1. प्राचीन भारत में निम्न में से किस एक ने नियमित रूप से सोने के सिक्के चलाए ?
U.P. Lower Sub. (Pre) 2004
उत्तर-(c)
कुषाण शासकों ने प्राचीन भारत में सबसे व्यवस्थित एवं नियमित रूप से स्वर्ण मुद्राओं का प्रचलन किया। यद्यपि हिंद-यवन (इंडो-ग्रीक) शासकों ने उत्तर-पश्चिम भारत में स्वर्ण सिक्कों की परंपरा आरंभ की थी, परंतु इसे व्यापक एवं संगठित रूप देने का श्रेय कुषाणों को ही जाता है। कुषाणों ने स्वर्ण के साथ-साथ ताम्र मुद्राएं भी बड़े पैमाने पर जारी कीं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कुषाण सम्राट विम कडफिसेस पहले कुषाण शासक थे जिन्होंने बड़े पैमाने पर स्वर्ण सिक्के जारी किए — इनके सिक्कों पर शिव और नंदी का चित्रण मिलता है, जो उनके शैव मतावलंबी होने का प्रमाण है। कनिष्क प्रथम के स्वर्ण सिक्के अपनी शुद्धता और कलात्मकता के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं — उन पर ग्रीक, ईरानी और भारतीय देवताओं का एक साथ अंकन मिलता है, जो कुषाण साम्राज्य की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाता है।
2. बुद्ध का किसके सिक्कों पर अंकन हुआ है?
U.P.P.C.S. (Pre) 2010
उत्तर-(b)
कुषाण सम्राट कनिष्क प्रथम के सिक्कों पर बुद्ध की आकृति अंकित मिलती है। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि ये सिक्के बौद्ध धर्म में बुद्ध की मानवीय प्रतिमा को सिक्कों पर दर्शाने के प्राचीनतम प्रमाणों में से एक हैं। कनिष्क बौद्ध धर्म का उदार संरक्षक था और उसी के काल में चौथी बौद्ध संगीति का आयोजन हुआ था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कनिष्क के सिक्कों पर बुद्ध को “बोद्दो” (Boddo) नाम से अंकित किया गया है — यह यूनानी लिपि में बुद्ध का लिप्यंतरण है। इसके अतिरिक्त कनिष्क के सिक्कों पर ग्रीक देवता हेलिओस, ईरानी देवता मिहिर (सूर्य), और भारतीय देवता शिव समेत 30 से अधिक विभिन्न देवताओं की आकृतियाँ मिलती हैं, जो उसकी धार्मिक सहिष्णुता का प्रमाण है।
3. सूची I को सूची II से सुमेलित कीजिए तथा नीचे दिए गए कूट में से सही
सूची I सूची II
A. डिमेट्रियस 1. पहलव
B. रुद्रदामन 2. कुषाण
C. गोंडोफर्नीज 3. हिंद- यूनानी
D. विम 4. शक
कूट :
A B C D उत्तर चुनिए
सूची I सूची II
A. डिमेट्रियस 1. पहलव
B. रुद्रदामन 2. कुषाण
C. गोंडोफर्नीज 3. हिंद- यूनानी
D. विम 4. शक
कूट :
A B C D उत्तर चुनिए
U.P. R.O/A.R.O. (Mains) 2017
उत्तर-(c)
सही सुमेलन इस प्रकार है — डिमेट्रियस हिंद-यूनानी (इंडो-ग्रीक) शासक था जिसने लगभग 200-190 ईसा पूर्व में उत्तर-पश्चिम भारत पर आक्रमण किया। रुद्रदामन शक वंश का प्रतापी क्षत्रप था। गोंडोफर्नीज पहलव (पार्थियन) वंश का शासक था। विम (विम कडफिसेस) कुषाण वंश का शासक था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गोंडोफर्नीज का उल्लेख ईसाई परंपरा में भी मिलता है — माना जाता है कि ईसा मसीह के शिष्य सेंट थॉमस उसके शासनकाल में भारत आए थे। डिमेट्रियस पहला हिंद-यवन शासक था जिसने “द्विभाषीय” सिक्के जारी किए — एक तरफ ग्रीक और दूसरी तरफ खरोष्ठी लिपि में लेख अंकित थे।
4. निम्नलिखित में से किस हिंद-यवन शासक ने सीसे के सिक्के जारी किए थे?
U.P.P.S.C. (R.I.) 2014
उत्तर-(a)
हिंद-यवन (इंडो-ग्रीक) शासक स्ट्रैटो II ने सीसे (Lead) की धातु में सिक्के जारी किए थे, जो अपने वंश के अन्य शासकों से उसे अलग करता है। उसका शासनकाल लगभग 25 ईसा पूर्व से 10 ईस्वी तक रहा। वह हिंद-यवन वंश के अंतिम शासकों में से एक था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: स्ट्रैटो II का शासन मुख्यतः पंजाब क्षेत्र तक सीमित था और उसे शकों के बढ़ते दबाव का सामना करना पड़ा था। अधिकांश हिंद-यवन शासकों ने चांदी और तांबे के सिक्के जारी किए, इसलिए सीसे के सिक्के दुर्लभ एवं ऐतिहासिक दृष्टि से विशेष महत्व रखते हैं — ये सिक्के मुद्रा संग्रहकर्ताओं और पुरातत्वविदों के लिए अमूल्य हैं।
5. निम्नलिखित में से कौन-सा एक अन्य तीनों के समसामयिक नहीं था?
I.A.S. (Pre) 2005
उत्तर-(c)
बिंबिसार (544–492 ईसा पूर्व), गौतम बुद्ध (563–483 ईसा पूर्व) और प्रसेनजित — ये तीनों एक-दूसरे के समकालीन थे। बिंबिसार मगध का हर्यंक वंशी शासक था, जबकि प्रसेनजित कोसल महाजनपद का राजा था। मिलिंद (मिनांडर) एक इंडो-ग्रीक शासक था जिसका काल लगभग 155–130 ईसा पूर्व था — यह इन तीनों से कई शताब्दियों बाद का है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मिलिंद और बौद्ध भिक्षु नागसेन के बीच हुए प्रसिद्ध दार्शनिक संवाद “मिलिंदपण्हो” (मिलिंद के प्रश्न) पालि भाषा में संकलित हैं — यह ग्रंथ बौद्ध दर्शन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। बिंबिसार बौद्ध धर्म का पहला राजकीय संरक्षक माना जाता है — उसने स्वयं गौतम बुद्ध से मिलकर बौद्ध संघ को राजकीय सहयोग प्रदान किया था।
6. निम्नलिखित शासकों में से किसके सिक्कों पर संकर्षण एवं वासुदेव दोनों अंकित हैं?
U.P.P.C.S. (Mains) 2017
उत्तर-(d)
हिंद-यवन शासक अगाथोक्लीज के सिक्के अफगानिस्तान के ऐ-खानम (Ai-Khanum) से प्राप्त हुए हैं। इन सिक्कों पर वासुदेव (कृष्ण) और संकर्षण (बलराम) दोनों की आकृतियाँ उकेरी गई हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि भागवत/वैष्णव धर्म उस काल में उत्तर-पश्चिम भारत में भी प्रचलित था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अगाथोक्लीज के ये सिक्के भारतीय देवताओं को दर्शाने वाले सबसे प्राचीन सिक्कों में गिने जाते हैं — इन सिक्कों पर खरोष्ठी और ब्राह्मी दोनों लिपियों का प्रयोग हुआ है, जो अत्यंत दुर्लभ है। संकर्षण के हाथ में हल और मूसल का अंकन उनके पारंपरिक प्रतीक चिह्नों के रूप में इन सिक्कों पर भी परिलक्षित होता है।
7. ‘काव्य शैली’ का प्राचीनतम नमूना किसके अभिलेख में मिलता है?
U.P.P.C.S. (Pre) 1997
उत्तर-(a)
शक क्षत्रप रुद्रदामन प्रथम (130–150 ई.) का जूनागढ़ अभिलेख गुजरात में गिरनार पर्वत पर स्थित है। ब्राह्मी लिपि और शुद्ध संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण यह अभिलेख अब तक ज्ञात संस्कृत अभिलेखों में सर्वाधिक प्राचीन है। इसी अभिलेख में संस्कृत काव्य शैली का प्रथम एवं सर्वप्राचीन उदाहरण प्राप्त होता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इस अभिलेख में रुद्रदामन की विजयों, व्यक्तित्व, वंशावली और सुदर्शन झील के जीर्णोद्धार का विस्तृत वर्णन है। उल्लेखनीय है कि यह जूनागढ़ शिला वही है जिस पर सम्राट अशोक के 14 शिलालेख और बाद में स्कंदगुप्त का अभिलेख भी उत्कीर्ण किया गया — अर्थात् एक ही शिला पर तीन अलग-अलग कालों के अभिलेख विद्यमान हैं, जो इसे पुरातत्व की दृष्टि से अनमोल बनाता है।
8. किस अभिलेख में रुद्रदामन प्रथम की विभिन्न उपलब्धियां वर्णित
53rd to 55th B.P.S.C. (Pre) 2011
उत्तर-(a)
गुजरात के जूनागढ़ से प्राप्त अभिलेख में रुद्रदामन प्रथम की वंशावली, उनकी विजयों, शासन-कुशलता और व्यक्तिगत गुणों का विस्तृत एवं काव्यात्मक वर्णन किया गया है। यह अभिलेख विशुद्ध संस्कृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में लिखा गया है तथा इसे प्रशस्ति काव्य की श्रेणी में रखा जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: रुद्रदामन ने अपनी पुत्री का विवाह गौतमीपुत्र सातकर्णी के पुत्र से कराया था — इस प्रकार शक और सातवाहन वंशों के बीच वैवाहिक संबंध स्थापित हुए थे, भले ही दोनों राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी भी रहे। जूनागढ़ अभिलेख में रुद्रदामन को व्याकरण, संगीत, तर्कशास्त्र और राजनीति में पारंगत बताया गया है, जो उस युग के शासकों के बहुमुखी व्यक्तित्व को उजागर करता है।
9. बिना बेगार के किसने सुदर्शन झील का जीर्णोद्धार कराया?
