9वीं शताब्दी का चोल साम्राज्य : पुनरुत्थान और समुद्री साम्राज्य

भारतीय इतिहास प्राचीन भारत 9वीं शताब्दी का चोल साम्राज्य
📚 विषय सूची

चोल साम्राज्य का पुनरुत्थान (850-1150 ई.) : विजयालय

➣ चोल वंश दूसरी शताब्दी (संगम काल में) के मध्य ही अस्तित्व में आ गया था। उस समय इसका सबसे प्रसिद्ध शासक करिकाल था।

➣ नवीं सदी में विजयालय के नेतृत्व में चोलो का पुनरूत्थान हुआ। इतिहास में सामान्यत: इसे 9वीं शताब्दी का चौल वंश नाम से भी जाना जाता है।

चोल साम्राज्य के राजाओ की सूची

➣ करिकाल के पश्चात चोल राज्य कमजोर हो गया। करिकाल के तीन पुत्रों क्रमश: . मनिनर्लोगल्ली, नेडुमुक्किलि तथा मावलतान के अतिरिक्त संगम साहित्य में चोल वंश के कुछ अन्य राजाओं के नाम भी प्राप्त होते हैं- कोप्परुन्जोलन, पेरुनरकिल्लि, कोचेगणान्मरु आदि।

➣ संगमयुगीन चोल शासकों ने दूसरी-चौथी सदी तक शासन किया।

➣ पल्लव, सातवाहनों के पतन के प्रश्चात दक्षिण भारत में एक शक्तिशाली राज्य बनकर उभरे।

➣ इस समय दक्षिण भारत में राष्ट्रकूटों, चालुक्यों, पल्लवों और पाण्ड्यों में सर्वोच्चता के लिए संघर्ष हो रहा था।

➣ संगम काल का अंतिम चेर शासक सेइयै (लगभग 210 ई.) था, जिसके समकालीन पाण्ड्य शासक नेडुंजेलियन ने इसे पराजित कर चेर राज्य की भी स्वंतत्रता का अंत कर दिया।

➣ 9वीं शताब्दी के मध्य लगभग 850ई. में विजयालय (850-875 ई.) के नेतृत्व में चोल शक्ति का पुनरुत्थान हुआ। इसलिए विजयालय को चोल वंश का द्वितीय संस्थापक भी कहा जाता है। आरम्भ में चोल पल्लवों के सामन्त थे।

मेगास्थनीज के इंडिका और अशोक के अभिलेखों से ज्ञात होता है कि 9वीं-12वीं शताब्दी तक चोल वंश ने तमिलनाडु, आंध्र प्रदेशकर्नाटक पर शासन किया।

➣ इनके समकालीन राष्ट्रकूट दक्षिण क्षेत्र में शक्तिशाली राज्य था। राष्ट्रकूट शासक कृष्ण तृतीय ने 949 ई. में चोल सम्राट परान्तक प्रथम को पराजित किया और चोल साम्राज्य के उत्तरी क्षेत्र पर अधिकार कर लिया था।

➣ हालाँकि राष्ट्रकूट नरेश कृष्ण तृतीय की मृत्यु के पश्चात् राष्ट्रकूटों का पतन होने लगा। अत: चोल एक बार फिर उठे।

9वीं शताब्दी का चोल साम्राज्य
  उरवप्पहर्रे इलन जेत चेन्नी
 करिकाल 190-
 विजयालय 850 – 875 ई.
 आदित्य 875 – 907 ई.
 परान्तक प्रथम 908 – 949 ई.
 परान्तक द्वितीय 956 – 983 ई.
 राजराज प्रथम 985 – 1014 ई.
 राजेन्द्र प्रथम 1014 – 1044 ई.
 राजाधिराज 1044 – 1052 ई.
 राजेन्द्र द्वितीय 1052 – 1064 ई.
 वीर राजेन्द्र 1064 – 1070 ई.
 अधिराजेन्द्र 1070-कुछ महीने
कुलोत्तुंग प्रथम 1070 – 1120 ई.
 विक्रम चोल 1120 – 1133 ई.
 कुलोत्तुंग द्वितीय 1133 – 1150 ई.

कुलोत्तुंग प्रथम वेंगी के चालुक्य का शासक था। क्योंकि अधिराजेन्द्र उसी वर्ष सिंहासन आरूढ़ हुआ था उसी वर्ष उसकी मृत्यु भी हो गयी। उसका कोई पुत्र नहीं था अत : कुलोत्तुंग प्रथम ने चोल वंश की सत्ता संभाली क्योंकि वह चोल राजकुमारी का पुत्र था।

विजयालय (850 – 875 ई.) : चोल साम्राज्य का पुनरुत्थान

➣ विजयालय को चोल साम्राज्य का द्वितीय संस्थापक माना जाता है। आरम्भ में वह पल्लवों का सामन्त था।

➣ विजयालय ने पल्लवों की अधीनता से चोल को मुक्त किया तथा स्वतंत्रतापूर्वक शासन करना आरम्भ किया।

➣ विजयालय ने पाण्ड्य शासकों से तंजौर (तंजावुर) को छीनकर उरैयूर के स्थान पर तंजौर को अपने राज्य की राजधानी बनाई।

