ रोमन सम्राट की भाँति कनिष्क ने कैंसर या सीजर की उपाधि धारण की तथा शकों की भाँति क्षत्रप शासन व्यवस्था लागू की।

    मथुरा संभवतः उसके शासन का मुख्य केन्द्र था तथा दूसरा प्रशासनिक केन्द्र वाराणसी में था।

    ➣ इसका साम्राज्य मध्य एशिया के आधुनिक उज़्बेकिस्तान तजाकिस्तान, चीन के आधुनिक सिक्यांग एवं कांसू प्रान्त से लेकर अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और समस्त उत्तर भारत में बिहार एवं उड़ीसा तक फैला था।

    ➣ इतने विस्तृत साम्राज्य के शासन के लिए सम्राट् ने क्षत्रपों तथा महाक्षत्रपों की नियुक्ति की जिनका उल्लेख उसके लेखों में मिलता है।

    ➣ कनिष्क की प्रथम राजधानी पेशावर (पुरुषपुर) एवं दूसरी राजधानी मथुरा थी। राजतरंगिणी में उल्लेख है कि कनिष्क ने कश्मीर जीतकर वहाँ कनिष्कपुर नामक नगर बसाया।

    ➣ कनिष्क ने तक्षशिला में सिरमुख नामक स्थान पर एक नये नगर का निर्माण किया।

    ➣ पुरुषपुर (पेशावर) स्थित कनिष्क चैत्य का निर्माण वास्तुकार अंगिलस ने किया। यह पहला चैत्य है जिसमें लोहे के छत्र का प्रयोग हुआ है।

    श्रीधर्मपिटकनिदानसूत्र के चीनी अनुवाद से ज्ञात होता है कि कनिष्क ने पाटलिपुत्र पर आक्रमण कर वहां से प्रसिद्ध विद्वान अश्वघोष, बुद्ध का मिक्षापात्र तथा अनोखा मुर्गा प्राप्त किया।

    ➣ कनिष्क ने चीनी सेनापति के पास दूत भेजकर हान वंशीय राजकुमारी से विवाह की मांग की, जिसे ठुकरा दिया गया, बाद में कनिष्क चीनी सेनापति पान-चाओ से पराजित हुआ।

    ➣ बाद में पानचाओ के उत्तराधिकारी को हराकर चीनी शासक से खोतान, काशगरयारकन्द छीने। उसका रेशम मार्ग पर नियत्रण स्थापित हो गया।

    ➣ कनिष्क ने चीन से रोम को जाने वाले सिल्क मार्ग की तीन मुख्य शाखाओं पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया।

    • कैस्पियन सागर से होकर जाने वाला मार्ग।
    • मर्व से फरात नदी होते हुए रूम सागर पर बने बंदरगाह तक जाने वाला मार्ग।
    • भारत से लाल सागर तक जाने वाला मार्ग।

    ➣ यह रेशम या सिल्क मार्ग कुषाणों के लिए आय का बड़ा स्रोत था वे इस मार्ग पर व्यापारियों से चुंगी की वसूल करते थे।


    ➣ इस प्रकार कनिष्क ने प्रथम बार अन्तरराष्ट्रीय साम्राज्य की स्थापना की।

    ➣ कनिष्क का साम्राज्य बहुत विस्तृत था। उसकी उत्तरी सीमा चीन से स्पर्श होती थी। इसलिए उसने एक नया नगर कुसुमपुर (पाटलिपुत्र) की स्थापना की, और उसे पुष्पपुर नाम दिया। यही वर्तमान में पेशावर है।

    ➣ पेशावर के निकट कनिष्क ने एक बड़ा स्तूप और मठ बनवाया, जिसमें बुद्ध के अवशेष रखे गए। एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि इस स्तूप का निर्माण एक यूनानी इंजीनियर एजिसिलाओस ने कराया था।

    धार्मिक नीति

    ➣ कनिष्क ने सब धर्मों के प्रति सहिषुणता की नीति अपनाई। उसने अपनी मुद्राओं पर यूनानी, ईरानी, हिन्दू और बौद्ध देवी देवताओं की मूर्तियाँ अंकित करवाई थी।

    ➣ कनिष्क ने बौद्ध धर्म का मुक्त हृदय से संपोषण एवं संरक्षण किया। मौर्य वंशीय सम्राट अशोक के बाद कनिष्क ही बौद्ध धर्म का प्रवल समर्थक था।

    कनिष्क को द्वितीय अशोक कहा जाता है।

    ➣ कनिष्क बौद्ध धर्म (महायान शाखा) का अनुयायी था। आचार्य अश्वघोष ने उसे बौद्ध धर्म में दीक्षित किया था। जिसे वह पाटलिपुत्र से लाया था।

    भारत में पहले सूर्य मन्दिर की स्थापना मुल्तान में हुई थी जिसे कुषाणों ने बनाया था।

    ➣ कनिष्क ने भारत में कार्तिकेय की पूजा को आरम्भ किया और उसे विशेष बढ़ावा दिया। उसने कार्तिकेय और उसके अन्य नामों का अंकन भी अपने सिक्कों पर करवाया।

    चौथी बौद्ध संगीति

    ➣ पार्श्व कनिष्क के राजगुरु थे। पार्श्व की सलाह से ही कनिष्क ने चौथी बौद्ध संगीति का आयोजन किया।

    ➣ कनिष्क के शासनकाल में कश्मीर में कुण्डलवन में वसुमित्र की अध्यक्षता में चौथी बौद्ध संगीति हुई।

    ➣ चतुर्थ बौद्ध संगीति के उपाध्यक्ष एवं मुख्य अतिथि अश्वघोष थे, जिन्हें विशेष रूप से साकेत से बुलाया गया था। अश्वघोष कनिष्क के राजकवि थे।

    ➣ चौथी बौद्ध संगीति में बौद्ध ग्रन्थों पर जो टीकायें लिखी गई, उन्हें विभाषा शास्त्र कहा जाता है। विभाषा शास्त्र की रचना वसुमित्र ने की।

    ➣ बौद्धों की चतुर्थ संगीति में ही बौद्ध धर्म का दो सम्प्रदायों हीनयान और महायान में विभाजित हो गया था। जिसमे कनिष्क ने बौद्ध धर्म की महायान शाखा को राज्याश्रय प्रदान किया।

    कनिष्क के अभिलेख

    ➣ कनिष्क के कुल 12 अभिलेख प्राप्त होते है, जिनमें प्रमुख निम्न हैं-

    तक्षशिला चिर स्तूप लेख यह शासन के प्रथम वर्ष का लेख है (78 ई.) । इसे धर्मराजिका स्तूप भी कहते हैं।
    रबातक अभिलेखबैक्ट्रियन भाषा एवं ग्रीक लिपि में कुषाणों की वंशावली देने वाला यह प्रथम अभिलेख है। इसमें कनिष्क एवं कडफिसेस शासकों के बीच सम्बन्ध स्पष्ट करता है।
    सारनाथ एवं कौशाम्बी अभिलेखशासन के तीसरे वर्ष का है। सारनाथ अभिलेख से कनिष्क के मथुरा के महाक्षत्रप खरपल्लान व वाराणसी के क्षत्रप वनस्पर का नाम मिलता है।

    सिक्के

    ➣ कनिष्क के सिक्कों पर यूनानी भाषा में मिइरो (सूर्य), मेओ (चन्द्र) शिव आदि अंकित हैं, कुछ सिक्कों में शिव के हाथ में त्रिशूलडमरू और नाना (सुमेरियन मातृदेवी), ओयशो (भारतीय देव शिव) का अंकन है।

    ➣ कनिष्क ने युनानियों द्वारा प्रारम्भ द्विभाषी एवं द्विलिपि सिक्के बन्द करवा दिए।

    ➣ कनिष्क के सिक्के में सूर्य बायीं और खड़े हैं। बांए हाथ में दण्ड है जो रश्ना सें बंधा है। कमर के चारों ओर तलवार लटकी है, का अलकरण मिलता है।

    ➣ मानव के रूप में बुद्ध की आकृति का अंकन सर्वप्रथम कनिष्क की मुद्राओं पर हुआ। सर्वप्रथम मैत्रेय बुद्ध का अंकन कनिष्क प्रथम के सिक्कों पर है।

    ➣ कनिष्क के कुछ सिक्कों पर प्रभामण्डल युक्त बुद्ध की खड़ी प्रतिमा एवं नीचे यूनानी लिपि में बुद्ध खुदा हुआ है।

    ➣ कुछ ताँबे के सिक्कों पर साको मोनो बुद्ध खुदा हुआ है। कुछ सिक्कों पर यूनानी देवताओं की आकृतियां अंकित है।

    ➣ भारत में सिक्कों पर सूर्य का अंकन किसी शासक द्वारा पहली बार हुआ था।

    ➣ कनिष्क द्वारा जारी किये गये एक ताँबे के सिक्के पर उसे बलि वेदी पर बलि करते हुए दिखाया गया है।

    महास्थान (बोगरा) में पाई गई सोने की मुद्रा पर कनिष्क की एक खड़ी मूर्ति अंकित है।

    मथुरा में कनिष्क की एक प्रतिमा मिली है, जिसमें उन्हें घुटने तक चोगा एवं पैरों में भारी जूते पहने हुए दिखाया गया है।

    ➣ कनिष्क के शासनकाल में कला के क्षेत्र में गांधार शैली तथा मथुरा शैली दो स्वतंत्र शैलियों का विकास हुआ।

    ➣ महात्मा बुद्ध की प्रथम मूर्ति का निर्माण मथुरा शैली में हुआ है। जबकि सर्वाधिक बौद्ध मूर्तियों का निर्माण गांधार शैली के अंतर्गत हुआ है।

    ❑ इसे इंडो-ग्रीक शैली (ग्रीक-बुद्धिष्ट शैली) भी कहा जाता है। इसका केंद्र बिंदु गांधार था, अत: इसे गांधार कला शैली भी कहा जाता है।

    ❑ इसमें बुद्ध एवं बोधिसत्वों की मूर्तियां काले स्लेटी पाषाण से बनाई गई हैं।

    ❑ यह यूनानी देवता अपोलो की नकल प्रतीत होती है।

    ❑ इस कला शैली का जन्म मथुरा में हुआ। इस शैली में लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग हुआ है।

    ❑ इसमें बौद्ध, हिंदू एवं जैन धर्मों से संबंधित मूर्तियों का निर्माण किया गया है।

    ❑ बुद्ध की प्रथम मूर्ति के निर्माण का श्रेय (पहली शती ई.) इसी कला शैली को दिया जाता है।

    ➣ उल्लेखनीय है इतिहास में एक अन्य शैली, अमरावती शैली का भी उल्लेख मिलता है जिसका विकास कृष्णा- गोदावरी की निचली घाटी में सातवाहन शासकों के समय हुआ।

    ➣ अमरावती शैली की मूर्तियां में सफेद संगमरमर का उपयोग होता है। मुख्य रूप से बौद्ध प्रभाव देखने को मिलता है।

    कनिष्क के विद्वान

    चरक कनिष्क के राजवैद्य थे।
    अश्वघोष राजकवि, चौथी बौद्ध संगीति के मुख्य अतिथि व उपाध्यक्ष।
    वसुमित्र ये चौथी बौद्ध संगीति के अध्यक्ष ।
    मातृचेट अर्घ्यशतकम के लेखक।
    संगरक्ष कनिष्क के राजपुरोहित।
    नागार्जुन प्रज्ञापारमितासूत्र के लेखक एवं शून्यवाद के प्रतिपादक।
    एजिसिलाओस प्रसिद्ध ग्रीक विद्वान।

    अश्वघोष कनिष्क का राजकवि था जिसने बुद्धचरित, सौन्दरनन्द और शारिपुत्र प्रकरण की रचना की थी।

    ➣ कनिष्क काल में वसुमित्र ने महाविभाष सूत्र की रचना की जिसे बौद्धों का विश्वकोष कहा जाता है।

    नागार्जुन कनिष्क का दरबारी विद्वान था जिसने माध्यमिक सूत्र की रचना की जिसमें सापेक्षिकता का सिद्धांत प्रस्तुत किया इसके लिए इन्हें भारत का आइंस्टीन कहते है।

    ➣ कनिष्क के राजवैद्य चरक ने चरक संहिता की रचना की। जिसे शल्य चिकित्सा का प्राचीनतम ग्रंथ माना जाता है। अल्बेरूनी ने इसे औषधिशास्त्र का सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ बताया।

    चरक को शल्य चिकित्सा का प्रणेता माना गया है।

    ➣ कनिष्क ने कुल 23 वर्षों तक राज्य किया। उसकी मृत्यु 101 ई. के लगभग हुई थी। उसका उत्तराधिकारी हुविष्क था।

    ➣ कनिष्क की मृत्यु के पश्चात उसका बड़ा पुत्र वासिष्क ( 102 106 ई.) राजा हुआ, जिसने मात्र 4 वर्षों तक शासन किया। राजतरंगी इन्हें जुष्क कहा गया है।

    शक संवत (78 ई.) : भारत का प्राचीन राष्ट्रीय संवत

    ➣ इस संवत का आरंभ 78 ई.पू.में हुआ था। कुषाण राजा कनिष्क महान ने अपने राज्यारोहण को उत्सव के रूप में मनाने और उस तिथि को यादगार बनाने के लिए इस संवत की शुरुआत की।

    ➣ इस संवत की पहली तिथि चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा है और इसी तिथि पर कनिष्क ने राज्य सत्ता सम्हाली थी।

    ➣ शक संवत भारत का राष्ट्रीय कैलंडर है। भारत सरकार द्वारा इसे प्रयोग में लाया जाता है।

    ➣ भारत में इस संवत का प्रयोग वराहमिरि द्वारा 500 ई. से किया गया।

    ➣ यह संवत अन्य संवतों की तुलना में कहीं अधिक वैज्ञानिक और त्रुटिहीन है।

    ➣ यह संवत प्रत्येक वर्ष में 22 मार्च को शुरू होता है और इस दिन सूर्य विषुवत रेखा के ऊपर होता है और इसी कारण दिन और रात बराबर के समय के होते हैं।

    ➣ शक संवत के 365 दिन होते हैं और इसका लीप इयर भी अंग्रेजी ग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ ही होता है।

    ➣ लीप ईयर होने पर शक संवत 23 मार्च को शुरू होता है और उसमें 366 दिन होते हैं।

    ➣ एक अन्य विचार के अनुसार, उज्जयिनी में शक क्षत्रप चष्टन (78-110 ई.) ने शक संवत का प्रवर्तन किया।

    हुविष्क (106-140 ई.)

