बनबासी का कदम्ब वंश (345-570 ई.)

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➣ चतुर्थ शताब्दी ईस्वी के मध्य से मयूर शर्मा नामक व्यक्ति के नेतृत्व में कदम्बों का दक्षिणापथ के दक्षिण-पश्चिम में उत्कर्ष हुआ।

➣ इस समय समुद्रगुप्त के दक्षिणापथ अभियान के परिणामस्वरूप कांची के पल्लवों की शक्ति अत्यन्त क्षीण हो चुकी थी।

➣ कदम्ब लोग मानव्यगोत्रीय ब्राह्मण थे जो अपने को हारीति पुत्र कहते थे। उनका मुख्य कार्य वेदों का अध्ययन तथा वैदिक यज्ञों का अनुष्ठान करना था। पहले वे पल्लवों की अधीनता स्वीकार करते थे।

मयूरशर्मन (345-360 ई.)

➣ इस वंश के मयूर शर्मन ने पल्लवो के विरूद्ध विद्रोह किया तथा अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दिया। वह कदम्ब वंश का संस्थापक था।

➣ मयूरशर्मन ने पल्लवों के सीमान्त अधिकारियों को परास् श्रीपर्वत के आस पास के घने वनो पर अधिकार कर लिया।

➣ कालान्तर में पल्लव राजाओ ने उससे मैत्री सम्बन्ध स्थापित किया तथा उसे स्वतंत्र शासक स्वीकार कर लिया तथा पश्चिमी समुद्र एवं प्रेहरा (संभवत: तुंगभद्रा व मलप्रभ नदी) के बीच के भूभाग पर उसका प्रभुत्व मान लिया।

➣ बाद की कथाओ में मयूरशर्मन को 18 अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान करने वाला कहा गया है।

बनवासी (वैजयन्ती) उसकी मुख्य राजधानी तथा पालासिका उप-राजधानी थी। मयूरशर्मन ने लगभग 345-360 ई. तक शासन किया।

➣ कदम्बवंशी शासकों की वंशावली एकमात्र तालगुण्ड स्तम्भलेख से ज्ञात होती है।

➣ मयूरशर्मन के पश्चात् काकुत्सबर्मन इस कुल का सर्वाधिक शक्तिशाली राजा हुआ। उन्होने 425 ई. तक शासन किया।

➣ उसके पूर्व तीन राजाओं के नाम ज्ञात होते है- कंगवर्मन् भगीरथ तथा लघु।

कंगवर्मन् के विषय में यह बताया गया है कि उसने वासीम शाखा के वाकाटक नरेश विंध्यसेन के कुन्तल राज्य पर आक्रमण का सफलतापूर्वक प्रतिरोध किया था।

भगीरथ (385-410 ई.)

➣ संभवतः भगीरथ के काल में ही गुप्तशासक चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य ने कालिदास के नेतृत्व में अपना एक दूत मण्डल कुन्तल नरेश के दरबार में भेजा था।

काकुत्सवर्मन (425-450 ई.)

➣ भगीरथ के बडे पुत्र रघु को अनेक शत्रुओ का विजेता कहा गया है। उसके शासन के अन्त में उसका छोटा भाई काकुत्सवर्मन 425 ई. मे राजा बना।

➣ उसका शासन काल अत्यन्त समृद्धिशाली था तथा उसने अपनी कन्याओ का विवाह वाकाटक तथा गुप्त राजवंशो में किया था।

तालगुण्ड प्रशस्ति में काकुत्सवर्मन् की शक्ति की बड़ी प्रशंसा की गयी है। उसने तालगुण्ड में एक विशाल तालाब खुदवाया था। काकुत्सवर्मन ने 450 ई. तक शासन किया।

शान्तिवर्मन (450-475 ई.)

➣ काकुत्सवर्मन का उत्तराधिकारी उसका पुत्र शान्तिवर्मन हुआ। उसे अत्यन्त यशस्वी शासक बताया गया है जो तीन ताज (पट्टत्रय) धारण करता था।

➣ उसके पुत्र मृर्गेश के एक लेख से पता चलता है कि उसने अपने शत्रुओं की लक्ष्मी को उनके महलों से बलपूर्वक खींच निकाला था।

➣ शान्तिवर्मन के काल में कदम्ब राज्य को पल्लवों से खतरा बना हुआ था। अतः उसने अपने राज्य के दक्षिणी भाग को अपने छोटे भाई कृष्णवर्मन् की अधीनता में कर दिया। यह स्पष्टतः राज्य का विभाजन था।

➣ कृष्णवर्मन् ने अश्वमेध यज्ञ किया था। कालांतर में वह पल्लवों के साथ युद्ध में मार डाला गया। उसका पुत्र विष्णुवर्मा पल्लवों द्वारा अभिषिक्त किया गया।

मृगेशवर्मन् (470-488 ई.)

➣ शान्तिवर्मन के बाद उसका पुत्र मृगेशवर्मन् शासक बना। उसका बनवासी तथा पलाशिका दोनो पर अधिकार था। गङ्ग तथा पल्लव शासकों के विरूद्ध उसे सफलता प्राप्त हुयी।

➣ वह अपनी विदूता तथा बुद्धिमत्ता के लिये प्रसिद्ध था। वह एक कुशल सैनिक भी था जिसे घोड़े तथा हाथियों की सवारी का शैक था।

➣ उसने अपने पिता की स्मृति में पलाशिका में एक जैन मन्दिर का निर्माण करवाया था तथा उसे उदारतापूर्वक दान दिया था।

रविवर्मा (500-538 ई.)

➣ मृगेश के बाद रविवर्मा एक महत्वपूर्ण शासक हुआ। हल्सी लेख से पता चलता है कि उसने विष्णुवर्धन तथा अन्य राजाओं को युद्ध में मार डाला एवं पलाशिका से पल्लवों को निकाल कर वहां अपना अधिकार जमा लिया।

➣ उसकी विजयों के फलस्वरूप समस्त प्राचीन कदम्ब राज्य पर उसका अधिकार पुनः स्थापित हो गया।

हरिवर्मा (538-550 ई.)

➣ रविवर्मा का उत्तराधिकारी हरिवर्मा बना। वह शान्त प्रकृति का शासक था। उसके राज्यकाल मे 545 ई. के लगभग चालुक्य नरेश पुलकेशिन प्रथम ने कदम्ब राज्य के उत्तरी भाग को जीत लिया तथा बादामी में अपनी राजधानी बनाई।

➣ कदम्बों में पारिवारिक विवाद के कारण एकता नही थी। उनकी छोटी शाखा (जिसकी स्थापना दक्षिण में कृष्णवर्मा प्रथम ने की थी) के कृष्णवर्मा द्वितीय (550-556 ई०) ने वैजयन्ती पर आक्रमण कर वहां अपना अधिकार कर लिया और इस प्रकार बड़ी शाखा के अन्तिम शासक हरिवर्मा का अन्त हुआ।

कृष्णवर्मा द्वितीय अथवा उसके पुत्र अजवर्मा के समय मे पुलकेशिन प्रथम के पुत्र कीर्त्तिवर्मा ने वनवासी को अन्तिम रूप से जीतकर अपने राज्य में मिला लिया।

➣ इस प्रकार कदम्ब राज्य की स्वाधीनता का अन्त हुआ।

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