➣ तंजौर को जीतने के उपलक्ष्य में विजयालय ने नरकेसरी की उपाधि धारण की थी। तंजौर विजय का उल्लेख तिरूकोयिलूर लेख में मिलता है।

➣ विजयालय ने निशुम्भसूदिनी देवी मंदिर का निर्माण करवाया था।

➣ विजयालय का पुत्र एवं उत्तराधिकारी आदित्य प्रथम लगभग 871-907 ई. में चोल सिंहासन पर बैठा। आदित्य प्रथम (875 – 907 ई.) : पल्लव शक्ति का अंत

➣ इसने चोलों को पूर्ण स्वतन्त्र किया एवं पल्लव सत्ता को समाप्त कर दिया। आदित्य परम शैव भक्त था और उसने शिव के अनेक मंदिर बनाए।

➣ उसने 890 ई. के लगभग अपने समकालीन पल्लव शासक अपराजित वर्मन को परास्त कर उसकी हत्या कर दी तथा तोंडमंडलम्‌ को अपने राज्य में मिला लिया एवं तोण्डेनाडू, नरकेसरी एवं कोदण्डराम की उपाधि धारण की।

➣ पल्लवों की इस पराजय के कारण आदित्य के चोल राज्य की उत्तरी सीमा दक्षिणापथपति राष्ट्रकूटों के राज्य की सीमा के साथ आ लगी।

➣ पल्लवों के अतिरिक्त उसने पाण्ड्यों एवं कलिंग देश के गंगों को भी पराजित किया और मदुरैकोण्ड की उपाधि धारण की।

➣ 949 ई. में राष्ट्रकूट नरेश कृष्ण तृतीय ने पश्चिमी गंगों की सहायता से चोलों पर आक्रमण कर दिया।

➣ इस आक्रमण से तक्कोलम के युद्ध में चोल बुरी तरह पराजित हुये

परान्तक प्रथम (908 – 949 ई.) : मदुरै विजय और विस्तार नीति

➣ परांतक ने 915 ई. में वेल्लूर के युद्ध में नरेश राजसिंह द्वितीय पर आक्रमण कर पाण्ड्यों की राजधानी मदुरै पर अधिकार कर लिया।

➣ पुन: पाण्ड्य नरेश ने श्रीलंका के शासक कस्सप पंचम से सैनिक सहायता प्राप्त कर परान्तक के ख़िलाफ़ युद्ध किया। पर चोल राजा परान्तक से बुरी तरह परास्त हुआ।

➣ 949 ई. में उसे राष्ट्रकूट नरेश कृष्ण तृतीय ने पश्चिमी गंगों की सहायता से तक्कोलम के युद्ध में बुरी तरह परास्त किया तथा साम्राज्य का उत्तरी भाग (तोण्डमण्डलम) राष्ट्रकूट साम्राज्य में मिल गया।

➣ राष्ट्रकूट राजा कृष्ण तृतीय (940-968) ने कांची को एक बार फिर राष्ट्रकूट साम्राज्य में मिला लिया। पर कृष्ण तृतीय केवल कांची की विजय से ही संतुष्ट नहीं हुआ, उसने दक्षिण दिशा में आगे बढ़कर चोलो की राजधानी तंजौर पर आक्रमण कर उसे भी जीत लिया।

➣ तंजोर को जीत के उपलक्ष में उसने तैजजयुकोण्ड की उपाधि धारण की और कुछ समय के लिए चोल राज्य की स्वतंत्र सत्ता का अन्त कर दिया।

➣ परान्तक प्रथम के समय के उत्तरमेरूर के अभिलेखों (919 ई.व 921 ई.) से चोल स्थानीय स्वशासन की जानकारी मिलती है।

➣ उसने मदुरैकोण्ड की उपाधि धारण की। परान्तक प्रथम की एक प्रसिद्ध उपाधि उत्तम चोल भी थी।

➣ ऋग्वेद का टीकाकार वेंकटमाघव उसका समकालीन था।

➣ चोलराज परान्तक के पुत्र राजादित्य ने राष्ट्रकूटों से युद्ध करते हुए वीरगति प्राप्त की।

➣ परान्तक प्रथम ने भूमि का सर्वेक्षण कराया और हेमगर्भ एवं तुलाभार नामक यज्ञ एवं मंदिर बनवाने का भी श्रेय परान्तक को ही जाता है।

➣ उसके उत्तरमेरुर लेख से चोलों के स्थानीय स्वशासन की जानकारी प्राप्त होती है।

अन्य उत्तराधिकारी

➣ परान्तक प्रथम के बाद क्रमशः गंडरादित्य (955 से 957 ई.) एवं अरिन्जय (957 ई.) चोल वंश के शासक हुए। जो अयोग्य साबित हुए।

परान्तक द्वितीय (956-973 ई.) को चोल राजवंश के शासक सुन्दरचोल के नाम से भी जाना जाता था।

➣ उसने समकलीन पाण्ड्य शासक वीर पाण्ड्य को चेबूर मैदान में पराजित किया था एंव तथा श्रीलंका के शासक महिन्द चतुर्थ पर असफल आक्रमण किया।