    ➣ वासिष्क के उपरांत उसका पुत्र हुविष्क (106-140ई.) शासक बना। इसके समय कुषाण सत्ता का प्रमुख केंद्र पेशावर से हटकर अब मथुरा हो गया था।

    ➣ इसने कश्मीर में हुष्कपुर नामक नगर (बारामूला के निकट) की स्थापना करवाई। यह शिवविष्णु का उपासक था। इसके चतुर्भुजी विष्णु के सिक्के प्राप्त हैं।

    ➣ हुविष्क के सिक्कों पर शिव, स्कन्द तथा विष्णु आदि देवताओं तथा सर्वप्रथम शृंग धारण किए उमा की आकृतियों का अंकन है।

    ➣ हुविष्क के सिक्कों पर संकर्षण एवं वासुदेव दोनों अंकित है। इसकी मुद्राओं पर ही सर्वाधिक संख्या में हिन्दु देवी देवताओं का अंकन है। साथ ही ईरानी (पारसी) देवता आहुरमज्दा का अंकन भी कुछ सिक्कों पर मिलता है।

    उमा एवं पाशुपत धर्म का प्राचीनतम अंकन हुविष्क की मुद्राओं पर ही हुआ है तथा कार्तिकेय और हरिहर का भी अंकन है।

    ➣ हुविष्क के मथुरा लेख से ज्ञात होता है कि श्रेणियाँ बैंक का कार्य करती थी। इसमें आटा पीसने वाली श्रेणी का उल्लेख है।

    ➣ हुविष्क ने मथुरा में एक मंदिर और बौद्ध बिहार बनवाया।

    ➣ वह संभवतः रुद्रदामा द्वारा पराजित हुआ और मालवा शकों के हाथ में चला गया।

    वासुदेव प्रथम (192 ई. -232 ई.)

    ➣ कनिष्क कुल का अन्तिम महान् शासक वासुदेव प्रथम था। वासुदेव प्रथम कुषाण शासक था, जिसका नाम भारतीय देवताओं पर था।

    ➣ वासुदेव के स्वर्णताम्र सिक्के प्राप्त हुये हैं। सिक्कों पर शिव व उमा का चित्र है। एक सिक्के पर शिव का हाथी के साथ चित्रण है।

    ➣ कुषाण शासकों के सोनेतांबे के सिक्के बहुतायत से मिलते हैं, लेकिन विम कडफिससहुविष्क का एक-एक चाँदी का सिक्का भी प्राप्त हुआ है।

    ➣ कनिष्क द्वितीय ने रोमन राजाओं की उपाधि सीजर एवं कैसर उपाधि धारण की।

    ➣ कनिष्क द्वितीय के आरा पाषाण लेख (खरोष्ठी भाषा) में कनिष्क द्वितीय को महरजस रजतिरज देवपुत्रस कैसरस कहा गया है।

    वासुदेव द्वितीय (275 ई. – 300 ई.)

    ➣ वासुदेव द्वितीय अन्तिम कुषाण शासक था। उसके समय में उत्तर पश्चिम का बहुत बड़ा भाग कुषाणों के हाथ से निकल गया। संभवत: ईरान के ससैनियन शासकों ने इसे पराजित कर कुषाण वंश का अन्त किया।

    ➣ ससैनियन (ईरानी ) शासकों ने वासुदेव के शिवनन्दी प्रकार के सिक्कों को ग्रहण किया, जिन्हें ससैनियन-कुषाण सिक्के कहा जाता है।

    • प्रथम बार स्वर्ण मुद्रा इंडो-ग्रीक शासकों ने चलाई।
    • कुषाणों ने सर्वाधिक शुद्ध स्वर्ण सिक्के (124 ग्रेन के) जारी किए।
    • सर्वाधिक स्वर्ण मुद्राएँ गुप्तों ने चलवाई।
    • कुषाणों को सर्वाधिक ताम्र सिक्के चलाने का श्रेय भी प्राप्त है।
    • उन्होंने चांदी के सिक्के नहीं चलाए; केवल स्वर्णतांबे के सिक्के जारी किए।
  • मौर्योत्तर काल | Q&A Practice

    ➣ शुंग वंश संस्थापक कौन था?
    उत्तर : पुष्यमित्र शुंग

    ➣ पुष्यमित्र शुंग ने अन्तिम मौर्य राजा वृहद्रथ की हत्या कर की थी। वह मौर्यों का क्या था?
    उत्तर : सेनापति

    ➣ पुष्यमित्र शुंग स्वयं को राजा के बदले क्या कहलाना पसंद करता था?
    उत्तर : सेनापति

    ➣ पुष्यमित्र शुंग ने उत्तर प्रदेश के किस शहर को अपनी राजधानी बनाया था?
    उत्तर : अयोध्या

    ➣ किन साहित्यों में उल्लेख मिलता है कि शुंग भारद्वाज वंश के ब्राह्मण थे?
    उत्तर : पाणिनि के अष्टाध्यायी और पुराण में

    ➣ किस तिब्बती लेखक ने भी शुंगों को ब्राह्मण माना है?
    उत्तर : तारानाथ

    ➣ दो अश्वमेघ का अनुष्ठान करने वाले पुष्यमित्र शुंग ने अशोक द्वारा निर्मित 84 हजार स्तूपों को नष्ट कर दिया था। इतिहासकार उसको क्या मानते थे?
    उत्तर : कट्टरवादी ब्राह्मण

    ➣ अयोध्या शिलालेख के अनुसार, पुष्यमित्र शुंग ने अपने शासन के अंतिम दिनों में किसके नेतृत्व में दो अश्वमेध यज्ञ करवाये थे?
    उत्तर : पतंजलि

    ➣ पुष्यमित्र की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र अग्निमित्र शुंग वंश का राजा हुआ। उसके पहले वह कहां का उपराजा (राज्यपाल) था?
    उत्तर : विदिशा

    ➣ मालविकाग्निमित्रम् चौथी शताब्दी के उत्तरार्द्ध एवं पांचवी शताब्दी के पूर्वार्द्ध में रचित एक संस्कृत ग्रंथ है, इसकी रचना किसने की थी ?
    उत्तर : कालिदास

    ➣ अग्निमित्र के किस पुत्र को शुंग वंश का चौथा राजा बनाया गया, जिसके शासन काल में शुंग सेना ने यवनों को पराजित किया ?
    उत्तर : वसुमित्र

    ➣ वसुमित्र ने यूनानियों की चुनौती को स्वीकार करते हुए अपने 100 सामंतों को लेकर किस नदी के किनारे यूनानियों से युद्ध किया ?
    उत्तर : सिंधु नदी

    ➣ यवनों ने पाटलिपुत्र या कुसुमध्वज पर विजय प्राप्त करने के उद्देश्य से कहां के लोगों को साथ लेकर मध्य प्रदेश पर आक्रमण किया?
    उत्तर : साकेत, पंचाल और मथुरा

    ➣ पंचाल और मथुरा के राजाओं (पार्थिवों) का पता उनके सिक्कों से चलता है। हाल ह्री में मिले एक मुद्रा संग्रह में पंचाल वंश के 21 मित्र राजाओं के सिक्के मिले हैं। इन सिक्कों को क्या कहा जाता है?
    उत्तर : मित्र मुद्राए

    ➣ किसके विवरण से यह ज्ञात होता है कि यवन गंगा और पाटलिपुत्र तक बढ़ आये थे। बाद में ये आक्रमणकारी मध्य प्रदेश से ही क्यों वापस चले गये ?
    उत्तर : आपसी लड़ाई के कारण

    ➣ शुंग वंश का दसवां और अंतिम राजा कौन था?
    उत्तर : देवभूति

    ➣ शुंग वंश के अंतिम शासक की हत्या उसके किस अमात्य ने की थी ?
    उत्तर : वसुदेव

    ➣ शुंग वंश की समाप्ति के बाद जिस वंश की स्थापना हुई वह किस नाम से जाना जाता है?
    उत्तर : कण्व अथवा कण्वायन वंश (75-30 ई.पू.)

    ➣ कण्व वंश की स्थापना किसने की थी ?
    उत्तर : वसुदेव

    ➣ कण्व वंश के राजा ब्राह्मण थे। वे क्या कहलाते थे?
    उत्तर : द्विज

    ➣ मौर्योत्तर काल का अंतिम शासक कौन था ?
    उत्तर : सुशर्मा ( कण्व वंश)

    ➣ एक सातवाहन शासक द्वारा ‘हाल’ छद्म नाम से लिखी गयी ‘गाधा सप्तशती’ किस भाषा में लिखी गयी एक सुन्दर काव्य रचना है ?
    उत्तर : प्राकृत भाषा

    ➣ वैयाकरण पाणिनी की किस प्रसिद्ध रचना की टीका है?
    उत्तर : अष्टाध्यायी

    ➣ चरकसंहिता किस शास्त्र से सम्बंधित एक प्रसिद्ध मौलिक ग्रंथ है ?
    उत्तर : चिकित्साशास्त्र का

    ➣ चरकसंहिता के रचयिता चरक किस कुषाण शासक के समकालीन थे?
    उत्तर : कनिष्क

    ➣ ‘नाट्यशास्त्र’ की रचना किसने की थी?
    उत्तर : भरत ने

    ➣ कामसूत्र की रचना किसने की थी?
    उत्तर : वात्स्यायन

    ➣ बुद्धचरित’ नामक संस्कृत काव्य की रचना कनिष्क के किस समकालीन साहित्यकार ने की थी ?
    उत्तर : अश्वघोष

    ➣ अश्वघोष ने एक अन्य छंदबद्ध काव्य ‘सौन्दरानन्द’ की रचना की। यह कृति बुद्ध के किस सौतेले भाई के बौद्ध में धर्म दीक्षित होने के प्रसंग पर आधारित है?
    उत्तर : आनन्द

    ➣ सबसे पहले सम्पूर्ण नाटक रचने का श्रेय भास को जाता है। उनके किस नाटक का कथानक राजा उदयन एवं वासवदत्ता की कथा पर आधारित है?
    उत्तर : स्वप्नवासवदत्ता

    ➣ रुद्रदामन का गिरनार अभिलेख किस भाषा के काव्य का अनूठा उदाहरण है ?
    उत्तर : संस्कृत

    ➣ कुषाण साम्राज्य के किस विहार के अभिलेख में संस्कृत का प्रयोग हुआ है?
    उत्तर : सुई विहार

    ➣ कार्ले का चैत्य तथा अजंता एवं एलोरा को गुफाओं का निर्माण किन शासकों की महत्वपूर्ण कृतियां हैं?
    उत्तर : सातवाहन

    ➣ कनिष्क काल में सुप्रसिद्ध विद्वान नागार्जुन ने किस वाद का प्रतिपादन किया?
    उत्तर : शून्यवाद

    ➣ नागार्जुन ने अपने ग्रंथ ‘माध्यमिक सूत्र’ में सृष्टि सिद्धांत (जेमवतल व त्मसंजपअपजल ) का प्रतिपादन किया। इसके लिए उनको किस संज्ञा से विभूषित किया जाता है?
    उत्तर : भारत का आइंस्टीन

    ➣ भारत का आइंस्टीन किसे कहा गया है?
    उत्तर : नागार्जुन

    ➣ वसुमित्र ने बौद्ध धर्म के किस ग्रंथ पर ‘महाविभाषसूत्र’ नामक टीका लिखी त्रिपिटक

    ➣ सातवाहनों की राजकीय भाषा प्राकृत थी । इसकी लिपि क्या थी?
    उत्तर : ब्राह्मी लिपि

    ➣ कहां से प्राप्त स्तूप गोलाकार था, जहां सातवाहनों के परवर्ती इक्ष्वाकुओं की राजधानी थी ?
    उत्तर : नागार्जुनकोंडा

