मौर्योत्तर काल : ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारतीय इतिहास प्राचीन भारत मौर्योत्तर काल
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मौर्योत्तर काल

➣ इस काल में हिन्दूकुश (खबर दर्रा) से लेकर कर्नाटक एवं बंगाल तक एक ही राजवंश का आधिपत्य नहीं रहा।

➣ हालांकि बीच में करीब सौ वर्षों का व्यवधान हुआ। देश के उत्तर पश्चिमी मार्गों से कई विदेशी आक्रमणकारियों ने आकर कई क्षेत्रों में अपने-अपने राज्य स्थापित कर लिये।

➣ दक्षिण में स्थानीय शासक वंशों ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर लिया। कुछ समय के लिए मध्य क्षेत्र का सिंधु घाटी एवं गोदावरी क्षेत्र से संबंध टूट गया और मगध के वैभव का स्थान कई अन्य नगरों ने ले लिया।

➣ उत्तर भारत में मौर्यों के सबसे महत्त्वपूर्ण देशी उत्तराधिकारी हुए शुंग और उसके बाद कण्व दक्कन तत्पश्चात मध्य भारत में सातवाहन हुए। ये सभी राजवंश ब्राह्मण थे-

वंशसंस्थापक क्षेत्र
शुंग पुष्यमित्र शुंग पूर्वी भारत
कण्व वासुदेवमध्य भारत
सातवाहन सिमुक दक्षिण-भारत

➣ जबकि पश्चिमोत्तर भारत में विदेशी आक्रमणकारियों ने अपना आधिपत्य जमाया-

वंशसंस्थापक क्षेत्र
हिन्द यवन डेमेट्रियस प्रथम स्यालकोट
शक नहपान नासिक
पहलव मिथ्रोडेटस प्रथम तक्षशिला
कुषाण कुजुल कडफिसेस उज्जयिनी

➣ कुषाण से राजा कनिष्क हुआ जिसके द्वारा चलाया गया संवत, शक संवत भारतीय सरकार द्वारा राष्ट्रीय पंचांग के रूप में प्रयोग किया जाता है।

➣ विक्रम संवत की शुरुवात भी मौर्योत्तर काल में ही हुई। एक उज्जैन से शकों को खदेड़ कर स्थानीय शासक ने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की। यहीं से विक्रमादित्य की उपाधि का चलन प्रारम्भ माना गया है।

ज्ञातव्य हो इतिहास में 14 विक्रमादित्य हुए हैं जिसमे अंतिम विक्रमादित्य हिन्दू राजा हेमू (1556 ई. ) था एंव सबसे विख्यात चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य।

➣ कनिष्क की मृत्यु के पश्चात सातवाहन शासक गौतमी पुत्र शातकर्णी का शासनकाल प्रारम्भ होता है। जिसने विदेशियों को पीछे खदेड़ दिया। गौतमी पुत्र शातकर्णी नाम से एक दक्षिण भारतीय फिल्म भी बनी हुई है।

मौर्योत्तर कालीन अभिलेख

रूद्र दामन का गिरनार/ जूनागढ़ अभिलेख

➣ यह संस्कृत भाषा में सबसे बड़ा अभिलेख है। जिसमे रूद्रदामन की शातकर्णी पर विजय का उल्लेख मिलता है।

➣ इसके अलावा इस अभिलेख से सर्वप्रथम विष्णु के साथ लक्ष्मी का उल्लेख प्राप्त हुआ।

➣ इससे सुदर्शन झील का इतिहास भी ज्ञात होता है। इस झील का निर्माण चंद्रगुप्त के समय सौराष्ट्र के गवर्नर पुष्यगुप्त ने करवाया था। अशोक के समय तुषाष्प ने इसमें से नहर निकाली तथा रूद्रदामन ने झील के बांध की मरम्मत करवाई।

