➣ चोल शासन का स्वरूप राजतन्त्रात्मक था। केन्द्रीय प्रशासन में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति राजा था। राजा के मौखिक आदेश तिरूवायकेल्वि कहलाते थे।
➣ केंद्रीय प्रशासन का सर्वोच्च अधिकारी राजा होता था।
➣ सम्राट का न्यायालय धर्मासन, धर्मासन का निर्णय धर्मासन भट्ट तथा न्यायाधीशों को धर्मभट्ट कहा जाता था।
➣ राजा की शक्ति और प्रतिष्ठा का पता इस बात से चलता है कि चोल राजाओं और रानियों की मूर्तियां मंदिरों में स्थापित कर उनकी पूजा की जाती है।
➣ राज्यपद वंशानुगत था तथा युवराज ज्येष्ठता के आधार पर राज्य का उत्तराधिकारी बनता था। चोल वंश के शासक अपने शासनकाल में ही उत्तराधिकारी घोषित कर देते थे।
➣ समाज में सरकारी अधिकारियों का एक अलग वर्ग था, जो दो श्रेणियों में विभक्त था। इनमें ऊपरी श्रेणी पेरुन्दनम तथा निम्नस्थ श्रेणी शिरूदनम कहलाती थी। सरकारी पद वंशानुगत होते थे।
➣ राजा के व्यक्तिगत अंगरक्षकों को वेडैक्कार कहा जाता था। राजाओं के स्नानघर एवं भोजनालय का प्रबंध स्त्रियां देखती थी।
➣ राज्य के उच्च अधिकारियों को उडैनकूट्टम कहा जाता था।
➣ उडैनकूट्टम का अर्थ है सदा प्रस्तुत समूह। ये राजा के निजी सहायक होते थे तथा राजा के आदेशों को लिपिबद्ध करते थे। अधिकारियों को वेतन के रूप में भूमि प्रदान की जाती थी।
➣ कुछ प्रमुख अधिकारी निम्न थे :-
| 1. औलेनायकम | प्रधान सचिव के रूप में कच्चे आदेशों की जाँच। |
| 2. तिरून्दनम | एक प्रधान कर्मचारी |
| 3. विडैयाधिकारिन | कार्य प्रेषक |
| 4. नडुविरूक्कै | राजा व प्रजा के मध्य का अधिकारी |
| 5. आणत्ति | राजा के आदेशों को प्रेषित करने वाला अधिकारी |
| 6. मुगवेट्टि एवं पट्टोल | राजस्व विभाग के छोटे कर्मचारी |
| 7. करूमिगल | अधिकारी |
| 8. ककाणी | लेखा विभाग की जांच के लिए नियुक्त अधिकारी। |
➣ चोल अभिलेखों में मन्त्रिमंडल का उल्लेख नहीं मिलता। शासन में राजां के सहयोगी उच्च पदाधिकारी होते थे।
| श्रीमुख | राजा द्वारा स्थानीय संस्थाओं को दिए गये आदेश। |
| पुरवुवीर | एक प्रकार भूमिकर |
| वारिप्पपोत्रगम | लगान |
| पणिमक्कल | नौकर को कहा जाता था। |
| आदिगरिगल | सैनिक व असैनिक व्यक्ति। |
| प्रभुमान्यम’ | राजा के स्वामित्व की भूमि |
| मडप्पुर | मठों को प्रदत्त भूमि |
| ब्रह्मदेय | ब्राह्मणों को दी गई भूमि |
| देवदान, देवाप्रहार व देवभोग | मंदिरों को दी गई भूमि |
| एक भोग्य | ब्राह्मण को निजी उपयोग हेतु दी गई भूमि |
| शालाभोग | शैक्षणिक प्रयोजन के लिए दी गई भूमि। |
| अग्रहार या गणयोग्य | ब्राह्मणों की सामूहिक भूमि। |
➣ सभा कोटि के गाँवों में ब्रह्मदेय और अग्रहार गाँव आते थे। अग्रहार गाँवों की भूमि पर तो दानग्राही ब्राह्मणों का व्यक्तिगत स्वामित्व होता था, पर उनके कामकाज सामूहिक होते थे।