उत्तमचोल (973-985 ई.) ने चोलों में सर्वप्रथम सोने के सिक्के जारी किये एवं राष्ट्रकूटों से तोण्डमण्डलम जीता।

राजराज प्रथम (985 – 1014 ई.) : चोल साम्राज्य का स्वर्णकाल एवं नौसैनिक शक्ति

➣ यह अरिमोलिवर्मन परान्तक द्वितीय का पुत्र एवं उत्तराधिकारी, परान्तक द्वितीय के बाद चोल राजवंश के सिंहासन पर बैठा। राजराज प्रथम का प्रारम्भिक नाम अरूमोलिवर्मन था।

➣ राजराज के शासन के साथ चोल इतिहास की महानता का युग प्रारम्भ हुआ। उसने मूम्माडिचोल देव, जयगोण्ड, चोल-मार्त्तण्ड, अरिमोलिवर्मन, राजाश्रय, चोलेन्द्र सिंह एवं राजमार्त्ताण्ड आदि उपाधियाँ भी ग्रहण की।

➣ उसने अपने पितामह परान्तक प्रथम की लौह एवं रक्त की नीति का पालन करते हुए राजराज की उपाधि ग्रहण की।

तंजौर अभिलेख में राजराज प्रथम के युद्ध अभियानों का क्रमिक विवरण मिलता है। तिरूवलंगाडु ताम्रपत्र अभिलेखों में राजराज प्रथम की चेरों एवं पाण्ड्यों के विरुद्ध विजयों एवं श्रीलंका विजय का उल्लेख है।

➣ उसने सर्वप्रथम चेरों (केरल शासक रविवर्मा) की नौसेना को कंडलूर में परास्त किया तथा इस विजय के उपलक्ष्य में माण्डलूर शालैकमरुत की उपाधि ग्रहण की।

➣ चेरों के बाद राजराज ने पाण्ड्य शासक अमर भुजंग को पराजित कर राजधानी मदुरै को अपने क़ब्ज़े में कर लिया।

➣ राजराज प्रथम ने श्रीलंका पर आक्रमण कर उसके शासक महेन्द्र (महिन्द) पंचम को पराजित किया और श्रीलंका के उत्तरी भाग को चोल साम्राज्य का एक प्रान्त बना दिया और इसे मुम्डिचोलमण्डलम् का नाम दिया।

➣ चोल सेनाओं ने श्रीलंका की प्राचीन राजधानी अनुराधापुर को नष्ट कर पोलन्नरूआ को चोल प्रान्त की नई राजधानी बनाया व इसका नाम जयनाथ मंडलम रखा।

➣ राजराज के श्रीलंका विजय दक्षिण एवं एशियाई देशों के साथ व्यापार को अपने अधिकार में लाने के उद्देश्य से किया था। उसने श्रीलंका विजय की स्मृति में वहाँ एक शिव मन्दिर का निर्माण कराया।

➣ राजराज प्रथम ने वेंगी के अपदस्थ चालुक्य राजकुमारों (शक्तिवर्मन और विमलादित्य) को चोडभीम के विरुद्ध शरण देकर सैनिक दी।

➣ राजराज ने वेंगी के अपदस्थ राजकुमारों (शक्तिवर्मन एवं विमलादित्य) को चोडभीम के विरुद्ध संरक्षण प्रदान किया। उसने भीम को पराजित करके शक्ति वर्मन को वेंगी का राजा बनाया, अब वेंगी उसका संरक्षित राज्य बन गया।

➣ चोल अभिलेखों से विदित होता है कि राजराज ने कलिंग सहित 12000 पुराने द्वीपों वाले सामूहिक प्रदेशों, जिसकी पहचान लक्षद्वीप एवं मालद्वीप के साथ की गई है को विजित किया।

➣ राजराज ने अपनी यशस्वी विजयों का समापन मालदीव द्वीप समूह की विजय से किया। यह विजय उसकी नौ सेना की अद्भुत उपलब्धि थी।

➣ राजराज प्रथम ने श्रीविजय के शैलेन्द्र शासक श्रीमारविजयोतुंगवर्मन को नागपट्टनम् में एक चूड़ामणि बौद्ध विहार के निर्माण की अनुमति दी, यद्यपि राजराज प्रथम शैव था।

➣ राजराज प्रथम के काल में एक दूतमण्डल चीन गया था।

➣ राजराज प्रथम ने शैव मतानुयायी था। उसने शिवपादशेखर की उपाधि धारण की। उसके द्वारा प्रचलित सिक्कों पर कृष्ण मुरलीधर तथा विष्णु-पद-चिह्न आदि का अंकन उल्लेखनीय है।

➣ राजराज प्रथम ने अपनी रानी लोक महादेवी के साथ तिरूवलजलि मन्दिर में तुलाभार एवं हिरण्यगर्भ नामक यज्ञ किया था। दक्षिण भारत में सर्वप्रथम खड़ी या आसीनस्थ आकृति वाले सिक्के जारी किये है।

➣ उसने 1000 ई. में भूराजस्व के निर्धारण के लिए भूमि का सर्वेक्षण कराया और स्थानीय स्वशासन को प्रोत्साहन दिया।