U.P.P.C.S. (Pre) 2014
उत्तर-(d)
जूनागढ़ अभिलेख के अनुसार रुद्रदामन प्रथम ने गिरनार के निकट स्थित सुदर्शन झील का जीर्णोद्धार बिना किसी प्रकार की बेगार (जबरिया श्रम) लिए, बिना कर वृद्धि किए और अपने स्वयं के कोष से कराया। इस झील का निर्माण मूलतः मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के समय उनके प्रांतीय गवर्नर पुष्यगुप्त वैश्य ने कराया था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सुदर्शन झील के इतिहास में तीन बार प्रमुख निर्माण/जीर्णोद्धार का उल्लेख मिलता है — पहली बार चंद्रगुप्त मौर्य के काल में निर्माण, दूसरी बार अशोक के राज्यपाल तुषास्फ द्वारा मरम्मत, और तीसरी बार रुद्रदामन द्वारा व्यापक जीर्णोद्धार। बाद में गुप्त सम्राट स्कंदगुप्त ने भी इस झील की मरम्मत कराई थी, जिसका उल्लेख उसी जूनागढ़ शिला पर उत्कीर्ण उनके अभिलेख में है।
10. कार्दमक क्षत्रपों ने निम्नलिखित में से किस धातु में अति दुर्लभ सिक्के प्रचलित किया?
U.P.B.E.O. (Pre) 2019
उत्तर-(a)
कार्दमक वंश के शासकों की मुद्राओं को दो वर्गों में बाँटा जाता है — रजत मुद्राएं (जो क्षहरात वंशी परंपरा की निरंतरता हैं) और पोटीन निर्मित सिक्के। कार्दमक शासक चष्टन ने रजत एवं ताम्र दोनों धातुओं में मुद्राएं जारी कीं, परंतु ताम्र सिक्के अत्यंत दुर्लभ रहे। अतः इस वंश के संदर्भ में अतिदुर्लभ सिक्के ताम्र धातु के ही माने जाते हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कार्दमक वंश के संस्थापक चष्टन (Chashtana) को उज्जयिनी के पश्चिमी क्षत्रपों का आदि पुरुष माना जाता है — टॉलेमी की भूगोल पुस्तक में इसका उल्लेख “तिआस्तानेस” (Tiastanes) नाम से मिलता है। कार्दमक वंश के सबसे शक्तिशाली शासक रुद्रदामन प्रथम थे जिन्होंने सातवाहन राजा गौतमीपुत्र सातकर्णी को दो बार पराजित किया था।
11. उत्तरी तथा उत्तरी-पश्चिमी भारत में सर्वाधिक संख्या में तांबे के सिक्कों को जारी किया था-
U.P.P.C.S. (Pre) 2005
उत्तर-(b)
उत्तरी एवं उत्तर-पश्चिमी भारत में स्वर्ण सिक्कों का प्रचलन सर्वप्रथम इंडो-ग्रीक शासकों ने किया, किंतु इसे व्यापक एवं नियमित रूप देने का श्रेय कुषाणों को है। कुषाण शासकों ने स्वर्ण और ताम्र — दोनों ही धातुओं में बड़ी संख्या में सिक्के जारी किए। ताम्र सिक्कों की संख्या और वितरण की दृष्टि से कुषाण इस क्षेत्र में सर्वोपरि थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कुषाण शासक विम कडफिसेस पहले भारतीय शासक थे जिन्होंने बड़े पैमाने पर ताम्र सिक्के जारी किए और उन पर शिव की आकृति के साथ “महेश्वर” की उपाधि अंकित की। कुषाण सिक्कों पर तिथि अंकन की परंपरा भी थी जो इतिहासकारों को कुषाण कालक्रम निर्धारित करने में अत्यंत सहायक रही है।
12. यौधेय सिक्कों पर किस देवता का अंकन मिलता है?
U.P.P.C.S. (Spl)(Mains) 2008
उत्तर-(d)
यौधेय एक प्राचीन गणतांत्रिक जनजाति थी जिसका उल्लेख पाणिनि की अष्टाध्यायी, वराहमिहिर की बृहत्संहिता तथा विभिन्न पुराणों में मिलता है। इनका भौगोलिक क्षेत्र दक्षिण-पूर्वी पंजाब से राजस्थान तक विस्तृत था। इनके ताम्र सिक्कों पर युद्ध के देवता कार्तिकेय (स्कंद/षण्मुख) का चित्रण मिलता है, जो इनकी वीरता की परम्परा को दर्शाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यौधेयों की मुद्राओं पर “यौधेयानां बहुधान्यके” जैसे ब्राह्मी लेख मिलते हैं, जो उनकी समृद्ध कृषि अर्थव्यवस्था का संकेत देते हैं। गुप्त काल में यौधेयों ने गुप्त साम्राज्य की अधीनता स्वीकार कर ली थी, जिसका प्रमाण समुद्रगुप्त के प्रयागस्तंभ अभिलेख में मिलता है।
13. इनमें से किसने सर्वप्रथम व्यापक पैमाने पर स्वर्णमुद्रा का प्रचलन किया?
64th B.P.S.C. (Pre) 2018
उत्तर-(c)
कुषाण वंश के शासक विम कडफिसेस को भारतीय उपमहाद्वीप में व्यापक स्तर पर सोने की मुद्राओं के प्रचलन का श्रेय दिया जाता है। यह कुषाणों का भारत को सबसे महत्त्वपूर्ण आर्थिक योगदान माना जाता है। इन सिक्कों की शुद्धता और भार-मानक रोमन ऑरियस के समकक्ष थे, जो उस समय की अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मानकता को दर्शाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: विम कडफिसेस के सोने के सिक्कों पर शिव, त्रिशूल और नंदी के चिह्न उत्कीर्ण हैं, जो इनकी शैव धर्म के प्रति आस्था को प्रकट करते हैं। इन सिक्कों का वजन लगभग 8 ग्राम था और ये रोमन साम्राज्य के साथ भारत के सक्रिय व्यापार संबंधों की पुष्टि करते हैं।
14. निम्नलिखित में से किस शासक को सर्वप्रथम सोने के सिक्के जारी करने का श्रेय दिया जाता है?
U.P.P.C.S. (Mains) 2009
उत्तर-(b)
कुषाण वंश के शासकों में विम कडफिसेज (विम कडफिसेस) ही वह प्रथम शासक थे जिन्होंने स्वर्ण सिक्के जारी किए। इनसे पूर्व कुजुल कडफिसेस केवल ताम्र सिक्के ही चलाते थे। विम कडफिसेस ने सोने के सिक्के जारी कर भारतीय मुद्रा प्रणाली को एक नई दिशा दी। अतिरिक्त तथ्य: विम कडफिसेस के स्वर्ण सिक्कों की एक विशेषता यह थी कि इन पर ग्रीक और खरोष्ठी दोनों लिपियों में लेख उत्कीर्ण हैं, जो कुषाण साम्राज्य की बहुसांस्कृतिक प्रकृति को दर्शाते हैं। उनका शासनकाल लगभग 80-100 ई. माना जाता है।
15. निम्नलिखित में से किसने भारत में स्वर्ण सिक्कों का प्रचलन नियमित उपयोग के लिए किया था?
U.P. P.C.S. (Pre) 2015
उत्तर-(a)
कुषाण वंश के विम कडफिसेस — जो कनिष्क प्रथम के पिता थे — ने भारत में स्वर्ण सिक्कों को दैनिक व्यापारिक उपयोग हेतु नियमित रूप से प्रचलित किया। इनसे पहले कुजुल कडफिसेस ने केवल तांबे के सिक्के चलाए थे। विम के इस कदम ने भारतीय अर्थव्यवस्था में स्थायी परिवर्तन लाया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: विम कडफिसेस के सिक्कों पर “महेश्वर” (महान शिव के भक्त) उपाधि उत्कीर्ण है, जो भारतीय धर्म के प्रति उनके गहरे झुकाव को दर्शाती है। उनके सिक्के रोमन सिक्कों के वजन मानक (लगभग 8 ग्राम) पर आधारित थे, जो तत्कालीन भारत-रोम व्यापार की गहनता को उजागर करता है।
16. विक्रम एवं शक संवतों में कितना अंतर (वर्षों में) है?
U.P.U.D.A./L.D.A. (Pre) 2006
उत्तर-(c)
विक्रम संवत् 57 ई.पू. से प्रारंभ होता है और शक संवत् 78 ई. से। इसलिए दोनों के बीच का अंतर 57 + 78 = 135 वर्ष है। व्यावहारिक रूप से, यदि ग्रेगेरियन वर्ष में 57 जोड़ें तो विक्रम संवत् मिलता है और 78 घटाएँ तो शक संवत् प्राप्त होता है। अतः दोनों संवतों का अंतर सदैव 135 वर्ष रहता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: विक्रम संवत् को ‘कृत संवत्’ और ‘मालव संवत्’ के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि इसे मालव गणराज्य के लोगों ने प्रारंभ किया था। शक संवत् भारत सरकार द्वारा अपनाया गया राष्ट्रीय पंचांग है, जो 22 मार्च 1957 से आधिकारिक रूप से लागू हुआ।
17. शक संवत् पर आधारित राष्ट्रीय पंचांग (कैलेंडर) का 1 चैत्र, ग्रेगेरियन कैलेंडर पर आधारित 365 दिन के सामान्य वर्ष की निम्नलिखित तिथियों में किस एक तद्नुरूप है?
I.A.S. (Pre) 2014
उत्तर-(a)
चैत्र भारतीय राष्ट्रीय पंचांग का पहला महीना है। सामान्य वर्ष (365 दिन) में 1 चैत्र 22 मार्च को पड़ता है, जबकि लीप वर्ष (366 दिन) में यह 21 मार्च को होता है। राष्ट्रीय कैलेंडर की तिथियाँ ग्रेगेरियन कैलेंडर की तिथियों से स्थायी रूप से संबद्ध हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: भारत सरकार ने शक संवत् पर आधारित राष्ट्रीय पंचांग को 22 मार्च 1957 (1 चैत्र, शक संवत् 1879) से आधिकारिक रूप से अपनाया था। राष्ट्रीय पंचांग में 12 महीने होते हैं और वर्ष चैत्र से प्रारंभ होकर फाल्गुन पर समाप्त होता है।
18. कुषाण शासक कनिष्क का राज्याभिषेक किस सन् में हुआ?