प्रशासनिक व्यवस्था
➣ चोल साम्राज्य प्रान्तों में विभाजित था। प्रान्तों को मण्डलम कहा जाता था। इनकी संख्या छः थी।
➣ चोल साम्राज्य के चरम के समय प्रान्तों की संख्या आठ हो गई, श्रीलंका के मिलने पर यह नौ भी हो जाती थी।
➣ प्रशासन की सुविधा के लिए विशाल चोल साम्राज्य प्रांतों में विभक्त था। प्रांतों को मंडलम् कहा जाता था, जिन पर राजपरिवार के लोग नियुक्त होते थे।
➣ साम्राज्य → मंडलम (प्रांत) → कोट्टम या वलनाडु (कमिश्नरी) →नाडु (जिला) → कुर्रम (गाँव)
➣ मण्डल प्रशासन से लेकर ग्राम प्रशासन तक शासकीय कार्यों की सहायता करने हेतु स्थानीय सभाएँ होती थीं। नाडु की स्थानीय सभा को नट्टार तथा व्यापारिक संघ की सभा को नगरट्टार (नगरम् ) कहते थे।
स्थानीय स्वशासन
➣ चोलों की सबसे महत्वपूर्ण देन स्थानीय स्वशासन है। परान्तक प्रथम के उत्तरमेरूर अभिलेखों से चोलों की स्थानीय स्वशासन व्यवस्था पर प्रकाश पड़ता है।
➣ स्वायत्त शासन प्रणाली के कारण ही चोल वंश को प्राचीन भारत में महत्त्वपूर्ण राजवंश माना जाता है।
➣ स्थानीय प्रशासन में बड़े नगरों में अलग कुर्रम (ग्राम संघ) गठित किये जाते थे जिन्हें तनियूर/तकुर्रम कहा जाता था।
➣ उर एक सामान्य प्रकार की (सर्वसाधारण लोगों की) ग्राम सभा थी, जिसमें ग्राम, पुर या नगर दोनों सम्मिलित थे। उर का शाब्दिक अर्थ पुर है। इसकी कार्यकारिणी समिति को आलुंगणम् कहा जाता था।
➣ सभा या महासभा गाँवों के वरिष्ठ ब्राह्मणों जिन्हें अग्रहार कहा जाता था, की सभा थी अर्थात् यह मूल रूप से अग्रहारों अथवा ब्राह्मण बस्तियों की संस्था थी।
➣ ग्राम तथा नगरों की सभाएं नियमित शासन की मूलभूत इकाइयाँ थीं। नाडु की प्रशासनिक सभाएँ प्रतिनिधियों द्वारा निर्मित होती थीं।
➣ चोल सम्राटों ने स्थानीय प्रशासन व्यवस्था समिति प्रणाली को लागू किया, जिसे वारियम कहा जाता था।
➣ चोल अभिलेखों में मोटे तौर पर तीन प्रकार की ग्राम सभाओं का उल्लेख प्राप्त होता है, वे हैं-उर, सभा या महासभा और नगरम्।
➣ इस काल के स्थानीय स्वशासन में उर तथा सभा या महासभा बालिक सदस्यों द्वारा निर्मित होती थी।
➣ स्थानीय प्रशासन समितियों द्वारा संचालित होता था। इन समितियों को वारियम कहते थे। सामान्यतः वारियम के सदस्यों की कार्य अवधि तीन वर्ष की होती थी।
➣ कुछ प्रमुख समितियाँ इस प्रकार थीं-
- तोट्टवारियम् – उद्यान समिति
- एरिवारियम् – सिंचाई/तालाव समिति
- पोन्वारियम् – मुद्रा नियमन से संबंधित समिति
- सम्वत्सर वारियम् – वार्षिक समिति
➣ वारियम (समिति) की सदस्यता के लिए निम्न शर्तों को पूरा करना पड़ता था।
- 35 से 70 वर्ष के बीच आयु।
- डेढ़ एकड़ अर्थात् 1/4 वेलि भूमि का मालिक होना।
- अपनी भूमि में बने मकान में रहना।
- वैदिक मंत्रों का ज्ञाता होना।
➣ चोरी के अपराध में दण्डित व्यक्ति सदस्य नहीं बन सकता था।