ग्राम सभाओं एवं स्वशासित निगमों द्वारा सार्वजनिक धन के दुरुपयोग को रोकने हेतु उसने हिसाब के जाँच पड़ताल की व्यवस्था की।

➣ राजराज प्रथम ने मुम्मडिचोल देव, जयगोण्ड, चोलमार्तण्ड, शिवपादशेखर आदि उपाधियाँ भी ग्रहण की।

➣ चोल स्थापत्य कला के क्षेत्र में राजराज का योगदान सर्वथा नवीन रहा। तंजौर में उसके द्वारा निर्मित बृहदेश्वर या राजराजेश्वर मन्दिर (शिव मन्दिर) एवं भवन तमिल स्थापत्य के सर्वाधिक सुन्दर स्मारकों में से है।

➣ राजराज प्रथम ने अपने शासन काल में चोल अभिलेखों का प्रारम्भ ऐतिहासिक प्राक्कथन (प्रशस्ति) के साथ करवाने की प्रथा की शुरुआत की।

राजेन्द्र प्रथम (दक्षिण का नेपोलियन) (1014 – 1044 ई.) : गंगईकोंडचोलपुरम् एवं समुद्री विजय

➣ वह राजराज प्रथम का पुत्र एवं उत्तराधिकारी था। यह अपने पिता के समान ही साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का था। उसके समय नौसेना का सर्वाधिक विकास हुआ।

➣ अपने विजय अभियान के प्रारम्भ में उसने पश्चिमी चालुक्यों, पाण्ड्यों एवं चेरों को पराजित किया। इन राज्यों पर अधिकार करने के पश्चात् उसने अपने पुत्र राजाधिराज प्रथम को पाण्ड्य प्रदेश का वायसराय (महामण्डलेश्वर) नियुक्त किया और उसे चोल पाण्ड्य की उपाधि दी।

➣ राजेन्द्र प्रथम के तिरूवालंगाडु एवं करंबाई (तंजौर) अभिलेखों से उसकी उपलब्धियों की जानकारी प्राप्त होती है।

➣ राजेन्द्र प्रथम ने संपूर्ण श्रीलंका को विजित किया। राजराज प्रथम ने सिर्फ उत्तरी श्रीलंका ही जीता था। स्मिथ ने राजेन्द्र प्रथम को दक्षिण का नेपोलियन कहा था।

➣ लगभग 1017 ई. में सिंहल (श्रीलंका) राज्य के विरुद्ध अभियान में उसने वहां के शासक महेन्द्र पंचम को परास्त कर उसे बंदी बना लिया। सिहंल विजय का उल्लेख करन्दै ताम्रपत्र एवं महावंश में मिलता है।

➣ बंदीगृह में 1029 ई. में महेन्द्र पंचम की मृत्यु हो गई। कालांतर में महिन्द पंचम के पुत्र कस्यप ने दक्षिणी लंका पर पुनः अधिकार कर लिया तथा विक्रमबाहु प्रथम के नाम से वहां राज्य किया।

➣ राजेन्द्र प्रथम के सामरिक अभियानों का महत्त्वपूर्ण कारनामा था- उसकी सेनाओं का गंगा नदी पार कर कलिंग एवं बंगाल तक पहुंच जाना।

➣ राजेन्द्र की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विजय 1035 ई. कडारम (आधुनिक केद्दक) के श्री विजय साम्राज्य के विरुद्ध सफल सैनिक अभियान था। श्री विजय साम्राज्य मलाया प्रायद्वीप, सुमात्रा, जावा और निकटवर्ती द्वीपों तक फैला था।

➣ चोल जहाजी बेड़े ने बंगाल की खाड़ी को पारकर कडारम के श्रीविजय नरेश संग्राम कुलोतुंगवर्मन को पराजित किया और निकोबार द्वीप समूह एवं मलय प्रायद्वीप के मध्य कडारम सहित बारह द्वीपों पर अधिकार कर लिया।

➣ श्रीविजय साम्राज्य के विरुद्ध राजेन्द्र चोल के अभियान का उद्देश्य भारतीय व्यापारियों के मार्ग में चीन से व्यापार में आ रही बाधाओं को दूर करना था। श्रीलंका एवं महाद्वीप पर जलसेना के कारण चोल नियन्त्रण बना हुआ था, जिसके कारण पूर्वी जगत विशेषतः चीन के साथ व्यापार को भी प्रोत्साहन मिल रहा था।

➣ श्रीविजय साम्राज्य के विरुद्ध राजेन्द्र चोल की सफलता के कारण चीन के साथ व्यापारिक संपर्क पहले से आसान हो गया। राजेन्द्र प्रथम ने इस उपलक्ष्य में कडारकोंड एवं कटाहधिपति की उपाधि धारण की।

➣ उसने बंगाल के पाल शासक महिपाल प्रथम को पराजित कर गंगाघाटी के अभियान की सफलता पर गंगैकोण्डचोल की उपाधि धारण की तथा गंगैकोण्डचोलपुरम (वर्तमान में त्रिचनापल्ली में) नामक नयी राजधानी की स्थापना की। गंगाघाटी के अभियान का नेतृत्व राजेन्द्र प्रथम के पुत्र विक्रम चोल ने किया।