U.P.P.C.S. (Pre) 1991
उत्तर-(d)
कनिष्क के राज्याभिषेक की तिथि इतिहासकारों में लंबे समय से विवादास्पद रही है। इस पर विचार-विमर्श के लिए 1913 और 1960 में लंदन में दो अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किए गए। 1960 के द्वितीय सम्मेलन में व्यापक सहमति 78 ई. के पक्ष में बनी और इसी वर्ष से शक संवत् की गणना की जाती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कनिष्क कुषाण वंश का सबसे प्रतापी शासक था। उसका साम्राज्य अफगानिस्तान से लेकर उत्तर भारत तक और मध्य एशिया के कुछ भागों तक फैला हुआ था। उसने चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन कश्मीर में करवाया था, जिसमें महायान बौद्ध धर्म को मान्यता दी गई।
19. बुद्ध का किसके सिक्कों पर अंकन हुआ है?
U.P.P.C.S. (Pre) 2010
उत्तर-(b)
कुषाण शासक कनिष्क के सिक्कों पर बुद्ध की आकृति अंकित मिलती है। यह ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि ये सिक्के बुद्ध की मानवीय रूप में सर्वप्रथम मूर्तिकला अभिव्यक्तियों में से एक माने जाते हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कनिष्क के सिक्कों पर बुद्ध के अतिरिक्त ग्रीक, ईरानी और भारतीय देवी-देवताओं की आकृतियाँ भी मिलती हैं, जो उसकी धार्मिक उदारता को दर्शाती हैं। कनिष्क के सिक्कों पर लेख तीन लिपियों — खरोष्ठी, ब्राह्मी और यूनानी — में मिलते हैं, जो उसके साम्राज्य की बहुसांस्कृतिक प्रकृति को दर्शाते हैं।
20. अश्वघोष किसका समकालीन था ?
U.P.P.C.S. (Mains) 2008
Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2010
Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2010
उत्तर-(c)
अश्वघोष महान बौद्ध कवि, दार्शनिक और नाटककार थे जो कुषाण शासक कनिष्क के समकालीन और राजकवि थे। उन्होंने बुद्धचरित (संस्कृत महाकाव्य), सौन्दरानन्द तथा महायान श्रद्धोत्पाद शास्त्र की रचना की।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अश्वघोष को प्रथम संस्कृत महाकाव्य ‘बुद्धचरित’ का रचयिता माना जाता है, जिसका चीनी और तिब्बती भाषाओं में भी अनुवाद हुआ। वे पहले ब्राह्मण धर्म के अनुयायी थे, बाद में बौद्ध धर्म में दीक्षित हुए और महायान बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा।
21. निम्नलिखित में से कौन एक कनिष्क के दरबार से संबद्ध नहीं था?
U.P. Lower Sub. (Spl) (Pre) 2008
उत्तर-(d)
कनिष्क के दरबार में अश्वघोष (राजकवि), चरक (आयुर्वेद विशेषज्ञ), नागार्जुन (बौद्ध दार्शनिक) और पार्श्व जैसे विद्वान जुड़े थे। पतंजलि इनसे बहुत पूर्व शुंग काल (लगभग 150 ई.पू.) में हुए थे और उन्होंने पाणिनि की अष्टाध्यायी पर ‘महाभाष्य’ लिखा था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चरक ने आयुर्वेद का प्रसिद्ध ग्रंथ ‘चरकसंहिता’ लिखा, जो आज भी आयुर्वेद चिकित्सा का आधार ग्रंथ माना जाता है। नागार्जुन माध्यमिक दर्शन के प्रणेता थे और उन्हें ‘भारत का आइंस्टीन’ भी कहा जाता है क्योंकि उनके ‘शून्यवाद’ के सिद्धांत ने भारतीय दर्शन को गहराई से प्रभावित किया।
22. कनिष्क के सारनाथ बौद्ध प्रतिमा अभिलेख की तिथि क्या है ?
U.P.P.C.S. (Pre) 2014
उत्तर-(b)
कनिष्क के सारनाथ बौद्ध अभिलेख की तिथि 81 ई. है। यह बौद्ध प्रतिमा मूलतः मथुरा में निर्मित हुई थी और कनिष्क के राज्यारोहण (78 ई.) के तीसरे वर्ष अर्थात् 81 ई. में सारनाथ में स्थापित की गई। यह अभिलेख कनिष्क काल की कला एवं इतिहास का महत्त्वपूर्ण प्रमाण है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सारनाथ (वाराणसी के निकट) वह स्थान है जहाँ गौतम बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना पहला उपदेश (धर्मचक्रप्रवर्तन) दिया था। मथुरा कला और गांधार कला शैली दोनों का विकास कुषाण काल में ही हुआ — मथुरा कला में देशी परंपरा प्रबल थी जबकि गांधार कला में ग्रीक प्रभाव स्पष्ट था।
23. निम्नलिखित में कौन-सा वर्ष दिसंबर, 2009 में शक संवत् का वर्ष होगा ?
U.P.P.C.S. (Mains) 2007
उत्तर-(a)
शक संवत् ज्ञात करने के लिए ग्रेगेरियन वर्ष में से 78 घटाया जाता है। अतः दिसंबर 2009 में शक संवत् = 2009 − 78 = 1931 होगा। ध्यान रखें कि शक संवत् का नया वर्ष मार्च में प्रारंभ होता है, इसलिए दिसंबर में वही वर्ष चल रहा होगा जो मार्च में शुरू हुआ था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शक संवत् भारत का आधिकारिक राष्ट्रीय पंचांग है और इसका उपयोग भारत सरकार के राजपत्र (Gazette), आकाशवाणी के समाचार-प्रसारण तथा सरकारी कैलेंडरों में ग्रेगेरियन तिथियों के साथ-साथ किया जाता है।
24. कनिष्क के समकालीन निम्नलिखित नामों का अध्ययन करें और निम्नांकित
उत्तर कोड के अनुसार अपना उत्तर इंगित करें-
(I) अश्वघोष
(II) वसुमित्र
(III) कालिदास
(IV) कंबन
उत्तर कोड :
U.P.P.C.S. (Pre) 1994
उत्तर-(c)
अश्वघोष कनिष्क के राजकवि थे और वसुमित्र उनके आश्रित विद्वान, जिन्होंने कश्मीर में आयोजित चतुर्थ बौद्ध संगीति की अध्यक्षता की थी। कालिदास गुप्तकाल (चंद्रगुप्त द्वितीय के समय, लगभग 4थी-5वीं शताब्दी ई.) में हुए थे, जबकि कंबन 12वीं शताब्दी के तमिल कवि थे जिन्होंने ‘कम्बरामायणम्’ की रचना की।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वसुमित्र ने ‘महाविभाषा’ नामक बौद्ध ग्रंथ की रचना की जो सर्वास्तिवाद बौद्ध दर्शन का प्रमुख ग्रंथ माना जाता है। चतुर्थ बौद्ध संगीति (कनिष्क के काल में) में ही हीनयान और महायान के रूप में बौद्ध धर्म का आधिकारिक विभाजन माना जाता है।
25. विक्रम संवत् कब से प्रारंभ हुआ?
U.P.P.C.S. (Pre) 1992
उत्तर-(b)
विक्रम संवत् 57 ई.पू. से प्रारंभ हुआ। जैन साहित्य के अनुसार महावीर स्वामी के निर्वाण (527 ई.पू.) और विक्रम संवत् के प्रारंभ के बीच 470 वर्षों का अंतर है। अतः 527 − 470 = 57 ई.पू. इसकी प्रारंभिक तिथि निर्धारित होती है। इसे परंपरागत रूप से राजा विक्रमादित्य द्वारा शकों पर विजय के उपलक्ष्य में प्रारंभ माना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: विक्रम संवत् आज भी राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे अनेक भारतीय राज्यों में हिंदू त्यौहारों और शुभ अवसरों की तिथि निर्धारित करने के लिए प्रयुक्त होता है। नेपाल में विक्रम संवत् को आधिकारिक राष्ट्रीय पंचांग का दर्जा प्राप्त है।
26. शक संवत् कब प्रारंभ किया गया?
U.P.P.C.S. (Pre) 1990
U.P.R.O./ A.R.O. (Mains) 2013
उत्तर-(b)
शक संवत् 78 ई. से प्रारंभ हुआ। जैन ग्रंथों के अनुसार विक्रमादित्य के उत्तराधिकारी को विक्रम संवत् के 135वें वर्ष में शकों ने पराजित किया और इसी उपलक्ष्य में शक संवत् आरंभ हुआ। गणना के अनुसार 135 − 57 = 78 ई., यही शक संवत् की प्रारंभिक तिथि है। अधिकांश इतिहासकार कनिष्क को इसका प्रवर्तक मानते हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शक संवत् का उपयोग प्राचीन भारतीय खगोलशास्त्रीय ग्रंथों जैसे आर्यभट्ट की ‘आर्यभटीय’ और वराहमिहिर की ‘पंचसिद्धांतिका’ में भी किया गया है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के प्रक्षेपण अभिलेखों में भी शक संवत् की तिथि अंकित की जाती है।
27. शुंग वंश के बाद किस वंश ने भारत पर राज किया?