➣ महासभा को पेरुंगुर्रि, इसके सदस्यों को पेरुमक्कल तथा समिति के सदस्यों को वारियप्पेरूमक्कल कहा जाता था। सभा की बैठक गाँव के मन्दिर, वृक्ष के नीचे या जलाशय के किनारे होती थी।
➣ कभी-कभी सदस्यों के चुनाव के नियम सम्राट द्वारा निर्धारित किये जाते थे, किन्तु अधिकतर ग्राम सभा द्वारा ही इसके निर्धारण का प्रचलन था।
➣ सार्वजनिक भूमि पर महासभा का स्वामित्व होता था। गाँव के हित के लिए महासभा कर भी लगाती थी।
➣ समिति के सदस्यों को चुनने के लिए प्रत्येक गाँव को तीस वार्डों में बाँटा गया था। प्रत्येक वार्ड से एक-एक व्यक्ति का चुनाव लॉटरी द्वारा किया जाता था।
➣ नगरम्– व्यापारी समुदाय की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण प्रशासकीय सभा थी। चोल अभिलेख में नगरम् का उल्लेख प्रायः व्यापारिक केन्द्रों के प्रबन्ध कार्य हेतु किया जाता था।
➣ नगरम् की प्रशासनिक व्यवस्था में मुख्यरूप से व्यापारियों को ही सम्मिलित किया जाता था।
➣ ग्राम सभा– यह भूमि कर का संग्रह करती थी तथा संग्रहीत राशि को राजकोष में जमा करती थी। इन्हीं सभाओं द्वारा ग्रामीण विवादों (मुकदमों) का फैसला भी किया जाता था।
➣ मन्दिरों का निर्माण, जीर्णोद्धार तथा उनकी आय-व्यय का उचित प्रबन्धन ग्राम सभाओं का ही उत्तरदायित्व था।
➣ भूमि सर्वेक्षण का कार्य केन्द्रीय सरकार द्वारा किया जाता था, किन्तु भूमि के वर्गीकरण या उसकी श्रेणी में किसी भी प्रकार के परिवर्तन के लिए ग्राम सभा की अनुमति आवश्यक थी।
➣ प्रत्येक ग्राम में मध्यस्थ नामक कुछ वेतन भोगी कर्मचारी होते थे, जो ग्राम सभा के कार्यों में सहायता प्रदान करते थे। ग्राम सभाएं नहरों व तालाबों का निर्माण भी करती थीं।
| नाडु | नाडु की सभा को नाट्टार कहा जाता था। |
| नाडु विनियोगम | नाडु के खर्च के लिये कर। |
➣ दक्षिण भारत में व्यापारियों एवं सौदागरों की बस्तियों को नगरम् कहा जाता था। नगरम् के शासन संचालन में व्यापारियों की प्रमुख भूमिका होती थी।
राजस्व व्यवस्था
➣ भूमिकर राज्य की आय का प्रमुख साधन था। भूमिकर कृषि उत्पादन का एक तिहाई था।
➣ अकाल तथा आपदा की स्थिति में भूमि कर में छूट दी जाती थी, किंतु यह भी उल्लेख मिलता है कि भू-राजस्व न जमा करने पर किसानों की भूमि नीलाम कर दी जाती थी।
➣ चोल अभिलेखों में उपज के अनुसार भूमि को कुल 12 कोटियों में विभाजित किया गया है। व्यापार कर, विवाह कर तथा निकटवर्ती राज्यों में लूटमार भी आय का साधन थे।
➣ चोल अभिलेखों में करों के लिए प्रयुक्त शब्द इरै, वरि, मरूपाडु तथा दण्डम है।
➣ चोल लेखों में सर्वाधिक उल्लिखित कर वेट्टी (बेगार) एवं कडमै (भूराजस्व) है।
➣ राजस्व को आयम, सोने के सिक्के को काशु तथा अन्न के माप को कलम (तीन मण) कहा जाता था। भूमि माप भी कलम कहलाता था। मा एवं वेलि भूमिमाप की इकाई थी।