➣ नवीन राजधानी के निकट सिंचाई के लिए चोलगंगम नामक तालाब का निर्माण करवाया।

➣ राजेन्द्र प्रथम पहला भारतीय चोल शासक था जिसने अरब सागर पर अपनी प्रभुता कायम की। अरब सागर स्थित सदिमन्तीब द्वीप पर अपना अधिकार स्थापित किया। चोल शासक द्वारा यह पश्चिम का सर्वप्रथम अभियान था।

➣ राजेन्द्र द्वारा बंगाल पर आक्रमण निश्चित रूप से तमिल प्रदेश से प्रथम उत्तरी सैनिक अभियान था। उसके समय बंगाल की खाड़ी चोलों की झील कहलाती थी।

➣ राजेन्द्र चोल के शासन काल में दक्षिण भारत में वैदिक शिक्षा एवं दर्शन का प्रचुर विकास हुआ। उसने वैदिक साहित्य के अध्ययन के लिए एक विशाल विद्यालय की स्थापना करवायी। उसके विद्यानुराग की पुष्टि उसकी उपाधियों जैसे- पण्डित चोल, मुडिगुंडचोल आदि से होती है।

➣ उसने दो बार (1016 ई. व 1033 ई.) व्यापारिक दूतमण्डल चीन भेजा।

राजाधिराज प्रथम (1044 – 1052 ई.) : चालुक्यों के विरुद्ध संघर्ष

➣ राजाधिराज प्रथम (1044-1052 ई.), राजेन्द्र प्रथम का पुत्र था और उसके बाद राज्य का वास्तविक उत्तराधिकारी था। उसने चेर-पाण्ड्य तथा श्रीलंका के संघ को तोड़ने में सफलता प्राप्त की।

➣ उसके शासन काल में पाड्य, चेर वंश और सिंहल (श्रीलंका) के राज्यों ने स्वतंत्र होने का प्रयत्न किया, पर चोलराज ने उन्हें बुरी तरह से कुचल डाला।

➣ राजाधिराज ने तत्कालीन चालुक्य नरेश सोमेश्वर प्रथम आहवमल्ल को धान्यकटक तथा पुण्डूर के युद्ध में पराजित किया तथा चालुक्य राजधानी कल्याणी पर अधिकार कर लिया। इस विजय के उपलक्ष्य में राजाधिराज ने वहीँ अपना वीरभिषेक करवाकर विजय राजेन्द्र की उपाधि ग्रहण की थी।

➣ राजधानी कल्याणी की विजय स्मृति के रूप में वहां से एक द्वार पालक की मूर्ति लाकर राजाधिराज ने उसे तंजौर नगर के रासुरम नामक स्थान पर स्थापित करवाया।

➣ कालान्तर में लगभग 1050 ई. में सोमेश्वर ने चोल सेनाओं को अपने प्रदेश से बाहर खदेड़ दिया और साथ ही वेंगी के शासक राजाराम को अपनी अधीन कर लिया।

➣ राजाधिराज प्रथम ने अश्वमेध यज्ञ भी किया, जिसका मणिमंगलम लेख में उल्लेख है।

कोप्पम का युद्ध (1054 ई.)

➣ यह युद्ध दक्षिण भारत में प्रभुत्व स्थापित करने तथा कृष्णा-तुंगभद्रा क्षेत्र एवं वेंगी पर नियंत्रण के लिए हुआ।

➣ चोल पक्ष का नेतृत्व राजाधिराज प्रथम कर रहे थे, जबकि चालुक्य पक्ष का नेतृत्व सोमेश्वर प्रथम के हाथों में था।

➣ युद्ध के दौरान राजाधिराज प्रथम वीरगति को प्राप्त हुए, जिससे चोल सेना में कुछ समय के लिए अव्यवस्था फैल गई।

➣ इसके बाद छोटे भाई राजेंद्र द्वितीय ने सेना का नेतृत्व संभाला, सैनिकों को पुनर्गठित किया और अंततः चालुक्यों को पराजित कर चोलों को विजय दिलाई।

➣ कहा जाता है कि युद्धभूमि में ही राजेन्द्र द्वितीय का राज्याभिषेक किया गया था। यह युद्ध चोल सैन्य शक्ति, वीरता और नेतृत्व क्षमता का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है।

➣ राजाधिराज प्रथम को अनमेरूथजिन (हाथी की पीठ पर मृत्यु को प्राप्त) कहा गया है। उसने भूपेन्द्र चोल की उपाधि धारण की थी।

राजेन्द्र द्वितीय (1052 – 1064 ई.) : कोप्पम युद्ध में विजय

कोप्पम के युद्ध में राजाधिराज की हत्या के बाद इसने कल्याणी के चालुक्यो को पराजित कर युद्ध भूमि में ही अपना राज्याभिषेक करवाया तथा कोल्हापुर में विजयस्तम्भ स्थापित किया एवं प्रकेशरी उपाधि धारण की।

➣ राजेन्द्र द्वितीय ने 1062 ई. में कुंडलसंगमम् में चालुक्य (सोमेश्वर प्रथम) सेना को पराजित किया था।