45th B.P.S.C. (Pre) 2001
उत्तर-(c)
शुंग वंश का अंतिम शासक देवभूति था, जिसे उसके ही मंत्री (आमात्य) वासुदेव कण्व ने षड्यंत्र करके मार डाला और 73 ई.पू. में कण्व वंश की नींव रखी। यह वंश भी शुंगों की तरह ब्राह्मण वंश था। कण्व वंश ने लगभग 45 वर्षों तक मगध पर शासन किया और उसके चार राजाओं का उल्लेख मिलता है — वासुदेव, भूमिमित्र, नारायण और सुशर्मा।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कण्व वंश के अंतिम राजा सुशर्मा को सातवाहन वंश के संस्थापक सिमुक ने पराजित कर मार डाला, जिससे कण्व वंश का अंत हुआ। पुराणों के अनुसार कण्व वंश ने 45 वर्ष (73 ई.पू. – 28 ई.पू.) तक शासन किया।
28. बाल विवाह की प्रथा आरंभ हुई-
R.A.S. / R.T.S. (Pre) (Re-exam.) 2000
उत्तर-(b)
कुषाण काल (प्रथम-द्वितीय शताब्दी ई.) में भारतीय समाज में बाल विवाह की प्रथा का प्रचलन आरंभ हुआ। इस युग में कन्याओं के विवाह की आयु घटाकर 8 से 10 वर्ष कर दी गई। इसके साथ ही स्त्रियों का उपनयन संस्कार भी समाप्त होने लगा, जिससे उनकी सामाजिक स्थिति में गिरावट आई।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बाल विवाह के प्रचलन का एक प्रमुख कारण उस काल में विदेशी आक्रमणकारियों (शक, कुषाण आदि) से लड़कियों की सुरक्षा की चिंता भी मानी जाती है। मनुस्मृति में भी बालिका विवाह का समर्थन दिखता है, जो इसी कालखंड की रचना मानी जाती है।
29. सिमुक निम्न वंशों में से किसका संस्थापक था?
U.P.P.C.S. (Spl) (Mains) 2008
उत्तर-(d)
सातवाहन वंश की स्थापना सिमुक (जिसे सिंधुक या शिप्रक भी कहा जाता है) ने की थी। उसने कण्व वंश के अंतिम शासक सुशर्मा की हत्या करके लगभग 60 ई.पू. में इस वंश की नींव रखी। सातवाहन मूलतः दक्कन क्षेत्र के शासक थे और उनकी राजधानी प्रतिष्ठान (वर्तमान पैठण, महाराष्ट्र) थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सातवाहन शासक ‘अमात्य’ और ‘महाभोज’ जैसी प्रशासनिक उपाधियों का प्रयोग करते थे। सातवाहनों ने रोमन साम्राज्य के साथ व्यापक समुद्री व्यापार किया — मसाले, मोती और कपड़े का निर्यात किया जाता था।
30. निम्नलिखित में से कौन कनिष्क प्रथम के दरबार में नहीं गया था?
U.P.P.C.S. (Mains) 2005
उत्तर-(d)
कनिष्क प्रथम के दरबार में अश्वघोष (बौद्ध कवि और दार्शनिक), वसुमित्र (बौद्ध विद्वान), पार्श्व (बौद्ध धर्मगुरु), नागार्जुन, और चरक (आयुर्वेदाचार्य) जैसे विद्वान थे। विशाखदत्त एक संस्कृत नाटककार थे जो गुप्त काल से संबंधित थे — उन्होंने ‘मुद्राराक्षस’ और ‘देवी चंद्रगुप्तम’ नामक नाटकों की रचना की। अतः वे कनिष्क के दरबार से संबंधित नहीं थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कनिष्क के दरबार में महाकवि अश्वघोष ने ‘बुद्धचरित’ की रचना की थी, जिसे ‘भारत का प्रथम महाकाव्य’ भी कहा जाता है। कनिष्क ने कश्मीर में चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन करवाया था।
31. मौर्यों के बाद दक्षिण भारत में सबसे प्रभावशाली राज्य था-
U.P.P.C.S. (Pre) 1993
उत्तर-(a)
मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद दक्षिण भारत में सातवाहन वंश सबसे शक्तिशाली और प्रभावशाली राजवंश बनकर उभरा। सातवाहनों ने लगभग 450 वर्षों (60 ई.पू. – 240 ई.) तक दक्षिण और दक्कन क्षेत्र पर शासन किया। इनका साम्राज्य वर्तमान महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और मध्य भारत के बड़े हिस्से पर फैला था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सातवाहन शासक गौतमीपुत्र शातकर्णि को इस वंश का सबसे महान शासक माना जाता है, जिन्होंने शकों को पराजित किया था। सातवाहनों के काल में ही ‘अमरावती स्तूप’ का निर्माण हुआ, जो बौद्ध कला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
32. पुष्यमित्र शुंग द्वारा दो अश्वमेध यज्ञ किए जाने के बारे में जानकारी किस लेख से मिलती है?
U.P.P.C.S. (Pre) 2018
उत्तर-(c)
अयोध्या अभिलेख से यह जानकारी मिलती है कि शुंग वंश के संस्थापक पुष्यमित्र शुंग ने दो अश्वमेध यज्ञ संपन्न कराए थे। पुष्यमित्र शुंग ने 184 ई.पू. में मौर्य वंश के अंतिम शासक बृहद्रथ की हत्या करके शुंग वंश की स्थापना की थी। वह स्वयं एक ब्राह्मण था और पारंपरिक वैदिक धर्म का समर्थक था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: पुष्यमित्र शुंग के शासनकाल में ही महान संस्कृत व्याकरणाचार्य पतंजलि ने ‘महाभाष्य’ की रचना की थी। पुष्यमित्र ने यूनानी राजा डेमेट्रियस के आक्रमण को भी सफलतापूर्वक विफल किया था।
33. किस चीनी जनरल ने कनिष्क को हराया था ?
Jharkhand P.C.S. (Pre) 2003
उत्तर-(a)
चीनी स्रोतों के अनुसार, हान वंश के प्रसिद्ध सेनापति पान चाऊ ने 73 ई. से 94 ई. के बीच चीनी तुर्किस्तान पर अभियान चलाया। कुषाण शासक ने हान राजकुमारी से विवाह का प्रस्ताव भेजा, जिसे पान चाऊ ने अस्वीकार कर दिया। इससे रुष्ट होकर कुषाण शासक ने आक्रमण किया परंतु पराजित हुए। यद्यपि अधिकांश इतिहासकार इस कुषाण शासक को विम कडफिसेस मानते हैं, तथापि यदि कनिष्क का राज्यारोहण 78 ई. माना जाए तो यह युद्ध कनिष्क के काल का हो सकता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: पान चाऊ को चीन के इतिहास में ‘रेशम मार्ग का रक्षक’ भी कहा जाता है। कुषाण साम्राज्य रेशम मार्ग (Silk Route) पर नियंत्रण रखता था, जिससे उसे भारी व्यापारिक लाभ मिलता था — यही नियंत्रण चीन के साथ उनके संघर्ष का एक प्रमुख कारण था।
34. इनमें से किस आयुर्वेदाचार्य ने तक्षशिला विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त की थी?
U.P. Lower Sub. (Pre) 2015
उत्तर-(c&d)
तक्षशिला (वर्तमान पाकिस्तान के रावलपिंडी जिले में स्थित) प्राचीन भारत का सर्वाधिक प्रतिष्ठित शिक्षा केंद्र था और गांधार राज्य की राजधानी भी था। यह वैद्यक (आयुर्वेद) तथा धनुर्विद्या के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध था। कनिष्क के राजवैद्य चरक तथा मगध नरेश बिंबिसार के राजवैद्य जीवक दोनों ने यहीं से शिक्षा प्राप्त की थी। इनके अतिरिक्त चाणक्य, वसुबंधु और कोशल नरेश प्रसेनजित ने भी यहाँ अध्ययन किया था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जीवक ने तक्षशिला में 7 वर्षों तक आयुर्वेद का अध्ययन किया था और वे बौद्ध धर्म के अनुयायी थे — उन्होंने स्वयं बुद्ध का भी उपचार किया था। तक्षशिला विश्व के प्राचीनतम विश्वविद्यालयों में से एक माना जाता है, जिसकी स्थापना लगभग 700 ई.पू. में हुई थी।
35. निम्नलिखित में से कौन-सा शासक वर्ण-व्यवस्था का रक्षक कहा जाता है?
Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2013
उत्तर-(c)
सातवाहन वंश के महान शासक गौतमीपुत्र शातकर्णि (लगभग 106–130 ई.) ने अपने अभिलेखों में दावा किया है कि उन्होंने विछिन्न हो रही चातुर्वर्ण्य व्यवस्था (चार वर्णों की सामाजिक संरचना) को पुनर्स्थापित किया और वर्णसंकर (अर्थात् वर्णों के मिश्रण) को रोका। इसी कारण उन्हें ‘वर्ण-व्यवस्था का रक्षक’ की उपाधि दी जाती है। उन्होंने पश्चिमी क्षत्रपों (शकों) को पराजित करके अपनी शक्ति का विस्तार किया था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गौतमीपुत्र शातकर्णि की माता गौतमी बलश्री ने नासिक प्रशस्ति लेख (नासिक अभिलेख) जारी करवाया था, जिससे उनकी उपलब्धियों की जानकारी मिलती है। गौतमीपुत्र शातकर्णि को ‘एकाराट’ (एकमात्र शासक) की उपाधि भी प्राप्त थी।
36. निम्न में से किस वंश के साम्राज्य की सीमाएं भारत के बाहर तक फैली थीं?
Uttarakhand U.D.A./L.D.A. (Mains) 2006
उत्तर-(b&c)
मौर्य और कुषाण दोनों वंशों के साम्राज्य की सीमाएँ भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर तक फैली हुई थीं। सेल्यूकस निकेटर से संधि के पश्चात चंद्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य काबुल, कंधार और बलूचिस्तान तक विस्तृत था। कुषाण शासक कनिष्क का साम्राज्य उत्तर में मध्य एशिया (तुरफान) से लेकर दक्षिण में विंध्य पर्वत तक और पश्चिम में उत्तरी अफगानिस्तान से पूर्व में बिहार तक फैला था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कुषाण वंश की उत्पत्ति मध्य एशिया की यूझी (Yuezhi) जनजाति से हुई थी, जो चीन से विस्थापित होकर बैक्ट्रिया होते हुए भारत आई। कनिष्क की राजधानी पुरुषपुर (वर्तमान पेशावर, पाकिस्तान) थी, और उनके सिक्कों पर ग्रीक, ईरानी तथा भारतीय देवताओं के चित्र मिलते हैं, जो साम्राज्य की बहुसांस्कृतिक प्रकृति को दर्शाते हैं।
37. निम्नलिखित नगरों में से किसका उल्लेख कनिष्क के रबतक अभिलेख में नहीं है?