  • मौर्यत्तर काल एंव सातवाहन साम्राज्य MCQ प्रश्न | UPSC

    1. प्राचीन भारत में निम्न में से किस एक ने नियमित रूप से सोने के सिक्के चलाए ?
    (a) सातवाहन
    (b) शक
    (c) कुषाण
    (d) पार्थियन
    U.P. Lower Sub. (Pre) 2004
    उत्तर-(c)
    कुषाण शासकों ने प्राचीन भारत में सबसे व्यवस्थित एवं नियमित रूप से स्वर्ण मुद्राओं का प्रचलन किया। यद्यपि हिंद-यवन (इंडो-ग्रीक) शासकों ने उत्तर-पश्चिम भारत में स्वर्ण सिक्कों की परंपरा आरंभ की थी, परंतु इसे व्यापक एवं संगठित रूप देने का श्रेय कुषाणों को ही जाता है। कुषाणों ने स्वर्ण के साथ-साथ ताम्र मुद्राएं भी बड़े पैमाने पर जारी कीं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कुषाण सम्राट विम कडफिसेस पहले कुषाण शासक थे जिन्होंने बड़े पैमाने पर स्वर्ण सिक्के जारी किए — इनके सिक्कों पर शिव और नंदी का चित्रण मिलता है, जो उनके शैव मतावलंबी होने का प्रमाण है। कनिष्क प्रथम के स्वर्ण सिक्के अपनी शुद्धता और कलात्मकता के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं — उन पर ग्रीक, ईरानी और भारतीय देवताओं का एक साथ अंकन मिलता है, जो कुषाण साम्राज्य की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाता है।
    2. बुद्ध का किसके सिक्कों पर अंकन हुआ है?
    (a) विम कडफिसेस
    (b) कनिष्क
    (c) नहपाण
    (d) बुध गुप्त
    U.P.P.C.S. (Pre) 2010
    उत्तर-(b)
    कुषाण सम्राट कनिष्क प्रथम के सिक्कों पर बुद्ध की आकृति अंकित मिलती है। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि ये सिक्के बौद्ध धर्म में बुद्ध की मानवीय प्रतिमा को सिक्कों पर दर्शाने के प्राचीनतम प्रमाणों में से एक हैं। कनिष्क बौद्ध धर्म का उदार संरक्षक था और उसी के काल में चौथी बौद्ध संगीति का आयोजन हुआ था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कनिष्क के सिक्कों पर बुद्ध को “बोद्दो” (Boddo) नाम से अंकित किया गया है — यह यूनानी लिपि में बुद्ध का लिप्यंतरण है। इसके अतिरिक्त कनिष्क के सिक्कों पर ग्रीक देवता हेलिओस, ईरानी देवता मिहिर (सूर्य), और भारतीय देवता शिव समेत 30 से अधिक विभिन्न देवताओं की आकृतियाँ मिलती हैं, जो उसकी धार्मिक सहिष्णुता का प्रमाण है।
    3. सूची I को सूची II से सुमेलित कीजिए तथा नीचे दिए गए कूट में से सही
    सूची I सूची II
    A. डिमेट्रियस 1. पहलव
    B. रुद्रदामन 2. कुषाण
    C. गोंडोफर्नीज 3. हिंद- यूनानी
    D. विम 4. शक
    कूट :
    A B C D उत्तर चुनिए
    (a) 1 3 2 4
    (b) 4 3 1 2
    (c) 3 4 1 2
    (d) 1 2 3 4
    U.P. R.O/A.R.O. (Mains) 2017
    उत्तर-(c)
    सही सुमेलन इस प्रकार है — डिमेट्रियस हिंद-यूनानी (इंडो-ग्रीक) शासक था जिसने लगभग 200-190 ईसा पूर्व में उत्तर-पश्चिम भारत पर आक्रमण किया। रुद्रदामन शक वंश का प्रतापी क्षत्रप था। गोंडोफर्नीज पहलव (पार्थियन) वंश का शासक था। विम (विम कडफिसेस) कुषाण वंश का शासक था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गोंडोफर्नीज का उल्लेख ईसाई परंपरा में भी मिलता है — माना जाता है कि ईसा मसीह के शिष्य सेंट थॉमस उसके शासनकाल में भारत आए थे। डिमेट्रियस पहला हिंद-यवन शासक था जिसने “द्विभाषीय” सिक्के जारी किए — एक तरफ ग्रीक और दूसरी तरफ खरोष्ठी लिपि में लेख अंकित थे।
    4. निम्नलिखित में से किस हिंद-यवन शासक ने सीसे के सिक्के जारी किए थे?
    (a) स्ट्रैटो II
    (b) स्ट्रैटो I
    (c) डेमेट्रियस
    (d) मिनांडर
    U.P.P.S.C. (R.I.) 2014
    उत्तर-(a)
    हिंद-यवन (इंडो-ग्रीक) शासक स्ट्रैटो II ने सीसे (Lead) की धातु में सिक्के जारी किए थे, जो अपने वंश के अन्य शासकों से उसे अलग करता है। उसका शासनकाल लगभग 25 ईसा पूर्व से 10 ईस्वी तक रहा। वह हिंद-यवन वंश के अंतिम शासकों में से एक था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: स्ट्रैटो II का शासन मुख्यतः पंजाब क्षेत्र तक सीमित था और उसे शकों के बढ़ते दबाव का सामना करना पड़ा था। अधिकांश हिंद-यवन शासकों ने चांदी और तांबे के सिक्के जारी किए, इसलिए सीसे के सिक्के दुर्लभ एवं ऐतिहासिक दृष्टि से विशेष महत्व रखते हैं — ये सिक्के मुद्रा संग्रहकर्ताओं और पुरातत्वविदों के लिए अमूल्य हैं।
    5. निम्नलिखित में से कौन-सा एक अन्य तीनों के समसामयिक नहीं था?
    (a) बिंबिसार
    (b) गौतम बुद्ध
    (c) मिलिंद
    (d) प्रसेनजित
    I.A.S. (Pre) 2005
    उत्तर-(c)
    बिंबिसार (544–492 ईसा पूर्व), गौतम बुद्ध (563–483 ईसा पूर्व) और प्रसेनजित — ये तीनों एक-दूसरे के समकालीन थे। बिंबिसार मगध का हर्यंक वंशी शासक था, जबकि प्रसेनजित कोसल महाजनपद का राजा था। मिलिंद (मिनांडर) एक इंडो-ग्रीक शासक था जिसका काल लगभग 155–130 ईसा पूर्व था — यह इन तीनों से कई शताब्दियों बाद का है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मिलिंद और बौद्ध भिक्षु नागसेन के बीच हुए प्रसिद्ध दार्शनिक संवाद “मिलिंदपण्हो” (मिलिंद के प्रश्न) पालि भाषा में संकलित हैं — यह ग्रंथ बौद्ध दर्शन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। बिंबिसार बौद्ध धर्म का पहला राजकीय संरक्षक माना जाता है — उसने स्वयं गौतम बुद्ध से मिलकर बौद्ध संघ को राजकीय सहयोग प्रदान किया था।
    6. निम्नलिखित शासकों में से किसके सिक्कों पर संकर्षण एवं वासुदेव दोनों अंकित हैं?
    (a) हुविष्क
    (b) कनिष्क
    (c) समुद्रगुप्त
    (d) अगाथोक्लीज
    U.P.P.C.S. (Mains) 2017
    उत्तर-(d)
    हिंद-यवन शासक अगाथोक्लीज के सिक्के अफगानिस्तान के ऐ-खानम (Ai-Khanum) से प्राप्त हुए हैं। इन सिक्कों पर वासुदेव (कृष्ण) और संकर्षण (बलराम) दोनों की आकृतियाँ उकेरी गई हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि भागवत/वैष्णव धर्म उस काल में उत्तर-पश्चिम भारत में भी प्रचलित था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अगाथोक्लीज के ये सिक्के भारतीय देवताओं को दर्शाने वाले सबसे प्राचीन सिक्कों में गिने जाते हैं — इन सिक्कों पर खरोष्ठी और ब्राह्मी दोनों लिपियों का प्रयोग हुआ है, जो अत्यंत दुर्लभ है। संकर्षण के हाथ में हल और मूसल का अंकन उनके पारंपरिक प्रतीक चिह्नों के रूप में इन सिक्कों पर भी परिलक्षित होता है।
    7. ‘काव्य शैली’ का प्राचीनतम नमूना किसके अभिलेख में मिलता है?
    (a) काठियावाड़ के रुद्रदामन के
    (b) अशोक के
    (c) राजेंद्र प्रथम के
    (d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
    U.P.P.C.S. (Pre) 1997
    उत्तर-(a)
    शक क्षत्रप रुद्रदामन प्रथम (130–150 ई.) का जूनागढ़ अभिलेख गुजरात में गिरनार पर्वत पर स्थित है। ब्राह्मी लिपि और शुद्ध संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण यह अभिलेख अब तक ज्ञात संस्कृत अभिलेखों में सर्वाधिक प्राचीन है। इसी अभिलेख में संस्कृत काव्य शैली का प्रथम एवं सर्वप्राचीन उदाहरण प्राप्त होता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इस अभिलेख में रुद्रदामन की विजयों, व्यक्तित्व, वंशावली और सुदर्शन झील के जीर्णोद्धार का विस्तृत वर्णन है। उल्लेखनीय है कि यह जूनागढ़ शिला वही है जिस पर सम्राट अशोक के 14 शिलालेख और बाद में स्कंदगुप्त का अभिलेख भी उत्कीर्ण किया गया — अर्थात् एक ही शिला पर तीन अलग-अलग कालों के अभिलेख विद्यमान हैं, जो इसे पुरातत्व की दृष्टि से अनमोल बनाता है।
    8. किस अभिलेख में रुद्रदामन प्रथम की विभिन्न उपलब्धियां वर्णित
    (a) जूनागढ़
    (b) भितरी
    (c) नासिक
    (d) सांची
    53rd to 55th B.P.S.C. (Pre) 2011
    उत्तर-(a)
    गुजरात के जूनागढ़ से प्राप्त अभिलेख में रुद्रदामन प्रथम की वंशावली, उनकी विजयों, शासन-कुशलता और व्यक्तिगत गुणों का विस्तृत एवं काव्यात्मक वर्णन किया गया है। यह अभिलेख विशुद्ध संस्कृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में लिखा गया है तथा इसे प्रशस्ति काव्य की श्रेणी में रखा जाता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: रुद्रदामन ने अपनी पुत्री का विवाह गौतमीपुत्र सातकर्णी के पुत्र से कराया था — इस प्रकार शक और सातवाहन वंशों के बीच वैवाहिक संबंध स्थापित हुए थे, भले ही दोनों राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी भी रहे। जूनागढ़ अभिलेख में रुद्रदामन को व्याकरण, संगीत, तर्कशास्त्र और राजनीति में पारंगत बताया गया है, जो उस युग के शासकों के बहुमुखी व्यक्तित्व को उजागर करता है।
    9. बिना बेगार के किसने सुदर्शन झील का जीर्णोद्धार कराया?
    (a) चंद्रगुप्त मौर्य
    (b) बिंदुसार
    (c) अशोक
    (d) रुद्रदामन प्रथम
    U.P.P.C.S. (Pre) 2014
    उत्तर-(d)
    जूनागढ़ अभिलेख के अनुसार रुद्रदामन प्रथम ने गिरनार के निकट स्थित सुदर्शन झील का जीर्णोद्धार बिना किसी प्रकार की बेगार (जबरिया श्रम) लिए, बिना कर वृद्धि किए और अपने स्वयं के कोष से कराया। इस झील का निर्माण मूलतः मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के समय उनके प्रांतीय गवर्नर पुष्यगुप्त वैश्य ने कराया था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सुदर्शन झील के इतिहास में तीन बार प्रमुख निर्माण/जीर्णोद्धार का उल्लेख मिलता है — पहली बार चंद्रगुप्त मौर्य के काल में निर्माण, दूसरी बार अशोक के राज्यपाल तुषास्फ द्वारा मरम्मत, और तीसरी बार रुद्रदामन द्वारा व्यापक जीर्णोद्धार। बाद में गुप्त सम्राट स्कंदगुप्त ने भी इस झील की मरम्मत कराई थी, जिसका उल्लेख उसी जूनागढ़ शिला पर उत्कीर्ण उनके अभिलेख में है।
    10. कार्दमक क्षत्रपों ने निम्नलिखित में से किस धातु में अति दुर्लभ सिक्के प्रचलित किया?
    (a) ताम्र
    (b) रजत
    (c) पोटीन
    (d) स्वर्ण
    U.P.B.E.O. (Pre) 2019
    उत्तर-(a)
    कार्दमक वंश के शासकों की मुद्राओं को दो वर्गों में बाँटा जाता है — रजत मुद्राएं (जो क्षहरात वंशी परंपरा की निरंतरता हैं) और पोटीन निर्मित सिक्के। कार्दमक शासक चष्टन ने रजत एवं ताम्र दोनों धातुओं में मुद्राएं जारी कीं, परंतु ताम्र सिक्के अत्यंत दुर्लभ रहे। अतः इस वंश के संदर्भ में अतिदुर्लभ सिक्के ताम्र धातु के ही माने जाते हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कार्दमक वंश के संस्थापक चष्टन (Chashtana) को उज्जयिनी के पश्चिमी क्षत्रपों का आदि पुरुष माना जाता है — टॉलेमी की भूगोल पुस्तक में इसका उल्लेख “तिआस्तानेस” (Tiastanes) नाम से मिलता है। कार्दमक वंश के सबसे शक्तिशाली शासक रुद्रदामन प्रथम थे जिन्होंने सातवाहन राजा गौतमीपुत्र सातकर्णी को दो बार पराजित किया था।
    11. उत्तरी तथा उत्तरी-पश्चिमी भारत में सर्वाधिक संख्या में तांबे के सिक्कों को जारी किया था-
    (a) इंडो-ग्रीको ने
    (b) कुषाणों ने
    (c) शकों ने
    (d) प्रतिहारों ने
    U.P.P.C.S. (Pre) 2005
    उत्तर-(b)
    उत्तरी एवं उत्तर-पश्चिमी भारत में स्वर्ण सिक्कों का प्रचलन सर्वप्रथम इंडो-ग्रीक शासकों ने किया, किंतु इसे व्यापक एवं नियमित रूप देने का श्रेय कुषाणों को है। कुषाण शासकों ने स्वर्ण और ताम्र — दोनों ही धातुओं में बड़ी संख्या में सिक्के जारी किए। ताम्र सिक्कों की संख्या और वितरण की दृष्टि से कुषाण इस क्षेत्र में सर्वोपरि थे।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कुषाण शासक विम कडफिसेस पहले भारतीय शासक थे जिन्होंने बड़े पैमाने पर ताम्र सिक्के जारी किए और उन पर शिव की आकृति के साथ “महेश्वर” की उपाधि अंकित की। कुषाण सिक्कों पर तिथि अंकन की परंपरा भी थी जो इतिहासकारों को कुषाण कालक्रम निर्धारित करने में अत्यंत सहायक रही है।
    12. यौधेय सिक्कों पर किस देवता का अंकन मिलता है?
    (a) वासुदेव
    (b) मित्र
    (c) इंद्र
    (d) कार्तिकेय
    U.P.P.C.S. (Spl)(Mains) 2008
    उत्तर-(d)
    यौधेय एक प्राचीन गणतांत्रिक जनजाति थी जिसका उल्लेख पाणिनि की अष्टाध्यायी, वराहमिहिर की बृहत्संहिता तथा विभिन्न पुराणों में मिलता है। इनका भौगोलिक क्षेत्र दक्षिण-पूर्वी पंजाब से राजस्थान तक विस्तृत था। इनके ताम्र सिक्कों पर युद्ध के देवता कार्तिकेय (स्कंद/षण्मुख) का चित्रण मिलता है, जो इनकी वीरता की परम्परा को दर्शाता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यौधेयों की मुद्राओं पर “यौधेयानां बहुधान्यके” जैसे ब्राह्मी लेख मिलते हैं, जो उनकी समृद्ध कृषि अर्थव्यवस्था का संकेत देते हैं। गुप्त काल में यौधेयों ने गुप्त साम्राज्य की अधीनता स्वीकार कर ली थी, जिसका प्रमाण समुद्रगुप्त के प्रयागस्तंभ अभिलेख में मिलता है।
    13. इनमें से किसने सर्वप्रथम व्यापक पैमाने पर स्वर्णमुद्रा का प्रचलन किया?
    (a) पुष्यमित्र शुंग
    (b) मिनांडर
    (c) विम कडफिसेस
    (d) गौतमीपुत्र शातकर्णि
    64th B.P.S.C. (Pre) 2018
    उत्तर-(c)
    कुषाण वंश के शासक विम कडफिसेस को भारतीय उपमहाद्वीप में व्यापक स्तर पर सोने की मुद्राओं के प्रचलन का श्रेय दिया जाता है। यह कुषाणों का भारत को सबसे महत्त्वपूर्ण आर्थिक योगदान माना जाता है। इन सिक्कों की शुद्धता और भार-मानक रोमन ऑरियस के समकक्ष थे, जो उस समय की अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मानकता को दर्शाता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: विम कडफिसेस के सोने के सिक्कों पर शिव, त्रिशूल और नंदी के चिह्न उत्कीर्ण हैं, जो इनकी शैव धर्म के प्रति आस्था को प्रकट करते हैं। इन सिक्कों का वजन लगभग 8 ग्राम था और ये रोमन साम्राज्य के साथ भारत के सक्रिय व्यापार संबंधों की पुष्टि करते हैं।
    14. निम्नलिखित में से किस शासक को सर्वप्रथम सोने के सिक्के जारी करने का श्रेय दिया जाता है?
    (a) कुजुल कडफिसेस
    (b) विम कडफिसेज
    (c) कनिष्क प्रथम
    (d) हुविष्क
    U.P.P.C.S. (Mains) 2009
    उत्तर-(b)