➣ उसने अपनी पुत्री का विवाह पूर्वी के चालुक्य नरेश राजेन्द्र के साथ किया था।

वीर राजेन्द्र (1064 – 1070 ई.) : चोल सत्ता का सुदृढ़ीकरण

➣ राजेन्द्र द्वितीय की मृत्यु के बाद उसका छोटा भाई वीर राजेन्द्र गद्दी पर बैठा। उसें राजकेसरी की उपाधि धारण की थी।

➣ उसने 1060 ई. के आसपास अपने परम्परागत शत्रु पश्चिमी चालुक्यों को कुडलसंगमम् के मैदान में पराजित किया। इस विजय के उपलक्ष्य में वीर राजेन्द्र ने तुंगभद्रा नदी के किनारे एक विजयस्तम्भ की स्थापना करवाई।

➣ पश्चिमी चालुक्य नरेश सोमेश्वर युद्ध में के असाध्य रोग के कारण कूड्डल-संगमम् के युद्ध में उपस्थित न हो सका सोमेश्वर ने अपने अपमान एवं रोग से त्रस्त होकर तुंगभद्रा में डूबकर आत्महत्या कर ली।

➣ पश्चिमी चालुक्य साम्राज्य के ख़िलाफ़ एक अन्य अभियान में कम्पिलनगर को जीतने के उपलक्ष्य में करडिग ग्राम में एक और विजयस्तम्भ स्थापित करवाया था।

➣ उसने सिंहल नरेश विजयबाहु प्रथम के विरुद्ध सैनिक अभियान कर उसे पराजित कर वातगिरि में शरण लेने के लिए बाध्य किया।

➣ वीर राजेन्द्र के द्वारा कडारम् को जीतने का भी प्रयास किया गया था।

अधिराजेन्द्र (1070 ई.) : चोल उत्तराधिकार संघर्ष

➣ वीर राजेन्द्र की मृत्यु के बाद अधिराजेन्द्र (1070 ई.) सिंहासन आरूढ़ हुआ। वह चोल साम्राज्य की शक्ति को अक्षुण्ण रखने में असमर्थ रहा।

➣ अधिराजेन्द्र शैव धर्म का अनुयायी था। उसके समकालीन प्रसिद्ध वैष्णव आचार्य रामानुज से इतना द्वेष करता था कि, रामानुज को उसके राज्य काल में श्रीरंगम छोड़कर अन्य स्थान जाना पड़ा।

➣ उसके शासन काल में सर्वत्र विद्रोह शुरू हो गए और इन्हीं के विरुद्ध संघर्ष करते हुए अपने राज्य के पहले साल में ही उसकी मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के साथ ही चोल वंश समाप्त हो गया।

➣ अशांतिमय परिस्थिति का लाभ उठाकर राजेन्द्र द्वितीय कुलोत्तुंग प्रथम के नाम से चोल राजसिंहासन पर बैठा।

➣ चूँकि वेंगी के चालुक्य कुलोत्तुंग प्रथम चोल राजकुमारी का पुत्र था इसलिए उसे चोल सिंहासन भी प्राप्त हो गया। अब वेंगी के चालुक्य तथा चोल राज्य परस्पर एक हो गए।

➣ इसे 1070 ई0 के लगभग वेंगी का अस्तित्व समाप्त हो गया। इसके बाद का चोल इतिहास चोल-चालुक्य वंशीय इतिहास के नाम से जाना जाता है।

चोल+चालुक्य वंश

➣ इस वंश का संस्थापक राजेन्द्र द्वितीय, विष्णुवर्धन (पूर्वी चालुक्य) का पुत्र था। वह चोल शासक अधिराजेन्द्र की मृत्यु के पश्चात अशांतिमय परिस्थिति का लाभ उठाकर वह कुलोत्तुंग प्रथम के नाम से चोल राजसिंहासन पर बैठा।

9वीं शताब्दी में चोल+चालुक्य वंश

कुलोत्तुंग प्रथम (1070 – 1120 ई.) : चोल-चालुक्य एकता एवं प्रशासनिक सुधार

➣ विल्हण के विक्रमांकदेवचरित से ज्ञात होता है उसने दक्षिण के चालुक्य नरेश विक्रमादित्य षष्ठ को पराजित किया था।

➣ 1075-76 ई. में कुलोत्तंग ने कलचुरी शासक यशकर्णदेव को तथा 1100 ई. में कलिंग नरेश अनन्तवर्मा चोडगंग को पराजित किया।

➣ कुलोत्तुंग के शासन काल में सिंहली (श्रीलंका) नरेश विजयबाहु ने अपने को स्वतंत्र घोषित कर लिया।

➣ बौद्ध महावंश से प्राप्त ;जानकारी के अनुसार , कुलोत्तुंग ने उसकी स्वतन्त्रता में हस्तक्षेप न कर उससे मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाकर सिंहली राजकुमार वीरप्पेरुमाल के साथ अपनी पुत्री का विवाह करा लिया।

➣ कुलोत्तुंग प्रथम ने चोल शासक राजेन्द्र द्वितीय की पुत्री मधुरान्तकी से विवाह किया। वह सर्वाधिक समय तक शासन करने वाला चोल शासक था।

राजराज प्रथम की तरह कुलोत्तुंग ने भी भूराजस्व निर्धारण के लिए भूमि का पुनः सर्वेक्षण कराया।