U.P.R.O. / A.R.O. (Mains) 2014
उत्तर-(a)
रबतक अभिलेख 1993 में अफगानिस्तान के शुर्ख कोटल के निकट ‘रबतक’ नामक स्थान से प्राप्त हुआ। यह यूनानी लिपि और बैक्ट्रियन भाषा में लिखा गया है तथा कुषाण शासक कनिष्क से संबंधित है। इस अभिलेख में साकेत, कौशाम्बी, पाटलिपुत्र और चम्पा — इन चार नगरों का उल्लेख मिलता है। श्रावस्ती का इसमें कोई उल्लेख नहीं है, अतः उत्तर (a) सही है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: रबतक अभिलेख कुषाण इतिहास की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे कनिष्क की वंशावली और उनके पूर्वजों — कुजुल कडफिसेस, विम ताक्षम (विम कडफिसेस) — के नामों की पुष्टि होती है। यह अभिलेख कनिष्क के राज्यारोहण वर्ष के विवाद को सुलझाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
38. जो कला शैली भारतीय और यूनानी (ग्रीक) आकृति का सम्मिश्रण है, उसे कहते हैं-
R.A.S./R.T.S. (Pre) 2008
R.A.S./R.T.S. (Pre) 1993
R.A.S./R.T.S. (Pre) 1993
उत्तर-(c)
गांधार कला शैली भारतीय एवं यूनानी (ग्रीक) कला परंपराओं के मिश्रण से उत्पन्न हुई एक अद्वितीय शैली है। इसके मुख्य संरक्षक शक एवं कुषाण शासक थे। इस शैली का विषय-वस्तु पूर्णतः बौद्ध धर्म से संबंधित था, इसीलिए इसे ‘ग्रीको-बुद्धिस्ट’, ‘इंडो-ग्रीक’ अथवा ‘ग्रीको-रोमन’ कला भी कहा जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:गांधार शैली में बुद्ध की मूर्तियों पर यूनानी प्रभाव स्पष्ट दिखता है — उनके वस्त्र टोगा की तरह, घुंघराले बाल, और स्पष्ट चेहरे की विशेषताएं यूनानी मूर्तिकला की याद दिलाती हैं।
गांधार कला का प्रमुख केंद्र वर्तमान पाकिस्तान और अफगानिस्तान में था — विशेष रूप से पेशावर (पुरुषपुर), तक्षशिला और जलालाबाद।
गांधार कला का प्रमुख केंद्र वर्तमान पाकिस्तान और अफगानिस्तान में था — विशेष रूप से पेशावर (पुरुषपुर), तक्षशिला और जलालाबाद।
39. प्राचीन काल के भारत पर आक्रमणों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा एक सही कालानुक्रम है ?
I.A.S. (Pre) 2006
उत्तर-(a)
भारत पर विदेशी आक्रमणकारियों का सही कालानुक्रम है — यूनानी (326 ई.पू., सिकंदर महान), शक (प्रथम शताब्दी ई.पू.), और कुषाण (पहली शताब्दी ई.)। सिकंदर ने झेलम नदी के तट पर हाइडेस्पीज का युद्ध लड़ा था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:सिकंदर के आक्रमण (326 ई.पू.) ने भारत और यूनान के बीच व्यापारिक एवं सांस्कृतिक संपर्क का मार्ग प्रशस्त किया, जिसके फलस्वरूप हेलेनिस्टिक कला का प्रभाव भारतीय उपमहाद्वीप पर पड़ा।
कुषाण वंश मध्य एशिया की युएज़ी जनजाति से उत्पन्न हुआ था। उनके महान शासक कनिष्क प्रथम ने बौद्ध धर्म की चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन कश्मीर (या कुंडलवन) में करवाया था।
कुषाण वंश मध्य एशिया की युएज़ी जनजाति से उत्पन्न हुआ था। उनके महान शासक कनिष्क प्रथम ने बौद्ध धर्म की चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन कश्मीर (या कुंडलवन) में करवाया था।
40. कला की गांधार शैली निम्न समय में फली-फूली-
38th B.P.S.C. (Pre) 1992
उत्तर-(a)
गांधार कला शैली कुषाण शासन काल में अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँची। कुषाण सम्राट कनिष्क के शासनकाल में दो प्रमुख कला शैलियों का विकास हुआ — (1) गांधार शैली, जो उत्तर-पश्चिम में यूनानी प्रभाव के साथ फली-फूली, और (2) मथुरा शैली, जो शुद्ध भारतीय परंपरा का प्रतिनिधित्व करती थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:गांधार कला शैली लगभग पहली से पाँचवीं शताब्दी ई. तक सक्रिय रही। इसमें स्लेटी शिस्ट (Schist) पत्थर का उपयोग किया जाता था जो उस क्षेत्र में सहज उपलब्ध था।
41. निम्नलिखित में से किस मूर्ति कला में सदैव हरित स्तरित चट्टान (शिस्ट) का प्रयोग माध्यम के रूप में होता था?
I.A.S. (Pre) 1996
उत्तर-(d)
गांधार मूर्तिकला में सदैव हरित स्तरित शिस्ट चट्टान का उपयोग किया जाता था। यह पत्थर गांधार क्षेत्र (वर्तमान उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान) में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध था। मथुरा कला में इसका आंशिक अनुसरण हुआ, परंतु वहाँ मुख्यतः लाल बलुआ पत्थर (Red Sandstone) का प्रयोग होता था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:मथुरा कला शैली में बुद्ध की मूर्तियाँ पूर्णतः स्वदेशी परंपरा में बनाई जाती थीं — पतले वस्त्र, घुटा हुआ सिर, और भारतीय शारीरिक गठन इसकी पहचान थी। यह शैली गुप्तकालीन कला की पूर्वपीठिका बनी।
गांधार और मथुरा दोनों शैलियाँ बुद्ध की मानवीय प्रतिमाएँ बनाने में अग्रणी रहीं। इससे पहले के मौर्यकाल में बुद्ध को प्रतीकों (पाद-चिह्न, छत्र, धर्मचक्र) द्वारा दर्शाया जाता था, न कि मानवाकृति में।
42. निम्नलिखित में से कौन सही सुमेलित नहीं है?
सूची-I (राजवंश) सूची-II (सिक्कों की धातुएं)
U.P.R.O/A.R.O. (Pre) 2016
उत्तर-(c)
सातवाहन शासकों ने स्वर्ण सिक्के नहीं चलाए — उन्होंने चाँदी, ताँबा और सीसे के सिक्के प्रचलन में रखे। कुषाणों ने अत्यंत शुद्ध सोने के सिक्के जारी किए (यद्यपि भारत में सर्वप्रथम स्वर्ण सिक्के हिंद-यवन/इंडो-ग्रीक शासकों ने चलाए थे)। गुप्तों ने स्वर्ण व रजत, और कलचुरियों ने तीनों धातुओं के सिक्के चलाए।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:सातवाहन काल के चाँदी के सिक्कों पर राजा का नाम प्राकृत में लिखा होता था और उन पर हाथी, शेर, अश्व तथा जहाज जैसी आकृतियाँ उत्कीर्ण होती थीं — ये उनके समुद्री व्यापार की ओर भी संकेत करती हैं।
43. अफगानिस्तान का बमियान प्रसिद्ध था
U.P.P.C.S. (Spl) (Mains) 2008
उत्तर-(d)
अफगानिस्तान का बामियान क्षेत्र पर्वत की चट्टानों को तराश कर बनाई गई विशालकाय बुद्ध प्रतिमाओं के लिए विश्व-विख्यात था। ये प्रतिमाएँ गांधार कला की उत्कृष्ट उपलब्धि थीं। दुर्भाग्यवश, मार्च 2001 में तालिबान शासन ने इन ऐतिहासिक प्रतिमाओं को गोलाबारी एवं विस्फोटकों से नष्ट कर दिया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:बामियान की दो मुख्य बुद्ध प्रतिमाएँ क्रमशः 55 मीटर और 37 मीटर ऊँची थीं — ये दुनिया की सबसे बड़ी खड़ी बुद्ध प्रतिमाओं में से थीं। इनका निर्माण लगभग 6वीं शताब्दी ई. में हुआ था।
UNESCO ने बामियान घाटी को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया है। इन प्रतिमाओं के विध्वंस के बाद वहाँ पुनर्निर्माण की संभावनाओं पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस जारी है।
UNESCO ने बामियान घाटी को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया है। इन प्रतिमाओं के विध्वंस के बाद वहाँ पुनर्निर्माण की संभावनाओं पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस जारी है।
44. निम्नलिखित युग्मों में से कौन-सा एक सही सुमेलित है?
I.A.S. (Pre) 2001
Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2008
Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2008
उत्तर-(b)
केवल कुषाण–गांधार कला शैली का युग्म सही है। शेष तीनों गलत हैं: चित्रित धूसर मृद्भांड (Painted Grey Ware) हड़प्पा से नहीं बल्कि उत्तर वैदिक काल (लगभग 1000–600 ई.पू.) से संबंधित है; अजंता की चित्रकारी गुप्त व वाकाटक काल की देन है, मुगलकाल की नहीं; और पहाड़ी चित्र शैली मराठाओं से नहीं बल्कि हिमालयी राजपूत रियासतों (कांगड़ा, बसोहली, चंबा आदि) से संबंधित है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:कुषाण शासक कनिष्क (लगभग 78–101 ई.) के काल में गांधार शैली के साथ-साथ मथुरा शैली भी पनपी। दोनों शैलियों में अंतर यह था कि गांधार में विदेशी प्रभाव था जबकि मथुरा शुद्ध देशज परंपरा में थी।
45. सूची-I तथा सूची-II को सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट से सही
सूची-I सूची-II
A. गाधार कला 1. मिनांडर
B. जूनागढ़ शिलालेख 2. पतिक
C. मिलिंदपन्हो 3. कुषाण
D. तक्षशिला लेख 4. रुद्रदामन I
कूट :
A B C D उत्तर चुनिए –
सूची-I सूची-II
A. गाधार कला 1. मिनांडर
B. जूनागढ़ शिलालेख 2. पतिक
C. मिलिंदपन्हो 3. कुषाण
D. तक्षशिला लेख 4. रुद्रदामन I
कूट :
A B C D उत्तर चुनिए –
U.P.P.C.S. (Pre) 2017
उत्तर-(c)
सही सुमेलन इस प्रकार है —
गांधार कला → कुषाण (कनिष्क के संरक्षण में विकसित)
जूनागढ़ शिलालेख → रुद्रदामन I (शक शासक, लगभग 150 ई.)