    कुषाण वंश के शासकों में विम कडफिसेज (विम कडफिसेस) ही वह प्रथम शासक थे जिन्होंने स्वर्ण सिक्के जारी किए। इनसे पूर्व कुजुल कडफिसेस केवल ताम्र सिक्के ही चलाते थे। विम कडफिसेस ने सोने के सिक्के जारी कर भारतीय मुद्रा प्रणाली को एक नई दिशा दी। अतिरिक्त तथ्य: विम कडफिसेस के स्वर्ण सिक्कों की एक विशेषता यह थी कि इन पर ग्रीक और खरोष्ठी दोनों लिपियों में लेख उत्कीर्ण हैं, जो कुषाण साम्राज्य की बहुसांस्कृतिक प्रकृति को दर्शाते हैं। उनका शासनकाल लगभग 80-100 ई. माना जाता है।
    15. निम्नलिखित में से किसने भारत में स्वर्ण सिक्कों का प्रचलन नियमित उपयोग के लिए किया था?
    (a) विम कडफिसेस ने
    (b) कुजुल कडफिसेस ने
    (c) कनिष्क ने
    (d) हर्मवीज ने
    U.P. P.C.S. (Pre) 2015
    उत्तर-(a)
    कुषाण वंश के विम कडफिसेस — जो कनिष्क प्रथम के पिता थे — ने भारत में स्वर्ण सिक्कों को दैनिक व्यापारिक उपयोग हेतु नियमित रूप से प्रचलित किया। इनसे पहले कुजुल कडफिसेस ने केवल तांबे के सिक्के चलाए थे। विम के इस कदम ने भारतीय अर्थव्यवस्था में स्थायी परिवर्तन लाया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: विम कडफिसेस के सिक्कों पर “महेश्वर” (महान शिव के भक्त) उपाधि उत्कीर्ण है, जो भारतीय धर्म के प्रति उनके गहरे झुकाव को दर्शाती है। उनके सिक्के रोमन सिक्कों के वजन मानक (लगभग 8 ग्राम) पर आधारित थे, जो तत्कालीन भारत-रोम व्यापार की गहनता को उजागर करता है।
    16. विक्रम एवं शक संवतों में कितना अंतर (वर्षों में) है?
    (a) 57 वर्ष
    (b) 78 वर्ष
    (c) 135 वर्ष
    (d) 320 वर्ष
    U.P.U.D.A./L.D.A. (Pre) 2006
    उत्तर-(c)
    विक्रम संवत् 57 ई.पू. से प्रारंभ होता है और शक संवत् 78 ई. से। इसलिए दोनों के बीच का अंतर 57 + 78 = 135 वर्ष है। व्यावहारिक रूप से, यदि ग्रेगेरियन वर्ष में 57 जोड़ें तो विक्रम संवत् मिलता है और 78 घटाएँ तो शक संवत् प्राप्त होता है। अतः दोनों संवतों का अंतर सदैव 135 वर्ष रहता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: विक्रम संवत् को ‘कृत संवत्’ और ‘मालव संवत्’ के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि इसे मालव गणराज्य के लोगों ने प्रारंभ किया था। शक संवत् भारत सरकार द्वारा अपनाया गया राष्ट्रीय पंचांग है, जो 22 मार्च 1957 से आधिकारिक रूप से लागू हुआ।
    17. शक संवत् पर आधारित राष्ट्रीय पंचांग (कैलेंडर) का 1 चैत्र, ग्रेगेरियन कैलेंडर पर आधारित 365 दिन के सामान्य वर्ष की निम्नलिखित तिथियों में किस एक तद्नुरूप है?
    (a) 22 मार्च (अथवा 21 मार्च)
    (b) 15 मई (अथवा 16 मई )
    (c) 31 मार्च (अथवा 30 मार्च)
    (d) 21 अप्रैल (अथवा 20 अप्रैल)
    I.A.S. (Pre) 2014
    उत्तर-(a)
    चैत्र भारतीय राष्ट्रीय पंचांग का पहला महीना है। सामान्य वर्ष (365 दिन) में 1 चैत्र 22 मार्च को पड़ता है, जबकि लीप वर्ष (366 दिन) में यह 21 मार्च को होता है। राष्ट्रीय कैलेंडर की तिथियाँ ग्रेगेरियन कैलेंडर की तिथियों से स्थायी रूप से संबद्ध हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: भारत सरकार ने शक संवत् पर आधारित राष्ट्रीय पंचांग को 22 मार्च 1957 (1 चैत्र, शक संवत् 1879) से आधिकारिक रूप से अपनाया था। राष्ट्रीय पंचांग में 12 महीने होते हैं और वर्ष चैत्र से प्रारंभ होकर फाल्गुन पर समाप्त होता है।
    18. कुषाण शासक कनिष्क का राज्याभिषेक किस सन् में हुआ?
    (a) 178 बी.सी.
    (b) 101 ए.डी.
    (c) 58 बी.सी.
    (d) 78 ए.डी.
    U.P.P.C.S. (Pre) 1991
    उत्तर-(d)
    कनिष्क के राज्याभिषेक की तिथि इतिहासकारों में लंबे समय से विवादास्पद रही है। इस पर विचार-विमर्श के लिए 1913 और 1960 में लंदन में दो अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किए गए। 1960 के द्वितीय सम्मेलन में व्यापक सहमति 78 ई. के पक्ष में बनी और इसी वर्ष से शक संवत् की गणना की जाती है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कनिष्क कुषाण वंश का सबसे प्रतापी शासक था। उसका साम्राज्य अफगानिस्तान से लेकर उत्तर भारत तक और मध्य एशिया के कुछ भागों तक फैला हुआ था। उसने चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन कश्मीर में करवाया था, जिसमें महायान बौद्ध धर्म को मान्यता दी गई।
    19. बुद्ध का किसके सिक्कों पर अंकन हुआ है?
    (a) विम कडफिसेस
    (b) कनिष्क
    (c) नहपाण
    (d) बुध गुप्त
    U.P.P.C.S. (Pre) 2010
    उत्तर-(b)
    कुषाण शासक कनिष्क के सिक्कों पर बुद्ध की आकृति अंकित मिलती है। यह ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि ये सिक्के बुद्ध की मानवीय रूप में सर्वप्रथम मूर्तिकला अभिव्यक्तियों में से एक माने जाते हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कनिष्क के सिक्कों पर बुद्ध के अतिरिक्त ग्रीक, ईरानी और भारतीय देवी-देवताओं की आकृतियाँ भी मिलती हैं, जो उसकी धार्मिक उदारता को दर्शाती हैं। कनिष्क के सिक्कों पर लेख तीन लिपियों — खरोष्ठी, ब्राह्मी और यूनानी — में मिलते हैं, जो उसके साम्राज्य की बहुसांस्कृतिक प्रकृति को दर्शाते हैं।
    20. अश्वघोष किसका समकालीन था ?
    (a) अशोक का
    (b) चंद्रगुप्त द्वितीय का
    (c) कनिष्क का
    (d) हर्षवर्धन का
    U.P.P.C.S. (Mains) 2008
    Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2010
    उत्तर-(c)
    अश्वघोष महान बौद्ध कवि, दार्शनिक और नाटककार थे जो कुषाण शासक कनिष्क के समकालीन और राजकवि थे। उन्होंने बुद्धचरित (संस्कृत महाकाव्य), सौन्दरानन्द तथा महायान श्रद्धोत्पाद शास्त्र की रचना की।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अश्वघोष को प्रथम संस्कृत महाकाव्य ‘बुद्धचरित’ का रचयिता माना जाता है, जिसका चीनी और तिब्बती भाषाओं में भी अनुवाद हुआ। वे पहले ब्राह्मण धर्म के अनुयायी थे, बाद में बौद्ध धर्म में दीक्षित हुए और महायान बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा।
    21. निम्नलिखित में से कौन एक कनिष्क के दरबार से संबद्ध नहीं था?
    (a) अश्वघोष
    (b) चरक
    (c) नागार्जुन
    (d) पतंजलि
    U.P. Lower Sub. (Spl) (Pre) 2008
    उत्तर-(d)
    कनिष्क के दरबार में अश्वघोष (राजकवि), चरक (आयुर्वेद विशेषज्ञ), नागार्जुन (बौद्ध दार्शनिक) और पार्श्व जैसे विद्वान जुड़े थे। पतंजलि इनसे बहुत पूर्व शुंग काल (लगभग 150 ई.पू.) में हुए थे और उन्होंने पाणिनि की अष्टाध्यायी पर ‘महाभाष्य’ लिखा था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चरक ने आयुर्वेद का प्रसिद्ध ग्रंथ ‘चरकसंहिता’ लिखा, जो आज भी आयुर्वेद चिकित्सा का आधार ग्रंथ माना जाता है। नागार्जुन माध्यमिक दर्शन के प्रणेता थे और उन्हें ‘भारत का आइंस्टीन’ भी कहा जाता है क्योंकि उनके ‘शून्यवाद’ के सिद्धांत ने भारतीय दर्शन को गहराई से प्रभावित किया।
    22. कनिष्क के सारनाथ बौद्ध प्रतिमा अभिलेख की तिथि क्या है ?
    (a) 78 ई. सन्
    (b) 81 ई. सन्
    (c) 98 ई. सन्
    (d) 121 ई. सन्
    U.P.P.C.S. (Pre) 2014
    उत्तर-(b)
    कनिष्क के सारनाथ बौद्ध अभिलेख की तिथि 81 ई. है। यह बौद्ध प्रतिमा मूलतः मथुरा में निर्मित हुई थी और कनिष्क के राज्यारोहण (78 ई.) के तीसरे वर्ष अर्थात् 81 ई. में सारनाथ में स्थापित की गई। यह अभिलेख कनिष्क काल की कला एवं इतिहास का महत्त्वपूर्ण प्रमाण है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सारनाथ (वाराणसी के निकट) वह स्थान है जहाँ गौतम बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना पहला उपदेश (धर्मचक्रप्रवर्तन) दिया था। मथुरा कला और गांधार कला शैली दोनों का विकास कुषाण काल में ही हुआ — मथुरा कला में देशी परंपरा प्रबल थी जबकि गांधार कला में ग्रीक प्रभाव स्पष्ट था।
    23. निम्नलिखित में कौन-सा वर्ष दिसंबर, 2009 में शक संवत् का वर्ष होगा ?
    (a) 1931
    (b) 1952
    (c) 2066
    (d) 2087
    U.P.P.C.S. (Mains) 2007
    उत्तर-(a)
    शक संवत् ज्ञात करने के लिए ग्रेगेरियन वर्ष में से 78 घटाया जाता है। अतः दिसंबर 2009 में शक संवत् = 2009 − 78 = 1931 होगा। ध्यान रखें कि शक संवत् का नया वर्ष मार्च में प्रारंभ होता है, इसलिए दिसंबर में वही वर्ष चल रहा होगा जो मार्च में शुरू हुआ था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शक संवत् भारत का आधिकारिक राष्ट्रीय पंचांग है और इसका उपयोग भारत सरकार के राजपत्र (Gazette), आकाशवाणी के समाचार-प्रसारण तथा सरकारी कैलेंडरों में ग्रेगेरियन तिथियों के साथ-साथ किया जाता है।
    24. कनिष्क के समकालीन निम्नलिखित नामों का अध्ययन करें और निम्नांकित उत्तर कोड के अनुसार अपना उत्तर इंगित करें-
    (I) अश्वघोष
    (II) वसुमित्र
    (III) कालिदास
    (IV) कंबन
    उत्तर कोड :
    (a) I और IV
    (b) II और III
    (c) I और II
    (d) वे सभी
    U.P.P.C.S. (Pre) 1994
    उत्तर-(c)
    अश्वघोष कनिष्क के राजकवि थे और वसुमित्र उनके आश्रित विद्वान, जिन्होंने कश्मीर में आयोजित चतुर्थ बौद्ध संगीति की अध्यक्षता की थी। कालिदास गुप्तकाल (चंद्रगुप्त द्वितीय के समय, लगभग 4थी-5वीं शताब्दी ई.) में हुए थे, जबकि कंबन 12वीं शताब्दी के तमिल कवि थे जिन्होंने ‘कम्बरामायणम्’ की रचना की।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वसुमित्र ने ‘महाविभाषा’ नामक बौद्ध ग्रंथ की रचना की जो सर्वास्तिवाद बौद्ध दर्शन का प्रमुख ग्रंथ माना जाता है। चतुर्थ बौद्ध संगीति (कनिष्क के काल में) में ही हीनयान और महायान के रूप में बौद्ध धर्म का आधिकारिक विभाजन माना जाता है।
    25. विक्रम संवत् कब से प्रारंभ हुआ?
    (a) 78 ई.
    (b) 57 ई.पू.
    (c) 72 ई.पू.
    (d) 56 ई.पू.
    U.P.P.C.S. (Pre) 1992
    उत्तर-(b)
    विक्रम संवत् 57 ई.पू. से प्रारंभ हुआ। जैन साहित्य के अनुसार महावीर स्वामी के निर्वाण (527 ई.पू.) और विक्रम संवत् के प्रारंभ के बीच 470 वर्षों का अंतर है। अतः 527 − 470 = 57 ई.पू. इसकी प्रारंभिक तिथि निर्धारित होती है। इसे परंपरागत रूप से राजा विक्रमादित्य द्वारा शकों पर विजय के उपलक्ष्य में प्रारंभ माना जाता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: विक्रम संवत् आज भी राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे अनेक भारतीय राज्यों में हिंदू त्यौहारों और शुभ अवसरों की तिथि निर्धारित करने के लिए प्रयुक्त होता है। नेपाल में विक्रम संवत् को आधिकारिक राष्ट्रीय पंचांग का दर्जा प्राप्त है।
    26. शक संवत् कब प्रारंभ किया गया?
    (a) 58 ई.
    (b) 78 ई.
    (c) 320 ई.
    (d) 606 ई.
    U.P.P.C.S. (Pre) 1990 U.P.R.O./ A.R.O. (Mains) 2013
    उत्तर-(b)
    शक संवत् 78 ई. से प्रारंभ हुआ। जैन ग्रंथों के अनुसार विक्रमादित्य के उत्तराधिकारी को विक्रम संवत् के 135वें वर्ष में शकों ने पराजित किया और इसी उपलक्ष्य में शक संवत् आरंभ हुआ। गणना के अनुसार 135 − 57 = 78 ई., यही शक संवत् की प्रारंभिक तिथि है। अधिकांश इतिहासकार कनिष्क को इसका प्रवर्तक मानते हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शक संवत् का उपयोग प्राचीन भारतीय खगोलशास्त्रीय ग्रंथों जैसे आर्यभट्ट की ‘आर्यभटीय’ और वराहमिहिर की ‘पंचसिद्धांतिका’ में भी किया गया है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के प्रक्षेपण अभिलेखों में भी शक संवत् की तिथि अंकित की जाती है।
    27. शुंग वंश के बाद किस वंश ने भारत पर राज किया?
    (a) सातवाहन
    (b) कुषाण (कुशान)
    (c) कनवा (कण्व)
    (d) गुप्त
    45th B.P.S.C. (Pre) 2001
    उत्तर-(c)
    शुंग वंश का अंतिम शासक देवभूति था, जिसे उसके ही मंत्री (आमात्य) वासुदेव कण्व ने षड्यंत्र करके मार डाला और 73 ई.पू. में कण्व वंश की नींव रखी। यह वंश भी शुंगों की तरह ब्राह्मण वंश था। कण्व वंश ने लगभग 45 वर्षों तक मगध पर शासन किया और उसके चार राजाओं का उल्लेख मिलता है — वासुदेव, भूमिमित्र, नारायण और सुशर्मा।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कण्व वंश के अंतिम राजा सुशर्मा को सातवाहन वंश के संस्थापक सिमुक ने पराजित कर मार डाला, जिससे कण्व वंश का अंत हुआ। पुराणों के अनुसार कण्व वंश ने 45 वर्ष (73 ई.पू. – 28 ई.पू.) तक शासन किया।
    28. बाल विवाह की प्रथा आरंभ हुई-
    (a) मौर्यकाल में
    (b) कुषाणकाल में
    (c) गुप्तकाल में
    (d) हर्षवर्धन के काल में
    R.A.S. / R.T.S. (Pre) (Re-exam.) 2000
    उत्तर-(b)
    कुषाण काल (प्रथम-द्वितीय शताब्दी ई.) में भारतीय समाज में बाल विवाह की प्रथा का प्रचलन आरंभ हुआ। इस युग में कन्याओं के विवाह की आयु घटाकर 8 से 10 वर्ष कर दी गई। इसके साथ ही स्त्रियों का उपनयन संस्कार भी समाप्त होने लगा, जिससे उनकी सामाजिक स्थिति में गिरावट आई।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बाल विवाह के प्रचलन का एक प्रमुख कारण उस काल में विदेशी आक्रमणकारियों (शक, कुषाण आदि) से लड़कियों की सुरक्षा की चिंता भी मानी जाती है। मनुस्मृति में भी बालिका विवाह का समर्थन दिखता है, जो इसी कालखंड की रचना मानी जाती है।
    29. सिमुक निम्न वंशों में से किसका संस्थापक था?
    (a) चेर
    (b) चोल
    (c) पाण्ड्य
    (d) सातवाहन
    U.P.P.C.S. (Spl) (Mains) 2008
    उत्तर-(d)
    सातवाहन वंश की स्थापना सिमुक (जिसे सिंधुक या शिप्रक भी कहा जाता है) ने की थी। उसने कण्व वंश के अंतिम शासक सुशर्मा की हत्या करके लगभग 60 ई.पू. में इस वंश की नींव रखी। सातवाहन मूलतः दक्कन क्षेत्र के शासक थे और उनकी राजधानी प्रतिष्ठान (वर्तमान पैठण, महाराष्ट्र) थी।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सातवाहन शासक ‘अमात्य’ और ‘महाभोज’ जैसी प्रशासनिक उपाधियों का प्रयोग करते थे। सातवाहनों ने रोमन साम्राज्य के साथ व्यापक समुद्री व्यापार किया — मसाले, मोती और कपड़े का निर्यात किया जाता था।
    30. निम्नलिखित में से कौन कनिष्क प्रथम के दरबार में नहीं गया था?