➣ करों की वसूली ग्रामसभाएं करती थी तथा नगरों में यह काम नगर समितियाँ करती थी।
➣ राजस्व विभाग का प्रमुख वरिपोत्तराक कहलाता था एवं राजस्व विभाग को वारिपोत कहा जाता था।
➣ प्रत्येक नगर एवं गाँव में कुछ भू-क्षेत्र कर मुक्त रहते थे, जैसे कि हस्तशिल्पकारों एवं कारीगरों के आवास स्थान, चाण्डालों की बस्तियाँ, मन्दिर, तड़ाग, नहरें, शमशान भूमि आदि।
➣ चोल अभिलेखों में उल्लिखित प्रमुख कर निम्न हैं:-
| 1. तरिइरै | हथकरघों पर कर |
| 2. मनैइरै | गृहकर |
| 3. सैक्करै (पेविर) | तेलघानीकर |
| 4. सेतैरै | व्यापार कर |
| 5. तत्तारपात्तम (तट्टोलि) | सुनारों पर कर |
| 6. ओलुक्कुनीर पात्तम | पशु व पानी के साधनों, तालाब आदि पर कर |
| 7. उप्पायम | नमक कर |
| 8. वलीआयम | पथकर |
| 9. मरमज्जाड़ि | वृक्षकर |
| 10. कडमै | सुपारी के बागान पर कर, लगान या शुल्क |
| 11. किडाक्काशु | नर पशुधन कर |
| 12. मगन्मै | लुहार, कुम्हार, बढ़ई आदि पर लगने वाला कर/शिल्पकर |
| 13. वाशल्पिरमम् | द्वारकर |
| 14. कढ़इरै | व्यापारिक प्रतिष्ठान पर कर |
| 15. पाडिकावल कूलि | ग्राम पर कर। |
➣ यह स्थानीय प्रधानों को गाँववासियों द्वारा सुरक्षा के बदले दिया जाने वाला कर था।
➣ भूमि को तीन भागों में बाँटा गया था-ब्रहादेय, देवदान तथा शालभोग।
➣ कृषकों को सिंचाई की सुविधा उपलब्ध कराई जाती थी, जिसमें राज्य सरकार के अलावा मंदिरों तथा व्यक्तिगत प्रयासों की भी भूमिका होती थी।
➣ सिंचाई पर कर लगता था। कुछ लोगों को इस कर से छूट मिलती थी, जो सेवाविधि के रूप में जानी जाती थी।
➣ बढ़ई, सुनार, लुहार, धोबी आदि के व्यावसायिक समुदाय थे, जिन्हें कलने कहा जाता था।
➣ नगरों में व्यापारियों के विभिन्न संगठन थे, जिनके लिये बणज्ज शब्द का उल्लेख मिलता है। इन्हें वलजियम्, वलंजियर, बलजि आदि नामों से जाना जाता है। व्यापारिक क्षेत्र के लिये नगरम् का भी प्रयोग हुआ है।
➣ मानक सिक्का कलंजु या कल्याणजू कहलाता था।
➣ चोल काल में मंदिर आर्थिक गतिविधियों के केंद्र थे। ये मंदिर बैंकिंग का कार्य भी करते थे।
➣ दक्षिण भारत में घटिका प्रायः मंदिरों के साथ संबद्ध विद्यालय होते थे।
सैन्य संगठन
➣ चोल सेना के तीन प्रमुख अंग थे-1. पैदल, 2. अश्वारोही, 3. गजारोही
➣ सेना को मुन्रूकई महासेनई अथवा रपडईविडु कहा जाता था।
➣ सेना के बैरक (छावनी) को कड़गम या पडेविडु तथा टुकड़ी को गुल्प कहा जाता था।
➣ थल सेना के प्रमुख अंग निम्नलिखित थे-
- कुडिरैच्चेवगर (अश्वारोही)
- विलीगल (धनुर्धर)
- कुंजिरमल्लर अथवा अनैयाटकल (गजारोही)
- बडपेर्रकौक्कोलर (पैदल सैनिक)
➣ थल सेना के मुख्य अंग थे- धनुर्धर (विल्लिगल), गजारोही (कुजिरमल्ल), घुड़सवार (कुडिरैच्चेवगर) तथा पैदल सेना (बड़पेई कैक्कोलर) आदि।
➣ चोलों की अश्वसेना (मनरुकैमहासनै) में अश्वों का अरब एवं खाड़ी देशों से आयात किया जाता था।