मिलिंदपन्हो → मिनांडर (यूनानी राजा, जिसे ‘मिलिंद’ भी कहते हैं)
तक्षशिला लेख → पतिक (कुषाण काल का शिलालेख, उत्तर-पश्चिम भारत में)
गांधार कला → कुषाण (कनिष्क के संरक्षण में विकसित)
जूनागढ़ शिलालेख → रुद्रदामन I (शक शासक, लगभग 150 ई.)
मिलिंदपन्हो → मिनांडर (यूनानी राजा, जिसे ‘मिलिंद’ भी कहते हैं)
तक्षशिला लेख → पतिक (कुषाण काल का शिलालेख, उत्तर-पश्चिम भारत में)
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:जूनागढ़ शिलालेख संस्कृत भाषा में लिखित सबसे प्रारंभिक अभिलेखों में से एक है। इसी अभिलेख में सुदर्शन झील के जीर्णोद्धार का उल्लेख मिलता है, जिसे मौर्यकाल में चंद्रगुप्त ने बनवाया था।
मिलिंदपन्हो (Milindapanha) एक प्रसिद्ध बौद्ध ग्रंथ है जिसमें यूनानी राजा मिनांडर (मिलिंद) और बौद्ध भिक्षु नागसेन के बीच दार्शनिक संवाद वर्णित हैं। मिनांडर बाद में बौद्ध धर्म का अनुयायी बन गया था।
मिलिंदपन्हो (Milindapanha) एक प्रसिद्ध बौद्ध ग्रंथ है जिसमें यूनानी राजा मिनांडर (मिलिंद) और बौद्ध भिक्षु नागसेन के बीच दार्शनिक संवाद वर्णित हैं। मिनांडर बाद में बौद्ध धर्म का अनुयायी बन गया था।
46. गांधार कला शैली एक संश्लेषण है-
U.P. P.C.S. (Pre) 1996
उत्तर-(d)
गांधार कला शैली भारतीय और यूनानी (ग्रीक) कला का अद्भुत संश्लेषण है। यह शैली सिकंदर के आक्रमण के बाद भारत में आए यूनानी कलात्मक प्रभाव का परिणाम थी। इसका विकास मुख्यतः कुषाण काल (पहली–तीसरी शताब्दी ई.) में हुआ।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:गांधार कला पर रोमन कला का भी प्रभाव पड़ा — विशेषतः वस्त्रों की भंगिमाओं और चेहरे की रूपरेखा में रोमन मूर्तिकला की झलक मिलती है, जिसके कारण इसे कभी-कभी ‘इंडो-रोमन’ शैली भी कहते हैं।
47. नीचे दो वक्तव्य दिए गए हैं, जिसमें एक को अभिकथन (A) व दूसरे को कारण (R) कहा गया है :
अभिकथन (A) – सातवाहन काल में संस्कृत के साथ प्राकृत व अन्य लोक भाषाओं का विकास हुआ।
कारण (R) – सातवाहन राजाओं ने साहित्य रचना के लिए संस्कृत तथा अन्य लोक भाषाओं को अपनाया। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर का चयन कीजिए
अभिकथन (A) – सातवाहन काल में संस्कृत के साथ प्राकृत व अन्य लोक भाषाओं का विकास हुआ।
कारण (R) – सातवाहन राजाओं ने साहित्य रचना के लिए संस्कृत तथा अन्य लोक भाषाओं को अपनाया। नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर का चयन कीजिए
U.P.R.O/A.R.O. (Mains) 2017
उत्तर-(a)
सातवाहन काल में प्राकृत और संस्कृत दोनों भाषाओं का समानांतर विकास हुआ। सातवाहन राजा हाल ने प्राकृत भाषा में ‘गाथासप्तशती’ की रचना की, जो श्रृंगार रस का महत्त्वपूर्ण काव्य-ग्रंथ है। उनके दरबारी विद्वान गुणाढ्य ने पैशाची प्राकृत में ‘बृहत्कथा’ लिखी, जबकि शर्ववर्मन ने ‘कातंत्र’ नामक संस्कृत व्याकरण की रचना की। कन्हेरी के एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि एक सातवाहन रानी संस्कृत का प्रयोग करती थीं, जो यह सिद्ध करता है कि राजपरिवार में दोनों भाषाओं का प्रचलन था। अतः अभिकथन और कारण दोनों सत्य हैं और कारण, अभिकथन की सटीक व्याख्या करता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘गाथासप्तशती’ में कुल 700 पद्य हैं और यह महाराष्ट्री प्राकृत में लिखी गई है — यह ग्रंथ प्राकृत साहित्य की आधारशिला माना जाता है। गुणाढ्य की ‘बृहत्कथा’ बाद में संस्कृत में ‘कथासरित्सागर’ के रूप में रूपांतरित की गई।
48. पहला ईरानी शासक जिसने भारत के कुछ भाग को अपने अधीन किया था-
R.A.S./ R.T.S. (Pre) 1994
उत्तर-(c)
ईरान के अचमेनिद वंश के शासक डेरियस प्रथम (522–486 ई.पू.) पहले ऐसे ईरानी राजा थे जिन्होंने भारत के उत्तर-पश्चिमी भाग — सिंधु घाटी क्षेत्र — को अपने साम्राज्य में शामिल किया। यूनानी इतिहासकार हेरोडोटस के अनुसार, डेरियस प्रथम का साम्राज्य पूर्व में राजपूताना के मरुस्थल तक फैला हुआ था। पर्सिपोलिस और नक्शे-रुस्तम के शिलालेखों में पंजाब को भी उसके साम्राज्य का अंग बताया गया है। इस क्षेत्र से उसे अपार राजस्व और सैन्य बल प्राप्त होता था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: डेरियस प्रथम ने भारतीय (सिंधु) प्रांत को अपने साम्राज्य का सबसे समृद्ध और सबसे अधिक कर देने वाला प्रांत बताया था — यह 360 टैलेंट सोना प्रति वर्ष कर देता था। उसने सिंधु नदी का सर्वेक्षण करने के लिए स्काइलैक्स नामक यूनानी नाविक को भी भेजा था।
49. निम्नलिखित को कालक्रमानुसार व्यवस्थित कीजिए-
1.सातवाहन
2.वाकाटक
3.चालुक्य
निम्नलिखित में सही कूट का चयन कीजिए-
Jharkhand P.C.S. (Pre) 2021
उत्तर-(d)
तीनों राजवंशों का कालक्रम इस प्रकार है: सातवाहन वंश की स्थापना सिमुक ने लगभग प्रथम शताब्दी ई.पू. में की थी और यह वंश दक्कन पर करीब 400 वर्षों तक शासन करता रहा। इसके पश्चात वाकाटक वंश की स्थापना तृतीय शताब्दी ई. में विंध्यशक्ति ने की और यह वंश गुप्त काल का समकालीन रहा। अंत में गुजरात के चालुक्य (सोलंकी) वंश की स्थापना मूलराज प्रथम ने दसवीं शताब्दी ई. (लगभग 941 ई.) में की। अतः सही क्रम है: सातवाहन → वाकाटक → चालुक्य, जो विकल्प (d) के अनुरूप है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वाकाटक राजा रुद्रसेन द्वितीय का विवाह गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावतीगुप्त से हुआ था, जिससे दोनों राजवंशों के मध्य घनिष्ठ राजनीतिक संबंध स्थापित हुए। अजंता की कुछ प्रसिद्ध गुफाएँ वाकाटक काल में ही निर्मित हुई थीं।
50. निम्नलिखित शासकों में से किसके लिए ‘एका ब्राह्मण’ प्रयुक्त हुआ है?