    (a) अश्वघोष
    (b) पार्श्व
    (d) विशाखदत्त
    (c) वसुमित्र
    U.P.P.C.S. (Mains) 2005
    उत्तर-(d)
    कनिष्क प्रथम के दरबार में अश्वघोष (बौद्ध कवि और दार्शनिक), वसुमित्र (बौद्ध विद्वान), पार्श्व (बौद्ध धर्मगुरु), नागार्जुन, और चरक (आयुर्वेदाचार्य) जैसे विद्वान थे। विशाखदत्त एक संस्कृत नाटककार थे जो गुप्त काल से संबंधित थे — उन्होंने ‘मुद्राराक्षस’ और ‘देवी चंद्रगुप्तम’ नामक नाटकों की रचना की। अतः वे कनिष्क के दरबार से संबंधित नहीं थे।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कनिष्क के दरबार में महाकवि अश्वघोष ने ‘बुद्धचरित’ की रचना की थी, जिसे ‘भारत का प्रथम महाकाव्य’ भी कहा जाता है। कनिष्क ने कश्मीर में चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन करवाया था।
    31. मौर्यों के बाद दक्षिण भारत में सबसे प्रभावशाली राज्य था-
    (a) सातवाहन
    (b) पल्लव
    (c) चोल
    (d) चालुक्य
    U.P.P.C.S. (Pre) 1993
    उत्तर-(a)
    मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद दक्षिण भारत में सातवाहन वंश सबसे शक्तिशाली और प्रभावशाली राजवंश बनकर उभरा। सातवाहनों ने लगभग 450 वर्षों (60 ई.पू. – 240 ई.) तक दक्षिण और दक्कन क्षेत्र पर शासन किया। इनका साम्राज्य वर्तमान महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और मध्य भारत के बड़े हिस्से पर फैला था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सातवाहन शासक गौतमीपुत्र शातकर्णि को इस वंश का सबसे महान शासक माना जाता है, जिन्होंने शकों को पराजित किया था। सातवाहनों के काल में ही ‘अमरावती स्तूप’ का निर्माण हुआ, जो बौद्ध कला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
    32. पुष्यमित्र शुंग द्वारा दो अश्वमेध यज्ञ किए जाने के बारे में जानकारी किस लेख से मिलती है?
    (a) सारनाथ लेख
    (b) बेसनगर लेख
    (c) अयोध्या लेख
    (d) हाथीगुम्फा लेख
    U.P.P.C.S. (Pre) 2018
    उत्तर-(c)
    अयोध्या अभिलेख से यह जानकारी मिलती है कि शुंग वंश के संस्थापक पुष्यमित्र शुंग ने दो अश्वमेध यज्ञ संपन्न कराए थे। पुष्यमित्र शुंग ने 184 ई.पू. में मौर्य वंश के अंतिम शासक बृहद्रथ की हत्या करके शुंग वंश की स्थापना की थी। वह स्वयं एक ब्राह्मण था और पारंपरिक वैदिक धर्म का समर्थक था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: पुष्यमित्र शुंग के शासनकाल में ही महान संस्कृत व्याकरणाचार्य पतंजलि ने ‘महाभाष्य’ की रचना की थी। पुष्यमित्र ने यूनानी राजा डेमेट्रियस के आक्रमण को भी सफलतापूर्वक विफल किया था।
    33. किस चीनी जनरल ने कनिष्क को हराया था ?
    (a) पान चाऊ
    (b) पान यांग
    (c) शी हुआंग टी
    (d) हो टी
    Jharkhand P.C.S. (Pre) 2003
    उत्तर-(a)
    चीनी स्रोतों के अनुसार, हान वंश के प्रसिद्ध सेनापति पान चाऊ ने 73 ई. से 94 ई. के बीच चीनी तुर्किस्तान पर अभियान चलाया। कुषाण शासक ने हान राजकुमारी से विवाह का प्रस्ताव भेजा, जिसे पान चाऊ ने अस्वीकार कर दिया। इससे रुष्ट होकर कुषाण शासक ने आक्रमण किया परंतु पराजित हुए। यद्यपि अधिकांश इतिहासकार इस कुषाण शासक को विम कडफिसेस मानते हैं, तथापि यदि कनिष्क का राज्यारोहण 78 ई. माना जाए तो यह युद्ध कनिष्क के काल का हो सकता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: पान चाऊ को चीन के इतिहास में ‘रेशम मार्ग का रक्षक’ भी कहा जाता है। कुषाण साम्राज्य रेशम मार्ग (Silk Route) पर नियंत्रण रखता था, जिससे उसे भारी व्यापारिक लाभ मिलता था — यही नियंत्रण चीन के साथ उनके संघर्ष का एक प्रमुख कारण था।
    34. इनमें से किस आयुर्वेदाचार्य ने तक्षशिला विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त की थी?
    (a) सुश्रुत
    (b) वाग्भट्ट
    (c) चरक
    (d) जीवक
    U.P. Lower Sub. (Pre) 2015
    उत्तर-(c&d)
    तक्षशिला (वर्तमान पाकिस्तान के रावलपिंडी जिले में स्थित) प्राचीन भारत का सर्वाधिक प्रतिष्ठित शिक्षा केंद्र था और गांधार राज्य की राजधानी भी था। यह वैद्यक (आयुर्वेद) तथा धनुर्विद्या के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध था। कनिष्क के राजवैद्य चरक तथा मगध नरेश बिंबिसार के राजवैद्य जीवक दोनों ने यहीं से शिक्षा प्राप्त की थी। इनके अतिरिक्त चाणक्य, वसुबंधु और कोशल नरेश प्रसेनजित ने भी यहाँ अध्ययन किया था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जीवक ने तक्षशिला में 7 वर्षों तक आयुर्वेद का अध्ययन किया था और वे बौद्ध धर्म के अनुयायी थे — उन्होंने स्वयं बुद्ध का भी उपचार किया था। तक्षशिला विश्व के प्राचीनतम विश्वविद्यालयों में से एक माना जाता है, जिसकी स्थापना लगभग 700 ई.पू. में हुई थी।
    35. निम्नलिखित में से कौन-सा शासक वर्ण-व्यवस्था का रक्षक कहा जाता है?
    (a) पुष्यमित्र शुंग
    (b) खारवेल
    (c) गौतमीपुत्र शातकर्णि
    (d) वासुदेव
    Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2013
    उत्तर-(c)
    सातवाहन वंश के महान शासक गौतमीपुत्र शातकर्णि (लगभग 106–130 ई.) ने अपने अभिलेखों में दावा किया है कि उन्होंने विछिन्न हो रही चातुर्वर्ण्य व्यवस्था (चार वर्णों की सामाजिक संरचना) को पुनर्स्थापित किया और वर्णसंकर (अर्थात् वर्णों के मिश्रण) को रोका। इसी कारण उन्हें ‘वर्ण-व्यवस्था का रक्षक’ की उपाधि दी जाती है। उन्होंने पश्चिमी क्षत्रपों (शकों) को पराजित करके अपनी शक्ति का विस्तार किया था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गौतमीपुत्र शातकर्णि की माता गौतमी बलश्री ने नासिक प्रशस्ति लेख (नासिक अभिलेख) जारी करवाया था, जिससे उनकी उपलब्धियों की जानकारी मिलती है। गौतमीपुत्र शातकर्णि को ‘एकाराट’ (एकमात्र शासक) की उपाधि भी प्राप्त थी।
    36. निम्न में से किस वंश के साम्राज्य की सीमाएं भारत के बाहर तक फैली थीं?
    (a) गुप्त वंश
    (b) मौर्य वंश
    (c) कुषाण वंश
    (d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
    Uttarakhand U.D.A./L.D.A. (Mains) 2006
    उत्तर-(b&c)
    मौर्य और कुषाण दोनों वंशों के साम्राज्य की सीमाएँ भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर तक फैली हुई थीं। सेल्यूकस निकेटर से संधि के पश्चात चंद्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य काबुल, कंधार और बलूचिस्तान तक विस्तृत था। कुषाण शासक कनिष्क का साम्राज्य उत्तर में मध्य एशिया (तुरफान) से लेकर दक्षिण में विंध्य पर्वत तक और पश्चिम में उत्तरी अफगानिस्तान से पूर्व में बिहार तक फैला था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कुषाण वंश की उत्पत्ति मध्य एशिया की यूझी (Yuezhi) जनजाति से हुई थी, जो चीन से विस्थापित होकर बैक्ट्रिया होते हुए भारत आई। कनिष्क की राजधानी पुरुषपुर (वर्तमान पेशावर, पाकिस्तान) थी, और उनके सिक्कों पर ग्रीक, ईरानी तथा भारतीय देवताओं के चित्र मिलते हैं, जो साम्राज्य की बहुसांस्कृतिक प्रकृति को दर्शाते हैं।
    37. निम्नलिखित नगरों में से किसका उल्लेख कनिष्क के रबतक अभिलेख में नहीं है?
    (a) श्रावस्ती
    (b) कौशाम्बी
    (c) पाटलिपुत्र
    (d) चम्पा
    U.P.R.O. / A.R.O. (Mains) 2014
    उत्तर-(a)
    रबतक अभिलेख 1993 में अफगानिस्तान के शुर्ख कोटल के निकट ‘रबतक’ नामक स्थान से प्राप्त हुआ। यह यूनानी लिपि और बैक्ट्रियन भाषा में लिखा गया है तथा कुषाण शासक कनिष्क से संबंधित है। इस अभिलेख में साकेत, कौशाम्बी, पाटलिपुत्र और चम्पा — इन चार नगरों का उल्लेख मिलता है। श्रावस्ती का इसमें कोई उल्लेख नहीं है, अतः उत्तर (a) सही है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: रबतक अभिलेख कुषाण इतिहास की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे कनिष्क की वंशावली और उनके पूर्वजों — कुजुल कडफिसेस, विम ताक्षम (विम कडफिसेस) — के नामों की पुष्टि होती है। यह अभिलेख कनिष्क के राज्यारोहण वर्ष के विवाद को सुलझाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
    38. जो कला शैली भारतीय और यूनानी (ग्रीक) आकृति का सम्मिश्रण है, उसे कहते हैं-
    (a) शिखर
    (b) वेरा
    (c) गांधार
    (d) नागर
    R.A.S./R.T.S. (Pre) 2008
    R.A.S./R.T.S. (Pre) 1993
    उत्तर-(c)
    गांधार कला शैली भारतीय एवं यूनानी (ग्रीक) कला परंपराओं के मिश्रण से उत्पन्न हुई एक अद्वितीय शैली है। इसके मुख्य संरक्षक शक एवं कुषाण शासक थे। इस शैली का विषय-वस्तु पूर्णतः बौद्ध धर्म से संबंधित था, इसीलिए इसे ‘ग्रीको-बुद्धिस्ट’, ‘इंडो-ग्रीक’ अथवा ‘ग्रीको-रोमन’ कला भी कहा जाता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:गांधार शैली में बुद्ध की मूर्तियों पर यूनानी प्रभाव स्पष्ट दिखता है — उनके वस्त्र टोगा की तरह, घुंघराले बाल, और स्पष्ट चेहरे की विशेषताएं यूनानी मूर्तिकला की याद दिलाती हैं।
    गांधार कला का प्रमुख केंद्र वर्तमान पाकिस्तान और अफगानिस्तान में था — विशेष रूप से पेशावर (पुरुषपुर), तक्षशिला और जलालाबाद।
    39. प्राचीन काल के भारत पर आक्रमणों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा एक सही कालानुक्रम है ?
    (a) यूनानी-शक-कुषाण
    (b) यूनानी-कुषाण-शक
    (c) शक-यूनानी-कुषाण
    (d) शक-कुषाण-यूनानी
    I.A.S. (Pre) 2006
    उत्तर-(a)
    भारत पर विदेशी आक्रमणकारियों का सही कालानुक्रम है — यूनानी (326 ई.पू., सिकंदर महान), शक (प्रथम शताब्दी ई.पू.), और कुषाण (पहली शताब्दी ई.)। सिकंदर ने झेलम नदी के तट पर हाइडेस्पीज का युद्ध लड़ा था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:सिकंदर के आक्रमण (326 ई.पू.) ने भारत और यूनान के बीच व्यापारिक एवं सांस्कृतिक संपर्क का मार्ग प्रशस्त किया, जिसके फलस्वरूप हेलेनिस्टिक कला का प्रभाव भारतीय उपमहाद्वीप पर पड़ा।
    कुषाण वंश मध्य एशिया की युएज़ी जनजाति से उत्पन्न हुआ था। उनके महान शासक कनिष्क प्रथम ने बौद्ध धर्म की चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन कश्मीर (या कुंडलवन) में करवाया था।
    40. कला की गांधार शैली निम्न समय में फली-फूली-
    (a) कुषाणों के समय
    (b) गुप्तों के समय
    (c) अकबर के समय
    (d) मौर्यों के समय
    38th B.P.S.C. (Pre) 1992
    उत्तर-(a)
    गांधार कला शैली कुषाण शासन काल में अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँची। कुषाण सम्राट कनिष्क के शासनकाल में दो प्रमुख कला शैलियों का विकास हुआ — (1) गांधार शैली, जो उत्तर-पश्चिम में यूनानी प्रभाव के साथ फली-फूली, और (2) मथुरा शैली, जो शुद्ध भारतीय परंपरा का प्रतिनिधित्व करती थी।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:गांधार कला शैली लगभग पहली से पाँचवीं शताब्दी ई. तक सक्रिय रही। इसमें स्लेटी शिस्ट (Schist) पत्थर का उपयोग किया जाता था जो उस क्षेत्र में सहज उपलब्ध था।
    41. निम्नलिखित में से किस मूर्ति कला में सदैव हरित स्तरित चट्टान (शिस्ट) का प्रयोग माध्यम के रूप में होता था?
    (a) मौर्य मूर्ति कला
    (b) मथुरा मूर्ति कला
    (c) भरहुत मूर्ति कला
    (d) गांधार मूर्ति कला
    I.A.S. (Pre) 1996
    उत्तर-(d)
    गांधार मूर्तिकला में सदैव हरित स्तरित शिस्ट चट्टान का उपयोग किया जाता था। यह पत्थर गांधार क्षेत्र (वर्तमान उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान) में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध था। मथुरा कला में इसका आंशिक अनुसरण हुआ, परंतु वहाँ मुख्यतः लाल बलुआ पत्थर (Red Sandstone) का प्रयोग होता था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:मथुरा कला शैली में बुद्ध की मूर्तियाँ पूर्णतः स्वदेशी परंपरा में बनाई जाती थीं — पतले वस्त्र, घुटा हुआ सिर, और भारतीय शारीरिक गठन इसकी पहचान थी। यह शैली गुप्तकालीन कला की पूर्वपीठिका बनी।
    गांधार और मथुरा दोनों शैलियाँ बुद्ध की मानवीय प्रतिमाएँ बनाने में अग्रणी रहीं। इससे पहले के मौर्यकाल में बुद्ध को प्रतीकों (पाद-चिह्न, छत्र, धर्मचक्र) द्वारा दर्शाया जाता था, न कि मानवाकृति में।
    42. निम्नलिखित में से कौन सही सुमेलित नहीं है? सूची-I (राजवंश) सूची-II (सिक्कों की धातुएं)
    (a) कुषाण- स्वर्ण एवं ताम्र
    (b) गुप्त- स्वर्ण एवं रजत
    (c) सातवाहन -स्वर्ण
    (d) कलचुरि -स्वर्ण, रजत एवं ताम्र
    U.P.R.O/A.R.O. (Pre) 2016
    उत्तर-(c)
    सातवाहन शासकों ने स्वर्ण सिक्के नहीं चलाए — उन्होंने चाँदी, ताँबा और सीसे के सिक्के प्रचलन में रखे। कुषाणों ने अत्यंत शुद्ध सोने के सिक्के जारी किए (यद्यपि भारत में सर्वप्रथम स्वर्ण सिक्के हिंद-यवन/इंडो-ग्रीक शासकों ने चलाए थे)। गुप्तों ने स्वर्ण व रजत, और कलचुरियों ने तीनों धातुओं के सिक्के चलाए।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:सातवाहन काल के चाँदी के सिक्कों पर राजा का नाम प्राकृत में लिखा होता था और उन पर हाथी, शेर, अश्व तथा जहाज जैसी आकृतियाँ उत्कीर्ण होती थीं — ये उनके समुद्री व्यापार की ओर भी संकेत करती हैं।
    43. अफगानिस्तान का बमियान प्रसिद्ध था
    (a) हिंदू मंदिर के कारण
    (b) हाथी दांत के काम हेतु
    (c) स्वर्ण सिक्कों के टंकण हेतु
    (d) बुद्ध प्रतिमा के लिए
    U.P.P.C.S. (Spl) (Mains) 2008
    उत्तर-(d)
    अफगानिस्तान का बामियान क्षेत्र पर्वत की चट्टानों को तराश कर बनाई गई विशालकाय बुद्ध प्रतिमाओं के लिए विश्व-विख्यात था। ये प्रतिमाएँ गांधार कला की उत्कृष्ट उपलब्धि थीं। दुर्भाग्यवश, मार्च 2001 में तालिबान शासन ने इन ऐतिहासिक प्रतिमाओं को गोलाबारी एवं विस्फोटकों से नष्ट कर दिया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:बामियान की दो मुख्य बुद्ध प्रतिमाएँ क्रमशः 55 मीटर और 37 मीटर ऊँची थीं — ये दुनिया की सबसे बड़ी खड़ी बुद्ध प्रतिमाओं में से थीं। इनका निर्माण लगभग 6वीं शताब्दी ई. में हुआ था।