➣ सेना की टुकड़ियों के प्रमुख को नायक व प्रधान सेनापति को महादण्डनायक कहा जाता था।
➣ राजा के निजी अंगरक्षकों को वेडैक्कार (वेलैक्कार) अथवा कैकोलप्तेरुम्बर्ड कहा जाता था।
➣ सेना में अनेक सेनापति ब्राह्मण थे, जिन्हें ब्राह्माधिराज कहा जाता था। न्याय समितियों को न्यायातर कहा जाता है।
➣ चोल शासकों ने नौसेना को भी सुव्यवस्थित ढंग से संगठित किया। रथ सेना का अस्तित्व नहीं था।
➣ युद्ध में विशेष वीरता प्रदर्शित करने वाले सैनिकों को क्षत्रिय शिरोमणि की उपाधि दी जाती थी।
➣ चोल सेना में 70 रेजीमेंट थे। युद्ध में बन्दी बनाये गए स्त्री पुरुष जिन्हें दास बना दिया जाता था, वेलम कहे जाते थे।
➣ राज्य भूमि की उपज का 1/3 भाग भू-राजस्व के रूप में वसूलता था।
➣ प्रशासनिक सुविधा के लिए संपूर्ण साम्राज्य विभिन्न मंडलों में विभक्त था। मंडल, जिनकी संख्या 7-8 थी, क्रमश: नाडु, कुर्रम (कोट्टम) में बंटे हुए थे।
➣ गांव सबसे छोटी प्रशासनिक इकाई थीं।
➣ चोलों के शासनकाल में स्थानीय स्वशासन में उत्तर, सभा, महासभा, नाट्टुर तथा उर का विशेष महत्व था। उर सर्वसाधार की तथा सभा ब्राह्मणों का संगठन था।
➣ महासभा गांवों में होती थी। नाडुओं की समितियां नाट्टुर तथा व्यापारियों की समितियां नगरत्तार (नगरम्) कहलाती थी।
सामाजिक संगठन
➣ चोल समाज में क्षत्रिय व वैश्य वर्ग अनुपस्थित थे। समाज दो भागों ब्राह्मणों व अब्राह्मणों में बंटा हुआ था। अब्राह्मणों में सबसे महत्त्वपूर्ण शूद्र थे।
➣ चोल काल में दक्षिण वर्गीय (वलंगई) तथा वामवर्गीय (इडंगई) औद्योगिक वर्गीय दो समूह थे। दक्षिण वर्गीय जातियाँ मुख्यतः कृषक एवं श्रमिक जातियाँ थी तथा वामवर्गीय जातियाँ हस्त शिल्पकारों या दस्तकारों की जातियाँ थीं।
➣ चोल काल में इडंगई की अपेक्षा वलंगई कहीं अधिक अधिकारयुक्त होते थे। वलंगई का प्रभाव दरबार तथा सेना में कहीं अधिक था। इडंगई लोग अपनी आजीविका व्यापार तथा दस्तकारी के द्वारा चलाते थे।
➣ समाज में कुछ वर्गों को अछूत (परैया) माना जाता था। बेल्लाल शूद्र कृषक थे,लेकिन ये बड़े भूस्वामी थे।
➣ चोलकाल में रथराज नामक नये वर्ग का उदय हुआ, जिनकी उत्पत्ति उच्च वर्ग के पुरुषों और निम्न वर्ग की महिलाओं के संयोग से हुई था।
➣ समाज में सजातीय विवाह के अतिरिक्त अनुलोम और प्रतिलोम विवाह भी होते थे।
➣ पर्दा प्रथा का प्रचलन नहीं था, परंतु सती प्रथा व बहु-विवाह प्रचलित थे। देवदासी प्रथा भी विद्यमान थी।
व्यापार
➣ व्यापार श्रेणियों द्वारा नियन्त्रित होता था जिनमें मणिग्रामम्, वलंजियर तथा नानादेशि प्रमुख थी। इनमें सबसे शक्तिशाली नानादेशि थी।
➣ दसवीं सदी में दक्षिण भारत में कई व्यापारिक संगठनों का उदय हुआ। अभिलेखों में इन संगठनों को समाया कहा गया है।