U.P.R.O/A.R.O. (Pre) 2016
उत्तर-(c)
सातवाहन वंश के महान शासक गौतमीपुत्र शातकर्णि को नासिक के एक अभिलेख में ‘एका ब्राह्मण’ की उपाधि दी गई है, जिसका अर्थ है ‘अद्वितीय ब्राह्मण’ अथवा ‘ब्राह्मण धर्म का एकमात्र संरक्षक।’ वह शक शासकों को पराजित करने के कारण इतिहास में विशेष रूप से प्रसिद्ध है। उसने क्षत्रपों की सत्ता को समाप्त कर दक्कन में पुनः एकछत्र सातवाहन शासन स्थापित किया। उसकी माता गौतमी बलश्री ने नासिक प्रशस्ति में उसके शौर्य और धार्मिक कार्यों का विस्तार से वर्णन किया है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गौतमीपुत्र शातकर्णि को ‘त्रिसमुद्रतोयपीतवाहन’ भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है — जिसके घोड़ों ने तीनों समुद्रों का जल पिया हो। यह उपाधि उनके विशाल साम्राज्य-विस्तार का प्रतीक है। उनका शासनकाल लगभग 106–130 ई. माना जाता है।
51. निम्न राजवंशों में सबसे पुराना राजवंश था-
U.P. U.D.A./L.D.A. (Pre) 2001
उत्तर-(d)
दिए गए सभी राजवंशों में सातवाहन सबसे प्राचीन है। इस वंश के संस्थापक सिमुक का काल अधिकांश स्रोतों के अनुसार लगभग 200 ई.पू. से आरंभ होता है। पुराणों में इसे ‘आंध्रभृत्य’ या ‘आंध्र’ वंश कहा गया है। तुलनात्मक रूप से पल्लव वंश तीसरी-चौथी शताब्दी ई., चालुक्य छठी शताब्दी ई. और राष्ट्रकूट वंश आठवीं शताब्दी ई. में उभरे। इस प्रकार सातवाहन इन सभी से कई शताब्दियाँ पुराना है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सातवाहन वंश लगभग 400 वर्षों तक (200 ई.पू. से लगभग 220 ई. तक) शासन में रहा, जो इसे दक्षिण भारत के सबसे दीर्घजीवी राजवंशों में से एक बनाता है। इस वंश ने रोमन साम्राज्य के साथ सक्रिय व्यापार किया, जिसके प्रमाण सातवाहन काल के सिक्कों और बंदरगाहों से मिलते हैं।
52. निम्नलिखित को सुमेलित कीजिए-
राजवंश राजधानी
A. शुंग – i. महोबा
B. सातवाहन – ii. बनवासी
C. कदम्ब – iii. पैठन
D. चन्देल – iv. पाटलिपुत्र
सही कूट का चयन कीजिए-
A B C D
राजवंश राजधानी
A. शुंग – i. महोबा
B. सातवाहन – ii. बनवासी
C. कदम्ब – iii. पैठन
D. चन्देल – iv. पाटलिपुत्र
सही कूट का चयन कीजिए-
A B C D
R.A.S./R.T.S. (Pre) 2018
उत्तर-(a)
इन राजवंशों और उनकी राजधानियों का सही सुमेलन इस प्रकार है: शुंग वंश की राजधानी पाटलिपुत्र थी (मगध में), सातवाहन वंश की राजधानी पैठन (प्रतिष्ठान, महाराष्ट्र में), कदम्ब वंश की राजधानी बनवासी (वर्तमान कर्नाटक में) और चन्देल वंश की राजधानी महोबा (वर्तमान उत्तर प्रदेश में) थी। ये सभी अपने-अपने क्षेत्रों में सांस्कृतिक और स्थापत्य दृष्टि से महत्त्वपूर्ण केंद्र थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कदम्ब वंश (345–525 ई.) दक्षिण भारत का पहला ऐसा राजवंश था जिसने कन्नड़ भाषा को राजकीय लेखन में प्रयोग किया। चन्देल वंश के शासकों ने खजुराहो के विश्वप्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण करवाया, जो आज यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल हैं।
53. सातवाहनों की राजधानी अवस्थित थी-
U.P.P.C.S. (Mains) 2005
उत्तर-(a)
सातवाहनों की वास्तविक और प्रमुख राजधानी प्रतिष्ठान (वर्तमान पैठन, महाराष्ट्र) थी, जो गोदावरी नदी के तट पर स्थित है। हालाँकि परंपरागत रूप से आरंभिक राजधानी अमरावती को माना जाता है। पुराणों में इस वंश को ‘आंध्रभृत्य’ कहा गया है और इनका उदय दक्कन में हुआ था। परीक्षा की दृष्टि से इस प्रश्न का स्वीकृत उत्तर ‘अमरावती’ है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: प्रतिष्ठान (पैठन) एक महत्त्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र भी था — यह ‘दक्षिणापथ’ व्यापार मार्ग पर स्थित था और रोमन व्यापारियों का यहाँ आना-जाना रहता था। ग्रीक भूगोलशास्त्री टॉलेमी ने अपने ग्रंथ में इसे ‘प्रैटिष्ठान’ नाम से उल्लिखित किया है।
54. सातवाहन शासकों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/ से कथन सत्य है / हैं ?
1.सातवाहन नरेश प्राकृत भाषा के पोषक थे।
2.सातवाहन काल में कला के लोक पक्ष को अधिक प्रोत्साहन मिला।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर को चुनिए ।
1.सातवाहन नरेश प्राकृत भाषा के पोषक थे।
2.सातवाहन काल में कला के लोक पक्ष को अधिक प्रोत्साहन मिला।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर को चुनिए ।
U.P.P.C.S. (Pre) 2021
उत्तर-(b)
सातवाहन शासकों ने प्राकृत भाषा को विशेष संरक्षण दिया। राजा हाल द्वारा रचित ‘गाथासप्तशती’ इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। कला के क्षेत्र में सातवाहन काल में सांची, अमरावती और नागार्जुनकोंडा में बौद्ध स्तूपों और मूर्तियों का निर्माण हुआ जिनमें जन-जीवन, लोक कथाएँ और सामान्य दृश्यों को उकेरा गया — यह लोक कला का स्पष्ट प्रमाण है। अतः दोनों कथन सत्य हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अमरावती स्तूप (आंध्र प्रदेश), जिसे ‘महाचैत्य’ भी कहा जाता है, सातवाहन काल की श्रेष्ठतम कला का प्रतीक है — इसकी संगमरमर की नक्काशी अत्यंत सजीव और लोकजीवन से प्रेरित है। यह स्तूप तीसरी शताब्दी ई.पू. से दूसरी शताब्दी ई. के बीच निर्मित हुआ।
55. आंध्र सातवाहन राजाओं की सबसे लंबी सूची किस पुराण में मिलती है?
Uttarakhand U.D.A./L.D.A. (Mains) 2006
उत्तर-(c)
विभिन्न पुराणों में सातवाहन राजाओं के नाम संकलित हैं, किन्तु इनमें से सबसे विस्तृत सूची मत्स्य पुराण में मिलती है, जिसमें 29 सातवाहन राजाओं के नाम दर्ज हैं। वायु पुराण और विष्णु पुराण में भी इस वंश का उल्लेख है, परन्तु वे सूचियाँ तुलनात्मक रूप से संक्षिप्त हैं। पुराणों में इस वंश को ‘आंध्र’ या ‘आंध्रभृत्य’ कहा गया है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मत्स्य पुराण के अनुसार सातवाहन वंश ने कुल 460 वर्षों तक शासन किया। यह पुराण सातवाहन इतिहास के पुनर्निर्माण का सबसे महत्त्वपूर्ण साहित्यिक स्रोत है और इसीलिए इतिहासकार इसे इस वंश के अध्ययन में प्राथमिकता देते हैं।
56. निम्न में से कौन-सा स्थान सातवाहनों की राजधानी था?
U.P. Lower Sub. (Spl) (Pre) 2008
उत्तर-(a)
सातवाहनों की मुख्य राजधानी प्रतिष्ठान थी, जिसे आज ‘पैठन’ के नाम से जाना जाता है। यह महाराष्ट्र में गोदावरी नदी के किनारे स्थित है। नागार्जुनकोंडा इक्ष्वाकु वंश का केंद्र था, शाकल/स्यालकोट मेनांडर (मिलिंद) की राजधानी थी, और पाटलिपुत्र मगध की राजधानी। इस प्रकार प्रतिष्ठान ही सातवाहनों की वास्तविक राजधानी थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: प्रतिष्ठान (पैठन) आज भी महाराष्ट्र में अपनी ‘पैठणी साड़ियों’ के लिए प्रसिद्ध है — यह रेशमी साड़ी परंपरा सातवाहन काल के बुनकर शिल्प की विरासत मानी जाती है। पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी (प्रथम शताब्दी ई.) में भी इसे एक समृद्ध व्यापारिक नगर के रूप में उल्लिखित किया गया है।
57. पेरीप्लस ऑफ द इरिथ्रियन सी किसने लिखी?
64th B.P.S.C. (Pre) 2018
उत्तर-(e)
‘पेरीप्लस ऑफ द इरिथ्रियन सी’ एक प्राचीन यूनानी पांडुलिपि है जो लगभग पहली शताब्दी ईस्वी (60 ई.) में अलेक्जेंड्रिया के एक अज्ञात नाविक/व्यापारी द्वारा लिखी गई थी। इसमें हिंद महासागर, लाल सागर और फारस की खाड़ी के बंदरगाहों तथा व्यापारिक मार्गों का विस्तृत वर्णन है। इसमें भारत के बंदरगाहों जैसे बरीगाज़ा (भड़ौच) और मुज़िरिस का भी उल्लेख मिलता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इस ग्रंथ में भारत से रोम को निर्यात होने वाली वस्तुओं जैसे काली मिर्च, मलमल, हाथीदाँत और मोती का विशेष उल्लेख किया गया है, जो तत्कालीन भारत-रोम व्यापार की समृद्धि को दर्शाता है। साथ ही, इस ग्रंथ से यह भी पता चलता है कि उस काल में दक्षिण भारत के ‘मुज़िरिस’ बंदरगाह से बड़ी मात्रा में व्यापार होता था, जिसे आज केरल का ‘कोडुंगल्लूर’ माना जाता है।
58. कलिंग नरेश खारवेल निम्न में से किस वंश से संबंधित थे?
U.P.P.C.S. (Spl) (Mains) 2008
U.P.P.C.S. (Mains) 2015
U.P.P.C.S. (Mains) 2015
उत्तर-( (a)
कलिंग का शासक खारवेल चेदि वंश (महामेघवाहन वंश) से संबंधित था। इस वंश का संस्थापक महामेघवाहन था और खारवेल इस वंश का सर्वाधिक प्रतापी राजा था। हाथीगुम्फा अभिलेख के अनुसार खारवेल ने मगध पर आक्रमण कर वहाँ से जैन तीर्थंकर की वह मूर्ति वापस लाई जिसे नंद राजा उठा ले गए थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:खारवेल ने अपने शासनकाल में कलिंग की सिंचाई व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए नंद राजाओं द्वारा निर्मित नहर का विस्तार करवाया था। वह जैन धर्म का परम अनुयायी था और उसने जैन मुनियों के लिए उदयगिरि पहाड़ी पर गुफाएँ भी बनवाईं।
59. निम्नलिखित में से कौन-सा युग्म सही सुमेलित नहीं है?