    UNESCO ने बामियान घाटी को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया है। इन प्रतिमाओं के विध्वंस के बाद वहाँ पुनर्निर्माण की संभावनाओं पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस जारी है।
    44. निम्नलिखित युग्मों में से कौन-सा एक सही सुमेलित है?
    (a) हड़प्पा सभ्यता – चित्रित धूसर मृद्भांड
    (b) कुषाण – गांधार कला शैली
    (c) मुगल – अजंता चित्रकारी
    (d) मराठा – पहाड़ी चित्र शैली
    I.A.S. (Pre) 2001
    Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2008
    उत्तर-(b)
    केवल कुषाण–गांधार कला शैली का युग्म सही है। शेष तीनों गलत हैं: चित्रित धूसर मृद्भांड (Painted Grey Ware) हड़प्पा से नहीं बल्कि उत्तर वैदिक काल (लगभग 1000–600 ई.पू.) से संबंधित है; अजंता की चित्रकारी गुप्त व वाकाटक काल की देन है, मुगलकाल की नहीं; और पहाड़ी चित्र शैली मराठाओं से नहीं बल्कि हिमालयी राजपूत रियासतों (कांगड़ा, बसोहली, चंबा आदि) से संबंधित है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:कुषाण शासक कनिष्क (लगभग 78–101 ई.) के काल में गांधार शैली के साथ-साथ मथुरा शैली भी पनपी। दोनों शैलियों में अंतर यह था कि गांधार में विदेशी प्रभाव था जबकि मथुरा शुद्ध देशज परंपरा में थी।
    45. सूची-I तथा सूची-II को सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट से सही
    सूची-I सूची-II
    A. गाधार कला 1. मिनांडर
    B. जूनागढ़ शिलालेख 2. पतिक
    C. मिलिंदपन्हो 3. कुषाण
    D. तक्षशिला लेख 4. रुद्रदामन I
    कूट :
    A B C D उत्तर चुनिए –
    (a) 1 3 4 2
    (b) 2 4 3 1
    (c) 3 4 1 2
    (d) 2 1 3 4
    U.P.P.C.S. (Pre) 2017
    उत्तर-(c)
    सही सुमेलन इस प्रकार है —
    गांधार कला → कुषाण (कनिष्क के संरक्षण में विकसित)
    जूनागढ़ शिलालेख → रुद्रदामन I (शक शासक, लगभग 150 ई.)
    मिलिंदपन्हो → मिनांडर (यूनानी राजा, जिसे ‘मिलिंद’ भी कहते हैं)
    तक्षशिला लेख → पतिक (कुषाण काल का शिलालेख, उत्तर-पश्चिम भारत में)
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:जूनागढ़ शिलालेख संस्कृत भाषा में लिखित सबसे प्रारंभिक अभिलेखों में से एक है। इसी अभिलेख में सुदर्शन झील के जीर्णोद्धार का उल्लेख मिलता है, जिसे मौर्यकाल में चंद्रगुप्त ने बनवाया था।
    मिलिंदपन्हो (Milindapanha) एक प्रसिद्ध बौद्ध ग्रंथ है जिसमें यूनानी राजा मिनांडर (मिलिंद) और बौद्ध भिक्षु नागसेन के बीच दार्शनिक संवाद वर्णित हैं। मिनांडर बाद में बौद्ध धर्म का अनुयायी बन गया था।
    46. गांधार कला शैली एक संश्लेषण है-
    (a) भारतीय तथा फारसी कला का
    (b) भारतीय तथा चीनी कला का
    (c) भारतीय तथा तुर्की-अफगानी कला का
    (d) भारतीय तथा यूनानी कला का
    U.P. P.C.S. (Pre) 1996
    उत्तर-(d)
    गांधार कला शैली भारतीय और यूनानी (ग्रीक) कला का अद्भुत संश्लेषण है। यह शैली सिकंदर के आक्रमण के बाद भारत में आए यूनानी कलात्मक प्रभाव का परिणाम थी। इसका विकास मुख्यतः कुषाण काल (पहली–तीसरी शताब्दी ई.) में हुआ।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:गांधार कला पर रोमन कला का भी प्रभाव पड़ा — विशेषतः वस्त्रों की भंगिमाओं और चेहरे की रूपरेखा में रोमन मूर्तिकला की झलक मिलती है, जिसके कारण इसे कभी-कभी ‘इंडो-रोमन’ शैली भी कहते हैं।
    47. नीचे दो वक्तव्य दिए गए हैं, जिसमें एक को अभिकथन (A) व दूसरे को कारण (R) कहा गया है :
    अभिकथन (A) – सातवाहन काल में संस्कृत के साथ प्राकृत व अन्य लोक भाषाओं का विकास हुआ।
    कारण (R) – सातवाहन राजाओं ने साहित्य रचना के लिए संस्कृत तथा अन्य लोक भाषाओं को अपनाया। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर का चयन कीजिए
    (a) (A) तथा (R) दोनों सही हैं और (A) का सही स्पष्टीकरण (R) है।
    (b) (A) तथा (R) दोनों सही हैं, किंतु (A) का सही स्पष्टीकरण (R) नहीं है।
    (c) (A) सही है, किंतु (R) गलत है।
    (d) (A) गलत है, किंतु (R) सही है।
    U.P.R.O/A.R.O. (Mains) 2017
    उत्तर-(a)
    सातवाहन काल में प्राकृत और संस्कृत दोनों भाषाओं का समानांतर विकास हुआ। सातवाहन राजा हाल ने प्राकृत भाषा में ‘गाथासप्तशती’ की रचना की, जो श्रृंगार रस का महत्त्वपूर्ण काव्य-ग्रंथ है। उनके दरबारी विद्वान गुणाढ्य ने पैशाची प्राकृत में ‘बृहत्कथा’ लिखी, जबकि शर्ववर्मन ने ‘कातंत्र’ नामक संस्कृत व्याकरण की रचना की। कन्हेरी के एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि एक सातवाहन रानी संस्कृत का प्रयोग करती थीं, जो यह सिद्ध करता है कि राजपरिवार में दोनों भाषाओं का प्रचलन था। अतः अभिकथन और कारण दोनों सत्य हैं और कारण, अभिकथन की सटीक व्याख्या करता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘गाथासप्तशती’ में कुल 700 पद्य हैं और यह महाराष्ट्री प्राकृत में लिखी गई है — यह ग्रंथ प्राकृत साहित्य की आधारशिला माना जाता है। गुणाढ्य की ‘बृहत्कथा’ बाद में संस्कृत में ‘कथासरित्सागर’ के रूप में रूपांतरित की गई।
    48. पहला ईरानी शासक जिसने भारत के कुछ भाग को अपने अधीन किया था-
    (a) साइरस
    (b) केम्बिसिस
    (c) डेरियस प्रथम
    (d) शहार्श
    R.A.S./ R.T.S. (Pre) 1994
    उत्तर-(c)
    ईरान के अचमेनिद वंश के शासक डेरियस प्रथम (522–486 ई.पू.) पहले ऐसे ईरानी राजा थे जिन्होंने भारत के उत्तर-पश्चिमी भाग — सिंधु घाटी क्षेत्र — को अपने साम्राज्य में शामिल किया। यूनानी इतिहासकार हेरोडोटस के अनुसार, डेरियस प्रथम का साम्राज्य पूर्व में राजपूताना के मरुस्थल तक फैला हुआ था। पर्सिपोलिस और नक्शे-रुस्तम के शिलालेखों में पंजाब को भी उसके साम्राज्य का अंग बताया गया है। इस क्षेत्र से उसे अपार राजस्व और सैन्य बल प्राप्त होता था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: डेरियस प्रथम ने भारतीय (सिंधु) प्रांत को अपने साम्राज्य का सबसे समृद्ध और सबसे अधिक कर देने वाला प्रांत बताया था — यह 360 टैलेंट सोना प्रति वर्ष कर देता था। उसने सिंधु नदी का सर्वेक्षण करने के लिए स्काइलैक्स नामक यूनानी नाविक को भी भेजा था।
    49. निम्नलिखित को कालक्रमानुसार व्यवस्थित कीजिए-
    1.सातवाहन
    2.वाकाटक
    3.चालुक्य
    निम्नलिखित में सही कूट का चयन कीजिए-
    (a) 2, 3, 1
    (b) 3, 2, 1
    (c) 3, 1, 2
    (d) 1, 2, 3
    Jharkhand P.C.S. (Pre) 2021
    उत्तर-(d)
    तीनों राजवंशों का कालक्रम इस प्रकार है: सातवाहन वंश की स्थापना सिमुक ने लगभग प्रथम शताब्दी ई.पू. में की थी और यह वंश दक्कन पर करीब 400 वर्षों तक शासन करता रहा। इसके पश्चात वाकाटक वंश की स्थापना तृतीय शताब्दी ई. में विंध्यशक्ति ने की और यह वंश गुप्त काल का समकालीन रहा। अंत में गुजरात के चालुक्य (सोलंकी) वंश की स्थापना मूलराज प्रथम ने दसवीं शताब्दी ई. (लगभग 941 ई.) में की। अतः सही क्रम है: सातवाहन → वाकाटक → चालुक्य, जो विकल्प (d) के अनुरूप है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वाकाटक राजा रुद्रसेन द्वितीय का विवाह गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावतीगुप्त से हुआ था, जिससे दोनों राजवंशों के मध्य घनिष्ठ राजनीतिक संबंध स्थापित हुए। अजंता की कुछ प्रसिद्ध गुफाएँ वाकाटक काल में ही निर्मित हुई थीं।
    50. निम्नलिखित शासकों में से किसके लिए ‘एका ब्राह्मण’ प्रयुक्त हुआ है?
    (a) पुष्यमित्र शुंग
    (b) खारवेल
    (c) गौतमीपुत्र शातकर्णि
    (d) सुशर्मन
    U.P.R.O/A.R.O. (Pre) 2016
    उत्तर-(c)
    सातवाहन वंश के महान शासक गौतमीपुत्र शातकर्णि को नासिक के एक अभिलेख में ‘एका ब्राह्मण’ की उपाधि दी गई है, जिसका अर्थ है ‘अद्वितीय ब्राह्मण’ अथवा ‘ब्राह्मण धर्म का एकमात्र संरक्षक।’ वह शक शासकों को पराजित करने के कारण इतिहास में विशेष रूप से प्रसिद्ध है। उसने क्षत्रपों की सत्ता को समाप्त कर दक्कन में पुनः एकछत्र सातवाहन शासन स्थापित किया। उसकी माता गौतमी बलश्री ने नासिक प्रशस्ति में उसके शौर्य और धार्मिक कार्यों का विस्तार से वर्णन किया है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गौतमीपुत्र शातकर्णि को ‘त्रिसमुद्रतोयपीतवाहन’ भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है — जिसके घोड़ों ने तीनों समुद्रों का जल पिया हो। यह उपाधि उनके विशाल साम्राज्य-विस्तार का प्रतीक है। उनका शासनकाल लगभग 106–130 ई. माना जाता है।
    51. निम्न राजवंशों में सबसे पुराना राजवंश था-
    (a) चालुक्य
    (b) पल्लव
    (c) राष्ट्रकूट
    (d) सातवाहन
    U.P. U.D.A./L.D.A. (Pre) 2001
    उत्तर-(d)
    दिए गए सभी राजवंशों में सातवाहन सबसे प्राचीन है। इस वंश के संस्थापक सिमुक का काल अधिकांश स्रोतों के अनुसार लगभग 200 ई.पू. से आरंभ होता है। पुराणों में इसे ‘आंध्रभृत्य’ या ‘आंध्र’ वंश कहा गया है। तुलनात्मक रूप से पल्लव वंश तीसरी-चौथी शताब्दी ई., चालुक्य छठी शताब्दी ई. और राष्ट्रकूट वंश आठवीं शताब्दी ई. में उभरे। इस प्रकार सातवाहन इन सभी से कई शताब्दियाँ पुराना है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सातवाहन वंश लगभग 400 वर्षों तक (200 ई.पू. से लगभग 220 ई. तक) शासन में रहा, जो इसे दक्षिण भारत के सबसे दीर्घजीवी राजवंशों में से एक बनाता है। इस वंश ने रोमन साम्राज्य के साथ सक्रिय व्यापार किया, जिसके प्रमाण सातवाहन काल के सिक्कों और बंदरगाहों से मिलते हैं।
    52. निम्नलिखित को सुमेलित कीजिए-
    राजवंश राजधानी
    A. शुंग – i. महोबा
    B. सातवाहन – ii. बनवासी
    C. कदम्ब – iii. पैठन
    D. चन्देल – iv. पाटलिपुत्र
    सही कूट का चयन कीजिए-
    A B C D
    (a) iv iii ii i
    (b) iv ii iii i
    (c) i iv ii iii
    (d) i ii iii iv
    R.A.S./R.T.S. (Pre) 2018
    उत्तर-(a)
    इन राजवंशों और उनकी राजधानियों का सही सुमेलन इस प्रकार है: शुंग वंश की राजधानी पाटलिपुत्र थी (मगध में), सातवाहन वंश की राजधानी पैठन (प्रतिष्ठान, महाराष्ट्र में), कदम्ब वंश की राजधानी बनवासी (वर्तमान कर्नाटक में) और चन्देल वंश की राजधानी महोबा (वर्तमान उत्तर प्रदेश में) थी। ये सभी अपने-अपने क्षेत्रों में सांस्कृतिक और स्थापत्य दृष्टि से महत्त्वपूर्ण केंद्र थे।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कदम्ब वंश (345–525 ई.) दक्षिण भारत का पहला ऐसा राजवंश था जिसने कन्नड़ भाषा को राजकीय लेखन में प्रयोग किया। चन्देल वंश के शासकों ने खजुराहो के विश्वप्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण करवाया, जो आज यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल हैं।
    53. सातवाहनों की राजधानी अवस्थित थी-
    (a) अमरावती में
    (b) नांदेड़
    (c) नालदुर्ग में
    (d) दुर्ग में
    U.P.P.C.S. (Mains) 2005
    उत्तर-(a)
    सातवाहनों की वास्तविक और प्रमुख राजधानी प्रतिष्ठान (वर्तमान पैठन, महाराष्ट्र) थी, जो गोदावरी नदी के तट पर स्थित है। हालाँकि परंपरागत रूप से आरंभिक राजधानी अमरावती को माना जाता है। पुराणों में इस वंश को ‘आंध्रभृत्य’ कहा गया है और इनका उदय दक्कन में हुआ था। परीक्षा की दृष्टि से इस प्रश्न का स्वीकृत उत्तर ‘अमरावती’ है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: प्रतिष्ठान (पैठन) एक महत्त्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र भी था — यह ‘दक्षिणापथ’ व्यापार मार्ग पर स्थित था और रोमन व्यापारियों का यहाँ आना-जाना रहता था। ग्रीक भूगोलशास्त्री टॉलेमी ने अपने ग्रंथ में इसे ‘प्रैटिष्ठान’ नाम से उल्लिखित किया है।
    54. सातवाहन शासकों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/ से कथन सत्य है / हैं ?
    1.सातवाहन नरेश प्राकृत भाषा के पोषक थे।
    2.सातवाहन काल में कला के लोक पक्ष को अधिक प्रोत्साहन मिला।
    नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर को चुनिए ।
    (a) केवल 1
    (b) 1 और 2 दोनों
    (c) केवल 2
    (d) न तो 1 न ही 2
    U.P.P.C.S. (Pre) 2021
    उत्तर-(b)
    सातवाहन शासकों ने प्राकृत भाषा को विशेष संरक्षण दिया। राजा हाल द्वारा रचित ‘गाथासप्तशती’ इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। कला के क्षेत्र में सातवाहन काल में सांची, अमरावती और नागार्जुनकोंडा में बौद्ध स्तूपों और मूर्तियों का निर्माण हुआ जिनमें जन-जीवन, लोक कथाएँ और सामान्य दृश्यों को उकेरा गया — यह लोक कला का स्पष्ट प्रमाण है। अतः दोनों कथन सत्य हैं।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अमरावती स्तूप (आंध्र प्रदेश), जिसे ‘महाचैत्य’ भी कहा जाता है, सातवाहन काल की श्रेष्ठतम कला का प्रतीक है — इसकी संगमरमर की नक्काशी अत्यंत सजीव और लोकजीवन से प्रेरित है। यह स्तूप तीसरी शताब्दी ई.पू. से दूसरी शताब्दी ई. के बीच निर्मित हुआ।
    55. आंध्र सातवाहन राजाओं की सबसे लंबी सूची किस पुराण में मिलती है?
    (a) वायु पुराण
    (b) विष्णु पुराण
    (c) मत्स्य पुराण
    (d) उपर्युक्त में से किसी में नहीं
    Uttarakhand U.D.A./L.D.A. (Mains) 2006
    उत्तर-(c)