➣ दक्षिण भारत की दो प्रमुख श्रेणियाँ हैं- आयवोले और मणिग्रामम्। मणिग्रामम आन्तरिक व समुद्र तटीय व्यापार में संलग्न श्रेणी थी।
➣ अंजुवण्णम् तथा वीरवनंजुस विदेशी व्यापारियों की प्रसिद्ध श्रेणियाँ थी। ये श्रेणियाँ मन्दिरों आदि को दान देने व धार्मिक कार्यों के लिए सभा तथा उर में धन जमा कराती थी।
➣ चोल युगीन बन्दरगाह नागापट्टनम, महाबलीपुरम, कावेरीपत्तनम, शालियूर, कोरकई आदि थे। श्रीलंका व दक्षिण भारत के मध्य मुक्त व्यापार का केन्द्र केन्टन का बन्दरगाह था।
➣ कावेरी नदी चोल साम्राज्य की जीवन रेखा थी। कांचीपुरम प्रमुख कपास उत्पादक क्षेत्र था।
➣ कुडमुक्कु क्षेत्र पान-पत्ता एवं सुपारी की उन्नत फसल का उत्पादक क्षेत्र था।
➣ एरिभट्ट व्यक्तिगत दान था जो सिंचाई की व्यवस्थाओं हेतु दिया जाता था, जिससे तालाबों की मरम्मत तथा देखरेख होती थी।
➣ मार्कोपोलो एवं वसाफ कालीकट को भारतीय व्यापार का सबसे बड़ा गोदाम कहते है।
➣ चोल काल में आयातित वस्तुओं में घोड़े सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण थे।
➣ घुमक्कड़ व्यापारियों के समूह को अय्यावोल कहते थे।
➣ मालाबार क्षेत्र में उत्पादित काली मिर्च व सफेद मिर्च का निर्यात क्वीलो बन्दरगाह से किया जाता था।
➣ चोलों द्वारा निर्यातित वस्तुओं में प्रमुख थी-मसाले (कालीमिर्च), औषधियां, कच्चा माल व सूती वस्त्र।
➣ सूती वस्त्र उद्योग अत्यधिक विकसित अवस्था में था। इसका केन्द्र कालीकट था।
➣ निर्यात योग्य नील का उत्पादन त्रावणकोर में होता था। मार्कोपोलो के अनुसार चोल राज्य में उत्तम किस्म का नील तथा हाथीदाँत उत्पन्न होता था।
➣ फारस की खाड़ी स्थित सिराफ संपूर्ण विश्व की सबसे बड़ी व्यापारिक मण्डी थी।
➣ चोल कालीन स्वर्ण सिक्का कलंजु कहलाता था। सोने एवं तांबे का सिक्का काशु (काषु) कहलाता था। सोने के सिक्के को कन्नड़ क्षेत्र में पोन या हून कहते थे। कलंजु एवं काशु में 1 : 2 का अनुपात था।
➣ चोल सिक्कों पर बाघ, मछली एवं धनुष का अंकन हुआ है। सबसे बड़ी मुद्रा निधि/सिक्कों का ढेर धवलेश्वरम से प्राप्त हुआ है। चोलों की मानक स्वर्ण मुद्राएं काशु एवं माडै थी।
कलात्मक विकास
➣ चोलों ने द्रविड़-शैली के अनेक मंदिरों का निर्माण करवाया। चोल द्रविड़ शैली की प्रमुख विशेषता वर्गाकार या ऊँचे विमान थी। आरंभिक चोल मंदिर छोटे थे, परंतु बाद में भव्य मंदिर भी बने।
➣ चोल मंदिरों में विस्तृत प्रांगण, विशाल विमान तथा ऊंचे और अलंकृत गोपुरम् देखने को मिलते हैं।
➣ चोल मन्दिरों के विषय में फर्ग्युसन ने कहा है कि चोल कलाकारों ने दानवों की भांति इनका निर्माण किया तथा रत्नकारों (जौहरियों) के रूप में इनका विन्यास किया।
➣ आर.एस.शर्मा ने चोल मन्दिरों को राज्य के अन्दर राज्य कहा है।
➣ विजयालय द्वारा निर्मित नरतमलै के चोलेश्वर मन्दिर में मन्दिर की बाहरी दीवारों को सुन्दर भित्ति चित्रों से सजाया गया है।