अभिलेख शासक
अभिलेख शासक
U.P.R.O./ A.R.O. (Pre) 2017
उत्तर-(c)
भितरी स्तंभ लेख का संबंध गुप्त शासक स्कंदगुप्त से है, न कि पुलकेशिन द्वितीय से। पुलकेशिन द्वितीय का अभिलेख ऐहोल से प्राप्त होता है जिसे उसके दरबारी कवि रविकीर्ति ने संस्कृत में लिखा था। गौतमीपुत्र शातकर्णि के दो अभिलेख नासिक से और एक कार्ले से मिलते हैं। रुद्रदामन प्रथम का जूनागढ़ (गिरनार) अभिलेख शक संवत् 72 (लगभग 150 ई.) का है जो शुद्ध संस्कृत में लिखा गया पहला बड़ा अभिलेख माना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:ऐहोल अभिलेख में हर्षवर्धन पर पुलकेशिन द्वितीय की विजय का भी उल्लेख है और इसमें कालिदास एवं भारवि जैसे कवियों की प्रशंसा की गई है। रुद्रदामन प्रथम का जूनागढ़ अभिलेख यह भी बताता है कि उसने सुदर्शन झील की मरम्मत करवाई थी, जिसे मूलतः चंद्रगुप्त मौर्य के समय बनाया गया था।
60. निम्नलिखित में से किस वंश के शासकों को पुराणों में ‘श्रीपर्वतीय’ कहा गया है?
U.P.P.C.S. (Pre) 2020
उत्तर-(b)
इक्ष्वाकु वंश के शासकों को पुराणों में दो नामों से संबोधित किया गया है — ‘श्रीपर्वतीय’ अर्थात् श्रीपर्वत के शासक, और ‘आंध्रभृत्य’ अर्थात् आंध्रों के सेवक। ये पहले सातवाहनों के अधीन सामंत थे परंतु सातवाहन शक्ति के क्षीण होने पर उन्होंने स्वतंत्र राज्य स्थापित किया। इस वंश का संस्थापक श्रीशांतमूल था जिसने कृष्णा नदी की घाटी में शासन किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इक्ष्वाकु वंश के शासक बौद्ध धर्म के संरक्षक थे और उनके काल में नागार्जुनकोंडा तथा अमरावती में बौद्ध स्तूपों का निर्माण हुआ। इस वंश की रानियाँ प्रायः ब्राह्मण धर्म की अनुयायी थीं, जिससे इस काल में दोनों धर्मों का सह-अस्तित्व देखने को मिलता है।
61. हाथीगुम्फा का अभिलेख किस शासक के विषय में जानकारी का स्रोत है ?
U.P.P.C.S. (Pre) 2018
उत्तर-(a)
उड़ीसा (ओडिशा) के भुवनेश्वर के निकट उदयगिरि पहाड़ी की ‘हाथीगुम्फा’ गुफा से खारवेल का एक बिना तिथि का अभिलेख मिला है। यह अभिलेख ब्राह्मी लिपि एवं प्राकृत भाषा में है और इसमें खारवेल के बचपन, शिक्षा-दीक्षा, राज्याभिषेक तथा राजा बनने के बाद के तेरह वर्षों की घटनाओं का क्रमबद्ध विवरण मिलता है। यह खारवेल के इतिहास का एकमात्र प्रमुख स्रोत है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इस अभिलेख में खारवेल के दक्षिण भारत तक के सैन्य अभियानों का भी उल्लेख है जिसमें उसने पाण्ड्य राजाओं को अपनी अधीनता स्वीकार करने पर विवश किया। अभिलेख यह भी बताता है कि खारवेल ने कलिंग की राजधानी में एक भव्य राजप्रासाद का निर्माण कराया था।
62. निम्न कथनों पर विचार कीजिए-
कथन (a) : कुषाण फारस की खाड़ी और लाल सागर से होकर व्यापार करते थे।
कारण (R) : उनकी सुसंगठित नौसेना उच्च कोटि की थी। उपर्युक्त के संदर्भ में निम्न में से कौन-सा सही
कूट : उत्तर है?
कथन (a) : कुषाण फारस की खाड़ी और लाल सागर से होकर व्यापार करते थे।
कारण (R) : उनकी सुसंगठित नौसेना उच्च कोटि की थी। उपर्युक्त के संदर्भ में निम्न में से कौन-सा सही
कूट : उत्तर है?
U.P. Lower Sub. (Pre) 1998
उत्तर-(c)
यह सत्य है कि कुषाण काल में फारस की खाड़ी और लाल सागर के मार्ग से पश्चिमी देशों के साथ व्यापार होता था, जिसके साक्ष्य ‘पेरीप्लस ऑफ द एरीथ्रियन सी’ तथा अरिकामेडु की खुदाई से प्राप्त होते हैं। किंतु इन व्यापारिक संबंधों का कारण उनकी नौसैनिक शक्ति नहीं थी — कुषाणों के पास किसी उल्लेखनीय नौसेना के कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। यह व्यापार मुख्यतः थल एवं समुद्री दोनों मार्गों से निजी व्यापारियों द्वारा संचालित होता था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कुषाण काल में ‘रेशम मार्ग’ (Silk Route) अत्यंत सक्रिय था जो मध्य एशिया से होते हुए चीन और रोम को जोड़ता था, और कुषाण इस मार्ग के महत्वपूर्ण नियंत्रक थे। कुषाण शासक कनिष्क के समय में बौद्ध धर्म मध्य एशिया और चीन तक इसी व्यापारिक मार्ग से फैला।
63. राजा खारवेल का नाम जुड़ा (Figures) है-
43rd B.P.S.C. (Pre) 1999
उत्तर-(c)
कलिंग नरेश खारवेल का नाम हाथीगुम्फा लेख से जुड़ा है। यह अभिलेख उदयगिरि पहाड़ी (भुवनेश्वर के निकट, ओडिशा) पर स्थित हाथी के आकार की गुफा में उत्कीर्ण है। यह खंडित अवस्था में है और इसमें खारवेल के समस्त शासनकाल का लेखा-जोखा मिलता है। खारवेल जैन धर्म का प्रबल समर्थक था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: हाथीगुम्फा अभिलेख में उल्लेख है कि खारवेल ने यवन (यूनानी) राजा डेमेट्रियस के आक्रमण को विफल किया था। इस अभिलेख में महाभारत काल की भाषा ‘मागधी’ के निकट की प्राकृत का प्रयोग हुआ है, जो इसे भाषावैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाता है।
64. निम्नलिखित राजाओं में से कौन जैन धर्म का संरक्षक था?
U.P.P.S.C. (R.I.) 2014
उत्तर-(d)
खारवेल कलिंग का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था जो जैन धर्म का परम संरक्षक था। उसने जैन मुनियों के लिए उदयगिरि और खंडगिरि की पहाड़ियों पर अनेक गुफाएँ निर्मित करवाईं। इसके विपरीत, अशोक बौद्ध धर्म का संरक्षक था, हर्षवर्धन ने बौद्ध एवं शैव दोनों धर्मों को संरक्षण दिया, और पुलकेशिन द्वितीय शैव धर्मावलम्बी था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: खारवेल ने पाटलिपुत्र (मगध) से जैन तीर्थंकर ऋषभनाथ की वह मूर्ति पुनः प्राप्त की जिसे नंद वंश के राजा कलिंग से उठा ले गए थे — यह घटना हाथीगुम्फा अभिलेख में विशेष रूप से उल्लिखित है। खारवेल के काल में कलिंग जैन धर्म का एक प्रमुख केंद्र बन गया था।
65. निम्नलिखित राजाओं में से किसका जैन धर्म के प्रति भारी झुकाव था?
48th to 52nd B.P.S.C. (Pre) 2008
उत्तर-(c)
दिए गए विकल्पों में खारवेल ही एकमात्र शासक था जिसका जैन धर्म के प्रति गहरा अनुराग था। दशरथ मौर्य वंश का शासक था जो आजीवक संप्रदाय का समर्थक था। बृहद्रथ मौर्य वंश का अंतिम शासक था और हुविष्क कुषाण शासक था जो मुख्यतः बौद्ध एवं शैव धर्म को मानता था। खारवेल ने अपने जीवनकाल में जैन संस्थाओं और धार्मिक स्थलों को भरपूर संरक्षण दिया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: खारवेल ने अपने शासन के 12वें वर्ष में एक विशाल जैन सम्मेलन का आयोजन किया था जिसमें देशभर के जैन साधुओं को आमंत्रित किया गया था। वह दिगंबर जैन परंपरा का अनुयायी माना जाता है।
66. कलिंग नरेश खारवेल का संबंध था-
60th to 62nd B.P.S.C. (Pre) 2016
उत्तर-(d)
खारवेल का संबंध एक साथ दोनों नामों — चेदि वंश और महामेघवाहन वंश — से है, इसलिए विकल्प (d) ‘एक से अधिक’ सही उत्तर है। कलिंग के इस वंश का संस्थापक ‘महामेघवाहन’ नामक व्यक्ति था, इसलिए इसे महामेघवाहन वंश कहते हैं। यह मूलतः चेदि वंश की एक शाखा थी, इसलिए इसे चेदि वंश भी कहा जाता है। खारवेल इस वंश का तीसरा और सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘चेदि’ एक प्राचीन जनपद था जो मध्य भारत (वर्तमान बुंदेलखंड क्षेत्र) में स्थित था। कलिंग की चेदि शाखा ने ओडिशा तट पर अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित किया और खारवेल के काल में यह राज्य अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचा।
67. पूर्वी रोमन शासक जस्टिनियन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान किस क्षेत्र में था?
R.A.S./R.T.S. (Pre) 1994
उत्तर-(a)
पूर्वी रोमन (बाइज़ेंटाइन) सम्राट जस्टिनियन प्रथम (527–565 ई.) का सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान विधि (कानून) के क्षेत्र में रहा। उसने बिखरे हुए रोमन कानूनों को संकलित और संशोधित करवाकर ‘कॉर्पस जूरिस सिविलिस’ (Corpus Juris Civilis) नामक विधि संहिता तैयार करवाई जो आगे चलकर यूरोपीय विधि प्रणाली का आधार बनी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:जस्टिनियन ने स्थापत्य कला में भी उल्लेखनीय योगदान दिया — उसने कॉन्स्टेंटिनोपल में विश्व प्रसिद्ध ‘हागिया सोफिया’ (Hagia Sophia) गिरिजाघर का पुनर्निर्माण करवाया, जो अपने विशाल गुंबद के लिए आज भी प्रसिद्ध है। उसने अफ्रीका और इटली में पुनः रोमन साम्राज्य के विस्तार का भी प्रयास किया।
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