    विभिन्न पुराणों में सातवाहन राजाओं के नाम संकलित हैं, किन्तु इनमें से सबसे विस्तृत सूची मत्स्य पुराण में मिलती है, जिसमें 29 सातवाहन राजाओं के नाम दर्ज हैं। वायु पुराण और विष्णु पुराण में भी इस वंश का उल्लेख है, परन्तु वे सूचियाँ तुलनात्मक रूप से संक्षिप्त हैं। पुराणों में इस वंश को ‘आंध्र’ या ‘आंध्रभृत्य’ कहा गया है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मत्स्य पुराण के अनुसार सातवाहन वंश ने कुल 460 वर्षों तक शासन किया। यह पुराण सातवाहन इतिहास के पुनर्निर्माण का सबसे महत्त्वपूर्ण साहित्यिक स्रोत है और इसीलिए इतिहासकार इसे इस वंश के अध्ययन में प्राथमिकता देते हैं।
    56. निम्न में से कौन-सा स्थान सातवाहनों की राजधानी था?
    (a) प्रतिष्ठान
    (b) नागार्जुनकोंडा
    (c) शाकल अथवा स्यालकोट
    (d) पाटलिपुत्र
    U.P. Lower Sub. (Spl) (Pre) 2008
    उत्तर-(a)
    सातवाहनों की मुख्य राजधानी प्रतिष्ठान थी, जिसे आज ‘पैठन’ के नाम से जाना जाता है। यह महाराष्ट्र में गोदावरी नदी के किनारे स्थित है। नागार्जुनकोंडा इक्ष्वाकु वंश का केंद्र था, शाकल/स्यालकोट मेनांडर (मिलिंद) की राजधानी थी, और पाटलिपुत्र मगध की राजधानी। इस प्रकार प्रतिष्ठान ही सातवाहनों की वास्तविक राजधानी थी।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: प्रतिष्ठान (पैठन) आज भी महाराष्ट्र में अपनी ‘पैठणी साड़ियों’ के लिए प्रसिद्ध है — यह रेशमी साड़ी परंपरा सातवाहन काल के बुनकर शिल्प की विरासत मानी जाती है। पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी (प्रथम शताब्दी ई.) में भी इसे एक समृद्ध व्यापारिक नगर के रूप में उल्लिखित किया गया है।
    57. पेरीप्लस ऑफ द इरिथ्रियन सी किसने लिखी?
    (a) टेसियस
    (b) प्लिनी
    (c) टॉलमी
    (d) स्ट्रैबो
    (e) उपर्युक्त में से कोई नहीं/उपर्युक्त में से एक से अधिक
    64th B.P.S.C. (Pre) 2018
    उत्तर-(e)
    ‘पेरीप्लस ऑफ द इरिथ्रियन सी’ एक प्राचीन यूनानी पांडुलिपि है जो लगभग पहली शताब्दी ईस्वी (60 ई.) में अलेक्जेंड्रिया के एक अज्ञात नाविक/व्यापारी द्वारा लिखी गई थी। इसमें हिंद महासागर, लाल सागर और फारस की खाड़ी के बंदरगाहों तथा व्यापारिक मार्गों का विस्तृत वर्णन है। इसमें भारत के बंदरगाहों जैसे बरीगाज़ा (भड़ौच) और मुज़िरिस का भी उल्लेख मिलता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इस ग्रंथ में भारत से रोम को निर्यात होने वाली वस्तुओं जैसे काली मिर्च, मलमल, हाथीदाँत और मोती का विशेष उल्लेख किया गया है, जो तत्कालीन भारत-रोम व्यापार की समृद्धि को दर्शाता है। साथ ही, इस ग्रंथ से यह भी पता चलता है कि उस काल में दक्षिण भारत के ‘मुज़िरिस’ बंदरगाह से बड़ी मात्रा में व्यापार होता था, जिसे आज केरल का ‘कोडुंगल्लूर’ माना जाता है।
    58. कलिंग नरेश खारवेल निम्न में से किस वंश से संबंधित थे?
    (a) चेदि
    (b) कदम्ब
    (c) कलिंग
    (d) हर्यंक
    U.P.P.C.S. (Spl) (Mains) 2008
    U.P.P.C.S. (Mains) 2015
    उत्तर-( (a)
    कलिंग का शासक खारवेल चेदि वंश (महामेघवाहन वंश) से संबंधित था। इस वंश का संस्थापक महामेघवाहन था और खारवेल इस वंश का सर्वाधिक प्रतापी राजा था। हाथीगुम्फा अभिलेख के अनुसार खारवेल ने मगध पर आक्रमण कर वहाँ से जैन तीर्थंकर की वह मूर्ति वापस लाई जिसे नंद राजा उठा ले गए थे।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:खारवेल ने अपने शासनकाल में कलिंग की सिंचाई व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए नंद राजाओं द्वारा निर्मित नहर का विस्तार करवाया था। वह जैन धर्म का परम अनुयायी था और उसने जैन मुनियों के लिए उदयगिरि पहाड़ी पर गुफाएँ भी बनवाईं।
    59. निम्नलिखित में से कौन-सा युग्म सही सुमेलित नहीं है?
    अभिलेख शासक
    (a) नासिक- गौतमीपुत्र
    (b) हाथीगुम्फा – खारवेल
    (c) भितरी – पुलकेशिन द्वितीय
    (d) गिरनार – रुद्रदामन प्रथम
    U.P.R.O./ A.R.O. (Pre) 2017
    उत्तर-(c)
    भितरी स्तंभ लेख का संबंध गुप्त शासक स्कंदगुप्त से है, न कि पुलकेशिन द्वितीय से। पुलकेशिन द्वितीय का अभिलेख ऐहोल से प्राप्त होता है जिसे उसके दरबारी कवि रविकीर्ति ने संस्कृत में लिखा था। गौतमीपुत्र शातकर्णि के दो अभिलेख नासिक से और एक कार्ले से मिलते हैं। रुद्रदामन प्रथम का जूनागढ़ (गिरनार) अभिलेख शक संवत् 72 (लगभग 150 ई.) का है जो शुद्ध संस्कृत में लिखा गया पहला बड़ा अभिलेख माना जाता है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:ऐहोल अभिलेख में हर्षवर्धन पर पुलकेशिन द्वितीय की विजय का भी उल्लेख है और इसमें कालिदास एवं भारवि जैसे कवियों की प्रशंसा की गई है। रुद्रदामन प्रथम का जूनागढ़ अभिलेख यह भी बताता है कि उसने सुदर्शन झील की मरम्मत करवाई थी, जिसे मूलतः चंद्रगुप्त मौर्य के समय बनाया गया था।
    60. निम्नलिखित में से किस वंश के शासकों को पुराणों में ‘श्रीपर्वतीय’ कहा गया है?
    (a) वाकाटक
    (b) इक्ष्वाकु
    (c) शक
    (d) खारवेल
    U.P.P.C.S. (Pre) 2020
    उत्तर-(b)
    इक्ष्वाकु वंश के शासकों को पुराणों में दो नामों से संबोधित किया गया है — ‘श्रीपर्वतीय’ अर्थात् श्रीपर्वत के शासक, और ‘आंध्रभृत्य’ अर्थात् आंध्रों के सेवक। ये पहले सातवाहनों के अधीन सामंत थे परंतु सातवाहन शक्ति के क्षीण होने पर उन्होंने स्वतंत्र राज्य स्थापित किया। इस वंश का संस्थापक श्रीशांतमूल था जिसने कृष्णा नदी की घाटी में शासन किया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इक्ष्वाकु वंश के शासक बौद्ध धर्म के संरक्षक थे और उनके काल में नागार्जुनकोंडा तथा अमरावती में बौद्ध स्तूपों का निर्माण हुआ। इस वंश की रानियाँ प्रायः ब्राह्मण धर्म की अनुयायी थीं, जिससे इस काल में दोनों धर्मों का सह-अस्तित्व देखने को मिलता है।
    61. हाथीगुम्फा का अभिलेख किस शासक के विषय में जानकारी का स्रोत है ?
    (a) खारवेल
    (b) अशोक
    (c) हर्षवर्धन
    (d) कनिष्क
    U.P.P.C.S. (Pre) 2018
    उत्तर-(a)
    उड़ीसा (ओडिशा) के भुवनेश्वर के निकट उदयगिरि पहाड़ी की ‘हाथीगुम्फा’ गुफा से खारवेल का एक बिना तिथि का अभिलेख मिला है। यह अभिलेख ब्राह्मी लिपि एवं प्राकृत भाषा में है और इसमें खारवेल के बचपन, शिक्षा-दीक्षा, राज्याभिषेक तथा राजा बनने के बाद के तेरह वर्षों की घटनाओं का क्रमबद्ध विवरण मिलता है। यह खारवेल के इतिहास का एकमात्र प्रमुख स्रोत है।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इस अभिलेख में खारवेल के दक्षिण भारत तक के सैन्य अभियानों का भी उल्लेख है जिसमें उसने पाण्ड्य राजाओं को अपनी अधीनता स्वीकार करने पर विवश किया। अभिलेख यह भी बताता है कि खारवेल ने कलिंग की राजधानी में एक भव्य राजप्रासाद का निर्माण कराया था।
    62. निम्न कथनों पर विचार कीजिए-
    कथन (a) : कुषाण फारस की खाड़ी और लाल सागर से होकर व्यापार करते थे।
    कारण (R) : उनकी सुसंगठित नौसेना उच्च कोटि की थी। उपर्युक्त के संदर्भ में निम्न में से कौन-सा सही
    कूट : उत्तर है?
    (a) दोनों (a) और (R) सही हैं और (R), (a) का सही स्पष्टीकरण है।
    (b) दोनों (a) और (R) सही हैं, परंतु (R), (a) का सही स्पष्टीकरण नहीं है।
    (c) (a) सही है, परंतु (R) गलत है।
    (d) (a) गलत है, परंतु (R) सही है।
    U.P. Lower Sub. (Pre) 1998
    उत्तर-(c)
    यह सत्य है कि कुषाण काल में फारस की खाड़ी और लाल सागर के मार्ग से पश्चिमी देशों के साथ व्यापार होता था, जिसके साक्ष्य ‘पेरीप्लस ऑफ द एरीथ्रियन सी’ तथा अरिकामेडु की खुदाई से प्राप्त होते हैं। किंतु इन व्यापारिक संबंधों का कारण उनकी नौसैनिक शक्ति नहीं थी — कुषाणों के पास किसी उल्लेखनीय नौसेना के कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। यह व्यापार मुख्यतः थल एवं समुद्री दोनों मार्गों से निजी व्यापारियों द्वारा संचालित होता था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कुषाण काल में ‘रेशम मार्ग’ (Silk Route) अत्यंत सक्रिय था जो मध्य एशिया से होते हुए चीन और रोम को जोड़ता था, और कुषाण इस मार्ग के महत्वपूर्ण नियंत्रक थे। कुषाण शासक कनिष्क के समय में बौद्ध धर्म मध्य एशिया और चीन तक इसी व्यापारिक मार्ग से फैला।
    63. राजा खारवेल का नाम जुड़ा (Figures) है-
    (a) गिरनार के स्तंभ लेख के साथ
    (b) जूनागढ़ स्तंभ लेख के साथ
    (c) हाथीगुम्फा लेख के साथ
    (d) सारनाथ लेख के साथ
    43rd B.P.S.C. (Pre) 1999
    उत्तर-(c)
    कलिंग नरेश खारवेल का नाम हाथीगुम्फा लेख से जुड़ा है। यह अभिलेख उदयगिरि पहाड़ी (भुवनेश्वर के निकट, ओडिशा) पर स्थित हाथी के आकार की गुफा में उत्कीर्ण है। यह खंडित अवस्था में है और इसमें खारवेल के समस्त शासनकाल का लेखा-जोखा मिलता है। खारवेल जैन धर्म का प्रबल समर्थक था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: हाथीगुम्फा अभिलेख में उल्लेख है कि खारवेल ने यवन (यूनानी) राजा डेमेट्रियस के आक्रमण को विफल किया था। इस अभिलेख में महाभारत काल की भाषा ‘मागधी’ के निकट की प्राकृत का प्रयोग हुआ है, जो इसे भाषावैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाता है।
    64. निम्नलिखित राजाओं में से कौन जैन धर्म का संरक्षक था?
    (a) अशोक
    (b) हर्ष
    (c) पुलकेशिन द्वितीय
    (d) खारवेल
    U.P.P.S.C. (R.I.) 2014
    उत्तर-(d)
    खारवेल कलिंग का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था जो जैन धर्म का परम संरक्षक था। उसने जैन मुनियों के लिए उदयगिरि और खंडगिरि की पहाड़ियों पर अनेक गुफाएँ निर्मित करवाईं। इसके विपरीत, अशोक बौद्ध धर्म का संरक्षक था, हर्षवर्धन ने बौद्ध एवं शैव दोनों धर्मों को संरक्षण दिया, और पुलकेशिन द्वितीय शैव धर्मावलम्बी था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: खारवेल ने पाटलिपुत्र (मगध) से जैन तीर्थंकर ऋषभनाथ की वह मूर्ति पुनः प्राप्त की जिसे नंद वंश के राजा कलिंग से उठा ले गए थे — यह घटना हाथीगुम्फा अभिलेख में विशेष रूप से उल्लिखित है। खारवेल के काल में कलिंग जैन धर्म का एक प्रमुख केंद्र बन गया था।
    65. निम्नलिखित राजाओं में से किसका जैन धर्म के प्रति भारी झुकाव था?
    (a) दशरथ
    (b) बृहद्रथ
    (c) खारवेल
    (d) हुविष्क
    48th to 52nd B.P.S.C. (Pre) 2008
    उत्तर-(c)
    दिए गए विकल्पों में खारवेल ही एकमात्र शासक था जिसका जैन धर्म के प्रति गहरा अनुराग था। दशरथ मौर्य वंश का शासक था जो आजीवक संप्रदाय का समर्थक था। बृहद्रथ मौर्य वंश का अंतिम शासक था और हुविष्क कुषाण शासक था जो मुख्यतः बौद्ध एवं शैव धर्म को मानता था। खारवेल ने अपने जीवनकाल में जैन संस्थाओं और धार्मिक स्थलों को भरपूर संरक्षण दिया।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: खारवेल ने अपने शासन के 12वें वर्ष में एक विशाल जैन सम्मेलन का आयोजन किया था जिसमें देशभर के जैन साधुओं को आमंत्रित किया गया था। वह दिगंबर जैन परंपरा का अनुयायी माना जाता है।
    66. कलिंग नरेश खारवेल का संबंध था-
    (a) महामेघवाहन वंश से
    (b) चेदि वंश से
    (c) सातवाहन वंश से
    (d) उपर्युक्त में से कोई नहीं/ उपर्युक्त में से एक से अधिक
    60th to 62nd B.P.S.C. (Pre) 2016
    उत्तर-(d)
    खारवेल का संबंध एक साथ दोनों नामों — चेदि वंश और महामेघवाहन वंश — से है, इसलिए विकल्प (d) ‘एक से अधिक’ सही उत्तर है। कलिंग के इस वंश का संस्थापक ‘महामेघवाहन’ नामक व्यक्ति था, इसलिए इसे महामेघवाहन वंश कहते हैं। यह मूलतः चेदि वंश की एक शाखा थी, इसलिए इसे चेदि वंश भी कहा जाता है। खारवेल इस वंश का तीसरा और सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘चेदि’ एक प्राचीन जनपद था जो मध्य भारत (वर्तमान बुंदेलखंड क्षेत्र) में स्थित था। कलिंग की चेदि शाखा ने ओडिशा तट पर अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित किया और खारवेल के काल में यह राज्य अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचा।
    67. पूर्वी रोमन शासक जस्टिनियन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान किस क्षेत्र में था?
    (a) विधि
    (b) स्थापत्य कला
    (c) विज्ञान
    (d) साहित्य
    R.A.S./R.T.S. (Pre) 1994
    उत्तर-(a)
    पूर्वी रोमन (बाइज़ेंटाइन) सम्राट जस्टिनियन प्रथम (527–565 ई.) का सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान विधि (कानून) के क्षेत्र में रहा। उसने बिखरे हुए रोमन कानूनों को संकलित और संशोधित करवाकर ‘कॉर्पस जूरिस सिविलिस’ (Corpus Juris Civilis) नामक विधि संहिता तैयार करवाई जो आगे चलकर यूरोपीय विधि प्रणाली का आधार बनी।
    📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:जस्टिनियन ने स्थापत्य कला में भी उल्लेखनीय योगदान दिया — उसने कॉन्स्टेंटिनोपल में विश्व प्रसिद्ध ‘हागिया सोफिया’ (Hagia Sophia) गिरिजाघर का पुनर्निर्माण करवाया, जो अपने विशाल गुंबद के लिए आज भी प्रसिद्ध है। उसने अफ्रीका और इटली में पुनः रोमन साम्राज्य के विस्तार का भी प्रयास किया।
  • मौर्योत्तर काल : ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