➣ उसने व्यापार की प्रगति में बाधक चुंगियों तथा तटकरों को समाप्त कर दिया, जिसके कारण उसे शुंगम् (करों को हटाने वाला) की उपाधि मिली।

➣ कुलोतुंग प्रथम के स्वर्ण सिक्कों पर उसकी कुछ उपाधियाँ जैसे- कटैकोण्डचोल तथा मलैनडुकोण्डचोलन का उल्लेख प्राप्त होता है।

➣1090 ई. में कडारम नरेश ने कुलोत्तुंग के पास अपना दूत भेजा एवं नागपट्टम स्थित चूड़ामणि बौद्ध विहार को दान दी गई भूमि को करमुक्त करवाया।

1077 ई. में उसने 72 व्यापारियों का एक व्यापारिक शिष्टमण्डल चीन भेजा।

➣ उसके शासक काल में मलय प्रायद्वीप के साथ चोलों के सुदृढ़ व्यापारिक एवं सांस्कृतिक सम्बन्ध रहे।

➣ कुलोत्तुंग प्रथम के स्वर्ण सिक्कों पर उसकी कुछ उपाधियाँ जैसे कटैकोण्डचोलन तथा मलैनडुकोण्डचोलन का उल्लेख है।

➣ अपने शासन के अन्तिम वर्षों में कुलोत्तुंग प्रथम ने कलिंग के विरुद्ध दो बार अभियान किया। उसके द्वितीय कलिंग अभियान का उल्लेख कलिंगतुप्परणी नामक महाकाव्य में मिलता है। इसके लेखक जयन्गोन्दार थे।

➣ कुलोत्तुंग प्रथम के समय में अदियरक्कुनल्लर ने शिलप्पादिकारम पर टीका लिखी।

➣ इसने तिरूवाडुतुरू में एक चिकित्साविद्यालय की स्थापना की, जहाँ चरक संहिता एवं अष्टांग हृदय जैसे ग्रन्थों का अध्ययन होता था।

➣ वैष्णव सुधारक रामानुज को कुलोत्तुंग प्रथम के कारण श्री रंगम छोड़ना पड़ा। फिर उसने मैसूर में होयसल शासक विट्टिग विष्णु वर्धन के यहां शरण ली।

➣ कुलोत्तंग प्रथम के शासन के अन्तिम दिनों में वेंगी व मैसूर स्वतन्त्र हो गये थे। इस समय कुलोत्तुंग का शासन केवल तमिल प्रदेश एवं कुल तेलुगू क्षेत्रों तक सीमित रह गया।

विक्रम चोल (1120 – 1133 ई.) : चोल सत्ता का पुनर्संगठन

➣ वह कुलोत्तुंग प्रथम का पुत्र था। जो पिता की मृत्यु के पश्चात राजसिंहासन पर आसीन हुआ था। वह धार्मिक दृष्टि से असहिष्णु प्रवृत्ति का व्यक्ति था। उसने अकलक एवं त्याग समुद्र की उपाधियाँ धारण की थीं।

➣ वेंगी शासक विक्रमादित्य षष्ठ के पश्चात् विक्रम चोल ने पुनः वेंगी पर अधिकार कर लिया। 1133 ई. के लगभग उसने पश्चिमी चालुक्य नरेश सोमेश्वर तृतीय को पराजित किया।

➣ उसने अकाल एवं बाढ़ के समय में प्रजा से जबरन राजस्व वसूल कर, चिदम्बरम् के मन्दिर को सुसज्जित किया।

कुलोत्तुंग द्वितीय (1133 – 1150 ई.) : धार्मिक संरक्षण एवं मंदिर निर्माण

➣ कुलोत्तुंग द्वितीय विक्रम चोल का पुत्र था। इस शासक की कोई भी राजनीतिक उपलब्धि नहीं थी। कुलोत्तुंग ने चिदम्बरम मंदिर के विस्तार एवं प्रदक्षिणापथ को स्वर्णमंडित कराने के कार्य को जारी रखा।

➣ कुलोत्तुग द्वितीय कट्टर शैव था तथा उसने गोविन्दराज की प्राचीन वैष्णव मूर्ति को समुद्र में फिंकवा दिया। यह प्रतिमा चिदम्बरम के नटराज (शिव) मन्दिर के प्रांगण में स्थित थी।

➣ रामानुज ने गोविन्दराज की मूर्ति को समुद्र से निकलवा कर तिरूपति में स्थापित करवाया। गोविन्दराज की यह मूर्ति लम्बे समय बाद विजयनगर के रामराय ने पुनः अपने मूल स्थान चिदम्बरम के नटराज मंदिर में स्थापित करवाई।

➣ कुलोत्तंग द्वितीय और उसके सामन्तों ने ओट्टाकुट्टन, शेक्किलर और कंबल को संरक्षण दिया था।

➣ उसने कुंभकोणम के निकट तिरुभुवन में कम्पोरेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया एंव चिदम्बरम के नटराज मन्दिर के निर्माण कार्य को पूर्ण करवाया।