अयोध्या अभिलेख

➣ इस अभिलेख को पुष्यमित्र शुंग के उत्तराधिकारी धनदेव ने लिखवाया था।

➣ इसमें पुष्यमित्र शुंग द्वारा कराए गये दो अश्वमेध यज्ञों की चर्चा की गयी है।

➣ इससे शुगों की यवनों पर विजय की पुष्टि होती है।

➣ इससे यह भी पता चलता है कि पुष्यमित्र शुंग ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया था।

बेसनगर अभिलेख

➣ यह अभिलेख यवन राजदूत हेलियोडोरस से संबंधित है, जो गरुड़ स्तंभ के ऊपर खुदा हुआ है।

➣ इससे भागवत धर्म की लोकप्रियता का पता चलता है। इसमें वासुदेव तथा काशीपुत्र भागभद्र (शुग शासक) का उल्लेख किया गया है।

➣ यह लेख मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में स्थित है।

नासिक प्रशस्ति

➣ यह प्रशस्ति गौतमीपुत्र शातकर्णी की मां ने उत्कीर्ण करवाए थे। इसके मुताबिक शातकर्णी ने शक, पल्लव, यवन को हराकर गुजरात, सौराष्ट्र और मालवा पर अधिकार किया।

➣ इसमें शातकर्णी को त्रिसमुद्रतोयपितवाहन (जिसके घोड़ों ने तीन समुद्रों का पानी पिया हो) कहा गया है।

भरहुत का लेख

➣ इस लेख से भी शुगकाल के बारे में जानकारी मिलती है। भरहुत स्तूप का निर्माण पुष्यमित्र शुंग ने करवाया था।

➣ पुष्यमित्र ने सांची के स्तूप की लकड़ी की वेदिका के स्थान पर पत्थर की वेदिका का निर्माण कराया था।

➣ भरहुत लेख में कोशल गणराज्य के अनाथपिण्डक नामक धनी व्यापारी ने बुद्ध की शिष्यता ग्रहण की तथा संघ के लिए जेतवन विहार प्रदान किया, उल्लेख मिलता है।

नानाघाट अभिलेख

➣ यह अभिलेख शातकर्णी प्रथम से संबंधित है। इसके मुताबिक शातकर्णी प्रथम ने दो अवश्वमेध यज्ञ किए थे।

➣ इसके समीप एक गुफा में सातवाहन नरेश शातकर्णी द्वितीय की रानी नायनिका (नागनिका) का एक अभिलेख है, जिसमें उसके द्वारा अश्वमेध, राजसूय यज्ञों सहित कई यज्ञ किए जाने तथा ब्राह्मणों को विभिन्न दान दिए जाने के उल्लेख है।

शिनकोट अभिलेख

➣ बाजौर के शिनकोट नामक स्थान से मिनांडर का पात्र-अभिलेख प्राप्त हुआ है।

➣ इस पात्र में मिनांडर के सामंत विमकमित्र द्वारा शाक्यमुनि के पवित्र अवशेष स्थापित किए गये थे।

➣ शिनकोट मंजूषा अभिलेख से भी मिनांडर का बौद्ध मतानुयायी होना प्रमाणित होता है।

तख्त-ए-बही अभिलेख

➣ यह अभिलेख पेशावर के निकट स्थित है। इस अभिलेख के अनुसार गॉन्डोफर्नीज सबसे शक्तिशाली पहलव राजा था। उसने कम से कम 26 वर्षों तक शासन किया, जो संभवतः 19 से 45 ई. तक रहा।

➣ गॉन्डोफर्नीज के सिक्के, जिनमें से कुछ पर उसका भारतीय नाम गुन्दफर्न अंकित है, यह संभावना दर्शाते हैं कि उसने पूर्वी ईरान और पश्चिमोत्तर भारत, दोनों पर एकछत्र शासन किया होगा।

पंजतर अभिलेख

➣ यह अभिलेख पाकिस्तान के हजारा जिले में स्थित है। इस अभिलेख में महाराज कुषाण का उल्लेख किया गया है।

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