➣ नरत्तमलै का विजयालय चोलेश्वर मंदिर तथा श्रीनिवासनल्लूर कोरण्डनाथ के मंदिर गर्भगृहयुक्त है।
➣ राजराज प्रथम ने राजराजेश्वर या वृहदेश्वर मंदिर का निर्माण तंजौर में करवाया। यह मंदिर एक चतुष्कोण प्रांगण में बना हुआ था। यह 58.5 मीटर ऊंचा था। यह मंदिर द्रविड़-शैली का विशिष्ट उदाहरण है।
➣ वृहदेश्वर मन्दिर का निर्माण 1003-1011 ई. के मध्य हुआ। पर्सी ब्राउन के अनुसार इसका विमान न केवल द्रविड़ शैली की सर्वोत्तम रचना है, अपितु इसे समस्त भारतीय स्थापत्य की कसौटी कहा जाता है।
➣ वृहदेश्वर मन्दिर के बहिर्भाग में एकाश्म नंदी की मूर्ति है जो भारत में नंदी की दूसरी सबसे बड़ी मूर्ति है। यह मन्दिर चोलयुगीन चित्रकला का भी अनुपम उदाहरण है।
➣ राजेंद्र चोल ने गंगैकोंडचोलपुरम् में भी एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया।
➣ चोलकालीन अन्य प्रमुख मंदिरों में ऐरावतेश्वर तथा त्रिभुवनेश्वर के मंदिरों का उल्लेख किया जा सकता है। इस युग की मूर्तिकला का सबसे बढ़िया नमूना कांसे की बनी नटराज की अनेक मूर्तियां प्रस्तुत करती हैं।
➣ पाण्ड्यकालीन कला के अंतर्गत विशाल व अलंकृत गोपुरम इसकी विशेषता थी। मंदिर के प्रवेश द्वार को गोपुरम कहा जाता था।
| प्रमुख मंदिर | शासक | स्थान |
|---|---|---|
| 1. चोलेश्वर मंदिर | विजयालय | नरत्तमलै |
| 2. कोरंगनाथ मंदिर | परान्तक प्रथम (त्रिचनापल्ली) | श्रीनिवासनल्लूर |
| 3. वृहदेश्वर मन्दिर | राजराज प्रथम | तंजौर |
| 4. ऐरावतेश्वर मन्दिर | राजराज द्वितीय | धारासुरम (तंजौर) |
| 5. त्रिभुवनेश्वर मन्दिर | कुलोत्तुंग तृतीय | त्रिभुवन (तंजौर) |
| 6. शिवमन्दिर | – | तिरूवलीश्वरम (तिन्नेवेली) |
| 7. कम्हरेश्वर मंदिर | कुलोत्तुंग तृतीय | त्रिभुवन (कुंभकोणम) |
➣ इस कला के प्रमुख मंदिर है:- 1. तिरूमलाई मन्दिर 2. चिदम्बरम मन्दिर 3. कुंबकोणम् मन्दिर।
राजनीतिक सबध
➣ पल्लव-पांड्य संघर्ष का लाभ उठा कर चोलों ने अपना राजनीतिक प्रभाव बढ़ाना आरंभ कर दिया। चोल शक्ति के पुर्नरूत्थान का श्रेय विजयालय (850 से 871 ई.) तथा परांतक प्रथम (907 से 953 ई.) को दिया जाता है।
➣ राजराज प्रथम के सामुद्रिक अभियान केवल श्रीलंका तक ही सीमित नहीं थे।
➣ श्रीलंका पर अधिकार करने के अतिरिक्त उसने मालदीष द्वीप समूह के विरूद्ध भी सामुद्रिक अभियान किए।
➣ श्रीलंका पर विजय के अतिरिक्त राजेंद्र प्रथम ने कडारम (केद्दह) के श्रीविजय साम्राज्य के विरूद्ध भी सामुद्रिक अभियान किया।
➣ राजेंद्र चोल की बढ़ती हुई शक्ति का प्रभाव दक्षिण-पूर्व एशिया के अन्य देशों पर भी पड़ा।
➣ उसकी शक्ति से भयभीत होकर कम्बुज (कम्पूचिया) के शासक सूर्यवर्मन ने राजेंद्र चोल से मैत्री की याचना की तथा इसे संपुष्ट करने के लिए चोल सम्राट को बहुमूल्य उपहार भेजे।