    📚 विषय सूची

    मौर्योत्तर काल

    ➣ इस काल में हिन्दूकुश (खबर दर्रा) से लेकर कर्नाटक एवं बंगाल तक एक ही राजवंश का आधिपत्य नहीं रहा।

    ➣ हालांकि बीच में करीब सौ वर्षों का व्यवधान हुआ। देश के उत्तर पश्चिमी मार्गों से कई विदेशी आक्रमणकारियों ने आकर कई क्षेत्रों में अपने-अपने राज्य स्थापित कर लिये।

    ➣ दक्षिण में स्थानीय शासक वंशों ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर लिया। कुछ समय के लिए मध्य क्षेत्र का सिंधु घाटी एवं गोदावरी क्षेत्र से संबंध टूट गया और मगध के वैभव का स्थान कई अन्य नगरों ने ले लिया।

    ➣ उत्तर भारत में मौर्यों के सबसे महत्त्वपूर्ण देशी उत्तराधिकारी हुए शुंग और उसके बाद कण्व दक्कन तत्पश्चात मध्य भारत में सातवाहन हुए। ये सभी राजवंश ब्राह्मण थे-

    वंशसंस्थापक क्षेत्र
    शुंग पुष्यमित्र शुंग पूर्वी भारत
    कण्व वासुदेवमध्य भारत
    सातवाहन सिमुक दक्षिण-भारत

    ➣ जबकि पश्चिमोत्तर भारत में विदेशी आक्रमणकारियों ने अपना आधिपत्य जमाया-

    वंशसंस्थापक क्षेत्र
    हिन्द यवन डेमेट्रियस प्रथम स्यालकोट
    शक नहपान नासिक
    पहलव मिथ्रोडेटस प्रथम तक्षशिला
    कुषाण कुजुल कडफिसेस उज्जयिनी

    ➣ कुषाण से राजा कनिष्क हुआ जिसके द्वारा चलाया गया संवत, शक संवत भारतीय सरकार द्वारा राष्ट्रीय पंचांग के रूप में प्रयोग किया जाता है।

    ➣ विक्रम संवत की शुरुवात भी मौर्योत्तर काल में ही हुई। एक उज्जैन से शकों को खदेड़ कर स्थानीय शासक ने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की। यहीं से विक्रमादित्य की उपाधि का चलन प्रारम्भ माना गया है।

    ज्ञातव्य हो इतिहास में 14 विक्रमादित्य हुए हैं जिसमे अंतिम विक्रमादित्य हिन्दू राजा हेमू (1556 ई. ) था एंव सबसे विख्यात चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य।

    ➣ कनिष्क की मृत्यु के पश्चात सातवाहन शासक गौतमी पुत्र शातकर्णी का शासनकाल प्रारम्भ होता है। जिसने विदेशियों को पीछे खदेड़ दिया। गौतमी पुत्र शातकर्णी नाम से एक दक्षिण भारतीय फिल्म भी बनी हुई है।

    मौर्योत्तर कालीन अभिलेख

    रूद्र दामन का गिरनार/ जूनागढ़ अभिलेख

    ➣ यह संस्कृत भाषा में सबसे बड़ा अभिलेख है। जिसमे रूद्रदामन की शातकर्णी पर विजय का उल्लेख मिलता है।

    ➣ इसके अलावा इस अभिलेख से सर्वप्रथम विष्णु के साथ लक्ष्मी का उल्लेख प्राप्त हुआ।

    ➣ इससे सुदर्शन झील का इतिहास भी ज्ञात होता है। इस झील का निर्माण चंद्रगुप्त के समय सौराष्ट्र के गवर्नर पुष्यगुप्त ने करवाया था। अशोक के समय तुषाष्प ने इसमें से नहर निकाली तथा रूद्रदामन ने झील के बांध की मरम्मत करवाई।

    अयोध्या अभिलेख

    ➣ इस अभिलेख को पुष्यमित्र शुंग के उत्तराधिकारी धनदेव ने लिखवाया था।

    ➣ इसमें पुष्यमित्र शुंग द्वारा कराए गये दो अश्वमेध यज्ञों की चर्चा की गयी है।

    ➣ इससे शुगों की यवनों पर विजय की पुष्टि होती है।

    ➣ इससे यह भी पता चलता है कि पुष्यमित्र शुंग ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया था।

    बेसनगर अभिलेख

    ➣ यह अभिलेख यवन राजदूत हेलियोडोरस से संबंधित है, जो गरुड़ स्तंभ के ऊपर खुदा हुआ है।

    ➣ इससे भागवत धर्म की लोकप्रियता का पता चलता है। इसमें वासुदेव तथा काशीपुत्र भागभद्र (शुग शासक) का उल्लेख किया गया है।

    ➣ यह लेख मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में स्थित है।

    नासिक प्रशस्ति

    ➣ यह प्रशस्ति गौतमीपुत्र शातकर्णी की मां ने उत्कीर्ण करवाए थे। इसके मुताबिक शातकर्णी ने शक, पल्लव, यवन को हराकर गुजरात, सौराष्ट्र और मालवा पर अधिकार किया।

    ➣ इसमें शातकर्णी को त्रिसमुद्रतोयपितवाहन (जिसके घोड़ों ने तीन समुद्रों का पानी पिया हो) कहा गया है।

    भरहुत का लेख

    ➣ इस लेख से भी शुगकाल के बारे में जानकारी मिलती है। भरहुत स्तूप का निर्माण पुष्यमित्र शुंग ने करवाया था।

    ➣ पुष्यमित्र ने सांची के स्तूप की लकड़ी की वेदिका के स्थान पर पत्थर की वेदिका का निर्माण कराया था।

    ➣ भरहुत लेख में कोशल गणराज्य के अनाथपिण्डक नामक धनी व्यापारी ने बुद्ध की शिष्यता ग्रहण की तथा संघ के लिए जेतवन विहार प्रदान किया, उल्लेख मिलता है।

    नानाघाट अभिलेख

    ➣ यह अभिलेख शातकर्णी प्रथम से संबंधित है। इसके मुताबिक शातकर्णी प्रथम ने दो अवश्वमेध यज्ञ किए थे।

    ➣ इसके समीप एक गुफा में सातवाहन नरेश शातकर्णी द्वितीय की रानी नायनिका (नागनिका) का एक अभिलेख है, जिसमें उसके द्वारा अश्वमेध, राजसूय यज्ञों सहित कई यज्ञ किए जाने तथा ब्राह्मणों को विभिन्न दान दिए जाने के उल्लेख है।

    शिनकोट अभिलेख

    ➣ बाजौर के शिनकोट नामक स्थान से मिनांडर का पात्र-अभिलेख प्राप्त हुआ है।

    ➣ इस पात्र में मिनांडर के सामंत विमकमित्र द्वारा शाक्यमुनि के पवित्र अवशेष स्थापित किए गये थे।

    ➣ शिनकोट मंजूषा अभिलेख से भी मिनांडर का बौद्ध मतानुयायी होना प्रमाणित होता है।

    तख्त-ए-बही अभिलेख

    ➣ यह अभिलेख पेशावर के निकट स्थित है। इस अभिलेख के अनुसार गॉन्डोफर्नीज सबसे शक्तिशाली पहलव राजा था। उसने कम से कम 26 वर्षों तक शासन किया, जो संभवतः 19 से 45 ई. तक रहा।

    ➣ गॉन्डोफर्नीज के सिक्के, जिनमें से कुछ पर उसका भारतीय नाम गुन्दफर्न अंकित है, यह संभावना दर्शाते हैं कि उसने पूर्वी ईरान और पश्चिमोत्तर भारत, दोनों पर एकछत्र शासन किया होगा।

    पंजतर अभिलेख

    ➣ यह अभिलेख पाकिस्तान के हजारा जिले में स्थित है। इस अभिलेख में महाराज कुषाण का उल्लेख किया गया है।

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