राजराजा द्वितीय (1150 – 1173 ई.) : दारासुरम् मंदिर का निर्माण

➣ यह कुलोत्तुंग द्वितीय का पुत्र तथा उत्तराधिकारी था जिसने लगभग 1150 ई. से 1173 ई. तक शासन किया। उसे चोल साहित्य में मुक्तमिल कुततिलैयन (तमिल संरक्षक) कहा गया है।

➣ उसका राज्य सम्पूर्ण तेलगू प्रदेश, कोगूनाद के अधिकांश भागों तथा गड्गवाडि के पूर्वी भगा तक फैला हुआ था। उसके समय में चारो ओर शक्तिशाली सामंतों का उदय हुआ।

➣ उसके कोई पुत्र नहीं था। अत: 1166 ई. में उसने विक्रमचोल के पौत्र (पुत्री के पुत्र) राजाधिराज द्वितीय को अपना युवराज नियुक्त किया।

राजाधिराज द्वितीय (1173 – 1182 ई.) : पांड्य संघर्ष एवं चोल प्रभुत्व

➣ यह राजराज का उत्तराधिकारी था। इस समय पांड्य वंश में कुलशेखर तथा वीर पांड्य के बीच उत्तराधिकार के लिये संघर्ष हुआ था।

➣ राजाधिराज ने वीर पांड्य का पक्ष लिया तथा कुलशेखर का समर्थन श्रीलंका के राजा पराक्रमबाह ने किया।

➣ राजाधिराज को सफलता मिली तथा उसने वीर को पांड्यों का राजा बनाया। परंतु इससे चोलों को कोई लाभ नहीं हुआ।

कुलोत्तुंग तृतीय (1182 – 1216 ई.) : चोल साम्राज्य का अंतिम शक्तिशाली शासक

➣ यह राजधिराज का उत्तराधिकारी था परंतु राजाधिराज के साथ उसका संबंध अज्ञात है। वह चोल साम्राज्य का अंतिम शासक था।

1182 ई. में उसने वीरपांड्य को पराजित किया तथा उसे अपनी अधीनता में रहने के लिये बाध्य किया। कुलोत्तुंग ने होयसलचेर राजाओं को भी जीतकर अपनी अधीनता में किया।

➣ कुछ समय बाद पांड्यों ने जटावर्मन कुलशेखर के नेतृत्व में पुनः विद्रोह किया। 1205 ई. में कुलोत्तुगड् ने पांड्य राज्य पर आक्रमण किया।

➣ उसकी सेना ने मदुरा लूटा तथा पांड्यों के अभिषेक मंडल को ध्वस्त कर दिया। परंतु कुलशेखर को उसका राज्य पुन: वापस कर दिया गया।

राजराज तृतीय (1216 – 1250 ई.) : चोल साम्राज्य का पतन प्रारंभ

➣ कुलोत्तुग का उत्तराधिकारी राजराज तृतीय एक निर्बल राजा था। उसके राज्य में चतुर्दिक विद्रोह व अराजकता फैल गयी।

पांड्य नरेश सुंदर ने उसके राज्य पर आक्रमण कर उसे बंदी बना लिया परंतु होयसल नरेश नरसिंह द्वितीय की सहायता से उसे मुक्ति मिली।

तेल्लारू के युद्ध में उसे यादव सरदार कोप्पेरूजिंग ने परास्त कर बंदी बना लिया।

1231 ई. में होयसल सेना की सहायता से वह पुनः अपनी स्वतंत्रता एवं राज्य पाने में सफल हुआ।

➣ राजराज किसी प्रकार 1250 ई. तक राज्य करता रहा, परंतु उसका अधिकार नाममात्र का ही रहा।

➣ चोलकाल में सर्वाधिक महत्वपूर्ण लेख राजराज तृतीय का तिरूवेन्दिपुरम लेख है।

राजेन्द्र तृतीय (1250 – 1279 ई.) : चोल वंश का अंतिम शासक

➣ यह चोल वंश का अंतिम शासक था। उसने चोल-शक्ति का पुनरूद्धार करने का प्रयास किया। उसने पांड्यों पर आक्रमण कर सुंदरपांड्य द्वितीय को पराजित किया।

➣ परंतु चालुक्य नरेश सोमेश्वर तृतीय ने पांड्यों का साथ दिया जिससे राजेन्द्र को प्रयास सफल न हो सके। उसने एक युद्ध में राजेन्द्र को परासत किया तथा बाद में उससे संधि कर ली।

1251 ई. में पाण्ड्य वंश का शासन जटावर्मन् सुंदरपांड्य नामक एक शक्तिशाली राजा के हाथ में आया।

➣ उसने चालुक्य, होयसल तथा काकतीय राज्यों को जीता और चोल शासक राजेन्द्र तृतीय को अपनी अधीनता में रहने के लिये बाध्य किया।

➣ इसके बाद 1279 ई. तक वह पांड्य नरेश के सामंत की के रूप में से शासन करता रहा।

➣ 1279 ई. में उसे पांड्य शासक कुलशेखर के हाथों पुनः पराजित होना पड़ा। इसके साथ ही चोल-राज्य तथा शासन का अंत हुआ।

पांड्य नरेश कुलशेखर समस्त चोलमंडल का सार्वभौम शासक बन बैठा।

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