➣ इस प्रकार राजेंद्र चोल के सामुद्रिक अभियानों से चोलों का प्रभाव दक्षिण-पूर्व एशिया तक पहुंच गया।
➣ समूहों का गठन उद्देश्य विशेष की पूर्ति के लिए किया जाता था। आर्थिक कार्यों (व्यापार) से संबद्ध समूहों में बलंजयार और मनिग्रामम् का उल्लेख चोल अभिलेखों में मिलता है।
➣ मूलपरूदियार नामक समूह मंदिरों का प्रबंध देखता था। प्रत्येक ग्राम और नगर को विभिन्न गलियों में विभक्त कर उनकी व्यवस्था के लिए विभिन्न समूहों का गठन किया जाता था।
चोल कालीन शब्दावली
| वडैक्कार | राजा के व्यक्तिगत अंगरक्षक |
| उडनकूट्टम | राजा के उच्च अधिकारी (मंत्री) |
| नट्टार | नाडु की स्थानीय सभा |
| नगरद्वार (नगरम्) | व्यापारिक संघ की सभा |
| कलम | अन्न के तौल की इकाई |
| काशु | सोने/तांबे के सिक्के |
| वेलि | भूमि माप की इकाई |
| आयाम | राजस्व |
| रित्पोत्तराक | राजस्व विभाग का प्रमुख |
| न्यायत्तार | न्याय समितियां |
| पेरूमक्कल | महासभा (पेरूंगुरिं) के सदस्य |
| वारियप्पेरूमक्कल | समिति के सदस्य |
| वल्लाल | बड़े भूस्वामी व कृषक |
| प्रभुमान्यम् | राजा के स्वामित्व वाली भूमि |
| शालाभोग | शैक्षणिक प्रयोजनों के लिए प्रदत्त भूमि |
चोलकालीन ऐतिहासिक स्थल
| तोण्डमंडल | नवीन चोलवंश से संबंध भूमि संजौर: चोल-साम्राज्य की राजधानी, जहां राजराज प्रथम द्वारा निर्मित बृहदेश्वर मंदिर है। |
| बेलूर | यहां पाण्ड्यों व श्रीलंका की संयुक्त सेना को परांतक प्रथम ने हराया था। |
| तक्कीलम् | यहां 949 ई. में हुए युद्ध में राष्ट्रकूटों द्वारा चोल उत्तराधिकारी राजादित्य की मृत्यु हुई। |
| कण्डलूर | त्रिवेंद्रम के निकट स्थित, जहां राजराज प्रथम ने चेरों को हराया। |
| वेंगी | आंध्रतट पर स्थित, जहां राजराज प्रथम ने पूर्वी चालुक्यों पर प्रभुत्व स्थापित किया। |
| अनुराधापुर | चोलयुग में श्रीलंका की राजधानी, जिसे राजराज प्रथम ने ध्वस्त कर दिया था। |
| पोलन्नरूआ | इसे राजराज प्रथम ने श्रीलंका पर प्रभुत्व कायम कर उसे अपने साम्राज्य का अंग बनाया। |
| अनईमंगलम | यह गांव शैलेन्द्रशासक को चूडामणि विहार के निर्माण के निमित्त दिया गया था। |
| शण्डिमट्टिक्यू | अरबसागर में स्थित क्षेत्र, जहां राजेन्द्र प्रथम ने अपना प्रभुत्व स्थापित किया। |
| गंगैकोण्डचोलपुरम | कावेरीपट्टनम के पास यह नगर राजेन्द्र प्रथम ने उत्तर भारत अभियान की सफलता के बाद बनवाया था। |
| चिदंबरम् | यहां भी चोल शासकों का राज्याभिषेक होता था। |
| उत्तरमेरूर | यहां से चोलवंश से संबद्ध 909 ई.-929 ई. के दो अभिलेख मिले हैं। |
| नेगापट्टम | कोरोमंडल तट पर स्थित, जहां शैलेन्द्रशासक ने राजराज प्रथम के समय विहार बनवाया था। |
| नयम्मिलई | यहां विजयालय चोलेश्वर मंदिर के अवशेष हैं। |
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